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| = भावप्रकाशः = | | = भावप्रकाशः = |
| __NOTOC__
| | <div class="gr-page-nav">[[Padyamala|Padyamala]] · [[Padyamala/Vyakhya/Bhavaprakashaha|Bhavaprakashaha]]</div> |
| <div class="gr-page-nav">[[Padyamala|Padyamala]]</div> | | <div class="gr-teeka-page" data-primary="Padyamala" data-slug="Bhavaprakashaha" data-interleaved="1"> |
| <div class="gr-teeka-page" data-primary="Padyamala" data-slug="Bhavaprakashaha"> | |
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| == अध्याय 1 == | | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः भङ्गः"></span> |
| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C01_S01_V01"> | | == प्रथमः भङ्गः == |
| <div class="teeka-block"> | | <div class="verse-block" id="VA_C01_S01_V01" data-block-id="VA_C01_S01_V01" data-doc="VA" data-chapter="VA_C01" data-verse-type="shloka"><span class="shloka-block"><span class="shloka-line">नमोऽगणितकल्याणगुणपूर्णाय विष्णवे।</span><span class="shloka-line">सत्याशेषजगज्जन्मपूर्वकर्त्र मुरद्विषे ।। 1 ।।</span></span></div> |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div> | | |
| <div class="teeka-body"> | | <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C01_S01_V01" data-teeka="Bhavaprakashaha"><div class="teeka-block"><div class="teeka-body">{{Teeka |
| {{Bhashyam | |
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| | | | label = भावप्रकाशः |
| <h4 class="gr-vyakhya-head">प्रथमः भङ्गः</h4> | | | text = <h4 class="gr-vyakhya-head">प्रथमः भङ्गः</h4> |
| <div class="shloka-block"> | | <div class="teeka-shloka shloka-block"><span class="shloka-line">श्रीरामं हनुमत्सेव्यं श्रीकृष्णं भीमसोवितम्।</span><span class="shloka-line">श्रीव्यासं मध्वसंसेख्यं समस्ताभीष्टदं भजे ।। 1 ।।</span></div> |
| <span class="shloka-line">श्रीरामं हनुमत्सेव्यं श्रीकृष्णं भीमसोवितम्।</span> | | <div class="teeka-shloka shloka-block"><span class="shloka-line">श्रीमदानन्दतीर्थर्यचरणावाश्रयेऽनिशम्।</span><span class="shloka-line">रुद्रादिसर्वविबुधैः संसेव्याविष्टदौ सताम् ।। 2 ।।</span></div> |
| <span class="shloka-line">श्रीव्यासं मध्वसंसेख्यं समस्ताभीष्टदं भजे ।। 1 ।।</span> | | <div class="teeka-shloka shloka-block"><span class="shloka-line">अक्षोब्यतीर्थकरजान् व्यासरामपदार्चकान्।</span><span class="shloka-line">वन्दे ग्रन्थार्थविज्ञप्त्यै जयराजमुनीनहम् ।। 3 ।।</span></div> |
| </div> | | <div class="teeka-shloka shloka-block"><span class="shloka-line">यैरहं शुकवत्सम्यक् शिक्षितोऽस्मि कृपालुभिः।</span><span class="shloka-line">तान्वन्दे यादवाचार्यान्वेदेशमुनिसेवकान् ।। 4 ।।</span></div> |
| <div class="shloka-block"> | | <div class="teeka-shloka shloka-block"><span class="shloka-line">अथैतत्कृपया श्रीनिवासाख्यायुतसूरिणा।</span><span class="shloka-line">प्रकाश्यते मया वादावली सम्यग्यथामति ।। 5 ।।</span></div> |
| <span class="shloka-line">श्रीमदानन्दतीर्थर्यचरणावाश्रयेऽनिशम्।</span> | |
| <span class="shloka-line">रुद्रादिसर्वविबुधैः संसेव्याविष्टदौ सताम् ।। 2 ।।</span> | |
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| <span class="shloka-line">अक्षोब्यतीर्थकरजान् व्यासरामपदार्चकान्।</span> | |
| <span class="shloka-line">वन्दे ग्रन्थार्थविज्ञप्त्यै जयराजमुनीनहम् ।। 3 ।।</span> | |
| </div> | |
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| <span class="shloka-line">यैरहं शुकवत्सम्यक् शिक्षितोऽस्मि कृपालुभिः।</span> | |
| <span class="shloka-line">तान्वन्दे यादवाचार्यान्वेदेशमुनिसेवकान् ।। 4 ।।</span> | |
| </div> | |
| <div class="shloka-block"> | |
| <span class="shloka-line">अथैतत्कृपया श्रीनिवासाख्यायुतसूरिणा।</span> | |
| <span class="shloka-line">प्रकाश्यते मया वादावली सम्यग्यथामति ।। 5 ।।</span> | |
| </div> | |
| <p class="gr-vyakhya-para">अथ परमकारुणिको जयतीर्थश्रीमच्चरणः श्रीमदाचार्यैस्तत्र तत्र विक्षिप्य वर्णितं मायावादिनां दूषणं मन्दानुजिघृक्षयैकत्र सङ्कलय्य दर्शयितुं वादावल्याख्यं प्रकरणमारभमाणः स्वचिकीर्षितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्रपरिसमाप्त्यर्थमुत्तरग्रन्थोपक्षेपकविशेषण विशिष्टतया श्रीविष्णुनमनरूपमङ्गलं कृत्वा शिष्यशिक्षायै ग्रन्थदावुपनिबध्नाति।। नम इति ।। अशेषेति ।। रमाब्रह्मादीत्यर्थः। पूर्वशब्देन स्थिलयनियमनज्ञानाज्ञानबन्धमोक्षाणां ग्रहणम्। जगज्जन्म पूर्वं प्रभृतिर्यस्य स्थित्यादेस्तत्तथोक्तं तस्य कर्त्र इत्यर्थः। रमाब्रह्माद्यशेष जगत्कर्तृत्वोक्त्या तस्य तत्स्रष्टृत्वं तत्प्रकारश्च सिसृक्षत्वं विशेषश्च साक्षाद्भगवदिच्छया प्राप्तैव सृष्टेत्युदितेत्यादि-र्वियत्पादीयान् व्याख्यानोक्तरीत्या द्रष्टव्यः। प्रतिवादिनिराकरणसामर्थ्या-वाप्त्यर्थं मुरद्विष इत्युक्तम्। तं यथा यथोपासते तदेव भवतीति श्रुतेरिति ज्ञातव्यम्।</p> | | <p class="gr-vyakhya-para">अथ परमकारुणिको जयतीर्थश्रीमच्चरणः श्रीमदाचार्यैस्तत्र तत्र विक्षिप्य वर्णितं मायावादिनां दूषणं मन्दानुजिघृक्षयैकत्र सङ्कलय्य दर्शयितुं वादावल्याख्यं प्रकरणमारभमाणः स्वचिकीर्षितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्रपरिसमाप्त्यर्थमुत्तरग्रन्थोपक्षेपकविशेषण विशिष्टतया श्रीविष्णुनमनरूपमङ्गलं कृत्वा शिष्यशिक्षायै ग्रन्थदावुपनिबध्नाति।। नम इति ।। अशेषेति ।। रमाब्रह्मादीत्यर्थः। पूर्वशब्देन स्थिलयनियमनज्ञानाज्ञानबन्धमोक्षाणां ग्रहणम्। जगज्जन्म पूर्वं प्रभृतिर्यस्य स्थित्यादेस्तत्तथोक्तं तस्य कर्त्र इत्यर्थः। रमाब्रह्माद्यशेष जगत्कर्तृत्वोक्त्या तस्य तत्स्रष्टृत्वं तत्प्रकारश्च सिसृक्षत्वं विशेषश्च साक्षाद्भगवदिच्छया प्राप्तैव सृष्टेत्युदितेत्यादि-र्वियत्पादीयान् व्याख्यानोक्तरीत्या द्रष्टव्यः। प्रतिवादिनिराकरणसामर्थ्या-वाप्त्यर्थं मुरद्विष इत्युक्तम्। तं यथा यथोपासते तदेव भवतीति श्रुतेरिति ज्ञातव्यम्।</p> |
| }} | | }}</div></div></div> |
| </div> | | <div class="verse-block" id="VA_C01_S01_V02" data-block-id="VA_C01_S01_V02" data-doc="VA" data-chapter="VA_C01" data-verse-type="mantra"><span class="shloka-block"><span class="shloka-line">मूलम्--ननु कथं सत्यता जगतोऽङ्गीकाराधिकारिणी। विमतं मिथ्या दृश्यत्वाज्जडत्वात् परिच्छिन्नत्वाच्छुक्तिरजतवदित्यनुमानविरोधादिति। मैवम्। मिथ्यात्वानिरुक्तेः।</span></span></div> |
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C01_S01_V02"> | | <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C01_S01_V02" data-teeka="Bhavaprakashaha"><div class="teeka-block"><div class="teeka-body">{{Teeka |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div> | |
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| <span class="shloka-line">मूलम्--ननु कथं सत्यता जगतोऽङ्गीकाराधिकारिणी। विमतं मिथ्या दृश्यत्वाज्जडत्वात् परिच्छिन्नत्वाच्छुक्तिरजतवदित्यनुमानविरोधादिति। मैवम्। मिथ्यात्वानिरुक्तेः।</span>
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| {{Bhashyam | |
| | verse_id = VA_C01_S01_V02 | | | verse_id = VA_C01_S01_V02 |
| | id = VA_C01_S01_V02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C01_S01_V02_ |
| | text = | | | name = |
| | | label = भावप्रकाशः |
| | | text = <p class="gr-vyakhya-para">सत्याशेषजगदित्युक्तं जगत्सत्यत्वमसहमानो मायावादी प्रत्यवतिष्ठते।। नन्विति। अङ्गीकारस्याधिकारो योग्यता यस्याः सा तथोक्ताऽङ्गीकर्तुं योग्येत्यर्थः। कुतः सत्यता जगतो नाङ्गीकर्तुं योग्येत्यतोऽनुमानविरोधादित्याह।। विमतमिति। सर्वं मिथ्येत्युक्ते ब्रह्मणि प्रमाणबाधः शुक्तिरजतादौ सिद्धार्थता च स्यात्। अतो विमतमित्युक्तम्। विमतेरनेकविधत्वेऽपि साध्यविशेषोपादानात्तद्विशेषसिद्धिः। तथा च सत्यत्वमिथ्यात्वाभ्यां विप्रतिपत्तिविषयो वियदादीत्युक्तं भवति। ननु तर्हि वियदादिकं मिथ्येत्येव कस्मात्पक्षनिर्देशो न कृत इति चेत्। उच्यते। आदिपदग्राह्यतावच्छेदकानुक्तावसङ्कुचितेनादिपदेन ब्रह्मदेरपि ग्रहणापत्त्योक्तदोषानिस्तारात्। किञ्चाप्रसिद्धविशेष्यत्वाप्रसिद्धविशेषणत्वसिद्धार्थत्वप्रमाणबाधानां प्रतिज्ञादोषाणामुद्धारोऽप्येतेन कृतः स्यादित्येतदर्थं विमतग्रहणम्। यदि विशेष्यभूतं वियदाद्यप्रसिद्धं स्यात्तदा किमाश्रया विमतिः स्यात्। यदि च विशेषणभूतं मिथ्यात्वमप्रसिद्धं भवेत्तदा किमुल्लेखिनी विमतिर्भवेत्। यदि वा मिथ्यात्वं वियदादौ सिद्धं बाधितं वा स्यात्तदाऽन्यतरकोटिनिश्चयान्न विमतिः स्यात्। अस्ति चेयं तस्मान्नाप्रसिद्धविशेष्यत्वादीति। आदिपदेनायं पट एतत्तन्तुनिष्ठान्ताभावप्रतियोगी अंशित्वात्पटान्तरवदित्यनुमानं ग्राह्यम्।</p> |
| | }}</div></div></div> |
| | <div class="verse-block" id="VA_C01_S01_V03" data-block-id="VA_C01_S01_V03" data-doc="VA" data-chapter="VA_C01" data-verse-type="mantra"><span class="shloka-block"><span class="shloka-line">मूलम्-तत्किमनिर्वचनीयत्वं वा असत्त्वं वा सद्विविक्तत्वं वा प्रमाणाविषयत्वं वा अप्रमाणविषयत्वं वा अविद्यातत्कार्ययोरन्यरत्वं वा स्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणतया प्रतीयमानत्वं वा। नाद्यः। विकल्पासहत्वात्।।</span></span></div> |
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| <p class="gr-vyakhya-para">सत्याशेषजगदित्युक्तं जगत्सत्यत्वमसहमानो मायावादी प्रत्यवतिष्ठते।। नन्विति। अङ्गीकारस्याधिकारो योग्यता यस्याः सा तथोक्ताऽङ्गीकर्तुं योग्येत्यर्थः। कुतः सत्यता जगतो नाङ्गीकर्तुं योग्येत्यतोऽनुमानविरोधादित्याह।। विमतमिति। सर्वं मिथ्येत्युक्ते ब्रह्मणि प्रमाणबाधः शुक्तिरजतादौ सिद्धार्थता च स्यात्। अतो विमतमित्युक्तम्। विमतेरनेकविधत्वेऽपि साध्यविशेषोपादानात्तद्विशेषसिद्धिः। तथा च सत्यत्वमिथ्यात्वाभ्यां विप्रतिपत्तिविषयो वियदादीत्युक्तं भवति। ननु तर्हि वियदादिकं मिथ्येत्येव कस्मात्पक्षनिर्देशो न कृत इति चेत्। उच्यते। आदिपदग्राह्यतावच्छेदकानुक्तावसङ्कुचितेनादिपदेन ब्रह्मदेरपि ग्रहणापत्त्योक्तदोषानिस्तारात्। किञ्चाप्रसिद्धविशेष्यत्वाप्रसिद्धविशेषणत्वसिद्धार्थत्वप्रमाणबाधानां प्रतिज्ञादोषाणामुद्धारोऽप्येतेन कृतः स्यादित्येतदर्थं विमतग्रहणम्। यदि विशेष्यभूतं वियदाद्यप्रसिद्धं स्यात्तदा किमाश्रया विमतिः स्यात्। यदि च विशेषणभूतं मिथ्यात्वमप्रसिद्धं भवेत्तदा किमुल्लेखिनी विमतिर्भवेत्। यदि वा मिथ्यात्वं वियदादौ सिद्धं बाधितं वा स्यात्तदाऽन्यतरकोटिनिश्चयान्न विमतिः स्यात्। अस्ति चेयं तस्मान्नाप्रसिद्धविशेष्यत्वादीति। आदिपदेनायं पट एतत्तन्तुनिष्ठान्ताभावप्रतियोगी अंशित्वात्पटान्तरवदित्यनुमानं ग्राह्यम्।</p> | | <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C01_S01_V03" data-teeka="Bhavaprakashaha"><div class="teeka-block"><div class="teeka-body">{{Teeka |
| | | verse_id = VA_C01_S01_V03 |
| | | id = VA_C01_S01_V03_ |
| | | name = |
| | | label = भावप्रकाशः |
| | | text = <p class="gr-vyakhya-para">तत्किमित्यादि। अत्रोत्तरोत्तरविकल्पकरणे पूर्वपूर्वविकल्पेषु वक्ष्यमाणदूषणान्येवास्वरसबीजानीति ज्ञातव्यम्।। अविद्येति। अविद्यात्वं मिथ्यात्वमित्युक्तेऽविद्याया एव मिथ्यात्वप्राप्त्या प्रपञ्चे तदभावादव्याप्तिः स्यादतस्तत्कार्यग्रहणम्। तत्कार्यत्वं मिथ्यात्वमित्युक्ते प्रपञ्चेऽविद्याकार्यत्वसद्भावेऽप्यविद्यायां तदभावादव्याप्तिः स्यादतोऽविद्याग्रहणम्। अननुगमपरिहारायान्यतरग्रहणमिति द्रष्टव्यम्।। स्वात्यन्ताभावेति। स्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणत्वमित्येवोक्ते व्याघातः स्यात्। प्रतियोगितदत्यन्ताभावयोरेकाधिकरणत्वायोगादतः प्रतीयमानत्वमित्युक्तम्। तथा च प्रतियोग्यधिकरणतया भ्रान्तिसिद्धस्य वस्तुनोऽत्यन्ताभावाधिकरणत्वोपपत्तेर्न व्याघातः। तथा च प्रतीयमानाधिकरणनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वमिति यावत्। प्रतिपन्नोपाधौ त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वे तात्पर्यम्। घटस्य तन्त्वादिरूपे पटोपाधावत्यन्ताभावः सर्वसम्मत एव। यस्मिन्मृदाद्युपाधौ स्वयं प्रतीयते तत्रापि तदत्यन्ताभावसाधने मिथ्यात्वमेव सिध्यतीति भावः।। विकल्पेति।। विकल्पस्य सहं न भवतीति विकल्पासहस्तस्य भावस्तत्त्वं तस्मादित्यर्थः।</p> |
| | }}</div></div></div> |
| | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयभङ्गः"></span> |
| | == द्वितीयभङ्गः == |
| | {{Bhashyam |
| | | verse_id = VA_C02_S01 |
| | | id = VA_C02_S01_B01 |
| | | text = मूलम्-तथा हि। अनिर्वचनीयत्वं किं निर्वचनविरहो वा निर्वाच्यविरहो वा। नाद्यः। स्वाभ्युपगतव्यवहारविषयत्वविरोधात्। द्वितीये सत्वविरहो वाऽसत्त्वविरहो वा। नाद्यः। असतोऽनिर्वाच्यतापातात्। नोत्तरः। ब्रह्मणोऽनिर्वाच्यतापातात्। अथ सदसद्वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वमिति मतं तदाऽस्माभिर्जगतः सदसद्रूपताऽनभ्युपगमात्सिद्धसाधनता। अथ प्रत्येकमुभयवैलक्षण्यं विवक्षितं तथाऽप्यसद्ब्रह्मवैलक्षण्याभ्युपगमेन प्रस्तुतदोषानिस्तारः। एतेन सदसत्त्वानधिकरणत्वमनिर्वचनीयत्वमित्यपास्तम्।प्रत्येकं सदसत्त्वाभ्यां विचारपदवीं न यत्। गाहते तदनिर्वाच्यमाहुर्वेदान्त (वादिन) वेदिनः।।इति चेन्न। तादृशवस्तुनोऽ(प्र)सिद्धत्वेनाप्रसिद्धविशेषणत्वात्। असत्त्वविरहे सत्त्वस्य सत्त्वविरहेऽसत्त्वस्य (निपतितत्वे) नियतत्वेनोभयविरहितत्वं व्याहतमेव। |
| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C01_S01_V03">
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| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-तत्किमनिर्वचनीयत्वं वा असत्त्वं वा सद्विविक्तत्वं वा प्रमाणाविषयत्वं वा अप्रमाणविषयत्वं वा अविद्यातत्कार्ययोरन्यरत्वं वा स्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणतया प्रतीयमानत्वं वा। नाद्यः। विकल्पासहत्वात्।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C01_S01_V03 | | | verse_id = VA_C02_S01 |
| | id = VA_C01_S01_V03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C02_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-ननु निषेधसमुच्चयस्य तात्त्विकत्वानभ्युपगमान्न व्याघातः। तत्तत्प्रतियोगिदुर्निरूपतामात्रप्रकटनाय तत्तद्विलक्षणताभिलापादिति चेन्न। तथा सति तस्यानिर्वचनीयतापातात्। यथा खलु सत्त्वासत्त्वे भवन्मते दुर्निरूपत्वान्न जगतो विद्येते तथाऽनिर्वचनीयताया अपि दुर्निरूपत्वेन तदभावो ध्रुवः स्यात्। असत्त्वविरहे सत्त्वसमित्यादिव्याप्त्यसिद्धेर्न व्याहतिरिति चेन्न। आत्मादौ व्याप्तिसम्भवात्। |
| | }} |
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| <p class="gr-vyakhya-para">तत्किमित्यादि। अत्रोत्तरोत्तरविकल्पकरणे पूर्वपूर्वविकल्पेषु वक्ष्यमाणदूषणान्येवास्वरसबीजानीति ज्ञातव्यम्।। अविद्येति। अविद्यात्वं मिथ्यात्वमित्युक्तेऽविद्याया एव मिथ्यात्वप्राप्त्या प्रपञ्चे तदभावादव्याप्तिः स्यादतस्तत्कार्यग्रहणम्। तत्कार्यत्वं मिथ्यात्वमित्युक्ते प्रपञ्चेऽविद्याकार्यत्वसद्भावेऽप्यविद्यायां तदभावादव्याप्तिः स्यादतोऽविद्याग्रहणम्। अननुगमपरिहारायान्यतरग्रहणमिति द्रष्टव्यम्।। स्वात्यन्ताभावेति। स्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणत्वमित्येवोक्ते व्याघातः स्यात्। प्रतियोगितदत्यन्ताभावयोरेकाधिकरणत्वायोगादतः प्रतीयमानत्वमित्युक्तम्। तथा च प्रतियोग्यधिकरणतया भ्रान्तिसिद्धस्य वस्तुनोऽत्यन्ताभावाधिकरणत्वोपपत्तेर्न व्याघातः। तथा च प्रतीयमानाधिकरणनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वमिति यावत्। प्रतिपन्नोपाधौ त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वे तात्पर्यम्। घटस्य तन्त्वादिरूपे पटोपाधावत्यन्ताभावः सर्वसम्मत एव। यस्मिन्मृदाद्युपाधौ स्वयं प्रतीयते तत्रापि तदत्यन्ताभावसाधने मिथ्यात्वमेव सिध्यतीति भावः।। विकल्पेति।। विकल्पस्य सहं न भवतीति विकल्पासहस्तस्य भावस्तत्त्वं तस्मादित्यर्थः।</p>
| | {{Bhashyam |
| | | verse_id = VA_C02_S01 |
| | | id = VA_C02_S01_B03 |
| | | text = मूलम्-तत्रात्मत्वप्रयुक्तं सत्त्वमिति चेत्किं तदात्मत्वम्। घटादिव्यावृत्ताऽऽत्मवृत्तिर्जातिर्वा किंवा सत्त्वं उताबाध्यत्वं ज्ञानत्वं वा ज्ञानाधारत्वं वा स्वप्रकाशत्वं वा आत्मपदावाच्यत्वं वा तल्लक्ष्यत्वं वा। नाद्यः। आत्मन एकत्वेन तत्र जातेरयोगात्। कल्पितात्मभेदसद्भावान्नैवमिति चेन्न। कल्पितात्मनां पक्ष(कुक्षि)निक्षिप्ततया तस्यानुपाधित्वात्। न द्वितीयः। साध्यविशिष्टत्वात्। |
| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 2 ==
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C02_S01_B01">
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| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-तथा हि। अनिर्वचनीयत्वं किं निर्वचनविरहो वा निर्वाच्यविरहो वा। नाद्यः। स्वाभ्युपगतव्यवहारविषयत्वविरोधात्। द्वितीये सत्वविरहो वाऽसत्त्वविरहो वा। नाद्यः। असतोऽनिर्वाच्यतापातात्। नोत्तरः। ब्रह्मणोऽनिर्वाच्यतापातात्। अथ सदसद्वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वमिति मतं तदाऽस्माभिर्जगतः सदसद्रूपताऽनभ्युपगमात्सिद्धसाधनता। अथ प्रत्येकमुभयवैलक्षण्यं विवक्षितं तथाऽप्यसद्ब्रह्मवैलक्षण्याभ्युपगमेन प्रस्तुतदोषानिस्तारः। एतेन सदसत्त्वानधिकरणत्वमनिर्वचनीयत्वमित्यपास्तम्।प्रत्येकं सदसत्त्वाभ्यां विचारपदवीं न यत्। गाहते तदनिर्वाच्यमाहुर्वेदान्त (वादिन) वेदिनः।।इति चेन्न। तादृशवस्तुनोऽ(प्र)सिद्धत्वेनाप्रसिद्धविशेषणत्वात्। असत्त्वविरहे सत्त्वस्य सत्त्वविरहेऽसत्त्वस्य (निपतितत्वे) नियतत्वेनोभयविरहितत्वं व्याहतमेव।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C02_S01_B01 | | | verse_id = VA_C02_S01 |
| | id = VA_C02_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C02_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्-न तृतीयः। असति व्यभिचारात्। तस्यापि बाध्यत्वे नासत्त्वस्यास्ति बाधकमित्यात्मवचनविरोधात्। न चतुर्थः। पक्षैकदेशाव्यावृत्तेः न पञ्चमः। आत्मन्यभावात्। तद्वतस्तस्य पक्षनिक्षेपात्। न षष्ठः। स्वप्रकाशताया उपर्यपाकार्यत्वात्। न सप्तमः। आत्मन्यभावात्। नान्त्यः। पक्षाव्यावृत्तेः।। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">द्वितीयभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">निर्वचनशब्दात्तस्सम्बन्धीत्यर्थे छप्रत्यये तस्येयादेशे निर्वचनीयमिति भवति। तदीयं मदीयमित्यादिवत्। निर्वचनसम्बन्धित्वं चात्र तद्विषयत्वं विवक्षितम्। तथा चार्निर्वचनीयत्वं नाम निर्वचनविषयत्वाभावः। तत्र किं विशेषणभूतं यन्निर्वचनं वच परिभाषण इति धातेर्नितरामुक्तिस्तद्विरहोऽभिप्रेत उत तद्विषयरूपनिर्वाच्यविरह इति विकल्पयति।। निर्वचनविरह इत्यादिना।। व्यवहारेति।। इदं रूप्यमित्यादिव्यवहारेत्यर्थः। तथा च व्यवहारस्यैवाभावे व्यवहारविषयत्वाभ्युपगमो विरुद्व इति भावः। तथा च लक्षणस्यासम्भव इति ज्ञातव्यम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">द्वितीये निर्वाच्यत्वं किं विवक्षितं सत्त्वमसत्त्वं वा यद्विरहोऽनिर्वाच्यत्वमित्याशयेन विकल्प्य दूषयति।। द्वितीय इत्यादिना।। ब्रह्मण इति।। निर्वचनविषयरूपासत्त्वविरहस्य ब्रह्मण्यपि सत्त्वादित्यर्थः। सदसद्वैलक्षण्यमित्यत्र सच्च तदसच्च सदसत्तद्वैलक्षण्यमिति विवक्षितम्। यद्वा सच्चासच्च सदसती द्वन्द्वान्न्ते श्रूयमाणो वैलक्षण्यशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते। तथा च सद्वैलक्षण्यमसद्वैलक्षण्यमित्युभयवैलक्षण्यं विवक्षितमिति विकल्प्याद्ये सदेकस्वभावस्य जगतः सदसद्रूपतानङ्गीकारत्तद्वैलक्षण्यसाधने सिद्धसाधनतेत्याह।। तदेति। तर्हित्यर्थः। द्वितीयं शङ्कते।। अथेति। प्रस्तुतदोषः सिद्धसाधनता। सद्वैलक्षण्यसाधने सद्ब्रह्म तद्वैलक्षण्याभ्युपगमात्सिद्धसाधनता। असद्वैलक्षण्यसाधनेऽपि तद्वैलक्षण्यस्याप्यस्माभिरप्यभ्युपगमात्सिद्धसाधनतैवेत्यर्थः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">एतेनेति। सच्च तदसच्च सदसत्तत्त्वानधिकरणत्वं विवक्षितं चेत्तर्हि सदेकस्वभावस्य जगतः सदसत्त्वानभ्युपगमात्तदनधिकरणत्वसाधने सिद्धसाधनता। सच्चासच्च सदसती। द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणस्त्वप्रत्ययः प्रत्येकमभिसम्बध्यते। तथा च सत्वानधिकरणत्वमसत्त्वानधिकरणत्वमिति प्रत्येकमुभयानधिकरणत्वसाधने सत्त्वं ब्रह्मत्वं तदनधिकरणत्वस्यासत्त्वानधिकरणत्वस्य च जगतोऽस्माभिरप्यभ्युपमात्सिद्धसाधनत्वमिति प्रस्तुतदूषणेनेत्यर्थः ।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">शङ्कते।। प्रत्येकमिति। सत्त्वेन प्रकारेण विचारागोचरत्वे सत्यसत्त्वेन प्रकारेण विचारागोचरत्वमित्यर्थः। विचारपदवीं विचारमार्गं न गाहते न प्राप्नोतीति यावत्। तथा च सत्त्वेन विचारागोचरत्वमसत्त्वेन च विचारागोचरत्वरूपमनिर्वचनीयत्वमेव मिथ्यात्वमभिप्रेतमिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तादृशवस्तुन इति। सत्त्वेन विचारागोचरस्यासत्त्वेन विचारागोचरस्य वस्तुन इत्यर्थः।। नियतत्वेनेति। परस्परविरुद्धयोरन्यतरनिषेधस्यान्यतरविधिनाऽन्तरीयकत्वादित्यर्थः।। उभयविरहितत्वमिति। सत्त्वासत्त्वोभयविरहितत्वं सदसद्वैलक्षण्यमिति यावत्। प्राप्तमित्यर्थः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-ननु निषेधसमुच्चयस्य तात्त्विकत्वानभ्युपगमान्न व्याघातः। तत्तत्प्रतियोगिदुर्निरूपतामात्रप्रकटनाय तत्तद्विलक्षणताभिलापादिति चेन्न। तथा सति तस्यानिर्वचनीयतापातात्। यथा खलु सत्त्वासत्त्वे भवन्मते दुर्निरूपत्वान्न जगतो विद्येते तथाऽनिर्वचनीयताया अपि दुर्निरूपत्वेन तदभावो ध्रुवः स्यात्। असत्त्वविरहे सत्त्वसमित्यादिव्याप्त्यसिद्धेर्न व्याहतिरिति चेन्न। आत्मादौ व्याप्तिसम्भवात्।</span>
