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| | #REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C18]] |
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| | chapter_num = 18
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| | title = अष्टादशोऽध्यायः
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| पूर्वोक्तं साधनं सर्वं सङ्क्षिप्योपसंहरति अनेनाध्यायेन-
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| सर्वाध्यायोक्तधर्मस्य समासतो निर्णयात्मकोनुक्तत्रैगुण्यवादी चायम् ।
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| | verse_line1 = संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
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| | verse_line2 = त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥१ ॥
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| }}
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| अर्जुन उवाच
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| | verse_line1 = काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः ।
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| | verse_line2 = सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥
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| }}
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| श्रीभगवानुवाच
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| | verse_line1 = त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
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| | verse_line2 = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥
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| | text =
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| 'मनीषिणः'' इत्युक्तत्वात् तेप्यनिन्द्याः । अतः 'त्याज्यं दोषवत्'' इत्यस्यार्थः 'सङ्गं त्यक्त्वा फलं च'' इति ॥ ३ ॥
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| | verse_line1 = निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
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| | verse_line2 = त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥
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| | verse_line1 = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
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| | verse_line2 = यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥
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| | verse_line1 = एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
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| | verse_line2 = कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥
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| | text =
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| द्रव्ययज्ञादीनां मध्ये स्वोचितो यज्ञो विद्यादानादिषु स्वोचितं दानं स्वोचितं तपश्च सर्वैर्वर्णाश्रमिभिरन्यैश्च कार्यमेवेत्यर्थः । विष्णुनामस्वाध्यायोन्त्यानां सत्योपवासादितपश्च ॥ ५,६ ॥
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| | verse_line1 = नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
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| | verse_line2 = मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥
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| | text =
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| सङ्गफलत्यागमृते स्वरूपत्यागः कार्य इति मिथ्याज्ञानाख्यमोहात् । 'स्वयज्ञादीन् परित्यज्य निरयं यात्यसंशयम्'' । इति पाद्मे ॥ ७ ॥
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| | verse_line1 = दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
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| | verse_line2 = स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥
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| | verse_line1 = कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेर्जुन ।
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| | verse_line2 = सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥
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| | text =
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| मोहं विना दृष्टदुःखमित्येव । दुःखशब्देन केवलमानसम् । कायक्लेशस्य पृथगुक्तेः ।'दुःखं तु मानसं ज्ञेयमायासो बाह्य उच्यते ।'दुःखं तु मानसं ज्ञेयमायासो बाह्य उच्यते ।विशेषस्य विवक्षायामन्यथा सर्वमेव तु'' ॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ८,९ ॥
