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| <div class="gr-doc-title">विष्णुतत्त्वविनिर्णयः</div> | | <div class="gr-doc-title" data-has-ullekha="1">विष्णुतत्त्वविनिर्णयः</div> |
| __TOC__ | | __TOC__ |
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| | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः परिच्छेदः"></span> |
| == प्रथमः परिच्छेदः == | | == प्रथमः परिच्छेदः == |
| {{Adhyaya
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B001" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B001">सदागमैकविज्ञेयं समतीतक्षराक्षरम् । |
| | document_id = VTN
| | नारायणं सदा वन्दे निर्दोषाशेषसद्गुणम् ॥</div> |
| | chapter_num = 1
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| | title = प्रथमः परिच्छेदः
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| }}
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| {{Bhashyam
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| | id = VTN_C01_B001
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| | text =
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| सदागमैकविज्ञेयं समतीतक्षराक्षरम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B002" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B002">विशेषणाणि यानीह कथितानि सदुक्तिभिः । |
| नारायणं सदा वन्दे निर्दोषाशेषसद्गुणम् ॥
| | साधयिष्यामि तान्येव क्रमात् सज्जनसंविदे ॥</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B003" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B003"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmanda-id">‘ऋगाद्या भारतं चैव पञ्चरात्रमथाखलिम् ।<br/>मूलरामायणं चैव पुराणं चैतदात्मकम् ॥<br/>ये चानुयायिनस्त्वेषां सर्वे ते च सदागमाः ।<br/>दुरागमास्तदन्ये ये तैर्न ज्ञेयो जनार्दनः ॥<br/>ज्ञेय एतैः सदायुक्तैः भक्तिमद्भिः सुनिष्ठितैः ।<br/>न च केवलतर्केण नाक्षजेन न केनचित् ॥<br/>केवलागमविज्ञेयो भक्तैरेव न चान्यथा ॥’</span> इति ब्रह्माण्डे । |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Taittariyabrahmana-id">‘नावेदविन्मनुते तं बृहन्तं सर्वानुभूमात्मानं साम्पराये’(तै.ब्रा.३.१२.९.७)</span> इति तैत्तिरीयश्रुतिः । |
| | id = VTN_C01_B002
| | <span class="gr-reference gr-ref-Kathakopanishat-id">‘नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ’(कठ.१.२.९)</span> इति च कठश्रुतिः । |
| | text =
| | <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘नेन्द्रियाणि नानुमानं वेदा ह्येवैनं वेदयन्ति तस्मादाहुर्वेदाः’</span> इति च पिप्पलादश्रुतिः ।</div> |
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| विशेषणाणि यानीह कथितानि सदुक्तिभिः ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B004" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B004">न चैतेषां वचनानामेवाप्रामाण्यम् ।</div> |
| साधयिष्यामि तान्येव क्रमात् सज्जनसंविदे ॥
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B005" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B005">अपौरुषेयत्वात् वेदस्य ।</div> |
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmanda-id">‘ऋगाद्या भारतं चैव पञ्चरात्रमथाखलिम् । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B006" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B006"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः’(छां.उ.७.१.४)</span> इति तद्गृहीतत्वाच्च ।</div> |
| मूलरामायणं चैव पुराणं चैतदात्मकम् ॥
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| ये चानुयायिनस्त्वेषां सर्वे ते च सदागमाः ।
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| दुरागमास्तदन्ये ये तैर्न ज्ञेयो जनार्दनः ॥
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| ज्ञेय एतैः सदायुक्तैः भक्तिमद्भिः सुनिष्ठितैः ।
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| न च केवलतर्केण नाक्षजेन न केनचित् ॥
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| केवलागमविज्ञेयो भक्तैरेव न चान्यथा ॥’</span></span> इति ब्रह्माण्डे ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittariyabrahmana-id">‘नावेदविन्मनुते तं बृहन्तं सर्वानुभूमात्मानं साम्पराये’(तै.ब्रा.३.१२.९.७)</span></span> इति तैत्तिरीयश्रुतिः ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathakopanishat-id">‘नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ’(कठ.१.२.९)</span></span> इति च कठश्रुतिः ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘नेन्द्रियाणि नानुमानं वेदा ह्येवैनं वेदयन्ति तस्मादाहुर्वेदाः’</span></span> इति च पिप्पलादश्रुतिः ।
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B007" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B007">न चापौरुषेयं वाक्यमेव नास्तीति वाच्यम् । तदभावे सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धेः ।</div> |
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| | text =
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| न चैतेषां वचनानामेवाप्रामाण्यम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B008" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B008">यस्य तौ नाभिमतौ नासौ समयी, समयप्रयोजनाभावात् ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B009" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B009">न च तेन लोकोपकारः । धर्माद्यभावज्ञाने परस्परहिंसादिना अपकारस्यैव प्राप्तेः ।</div> |
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| | text =
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| अपौरुषेयत्वात् वेदस्य ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B010" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B010">न चोपकारेण तस्य प्रयोजनम्, अदृष्टाभावात् । अतो धर्माद्यभावं वदता स्वसमयस्याऽनर्थक्यमङ्गीकृतमेवेति नासौ समयी ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B011" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B011">न च पौरुषेयेण वाक्येन तत्सिद्धिः । अज्ञानविप्रलम्भयोः प्राप्तेः । न च तदर्थत्वेन सर्वज्ञः कल्प्येत । अन्यत्राऽदृष्टस्य सर्वज्ञत्वस्य कल्पनम्, तस्याविप्रलम्भकत्वकल्पनम् , तस्य तत्कृतत्वकल्पनं चेति कल्पनागौरवप्राप्तेः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः’(छां.उ.७.१.४)</span></span> इति तद्गृहीतत्वाच्च । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B012" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B012">अपौरुषेयवाक्याङ्गीकारे न किञ्चित् कल्प्यम् ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B013" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B013">अपौरुषेयत्वं च स्वत एव सिद्धम् । वेदकर्तृरप्रसिद्धेः । अप्रसिद्धौ च (तत्) कर्तुस्तत्कल्पने कल्पनागौरवम् । अकल्पने चाकर्तृत्वं सिद्धमेव ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B007
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| | text =
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| न चापौरुषेयं वाक्यमेव नास्तीति वाच्यम् । तदभावे सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धेः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B014" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B014">न च लौकिकवाक्यवत् सकर्तृकत्वम् । तस्य अकर्तृकत्वप्रसिद्ध्यभावात् ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B015" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B015">न च केनचित् कृत्वा वेद इत्युक्तं वेदसमम्, परम्पराभावात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B008
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| | text =
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| यस्य तौ नाभिमतौ नासौ समयी, समयप्रयोजनाभावात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B016" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B016">न च स्वयम्प्रतिभातवेदैः दृष्टमवेदवाक्यं भवति । परम्परासिद्धवेदवाक्यनुसारित्वात् । वेदद्रष्टॄणामुक्तगुणवत्वाच्च तेषाम् । उक्तं च ब्रह्माण्डे - |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmanda-id">‘विंशल्लक्षणतोनूनः तपस्वी बहुवेदवित् । <br/> वेद इत्येव यं पश्येत् स वेदो ज्ञानदर्शनात् ’</span> ॥इति ॥</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B017" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B017">प्रामाण्यं च स्वतः एव । अन्यथाऽनवस्थानात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B009
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| | text =
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| न च तेन लोकोपकारः । धर्माद्यभावज्ञाने परस्परहिंसादिना अपकारस्यैव प्राप्तेः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B018" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B018">न चोक्तयुक्त्यधीनत्वं प्रामाण्यस्य । बुद्धिदोषनिरासमात्रकारणत्वाद् युक्तीनाम् । अदुष्टबुद्धीनां स्वत एव सिद्धत्वातच्च प्रामाण्यस्य ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B019" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B019">न चाऽकाङ्क्षायामेव प्रमाणान्तरापेक्षत्वादनवस्थाभाव इति वाच्यम् । आकाङ्क्षाया एव बुद्धिदोषात्मकत्वात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B010
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| | text =
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| न चोपकारेण तस्य प्रयोजनम्, अदृष्टाभावात् । अतो धर्माद्यभावं वदता स्वसमयस्याऽनर्थक्यमङ्गीकृतमेवेति नासौ समयी ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B020" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B020">दुष्टबुद्धीनामेवाप्रामाण्यशङ्केति परतोऽप्रामाण्यम् । प्रामाण्यं च स्वत एव सिद्धम् । |
| }}
| | ॥ इति प्रामाण्यस्वतस्त्ववादः ॥</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B021" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B021">न चोच्चारणकाल एव वर्णानामुत्पत्तिरिति वाच्यम् ; तदेवेदं वचनमिति प्रत्यभिज्ञाविरोधात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B011
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| | text =
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| न च पौरुषेयेण वाक्येन तत्सिद्धिः । अज्ञानविप्रलम्भयोः प्राप्तेः । न च तदर्थत्वेन सर्वज्ञः कल्प्येत । अन्यत्राऽदृष्टस्य सर्वज्ञत्वस्य कल्पनम्, तस्याविप्रलम्भकत्वकल्पनम् , तस्य तत्कृतत्वकल्पनं चेति कल्पनागौरवप्राप्तेः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B022" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B022">न च सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञा भ्रान्तिरिति वाच्यम् । ‘सोऽयं देवदत्तः’ इत्यादेरपि तथात्वप्राप्तेः ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B023" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B023">सर्वक्षणिकत्वं वदताऽपि बौद्धेन ‘सेयं दिक्’ इत्यादिप्रत्यभिज्ञायाः न भ्रान्तित्वं वाच्यम् ; पञ्चस्कन्धेभ्योऽन्यत्वात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B012
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| | text =
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| अपौरुषेयवाक्याङ्गीकारे न किञ्चित् कल्प्यम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B024" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B024">न च दिश एव भ्रान्तिकल्पिताः ; विज्ञानशून्ययोरपि साम्यात् । न च आदित्योदयादिनैव दिक्कल्पना ; अन्धकारेऽपि दिङ्मात्रप्रतीतेः ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B025" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B025">कादाचित्कभ्रान्तिरेवाऽदित्योदयादिदर्शनान्निवर्तते । सा च विज्ञानशून्ययोरपि भवतीति तेषां मतम् ; वादिविप्रतिपत्तेः । अतो दिशः स्थिरा एवेति सिद्ध्यति शून्यवदेव ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B013
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| | text =
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| अपौरुषेयत्वं च स्वत एव सिद्धम् । वेदकर्तृरप्रसिद्धेः । अप्रसिद्धौ च (तत्) कर्तुस्तत्कल्पने कल्पनागौरवम् । अकल्पने चाकर्तृत्वं सिद्धमेव ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B026" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B026">अतस्तद्वद्वेदस्यापि स्थैर्यं सिद्धम् ; तदेवेदं वाक्यमिति प्रत्यभिज्ञानात् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B027" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B027">न चानुमानादीनामागमं विना प्रामाण्यं धर्मादिषु ; तदगोचरत्वात् । अतोऽपौरुषेयवाक्येनैव धर्मादिसिद्धेः सर्ववादिनामपि तदङ्गीकार्यम् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B014
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| | text =
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| न च लौकिकवाक्यवत् सकर्तृकत्वम् । तस्य अकर्तृकत्वप्रसिद्ध्यभावात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B028" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B028">तत्प्रामाण्यं च स्वत एव सिद्धम् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B029" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B029">अप्रामाण्यस्य च परतस्त्वानङ्गीकारे दुष्टेन्द्रियादेरप्यप्रामाण्यहेतुत्वं न स्यात् । तदनङ्गीकारे चानुभवविरोधः । अतः प्रामाण्यं स्वतः परतोऽप्रामाण्यमिति (च) सिद्धम् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B015
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| | text =
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| न च केनचित् कृत्वा वेद इत्युक्तं वेदसमम्, परम्पराभावात् । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B030" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B030"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.सं.८.७५.६)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘नित्ययानित्यया स्तौमि ब्रह्म तत्परमं पदम्’</span> इति । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘श्रुतिर्वाव नित्या अनित्या वाव स्मृतयो याश्चान्याः वाचः’</span> इति पैङ्गिश्रुतिः । |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘विज्ञेयं परमं ब्रह्म ज्ञापिका परमा श्रुतिः ।<br/>अनादिनित्या सा तच्च विना तां न स गम्यते ॥’</span> इति कात्यायनश्रुतिः । |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद् ब्रह्म विष्टितं तावती वाक् ॥ <br/>कश्छन्दसां योगमावेद धीरः को धिष्ण्यां प्रतिवाचं पपाद।’(ऋ.सं.१०.११४.९-१०)</span> इति च ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B031" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B031"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘नित्या वेदाः समस्ताश्च शाश्वता विष्णुबुद्धिगाः ।<br/> सर्गे सर्गेऽमुनेवैत उद्गीर्यन्ते तथैव च ॥<br/>तत्क्रमेणैव तैर्वर्णैस्तैः स्वरैरेव नान्यथा ॥’</span></div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B016
| |
| | text =
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| न च स्वयम्प्रतिभातवेदैः दृष्टमवेदवाक्यं भवति । परम्परासिद्धवेदवाक्यनुसारित्वात् । वेदद्रष्टॄणामुक्तगुणवत्वाच्च तेषाम् । उक्तं च ब्रह्माण्डे -
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B032" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B032"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अतः श्रुतित्वमेतासां श्रुता एव यतोऽखिलैः ।<br/>जन्मान्तरे श्रुतास्तास्तु वासुदेवप्रसादतः ॥ <br/>मुनीनां प्रतिभास्यन्ति भागेनैव न सर्वशः ।<br/>यतस्ता हरिणा दृष्टाः श्रुता एवापरैः जनैः । <br/>श्रुतयो दृष्टयश्चेति तेनोच्यन्ते पुरातनैः ॥’</span></div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmanda-id">‘विंशल्लक्षणतोनूनः तपस्वी बहुवेदवित् ।
| |
| वेद इत्येव यं पश्येत् स वेदो ज्ञानदर्शनात् ’</span></span> ॥इति ॥
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B033" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B033"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तदुत्पत्तिवचश्चैव भवेत् व्यक्तिमपेक्ष्य तु ।<br/> चेतनस्य जनिर्यद्वदुच्यते सर्वलौकिकैः ॥<br/>पुराणानि तदर्थानि सर्गे सर्गेन्यथैव तु । <br/>क्रियन्तेतस्त्वनित्यानि तदर्थाः पूर्वसर्गवत् ॥’</span> |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">‘वेदानां सृष्टिवाक्यानि भवेयुर्व्यक्त्यपेक्षया । <br/> अवान्तराभिमानानां देवानां वा व्यपेक्षया ॥<br/> नानित्यत्वात् कुतस्तेषामनित्यत्वं स्थिरात्मनाम् ॥’</span> इति ब्रह्माण्डे ।</div> |
| | id = VTN_C01_B017
| |
| | text =
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| प्रामाण्यं च स्वतः एव । अन्यथाऽनवस्थानात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B034" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B034">न चानित्यत्वे श्रुतिर्वेद इत्यादि विशेषशब्दो उपपद्यते(युज्यते) । |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahavarahapurana-id">‘वेदास्ते नित्यविन्नत्वात् श्रुतयश्चाखिलैः श्रुतेः ।<br/>आम्नायोऽनन्यथापाठादीशबुद्धिस्थिताः सदा ॥’</span> इति महावाराहे । |
| | न च नित्यत्वं विना वेदानां दर्शनव्यवहारो युज्यते ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B035" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B035">न च वर्णपदानामनित्यत्वं वक्तुं युक्तम् । सर्वज्ञत्वादीश्वरस्य तद्बुद्धौ सर्वदा प्रतीयमानत्वात् । न च घटादिवत् संस्कारमात्रत्वं वक्तुं युक्तम् । प्रत्यभिज्ञाविरोधस्योक्तत्वात् । पुराणानामप्यन्यथा शब्दरचनमेवानित्यत्वम् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B018
| |
| | text =
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|
| न चोक्तयुक्त्यधीनत्वं प्रामाण्यस्य । बुद्धिदोषनिरासमात्रकारणत्वाद् युक्तीनाम् । अदुष्टबुद्धीनां स्वत एव सिद्धत्वातच्च प्रामाण्यस्य ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B036" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B036">अत आकाशगुणे शब्दे व्यज्यमाना वर्णादयस्तत्क्रमात्मको वेदश्च नित्य एवेति सिद्धम् । |
| }}
| | ॥ इति वर्णनित्यत्ववादः ॥</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B037" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B037">न केवलसिद्धेऽर्थे व्युत्पत्त्यभावादप्रामाण्यम् । सिद्धान्वित एव व्युत्पत्तिगृहीतेः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B019
| |
| | text =
| |
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| न चाऽकाङ्क्षायामेव प्रमाणान्तरापेक्षत्वादनवस्थाभाव इति वाच्यम् । आकाङ्क्षाया एव बुद्धिदोषात्मकत्वात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B038" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B038">‘इयं माता’, ‘अयं पिता’ इत्यादौ अङ्गुलिप्रसारणादिपूर्वकनिर्देशेनैव हि तज्जानाति । ‘कार्यान्विते एव व्युत्पत्तिः’इति वदतः कार्यस्य कार्यान्वयाभावात् कल्पनागौरवम् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B039" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B039">‘इयं माता’, ‘अयं पिता’, ‘सुरूपोऽसि’ इत्यादौ सिद्धमात्रज्ञापनेन पर्यवसितत्वात् वाक्यस्य ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B020
| |
| | text =
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| दुष्टबुद्धीनामेवाप्रामाण्यशङ्केति परतोऽप्रामाण्यम् । प्रामाण्यं च स्वत एव सिद्धम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B040" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B040">तस्य तत्र प्रामाण्यानुभवाच्च । न च कुत्रचित् सिद्धज्ञापनादन्यत् वाक्यस्य प्रयोजनं दृष्टम्। ज्ञात्वैव हीष्टसाधनतां प्रवर्तते; निवर्तते च विपर्ययेण । अतः सिद्ध एव सर्ववाक्यानां प्रामाण्यं सिद्धम् । प्रसिद्धं च व्याकरणनिरुक्त्यादीनां सिद्धमात्रे प्रामाण्यं सर्ववादिनाम् । तदनङ्गीकारे च सर्वशाब्दव्यवहारासिद्धिः ।</div> |
| ॥ इति प्रामाण्यस्वतस्त्ववादः ॥
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B041" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B041">उक्तं च नारदीये- |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahavarahapurana-id">‘सर्वज्ञं सर्वकर्तारं नारायणमनामयम् । <br/>सर्वोत्तमं ज्ञापयन्ति महातात्पर्यमत्र हि ॥<br/>सर्वेषामपि वेदानाम् इतिहासपुराणयोः । <br/>प्रमाणानां च सर्वेषां तदर्थं चान्यदुच्यते ॥’</span> इति ॥</div> |
| | id = VTN_C01_B021
| |
| | text =
| |
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|
| न चोच्चारणकाल एव वर्णानामुत्पत्तिरिति वाच्यम् ; तदेवेदं वचनमिति प्रत्यभिज्ञाविरोधात् । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B042" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B042">न च जीवेश्वराभेद एव तात्पर्यमागमस्य ; तत्र प्रमाणाभावात् । न च जीवेश्वरभेदः सिद्ध इत्यनुवादकत्वं भेदवाक्यानाम् ; आगमं विना ईश्वरस्यैव असिद्धेः । न च अनुमानात् तत्सिद्धिः ; विपर्ययेणापि अनुमातुं शक्यत्वात् ।</div> |
| }}
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|
| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B043" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B043">‘विमतं सकर्तृकं कार्यत्वात्, घटवत्’ इत्युक्ते ‘विमतं विकर्तृकं अस्मत्संमतकर्तृरहितत्वात्, आत्मवत्’ इत्यनुमानविरोधात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B022
| |
| | text =
| |
|
| |
|
| न च सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञा भ्रान्तिरिति वाच्यम् । ‘सोऽयं देवदत्तः’ इत्यादेरपि तथात्वप्राप्तेः ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B044" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B044">‘अकार्यत्वम्’ उपाधिरित्युक्ते ‘शरीरिजन्यत्वम्’ इतरत्रापि उपाधिः इत्युत्तरम् ।</div> |
| }}
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|
| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B045" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B045">प्रत्यक्षानुमानसिद्धत्वे च भेदस्य तद्विरोधादेवाप्रामाण्यमभेदागमस्य । तेनाभेदागमस्याप्रामाण्याभावे (तेनाभेदवाक्यास्याप्रामाण्याभावे च) नानुवादकत्वं भेदवाक्यानाम् । न हि बलवतोऽनुवादकत्वम् ; दार्ढ्यहेतुत्वात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B023
| |
| | text =
| |
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| |
|
| सर्वक्षणिकत्वं वदताऽपि बौद्धेन ‘सेयं दिक्’ इत्यादिप्रत्यभिज्ञायाः न भ्रान्तित्वं वाच्यम् ; पञ्चस्कन्धेभ्योऽन्यत्वात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B046" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B046">प्रत्यक्षादेरागमस्य प्राबल्येऽपि नोपजीव्यप्रमाणविरोधे प्रामाण्यम् । विषयाभावे स्वस्यैवाप्रामाण्यप्राप्तेः । तेनैव ह्यनुमानादिनाऽऽगमस्य विषयः सिद्ध्यति तत्पक्षेऽपि । अनुमानेन ह्यनुवादित्वपक्ष ईश्वरो बोद्धव्यः, प्रत्यक्षेण च आगमः । अतस्तयोर्विरोधे प्रामाण्यं न स्यात् । अनुमानसिद्धेश्वराच्च भेदोऽनुभवतः एव सिद्धो जीवस्य ; असर्वकर्तृत्वेनानुभवात् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B047" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B047">न चानुभवविरोधे आगमस्य प्रामाण्यम् ; आगमप्रामाण्यानुभवस्याप्यप्रामाण्यप्राप्तेः । बहुप्रमाणसंवादश्च दार्ढ्यहेतुरेव ; बहूनां वचने तस्यैव दर्शने च दार्ढ्यस्यैव दृष्टेः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B024
| |
| | text =
| |
|
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|
| न च दिश एव भ्रान्तिकल्पिताः ; विज्ञानशून्ययोरपि साम्यात् । न च आदित्योदयादिनैव दिक्कल्पना ; अन्धकारेऽपि दिङ्मात्रप्रतीतेः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B048" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B048">सर्वाविवादस्थल एव कथञ्चिदनुवादकत्वम् । न चात्र सर्वाविवादः, एकत्ववादिनामेव विवाददर्शनात् । बहुप्रमाणविरोधे च एकस्याप्रामाण्यं दृष्टं शुक्तिरजतादौ । न च दोषजन्यत्वादेव दुर्बलत्वमिति विरोधः । बहुप्रमाणविरुद्धानां दोषजन्यत्वनियमात् । दोषजन्यत्वं च बलवत्प्रमाणविरोधादेव ज्ञायते ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B049" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B049">‘अदुष्टमिन्द्रियं त्वक्षं तर्कोऽदुष्टस्तथाऽनुमा । |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B025
| |
| | text =
| |
| | |
| कादाचित्कभ्रान्तिरेवाऽदित्योदयादिदर्शनान्निवर्तते । सा च विज्ञानशून्ययोरपि भवतीति तेषां मतम् ; वादिविप्रतिपत्तेः । अतो दिशः स्थिरा एवेति सिद्ध्यति शून्यवदेव ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B026
| |
| | text =
| |
| | |
| अतस्तद्वद्वेदस्यापि स्थैर्यं सिद्धम् ; तदेवेदं वाक्यमिति प्रत्यभिज्ञानात् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B027
| |
| | text =
| |
| | |
| न चानुमानादीनामागमं विना प्रामाण्यं धर्मादिषु ; तदगोचरत्वात् । अतोऽपौरुषेयवाक्येनैव धर्मादिसिद्धेः सर्ववादिनामपि तदङ्गीकार्यम् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B028
| |
| | text =
| |
| | |
| तत्प्रामाण्यं च स्वत एव सिद्धम् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B029
| |
| | text =
| |
| | |
| अप्रामाण्यस्य च परतस्त्वानङ्गीकारे दुष्टेन्द्रियादेरप्यप्रामाण्यहेतुत्वं न स्यात् । तदनङ्गीकारे चानुभवविरोधः । अतः प्रामाण्यं स्वतः परतोऽप्रामाण्यमिति (च) सिद्धम् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B030
| |
| | text =
| |
| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.सं.८.७५.६)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘नित्ययानित्यया स्तौमि ब्रह्म तत्परमं पदम्’</span></span> इति । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘श्रुतिर्वाव नित्या अनित्या वाव स्मृतयो याश्चान्याः वाचः’</span></span> इति पैङ्गिश्रुतिः ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘विज्ञेयं परमं ब्रह्म ज्ञापिका परमा श्रुतिः ।
| |
| अनादिनित्या सा तच्च विना तां न स गम्यते ॥’</span></span> इति कात्यायनश्रुतिः ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद् ब्रह्म विष्टितं तावती वाक् ॥
| |
| कश्छन्दसां योगमावेद धीरः को धिष्ण्यां प्रतिवाचं पपाद।’(ऋ.सं.१०.११४.९-१०)</span></span> इति च ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B031
| |
| | text =
| |
| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘नित्या वेदाः समस्ताश्च शाश्वता विष्णुबुद्धिगाः ।
| |
| सर्गे सर्गेऽमुनेवैत उद्गीर्यन्ते तथैव च ॥
| |
| तत्क्रमेणैव तैर्वर्णैस्तैः स्वरैरेव नान्यथा ॥’</span></span>
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B032
| |
| | text =
| |
| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अतः श्रुतित्वमेतासां श्रुता एव यतोऽखिलैः ।
| |
| जन्मान्तरे श्रुतास्तास्तु वासुदेवप्रसादतः ॥
| |
| मुनीनां प्रतिभास्यन्ति भागेनैव न सर्वशः ।
| |
| यतस्ता हरिणा दृष्टाः श्रुता एवापरैः जनैः ।
| |
| श्रुतयो दृष्टयश्चेति तेनोच्यन्ते पुरातनैः ॥’</span></span>
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B033
| |
| | text =
| |
| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तदुत्पत्तिवचश्चैव भवेत् व्यक्तिमपेक्ष्य तु ।
| |
| चेतनस्य जनिर्यद्वदुच्यते सर्वलौकिकैः ॥
| |
| पुराणानि तदर्थानि सर्गे सर्गेन्यथैव तु ।
| |
| क्रियन्तेतस्त्वनित्यानि तदर्थाः पूर्वसर्गवत् ॥’</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">‘वेदानां सृष्टिवाक्यानि भवेयुर्व्यक्त्यपेक्षया ।
| |
| अवान्तराभिमानानां देवानां वा व्यपेक्षया ॥
| |
| नानित्यत्वात् कुतस्तेषामनित्यत्वं स्थिरात्मनाम् ॥’</span></span> इति ब्रह्माण्डे ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B034
| |
| | text =
| |
| | |
| न चानित्यत्वे श्रुतिर्वेद इत्यादि विशेषशब्दो उपपद्यते(युज्यते) ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahavarahapurana-id">‘वेदास्ते नित्यविन्नत्वात् श्रुतयश्चाखिलैः श्रुतेः ।
| |
| आम्नायोऽनन्यथापाठादीशबुद्धिस्थिताः सदा ॥’</span></span> इति महावाराहे ।
| |
| न च नित्यत्वं विना वेदानां दर्शनव्यवहारो युज्यते ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B035
| |
| | text =
| |
| | |
| न च वर्णपदानामनित्यत्वं वक्तुं युक्तम् । सर्वज्ञत्वादीश्वरस्य तद्बुद्धौ सर्वदा प्रतीयमानत्वात् । न च घटादिवत् संस्कारमात्रत्वं वक्तुं युक्तम् । प्रत्यभिज्ञाविरोधस्योक्तत्वात् । पुराणानामप्यन्यथा शब्दरचनमेवानित्यत्वम् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B036
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| | text =
| |
| | |
| अत आकाशगुणे शब्दे व्यज्यमाना वर्णादयस्तत्क्रमात्मको वेदश्च नित्य एवेति सिद्धम् ।
| |
| ॥ इति वर्णनित्यत्ववादः ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B037
| |
| | text =
| |
| | |
| न केवलसिद्धेऽर्थे व्युत्पत्त्यभावादप्रामाण्यम् । सिद्धान्वित एव व्युत्पत्तिगृहीतेः ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B038
| |
| | text =
| |
| | |
| ‘इयं माता’, ‘अयं पिता’ इत्यादौ अङ्गुलिप्रसारणादिपूर्वकनिर्देशेनैव हि तज्जानाति । ‘कार्यान्विते एव व्युत्पत्तिः’इति वदतः कार्यस्य कार्यान्वयाभावात् कल्पनागौरवम् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| | text =
| |
| | |
| ‘इयं माता’, ‘अयं पिता’, ‘सुरूपोऽसि’ इत्यादौ सिद्धमात्रज्ञापनेन पर्यवसितत्वात् वाक्यस्य ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| |
| | text =
| |
| | |
| तस्य तत्र प्रामाण्यानुभवाच्च । न च कुत्रचित् सिद्धज्ञापनादन्यत् वाक्यस्य प्रयोजनं दृष्टम्। ज्ञात्वैव हीष्टसाधनतां प्रवर्तते; निवर्तते च विपर्ययेण । अतः सिद्ध एव सर्ववाक्यानां प्रामाण्यं सिद्धम् । प्रसिद्धं च व्याकरणनिरुक्त्यादीनां सिद्धमात्रे प्रामाण्यं सर्ववादिनाम् । तदनङ्गीकारे च सर्वशाब्दव्यवहारासिद्धिः ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| |
| | text =
| |