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| | verse_id = VA_C02_S01_B02 | | | verse_id = VA_C02_S01 |
| | id = VA_C02_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C02_S01_B05 |
| | text = | | | text = मूलम्-न च वाच्यमात्मादौ न विकल्पोऽवकल्पने तस्य तवापि सिद्धत्वादिति। अस्माभिरुक्तप्रकारान्यतरस्वीकारेऽपि त्वन्मते दोषग्रासानिस्तारात्। तस्मादसत्त्वविरहे सत्त्वमित्यादिव्याप्तिसिद्धेरुभयविरहित्वं व्याहतमेवेति सिद्धम्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। तात्त्विकत्वेति।। सत्त्वासत्त्वनिषेधसमुच्चयद्वयस्य तात्त्विकत्वाङ्गीकारे ह्यसत्त्वविरहे सत्त्वस्येत्याद्युक्तरीत्या व्याहतिः स्यान्न चैवमिति भावः। व्याघाताभावमेवोपपादयति।। तत्तदिति। सद्वैलक्षण्य प्रतियोगिभूतं सत्त्वमसद्वैलक्षण्यप्रतियोगिभूतं चासत्त्वं दुर्निरूपमित्यत्रैव तदुभयवैलक्षण्योक्तेस्ताप्तर्यं न तु तस्यानिर्वचनीयलक्षणत्व इत्यर्थः। तथा च जगतः सत्त्वासत्त्वे दुर्निरूपे इत्येवोच्यमानत्वान्न व्याघात इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तथा सतीति।। सत्त्वासत्त्वयोर्दुर्निरूपत्वाज्जगति ते न स्त इत्यभिप्राये सतीत्यर्थः। तस्य जगतः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तदुपपादयति।। यथा खलु सत्त्वासत्त्वे भवन्मत इति। तदभावोऽनिर्वचनीयत्वाभावो ध्रुवो नियतः स्यात्। जगत इति शेषः। इत्यादीत्यादिपदेन सत्त्वविरहे चासत्त्वमित्यस्य ग्रहणम्। व्याप्त्यसिद्धेरिति। उभयत्र दृष्टान्ताभावादिति भावः। तथा च नियतत्वेनेति प्रागुक्तमसदिति भावः। आत्मादावित्यादिपदेन शशविषाणाद्यसद्ग्रहणम्। तथा चासत्त्वविरहे सत्त्वमित्यत्रात्मा दृष्टान्तः सत्त्वविरहे चासत्त्वमित्यत्र शशविषाणादिकं दृष्टन्त इति भावः।</p>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C02_S01_B03"> | | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयभङ्गः"></span> |
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| | == तृतीयभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-तत्रात्मत्वप्रयुक्तं सत्त्वमिति चेत्किं तदात्मत्वम्। घटादिव्यावृत्ताऽऽत्मवृत्तिर्जातिर्वा किंवा सत्त्वं उताबाध्यत्वं ज्ञानत्वं वा ज्ञानाधारत्वं वा स्वप्रकाशत्वं वा आत्मपदावाच्यत्वं वा तल्लक्ष्यत्वं वा। नाद्यः। आत्मन एकत्वेन तत्र जातेरयोगात्। कल्पितात्मभेदसद्भावान्नैवमिति चेन्न। कल्पितात्मनां पक्ष(कुक्षि)निक्षिप्ततया तस्यानुपाधित्वात्। न द्वितीयः। साध्यविशिष्टत्वात्।</span>
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| </div>
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| | id = VA_C02_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C03_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम् किञ्च न सदसद्विलक्षणत्वे मानम्। विवादपदं सदसद्विलक्षणमिति प्रतिज्ञायां पक्षस्याप्रसिद्ध विशेषणत्वप्रसङ्गात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">तत्रेति। दृष्टान्तभूते आत्मनीत्यर्थः।। प्रयुक्तमिति। सत्त्वे आत्मत्वं प्रयोजकमित्यर्थः। तथा च जगत्सद्भवितुमर्हति असत्त्वशून्यत्वादात्मवदित्यत्रात्मत्वमुपाधिरिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">किं तदात्मत्वमिति। यत्सत्त्वे प्रयोजकत्वेनोच्यत इत्यर्थः।। घटादिव्यावृत्तेति। घटाद्यवृत्तित्वे सत्यात्मवृत्तिजातिरात्मत्वमित्यर्थः। आत्मवृत्तिधर्म आत्मत्वमित्युक्ते प्रमेयत्वादावतिव्याप्तिः स्यादतो जातिरित्युक्तम्। तथात्वे सत्ताद्रव्यत्वयोरतिव्याप्तिः स्यादतः सत्यन्तम्। तावत्युक्ते शशविषाणादावतिव्याप्तिः स्यादतो विशेष्यभागः। बुद्धिसुखदुःखेच्छादवतिव्याप्तिपरिहाराय जातिपदमिति द्रष्टव्यम्। तल्लक्ष्यत्वमात्मपदलक्ष्यत्वम्।। जातेरयोगादिति। अनेकानुगतत्वाभावेन नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यमिति तल्लक्षणाभावान्नात्मत्वं जातिरिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">कल्पितेति। कल्पितानां विशिष्टात्मनामित्यर्थः। तथा चानेकानुगतत्वप्राप्त्या युक्तमात्मत्वस्य जातित्वमिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अनुपाधित्वादिति। पक्षैकदेशाव्यावृत्तत्वेन साधनव्यापकत्वान्नात्मत्वस्योपाधित्वमिति भावः। तथा च जगत्सन्न भवति। अनात्मत्वादित्येवमुपाधिव्यावृत्त्या साध्यव्यावृत्तिसाधनरूपसत्प्रतिपक्षोन्नयने भागासिद्धिरिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">साध्याविशिष्टत्वादिति। साध्येनाविशिष्टत्वादविलक्षणत्वात्तदभिन्नत्वादित्यर्थः। असत्त्वविरहेण सत्त्वे साध्ये सत्त्वरूपात्मत्वस्योपाधित्वोक्तावुपाधेः साध्याभेदः स्पष्टः। न हि स्वस्मिन्स्वयमेवोपाधिः प्रयोज्यप्रयोजकभावस्य भेदव्याप्तत्वादित्यर्थः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न तृतीयः। असति व्यभिचारात्। तस्यापि बाध्यत्वे नासत्त्वस्यास्ति बाधकमित्यात्मवचनविरोधात्। न चतुर्थः। पक्षैकदेशाव्यावृत्तेः न पञ्चमः। आत्मन्यभावात्। तद्वतस्तस्य पक्षनिक्षेपात्। न षष्ठः। स्वप्रकाशताया उपर्यपाकार्यत्वात्। न सप्तमः। आत्मन्यभावात्। नान्त्यः। पक्षाव्यावृत्तेः।।</span>
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| | id = VA_C02_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C03_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-सत्त्वासत्त्वे एकवस्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगिनी धर्मत्वाद्रूपरसवदित्यनुमाने वस्तुशब्दस्य सच्छब्दपर्यायत्वात्सत्त्वं सन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगीति व्याघातः। प्रमेयत्वाभिधेयत्वादावनैकान्तिकश्च। अविरुद्धत्वमुपाधिश्च। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">असति व्यभिचारादिति। समव्याप्तस्याप्युपाधित्वं कैश्चिदङ्गीकृतम्। यथाऽऽहुः। साधनाव्यापकाः साध्यसमव्याप्ता ह्युपाधय इति। तथा च यत्राबाध्यत्वं तत्र सत्त्वमिति न समव्याप्तिः। असति व्यभिचारादित्यर्थः।। तस्यापीति। असतोऽपीत्यर्थः। तथा च समव्याप्तौ न व्यभिचार इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">नासत्त्वस्येति। अर्शआद्य जन्तत्वमङ्गीकृत्यासत्त्ववत इत्यर्थो द्रष्टव्यः। भवितृप्रधानो वा निर्देशः। तथा चासत इत्यर्थः। शुक्तिरजतादेर्बाध्यत्वं नात्र रजतमित्यादिबाधक प्रत्ययाधीनं दृष्टं तदिहाप्यसतः शशविषाणादेर्बाध्यत्वे प्रतियोग्यधिकरणतया प्रतिपन्नोपाधौ त्रैकालिकनिषेधप्रत्ययरूपबाधकेन भाव्यम्। न च तद्युज्यते। असतः प्रतिपन्नोपाधेरेवाभावेनोक्तबाधकप्रत्ययाभावादिति स्वयमेवोक्तत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">पक्षैकदेशेति। असत्त्वविरहरूपसाधनवति पक्षैकदेशवृत्तिज्ञाने ज्ञानत्वरूपात्मत्वव्यावृत्त्यभावेन साधनव्यापकत्वादित्यर्थः।। आत्मनीति।। शुद्धात्मनश्चिन्मात्रत्वेन ज्ञानरूपत्वेन ज्ञानाधारत्वाभावाल्लक्षणस्यासम्भव इत्यर्थः। उपाधेरात्मनि साध्याव्यापकतेति ज्ञातव्यम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">पननु नासम्भवो विशिष्टात्मनो ज्ञानाधारत्वादिति चेत्। तर्हि तस्य पक्षनिक्षिप्तत्वेन ज्ञानधारत्वरूपात्मत्वव्यावृत्त्यभावेन साधनव्यापकत्वादित्याह।। तद्वत इति। ज्ञानाधारत्वरूपात्मत्ववतो विशिष्टस्येत्यर्थः। उपरि दृश्यत्वनिरुक्तिभङ्गे।। आत्मनीति।। चिदात्मनः शब्दवाच्यत्वेन तत्तच्छब्दप्रवृत्तिनिमित्तगुणवत्त्वप्राप्त्या केवलो निर्गुणश्चेति श्रुतिविरोधापत्तेः समस्तशब्दलक्ष्यत्वमेव तस्याङ्गीकृतं न वाच्यत्वम्। तथा चात्मपदवाच्यत्वरूपात्मलक्षणस्य चिदात्मन्यसम्भव इत्यर्थः।। पक्षाव्यावृत्तेरिति। आत्मपदलक्ष्यत्वस्य केवलान्वयित्वेन सर्वत्रापि पक्षे सत्त्वेन साधनव्यापकत्वादित्यर्थः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न च वाच्यमात्मादौ न विकल्पोऽवकल्पने तस्य तवापि सिद्धत्वादिति। अस्माभिरुक्तप्रकारान्यतरस्वीकारेऽपि त्वन्मते दोषग्रासानिस्तारात्। तस्मादसत्त्वविरहे सत्त्वमित्यादिव्याप्तिसिद्धेरुभयविरहित्वं व्याहतमेवेति सिद्धम्।</span>
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| | id = VA_C02_S01_B05_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C03_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च घटत्वाघटत्वे एकधर्मिनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगिनी धर्मत्वाद्रूपरसवदित्याभाससमानयोगक्षेमश्च। सच्चेन्न बाध्येतासच्चेन्न प्रतीयेतेत्यर्थापत्तिरेवानिर्वचनीये प्रमाणमिति चेन्न। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">।। आत्मादौ न विकल्प इत्यादि। नात्मत्वमस्माभिर्निर्वक्तव्यं भवतामपि सम्मतत्वात्। तथा च भवद्भिर्यदात्मत्वं निरुच्यते तदेवास्माभिरूपाधित्वेनोच्यत इत्यशयः।। उक्तप्रकारान्यतरेति। ज्ञानाधारत्वस्वप्रकाशत्वात्मपदवाच्यत्वरूपप्रकारेष्वन्यतरेष्वित्यर्थः। त्वन्मत इत्यतः पूर्वं त्वया तदङ्गीकार इति शेषः। दोषेति। उक्तरीत्येर्थः। आत्मत्वस्यानुपाधित्वे प्रकृते किमायातमित्यतस्तदुपयोगं दर्शयन्नुपसंहरति।। तस्मादिति। आत्मत्वस्यानुपाधित्वेनासतत्वविरहस्य सत्त्वेन निरुपाधिकसम्बन्धसद्भावादित्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
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| == अध्याय 3 == | | <span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थः भङ्गः"></span> |
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| | == चतुर्थः भङ्गः == |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| |
| <span class="shloka-line">मूलम् किञ्च न सदसद्विलक्षणत्वे मानम्। विवादपदं सदसद्विलक्षणमिति प्रतिज्ञायां पक्षस्याप्रसिद्ध विशेषणत्वप्रसङ्गात्।</span>
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| </div>
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| | text = | | | text = मूलम्-सच्चेन्न बाध्येतेत्यत्र किमिदं सद्विक्षितं किं सत्तायुक्तमथाबाध्यमुत ब्रह्मस्वरूपम्। नाद्यः। सत्तायुक्तस्य प्रपञ्चस्य भवन्मते बाध्यतया यत्सत्तदबाध्यमिति व्याप्त्यसिद्धेः। न द्वितीयः। यदबाध्यं तदबाध्यमिति साध्याविशिष्टत्वात्। न तृतीयः। सिद्धसाधनत्वात्। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">तृतीयभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">। सदसद्विलक्षणे तादृशवस्तुसद्भावे विवादपदमित्यनुमाने बाध्यत्वादिति हेतुर्द्रष्टव्यः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-सत्त्वासत्त्वे एकवस्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगिनी धर्मत्वाद्रूपरसवदित्यनुमाने वस्तुशब्दस्य सच्छब्दपर्यायत्वात्सत्त्वं सन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगीति व्याघातः। प्रमेयत्वाभिधेयत्वादावनैकान्तिकश्च। अविरुद्धत्वमुपाधिश्च।</span>
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| </div>
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| | text = | | | text = मूलम्-असच्चेन्न प्रतीयेतेत्यत्रासतोऽसत्त्वेन प्रतीतिर्निषिध्यते सत्त्वेन वा। आद्येऽसद्व्यवहारलोपप्रसङ्गः द्वितीये भ्रान्तिव्यवहारलोपप्रसङ्गः। प्रकृतादन्यात्मना प्रतीतेरेव भ्रान्तित्वात्। तत्र चान्याकारस्यासतः सत्त्वेन प्रतिभासाङ्गीकारात्। तस्यानिर्वचनीयत्वं ब्रूम इति चेन्न। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">।। सत्त्वासत्त्व इति। तथा च सत्त्वासत्त्वयोरेकवस्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रातियोगित्वे साधिते सति यद्वस्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगिनी सत्त्वासत्त्वे तद्वस्तु सदसद्विलक्षणमेवायास्यतीति भावः। अत्र पक्षद्वयानुसारेण दृष्टान्तद्वयमित्याहुः। तन्न। अनित्ये वाङ्मनसी मूर्तत्वाद्धटवदित्याद्यभियुक्तप्रयुक्तानुमानेष्वपि दृष्टान्तद्वयप्रयोगप्रसङ्गात्। वस्तुतस्तु न तावदत्रैकान्त्याभावप्रतियोगित्वं साध्यतया विवक्षितम्। तथात्वे बाधापत्तेः। प्रतियोगिभेदेनाभावभेदात्सत्त्वा सत्त्वोभयप्रतियोगिकात्यन्न्ता भावस्यैकत्वायोगादतो द्वित्वावच्छिन्नात्यन्ताभावप्रतियोगित्वमेव साध्यतया विवक्षितमिति वक्तव्यम्। तत्र बाधाभावेऽपि रूपस्य रसस्य वैकस्यैव दृष्टान्तत्वे तस्यात्यन्ताभावद्वयप्रतियोगित्वाभावेन साध्यवैकल्य प्रसङ्गादतस्तदर्थं दृष्टान्तद्वयग्रहणमिति द्रष्टव्यम्। एकवस्तुनिष्ठेति पाठान्तरः। एकधर्मीति पाठे वस्तुशब्दस्येत्युत्तरग्रन्थासङ्गतिरिति ज्ञातव्यम्।। प्रमेयत्वेति। प्रमेयत्वादिधर्माणां केवलान्वयित्वेनात्यन्ता भावप्रतियोगित्वरूपसाध्याभावादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु व्यतिरेकिधर्मत्वादिति हेतुर्विशिष्यतेऽतो न प्रमेयत्वादावनैकान्तिकत्वमित्यत आह।। अविरुद्धत्वमिति। सहानवस्थानरूपविरोधाभावः सहावस्थानमित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु विरोधः परस्परविरहव्याप्यत्वरूपः परस्परविरहरूपश्च प्रसिद्धः। अत्र चाविरुद्धत्वं यदि परस्परविरहव्याप्यत्वाभावस्तदा गोत्वाश्वत्वादौ साध्याव्यापकता। तयोर्महिष्यादिनिष्ठत्यन्ताभावप्रतियोगित्वेऽपि परस्परविरहव्याप्यत्वात्। यदि च परस्परविरहरूपत्वाभावस्तदा रूपतद्ध्वंसादौ साध्याव्यापकता। तयोर्वाय्वादिनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वेऽपि परस्परविरहरूपत्वादिति चेन्न। तथा च परस्परविरहरूपत्वाभावस्यैव विवक्षितत्वाद्विरहश्चात्यन्ताभावः। तथा च परस्परात्यन्ताभावानात्मकत्वमुपाधिरिति न कश्चिद्दोषः। नन्वेवं सति साधनव्यापकोऽयमुपाधिः। अनिर्वचनीयरूपतृतीयकोट्यङ्गीकारवादिनो मम मते सत्त्वासत्त्वयोरपि परस्परात्यन्ताभावानात्मकत्वादिति चेन्न। अनिर्वचनीयार्थाप्रतीतेः प्रागविरोधाप्रतीतेः। तथा चानिर्वचनीयरूपतृतीयकोटिसिद्धौ सत्त्वासत्त्वयोरविरोधसिद्ध्या उपाधेः साधनव्यापकत्वसिद्धिस्तत्सिद्धौ निर्दुष्टानुमानेनानिर्वचनीयार्थसिद्धिरित्यन्योन्याश्रयः स्यादिति भावः। अत्र व्यतिरेकिधर्मत्वादिति हेतोर्घटत्वे व्यभिचारश्च द्रष्टव्यः। पटनिष्ठस्य घटत्वप्रतियोगिकात्यन्ताभावस्यैकत्वेन द्वित्वावच्छिन्नात्यन्ताभाव प्रतियोगित्वभावेन साध्याभावात्।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च घटत्वाघटत्वे एकधर्मिनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगिनी धर्मत्वाद्रूपरसवदित्याभाससमानयोगक्षेमश्च। सच्चेन्न बाध्येतासच्चेन्न प्रतीयेतेत्यर्थापत्तिरेवानिर्वचनीये प्रमाणमिति चेन्न।</span>
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| | id = VA_C03_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-तदपि किं प्रकृतेनैव रूपेण प्रतीयते भ्रान्तावन्याकारेण वा। आद्ये भ्रान्तिव्यवहारलोपप्रसङ्गः। द्वितीयेऽसतः सत्त्वेन प्रतीतिरनिवार्या। अथ तस्याप्यनिर्वचनीयत्वं मन्यसे तर्ह्यनवस्था। तथा च निर्णयदर्शनं दुःशकं प्रसज्येत। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।आभाससाम्यं चाह।। किञ्चिति। तथा च घटाघटविलक्षणं किमपिकिञ्चिद्वस्तु सिद्ध्येदित्याशयः।। आभासेति। सत्त्वासत्त्वे इत्युक्तानुमानप्रयोग इति शेषः। अन्यथा पुल्लिङ्गानुपपत्तिः। अप्राप्तदूषणप्राप्तिर्योगः प्राप्तदूषणस्य परिहारलक्षणं क्षेमः। आभासेनानुमानेन समानौ योगक्षेमौ यस्यासौ तथोक्तः। आभासानुमाननिष्ठानि दूषणानि त्वदीयानुमानेऽपि समानानि। तत्परिहारप्रकारश्चाभासानुमानेऽपि समान इत्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
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| == अध्याय 4 ==
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-सच्चेन्न बाध्येतेत्यत्र किमिदं सद्विक्षितं किं सत्तायुक्तमथाबाध्यमुत ब्रह्मस्वरूपम्। नाद्यः। सत्तायुक्तस्य प्रपञ्चस्य भवन्मते बाध्यतया यत्सत्तदबाध्यमिति व्याप्त्यसिद्धेः। न द्वितीयः। यदबाध्यं तदबाध्यमिति साध्याविशिष्टत्वात्। न तृतीयः। सिद्धसाधनत्वात्।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B01 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्-न द्वितीयः। अपदर्शनत्वात्। न तृतीयः। विचारागोचरत्वात्। तथा हि। काऽसौ सद्विविक्तता नाम। किं परजातिविरहोऽब्रह्मत्वं वाऽसत्त्वं वाऽबाध्येतरत्वं वा। नाद्यः। तेनापि जगति जातेरनिराकरणात्। न द्वितीयः। सिद्धसाधनत्वात्। न तृतीयः। अपसिद्धान्तात्। चतुर्थेऽपि ब्रह्मेतरत्वाभ्युपगमेन सिद्धसाधनत्वात्। अबाद्येतरत्वं नाम बाध्यत्वमिति चेन्न। बाध्यत्वानिरूपणात्। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">चतुर्थः भङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">।ख्यातिबाधान्यथाऽनुपपत्तिरेवानिर्वाचनीयार्थे मानमित्याशङ्कते।। सच्चेदिति।। सत्तायुक्तमिति। सत्ताजातियुक्तमित्यर्थः। यत्सत्सत्ताजातियुक्तम्। साध्यमापाद्यम्। अविशिष्टत्वात् आपादकस्येति शेषः। सच्चेदबाध्यं चेन्न बाध्येतेत्यापादने यदबाध्यं तदबाध्यमिति व्याप्तिर्न सम्भवति। आपाद्यापादकयोरेकत्वादित्यर्थः। सिद्धसाधनत्वादिति। सच्चेद्ब्रह्मस्वरूपं चेन्न बाध्येत। बाध्यते चेदम्। तस्माद्ब्रह्मस्वरूपं नेति विपर्ययपर्यवसाने सिद्धसाधनत्वप्रसङ्गादित्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-असच्चेन्न प्रतीयेतेत्यत्रासतोऽसत्त्वेन प्रतीतिर्निषिध्यते सत्त्वेन वा। आद्येऽसद्व्यवहारलोपप्रसङ्गः द्वितीये भ्रान्तिव्यवहारलोपप्रसङ्गः। प्रकृतादन्यात्मना प्रतीतेरेव भ्रान्तित्वात्। तत्र चान्याकारस्यासतः सत्त्वेन प्रतिभासाङ्गीकारात्। तस्यानिर्वचनीयत्वं ब्रूम इति चेन्न।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B02 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B05 |
| | text = | | | text = वादावलीतत्किमन्यथाज्ञातस्य सम्यग्ज्ञातत्वं प्रतिपन्नोपाधौ निषेधप्रतियोगित्वं वा। नाद्यः। सिद्धसाधनत्वात्। अस्माभिरपि सर्वमनिर्वचनीयमित्याद्यन्यथाज्ञातस्य जगतो यथावज्ज्ञातताभ्युपगमात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।असद्व्यवहारेति। व्यवहारस्य व्यवहर्तव्यज्ञानसाध्यत्वेनासतः प्रतीत्यभावेऽसदिति व्यवहार एव लुप्येतेत्यर्थः।। भ्रान्तिव्यवहारेति। भ्रान्तिरियमिति व्यवहारेत्यर्थः। तदुपपादयति।। प्रकृतादिति। इदन्त्वेन पुरतः प्रतीयमानाद्वास्तवाच्छुक्त्याकारादित्यर्थः। अन्यात्मना रजतात्मना। यथोक्तम्। असतः सत्त्वप्रतीतिः सतोऽसत्त्वेन प्रतीतिरित्यन्यथाप्रतीतेरेव भ्रान्तित्वादिति। ततोऽपि किमित्यत आह।। तत्र चेति। भ्रान्तावित्यर्थः। अन्यथाकारस्य रजताकारस्य। तथा चासतः सत्त्वेन प्रतीत्यभावेऽसतो रजताकारस्यापि सत्त्वेन प्रतिभासाभावापत्त्या भ्रान्तिव्यवहारोच्छेदप्रसङ्गः स्यादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु प्रतीयमानस्य रजताकारस्यासत्त्वं नोच्यते येन तस्य सत्यत्वेन प्रतीत्यङ्गीकारः स्यान्न चैवं किन्त्वित्यत आह ।। तस्येति। अनिर्वचनीयत्वं प्रातिभासिकत्वम्।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-तदपि किं प्रकृतेनैव रूपेण प्रतीयते भ्रान्तावन्याकारेण वा। आद्ये भ्रान्तिव्यवहारलोपप्रसङ्गः। द्वितीयेऽसतः सत्त्वेन प्रतीतिरनिवार्या। अथ तस्याप्यनिर्वचनीयत्वं मन्यसे तर्ह्यनवस्था। तथा च निर्णयदर्शनं दुःशकं प्रसज्येत।</span>
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| | id = VA_C04_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B06 |
| | text = | | | text = मूलम्द्वितीये किमेकदेशकालप्रतिपन्नस्य कालान्तरादौ निषेधप्रतियोगित्वमुत त्रिकालाखिलदेशनिषेधप्रतियोगित्वम्। नाद्यः। अंशे सिद्धसाधनत्वात्। रीत्यन्तरेणानित्यत्वादेरेवोक्तत्वात्। न द्वितीयः। नित्यसर्वगतयोः कालाकाशयोस्तादृशबाधप्रतिज्ञाने व्याघातात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।तदपीति। अनिर्वचनीयं रजतमपीत्यर्थः।। प्रकृतेनैव रूपेणेति। प्रातिभासिकत्वेनानिर्वचनीयत्वेनेत्यर्थः।। अन्याकारेण वेति। असत्त्वेन वेत्यर्थः। प्रातिभासिकवैलक्षण्येन व्यावहारिकत्वेनेति यावत्।। भ्रान्तीति। प्रातिभासिकं रजतं प्रातिभासिकत्वेनैव प्रतीयते चेत्का नाम भ्रान्तिः। उपलक्षणमेतत्। प्रवृत्त्यभावप्रसङ्गोऽपि द्रष्टव्यः। न हि प्रातिभासिकं क्वचिदनेनार्थक्रियासूपयुज्यमानं दृष्टं येन तथात्वं प्रतीत्यऽपि प्रवर्तेत ।। असतः सत्त्वेनेति। अयं भावः। प्रातिभासिके रजते यत्सत्त्वं व्यावहारिकत्वं प्रतीयते तत्किं सद्वाऽसद्वा। नाद्यः। रजतस्यानिर्वचनीयताऽनुपपत्तेः। न हि यस्य सत्त्वं सत्तदनिर्वचनीयमिति सम्भवति। न द्वितीयः। अनिर्वचनीये रजते प्रतीयमानं सत्त्वं यद्यसत्तदा प्रष्टव्यम्। किमसत्त्वेन प्रतीयते सत्त्वेन वा। नाद्यः। प्रवृत्त्यभावापत्तेः। न ह्यसदर्थक्रियासूपयुज्यमानं क्वचिदनेनोपलब्धं येन तथात्वं प्रतीत्यापि प्रवर्तेत। न द्वितीयः। असतः सत्त्वेन प्रतीतेरनिर्वार्यत्वादिति।। तस्यापीति। अनिर्वचनीये रजते प्रतीयमानस्य सत्त्वस्यापीत्यर्थः।। अनवस्थेति। तत्किमनिर्वचनीयत्वेन प्रतीयते सत्त्वेन वेत्यादि विकल्पापत्त्याऽनवस्थेत्यर्थः।। निर्णयेति। रजतस्यानिर्वचनीयत्वाव धारणमित्यर्थः। दुःशकमशक्यम्। त्वन्मत इति शेषः। यद्यप्यर्थतत्त्वावधारणमेव निर्णयः। निर्णयस्तर्कमानाभ्यामर्थतत्त्वावधारणमिति वचनात्। तथाऽपि दर्शनस्य पृथगुक्तत्वादर्थत्वमेव निर्णयपदेन ग्राह्यमिति द्रष्टव्यम्।</p>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न द्वितीयः। अपदर्शनत्वात्। न तृतीयः। विचारागोचरत्वात्। तथा हि। काऽसौ सद्विविक्तता नाम। किं परजातिविरहोऽब्रह्मत्वं वाऽसत्त्वं वाऽबाध्येतरत्वं वा। नाद्यः। तेनापि जगति जातेरनिराकरणात्। न द्वितीयः। सिद्धसाधनत्वात्। न तृतीयः। अपसिद्धान्तात्। चतुर्थेऽपि ब्रह्मेतरत्वाभ्युपगमेन सिद्धसाधनत्वात्। अबाद्येतरत्वं नाम बाध्यत्वमिति चेन्न। बाध्यत्वानिरूपणात्।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B04 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B07 |