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| | verse_line1 = न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
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| | verse_line2 = त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥
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| | verse_line1 = न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
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| | verse_line2 = यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥
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| | text =
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| 'न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म केवलं दृष्टदुःखदम् ।
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| जन्मान्तरकृते पुण्ये न सज्जेत् सात्त्विकश्चले ।
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| यः सम्यक् तत्त्वविद् विष्णोस्तदर्पणधियैव तु ।
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| फलेच्छावर्जितस्तस्य कर्मबन्धाय नो भवेत् ।
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| बहुलं चेदल्पदोषं यावदेवापरोक्षदृक्'' ॥ इति च ॥ १०,११ ॥
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| | verse_line1 = अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
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| | verse_line2 = भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥
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| | text =
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| अन्येषामिष्टम् । अस्य तु त्यागित्वादेव नेष्टम् ।
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| 'ज्ञानादेर्मोक्षभोग्याच्च नान्यत् स्यात् कर्मणः फलम् ॥ त्यागिनस्तत्त्वसंवेत्तुरन्येषां तदृते फलम्'' ॥ इति च ।
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| केवलकाम्यकर्मणां फलानपेक्षयाप्यकरणमित्येतावांस्त्यागात् संन्यासस्य विशेष इत्यत्यागिनां प्रतियोगित्वेन न्यासिन उक्ताः । त्यागित्वं तेषामपि ह्यस्ति ।
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| 'परेच्छयापि ये काम्यं कर्म कुर्युर्न तु क्वचित् ।
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| न्यासिनो नाम तेन्येभ्यः फलत्यागिभ्य उत्तमाः'' ॥ इति च ॥१२ ॥
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| | verse_line1 = पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
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| | verse_line2 = साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥
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| | text =
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| 'कथितं परमं साङ्ख्यं कपिलाख्येन विष्णुना ।
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| सेश्वरं वैदिकं साक्षाज्ज्ञेयमन्यदवैदिकम्'' ॥ इति च ॥१३ ॥
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| | verse_line1 = अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
| |
| | verse_line2 = विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥
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| | verse_line1 = शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
| |
| | verse_line2 = न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥
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| |
| अधिष्ठानं शरीरादि ॥ १४, १५ ॥
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| | verse_line1 = तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
| |
| | verse_line2 = पश्यत्यकृतबुदि्धत्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥
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| |
| | verse_line1 = यस्य नाहङ्कृतो भावो बुदि्धर्यस्य न लिप्यते ।
| |
| | verse_line2 = हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥
| |
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| }}
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| |
| | text =
| |
| 'स्वातन्त्र्यमीश्वरे वेत्ति नैवात्मनि कदाचन ।
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| ईश्वराधीनमेवात्मन् स्वातन्त्र्यं तु जडान् प्रति ।
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| तारतम्येन लक्ष्म्यादेर्जीवान् प्रति च सर्वशः ।
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| यस्तदर्थं समुत्पन्नो यथा रुद्रो यथा यमः ।
