Kathalakshana/Vyakhya/Kathalakshanapanchika: Difference between revisions
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<span class="gr-prateeka">नृसिंहमखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिम् । | |||
सम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमञ्जसा ॥ १ ॥</span> | |||
<div class="shloka-block"><span class="shloka-line">श्रियः कमितुरानम्य चरणाम्बुरुहद्वयम् ।</span><span class="shloka-line">यथाबोधं विधास्यामः कथालक्षणपञ्चिकाम् ॥</span></div> | <div class="shloka-block"><span class="shloka-line">श्रियः कमितुरानम्य चरणाम्बुरुहद्वयम् ।</span><span class="shloka-line">यथाबोधं विधास्यामः कथालक्षणपञ्चिकाम् ॥</span></div> | ||
अथ कथां लिलक्षयिषुराचार्यवर्यः प्रारिप्सितप्रकरणपरिसमाप्त्यादि प्रयोजनेष्टदेवताप्रणतिनुतिपुरस्सरं विवक्षितमर्थं दर्शयति ॥ | अथ कथां लिलक्षयिषुराचार्यवर्यः प्रारिप्सितप्रकरणपरिसमाप्त्यादि प्रयोजनेष्टदेवताप्रणतिनुतिपुरस्सरं विवक्षितमर्थं दर्शयति ॥ | ||
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<span class="gr-prateeka">वादो जल्पो वितण्डेति त्रिविधा विदुषां कथा ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">तत्वनिर्णयमुद्दिश्य केवलं गुरुशिष्ययोः ॥ २ ॥ | |||
कथाऽन्येषामपि सतां वादः..... ।</span> | |||
अथ कथां विभागेनोद्दिशति | अथ कथां विभागेनोद्दिशति | ||
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<span class="gr-prateeka">वा समितेश्शुभा ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">ख्यात्याद्यर्थं स्पर्धया वा सतां जल्प इतीर्यते ॥</span> | |||
ननु यदा विदिततत्वौ अदुष्टमनसौ परप्रार्थितौ कथां कुरुतः स वादो न वा ? आद्ये अव्यापकमाद्यं लक्षणं, द्वयोरपि तत्वज्ञानितया तदुद्देशिताभावात् । द्वितीयमतिव्यापकम् । सेयमुभयतः पाशा रज्जुः इत्यत आह– | ननु यदा विदिततत्वौ अदुष्टमनसौ परप्रार्थितौ कथां कुरुतः स वादो न वा ? आद्ये अव्यापकमाद्यं लक्षणं, द्वयोरपि तत्वज्ञानितया तदुद्देशिताभावात् । द्वितीयमतिव्यापकम् । सेयमुभयतः पाशा रज्जुः इत्यत आह– | ||
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<span class="gr-prateeka">वितण्डा तु सतामन्यैः ... ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">....तत्वमेषु निगूहितम् ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">स्वयं वा प्राश्निकैर्वादे चिन्तयेत् ... ॥</span> | |||
<span class="gr-prateeka">.... तत्वनिर्णयम् ॥</span> | |||
वितण्डालक्षणं दर्शयति | वितण्डालक्षणं दर्शयति | ||
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<span class="gr-prateeka">रागद्वेषविहीनास्तु सर्वविद्याविशारदाः । | |||
प्राश्निका इति विज्ञेयाः .....</span> | |||
<span class="gr-prateeka">........ विषमा एक एव वा ॥</span> | |||
प्राश्निकानां लक्षणं वक्ति | प्राश्निकानां लक्षणं वक्ति | ||
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<span class="gr-prateeka">अशेषसंशयच्छेत्ता निस्संशय उदारधीः । एकश्चेत्प्राश्निको ज्ञेयस्सर्वदोषविवर्जितः ॥ ६ ॥</span> | |||
नन्वेवं चेत् एक एव इत्यनुज्ञानं कथम् ? संवादाभावेन तत्कृतकथानिर्णये अनाश्वासादित्यत आह | नन्वेवं चेत् एक एव इत्यनुज्ञानं कथम् ? संवादाभावेन तत्कृतकथानिर्णये अनाश्वासादित्यत आह | ||