| | |
| उक्तं च नारदीये-
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahavarahapurana-id">‘सर्वज्ञं सर्वकर्तारं नारायणमनामयम् ।
| |
| सर्वोत्तमं ज्ञापयन्ति महातात्पर्यमत्र हि ॥
| |
| सर्वेषामपि वेदानाम् इतिहासपुराणयोः ।
| |
| प्रमाणानां च सर्वेषां तदर्थं चान्यदुच्यते ॥’</span></span> इति ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
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| |
| | text =
| |
| | |
| न च जीवेश्वराभेद एव तात्पर्यमागमस्य ; तत्र प्रमाणाभावात् । न च जीवेश्वरभेदः सिद्ध इत्यनुवादकत्वं भेदवाक्यानाम् ; आगमं विना ईश्वरस्यैव असिद्धेः । न च अनुमानात् तत्सिद्धिः ; विपर्ययेणापि अनुमातुं शक्यत्वात् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B043
| |
| | text =
| |
| | |
| ‘विमतं सकर्तृकं कार्यत्वात्, घटवत्’ इत्युक्ते ‘विमतं विकर्तृकं अस्मत्संमतकर्तृरहितत्वात्, आत्मवत्’ इत्यनुमानविरोधात् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
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| |
| | text =
| |
| | |
| ‘अकार्यत्वम्’ उपाधिरित्युक्ते ‘शरीरिजन्यत्वम्’ इतरत्रापि उपाधिः इत्युत्तरम् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
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| |
| | text =
| |
| | |
| प्रत्यक्षानुमानसिद्धत्वे च भेदस्य तद्विरोधादेवाप्रामाण्यमभेदागमस्य । तेनाभेदागमस्याप्रामाण्याभावे (तेनाभेदवाक्यास्याप्रामाण्याभावे च) नानुवादकत्वं भेदवाक्यानाम् । न हि बलवतोऽनुवादकत्वम् ; दार्ढ्यहेतुत्वात् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B046
| |
| | text =
| |
| | |
| प्रत्यक्षादेरागमस्य प्राबल्येऽपि नोपजीव्यप्रमाणविरोधे प्रामाण्यम् । विषयाभावे स्वस्यैवाप्रामाण्यप्राप्तेः । तेनैव ह्यनुमानादिनाऽऽगमस्य विषयः सिद्ध्यति तत्पक्षेऽपि । अनुमानेन ह्यनुवादित्वपक्ष ईश्वरो बोद्धव्यः, प्रत्यक्षेण च आगमः । अतस्तयोर्विरोधे प्रामाण्यं न स्यात् । अनुमानसिद्धेश्वराच्च भेदोऽनुभवतः एव सिद्धो जीवस्य ; असर्वकर्तृत्वेनानुभवात् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B047
| |
| | text =
| |
| | |
| न चानुभवविरोधे आगमस्य प्रामाण्यम् ; आगमप्रामाण्यानुभवस्याप्यप्रामाण्यप्राप्तेः । बहुप्रमाणसंवादश्च दार्ढ्यहेतुरेव ; बहूनां वचने तस्यैव दर्शने च दार्ढ्यस्यैव दृष्टेः ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B048
| |
| | text =
| |
| | |
| सर्वाविवादस्थल एव कथञ्चिदनुवादकत्वम् । न चात्र सर्वाविवादः, एकत्ववादिनामेव विवाददर्शनात् । बहुप्रमाणविरोधे च एकस्याप्रामाण्यं दृष्टं शुक्तिरजतादौ । न च दोषजन्यत्वादेव दुर्बलत्वमिति विरोधः । बहुप्रमाणविरुद्धानां दोषजन्यत्वनियमात् । दोषजन्यत्वं च बलवत्प्रमाणविरोधादेव ज्ञायते ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B049
| |
| | text =
| |
| | |
| ‘अदुष्टमिन्द्रियं त्वक्षं तर्कोऽदुष्टस्तथाऽनुमा । | |
| आगमोऽदुष्टवाक्यं च स्वदृक् चानुभवः स्मृतः ॥ | | आगमोऽदुष्टवाक्यं च स्वदृक् चानुभवः स्मृतः ॥ |
| बलवत्प्रमाणतश्चैव ज्ञेया दोषा न चान्यथा । | | बलवत्प्रमाणतश्चैव ज्ञेया दोषा न चान्यथा । |
| द्विविधं बलवत्त्वं च बहुत्वाच्च स्वभावतः । | | द्विविधं बलवत्त्वं च बहुत्वाच्च स्वभावतः । |
| तयोः स्वभावो बलवानुपजीव्यादिकश्च सः ॥ | | तयोः स्वभावो बलवानुपजीव्यादिकश्च सः ॥</div> |
| }}
| |
|
| |
|
| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B050" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B050">याथार्थ्यमेव प्रामाण्यं तन्मुख्यं ज्ञानशब्दयोः । |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B050
| |
| | text =
| |
| | |
| याथार्थ्यमेव प्रामाण्यं तन्मुख्यं ज्ञानशब्दयोः । | |
| ज्ञानं च द्विविधं बाह्यं तथाऽनुभवरूपकम् ॥ | | ज्ञानं च द्विविधं बाह्यं तथाऽनुभवरूपकम् ॥ |
| बल्येवानुभवस्तत्र निर्दोषं त्वक्षजादिकम् । | | बल्येवानुभवस्तत्र निर्दोषं त्वक्षजादिकम् । |
| अनुप्रमाणतां याति तथाऽक्षादित्रयं ततः ॥ | | अनुप्रमाणतां याति तथाऽक्षादित्रयं ततः ॥ |
| प्राबल्यमागमस्यैव जात्या तेषु त्रिषु स्मृतम् । | | प्राबल्यमागमस्यैव जात्या तेषु त्रिषु स्मृतम् । |
| उपजीव्यविरोधे तु न प्रामाण्यममुष्य च ॥ | | उपजीव्यविरोधे तु न प्रामाण्यममुष्य च ॥</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B051" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B051">यामाहुरनुमां केचित् (त्र्या)त्रियाद्यवयवात्मिकाम् । |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B051
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| | text =
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| यामाहुरनुमां केचित् (त्र्या)त्रियाद्यवयवात्मिकाम् । | |
| सा व्यर्था, नोपपत्त्या हि विना साऽपि प्रमाणताम् ॥ | | सा व्यर्था, नोपपत्त्या हि विना साऽपि प्रमाणताम् ॥ |
| यात्यतो युक्तिरेवैका प्रमाणमनुमात्मकम् । | | यात्यतो युक्तिरेवैका प्रमाणमनुमात्मकम् । |
| युक्तिः प्रतिज्ञारूपा च हेतुदृष्टान्तरूपिका ॥ | | युक्तिः प्रतिज्ञारूपा च हेतुदृष्टान्तरूपिका ॥ |
| तथोपनयरूपा च परा निगमनात्मिका । | | तथोपनयरूपा च परा निगमनात्मिका । |
| पृथक् पृथक् प्रमाणत्वं याति युक्तितयैव तु ॥ | | पृथक् पृथक् प्रमाणत्वं याति युक्तितयैव तु ॥</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B052" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B052">प्रतिज्ञा हेतुगर्भैव पृथक् प्रामाण्यमेष्यति । |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B052
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| | text =
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| प्रतिज्ञा हेतुगर्भैव पृथक् प्रामाण्यमेष्यति । | |
| सिद्धत्वेन प्रतिज्ञाया हेतुर्मानं पृथग् भवेत् ॥ | | सिद्धत्वेन प्रतिज्ञाया हेतुर्मानं पृथग् भवेत् ॥ |
| प्रतिज्ञावयवत्वात्तु स्वातन्त्र्येणैव मानताम् । | | प्रतिज्ञावयवत्वात्तु स्वातन्त्र्येणैव मानताम् । |
| दृष्टान्तो यात्युपनयो व्याप्तिमाश्रित्य केवलम् ॥ | | दृष्टान्तो यात्युपनयो व्याप्तिमाश्रित्य केवलम् ॥ |
| व्याप्तिस्तु केवलाऽपि स्यात् प्रमाणं नियमाश्रयात् । | | व्याप्तिस्तु केवलाऽपि स्यात् प्रमाणं नियमाश्रयात् । |
| तथा निगमनं चोपसंहारैकस्वरूपतः ॥ | | तथा निगमनं चोपसंहारैकस्वरूपतः ॥ |
| प्रामाण्यं यात्यनुभवो ज्ञापयत्युपपत्तिताम् ॥ | | प्रामाण्यं यात्यनुभवो ज्ञापयत्युपपत्तिताम् ॥</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B053" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B053">विरोधश्च तथाऽधिक्यं न्यूनताऽसङ्गतिस्तथा । |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B053
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| | text =
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| विरोधश्च तथाऽधिक्यं न्यूनताऽसङ्गतिस्तथा । | |
| उपपत्तिदोषा विज्ञेया विरोधश्च स्वतोऽन्यतः ॥ | | उपपत्तिदोषा विज्ञेया विरोधश्च स्वतोऽन्यतः ॥ |
| जनकस्यात्ययो जातिः स्वस्य वाऽन्यस्य वा भवेत् । | | जनकस्यात्ययो जातिः स्वस्य वाऽन्यस्य वा भवेत् । |
| जनकं प्रमाणमुद्दिष्टं स्वस्यार्थस्य प्रकाशनात् । | | जनकं प्रमाणमुद्दिष्टं स्वस्यार्थस्य प्रकाशनात् । |
| निग्रहा एत एव स्युः संवादानुक्तिसंयुताः ॥ | | निग्रहा एत एव स्युः संवादानुक्तिसंयुताः ॥</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B054" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B054">अर्थतः प्राप्तिरेवार्थापत्तिरित्यभिधीयते । |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B054
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| | text =
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| अर्थतः प्राप्तिरेवार्थापत्तिरित्यभिधीयते । | |
| दृष्ट्वा सदृशमेवान्यं पूर्वदृष्टे तु वस्तुनि ॥ | | दृष्ट्वा सदृशमेवान्यं पूर्वदृष्टे तु वस्तुनि ॥ |
| एतत्सदृशताज्ञानमुमानं प्रकीर्तितम् । | | एतत्सदृशताज्ञानमुमानं प्रकीर्तितम् । |
| अभावस्य परिज्ञानं द्विविधं समुदाहृतम् ॥ | | अभावस्य परिज्ञानं द्विविधं समुदाहृतम् ॥ |
| एकं तत्रानुभवतो योग्यस्यानुपलब्धितः । | | एकं तत्रानुभवतो योग्यस्यानुपलब्धितः । |
| द्वितीयमपि विज्ञेयमं सुखाद्ये च घटादिके ॥ | | द्वितीयमपि विज्ञेयमं सुखाद्ये च घटादिके ॥</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B054" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B054">एकं प्रत्यक्षरूपं स्यात् द्वितीयमनुमात्मकम् । |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B054
| |
| | text =
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| एकं प्रत्यक्षरूपं स्यात् द्वितीयमनुमात्मकम् । | |
| क्वचिद् घटाद्यभावोऽपि प्रत्यक्षेणावगम्यते ॥ | | क्वचिद् घटाद्यभावोऽपि प्रत्यक्षेणावगम्यते ॥ |
| झटित्येव परिज्ञानान्न लिङ्गोद्भवता मता । | | झटित्येव परिज्ञानान्न लिङ्गोद्भवता मता । |
| अर्थापत्तिश्चोपमा च ह्यनुमाभेद एव तु ॥ | | अर्थापत्तिश्चोपमा च ह्यनुमाभेद एव तु ॥</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B055" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B055">आगमो द्विविधो ज्ञेयो नित्योनित्यस्तथैव च ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B055
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| | text =
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| आगमो द्विविधो ज्ञेयो नित्योनित्यस्तथैव च ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B056" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B056">प्रत्यक्षं त्रिविधं ज्ञेयमैश्वरं यौगिकं तथा । |
| }}
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| {{Bhashyam
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| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B056
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| | text =
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| प्रत्यक्षं त्रिविधं ज्ञेयमैश्वरं यौगिकं तथा । | |
| अयोगिकं चेति तथा सर्वमक्षात्मकं मतम् ॥ | | अयोगिकं चेति तथा सर्वमक्षात्मकं मतम् ॥ |
| अक्षाणि च स्वरूपाणि नित्यज्ञानात्मकानि च । | | अक्षाणि च स्वरूपाणि नित्यज्ञानात्मकानि च । |
| विष्णोः श्रियस्तथैवोक्तान्यन्येषां द्विविधानि तु ॥
| | विष्णोः श्रियस्तथैवोक्तान्यन्येषां द्विविधानि तु ॥ |
| स्वरूपाणि च भिन्नानि भिन्नानि त्रिविधानि च । | | स्वरूपाणि च भिन्नानि भिन्नानि त्रिविधानि च । |
| दैवासुराणि मध्यानीत्येतत्प्रत्यक्षमीरितम् । | | दैवासुराणि मध्यानीत्येतत्प्रत्यक्षमीरितम् । |
| विषयान् प्रति स्थितं ह्यक्षं प्रत्यक्षमिति कीर्तितम् । | | विषयान् प्रति स्थितं ह्यक्षं प्रत्यक्षमिति कीर्तितम् । |
| अक्षयं पुरुषस्याक्षं स्वरूपे मुख्यमेव तु (तत्)। | | अक्षयं पुरुषस्याक्षं स्वरूपे मुख्यमेव तु (तत्)। |
| उपचारस्तदन्यत्र सृष्टावुपचयो यतः । | | उपचारस्तदन्यत्र सृष्टावुपचयो यतः । |
| उपपत्तिस्वरूपत्वादनुमा सम्भवादिकम् ॥ | | उपपत्तिस्वरूपत्वादनुमा सम्भवादिकम् ॥ |
| प्रत्यक्षागममाहात्म्यादनुमानं प्रमाणताम् । | | प्रत्यक्षागममाहात्म्यादनुमानं प्रमाणताम् । |
| याति, नैवान्यथा, तस्य नियतत्वं क्वचिद्भवेत् ॥’ इति ब्रह्मतर्के । | | याति, नैवान्यथा, तस्य नियतत्वं क्वचिद्भवेत् ॥’ इति ब्रह्मतर्के । |
| ॥ इति ब्रह्मतर्कव्याख्या ॥ | | ॥ इति ब्रह्मतर्कव्याख्या ॥</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
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| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B057
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| | text =
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| अत्र चोपजीव्यत्वेन प्रमाणप्राबल्याद्भेद एव तात्पर्यं युक्तम् । कथञ्चानुवादकत्वं भेदस्य प्रमाणेनासिद्धौ । सिद्धौ च कथमभेदवाक्यस्याबाधः । न चाप्रमाणसिद्धेनानुवादकत्वं प्रमाणस्य भवति । दुर्बलत्वे च भेदप्रमाणस्याभासत्वात् । न भेदवाक्यानामनुवादित्वम् । अतश्च भेदवाक्यानामेव प्राबल्यम् ।
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| }}
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| {{Bhashyam
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| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B058
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| | text =
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| सर्वप्रमाणविरुद्धवचनानामेव प्राबल्याङ्गीकारे ‘इदं वाऽग्रे नैव किञ्चनाऽसीत् । असतः सदजायत’ इत्यादीनामेवाविचारेण प्रतीयमानस्यार्थस्य सर्वप्रमाणविरुद्धत्वात् तत्र सर्वागमानां महातात्पर्यं प्रसज्येत । न च तत्र युक्तिविरोध इति वाच्यम् । तस्मिन् पक्षे युक्तिविरुद्धत्वेनाननुवादित्वमिति गुण एव स्यात् । युक्तिसिद्धत्वे ह्यनुवादित्वं स्यात् । अतः प्रमाणसिद्धत्वे तदपलापायुक्तेः, अप्रमाणसिद्धत्वे च प्रमाणस्य अनुवादित्वाभावाच्च न भेदवाक्यानां दौर्बल्यम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B057" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B057">अत्र चोपजीव्यत्वेन प्रमाणप्राबल्याद्भेद एव तात्पर्यं युक्तम् । कथञ्चानुवादकत्वं भेदस्य प्रमाणेनासिद्धौ । सिद्धौ च कथमभेदवाक्यस्याबाधः । न चाप्रमाणसिद्धेनानुवादकत्वं प्रमाणस्य भवति । दुर्बलत्वे च भेदप्रमाणस्याभासत्वात् । न भेदवाक्यानामनुवादित्वम् । अतश्च भेदवाक्यानामेव प्राबल्यम् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B058" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B058">सर्वप्रमाणविरुद्धवचनानामेव प्राबल्याङ्गीकारे ‘इदं वाऽग्रे नैव किञ्चनाऽसीत् । असतः सदजायत’ इत्यादीनामेवाविचारेण प्रतीयमानस्यार्थस्य सर्वप्रमाणविरुद्धत्वात् तत्र सर्वागमानां महातात्पर्यं प्रसज्येत । न च तत्र युक्तिविरोध इति वाच्यम् । तस्मिन् पक्षे युक्तिविरुद्धत्वेनाननुवादित्वमिति गुण एव स्यात् । युक्तिसिद्धत्वे ह्यनुवादित्वं स्यात् । अतः प्रमाणसिद्धत्वे तदपलापायुक्तेः, अप्रमाणसिद्धत्वे च प्रमाणस्य अनुवादित्वाभावाच्च न भेदवाक्यानां दौर्बल्यम् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B059
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| | text =
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| न च प्रमाणबहुत्वे दौर्बल्यम् । दार्ढ्यमेव हि बहुवाक्यसंवादे दृष्टम् । तथा सति अभ्यासादेरप्यप्रामाण्यहेतुत्वं स्यात् । अभ्यासस्य च तात्पर्यलिङ्गत्वं सर्वेषां सिद्धम् । तदनङ्गीकारे तत्पक्षेऽपि नवकृत्वः ‘तत्त्वमसि’ इत्यभ्यासस्यानुवादकत्वेनाप्रामाण्यं स्यात् । प्रथमवाक्येनैव यस्यासिद्धं तदर्थमपरमित्युक्ते प्रत्यक्षादिना भेदो येनानिश्चितस्तदर्थमपरं वाक्यमित्युत्तरम् । तस्मात् बहुप्रमाणसंवादित्वे प्राबल्यमेव । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B059" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B059">न च प्रमाणबहुत्वे दौर्बल्यम् । दार्ढ्यमेव हि बहुवाक्यसंवादे दृष्टम् । तथा सति अभ्यासादेरप्यप्रामाण्यहेतुत्वं स्यात् । अभ्यासस्य च तात्पर्यलिङ्गत्वं सर्वेषां सिद्धम् । तदनङ्गीकारे तत्पक्षेऽपि नवकृत्वः ‘तत्त्वमसि’ इत्यभ्यासस्यानुवादकत्वेनाप्रामाण्यं स्यात् । प्रथमवाक्येनैव यस्यासिद्धं तदर्थमपरमित्युक्ते प्रत्यक्षादिना भेदो येनानिश्चितस्तदर्थमपरं वाक्यमित्युत्तरम् । तस्मात् बहुप्रमाणसंवादित्वे प्राबल्यमेव । |
| अतः सर्वप्रमाणविरुद्धत्वान्नाभेदे तात्पर्यं वाक्यस्य । किन्तु विष्णोः सर्वोत्तमत्व एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् । | | अतः सर्वप्रमाणविरुद्धत्वान्नाभेदे तात्पर्यं वाक्यस्य । किन्तु विष्णोः सर्वोत्तमत्व एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B060" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B060">तथा चोक्तं भगवता- |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । <br/>क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥</span> |
| | id = VTN_C01_B060
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । <br/>यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥</span> |
| | text =
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । <br/>अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥</span> |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । <br/>स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥</span> |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । <br/>एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥’(भा.गी.१५.१६-२०)</span> इति । |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैव चान्यत्र सत्यम् । <br/>अवान्तरं तत्परत्वं तदन्यत् सर्वागमानां पुरुषार्थस्ततोतः ॥’</span> इति पैङ्गिश्रुतिः । |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id">‘मुख्यं च सर्ववेदानां तात्पर्यं श्रीपतेः परम् । <br/> उत्कर्षे तु तदन्यत्र तात्पर्यं स्यादवान्तरम् ॥’</span> इति महावाराहे ।</div> |
|
| |
|
| तथा चोक्तं भगवता-
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B061" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B061">युक्तं च विष्णोः सर्वोत्तमत्त्व(त्कर्षे) एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् । मोक्षो हि सर्वपुरुषार्थोत्तमः । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । | | <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘धर्मार्थकामाः सर्वेऽपि न नित्या मोक्ष एव हि । <br/>नित्यस्तस्मात् तदर्थाय यतेत मतिमान् नरः ॥’</span> इति भाल्लवेयश्रुतिः । |
| क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥</span></span>
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahabaharata-id">‘अनित्यत्वात् सदुःखत्वान्न धर्माद्याः परं सुखम् ।<br/>मोक्ष एव परानन्दः संसारे परिवर्तताम् ॥’</span> इति च भारते । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
| |
| यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
| |
| अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
| |
| स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।
| |
| एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥’(भा.गी.१५.१६-२०)</span></span> इति ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैव चान्यत्र सत्यम् ।
| |
| अवान्तरं तत्परत्वं तदन्यत् सर्वागमानां पुरुषार्थस्ततोतः ॥’</span></span> इति पैङ्गिश्रुतिः ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id">‘मुख्यं च सर्ववेदानां तात्पर्यं श्रीपतेः परम् ।
| |
| उत्कर्षे तु तदन्यत्र तात्पर्यं स्यादवान्तरम् ॥’</span></span> इति महावाराहे ।
| |
| }}
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| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B061
| |
| | text =
| |
| | |
| युक्तं च विष्णोः सर्वोत्तमत्त्व(त्कर्षे) एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् । मोक्षो हि सर्वपुरुषार्थोत्तमः । | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘धर्मार्थकामाः सर्वेऽपि न नित्या मोक्ष एव हि ।
| |
| नित्यस्तस्मात् तदर्थाय यतेत मतिमान् नरः ॥’</span></span> इति भाल्लवेयश्रुतिः । | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabaharata-id">‘अनित्यत्वात् सदुःखत्वान्न धर्माद्याः परं सुखम् ।
| |
| मोक्ष एव परानन्दः संसारे परिवर्तताम् ॥’</span></span> इति च भारते । | |
| मोक्षश्च विष्णुप्रसादेन विना न लभ्यते । | | मोक्षश्च विष्णुप्रसादेन विना न लभ्यते । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘यस्य प्रसादात् परमार्तिरूपादस्मात् संसारान्मुच्यते नापरेण ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘यस्य प्रसादात् परमार्तिरूपादस्मात् संसारान्मुच्यते नापरेण ।<br/>नारायणोऽसौ परमो विचिन्त्यो मुमुक्षुभिः कर्मपाशादमुष्मात् ॥’</span> इति नारायणश्रुतिः । |
| नारायणोऽसौ परमो विचिन्त्यो मुमुक्षुभिः कर्मपाशादमुष्मात् ॥’</span></span> इति नारायणश्रुतिः । | | <span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुधा श्रुतेन ।<br/>यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥’(कठ.१.२.२३)</span> इति कठश्रुतिः । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुधा श्रुतेन ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।<br/>भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥’(भ.गी.१२.७)</span> इति भगवद्वचनम् । |
| यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥’(कठ.१.२.२३)</span></span> इति कठश्रुतिः । | | <span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘उत्पत्तिस्थितिसंहारा नियतिज्ञानमावृतिः । <br/>बन्धमोक्षौ च पुरुषाद्यस्मात् स हरिरेकराट् ॥’</span> इति स्कान्दे । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अज्ञानां ज्ञानदो विष्णुः ज्ञानिनां मोक्षदश्च सः । <br/>आनन्दश्च मुक्तानां स एवैको जनार्दनः ॥’</span> इति च । |
| भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥’(भ.गी.१२.७)</span></span> इति भगवद्वचनम् । | | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘बन्धको भवपाशेन भवपाशाच्च मोचकः ।<br/>कैवल्यदः परं ब्रह्म विष्णुरेव न संशयः ॥’</span> इति च ।</div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘उत्पत्तिस्थितिसंहारा नियतिज्ञानमावृतिः ।
| |
| बन्धमोक्षौ च पुरुषाद्यस्मात् स हरिरेकराट् ॥’</span></span> इति स्कान्दे । | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अज्ञानां ज्ञानदो विष्णुः ज्ञानिनां मोक्षदश्च सः ।
| |
| आनन्दश्च मुक्तानां स एवैको जनार्दनः ॥’</span></span>इति च । | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘बन्धको भवपाशेन भवपाशाच्च मोचकः ।
| |
| कैवल्यदः परं ब्रह्म विष्णुरेव न संशयः ॥’</span></span> इति च । | |
| }}
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| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B062
| |
| | text =
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| | |
| प्रीतिश्च गुणोत्कर्षज्ञानादेव विशेषतो दृष्टा ; नाभेदज्ञानात् । अभेदज्ञानादप्रीतिरेवोत्तमानां भवति । घातयन्ति हि राजानो राजाऽहमिति वदन्तम् । ददाति च सर्वमभिप्रेतं गुणोत्कर्षं वदतः ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘न तादृशी प्रीतिरीड्यस्य विष्णोर्गुणोत्कर्षज्ञातरि यादृशी स्यात् ।
| |
| तत्प्रीणनान्मोक्षमाप्नोति सर्वस्ततो वेदास्तत्पराः सर्व एव ॥’</span></span> इति सौपर्णश्रुतिः ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
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| स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत ॥(भ.गी.१५.१९)</span></span>
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| इति गुणोत्कर्षज्ञानादेव परमा प्रीतिर्भगवता स्वयमेवाभिहिता । अतो विष्णोः गुणोत्कर्ष एव सर्वश्रुतिस्मृतीनां महातात्पर्यम् । न चाभेदे तात्पर्यमित्यत्र किञ्चिन्मानम् ।
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| {{Bhashyam
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| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B063
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| न च विशेषणविशेष्यतया भेदसिद्धिः । विशेषणविशेष्यभावश्च भेदापेक्षः ; धर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेदसिद्धिः, भेदापेक्षं च धर्मिप्रतियोगित्वमित्यन्योन्याऽश्रयतया भेदस्यायुक्तिः, पदार्थस्वरूपत्वात् भेदस्य । न च धर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेदस्यास्वरूपत्वम् ; ऐक्यवत् स्वरूपस्यैव तथात्वम् ।
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| {{Bhashyam
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| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B064
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| | text =
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| स्वरूपसिद्धावपि तदसिद्धिश्च जीवेश्वरैक्यं वदतः सिद्धैव । भेदस्तु स्वरूपदर्शन एव सिद्धः । प्रायः सर्वतो विलक्षणं हि पदार्थस्वरूपं दृश्यते । ‘अस्य भेदः’ इति तु ‘पदार्थस्य स्वरूपम्’ इतिवत् ।
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B062" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B062">प्रीतिश्च गुणोत्कर्षज्ञानादेव विशेषतो दृष्टा ; नाभेदज्ञानात् । अभेदज्ञानादप्रीतिरेवोत्तमानां भवति । घातयन्ति हि राजानो राजाऽहमिति वदन्तम् । ददाति च सर्वमभिप्रेतं गुणोत्कर्षं वदतः । |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘न तादृशी प्रीतिरीड्यस्य विष्णोर्गुणोत्कर्षज्ञातरि यादृशी स्यात् ।<br/>तत्प्रीणनान्मोक्षमाप्नोति सर्वस्ततो वेदास्तत्पराः सर्व एव ॥’</span> इति सौपर्णश्रुतिः । |
| | id = VTN_C01_B065
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । <br/> स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत ॥(भ.गी.१५.१९)</span> |
| | text =
| | इति गुणोत्कर्षज्ञानादेव परमा प्रीतिर्भगवता स्वयमेवाभिहिता । अतो विष्णोः गुणोत्कर्ष एव सर्वश्रुतिस्मृतीनां महातात्पर्यम् । न चाभेदे तात्पर्यमित्यत्र किञ्चिन्मानम् ।</div> |
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| यदि न स्वरूपं भेदः, तदा पदार्थे दृष्टे प्रायः सर्वतो वैलक्ष्ण्यं तस्य न ज्ञायेत । अज्ञाते च वैलक्षण्ये आत्मनि घट इत्यपि संशयः(यादिः) स्यात् । न हि कश्चित् तथा संशयं करोति । ज्ञात्वैव प्रायः सर्वतो वैलक्षण्यं कस्मिश्चिदेव सदृशे संशयं करोति । न ह्यात्मनि ‘अहं देवदत्तो न वा’ इति कस्यचित् संशयो भवति । सामान्यतः सर्ववैलक्षण्ये ज्ञात एव घटत्वादिज्ञानम् । अतो नान्योन्याश्रयता ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B063" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B063">न च विशेषणविशेष्यतया भेदसिद्धिः । विशेषणविशेष्यभावश्च भेदापेक्षः ; धर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेदसिद्धिः, भेदापेक्षं च धर्मिप्रतियोगित्वमित्यन्योन्याऽश्रयतया भेदस्यायुक्तिः, पदार्थस्वरूपत्वात् भेदस्य । न च धर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेदस्यास्वरूपत्वम् ; ऐक्यवत् स्वरूपस्यैव तथात्वम् ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B064" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B064">स्वरूपसिद्धावपि तदसिद्धिश्च जीवेश्वरैक्यं वदतः सिद्धैव । भेदस्तु स्वरूपदर्शन एव सिद्धः । प्रायः सर्वतो विलक्षणं हि पदार्थस्वरूपं दृश्यते । ‘अस्य भेदः’ इति तु ‘पदार्थस्य स्वरूपम्’ इतिवत् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B066
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| | text =
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| न च युगपज्ज्ञानानुपत्तिर्दोषः । यथा युगपदेव दीपसहस्रदर्शने सामान्यतः सर्वे ज्ञायन्त एव, तथा स्यात् । एकस्मिन्नेव वस्तुनि विशेषस्तैरप्यङ्गीकृत एव । ‘नेति नेति’ इत्यत्र सर्ववैलक्षण्याङ्गीकारात् । विशेषानङ्गीकारे च पुनरुक्तेः । न च घटाद् वैलक्षण्यमेव पटाद् वैलक्षण्यम् ; अनुभवविरोधात् । तस्मात् भेददर्शनं युक्तमेव । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B065" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B065">यदि न स्वरूपं भेदः, तदा पदार्थे दृष्टे प्रायः सर्वतो वैलक्ष्ण्यं तस्य न ज्ञायेत । अज्ञाते च वैलक्षण्ये आत्मनि घट इत्यपि संशयः(यादिः) स्यात् । न हि कश्चित् तथा संशयं करोति । ज्ञात्वैव प्रायः सर्वतो वैलक्षण्यं कस्मिश्चिदेव सदृशे संशयं करोति । न ह्यात्मनि ‘अहं देवदत्तो न वा’ इति कस्यचित् संशयो भवति । सामान्यतः सर्ववैलक्षण्ये ज्ञात एव घटत्वादिज्ञानम् । अतो नान्योन्याश्रयता ।</div> |
| ॥ इति भेदवादप्रकरणम् ॥
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B066" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B066">न च युगपज्ज्ञानानुपत्तिर्दोषः । यथा युगपदेव दीपसहस्रदर्शने सामान्यतः सर्वे ज्ञायन्त एव, तथा स्यात् । एकस्मिन्नेव वस्तुनि विशेषस्तैरप्यङ्गीकृत एव । ‘नेति नेति’ इत्यत्र सर्ववैलक्षण्याङ्गीकारात् । विशेषानङ्गीकारे च पुनरुक्तेः । न च घटाद् वैलक्षण्यमेव पटाद् वैलक्षण्यम् ; अनुभवविरोधात् । तस्मात् भेददर्शनं युक्तमेव । |
| | verse_id = VTN_C01
| | ॥ इति भेदवादप्रकरणम् ॥</div> |
| | id = VTN_C01_B067
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| | text =
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| यच्च प्रमाणदृष्टानामपि पदार्थानां मिथ्यात्वकल्पनं तच्च प्रमाणविरुद्धत्वादेव प्रकाशतस्करत्वम् । न हि प्रमाणदृष्टस्य तर्कबाध्यत्वम्, प्रत्यक्षादिविरुद्धानां तर्काभासत्वनियमात् । शुक्त्यादेः रजतादिप्रतीतेरपि बलवत्प्रत्यक्षविरुद्धत्वादेव भ्रमत्वं न तर्कमात्रात् । तर्कमात्रतः(त्रेण) प्रत्यक्षबाधने भूतचतुष्टयस्याबादेः पृथिवीत्वादृष्टेः पृथिव्या अपि पृथिवीत्वं न स्यात् । अतो न तर्कमात्रत एव दृष्टस्य भ्रान्तित्वं कल्प्यम् । अतः सर्वभेदनिरासकतर्कस्य सर्वश्रुतिस्मृतिप्रत्यक्षानुमानविरुद्धत्वात् नितरामाभासत्वम् (एव) । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B067" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B067">यच्च प्रमाणदृष्टानामपि पदार्थानां मिथ्यात्वकल्पनं तच्च प्रमाणविरुद्धत्वादेव प्रकाशतस्करत्वम् । न हि प्रमाणदृष्टस्य तर्कबाध्यत्वम्, प्रत्यक्षादिविरुद्धानां तर्काभासत्वनियमात् । शुक्त्यादेः रजतादिप्रतीतेरपि बलवत्प्रत्यक्षविरुद्धत्वादेव भ्रमत्वं न तर्कमात्रात् । तर्कमात्रतः(त्रेण) प्रत्यक्षबाधने भूतचतुष्टयस्याबादेः पृथिवीत्वादृष्टेः पृथिव्या अपि पृथिवीत्वं न स्यात् । अतो न तर्कमात्रत एव दृष्टस्य भ्रान्तित्वं कल्प्यम् । अतः सर्वभेदनिरासकतर्कस्य सर्वश्रुतिस्मृतिप्रत्यक्षानुमानविरुद्धत्वात् नितरामाभासत्वम् (एव) ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B068" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B068">न च परमार्थतो भेदाभावः व्यावहारिकः सोऽस्तीति वाच्यम् । सदसद्वैलक्षण्ये प्रमाणाभावात् । ‘असतः ख्यात्ययोगात्’इति वदतः असतः ख्यातिरभूत्, न वा । यदि नाभूत् न तत्ख्यातिनिराकरणम् । यद्यभूत् न तथाऽपि । न चासतो वैलक्षण्यं तत्प्रतीतिं विना ज्ञायते । न च शुक्ते रजतत्वं सद्वलिक्षणम् । ‘असदेव रजतं प्रत्यभात्' इत्यनुभवात् । न च प्रतीतत्वादसत्त्वाभावः । असतः सत्त्वप्रतीतिः सतोऽसत्त्वप्रतीतिरित्यन्यथाप्रतीतेरेव भ्रान्तित्वात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B068
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| | text =