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| हत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबद्ध्यते ।
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| अज्ञस्तदर्थं जातोपि ब(व)द्ध्यते दैत्यवद् ध्रुवम् ।
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| अपरोक्षदृङ्ग् न जातो यस्तदर्थं मुक्तिगं सुखम् ।
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| ह्रसेत् तस्य परोक्षज्ञः किञ्चिद् दोषेण लिप्यते'' ॥ इति च ।
| |
| अस्वातन्त्र्यज्ञानात् हन्मीति भावोप्यस्य नास्तीति न हन्ति । अन्यस्य भावोस्तीति विशेषः । 'बुदि्धर्यस्य न लिप्यते'' इति । रागान्न हन्ति, किन्तु धर्मबुद्ध्या ।
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| 'स्वातन्त्र्यं मन्यमानस्य रागाद् धर्मं च कुर्वतः ।
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| तन्निमित्तस्तु दोषः स्याद् गुणश्च स्यात् सुकर्मजः'' ॥ इति च ॥१७ ॥
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| }}
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| | chapter_id = BGT_C18
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
| |
| | verse_line2 = करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥
| |
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| |
| }}
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| | |
| {{Bhashyam
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| | verse_id = BGT_C18_V18
| |
| | id = BGT_C18_V18_B01
| |
| | text =
| |
| 'सम्प्रेरयितुरीशस्य कर्मस्वखिलचेतनान् ।
| |
| ज्ञातृज्ञेयज्ञानरूपा प्रेरणा सा स एव यत् ।
| |
| स्वरूपेणैव नित्या सा विशेषात्मतया भवेत् ।
| |
| विशेषोपि स्वरूपेण नित्यश्च स्याद् विशेषतः ।
| |
| स्वनिर्वाहकता यस्मान्नानवस्था विशिष्टवत् ।
| |
| विशेष्यस्य विशिष्टस्याप्यभेदे(प्य)पि विवादिनि ।
| |
| विशेषोस्त्येव नात्रापि ह्यनवस्था कदाचन ।
| |
| ज्ञातुरन्योहमिति तु कस्याप्यनुभवो न हि ।
| |
| अस्मि ज्ञातैवाहमिति भेदस्तस्मात् तयोः कुतः ।
| |
| पश्यामीति विशेषोयमिदानीं मे समुत्थितः ।
| |
| इत्याद्यनुभवाद् भेदो न विशेष्यविशिष्टयोः ।
| |
| विशेषणं तु द्विविधं विशेषाख्यं तथेतरत् ।
| |
| विशेषमणयेद् येन प्रोक्तं तेन विशेषणम् ।
| |
| विशेषोपि विशेषस्य स्वस्यैव गमको भवेत्'' ॥ इत्यादि तत्त्वविवेके ।
| |
| सङ्ग्रहः पञ्चकारणानां सङ्क्षेपः । अधिष्ठानस्य करणेन्तर्भावात् । दैवशब्दोदितेश्वरस्यैव मुख्यकर्तृत्वात् स्वतन्त्रकर्त्रोः कर्तृशब्देनैवोक्तेः त्रैविध्यम् । कर्म चेष्टा ॥१८ ॥
| |
| }}
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| | |
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| | verse_id = BGT_C18_V19
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| | chapter_id = BGT_C18
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
| |
| | verse_line2 = प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥
| |
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| |
| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| एवं गुणसङ्ख्याने परमसाङ्ख्यशास्त्रे ॥ १९ ॥
| |
| }}
| |
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| |
| | verse_line1 = सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
| |
| | verse_line2 = अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विदि्ध सात्त्विकम्॥२० ॥
| |
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| |
| }}
| |
| | |
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| |
| | text =
| |
| 'अस्तित्वाद् भूतनामभ्यः सर्वजीवेभ्य एव यत् ।
| |
| मुक्तेभ्योपि पृथक्त्वेन विष्णोः सर्वत्रगस्य च ।
| |
| ऐक्येन च स्वरूपाणां प्रादुर्भावादिकात्मनाम् ।
| |
| तारतम्येन जीवानां भेदेनैव परस्परम् ।
| |
| जडेभ्यश्चैव जीवानां जडानां च परस्परम् ।
| |
| तेभ्यो विष्णोश्च सम्यक् तल्लक्षणज्ञानपूर्वकम् ।
| |
| ज्ञानं सात्त्विकमुद्दिष्टं यत् साक्षान्मुक्तिकारणम्'' ॥२० ॥
| |
| }}
| |
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| |
| | verse_line1 = पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।
| |
| | verse_line2 = वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विदि्ध राजसम्॥२१ ॥
| |
| }}
| |
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| |
| | verse_line1 = यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
| |
| | verse_line2 = अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| }}
| |
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| | text =
| |