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<span class="gr-prateeka">एको वा बहवो वा स्युर्विष्णुभक्तिपरास्सदा ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">विष्णुभक्तिर्हि सर्वेषां सद्गुणानां स्वलक्षणम् ॥</span> | |||
विशेषणान्तरमाह | विशेषणान्तरमाह | ||
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<span class="gr-prateeka">पृष्टेनाऽगम एवादौ वक्तव्यः</span> | |||
<span class="gr-prateeka">........ साध्यसिद्धये ॥</span> | |||
<span class="gr-prateeka">नैषा तर्केणापनेया मतिरित्याह हि श्रुतिः ॥</span> | |||
<span class="gr-prateeka">अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥</span> | |||
वादे, प्रतिवादिना वादिनं प्रति विचार्ये प्रमेये प्रमाणं प्रष्टव्यम् । पृष्टेन च वादिना तावदागम एव वक्तव्यः न तु छलादिना प्रश्नखण्डनं कर्तव्यम् । नाप्यनुमानं दुरागमो वा वक्तव्यः । | वादे, प्रतिवादिना वादिनं प्रति विचार्ये प्रमेये प्रमाणं प्रष्टव्यम् । पृष्टेन च वादिना तावदागम एव वक्तव्यः न तु छलादिना प्रश्नखण्डनं कर्तव्यम् । नाप्यनुमानं दुरागमो वा वक्तव्यः । | ||
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<span class="gr-prateeka">ऋग्यजुस्सामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम् ॥ | |||
मूलरामायणं चैव सम्प्रोच्यन्ते सदागमाः । | |||
अनुकूला य एतेषां ते च प्रोक्तास्सदागमाः ॥</span> | |||
तत्र श्रुतीनामपौरुषेयत्वेन अप्रामाण्यकारणशून्यानामप्रामाण्यं वक्तुं तावन्न शक्यम् । स्मृत्यादीनामप्याप्तप्रणीततया श्रुत्यानुकूल्येन च दोषाभावनिश्चयान्नाप्रामाण्यं वक्तुं शक्यते । अतो विषयान्तरोपदर्शनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव न्याय्यमित्याशयवानाह | तत्र श्रुतीनामपौरुषेयत्वेन अप्रामाण्यकारणशून्यानामप्रामाण्यं वक्तुं तावन्न शक्यम् । स्मृत्यादीनामप्याप्तप्रणीततया श्रुत्यानुकूल्येन च दोषाभावनिश्चयान्नाप्रामाण्यं वक्तुं शक्यते । अतो विषयान्तरोपदर्शनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव न्याय्यमित्याशयवानाह | ||
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<span class="gr-prateeka">अन्ये दुरागमा नाम तैर्न साध्यं हि साध्यते ।</span> | |||
ननु यदा वादी परिगणितं वेदादिकं वदेत् तदा प्रतिवादिनाऽन्योऽर्थोऽभिधीयताम् । यदा तु उपरिगणितं पाशुपतादिकम भिदधीत, तदा तु अप्रामाण्यं वक्तुं शक्यत एव । अतः कथं अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इति नियमः ? इत्यत आह | ननु यदा वादी परिगणितं वेदादिकं वदेत् तदा प्रतिवादिनाऽन्योऽर्थोऽभिधीयताम् । यदा तु उपरिगणितं पाशुपतादिकम भिदधीत, तदा तु अप्रामाण्यं वक्तुं शक्यत एव । अतः कथं अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इति नियमः ? इत्यत आह | ||
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<span class="gr-prateeka">स्वपक्ष आगमश्चैव वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥</span> | |||
<span class="gr-prateeka">तस्याप्यन्यार्थता साध्या वादिना ..... ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">...... स्वार्थसिद्धये ।</span> | |||
वादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकथनेन किं प्रतिवादी चरितार्थः ? नेत्याह | वादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकथनेन किं प्रतिवादी चरितार्थः ? नेत्याह | ||
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<span class="gr-prateeka">अन्यार्थता निराकार्या स्वागमस्य ...... ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">......... विनिश्चयात् ॥</span> | |||
<span class="gr-prateeka">उपपत्त्यवकाशोऽत्र ह्यागमार्थविनिर्णये ।</span> | |||
किमेतावता जितं वादिना ? नेत्याह | किमेतावता जितं वादिना ? नेत्याह | ||
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<span class="gr-prateeka">वाद्यागमार्थे निर्णीत आगमार्थः परस्य तु ॥</span> | |||
<span class="gr-prateeka">निर्णेयः सहितैः पश्चात् ........................ ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">..... ततो निश्शेषनिर्णयः ।</span> | |||
एवं वादिना स्वागमस्योपपत्तिवशेन स्वाभिमतार्थेप्रामाण्यं साधितवता स्वपक्षे साधिते, परोपन्यस्तागमस्य च अर्थान्तरमुक्तवता परपक्षे दूषिते निवृत्तो वाद इति न मन्तव्यं; किं नाम ? इत्यत आह | एवं वादिना स्वागमस्योपपत्तिवशेन स्वाभिमतार्थेप्रामाण्यं साधितवता स्वपक्षे साधिते, परोपन्यस्तागमस्य च अर्थान्तरमुक्तवता परपक्षे दूषिते निवृत्तो वाद इति न मन्तव्यं; किं नाम ? इत्यत आह | ||
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<span class="gr-prateeka">प्रत्यक्षसिद्धेष्वर्थेषु प्रश्ने मामक्षजं वदेत् ॥</span> | |||
<span class="gr-prateeka">ज्ञानं वा ज्ञानसिद्धेषु .................... ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">.......... नानुमां प्रथमं वदेत् ।</span> | |||
ननु यदि परश्चक्षुराद्येकप्रमाणके साक्ष्येकविषये वा अर्थे प्रमाणं पृच्छेत् तदा परेण किं तूष्णीमासितव्यम् ? प्रत्यक्षादिकं वा वक्तव्यम् ? आद्ये साध्यासिद्धिः । द्वितीये तु आगम एव वक्तव्यः इति नियमभङ्गः । न च प्रत्यक्षसिद्धेऽर्थे विप्रतिपत्तिरेव न सम्भवति तत्प्रामाण्यासम्प्रतिपत्त्यभिप्रायेण तदुपपत्तेरिति । तत्राह | ननु यदि परश्चक्षुराद्येकप्रमाणके साक्ष्येकविषये वा अर्थे प्रमाणं पृच्छेत् तदा परेण किं तूष्णीमासितव्यम् ? प्रत्यक्षादिकं वा वक्तव्यम् ? आद्ये साध्यासिद्धिः । द्वितीये तु आगम एव वक्तव्यः इति नियमभङ्गः । न च प्रत्यक्षसिद्धेऽर्थे विप्रतिपत्तिरेव न सम्भवति तत्प्रामाण्यासम्प्रतिपत्त्यभिप्रायेण तदुपपत्तेरिति । तत्राह | ||
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<span class="gr-prateeka">परतुष्टिकरं वाक्यं वदेतां यदि वादिनौ ॥ | |||
स एवात्रागमो ज्ञेयः .................... ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">....... परतुष्टिर्हि तत्फलम् ।</span> | |||
ननु तत् उक्तेषु अपरिगणितत्वात् न आगम इत्युक्तं इत्यत आह | ननु तत् उक्तेषु अपरिगणितत्वात् न आगम इत्युक्तं इत्यत आह | ||
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<span class="gr-prateeka">एवं निर्णयपर्यन्तं वादे सुबहवोऽपि हि ॥ | |||
घटेयुः .......</span> | |||
<span class="gr-prateeka">......चिरकालं च ... ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">जल्पे यावत् परो जितः ॥</span> | |||