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| न च परमार्थतो भेदाभावः व्यावहारिकः सोऽस्तीति वाच्यम् । सदसद्वैलक्षण्ये प्रमाणाभावात् । ‘असतः ख्यात्ययोगात्’इति वदतः असतः ख्यातिरभूत्, न वा । यदि नाभूत् न तत्ख्यातिनिराकरणम् । यद्यभूत् न तथाऽपि । न चासतो वैलक्षण्यं तत्प्रतीतिं विना ज्ञायते । न च शुक्ते रजतत्वं सद्वलिक्षणम् । ‘असदेव रजतं प्रत्यभात्' इत्यनुभवात् । न च प्रतीतत्वादसत्त्वाभावः । असतः सत्त्वप्रतीतिः सतोऽसत्त्वप्रतीतिरित्यन्यथाप्रतीतेरेव भ्रान्तित्वात् । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B069" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B069">न च असतो भ्रान्तावपि प्रतीतिर्नास्तीति वाच्यम् । अनिर्वचनीयपरमार्थत्वस्य असत एव दृष्ट्यङ्गीकारात् । न च तदपि अनिर्वाच्यम्, अनवस्थितेः । प्रथमानिर्वचनीयासिद्ध्या सर्वासिद्धिरिति मूलक्षतिः ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B068" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B068">अनिर्वचनीयत्वे रजतस्यानिर्वचनीयमिदं रजतमिति बाधकज्ञानमुत्पद्येत। मिथ्याशब्दस्त्वभाववाची । न च सदसद्वलिक्षणं नामस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । अनुभवविरोधश्च तत्पक्षे । सदसतोर्द्वयोरेव सर्वैरनुभूयमानत्वात् । अतोऽनिर्वचनीयाभावादसतः प्रतीत्यनङ्गीकारात् प्रतीयमानत्वाच्च भेदस्य सत्त्वप्राप्तेर्नाद्वितीयत्वं युज्यते ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B069
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| न च असतो भ्रान्तावपि प्रतीतिर्नास्तीति वाच्यम् । अनिर्वचनीयपरमार्थत्वस्य असत एव दृष्ट्यङ्गीकारात् । न च तदपि अनिर्वाच्यम्, अनवस्थितेः । प्रथमानिर्वचनीयासिद्ध्या सर्वासिद्धिरिति मूलक्षतिः ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B069" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B069">कथं च श्रुतिसिद्धौ जीवपरमात्मभेदो निराक्रियते । मिथ्यावादित्वे च श्रुतेः कथमैक्यस्य सत्यत्वम् । कथं चैवंवादिनां वेदवादित्वम् । वेदोक्तस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारादेव ह्यवेदवादित्वं बौद्धादीनामपि । अतो विष्णोः सर्वोत्तमत्व एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B070" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B070">कथञ्च जीवपरमात्मैक्ये सर्वश्रुतीनां तात्पर्यं युज्यते, सर्वप्रमाणविरुद्धत्वात् । तथा हि- अनुभवविरोधः । न हि ‘अहं सर्वज्ञः, सर्वेश्वरः, निर्दुःखः, निर्दोषः’ इति वा कस्यचिदनुभवः । अस्ति च तद्विपर्ययेणानुभवः । न च मिथ्यानुभवोऽयम् । तद्विपरीतप्रमाणाभावात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B068
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| | text =
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| अनिर्वचनीयत्वे रजतस्यानिर्वचनीयमिदं रजतमिति बाधकज्ञानमुत्पद्येत। मिथ्याशब्दस्त्वभाववाची । न च सदसद्वलिक्षणं नामस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । अनुभवविरोधश्च तत्पक्षे । सदसतोर्द्वयोरेव सर्वैरनुभूयमानत्वात् । अतोऽनिर्वचनीयाभावादसतः प्रतीत्यनङ्गीकारात् प्रतीयमानत्वाच्च भेदस्य सत्त्वप्राप्तेर्नाद्वितीयत्वं युज्यते ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B071" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B071">न चाभेदे कश्चिदागमः । सन्ति च भेदे सर्वागमाः । तथाहि - ‘अतत्त्वमसि’ इति नवकृत्व उपदेशः सदृष्टान्तकः । न चायमम् अभेदोपदेशः । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयते ।’(छां.उ.६.८.२)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वा प्रजा सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’ (छां.उ.६.८.४)</span> ॥1॥</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B072" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B072"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां समवहारमेकतां गमयन्ति । ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वा प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति।’(छां.उ.६.९.१-३)</span> ॥2॥</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B069
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| कथं च श्रुतिसिद्धौ जीवपरमात्मभेदो निराक्रियते । मिथ्यावादित्वे च श्रुतेः कथमैक्यस्य सत्यत्वम् । कथं चैवंवादिनां वेदवादित्वम् । वेदोक्तस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारादेव ह्यवेदवादित्वं बौद्धादीनामपि । अतो विष्णोः सर्वोत्तमत्व एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B073" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B073"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति । स समुद्र एव भवति । ता यथा तत्र (न विवेकं लभन्ते) न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति । एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तत्तदा भवन्ति।’ (छां.उ.६.१०.१-२)</span> ॥3॥</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B074" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B074"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘...स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति । अस्य यदैकां शाखां जीवो जहाति अथ सा शुष्यति...’ (छां.उ.६.११.१-२)</span> ॥4॥ |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीति अण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति । तं होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयसे एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति..’ (छां.उ.६.१२.१-२)</span> ॥5॥</div> |
| | id = VTN_C01_B070
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| | text =
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| कथञ्च जीवपरमात्मैक्ये सर्वश्रुतीनां तात्पर्यं युज्यते, सर्वप्रमाणविरुद्धत्वात् । तथा हि- अनुभवविरोधः । न हि ‘अहं सर्वज्ञः, सर्वेश्वरः, निर्दुःखः, निर्दोषः’ इति वा कस्यचिदनुभवः । अस्ति च तद्विपर्ययेणानुभवः । न च मिथ्यानुभवोऽयम् । तद्विपरीतप्रमाणाभावात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B075" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B075"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">लवणमेतदुदकेऽवधाय मा प्रातरुपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति । तद्धावमृश्य न विवेद ।<br/> यथा विलीनमेवाङ्ग अस्यान्तादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । मध्यादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । अन्त्यादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । अभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । तच्छश्वत् संवर्तते । तं होवाच अत्र वाव किल (त)सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति’ (छां.उ.६.१३.१-२)</span> ॥6॥ |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योभिनद्धाक्षमानीय तं ततोतिजने विसृजेत्....’ (छां.उ.६.१४.१)</span> ॥7॥</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B076" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B076"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अथ यदाऽस्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावन्न विजानाति’ (छां.उ.६.१५.२)</span> ॥8॥ |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘पुरुषं सोम्योतं हस्तगृहीतमानयन्ति अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत् परशुमस्मै तपतेति । स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोनृताभिसन्धोनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यते अथ हन्यते अथ स यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते । स सत्यभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यते अथ मुच्यते’ (छां.उ.६.१६.१-२)</span> ॥ |
| | id = VTN_C01_B071
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ एवमेव खलु सोम्य आचार्यवान् पुरुषो वेद’</span> ॥9॥ इति स्थाननवकेऽपि भेद एव दृष्टान्ताभिधानात् ।</div> |
| | text =
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| न चाभेदे कश्चिदागमः । सन्ति च भेदे सर्वागमाः । तथाहि - ‘अतत्त्वमसि’ इति नवकृत्व उपदेशः सदृष्टान्तकः । न चायमम् अभेदोपदेशः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयते ।’(छां.उ.६.८.२)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वा प्रजा सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’ (छां.उ.६.८.४)</span></span> ॥1॥
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B077" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B077">नहि शकुनिसूत्रयोः, नानावृक्षरसानां, नदीसमुद्रयोः, जीववृक्षयोः, अणिम-धानयोः, लवणोदकयोः, गन्धारपुरुषयोः, अज्ञप्राणादिनियामकयोः स्तेनापहार्ययोश्चैक्यम् । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा’(छां.उ.६.९.२)</span> इति <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सत आगम्य न विदुः सत आगच्छाम इहे इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा’(छां.उ.६.१०.२)</span> इति भेदापरिज्ञानेनानर्थवचनाच्च । न हि गृहादागतस्य गृहे प्रविष्टस्य च तदैक्यम् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B078" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B078"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति’(छां.उ.६.१०.१)</span> इत्यत्रापि भेद एव उच्यते । अन्यथा ‘तास्समुद्र एव भवन्ति’ इति व्यपदेशः स्यात् । अतो नद्यः समुद्रादागच्छन्ति तं प्रविशन्ति च । समुद्रस्तु स एव, नैतासां समुद्रत्वं भवतीत्यर्थः । न हि भिन्नानां नदीजलपरमाणूनां समुद्राणुभिरैक्यं युज्यते । तथासति महाजनसमितौ प्रविष्टानां द्वित्राणां तदैक्यं स्यात् । न च तद्युज्यते भेदेनानुभवात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B072
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां समवहारमेकतां गमयन्ति । ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वा प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति।’(छां.उ.६.९.१-३)</span></span> ॥2॥ | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B079" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B079"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स्वं ह्यपीतो भवति’(छां.उ.६.८.१)</span> इत्यत्रापि ‘स्व’ इति परमात्मनोऽभिधानम् । <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘स्वात्मना चोत्तरयोः’(ब्र.सू.२.३.२१)</span> इति सूत्रात् । |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्वातन्त्र्यात् स्व इति प्रोक्तः आत्मायं चाततत्वतः । <br/> ब्रह्मायं गुणपूर्णत्वात् भगवान् विष्णुरव्ययः ॥’</span> |
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति । स समुद्र एव भवति । ता यथा तत्र (न विवेकं लभन्ते) न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति । एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तत्तदा भवन्ति।’ (छां.उ.६.१०.१-२)</span></span>॥3॥
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘...स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति । अस्य यदैकां शाखां जीवो जहाति अथ सा शुष्यति...’ (छां.उ.६.११.१-२)</span></span> ॥4॥
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीति अण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति । तं होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयसे एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति..’ (छां.उ.६.१२.१-२)</span></span> ॥5॥
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">लवणमेतदुदकेऽवधाय मा प्रातरुपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति । तद्धावमृश्य न विवेद ।
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| यथा विलीनमेवाङ्ग अस्यान्तादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । मध्यादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । अन्त्यादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । अभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । तच्छश्वत् संवर्तते । तं होवाच अत्र वाव किल (त)सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति’ (छां.उ.६.१३.१-२)</span></span> ॥6॥
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योभिनद्धाक्षमानीय तं ततोतिजने विसृजेत्....’ (छां.उ.६.१४.१)</span></span> ॥7॥
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अथ यदाऽस्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावन्न विजानाति’ (छां.उ.६.१५.२)</span></span>॥8॥
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘पुरुषं सोम्योतं हस्तगृहीतमानयन्ति अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत् परशुमस्मै तपतेति । स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोनृताभिसन्धोनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यते अथ हन्यते अथ स यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते । स सत्यभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यते अथ मुच्यते’ (छां.उ.६.१६.१-२)</span></span> ॥
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ एवमेव खलु सोम्य आचार्यवान् पुरुषो वेद’</span></span> ॥9॥ इति स्थाननवकेऽपि भेद एव दृष्टान्ताभिधानात् ।
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| नहि शकुनिसूत्रयोः, नानावृक्षरसानां, नदीसमुद्रयोः, जीववृक्षयोः, अणिम-धानयोः, लवणोदकयोः, गन्धारपुरुषयोः, अज्ञप्राणादिनियामकयोः स्तेनापहार्ययोश्चैक्यम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा’(छां.उ.६.९.२)</span></span> इति <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सत आगम्य न विदुः सत आगच्छाम इहे इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा’(छां.उ.६.१०.२)</span></span> इति भेदापरिज्ञानेनानर्थवचनाच्च । न हि गृहादागतस्य गृहे प्रविष्टस्य च तदैक्यम् ।
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति’(छां.उ.६.१०.१)</span></span> इत्यत्रापि भेद एव उच्यते । अन्यथा ‘तास्समुद्र एव भवन्ति’ इति व्यपदेशः स्यात् । अतो नद्यः समुद्रादागच्छन्ति तं प्रविशन्ति च । समुद्रस्तु स एव, नैतासां समुद्रत्वं भवतीत्यर्थः । न हि भिन्नानां नदीजलपरमाणूनां समुद्राणुभिरैक्यं युज्यते । तथासति महाजनसमितौ प्रविष्टानां द्वित्राणां तदैक्यं स्यात् । न च तद्युज्यते भेदेनानुभवात् ।
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स्वं ह्यपीतो भवति’(छां.उ.६.८.१)</span></span> इत्यत्रापि ‘स्व’ इति परमात्मनोऽभिधानम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘स्वात्मना चोत्तरयोः’(ब्र.सू.२.३.२१)</span></span> इति सूत्रात् ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्वातन्त्र्यात् स्व इति प्रोक्तः आत्मायं चाततत्वतः ।
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| ब्रह्मायं गुणपूर्णत्वात् भगवान् विष्णुरव्ययः ॥’</span></span>
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| इति परमोपनिषदि । ‘अपीत’ इत्यत्रापि प्रवेशमात्रम् । ‘स्वम्’इति द्वितीयानिर्देशात् । एकीभावविवक्षायां ‘स्वेन’ इति निर्देशः स्यात् । | | इति परमोपनिषदि । ‘अपीत’ इत्यत्रापि प्रवेशमात्रम् । ‘स्वम्’इति द्वितीयानिर्देशात् । एकीभावविवक्षायां ‘स्वेन’ इति निर्देशः स्यात् । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">स्वं कुलायं यथापीतः पक्षी स्यादेवमीश्वरम् ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">स्वं कुलायं यथापीतः पक्षी स्यादेवमीश्वरम् । <br/>अप्येति जीवः प्रस्वापे मुक्तो चान्योपि सन् सदा ॥’<br/></span> इति च । ‘एवमेव खलु सोम्य एतन्मनो दिशं दिशं पतित्वा अन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते’ इत्यत्रापि मन इति जीवः, प्राण इति परमात्मा । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यत्रायं पुरुषः स्वपिति नाम’</span> इति तयोरेव प्रस्तुतत्वात् । |
| अप्येति जीवः प्रस्वापे मुक्तो चान्योपि सन् सदा ॥’</span></span> इति च । ‘एवमेव खलु सोम्य एतन्मनो दिशं दिशं पतित्वा अन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते’ इत्यत्रापि मन इति जीवः, प्राण इति परमात्मा । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यत्रायं पुरुषः स्वपिति नाम’</span></span> इति तयोरेव प्रस्तुतत्वात् । | | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘मननात् मन उद्दिष्टः पुद्गलो निरयं गिरन् । <br/>कर्मानुशयनाच्चैव संसार्यनुशयी स्मृतः ॥’</span> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘मननात् मन उद्दिष्टः पुद्गलो निरयं गिरन् ।
| | इति च (परमोपनिषदि) । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘प्राणः प्रणयनादेषः साधुत्वात् सन् हरिः स्मृतः ।’</span> इति च। <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वा प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’(छां.उ.६.८.४)</span> इत्यत्रापि भेद एव प्रतीयते । |
| कर्मानुशयनाच्चैव संसार्यनुशयी स्मृतः ॥’</span></span> | | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्रष्टृत्वादाश्रयात्वाच्च मुक्तानां च प्रति प्रति ।<br/>स्थापनाच्च विभुर्विष्णुरन्यः संसारिणो मतः ॥’</span> इति च ॥</div> |
| इति च (परमोपनिषदि) । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘प्राणः प्रणयनादेषः साधुत्वात् सन् हरिः स्मृतः ।’</span></span> इति च।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वा प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’(छां.उ.६.८.४)</span></span> इत्यत्रापि भेद एव प्रतीयते ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्रष्टृत्वादाश्रयात्वाच्च मुक्तानां च प्रति प्रति ।
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| स्थापनाच्च विभुर्विष्णुरन्यः संसारिणो मतः ॥’</span></span> इति च ॥ | |
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’(छां.उ.६.३.२)</span></span> इति <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’(छां.उ.६.११.१)</span></span> इत्यत्रापि ‘जीव’शब्देन परमात्माभिहितः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘जीव इति भगवतोऽनिरुद्धस्याख्या’</span></span> इति श्रुतेः ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘विष्णुर्जीव इति प्रोक्तः सततं प्राणधारणात् ।
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| स प्रविश्य शरीरं च स्थावरं जङ्गमं तथा ॥
| |
| महाभूतानि च विभुस्त्रिवृत्करणपूर्वकम् ।
| |
| संसारिणं भ्रामयति सदैवान्यत्वलक्षणम् ॥
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| तेनायं मोदते नित्यं वृक्षावस्थां गतोऽपि सन् ॥’</span></span> इति च ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘तत्तेज ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ता आप ऐक्षन्त’ (छां.उ.६.२.४)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘इमास्तिस्रो देवता’ (छां.उ.६.३.२)</span></span> इति पूर्वमेव चेतनत्वसिद्धेः <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अनेन जीवेनात्मना’ (छां.उ.६.३.२)</span></span> इति संसारिणः पुनः प्रवेशो न युक्तः । अतस्तत्र जीवशब्देन परमात्मैवाभिहितः ।
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’(छां.उ.६.११.१)</span></span> इत्यत्रापि जीवशब्दोदितः स एव । पेपीयमानो मोदमानस्तु संसारी । न हि चेतनादन्यस्य मोदभोगादिकं युज्यते ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">(शरीरमेवायतनं सुखस्य दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् ॥म.भा.१२.१९४.१८)‘सुखस्य चाप्यायतनं शरीरं दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् ।
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| अचेतनं प्राकृतमेतदाहुर्भोक्ता तयोश्चेतनकः शरीरी ॥’</span></span> इति च भारते ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते’(छां.उ.६.११.३)</span></span> इत्यत्रापि जीवशब्दः परे । न हि संसारिणो मुख्यतः प्राणधारकत्वं युज्यते ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ब्रह्मणा त्यक्तदेहस्तु मृत इत्युच्यते नरः’</span></span> इति च ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यं वै सोम्य एतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न (अस्य सोम्यैषोणिम्न) एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति’(छां.उ.६.१२.२)</span></span> इत्यत्रापि अणिमशब्देन पर एवाभिहितः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो’(छां.उ.६.१२.३)</span></span> इत्युक्तत्वात् । धानासु तु <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अण्व्य इवेमा धाना’(छां.उ.६.१२.१)</span></span> इति स्त्रीलिङ्गप्रयोगात् इवशब्दाच्च नाणिमात्वम् । न च ता ‘न निभालयसे’ । ‘ऐतदात्म्यम्’ इत्येतदीयम् । ‘स आत्मा’ इत्यात्मशब्दश्च पर एव । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात्’(ब्र.सू.१.३.१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘नानुमानमतच्छब्दात्’(ब्र.सू.१.३.३)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘प्राणभृच्च’(ब्र.सू.१.३.४)</span></span> इत्यत्र <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’(मु.उ.२.२.५)</span></span> इति स्वशब्दपर्यायात्मशब्दात् न प्रकृतिजीवावभिधीयेते । किन्तु पर एवेति भगवता व्यासेनाभिहितम् । अत आत्मशब्दस्तस्मिन्नेव मुख्यः ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आततत्वाच्च मातृत्वादात्मेति परमो हरिः ।
| |
| आत्माभासास्तदन्ये ये न ह्येतेषां तता गुणाः ॥’</span></span> इति परमोपनिषदि ।
| |
| }}
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| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तेजः परस्यां देवतायां तावन्न जानाति’</span></span> इत्यत्र च <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘यदास्य प्राणादीन् परो ग्रसति तदा न जानाति, यदा ददाति तदा जानाति’</span></span> इति तद्वशत्वमेवोक्तम् ।
| |
| ‘यदा प्राणान् ददतीशस्तदा चेतनकोखलिम् ।
| |
| जानाति ग्रस्तकरणस्तेन वेत्ति न किञ्चन ॥’ इति ।
| |
| ‘अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत्’ इत्यत्र च अन्याभिमतस्यैव वस्तुनोऽपहार्यत्वात् भेद एवायं दृष्टान्तः । अन्यं सन्तं परमात्मानं स्वयमिति मन्यमानः स्तेन एवेति । न हि स्वकीयं परित्यजन् स्तेनो भवति ।
| |
| }}
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| |
| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
| |
| शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथा वादबलाज्जनाः ॥
| |
| कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।
| |
| याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ॥
| |
| ब्रह्मस्तेना निरानन्दा अपक्वमनसोशिवाः ।
| |
| वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥
| |
| तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ।
| |
| यतः स्वरूपतश्चान्यो जातितः श्रुतितोर्थतः ॥
| |
| कथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः स्यादसंहितः ॥’</span></span> इति मोक्षधर्मे ।
| |
| }}
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| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्षरसा यथा ।
| |
| यथा नद्यः समुद्रश्च शुद्धोदलवणे यथा ॥
| |
| यथा चोरापहार्यौ च यथा पुंविषयावपि ।
| |
| तथा जीवेश्वरौ भिन्नौ सर्वदैव वलिक्षणौ ॥
| |
| तथापि सूक्ष्मरूपत्वान्न जीवात् परमो हरिः ।
| |
| भेदेन मन्ददृष्टीनां दृश्यते प्रेरकोपि सन् ॥
| |
| वैलक्षण्यं तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते बद्ध्यतेन्यथा ॥’</span></span> इति च परमोपनिषदि ।
| |
| }}
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| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘प्रेरकः सर्व(भूतानां)जीवानां प्राणधीचोदिता च सः ।
| |
| विष्णुः संसारिणोऽन्यो यस्तमविज्ञाय मूढधीः ॥
| |
| देहेन्द्रियप्राणबुद्धिनेतृत्वं मन्यतेत्मनः ।
| |
| अतः संसारपदवीं याति जीवेशयोः सदा ॥
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| वैलक्षण्यं परं ज्ञात्वा मुच्यते बद्ध्यतेऽन्यथा ॥’</span></span> इति च ।
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| }}
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| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B080" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B080"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’(छां.उ.६.३.२)</span> इति <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’(छां.उ.६.११.१)</span> इत्यत्रापि ‘जीव’शब्देन परमात्माभिहितः । <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘जीव इति भगवतोऽनिरुद्धस्याख्या’</span> इति श्रुतेः ।</div> |
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय’(छां.६.१.२)</span></span> इति, आत्मनोऽन्यमनूचानत्वादिगुणप्रदं परमविज्ञाय स्तब्धस्य पराधीनत्वज्ञापनेन स्तब्धतां निरस्य तन्निष्ठा ह्यत्रोपदिश्यते । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B081" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B081"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘विष्णुर्जीव इति प्रोक्तः सततं प्राणधारणात् । <br/>स प्रविश्य शरीरं च स्थावरं जङ्गमं तथा ॥<br/>महाभूतानि च विभुस्त्रिवृत्करणपूर्वकम् ।<br/>संसारिणं भ्रामयति सदैवान्यत्वलक्षणम् ॥<br/>तेनायं मोदते नित्यं वृक्षावस्थां गतोऽपि सन् ॥’</span> इति च ।</div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१)</span></span> इत्यादिवादिप्रसिद्धमपि निराक्रियते ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः’(मु.उ.१.२.१०)</span></span> इत्यादिवत् श्रुतितात्पर्यापरिज्ञानप्राप्तं च ।
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B082" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B082"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘तत्तेज ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ता आप ऐक्षन्त’ (छां.उ.६.२.४)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘इमास्तिस्रो देवता’ (छां.उ.६.३.२)</span> इति पूर्वमेव चेतनत्वसिद्धेः <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अनेन जीवेनात्मना’ (छां.उ.६.३.२)</span> इति संसारिणः पुनः प्रवेशो न युक्तः । अतस्तत्र जीवशब्देन परमात्मैवाभिहितः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B090
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| दर्शितं च ‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचित् ब्रूयुरनैपुणाः’ इति । तद्वशत्वज्ञापनार्थं च <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१)</span></span> इत्यादिसृष्टिकथनम् । एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं च प्राधान्यात् किञ्चित् सादृश्यात् कारणत्वाच्च । न तु तदन्यस्य मिथ्यात्वात् । न हि सत्यज्ञानेन मिथ्याज्ञानं भवति ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B083" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B083"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’(छां.उ.६.११.१)</span> इत्यत्रापि जीवशब्दोदितः स एव । पेपीयमानो मोदमानस्तु संसारी । न हि चेतनादन्यस्य मोदभोगादिकं युज्यते । |
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| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">(शरीरमेवायतनं सुखस्य दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् ॥म.भा.१२.१९४.१८)‘सुखस्य चाप्यायतनं शरीरं दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् । <br/>अचेतनं प्राकृतमेतदाहुर्भोक्ता तयोश्चेतनकः शरीरी ॥’</span> इति च भारते । |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते’(छां.उ.६.११.३)</span> इत्यत्रापि जीवशब्दः परे । न हि संसारिणो मुख्यतः प्राणधारकत्वं युज्यते । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ब्रह्मणा त्यक्तदेहस्तु मृत इत्युच्यते नरः’</span> इति च ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B084" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B084"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यं वै सोम्य एतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न (अस्य सोम्यैषोणिम्न) एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति’(छां.उ.६.१२.२)</span> इत्यत्रापि अणिमशब्देन पर एवाभिहितः । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो’(छां.उ.६.१२.३)</span> इत्युक्तत्वात् । धानासु तु <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अण्व्य इवेमा धाना’(छां.उ.६.१२.१)</span> इति स्त्रीलिङ्गप्रयोगात् इवशब्दाच्च नाणिमात्वम् । न च ता ‘न निभालयसे’ । ‘ऐतदात्म्यम्’ इत्येतदीयम् । ‘स आत्मा’ इत्यात्मशब्दश्च पर एव । <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात्’(ब्र.सू.१.३.१)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘नानुमानमतच्छब्दात्’(ब्र.सू.१.३.३)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘प्राणभृच्च’(ब्र.सू.१.३.४)</span> इत्यत्र <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’(मु.उ.२.२.५)</span> इति स्वशब्दपर्यायात्मशब्दात् न प्रकृतिजीवावभिधीयेते । किन्तु पर एवेति भगवता व्यासेनाभिहितम् । अत आत्मशब्दस्तस्मिन्नेव मुख्यः । |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आततत्वाच्च मातृत्वादात्मेति परमो हरिः ।<br/>आत्माभासास्तदन्ये ये न ह्येतेषां तता गुणाः ॥’</span> इति परमोपनिषदि ।</div> |
| | id = VTN_C01_B091
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| | text =
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| न हि शुक्तिज्ञो रजतज्ञ इत्युच्यते । विरोधात् तयोः ज्ञानयोः । नेदं रजतमित्यरजतज्ञो हि शुक्तिज्ञो भवति । रजतज्ञश्चेन्न शुक्तिज्ञः । न हि तज्ज्ञस्तदभावज्ञो भवति । तदभावस्य तज्ज्ञानपूर्वकत्वं चान्यत्र तस्य सत्त्वादेव दृष्टम् । तदनङ्गीकारे तदेव न युज्यते । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B085" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B085"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तेजः परस्यां देवतायां तावन्न जानाति’</span> इत्यत्र च <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘यदास्य प्राणादीन् परो ग्रसति तदा न जानाति, यदा ददाति तदा जानाति’</span> इति तद्वशत्वमेवोक्तम् । |
| }}
| | ‘यदा प्राणान् ददतीशस्तदा चेतनकोखलिम् । |
| | जानाति ग्रस्तकरणस्तेन वेत्ति न किञ्चन ॥’ इति । |