| 'विष्णोरन्यस्य याथार्थ्यज्ञानं राजसमुच्यते ।यदि विष्णुं न जानाति यदि वा मिश्रतत्त्ववित् ।अन्यथाकरणीयत्वात् कार्याख्यं जीवमेव यः ।अकार्यं ब्रह्म जानाति स एवाखिलमित्यपि । एकजीवपरिज्ञानात् कृत्स्नज्ञोस्मीति मन्यते ।युक्तिभिर्ज्ञान(युक्तिविज्ञान)राहित्यात् स्वपक्षस्याल्पयुक्तितः ।अयुक्ततामेव गुणं मन्यते चाल्पदर्शनः ।अतत्त्वार्थं जगद् ब्रूते तत्त्वार्थज्ञानवर्जनात् ।स मुख्यतामसज्ञानी ह्येकैकेनापि किं पुनः ।सर्वैरेतैर्विशेषैश्च युक्तः पापतमाधिकः'' ॥ इति पाद्मे ।'पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानम्'' इत्यस्य व्याख्यानम्'नानाभावान्'' इत्यादि । सर्वगतमेकमीश्वरं न जानातीत्येतावतैव राजसत्वम् । एकस्य कृत्स्नवज्ज्ञानमेव तामसम् । मुक्तत्वादिरूपेण अन्यथा करणीयत्वात् पराधीनत्वेनाल्पस्य जीवस्य स्वातन्त्र्यादिगुणपूर्णत्वात् कृत्स्नेन ब्रह्मणैक्यज्ञानं च महातामसम् । किं पुनस्तावन्मात्रं सर्वमिति ज्ञानम् । किं पुनस्तत्राप्येकजीवादन्यत् किमपि नास्तीति औतुकं ज्ञानं सर्वमपि तामसम् । किमु तदेवोक्तलक्षणम् । अतत्त्वार्थवत् सदसद्वैलक्षण्याद्यन्यथार्थकल्पनायुक्तमेव तामसम् । किमु तदेवोक्तविशेषणैर्युक्तम् । प्रायोल्पज्ञानमपि तामसम् । अज्ञानबहुलत्वात् किमु तदेवोक्तमिथ्याज्ञानबहुलमित्यपुनरुक्तिः । एकस्मिन् सर्ववज्ज्ञानं कार्ये जीवे पूर्णब्रह्मेति सक्तं ज्ञानं निर्युक्तिकं चातत्त्वार्थकल्पनायुक्तमल्पज्ञानं च पृथक्पृथगपि तामसानीति च । मायावादे त्वेतानि समस्तानि । अन्यत्रापि त्वहैतुकत्वादिकं विरुद्धवादिषु समं सर्वेषु ॥ २१,२२ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
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| | verse_line2 = अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥
| |
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| | verse_line1 = यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
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| | verse_line2 = क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
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| | verse_line2 = मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥२५ ॥
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| 'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा'' इत्युक्त्वा 'ये मे मतम्'' 'ये त्वेतत्'' इति च तस्य मोक्षसाधनत्वस्याकरणे प्रत्यवायस्य चोक्तेर्भगवदर्पितत्वेन सर्वकर्मकरणं तस्य विष्णोः सर्वपरमत्वज्ञानं च नियतमेवेति ज्ञायते । 'अध्यात्मचेतसा'' इत्युक्तत्वात् तत्स्व(तत्व)रूपयाथार्थ्यज्ञानादि । 'ये तु सर्वाणि'' इत्यस्मिन् श्लोकेध्यात्मचेतस्त्वस्य 'मत्पराः अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्तः'' इति व्याख्यातत्वात् । एवं सर्वमपि भगवद्भक्तियुक्तमेव सात्त्विकम् ।
| |
| ॥ २३-२५ ॥
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| | verse_line1 = मुक्तसङ्गोनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
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| | verse_line2 = सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥
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| सर्वस्य भगवदधीनत्वनिश्चयादेवानहंवादी ॥ २६ ॥
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| | verse_line1 = रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोशुचिः ।
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| | verse_line1 = अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोलसः ।
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| | verse_line1 = बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।
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| | verse_line2 = प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥
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| |
| 'भगवद्भक्तिसामर्थ्यात् प्रकृष्टो न कृतो हि यः ।
| |
| स प्राकृतो दीर्घसूत्री कुर्यां पश्चादिति स्मरन्'' ॥ इति शब्दतत्त्वे ।
| |
| प्राप्तकालस्य कर्मणो दीर्घकालेनैव कृतिं सूचयन् दीर्घसूत्रीत्यर्थः ।
| |
| 'अलसो दीर्घसूत्री च सत्त्वयुक् तामसो मतः ।
| |
| अयुक्तो राजसः स्तब्धः प्राकृतो नैकृतिः शठः ।
| |
| एकैकेनैव दोषेण प्रोक्तस्तामसतामसः ।
| |
| दुर्नरत्वं च तिर्यक्त्वं तमश्चैतत्फलं क्रमात्'' ॥ इति च ॥ २८-२९ ॥
| |
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| | verse_line1 = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
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| | verse_line2 = बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुदि्धः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥
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| | verse_line1 = यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