नन्वेवंविधस्य वादस्य किं अवसानम् ? तत्राह | नन्वेवंविधस्य वादस्य किं अवसानम् ? तत्राह | ||
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<span class="gr-prateeka">तत्वनिर्णयवैलोम्यं वादे साक्षात् पराजयः ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">संवादे श्लाघ्यतैव स्यात् गुरुत्वमितरस्य च ॥</span> | |||
एवं असङ्करेण कथामार्गत्रयं प्रतिपादितवता कथैक्यादिमतानि अपहस्तितानि विज्ञातव्यानि । अधिकार्यङ्गप्रवृत्तिप्रकारफलभेदे सति किन्निबन्धनं कथैक्यं स्यात् । | एवं असङ्करेण कथामार्गत्रयं प्रतिपादितवता कथैक्यादिमतानि अपहस्तितानि विज्ञातव्यानि । अधिकार्यङ्गप्रवृत्तिप्रकारफलभेदे सति किन्निबन्धनं कथैक्यं स्यात् । | ||
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<span class="gr-prateeka">तत्वनिर्णयवैलोम्ये निन्द्यो दण्ड्योऽथ वा भवेत् ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">विरोधाऽसङ्गतिन्यूनतूष्णीम्भावादिकैर्जितः ॥ | |||
भवेज्जल्पे ...</span> | |||
तत्वनिर्णयवैलोम्यंप्राप्तोऽपि यदि मतिमान्द्यादिना तत्र न संवादं करोति तस्य कर्तव्यम् आह | तत्वनिर्णयवैलोम्यंप्राप्तोऽपि यदि मतिमान्द्यादिना तत्र न संवादं करोति तस्य कर्तव्यम् आह | ||
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<span class="gr-prateeka">...... वितण्डायां न्यायो जल्पवदीरितः ।</span> | |||
प्रसङ्गात् वितण्डायां निग्रहादिकमतिदिशति | प्रसङ्गात् वितण्डायां निग्रहादिकमतिदिशति | ||
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<span class="gr-prateeka">संवादे दण्ड्यता न स्यात् वितण्डाजल्पयोरपि ॥ | |||
पराजितत्वमात्रं स्यात् ............</span> | |||
<span class="gr-prateeka">अनुवादादिराहित्यं नैव जल्पेऽपि दूषणम् ॥</span> | |||
विरोधादिप्राप्तवतो जल्पवितण्डयोः कि कार्यं ? इत्यपेक्षायामाह | विरोधादिप्राप्तवतो जल्पवितण्डयोः कि कार्यं ? इत्यपेक्षायामाह | ||
}} | }} | ||
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<span class="gr-prateeka">विद्याहीनत्वलिङ्गेऽपि वादिनोः स्यात् पराजयः ।</span> | |||
वादिप्रतिवादिनोः जल्पारम्भोत्तरकालीनं निग्रहस्थानं उक्तम् । कथातः प्रागपि सम्भवात् आह | वादिप्रतिवादिनोः जल्पारम्भोत्तरकालीनं निग्रहस्थानं उक्तम् । कथातः प्रागपि सम्भवात् आह | ||
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<span class="gr-prateeka">तदभावात् नैव षट्कात् अन्यो निग्रह इष्यते ॥ | |||
अन्तर्भावातदिहान्येषां निग्रहाणाम् ............ ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">...... इति स्म ह ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">विद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोः ॥</span> | |||
ननु विरोधादिव्यतिरिक्तानि हेत्वाभासादीनि निग्रहस्थानानि सन्ति । विजयमात्रप्रयोजनयोश्च जल्पवितण्डयोः पराजयनिमित्तानि सम्भावितानि च । अतः कथं विरोधादिषट्केनैव जल्पादौ पराजयः ? इत्यत आह | ननु विरोधादिव्यतिरिक्तानि हेत्वाभासादीनि निग्रहस्थानानि सन्ति । विजयमात्रप्रयोजनयोश्च जल्पवितण्डयोः पराजयनिमित्तानि सम्भावितानि च । अतः कथं विरोधादिषट्केनैव जल्पादौ पराजयः ? इत्यत आह | ||