| | text = | | | text = मूलम्-काचेयं प्रतिपन्नता नाम। प्रमाणप्रतिपन्नता भ्रान्तिप्रतिपन्नता वा। नाद्यः। प्रमाणप्रतिपन्नस्य त्रिकालाखिलदेशनिषेधप्रतियोगितासाधनेऽतिप्रसङ्गत्। द्वितीये वक्तव्यं कोऽयं निषेधः। अभाववेदनं सद्विविक्तत्ववेदनं वा। नाद्यः। अत्यन्तासत्त्वापातात्। न द्वितीयः। तस्यैवाद्याप्यनिरूपणात्। न चतुर्थः। विचारगोचरत्वात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। न द्वितीय इति। असत्त्वं मिथ्यात्वमिति द्वितीयः पक्षोऽपि न युक्त इत्यर्थः।। अपदर्शनत्वादिति। दर्शनं सिद्धान्तस्तद्विरुद्धत्वादित्यर्थः। जगतोऽसद्धैलक्षम्याङ्गीकारेण असत्त्वरूपमिथ्यात्वाङ्गीकारेऽपसिद्धान्त इति भावः। सद्धिविक्तत्वं मिथ्यात्वमिति तृतीयः पक्षः कुतो न युक्त इत्यत आह।। विचारेति। सत्तारूपा व्यापकजातिः सच्छब्दार्थ इत्यभिप्रेत्य परजातिविरह इत्युक्तम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु सद्विविविक्तत्वं नाम सत्ताजातिमद्भिन्नत्वमतः सत्ताजात्यनधिकरणत्वरूपः सत्ताविरहः सद्विविक्तत्वमिति कथं युक्तमिति चेत्। उच्यते। यत्र यत्प्रतियोगिकान्योन्याभावस्तत्र तत्प्रतियोगितावच्छेदकात्यन्ताभाव इत्येवं तत्प्रतियोगिकान्योन्याभावस्य तत्प्रतियोगितावच्छेदकात्यन्ता भावव्याप्तत्वेन जगति सत्ताजातिमद्विविक्तत्वोक्तौ तत्प्रतियोगिता वच्छेदकीभूता सत्ताजातिमतत्वकोटिनिविष्टा या सत्ताजातिः तदनधिकरणत्वरूपः सत्ताजातिविरहो लभ्यत एव। यथा वायौ रूपवदन्योन्याभावोक्तौ प्रतियोगितावच्छेदकीभूतरूपत्वकोटि निविष्टरूपात्यन्ताभावोऽपि लभ्यते तद्वदिति द्रष्टव्यम्। यद्वा परजातिविरह इत्यस्य सत्ताजातिमद्भिन्नत्वमेवार्थतया विवक्षितमिति न कश्चित्क्षुद्रोपद्रवः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">सच्छब्दार्थो ब्रह्मेत्यभिप्रेत्य तद्विविक्तत्वं नामाब्रह्मत्वमित्युक्तम्। ब्रह्मभिन्नत्वमित्यर्थः। सदबाध्यत्वमित्यभिप्रेत्याबाध्येतरत्वं वेत्युक्तम्।। तेनापीति। तथा चापसिद्धान्त इति भावः। सन्मात्रविलक्षणं चेत्सिद्धसाधनता ब्रह्मवैलक्षण्याङ्गीकारादिति तत्त्वोद्योतं मनसि निधायाह।। सिद्धसाधनत्वादिति।। ब्रह्मेतरत्वेति। अबाध्यं ब्रह्म तदितरत्वाभ्युप गमेनेत्यर्थः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">वादावलीतत्किमन्यथाज्ञातस्य सम्यग्ज्ञातत्वं प्रतिपन्नोपाधौ निषेधप्रतियोगित्वं वा। नाद्यः। सिद्धसाधनत्वात्। अस्माभिरपि सर्वमनिर्वचनीयमित्याद्यन्यथाज्ञातस्य जगतो यथावज्ज्ञातताभ्युपगमात्।</span>
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| </div>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B05 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B05_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B08 |
| | text = | | | text = वादावलीतथा हि। प्रमाणाविषयत्वं नाम यत्किञ्चित्प्रमाणाविषयत्वं वा प्रमाणमात्राविषयत्वं वा। नाद्यः। गन्धादेः श्रोत्राद्यविषयतासिद्ध्या सिद्धसाधनत्वात्। न द्वितीयः। ब्रह्मणोऽपि मिथ्यात्वापातात्। प्रमाणाविषयत्वे प्रपञ्चस्य तत्पक्षीकरणायोगाच्च। अतत्त्वावेदकप्रत्यक्षादिसिद्धतया पक्षीकरणमुपपन्नमिति चेन्न। प्रत्यक्षादेरतत्त्वावेदकत्वे मानाभावात्। विषयस्यासत्त्वादेव तत्सिद्धिरिति चेत्तदेव कुतः। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।सम्यग्ज्ञातत्वं सम्यग्विज्ञानविषयत्वम्। यथावत् पारमार्थिकत्वेन ।। प्रतिपन्नोपाधाविति। प्रतियोग्यधिकरणतया प्रतिपन्ने उपधावित्यर्थः। असत्यतिव्याप्तिपरिहारायेदं विशेषणम्। तस्य प्रतिपन्नोपाधेरेवाभावादिति ध्येयम्।</p>
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| }} | | }} |
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| <span class="shloka-line">मूलम्द्वितीये किमेकदेशकालप्रतिपन्नस्य कालान्तरादौ निषेधप्रतियोगित्वमुत त्रिकालाखिलदेशनिषेधप्रतियोगित्वम्। नाद्यः। अंशे सिद्धसाधनत्वात्। रीत्यन्तरेणानित्यत्वादेरेवोक्तत्वात्। न द्वितीयः। नित्यसर्वगतयोः कालाकाशयोस्तादृशबाधप्रतिज्ञाने व्याघातात्।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B06 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B06_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B09 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्चात्त्वावेदकं प्रमाणं चेति व्याघातः। अतत्त्वावेदकं प्रमाणं चेच्छुक्तिरजतज्ञानमपि प्रमाणं किन्न स्यात्। अतत्त्वावेदकत्वाविशेषात्। प्रमाणं चेन्नातत्त्वावेदकम्। अद्वैतवाक्यवत्। न पञ्चमः। सर्वमनिर्वचनीयं क्षणिकं ब्रह्माकार्यमित्याद्यप्रमाणविषयताभ्युपगमेन सिद्धसाधनत्वात्। भ्रमप्रतीतत्वं विवक्षिमिति चेत्। तथा सति तस्यासत्त्वेन सिद्धान्तविरोधः। न षष्ठः। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।कालान्तरादावित्यत्रादिपदेन देशान्तरसङ्ग्रहः।। त्रिकालेति। सार्वदैशिकसार्वकालिकानिषेधप्रतियोगित्वमित्यर्थः।। अंश इति। प्रकृत्यादिरूपं नित्यं जगद्विहाय घटाद्यनित्यजगदंशे निरुक्तबाध्यत्वाङ्गीकारादित्यर्थः। तदेव विवृणोति।। रीत्यन्तरेणेति। अनित्यत्वादेरित्यत्रादिपदेन परिच्छित्वग्रहणम्। तथा च विमतमनित्यमिति वक्तव्ये निरुक्तबाध्यत्वप्रतिज्ञानेन वाचो भङ्ग्या नित्यत्वादेरेवोक्तत्वादित्यर्थः। तत्रैकस्मिन्काले प्रतिपन्नस्य कालान्तरे निषेधेऽनित्यत्वस्यैकस्मिन्देशे प्रतिपन्नस्य देशान्तरे निषेधे परिच्छिन्नत्वस्यैव प्राप्तेरिति भावः।।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">नित्यसर्वगतयोरिति। कालः सदा सर्वत्रास्त्याकाशः सदा सर्वत्रास्तीति प्रतीत्या जगदन्तर्गतयोः कालाव्याकृताकाशयोरुभयोरपि प्रत्येकं नित्यत्वसर्वगतत्वयोः प्रमितत्वात्तयोरेतादृशबाध्यत्वप्रतिज्ञाने प्रमाणबाध इत्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-काचेयं प्रतिपन्नता नाम। प्रमाणप्रतिपन्नता भ्रान्तिप्रतिपन्नता वा। नाद्यः। प्रमाणप्रतिपन्नस्य त्रिकालाखिलदेशनिषेधप्रतियोगितासाधनेऽतिप्रसङ्गत्। द्वितीये वक्तव्यं कोऽयं निषेधः। अभाववेदनं सद्विविक्तत्ववेदनं वा। नाद्यः। अत्यन्तासत्त्वापातात्। न द्वितीयः। तस्यैवाद्याप्यनिरूपणात्। न चतुर्थः। विचारगोचरत्वात्।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B07 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B07_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B10 |
| | text = | | | text = वादावलीकेयमविद्या नाम। अनाद्यनिर्वाच्या वा अनादिभावरूपत्वे सति विज्ञानविलाप्या वा भ्रमोपादानं वा। नाद्यः। अनिर्वाच्यासिद्ध्याऽप्रसिद्धविशेषणत्वात्। आकाशादौ लक्षणस्यातिव्याप्तेश्च। ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यानादित्वानभ्युपगमान्नैवमिति चेत्। एवं तर्हि लक्षणस्यासम्भवः। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">।। का चेयमिति। उपाधेरिति शेषः।। प्रमाणप्रतिपन्नतेति। प्रतियोग्याधारत्वेन प्रमाणप्रतिपन्ने प्रमीयमाणे उपाधावित्यर्थः।। भ्रान्तीति। प्रतियोग्याधारत्वेन भ्रान्तिप्रतिपन्नोपाधावित्यर्थः।। प्रमाणप्रतिपन्नस्येति। प्रतियोग्याधारत्वेन प्रमाणप्रतिपन्ने उपाधावित्यर्थस्योपाधिनिष्ठतया प्रमाणप्रमितस्य प्रतियोगिन इति फलितार्थाभिप्रायेणैवमुक्तमित्यवसेयम्।। अतिप्रसङ्गादिति। आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। अनादिमध्यान्तम्।। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः। स एवाधस्तात्स एवोपरिष्ठादित्यादिप्रमाणैः सर्वदेशकालनिष्ठतया प्रमाणप्रमितस्य ब्रह्मणोऽपि त्रिकालाखिलदेशीयनिषेधप्रसङ्गादित्यर्थः। अभाववेदनं कालत्रये नास्तीति वेदनम्।। अत्यन्तासत्त्वेति। उपाधिनिष्ठतया भ्रान्तिप्रतिपन्नस्य प्रतियोगिनो जगतस्त्रिकालनिषेधसाधनेऽत्यन्तासत्त्वापत्त्याऽपसिद्धान्त इत्यर्थः।। तस्यैवेति। सद्विविक्तत्वस्यैवेत्यर्थः। तथा च सद्विविक्तत्वसिद्धौ सद्विविक्तत्ववेदनरूपनिषेधसिद्ध्या तत्प्रतियोगित्वरूपबाध्यत्व सिद्धिस्तत्सिद्धावबाध्येतरत्वापरपर्यायबाध्यत्व रूपसद्विविक्तत्वसिद्धिरित्यन्योन्याश्रय इत्यर्थः। प्रमाणाविषयत्वं मिथ्यात्वमिति चतुर्थः पक्षः कुतो न युक्त इत्यत आह।। विचारेति।।</p>
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| }} | | }} |
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| <span class="shloka-line">वादावलीतथा हि। प्रमाणाविषयत्वं नाम यत्किञ्चित्प्रमाणाविषयत्वं वा प्रमाणमात्राविषयत्वं वा। नाद्यः। गन्धादेः श्रोत्राद्यविषयतासिद्ध्या सिद्धसाधनत्वात्। न द्वितीयः। ब्रह्मणोऽपि मिथ्यात्वापातात्। प्रमाणाविषयत्वे प्रपञ्चस्य तत्पक्षीकरणायोगाच्च। अतत्त्वावेदकप्रत्यक्षादिसिद्धतया पक्षीकरणमुपपन्नमिति चेन्न। प्रत्यक्षादेरतत्त्वावेदकत्वे मानाभावात्। विषयस्यासत्त्वादेव तत्सिद्धिरिति चेत्तदेव कुतः।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B08 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B08_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B11 |
| | text = | | | text = मूलम्-न द्वितीयः। अनादित्वस्यासम्भवित्वात्। अनादिभावरूपस्य विज्ञानविलापनाऽसम्भवाच्च ब्रह्मवत्। भावाभावविलक्षणाविद्याया अभावविलक्षणतामात्रेण बावत्वोपचारादात्मवदनादिभावत्वेना निवर्त्यत्वानुमानानुपपत्तिरिति चेन्न। अभावविलक्षणतामात्रेणाप्यानादेर निवर्त्यत्वानुमानसम्भवात्। न चात्मत्वादिरुपाधिः। अत्यन्तासति व्यभिचारात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। गन्धादेरिति। पक्षीभूतविश्वान्तर्गतस्य गन्धादेरित्यर्थः।। आपातादिति। प्रमाणावेद्यत्वाङ्गीकारादित्यर्थः।। प्रमाणाविषयत्व इति। प्रमाणाविषयत्वरूपमिथ्यात्वसाधन इत्यर्थः।। तदिति। निरुक्तमिथ्यात्वसाधनं प्रतीत्यर्थः। आश्रयासिद्धिप्रसङ्गादिति भावः। असत्त्वमतत्त्वता। तत्सिद्धिः प्रत्यक्षादेरतत्त्वावेदकत्वसिद्धिः।। तदेवेति। विषयासत्त्वमेवेत्यर्थः। तथा च प्रत्यक्षादेरतत्त्वावेदकत्वसिद्धौ विषयासत्त्वासिद्धिर्विषयासत्त्वसिद्धौ प्रत्यक्षादेरतत्त्वावेदकत्व सिद्धिरित्यन्योन्याश्रयत्वादिति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्चात्त्वावेदकं प्रमाणं चेति व्याघातः। अतत्त्वावेदकं प्रमाणं चेच्छुक्तिरजतज्ञानमपि प्रमाणं किन्न स्यात्। अतत्त्वावेदकत्वाविशेषात्। प्रमाणं चेन्नातत्त्वावेदकम्। अद्वैतवाक्यवत्। न पञ्चमः। सर्वमनिर्वचनीयं क्षणिकं ब्रह्माकार्यमित्याद्यप्रमाणविषयताभ्युपगमेन सिद्धसाधनत्वात्। भ्रमप्रतीतत्वं विवक्षिमिति चेत्। तथा सति तस्यासत्त्वेन सिद्धान्तविरोधः। न षष्ठः।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B09 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B09_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B12 |
| | text = | | | text = मूलम्-न तृतीयः। भ्रमशब्देनार्थो ज्ञानं वा। नाद्यः। पदार्थस्यासत्त्वेन तदुपादानतया असम्भवात्। न द्वितीयः। अन्तःकरणेऽतिव्याप्तेः। भ्रमस्याविद्योपादानकताऽभावेनासम्भवित्वाच्च। तदनुपादानत्वे सत्यत्वं स्यादिति चेत्। स्यादेव। तथा सति प्रमाणज्ञानवदेव विषयापहारलक्षणबाधस्याप्यप्रसङ्ग इति चेन्न। तव व्याप्त्यसिद्धेः। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। प्रमाणं चेति। यतावस्थितज्ञेयविषयीकारित्वरूप प्रामाण्यस्यार्थसत्ताघटितत्वादिति भावः। तथा च प्रत्यक्षादेरतत्त्वावेदकत्वाङ्गीकारे प्रामाण्यमेव न सम्भवतीत्युक्त्वा प्रामाण्याङ्गीकारेऽतत्त्वावेदकत्त्वमेव न युक्तमित्याह।। प्रमाणं चेदिति।। अद्वैतवाक्यवदिति। यथा तत्त्वमसीत्याद्यद्वैतवाक्यस्य प्रमाणत्वेन तद्वेद्यस्यैक्यस्य नातत्त्वतैवं प्रकृतेऽपीत्यर्थः। यदिप्रमाणस्याप्यतत्त्वावेदकत्वमङ्गीक्रियते तर्ह्यद्वैतवाक्यस्याप्यतत्त्वावेदकत्व प्राप्त्य तद्बोध्यस्यैक्यस्याप्ययाथार्थ्यमतत्त्वता स्यादिति भावः। ब्रह्माकार्यं ब्रह्मविकारि। भ्रमप्रतीतत्वं भ्रमविषयत्वम्।। असत्त्वेनेति। असत्त्वप्रसङ्गेनेत्यर्थः। आरोप्यतया भ्रमविषयत्वस्यैवासत्त्वादिति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">वादावलीकेयमविद्या नाम। अनाद्यनिर्वाच्या वा अनादिभावरूपत्वे सति विज्ञानविलाप्या वा भ्रमोपादानं वा। नाद्यः। अनिर्वाच्यासिद्ध्याऽप्रसिद्धविशेषणत्वात्। आकाशादौ लक्षणस्यातिव्याप्तेश्च। ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यानादित्वानभ्युपगमान्नैवमिति चेत्। एवं तर्हि लक्षणस्यासम्भवः।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B10 | | | verse_id = VA_C04_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B10_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C04_S01_B13 |
| | text = | | | text = मूलम्-तत्त्वावेदकस्यापि त्वयाऽऽविद्यकत्वाभ्युपगमात्। एतावन्तं कालं रजतमभादित्यनुभवविरोधाच्च। अनिर्वचनीयस्यापि भ्रमस्याभावविलक्षणतया तथात्वेनानुसन्धानोपपत्तिरिति चेन्न। स्वरूपसत एवासीदिति प्रतिसन्धानात्। एतावन्तं कालमिहादर्शे मुखमासीत्। स्फटिकश्च लोहित आसीदित्याद्यनुसन्धानान्नैवमिति चेत्। एतावन्तं कालं मुखमद्राक्षमित्येवानुसन्धानेनानुसन्धानान्तरे विवादात्।। छ ।। अविद्यालक्षणनिरासः।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।अनादीति। प्रपञ्चे शुक्तिरजते चातिव्याप्तिवारणायानादीत्युक्तम्। ब्रह्मण्यतिव्याप्तिवारणायानिर्वाच्येत्युक्तमिति द्रष्टव्यम्।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अनादीति। ब्रह्मण्यतिव्याप्तिवारणाय विलाप्येत्युक्तम्। जीव ईशो विशुद्धा चिद्भेदस्तस्यास्तयोर्द्वयोः। अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमनादयः।। इति वचनात्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अनादिभूतचैतन्याविद्यासम्बन्धे सम्बन्धिन्यामविद्यायां निवृत्तायां स्वत एव निवृत्तमानेऽतिव्याप्तिवारणाय विज्ञानपदम्। तस्य च न विज्ञानविलाप्यत्वं साक्षात्किन्तु ज्ञानजन्याज्ञाननिवृत्तिविलाप्यत्वमेव। इह च साक्षादेव विज्ञानविलाप्यत्वं विवक्षितमिति नातिव्याप्तिः। भावरूपत्वे सति विलाप्यत्वं प्रपञ्चे शुक्तिरूप्ये उत्तरज्ञाननिवर्त्ये पूर्वज्ञाने चातिव्याप्तमतोऽनादीति। अनादित्वे सति विज्ञानविलाप्यत्वं ज्ञानप्राग भावेऽतिव्याप्तमतो भावरूपत्वे सतीत्युक्तमित्यवधेयम्।। भ्रमेति । उपादानत्वं मृत्पिण्डादावतिव्याप्तमतो भ्रमपदम्। भ्रम एवातिव्याप्तिवारणायोपादानपदम्। आकाशादावनिर्वाच्यत्व सद्भावेऽप्यनादित्वरूपविशेषणाभावान्नातिव्याप्तिरित्याशङ्कते।। ब्रह्मव्यतिरिक्तस्येति।। असम्भव इति। अविद्याया अपि ब्रह्मव्यतिरिक्तत्वेनानादित्वगर्भलक्षणाभावादसम्भव इत्यर्थः।</p>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C04_S01_B11"> | | <span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == पञ्चमभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न द्वितीयः। अनादित्वस्यासम्भवित्वात्। अनादिभावरूपस्य विज्ञानविलापनाऽसम्भवाच्च ब्रह्मवत्। भावाभावविलक्षणाविद्याया अभावविलक्षणतामात्रेण बावत्वोपचारादात्मवदनादिभावत्वेना निवर्त्यत्वानुमानानुपपत्तिरिति चेन्न। अभावविलक्षणतामात्रेणाप्यानादेर निवर्त्यत्वानुमानसम्भवात्। न चात्मत्वादिरुपाधिः। अत्यन्तासति व्यभिचारात्।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B11 | | | verse_id = VA_C05_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B11_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C05_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-अविद्यायां चैवंविधायां किं प्रमाणम्। देवदत्तप्रमा तत्स्थप्रमाप्रागभावातिरेकिणोऽनादेर्ध्वंसिका प्रमात्वादविगीतप्रमा यथेत्यनुमानं मानमिति चेन्न। घटोऽयमेतद्धटप्रागभावव्यतिरिक्तानादेर्निवर्तको घटत्वाद्वटान्तरवदित्याभाससमानयोगक्षेमत्वात्। एतेन विगीतो भ्रम एतज्जनकाबाध्यातिरिक्तोपादाननकः विभ्रमत्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति च निरस्तम्। अनादित्वप्रमानिवर्त्यत्वयोर्विरोधाच्च। देवदत्तप्रमा देवदत्तगतैतत्प्रमाप्रागभावातिनिक्तानादेर्निवर्तिका न भवति प्रमात्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति सत्प्रतिपक्षता च। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।असम्भवित्वादिति। अविद्यायाः प्रातिभासिकत्वेन दोषजन्यधीमात्रशरीरत्वादिति भावः। अनादीति। तथा चाज्ञानं न ज्ञानविलाप्यमनादिभावरूपत्वाद्ब्रह्मवदित्यनुमानं द्रष्टव्यम्। अत्र प्रपञ्चे व्यभिचारपरिहारायानादीति विशेषणम्। ज्ञानप्रागभावे व्यभिचारपरिहाराय भावरूपत्वादित्युक्तम्। शङ्कते।। भावाभावेति। भावात्वोपचारे बीजम् अभावविलक्षणतामात्रेणेति। भावभूते घटादावभाव विलक्षणतासद्भावादित्यर्थः। न ह्युपचारोऽनुमानप्रवृत्त्यङ्गम्। तथा सति चित्रलिखितसिंहे माणवके चोपचारेण सिंहाग्निशब्दसद्भावेन गजहननदहनाद्यर्थक्रियानुमानप्रसङ्गादित्यर्थः। आत्मवद्ब्रह्मवत्।। अभावेति। यद्भावत्वोपचारं बीजतयाऽङ्गीकृतं तन्मात्रेणापीत्यर्थः। तथा चाज्ञानं न ज्ञाननिवर्त्यमनादित्वे सत्यभावविलक्षणत्वाद्ब्रह्मवदित्येवानुमानं स्यादिर्थः। ज्ञाननिवर्त्यत्वाभावानुमाने उपाधिमाशङ्कते ।। न चेति।। आत्मत्वादिरित्यादिपदेन ब्रह्मत्वसङ्ग्रहः।। अत्यन्तासतीति। तत्र ज्ञाननिवर्त्यत्वाभावे सत्यप्यात्मत्वादेरभावेन साध्याव्यापकत्वादित्यर्थः।</p>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C04_S01_B12"> | | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठः भङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == षष्ठः भङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न तृतीयः। भ्रमशब्देनार्थो ज्ञानं वा। नाद्यः। पदार्थस्यासत्त्वेन तदुपादानतया असम्भवात्। न द्वितीयः। अन्तःकरणेऽतिव्याप्तेः। भ्रमस्याविद्योपादानकताऽभावेनासम्भवित्वाच्च। तदनुपादानत्वे सत्यत्वं स्यादिति चेत्। स्यादेव। तथा सति प्रमाणज्ञानवदेव विषयापहारलक्षणबाधस्याप्यप्रसङ्ग इति चेन्न। तव व्याप्त्यसिद्धेः।</span>
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| | verse_id = VA_C04_S01_B12 | | | verse_id = VA_C06_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B12_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C06_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-अथ प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषयावरणस्व निवर्त्यस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकं अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वात् अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीपप्रबावदित्यनुमानं मानमस्तु। अत्र च प्रमाणज्ञानं वस्त्वन्तरपूर्वकमित्युक्ते स्वप्रागभावेन सिद्धसाधनता। तन्निवृत्त्यर्थं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति पदम्। तथाऽपि स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वजनकसामग्रया सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वविषयावरणेति पदम्। तथाऽप्यदृष्टेन सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वनिवर्त्येति पदम्। अर्थान्तरनिवृत्तये आत्माश्रितदाज्ञानसिद्धये च स्वदेशेति पदमिति। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।अर्थज्ञानात्मकत्वोभयविधभ्रमस्य परेणाप्यङ्गीकृतत्वात्तदनुसारेण विकल्पयति।। भ्रमशब्देनेति। अर्थो रजतादिः।। पदार्थस्यासत्त्वेनेति। तथा चार्थरूपो भ्रमो निरुपादानोऽसत्त्वाच्छशशृङ्गवदित्यनुमानेन निरुपादानत्वसिद्धेरज्ञानेऽर्थरूपभ्रमोपादानताया असम्भवान्मद्रीत्यऽसम्भव इत्यर्थः। इदमुपलक्षणम्। अर्थरूपो भ्रमो निरुपादानः सद्विलक्षणत्वादज्ञानवदित्यनुमानेनाज्ञानेऽर्थरूपभ्रमोपादानत्वायोगात्त्वद्रीत्या चासम्भव इत्यपि द्रष्टव्यम् ।। अन्तःकरण इति। धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एवेति श्रुतेर्भ्रमशब्दवाच्याज्ञानोपादानताया अन्तःकरणेऽपि सत्त्वेन तत्रातिव्याप्तेरित्यर्थः।। भ्रमस्येति। भ्रमरूपज्ञानस्येत्यर्थः।। उपादानकतेति। उपादनकर्तेत्यर्थः। भ्रमरूपज्ञानस्य त्वन्मते ब्रह्मवत्सद्विलक्षणत्वेनाविद्योपादानकत्वाभावादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">असम्भवित्वादिति। भ्रमोपादानत्वलक्षणस्याविद्यायामसम्भव इत्यर्थः।। तदनुपादानत्व इति। अविद्योपादानकत्वाभाव इत्यर्थः।। सत्यत्वं स्यादिति। भ्रमरूपज्ञानस्वरूपस्येत्यर्थः।। तथा सतीति। ज्ञानस्य सत्यत्वे सतीत्यर्थः।। प्रमाणज्ञानवदेवेति। प्रमाणभूतायङ्घट इत्यादिज्ञानवदेवेत्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-तत्त्वावेदकस्यापि त्वयाऽऽविद्यकत्वाभ्युपगमात्। एतावन्तं कालं रजतमभादित्यनुभवविरोधाच्च। अनिर्वचनीयस्यापि भ्रमस्याभावविलक्षणतया तथात्वेनानुसन्धानोपपत्तिरिति चेन्न। स्वरूपसत एवासीदिति प्रतिसन्धानात्। एतावन्तं कालमिहादर्शे मुखमासीत्। स्फटिकश्च लोहित आसीदित्याद्यनुसन्धानान्नैवमिति चेत्। एतावन्तं कालं मुखमद्राक्षमित्येवानुसन्धानेनानुसन्धानान्तरे विवादात्।। छ ।। अविद्यालक्षणनिरासः।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C04_S01_B13 | | | verse_id = VA_C06_S01 |