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| | verse_line2 = अयथावत्प्रजानाति बुदि्धः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥
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| | verse_line1 = अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
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| |
| 'किञ्चिद् यथावद् धर्मादीनयथावच्च पश्यति ।
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| यया बुद्ध्या राजसी सा मिथ्यादृक्त्वेव तामसी'' ॥ इति च ॥३१,३२॥
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| | verse_line1 = धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ।
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| | verse_line2 = योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥
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| | verse_line1 = यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेर्जुन ।
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| 'वैष्णवो भक्तियोगो यस्त(दुक्ता)द्युक्ता सात्त्विकी धृतिः'' । इति च । विहित-विषयैवेत्यव्यभिचारिणी ॥ ३३,३४ ॥
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| | verse_line1 = यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
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| | verse_line2 = न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥
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| | verse_line1 = सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।
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| 'स्वप्नं भयम्'' इत्यादि सर्वनिषिद्धोपलक्षणम् ।'तत्तत् सात्त्विकमेव स्याद् यद्यद् वृद्धाः प्रचक्षते ।निन्दन्ति तामसं तत्तद् राजसं तदुपेक्षितम्'' ॥ इति हि भागवते ।'महात्मानस्तु मां पार्थ'' 'अभयं सत्त्वसंशुदि्धः'' इत्यादिना वृद्धाश्चोक्ताः ॥ ३५, ३६ ॥
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| | verse_line1 = यत्तदग्रे विषमिव परिणामेमृतोपमम् ।
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| 'विष्णोः प्रसादात् स्वमनःप्रसादात् सात्त्विकं सुखम्'' इति पाद्मे ।
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| ॥३७ ॥
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| | verse_line1 = विषयेंद्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेमृतोपमम् ।
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| | verse_line1 = यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
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| | verse_line1 = न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
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| | verse_line2 = सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥
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| | verse_line1 = ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
| |
| | verse_line2 = कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१ ॥
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| | text =
| |
| सत्त्वं जीवजातम् । मुक्तानां गुणातीतत्वात् 'पृथिव्यां दिवि देवेषु वा'' इति विशेषः ।
| |
| 'यथेष्टं सञ्चरन्तोपि मुक्ता भूम्यादिगा न तु ।
| |
| ग्रामस्था अपि न ग्राम्या वैलक्षण्यादि्ध सज्जनाः ।
| |
| नराधमास्तामसेषु सात्त्विकास्तत्र राजसाः ।
| |
| दैत्यभृत्या महादैत्या मुख्यतामसतामसाः ।
| |
| राजसास्तु नरास्तत्र विप्रा राजससात्त्विकाः ।
| |
| तत्रस्थशुद्धसत्त्वास्तु परहंसाः प्रकीर्तिताः ।
| |
| हंसो बहूदः कुटिको वनस्थो नैष्ठिको गृही ।
| |
| क्रमाद् रजोधिका बाह्यं कर्मैषामधिकं यतः ।
| |
| धर्माः परमहंसानां ब्राह्मा एव शमादिकाः ।
| |
| देवादेः कर्मबाहुल्यं न लिङ्गं रजसः क्वचित् । न हि विष्णोश्चलेत् तेषां मनः कर्मकृतावपि ।
| |
| अन्येषां चलचित्तत्वात् प्रायः स्यात् कर्म राजसम् ।
| |
| यदि तत् स्मारकं विष्णोर्विद्यात् सात्त्विकमेव तत् ।
| |
| धर्मार्थहिंसनाग्निश्च विशेषो ब्रह्मचारिण; ।
| |
| पैतृकं चापि यतितो दारास्तु गृहिणस्ततः ।
| |
| असर्गो (असङ्गो) ग्राम्यसन्त्यागः पश्वहिंसा गृहस्थतः ।
| |
| वनस्थस्य विशेषोयं सर्वेषामितरत् समम्'' ॥ इति च ।
| |
| 'सात्त्विकाः स्वल्परजसः क्षत्रियाः सत्त्वराजसाः ।
| |
| वैश्याः शूद्रा अतिस्वल्पसत्त्वाधिक्येन तामसाः ।
| |
| ये तु भागवता वर्णास्तेषां भेदोयमीरितः ।
| |
| सत्त्वाधिकः पुल्कसोपि यस्तु भागवतः सदा ।
| |
| त्रैविद्यमात्रा विष्णोर्ये सर्वाधिक्ये ससंशयाः ।
| |
| अन्याधिक्यं न मन्यन्ते श्रीशाद् राजसराजसाः ।