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<span class="gr-prateeka">स्खलितत्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजयः ।</span> | |||
<span class="gr-prateeka">वादजल्पवितण्डानां इति शुद्धं स्वलक्षणम् ॥</span> | |||
विरोधादीनि निग्रहस्थानानि इत्युक्तं । तत्र विशेषं आह– | विरोधादीनि निग्रहस्थानानि इत्युक्तं । तत्र विशेषं आह– | ||
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<span class="gr-prateeka">आनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्कानुसारतः । | |||
कथालक्षणमित्युक्तं प्रीत्यर्थं शार्ङ्गधन्वनः ॥</span> | |||
न केवलं एतत् कथालक्षणं उपपत्त्या साधु प्रतिपत्तव्यम् । किं नाम ? परमाप्तोक्तत्वात् आगमान्तरसिद्धत्वाच्च इति दर्शयन् उक्तस्य विनियोगं आह– | न केवलं एतत् कथालक्षणं उपपत्त्या साधु प्रतिपत्तव्यम् । किं नाम ? परमाप्तोक्तत्वात् आगमान्तरसिद्धत्वाच्च इति दर्शयन् उक्तस्य विनियोगं आह– | ||
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<span class="gr-prateeka">सदोदितामितज्ञानपूरवारितहृत्तमाः । | |||
नरसिंहः प्रियतमः प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥</span> | |||
<span class="gr-prateeka">इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितेषु दशप्रकरणेषु कथालक्षणं सम्पूर्णम् ॥</span> | |||
<div class="shloka-block"><span class="shloka-line">श्रीमदानन्दतीर्थार्यहृदयामलमन्दिरा ।</span><span class="shloka-line">इन्दिरार्चितपादाब्जा देवता पातु नः सदा ॥</span></div> | <div class="shloka-block"><span class="shloka-line">श्रीमदानन्दतीर्थार्यहृदयामलमन्दिरा ।</span><span class="shloka-line">इन्दिरार्चितपादाब्जा देवता पातु नः सदा ॥</span></div> | ||
भक्त्यतिशयवशात् भगवान् आचार्यः प्रकरणनिर्माणफलत्वेन परमेश्वरप्रशंसापुरस्सरं तत्प्रसादं आशास्ते | भक्त्यतिशयवशात् भगवान् आचार्यः प्रकरणनिर्माणफलत्वेन परमेश्वरप्रशंसापुरस्सरं तत्प्रसादं आशास्ते | ||
Latest revision as of 11:56, 19 April 2026
कथालक्षणपञ्चिका
नरसिंहमखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिम् । सम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमञ्जसा ॥1॥
सम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमञ्जसा ॥ १ ॥
वादो जल्पो वितण्डेति त्रिविधा विदुषां कथा । तत्त्वनिर्णयमुद्दिश्य केवलं गुरुशिष्ययोः ॥2॥
तत्वनिर्णयमुद्दिश्य केवलं गुरुशिष्ययोः ॥ २ ॥
कथाऽन्येषामपि सतां वादः..... ।अथ कथां विभागेनोद्दिशति
कथाऽन्येषामपि सतां वादो वा समितेः शुभा । ख्यात्याद्यर्थं स्पर्धया वा सतां जल्प इतीर्यते ॥3॥
ख्यात्याद्यर्थं स्पर्धया वा सतां जल्प इतीर्यते ॥
ननु यदा विदिततत्वौ अदुष्टमनसौ परप्रार्थितौ कथां कुरुतः स वादो न वा ? आद्ये अव्यापकमाद्यं लक्षणं, द्वयोरपि तत्वज्ञानितया तदुद्देशिताभावात् । द्वितीयमतिव्यापकम् । सेयमुभयतः पाशा रज्जुः इत्यत आह–वितण्डा तु सतामन्यैस्तत्त्वमेषु निगूहितम् । स्वयं वा प्राश्निकैर्वादे चिन्तयेत् तत्त्वनिर्णयम् ॥4॥
....तत्वमेषु निगूहितम् । स्वयं वा प्राश्निकैर्वादे चिन्तयेत् ... ॥ .... तत्वनिर्णयम् ॥
वितण्डालक्षणं दर्शयतिरागद्वेषविहीनास्तु सर्वविद्याविशारदाः । प्राश्निका इति सम्प्रोक्ता विषमा एक एव वा ॥5॥
प्राश्निका इति विज्ञेयाः .....