| | id = VA_C04_S01_B13_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C06_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्नानेनानुमानेन त्वदभिमताज्ञानसिद्धिः। जडेऽज्ञानानभ्युपगमेनान्तःकरणवृत्तिलक्षणप्रमाणज्ञानानं तथाविधवस्तुपूर्वकत्वाभावेऽपि हेतोस्तत्र सद्भावादनैकान्तिकत्वात्। व्यर्थं च स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति विशेषणम्। स्वनिवर्त्यविशेषणेनैव तद्व्यावृत्तेः। न हि भावः स्वप्रागभावनिवर्तकः। अपि तु भावोत्पत्तिरेव तत्प्रागभावनिवर्तिका। भावाभावयोः सहावस्थानविरोधात्। अतः स्वनिवर्त्यविशेषणेनैव स्वप्रागभावव्यावृत्तेर्व्यर्थं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति विशेषणम्। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">।व्याप्त्यसिद्धिरित्युक्तमुपपादयति।। तत्त्वावेदकस्यापीति। तत्त्वावेदकशब्दोऽत्र रूढ्या प्रमाणपरोऽभिप्रेतः। तथाच प्रमाणभूतस्यापीत्यर्थः। सत्यभूतस्यापि साक्षिण इति यावत्। विषभूताज्ञानसुखादेरिति शेषः।। आविद्यकत्वेनेति। बाध्यत्वेति यावत्। यद्वा तत्त्वावेदकस्येत्यर्शआद्यजन्तम्। तत्सिद्धस्याज्ञानादेरित्यर्थः। तथा च ज्ञानस्य सत्यत्वेन तद्विषयस्याबाध्यत्वमिति व्याप्तिस्त्वन्मते न सिद्धा। ब्रह्मस्वरूपतया साक्षितद्वेद्यचैतन्यस्य सत्यत्वेऽपि तद्विषयस्य साक्षिरूपज्ञानस्य ज्ञानसुखादेः प्रातिभासिकस्य बाध्यत्वलाङ्गीकारेण त्वन्मते व्यभिचारादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">भ्रमरूपज्ञानस्याविद्योपादानकत्वेन मिथ्यात्वाङ्गीकारेऽनुभवविरोधं चाह।। एतावन्तं कालमिति।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">रजतमभादिति। रजतदज्ञानं ममासीदित्यर्थः। अयं चानुभवस्तार्किकमतेऽनुव्यवसायरूपः। अस्मन्मते तुसाक्षिरूपस्तेन च भ्रमरूपो ज्ञानस्वरूपस्यासीदिति सत्तावगाहनादित्यर्थः। नन्वासीदित्यनेन ज्ञानस्य सत्त्वं न विषयीक्रियते किन्नामासद्वैलक्षण्यमात्रमेवेत्याशङ्कते।। अनिर्वचनीयस्यापीति। सदसद्वैलक्षण्यस्यापीत्यर्थः।। अभावेति। न भवतीत्यभावोऽसन् तद्विलक्षणतयेत्यर्थः। असद्वैलक्षण्यमात्रेण सत्त्वानुसन्धाने चेति न्यायामृतोक्तेः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तथात्वेनेति। सत्त्वेनेत्यर्थः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">स्वरूपसत एवेति। रजतज्ञानं स्वरूपत एवासीदित्यनुसन्धीयते नासद्वैलक्षण्यमात्रेणेत्यर्थः। इदमुपलक्षणम्। असद्वैलक्षण्यमात्रेणासीदित्यनुसन्धाने सद्वैलक्षण्येन नासीदित्यप्यनुसन्धानापातात्। रजतस्याप्यसद्विलक्षणत्वेनैतावन्तं कालं रूप्यमासीदित्यप्यनुसन्धानापातादित्यपि द्रष्टव्यम्। नन्वारोपितस्याप्यर्थस्यासीदिति सत्त्वं क्वचिदनुसन्धीयत एव। आदर्शे मुखस्य स्फटिके लौहित्यस्यारोपितत्वेनैतावन्तं कालं ग्रीवास्थमेव मुखमिहादर्शे आसीत्। स्फटिकश्च लौहित आसीदित्यनुसन्धानदर्शनादित्याशङ्कते। एतावन्तं कालमिति।। नैवमिति। आसीदित्यनुसन्धानमात्रेण सत्यत्वमित्यर्थः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अनुसन्धानान्तर इति। इहादर्शे मुखमासीदित्येवंरूपानुसन्धान इत्यर्थः। इदमुपलक्षणम्। अस्तु वा मुखमासीदित्यनुसन्धानम्। तथाऽपि मुखप्रतिबिम्बमासीदित्यर्थकत्वात्। स्फटिके लौहित्यस्यापि प्रतिबिम्बत्वात् । तथा च प्रतिबिम्बस्य छायादिवत्सत्यत्वेन तत्रासीदित्यनुसन्धनं युक्तमेवेति द्रष्टव्यम्। यथोक्तं न्यायामृते। एतावन्तं कालमिहादर्शे मुखमासीदित्यनुसन्धानं तु प्रतिबिम्बस्य छायादिवत्सत्यत्वादिति।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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|
| == अध्याय 5 ==
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C05_S01_B01">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-अविद्यायां चैवंविधायां किं प्रमाणम्। देवदत्तप्रमा तत्स्थप्रमाप्रागभावातिरेकिणोऽनादेर्ध्वंसिका प्रमात्वादविगीतप्रमा यथेत्यनुमानं मानमिति चेन्न। घटोऽयमेतद्धटप्रागभावव्यतिरिक्तानादेर्निवर्तको घटत्वाद्वटान्तरवदित्याभाससमानयोगक्षेमत्वात्। एतेन विगीतो भ्रम एतज्जनकाबाध्यातिरिक्तोपादाननकः विभ्रमत्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति च निरस्तम्। अनादित्वप्रमानिवर्त्यत्वयोर्विरोधाच्च। देवदत्तप्रमा देवदत्तगतैतत्प्रमाप्रागभावातिनिक्तानादेर्निवर्तिका न भवति प्रमात्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति सत्प्रतिपक्षता च।</span>
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| | verse_id = VA_C05_S01_B01 | | | verse_id = VA_C06_S01 |
| | id = VA_C05_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C06_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च सत्यतथाविधवस्तुपूर्वकत्वे साध्ये सिद्धसाधनम्। अनिर्वचनियतथाविधवस्तुपूर्वकत्वे साध्ये साध्यविकलो दृष्टन्तः। अविशेषिततथाविधवस्तुपूर्वकत्वे साध्येऽप्रसिद्धविशेषणता। प्रामाणिकाप्रामाणिकयोः साधारणधर्मस्याप्यप्रामाणिकत्वात्। अनिर्वचनीयस्य केनापि प्रमाणेनाप्रमितत्वात्। न हि शशविषाणगोविषाण योर्विषाणत्वसामान्यमस्ति। ज्ञानप्रतिबन्धकपापस्यसिद्धतया सिद्धसाधनत्वं च। ज्ञाननिवर्त्यत्वात्तस्यापि। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">पञ्चमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। अविद्यायां चेति। चशब्दः प्रकृतत्वानुसन्धानार्थः। तदेव दर्शयति।। एवंविधायामिति। उक्तलक्षणलक्षितायामित्यर्थः। यद्वा वस्तुसिद्धेर्लक्षणप्रमाणाधीनत्वेन लक्षणासम्भवेन तदसिद्धिमुक्त्वा प्रमाणाभावेनापि तदसिद्धिं वक्तुं पृच्छति।। एवंविधायामविद्यायां प्रमाणं च किमिति। इत्येवं चशब्दो भिन्नक्रमेण योज्यः। यद्वा किमित्याक्षेपः। तथा च न केवलं किमपि लक्षणं नास्तीति किन्नाम प्रमाणं च किमस्ति न किमपीत्यर्थः। एतदसहमानस्तत्त्वप्रदीपोक्तमनुमानप्रमाणमाशङ्कते।। देवदत्तप्रमेति। देवदत्तगतप्रमेत्यर्थः।। तत्स्थेति। देवदत्तगतेत्यर्थः। अतिरेकिणोऽतिरिक्तस्य। मात्वात्प्रमात्वात्। अविगीतप्रमा यज्ञदत्तप्रमा। अत्र पक्षे प्रागभावातिरिक्तानाद्यज्ञानमादाय साध्यसिद्धिर्दृष्टान्ते तु देवदत्तीय प्रमाप्रागभावातिरिक्तयज्ञदत्तीयप्रमाप्रागभावमादायेति द्रष्टव्यम्। दृष्टन्त इव पक्षेऽपि साध्यपर्यवसानेनार्थान्तरशङ्का तु बाधादेव तु न युक्ता। अत्र प्रमामात्रपक्षीकारे यज्ञदत्तप्रमाया अपि प्राप्त्या तस्यां च देवदत्तगतप्रमाप्रागभावातिरिक्तानादिभूतयज्ञदत्त प्रमाप्रागभावनिवर्तकत्वस्य सिद्धत्वात्सिद्धसाधनता स्यादतो देवदत्तप्रमेत्युक्तम्। साध्ये तत्स्थे देवदत्तगतेति विशेषणत्यागेऽप्रसिद्धिः स्यात्। दृष्टान्तभूतयज्ञदत्तप्रमायाम बावातिरिक्तानादिनिवर्तकत्वस्य प्रतिवादिनोऽसम्मतत्वात्। अतो देवदत्तगतेत्युक्तम्। देवदत्तगतानादेर्ध्वंसिकेत्येवोक्तौ देवदत्तप्रमाया देवदत्तगतानादिभूतस्वप्रागाभावनिवर्तकत्वेन सिद्धसाधनता स्यादतः प्रमाप्रागभावातिरिक्तेत्युक्तम्। अनादिपदत्यागे देवदत्तप्रमाया देवदत्तगत प्रमाप्रागभावातिरिक्तपूर्वप्रमाया निवर्तकत्वेन तादृशप्रमाप्राग भावातिरिक्तमिथ्याज्ञाननिवर्तकत्वेन वा सिद्धसाधनता वारणायानादीत्युक्तम्। पूर्वप्रमामिथ्याज्ञानयोरनादित्वाभावान्नोक्तदोषः।। घटोऽयमिति। दृष्टान्तभूते घटान्तरे एतद्धटप्रागभावातिरिक्त स्वप्रागभावनिवर्तकत्वेन साध्यपर्यवसानम्। एवमेव पक्षे साध्यपर्यवसानेनार्थान्तरता तु बाधादेव न शङ्क्या। तथा चैतद्धटनिवर्त्यो घटप्रागभावातिरिक्तोऽप्यनादिभूतः पदार्थः कश्चित्सिध्येदिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">आभासेत्यादि। पूर्वोक्तानुमानस्येति शेषः। अप्राप्तदूषणप्राप्तिर्योगः प्राप्तदूषणपरिहारलक्षणं क्षेमः। तथा च पूर्वोक्तानुमानस्याभासानुमानेन समानौ योगक्षेमौ यस्य तत्तथोक्तं त्त्वादित्यर्थः। तत्त्वप्रदीपोक्तानुमानान्तरमप्याभासानुमानसमानयोगक्षेमत्वेनैव निरस्तमित्याह।। एतेनेति।। विगीतो भ्रम इति। विमतः प्रपञ्चभ्रम इत्यर्थः।। एतज्जनकेति। पक्षीभूतजगद्भ्रमजनकं यदबाध्यत्वं तदतिरिक्तोपादानक इत्यर्थः। बाध्योपादानक इति फलितार्थः। एतज्जनकाबाध्यातिरिक्तत्वं नामैतज्जनकाबाध्यभिन्नत्वमिदं चविशिष्टस्यैतज्जनकाभाध्यस्याभावरूपम्। इदं च दृष्टान्तभूतः सम्प्रतिपन्नो यो रूप्यभ्रमस्तदुपादाने शुक्त्यज्ञानेऽबाध्यत्वरूपविशेष्यस्य सत्त्वेऽप्येतज्जनकत्वरूपविशेषणाभावेन पक्षीभूतभ्रमजनके त्वज्ञाने एतज्जनकत्वरूपविशेषणस्य सत्त्वेऽप्यबाध्यत्वरूपविशेष्याभावेन विशिष्टाभावोऽनुगतः। पक्षेऽपि दृष्टान्त इव न विशेषणाबावमादाय विशिष्टाभावसिद्धिः। पक्षीभूतभ्रमस्य यदुपादानं तस्य पक्षभूतभ्रमजनकतया तत्रैतज्जनकातिरिक्तत्वस्य बाधितत्वात्। पक्षीभूतभ्रमेऽबाध्यातिरिक्तं बाध्यं यदज्ञानं तदुपादानकत्वमादाय साध्यसिद्धिः। दृष्टान्तभूतभ्रमे तु पक्षीभूतभ्रमजनकातिरिक्तशुक्त्यज्ञानोपादनकत्वामादायेति विवेकः। बाध्योपादानक इत्येवोक्ते दृष्टान्तेऽप्रसिद्धिः स्यात्। रूप्योपादाने शुक्त्यज्ञाने बाध्यत्वस्य प्रतिवाद्यसम्मतत्वादतो नञ्द्वयगर्भं साध्यं कृतम्। तच्च विशेषणाभावेनोक्तरीत्या दृष्टान्तेऽस्तीति न दोष इत्यवधेयम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">इदमप्याभाससमानयोगक्षेमत्वेन निरस्तम्। तथा हि। अयं घट एतज्जनकाबाध्यभिन्नोपादानको घटत्वाद्धटान्तरवत्। घटान्तरोपादानेऽबाध्यत्वरूपविशेष्यस्य सत्त्वेऽकप्येतज्जनकत्वरूपविशेषणस्याभावेन पक्षीभूतघटोपादाने एतज्जनकत्वरूपविशेषणस्य सत्त्वेऽप्यबाध्यत्वरूपविशेष्याभावेन विशिष्टाभावस्य पक्षदृष्टान्तयोः सद्भावादिति भावः। यद्वैतेनेति वक्ष्यमाणसत्प्रतिपक्षत्वपरामर्शः। तत्प्रकारश्च विगीतो भ्रम एतज्जनकाबाध्यातिरिक्तोपादानको विभ्रमत्वात्सम्मतवदिति न्यायामृतोक्तरीत्या द्रष्टव्यः। तत्र दृष्टान्तीकृतभ्रमोपादानभूते शुक्त्यज्ञाने ज्ञाननिवर्त्यत्वारव्यबाध्यत्वरूप विशेष्यसद्भावेऽप्येतज्जनकत्वरूपविशेषणाभावेन पक्षीभूतप्रपञ्चब्रमजनके चाज्ञाने एतज्जनकत्वरूपविशेषणसद्भावेऽपि बाध्यत्वरूपविशेषस्यास्मद्रीत्याऽभावेन विशिष्टाभावोऽनुगत इति द्रष्टव्यम्। देवदत्तप्रमापक्षकानुमानस्याभाससाम्यमुक्त्वा बाधं चाह।। अनादित्वेति। योऽनादिभावः स न निवर्तत इत्यस्ति व्याप्तिः। अन्यथा ब्रह्मणोऽपि निवर्त्यत्वापत्तेः। तथा चाज्ञानस्याप्यनादिभावत्वेनानिवर्त्यत्वे सिद्धे देवदत्तगतप्रमाया अनादिभूताज्ञाननिवर्तकत्वे साध्ये बाध इत्यर्थः। पूर्वानुमाने देवदत्तगतप्रमाया देवदत्तगतप्रमाप्रागभावतिरिक्ताज्ञान निवर्तकत्वं पर्यवसितम्। तद भावसाधनेन सत्प्रतिपक्षत्वं चाह।। देवदत्तप्रमेति।। एतत्प्रमेति। घटादिप्रमेत्यर्थः। अनादेरज्ञानस्येत्यर्थः। अन्यथा सम्प्रतिपन्नाया यज्ञदत्तप्रमाया देवदत्तगतघटप्रमाप्राग भावातिरिक्तानादिभूतस्वगतघटप्रमाप्रागभावनिवर्तकत्वेन साध्यवैकल्यं स्यादिति द्रष्टव्यम्।</p>
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| }} | | }} |
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| == अध्याय 6 ==
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C06_S01_B01">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-अथ प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषयावरणस्व निवर्त्यस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकं अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वात् अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीपप्रबावदित्यनुमानं मानमस्तु। अत्र च प्रमाणज्ञानं वस्त्वन्तरपूर्वकमित्युक्ते स्वप्रागभावेन सिद्धसाधनता। तन्निवृत्त्यर्थं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति पदम्। तथाऽपि स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वजनकसामग्रया सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वविषयावरणेति पदम्। तथाऽप्यदृष्टेन सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वनिवर्त्येति पदम्। अर्थान्तरनिवृत्तये आत्माश्रितदाज्ञानसिद्धये च स्वदेशेति पदमिति।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C06_S01_B01 | | | verse_id = VA_C06_S01 |
| | id = VA_C06_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C06_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च किमिदं प्रकाशकत्वं नाम। ज्ञापकत्वं वा ज्ञापकाप्यायकत्वं वा ज्ञानत्वं वा। नाद्यः। चक्षुरादौ व्यभिचारात्। दृष्टान्तस्य साधनविकलत्वाच्च। ज्ञाने ज्ञानकारणत्वाभावेनासिद्धेश्च। न द्वितीयः। असिद्धेः। अञ्जनादौ व्यभिचाराच्च। न तृतीयः। साधनविकलत्वात् दृष्टान्तस्य। न किञ्चिदहमवेदिषमिति परामर्शसिद्धः सौषुप्तिकानुभवोऽस्तु प्रमाणमिति चेन्न। तस्य ज्ञानाभावविषयतयोपपत्तेः। नन्वभावप्रतीतेर्धर्मिप्रतियोगिबोधपराधीनतया तदभावे तस्यानुभवितुमयोग्यत्वमिति चेन्न। साक्षिणा धर्मिप्रतियोगिग्रहणोपपत्तेः। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">षष्ठः भङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अथाविद्यायांविवरणकारोक्तमनुमानमाशङ्कते।। अथ प्रमाणज्ञानमिति। अत्र विवादगोचरापन्नेति पूरणीयम्। अन्यथा वेदान्तजन्यद्वितीयादिज्ञानमादाय बाधः स्यात्। तस्यापि प्रथमज्ञानरूपवस्तुपूर्वकत्वेऽपि तस्य स्वविषयप्रकाशत्वेन स्वविषयावरणत्वाभावाद्बाधः। स्यादिति द्रष्टव्यम्। हेतौ धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानेषु व्यभिचारवारणायाप्रकाशितमिति। दृष्टान्ते सौरालोकप्रदेशस्थितदीपप्रभाव्यावृत्त्यर्थमन्धकार इति। द्वितीयादिप्रभासु साधनवैकल्यपरिहाराया प्रथमेत्युक्तम्। तथा च विवादगोचरापन्नं वेदान्तरूपं प्रमाणजन्यं चरमसाक्षात्काररूपं प्राथमिकं ज्ञानमित्यर्थः। साध्ये स्वशब्देन पक्षीभूतं प्रमाणज्ञानं ग्राह्यम्। साध्यस्थविशेषणानां कृत्यं दर्शयति।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अत्र चेत्यादिना। स्वजनकसामग्र्या स्वोत्पादकादृष्टादिरूपया। अदृष्टेन स्वप्रतिबन्धकादृष्टेन।। अर्थान्तरेति। विषयगताज्ञातत्वमादायेति शेषः। यथोक्तं न्यायमृते। स्वप्रागभावं स्वोत्पादकादृष्टं स्वप्रतिबन्धकादृष्टं विषयगतमज्ञातत्वं च व्युदसितुं साध्ये विशेषणानीति। अयमर्थः। अत्र स्वविषयावरणेत्याद्येवोक्ते प्रमाणज्ञानप्रागभावरूपवस्त्वन्तर पूर्वकत्वमादायार्थान्तरता स्यात्। तस्यापि स्वविषयावरणत्वात्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु प्रमाणज्ञानप्रागभावस्य स्वशब्दोक्तप्रमाणज्ञानविषयीभूतब्रह्मावरकत्वं कथम्। अभावस्यावरकत्वानङ्गीकारादिति चेत्। सत्यम्। अत्र स्वविषयावरणशब्देन स्वसत्तादशायां कार्यानुत्पादकप्रयोजकत्वस्यैव विवक्षितत्वात्। एवञ्च प्रमाणज्ञानप्रागभावस्यापि स्वसत्तादशायां कार्यानुत्पादकप्रयोजकत्वेन स्वविषयावरणत्वात्। आत्मनिष्ठत्वेन प्रमाणज्ञानसमानदेशत्वात्। स्वनिवर्त्यवाच्च।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु प्रमाणज्ञानप्रागभावस्य कथं प्रमाणज्ञाननिवर्त्यत्वम्। प्रमाणज्ञाननिवर्त्यत्वं नाम स्वजन्यध्वंसप्रतियोगित्वमेव हि स्वनिवर्त्यत्वम्। न हीदं प्रमाणज्ञानप्रागभावे युक्तम्। अभावाभावस्य भावत्वेन प्रतियोगिन एव प्रागभावध्वंसरूपत्वेन प्रमाणज्ञानस्यैव प्रमाणज्ञानप्रागभावध्वंसरूपतया स्वस्य स्वजन्यत्वाभावादिति चेत्। सत्यम्। अभावाभावो भावव्याप्य इति मते प्रागभावनिवृत्तेः। प्रतियोग्यन्यत्वात्। प्रमाणज्ञानजन्यध्वंस प्रतियोगित्वरूपं स्वनिवर्त्यत्वं प्रमाणज्ञानप्रागभावेऽस्त्येवातः स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेत्युक्तम्। स्वविषयावरणपदत्यागे प्रमाणज्ञानोत्पादकादृष्टरूपवस्त्वन्तरपूर्वकत्वमादायार्थान्तरता स्यात्। तस्यापि स्वप्रागभावव्यतिरिक्तत्वात्। अदृष्टस्य फलनाश्यत्वेन प्रमाणज्ञानोत्पादकादृष्टस्य प्रमाणज्ञाननाश्यत्वात्। आत्मगतत्वेन प्रमाणज्ञानसमानदेशत्वाभावाच्चात उक्तं स्वविषयावरणेति। तस्योत्पत्त्यनुकूलत्वेन स्वसत्तादशायां कार्यानुत्पादकप्रयोजकत्व रूपस्वविषयावरणत्वाभावान्न तदादायार्थान्तरता। स्वनिवर्त्यपदत्यागे प्रमाणज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकादृष्टरूपस्त्वन्तरपूर्वकत्वमादायार्थान्तरता स्यात्। तस्यापि स्वप्रागभावव्यतिरिक्तत्वात्। स्वोत्पत्तिप्रतिबन्धकत्वादेव स्वसत्तादशायां प्रमाणज्ञानस्य कार्यानुत्पादकप्रयोजकत्वेन स्वविषयावरणत्वात्। आत्मनिष्ठत्वेन स्वदेशगतत्वाच्चात् ।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">उक्तं स्वनिवर्त्येति। लोके प्रतिबन्धकनिवृत्त्यनन्तरमेव कार्योत्पत्तिदर्शनेन कार्योत्पत्त्या प्रतिबन्धकनिवृत्त्यभावेन प्रमाणज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकादृष्टस्य प्रमाणज्ञाननिवर्त्यत्वाभावान्न तेनार्थान्तरता। स्वदेशगतपदत्यागे विषये ज्ञाततावदज्ञातताऽपि काचन तिष्ठति। एवञ्च विषयगताज्ञानत्वमादायार्थान्तरता स्यात्। तस्यापि स्वप्रागभावव्यतिरिक्तत्वात्स्वविषयावरणत्वात्स्वनिवर्त्यत्वाच्चात उक्तं स्वदेशगतेति। अज्ञातत्वस्य स्वदेशगतत्वाभावान्न तेनार्थान्तरतेति द्रष्टव्यम्। स्वदेशगतपदस्य कृत्यान्तरं दर्शयति।। आत्माश्रितेति। तथा चोद्देश्यसिद्ध्यर्थं चेदं विशेषणमिति भावः। वस्त्वन्तरं वस्तुविशेषः। हेतावालोकोत्पन्नप्रदीपप्रभायां व्यभिचारवारणायाप्रकाशितेत्युक्तम्।</p>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C06_S01_B02"> | | <span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == सप्तमभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्नानेनानुमानेन त्वदभिमताज्ञानसिद्धिः। जडेऽज्ञानानभ्युपगमेनान्तःकरणवृत्तिलक्षणप्रमाणज्ञानानं तथाविधवस्तुपूर्वकत्वाभावेऽपि हेतोस्तत्र सद्भावादनैकान्तिकत्वात्। व्यर्थं च स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति विशेषणम्। स्वनिवर्त्यविशेषणेनैव तद्व्यावृत्तेः। न हि भावः स्वप्रागभावनिवर्तकः। अपि तु भावोत्पत्तिरेव तत्प्रागभावनिवर्तिका। भावाभावयोः सहावस्थानविरोधात्। अतः स्वनिवर्त्यविशेषणेनैव स्वप्रागभावव्यावृत्तेर्व्यर्थं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति विशेषणम्।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C06_S01_B02 | | | verse_id = VA_C07_S01 |
| | id = VA_C06_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C07_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-यत्तु कश्चिदाह नाज्ञानं ज्ञानाभावः। अभावमानागम्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवत्। अभावो ह्यभावस्य प्रत्यक्षस्य वा विषयः। अज्ञानं च न मानगम्यम्। माननिवर्त्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवदिति। तदसत्। अज्ञानस्य मानागम्यत्वे तत्साधनायानुमानकथनायोगात्। एतन्मानगम्यत्वेन मानागम्यमिति व्याघातः। फलव्याप्यताऽभावेऽपि वृत्तिव्याप्यतामात्रेण तत्रानुमानप्रवृत्तिरिति न युक्तम्। अज्ञानस्य वृत्तिव्याप्यतानङ्गीकारात्। न च प्रमाणनिवर्त्यत्वस्य प्रमाणागम्यत्वेन व्याप्तिरस्ति। प्रत्यभिज्ञाप्रमाणनिवर्त्यस्य संस्कारस्य मानगम्यत्वात्। न च त्वदुक्तमर्थं न जानामीत्यादिव्यवहारोऽत्यन्तसुप्ते ज्ञायमाने चाज्ञायमानेऽसम्भाव्यमानोऽज्ञानं गमयतीति युक्तम्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">त्वदभिमतेनि। भावरूपेत्यर्थः।। अन्तःकरणवृत्तीति। मनोवृत्तीत्यर्थः।। ज्ञानानामिति। घटादिज्ञानानामित्यर्थः।। तथाविधेति। स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेत्यादि विशेषणचतुष्टयोपेतवस्त्वित्यर्थः।। अभावेऽपीति। अनेन साध्याभाव उक्त इति द्रष्टव्यम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु तत्रापि घटाद्यज्ञानरूपतथाविधवस्तुपूर्वकत्वमस्त्येवेति साध्यस्यापि सत्त्वान्न व्यभिचार इत्यत उक्तम् ।। जड इति।। जडविषय इत्यर्थः।। जडावरकेति यावत्। प्राप्तप्रकाशप्रतिबन्धरूपावरणकृत्याभावेन जडावरकाज्ञानानब्युपगमादिति भावः। यथोक्तम्। "अप्रकाशस्वरूपत्वाज्जडे ज्ञानं न मन्यत" इति।। हेतोरिति। अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वरूपहेतोरित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु स्वप्रागभावमादायार्थान्तरतापरिहाराय तद्विशेष्णं सार्थकमिति चेत्तत्राह।। स्वनिवर्त्येति।। स्वनिवर्त्यत्वं नाम स्वजन्यध्वंसप्रतियोगित्वं तत्प्रमाणज्ञानप्रागभावे नास्ति। कुत इत्यत आह।। न हीति भाव इति। प्रमाणज्ञान इति यावत्। तथा च प्रमाणज्ञानप्रागभावनिवृत्तेः स्वजन्यत्वं नास्तीति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">भावोत्पत्तिरेवेति।। प्रतियोग्यापत्तिरेवेत्यर्थः।। प्रागभावनिवर्तिकेति।। प्रागभावविपत्तिनिवृत्तिरूपेत्यर्थः। तथा हि। प्रतियोग्यापत्तिरेव प्रागभावनाशः। कुत इति चेत्। प्रागभावनाशस्य प्रतियोगिसामग्रीजन्यत्वेन प्रतियोग्यात्मकत्वादिति भावः। नन्वेकसामग्रीजन्यत्वेन प्रागभावप्रतियोगिप्रागभावनिवृत्तेरभेदोक्तौ कटतन्तुरूपयोरप्यभेदः स्यात्तन्तुलक्षणैकसमवायिकारणजन्यत्वादिति चेन्न। एकसामग्रीजन्यत्वाभावात्। पटोत्पत्तौ तन्तुद्वय संयोगस्यासमवायिकारणत्वेन तन्तुरूपोत्पत्तौ तन्त्ववयवगतरूपस्या समवायिकारणत्वेन सामग्रीभेदात्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु प्रागभावध्वंसस्य प्रतियोगिसामग्रीजन्यत्वे सोपादानकत्वं स्यादिति चेन्न। इष्टपत्तेः। यत्र ध्वंसः प्रतियोगिभिन्नस्तत्र निरुपादानकत्वं प्रकृते च प्रागभावनिवृत्तिः प्रतियोग्यात्मिकैवेति सोपादानकत्वे दोषाभावात्। यथोक्तम्। प्रतियोग्यापत्तिरेवाभावविपत्तित्वस्य प्रागभावे दृष्टत्वादिति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">किञ्च प्रमाणज्ञानस्य स्वप्रागभावनिवर्तकत्वे वध्यघातकभावरूपविरोधः प्राप्तः। वध्यधातकभावविरोधश्च मूषकमार्जारवत्सहावस्थानसापेक्ष। तर्ह्यस्तु प्रमाणज्ञानस्यापि स्वप्रागभावेन सहावस्थिततया तन्निवर्तकत्वमिति चेत्तत्राह।। भावाभावयोरिति।। प्रतियोगितदभावयोरित्यर्थः।। विरोधादिति। भावाभावयोर्हि परस्परप्रतिक्षेपरूपतया साक्षाद्विरोधस्तद्द्वारा जन्ययोस्तज्ज्ञानयोर्वाक्ययोरिति स्थितिः। तयोश्च सहावस्थाने लोके विरोधवार्तैवोच्छिद्येत। सर्वविरोधामानां तन्मूलकत्वादिति भावः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C06_S01_B04">
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| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च किमिदं प्रकाशकत्वं नाम। ज्ञापकत्वं वा ज्ञापकाप्यायकत्वं वा ज्ञानत्वं वा। नाद्यः। चक्षुरादौ व्यभिचारात्। दृष्टान्तस्य साधनविकलत्वाच्च। ज्ञाने ज्ञानकारणत्वाभावेनासिद्धेश्च। न द्वितीयः। असिद्धेः। अञ्जनादौ व्यभिचाराच्च। न तृतीयः। साधनविकलत्वात् दृष्टान्तस्य। न किञ्चिदहमवेदिषमिति परामर्शसिद्धः सौषुप्तिकानुभवोऽस्तु प्रमाणमिति चेन्न। तस्य ज्ञानाभावविषयतयोपपत्तेः। नन्वभावप्रतीतेर्धर्मिप्रतियोगिबोधपराधीनतया तदभावे तस्यानुभवितुमयोग्यत्वमिति चेन्न। साक्षिणा धर्मिप्रतियोगिग्रहणोपपत्तेः।</span>
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| </div>
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| | verse_id = VA_C06_S01_B04 | | | verse_id = VA_C07_S01 |