| |
| अज्ञा विष्णौ द्वेषहीनाः सर्वे राजसतामसाः ।
| |
| पितृगन्धर्वपूर्वाश्च मुनयो देवता इति ।
| |
| सात्त्विकास्त्रिविधास्तत्र श्रेष्ठा एवोत्तरोत्तराः ।
| |
| देवा इन्द्रो विरिञ्चाद्या इति त्रेधैव देवताः ।
| |
| क्रमोत्तराः शिवो वाणी ब्रह्मा चैवोत्तरोत्तराः ।
| |
| सत्त्वसत्त्वमहासत्त्वसूक्ष्मसत्त्वश्चतुर्मुखः ।
| |
| तस्माद् यावद् विमुक्तिः स्यान्मुक्तावेवं सुखक्रमः'' ॥ इति च ।
| |
| विष्णौ किञ्चिदप्रीतियुक्तास्तामसमध्ये सात्त्विका नराधमा इत्यर्थः । राजसानां मध्ये सात्त्विका एव भागवतविप्रादयः ।
| |
| राजसस्थसात्त्विकेष्वेव शुद्धसात्त्विकाः किञ्चिद्रजोयुक्तसात्त्विकाः समरजोयुक्तसात्त्विकाः सत्त्वात् किञ्चिदूनतमोयुक्तसात्त्विका इति वर्णभेदः । सत्त्वप्रधानत्वादेव तानारभ्योत्तरोत्तरं सर्वेपि मोक्षयोग्याः । 'सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम्'' इत्यादेः ।
| |
| 'सत्त्वाधिको मोक्षयोग्यो योग्योन्धतमसस्तथा ।
| |
| तम उत्तरो रजो भूयान् समो वा सृतिपात्रकः'' ॥ इति च ॥ ४०,४१ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
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| |
| 'शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
| |
| ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म (विप्रकर्म) स्वभावजम् ।
| |
| एते गुणाः किञ्चिदूना विप्रात् क्षत्रिय एव च ।
| |
| अधिका वा ब्राह्मणेभ्यः केषुचिच्चक्रवर्तिषु ।
| |
| ऋषयस्त्वेव विज्ञेयाः कार्तवीर्यादयो नृपाः ॥४२ ॥
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| 'शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
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| दानमीश्वरभावश्च क्षत्रिये(भ्यो)न्ये गुणा अपि ॥४३ ॥
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| 'क्षत्रियोनब्रह्मगुणो वैश्यः कृष्यादिजीवनः ।>तत ऊनः शमाद्यैर्यः शुश्रूषुः शूद्र उच्यते ।अधिकाश्चेद् गुणाः शूद्रे ब्राह्मणादिः स उच्यते ।ब्राह्मणोप्यल्पगुणकः शूद्र एवेति कीर्तितः ।नरोपि यो देवगुणो ज्ञेयो देवो नृतां गतः'' ॥ इति च ।नरोपि यो देवगुणो ज्ञेयो देवो नृतां गतः'' ॥ इति च ।'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य'' इति वचनाच्च क्षत्रियादिष्वपि शमाद्यनुवृत्ति-र्ज्ञायते । न हि शमादिकं विना तस्याभितोर्चनं भवति । सम्यक् शमादिभिरर्चनं ह्यभ्यर्चनम् । न च शमादीन् विना सिदि्धं विन्दति । 'यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यम्'' इत्युक्तत्वाच्च । 'शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इंद्रियनिग्रहः'' इति हि भागवते । न च क्षत्रियादिभिरपि शौचतपःक्षमा(शमा)दिभिर्हीनैर्भाव्यमिति तत्तद्धर्मेषूच्यते । युक्ता ह्येतैः सर्वैर्गुणैर्जनकतुलाधारादयः । अतो युद्धेपलायनमैश्वर्यं च क्षत्रियस्य विशेषगुणौ । तौ, च कृष्यादयः, जीवनार्थं शुश्रूषा, याजनं, जीवनार्थं प्रतिग्रहश्चेत्येत एवान्येषां परधर्माः ।'शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं दानं च क्षत्रियेधिकाः ।तद्धीना ब्राह्मणे तस्माद् वैश्ये शूद्रे ततोल्पकाः ।अध्यापनं च शुश्रूषा जीवनार्थमृते सदा (सताम्) ।विप्रादिषु क्रमात् ज्ञेयाः शूद्रस्याध्यापनं विना ।तस्माच्छूद्रोल्पशुश्रूषुः स्वभावाज्जीवनं विना ।एते नैसर्गिका भावाः स्याद् भावोन्योपि कुत्रचित् ।बलाद् विरुद्धभावस्तु हेयः स्वाभाविकोपि यः ।अनिसर्गोपि हि शुभो वर्धनीयः प्रयत्नतः ।याजनैश्वर्यपूर्वास्तु नान्यैः कार्याः शुभा अपि ।अपलायनं च शूद्राणां ब्रह्मक्षत्रार्थमिष्यते'' ॥ इति च ।'प्रसह्य वित्ताहरणं शारीरो दण्ड एव च ।अशिष्याणां शासनं च तथैवार्थविनाशनम् ।एष ईश्वरभावः स्यान्न कार्यः क्षत्रियेतरैः ।सर्वे विधर्मिणः शास्याः क्षत्रियैर्यत्नतः सदा ।अङ्गाद्यहानिकृद् दण्डः शिष्येषु ब्राह्मणादिभिः ।कार्यो देहेपि शिष्यश्च स्वामिना स्वेन वार्पितः ।पुत्रानुजादयः सर्वे शिष्या एव निसर्गतः ।गुरवश्चैव मित्राणि सखिसब्रह्मचारिणः ।सम्बन्धिनश्च सर्वेपि तत्तद्योग्यतयाखिलैः ।शिक्षणीयेषु भावेषु शिक्षणीयाः प्रयत्नतः ।उन्मादे बन्धानाद्यैर्वा ताडनं न गुरोः क्वचित् ।पापं चरन्तस्त्वन्येपि सर्वैर्दृष्टिपथं गताः ।शक्तितो वारणीयाः स्युर्देशकालानुसारतः ।तदुत्तमविरोद्धारः सन्त्याज्या गुरवोपि तु ।यथाशक्त्यनुशास्यैव कालतोपि न चेच्छुभाः ।विष्णौ परमभक्तस्तु न त्याज्यः शास्य एव च ।शिक्षयंश्च गुरून् शिष्यो गुरुवन्नैव शिक्षयेत् ।महान्तो नानुशास्याश्च विरुद्धाचरिता अपि ।यदि च स्वोत्तमानां ते विरोधं नैव कुर्वते'' ॥ इत्यादि च ।'आपत्सु विप्रः क्षात्रं तु विशां वा धर्ममाचरेत् ।क्षात्रासिद्धौ न शूद्रस्तु विप्रक्षत्रिययोः क्वचित् ।क्षत्रियो ब्राह्ममापत्सु तदापत्सु विशामपि ।क्षत्रियो विप्रधर्मापि नैव भैक्ष्यप्रतिग्रही ।वैश्य आपत्सु शौद्रं तु धर्ममेकं न चापरम् ।>शूद्र आपत्सु विड्धर्मा तदापत्सु च कारुकः ।शूद्रस्तु वैश्यधर्मापि नैव वेदाक्षरो भवेत् ।अत्यापदि क्षत्रियोपि पादशुश्रूषणं विना ।शौद्रधर्मं चरन् विप्रक्षत्रियेषु न दुष्यति ।येषु कर्मसु याच्यः स्यात् स्वामिनापि न याचिता ।शौद्राण्यपि स्वधर्मत्वे क्षत्रियस्यापदो यदि ।आत्मनश्चेद् बलाधिक्यं सानुबन्धादपि प्रभोः ।धर्मार्थं सेवतोर्थार्थं विप्रधर्माधिकाद् वरः ।प्रभुणा याच्यवृत्तिस्तु विशेषेणापि धर्मभाक् ।बाह्वोर्बलेधिको यः स्यात् क्षत्रियो विद्ययाधिकः ।विप्रो भागवतौ चैतौ सेशा लोकास्तयोरिमे'' ॥ इति व्यासस्मृऽतौ ।॥ ४४-४८ ॥