| | ‘अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत्’ इत्यत्र च अन्याभिमतस्यैव वस्तुनोऽपहार्यत्वात् भेद एवायं दृष्टान्तः । अन्यं सन्तं परमात्मानं स्वयमिति मन्यमानः स्तेन एवेति । न हि स्वकीयं परित्यजन् स्तेनो भवति ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B086" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B086"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । <br/> शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथा वादबलाज्जनाः ॥<br/>कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः । <br/> याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ॥<br/> ब्रह्मस्तेना निरानन्दा अपक्वमनसोशिवाः । <br/> वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥<br/> तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् । <br/>यतः स्वरूपतश्चान्यो जातितः श्रुतितोर्थतः ॥<br/> कथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः स्यादसंहितः ॥’</span> इति मोक्षधर्मे ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B092
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| प्रधानज्ञानादप्रधानस्य ज्ञातवद्व्यपदेशोऽस्त्येव । यथा प्रधानपुरुषाणां ज्ञानाह्वाननाशनैः ‘ग्रामो ज्ञातः, आहूतो, नाशितः’ इति व्यपदेशः । कारणे च पितरि ज्ञाते ‘पुत्रो ज्ञातः’ इति । ‘जानाम्येनमस्य पुत्रोऽयम्’ इति व्यपदेश इति । एवमत्राप्येतत्सृष्टं सर्वमित्यादि । सादृश्याच्चैकस्त्रीज्ञानादन्यस्त्रीज्ञानमिति ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B087" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B087"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्षरसा यथा । <br/>यथा नद्यः समुद्रश्च शुद्धोदलवणे यथा ॥ <br/>यथा चोरापहार्यौ च यथा पुंविषयावपि । <br/>तथा जीवेश्वरौ भिन्नौ सर्वदैव वलिक्षणौ ॥ <br/>तथापि सूक्ष्मरूपत्वान्न जीवात् परमो हरिः । <br/>भेदेन मन्ददृष्टीनां दृश्यते प्रेरकोपि सन् ॥ <br/>वैलक्षण्यं तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते बद्ध्यतेन्यथा ॥’</span> इति च परमोपनिषदि ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B088" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B088"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘प्रेरकः सर्व(भूतानां)जीवानां प्राणधीचोदिता च सः । <br/>विष्णुः संसारिणोऽन्यो यस्तमविज्ञाय मूढधीः ॥<br/>देहेन्द्रियप्राणबुद्धिनेतृत्वं मन्यतेत्मनः । <br/>अतः संसारपदवीं याति जीवेशयोः सदा ॥<br/>वैलक्षण्यं परं ज्ञात्वा मुच्यते बद्ध्यतेऽन्यथा ॥’</span> इति च ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B093
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| तदेव सादृश्यमत्रापि विवक्षितं <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं स्यात्’ (छां.उ.६.१.४)</span></span> इत्यादिना । अन्यथा ‘एक’शब्दः ‘पिण्ड’शब्दश्च व्यर्थः स्यात् । ‘मृदा विज्ञातया’ इत्येतावता पूर्णत्वात् । न हि एकमृत्पिण्डात्मकान्यन्यमृण्मयानि । सादृश्यमेव हि तेषाम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्यात्’(छां.उ.६.१.५)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्यात्’(छां.उ.६.१.६)</span></span> इत्यादिकमपि व्यर्थं स्यात् । न हि एकमण्यात्मकमन्यल्लोहमयम् । न चैकनखनिकृन्तनात्मकं सर्वं कार्ष्णायसम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B089" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B089"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय’(छां.६.१.२)</span> इति, आत्मनोऽन्यमनूचानत्वादिगुणप्रदं परमविज्ञाय स्तब्धस्य पराधीनत्वज्ञापनेन स्तब्धतां निरस्य तन्निष्ठा ह्यत्रोपदिश्यते । |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१)</span> इत्यादिवादिप्रसिद्धमपि निराक्रियते । <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः’(मु.उ.१.२.१०)</span> इत्यादिवत् श्रुतितात्पर्यापरिज्ञानप्राप्तं च ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B090" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B090">दर्शितं च ‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचित् ब्रूयुरनैपुणाः’ इति । तद्वशत्वज्ञापनार्थं च <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१)</span> इत्यादिसृष्टिकथनम् । एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं च प्राधान्यात् किञ्चित् सादृश्यात् कारणत्वाच्च । न तु तदन्यस्य मिथ्यात्वात् । न हि सत्यज्ञानेन मिथ्याज्ञानं भवति ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छां.उ.६.१.४)</span></span> इत्यत्र च, वाच नाम्नामारम्भणं विकारः, अविकृतं नित्यं नामधेयं मृत्तिकेत्येवेत्येतद्वचनं(त्यादिवैदिकमेव एतद्वचनं) सत्यमिति श्रुत्यर्थः । न च वाचारम्भणशब्दोऽपि मिथ्यात्वे प्रसिद्धः । वाचारम्भणमात्रमिति चाश्रुतकल्पना । तस्मिन् पक्षे ‘नामधेय’शब्द ‘इतिशब्दश्च व्यर्थः स्यात् । अतो न कुत्रापि जगतो मिथ्यात्वमुच्यते । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B091" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B091">न हि शुक्तिज्ञो रजतज्ञ इत्युच्यते । विरोधात् तयोः ज्ञानयोः । नेदं रजतमित्यरजतज्ञो हि शुक्तिज्ञो भवति । रजतज्ञश्चेन्न शुक्तिज्ञः । न हि तज्ज्ञस्तदभावज्ञो भवति । तदभावस्य तज्ज्ञानपूर्वकत्वं चान्यत्र तस्य सत्त्वादेव दृष्टम् । तदनङ्गीकारे तदेव न युज्यते ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B092" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B092">प्रधानज्ञानादप्रधानस्य ज्ञातवद्व्यपदेशोऽस्त्येव । यथा प्रधानपुरुषाणां ज्ञानाह्वाननाशनैः ‘ग्रामो ज्ञातः, आहूतो, नाशितः’ इति व्यपदेशः । कारणे च पितरि ज्ञाते ‘पुत्रो ज्ञातः’ इति । ‘जानाम्येनमस्य पुत्रोऽयम्’ इति व्यपदेश इति । एवमत्राप्येतत्सृष्टं सर्वमित्यादि । सादृश्याच्चैकस्त्रीज्ञानादन्यस्त्रीज्ञानमिति ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B095
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः’(ई.उ.८),</span></span> | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B093" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B093">तदेव सादृश्यमत्रापि विवक्षितं <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं स्यात्’ (छां.उ.६.१.४)</span> इत्यादिना । अन्यथा ‘एक’शब्दः ‘पिण्ड’शब्दश्च व्यर्थः स्यात् । ‘मृदा विज्ञातया’ इत्येतावता पूर्णत्वात् । न हि एकमृत्पिण्डात्मकान्यन्यमृण्मयानि । सादृश्यमेव हि तेषाम् । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्यात्’(छां.उ.६.१.५)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्यात्’(छां.उ.६.१.६)</span> इत्यादिकमपि व्यर्थं स्यात् । न हि एकमण्यात्मकमन्यल्लोहमयम् । न चैकनखनिकृन्तनात्मकं सर्वं कार्ष्णायसम् ।</div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘यच्चिकेत सत्यमित् तन्न मोघं वसुस्पार्हमुत जेतोत दाता ।’(ऋ.सं.१०.५५.६),</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदापश्चन प्रमिनन्ति व्रतं वाम् ।’(ऋ.सं.०२.२४.१२),</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘प्र घान्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्’,(ऋ.सं.२.१५.१)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति ।
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| न चान्यथा क्वापि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथाभविष्यत् ॥’,</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञः शक्तिं हरेर्ये न विदुः परां हि ।
| |
| यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा ॥’,</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
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| अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥(भ.गी.१६.८)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
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| प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥’(भ.गी.१६.९)</span></span> इत्यादेश्च ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B094" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B094"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छां.उ.६.१.४)</span> इत्यत्र च, वाच नाम्नामारम्भणं विकारः, अविकृतं नित्यं नामधेयं मृत्तिकेत्येवेत्येतद्वचनं(त्यादिवैदिकमेव एतद्वचनं) सत्यमिति श्रुत्यर्थः । न च वाचारम्भणशब्दोऽपि मिथ्यात्वे प्रसिद्धः । वाचारम्भणमात्रमिति चाश्रुतकल्पना । तस्मिन् पक्षे ‘नामधेय’शब्द ‘इतिशब्दश्च व्यर्थः स्यात् । अतो न कुत्रापि जगतो मिथ्यात्वमुच्यते ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B096
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अनित्यत्वविकारित्वपारतन्त्र्यादिरूपतः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B095" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B095"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः’(ई.उ.८),</span> |
| स्वप्नादिसाम्यं जगतो न तु बोधनिवर्त्यता ॥
| | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘यच्चिकेत सत्यमित् तन्न मोघं वसुस्पार्हमुत जेतोत दाता ।’(ऋ.सं.१०.५५.६),</span> |
| सर्वज्ञस्य यतो विष्णोः सर्वदैतत् प्रतीयते ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदापश्चन प्रमिनन्ति व्रतं वाम् ।’(ऋ.सं.०२.२४.१२),</span> |
| बोधासहं ततो नैतत् किन्त्वाज्ञावशमस्य हि ॥’</span></span> इति परमोपनिषदि ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘प्र घान्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्’,(ऋ.सं.२.१५.१)</span> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘प्रज्ञाविनिर्मितं यस्मादतो मायामयं जगत् । | | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति ।<br/> न चान्यथा क्वापि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथाभविष्यत् ॥’,</span> |
| अनेनानुगतं यस्मादनृतं तेन कथ्यते ॥
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञः शक्तिं हरेर्ये न विदुः परां हि । <br/> यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा ॥’,</span> |
| बोधानिवर्त्यमपि तु नित्यमेव प्रवाहतः ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । <br/>अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥(भ.गी.१६.८)<br/></span> |
| ‘अ’ इत्युक्तः परो देवस्तेन सत्यमिदं जगत् ॥
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।<br/>प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥’(भ.गी.१६.९)<br/></span> इत्यादेश्च ।</div> |
| तदधीनस्वरूपत्वादसत्यं तेन कथ्यते ।
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| सत्यस्य सत्यं स विभुरिन्द्रचापस्य सूर्यवत् ॥’</span></span> इति च ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ।’(बृ.उ.४.१.२० )</span></span> इति च । | |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B096" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B096"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अनित्यत्वविकारित्वपारतन्त्र्यादिरूपतः । <br/> स्वप्नादिसाम्यं जगतो न तु बोधनिवर्त्यता ॥<br/>सर्वज्ञस्य यतो विष्णोः सर्वदैतत् प्रतीयते । <br/>बोधासहं ततो नैतत् किन्त्वाज्ञावशमस्य हि ॥’</span> इति परमोपनिषदि । |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘प्रज्ञाविनिर्मितं यस्मादतो मायामयं जगत् । <br/>अनेनानुगतं यस्मादनृतं तेन कथ्यते ॥ <br/>बोधानिवर्त्यमपि तु नित्यमेव प्रवाहतः । <br/>‘अ’ इत्युक्तः परो देवस्तेन सत्यमिदं जगत् ॥ <br/> तदधीनस्वरूपत्वादसत्यं तेन कथ्यते । <br/>सत्यस्य सत्यं स विभुरिन्द्रचापस्य सूर्यवत् ॥’</span> इति च । |
| | id = VTN_C01_B097
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ।’(बृ.उ.४.१.२० )</span> इति च ।</div> |
| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘महामायेत्यविद्येति नियतिर्मोहिनीति च । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B097" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B097"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘महामायेत्यविद्येति नियतिर्मोहिनीति च । <br/>प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छाऽनन्त कथ्यते ॥<br/>प्रकृतिः प्रकृष्टकरणात् वासना वासयेत् यतः । <br/>‘अ’ इत्युक्तो हरिस्तस्य विद्याऽविद्येति सञ्ज्ञिता ॥<br/> मायेत्युक्त्वा प्रकृष्टत्वात् प्रकृष्टं हि मयाभिधम् । <br/>विष्णोः प्रज्ञप्तिरेवेका शब्दैरेतैरुदीर्यते ॥<br/>प्रज्ञप्तिरूपो हि हरिः सा च स्वानन्दलक्षणा ॥’ इति च ।</span></div> |
| प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छाऽनन्त कथ्यते ॥ | |
| प्रकृतिः प्रकृष्टकरणात् वासना वासयेत् यतः । | |
| ‘अ’ इत्युक्तो हरिस्तस्य विद्याऽविद्येति सञ्ज्ञिता ॥ | |
| मायेत्युक्त्वा प्रकृष्टत्वात् प्रकृष्टं हि मयाभिधम् ।
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| विष्णोः प्रज्ञप्तिरेवेका शब्दैरेतैरुदीर्यते ॥ | |
| प्रज्ञप्तिरूपो हि हरिः सा च स्वानन्दलक्षणा ॥’ इति च ।</span></span> | |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B098" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B098"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सर्वे वेदा हरेर्भेदं सर्वस्माज्ज्ञापयन्ति हि ।<br/>भेदः स्वातन्त्र्यसार्वज्ञ्यसर्वैश्वर्यादिकश्च सः ॥<br/>स्वरूपमेव भेदोऽयं व्यावृत्तिश्च स्वरूपता । <br/>सर्वव्यावृत्तये यस्मात् स्वशब्दोऽयं प्रयुज्यते ॥<br/>सर्वव्यावृत्ततामेव नेति नेत्यादिका श्रुतिः ।<br/>विष्णोरतो वदेदन्या अपि सर्वा न संशयः ॥’</span> इति च नारायणश्रुतिः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B098
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सर्वे वेदा हरेर्भेदं सर्वस्माज्ज्ञापयन्ति हि । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B099" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B099"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘अहं ब्रह्मास्मि’(बृ.उ.३.५.४ )</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Aitareyabrahmana-id">‘तद्योहं सोसौ योसौ सोहम्’(ऐ.ब्रा.आ-२,अ-२,ख-४.१२)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘योसावादित्ये(य एव आदित्ये) पुरुषः(पुरुषो दृष्यते) सोऽहमस्मि स एवाहमस्मि’(छां.४.११.१)</span> इत्यादौ तु अन्तर्याम्यपेक्षया । |
| भेदः स्वातन्त्र्यसार्वज्ञ्यसर्वैश्वर्यादिकश्च सः ॥
| | <span class="gr-reference gr-ref-Taitattiriyaopanishat-id">‘स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः’(ब्रह्मवल्लि.२७)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Aitareyabrahmana-id">‘अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति’(ऐ.ब्रा.२.३.८)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakabrahmana-id">‘तस्योपनिषदहमिति’(बृ.ब्रा.५)</span></div> |
| स्वरूपमेव भेदोऽयं व्यावृत्तिश्च स्वरूपता ।
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| सर्वव्यावृत्तये यस्मात् स्वशब्दोऽयं प्रयुज्यते ॥
| |
| सर्वव्यावृत्ततामेव नेति नेत्यादिका श्रुतिः ।
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| विष्णोरतो वदेदन्या अपि सर्वा न संशयः ॥’</span></span> इति च नारायणश्रुतिः ।
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B100" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B100">‘अहंनामा हरिर्नित्यमहेयत्वात् प्रकीर्तितः । |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B099
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘अहं ब्रह्मास्मि’(बृ.उ.३.५.४ )</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Aitareyabrahmana-id">‘तद्योहं सोसौ योसौ सोहम्’(ऐ.ब्रा.आ-२,अ-२,ख-४.१२)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘योसावादित्ये(य एव आदित्ये) पुरुषः(पुरुषो दृष्यते) सोऽहमस्मि स एवाहमस्मि’(छां.४.११.१)</span></span> इत्यादौ तु अन्तर्याम्यपेक्षया । | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taitattiriyaopanishat-id">‘स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः’(ब्रह्मवल्लि.२७)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Aitareyabrahmana-id">‘अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति’(ऐ.ब्रा.२.३.८)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakabrahmana-id">‘तस्योपनिषदहमिति’(बृ.ब्रा.५)</span></span>
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| {{Bhashyam
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| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B100
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| | text =
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| ‘अहंनामा हरिर्नित्यमहेयत्वात् प्रकीर्तितः । | |
| त्वं चासौ प्रतियोगित्वात् परोक्षत्वात् स इत्यपि ॥ | | त्वं चासौ प्रतियोगित्वात् परोक्षत्वात् स इत्यपि ॥ |
| सर्वान्तर्यामिणि हरावस्मच्छब्दविभक्तयः । | | सर्वान्तर्यामिणि हरावस्मच्छब्दविभक्तयः । |
| युष्मच्छब्दगताश्चैव सर्वास्तच्छब्दगा अपि ॥
| | युष्मच्छब्दगताश्चैव सर्वास्तच्छब्दगा अपि ॥ |
| सर्वशब्दगताश्चैव वचनान्यखिलान्यपि । | | सर्वशब्दगताश्चैव वचनान्यखिलान्यपि । |
| स्वतन्त्रत्वात् प्रवर्तन्ते व्यावृत्तेप्यखिलात् सदा ॥ | | स्वतन्त्रत्वात् प्रवर्तन्ते व्यावृत्तेप्यखिलात् सदा ॥ |
| तत्सम्बन्धात्तु जीवेषु तत्सम्बन्धादचित्स्वपि । | | तत्सम्बन्धात्तु जीवेषु तत्सम्बन्धादचित्स्वपि । |
| वर्तन्त उपचारेण तिङ्पदान्यखिलान्यपि । | | वर्तन्त उपचारेण तिङ्पदान्यखिलान्यपि । |
| तस्मात् सर्वगतो विष्णुरेको भिच्च ततो बहुः ॥’ इति नारायणश्रुतिः । | | तस्मात् सर्वगतो विष्णुरेको भिच्च ततो बहुः ॥’ इति नारायणश्रुतिः । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । <br/> अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥’(भ.गी.१८.२०)</span> इति भगवद्वचनम् ।</div> |
| अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥’(भ.गी.१८.२०)</span></span> इति भगवद्वचनम् ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B101" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B101">न चासत्यो भेदः । <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः’(ऋ.सं.४.१७.५)</span> । <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये’(ऋ.सं.८.३.४)</span> । <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदा । मैवारुवण्यो मैवारुवण्यो मैवारुवण्यः’।</span> <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘आत्मा हि परमस्वतन्त्रः सर्ववित् सर्वशक्तिः परमसुखः परमो जीवस्तु तद्वशोल्पज्ञोल्पशक्तिः आर्तो अल्पकः’</span> इत्यादिश्रुतिभ्यः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B101
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| | text =
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| न चासत्यो भेदः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः’(ऋ.सं.४.१७.५)</span></span> । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये’(ऋ.सं.८.३.४)</span></span> । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदा । मैवारुवण्यो मैवारुवण्यो मैवारुवण्यः’।</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘आत्मा हि परमस्वतन्त्रः सर्ववित् सर्वशक्तिः परमसुखः परमो जीवस्तु तद्वशोल्पज्ञोल्पशक्तिः आर्तो अल्पकः’</span></span> इत्यादिश्रुतिभ्यः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B102" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B102">न चावान्तरसत्यत्वमिदम् । <span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyaranyaka-id">‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोश्नुुते सर्वान् कामान् सह । ब्रह्मणा विपश्चिता ।’(तै.आ.८.१)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘एतमानन्दमयामात्मानमुपसङ्क्रम्य इमान् लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत् सामगायन्नास्ते ।’(भृगुवल्ली.१४)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्मान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां वि मिमीत उत्वः ॥’(ऋ.सं.१०.७१.११)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ।’(छां.उ.८.३.४)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाज्ञातिभिर्वा’(छां.उ.८.१२.३)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् तत् केन कं जिघ्रेत् तत् केन कं विजानीयात् येनेदं सर्वं विजानाति तं च केन विजानीयात् विज्ञातारमरे केन विजानीयात्’(बृ.उ.४(२).४.१४)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’(कठ.उ.२.१.१५)</span> <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’(मुण्डक.उ.४.६(२.२.५))</span> <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.उ.५.३(३.१.३))</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । आदघ्नासः उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥(ऋ.सं.१०.७१.७)’</span> |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ईशमाश्रित्य तिष्ठन्ति मुक्ताः संसारसागरात् ।<br/>यथेष्टभोगभोक्तारो ब्रह्मान्ता उत्तरोत्तरम् ॥’</span> इत्यादि मोक्षानन्तरं भेदश्रुतिभ्यः ॥ |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।<br/>सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२)</span> इति भगवद्वचनम् । |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘ओं जगद्य्वापारवर्जम् ओं’(ब्र.सू.४.४.१७)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘ओं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ओं’(ब्र.सू.४.४.१८)</span> इत्यादि च ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B103" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B103"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘अविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा’(बृ.उ.६.५.१३(४.५.१४))</span> इति तद्धर्माणामप्यनुच्छित्तेः प्रस्तुतत्वात् । <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘अत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापिबन्’(बृ.उ.६.५.१३(४.५.१४))</span> <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘न प्रेत्य सञ्ज्ञाऽस्ति’(बृ.उ.६.५.१२(४.५.१३))</span> इति सञ्ज्ञानाशस्य दोषत्वेवोक्तत्वात् । <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत्’(बृ.उ.४(२).४.१४)</span> इति ह्याक्षेप एव ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B102
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| | text =
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| न चावान्तरसत्यत्वमिदम् ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyaranyaka-id">‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोश्नुुते सर्वान् कामान् सह । ब्रह्मणा विपश्चिता ।’(तै.आ.८.१)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘एतमानन्दमयामात्मानमुपसङ्क्रम्य इमान् लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत् सामगायन्नास्ते ।’(भृगुवल्ली.१४)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्मान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां वि मिमीत उत्वः ॥’(ऋ.सं.१०.७१.११)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ।’(छां.उ.८.३.४)</span></span><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाज्ञातिभिर्वा’(छां.उ.८.१२.३)</span></span><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् तत् केन कं जिघ्रेत् तत् केन कं विजानीयात् येनेदं सर्वं विजानाति तं च केन विजानीयात् विज्ञातारमरे केन विजानीयात्’(बृ.उ.४(२).४.१४)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’(कठ.उ.२.१.१५)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’(मुण्डक.उ.४.६(२.२.५))</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.उ.५.३(३.१.३))</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । आदघ्नासः उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥(ऋ.सं.१०.७१.७)’</span></span>
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B104" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B104">न हि भोगाभावो <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘विज्ञातारमरे केन विजानीयाद्’(बृ.उ.४(२).४.१४)</span> इति विज्ञातुरविज्ञानं चापेक्षितम् । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ईशमाश्रित्य तिष्ठन्ति मुक्ताः संसारसागरात् ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अहमित्येव यो वेद्यः स जीव इति कीर्तितः । <br/> स दुःखी स सुखी चैव स पात्रं बन्धमोक्षयोः ॥’</span> इति च परमश्रुतिः । |
| यथेष्टभोगभोक्तारो ब्रह्मान्ता उत्तरोत्तरम् ॥’</span></span> इत्यादि मोक्षानन्तरं भेदश्रुतिभ्यः ॥
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘मग्नस्य हि परेज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ।’(म.भा.१२.३०७.८३)</span> इति मोक्षधर्मे । <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘न तु तद् द्वितीयमस्ति’(बृ.उ.६(४).३.२३)</span> इति च । यत्तद् ब्रह्म द्वैतत्वेन न पश्यति तदेव द्वितीयं नेत्याह । <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् (यत्ततोऽन्यत् विभक्तत्वेनैव पश्येत्)’(बृ.उ.६(४).३.२३)</span> इति वाक्यशेषात् । ‘न हि द्रष्टुर्दृष्टेः विपरिलोपो विद्यते’ इति हेतोश्च ।</div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
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| सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२)</span></span> इति भगवद्वचनम् ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘ओं जगद्य्वापारवर्जम् ओं’(ब्र.सू.४.४.१७)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘ओं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ओं’(ब्र.सू.४.४.१८)</span></span> इत्यादि च ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B105" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B105"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेव्यये सर्व एकीभवन्ति’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७))</span> इत्यत्रापि एकीभावो मत्यैक्यं क्षीराब्ध्यादिस्थित-तद्रूपापेक्षया स्थानैक्यं वा । <span class="gr-reference gr-ref-Krishnayajurvedataittiriyaaranyaka-id">‘कामेन मे काम आगात् । हृदयात् हृदयं मृत्योः । यदमीषामदः प्रियः तदैतूप मामभि ॥’(कृ.य.तै.आ.३.१५)</span> |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ब्रह्ममत्यनुकूला मे मतिर्मुक्तौ भविष्यति ।<br/> अतः प्रायोऽनुकूलत्वमिदानीमपि मे स्थितम् ॥’</span> |
| | id = VTN_C01_B103
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘येनाऽक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्’(मुण्डक.उ.५.६(३.१.६))</span> <span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’(ब्रह्मवल्लि.२७(८.१))</span> इत्यादिश्रुतिभ्यः ।</div> |
| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘अविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा’(बृ.उ.६.५.१३(४.५.१४))</span></span>इति तद्धर्माणामप्यनुच्छित्तेः प्रस्तुतत्वात् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘अत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापिबन्’(बृ.उ.६.५.१३(४.५.१४))</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘न प्रेत्य सञ्ज्ञाऽस्ति’(बृ.उ.६.५.१२(४.५.१३))</span></span> इति सञ्ज्ञानाशस्य दोषत्वेवोक्तत्वात् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत्’(बृ.उ.४(२).४.१४)</span></span> इति ह्याक्षेप एव । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B106" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B106">स्वरूपैक्यभिप्राये कर्माणि विज्ञानमयश्च इति न युज्यते । न हि तत्पक्षेपि कर्मणां ब्रह्मैक्यं मुक्तावस्ति । निवृत्त्यभिप्राये पञ्चदशकलानामपि समत्वात् । <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७))</span> इत्यन्यासां कलानां गमनमुक्त्वा कर्मणा विज्ञानात्मनश्चैकीभावकथनं व्यर्थं स्यात् । विशेषाभावात् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B107" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B107">न च ज्ञाननिवृत्तस्य रजतस्य शुक्त्या एकीभावव्यवहारोस्ति । <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘परेव्यये’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७)</span> इत्यधिकरणत्वकथनं च भेदज्ञापकम् । अन्यथा ‘पर एव भवन्ति’ इति निर्देशः स्यात् । |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘जीवस्य परमैक्यं तु बुद्धिसारूप्यमेव तु । <br/>एकस्थाननिवसो वा व्यक्तिस्थानमपेक्ष्य सः ॥<br/>न स्वरूपैकता तस्य मुक्तस्यापि विरूपतः । <br/>स्वातन्त्र्यपूर्णतेऽल्पत्वपारतन्त्र्ये विरूपता ॥’</span> इति परमश्रुतिः ।</div> |
| | id = VTN_C01_B104
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| | text =
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| न हि भोगाभावो <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘विज्ञातारमरे केन विजानीयाद्’(बृ.उ.४(२).४.१४)</span></span> इति विज्ञातुरविज्ञानं चापेक्षितम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B108" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B108"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’(मुण्डक.उ.६.९(३.२.९)</span> इत्यादि च <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सम्पूज्य ब्राह्मणं भक्त्या शूद्रोऽपि ब्राह्मणो भवेत्’</span> इतिवत् बृंहितो भवतीत्यर्थः । न हि ब्राह्मणपूजकः स एव ब्राह्मणो भवति । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ब्रह्माणि जीवा सर्वेऽपि परब्रह्माणि मुक्तिगाः । <br/>प्रकृतिः परमं ब्रह्म परमं महदच्युतः ॥<br/>तस्मान्न मुक्ता न च सा न क्वचिद् विष्णुवैभवम् । <br/>आप्नुवन्ति स एवैकः स्वतन्त्रः पूर्णसद्गुणः ॥’</span> इति परमश्रुतिः । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अहमित्येव यो वेद्यः स जीव इति कीर्तितः ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।’(ऋ.सं.७.९९.१)</span> |