| | id = VA_C06_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C07_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-किमत्र सर्वानुवादेन व्यवहारः किं वा सामान्यतः। नाद्यः तादृशव्यवहरस्यैवाभावात्। भावे वा त्वदुक्तं न प्रमाणतो जानामीत्येवम्परत्वोपपत्तेः। प्रतिवादिवाक्यादधिगतार्थस्यानुवादपुरस्सरं प्रमाणाभावेन निरसनदर्शनात्। न च त्वदुक्ते प्रमाणज्ञानं मम नास्तीत्यस्य विशिष्टविषयज्ञानस्य प्रमाणत्वात्तिद्विशेषणतयाऽर्थस्यापि प्रमाणेनाधिगमात्स्ववचनव्याघात इति युक्तम्। एतत्प्रमाणज्ञानस्य प्रमाणाभावविषयत्वेऽपि तदर्थस्यानेतद्विषयत्वात्। अन्यथा भ्रमो ममासीदित्यादिप्रमाणज्ञानस्यापि विशिष्टभ्रमविषयतया भ्रमविषयस्यापि प्रमाणिकतापातात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। ज्ञापकत्वमिति। साक्षाज्ज्ञानकरणत्वमित्यर्थः ज्ञापकाप्यायकत्वमिति। ज्ञानकरणसहकारित्वमित्यर्थः।। चक्षुरादाविति। अप्रकाशितार्थज्ञानकरणत्वे सत्यपिस्वनिवर्त्यवस्त्वन्तरपूर्वकत्वाभावाद् व्यभिचार इत्यर्थः।। दृष्टन्तस्येति। प्रदीपप्रभायां ज्ञानकारणत्वे सत्यपि ज्ञानकरणत्वाभावात्दृष्टान्तस्य साधनवैकल्यमित्यर्थः।। ज्ञान इति। पक्षीभूते प्रमाणज्ञान इत्यर्थः।। असिद्धेरिति। पक्षीभूते प्रमाणज्ञाने ज्ञानकरणाप्यायकत्वाभावादसिद्धिरित्यर्थः।। अञ्जनादाविति। अञ्जनस्य भूम्यन्तर्गतधनादिज्ञानकरणचक्षुः सहकारित्वेऽपि स्वनिवर्त्यवस्त्वन्तरपूर्वकत्वाभावाद्व्यभिचार इत्यर्थः।। साधनेति। प्रदीपप्रभायां ज्ञानत्वाभावादित्यर्थः। भावरूपाविद्यायां प्रत्यक्षप्रमाणमाशङ्कते। न किञ्चिदिति। न किञ्चिदहमवेदिषमित्युत्तरकालेऽज्ञानस्मरणं तावद्भवति। तच्चानुभवं विना न सम्भवतीति तद्बलात्सुषुप्तौ भावरूपाज्ञानानुभवसिद्धिरिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तस्य ज्ञानाभावविषयतयोपपत्तेरिति। एतावन्तं कालं दुःखं नावेदिषं शुक्तिरूप्यं नावेदिषमित्यादिवन्न किञ्चिदहमवेदिषमिति परामर्शसिद्धसौषुप्तिकानुभवस्यापि ज्ञानाभावविषयकत्वमेव न भावरूपाज्ञानविषयकत्वम्। तथात्वे दुःखशुक्तिरूप्यादावपि भावरूपाज्ञानं कल्प्यं स्यादिति भावः। न चेष्टापत्तिः। अप्रकाशस्वरूपत्वेन मायिना तत्र तदनङ्गीकारादिति ज्ञातव्यम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">शङ्कते।। नन्विति।। बोधपराधीनत्वादिति। ज्ञानाधीनत्वादित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तदभावे धर्म्यादिज्ञानाभावे।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तस्याभावस्य। अयम्भावः। न किञ्चिदहमवेदिषमिति परामर्शबलेन सुषुप्तौ कल्प्यमानो ज्ञानाभावानुभवोऽहमज्ञ इति वा मयि ज्ञानं नास्तीति वेत्येवंरूपो वक्तव्यः। स न सम्भवति। तथा हि। सद्ब्यामधिकरणप्रतियोगिभ्यामभावो निरूप्यत इति वचनात्। धर्मिभूतात्मज्ञानं प्रतियोगिभूतज्ञानज्ञानं वाऽस्ति न वेति प्रष्टव्यम्। नेति पक्षे धर्मिप्रतियोगिज्ञानाभावादेवाभावज्ञानं न सम्भवति। आद्ये धर्मिप्रतियोगिज्ञानसद्भावादेव न ज्ञानाभावज्ञानं विरोधादिति। साक्षिणेति। तथा च धर्मिभूतात्मनः प्रतियोगिभूतस्य ज्ञानस्य च ज्ञानं साक्षिरूपमस्तीति युक्तं ज्ञानाभावज्ञानमिति भावः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 7 ==
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C07_S01_B01">
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| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-यत्तु कश्चिदाह नाज्ञानं ज्ञानाभावः। अभावमानागम्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवत्। अभावो ह्यभावस्य प्रत्यक्षस्य वा विषयः। अज्ञानं च न मानगम्यम्। माननिवर्त्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवदिति। तदसत्। अज्ञानस्य मानागम्यत्वे तत्साधनायानुमानकथनायोगात्। एतन्मानगम्यत्वेन मानागम्यमिति व्याघातः। फलव्याप्यताऽभावेऽपि वृत्तिव्याप्यतामात्रेण तत्रानुमानप्रवृत्तिरिति न युक्तम्। अज्ञानस्य वृत्तिव्याप्यतानङ्गीकारात्। न च प्रमाणनिवर्त्यत्वस्य प्रमाणागम्यत्वेन व्याप्तिरस्ति। प्रत्यभिज्ञाप्रमाणनिवर्त्यस्य संस्कारस्य मानगम्यत्वात्। न च त्वदुक्तमर्थं न जानामीत्यादिव्यवहारोऽत्यन्तसुप्ते ज्ञायमाने चाज्ञायमानेऽसम्भाव्यमानोऽज्ञानं गमयतीति युक्तम्।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C07_S01_B01 | | | verse_id = VA_C07_S01 |
| | id = VA_C07_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C07_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-न द्वितीयः सामान्यानुवादेन विशेषव्यवहारोपपत्तेः। विशेषस्याप्यधिगमानधिगमयोर्नैवं व्यवहार इति चेन्न। अस्ति कश्चिद्विशेष इति सामान्यतो ज्ञातत्वात्। किञ्च भावरूपाविद्याभ्युपगमेऽपि किं पूर्वमर्थो ज्ञातो न वा। सर्वथाऽपि प्रश्नायोगः। अस्माकं तु सर्वं वस्तु ज्ञाततयाऽज्ञाततया वा साक्षिचैतन्यविषय एवेति प्रमाणज्ञानोदयात्प्रागज्ञातत्वविशेषितोऽर्थः साक्षिसिद्धोऽनुवादगोचरो भवति च प्रश्नार्ह इति चेन्न। साक्षिसिद्धतयाऽपि सिद्धेऽर्थे व्यवहारायोगात्। साक्षिणा ज्ञातेऽपि प्रमाणबुभुत्सया व्यवहार इति चेन्न। साक्षिसिद्धेत्वे प्रमाणबुभुत्साया निष्फलत्वात्। तथा च त्वयाऽपि सामान्यतः सिद्धोऽर्थो विशेषज्ञानायानूद्यत इति वक्तव्यम्। वयमपि सामान्यतः साक्षिसिद्धस्य विशेषप्रमाणबुभुत्सया व्यवहारं ब्रुमः। तस्मान्नाविद्या निरूपणगोचरतामाचरतीति कुतस्तत्कार्यं कुतस्तरां चाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य साध्यता सिद्ध्यतीति।। छ ।। अविद्याप्रमाणनिरासः ।। छ ।। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">सप्तमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। अभावमानेति। अनुपलब्धिरूपप्रमाणेत्यर्थः। सम्प्रतिपन्नवद्धटादिवत्। अत्र व्यतिरेकव्याप्तिमुपपादयति।। अभावो हीति।। अभावस्येति। अनुपलब्धिरूपषष्ठप्रमाणस्येत्यर्थः। भाट्टानां मतेऽनुपलब्धेः पृथक् प्रमाणत्वात्। व्यवहारे भट्टनय इत्यङ्गीकारादभावस्येत्युक्तम्। तार्किकरीत्याप्रत्यक्षस्येत्युक्तम्। स्वरूपासिद्धिपरिहाराय हेतुं साधयति।। अज्ञानं चेति।। माननिवर्त्यत्वादिति। वृत्तिरूपप्रमाणज्ञाननिवर्त्यत्वादित्यर्थः।। सम्प्रतिपन्नवदिति। मानप्रागभाववदित्यर्थः। यथा घटनिवर्त्यो घटप्रागभावो न घटगम्य एवं माननिवर्त्यो मानप्रागभावः प्रतियोगिभूतमानगम्यो मानं न भवतीति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अनुमानकथनेति। तस्य साध्यज्ञप्त्यर्थत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">एतन्मानेति।। अनुमानरूपमानेत्यर्थः।। फलेति। फलं चैतन्यं, तद्व्याप्यता तेन विशेषेणाप्यता प्राप्यता तद्विषयत्वं तदभावेऽपीत्यर्थः। तथा चाज्ञानस्य मानागम्यत्वं फलव्याप्यत्वाभावाभिप्रायेणोक्तमिति भावः।।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">वृत्तीति। एतदनुमानजन्यान्तः करणवृत्तिरूपज्ञानविषयत्वमात्रेणेत्यर्थः।। अनङ्गीकारादिति। चक्षुरादिगद्वारा बहिर्निर्गताया अन्तःकरणवृत्तेरज्ञाननिवर्तकत्वाङ्गीकारादितिं भावः। वृत्तिस्वरूपनिरूपणपरे स्वच्छेऽन्तःकरण इति श्लेके हरत्यज्ञानमित्युक्तत्वादिति ज्ञेयम्। माननिवर्त्यत्वहेतोः सोऽयं देवदत्त इति देवदत्तेऽतीतत्ववर्तमानत्वग्राहिणी प्रत्यभिज्ञा जायते। तथा च प्रत्यभिज्ञामुत्पाद्य विनष्टसंस्कारेऽयं देवदत्तः संस्कारवांस्तद्विषयकस्मृतिमत्त्वादित्येवं स्मृतिरूपकार्यानुमेयत्वेन मानगम्यत्वसद्भावाद्व्यभिचार इति भावः। पूर्वं न किञ्चिदहमवेदिषमिति परामर्शसिद्धसौषुप्तिकानुभवो भावरूपाज्ञाने मानमित्याशङ्क्य तस्य ज्ञानाभावविषयत्वमुक्तम्। इदीनीं प्रकारान्तरेण भावरूपाज्ञाने प्रमाणमाशङ्क्य निराकारोति। न चेति। सुषुप्त्युत्तरकाले त्वदुक्तमर्थन्न जानामीति व्यवहारस्तावद्भवति। व्यवहारश्च व्यवहर्तव्यज्ञानसाध्य इति सुषुप्तौ भावरूपाज्ञानसिद्धिः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">नन्वयमप्यनुभवो ज्ञानाभावविषयक इत्यशङ्कापरिहारायोक्तमत्यन्तसुषुप्ते सम्भाव्यमान इति। सुषुप्तेति भावे क्तः। तथा चात्यन्तसुषुप्ते मनआदिसर्वेन्द्रियोपरमरूपायां सुषुप्तौ ज्ञानाभावविषयत्वेनासम्भाव्यमान इत्यर्थः। तदुपपादनायोक्तमज्ञायमाने ज्ञायमाने वेति। धर्मिणि प्रतियोगिनि चेति शेषः। तथा हि। त्वदुक्तमर्थं न जानामीत्यनुभवस्य ज्ञानाभावविषयकत्वेऽभावज्ञानस्य धर्मिप्रतियोगिज्ञानसाध्यत्वाद्धर्मिभूतात्मज्ञानं प्रतियोगिभूतत्वदुक्तार्थज्ञानं चास्ति न वेति प्रष्टव्यम्। नेति पक्षे धर्मिप्रतियोगिज्ञानाभावादेवाभावज्ञानं न सम्भवति। आद्ये धर्मिप्रतियोगिज्ञानसद्भावादेव नाभावज्ञानं विरोधात्। साक्षिणा धर्मिप्रतियोगिज्ञानोपपत्तेरित्युक्तं समाधानमत्र न सम्भवति। धर्मिभूतात्मज्ञानस्य साक्षिणा सम्भवेऽपि प्रतियोगिभूतस्य बाह्यस्य त्वदुक्तार्थस्य साक्षिवेद्यत्वाभावादिति भावः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C07_S01_B02"> | | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == अष्टमभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किमत्र सर्वानुवादेन व्यवहारः किं वा सामान्यतः। नाद्यः तादृशव्यवहरस्यैवाभावात्। भावे वा त्वदुक्तं न प्रमाणतो जानामीत्येवम्परत्वोपपत्तेः। प्रतिवादिवाक्यादधिगतार्थस्यानुवादपुरस्सरं प्रमाणाभावेन निरसनदर्शनात्। न च त्वदुक्ते प्रमाणज्ञानं मम नास्तीत्यस्य विशिष्टविषयज्ञानस्य प्रमाणत्वात्तिद्विशेषणतयाऽर्थस्यापि प्रमाणेनाधिगमात्स्ववचनव्याघात इति युक्तम्। एतत्प्रमाणज्ञानस्य प्रमाणाभावविषयत्वेऽपि तदर्थस्यानेतद्विषयत्वात्। अन्यथा भ्रमो ममासीदित्यादिप्रमाणज्ञानस्यापि विशिष्टभ्रमविषयतया भ्रमविषयस्यापि प्रमाणिकतापातात्।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C07_S01_B02 | | | verse_id = VA_C08_S01 |
| | id = VA_C07_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C08_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-न च भावरूपाज्ञाननिराकरणे सिद्धान्तविरोधः। परन्यायेन परनिराकरणात्। न सप्तमः। अत्यन्ताभावपदेनासत्त्वाभिप्रायेऽपसिद्धान्तः। तदतिरिक्तस्याप्रसिद्धत्वात्। भाववैलक्षण्यमिति चेत्तर्हि तत एवासत्त्वापत्त्या नोक्तदोषनिवृत्तिः। तस्मान्न मिथ्यात्वनिरुिक्तः।। छ ।। मिथ्यात्वनिरुिक्तनिरासोपसंहारः ।। छ ।। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">कुतो न युक्तमित्यत आह।। किमत्रेति। त्वदुक्तमर्थमित्यत्रेत्यर्थः ।। सर्वानुवादेनेति। विशेषाकारेण घटपटादिसमस्तपदार्थानुवादेनेत्यर्थः।। सामान्यत इति। सामान्याकारेण सर्वपदार्थानुवादेनेत्यर्थः।। तादृशेति। लोके इति शेषः। विशेषाकारतः सर्वानुवादेनेति व्यवहारस्यैव लोकेऽभावादित्यर्थः। तथात्वे सार्वज्ञापत्तेरिति भावः। तुष्यतु दुर्जन इति न्यायेनाह।। भावे वेति ।। न प्रमामत इति। तथा च त्वदुक्तेऽर्थे प्रमाणज्ञानं मम नास्तीति प्रमाणज्ञानाभावविषयत्वोपपत्तेर्न भावरूपाज्ञानस्य साधकत्वमिति भावः। तदुपपादयति।। प्रतिवादीति। प्रमाणाभावेन प्रमाणज्ञानाभावेन। त्वदुक्तेऽर्थे प्रमाणज्ञानं मम नास्तीत्यस्य प्रमाणज्ञानाभावपरत्वे स्ववचनव्याघातमाशङ्कते ।। न च त्वदुक्त इति।। विशिष्टविषयज्ञानस्येति। त्वदुक्तार्थविशिष्टप्रमाणाज्ञानाभावाविषयकज्ञानस्येत्यर्थः।। तद्विशेषणतयेति। प्रमाणज्ञानविषयतया तदवच्छेदकत्वेनेति यावदित्यर्थः।। स्ववचनेति। पुनस्तत्र प्रमाणज्ञानं नास्तीत्युक्ते स्ववचनव्याघात इत्यर्थः।। एतत्प्रमाणज्ञानस्येति। त्वदुक्तेऽर्थे प्रमाणज्ञानं मम नास्तीत्येवंरूपज्ञानस्येत्यर्थः। प्रमाणाभावेति। प्रमाणज्ञानाभावेत्यर्थः।। विषयकत्वेऽपीति। साक्षात्त्वदुक्तार्थविशिष्ट प्रमाणज्ञानाभावविषयकत्वेऽपीत्यर्थः। तदर्थस्य प्रमाणज्ञानावच्छेदकीभूतस्य त्वदुक्तार्थस्य। अनैतद्विषयत्वात्साक्षादेतत्प्रमाणज्ञानाविषयत्वादित्यर्थः।। अन्यथेति। प्रमाणज्ञानावच्छेदकत्वेन परम्परयोक्तप्रमाणज्ञानविषयत्वेन प्रामाणिकत्वाङ्गीकार इत्यर्थः। भ्रमो रजतभ्रमः।। प्रमाणज्ञानस्येति। परमतेऽयमनुव्यवसायोऽस्मन्मते तु साक्षीति ज्ञातव्यम्।। विशिष्टार्थभ्रमविषयतयेति। रजतत्वविशिष्टरजतभ्रमरूपार्थविषयकतयेत्यर्थः।। भ्रमविषयस्यापीति। भ्रमरूपाज्ञानावच्छेदकीभूतस्य रजतस्यापीत्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C07_S01_B03"> | | <span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == नवमभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
| |
| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न द्वितीयः सामान्यानुवादेन विशेषव्यवहारोपपत्तेः। विशेषस्याप्यधिगमानधिगमयोर्नैवं व्यवहार इति चेन्न। अस्ति कश्चिद्विशेष इति सामान्यतो ज्ञातत्वात्। किञ्च भावरूपाविद्याभ्युपगमेऽपि किं पूर्वमर्थो ज्ञातो न वा। सर्वथाऽपि प्रश्नायोगः। अस्माकं तु सर्वं वस्तु ज्ञाततयाऽज्ञाततया वा साक्षिचैतन्यविषय एवेति प्रमाणज्ञानोदयात्प्रागज्ञातत्वविशेषितोऽर्थः साक्षिसिद्धोऽनुवादगोचरो भवति च प्रश्नार्ह इति चेन्न। साक्षिसिद्धतयाऽपि सिद्धेऽर्थे व्यवहारायोगात्। साक्षिणा ज्ञातेऽपि प्रमाणबुभुत्सया व्यवहार इति चेन्न। साक्षिसिद्धेत्वे प्रमाणबुभुत्साया निष्फलत्वात्। तथा च त्वयाऽपि सामान्यतः सिद्धोऽर्थो विशेषज्ञानायानूद्यत इति वक्तव्यम्। वयमपि सामान्यतः साक्षिसिद्धस्य विशेषप्रमाणबुभुत्सया व्यवहारं ब्रुमः। तस्मान्नाविद्या निरूपणगोचरतामाचरतीति कुतस्तत्कार्यं कुतस्तरां चाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य साध्यता सिद्ध्यतीति।। छ ।। अविद्याप्रमाणनिरासः ।। छ ।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C07_S01_B03 | | | verse_id = VA_C09_S01 |
| | id = VA_C07_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C09_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-नापि दृश्यत्वस्य। तथा हि। किमिदं दृश्यत्वम्। दृग्विषयत्वमस्वप्रकाशत्वं वा। आद्ये किं दृग्वृत्तिरूपा चिद्रूपा वा। नाद्यः। आत्मन्यनैकान्त्यात्। तस्यापि वेदान्तजनितवृत्तिविषयत्वात्। वृत्तिजनितफलासम्बन्धान्नानैकान्त्यमिति चेत्। फलं ज्ञातता, व्यवहारो वा। आद्ये घटादावपि तदभावादसिद्धिः। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">।। न द्वितीय इति। किं वा सामान्यत इति द्वितीयः पक्षो नेत्यर्थः।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">ननु सामान्याकारेण त्वदुक्तमर्थमनूद्य न जानामीति व्यवहारान्यथाऽनुपपत्याऽस्य व्यवहारस्य भावरूपाज्ञानविषयकत्वं कुतो न कल्पनीयमिति चेत्तत्राह।। सामान्येति। विशेषार्थेति। विशेषार्थज्ञानाभावविषयकेत्यर्थः। तथा च त्वदुक्तमर्थं विशेषतो न जानामीत्येवं विशेषज्ञानविषयक एवायं व्यवहारो न भावरूपाज्ञानविषयक इति भावः। पुनःशङ्कते।। विशेषस्यापीति। विशेषाकारस्यापीत्यर्थः। विशेषाकारोऽप्यधिगतो न वा। आद्येऽधिगतत्वादेव न जानामीत्युक्ते स्ववचनव्याघातः। द्वितीये तु प्रतियोगिज्ञानाभावादेव न जानामीति तदभावज्ञानायोग इति भावः। अस्ति कश्चिदिति।। गुहायां किञ्चिदस्तीतिवदस्ति कश्चिद्विशेष इति। विशेषाकारस्यापि सामान्यतः साक्षिणा ज्ञातत्वेन प्रतियोगिज्ञानसद्भावाद्युक्तं न जानामीति व्यवहारस्य विशेषज्ञानाभावविषयकत्वमिति भावः।।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">पूर्वमिति। अविद्याप्रतीत्यपेक्षया पूर्वमित्यर्थः। अर्थोऽविद्याविषयभूतः।। प्रश्नायोग इति। ज्ञातश्चेज्ज्ञातत्वादेव त्वदुक्तमर्थं न जानामीति प्रश्नायोगः। अज्ञातश्चेत्सुतरां प्रश्नायोगः। अज्ञातस्यानुवादायोगादिति भावः। प्रश्नायोगो नास्तीति शङ्कते ।। अस्माकं त्विति। ज्ञाततया ज्ञानावच्छेदकत्वेन। अज्ञाततयाऽज्ञानावच्छेदकत्वेन। इति वचनादिति शेषः।।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">प्रमाणेति। अविद्यानिवर्तकान्तःकरणवृत्तिरूपप्रमाणज्ञानोदयात्प्रागित्यर्थः ।। अज्ञातत्वविशेषित इति। अज्ञातत्वविशिष्टोऽज्ञानावच्छेदकीभूत इत्यर्थः। भवतीत्यस्य पूर्वोत्तराभ्यां सम्बन्धः। अस्मिन्नर्थे स्वाचार्यवचनसम्मतिमाह।। अस्माकं त्विति। तथा चोक्तव्यवहारस्य भावरूपाज्ञानविषयकत्वेऽपि न कश्चिद्दोष इति भावः।।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">साक्षिसिद्धतयेति। साक्षिविषयत्वेनेत्यर्थः। व्यवहारेति। यथा कथञ्चित्सिद्धत्वादेव न जानामीत्युक्तप्रश्नरूपव्यवहारायोगादित्यर्थः। पुनर्व्यवहारोपपत्तिं सङ्कते। साक्षिणेति। अज्ञानावच्छेदकतया साक्षिसिद्धेऽप्यर्थे त्वदुक्तमर्थं प्रमाणतो न जानामीत्यतस्तत्र किं प्रमाणमिति प्रमाणबुभुत्सायां प्रश्नरूपव्यवहारः सम्भवतीत्यर्थ-।। निष्फलत्वादिति। साक्षिरूपप्रमाणसिद्धत्वादेव तत्र प्रमाणबुभुत्साया निष्फलत्वादित्यर्थः। वयमपीत्यतः पूर्वं तद्वदिति शेषः।। तस्मादिति। लक्षणप्रमाणयोरभावादित्यर्थः। साक्षिसिद्धस्य त्वदुक्तार्थस्य। व्यवहारं न जानामीति व्यवहारम्। निरूपणगोचरतां निरूपणविषयतां नाचरति न प्राप्नोतीत्यर्थः।। कुत इति। जगदिति शेषः। वस्तुसिद्धेर्लक्षणप्रमाणाधीनत्वेनाविद्यायां तदभावेन तस्यापि निरूपयितुमशक्यत्वाज्जगतस्तत्कार्यत्वं कुत इत्यर्थः।। कुतस्तरामिति। अन्यतरत्वस्य तद्रूपमिथ्यात्वस्य।। सिध्यतीति। अप्रसिद्धविशेषणत्वादिति भावः।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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|
| == अध्याय 8 ==
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C08_S01_B01">
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| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
| |
| <div class="teeka-body">
| |
| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
| |
| <span class="shloka-line">मूलम्-न च भावरूपाज्ञाननिराकरणे सिद्धान्तविरोधः। परन्यायेन परनिराकरणात्। न सप्तमः। अत्यन्ताभावपदेनासत्त्वाभिप्रायेऽपसिद्धान्तः। तदतिरिक्तस्याप्रसिद्धत्वात्। भाववैलक्षण्यमिति चेत्तर्हि तत एवासत्त्वापत्त्या नोक्तदोषनिवृत्तिः। तस्मान्न मिथ्यात्वनिरुिक्तः।। छ ।। मिथ्यात्वनिरुिक्तनिरासोपसंहारः ।। छ ।।</span>
| |
| </div>
| |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C08_S01_B01 | | | verse_id = VA_C09_S01 |
| | id = VA_C08_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C09_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-अतीतानागतनित्यानुमेयेषु ज्ञातताभावाद्भागासिद्धिश्च। तथा हि। अवेद्यत्वे सत्यपरोक्षव्यवहारयोग्यत्वं स्वप्रकाशत्वमिति तल्लक्षणमबिदधता चित्सुखेनापरोक्षव्यवहारयोग्यताविशेषणकृत्याभिधानप्रस्तावेऽभिहितम्। न चावेद्यत्वमित्येतावदेवास्तु तल्लक्षणमिति वाच्यम्। तथा सत्यतीतानागतनित्यानुमेयेषु चातिव्याप्तेः। फलव्याप्यतालक्षणवेद्यत्वस्य तत्राभावादिति। द्वितीये पुनरनैकान्त्यमेव। आत्मनोऽपि वृत्तिजन्यव्यवहारविषयत्वात्। चिद्रूपदृग्विषयत्वन्तु घटादावस्माभिर्नाङ्गीक्रियत इति भागासिद्धिः। स्वप्रकाशत्वं च निर्वक्तव्यं यदभावो दृश्यत्वम्। अवेद्यत्वमिति चेत्तर्हि वेद्यत्वं दृश्यत्वमित्युक्तं स्यात्। तथा च प्रागुक्तविकल्पदोषापातः। |
| | |
| <h4 class="gr-vyakhya-head">अष्टमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">सिद्धान्तविरोध इति। अभावास्यावरकत्वायोगाज्जीव स्वरूपभूतानन्दाद्यावरकत्वान्यथाऽनुपपत्त्या भावरूपाज्ञानस्य सिद्धान्ते साधितत्वादिति भावः। न च भावरूपाज्ञानस्यावरकत्वे मानाभाव इति वाच्यम्।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">"प्रकृतिं स्वात्मसंश्लिष्टां गुणान्सत्त्वादिकानपि। कर्माणि सूक्ष्मदेहं च जायमाना हरेर्दृशिः।"</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">दहेदित्यादिप्रमाणसिद्धत्वात्। न चात्र भावरूपाज्ञानं न श्रुयत इति वाच्यम्। सत्त्वादिगुणानामेव तथात्वात्। यथोक्तं सुधायाम्। ज्ञानिनां मोक्षदः स इत्यत्र भावरूपाविद्याविरोधित्वेनाविद्याया सत्त्वादिगुणात्मिकया प्रकृत्या परमेश्वरो जीवस्वरूपभूतानप्यानन्दीनाच्छादयतीति।। परन्यायेनेति। स्वसिद्धैः साधनं परसिद्धैर्दूषममिति भगवत्पादैरुक्तत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">न सप्तम इति। स्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणतया प्रतीयमानत्वमिति सप्तमोऽपि न युक्त इत्यर्थः। अत्यन्ताभावप्रतियोगिपदेनेत्येवं पाठः। क्वचिदत्यन्ताभावपदेनेति पाठो दृश्यते। तत्र नामैकदेशे नामग्रहणमिति न्यायेनात्यन्ताभावप्रतियोगिपदेनेत्येवार्थो द्रष्टव्यः।। असत्त्वाभिप्राय इति। असत्त्वेऽभिप्रेते सतीत्यर्थः।। अपसिद्धान्त इति। असद्वैलक्षण्याङ्गीकारादिति भावः। नन्वस्य लक्षणस्य नासत्त्वे तात्पर्यं किन्तु तदतिरिक्ते सदसद्वैलक्षण्य रूपानिर्वचनीयत्वेऽतो नापसिद्धान्त इत्यत आह।। तदतिरिक्तस्येति।। अप्रसिद्धत्वादिति। तथा चानुमानस्याप्रसिद्ध-विशेषणत्वमित्यर्थः।। भावेति। भवतीति भावः स न, तद्वैलक्षण्यमित्यर्थः। तथा चास्य लक्षणस्यासत्त्व एव तात्पर्यमसत्त्वं च न निरुपारव्यत्वं किन्तु सद्वैलक्षण्यमेवेति नापसिद्धान्त इति भावः।।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">तत एवेति। भावविलक्षणत्वादेव सद्विलक्षणत्वादेवेति यावत्।। असत्त्वापत्त्येति।। परस्पर विरोधयोरन्यतरनिषेधस्यान्यतरविधिनान्तरीयकत्वादिति भावः। तृतीयकोटेरद्याप्यप्रसिद्धत्वादिति हृदयम्। उक्तदोषोऽपसिद्धान्तरूपः। मिथ्यात्वानिरुक्तेरिति प्रतिज्ञातमुपपाद्योपसंहरति।। तस्मादिति ।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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|
| == अध्याय 9 ==
| |
| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C09_S01_B01">
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| <div class="teeka-block">
| |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
| |
| <div class="teeka-body">
| |
| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
| |
| <span class="shloka-line">मूलम्-नापि दृश्यत्वस्य। तथा हि। किमिदं दृश्यत्वम्। दृग्विषयत्वमस्वप्रकाशत्वं वा। आद्ये किं दृग्वृत्तिरूपा चिद्रूपा वा। नाद्यः। आत्मन्यनैकान्त्यात्। तस्यापि वेदान्तजनितवृत्तिविषयत्वात्। वृत्तिजनितफलासम्बन्धान्नानैकान्त्यमिति चेत्। फलं ज्ञातता, व्यवहारो वा। आद्ये घटादावपि तदभावादसिद्धिः।</span>
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| </div>
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| | verse_id = VA_C09_S01_B01 | | | verse_id = VA_C09_S01 |