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| | verse_line1 = असक्तबुदि्धः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
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| | verse_line2 = नैष्कर्म्यसिदि्धं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥
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| 'नैष्कर्म्यसिदि्धम्'' अनिष्टसर्वकर्मनाशाख्यसिदि्धम् ॥ ४९ ॥
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| | verse_line1 = सिदि्धं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
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| | verse_line2 = समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥
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| | verse_line1 = बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
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| | verse_line1 = विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
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| वक्ष्यमाणप्रकारेण वर्तमानस्तदनन्तरं नैष्कर्म्यसिदि्धं प्राप्तो भूत्वा ब्रह्मा-ख्यायाः महालक्ष्म्याः सकाशं यथाप्नोति तथा निबोध । 'मम योनिर्महद् ब्रह्म'' 'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्'' इत्युक्तत्वात् । 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा'' इत्युक्त्वा 'मद्भक्तिं लभते पराम्'' इति वक्ष्यमाणत्वाच्च ।'सर्वपापक्षयाद् देहं त्यक्त्वा देवान् क्रमाद् व्रजन् ।प्राप्य लक्ष्मीं तत्प्रसादात् पुनः स्वृद्धा हरौ यदा ।भक्तिस्तया पुनर्ज्ञाने स्वृद्धे विष्णुं प्रपद्यते ।अपरोक्षदृशो विष्णोः शरीरेपि सतः पुरा ।त्यक्तदेहादिकस्यापि यावद् विष्णुं प्रपद्यते ।तावद् गुणा विवर्धन्ते स्थिताः स्युः प्राप्य केशवम्'' ॥ इति महावराहे॥ ५०-५२ ॥
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| | verse_line1 = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
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| 'विमुच्य निर्ममः शान्तः'' नैष्कर्म्यसिदि्धं प्राप्तो भूत्वा ब्रह्मणि भूयाय भवतीत्यर्थः ॥ ५३ ॥
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| | verse_line1 = ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
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| | verse_line1 = सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
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| विहितानि सर्वकर्माण्यपि मद्व्यपाश्रयो भूत्वा सदा कुर्वाणः । न हि यथेष्टाचरणे तात्पर्यमत्र । तथा सति विहिताकरणेपि समत्वात् 'मामनुस्मर युद्ध्य च'' 'ततः स्वधर्मं किर्तिं च'' इत्यादिप्रस्तुतविरोधः । अपिशब्दस्त्वेकमपि कर्मातदाश्रयेण न कार्यमित्यर्थे ॥ ५६ ॥
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| | verse_line1 = चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
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| भगवत्संश्रितस्य त्रैविद्यस्य च चेतसैव विशेष इत्याहचेतसा सर्व-कर्माणीति । स एव सर्वस्मात् परम इति भावोस्येति तत्परः । तत्र चित्तवृत्तिनिरोधोपि यो बुदि्धयोगः प्रत्याहारादिः ॥ ५७ ॥
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| | verse_line1 = मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
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| | verse_line1 = यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
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| | verse_line1 = स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
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| प्रकृतिरीश्वरेच्छा । 'प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छानन्त कथ्यते'' इत्यादि-वचनात् । एषा तु 'प्रकृत्यैव च कर्माणि'' इत्यादिष्वपि युज्यते । तस्या एव हि मुख्यतो नियोक्तृत्वं स्वभावकर्मादिभिर्बद्ध्वा ॥ ५९,६० ॥
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| | verse_line1 = ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।