........ विषमा एक एव वा ॥
प्राश्निकानां लक्षणं वक्तिअशेषसंशयच्छेत्ता निःसंशय उदारधीः । एकश्चेत् प्राश्निको ज्ञेयः सर्वदोषविवर्जितः ॥6॥
एको वा बहवो वा स्युर्विष्णुभक्तिपरास्सदा । विष्णुभक्तिर्हि सर्वेषां सद्गुणानां स्वलक्षणम् ॥7॥
विष्णुभक्तिर्हि सर्वेषां सद्गुणानां स्वलक्षणम् ॥
विशेषणान्तरमाहपृष्टेनागम एवादौ वक्तव्यः साध्यसिद्धये । नैषा तर्केणापनेया मतिरित्याह हि श्रुतिः । अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥8॥
........ साध्यसिद्धये ॥ नैषा तर्केणापनेया मतिरित्याह हि श्रुतिः ॥ अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥
वादे, प्रतिवादिना वादिनं प्रति विचार्ये प्रमेये प्रमाणं प्रष्टव्यम् । पृष्टेन च वादिना तावदागम एव वक्तव्यः न तु छलादिना प्रश्नखण्डनं कर्तव्यम् । नाप्यनुमानं दुरागमो वा वक्तव्यः ।ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम् । मूलरामायणं चैव सम्प्रोच्यन्ते सदागमाः ॥9॥
मूलरामायणं चैव सम्प्रोच्यन्ते सदागमाः ।
अनुकूला य एतेषां ते च प्रोक्तास्सदागमाः ॥
तत्र श्रुतीनामपौरुषेयत्वेन अप्रामाण्यकारणशून्यानामप्रामाण्यं वक्तुं तावन्न शक्यम् । स्मृत्यादीनामप्याप्तप्रणीततया श्रुत्यानुकूल्येन च दोषाभावनिश्चयान्नाप्रामाण्यं वक्तुं शक्यते । अतो विषयान्तरोपदर्शनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव न्याय्यमित्याशयवानाहअनुकूला य एतेषां ते च प्रोक्तास्सदागमाः । अन्ये दुरागमा नाम तैर्न साध्यं हि साध्यते ॥10॥
स्वपक्ष आगमश्चैव वक्तव्यः प्रतिवादिना । तस्याप्यन्यार्थता साध्या वादिना स्वार्थसिद्धये ॥11॥
तस्याप्यन्यार्थता साध्या वादिना ..... । ...... स्वार्थसिद्धये ।
वादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकथनेन किं प्रतिवादी चरितार्थः ? नेत्याहअन्यार्थता निराकार्या स्वागमस्य विनिश्चयम् । उपपत्त्यवकाशोऽत्र ह्यागमार्थविनिर्णये ॥12॥
......... विनिश्चयात् ॥ उपपत्त्यवकाशोऽत्र ह्यागमार्थविनिर्णये ।
किमेतावता जितं वादिना ? नेत्याहवाद्यागमार्थे निर्णीत आगमार्थः परस्य तु । निर्णेयः सहितैः पश्चात्ततो निश्शेषनिर्णयः ॥13॥
निर्णेयः सहितैः पश्चात् ........................ । ..... ततो निश्शेषनिर्णयः ।
एवं वादिना स्वागमस्योपपत्तिवशेन स्वाभिमतार्थेप्रामाण्यं साधितवता स्वपक्षे साधिते, परोपन्यस्तागमस्य च अर्थान्तरमुक्तवता परपक्षे दूषिते निवृत्तो वाद इति न मन्तव्यं; किं नाम ? इत्यत आहप्रत्यक्षसिद्धेष्वर्थेषु प्रश्ने मामक्षजं वदेत् । ज्ञानं वा ज्ञानसिद्धेषु नानुमां प्रथमं वदेत् ॥14॥
ज्ञानं वा ज्ञानसिद्धेषु .................... । .......... नानुमां प्रथमं वदेत् ।
ननु यदि परश्चक्षुराद्येकप्रमाणके साक्ष्येकविषये वा अर्थे प्रमाणं पृच्छेत् तदा परेण किं तूष्णीमासितव्यम् ? प्रत्यक्षादिकं वा वक्तव्यम् ? आद्ये साध्यासिद्धिः । द्वितीये तु आगम एव वक्तव्यः इति नियमभङ्गः । न च प्रत्यक्षसिद्धेऽर्थे विप्रतिपत्तिरेव न सम्भवति तत्प्रामाण्यासम्प्रतिपत्त्यभिप्रायेण तदुपपत्तेरिति । तत्राहपरतुष्टिकरं वाक्यं वदेतां यदि वादिनी । स एवात्रागमो ज्ञेयः परतुष्टिर्हि तत्फलम् ॥15॥
स एवात्रागमो ज्ञेयः .................... ।
....... परतुष्टिर्हि तत्फलम् ।
ननु तत् उक्तेषु अपरिगणितत्वात् न आगम इत्युक्तं इत्यत आहएवं निर्णयपर्यन्तं वादे सुबहवोऽपि हि । घटेयुश्चिरकालं च जल्पे यावत्परो जितः ॥16॥
घटेयुः .......
