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Kathalakshanam: Difference between revisions

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Latest revision as of 19:04, 1 June 2026

कथालक्षणम्
नरसिंहमखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिम् ।सम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमञ्जसा ॥1॥
वादो जल्पो वितण्डेति त्रिविधा विदुषां कथा ।तत्त्वनिर्णयमुद्दिश्य केवलं गुरुशिष्ययोः ॥2॥
कथाऽन्येषामपि सतां वादो वा समितेः शुभा ।ख्यात्याद्यर्थं स्पर्धया वा सतां जल्प इतीर्यते ॥3॥
वितण्डा तु सतामन्यैस्तत्त्वमेषु निगूहितम् ।स्वयं वा प्राश्निकैर्वादे चिन्तयेत् तत्त्वनिर्णयम् ॥4॥
रागद्वेषविहीनास्तु सर्वविद्याविशारदाः ।प्राश्निका इति सम्प्रोक्ता विषमा एक एव वा ॥5॥
अशेषसंशयच्छेत्ता निःसंशय उदारधीः ।एकश्चेत् प्राश्निको ज्ञेयः सर्वदोषविवर्जितः ॥6॥
एको वा बहवो वा स्युर्विष्णुभक्तिपरास्सदा ।विष्णुभक्तिर्हि सर्वेषां सद्गुणानां स्वलक्षणम् ॥7॥
पृष्टेनागम एवादौ वक्तव्यः साध्यसिद्धये ।नैषा तर्केणापनेया मतिरित्याह हि श्रुतिः ।
ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम् ।मूलरामायणं चैव सम्प्रोच्यन्ते सदागमाः ॥9॥
अनुकूला य एतेषां ते च प्रोक्तास्सदागमाः ।अन्ये दुरागमा नाम तैर्न साध्यं हि साध्यते ॥10॥
स्वपक्ष आगमश्चैव वक्तव्यः प्रतिवादिना ।तस्याप्यन्यार्थता साध्या वादिना स्वार्थसिद्धये ॥11॥
अन्यार्थता निराकार्या स्वागमस्य विनिश्चयम् ।उपपत्त्यवकाशोऽत्र ह्यागमार्थविनिर्णये ॥12॥
वाद्यागमार्थे निर्णीत आगमार्थः परस्य तु ।निर्णेयः सहितैः पश्चात्ततो निश्शेषनिर्णयः ॥13॥
प्रत्यक्षसिद्धेष्वर्थेषु प्रश्ने मामक्षजं वदेत् ।ज्ञानं वा ज्ञानसिद्धेषु नानुमां प्रथमं वदेत् ॥14॥
परतुष्टिकरं वाक्यं वदेतां यदि वादिनी ।स एवात्रागमो ज्ञेयः परतुष्टिर्हि तत्फलम् ॥15॥
एवं निर्णयपर्यन्तं वादे सुबहवोऽपि हि ।घटेयुश्चिरकालं च जल्पे यावत्परो जितः ॥16॥
तत्त्वनिर्णयवैलोम्यं वादे साक्षात्पराजयः ।संवादे श्लाघ्यतैव स्याद् गुरुत्वमितरस्य च ॥17॥
तत्त्वनिर्णयवैलोम्ये निन्द्यो दण्ड्योऽथवा भवेत् ।विरोधासङ्गतिन्यूनतूष्णीम्भावादिकैर्जितः ॥18॥
भवेज्जल्पे वितण्डायां न्यायो जल्पवदीरितः ।संवादे दण्ड्यतां न स्याद् वितण्डाजल्पयोरपि ॥19॥
पराजितत्वमात्रं स्यान्निन्द्यो दण्ड्योऽपि वाऽन्यथा ।अनुवादादिराहित्यं नैव जल्पेऽपि दूषणम् ॥20॥
विद्याहीनत्वलिङ्गेऽपि वादिनोः स्यात् पराजयः ।तदभावान्नैव षट्कादन्यो निग्रह इष्यते ॥21॥
अन्तर्भावादिहान्येषां निग्रहाणामिति स्म ह ।विद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोः ॥22॥
स्खलितात्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजयः ।वादजल्पवितण्डानामिति शुद्धं स्वलक्षणम् ॥23॥
आनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्कानुसारतः ।कथालक्षणमित्युक्तं प्रीत्यर्थं शार्ङ्गधन्वनः ॥24॥
सदोदितामितज्ञानपूरवारितहृत्तमाः ।नरसिंहः प्रियतमः प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥25॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं कथालक्षणम् ॥