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| | verse_line1 = तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
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| | verse_line1 = इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।
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| | verse_line1 = सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।
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| तदेवाह ईश्वरः सर्वभूतानामिति ।'निश्चितार्थः स तु ज्ञेयो यत्रात्मैव परोक्षतः ।उच्यते विष्णुना यद्वत् तद् ब्रह्मेत्यादि कथ्यते'' ॥ इति शब्दनिर्णये ।'मन्मनाः'' इत्युपसंहाराच्च ॥६१ ॥ शाश्वतं स्थानं वैकुण्ठादि- 'श्रीरेव लोकरूपेण विष्णोस्तिष्ठति सर्वदा ।अतो हि वैष्णवा लोका नित्यास्ते चेतना अपि'' ॥ इत्याग्नेये ।'न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च'' इत्याद्युक्तं च ॥६२ ॥ तत्त्वसारकथनं 'द्वाविमौ पुरुषौ'' इत्यत्रैवोपसंहृतम् । तत्त्वप्रशंसार्थमेव तद्बुदि्धप्रशंसा कृता । अत्र तु साधनसारोपसंहारः सर्वगुह्यतममिति । 'मन्मनाः'' इत्यादेः पूर्वमेवोक्तत्वात् भूय इति । अर्थतस्त्वत्रापि विष्ण्वाधिक्यमेवोक्तं भवति ॥ ६४,६५ ॥
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| अन्यसर्वधर्मान् परित्यज्येत्युक्तशेषत्वेनैव सर्वधर्मानिति वचनम् । 'मामेकं शरणं व्रज'' इत्यपि 'मन्मना'' इत्याद्युक्तनिगमनात्मना तद्व्याख्यानम् ।'सर्वोत्तमत्वविज्ञानपूर्वं तत्र मनः सदा ।सर्वाधिकप्रेमयुक्तं सर्वस्यात्र समर्पणम् ।अखण्डा त्रिविधा पूजा तद्रत्यैव स्वभावतः ।रक्षतीत्येव विश्वासस्तदीयोहमिति स्मृऽतिः ।शरणागतिरेषा स्याद् विष्णौ मोक्षफलप्रदा'' । इति महाविष्णुपुराणे ।अनादिजन्मकृतसर्वपापेभ्यः । अत्र प्राप्त्यभावात् । धर्मपरित्यागे पापपरित्यागस्य कैमुत्येनैव सिद्धत्वात् ॥६६ ॥
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| अतपस्कायैव न वाच्यम् । अशुश्रूषवे पुनश्चेति दोषाधिक्यमशुश्रूषोर्दर्शयितुं चशब्दः । एवमभक्ताय कदापि न वाच्यम् । कदाचिदल्पतपसोल्पशुश्रूषोरपि भक्त्याधिक्ये वाच्यं भवतीति कदाचनेति विशेषः । अभक्ताच्च न वाच्यमसूयोरिति तत्रापि चशब्दः ।'समुच्चये तथाधिक्ये न्यूनत्वे चः प्रयुज्यते'' । इति शब्दनिर्णये ।'अभक्तादपि पापः स्यादसूयुर्दोषदृग् यतः''इति च पाद्मे ॥६७ ॥
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| | verse_line1 = न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
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| अर्जुन उवाच
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| सञ्जय उवाच
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| | verse_line1 = तच्च संस्मृऽत्य संस्मृऽत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
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| | verse_line1 = यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
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| | verse_line2 = तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नाम अष्टादशोध्यायः ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये अष्टादशोध्यायः ॥
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| गीताप्रस्थानं समाप्तम् श्रीकृष्णार्पणमस्तु
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| 'सोपि मुक्तः'' 'न च तस्मान्मनुष्येषु'' इत्युक्तेश्च मुक्तानां महत् तारतम्यं ज्ञायते । 'मनुष्येषु'' इति विशेषणात् तत्रापि देवानामाधिक्यं च ।
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| 'मुक्तिर्ज्ञात्वापि विष्णुं स्याच्छास्त्रं श्रुत्वा ततोधिकम् ।
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| मुक्तौ सुखं तत्पठतस्ततोप्यधिकमिष्यते ।
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| व्याख्यातुस्तु समं मुक्तौ सुखं नान्यस्य कस्यचित् ।
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| ततोधिकं तु देवानां मुख्यव्याख्याकृतो यतः'' ॥ इति ॥ ६८-७२ ॥ 'यथेच्छसि तथा कुरु'' इत्याक्षेपपरिहाराय 'करिष्ये वचनं तव'' इत्यनुसरति भगवन्तम् ॥ ७३-७८ ॥ नमस्ते वासुदेवाय प्रेयसां मे प्रियोत्तम ।
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| समस्तगुणसम्पूर्णनिर्दोषानन्ददायिने ॥ यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
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| वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेव हि कृतो ग्रन्थोमुना केशवे ॥ निःशेषदोषरहित कल्पाणाखिलसद्गुण ।
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| भूतिस्वयम्भुशर्वादिवन्द्यं त्वां नौमि मे प्रियम् ॥
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| [[Category:Bhagavadgitatatparya]]
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