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| | text = | | | text = मूलम्-स्वव्यवहारे स्वातिरिक्तसंविदनपेक्षत्वं स्वप्रकाशत्वं तदभावो दृश्यत्वमिति चेत्तर्ह्यात्मनोऽप्यद्वितीयव्यवहारे संविदन्तरापेक्षासद्भावाद्व्यभिचारः। निर्विकल्पकस्वव्यवहारे संविदन्तरानपेक्ष आत्मेति चेत्तर्हि घटोऽपि तथैवेत्यसिद्धिः। घटे निर्विकल्पकव्यवहार एव नास्तीति चेदात्मन्यपि स नास्त्येव। सुषुप्तावस्तीति चेन्न। तस्यापि निर्विकल्पकत्वे विवादात्। अवेद्यत्वे सत्यपरोक्षव्यवहारविषयत्वं स्वप्रकाशत्वमिति चेन्न। व्याहतत्वेनासम्भवित्वात्। कथञ्चिदव्याहतत्वेऽपि विशेषणाभावेनोत विशेष्याभावेनाथोभयाभावेन दृश्यत्वं निर्वक्तव्यम्। तत्राद्येऽवेद्यत्वाभावो वेद्यत्वमेव हेतुरस्तु किं विशेष्येण। तस्य चोक्तं दूषणम्। द्वितीये स्वरूपासिद्धिः। तृतीये व्यर्थविशेष्यत्वं विशेष्यासिद्धिश्चेति।। छ ।। दृश्यत्वविकल्पनिरासः ।। छ ।। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">नवमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। दृश्यत्वस्येति। बुद्ध्या विवेकेन निरुक्तिरित्यनुवर्तते। दृगिति। ज्ञानमित्यर्थः।। वृत्तिरूपेति। अन्तःकरणवृत्तिरूपेत्यर्थः।। चिद्रपेति। वृत्तिप्रतिबिम्बचैतन्याबिव्यक्ताधिष्ठानचैतन्यरूपेत्यर्थः। तदुपपादयति।। तस्यापीति। अन्यथा ब्रह्मज्ञानजननाय प्रवृत्तानां वेदान्तानां वैय्यर्थ्यं स्यादिति भावः। इदमुपलक्षणम्। ब्रह्मजिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा ब्रह्मज्ञानमित्यादौ कर्मणि षष्ठी, आत्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यादौ इत्यादौ तव्यप्रत्ययादिश्च न स्यात्। तस्य कर्मणि स्मरणात्। ब्रह्म विचारयितुमारब्धयोर्गुरुशिष्ययोर्मौनं मौढ्यं च स्यादित्यपि द्रष्टव्यम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु वृत्तिविषयत्वं नाम वृत्तिजनितफलसम्बधित्वं विवक्षितम्। तदात्मनि नास्तीति न व्यभिचार इत्याङ्कते।। वृत्तिजनितेति।। घटादावपीति। ज्ञानविषयत्वातिरिक्तायां ज्ञाततायाम्प्रमाणाभावेन तस्यास्मन्मतेऽप्रामाणिकत्वात्। घटादावपि ज्ञानजनितज्ञाततालक्षण फलसम्बधित्वाभावात्स्वरूपासिद्धिः स्यादित्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C09_S01_B02"> | | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमभङ्गः"></span> |
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| | == दशमभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-अतीतानागतनित्यानुमेयेषु ज्ञातताभावाद्भागासिद्धिश्च। तथा हि। अवेद्यत्वे सत्यपरोक्षव्यवहारयोग्यत्वं स्वप्रकाशत्वमिति तल्लक्षणमबिदधता चित्सुखेनापरोक्षव्यवहारयोग्यताविशेषणकृत्याभिधानप्रस्तावेऽभिहितम्। न चावेद्यत्वमित्येतावदेवास्तु तल्लक्षणमिति वाच्यम्। तथा सत्यतीतानागतनित्यानुमेयेषु चातिव्याप्तेः। फलव्याप्यतालक्षणवेद्यत्वस्य तत्राभावादिति। द्वितीये पुनरनैकान्त्यमेव। आत्मनोऽपि वृत्तिजन्यव्यवहारविषयत्वात्। चिद्रूपदृग्विषयत्वन्तु घटादावस्माभिर्नाङ्गीक्रियत इति भागासिद्धिः। स्वप्रकाशत्वं च निर्वक्तव्यं यदभावो दृश्यत्वम्। अवेद्यत्वमिति चेत्तर्हि वेद्यत्वं दृश्यत्वमित्युक्तं स्यात्। तथा च प्रागुक्तविकल्पदोषापातः।</span>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C09_S01_B02 | | | verse_id = VA_C10_S01 |
| | id = VA_C09_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C10_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च दृश्यत्वं प्रमाणतो वा भ्रान्ता वा। नोभयमपि। अन्यतरासिद्धेः। ननु सामान्यतः प्रयुक्तस्य हेतोर्विशेषविकल्पैर्निराकरणे सर्वानुमानाभावप्रसङ्गः। तथा हि। धूमाद्धूमध्वजसाधने किमेतद्देशकालसंलग्नो धूमो हेतुः किं वाऽनेतद्देशकालसंलग्न इति विकल्प्याद्ये साधनशून्यं निदर्शनम्। द्वितीयेऽसिद्धिरिति दूषणसम्भवादिति। मैवम्। तत्र धूममात्रस्य पर्वतेऽग्निसाधकत्वेनादूषणत्वाभ्युपगमात्। तर्हि किं वक्रो धूमो हेतुरिति विकल्पेन दूषणप्रसङ्ग इति चेन्न। तस्य सामान्यस्यैव हेतुत्वात्। न चास्तु तथा प्रकृतेऽपीति वाच्यम्। प्रमाणभ्रान्तिदृश्ययोर्दृश्यत्वसामान्याभावात्। न हि जलनभोनलिनयोर्नलिनत्वसामान्यमस्ति। तर्हि कथं भ्रान्तिदृश्यत्वमित्यच्यत इति चेन्न। यथा नभो नलिनमित्युच्यते तथैवेत्यवेहि। दृश्यत्वस्य सन्मात्रवृत्तित्वाद्विरुद्धता च। न च शुक्तिरजतं दृश्यमिति वाच्यम्। तत्र शुक्तिकाया एव दृस्यत्वात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">त्वद्रीत्या भागासिद्धिश्च स्यादित्याह।। अतीतेति।। नित्यानुमेयेष्विति। नित्यातीन्द्रियेष्वित्यर्थः। योग्यत्वं विषत्वं तथैवोत्तरत्र व्यवहारात्। तल्लक्षणं स्वप्रकाशत्वलक्षणम्। प्रस्तावे प्रसङ्गे इति यावत्। तद्वाक्यं पठति।। न चेति।। एतावदेवास्त्विति। अपरोक्षव्यवहारयोग्यत्वमिति विशेष्यभागो व्यर्थ इति भावः। तामुपपादयति। फलव्याप्यतेति। वत्तिजनितज्ञाततालक्षणफलसम्बन्धित्व रूपदृश्यत्वापरपर्यायं यद्वेद्यत्वं तस्य तत्राभावेनावेद्यत्वसद्भावादिति व्याप्तिरित्यर्थः। तथा हि। असति धर्मिणि धर्मजननायोगान्नातीतानागतयोर्ज्ञानजन्यज्ञातताधारत्वम्। अपरोक्षज्ञानविषयेष्वेव ज्ञानेन ज्ञातताजननमङ्गीकृतम्। नानुमेयेषु धर्मदिष्वतीन्द्रियेष्वनुमेयस्यापि वन्ह्यादेःकदाचिदपरोक्षज्ञानविषयत्वेन ज्ञातताधारत्वान्नित्यानुमेयेष्वित्युक्तम्। नित्यातीन्द्रियेष्वित्यर्थः। तथा च तत्रातिव्याप्तिपरिहाराया विशेष्यभाग इति द्रष्टव्यम्। इत्यभिहितमित्यन्वयः। ज्ञानजन्यव्यवहाररूपफलसम्बन्धित्वं दृश्यत्वमिति द्वितीयपक्षे दोषमाह।। द्वितीय इति।। व्यवहारेति। आत्मेत्यादिव्यवहारेत्यर्तः। चिद्रूपदृग्विषयत्वं दृश्यत्वमिति पक्षमनूद्य स्वरूपासिद्ध्या दूषयति।। चिद्रूपेति।। नाङ्गीक्रियत इति। निरुक्तचैतन्यरूपाया दृशोऽप्रामाणिकत्वादिति भावः। इत्यसिद्धिरित्येव पाठः। अस्वप्रकाशत्वं दृश्यत्वमिति द्वितीयपक्षं दूषयितुमाह।। स्वप्रकाशत्वमिति। असङ्गतिपरिहारायाह।। यदभाव इति। ओमिति चेत्तत्राह।। तथा चेति। वेदनं नाम दृगेव। सा किं वृत्तिरूपा चिद्रूपा वेत्यादिप्रागुक्तविकल्पदोषापात इत्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-स्वव्यवहारे स्वातिरिक्तसंविदनपेक्षत्वं स्वप्रकाशत्वं तदभावो दृश्यत्वमिति चेत्तर्ह्यात्मनोऽप्यद्वितीयव्यवहारे संविदन्तरापेक्षासद्भावाद्व्यभिचारः। निर्विकल्पकस्वव्यवहारे संविदन्तरानपेक्ष आत्मेति चेत्तर्हि घटोऽपि तथैवेत्यसिद्धिः। घटे निर्विकल्पकव्यवहार एव नास्तीति चेदात्मन्यपि स नास्त्येव। सुषुप्तावस्तीति चेन्न। तस्यापि निर्विकल्पकत्वे विवादात्। अवेद्यत्वे सत्यपरोक्षव्यवहारविषयत्वं स्वप्रकाशत्वमिति चेन्न। व्याहतत्वेनासम्भवित्वात्। कथञ्चिदव्याहतत्वेऽपि विशेषणाभावेनोत विशेष्याभावेनाथोभयाभावेन दृश्यत्वं निर्वक्तव्यम्। तत्राद्येऽवेद्यत्वाभावो वेद्यत्वमेव हेतुरस्तु किं विशेष्येण। तस्य चोक्तं दूषणम्। द्वितीये स्वरूपासिद्धिः। तृतीये व्यर्थविशेष्यत्वं विशेष्यासिद्धिश्चेति।। छ ।। दृश्यत्वविकल्पनिरासः ।। छ ।।</span>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C09_S01_B03 | | | verse_id = VA_C10_S01 |
| | id = VA_C09_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C10_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-ननु रजतसंविदः कथं शुक्तिकाविषयो विरोधादिति चेन्न। रजतसंविद इति कोऽर्थः। किं रजतविषयाया इति रचतत्वोल्लेखिसंविद इति वा। नाद्यः। अनभ्युपगमात्। द्वितीये को विरोधः। स्वविषयशुक्तिकामेवान्याकारेण गृह्णातीत्यस्याविरुद्धत्वात्। ननु तर्ह्यपि रजतेऽस्ति कथञ्चिदृश्यतेति चेन्न। तस्य दृश्यत्वाभासत्वात्। तादृशस्य पक्षेऽनन्वयात्। किञ्च रजतस्य फलव्याप्यतया वृत्तिव्याप्यतया वा दृश्यत्वम्। नोभयमपि। अध्यस्ततयैव तत्सिद्ध्यभ्युपगमात्। न च तत्प्रतीतावुपायान्तरं वाऽस्ति। सन्निकर्षाभावात्। आत्मनोऽपि दृयशत्वादनैकान्तिकता च। नात्मा दृश्यत इति चेन्न। व्याहतेः। न ह्यज्ञाते धर्मिणि धर्मविधानं तन्निषेधो वा युज्यते। आत्मा दृश्यो वस्तुत्वाद्धटवत्। अयं घट एतद्धटात्मान्यान्यदृश्यान्यः प्रमेयत्वाद्धटवदिति च तस्य दृश्यत्वसिद्धेः। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। स्वव्यवहार इति। घटादिव्यवहारे घटादिव्यतिरिक्तवृत्तिरूपसंवित्सापेक्षत्वाद्धटादेरस्वप्रकाशत्वमात्मव्यवहारे तदभावात्तस्य स्वप्रकाशत्वमित्यर्थः।। संविदन्तरेति। स्वातिरिक्तसंविदित्यर्थः। तथा चात्मनोऽप्यद्वितीयत्वादि विशिष्टव्यवहारेऽद्वितीयत्वादिविशेषणोपनायकैकमेवा द्वितीयमित्यदिमानजनित संवित्सापेक्षत्वेनास्वप्रकाशत्वरूपदृश्यत्वसद्भावाद्व्यभिचार इति भावः। नन्वात्मनोऽद्वितीयत्वादिविशेषणविशिष्टव्यवहारे स्वातिरिक्त संवित्सापेक्षत्वे सत्यपि स्वरूपमात्रव्यवहारे तदभावेनास्वप्रकाशत्वरूपदृश्यत्वाभावान्नात्मनि व्यभिचार इत्याशङ्कते।। निर्विकल्पकेति। निर्विकारकात्मस्वरूपमात्रव्यवहार इत्यर्थः।। तथैवेति। घटो रूपीत्यादि विशिष्टव्यवहार एव स्वातिरिक्तविशेषणोपनायकमानजनित संवित्सापेक्षत्वसद्भावेऽपि निर्विकल्पकघटस्वरूपमात्रव्यवहारे घटादेः संविदन्तरानपेक्षत्वेनास्वप्रकाशत्वरूपदृश्यत्वाभावात्स्वरूपासिद्धिः स्यादित्यर्थः।। नास्तीति चेदिति। तथा चनासिद्धिरिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">स नास्त्येवेति। तथा च न व्यभिचार इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">सुषुप्ताविति। तत्र स्वरूपातिरिक्तस्याप्रतीतेरित्यर्थः। तथा च न व्यभिचार इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तस्यापीति। सौषुप्तिकात्मानुभवस्यापीत्यर्थः।। विवादादिति। एतावन्तं कालं सुखमहमस्वाप्समित्युत्तरकालीनपरामर्शबलेन कालसुखावस्थानामपि तदानीं प्रतीयमानत्वसिद्धेर्नस्वरूपमात्रविषयकत्वं तस्येति व्यभिचारः स्यादेवेति भावः। प्रकारान्तरेण स्वप्रकाशत्वलक्षणमाशङ्कते।। अवेद्यत्वे सतीति।। व्याहतत्वेनेति। अवेद्यत्वेऽपरोक्षव्यवहारविषयत्वमेव न सम्भवति।। तद्व्यवहारेति। तद्विषयकज्ञानस्यैव हेतुत्वादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">नन्ववेद्यत्वं नाम फलव्याप्यत्वमपरोक्षव्यवहारविषयत्वं तु वृत्तिव्याप्यत्वेन भविष्यतीति न व्याहतिरित्यत आह।। कथञ्चिदव्याहतत्वेऽपीति। फलं ज्ञातता व्यवहारो वा। नाद्यः। घटादावपि तदभावादसिद्धिः स्यात्। द्वितीये आत्मनोऽपि वेदान्तवृत्तिजन्यव्यवहारविषयत्वादनैकान्त्यमित्येवं फलव्याप्यत्वस्यानुपपन्नत्वात्कथञ्चिदित्युक्तम्।। विशेषणाभावेनेति। अपरोक्षव्यवहारविषयत्वरूपविशेष्यस्य सत्त्वमङ्गीकृत्यावेद्यत्वरूप विशेषणाभावेनेत्यर्थः। तथा चावेद्यत्वाभावे सत्यपरोक्षव्यवहारविषयत्वं दृश्यत्वमिति फलितोऽर्थः।। उत विशेष्याभावेनेति। विशेषणभूतमवेद्यत्वमङ्गीकृत्य विशेष्यभूतापरोक्षव्यवहारविषयत्वाभावेन धृश्यत्वनिर्वचनेऽवेद्यत्वे सत्यपरोक्षव्यवहारविषयत्वाभावो दृश्यत्वमिति फलितोऽर्थः।। अथोभयाभावेनेति। अवेद्यत्वाभावे सत्यपरोक्ष व्यवहारविषयत्वाभावो दृश्यत्वमिति फलितोऽर्थः। एवं सति तत्राद्य इत्यादिना वक्ष्यमाणदूषणं सुज्ञातं भवतीति द्रष्टव्यम्।। तस्य चेति। वेद्यत्वमात्रस्य ब्रह्मणि व्यभिचाररूपं दूषणमुक्तमित्यर्थः।। व्यर्थेति। व्यावर्त्याभावादिति भावः। तर्हि त्यज्यते तद्विशेषणमिति चेत्तत्राह।। विशेष्यासिद्धिश्चेतीति।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 10 ==
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C10_S01_B01">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च दृश्यत्वं प्रमाणतो वा भ्रान्ता वा। नोभयमपि। अन्यतरासिद्धेः। ननु सामान्यतः प्रयुक्तस्य हेतोर्विशेषविकल्पैर्निराकरणे सर्वानुमानाभावप्रसङ्गः। तथा हि। धूमाद्धूमध्वजसाधने किमेतद्देशकालसंलग्नो धूमो हेतुः किं वाऽनेतद्देशकालसंलग्न इति विकल्प्याद्ये साधनशून्यं निदर्शनम्। द्वितीयेऽसिद्धिरिति दूषणसम्भवादिति। मैवम्। तत्र धूममात्रस्य पर्वतेऽग्निसाधकत्वेनादूषणत्वाभ्युपगमात्। तर्हि किं वक्रो धूमो हेतुरिति विकल्पेन दूषणप्रसङ्ग इति चेन्न। तस्य सामान्यस्यैव हेतुत्वात्। न चास्तु तथा प्रकृतेऽपीति वाच्यम्। प्रमाणभ्रान्तिदृश्ययोर्दृश्यत्वसामान्याभावात्। न हि जलनभोनलिनयोर्नलिनत्वसामान्यमस्ति। तर्हि कथं भ्रान्तिदृश्यत्वमित्यच्यत इति चेन्न। यथा नभो नलिनमित्युच्यते तथैवेत्यवेहि। दृश्यत्वस्य सन्मात्रवृत्तित्वाद्विरुद्धता च। न च शुक्तिरजतं दृश्यमिति वाच्यम्। तत्र शुक्तिकाया एव दृस्यत्वात्।</span>
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| | verse_id = VA_C10_S01_B01 | | | verse_id = VA_C10_S01 |
| | id = VA_C10_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C10_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्किञ्च दृश्यत्वाभावे तदविद्यानिवृत्त्याभावेन मोक्षाभावप्रसङ्गः। न च त्वत्पक्षे ब्रह्मज्ञानं नाम यत्किञ्चित्स्यात्। षष्ठ्यर्थस्य विषयताऽनतिरेकात्। यद्धि श्रुतमयेन ज्ञानेन तत्त्वमभिधाय चिन्तामयीमवस्थामवलम्बमानस्यान्तःकरणपरिणामवृत्तिरूपं ज्ञानमुपजायते तेन भवेदविद्यानिवृत्तिरिति चेन्न। तथाऽभ्युपगमे परमात्त्मनोऽपि दृश्यतया व्यभिचारानिस्तारात्। आत्मनोऽपि वृत्तिव्याप्यत्वेऽपि फलव्याप्यताया अभावान्न दृश्यत्वमिति चेन्न। दत्तोत्तरत्वात्। विषयत्वाभावेऽप्यात्माकारज्ञानमात्मज्ञानं तेन भवेदविद्यानिवृत्तिरिति चेन्न। विचारागोचरत्वात्। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">दशमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। प्रमाणत इति। तथा च दृश्यत्वादित्यस्य प्रमितिविषयत्वादित्यर्थो द्रष्टव्यः।। भ्रान्त्या वेति। तथा च दृश्यत्वादित्यस्य भ्रान्तिविषयत्वादित्यर्थोऽवगन्तव्यः।। अन्यतरेति। आद्ये तवासिद्धिर्द्वितीयेऽस्माकमसिद्धिरित्यर्थः।। अनुमानाभाव इति। अनुमानोच्छेद इत्यर्थः।। धूमध्वजेति। धूम एव ध्वजो यस्य स धूमध्वजो वह्निरित्यर्थः। एतदिति देशकालयोर्विशेषणम्। पर्वतसम्बन्ध्येतत्कालसम्बन्धीत्यर्थः।। धूममात्रस्येति। एतद्देशकालानैतद्देशकालविशेषितधूमसामान्यस्येत्यर्थः।। अदूषणत्वादिति। त्वदीयविकल्पनिराकरणयोर्दूषणत्वाभावदित्यर्थः। धूमवत्त्वस्येति धूमवत्त्वं नाम धूमसंयोगरूपो धूमसम्बन्धः। तथा चैतद्देशकालसंलग्नो धूमसंयोगो हेतुरित्यादिरूपेणैव विकल्पः कर्तव्यो न तु धूमो हेतुरित्यादिरूपेण। तर्हि तथैव विकल्प्य दूषयिष्यामीति तु न युक्तम्। धूमसंयोगे एतद्देशकालसंयोगित्वरूपसंलग्नत्वस्य गुणे गुणानङ्गीकारेण बाधितत्वादिति भावः। प्रकारान्तरेण तदीयग्रन्थोक्तं विकल्पदूषणाभ्यां सर्वानुमानोच्छेदप्रसङ्गमाशङ्कते ।। तर्हीति। इत्यादीत्यादिपदेन ऋजुधूमो हेतुरित्यस्य ग्रहणम्। तथा च वक्रधूमस्य हेतुत्वे महानसे ऋजुधूमसद्भावदशायां साधनवैकल्यम्। ऋजुधूमस्य हेतुत्वे पर्वते वक्रधूमसद्भावदशायमसिद्धिरित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">एतदपि पूर्वोक्तरीत्यैव निराकृतमित्याह।। तस्येति। वक्रत्वाद्यविशेषितस्य धूमसामान्यस्यैव हेतुत्वादित्यर्थः।। प्रकृतेऽपीति। प्रमाणभ्रान्त्यविशेषितं दृश्यत्वसामान्यमेव हेतुरस्त्वित्यर्थः।। अभावादिति। नभोनलिनवद्भ्रान्तिदृश्यस्यात्यन्तासत्त्वात्। प्रमाणभ्रान्त्यविशेषितं दृश्यत्वसामान्यमेव हेतुरित्यर्थः।। अभावादिति। न हि व्यक्त्यभावे सामान्यमस्तीति भावः। तदेवोपपादयति।। न हीति।। जलनभोनलिनयोरिति। जलनलिननभोनलिनयोरित्यर्थः। सरोजारविन्द गगनारविन्दयोरिति यावत्। तत्र नभोनलिनस्यैवात्यन्तासत्त्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">उच्यत इतीति। व्यवह्रियत इत्यर्थः। असत्त्वे तस्य ज्ञानासम्भवेन व्यवहारायोगात्तस्य ज्ञानसाध्यत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अवेहीति। जानीहीत्यर्थः। तथा च शुकबालादिव्यवहारवत्तत्र चित्रलिखितसिंहे सिंहशब्दव्यवहारवच्च ज्ञानाभावेऽपि भवतीत्यैपचारिको व्यवहार इति भावः। असतोऽपि ज्ञानविषयत्वस्यान्यत्रोपपादितत्वान्नोक्तदोष इत्यपि द्रष्टव्यम्। दृश्यत्वहेतोर्विरुद्धत्वं चाह।। दृश्यत्वस्येति। सन्मात्रवृत्तित्वादिति। मिथ्यात्वरूपसाध्यभावव्याप्तत्वादित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु कथं दृश्यत्वस्य सन्मात्रवृत्तित्वं मिथ्याभूतेऽपि शुक्तिरजते दृश्यत्वस्य सत्त्वादित्याशङ्क्य निराकरोति।। न चेति। कुतो न चेत्यत आह।। तत्रेति। इदं रजतमिति भ्रमस्थल इत्यर्थः।। दृश्यत्वादिति। दृग्विषयत्वादित्यर्थः। यत्सन्निकृष्टेन करणेन यज्ज्ञानमुत्पद्यते स तस्य विषय इत्येवंरूपं विषयत्वं शुक्तिकाया मेवास्ति न रजते। असता सन्निकर्षायोगात्। अतो न रजते दृश्यत्वमस्तीति विरुद्धत्वकथनं युक्तमिति भावः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-ननु रजतसंविदः कथं शुक्तिकाविषयो विरोधादिति चेन्न। रजतसंविद इति कोऽर्थः। किं रजतविषयाया इति रचतत्वोल्लेखिसंविद इति वा। नाद्यः। अनभ्युपगमात्। द्वितीये को विरोधः। स्वविषयशुक्तिकामेवान्याकारेण गृह्णातीत्यस्याविरुद्धत्वात्। ननु तर्ह्यपि रजतेऽस्ति कथञ्चिदृश्यतेति चेन्न। तस्य दृश्यत्वाभासत्वात्। तादृशस्य पक्षेऽनन्वयात्। किञ्च रजतस्य फलव्याप्यतया वृत्तिव्याप्यतया वा दृश्यत्वम्। नोभयमपि। अध्यस्ततयैव तत्सिद्ध्यभ्युपगमात्। न च तत्प्रतीतावुपायान्तरं वाऽस्ति। सन्निकर्षाभावात्। आत्मनोऽपि दृयशत्वादनैकान्तिकता च। नात्मा दृश्यत इति चेन्न। व्याहतेः। न ह्यज्ञाते धर्मिणि धर्मविधानं तन्निषेधो वा युज्यते। आत्मा दृश्यो वस्तुत्वाद्धटवत्। अयं घट एतद्धटात्मान्यान्यदृश्यान्यः प्रमेयत्वाद्धटवदिति च तस्य दृश्यत्वसिद्धेः।</span>
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| | verse_id = VA_C10_S01_B02 | | | verse_id = VA_C10_S01 |
| | id = VA_C10_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C10_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्-तथा हि। आत्माकारमिति कोऽर्थः। आत्माकार एवाकारो यस्येति वाऽऽत्माकार इवाकारो यस्येति वाऽऽत्माऽऽकारो यस्येति वा। नाद्यः। ज्ञानज्ञेययोरेकाकारताऽनुपलम्भात्। एकैव सत्ता ज्ञानज्ञेययोराकारोऽस्तीति चेन्न। अनुगतसत्ताया अनङ्गीकारात्। सत्तयैकाकारत्वे च वेदान्तवाक्यजनितज्ञानमात्माकारमेव कुतः। घटाकारमपि किन्न स्यात्। न च परेणात्मनि सत्ता नामाकारोऽङ्गीक्रियो। निराकारताऽङ्गीकारात्। न द्वितीयः। अत्यन्तसादृश्यस्यानुपलम्भात्। किञ्चित्सादृश्यस्य प्रागिवातिप्रसञ्जकत्वात्। तृतीयेऽपि पक्षे नात्मा साक्षाज्ज्ञानस्याकारः सम्भवति। आधाराधेयभावस्यासम्भवात्। अतः परिशेषाद्विषयतया व्यावर्तकत्वेन चात्मा ज्ञानस्याकार इवेति वक्तव्यम्। तदेव च विषयत्वमिति यत्किञ्चिदेतत्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">रजतसंविदः शुक्तिकाविषयत्वं न विरुद्धमित्याशङ्कते।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु रजतसंविद इति।। विरोधादितीति। रजतज्ञानवानहमित्यनु व्यवसायरूपानुभवेन रजतसंविदो रजतविषयकत्वावगाहनाच्छुक्तिविषयत्वाङ्गीकारे तद्विरोध इत्यर्थः।। अनभ्युपगमादिति। असतो रजतस्य निरुक्तविषयताया अस्माभिरनभ्युपगमादित्यर्थः। स्वविषयेत्यतः पूर्वमिदं रजतमिति ज्ञानमिति शेषः। अन्याकारेण रजताकारेण रजतोल्लेखितयेति यावत्।। गृह्णातीति। दोषवशादिति शेषः। अत एवोक्तमन्यदन्यात्मनाऽवगाहत इत्यन्यथाख्यातिरिति। तथा च रजते दृश्यत्वाभावाद्युक्तं सन्मात्रवृत्तित्वमिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">नन्वेवमपि रूप्ये दृगुल्लेख्यत्वेनापि दृश्यत्वमागतमिति शङ्कते।। नन्विति। तर्ह्यपि तथाऽपि दृग्विषयत्वाभावेऽपीत्यर्थः। रजतोऽपीति वा सम्बन्धः।। कथञ्चिदिति। रजतमितिव्यवह्रियमाणत्वरूपं यद्रजतोल्लिखित्वरूपं दृश्यत्वं तद्रजते।़प्यस्तीति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तस्य दृश्यत्वाभासत्वादिति। दृग्विषयत्वमेव हि मुख्यं दृश्यत्वं नेतरत्। तस्याबासत्वात्तादृशस्य रजते सद्भावेऽपि नास्माकं काचित्क्षतिरिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु तर्ह्याभासभूतमेव दृश्यत्वं हेतुरस्तु तथा च रजते मिथ्यात्वसामानाधिकरण्यसद्भावान्न विरुद्धत्वमित्यत आह।। तादृशस्येति।। अनन्वयादिति। असम्बन्धादित्यर्थः। आभासभूतदृश्यत्वस्य प्रपञ्चे मिथ्यात्वसाधनाय पक्षसम्बन्धितया हेतुत्वेनावक्तव्यत्वादिति यावत्। अयम्भावः। प्रतिपन्नोपाधौ त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वरूपमिथ्यात्वमसति शशविषाणादौ नास्तीति तावत्तव सम्मतम्। तस्य प्रतियोग्यधिकरणतया प्रतिपन्नोपाधेरेवाभावात्। तत्र प्रष्टव्यम्। शशविषणमस्तीति शब्दात्तदाकारं ज्ञानमुपजायते न वेति। नेति पक्षेऽनुभवविरोधः। आकाङ्क्षादिमच्छब्दस्य ज्ञानजनकत्वस्वाभाव्यात्। आद्ये तद्विषयत्वमेव हि ज्ञानस्य तदाकारत्वम्। यत्सन्निकृष्टकरणेनेत्यादिरूपं मुख्यं तद्विषयत्वं शशविषाणस्य न सम्भवति। असता सन्निकर्षायोगात्। अतस्तदुल्लेखित्वरूपामुख्यं यदाभासभूतं दृश्यत्वं तदेव तत्र वक्तव्यम्। तथा च तेनापि तत्र निरुक्तं मिथ्यात्वं साध्यं स्यादन्यथाऽऽभासदृश्यत्वस्य तत्र व्यभिचारापत्तेः। अतो मुख्य एव दृश्यत्वे हेतूकरणीये तस्य रजतेऽभावाद्युक्तं तस्य सन्मात्रवृत्तित्वमिति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">दृष्टान्ते साधनवैकल्यं चाह।। किञ्चिति। दृश्यत्वं वक्तव्यमिति शेषः। कुत इत्यत आह।। अध्यस्ततयैवेति। प्रातिभासिकतयैवेत्यर्थः।। तत्सिद्धीति। रजतसिद्धीत्यर्थः। प्रातिभासिकस्थले रजताकाराविद्यावृत्तिरन्तरेव भवतीत्यङ्गीकारेण वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्याभिव्यक्ताधिष्ठानचैतन्यरूपफलस्य तत्राभावेन तद्व्याप्यत्वाभावात्। तत्राविद्यावृत्त्यङ्गीकारेणान्तःकरणवृत्त्यभावेन तद्व्याप्यत्वस्याप्यभावादित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">रजते दृग्विषयत्वं नास्तीत्युक्त्वा तत्र दृगेव न सम्भवति कारणाभावादित्याह।। न चेति। न हीत्यर्थः। तत्प्रतीतौ रजतप्रतीतौ। उपायान्तरमिति। इन्द्रियभिन्नमनुमानादिरूपं कारणान्तरमित्यर्थः। तर्हिन्द्रियमेवास्तु तत्कारणमिति चेत्तत्राह।। सन्निकर्षाभावादिति। रजतस्य प्रातिभासिकत्वेन प्रतिभासमात्रशरीरतया ज्ञानात्पूर्वं सत्त्वाभावेनेन्द्रियसन्निकर्षो न सम्भवतीति नेन्द्रियेण तज्ज्ञानमित्यर्थः। तथा च ज्ञानात्पूर्वं रजतसिद्धाविन्द्रियसन्निकर्षसम्भवेन तज्ज्ञानसिद्धिः। तत्सिद्धौ तस्यप्रातिभासिकत्वेन प्रतिभासमात्ररजतसिद्धिरित्यन्योन्याश्रय इति भावः। अधिकं वक्तुमुक्तमेव दूषणं पुनराह।। आत्मनोऽपीति। तत्र हेतोरभावान्न व्यभिचार इत्याशङ्कते।। न चात्मेति।। आत्मान हि दृश्यत इत्यर्थः। आत्मा न दृश्यत इत्युक्ते कथं व्याहतिरित्यत आह।। न हीति। वाशब्द उपमायाम्। धर्मविधानमिति दृष्टान्तार्थं यथाऽज्ञाते धर्मिणि धर्मविधानं न सम्भवति। (यथाऽज्ञाते धर्मिज्ञानाभावेन तत्र दृश्यत्वमस्तीति विधानं न सम्भवति तथा तत्र दृश्यत्वं नास्तीति दृश्यत्वरूपधर्मनिषेधोऽपि न सम्भवतीत्यर्थ इति पाठान्तरम्)। एवमात्मरूपज्ञानाभावे तत्र दृश्यत्वं निषेधता धर्मिभूतात्मज्ञाने वक्तव्ये पुनर्न दृश्यत इत्युक्ते व्याहतिरिति भावः। आत्मनो दृश्यत्वेऽनुमानमप्याह।। आत्मेति।। अयं घट इति।। एतद्धटेति। पक्षीभूतघट इत्यर्थः। तथा चैतद्धटश्चात्मा चताभ्यामन्यद्यत्सर्वं जगत्तदन्यद्यद्दृश्यमात्मरूपं तदन्यत्वमादाय साध्यार्थपर्यवसानम्। अत्र यद्यप्येतद्धटात्मान्यान्यदृश्यं पक्षीकृते घटेऽपि तथाऽपि स्वान्यत्वं बाधितमित्यात्मनो दृश्यत्वसिद्धिर्दृष्टान्तभूते घटे एतद्धटात्मन्यान्यादृश्यभूतैद्धटात्मान्यत्वमादाय साध्योपपादनं कर्तव्यम्। एवमेव पक्षीभूते एतद्धट उपपादनं कर्तुं न शक्यते बाधात्। अतो दृश्यभूतात्मान्यत्वमादायैव पर्यवस्यतीत्यात्मनो दृश्यत्वसिद्धिरिति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्किञ्च दृश्यत्वाभावे तदविद्यानिवृत्त्याभावेन मोक्षाभावप्रसङ्गः। न च त्वत्पक्षे ब्रह्मज्ञानं नाम यत्किञ्चित्स्यात्। षष्ठ्यर्थस्य विषयताऽनतिरेकात्। यद्धि श्रुतमयेन ज्ञानेन तत्त्वमभिधाय चिन्तामयीमवस्थामवलम्बमानस्यान्तःकरणपरिणामवृत्तिरूपं ज्ञानमुपजायते तेन भवेदविद्यानिवृत्तिरिति चेन्न। तथाऽभ्युपगमे परमात्त्मनोऽपि दृश्यतया व्यभिचारानिस्तारात्। आत्मनोऽपि वृत्तिव्याप्यत्वेऽपि फलव्याप्यताया अभावान्न दृश्यत्वमिति चेन्न। दत्तोत्तरत्वात्। विषयत्वाभावेऽप्यात्माकारज्ञानमात्मज्ञानं तेन भवेदविद्यानिवृत्तिरिति चेन्न। विचारागोचरत्वात्।</span>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C10_S01_B03 | | | verse_id = VA_C10_S01 |