......चिरकालं च ... । जल्पे यावत् परो जितः ॥
नन्वेवंविधस्य वादस्य किं अवसानम् ? तत्राहतत्त्वनिर्णयवैलोम्यं वादे साक्षात्पराजयः । संवादे श्लाघ्यतैव स्याद् गुरुत्वमितरस्य च ॥17॥
संवादे श्लाघ्यतैव स्यात् गुरुत्वमितरस्य च ॥
एवं असङ्करेण कथामार्गत्रयं प्रतिपादितवता कथैक्यादिमतानि अपहस्तितानि विज्ञातव्यानि । अधिकार्यङ्गप्रवृत्तिप्रकारफलभेदे सति किन्निबन्धनं कथैक्यं स्यात् ।विरोधाऽसङ्गतिन्यूनतूष्णीम्भावादिकैर्जितः ॥
भवेज्जल्पे ...तत्वनिर्णयवैलोम्यंप्राप्तोऽपि यदि मतिमान्द्यादिना तत्र न संवादं करोति तस्य कर्तव्यम् आह
भवेज्जल्पे वितण्डायां न्यायो जल्पवदीरितः । संवादे दण्ड्यतां न स्याद् वितण्डाजल्पयोरपि ॥19॥
पराजितत्वमात्रं स्यान्निन्द्यो दण्ड्योऽपि वाऽन्यथा । अनुवादादिराहित्यं नैव जल्पेऽपि दूषणम् ॥20॥
पराजितत्वमात्रं स्यात् ............
अनुवादादिराहित्यं नैव जल्पेऽपि दूषणम् ॥
विरोधादिप्राप्तवतो जल्पवितण्डयोः कि कार्यं ? इत्यपेक्षायामाहविद्याहीनत्वलिङ्गेऽपि वादिनोः स्यात् पराजयः । तदभावान्नैव षट्कादन्यो निग्रह इष्यते ॥21॥
अन्तर्भावादिहान्येषां निग्रहाणामिति स्म ह । विद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोः ॥22॥
अन्तर्भावातदिहान्येषां निग्रहाणाम् ............ ।
...... इति स्म ह । विद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोः ॥
ननु विरोधादिव्यतिरिक्तानि हेत्वाभासादीनि निग्रहस्थानानि सन्ति । विजयमात्रप्रयोजनयोश्च जल्पवितण्डयोः पराजयनिमित्तानि सम्भावितानि च । अतः कथं विरोधादिषट्केनैव जल्पादौ पराजयः ? इत्यत आहस्खलितात्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजयः । वादजल्पवितण्डानामिति शुद्धं स्वलक्षणम् ॥23॥
वादजल्पवितण्डानां इति शुद्धं स्वलक्षणम् ॥
विरोधादीनि निग्रहस्थानानि इत्युक्तं । तत्र विशेषं आह–आनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्कानुसारतः । कथालक्षणमित्युक्तं प्रीत्यर्थं शार्ङ्गधन्वनः ॥24॥
कथालक्षणमित्युक्तं प्रीत्यर्थं शार्ङ्गधन्वनः ॥न केवलं एतत् कथालक्षणं उपपत्त्या साधु प्रतिपत्तव्यम् । किं नाम ? परमाप्तोक्तत्वात् आगमान्तरसिद्धत्वाच्च इति दर्शयन् उक्तस्य विनियोगं आह–
श्रीमदानन्दतीर्थार्यहृदयामलमन्दिरा । इन्दिरार्चितपादाब्जा देवता पातु नः सदा ॥
नरसिंहः प्रियतमः प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितेषु दशप्रकरणेषु कथालक्षणं सम्पूर्णम् ॥