| स दुःखी स सुखी चैव स पात्रं बन्धमोक्षयोः ॥’</span></span> इति च परमश्रुतिः ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत्प्राप्तुं नैव शक्यते । <br/> तद्यत् स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥’</span> इति च ।</div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘मग्नस्य हि परेज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ।’(म.भा.१२.३०७.८३)</span></span> इति मोक्षधर्मे । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘न तु तद् द्वितीयमस्ति’(बृ.उ.६(४).३.२३)</span></span> इति च । यत्तद् ब्रह्म द्वैतत्वेन न पश्यति तदेव द्वितीयं नेत्याह । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् (यत्ततोऽन्यत् विभक्तत्वेनैव पश्येत्)’(बृ.उ.६(४).३.२३)</span></span> इति वाक्यशेषात् । ‘न हि द्रष्टुर्दृष्टेः विपरिलोपो विद्यते’ इति हेतोश्च ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B109" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B109"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यथाऽपियन्ति तेजांसि महातेजसि भास्करे ।<br/>पृथक् पृथक् स्थितान्यह्नि स्वरूपैरपि सर्वशः ॥<br/>परे ब्रह्मणि जीवाख्यब्रह्माण्यप्यपियन्ति हि । <br/>मुक्तौ पृथक् स्थितान्येव तदन्येषामदर्शनम् ।<br/>अप्ययोऽयं समुद्दिष्टो न स्वरूपैकता क्वचित् ॥’ इति नारायणश्रुतौ ।</span> |
| | verse_id = VTN_C01
| | अतः सर्वागमविरुद्धमेव जीवपरमैक्यम् ।</div> |
| | id = VTN_C01_B105
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेव्यये सर्व एकीभवन्ति’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७))</span></span> इत्यत्रापि एकीभावो मत्यैक्यं क्षीराब्ध्यादिस्थित-तद्रूपापेक्षया स्थानैक्यं वा । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Krishnayajurvedataittiriyaaranyaka-id">‘कामेन मे काम आगात् । हृदयात् हृदयं मृत्योः । यदमीषामदः प्रियः तदैतूप मामभि ॥’(कृ.य.तै.आ.३.१५)</span></span> | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B110" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B110">तथैव युक्तिविरुद्धं च । न तावदेकजीववादो युज्यते । एकाज्ञानपरिकल्पितत्वे च सर्वस्य ‘सर्वमिदं परिकल्पितम्’ इति जानतः पुनः शिष्यादिबोधनं न युज्यते । न हि ‘स्वप्नोऽयम्’ इति निश्चित्य स्वाप्नपुत्रदायार्थं यतते । स्वप्ने तु स्वप्नत्वाज्ञानादेव यतते । न च बहूनां दृश्यमानत्वादस्य ‘अज्ञानपरिकल्पितमिदम्’ इति निश्चयो युज्यते ।</div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ब्रह्ममत्यनुकूला मे मतिर्मुक्तौ भविष्यति ।
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| अतः प्रायोऽनुकूलत्वमिदानीमपि मे स्थितम् ॥’</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘येनाऽक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्’(मुण्डक.उ.५.६(३.१.६))</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’(ब्रह्मवल्लि.२७(८.१))</span></span> इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B111" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B111">स्वप्ने तु प्रबोधानन्तरमेकस्यावशिष्टत्वात् निश्चयः । न चात्र तथाऽस्ति । ‘तस्य तस्य तथा तथा प्रतिपत्तव्यम्’ इत्यङ्गीकारे वस्तुनि विकल्पासम्भवादकल्पितमित्येव स्यात् । न च तथा प्रतिपत्तव्यमित्यत्र प्रमाणमस्ति । |
| | verse_id = VTN_C01
| | शिष्याज्ञानपरिकल्पितमित्यङ्गीकारे तस्यैवाऽचार्यभावे स्वयमेव कल्पितो भवतीति सम्यग् ग्रन्थाधिगमस्यानर्थहेतुत्वं स्यात् । न च कस्यचिन्मुक्तिः । ग्रन्थाधिगमे तस्यैव स्वशिष्याज्ञानपरिकल्पितत्वप्राप्तेः ।</div> |
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| स्वरूपैक्यभिप्राये कर्माणि विज्ञानमयश्च इति न युज्यते । न हि तत्पक्षेपि कर्मणां ब्रह्मैक्यं मुक्तावस्ति । निवृत्त्यभिप्राये पञ्चदशकलानामपि समत्वात् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७))</span></span> इत्यन्यासां कलानां गमनमुक्त्वा कर्मणा विज्ञानात्मनश्चैकीभावकथनं व्यर्थं स्यात् । विशेषाभावात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B112" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B112">स चैकजीवो यदि भेदवादी भवति तस्य तत्रैव दार्ढ्यान्न कदाचिद्भेदनिवृत्तिरिति न कस्यापि मुक्तिः स्यात् । तेन यथा कल्पि तं तथैव भवतीति तेन एकजीववादिनां नित्यनिरयकल्पने स एव स्यात् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B113" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B113">न च एकजीवाज्ञानपरिकल्पितं समस्तमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः । <br/>मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥’(माण्डूक्य.उ.२.९)</span> |
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| | text =
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| न च ज्ञाननिवृत्तस्य रजतस्य शुक्त्या एकीभावव्यवहारोस्ति । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘परेव्यये’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७)</span></span> इत्यधिकरणत्वकथनं च भेदज्ञापकम् । अन्यथा ‘पर एव भवन्ति’ इति निर्देशः स्यात् ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘जीवस्य परमैक्यं तु बुद्धिसारूप्यमेव तु ।
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| एकस्थाननिवसो वा व्यक्तिस्थानमपेक्ष्य सः ॥
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| न स्वरूपैकता तस्य मुक्तस्यापि विरूपतः ।
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| स्वातन्त्र्यपूर्णतेऽल्पत्वपारतन्त्र्ये विरूपता ॥’</span></span> इति परमश्रुतिः ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’(मुण्डक.उ.६.९(३.२.९)</span></span> इत्यादि च <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सम्पूज्य ब्राह्मणं भक्त्या शूद्रोऽपि ब्राह्मणो भवेत्’</span></span>इतिवत् बृंहितो भवतीत्यर्थः । न हि ब्राह्मणपूजकः स एव ब्राह्मणो भवति । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ब्रह्माणि जीवा सर्वेऽपि परब्रह्माणि मुक्तिगाः ।
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| प्रकृतिः परमं ब्रह्म परमं महदच्युतः ॥
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।’(ऋ.सं.७.९९.१)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत्प्राप्तुं नैव शक्यते ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यथाऽपियन्ति तेजांसि महातेजसि भास्करे ।
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| पृथक् पृथक् स्थितान्यह्नि स्वरूपैरपि सर्वशः ॥
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| परे ब्रह्मणि जीवाख्यब्रह्माण्यप्यपियन्ति हि ।
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| मुक्तौ पृथक् स्थितान्येव तदन्येषामदर्शनम् ।
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| अप्ययोऽयं समुद्दिष्टो न स्वरूपैकता क्वचित् ॥’ इति नारायणश्रुतौ ।</span></span>
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| अतः सर्वागमविरुद्धमेव जीवपरमैक्यम् ।
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| न च एकजीवाज्ञानपरिकल्पितं समस्तमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
| |
| मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥’(माण्डूक्य.उ.२.९)</span></span> | |
| इत्यस्य च अयमर्थः- ‘प्रपञ्चो यदि विद्येत = भवेत = उत्पद्येत, तर्हि निवर्तेत। न च निवर्तते, तस्मादनादिरेवायम् । प्रकृष्टः पञ्चविधो भेदः प्रपञ्चः । न चाविद्यमानोऽयम्, मायामात्रत्वात् । ‘माया’ इति भगवत्प्रज्ञा, सैव मानत्राणकर्त्री यस्य तन्मायामात्रम् । परमेश्वरेण ज्ञातत्वात्, रक्षितत्वाच्च न द्वैतं भ्रान्तिकल्पितम्’ इत्यर्थः । | | इत्यस्य च अयमर्थः- ‘प्रपञ्चो यदि विद्येत = भवेत = उत्पद्येत, तर्हि निवर्तेत। न च निवर्तते, तस्मादनादिरेवायम् । प्रकृष्टः पञ्चविधो भेदः प्रपञ्चः । न चाविद्यमानोऽयम्, मायामात्रत्वात् । ‘माया’ इति भगवत्प्रज्ञा, सैव मानत्राणकर्त्री यस्य तन्मायामात्रम् । परमेश्वरेण ज्ञातत्वात्, रक्षितत्वाच्च न द्वैतं भ्रान्तिकल्पितम्’ इत्यर्थः । |
| न हीश्वरस्य भ्रान्तिः । तर्हि <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘अद्वैतः सर्वभावानाम्’(माण्डूक्य.उ.२.२)</span></span> इति व्यपदेशः कथम्? इत्यत आह-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘अद्वैतं परमार्थतः’(माण्डूक्य.उ.२.९)</span></span> इति । परमार्थापेक्षया हि अद्वैतम् । सर्वस्मादुत्तमः अर्थः स एक एवेत्यर्थः । | | न हीश्वरस्य भ्रान्तिः । तर्हि <span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘अद्वैतः सर्वभावानाम्’(माण्डूक्य.उ.२.२)</span> इति व्यपदेशः कथम्? इत्यत आह- <span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘अद्वैतं परमार्थतः’(माण्डूक्य.उ.२.९)</span> इति । परमार्थापेक्षया हि अद्वैतम् । सर्वस्मादुत्तमः अर्थः स एक एवेत्यर्थः ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B114" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B114">अन्यथा हि <span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘अद्वैतः सर्वभावानाम्’(माण्डूक्य.उ.२.२)</span> इति व्यर्थं स्यात् । सर्वभावानां मध्ये तस्य एकस्याद्वैतत्वमित्युक्ते समाधिकराहित्यमेवोक्तं स्यात् । अन्येषां सर्वभावानां च समाधिकभावः । <span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित्’ (माण्डूक्य.उ.२.१०)</span> इति वाक्यशेषाच्च न कल्पितत्वमस्येति ज्ञायते । निवर्तते इत्यङ्गीकारे ‘निवर्तेत, विद्येत’ इति च प्रसङ्गरूपेण कथनं ‘यदि’शब्दौ च न युज्यते । ‘विद्येत’ इत्यस्य च उत्पत्त्यर्थानङ्गीकारे ‘यद्यदस्ति तत्तन्निवर्तते’ इति व्याप्त्यभावात् ‘निवर्तेत’ इति न युज्यते । अतः प्रपञ्चस्य अनादिनित्यत्वपरमिदं वाक्यम् । अत <span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘उपदेशादयं वादोऽज्ञाते द्वैतं न विद्यते’(माण्डूक्य.उ.२.१०)</span> इत्याह । अज्ञात एव द्वैतं न विद्यते । अज्ञानिनां पक्ष एव द्वैतं न विद्यत इत्यर्थः ।</div> |
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| | text =
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| अन्यथा हि <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘अद्वैतः सर्वभावानाम्’(माण्डूक्य.उ.२.२)</span></span> इति व्यर्थं स्यात् । सर्वभावानां मध्ये तस्य एकस्याद्वैतत्वमित्युक्ते समाधिकराहित्यमेवोक्तं स्यात् । अन्येषां सर्वभावानां च समाधिकभावः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित्’ (माण्डूक्य.उ.२.१०)</span></span> इति वाक्यशेषाच्च न कल्पितत्वमस्येति ज्ञायते । निवर्तते इत्यङ्गीकारे ‘निवर्तेत, विद्येत’ इति च प्रसङ्गरूपेण कथनं ‘यदि’शब्दौ च न युज्यते । ‘विद्येत’ इत्यस्य च उत्पत्त्यर्थानङ्गीकारे ‘यद्यदस्ति तत्तन्निवर्तते’ इति व्याप्त्यभावात् ‘निवर्तेत’ इति न युज्यते । अतः प्रपञ्चस्य अनादिनित्यत्वपरमिदं वाक्यम् । अत <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘उपदेशादयं वादोऽज्ञाते द्वैतं न विद्यते’(माण्डूक्य.उ.२.१०)</span></span> इत्याह । अज्ञात एव द्वैतं न विद्यते । अज्ञानिनां पक्ष एव द्वैतं न विद्यत इत्यर्थः ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B115" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B115"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘जीवेश्वरभिदाचैव जडेश्वरभिदा तथा । <br/>जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ॥</span> |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">मिथश्च जडभेदोऽयं प्रपञ्चो भेदपञ्चकः । <br/>सोऽयं सत्यो ह्यनादिश्च सादिश्चेन्नाशमाप्नुयात् ॥</span> |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">न च नाशं प्रयात्येष न चासौ भ्रान्तिकल्पितः । <br/>कल्पिताश्चेन्निवर्तेत न चासौ विनिवर्तते ॥</span> |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">द्वैतं न विद्यत इति तस्मादज्ञानिनां मतम् । <br/> मतं हि ज्ञानिनामेतन्मितं त्रारातं च विष्णुना ॥<br/>तस्मात् सत्यमिति प्रोक्तं परमो हरिरेव तु ॥’</span> इति परमश्रुतिः ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B116" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B116">मैत्रेयीशाखायां च ‘अथ ज्ञानोपसर्गाः’ इत्युक्त्वा ‘अथ ये चान्ये मिथ्यातर्कैः दृष्टान्तैः कुहकेन्द्रजालैः वैदिकेषु परिस्थातुमिच्छन्ति तैः सह न संवसेत् प्राकाश्या ह्येते तस्करा अस्वर्ग्या’ इति ह्याह- |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Maitrayanyupanishat-id">‘नैरात्म्यवादकुहकैर्मिथ्यादृष्टान्तहेतुभिः ।<br/> भ्राम्यन् लोको न जानाति वेदविद्यान्तरं तु यत् ॥’(मैत्रायण्युपनिषत्.७.८)</span> इति । |
| | id = VTN_C01_B115
| | आत्मसम्बन्धि किमपि नास्तीति वादो नैरात्म्यवादः ।</div> |
| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘जीवेश्वरभिदाचैव जडेश्वरभिदा तथा । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B117" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B117">भ्रान्तिकल्पितत्वे च जगतः, सत्यं जगद्द्वयमपेक्षितम् । न हि सत्यशुक्तेः, सत्यरजतस्य, तयोः सादृश्यस्य चाभावे भ्रान्तिर्भवति ।</div> |
| जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ॥</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">मिथश्च जडभेदोऽयं प्रपञ्चो भेदपञ्चकः ।
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| सोऽयं सत्यो ह्यनादिश्च सादिश्चेन्नाशमाप्नुयात् ॥</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">न च नाशं प्रयात्येष न चासौ भ्रान्तिकल्पितः ।
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| कल्पिताश्चेन्निवर्तेत न चासौ विनिवर्तते ॥</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">द्वैतं न विद्यत इति तस्मादज्ञानिनां मतम् ।
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| मतं हि ज्ञानिनामेतन्मितं त्रारातं च विष्णुना ॥
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| तस्मात् सत्यमिति प्रोक्तं परमो हरिरेव तु ॥’</span></span> इति परमश्रुतिः ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B118" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B118">स्वप्नेऽपि वासनारूपं सत्यमेव जगन्मनसि स्थितं बहिःष्टत्वेन दृश्यते । देहात्मनोरपि एकदेशस्थत्वादिसादृश्यमस्त्येव । ‘शङ्खः पीतः’, ‘नभो नीलम्’ इत्यादिष्वपि पीतादयोऽन्यत्र विद्यन्त एव । तत्सादृश्यञ्च द्रव्यत्वादिकं किञ्चित् शङ्खादीनां चास्त्येव । अतो न कुत्रापि सदृशसत्यवस्तुद्वयं विना भ्रमः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B116
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| | text =
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| मैत्रेयीशाखायां च ‘अथ ज्ञानोपसर्गाः’ इत्युक्त्वा ‘अथ ये चान्ये मिथ्यातर्कैः दृष्टान्तैः कुहकेन्द्रजालैः वैदिकेषु परिस्थातुमिच्छन्ति तैः सह न संवसेत् प्राकाश्या ह्येते तस्करा अस्वर्ग्या’ इति ह्याह-
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B119" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B119">न चाऽत्मन्यनात्मभ्रमः क्वापि दृष्टः । न हि कश्चित् ‘अहमहं न भवामि’ इति भ्रान्तो दृश्यते । ‘आत्मन्यनात्मभ्रमः एवायं प्रपञ्चः’ इति तैरुच्यते । तं विनैव अनात्मन्यात्मभ्रमकल्पनेऽनात्मनः सत्यत्वं स्यात् । तदा चाद्वितीयत्वकल्पनेऽनात्मैवस्ति । नाऽत्मेति भवति ।</div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Maitrayanyupanishat-id">‘नैरात्म्यवादकुहकैर्मिथ्यादृष्टान्तहेतुभिः । | |
| भ्राम्यन् लोको न जानाति वेदविद्यान्तरं तु यत् ॥’(मैत्रायण्युपनिषत्.७.८)</span></span> इति ।
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| आत्मसम्बन्धि किमपि नास्तीति वादो नैरात्म्यवादः ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B120" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B120">आत्माज्ञानात्मकत्वे च जगत आत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्येत । न हि शुक्तेर्भेेदेन रजतं दृश्यते भ्रान्तौ । न चैकमेव युगपद् बहुधा दृश्यते भ्रान्तौ । न चाऽत्मनि भेदभ्रमः क्वपि दृष्टः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B117
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| | text =
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| भ्रान्तिकल्पितत्वे च जगतः, सत्यं जगद्द्वयमपेक्षितम् । न हि सत्यशुक्तेः, सत्यरजतस्य, तयोः सादृश्यस्य चाभावे भ्रान्तिर्भवति ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B121" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B121">न च कुत्रापि मिथ्योपाधिकृतो भेदो दृष्टः ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B122" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B122">न च ज्ञानाज्ञानयोरपि मिथ्याकल्पितत्वं दृष्टम् । तद्विषयस्यैवन्यथात्वं भ्रान्तौ । एवमाद्यनन्तयुक्तिविरुद्धोऽयं पक्षः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B118
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| | text =
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| स्वप्नेऽपि वासनारूपं सत्यमेव जगन्मनसि स्थितं बहिःष्टत्वेन दृश्यते । देहात्मनोरपि एकदेशस्थत्वादिसादृश्यमस्त्येव । ‘शङ्खः पीतः’, ‘नभो नीलम्’ इत्यादिष्वपि पीतादयोऽन्यत्र विद्यन्त एव । तत्सादृश्यञ्च द्रव्यत्वादिकं किञ्चित् शङ्खादीनां चास्त्येव । अतो न कुत्रापि सदृशसत्यवस्तुद्वयं विना भ्रमः ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B123" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B123">ग्रन्थबहुत्वं स्यादित्येवोपरम्यते ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B124" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B124">न च सत्यत्वाङ्गीकारे कश्चिद् दोषः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B119
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| | text =
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| न चाऽत्मन्यनात्मभ्रमः क्वापि दृष्टः । न हि कश्चित् ‘अहमहं न भवामि’ इति भ्रान्तो दृश्यते । ‘आत्मन्यनात्मभ्रमः एवायं प्रपञ्चः’ इति तैरुच्यते । तं विनैव अनात्मन्यात्मभ्रमकल्पनेऽनात्मनः सत्यत्वं स्यात् । तदा चाद्वितीयत्वकल्पनेऽनात्मैवस्ति । नाऽत्मेति भवति ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B125 " data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B125 ">बहुजीवादिपक्षेऽपि भेदस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारे एते दोषाः भवन्त्येव । मिथ्योपाधिकृतं हि तेषामपि बहुत्वम् । न च मिथ्योपाधिकृतो भेदः क्वपि दृष्टः ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B126 " data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B126 ">आत्मनि अनात्मकल्पनारूप्तवात् मिथ्योपाधिरेव न युज्यते । मायामयी सृष्टिरपि तत्सदृशस्यान्यस्य विद्यमानत्व एव दृष्टा । द्रव्यत्वादिसादृश्ययुक्तं किञ्चिदधिष्ठानमाश्रित्यैव च ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B120
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| | text =
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| आत्माज्ञानात्मकत्वे च जगत आत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्येत । न हि शुक्तेर्भेेदेन रजतं दृश्यते भ्रान्तौ । न चैकमेव युगपद् बहुधा दृश्यते भ्रान्तौ । न चाऽत्मनि भेदभ्रमः क्वपि दृष्टः ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B128" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B128"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अधिष्टानं च सदृशं तथ्य(सत्य)वस्तुद्वयं विना । <br/>न भ्रान्तिर्भवति क्वपि स्वप्नमायादिकेष्वपि ॥</span> |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘मानस्यां वासनया तु बहिर्वस्तुत्वकल्पनम् । <br/>स्वाप्नो भ्रमश्च मायायां कर्तृदेहादिवस्तुषु ॥</span> |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘चतुरङ्गबलत्वादिकल्पनं भ्रम इष्यते । <br/>न भ्रान्तिकल्पितं विश्वमतो विष्णुबलाश्रितम् ॥’</span> इति ब्रह्मवैवर्ते ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B129" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B129"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">न च मायाविना माया दृश्यते विश्वमीश्वरः । <br/>सदा पश्यति तेनेदं न मायेत्यवधार्यताम् ॥’</span> इति च ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B121
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| | text =
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| न च कुत्रापि मिथ्योपाधिकृतो भेदो दृष्टः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B130" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B130"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">अपरोक्षदृशो मिथ्यादर्शनं न क्वचित् भवेत् । <br/>सर्वापरोक्षविद्विष्णुः विश्वदृक् तन्न तन्मृषा ॥’</span> इति च ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B131" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B131">यदि चैकमेव ब्रह्मोपाधिभेदात् संसरति मुच्यते च तदा संसारिणां सर्वदा विद्यमानत्वात् सर्वदा संसार्येव ब्रह्म । अतस्तद्भावोऽपि न मुक्तिः सर्वदोपाधिसम्बद्धत्वात् तस्य । न च शुद्धस्य नोपाधिसम्बन्ध इति वाच्यम् । उपाधिसम्बद्धस्योपाधिसम्बन्धकल्पने अनवस्थाप्रसङ्गात् । न च तेनैव सम्बन्धेन सम्बद्धस्य । आत्माश्रयत्वप्रसङ्गात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B122
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| | text =
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| न च ज्ञानाज्ञानयोरपि मिथ्याकल्पितत्वं दृष्टम् । तद्विषयस्यैवन्यथात्वं भ्रान्तौ । एवमाद्यनन्तयुक्तिविरुद्धोऽयं पक्षः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B132" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B132">इतश्च मिथ्योपाधिर्न युज्यते । अज्ञानसिद्धौ मिथ्योपाधिसिद्धिः, अज्ञानं विना मिथ्यात्वासिद्धेः । न च मिथ्योपाधिं विनाऽज्ञानसिद्धिः । मिथ्योपाधिभिन्नस्यैव अज्ञत्वात् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B133" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B133">शुद्धस्यैवाज्ञत्वे मुक्तस्याप्यज्ञत्वप्रसक्तेः । स्वाभाविकत्वात् सत्यत्वात् सद्वितीयत्वप्रसक्तेश्च । स्वाभाविकस्य चानिवृत्त्यङ्गीकारादनिवृत्तिप्रसक्तेश्च । सत्यस्य च अनिवृत्तिरिति हि तत्पक्षः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B123
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| | text =
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| ग्रन्थबहुत्वं स्यादित्येवोपरम्यते ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B134" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B134">अतश्चान्योन्याश्रयता । अज्ञानसिद्धौ मिथ्योपाधिसिद्धिः, मिथ्योपाधिसिद्धौ जीवसिद्धिः, जीवसिद्धौ तदाश्रयाज्ञानसिद्धिः इति चक्रकं वा । न च शुद्धमेव भ्रान्त्याऽज्ञमिति युक्तम् । अज्ञानसिद्धौ भ्रमसिद्धिः, तत्सिद्धौ अज्ञानसिद्धिः इत्यन्योन्याश्रयत्वम् ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B135" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B135"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">अनागता अतीताश्च यावन्तः सहिताः क्षणाः ।<br/>अतीतानागताश्चैव यावन्तः परमाणवः ॥<br/>ततोऽप्यनन्तगुणिता जीवानां राशयः पृथक् ॥’</span> इति वत्सश्रुतेः</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B124
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| | text =
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| न च सत्यत्वाङ्गीकारे कश्चिद् दोषः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B133" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B133">न संसारिणां परिसमाप्तिरस्मत्पक्षे ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B134" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B134"><span class="gr-reference gr-ref-Skandapurana-id">परमाणुप्रदेशेऽपि ह्यनन्ताः प्राणिराशयः ।<br/>सूक्ष्मत्वादीशशक्त्यैव स्थूला अपि हि संस्थिताः ॥</span> |
| | verse_id = VTN_C01
| | <span class="gr-reference gr-ref-Skandapurana-id">सहस्रयोजनसभां प्रभावाद्विश्वकर्मणः । <br/>अनन्ता राशयोऽनन्ताः प्रजानामधिसंस्थिताः ॥’</span> इति स्कान्दे ।</div> |
| | id = VTN_C01_B125
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| | text =
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| बहुजीवादिपक्षेऽपि भेदस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारे एते दोषाः भवन्त्येव । मिथ्योपाधिकृतं हि तेषामपि बहुत्वम् । न च मिथ्योपाधिकृतो भेदः क्वपि दृष्टः ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B135" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B135">न च मिथ्यावस्तुनो दुर्घटत्वमेव भूषणम् । दृष्टस्य वस्तुनो मिथ्यात्वकल्पनस्य दृष्टिसकाशात् बलवत्प्रमाणयुक्त्यपेक्षत्वात् । तदभावे सत्यत्वं दृष्ट्यैव सिद्ध्यति । न ह्यन्नादिकं भोग्यं दृष्ट्वा भोक्तुं सत्यत्वे प्रमाणान्तरमपेक्षते । किन्तु ‘नेदमन्नम्’ इति केनचिदुक्ते कथमिदमन्नत्वेन दृश्यमानमन्नं न भवतीति प्रमाणान्तरमपेक्षते ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B136" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B136">न च प्रत्यक्षदृष्टस्य ततो बलवत्प्रत्यक्षमागमं विनानुमानादिनैव बाधो दृष्टः । दूरस्थवृक्षह्रस्वत्वादौ प्रत्यक्षापटुत्वस्यैव निश्चितत्वात् युक्त्या तत्र दीर्घत्वनिश्चयः । प्रत्यक्षस्य हि दूरे मन्दग्राहित्वं परिमाणादावन्यथात्वं च ततो बलवत्प्रत्यक्षेणैव निश्चितम् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B126
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| | text =
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| आत्मनि अनात्मकल्पनारूप्तवात् मिथ्योपाधिरेव न युज्यते । मायामयी सृष्टिरपि तत्सदृशस्यान्यस्य विद्यमानत्व एव दृष्टा । द्रव्यत्वादिसादृश्ययुक्तं किञ्चिदधिष्ठानमाश्रित्यैव च ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B137" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B137">न च जगत्प्रत्यक्षस्य मिथ्यात्वेन केनापि प्रमाणेन निश्चितम् । विशेषतश्च ज्ञानाज्ञानसुखदुःखात्मभेदादिविषयस्यानुभवस्य न मिथ्यात्वं दृष्टम् । अतश्च संसारस्य सत्यत्वात् सत्यस्य चानिवृत्त्यङ्गीकारान्न मोक्षः स्यात् । अनुभवसिद्धस्य बलवदनुभवं विना युक्तित एव मिथ्यात्वङ्गीकारे आत्मनोऽपि मिथ्यात्वं स्यात् । युक्तिश्च सर्वस्यान्यस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारात् । द्विधाकल्पने कल्पनागौरवमिति ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B138" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B138">आत्माधिष्ठान(स्य)भ्रमस्यैवादृष्टेः तस्याधिष्ठानत्वमपि न युज्यते । दुर्घटत्वस्य च भूषणत्वे दुर्घटमप्यात्ममिथ्यात्वं स्यादेव । प्रतीतेरप्यविद्याकार्यत्वाङ्गीकारात् । तस्याश्च दुर्घटत्वस्य भूषणत्वात् सत्यस्य च युक्त्यपेक्षत्वात् ‘घटादीनां द्रष्टृत्वम्, आत्मनो जडत्वम्, द्रष्टुरभावेऽपि च प्रतीतिः, अधिष्ठानं विनैव भ्रमः’ इत्यादि विरुद्धं सर्वमपि स्यात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
| |
| | id = VTN_C01_B128
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अधिष्टानं च सदृशं तथ्य(सत्य)वस्तुद्वयं विना । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B139" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B139">उपाधिभेदाङ्गीकारे हस्तपादाद्युपाधिभेदेऽपि तद्गतसुखदुःखादिभोक्तुर्यथा भेदो न प्रतीयते एवमेव शरीरादिभेदेऽपि भोक्तुर्भेदो न दृश्यते । सर्वदेहगतसुखदुःखादिकमेकेनैव भुज्येत । यथा च एकाङ्गुल्याद्यपगमेऽपि न मुक्तिः, एवमेकोपाध्यपगमेऽपि तस्यैवानन्तोपाधिसम्बद्धत्वान्न मुक्तिः स्यात् ।</div> |
| न भ्रान्तिर्भवति क्वपि स्वप्नमायादिकेष्वपि ॥</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘मानस्यां वासनया तु बहिर्वस्तुत्वकल्पनम् ।
| |
| स्वाप्नो भ्रमश्च मायायां कर्तृदेहादिवस्तुषु ॥</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘चतुरङ्गबलत्वादिकल्पनं भ्रम इष्यते ।
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| न भ्रान्तिकल्पितं विश्वमतो विष्णुबलाश्रितम् ॥’</span></span> इति ब्रह्मवैवर्ते । | |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B140" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B140"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">उद्यतायुधदोर्दण्डाः पतितास्वशिरोक्षिभिः । <br/>पश्यन्तः पातयन्ति स्म कबन्धा अप्यरीन् युधि ॥’</span> इति भारतवचनान्न विश्लेषाद्विशेषः ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B129
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">न च मायाविना माया दृश्यते विश्वमीश्वरः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B139" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B139">किञ्चोपाधिरात्मन एकदेशं ग्रसति उत सर्वमात्मानम् । एकदेशाङ्गीकारे सावयवत्वात् । सावयवस्य चानित्यत्वं तैरङ्गीकृतम् । सर्वग्रसे च नोपाधिः भेदकः स्यात् । उपाधिकृतांशकल्पने तदुपाधिकृतत्वे आत्माश्रयत्वम् । उपाध्यन्तरकल्पनेऽनवस्था ।</div> |
| सदा पश्यति तेनेदं न मायेत्यवधार्यताम् ॥’</span></span> इति च ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B140" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B140">न चेश्वरस्य सर्वगतत्वादौपाधिकभेदो ब्रह्मणा भवति । न हि देशतः कालतश्चापरिच्छिन्नयोरौपाधिकभेदो दृष्टः । सर्वोपाधिगत्वाच्च एकस्यैश्वरस्य भेदस्य मिथ्यात्वाद्ध(च्च ह)स्तपादादिभेदेऽपि भोक्तुरेकत्ववत् सर्वसुखदुःखादिभोक्तृत्वमीश्वरस्यैव स्यात् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B130
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| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">अपरोक्षदृशो मिथ्यादर्शनं न क्वचित् भवेत् । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B141" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B141">देशतः कालतश्चापरिच्छिन्नयोरौपाधिकभेदाभावादेव दुःखिनोऽन्यत् शुद्धं ब्रह्म न सिद्ध्यति । अतः ‘स्वाभाविकः संसारः’ इत्यनिवृत्तिरेव स्यात् । |
| सर्वापरोक्षविद्विष्णुः विश्वदृक् तन्न तन्मृषा ॥’</span></span> इति च ।
| | किञ्च विशिष्टस्य शुद्धस्य वा संसारः । शुद्धस्य संसार इत्युक्ते स्वाव्याहतिः । विशिष्टस्येत्युक्ते विशिष्टोऽन्यः स एव वा । स एव चेदुक्तो दोषः । अन्यश्चेन्नित्योऽनित्यो वा । अनित्यश्चेन्नाश एव तस्य न मोक्षः । नित्यत्वे च भेदस्य सत्यत्वम्, मोक्षेऽपि तस्य भावात् । स्वरूपमात्रस्याभेदः उपाधिभिन्न एवेत्यङ्गीकारे स्वरूपमेव उपाधिसम्बद्धमिति न तस्य शुद्धत्वम् । अशुद्धस्वभावस्य न कदाचित् शुद्धत्वमिति च तत्पक्षः ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B142" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B142">उपाधिमिथ्यात्वाङ्गीकारे चान्योन्याश्रयत्वादि(दयो) दोषा उक्ताः । न चानादिकर्मभेदाद्भेदः । औपाधिकभेदसिद्धौ कर्मभेदसिद्धिः, तत्सिद्धौ च तत्सिद्धिरित्यन्योन्याश्रयत्वात् । अतोऽनन्तदोषदुष्टत्वात् ग्रन्थबहुत्वं स्यादित्येवोपरम्यते । अतः सर्वप्रमाणविरुद्धत्वान्नाभेदे श्रुतितात्पर्यम् ।</div> |