| | id = VA_C10_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C10_S01_B05 |
| | text = | | | text = मूलम्-ननु भवेदिदं यदि दृग्विषयत्वं दृश्यत्वम्। स्वप्रतिबद्धव्यवहारे स्वातिरिक्तसंविदपेक्षानियतिर्दृश्यत्वम्। कथमेतादृशी दृश्यता कथितदूषणगणग्रस्ता स्यात्। मैवम्। अतिरिक्तपदेन पारमार्थिकभेदवत्त्वं वाऽऽविद्यकभेदवत्त्वं वा। नाद्यः। तवासिद्धेः। न द्वितीयः। ममासिद्धेः। सामान्यतः प्रयोग इति च प्रागेव परास्तम्। संविदपेक्षानियतत्वमात्रस्य हेतुत्वोपपत्तेर्व्यर्थविशेषणत्वं च। न चास्ति रजतेऽपि ज्ञानावेक्षा व्यवहाराय तस्याध्यस्ततयैव सिद्ध्यभ्युपगमादित्यवादिष्म। अत्यन्तासत्यनैकान्त्यं च। न च तदपि मिथ्येति वाच्यम्। तथा सति रजतादेरसद्विलक्षणत्वप्रतिपादन प्रयासवैय्यर्थ्यापातात्। न च बाध्यत्वमसतो युज्यते। अप्रतीत्यङ्गीकारात्। नापि तस्यानिर्वचनीयत्वम्। तत्र प्रमाणाभावादिति।। छ ।। दृश्यत्वहेतुनिरासः ।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">तदज्ञाननिवृत्तिश्च तेन भवतीति तत्त्वोद्योतं मनसि निधायाह।। किञ्चेति।। दृश्यत्वाभाव इति। आत्मन इति शेषः। तदविद्येति। आत्माज्ञानेत्यर्थः। तद्विषयकज्ञानस्यैव तदज्ञाननिवर्तकत्वादिति भावः। न चात्मनो दृक्कर्मत्वं विना तज्ज्ञानत्वमिति मूलं मनसि निधायाह।। न च तत्पक्ष इति। आत्मनो दृश्यत्वं नास्तीति पक्षे ब्रह्मज्ञानं नाम यत्प्रसिद्धं तत्किञ्चित्किमपि तत्पक्षे न स्यादित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु वेदान्तवाक्यजन्यज्ञानं ब्रह्मज्ञानं भविष्यत्येवं ब्रह्मणो ज्ञानं ब्रह्मज्ञानमित्यभ्युपगमादित्यत आह।। षष्ठ्यर्थस्येति। षष्ठ्यर्थसम्बन्धस्येत्यर्थः।। अनतिरेकादिति। त्वया च तदनङ्गीकारादिति भावः। वेदान्तजन्यपरोक्षज्ञानेनाविद्यानिवृत्त्य भावेऽप्यद्वैतसाक्षात्कारेण तन्निवृत्तिर्भविष्यतीत्याशङ्कते।। यद्वीति। श्रुतिमयेनेत्यादि। श्रवणात्मकेन ज्ञानेन तत्त्वं ब्रह्मस्वरूपमभिधाय धातूनामनेकार्थत्वान्मतं कृत्वेति यावत्। चिन्तामीमवस्थामवलम्बमानस्यान्तःकरणपरिणामभूतं वृत्तिरूपं यज्ज्ञानमात्मसाक्षात्काररूपं यज्ज्ञानमुपजायते तेनाविद्यानिवृत्तिर्भवेदित्यर्थः।। तथेति। आत्मसाक्षात्कारेणाविद्यानिवृत्त्यभ्युपगम इत्यर्थः।। दृश्यतयेति। दृश्यत्वप्राप्त्येत्यर्थः।। न दृश्यत्वमिति। तथा च हेतोरभावान्न व्यभिचार इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">दत्तोत्तरत्वादिति। फलं किं ज्ञातता व्यवहारो वेत्यादिना दत्तोत्तरत्वाद्दूषितत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">विषयत्वाभावेऽपीति। आत्मनो ज्ञानविषयत्वाभावेऽपीत्यर्थः। तेनात्माकारज्ञानेन न च तदाकारम्।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C10_S01_B04"> | | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == एकादशभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-तथा हि। आत्माकारमिति कोऽर्थः। आत्माकार एवाकारो यस्येति वाऽऽत्माकार इवाकारो यस्येति वाऽऽत्माऽऽकारो यस्येति वा। नाद्यः। ज्ञानज्ञेययोरेकाकारताऽनुपलम्भात्। एकैव सत्ता ज्ञानज्ञेययोराकारोऽस्तीति चेन्न। अनुगतसत्ताया अनङ्गीकारात्। सत्तयैकाकारत्वे च वेदान्तवाक्यजनितज्ञानमात्माकारमेव कुतः। घटाकारमपि किन्न स्यात्। न च परेणात्मनि सत्ता नामाकारोऽङ्गीक्रियो। निराकारताऽङ्गीकारात्। न द्वितीयः। अत्यन्तसादृश्यस्यानुपलम्भात्। किञ्चित्सादृश्यस्य प्रागिवातिप्रसञ्जकत्वात्। तृतीयेऽपि पक्षे नात्मा साक्षाज्ज्ञानस्याकारः सम्भवति। आधाराधेयभावस्यासम्भवात्। अतः परिशेषाद्विषयतया व्यावर्तकत्वेन चात्मा ज्ञानस्याकार इवेति वक्तव्यम्। तदेव च विषयत्वमिति यत्किञ्चिदेतत्।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C10_S01_B04 | | | verse_id = VA_C11_S01 |
| | id = VA_C10_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C11_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-न च जडत्वहेतुरपि निगदितदूषणगणलङ्घने जङ्घालः। तथा हि। किमिदं जडत्वं नाम। ज्ञानानाधारत्वं वाऽनात्मत्वं वाऽज्ञानरूपत्वं वाऽस्वप्रकाशत्वं वा।नाद्यः। विशिष्टात्मनि पक्षनिक्षिप्तेऽसिद्धत्वात्। असदात्मनोर्विपक्षभूतयोश्च वर्तमानत्वात्। न द्वितीयः। अनात्मत्वपदेनात्मातिरिक्तत्वं वाऽऽत्मत्वानाधारत्वं वा विवक्षितम्। नाद्यः। तवासिद्धेः। न हि त्वत्पक्षे परमात्मनो जगदतिरिक्तमस्ति। परमार्थतस्तदभावेऽप्यनाद्यविद्याविलसितो भेदोऽस्तीति चेत्तर्ह्यस्माकमसिद्धो हेतुः। असति व्यभिचारश्च। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">न हि ज्ञानज्ञेययोरेकाकारेति मूलं मनसि निधायाह।। आत्माकारमिति कोऽर्थ इत्यादिना।। आत्माकार एवेति। एतद्धटाकारं घटान्तरमितिवदिति भावः।।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">आत्माकार इवेति। गवाकारो गवयवदिति भावः।। आत्माकार इवाकारो यस्येति वेति। घटात्वाकारो घट इतिवदिति भावः।।</p>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">अनुपलम्भादिति। ज्ञानस्यान्तरत्वाज्ज्ञेयस्य चात्मनो बाह्यत्वेन तयोरेकाकारत्वाभावादिति भावः। नन्वात्मनिष्ठः सत्तारूप एवाकारो ज्ञानस्याप्यस्तीत्येवं ज्ञानज्ञेययोः सत्तयैकाकारत्वमस्तीत्याशङ्कते।। एकैवेति।। अनङ्गीकारादिति। अस्माभिः सत्तायाः प्रातिस्विकत्वाङ्गीकारादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">घटाकारमपीति। आत्मघटयोरपि सत्तयैकाकारत्वस्य सद्भावादित्यर्थः। दूषणान्तरमाह।। न द्वितीय इति। कुतो न द्वितीय इत्यत आत्माकार इवाकार इत्यत्र ज्ञाने आत्माकारेणात्यन्तसादृश्यं विवक्षितं सत्तया यत्किञ्चित्सादृश्यं वेति विकल्पं हृदि निधायाद्यं दूषयति।। अत्यन्तेति। ज्ञानस्यान्तरत्वादात्मनो बाह्यत्वादिति भावः। द्वितीयं दूषयति।। किञ्चिदिति।। अतिप्रसञ्जकत्वादिति। वेदान्तवाक्यजनित ज्ञानमात्माकारमेव कुतो घटाकारमपि किन्न स्यादित्यतिप्रसङ्ग इत्यर्थः।। साक्षादिति। घटस्य घटत्वमिवेत्यर्थः।। आधारेति। आकारो ह्याकारिणमाश्रयते न चात्मा तमाश्रयत इत्यर्थः। तद्विषयत्वमेव हि तदाकारत्वमिति मूलं मनसि निधायाह।। अत इति। तदेवग तदाकारत्वमेव।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C10_S01_B05">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-ननु भवेदिदं यदि दृग्विषयत्वं दृश्यत्वम्। स्वप्रतिबद्धव्यवहारे स्वातिरिक्तसंविदपेक्षानियतिर्दृश्यत्वम्। कथमेतादृशी दृश्यता कथितदूषणगणग्रस्ता स्यात्। मैवम्। अतिरिक्तपदेन पारमार्थिकभेदवत्त्वं वाऽऽविद्यकभेदवत्त्वं वा। नाद्यः। तवासिद्धेः। न द्वितीयः। ममासिद्धेः। सामान्यतः प्रयोग इति च प्रागेव परास्तम्। संविदपेक्षानियतत्वमात्रस्य हेतुत्वोपपत्तेर्व्यर्थविशेषणत्वं च। न चास्ति रजतेऽपि ज्ञानावेक्षा व्यवहाराय तस्याध्यस्ततयैव सिद्ध्यभ्युपगमादित्यवादिष्म। अत्यन्तासत्यनैकान्त्यं च। न च तदपि मिथ्येति वाच्यम्। तथा सति रजतादेरसद्विलक्षणत्वप्रतिपादन प्रयासवैय्यर्थ्यापातात्। न च बाध्यत्वमसतो युज्यते। अप्रतीत्यङ्गीकारात्। नापि तस्यानिर्वचनीयत्वम्। तत्र प्रमाणाभावादिति।। छ ।। दृश्यत्वहेतुनिरासः ।। छ ।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C10_S01_B05 | | | verse_id = VA_C11_S01 |
| | id = VA_C10_S01_B05_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C11_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्न द्वितीयः। आत्मत्वस्य प्रागुक्तप्रकारान्तर्भावे साध्याविशिष्टतासिद्ध्यनैकान्त्यान्यतमापातात्। एतेन यत्त्वयाऽऽत्मत्वमभिप्रेतं तदेवास्त्वस्माकमिति परिहृतम्। अस्माकमुक्तप्रकारान्यतरसङ्ग्रहसम्भवात्। न तृतीयः। वृत्तिज्ञानभागेऽसिद्धत्वात्। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">।। भवेदिदं दृग्विषयत्वं दृश्यत्वमिति। दृग्विषयत्वरूपे दृश्यत्वेऽस्माभिरभिहिते सतीदमात्मन्यनैकान्त्यादिरूपं दूषणं भवेदिति। न चैवं किन्त्विति शेषः।। स्वप्रतिबद्धेति। स्वसम्बद्धेत्यर्थः। स्वविषयकेति यावत्। यद्यपीदं पूर्वं शङ्कितं तथाऽप्यधिकस्य नियतिपदस्य प्रक्षेपेणेयं शङ्केति ध्येयम्।। कथितदूषणेति। आत्मनि व्यभिचारादित्यर्थः। तथा चात्मनोऽद्वितीयत्वादिव्यवहारेऽद्वितीयत्वादिविशेषणोपनायकमानापेक्षत्वेन स्वातिरिक्तसंवित्सापेक्षत्वेऽपि निर्विकल्पकस्वरूपमात्रव्यवहारे तदपेक्षाया अभावेन नियत्यभावन्नात्मन्यनैकान्त्यमिति भावः। तर्हि घटोऽपि तथैवेत्यसिद्धिः। घटे निर्विकल्पकव्यवहार एव नास्तीति चेन्न। आत्मन्यपि स नास्त्येवेत्यादिपूर्वोक्तं दूषणं स्पष्टत्वाच्छिष्यैरेवोह्यतामित्यनुक्त्वादूषणान्तरमाह।। अतिरिक्तपदेनेति।। पारमार्थिकेत्यादि। तथा च स्वप्रतियोगिकपारमार्थिकभेदवत्संवित्सापेक्षत्वं वाऽऽविद्यकभेदवत्संवित्सापेक्षत्वं वेति विकल्पार्थो द्रष्टव्यः।। तवासिद्धेरिति। पारमार्थिकभेदस्य त्वयाऽनङ्गीकारेण तद्धटितहेतोस्त्वन्मतेऽसिद्धिरित्यर्थः।। ममासिद्धेरिति। आविद्यकभेदस्य मयाऽनङ्गीकारेण तद्धटितहेतोर्मन्मतेऽसिद्धिः स्यादित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु पारमार्थिकत्वादिविशेषणमपहाय सामान्याकारेण भेदमात्रं विवक्षित्वा स्वातिरिक्तेति प्रयोगः क्रियत इति नोक्तदोष इत्याशङ्क्य निराकरोति।। सामान्यत इति।। प्रागेव परास्तमिति। जलनलिननभोनलिनयोर्नलिनत्वसामान्यवत्पारामार्थिका विद्यकभेदयोर्भेदत्वसामान्यमेव नास्ति। आविद्यकभेदरूपव्यक्तेरेवाभावादिति प्रागेव परास्तप्रायमित्यर्थः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">व्यर्थविशेषणमिति। स्वव्यवहारे स्वातिरिक्तेति विशेषणमित्यर्थः। अस्तु वा स्वातिरिक्तेति विशेषणं तथाऽपि साधनकैकल्यं स्यादित्याह।। न चास्तीति। चशब्दो दूषणान्तरसमुच्चयार्थः।। ज्ञानेति। स्वातिरिक्तसंविदित्यर्थः। व्यवहाराय स्वव्यवहाराय ।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु शुक्तिरजतेऽपि स्वव्यवहारे स्वातिरिक्तसंवित्सापेक्षा कुतो नास्तीति चेत्तत्राह। अध्यस्ततयैवेति। प्रातिभासिकतयैवेत्यर्थः।। सिद्धीति। रजतसिद्धीत्यर्थः। तथा च रजतस्य प्रतिभासमात्रशरीरत्वेन स्वव्यवहारे स्वातिरिक्तसंवित्सापेक्षत्वाभावादिति भावः। दृग्व्यावर्तकत्वरूपदृश्यत्वस्यात्यन्तासति शशविषाणादावनैकान्त्यं चाह।। अत्यन्तासतीति। साध्यस्यापि सत्त्वान्न व्यभिचार इत्याशङ्क्य निषेधति।। न च तदपीति। अत्यन्तासदपीत्यर्थः। शुक्तिरजतवदत्यन्तासतोऽपि मिथ्यात्वाङ्गीकारे यदसत्तन्न प्रतीयते प्रतीयते चेदं रजतं तस्मान्नासतोऽपि मिथ्यात्वाङ्गीकारे यदसत्तन्न प्रतीयते प्रतीयते चेदं रजतं तस्मान्नासदित्येवं शुक्तिरजतादेरसद्वैलक्षण्यप्रतिपादनायासो व्यर्थः स्याद्रजतासतोरुभयोरपि मिथ्यात्वेन समानत्वादिति भावः। असतो मिथ्यात्वाङ्गीकारे दूषणान्तरं चाह।। न चेति। चशब्दो दूषणान्तरसमुच्चये। बाध्यत्वं बाध्यत्वरूपं मिथ्यात्वं कुतो न युज्यत इत्यत आह।। अप्रतीत्यङ्गीकारादिति। मिथ्यात्वं हि बाध्यत्वं तच्च प्रतिपन्नोपाधेस्त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वरूपं न चासतस्तद्युज्यते। प्रतियोग्यधिकरणतया प्रतिपन्नोपाधेरेवाभावेन कस्मिन्नपाधौ तस्य प्रतीत्यनङ्गीकारात्। अतो बाध्यत्वरूपमिथ्यात्वस्य तत्राभावादसत्यनैकान्त्यं स्यादेवेति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु न बाध्यत्वं मिथ्यात्वं किन्त्वनिर्वचनीयत्वं तदसत्यप्यस्तीति न व्यभिचार इत्याशङ्कक्य निषेधति।। नापीति। अनिर्वचनीयत्वरूपमिथ्यात्वमपि तस्यासतः कुतो नेत्यत आह।। तत्रेति। अनिर्वचनीये प्रमाणाभावेन तादृशमिथ्यात्वसाधनेऽनुमानस्याप्रसिद्धविशेषणत्वं स्यात्। तथा च बाध्यत्वरूपं एव मिथ्यात्वे साध्येऽसति तदभावेन व्यभिचारः सुस्थ इति भावः। यद्वा मिथ्यात्वं नामानिर्वचनीयत्वं तच्च सदसद्वैलक्षण्यं तच्चासति न सम्भवति। कुत इत्यत आह।। तत्रेति। असदसन्नेति प्रतीत्यभावेन तत्रासद्वैलक्षण्यसद्भावे प्रमाणाभावादनिर्वचनीयत्वरूपमिथ्यात्वस्यापि तत्राभावेनासत्यनैकान्त्यं सुस्थमिति भावः। उपलक्षणमेतत्। रजतवदसतोऽप्यनिर्वचनीयत्वे रजतस्यासद्वैलक्षण्यप्रतिपादानायासो व्यर्थः स्यादित्यपि द्रष्टव्यम्। दृश्यत्वदूषणसमाप्तावितिशब्दः ।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 11 ==
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न च जडत्वहेतुरपि निगदितदूषणगणलङ्घने जङ्घालः। तथा हि। किमिदं जडत्वं नाम। ज्ञानानाधारत्वं वाऽनात्मत्वं वाऽज्ञानरूपत्वं वाऽस्वप्रकाशत्वं वा।नाद्यः। विशिष्टात्मनि पक्षनिक्षिप्तेऽसिद्धत्वात्। असदात्मनोर्विपक्षभूतयोश्च वर्तमानत्वात्। न द्वितीयः। अनात्मत्वपदेनात्मातिरिक्तत्वं वाऽऽत्मत्वानाधारत्वं वा विवक्षितम्। नाद्यः। तवासिद्धेः। न हि त्वत्पक्षे परमात्मनो जगदतिरिक्तमस्ति। परमार्थतस्तदभावेऽप्यनाद्यविद्याविलसितो भेदोऽस्तीति चेत्तर्ह्यस्माकमसिद्धो हेतुः। असति व्यभिचारश्च।</span>
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| | verse_id = VA_C11_S01_B01 | | | verse_id = VA_C11_S01 |
| | id = VA_C11_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C11_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्आत्मनो ज्ञानस्वरूपता न निर्वाह्यतामारोहति। तथा हि। तज्ज्ञानं सविषयं निर्विषयं वा। आद्ये स्वविषयं परविषयं वा। नाद्यः। स्ववृत्तिविरोधात्। न द्वितीयः । मोक्षे ज्ञआनाभावप्रसङ्गात्। नोत्तरः। ज्ञानत्वस्यैवाभावप्रसङ्गात्। निर्विषयज्ञानरूपत्वे चास्तु प्रपञ्चेऽपि तादृग्ज्ञानरूपत्वमित्यसिद्धिप्रसङ्गः। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">एकादशभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। निगदितदूषणेति। व्यभिचारादिदूषणेत्यर्थः। जङ्घालः समर्थो विभुः समर्थो जङ्घाल इत्यमरोक्तेः।। अज्ञानरूपत्वमिति। ज्ञानरूपत्वाभाव इत्यर्थः। विशिष्टात्मनीति। समुदायापेक्षमेकवचनम्।। असिद्धत्वादिति। विशिष्टात्मनां ज्ञानाधारत्वेन तदनाधारत्वरूपजडत्वस्य भागासिद्धत्वादित्यर्थः। विरुद्धत्वं चाह।। असदात्मनोरिति।। विपक्षभूतयोरिति। प्रतिपन्नोपाधौ त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वरूप मिथ्यात्वशून्ययोरित्यर्थः।। वर्तमानत्वादिति। तथा च साध्याभावव्याप्तत्वाद्विरुद्धत्वमिति भावः। तामेवासिद्धिमुपपादयति।। न हीति। तथा चात्मातिरिक्तत्वरूपानात्मत्वरूपं यज्जडत्वं तस्य तस्य त्वन्मतेऽसिद्धिरिति भावः। शङ्कते।। परमार्थत इति।। तदभावेऽपिति। आत्मप्रतियोगिकभेदाभावेऽपीत्यर्थः। अविद्याविलसितोऽविद्याया प्रतीयमानः ।। भेदोऽस्तीति। तथा चात्मप्रतियोगिकाविद्यकभेदवत्त्वरूपं यदनात्मत्वं तद्रूपजडत्वस्य न ममासिद्धिरित्यर्थः।। अस्माकमिति। आविद्यकभेदस्यास्माभिरनङ्गीकारेण तद्धटितजडत्वहेतोरस्माकमसिद्धिः स्यादित्यर्थः। असत्यात्मातिरिक्तत्वरूपानात्मत्वाख्यजडत्वसद्भावेऽपि निरुक्तमिथ्यात्वाभावद्व्यभिचारश्च स्यादित्याह।। असतीति।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्न द्वितीयः। आत्मत्वस्य प्रागुक्तप्रकारान्तर्भावे साध्याविशिष्टतासिद्ध्यनैकान्त्यान्यतमापातात्। एतेन यत्त्वयाऽऽत्मत्वमभिप्रेतं तदेवास्त्वस्माकमिति परिहृतम्। अस्माकमुक्तप्रकारान्यतरसङ्ग्रहसम्भवात्। न तृतीयः। वृत्तिज्ञानभागेऽसिद्धत्वात्।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C11_S01_B02 | | | verse_id = VA_C11_S01 |
| | id = VA_C11_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C11_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्न चतुर्थः। स्वकर्मकसंविद्रूपतामन्तरेण स्वप्रकाशान्तरस्योत्तरत्र वारयिष्यमाणत्वात्। स्वकर्मकप्रकाशत्वस्यात्मन्यपि तवाभावादिति। एतेनाचेतनत्वं जडत्वमिति निरस्तम्। उक्तपक्षाबहिर्भावात्। अस्माभिर्ज्ञातृत्वानाधारत्वस्य जडत्वेनाभिलापान्नास्मत्प्रतिबन्धी।। छ ।। जडत्वहेतुनिरासः ।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। प्रागुक्तेति। किं तदात्मत्वमिति प्रागुक्तप्रकारेत्यर्थः।। साध्याविशिष्टतेत्यादि। अबाध्यत्वमात्मत्वमित्युक्ते बाध्यत्वरूपानात्मत्वं जडत्वमित्युक्तं स्यात्तदेव च मिथ्यात्वमिति साध्याविशिष्टता। ज्ञानत्वमात्मत्वमित्युक्तेऽज्ञानत्वरूपानात्मत्वं जडत्वमित्युक्तं स्यात्। तथा च वृत्तिज्ञानभागेऽसिद्धिः। ज्ञानाधारत्वमित्युक्ते तदनाधारत्वरूपानात्मत्वं जडत्वमित्युक्तं स्यात्। तथा चासत्यनैकान्त्यं स्यादित्यर्थः। एतेनेत्युक्तं विशदयति।। असमाकमिति। कर्तरि षष्ठी। अस्माभिरित्यर्थः। अस्माकं मत इति शेषो वा।। उक्तप्रकारान्यतरेति।। ज्ञानाधारत्वज्ञानत्वान्यतरेत्यर्थः। तर्हि तदेवात्मत्वं मन्मतेऽस्त्विति चेत्तत्राह।। तस्य च त्वन्मतेसम्भवादिति। ज्ञानानाधारत्वरूपानात्मत्वाख्यजडत्वस्या सत्यनैकान्त्यप्रसङ्गेनाज्ञानत्वरूपानात्मत्वाख्यजडत्वस्य वृत्तिज्ञानभागेऽसिद्धिप्रसङ्गेन च त्वन्मतेऽसम्भवादित्यर्थः। अज्ञानरूपत्वं जडत्वमिति तृतीयः पक्षः कस्मान्न युज्यत इत्यत आह।। वृत्तिज्ञानेति। अज्ञानरूपत्वाख्यजडत्वस्यात्मनि व्यभिचारश्चेति।</p>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C11_S01_B03"> | | <span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == द्वादशभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्आत्मनो ज्ञानस्वरूपता न निर्वाह्यतामारोहति। तथा हि। तज्ज्ञानं सविषयं निर्विषयं वा। आद्ये स्वविषयं परविषयं वा। नाद्यः। स्ववृत्तिविरोधात्। न द्वितीयः । मोक्षे ज्ञआनाभावप्रसङ्गात्। नोत्तरः। ज्ञानत्वस्यैवाभावप्रसङ्गात्। निर्विषयज्ञानरूपत्वे चास्तु प्रपञ्चेऽपि तादृग्ज्ञानरूपत्वमित्यसिद्धिप्रसङ्गः।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C11_S01_B03 | | | verse_id = VA_C12_S01 |
| | id = VA_C11_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C12_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-परिच्छिन्नत्वहेतुरपि न साध्यसाधकतामध्यस्ते। तथा हि। परिच्छिन्नत्वं नाम देशतः परिच्छिन्नत्वं वा कालतो वाऽन्योन्याभावाधिकरणत्वं वा। नाद्यः। कालाकाशादिभागेऽसिद्धेः। अत एव न द्वितीयः। ब्रह्मव्यतिरिक्तं सकलमपि देशकालाभ्यां परिच्छिन्नमिति चेन्न। व्याघातात्। तथा हि। देशतः परिच्छिन्नत्वं नाम क्वचिन्निष्ठाभावप्रतियोगिता। तथा न सर्वस्याभावं प्रतिजानता किञ्चिदधिष्ठानमभ्युपेयम्। अभावस्याधिष्ठानबोधाधीनबोधत्वात्। तथा च कथं न व्याघातः। सकलमपि ब्रह्मण्यध्यस्तमतस्तत्र नास्तीति निषेधान्नाधिष्ठानाभ्युपगत्या व्याघात इति चेन्न। परिच्छिन्नता नाम बाध्यतेत्यर्थः स्यात्तथात्वे साध्याविशिष्टतयैव दुष्टतापत्तिः। कालपरिच्छेदे चानित्यता सादिता त्रिकालासत्यता वाऽभिप्रेता भवेत्तथा च कालस्यैतादृशपरिच्छेदायोगेनागतः स एव दुरात्मा व्याघातः। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।ननु कथमात्मनि व्यभिचारस्तस्य ज्ञानरूपत्वेन ज्ञानरूपत्वाभावरूपजडत्वस्य तत्राभावादिति चेत्तत्राह।। आत्मन इति।। न निर्वाह्यतामारोहतीति। निर्वहितुमशक्येति यावदित्यर्थः। तज्ज्ञानमात्मरूपं ज्ञानम्।। स्ववृत्तिविरोधादिति। प्रत्यक्त्वपराक्त्वरूपकर्तृत्वकर्मत्वयोर्भेदनियतत्वेन तयोस्त्वन्मते एकत्रैव स्वस्मिन्वृत्तेर्विरुद्धत्वादित्यर्थः। क्रियाकर्मणोरेकत्वस्य विरुद्धत्वादिति वाऽर्थः।। प्रसङ्गदिति। मोक्षे पराभावादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ज्ञानत्वस्यैवेति। ज्ञानस्वरूपत्वस्यैवेत्यर्थः। निर्विषयत्वे ज्ञानत्वमेव न स्याद्धटवदिति भावः। तुष्यतु दुर्जन इति न्यायेनाह।। निर्विषयज्ञानरूपत्वे चेति।। अस्तिति। वियदादिप्रपञ्चस्यापि ज्ञानरूपत्वेनाज्ञानरूपत्वहेतोरसिद्धिः। स्यात्। न च प्रपञ्चे ज्ञानरूपत्वं युक्तम्। तस्य विषयत्वाभावात्परविषयत्वाभावाच्च निर्विषयत्वे ज्ञानरूपत्वमेव स्यादिति वाच्यम्। आत्मवत्प्रपञ्चेऽपि निर्विषयज्ञानरूपत्वसम्भवादिति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्न चतुर्थः। स्वकर्मकसंविद्रूपतामन्तरेण स्वप्रकाशान्तरस्योत्तरत्र वारयिष्यमाणत्वात्। स्वकर्मकप्रकाशत्वस्यात्मन्यपि तवाभावादिति। एतेनाचेतनत्वं जडत्वमिति निरस्तम्। उक्तपक्षाबहिर्भावात्। अस्माभिर्ज्ञातृत्वानाधारत्वस्य जडत्वेनाभिलापान्नास्मत्प्रतिबन्धी।। छ ।। जडत्वहेतुनिरासः ।। छ ।।</span>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C11_S01_B04 | | | verse_id = VA_C12_S01 |
