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| | #REDIRECT [[Bruhadaranyaka#BR_C03_S06]] |
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| | title = गार्गिब्राह्मणम्
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| | verse_line1 = अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी प्रपच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति, कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेति गन्धर्वलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नुखलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेति अन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु चंद्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेति इंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु इंद्रलोकाः ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि माऽतिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपतदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि माऽतिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥ १ ॥
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| ॥ इति गार्गिब्राह्मणम् ॥
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| मुक्तानां तारतम्यं हि गार्गिब्राह्मणेनोच्यते । लोका इति मुक्तानामानन्दानुभवाः स्वरूपभूताः । अप्सु वायाविति स्वरूपस्यैव प्रस्तुतत्वात् । अनतिप्रश्नां वै देवतामतिपृच्छसीति देवतास्वरूपप्रश्नस्यैवावगम्यमानत्वाच्च । न चोपरितनलोकेषु अधस्तनलोकाः आश्रिताः । न च वायुर्गन्धर्वलोकाश्रितः । वाय्वाश्रयत्वश्रुतेः सर्वलोकानाम् । वायुना हि सर्वे लोका नेनीयन्ते इत्यादिना । सप्तस्कन्धगतो लोकान् यो बिभर्ति महाबलः इति हरिवंशेषु । न चानतिप्रश्नत्वं लोकमात्रस्यास्ति । अधस्तनेषु चोपरितना लोकास्तिष्ठन्ति । न च मरुतामेकोऽपि गन्धर्वलोकादवरो विद्यते ।
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| उक्तं च
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| आ पिबन्त्यखिलान् भोगानित्यापश्चक्रवर्तिनः ।
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| मुक्तास्तेषां वायुसुतश्चक्रो नाम व्यपाश्रयः ॥
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| मुक्तस्तस्य च मुक्तस्तु मरुद्गन्धर्वनामवान् ।
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| सुतो वायोस्तत्सुखानां मौक्तानामन्तरिक्षगः ॥
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| मरुतामेक एवासावन्तरिक्षस्तु वायुजः ।
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| तत्सुखानां च मौक्तानामानन्दाः सूर्यरूपकाः ॥
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| सौराणां चापि मौक्तानामानन्दाश्चंद्ररूपकाः ।
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| आह्लादनाच्चन्द्रनामा देवोऽसावनिरुद्धकः ॥
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| स एव चन्द्रमाविश्य स्थितश्तन्नामकोऽपि सः ।
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| अनिरुद्धसुखानां च मौक्तानामिन्द्र आश्रयः ॥
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| नक्षत्रनामवानिन्द्रो नैवान्यः क्षत्रियोऽस्य हि ।
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| विद्यते त्रिषु लोकेषु ब्रह्माद्यास्तूर्ध्वलोकगाः ॥
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| आनन्दानां तथेंद्राणां मौक्तानां देव आश्रयः ।
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| देवेति लिङ्गगनाम स्याल्लिङ्गात्मा रुद्र उच्यते ॥
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| इन्द्राश्रयः शिवस्यापि सुखानां मुक्तिगामिनाम् ।
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| शिवो हीश्वरनामा स्यात् तत्पारम्यात् सरस्वती ॥
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| इंद्रेत्युक्ता तत्सुखानां ब्रह्माधिर्मुक्तिगामिनाम् ।
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| तत्सुखानां परं ब्रह्म मुक्तिगानां पराश्रयः ॥
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| एवमेव च संसारे बिम्बत्वादुत्तरोत्तरम् ।
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| न परब्रह्मणः कश्चिदाश्रयः स्वाश्रयं यतः ॥
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| तस्याश्रयोऽस्ति चेत्येवं पृच्छतोऽपि शिरः सदा ।
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| भिद्यते पर्वतैरन्धे तमसिस्थस्य दैवतैः ॥
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| तस्माद्ब्रह्म परं नित्यं ज्ञेयं पूर्णमनाश्रयम् ॥ इति ब्रह्मांडे ।
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| रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।
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| ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः ॥ इति भारते ।
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| | text =
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| अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति इत्यादेश्च । संसाराल्लुप्तानां मुक्तानां कानि सुखानि लोकाः रोचमानानि कानि लोकाः । लीनं सुखं क इत्युक्तं कं नाम क्षीयतेऽत्र यत् ॥
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| [[Category:Bruhadaranyaka]] | |