| | verse_id = VTN_C01
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| | id = VTN_C01_B131
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| | text =
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| यदि चैकमेव ब्रह्मोपाधिभेदात् संसरति मुच्यते च तदा संसारिणां सर्वदा विद्यमानत्वात् सर्वदा संसार्येव ब्रह्म । अतस्तद्भावोऽपि न मुक्तिः सर्वदोपाधिसम्बद्धत्वात् तस्य । न च शुद्धस्य नोपाधिसम्बन्ध इति वाच्यम् । उपाधिसम्बद्धस्योपाधिसम्बन्धकल्पने अनवस्थाप्रसङ्गात् । न च तेनैव सम्बन्धेन सम्बद्धस्य । आत्माश्रयत्वप्रसङ्गात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B143" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B143">सर्वशब्दावाच्यस्य लक्षणाऽपि न दृष्टेति न तस्य शास्त्रगम्यत्वम् । अतोऽवाच्यत्वादज्ञेयत्वात् शून्यमेव तदिति प्राप्तम् । नच स्वेनापि ज्ञेयत्वं तैरुच्यते । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति ।</div> |
| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B144" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B144">न च स्वरूपमन्यद्वा ज्ञेयं ज्ञातारं च विना ज्ञानं दृष्टम् । अतो ज्ञातृज्ञेयाभावात् ज्ञानस्यापि शून्यतैव । अतः शून्यवादान्न कश्चित् विशेषः । न च ज्ञातृज्ञेयरहितं ज्ञानं क्वापि दृष्टम् ।</div> |
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| इतश्च मिथ्योपाधिर्न युज्यते । अज्ञानसिद्धौ मिथ्योपाधिसिद्धिः, अज्ञानं विना मिथ्यात्वासिद्धेः । न च मिथ्योपाधिं विनाऽज्ञानसिद्धिः । मिथ्योपाधिभिन्नस्यैव अज्ञत्वात् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C01_B145" data-verse="VTN_C01" data-block-id="VTN_C01_B145">अप्राप्ताच्चेश्वरभेदस्य नाभेदे श्रुतितात्पर्यं युज्यते । |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahopanishat-id">‘सर्वोत्तमं सर्वदोषव्यपेतं गुणैरशेषैः पूर्णमन्यं समस्तात् । <br/> वैलक्षण्याज्ज्ञापयितुं प्रवृत्ताः सर्वे वेदा मुख्यतो नैव चान्यत् ॥’</span> इति महोपनिषदि । |
| | अतः सर्वागमैरेव सर्वस्मात् भिन्नत्वेन सर्वस्माद्विशिष्टत्वेन च विज्ञेयो भगवान् नारायण इति सिद्धम् ॥</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="gr-author-note">॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः प्रथमः परिच्छेदः ॥</div> |
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| शुद्धस्यैवाज्ञत्वे मुक्तस्याप्यज्ञत्वप्रसक्तेः । स्वाभाविकत्वात् सत्यत्वात् सद्वितीयत्वप्रसक्तेश्च । स्वाभाविकस्य चानिवृत्त्यङ्गीकारादनिवृत्तिप्रसक्तेश्च । सत्यस्य च अनिवृत्तिरिति हि तत्पक्षः ।
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| }}
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| अतश्चान्योन्याश्रयता । अज्ञानसिद्धौ मिथ्योपाधिसिद्धिः, मिथ्योपाधिसिद्धौ जीवसिद्धिः, जीवसिद्धौ तदाश्रयाज्ञानसिद्धिः इति चक्रकं वा । न च शुद्धमेव भ्रान्त्याऽज्ञमिति युक्तम् । अज्ञानसिद्धौ भ्रमसिद्धिः, तत्सिद्धौ अज्ञानसिद्धिः इत्यन्योन्याश्रयत्वम् ।
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">अनागता अतीताश्च यावन्तः सहिताः क्षणाः । | |
| अतीतानागताश्चैव यावन्तः परमाणवः ॥
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| ततोऽप्यनन्तगुणिता जीवानां राशयः पृथक् ॥’</span></span> इति वत्सश्रुतेः
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| }}
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| न संसारिणां परिसमाप्तिरस्मत्पक्षे ।
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skandapurana-id">परमाणुप्रदेशेऽपि ह्यनन्ताः प्राणिराशयः ।
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| सूक्ष्मत्वादीशशक्त्यैव स्थूला अपि हि संस्थिताः ॥</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skandapurana-id">सहस्रयोजनसभां प्रभावाद्विश्वकर्मणः ।
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| अनन्ता राशयोऽनन्ताः प्रजानामधिसंस्थिताः ॥’</span></span> इति स्कान्दे ।
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| }}
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| न च मिथ्यावस्तुनो दुर्घटत्वमेव भूषणम् । दृष्टस्य वस्तुनो मिथ्यात्वकल्पनस्य दृष्टिसकाशात् बलवत्प्रमाणयुक्त्यपेक्षत्वात् । तदभावे सत्यत्वं दृष्ट्यैव सिद्ध्यति । न ह्यन्नादिकं भोग्यं दृष्ट्वा भोक्तुं सत्यत्वे प्रमाणान्तरमपेक्षते । किन्तु ‘नेदमन्नम्’ इति केनचिदुक्ते कथमिदमन्नत्वेन दृश्यमानमन्नं न भवतीति प्रमाणान्तरमपेक्षते ।
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| }}
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| न च प्रत्यक्षदृष्टस्य ततो बलवत्प्रत्यक्षमागमं विनानुमानादिनैव बाधो दृष्टः । दूरस्थवृक्षह्रस्वत्वादौ प्रत्यक्षापटुत्वस्यैव निश्चितत्वात् युक्त्या तत्र दीर्घत्वनिश्चयः । प्रत्यक्षस्य हि दूरे मन्दग्राहित्वं परिमाणादावन्यथात्वं च ततो बलवत्प्रत्यक्षेणैव निश्चितम् ।
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| }}
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| न च जगत्प्रत्यक्षस्य मिथ्यात्वेन केनापि प्रमाणेन निश्चितम् । विशेषतश्च ज्ञानाज्ञानसुखदुःखात्मभेदादिविषयस्यानुभवस्य न मिथ्यात्वं दृष्टम् । अतश्च संसारस्य सत्यत्वात् सत्यस्य चानिवृत्त्यङ्गीकारान्न मोक्षः स्यात् । अनुभवसिद्धस्य बलवदनुभवं विना युक्तित एव मिथ्यात्वङ्गीकारे आत्मनोऽपि मिथ्यात्वं स्यात् । युक्तिश्च सर्वस्यान्यस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारात् । द्विधाकल्पने कल्पनागौरवमिति ।
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| आत्माधिष्ठान(स्य)भ्रमस्यैवादृष्टेः तस्याधिष्ठानत्वमपि न युज्यते । दुर्घटत्वस्य च भूषणत्वे दुर्घटमप्यात्ममिथ्यात्वं स्यादेव । प्रतीतेरप्यविद्याकार्यत्वाङ्गीकारात् । तस्याश्च दुर्घटत्वस्य भूषणत्वात् सत्यस्य च युक्त्यपेक्षत्वात् ‘घटादीनां द्रष्टृत्वम्, आत्मनो जडत्वम्, द्रष्टुरभावेऽपि च प्रतीतिः, अधिष्ठानं विनैव भ्रमः’ इत्यादि विरुद्धं सर्वमपि स्यात् ।
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| }}
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| उपाधिभेदाङ्गीकारे हस्तपादाद्युपाधिभेदेऽपि तद्गतसुखदुःखादिभोक्तुर्यथा भेदो न प्रतीयते एवमेव शरीरादिभेदेऽपि भोक्तुर्भेदो न दृश्यते । सर्वदेहगतसुखदुःखादिकमेकेनैव भुज्येत । यथा च एकाङ्गुल्याद्यपगमेऽपि न मुक्तिः, एवमेकोपाध्यपगमेऽपि तस्यैवानन्तोपाधिसम्बद्धत्वान्न मुक्तिः स्यात् ।
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">उद्यतायुधदोर्दण्डाः पतितास्वशिरोक्षिभिः ।
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| पश्यन्तः पातयन्ति स्म कबन्धा अप्यरीन् युधि ॥’</span></span> इति भारतवचनान्न विश्लेषाद्विशेषः ।
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| किञ्चोपाधिरात्मन एकदेशं ग्रसति उत सर्वमात्मानम् । एकदेशाङ्गीकारे सावयवत्वात् । सावयवस्य चानित्यत्वं तैरङ्गीकृतम् । सर्वग्रसे च नोपाधिः भेदकः स्यात् । उपाधिकृतांशकल्पने तदुपाधिकृतत्वे आत्माश्रयत्वम् । उपाध्यन्तरकल्पनेऽनवस्था ।
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| }}
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| न चेश्वरस्य सर्वगतत्वादौपाधिकभेदो ब्रह्मणा भवति । न हि देशतः कालतश्चापरिच्छिन्नयोरौपाधिकभेदो दृष्टः । सर्वोपाधिगत्वाच्च एकस्यैश्वरस्य भेदस्य मिथ्यात्वाद्ध(च्च ह)स्तपादादिभेदेऽपि भोक्तुरेकत्ववत् सर्वसुखदुःखादिभोक्तृत्वमीश्वरस्यैव स्यात् ।
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| }}
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| देशतः कालतश्चापरिच्छिन्नयोरौपाधिकभेदाभावादेव दुःखिनोऽन्यत् शुद्धं ब्रह्म न सिद्ध्यति । अतः ‘स्वाभाविकः संसारः’ इत्यनिवृत्तिरेव स्यात् ।
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| किञ्च विशिष्टस्य शुद्धस्य वा संसारः । शुद्धस्य संसार इत्युक्ते स्वाव्याहतिः । विशिष्टस्येत्युक्ते विशिष्टोऽन्यः स एव वा । स एव चेदुक्तो दोषः । अन्यश्चेन्नित्योऽनित्यो वा । अनित्यश्चेन्नाश एव तस्य न मोक्षः । नित्यत्वे च भेदस्य सत्यत्वम्, मोक्षेऽपि तस्य भावात् । स्वरूपमात्रस्याभेदः उपाधिभिन्न एवेत्यङ्गीकारे स्वरूपमेव उपाधिसम्बद्धमिति न तस्य शुद्धत्वम् । अशुद्धस्वभावस्य न कदाचित् शुद्धत्वमिति च तत्पक्षः ।
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| उपाधिमिथ्यात्वाङ्गीकारे चान्योन्याश्रयत्वादि(दयो) दोषा उक्ताः । न चानादिकर्मभेदाद्भेदः । औपाधिकभेदसिद्धौ कर्मभेदसिद्धिः, तत्सिद्धौ च तत्सिद्धिरित्यन्योन्याश्रयत्वात् । अतोऽनन्तदोषदुष्टत्वात् ग्रन्थबहुत्वं स्यादित्येवोपरम्यते । अतः सर्वप्रमाणविरुद्धत्वान्नाभेदे श्रुतितात्पर्यम् ।
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| सर्वशब्दावाच्यस्य लक्षणाऽपि न दृष्टेति न तस्य शास्त्रगम्यत्वम् । अतोऽवाच्यत्वादज्ञेयत्वात् शून्यमेव तदिति प्राप्तम् । नच स्वेनापि ज्ञेयत्वं तैरुच्यते । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति ।
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| न च स्वरूपमन्यद्वा ज्ञेयं ज्ञातारं च विना ज्ञानं दृष्टम् । अतो ज्ञातृज्ञेयाभावात् ज्ञानस्यापि शून्यतैव । अतः शून्यवादान्न कश्चित् विशेषः । न च ज्ञातृज्ञेयरहितं ज्ञानं क्वापि दृष्टम् ।
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| अप्राप्ताच्चेश्वरभेदस्य नाभेदे श्रुतितात्पर्यं युज्यते ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahopanishat-id">‘सर्वोत्तमं सर्वदोषव्यपेतं गुणैरशेषैः पूर्णमन्यं समस्तात् ।
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| वैलक्षण्याज्ज्ञापयितुं प्रवृत्ताः सर्वे वेदा मुख्यतो नैव चान्यत् ॥’</span></span> इति महोपनिषदि ।
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| अतः सर्वागमैरेव सर्वस्मात् भिन्नत्वेन सर्वस्माद्विशिष्टत्वेन च विज्ञेयो भगवान् नारायण इति सिद्धम् ॥
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| ॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः प्रथमः परिच्छेदः ॥ | |
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| | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयः परिच्छेदः"></span> |
| == द्वितीयः परिच्छेदः == | | == द्वितीयः परिच्छेदः == |
| {{Adhyaya
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C02_B001" data-verse="VTN_C02" data-block-id="VTN_C02_B001"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">ब्रह्मा शिवः सुराद्याश्च शरीरक्षरणात् क्षराः । <br/>लक्ष्मीरक्षरदेहत्वादक्षरा तत्परो हरिः ॥</span> |
| | document_id = VTN
| | <span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">स्वातन्त्र्यशक्तिविज्ञानसुखाद्यैरखिलैर्गुणैः । <br/>निस्सीमत्वेन ते सर्वे तद्वशाः सर्वदैव च ॥</span> |
| | chapter_num = 2
| | <span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">सर्गस्थितिक्षययतिप्रकाशावृतिबन्धनम् । <br/>सर्वक्षराणामेकः स कुर्यात् सात्विकमोक्षणम् ॥</span> |
| | title = द्वितीयः परिच्छेदः
| | <span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">सर्गस्थितियतिज्योतिर्नित्यानन्दप्रदोक्षरे । <br/>चेष्टाप्रदश्च सर्वेषामेक एव परो हरिः ॥<br/>तस्य नान्योस्ति सर्गादिकर्ता निर्दोषकश्च सः ॥’</span> इति परमश्रुतिः । |
| }}
| | <span class="gr-reference gr-ref-Skandapurana-id">‘ब्रह्मशेषसुपर्णेशशक्रसूर्यगुहादयः । <br/>सर्वे क्षरा अक्षरा तु श्रीरेका तत्परो हरिः ॥’</span> इति स्कान्दे ।</div> |
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">ब्रह्मा शिवः सुराद्याश्च शरीरक्षरणात् क्षराः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C02_B002" data-verse="VTN_C02" data-block-id="VTN_C02_B002"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥(ऋ.सं.१०.१२५.५)</span> |
| लक्ष्मीरक्षरदेहत्वादक्षरा तत्परो हरिः ॥</span></span>
| | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वा उ । <br/> अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आविवेश ॥(ऋ.सं.१०.१२५.६)</span> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">स्वातन्त्र्यशक्तिविज्ञानसुखाद्यैरखिलैर्गुणैः । | | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तस्समुद्रे ॥’(ऋ.सं.१०.१२५.७)</span> |
| निस्सीमत्वेन ते सर्वे तद्वशाः सर्वदैव च ॥</span></span>
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id">‘यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति तदक्षरे परमे प्रजाः ॥ <br/> यतः प्रसूताः जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम् । <br/> यदोषधीभिः पुरुषान् पशूंश्च विवेश भूतानि चराचराणि ॥ <br/> अतः परं नान्यदणीयसं हि परात् परं यन्महतो महान्तम् । यदेकमव्यक्तमनन्तरूपं विश्वं पुराणं तमसः परस्तात् ॥ <br/> तदेवर्तं तदु सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम् ।’(म.ना.उ.१.३-६)</span> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">सर्गस्थितिक्षययतिप्रकाशावृतिबन्धनम् । | | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । <br/> विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५)</span> |
| सर्वक्षराणामेकः स कुर्यात् सात्विकमोक्षणम् ॥</span></span>
| | <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । <br/> मुखादिन्द्राश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ।’(ऋ.सं.१०.९०.१३)</span> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">सर्गस्थितियतिज्योतिर्नित्यानन्दप्रदोक्षरे । | | <span class="gr-reference gr-ref-Mahopanishat-id">‘एको(ह वै) नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो (नापो) नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी।’(महोपनिषत्१.२)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः ।’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ स मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत् तत एते व्यजायन्त ।’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विश्वो हिरण्यगर्भोग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्रा ’</span> इति । |
| चेष्टाप्रदश्च सर्वेषामेक एव परो हरिः ॥
| | <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न चशङ्करः ।<br/> नेन्द्रसूर्यौ न च गुहो न सोमो न विनायकः॥’</span> इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।</div> |
| तस्य नान्योस्ति सर्गादिकर्ता निर्दोषकश्च सः ॥’</span></span> इति परमश्रुतिः ।
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skandapurana-id">‘ब्रह्मशेषसुपर्णेशशक्रसूर्यगुहादयः । | |
| सर्वे क्षरा अक्षरा तु श्रीरेका तत्परो हरिः ॥’</span></span> इति स्कान्दे ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C02_B005" data-verse="VTN_C02" data-block-id="VTN_C02_B005"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashvataropanishat-id">‘यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्’(३.९)</span> इत्यत्राप्यपरमस्तीत्येवार्थः । अन्यथा <span class="gr-reference gr-ref-Shwetashvataropanishat-id">‘तेनेदं पूर्णं..(पुरुषेण सर्वम्॥) ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्।’(३.९-१०)</span> इति वाक्यशेषविरोधात् । ‘तेनेदम्’ इत्युक्तमेव ‘तत’ इति परामृश्यते । अन्यथा ‘यस्मात् परं न’ इत्युक्तिविरोधात् ।</div> |
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥(ऋ.सं.१०.१२५.५)</span></span> | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C02_B006" data-verse="VTN_C02" data-block-id="VTN_C02_B006"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ।’</span> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वा उ ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘‘तस्यैव सर्वनामानि व्यतिरिक्तस्य सर्वतः(शः) । <br/> यः स्वतन्त्रः सदैवैकः स विष्णुः परमो मतः ॥’</span> |
| अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आविवेश ॥(ऋ.सं.१०.१२५.६)</span></span>
| | इत्यादि श्रुतिभ्योऽन्यनामान्यस्यैवेति नान्येषां सर्वेश्वरत्वादिकमुच्यते । सर्ववेदेष्वप्यस्यादोषवचनादादावभावावचनाच्च तद्वचनाच्चान्येषां सर्वेषां वेदेषु सर्वेषु । तेषां सर्वनामत्वानुक्तेश्च ।</div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तस्समुद्रे ॥’(ऋ.सं.१०.१२५.७)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id">‘यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति तदक्षरे परमे प्रजाः ॥
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| यतः प्रसूताः जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम् ।
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| यदोषधीभिः पुरुषान् पशूंश्च विवेश भूतानि चराचराणि ॥
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| अतः परं नान्यदणीयसं हि परात् परं यन्महतो महान्तम् । यदेकमव्यक्तमनन्तरूपं विश्वं पुराणं तमसः परस्तात् ॥
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| तदेवर्तं तदु सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम् ।’(म.ना.उ.१.३-६)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
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| विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
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| मुखादिन्द्राश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ।’(ऋ.सं.१०.९०.१३)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahopanishat-id">‘एको(ह वै) नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो (नापो) नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी।’(महोपनिषत्१.२)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः ।’</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ स मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत् तत एते व्यजायन्त ।’</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विश्वो हिरण्यगर्भोग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्रा ’</span></span> इति ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न चशङ्करः ।
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| नेन्द्रसूर्यौ न च गुहो न सोमो न विनायकः॥’</span></span> इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C02_B007" data-verse="VTN_C02" data-block-id="VTN_C02_B007"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">‘उत्पत्तिर्वासुदेवस्य प्रादुर्भावो न चापरः ।<br/>देहोत्पत्तिस्तदन्येषां ब्रह्मादीनां तदीरणात् ॥</span> |
| | verse_id = VTN_C02
| | <span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">देहोऽनादिर्हरेर्नित्यो ब्रह्मादीनामनित्यकाः । <br/> मुख्योत्पत्तिस्तदन्येषां प्रादुर्भावो हरेर्जनिः ॥’</span> इति परमश्रुतेश्च ॥ |
| | id = VTN_C02_B005
| | इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः द्वितीयः परिच्छेदः ॥</div> |
| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashvataropanishat-id">‘यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्’(३.९)</span></span> इत्यत्राप्यपरमस्तीत्येवार्थः । अन्यथा <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashvataropanishat-id">‘तेनेदं पूर्णं..(पुरुषेण सर्वम्॥) ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्।’(३.९-१०)</span></span> इति वाक्यशेषविरोधात् । ‘तेनेदम्’ इत्युक्तमेव ‘तत’ इति परामृश्यते । अन्यथा ‘यस्मात् परं न’ इत्युक्तिविरोधात् । | |
| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ।’</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘‘तस्यैव सर्वनामानि व्यतिरिक्तस्य सर्वतः(शः) ।
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| यः स्वतन्त्रः सदैवैकः स विष्णुः परमो मतः ॥’</span></span>
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| इत्यादि श्रुतिभ्योऽन्यनामान्यस्यैवेति नान्येषां सर्वेश्वरत्वादिकमुच्यते । सर्ववेदेष्वप्यस्यादोषवचनादादावभावावचनाच्च तद्वचनाच्चान्येषां सर्वेषां वेदेषु सर्वेषु । तेषां सर्वनामत्वानुक्तेश्च ।
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">‘उत्पत्तिर्वासुदेवस्य प्रादुर्भावो न चापरः ।
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| देहोत्पत्तिस्तदन्येषां ब्रह्मादीनां तदीरणात् ॥</span></span> | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">देहोऽनादिर्हरेर्नित्यो ब्रह्मादीनामनित्यकाः ।
| |
| मुख्योत्पत्तिस्तदन्येषां प्रादुर्भावो हरेर्जनिः ॥’</span></span> इति परमश्रुतेश्च ॥
| |
| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः द्वितीयः परिच्छेदः ॥ | |
| }}
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| | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयः परिच्छेदः"></span> |
| == तृतीयः परिच्छेदः == | | == तृतीयः परिच्छेदः == |
| {{Adhyaya
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B001" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B001"><span class="gr-reference gr-ref-Paramopanishat-id">‘वर्जितः सर्वदोषैर्यो गुणसर्वस्वमूर्तिमान् । <br/> स्वतन्त्रो यद्वशाः सर्वे स विष्णुः परमो मतः ॥’</span> इति परमोपनिषदि ।</div> |
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| | chapter_num = 3
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| | title = तृतीयः परिच्छेदः
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Paramopanishat-id">‘वर्जितः सर्वदोषैर्यो गुणसर्वस्वमूर्तिमान् । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B002" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B002"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">‘नित्यपूर्णाखलिगुणो विदोषः सर्वदैव यः । <br/>स्वतन्त्रः स परो (परमो) विष्णुर्जन्ममृत्यादिवर्जितः ॥’</span> |
| स्वतन्त्रो यद्वशाः सर्वे स विष्णुः परमो मतः ॥’</span></span> इति परमोपनिषदि ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">‘नित्यपूर्णाखलिगुणो विदोषः सर्वदैव यः ।
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| स्वतन्त्रः स परो (परमो) विष्णुर्जन्ममृत्यादिवर्जितः ॥’</span></span> | |
| नारद उवाच । | | नारद उवाच । |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">‘निर्दोषश्चेत् कथं विष्णुर्मानुषेषूदपद्यत ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">‘निर्दोषश्चेत् कथं विष्णुर्मानुषेषूदपद्यत ।<br/>चिन्ताश्रमव्रणाज्ञानदुःखयुग् दृश्यते कथम् ॥</span> |
| चिन्ताश्रमव्रणाज्ञानदुःखयुग् दृश्यते कथम् ॥</span></span> | | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">एष मे संशयो ब्रह्मन् हृदि शल्य इवार्पितः । <br/> अनुद्धार्योऽपरैर्मत्यैः सूक्तिशक्त्या तमुद्धर ॥</span></div> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">एष मे संशयो ब्रह्मन् हृदि शल्य इवार्पितः ।
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| अनुद्धार्योऽपरैर्मत्यैः सूक्तिशक्त्या तमुद्धर ॥</span></span>
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| ब्रह्मोवाच ।
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">स्त्रीपुंमलाभियोगात्मदेहो विष्णोर्न जायते ।
| |
| किन्तु निर्दोषचैतन्यसुखां नित्यां स्वकां तनुम् ॥</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">प्रकाशयति सैवेयं जनिर्विष्णोर्न चापरा ।
| |
| तथाऽप्यसुरमोहाय परेषां च क्वचित् क्वचित् ॥</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">दुःखाज्ञानभ्रमादीन् स दर्शयेच्छुद्धसद्गुणः ।
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| क्व व्रणादि क्व चाज्ञानं स्वतन्त्राचिन्त्यसद्गुणे ॥</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">दोर्लभ्यायैव मौक्षस्य दर्शयेत् तान्यजो हरिः ।
| |
| मिथ्यादर्शनदोषेण तेन मुक्तिं न यान्ति च ॥</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">तमो यान्ति च तेनैव तस्माद्दोषविवर्जितम् ।
| |
| प्रादुर्भावगतं चैव जानीयाद्विष्णुमञ्जसा ॥’</span></span> इति ब्रह्माण्डे ।
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| }}
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| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahopanishat-id">गुणक्रियादयो विष्णोः स्वरूपं नान्यदिष्यते ।
| |
| अतो मिथोऽपि भेदो न तेषां क्वचित् कदाचन ॥</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahopanishat-id">स्वरूपेऽपि विशेषोऽस्ति स्वरूपत्ववदेव तु ।
| |
| भेदाभावेऽपि तेनैव व्यवहारश्च सर्वतः ॥’</span></span> इति महो(परमो)पनिषदि ।
| |
| }}
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| | |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">अभिन्नत्वमभेदश्च यथा भेदविवर्जितम् ।
| |
| व्यवहार्यं पृथक् च स्यादेवं सर्वे गुणाः हरेः ॥</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">अभेदाभिन्नयोर्भेदा यदि वा भेदभिन्नयोः ।
| |
| अनवस्थितिरेव स्यान्न विशेषणतामतिः ॥</span></span>
| |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">मूलसम्बन्धमज्ञात्वा तस्मादेकमनन्तधा ।
| |
| व्यवहार्यं विशेषेण दुस्तर्कबलतो हरेः ॥
| |
| विशेषोऽपि स्वरूपं स स्वनिर्वाहकताऽस्य च ॥’</span></span> इति ब्रह्मतर्के ॥
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘एकमेवाद्वितीयं तत् ’(छां.उ.६.१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘नेह नानास्ति किञ्चन’(कठ.२.१.११)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।’ (कठ.२.१.१०)</span></span>
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।
| |
| एवं धर्मान् पृथक् पश्यन् तानेवानु विधावति ॥(कठ.२.१.१४)’</span></span> इत्यादिश्रुतेश्च ॥
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| }}
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">‘देशः सर्वत्र पुरुषः स्वतन्त्रः कालनित्यता ।
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| इत्यादिषु स्वसम्बन्धो यथैव गुणरूपिणः ॥
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| गुणित्वं गुणभोक्तृत्वं स्याद् विष्णोस्तच्च स स्वयम् ॥’</span></span> इति ब्रह्मतर्के ।
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| }}
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| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B003" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B003">ब्रह्मोवाच । |
| | verse_id = VTN_C03
| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">स्त्रीपुंमलाभियोगात्मदेहो विष्णोर्न जायते । <br/> किन्तु निर्दोषचैतन्यसुखां नित्यां स्वकां तनुम् ॥</span> |
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| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">प्रकाशयति सैवेयं जनिर्विष्णोर्न चापरा । <br/> तथाऽप्यसुरमोहाय परेषां च क्वचित् क्वचित् ॥</span> |
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| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">दुःखाज्ञानभ्रमादीन् स दर्शयेच्छुद्धसद्गुणः । <br/> क्व व्रणादि क्व चाज्ञानं स्वतन्त्राचिन्त्यसद्गुणे ॥</span> |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">दोर्लभ्यायैव मौक्षस्य दर्शयेत् तान्यजो हरिः । <br/> मिथ्यादर्शनदोषेण तेन मुक्तिं न यान्ति च ॥</span> |
| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmandapurana-id">तमो यान्ति च तेनैव तस्माद्दोषविवर्जितम् । <br/> प्रादुर्भावगतं चैव जानीयाद्विष्णुमञ्जसा ॥’</span> इति ब्रह्माण्डे ।</div> |
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">विष्णुं सर्वगुणैः पूर्णं ज्ञात्वा संसारवर्जितः । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B004" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B004"><span class="gr-reference gr-ref-Mahopanishat-id">गुणक्रियादयो विष्णोः स्वरूपं नान्यदिष्यते । <br/> अतो मिथोऽपि भेदो न तेषां क्वचित् कदाचन ॥</span> |
| निर्दुःखानन्दभुङ् नित्यं तत्समीपे स मोदते ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Mahopanishat-id">स्वरूपेऽपि विशेषोऽस्ति स्वरूपत्ववदेव तु ।<br/> भेदाभावेऽपि तेनैव व्यवहारश्च सर्वतः ॥’</span> इति महो(परमो)पनिषदि ।</div> |
| मुक्तानां चाश्रयो विष्णुरधिकोधिपतिस्तथा ।
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| तद्वशा एव ते सर्वे सर्वेदैव स ईश्वरः ॥’</span></span> इति परमश्रुतिः ।
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B 005" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B 005"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">अभिन्नत्वमभेदश्च यथा भेदविवर्जितम् । <br/>व्यवहार्यं पृथक् च स्यादेवं सर्वे गुणाः हरेः ॥</span> |
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| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">अभेदाभिन्नयोर्भेदा यदि वा भेदभिन्नयोः । <br/>अनवस्थितिरेव स्यान्न विशेषणतामतिः ॥</span> |
| | id = VTN_C03_B009
| | <span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">मूलसम्बन्धमज्ञात्वा तस्मादेकमनन्तधा । <br/> व्यवहार्यं विशेषेण दुस्तर्कबलतो हरेः ॥ <br/> विशेषोऽपि स्वरूपं स स्वनिर्वाहकताऽस्य च ॥’</span> इति ब्रह्मतर्के ॥</div> |
| | text =
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| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-Atharvanopanishat-id">‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.४.६(२.२.५))</span></span> ,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘सोश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’(ब्रह्मवल्लि.२(तै.उ.२.२))</span></span> इत्यादि च ॥ | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B006" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B006"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘एकमेवाद्वितीयं तत् ’(छां.उ.६.१)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘नेह नानास्ति किञ्चन’(कठ.२.१.११)</span> |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘नृपाद्या शतधृत्यन्ताः मुक्तिगा उत्तरोत्तरम् ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।’ (कठ.२.१.१०)</span> |
