| blocks | | id | "Mithyatvanumanakhanadanam-1" |
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| oldKey | "MTK_C01_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MTK_C01" |
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| chapter | "MTK_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "‘विमतं मिथ्या दृश्यत्वात्, यदित्थं तत्तथा, यथा सम्प्रतिपन्नम्(शुक्तिरजतम्) ’ इत्युक्ते जगतोऽभावादाश्रयासिद्धः पक्षः । अनिर्वचनीयासिद्धेरप्रसिद्धविशेषणः । सदसद्वैलक्षण्ये मिथ्यात्वे सिद्धसाधनता । दृश्यत्वाभावादसिद्धो हेतुः । अनिर्वचनीयासिद्धेरेव सपक्षाभावाद्विरुद्धः । आत्मनोऽपि दृश्यत्वादनैकान्तिकः । जगतोऽभावेऽनुमानस्याप्यभाव इति तर्कबाधितत्वेनानध्यवसितः । प्रत्यक्षादिविरुद्धत्वाद् ‘विश्वं सत्यम्’ इत्यादिवाक्यविरुद्धत्वाच्च कालात्ययापदिष्टः । ‘रजतं दृष्टम्’ इति भ्रममात्रत्वात् ‘विमतं सत्यं दृश्यत्वात्, आत्मवत्’इत्यपि प्रयोज्यत्वात् प्रकरणसमः । ‘विमतं सत्यं प्रमाणदृष्टत्वात्, यदित्थं तत्तथा, यथात्मा’ इति प्रयोगात् सप्रतिसाधनः । शुक्तिरजतस्याप्यनिर्वचनीयत्वाभावात् साध्यविकलो दृष्टान्तः । उक्तप्रकारेण दृश्यत्वाभावात् साधनविकलः । प्रमाणविरुद्धत्वमुपाधिः ।" |
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| id | "Mithyatvanumanakhanadanam-2" |
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| oldKey | "MTK_C01_B02" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MTK_C01" |
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| chapter | "MTK_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "साध्यधर्मविशिष्टः पक्षः । साध्यसमानधर्मविशिष्टः सपक्षः । साध्यविपरीतधर्मविशिष्टः विपक्षः । पक्षवचनं प्रतिज्ञा । लिङ्गं हेतुः । निदर्शनं दृष्टान्तः ॥" |
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| id | "Mithyatvanumanakhanadanam-3" |
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| oldKey | "MTK_C01_B03" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MTK_C01" |
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| chapter | "MTK_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "यो दृश्यते सदानन्दनित्यव्यक्तचिदात्मना । निर्दोषाखलिकल्याणगुणं वन्दे रमापतिम् ॥" |
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