| गुणैः सर्वै शतगुणा मोदन्त इति हि श्रुतिः ॥’</span></span> इति पाद्मे ।
| | <span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।<br/> एवं धर्मान् पृथक् पश्यन् तानेवानु विधावति ॥(कठ.२.१.१४)’</span> इत्यादिश्रुतेश्च ॥</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B007" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B007"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">‘देशः सर्वत्र पुरुषः स्वतन्त्रः कालनित्यता । <br/>इत्यादिषु स्वसम्बन्धो यथैव गुणरूपिणः ॥<br/>गुणित्वं गुणभोक्तृत्वं स्याद् विष्णोस्तच्च स स्वयम् ॥’</span> इति ब्रह्मतर्के ।</div> |
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| अतो निश्शेषदोषवर्जितः पूर्णानन्तगुणो नारायण इति सिद्धम् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B008" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B008"><span class="gr-reference gr-ref-Paramashruti-id">विष्णुं सर्वगुणैः पूर्णं ज्ञात्वा संसारवर्जितः । <br/>निर्दुःखानन्दभुङ् नित्यं तत्समीपे स मोदते ।<br/>मुक्तानां चाश्रयो विष्णुरधिकोधिपतिस्तथा ।<br/>तद्वशा एव ते सर्वे सर्वेदैव स ईश्वरः ॥’</span> इति परमश्रुतिः ।</div> |
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B009" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B009"><span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-Atharvanopanishat-id">‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.४.६(२.२.५))</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘सोश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’(ब्रह्मवल्लि.२(तै.उ.२.२))</span> इत्यादि च ॥ |
| | verse_id = VTN_C03
| | <span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘नृपाद्या शतधृत्यन्ताः मुक्तिगा उत्तरोत्तरम् । <br/>गुणैः सर्वै शतगुणा मोदन्त इति हि श्रुतिः ॥’</span> इति पाद्मे ।</div> |
| | id = VTN_C03_B011
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| | text =
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| यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B010" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B010">अतो निश्शेषदोषवर्जितः पूर्णानन्तगुणो नारायण इति सिद्धम् ।</div> |
| वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥
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| }}
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| {{Bhashyam
| | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B011" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B011">यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । |
| | verse_id = VTN_C03
| | वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥</div> |
| | id = VTN_C03_B012
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| | text =
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| स्वतन्त्रायाखिलेशाय निर्दोषगुणरूपिणे । | | <div class="bhashyam-block" id="VTN_C03_B012" data-verse="VTN_C03" data-block-id="VTN_C03_B012">स्वतन्त्रायाखिलेशाय निर्दोषगुणरूपिणे । |
| प्रेयसे मे सुपूर्णाय नमो नारायणाय ते ॥ | | प्रेयसे मे सुपूर्णाय नमो नारायणाय ते ॥ |
| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः तृतीयः परिच्छेदः ॥ | | इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः तृतीयः परिच्छेदः ॥</div> |
| }}
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| [[Category:Sanskrit Documents]] | | [[Category:Sanskrit Documents]] |
| [[Category:Vishnutattvavinirnaya]] | | [[Category:Vishnutattvavinirnaya]] |
विष्णुतत्त्वविनिर्णयः
प्रथमः परिच्छेदः
सदागमैकविज्ञेयं समतीतक्षराक्षरम् ।
नारायणं सदा वन्दे निर्दोषाशेषसद्गुणम् ॥
विशेषणाणि यानीह कथितानि सदुक्तिभिः ।
साधयिष्यामि तान्येव क्रमात् सज्जनसंविदे ॥
‘ऋगाद्या भारतं चैव पञ्चरात्रमथाखलिम् ।
मूलरामायणं चैव पुराणं चैतदात्मकम् ॥
ये चानुयायिनस्त्वेषां सर्वे ते च सदागमाः ।
दुरागमास्तदन्ये ये तैर्न ज्ञेयो जनार्दनः ॥
ज्ञेय एतैः सदायुक्तैः भक्तिमद्भिः सुनिष्ठितैः ।
न च केवलतर्केण नाक्षजेन न केनचित् ॥
केवलागमविज्ञेयो भक्तैरेव न चान्यथा ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
‘नावेदविन्मनुते तं बृहन्तं सर्वानुभूमात्मानं साम्पराये’(तै.ब्रा.३.१२.९.७) इति तैत्तिरीयश्रुतिः ।
‘नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ’(कठ.१.२.९) इति च कठश्रुतिः ।
‘नेन्द्रियाणि नानुमानं वेदा ह्येवैनं वेदयन्ति तस्मादाहुर्वेदाः’ इति च पिप्पलादश्रुतिः ।
न चैतेषां वचनानामेवाप्रामाण्यम् ।
अपौरुषेयत्वात् वेदस्य ।
‘इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः’(छां.उ.७.१.४) इति तद्गृहीतत्वाच्च ।
न चापौरुषेयं वाक्यमेव नास्तीति वाच्यम् । तदभावे सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धेः ।
यस्य तौ नाभिमतौ नासौ समयी, समयप्रयोजनाभावात् ।
न च तेन लोकोपकारः । धर्माद्यभावज्ञाने परस्परहिंसादिना अपकारस्यैव प्राप्तेः ।
न चोपकारेण तस्य प्रयोजनम्, अदृष्टाभावात् । अतो धर्माद्यभावं वदता स्वसमयस्याऽनर्थक्यमङ्गीकृतमेवेति नासौ समयी ।
न च पौरुषेयेण वाक्येन तत्सिद्धिः । अज्ञानविप्रलम्भयोः प्राप्तेः । न च तदर्थत्वेन सर्वज्ञः कल्प्येत । अन्यत्राऽदृष्टस्य सर्वज्ञत्वस्य कल्पनम्, तस्याविप्रलम्भकत्वकल्पनम् , तस्य तत्कृतत्वकल्पनं चेति कल्पनागौरवप्राप्तेः ।
अपौरुषेयवाक्याङ्गीकारे न किञ्चित् कल्प्यम् ।
अपौरुषेयत्वं च स्वत एव सिद्धम् । वेदकर्तृरप्रसिद्धेः । अप्रसिद्धौ च (तत्) कर्तुस्तत्कल्पने कल्पनागौरवम् । अकल्पने चाकर्तृत्वं सिद्धमेव ।
न च लौकिकवाक्यवत् सकर्तृकत्वम् । तस्य अकर्तृकत्वप्रसिद्ध्यभावात् ।
न च केनचित् कृत्वा वेद इत्युक्तं वेदसमम्, परम्पराभावात् ।
न च स्वयम्प्रतिभातवेदैः दृष्टमवेदवाक्यं भवति । परम्परासिद्धवेदवाक्यनुसारित्वात् । वेदद्रष्टॄणामुक्तगुणवत्वाच्च तेषाम् । उक्तं च ब्रह्माण्डे -
‘विंशल्लक्षणतोनूनः तपस्वी बहुवेदवित् ।
वेद इत्येव यं पश्येत् स वेदो ज्ञानदर्शनात् ’ ॥इति ॥
प्रामाण्यं च स्वतः एव । अन्यथाऽनवस्थानात् ।
न चोक्तयुक्त्यधीनत्वं प्रामाण्यस्य । बुद्धिदोषनिरासमात्रकारणत्वाद् युक्तीनाम् । अदुष्टबुद्धीनां स्वत एव सिद्धत्वातच्च प्रामाण्यस्य ।
न चाऽकाङ्क्षायामेव प्रमाणान्तरापेक्षत्वादनवस्थाभाव इति वाच्यम् । आकाङ्क्षाया एव बुद्धिदोषात्मकत्वात् ।
दुष्टबुद्धीनामेवाप्रामाण्यशङ्केति परतोऽप्रामाण्यम् । प्रामाण्यं च स्वत एव सिद्धम् ।
॥ इति प्रामाण्यस्वतस्त्ववादः ॥
न चोच्चारणकाल एव वर्णानामुत्पत्तिरिति वाच्यम् ; तदेवेदं वचनमिति प्रत्यभिज्ञाविरोधात् ।
न च सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञा भ्रान्तिरिति वाच्यम् । ‘सोऽयं देवदत्तः’ इत्यादेरपि तथात्वप्राप्तेः ।
सर्वक्षणिकत्वं वदताऽपि बौद्धेन ‘सेयं दिक्’ इत्यादिप्रत्यभिज्ञायाः न भ्रान्तित्वं वाच्यम् ; पञ्चस्कन्धेभ्योऽन्यत्वात् ।
न च दिश एव भ्रान्तिकल्पिताः ; विज्ञानशून्ययोरपि साम्यात् । न च आदित्योदयादिनैव दिक्कल्पना ; अन्धकारेऽपि दिङ्मात्रप्रतीतेः ।
कादाचित्कभ्रान्तिरेवाऽदित्योदयादिदर्शनान्निवर्तते । सा च विज्ञानशून्ययोरपि भवतीति तेषां मतम् ; वादिविप्रतिपत्तेः । अतो दिशः स्थिरा एवेति सिद्ध्यति शून्यवदेव ।
अतस्तद्वद्वेदस्यापि स्थैर्यं सिद्धम् ; तदेवेदं वाक्यमिति प्रत्यभिज्ञानात् ।
न चानुमानादीनामागमं विना प्रामाण्यं धर्मादिषु ; तदगोचरत्वात् । अतोऽपौरुषेयवाक्येनैव धर्मादिसिद्धेः सर्ववादिनामपि तदङ्गीकार्यम् ।
तत्प्रामाण्यं च स्वत एव सिद्धम् ।
अप्रामाण्यस्य च परतस्त्वानङ्गीकारे दुष्टेन्द्रियादेरप्यप्रामाण्यहेतुत्वं न स्यात् । तदनङ्गीकारे चानुभवविरोधः । अतः प्रामाण्यं स्वतः परतोऽप्रामाण्यमिति (च) सिद्धम् ।
‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.सं.८.७५.६) ,
‘नित्ययानित्यया स्तौमि ब्रह्म तत्परमं पदम्’ इति ।
‘श्रुतिर्वाव नित्या अनित्या वाव स्मृतयो याश्चान्याः वाचः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
‘विज्ञेयं परमं ब्रह्म ज्ञापिका परमा श्रुतिः ।
अनादिनित्या सा तच्च विना तां न स गम्यते ॥’ इति कात्यायनश्रुतिः ।
‘सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद् ब्रह्म विष्टितं तावती वाक् ॥
कश्छन्दसां योगमावेद धीरः को धिष्ण्यां प्रतिवाचं पपाद।’(ऋ.सं.१०.११४.९-१०) इति च ।
‘नित्या वेदाः समस्ताश्च शाश्वता विष्णुबुद्धिगाः ।
सर्गे सर्गेऽमुनेवैत उद्गीर्यन्ते तथैव च ॥
तत्क्रमेणैव तैर्वर्णैस्तैः स्वरैरेव नान्यथा ॥’
‘अतः श्रुतित्वमेतासां श्रुता एव यतोऽखिलैः ।
जन्मान्तरे श्रुतास्तास्तु वासुदेवप्रसादतः ॥
मुनीनां प्रतिभास्यन्ति भागेनैव न सर्वशः ।
यतस्ता हरिणा दृष्टाः श्रुता एवापरैः जनैः ।
श्रुतयो दृष्टयश्चेति तेनोच्यन्ते पुरातनैः ॥’
‘तदुत्पत्तिवचश्चैव भवेत् व्यक्तिमपेक्ष्य तु ।
चेतनस्य जनिर्यद्वदुच्यते सर्वलौकिकैः ॥
पुराणानि तदर्थानि सर्गे सर्गेन्यथैव तु ।
क्रियन्तेतस्त्वनित्यानि तदर्थाः पूर्वसर्गवत् ॥’
‘वेदानां सृष्टिवाक्यानि भवेयुर्व्यक्त्यपेक्षया ।
अवान्तराभिमानानां देवानां वा व्यपेक्षया ॥
नानित्यत्वात् कुतस्तेषामनित्यत्वं स्थिरात्मनाम् ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
न चानित्यत्वे श्रुतिर्वेद इत्यादि विशेषशब्दो उपपद्यते(युज्यते) ।
‘वेदास्ते नित्यविन्नत्वात् श्रुतयश्चाखिलैः श्रुतेः ।
आम्नायोऽनन्यथापाठादीशबुद्धिस्थिताः सदा ॥’ इति महावाराहे ।
न च नित्यत्वं विना वेदानां दर्शनव्यवहारो युज्यते ।
न च वर्णपदानामनित्यत्वं वक्तुं युक्तम् । सर्वज्ञत्वादीश्वरस्य तद्बुद्धौ सर्वदा प्रतीयमानत्वात् । न च घटादिवत् संस्कारमात्रत्वं वक्तुं युक्तम् । प्रत्यभिज्ञाविरोधस्योक्तत्वात् । पुराणानामप्यन्यथा शब्दरचनमेवानित्यत्वम् ।
अत आकाशगुणे शब्दे व्यज्यमाना वर्णादयस्तत्क्रमात्मको वेदश्च नित्य एवेति सिद्धम् ।
॥ इति वर्णनित्यत्ववादः ॥
न केवलसिद्धेऽर्थे व्युत्पत्त्यभावादप्रामाण्यम् । सिद्धान्वित एव व्युत्पत्तिगृहीतेः ।
‘इयं माता’, ‘अयं पिता’ इत्यादौ अङ्गुलिप्रसारणादिपूर्वकनिर्देशेनैव हि तज्जानाति । ‘कार्यान्विते एव व्युत्पत्तिः’इति वदतः कार्यस्य कार्यान्वयाभावात् कल्पनागौरवम् ।
‘इयं माता’, ‘अयं पिता’, ‘सुरूपोऽसि’ इत्यादौ सिद्धमात्रज्ञापनेन पर्यवसितत्वात् वाक्यस्य ।
तस्य तत्र प्रामाण्यानुभवाच्च । न च कुत्रचित् सिद्धज्ञापनादन्यत् वाक्यस्य प्रयोजनं दृष्टम्। ज्ञात्वैव हीष्टसाधनतां प्रवर्तते; निवर्तते च विपर्ययेण । अतः सिद्ध एव सर्ववाक्यानां प्रामाण्यं सिद्धम् । प्रसिद्धं च व्याकरणनिरुक्त्यादीनां सिद्धमात्रे प्रामाण्यं सर्ववादिनाम् । तदनङ्गीकारे च सर्वशाब्दव्यवहारासिद्धिः ।
उक्तं च नारदीये-
‘सर्वज्ञं सर्वकर्तारं नारायणमनामयम् ।
सर्वोत्तमं ज्ञापयन्ति महातात्पर्यमत्र हि ॥
सर्वेषामपि वेदानाम् इतिहासपुराणयोः ।
प्रमाणानां च सर्वेषां तदर्थं चान्यदुच्यते ॥’ इति ॥
न च जीवेश्वराभेद एव तात्पर्यमागमस्य ; तत्र प्रमाणाभावात् । न च जीवेश्वरभेदः सिद्ध इत्यनुवादकत्वं भेदवाक्यानाम् ; आगमं विना ईश्वरस्यैव असिद्धेः । न च अनुमानात् तत्सिद्धिः ; विपर्ययेणापि अनुमातुं शक्यत्वात् ।
‘विमतं सकर्तृकं कार्यत्वात्, घटवत्’ इत्युक्ते ‘विमतं विकर्तृकं अस्मत्संमतकर्तृरहितत्वात्, आत्मवत्’ इत्यनुमानविरोधात् ।
‘अकार्यत्वम्’ उपाधिरित्युक्ते ‘शरीरिजन्यत्वम्’ इतरत्रापि उपाधिः इत्युत्तरम् ।
प्रत्यक्षानुमानसिद्धत्वे च भेदस्य तद्विरोधादेवाप्रामाण्यमभेदागमस्य । तेनाभेदागमस्याप्रामाण्याभावे (तेनाभेदवाक्यास्याप्रामाण्याभावे च) नानुवादकत्वं भेदवाक्यानाम् । न हि बलवतोऽनुवादकत्वम् ; दार्ढ्यहेतुत्वात् ।
प्रत्यक्षादेरागमस्य प्राबल्येऽपि नोपजीव्यप्रमाणविरोधे प्रामाण्यम् । विषयाभावे स्वस्यैवाप्रामाण्यप्राप्तेः । तेनैव ह्यनुमानादिनाऽऽगमस्य विषयः सिद्ध्यति तत्पक्षेऽपि । अनुमानेन ह्यनुवादित्वपक्ष ईश्वरो बोद्धव्यः, प्रत्यक्षेण च आगमः । अतस्तयोर्विरोधे प्रामाण्यं न स्यात् । अनुमानसिद्धेश्वराच्च भेदोऽनुभवतः एव सिद्धो जीवस्य ; असर्वकर्तृत्वेनानुभवात् ।
न चानुभवविरोधे आगमस्य प्रामाण्यम् ; आगमप्रामाण्यानुभवस्याप्यप्रामाण्यप्राप्तेः । बहुप्रमाणसंवादश्च दार्ढ्यहेतुरेव ; बहूनां वचने तस्यैव दर्शने च दार्ढ्यस्यैव दृष्टेः ।
सर्वाविवादस्थल एव कथञ्चिदनुवादकत्वम् । न चात्र सर्वाविवादः, एकत्ववादिनामेव विवाददर्शनात् । बहुप्रमाणविरोधे च एकस्याप्रामाण्यं दृष्टं शुक्तिरजतादौ । न च दोषजन्यत्वादेव दुर्बलत्वमिति विरोधः । बहुप्रमाणविरुद्धानां दोषजन्यत्वनियमात् । दोषजन्यत्वं च बलवत्प्रमाणविरोधादेव ज्ञायते ।
‘अदुष्टमिन्द्रियं त्वक्षं तर्कोऽदुष्टस्तथाऽनुमा ।
आगमोऽदुष्टवाक्यं च स्वदृक् चानुभवः स्मृतः ॥
बलवत्प्रमाणतश्चैव ज्ञेया दोषा न चान्यथा ।
द्विविधं बलवत्त्वं च बहुत्वाच्च स्वभावतः ।
तयोः स्वभावो बलवानुपजीव्यादिकश्च सः ॥
याथार्थ्यमेव प्रामाण्यं तन्मुख्यं ज्ञानशब्दयोः ।
ज्ञानं च द्विविधं बाह्यं तथाऽनुभवरूपकम् ॥
बल्येवानुभवस्तत्र निर्दोषं त्वक्षजादिकम् ।
अनुप्रमाणतां याति तथाऽक्षादित्रयं ततः ॥
प्राबल्यमागमस्यैव जात्या तेषु त्रिषु स्मृतम् ।
उपजीव्यविरोधे तु न प्रामाण्यममुष्य च ॥
यामाहुरनुमां केचित् (त्र्या)त्रियाद्यवयवात्मिकाम् ।
सा व्यर्था, नोपपत्त्या हि विना साऽपि प्रमाणताम् ॥
यात्यतो युक्तिरेवैका प्रमाणमनुमात्मकम् ।
युक्तिः प्रतिज्ञारूपा च हेतुदृष्टान्तरूपिका ॥
तथोपनयरूपा च परा निगमनात्मिका ।
पृथक् पृथक् प्रमाणत्वं याति युक्तितयैव तु ॥
प्रतिज्ञा हेतुगर्भैव पृथक् प्रामाण्यमेष्यति ।
सिद्धत्वेन प्रतिज्ञाया हेतुर्मानं पृथग् भवेत् ॥
प्रतिज्ञावयवत्वात्तु स्वातन्त्र्येणैव मानताम् ।
दृष्टान्तो यात्युपनयो व्याप्तिमाश्रित्य केवलम् ॥
व्याप्तिस्तु केवलाऽपि स्यात् प्रमाणं नियमाश्रयात् ।
तथा निगमनं चोपसंहारैकस्वरूपतः ॥
प्रामाण्यं यात्यनुभवो ज्ञापयत्युपपत्तिताम् ॥
विरोधश्च तथाऽधिक्यं न्यूनताऽसङ्गतिस्तथा ।
उपपत्तिदोषा विज्ञेया विरोधश्च स्वतोऽन्यतः ॥
जनकस्यात्ययो जातिः स्वस्य वाऽन्यस्य वा भवेत् ।
जनकं प्रमाणमुद्दिष्टं स्वस्यार्थस्य प्रकाशनात् ।
निग्रहा एत एव स्युः संवादानुक्तिसंयुताः ॥
अर्थतः प्राप्तिरेवार्थापत्तिरित्यभिधीयते ।
दृष्ट्वा सदृशमेवान्यं पूर्वदृष्टे तु वस्तुनि ॥
एतत्सदृशताज्ञानमुमानं प्रकीर्तितम् ।
अभावस्य परिज्ञानं द्विविधं समुदाहृतम् ॥
एकं तत्रानुभवतो योग्यस्यानुपलब्धितः ।
द्वितीयमपि विज्ञेयमं सुखाद्ये च घटादिके ॥
एकं प्रत्यक्षरूपं स्यात् द्वितीयमनुमात्मकम् ।
क्वचिद् घटाद्यभावोऽपि प्रत्यक्षेणावगम्यते ॥
झटित्येव परिज्ञानान्न लिङ्गोद्भवता मता ।
अर्थापत्तिश्चोपमा च ह्यनुमाभेद एव तु ॥
आगमो द्विविधो ज्ञेयो नित्योनित्यस्तथैव च ।
प्रत्यक्षं त्रिविधं ज्ञेयमैश्वरं यौगिकं तथा ।
अयोगिकं चेति तथा सर्वमक्षात्मकं मतम् ॥
अक्षाणि च स्वरूपाणि नित्यज्ञानात्मकानि च ।
विष्णोः श्रियस्तथैवोक्तान्यन्येषां द्विविधानि तु ॥
स्वरूपाणि च भिन्नानि भिन्नानि त्रिविधानि च ।
दैवासुराणि मध्यानीत्येतत्प्रत्यक्षमीरितम् ।
विषयान् प्रति स्थितं ह्यक्षं प्रत्यक्षमिति कीर्तितम् ।
अक्षयं पुरुषस्याक्षं स्वरूपे मुख्यमेव तु (तत्)।
उपचारस्तदन्यत्र सृष्टावुपचयो यतः ।
उपपत्तिस्वरूपत्वादनुमा सम्भवादिकम् ॥
प्रत्यक्षागममाहात्म्यादनुमानं प्रमाणताम् ।
याति, नैवान्यथा, तस्य नियतत्वं क्वचिद्भवेत् ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।
॥ इति ब्रह्मतर्कव्याख्या ॥
अत्र चोपजीव्यत्वेन प्रमाणप्राबल्याद्भेद एव तात्पर्यं युक्तम् । कथञ्चानुवादकत्वं भेदस्य प्रमाणेनासिद्धौ । सिद्धौ च कथमभेदवाक्यस्याबाधः । न चाप्रमाणसिद्धेनानुवादकत्वं प्रमाणस्य भवति । दुर्बलत्वे च भेदप्रमाणस्याभासत्वात् । न भेदवाक्यानामनुवादित्वम् । अतश्च भेदवाक्यानामेव प्राबल्यम् ।
सर्वप्रमाणविरुद्धवचनानामेव प्राबल्याङ्गीकारे ‘इदं वाऽग्रे नैव किञ्चनाऽसीत् । असतः सदजायत’ इत्यादीनामेवाविचारेण प्रतीयमानस्यार्थस्य सर्वप्रमाणविरुद्धत्वात् तत्र सर्वागमानां महातात्पर्यं प्रसज्येत । न च तत्र युक्तिविरोध इति वाच्यम् । तस्मिन् पक्षे युक्तिविरुद्धत्वेनाननुवादित्वमिति गुण एव स्यात् । युक्तिसिद्धत्वे ह्यनुवादित्वं स्यात् । अतः प्रमाणसिद्धत्वे तदपलापायुक्तेः, अप्रमाणसिद्धत्वे च प्रमाणस्य अनुवादित्वाभावाच्च न भेदवाक्यानां दौर्बल्यम् ।
न च प्रमाणबहुत्वे दौर्बल्यम् । दार्ढ्यमेव हि बहुवाक्यसंवादे दृष्टम् । तथा सति अभ्यासादेरप्यप्रामाण्यहेतुत्वं स्यात् । अभ्यासस्य च तात्पर्यलिङ्गत्वं सर्वेषां सिद्धम् । तदनङ्गीकारे तत्पक्षेऽपि नवकृत्वः ‘तत्त्वमसि’ इत्यभ्यासस्यानुवादकत्वेनाप्रामाण्यं स्यात् । प्रथमवाक्येनैव यस्यासिद्धं तदर्थमपरमित्युक्ते प्रत्यक्षादिना भेदो येनानिश्चितस्तदर्थमपरं वाक्यमित्युत्तरम् । तस्मात् बहुप्रमाणसंवादित्वे प्राबल्यमेव ।
अतः सर्वप्रमाणविरुद्धत्वान्नाभेदे तात्पर्यं वाक्यस्य । किन्तु विष्णोः सर्वोत्तमत्व एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् ।
तथा चोक्तं भगवता-
‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥’(भा.गी.१५.१६-२०) इति ।
‘सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैव चान्यत्र सत्यम् ।
अवान्तरं तत्परत्वं तदन्यत् सर्वागमानां पुरुषार्थस्ततोतः ॥’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
‘मुख्यं च सर्ववेदानां तात्पर्यं श्रीपतेः परम् ।
उत्कर्षे तु तदन्यत्र तात्पर्यं स्यादवान्तरम् ॥’ इति महावाराहे ।
युक्तं च विष्णोः सर्वोत्तमत्त्व(त्कर्षे) एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् । मोक्षो हि सर्वपुरुषार्थोत्तमः ।
‘धर्मार्थकामाः सर्वेऽपि न नित्या मोक्ष एव हि ।
नित्यस्तस्मात् तदर्थाय यतेत मतिमान् नरः ॥’ इति भाल्लवेयश्रुतिः ।
‘अनित्यत्वात् सदुःखत्वान्न धर्माद्याः परं सुखम् ।
मोक्ष एव परानन्दः संसारे परिवर्तताम् ॥’ इति च भारते ।
मोक्षश्च विष्णुप्रसादेन विना न लभ्यते ।
‘यस्य प्रसादात् परमार्तिरूपादस्मात् संसारान्मुच्यते नापरेण ।
नारायणोऽसौ परमो विचिन्त्यो मुमुक्षुभिः कर्मपाशादमुष्मात् ॥’ इति नारायणश्रुतिः ।
‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुधा श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥’(कठ.१.२.२३) इति कठश्रुतिः ।
‘तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥’(भ.गी.१२.७) इति भगवद्वचनम् ।
‘उत्पत्तिस्थितिसंहारा नियतिज्ञानमावृतिः ।
बन्धमोक्षौ च पुरुषाद्यस्मात् स हरिरेकराट् ॥’ इति स्कान्दे ।
‘अज्ञानां ज्ञानदो विष्णुः ज्ञानिनां मोक्षदश्च सः ।
आनन्दश्च मुक्तानां स एवैको जनार्दनः ॥’ इति च ।
‘बन्धको भवपाशेन भवपाशाच्च मोचकः ।
कैवल्यदः परं ब्रह्म विष्णुरेव न संशयः ॥’ इति च ।
प्रीतिश्च गुणोत्कर्षज्ञानादेव विशेषतो दृष्टा ; नाभेदज्ञानात् । अभेदज्ञानादप्रीतिरेवोत्तमानां भवति । घातयन्ति हि राजानो राजाऽहमिति वदन्तम् । ददाति च सर्वमभिप्रेतं गुणोत्कर्षं वदतः ।
‘न तादृशी प्रीतिरीड्यस्य विष्णोर्गुणोत्कर्षज्ञातरि यादृशी स्यात् ।
तत्प्रीणनान्मोक्षमाप्नोति सर्वस्ततो वेदास्तत्पराः सर्व एव ॥’ इति सौपर्णश्रुतिः ।
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत ॥(भ.गी.१५.१९)
इति गुणोत्कर्षज्ञानादेव परमा प्रीतिर्भगवता स्वयमेवाभिहिता । अतो विष्णोः गुणोत्कर्ष एव सर्वश्रुतिस्मृतीनां महातात्पर्यम् । न चाभेदे तात्पर्यमित्यत्र किञ्चिन्मानम् ।
न च विशेषणविशेष्यतया भेदसिद्धिः । विशेषणविशेष्यभावश्च भेदापेक्षः ; धर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेदसिद्धिः, भेदापेक्षं च धर्मिप्रतियोगित्वमित्यन्योन्याऽश्रयतया भेदस्यायुक्तिः, पदार्थस्वरूपत्वात् भेदस्य । न च धर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेदस्यास्वरूपत्वम् ; ऐक्यवत् स्वरूपस्यैव तथात्वम् ।
स्वरूपसिद्धावपि तदसिद्धिश्च जीवेश्वरैक्यं वदतः सिद्धैव । भेदस्तु स्वरूपदर्शन एव सिद्धः । प्रायः सर्वतो विलक्षणं हि पदार्थस्वरूपं दृश्यते । ‘अस्य भेदः’ इति तु ‘पदार्थस्य स्वरूपम्’ इतिवत् ।
यदि न स्वरूपं भेदः, तदा पदार्थे दृष्टे प्रायः सर्वतो वैलक्ष्ण्यं तस्य न ज्ञायेत । अज्ञाते च वैलक्षण्ये आत्मनि घट इत्यपि संशयः(यादिः) स्यात् । न हि कश्चित् तथा संशयं करोति । ज्ञात्वैव प्रायः सर्वतो वैलक्षण्यं कस्मिश्चिदेव सदृशे संशयं करोति । न ह्यात्मनि ‘अहं देवदत्तो न वा’ इति कस्यचित् संशयो भवति । सामान्यतः सर्ववैलक्षण्ये ज्ञात एव घटत्वादिज्ञानम् । अतो नान्योन्याश्रयता ।
न च युगपज्ज्ञानानुपत्तिर्दोषः । यथा युगपदेव दीपसहस्रदर्शने सामान्यतः सर्वे ज्ञायन्त एव, तथा स्यात् । एकस्मिन्नेव वस्तुनि विशेषस्तैरप्यङ्गीकृत एव । ‘नेति नेति’ इत्यत्र सर्ववैलक्षण्याङ्गीकारात् । विशेषानङ्गीकारे च पुनरुक्तेः । न च घटाद् वैलक्षण्यमेव पटाद् वैलक्षण्यम् ; अनुभवविरोधात् । तस्मात् भेददर्शनं युक्तमेव ।
॥ इति भेदवादप्रकरणम् ॥
यच्च प्रमाणदृष्टानामपि पदार्थानां मिथ्यात्वकल्पनं तच्च प्रमाणविरुद्धत्वादेव प्रकाशतस्करत्वम् । न हि प्रमाणदृष्टस्य तर्कबाध्यत्वम्, प्रत्यक्षादिविरुद्धानां तर्काभासत्वनियमात् । शुक्त्यादेः रजतादिप्रतीतेरपि बलवत्प्रत्यक्षविरुद्धत्वादेव भ्रमत्वं न तर्कमात्रात् । तर्कमात्रतः(त्रेण) प्रत्यक्षबाधने भूतचतुष्टयस्याबादेः पृथिवीत्वादृष्टेः पृथिव्या अपि पृथिवीत्वं न स्यात् । अतो न तर्कमात्रत एव दृष्टस्य भ्रान्तित्वं कल्प्यम् । अतः सर्वभेदनिरासकतर्कस्य सर्वश्रुतिस्मृतिप्रत्यक्षानुमानविरुद्धत्वात् नितरामाभासत्वम् (एव) ।
न च परमार्थतो भेदाभावः व्यावहारिकः सोऽस्तीति वाच्यम् । सदसद्वैलक्षण्ये प्रमाणाभावात् । ‘असतः ख्यात्ययोगात्’इति वदतः असतः ख्यातिरभूत्, न वा । यदि नाभूत् न तत्ख्यातिनिराकरणम् । यद्यभूत् न तथाऽपि । न चासतो वैलक्षण्यं तत्प्रतीतिं विना ज्ञायते । न च शुक्ते रजतत्वं सद्वलिक्षणम् । ‘असदेव रजतं प्रत्यभात्' इत्यनुभवात् । न च प्रतीतत्वादसत्त्वाभावः । असतः सत्त्वप्रतीतिः सतोऽसत्त्वप्रतीतिरित्यन्यथाप्रतीतेरेव भ्रान्तित्वात् ।
न च असतो भ्रान्तावपि प्रतीतिर्नास्तीति वाच्यम् । अनिर्वचनीयपरमार्थत्वस्य असत एव दृष्ट्यङ्गीकारात् । न च तदपि अनिर्वाच्यम्, अनवस्थितेः । प्रथमानिर्वचनीयासिद्ध्या सर्वासिद्धिरिति मूलक्षतिः ।
अनिर्वचनीयत्वे रजतस्यानिर्वचनीयमिदं रजतमिति बाधकज्ञानमुत्पद्येत। मिथ्याशब्दस्त्वभाववाची । न च सदसद्वलिक्षणं नामस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । अनुभवविरोधश्च तत्पक्षे । सदसतोर्द्वयोरेव सर्वैरनुभूयमानत्वात् । अतोऽनिर्वचनीयाभावादसतः प्रतीत्यनङ्गीकारात् प्रतीयमानत्वाच्च भेदस्य सत्त्वप्राप्तेर्नाद्वितीयत्वं युज्यते ।
कथं च श्रुतिसिद्धौ जीवपरमात्मभेदो निराक्रियते । मिथ्यावादित्वे च श्रुतेः कथमैक्यस्य सत्यत्वम् । कथं चैवंवादिनां वेदवादित्वम् । वेदोक्तस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारादेव ह्यवेदवादित्वं बौद्धादीनामपि । अतो विष्णोः सर्वोत्तमत्व एव महातात्पर्यं सर्वागमानाम् ।
कथञ्च जीवपरमात्मैक्ये सर्वश्रुतीनां तात्पर्यं युज्यते, सर्वप्रमाणविरुद्धत्वात् । तथा हि- अनुभवविरोधः । न हि ‘अहं सर्वज्ञः, सर्वेश्वरः, निर्दुःखः, निर्दोषः’ इति वा कस्यचिदनुभवः । अस्ति च तद्विपर्ययेणानुभवः । न च मिथ्यानुभवोऽयम् । तद्विपरीतप्रमाणाभावात् ।
न चाभेदे कश्चिदागमः । सन्ति च भेदे सर्वागमाः । तथाहि - ‘अतत्त्वमसि’ इति नवकृत्व उपदेशः सदृष्टान्तकः । न चायमम् अभेदोपदेशः । ‘स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयते ।’(छां.उ.६.८.२) ‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वा प्रजा सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’ (छां.उ.६.८.४) ॥1॥
‘यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां समवहारमेकतां गमयन्ति । ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वा प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति।’(छां.उ.६.९.१-३) ॥2॥
‘इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति । स समुद्र एव भवति । ता यथा तत्र (न विवेकं लभन्ते) न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति । एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तत्तदा भवन्ति।’ (छां.उ.६.१०.१-२) ॥3॥
‘...स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति । अस्य यदैकां शाखां जीवो जहाति अथ सा शुष्यति...’ (छां.उ.६.११.१-२) ॥4॥
‘न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीति अण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति । तं होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयसे एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति..’ (छां.उ.६.१२.१-२) ॥5॥
लवणमेतदुदकेऽवधाय मा प्रातरुपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति । तद्धावमृश्य न विवेद ।
यथा विलीनमेवाङ्ग अस्यान्तादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । मध्यादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । अन्त्यादाचामेति । कथमिति । लवणमिति । अभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । तच्छश्वत् संवर्तते । तं होवाच अत्र वाव किल (त)सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति’ (छां.उ.६.१३.१-२) ॥6॥
‘यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योभिनद्धाक्षमानीय तं ततोतिजने विसृजेत्....’ (छां.उ.६.१४.१) ॥7॥
‘अथ यदाऽस्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावन्न विजानाति’ (छां.उ.६.१५.२) ॥8॥
‘पुरुषं सोम्योतं हस्तगृहीतमानयन्ति अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत् परशुमस्मै तपतेति । स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोनृताभिसन्धोनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यते अथ हन्यते अथ स यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते । स सत्यभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यते अथ मुच्यते’ (छां.उ.६.१६.१-२) ॥
‘ एवमेव खलु सोम्य आचार्यवान् पुरुषो वेद’ ॥9॥ इति स्थाननवकेऽपि भेद एव दृष्टान्ताभिधानात् ।
नहि शकुनिसूत्रयोः, नानावृक्षरसानां, नदीसमुद्रयोः, जीववृक्षयोः, अणिम-धानयोः, लवणोदकयोः, गन्धारपुरुषयोः, अज्ञप्राणादिनियामकयोः स्तेनापहार्ययोश्चैक्यम् । ‘सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा’(छां.उ.६.९.२) इति ‘सत आगम्य न विदुः सत आगच्छाम इहे इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा’(छां.उ.६.१०.२) इति भेदापरिज्ञानेनानर्थवचनाच्च । न हि गृहादागतस्य गृहे प्रविष्टस्य च तदैक्यम् ।
‘ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति’(छां.उ.६.१०.१) इत्यत्रापि भेद एव उच्यते । अन्यथा ‘तास्समुद्र एव भवन्ति’ इति व्यपदेशः स्यात् । अतो नद्यः समुद्रादागच्छन्ति तं प्रविशन्ति च । समुद्रस्तु स एव, नैतासां समुद्रत्वं भवतीत्यर्थः । न हि भिन्नानां नदीजलपरमाणूनां समुद्राणुभिरैक्यं युज्यते । तथासति महाजनसमितौ प्रविष्टानां द्वित्राणां तदैक्यं स्यात् । न च तद्युज्यते भेदेनानुभवात् ।
‘स्वं ह्यपीतो भवति’(छां.उ.६.८.१) इत्यत्रापि ‘स्व’ इति परमात्मनोऽभिधानम् ।
‘स्वात्मना चोत्तरयोः’(ब्र.सू.२.३.२१) इति सूत्रात् ।
‘स्वातन्त्र्यात् स्व इति प्रोक्तः आत्मायं चाततत्वतः ।
ब्रह्मायं गुणपूर्णत्वात् भगवान् विष्णुरव्ययः ॥’
इति परमोपनिषदि । ‘अपीत’ इत्यत्रापि प्रवेशमात्रम् । ‘स्वम्’इति द्वितीयानिर्देशात् । एकीभावविवक्षायां ‘स्वेन’ इति निर्देशः स्यात् ।
स्वं कुलायं यथापीतः पक्षी स्यादेवमीश्वरम् ।
अप्येति जीवः प्रस्वापे मुक्तो चान्योपि सन् सदा ॥’
इति च । ‘एवमेव खलु सोम्य एतन्मनो दिशं दिशं पतित्वा अन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते’ इत्यत्रापि मन इति जीवः, प्राण इति परमात्मा । ‘यत्रायं पुरुषः स्वपिति नाम’ इति तयोरेव प्रस्तुतत्वात् ।
‘मननात् मन उद्दिष्टः पुद्गलो निरयं गिरन् ।
कर्मानुशयनाच्चैव संसार्यनुशयी स्मृतः ॥’
इति च (परमोपनिषदि) । ‘प्राणः प्रणयनादेषः साधुत्वात् सन् हरिः स्मृतः ।’ इति च। ‘ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वा प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’(छां.उ.६.८.४) इत्यत्रापि भेद एव प्रतीयते ।
‘स्रष्टृत्वादाश्रयात्वाच्च मुक्तानां च प्रति प्रति ।
स्थापनाच्च विभुर्विष्णुरन्यः संसारिणो मतः ॥’ इति च ॥
‘अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’(छां.उ.६.३.२) इति ‘स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’(छां.उ.६.११.१) इत्यत्रापि ‘जीव’शब्देन परमात्माभिहितः । ‘जीव इति भगवतोऽनिरुद्धस्याख्या’ इति श्रुतेः ।
‘विष्णुर्जीव इति प्रोक्तः सततं प्राणधारणात् ।
स प्रविश्य शरीरं च स्थावरं जङ्गमं तथा ॥
महाभूतानि च विभुस्त्रिवृत्करणपूर्वकम् ।
संसारिणं भ्रामयति सदैवान्यत्वलक्षणम् ॥
तेनायं मोदते नित्यं वृक्षावस्थां गतोऽपि सन् ॥’ इति च ।
‘तत्तेज ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३) ‘ता आप ऐक्षन्त’ (छां.उ.६.२.४) ‘इमास्तिस्रो देवता’ (छां.उ.६.३.२) इति पूर्वमेव चेतनत्वसिद्धेः ‘अनेन जीवेनात्मना’ (छां.उ.६.३.२) इति संसारिणः पुनः प्रवेशो न युक्तः । अतस्तत्र जीवशब्देन परमात्मैवाभिहितः ।
‘जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’(छां.उ.६.११.१) इत्यत्रापि जीवशब्दोदितः स एव । पेपीयमानो मोदमानस्तु संसारी । न हि चेतनादन्यस्य मोदभोगादिकं युज्यते ।
(शरीरमेवायतनं सुखस्य दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् ॥म.भा.१२.१९४.१८)‘सुखस्य चाप्यायतनं शरीरं दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् ।
अचेतनं प्राकृतमेतदाहुर्भोक्ता तयोश्चेतनकः शरीरी ॥’ इति च भारते ।
‘जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते’(छां.उ.६.११.३) इत्यत्रापि जीवशब्दः परे । न हि संसारिणो मुख्यतः प्राणधारकत्वं युज्यते ।
‘ब्रह्मणा त्यक्तदेहस्तु मृत इत्युच्यते नरः’ इति च ।
‘यं वै सोम्य एतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न (अस्य सोम्यैषोणिम्न) एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति’(छां.उ.६.१२.२) इत्यत्रापि अणिमशब्देन पर एवाभिहितः । ‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो’(छां.उ.६.१२.३) इत्युक्तत्वात् । धानासु तु ‘अण्व्य इवेमा धाना’(छां.उ.६.१२.१) इति स्त्रीलिङ्गप्रयोगात् इवशब्दाच्च नाणिमात्वम् । न च ता ‘न निभालयसे’ । ‘ऐतदात्म्यम्’ इत्येतदीयम् । ‘स आत्मा’ इत्यात्मशब्दश्च पर एव । ‘द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात्’(ब्र.सू.१.३.१) , ‘नानुमानमतच्छब्दात्’(ब्र.सू.१.३.३) ‘प्राणभृच्च’(ब्र.सू.१.३.४) इत्यत्र ‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’(मु.उ.२.२.५) इति स्वशब्दपर्यायात्मशब्दात् न प्रकृतिजीवावभिधीयेते । किन्तु पर एवेति भगवता व्यासेनाभिहितम् । अत आत्मशब्दस्तस्मिन्नेव मुख्यः ।
‘आततत्वाच्च मातृत्वादात्मेति परमो हरिः ।
आत्माभासास्तदन्ये ये न ह्येतेषां तता गुणाः ॥’ इति परमोपनिषदि ।
‘तेजः परस्यां देवतायां तावन्न जानाति’ इत्यत्र च
‘यदास्य प्राणादीन् परो ग्रसति तदा न जानाति, यदा ददाति तदा जानाति’ इति तद्वशत्वमेवोक्तम् ।
‘यदा प्राणान् ददतीशस्तदा चेतनकोखलिम् ।
जानाति ग्रस्तकरणस्तेन वेत्ति न किञ्चन ॥’ इति ।
‘अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत्’ इत्यत्र च अन्याभिमतस्यैव वस्तुनोऽपहार्यत्वात् भेद एवायं दृष्टान्तः । अन्यं सन्तं परमात्मानं स्वयमिति मन्यमानः स्तेन एवेति । न हि स्वकीयं परित्यजन् स्तेनो भवति ।
‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथा वादबलाज्जनाः ॥
कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।
याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ॥
ब्रह्मस्तेना निरानन्दा अपक्वमनसोशिवाः ।
वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥
तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ।
यतः स्वरूपतश्चान्यो जातितः श्रुतितोर्थतः ॥
कथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः स्यादसंहितः ॥’ इति मोक्षधर्मे ।
‘यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्षरसा यथा ।
यथा नद्यः समुद्रश्च शुद्धोदलवणे यथा ॥
यथा चोरापहार्यौ च यथा पुंविषयावपि ।
तथा जीवेश्वरौ भिन्नौ सर्वदैव वलिक्षणौ ॥
तथापि सूक्ष्मरूपत्वान्न जीवात् परमो हरिः ।
भेदेन मन्ददृष्टीनां दृश्यते प्रेरकोपि सन् ॥
वैलक्षण्यं तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते बद्ध्यतेन्यथा ॥’ इति च परमोपनिषदि ।
‘प्रेरकः सर्व(भूतानां)जीवानां प्राणधीचोदिता च सः ।
विष्णुः संसारिणोऽन्यो यस्तमविज्ञाय मूढधीः ॥
देहेन्द्रियप्राणबुद्धिनेतृत्वं मन्यतेत्मनः ।
अतः संसारपदवीं याति जीवेशयोः सदा ॥
वैलक्षण्यं परं ज्ञात्वा मुच्यते बद्ध्यतेऽन्यथा ॥’ इति च ।
‘सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय’(छां.६.१.२) इति, आत्मनोऽन्यमनूचानत्वादिगुणप्रदं परमविज्ञाय स्तब्धस्य पराधीनत्वज्ञापनेन स्तब्धतां निरस्य तन्निष्ठा ह्यत्रोपदिश्यते ।
‘तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१) इत्यादिवादिप्रसिद्धमपि निराक्रियते । ‘इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः’(मु.उ.१.२.१०) इत्यादिवत् श्रुतितात्पर्यापरिज्ञानप्राप्तं च ।
दर्शितं च ‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचित् ब्रूयुरनैपुणाः’ इति । तद्वशत्वज्ञापनार्थं च ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१) इत्यादिसृष्टिकथनम् । एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं च प्राधान्यात् किञ्चित् सादृश्यात् कारणत्वाच्च । न तु तदन्यस्य मिथ्यात्वात् । न हि सत्यज्ञानेन मिथ्याज्ञानं भवति ।
न हि शुक्तिज्ञो रजतज्ञ इत्युच्यते । विरोधात् तयोः ज्ञानयोः । नेदं रजतमित्यरजतज्ञो हि शुक्तिज्ञो भवति । रजतज्ञश्चेन्न शुक्तिज्ञः । न हि तज्ज्ञस्तदभावज्ञो भवति । तदभावस्य तज्ज्ञानपूर्वकत्वं चान्यत्र तस्य सत्त्वादेव दृष्टम् । तदनङ्गीकारे तदेव न युज्यते ।
प्रधानज्ञानादप्रधानस्य ज्ञातवद्व्यपदेशोऽस्त्येव । यथा प्रधानपुरुषाणां ज्ञानाह्वाननाशनैः ‘ग्रामो ज्ञातः, आहूतो, नाशितः’ इति व्यपदेशः । कारणे च पितरि ज्ञाते ‘पुत्रो ज्ञातः’ इति । ‘जानाम्येनमस्य पुत्रोऽयम्’ इति व्यपदेश इति । एवमत्राप्येतत्सृष्टं सर्वमित्यादि । सादृश्याच्चैकस्त्रीज्ञानादन्यस्त्रीज्ञानमिति ।
तदेव सादृश्यमत्रापि विवक्षितं ‘यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं स्यात्’ (छां.उ.६.१.४) इत्यादिना । अन्यथा ‘एक’शब्दः ‘पिण्ड’शब्दश्च व्यर्थः स्यात् । ‘मृदा विज्ञातया’ इत्येतावता पूर्णत्वात् । न हि एकमृत्पिण्डात्मकान्यन्यमृण्मयानि । सादृश्यमेव हि तेषाम् । ‘यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्यात्’(छां.उ.६.१.५) , ‘यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्यात्’(छां.उ.६.१.६) इत्यादिकमपि व्यर्थं स्यात् । न हि एकमण्यात्मकमन्यल्लोहमयम् । न चैकनखनिकृन्तनात्मकं सर्वं कार्ष्णायसम् ।
‘वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छां.उ.६.१.४) इत्यत्र च, वाच नाम्नामारम्भणं विकारः, अविकृतं नित्यं नामधेयं मृत्तिकेत्येवेत्येतद्वचनं(त्यादिवैदिकमेव एतद्वचनं) सत्यमिति श्रुत्यर्थः । न च वाचारम्भणशब्दोऽपि मिथ्यात्वे प्रसिद्धः । वाचारम्भणमात्रमिति चाश्रुतकल्पना । तस्मिन् पक्षे ‘नामधेय’शब्द ‘इतिशब्दश्च व्यर्थः स्यात् । अतो न कुत्रापि जगतो मिथ्यात्वमुच्यते ।
‘कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः’(ई.उ.८),
‘यच्चिकेत सत्यमित् तन्न मोघं वसुस्पार्हमुत जेतोत दाता ।’(ऋ.सं.१०.५५.६),
‘विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदापश्चन प्रमिनन्ति व्रतं वाम् ।’(ऋ.सं.०२.२४.१२),
‘प्र घान्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्’,(ऋ.सं.२.१५.१)
‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति ।
न चान्यथा क्वापि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथाभविष्यत् ॥’,
‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञः शक्तिं हरेर्ये न विदुः परां हि ।
यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा ॥’,
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥(भ.गी.१६.८)
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥’(भ.गी.१६.९)
इत्यादेश्च ।
‘अनित्यत्वविकारित्वपारतन्त्र्यादिरूपतः ।
स्वप्नादिसाम्यं जगतो न तु बोधनिवर्त्यता ॥
सर्वज्ञस्य यतो विष्णोः सर्वदैतत् प्रतीयते ।
बोधासहं ततो नैतत् किन्त्वाज्ञावशमस्य हि ॥’ इति परमोपनिषदि ।
‘प्रज्ञाविनिर्मितं यस्मादतो मायामयं जगत् ।
अनेनानुगतं यस्मादनृतं तेन कथ्यते ॥
बोधानिवर्त्यमपि तु नित्यमेव प्रवाहतः ।
‘अ’ इत्युक्तः परो देवस्तेन सत्यमिदं जगत् ॥
तदधीनस्वरूपत्वादसत्यं तेन कथ्यते ।
सत्यस्य सत्यं स विभुरिन्द्रचापस्य सूर्यवत् ॥’ इति च ।
‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ।’(बृ.उ.४.१.२० ) इति च ।
‘महामायेत्यविद्येति नियतिर्मोहिनीति च ।
प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छाऽनन्त कथ्यते ॥
प्रकृतिः प्रकृष्टकरणात् वासना वासयेत् यतः ।
‘अ’ इत्युक्तो हरिस्तस्य विद्याऽविद्येति सञ्ज्ञिता ॥
मायेत्युक्त्वा प्रकृष्टत्वात् प्रकृष्टं हि मयाभिधम् ।
विष्णोः प्रज्ञप्तिरेवेका शब्दैरेतैरुदीर्यते ॥
प्रज्ञप्तिरूपो हि हरिः सा च स्वानन्दलक्षणा ॥’ इति च ।
‘सर्वे वेदा हरेर्भेदं सर्वस्माज्ज्ञापयन्ति हि ।
भेदः स्वातन्त्र्यसार्वज्ञ्यसर्वैश्वर्यादिकश्च सः ॥
स्वरूपमेव भेदोऽयं व्यावृत्तिश्च स्वरूपता ।
सर्वव्यावृत्तये यस्मात् स्वशब्दोऽयं प्रयुज्यते ॥
सर्वव्यावृत्ततामेव नेति नेत्यादिका श्रुतिः ।
विष्णोरतो वदेदन्या अपि सर्वा न संशयः ॥’ इति च नारायणश्रुतिः ।
‘अहं ब्रह्मास्मि’(बृ.उ.३.५.४ ) , ‘तद्योहं सोसौ योसौ सोहम्’(ऐ.ब्रा.आ-२,अ-२,ख-४.१२) , ‘योसावादित्ये(य एव आदित्ये) पुरुषः(पुरुषो दृष्यते) सोऽहमस्मि स एवाहमस्मि’(छां.४.११.१) इत्यादौ तु अन्तर्याम्यपेक्षया ।
‘स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः’(ब्रह्मवल्लि.२७) ‘अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति’(ऐ.ब्रा.२.३.८) ‘तस्योपनिषदहमिति’(बृ.ब्रा.५)
‘अहंनामा हरिर्नित्यमहेयत्वात् प्रकीर्तितः ।
त्वं चासौ प्रतियोगित्वात् परोक्षत्वात् स इत्यपि ॥
सर्वान्तर्यामिणि हरावस्मच्छब्दविभक्तयः ।
युष्मच्छब्दगताश्चैव सर्वास्तच्छब्दगा अपि ॥
सर्वशब्दगताश्चैव वचनान्यखिलान्यपि ।
स्वतन्त्रत्वात् प्रवर्तन्ते व्यावृत्तेप्यखिलात् सदा ॥
तत्सम्बन्धात्तु जीवेषु तत्सम्बन्धादचित्स्वपि ।
वर्तन्त उपचारेण तिङ्पदान्यखिलान्यपि ।
तस्मात् सर्वगतो विष्णुरेको भिच्च ततो बहुः ॥’ इति नारायणश्रुतिः ।
‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥’(भ.गी.१८.२०) इति भगवद्वचनम् ।
न चासत्यो भेदः । ‘सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः’(ऋ.सं.४.१७.५) । ‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये’(ऋ.सं.८.३.४) । ‘सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदा । मैवारुवण्यो मैवारुवण्यो मैवारुवण्यः’। ‘आत्मा हि परमस्वतन्त्रः सर्ववित् सर्वशक्तिः परमसुखः परमो जीवस्तु तद्वशोल्पज्ञोल्पशक्तिः आर्तो अल्पकः’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
न चावान्तरसत्यत्वमिदम् ।
‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोश्नुुते सर्वान् कामान् सह । ब्रह्मणा विपश्चिता ।’(तै.आ.८.१) ,
‘एतमानन्दमयामात्मानमुपसङ्क्रम्य इमान् लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत् सामगायन्नास्ते ।’(भृगुवल्ली.१४) ,
‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्मान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां वि मिमीत उत्वः ॥’(ऋ.सं.१०.७१.११) ‘परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ।’(छां.उ.८.३.४) ‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाज्ञातिभिर्वा’(छां.उ.८.१२.३) ‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् तत् केन कं जिघ्रेत् तत् केन कं विजानीयात् येनेदं सर्वं विजानाति तं च केन विजानीयात् विज्ञातारमरे केन विजानीयात्’(बृ.उ.४(२).४.१४) ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’(कठ.उ.२.१.१५) ‘तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’(मुण्डक.उ.४.६(२.२.५)) ‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.उ.५.३(३.१.३)) ,
‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । आदघ्नासः उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥(ऋ.सं.१०.७१.७)’
‘ईशमाश्रित्य तिष्ठन्ति मुक्ताः संसारसागरात् ।
यथेष्टभोगभोक्तारो ब्रह्मान्ता उत्तरोत्तरम् ॥’ इत्यादि मोक्षानन्तरं भेदश्रुतिभ्यः ॥
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् ।
‘ओं जगद्य्वापारवर्जम् ओं’(ब्र.सू.४.४.१७) ,
‘ओं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ओं’(ब्र.सू.४.४.१८) इत्यादि च ।
‘अविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा’(बृ.उ.६.५.१३(४.५.१४)) इति तद्धर्माणामप्यनुच्छित्तेः प्रस्तुतत्वात् । ‘अत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापिबन्’(बृ.उ.६.५.१३(४.५.१४)) ‘न प्रेत्य सञ्ज्ञाऽस्ति’(बृ.उ.६.५.१२(४.५.१३)) इति सञ्ज्ञानाशस्य दोषत्वेवोक्तत्वात् । ‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत्’(बृ.उ.४(२).४.१४) इति ह्याक्षेप एव ।
न हि भोगाभावो
‘विज्ञातारमरे केन विजानीयाद्’(बृ.उ.४(२).४.१४) इति विज्ञातुरविज्ञानं चापेक्षितम् ।
‘अहमित्येव यो वेद्यः स जीव इति कीर्तितः ।
स दुःखी स सुखी चैव स पात्रं बन्धमोक्षयोः ॥’ इति च परमश्रुतिः ।
‘मग्नस्य हि परेज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ।’(म.भा.१२.३०७.८३) इति मोक्षधर्मे ।
‘न तु तद् द्वितीयमस्ति’(बृ.उ.६(४).३.२३) इति च । यत्तद् ब्रह्म द्वैतत्वेन न पश्यति तदेव द्वितीयं नेत्याह ।
‘ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् (यत्ततोऽन्यत् विभक्तत्वेनैव पश्येत्)’(बृ.उ.६(४).३.२३) इति वाक्यशेषात् । ‘न हि द्रष्टुर्दृष्टेः विपरिलोपो विद्यते’ इति हेतोश्च ।
‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेव्यये सर्व एकीभवन्ति’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७)) इत्यत्रापि एकीभावो मत्यैक्यं क्षीराब्ध्यादिस्थित-तद्रूपापेक्षया स्थानैक्यं वा ।
‘कामेन मे काम आगात् । हृदयात् हृदयं मृत्योः । यदमीषामदः प्रियः तदैतूप मामभि ॥’(कृ.य.तै.आ.३.१५)
‘ब्रह्ममत्यनुकूला मे मतिर्मुक्तौ भविष्यति ।
अतः प्रायोऽनुकूलत्वमिदानीमपि मे स्थितम् ॥’
‘येनाऽक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्’(मुण्डक.उ.५.६(३.१.६)) ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’(ब्रह्मवल्लि.२७(८.१)) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
स्वरूपैक्यभिप्राये कर्माणि विज्ञानमयश्च इति न युज्यते । न हि तत्पक्षेपि कर्मणां ब्रह्मैक्यं मुक्तावस्ति । निवृत्त्यभिप्राये पञ्चदशकलानामपि समत्वात् । ‘गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७)) इत्यन्यासां कलानां गमनमुक्त्वा कर्मणा विज्ञानात्मनश्चैकीभावकथनं व्यर्थं स्यात् । विशेषाभावात् ।
न च ज्ञाननिवृत्तस्य रजतस्य शुक्त्या एकीभावव्यवहारोस्ति । ‘परेव्यये’(मुण्डक.उ.६.७(३.२.७) इत्यधिकरणत्वकथनं च भेदज्ञापकम् । अन्यथा ‘पर एव भवन्ति’ इति निर्देशः स्यात् ।
‘जीवस्य परमैक्यं तु बुद्धिसारूप्यमेव तु ।
एकस्थाननिवसो वा व्यक्तिस्थानमपेक्ष्य सः ॥
न स्वरूपैकता तस्य मुक्तस्यापि विरूपतः ।
स्वातन्त्र्यपूर्णतेऽल्पत्वपारतन्त्र्ये विरूपता ॥’ इति परमश्रुतिः ।
‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’(मुण्डक.उ.६.९(३.२.९) इत्यादि च
‘सम्पूज्य ब्राह्मणं भक्त्या शूद्रोऽपि ब्राह्मणो भवेत्’ इतिवत् बृंहितो भवतीत्यर्थः । न हि ब्राह्मणपूजकः स एव ब्राह्मणो भवति ।
‘ब्रह्माणि जीवा सर्वेऽपि परब्रह्माणि मुक्तिगाः ।
प्रकृतिः परमं ब्रह्म परमं महदच्युतः ॥
तस्मान्न मुक्ता न च सा न क्वचिद् विष्णुवैभवम् ।
आप्नुवन्ति स एवैकः स्वतन्त्रः पूर्णसद्गुणः ॥’ इति परमश्रुतिः ।
‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।’(ऋ.सं.७.९९.१)
‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत्प्राप्तुं नैव शक्यते ।
तद्यत् स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥’ इति च ।
‘यथाऽपियन्ति तेजांसि महातेजसि भास्करे ।
पृथक् पृथक् स्थितान्यह्नि स्वरूपैरपि सर्वशः ॥
परे ब्रह्मणि जीवाख्यब्रह्माण्यप्यपियन्ति हि ।
मुक्तौ पृथक् स्थितान्येव तदन्येषामदर्शनम् ।
अप्ययोऽयं समुद्दिष्टो न स्वरूपैकता क्वचित् ॥’ इति नारायणश्रुतौ ।
अतः सर्वागमविरुद्धमेव जीवपरमैक्यम् ।
तथैव युक्तिविरुद्धं च । न तावदेकजीववादो युज्यते । एकाज्ञानपरिकल्पितत्वे च सर्वस्य ‘सर्वमिदं परिकल्पितम्’ इति जानतः पुनः शिष्यादिबोधनं न युज्यते । न हि ‘स्वप्नोऽयम्’ इति निश्चित्य स्वाप्नपुत्रदायार्थं यतते । स्वप्ने तु स्वप्नत्वाज्ञानादेव यतते । न च बहूनां दृश्यमानत्वादस्य ‘अज्ञानपरिकल्पितमिदम्’ इति निश्चयो युज्यते ।
स्वप्ने तु प्रबोधानन्तरमेकस्यावशिष्टत्वात् निश्चयः । न चात्र तथाऽस्ति । ‘तस्य तस्य तथा तथा प्रतिपत्तव्यम्’ इत्यङ्गीकारे वस्तुनि विकल्पासम्भवादकल्पितमित्येव स्यात् । न च तथा प्रतिपत्तव्यमित्यत्र प्रमाणमस्ति ।
शिष्याज्ञानपरिकल्पितमित्यङ्गीकारे तस्यैवाऽचार्यभावे स्वयमेव कल्पितो भवतीति सम्यग् ग्रन्थाधिगमस्यानर्थहेतुत्वं स्यात् । न च कस्यचिन्मुक्तिः । ग्रन्थाधिगमे तस्यैव स्वशिष्याज्ञानपरिकल्पितत्वप्राप्तेः ।
स चैकजीवो यदि भेदवादी भवति तस्य तत्रैव दार्ढ्यान्न कदाचिद्भेदनिवृत्तिरिति न कस्यापि मुक्तिः स्यात् । तेन यथा कल्पि तं तथैव भवतीति तेन एकजीववादिनां नित्यनिरयकल्पने स एव स्यात् ।
न च एकजीवाज्ञानपरिकल्पितं समस्तमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति ।
‘प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥’(माण्डूक्य.उ.२.९)
इत्यस्य च अयमर्थः- ‘प्रपञ्चो यदि विद्येत = भवेत = उत्पद्येत, तर्हि निवर्तेत। न च निवर्तते, तस्मादनादिरेवायम् । प्रकृष्टः पञ्चविधो भेदः प्रपञ्चः । न चाविद्यमानोऽयम्, मायामात्रत्वात् । ‘माया’ इति भगवत्प्रज्ञा, सैव मानत्राणकर्त्री यस्य तन्मायामात्रम् । परमेश्वरेण ज्ञातत्वात्, रक्षितत्वाच्च न द्वैतं भ्रान्तिकल्पितम्’ इत्यर्थः ।
न हीश्वरस्य भ्रान्तिः । तर्हि
‘अद्वैतः सर्वभावानाम्’(माण्डूक्य.उ.२.२) इति व्यपदेशः कथम्? इत्यत आह-
‘अद्वैतं परमार्थतः’(माण्डूक्य.उ.२.९) इति । परमार्थापेक्षया हि अद्वैतम् । सर्वस्मादुत्तमः अर्थः स एक एवेत्यर्थः ।
अन्यथा हि ‘अद्वैतः सर्वभावानाम्’(माण्डूक्य.उ.२.२) इति व्यर्थं स्यात् । सर्वभावानां मध्ये तस्य एकस्याद्वैतत्वमित्युक्ते समाधिकराहित्यमेवोक्तं स्यात् । अन्येषां सर्वभावानां च समाधिकभावः । ‘विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित्’ (माण्डूक्य.उ.२.१०) इति वाक्यशेषाच्च न कल्पितत्वमस्येति ज्ञायते । निवर्तते इत्यङ्गीकारे ‘निवर्तेत, विद्येत’ इति च प्रसङ्गरूपेण कथनं ‘यदि’शब्दौ च न युज्यते । ‘विद्येत’ इत्यस्य च उत्पत्त्यर्थानङ्गीकारे ‘यद्यदस्ति तत्तन्निवर्तते’ इति व्याप्त्यभावात् ‘निवर्तेत’ इति न युज्यते । अतः प्रपञ्चस्य अनादिनित्यत्वपरमिदं वाक्यम् । अत ‘उपदेशादयं वादोऽज्ञाते द्वैतं न विद्यते’(माण्डूक्य.उ.२.१०) इत्याह । अज्ञात एव द्वैतं न विद्यते । अज्ञानिनां पक्ष एव द्वैतं न विद्यत इत्यर्थः ।
‘जीवेश्वरभिदाचैव जडेश्वरभिदा तथा ।
जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ॥
मिथश्च जडभेदोऽयं प्रपञ्चो भेदपञ्चकः ।
सोऽयं सत्यो ह्यनादिश्च सादिश्चेन्नाशमाप्नुयात् ॥
न च नाशं प्रयात्येष न चासौ भ्रान्तिकल्पितः ।
कल्पिताश्चेन्निवर्तेत न चासौ विनिवर्तते ॥
द्वैतं न विद्यत इति तस्मादज्ञानिनां मतम् ।
मतं हि ज्ञानिनामेतन्मितं त्रारातं च विष्णुना ॥
तस्मात् सत्यमिति प्रोक्तं परमो हरिरेव तु ॥’ इति परमश्रुतिः ।
मैत्रेयीशाखायां च ‘अथ ज्ञानोपसर्गाः’ इत्युक्त्वा ‘अथ ये चान्ये मिथ्यातर्कैः दृष्टान्तैः कुहकेन्द्रजालैः वैदिकेषु परिस्थातुमिच्छन्ति तैः सह न संवसेत् प्राकाश्या ह्येते तस्करा अस्वर्ग्या’ इति ह्याह-
‘नैरात्म्यवादकुहकैर्मिथ्यादृष्टान्तहेतुभिः ।
भ्राम्यन् लोको न जानाति वेदविद्यान्तरं तु यत् ॥’(मैत्रायण्युपनिषत्.७.८) इति ।
आत्मसम्बन्धि किमपि नास्तीति वादो नैरात्म्यवादः ।
भ्रान्तिकल्पितत्वे च जगतः, सत्यं जगद्द्वयमपेक्षितम् । न हि सत्यशुक्तेः, सत्यरजतस्य, तयोः सादृश्यस्य चाभावे भ्रान्तिर्भवति ।
स्वप्नेऽपि वासनारूपं सत्यमेव जगन्मनसि स्थितं बहिःष्टत्वेन दृश्यते । देहात्मनोरपि एकदेशस्थत्वादिसादृश्यमस्त्येव । ‘शङ्खः पीतः’, ‘नभो नीलम्’ इत्यादिष्वपि पीतादयोऽन्यत्र विद्यन्त एव । तत्सादृश्यञ्च द्रव्यत्वादिकं किञ्चित् शङ्खादीनां चास्त्येव । अतो न कुत्रापि सदृशसत्यवस्तुद्वयं विना भ्रमः ।
न चाऽत्मन्यनात्मभ्रमः क्वापि दृष्टः । न हि कश्चित् ‘अहमहं न भवामि’ इति भ्रान्तो दृश्यते । ‘आत्मन्यनात्मभ्रमः एवायं प्रपञ्चः’ इति तैरुच्यते । तं विनैव अनात्मन्यात्मभ्रमकल्पनेऽनात्मनः सत्यत्वं स्यात् । तदा चाद्वितीयत्वकल्पनेऽनात्मैवस्ति । नाऽत्मेति भवति ।
आत्माज्ञानात्मकत्वे च जगत आत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्येत । न हि शुक्तेर्भेेदेन रजतं दृश्यते भ्रान्तौ । न चैकमेव युगपद् बहुधा दृश्यते भ्रान्तौ । न चाऽत्मनि भेदभ्रमः क्वपि दृष्टः ।
न च कुत्रापि मिथ्योपाधिकृतो भेदो दृष्टः ।
न च ज्ञानाज्ञानयोरपि मिथ्याकल्पितत्वं दृष्टम् । तद्विषयस्यैवन्यथात्वं भ्रान्तौ । एवमाद्यनन्तयुक्तिविरुद्धोऽयं पक्षः ।
ग्रन्थबहुत्वं स्यादित्येवोपरम्यते ।
न च सत्यत्वाङ्गीकारे कश्चिद् दोषः ।
बहुजीवादिपक्षेऽपि भेदस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारे एते दोषाः भवन्त्येव । मिथ्योपाधिकृतं हि तेषामपि बहुत्वम् । न च मिथ्योपाधिकृतो भेदः क्वपि दृष्टः ।
आत्मनि अनात्मकल्पनारूप्तवात् मिथ्योपाधिरेव न युज्यते । मायामयी सृष्टिरपि तत्सदृशस्यान्यस्य विद्यमानत्व एव दृष्टा । द्रव्यत्वादिसादृश्ययुक्तं किञ्चिदधिष्ठानमाश्रित्यैव च ।
‘अधिष्टानं च सदृशं तथ्य(सत्य)वस्तुद्वयं विना ।
न भ्रान्तिर्भवति क्वपि स्वप्नमायादिकेष्वपि ॥
‘मानस्यां वासनया तु बहिर्वस्तुत्वकल्पनम् ।
स्वाप्नो भ्रमश्च मायायां कर्तृदेहादिवस्तुषु ॥
‘चतुरङ्गबलत्वादिकल्पनं भ्रम इष्यते ।
न भ्रान्तिकल्पितं विश्वमतो विष्णुबलाश्रितम् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।
न च मायाविना माया दृश्यते विश्वमीश्वरः ।
सदा पश्यति तेनेदं न मायेत्यवधार्यताम् ॥’ इति च ।
अपरोक्षदृशो मिथ्यादर्शनं न क्वचित् भवेत् ।
सर्वापरोक्षविद्विष्णुः विश्वदृक् तन्न तन्मृषा ॥’ इति च ।
यदि चैकमेव ब्रह्मोपाधिभेदात् संसरति मुच्यते च तदा संसारिणां सर्वदा विद्यमानत्वात् सर्वदा संसार्येव ब्रह्म । अतस्तद्भावोऽपि न मुक्तिः सर्वदोपाधिसम्बद्धत्वात् तस्य । न च शुद्धस्य नोपाधिसम्बन्ध इति वाच्यम् । उपाधिसम्बद्धस्योपाधिसम्बन्धकल्पने अनवस्थाप्रसङ्गात् । न च तेनैव सम्बन्धेन सम्बद्धस्य । आत्माश्रयत्वप्रसङ्गात् ।
इतश्च मिथ्योपाधिर्न युज्यते । अज्ञानसिद्धौ मिथ्योपाधिसिद्धिः, अज्ञानं विना मिथ्यात्वासिद्धेः । न च मिथ्योपाधिं विनाऽज्ञानसिद्धिः । मिथ्योपाधिभिन्नस्यैव अज्ञत्वात् ।
शुद्धस्यैवाज्ञत्वे मुक्तस्याप्यज्ञत्वप्रसक्तेः । स्वाभाविकत्वात् सत्यत्वात् सद्वितीयत्वप्रसक्तेश्च । स्वाभाविकस्य चानिवृत्त्यङ्गीकारादनिवृत्तिप्रसक्तेश्च । सत्यस्य च अनिवृत्तिरिति हि तत्पक्षः ।
अतश्चान्योन्याश्रयता । अज्ञानसिद्धौ मिथ्योपाधिसिद्धिः, मिथ्योपाधिसिद्धौ जीवसिद्धिः, जीवसिद्धौ तदाश्रयाज्ञानसिद्धिः इति चक्रकं वा । न च शुद्धमेव भ्रान्त्याऽज्ञमिति युक्तम् । अज्ञानसिद्धौ भ्रमसिद्धिः, तत्सिद्धौ अज्ञानसिद्धिः इत्यन्योन्याश्रयत्वम् ।
अनागता अतीताश्च यावन्तः सहिताः क्षणाः ।
अतीतानागताश्चैव यावन्तः परमाणवः ॥
ततोऽप्यनन्तगुणिता जीवानां राशयः पृथक् ॥’ इति वत्सश्रुतेः
न संसारिणां परिसमाप्तिरस्मत्पक्षे ।
परमाणुप्रदेशेऽपि ह्यनन्ताः प्राणिराशयः ।
सूक्ष्मत्वादीशशक्त्यैव स्थूला अपि हि संस्थिताः ॥
सहस्रयोजनसभां प्रभावाद्विश्वकर्मणः ।
अनन्ता राशयोऽनन्ताः प्रजानामधिसंस्थिताः ॥’ इति स्कान्दे ।
न च मिथ्यावस्तुनो दुर्घटत्वमेव भूषणम् । दृष्टस्य वस्तुनो मिथ्यात्वकल्पनस्य दृष्टिसकाशात् बलवत्प्रमाणयुक्त्यपेक्षत्वात् । तदभावे सत्यत्वं दृष्ट्यैव सिद्ध्यति । न ह्यन्नादिकं भोग्यं दृष्ट्वा भोक्तुं सत्यत्वे प्रमाणान्तरमपेक्षते । किन्तु ‘नेदमन्नम्’ इति केनचिदुक्ते कथमिदमन्नत्वेन दृश्यमानमन्नं न भवतीति प्रमाणान्तरमपेक्षते ।
न च प्रत्यक्षदृष्टस्य ततो बलवत्प्रत्यक्षमागमं विनानुमानादिनैव बाधो दृष्टः । दूरस्थवृक्षह्रस्वत्वादौ प्रत्यक्षापटुत्वस्यैव निश्चितत्वात् युक्त्या तत्र दीर्घत्वनिश्चयः । प्रत्यक्षस्य हि दूरे मन्दग्राहित्वं परिमाणादावन्यथात्वं च ततो बलवत्प्रत्यक्षेणैव निश्चितम् ।
न च जगत्प्रत्यक्षस्य मिथ्यात्वेन केनापि प्रमाणेन निश्चितम् । विशेषतश्च ज्ञानाज्ञानसुखदुःखात्मभेदादिविषयस्यानुभवस्य न मिथ्यात्वं दृष्टम् । अतश्च संसारस्य सत्यत्वात् सत्यस्य चानिवृत्त्यङ्गीकारान्न मोक्षः स्यात् । अनुभवसिद्धस्य बलवदनुभवं विना युक्तित एव मिथ्यात्वङ्गीकारे आत्मनोऽपि मिथ्यात्वं स्यात् । युक्तिश्च सर्वस्यान्यस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारात् । द्विधाकल्पने कल्पनागौरवमिति ।
आत्माधिष्ठान(स्य)भ्रमस्यैवादृष्टेः तस्याधिष्ठानत्वमपि न युज्यते । दुर्घटत्वस्य च भूषणत्वे दुर्घटमप्यात्ममिथ्यात्वं स्यादेव । प्रतीतेरप्यविद्याकार्यत्वाङ्गीकारात् । तस्याश्च दुर्घटत्वस्य भूषणत्वात् सत्यस्य च युक्त्यपेक्षत्वात् ‘घटादीनां द्रष्टृत्वम्, आत्मनो जडत्वम्, द्रष्टुरभावेऽपि च प्रतीतिः, अधिष्ठानं विनैव भ्रमः’ इत्यादि विरुद्धं सर्वमपि स्यात् ।
उपाधिभेदाङ्गीकारे हस्तपादाद्युपाधिभेदेऽपि तद्गतसुखदुःखादिभोक्तुर्यथा भेदो न प्रतीयते एवमेव शरीरादिभेदेऽपि भोक्तुर्भेदो न दृश्यते । सर्वदेहगतसुखदुःखादिकमेकेनैव भुज्येत । यथा च एकाङ्गुल्याद्यपगमेऽपि न मुक्तिः, एवमेकोपाध्यपगमेऽपि तस्यैवानन्तोपाधिसम्बद्धत्वान्न मुक्तिः स्यात् ।
उद्यतायुधदोर्दण्डाः पतितास्वशिरोक्षिभिः ।
पश्यन्तः पातयन्ति स्म कबन्धा अप्यरीन् युधि ॥’ इति भारतवचनान्न विश्लेषाद्विशेषः ।
किञ्चोपाधिरात्मन एकदेशं ग्रसति उत सर्वमात्मानम् । एकदेशाङ्गीकारे सावयवत्वात् । सावयवस्य चानित्यत्वं तैरङ्गीकृतम् । सर्वग्रसे च नोपाधिः भेदकः स्यात् । उपाधिकृतांशकल्पने तदुपाधिकृतत्वे आत्माश्रयत्वम् । उपाध्यन्तरकल्पनेऽनवस्था ।
न चेश्वरस्य सर्वगतत्वादौपाधिकभेदो ब्रह्मणा भवति । न हि देशतः कालतश्चापरिच्छिन्नयोरौपाधिकभेदो दृष्टः । सर्वोपाधिगत्वाच्च एकस्यैश्वरस्य भेदस्य मिथ्यात्वाद्ध(च्च ह)स्तपादादिभेदेऽपि भोक्तुरेकत्ववत् सर्वसुखदुःखादिभोक्तृत्वमीश्वरस्यैव स्यात् ।
देशतः कालतश्चापरिच्छिन्नयोरौपाधिकभेदाभावादेव दुःखिनोऽन्यत् शुद्धं ब्रह्म न सिद्ध्यति । अतः ‘स्वाभाविकः संसारः’ इत्यनिवृत्तिरेव स्यात् ।
किञ्च विशिष्टस्य शुद्धस्य वा संसारः । शुद्धस्य संसार इत्युक्ते स्वाव्याहतिः । विशिष्टस्येत्युक्ते विशिष्टोऽन्यः स एव वा । स एव चेदुक्तो दोषः । अन्यश्चेन्नित्योऽनित्यो वा । अनित्यश्चेन्नाश एव तस्य न मोक्षः । नित्यत्वे च भेदस्य सत्यत्वम्, मोक्षेऽपि तस्य भावात् । स्वरूपमात्रस्याभेदः उपाधिभिन्न एवेत्यङ्गीकारे स्वरूपमेव उपाधिसम्बद्धमिति न तस्य शुद्धत्वम् । अशुद्धस्वभावस्य न कदाचित् शुद्धत्वमिति च तत्पक्षः ।
उपाधिमिथ्यात्वाङ्गीकारे चान्योन्याश्रयत्वादि(दयो) दोषा उक्ताः । न चानादिकर्मभेदाद्भेदः । औपाधिकभेदसिद्धौ कर्मभेदसिद्धिः, तत्सिद्धौ च तत्सिद्धिरित्यन्योन्याश्रयत्वात् । अतोऽनन्तदोषदुष्टत्वात् ग्रन्थबहुत्वं स्यादित्येवोपरम्यते । अतः सर्वप्रमाणविरुद्धत्वान्नाभेदे श्रुतितात्पर्यम् ।
सर्वशब्दावाच्यस्य लक्षणाऽपि न दृष्टेति न तस्य शास्त्रगम्यत्वम् । अतोऽवाच्यत्वादज्ञेयत्वात् शून्यमेव तदिति प्राप्तम् । नच स्वेनापि ज्ञेयत्वं तैरुच्यते । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति ।
न च स्वरूपमन्यद्वा ज्ञेयं ज्ञातारं च विना ज्ञानं दृष्टम् । अतो ज्ञातृज्ञेयाभावात् ज्ञानस्यापि शून्यतैव । अतः शून्यवादान्न कश्चित् विशेषः । न च ज्ञातृज्ञेयरहितं ज्ञानं क्वापि दृष्टम् ।
अप्राप्ताच्चेश्वरभेदस्य नाभेदे श्रुतितात्पर्यं युज्यते ।
‘सर्वोत्तमं सर्वदोषव्यपेतं गुणैरशेषैः पूर्णमन्यं समस्तात् ।
वैलक्षण्याज्ज्ञापयितुं प्रवृत्ताः सर्वे वेदा मुख्यतो नैव चान्यत् ॥’ इति महोपनिषदि ।
अतः सर्वागमैरेव सर्वस्मात् भिन्नत्वेन सर्वस्माद्विशिष्टत्वेन च विज्ञेयो भगवान् नारायण इति सिद्धम् ॥
॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः प्रथमः परिच्छेदः ॥
द्वितीयः परिच्छेदः
ब्रह्मा शिवः सुराद्याश्च शरीरक्षरणात् क्षराः ।
लक्ष्मीरक्षरदेहत्वादक्षरा तत्परो हरिः ॥
स्वातन्त्र्यशक्तिविज्ञानसुखाद्यैरखिलैर्गुणैः ।
निस्सीमत्वेन ते सर्वे तद्वशाः सर्वदैव च ॥
सर्गस्थितिक्षययतिप्रकाशावृतिबन्धनम् ।
सर्वक्षराणामेकः स कुर्यात् सात्विकमोक्षणम् ॥
सर्गस्थितियतिज्योतिर्नित्यानन्दप्रदोक्षरे ।
चेष्टाप्रदश्च सर्वेषामेक एव परो हरिः ॥
तस्य नान्योस्ति सर्गादिकर्ता निर्दोषकश्च सः ॥’ इति परमश्रुतिः ।
‘ब्रह्मशेषसुपर्णेशशक्रसूर्यगुहादयः ।
सर्वे क्षरा अक्षरा तु श्रीरेका तत्परो हरिः ॥’ इति स्कान्दे ।
‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥(ऋ.सं.१०.१२५.५)
अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वा उ ।
अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आविवेश ॥(ऋ.सं.१०.१२५.६)
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तस्समुद्रे ॥’(ऋ.सं.१०.१२५.७)
‘यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति तदक्षरे परमे प्रजाः ॥
यतः प्रसूताः जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम् ।
यदोषधीभिः पुरुषान् पशूंश्च विवेश भूतानि चराचराणि ॥
अतः परं नान्यदणीयसं हि परात् परं यन्महतो महान्तम् । यदेकमव्यक्तमनन्तरूपं विश्वं पुराणं तमसः परस्तात् ॥
तदेवर्तं तदु सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम् ।’(म.ना.उ.१.३-६)
‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५)
‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
मुखादिन्द्राश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ।’(ऋ.सं.१०.९०.१३)
‘एको(ह वै) नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो (नापो) नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी।’(महोपनिषत्१.२) , ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः ।’ , ‘ स मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत् तत एते व्यजायन्त ।’ , ‘विश्वो हिरण्यगर्भोग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्रा ’ इति ।
‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न चशङ्करः ।
नेन्द्रसूर्यौ न च गुहो न सोमो न विनायकः॥’ इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।
‘यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्’(३.९) इत्यत्राप्यपरमस्तीत्येवार्थः । अन्यथा ‘तेनेदं पूर्णं..(पुरुषेण सर्वम्॥) ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्।’(३.९-१०) इति वाक्यशेषविरोधात् । ‘तेनेदम्’ इत्युक्तमेव ‘तत’ इति परामृश्यते । अन्यथा ‘यस्मात् परं न’ इत्युक्तिविरोधात् ।
‘‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ।’
‘‘तस्यैव सर्वनामानि व्यतिरिक्तस्य सर्वतः(शः) ।
यः स्वतन्त्रः सदैवैकः स विष्णुः परमो मतः ॥’
इत्यादि श्रुतिभ्योऽन्यनामान्यस्यैवेति नान्येषां सर्वेश्वरत्वादिकमुच्यते । सर्ववेदेष्वप्यस्यादोषवचनादादावभावावचनाच्च तद्वचनाच्चान्येषां सर्वेषां वेदेषु सर्वेषु । तेषां सर्वनामत्वानुक्तेश्च ।
‘उत्पत्तिर्वासुदेवस्य प्रादुर्भावो न चापरः ।
देहोत्पत्तिस्तदन्येषां ब्रह्मादीनां तदीरणात् ॥
देहोऽनादिर्हरेर्नित्यो ब्रह्मादीनामनित्यकाः ।
मुख्योत्पत्तिस्तदन्येषां प्रादुर्भावो हरेर्जनिः ॥’ इति परमश्रुतेश्च ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः द्वितीयः परिच्छेदः ॥
तृतीयः परिच्छेदः
‘वर्जितः सर्वदोषैर्यो गुणसर्वस्वमूर्तिमान् ।
स्वतन्त्रो यद्वशाः सर्वे स विष्णुः परमो मतः ॥’ इति परमोपनिषदि ।
‘नित्यपूर्णाखलिगुणो विदोषः सर्वदैव यः ।
स्वतन्त्रः स परो (परमो) विष्णुर्जन्ममृत्यादिवर्जितः ॥’
नारद उवाच ।
‘निर्दोषश्चेत् कथं विष्णुर्मानुषेषूदपद्यत ।
चिन्ताश्रमव्रणाज्ञानदुःखयुग् दृश्यते कथम् ॥
एष मे संशयो ब्रह्मन् हृदि शल्य इवार्पितः ।
अनुद्धार्योऽपरैर्मत्यैः सूक्तिशक्त्या तमुद्धर ॥
ब्रह्मोवाच ।
स्त्रीपुंमलाभियोगात्मदेहो विष्णोर्न जायते ।
किन्तु निर्दोषचैतन्यसुखां नित्यां स्वकां तनुम् ॥
प्रकाशयति सैवेयं जनिर्विष्णोर्न चापरा ।
तथाऽप्यसुरमोहाय परेषां च क्वचित् क्वचित् ॥
दुःखाज्ञानभ्रमादीन् स दर्शयेच्छुद्धसद्गुणः ।
क्व व्रणादि क्व चाज्ञानं स्वतन्त्राचिन्त्यसद्गुणे ॥
दोर्लभ्यायैव मौक्षस्य दर्शयेत् तान्यजो हरिः ।
मिथ्यादर्शनदोषेण तेन मुक्तिं न यान्ति च ॥
तमो यान्ति च तेनैव तस्माद्दोषविवर्जितम् ।
प्रादुर्भावगतं चैव जानीयाद्विष्णुमञ्जसा ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
गुणक्रियादयो विष्णोः स्वरूपं नान्यदिष्यते ।
अतो मिथोऽपि भेदो न तेषां क्वचित् कदाचन ॥
स्वरूपेऽपि विशेषोऽस्ति स्वरूपत्ववदेव तु ।
भेदाभावेऽपि तेनैव व्यवहारश्च सर्वतः ॥’ इति महो(परमो)पनिषदि ।
अभिन्नत्वमभेदश्च यथा भेदविवर्जितम् ।
व्यवहार्यं पृथक् च स्यादेवं सर्वे गुणाः हरेः ॥
अभेदाभिन्नयोर्भेदा यदि वा भेदभिन्नयोः ।
अनवस्थितिरेव स्यान्न विशेषणतामतिः ॥
मूलसम्बन्धमज्ञात्वा तस्मादेकमनन्तधा ।
व्यवहार्यं विशेषेण दुस्तर्कबलतो हरेः ॥
विशेषोऽपि स्वरूपं स स्वनिर्वाहकताऽस्य च ॥’ इति ब्रह्मतर्के ॥
‘एकमेवाद्वितीयं तत् ’(छां.उ.६.१) ,
‘नेह नानास्ति किञ्चन’(कठ.२.१.११)
‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।’ (कठ.२.१.१०)
‘यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।
एवं धर्मान् पृथक् पश्यन् तानेवानु विधावति ॥(कठ.२.१.१४)’ इत्यादिश्रुतेश्च ॥
‘देशः सर्वत्र पुरुषः स्वतन्त्रः कालनित्यता ।
इत्यादिषु स्वसम्बन्धो यथैव गुणरूपिणः ॥
गुणित्वं गुणभोक्तृत्वं स्याद् विष्णोस्तच्च स स्वयम् ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।
विष्णुं सर्वगुणैः पूर्णं ज्ञात्वा संसारवर्जितः ।
निर्दुःखानन्दभुङ् नित्यं तत्समीपे स मोदते ।
मुक्तानां चाश्रयो विष्णुरधिकोधिपतिस्तथा ।
तद्वशा एव ते सर्वे सर्वेदैव स ईश्वरः ॥’ इति परमश्रुतिः ।
‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.४.६(२.२.५)) , ‘सोश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’(ब्रह्मवल्लि.२(तै.उ.२.२)) इत्यादि च ॥
‘नृपाद्या शतधृत्यन्ताः मुक्तिगा उत्तरोत्तरम् ।
गुणैः सर्वै शतगुणा मोदन्त इति हि श्रुतिः ॥’ इति पाद्मे ।
अतो निश्शेषदोषवर्जितः पूर्णानन्तगुणो नारायण इति सिद्धम् ।
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥
स्वतन्त्रायाखिलेशाय निर्दोषगुणरूपिणे ।
प्रेयसे मे सुपूर्णाय नमो नारायणाय ते ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः तृतीयः परिच्छेदः ॥