| | id = VA_C11_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C12_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्- कुतश्चाकाशादेः कालपरिच्छेदाध्यवसायः। जडत्वहेतुनेति चेन्न। तस्यापाकृतत्वात्। घटादौ कार्यताप्रयुक्तत्वाच्च परिच्छिन्नत्वस्य। यज्जडं तत्कार्यमिति चेन्न। अविद्यायां व्यभिचारात्। तस्याश्च कार्यत्वेऽनादित्वपरिभाषा परिलुप्येत। तत्कारणस्याभावश्च। पञ्चमप्रकारं मोक्षमाचक्षाणस्य जडत्वहेतोर्मोक्षे नित्यतयाऽभ्युपगते व्यभिचारः। तस्य च कालपरिच्छिन्नत्वे पुनरावृत्तिप्रसङ्गः। न हि सहस्राक्षोऽपि क्षयं क्षेप्तुं क्षम (त) इत्युन्मत्तवादश्च स्यात्। न तृतीयः। नेति नेतीत्यादिना ब्रह्मण्यपि जगदन्योन्याभावाधिकरणतायाः श्रुतत्वात्। सोऽपि भेदोऽविद्याविलसित इति चेन्न। तत्किमिदानीं परमार्थभेदभिन्नत्वं हेतुः। तथा सति पक्षे तदसिद्धिः स्यात्। विरुद्धता च स्यादिति।। छ ।। परिच्छिन्नत्वहेतुनिरासः।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। न चतुर्थ इति। अप्रकाशत्वं जडत्वमिति चतुर्थः पक्षो नेत्यर्थः। कुतो नेति चेत्स्वप्रकाशत्वस्य दुर्निरूपत्वादिति भावः। कथं दुर्निरूपत्वमिति चेत्तत्राह।। स्वकर्मकेति। स्वकर्मकज्ञानरूपत्वं विनेत्यर्थः।। प्रकाशान्तरस्येति। स्वतःसिद्धत्वादिरूपस्येत्यर्थः।। उत्तरत्रेति। अनुमानविरोधकथनावसरे स्वतःसिद्धत्वान्नेति चेन्न। स्वत इति स्वेनेति वा प्रमामेन विनेति वेत्यादिना ग्रन्थेनेत्यर्थः। अस्तु तर्हि स्वकर्मकप्रकाशरूपत्वमेव स्वप्रकाशत्वमित्यत आह।। स्वकर्मकप्रकाशत्वस्येति।। आत्मन्यपीति। न केवलं प्रपञ्चे किन्त्वात्मन्यपीत्यर्थः।। तवाभावादिति। कर्तृत्वकर्मत्वयोरेकत्र समावेशस्य निर्विशेषवादिनस्तव मतेऽभावेनाप्रकाशत्वरूपजडत्वस्यात्मनि व्यभिचार इति भावः। एतेनेत्युक्तं विशदयति। उक्तपक्षेति। किं तच्चेतनत्वं ज्ञानत्वं ज्ञानाधारत्वं वेत्यादिनोक्तपक्षाबहिर्भावादित्यर्थः। तत्र चासति व्यभिचारादिकं दूषणमुक्तमेवेति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु भवद्भिर्यज्जडत्वमङ्गीक्रियते तदेव मम हेतुत्वेनाभिप्रेतमित्यत आह।। अस्माभिरिति।। ज्ञातृत्वानाधारत्वस्येति। अप्रमातृत्वस्येति यावत्। तथा चास्मदभिमतस्य ज्ञातृत्वानाधारत्वरूपजडत्वस्य मिथ्यात्वसाधनाय हेतूकरणे त्वया ज्ञानरूपस्यात्मनो ज्ञातृत्वाधारतयाऽनङ्गीकारात्तत्र व्यभिचारः स्यादिति भावः। यथोक्तम्। जडत्वं चाप्रमातृत्वमेव। न च प्रमातृत्वमात्मनस्यैरङ्गीक्रियतेऽतस्तदप्यनैकान्तिकमिति।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 12 == | | <span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशभङ्गः"></span> |
| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C12_S01_B01">
| | == त्रयोदशभङ्गः == |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-परिच्छिन्नत्वहेतुरपि न साध्यसाधकतामध्यस्ते। तथा हि। परिच्छिन्नत्वं नाम देशतः परिच्छिन्नत्वं वा कालतो वाऽन्योन्याभावाधिकरणत्वं वा। नाद्यः। कालाकाशादिभागेऽसिद्धेः। अत एव न द्वितीयः। ब्रह्मव्यतिरिक्तं सकलमपि देशकालाभ्यां परिच्छिन्नमिति चेन्न। व्याघातात्। तथा हि। देशतः परिच्छिन्नत्वं नाम क्वचिन्निष्ठाभावप्रतियोगिता। तथा न सर्वस्याभावं प्रतिजानता किञ्चिदधिष्ठानमभ्युपेयम्। अभावस्याधिष्ठानबोधाधीनबोधत्वात्। तथा च कथं न व्याघातः। सकलमपि ब्रह्मण्यध्यस्तमतस्तत्र नास्तीति निषेधान्नाधिष्ठानाभ्युपगत्या व्याघात इति चेन्न। परिच्छिन्नता नाम बाध्यतेत्यर्थः स्यात्तथात्वे साध्याविशिष्टतयैव दुष्टतापत्तिः। कालपरिच्छेदे चानित्यता सादिता त्रिकालासत्यता वाऽभिप्रेता भवेत्तथा च कालस्यैतादृशपरिच्छेदायोगेनागतः स एव दुरात्मा व्याघातः।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C12_S01_B01 | | | verse_id = VA_C13_S01 |
| | id = VA_C12_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C13_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम् - सन्घट इत्यादिप्रत्यक्षेण बाधितविषयत्वात्कालात्ययापदिष्टच्च। ननु केयं सत्यता या प्रत्यक्षगोचरा। किं सत्त्वं वा विधिगम्यत्वं वाऽर्थक्रियाकारित्वं वा प्रातिभासिकेतरत्वं वाऽसत्त्वातिरिक्तत्वं वाऽबाध्यत्वं वा। आद्यपञ्चकान्यतमाभ्युपगमे नास्माकं प्रत्यक्षविरोधः। तस्यास्माभिरिनिराकरणात्। न षष्ठः। प्रत्यक्षस्योत्तरकालीनबाधाभावग्राहितायोगात्। तस्मात्सद्गन्धर्वनगरमित्यादिवदयं प्रत्यक्षेण सत्त्वग्रहणप्रवाद इति। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">द्वादशभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">।साधकतां मिथ्यात्वसाधकताम्। अधि अधिकृत्य। नास्ति तत्साधको न भवतीति यावदित्यर्थः।। कालतो वेति। कालतः परिच्छिन्नत्वं नामानित्यत्वमित्यर्थः। वस्तुतः परिच्छिन्नत्वरूपतृतीयविकल्पमर्थतोऽनुवदति।। अन्योन्याभावेति। तथा च वस्त्वन्तरप्रतियोगिकान्योन्याभावाधिकरणत्वरूपं वस्तुतः परिच्छिन्नत्वं वेत्यर्थः। देशतः कालतः परिच्छिन्नत्वं प्रकृतिकालादिष्वभावाद्भागासिद्धमिति तत्त्वोद्योतवाक्यं मनसि निधायाह।। कालेति। आदिपदेन प्रकृते पञ्चाशद्वर्णानां च ग्रहणम्।। भागेऽसिद्धेरिति। कालादीनां व्याप्तत्वेन देशतः परिच्छिन्नत्वाभावादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अत एवेति। भागेऽसिद्धेरेवेत्यर्थः। कालादीनां नित्यत्वेन कालतः परिच्छिन्नत्वाभावादित्यर्थः। भागासिद्धिपरिहारं शङ्कते।। ब्रह्मव्यतिरिक्तमिति।। क्कचिन्निष्ठेति। किञ्चिन्निष्ठेत्यर्थः।। सर्वस्येत्यादि। ब्रह्मव्यतिरिक्तं सकलं किञ्चिद्रूपमधिष्ठानमधिकरणमभ्युपेयमित्यर्थः। कुत इत्यत आह।। अभावस्येति।। अधिष्ठानेति। अधिकरणज्ञानाधीनज्ञानत्वादित्यर्थः। सद्भ्यामधिकरणप्रतियोगिभ्यामभावो निरुप्यत इति वचनादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">कथं न व्याघात इति। ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य सकलस्यापि किञ्चिन्निष्ठाभाव प्रतियोगित्वेऽधिकरणभूतस्य किञ्चितोऽभावप्रतियोगित्वं नास्तीति प्राप्तम्। ब्रह्मव्यतिरिक्तसकलमध्येऽधिकरणभूतस्य किञ्चितोऽपि प्रविष्टत्वेनाभावप्रतियोगित्वमस्तीति प्राप्तम्। तथा च व्याघात इत्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य किञ्चितोऽधिष्ठानत्वं नाभ्युपगम्यते येनोक्तरीत्या व्याघातः स्यात्किन्त्वित्यत आह।। सकलमपीति। तत्र ब्रह्मण्यध्यस्तत्वमभ्युपगमेन ब्रह्मरूपाधिष्ठानाभ्युपगमेन न व्याघात इत्यर्थः।। बाध्यतेत्यर्थः स्यादिति। देशतः परिच्छिन्नत्वं नाम ब्रह्मनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वमित्युक्त्या प्रतिन्नोपाधौ निषेधप्रतियोगित्वरूपबाध्यत्वमेवार्थतयोक्तं स्यादित्यर्थः।। साध्याविशिष्टतयैवेति। बाध्यताया एव च मिथ्यात्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">दुष्टतापत्तिरिति। देशतः परिच्छिन्नत्वहेतोरित्यर्थः। अनित्यतोत्तरकालेऽसत्त्वम्। सादिता पूर्वकाले सत्त्वम्।। त्रिकालासत्वेति। त्रैकालिकसत्त्वप्रतिषेध इत्यर्थः।। एतादृशेति। अनित्यतादिरूपेत्यर्थः।। स एव दुरात्मा व्याघात इति। उत्तरकाले पूर्वकाले कालत्रये च कालस्य सत्त्वाभावोक्तौ सत्त्वाभावाधिकरणतया कालस्य सत्त्वप्राप्त्या पुनस्तन्निषेधे स एव दुरात्मा पापी व्याघातः स्यात् यो देशतः परिच्छेद उक्त इत्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C12_S01_B02">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्- कुतश्चाकाशादेः कालपरिच्छेदाध्यवसायः। जडत्वहेतुनेति चेन्न। तस्यापाकृतत्वात्। घटादौ कार्यताप्रयुक्तत्वाच्च परिच्छिन्नत्वस्य। यज्जडं तत्कार्यमिति चेन्न। अविद्यायां व्यभिचारात्। तस्याश्च कार्यत्वेऽनादित्वपरिभाषा परिलुप्येत। तत्कारणस्याभावश्च। पञ्चमप्रकारं मोक्षमाचक्षाणस्य जडत्वहेतोर्मोक्षे नित्यतयाऽभ्युपगते व्यभिचारः। तस्य च कालपरिच्छिन्नत्वे पुनरावृत्तिप्रसङ्गः। न हि सहस्राक्षोऽपि क्षयं क्षेप्तुं क्षम (त) इत्युन्मत्तवादश्च स्यात्। न तृतीयः। नेति नेतीत्यादिना ब्रह्मण्यपि जगदन्योन्याभावाधिकरणतायाः श्रुतत्वात्। सोऽपि भेदोऽविद्याविलसित इति चेन्न। तत्किमिदानीं परमार्थभेदभिन्नत्वं हेतुः। तथा सति पक्षे तदसिद्धिः स्यात्। विरुद्धता च स्यादिति।। छ ।। परिच्छिन्नत्वहेतुनिरासः।। छ ।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C12_S01_B02 | | | verse_id = VA_C13_S01 |
| | id = VA_C12_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C13_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-मैवम्। अबाध्यतायाः प्रत्यक्षग्राह्यत्वात्। न च तस्योत्तरकालीनबाधाभावाग्राहकत्वमिति वाच्यम्। तदानीमबाध्यताग्रहणेनैव तत्सिद्धेः। तत्कालीनाबाध्यता गन्धर्वनगरेऽपि गृह्यत इति चेत्। सत्यम्। तथाऽप्यस्ति विशेषः। प्रामाण्यं हि ज्ञानस्योत्सर्गतोऽपवादादप्रामाण्यमिति विद्वत्सम्मतिः। तथा च तत्र बाधकादप्रामाण्यमुपस्थाप्यते प्रकृते तु तादृशबाधकादर्शनात्त्रिकालाबाध्यतैव निरपवादात्सिध्यतीति। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।कुतः प्रमाणात्।। कालपरिच्छेदेति। अनित्यत्वेत्यर्थः।। जडत्वहेतुनेतीति। तथा चाकाशादिकं कालतः परिच्छिन्नं जडत्वाद्धटवदित्यर्थः।। अपाकृतत्वादिति। ज्ञानानधिकरणत्वादिरूपजडत्वस्यात्मन्यपि सत्त्वेन तत्र निरुक्तानित्यत्वादिरूपकालतः परिच्छिन्नत्वाभावाद्व्यभिचार इत्यपास्तप्रायत्वादित्यर्थः। सोपाधिकत्वाच्च नोक्तानुमानं युक्तमित्याह।। घटादाविति। तथा च नित्यत्वरूपकालतः परिच्छिन्नत्वे कार्यत्वमेव प्रयोजकं न जडत्वं कृतकत्वसावयवत्वादिप्रयुक्ता च विनाशितेति वचनात्। प्रयोजकश्चोपाधिरित्युच्यते। तथा च घटादौ साध्यव्यापकत्वात्साधनवति पक्षेऽभावेन साधनाव्यापकत्वाच्च कार्यत्वमुपाधिरिति भावः। साधनव्यापकत्वान्नयमुपाधिरिति शङ्कते।। यज्जडमिति। तथा च जडत्वेनैव कार्यत्वमपि पक्षे साध्यत इति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु तत्रापि साध्यस्य सत्त्वान्न व्यभिचार इत्याशङ्क्य निरोकरोति।। तस्याश्चेति।। अनादित्वपरिभाषेति। जीव इशो विशुद्धा चिद्भेदस्तस्यास्तयोर्द्वयोः। अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमनादयः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">इत्यकार्यत्वापरनामकानादित्वपरिभाषासञ्ज्ञा लुप्येतेत्यर्थः।। तत्कारणस्येति। अविद्यायाः कार्यत्वाङ्गीकारे यत्कार्यं तत्सकारणकमिति व्याप्तेरविद्यायाः किञ्चित्कारणं वाच्यं तन्नास्तीत्यर्थः। कालपरिच्छिन्नत्वसाधकजडत्वहेतोः स्थलान्तरेऽपि व्यभिचारमाह।। पञ्चमप्रकारमिति। अविद्यानिवृत्तिरूपो मोक्षो न सन् अद्वैतभङ्गात्। नासन्प्रतीतिविरोधात्। न सदसद्विरोधात्। नापि सदसद्विलक्षणरूपोऽनिर्वाच्यः। प्रतियोगितदभावयोर्वैलक्षण्यस्यावश्यकत्वेनाविद्यायाः सदसद्विलक्षणत्वेन तन्निवृत्तिरूपमोक्षस्यापि तथात्वायोगादतः सदसद्विलक्षणविलक्षणरूपपञ्चमप्रकारमाचक्षते मायिन इति द्रष्टव्यम्। यथोक्तम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">न सन्नासन्न सदसन्नानिर्वाच्यश्च तत्क्षयः। यक्षानुरूपो बलिरित्याचार्याः प्रत्यपीपदन्निति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">साध्याभावोपपादनाय नित्यतयाऽभ्युपगत इत्युक्तम्। साध्यस्यापि सत्त्वान्न व्यभिचार इत्याशङ्क्य निराकरोति।। तस्येति। अविद्याध्वंसरूपमोक्षस्येत्यर्थः। कालपरिच्छिन्नत्वेऽनित्यत्वे।। पुनरावृत्तिप्रसङ्ग इति। अविद्यास्तमयो मोक्षः स संसार उदाहृत इति वचनात्। अविद्यारूपसंसारस्य पुनःप्राप्तिः स्यादित्यर्थः। इतोऽपि ध्वंसस्य नित्यत्वाङ्गीकारो न युक्त इत्याह ।। न हीति। इन्द्रोऽपि क्षयं ध्वंसं क्षेप्तुम्। क्षिपु निरसने। निरसितुमनित्यं कर्तुं न क्षमो न समर्थः। तथात्वे प्रतियोग्युन्मज्जनापत्तेः। इति हेतोस्त्वया मनुष्यमात्रेण ध्वंसस्यानित्यत्वाङ्गीकृतावुन्मत्तवादस्तव स्यादित्यर्थः। तथा चाविद्यानिवृत्तिरूपमोक्षस्यानित्यत्वात्तत्र जडत्वहेतोर्व्यभिचारः सुस्थ इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">नेति नेतीत्यादिनेति। स एष आत्मा नेति नेतीत्यादिश्रुतिवाक्येनेत्यर्थः। स एष आत्मा परमात्मा पृथिवीवन्न जलादिवन्नेति श्रुत्यर्थः।। श्रुतत्वादिति। तथा च वस्तुतः परिच्छिन्नत्वहेतोर्ब्रह्मणि व्यभिचार इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">सोऽपि भेदे इति। यो ब्रह्मणि श्रुतो जगदन्योन्याभावरूपवस्तुतः परिच्छेदरूपो भेदः सोऽप्याविद्यकत्वान्मिथ्याभूत इत्यर्थः। तथा च हेतोरेवाभावान्न व्यभिचार इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तत्किमिति। येन तदभावान्न व्यभिचारः स्यादिति भावः। ओमिति चेत्तत्राह।। तथा सतीति ।।तदसिद्धिः स्यादिति। पारमार्थिको यो जगदन्योन्याभावरूपो भेदस्तदधि करणत्वरूपवस्तुतः परिच्छिन्नत्वरूपहेतोर्जगति त्वयाऽनङ्गीकारादसिद्धिः स्यादित्यर्थः।। विरुद्धता चेति। स एष आत्मा नेति नेतीत्यादिना श्रुतस्य जगदन्योन्याभावाधिकरणत्वरूपवस्तुतः। परिच्छिन्नत्वहेतोर्ब्रह्मणि मिथ्यात्वभावेनैव व्याप्ततया दृष्टत्वेन हेतोर्विरुद्धता च स्यादित्यर्थः।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
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| == अध्याय 13 ==
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम् - सन्घट इत्यादिप्रत्यक्षेण बाधितविषयत्वात्कालात्ययापदिष्टच्च। ननु केयं सत्यता या प्रत्यक्षगोचरा। किं सत्त्वं वा विधिगम्यत्वं वाऽर्थक्रियाकारित्वं वा प्रातिभासिकेतरत्वं वाऽसत्त्वातिरिक्तत्वं वाऽबाध्यत्वं वा। आद्यपञ्चकान्यतमाभ्युपगमे नास्माकं प्रत्यक्षविरोधः। तस्यास्माभिरिनिराकरणात्। न षष्ठः। प्रत्यक्षस्योत्तरकालीनबाधाभावग्राहितायोगात्। तस्मात्सद्गन्धर्वनगरमित्यादिवदयं प्रत्यक्षेण सत्त्वग्रहणप्रवाद इति।</span>
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| </div>
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| | verse_id = VA_C13_S01_B01 | | | verse_id = VA_C13_S01 |
| | id = VA_C13_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C13_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-अस्त्वनुमानमेव बाधकं प्रत्यक्षस्येति चेन्न। प्रत्यक्षविरोधेन प्राप्तमरणावस्थस्य प्रत्यक्षविरोधाक्षमत्वात्। अन्यथा दहनशैत्यानुमानमपि तदुष्णतावगाहिप्रत्यक्षबाधकत्वेन प्रमाणं प्रसज्येत। यदा च प्रत्यक्षं समबलप्रत्यक्षान्तरेण न बाध्यते हन्त तदा का वार्ता तत्पादोपजीविनो वराकस्य तर्कस्य तद्बाधकत्वे। नभोमलिनतामाकलयत्प्रत्यक्षममूर्तानुमानेन बाधितं दृष्टमिति चेन्न। तत्राप्याप्तवाक्यादिनैव बाधाभ्युपगमेनासम्प्रतिपत्तेः। यदा च पुनः स्वयमेवानुमिमीते तदाऽपि बलवत्प्रत्यक्षग-हीतव्याप्तिकादेव तस्मादध्यवसायः। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">त्रयोदशभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। बाधितविषयत्वादिति। बाधितसाध्यकविषयत्वादित्यर्थः।। कालात्ययापदिष्ट इति। दृश्यत्वादिहेतुसमुदाय इत्यर्थः। प्रश्नस्यासङ्गीपरिहारायाह।। या प्रत्यक्षगोचरेति।। सत्त्वमिति। सत्ताजातिरित्यर्थः।। विधिगम्यत्वमिति। विधिबुद्धिविषयत्वमित्यर्थः।। अबाध्यत्वमिति। कालत्रयाबाध्यत्वमित्यर्थः। कुतोन विरोध इत्यत आह।। तस्येति। प्रतिपन्नोपाधौ त्रैकालिकसत्यताप्रतिषेधो मिथ्यात्वमिति वदद्भिरस्माभिस्तस्य प्रत्यक्षगृहीतस्याद्यपञ्चकान्यतररूपस्य सत्त्वस्यानिराकरणादित्यर्थः। तथात्व एव ह्यस्माकं प्रत्यक्षविरोधः स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अयोगादिति। तस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वेन कालत्रयाबाध्यत्वरूपसत्त्वग्राहकत्वाभावादिति भावः। तर्हि सन्घट इत्यादिप्रत्यक्षेण घटादिसत्त्वं गृह्यत इति प्रवादस्य का गतिरित्यत आह।। तस्मादिति। तस्मादबाध्यत्वरूपसत्त्वस्य प्रत्यक्षागोचरत्वात्। तथा च मायाविनिर्मितान्तरिक्षगतगन्धर्वनगरसत्त्वावगाहिप्रत्यक्षवज्जगत्सत्यत्वाव गाहिप्रत्यक्षमप्यप्रामाणिकमिति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-मैवम्। अबाध्यतायाः प्रत्यक्षग्राह्यत्वात्। न च तस्योत्तरकालीनबाधाभावाग्राहकत्वमिति वाच्यम्। तदानीमबाध्यताग्रहणेनैव तत्सिद्धेः। तत्कालीनाबाध्यता गन्धर्वनगरेऽपि गृह्यत इति चेत्। सत्यम्। तथाऽप्यस्ति विशेषः। प्रामाण्यं हि ज्ञानस्योत्सर्गतोऽपवादादप्रामाण्यमिति विद्वत्सम्मतिः। तथा च तत्र बाधकादप्रामाण्यमुपस्थाप्यते प्रकृते तु तादृशबाधकादर्शनात्त्रिकालाबाध्यतैव निरपवादात्सिध्यतीति।</span>
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| | verse_id = VA_C13_S01_B02 | | | verse_id = VA_C13_S01 |
| | id = VA_C13_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C13_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्-प्रत्यक्षत्वाद्गन्धर्वनगरप्रत्यक्षवद्विप्रतिपन्नमपि प्रत्यक्षं भ्रान्तं किन्न स्यादिति चेत्तर्हि वाक्यत्वाज्जरद्गवादिवाक्यवत्सत्यज्ञानादिवाक्यमप्रमाणं किन्न स्यात्। किञ्च प्रत्यक्षशब्देन प्रत्यक्षाभासविवक्षायां पक्षे तदभावः। प्रमाणाभिप्राये दृष्टान्तेऽनन्वयः। ज्ञानत्वमात्रस्य हेतुत्वे सत्यज्ञानादिवचनजन्यज्ञाने व्यभिचारः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य प्रत्यक्षबाधः ।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। अबाध्यताया इति। त्रिकालाबाध्यत्वरूपसत्त्वस्येत्यर्थः।। अग्राहकत्वमिति। वर्तमानमात्रग्राहित्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तदानीमबाध्यताग्रहणेनैवेति। वर्तमानकालीनसत्ताग्रहणेनैवेत्यर्थः।। तत्सिद्धेरिति। त्रैकालिकसत्ताप्रतिषेधाभावसिद्धेरित्यर्थः। अयं भावः। यदा प्रत्यक्षं वर्तमानकालसत्तां गृह्णाति तदा त्रैकालिकसत्ताप्रतिषेधाभावं गृह्वात्येव। यदा वर्तमानकालसत्तां गृह्णाति तदा त्रैकालिकसत्ताप्रतिषेधाभावं गृह्वात्येव। यदा वर्तमानकाले सत्ता तदा त्रैकालिकसत्ताप्रतिषेधाभाव इत्येवं वर्तमानकालीनसत्तायास्त्रैकालिकसत्ताप्रतिषेधाभावव्याप्यत्वात्। यथाऽऽहुः</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">स्वकाले ह्यस्तितां गृह्णन्साक्षात्कारस्त्रिकालगम्।प्रतिषेधं निरुन्धानो गृह्णात्येव ह्यबाध्यताम्।। इति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अन्यथा वह्निरनुष्ण इत्यत्रापि प्रतियोगिभूतौष्ण्यग्राहिप्रत्यक्षस्य साक्षाद्ग्राह्याभावावगाहित्वेन विरोधित्वं सर्वसम्मतं तदपि न स्यात्। तत्राप्यनुमानेन त्रैकालिकौष्ण्याभावः। साध्यते। स्पार्शनप्रत्यक्षेण तु वर्तमानकालीनमेवौष्ण्यं गृह्यते। तथा च त्रैकालिकानौष्ण्भावव्याप्यभूतैककालीनौष्ण्याग्राहकत्वेनैव स्पार्शनप्रत्यक्षस्य विरोधित्वं न साक्षादिति वक्तुं शक्यत्वात्। वस्तुतस्तु साक्षाद्ग्राह्याभावावगाहित्वेनैव विरोधित्वम्। न च प्रत्यक्षगृहीतैककालीनसत्तायास्त्रैकालिकसत्ता प्रतिषेधाभावरूपत्वाभावात्कथमेतदिति वाच्यम्। स्यादिदं यदि सार्वकालिकी सार्वदैशिकी या या सत्ता तत्प्रतिषेधो बाध इत्येवं देशकालयोरपि निषेध्यकोटौ प्रवेशः स्यान्न चैवं किन्तु सर्वस्मिन्देशे सर्वस्मिन्काले च या सत्ता तत्प्रतिषेध इत्येवमधिकरणकोटावेव। तथा च सत्ताप्रतिषेधमात्रस्यैव बाध्यत्वेन प्रत्यक्षेण च सत्तामात्रस्यैव गृहीतत्वेन साक्षाद्ग्राह्याभावावगाहित्वेनैव विरोधित्वम्। एतदेवाभिप्रेत्योक्तं तच्चेन्नोत्तरगोचरमित्यनुव्याख्यानावतारिकावसरे भक्तितपादीयसुधायाम्। घटादिसत्ताप्रतिषेधरूपस्य बाधस्यतत्सत्ताग्राहिण प्रत्यक्षेण विरोधावश्यम्भावादिति। निपुणतरमेतदुपपादितमस्मदाचार्यैस्तट्टिपण्यां तत्रैवानुसन्धेयम्।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">गृह्यत इतीति। प्रत्यक्षेणेत्यर्थः। तथा च तत्रापि तेन त्रिकालाबाध्यत्वं सिध्येदिति भावः।।निरपवादादिति। निर्बाधप्रत्यक्षात्सिध्यतीत्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C13_S01_B03"> | | <span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == चतुर्दशभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-अस्त्वनुमानमेव बाधकं प्रत्यक्षस्येति चेन्न। प्रत्यक्षविरोधेन प्राप्तमरणावस्थस्य प्रत्यक्षविरोधाक्षमत्वात्। अन्यथा दहनशैत्यानुमानमपि तदुष्णतावगाहिप्रत्यक्षबाधकत्वेन प्रमाणं प्रसज्येत। यदा च प्रत्यक्षं समबलप्रत्यक्षान्तरेण न बाध्यते हन्त तदा का वार्ता तत्पादोपजीविनो वराकस्य तर्कस्य तद्बाधकत्वे। नभोमलिनतामाकलयत्प्रत्यक्षममूर्तानुमानेन बाधितं दृष्टमिति चेन्न। तत्राप्याप्तवाक्यादिनैव बाधाभ्युपगमेनासम्प्रतिपत्तेः। यदा च पुनः स्वयमेवानुमिमीते तदाऽपि बलवत्प्रत्यक्षग-हीतव्याप्तिकादेव तस्मादध्यवसायः।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C13_S01_B03 | | | verse_id = VA_C14_S01 |
| | id = VA_C13_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C14_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-विश्वं सत्यमित्याद्यागमविरोधश्च व्यावहारिकं सत्त्वमत्रोच्यत इति चेन्न। निर्बीजत्वात्कल्पनायाः। व्यर्थं च प्रपञ्चे व्यावहारिकसत्यत्वप्रतिपादनम्। न हि कश्चिल्लोकिको वैदिको वा व्यावहारिकसत्यतां प्रपञ्चे नाभ्यपैति। तस्माद्वादिप्रसिद्धमिथ्यात्वनिषेधेन पारमार्थिकसत्त्वमेव प्रतिपाद्यते। अप्राप्ते शास्त्रमर्थवदिति न्यायात्। नेह नानेत्यादिश्रुतिनिषेध्यसमर्पकतयाऽनुवदति विश्वसत्यतावाक्यमिति चेन्न। तथा सति विश्वं सत्यमित्यादिवचनविधानसिद्ध्यर्थं नेह नानेत्यनुवाद इति प्रसङ्गात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। प्राप्तमरणावस्थस्येति। अनुमानस्येति शेषः। अनुमानस्यैव प्रत्यक्षबाधकत्वाङ्गीकारे बाधकमाह।। अन्यथेति।। प्रसज्येतेति। तथा च कालात्ययापदिष्टमात्रोच्छेदः स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">न बाध्यत इति। किन्तु प्रबलप्रत्यक्षेणैव बाध्यत इत्यर्थः।। तत्पादोपजीविन इति। प्रत्यक्षपादोपजीविन इत्यर्थः। धर्मिलिङ्गव्याप्त्यादिग्राहकत्वेन प्रत्यक्षस्यानुमानं प्रत्युपजीव्यत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">वराकस्येति। रण्डापुत्रस्येत्यर्थः। वराको विधवासुत इत्यमरोक्तेः। तर्कस्यानुमानस्य।। तद्बाधकत्व इति। प्रत्यक्षबाधकत्वे का वार्तेत्यन्वयः। तथा च प्रत्यक्षबाधकत्वं केवलतर्कस्य न सम्भवतीति भावः। यथोक्तम्। न हि प्रत्यक्षसिद्धमन्येन केनापि बाध्यं दृष्टमिति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु प्रत्यक्षसिद्धमप्यनुमानबाध्यं दृष्टमित्याशङ्कते।। नभ इति। मलिनता नैल्यम्। आकलयद्विषयीकुर्वत्। अमूर्तेति भावप्रधानो निर्देशः। इयत्तावच्छिन्नपरिमाणयोगित्वाभावोऽमूर्तत्वं विभुत्वमिति यावत्। तथा च नीलं नभ इति प्रत्यक्षं नभो न नीलं विभुत्वात्कालादिवदित्यनुमानबाध्यं दृष्टमित्यर्थः।। आप्तवाक्यादिनेति। नभो नीलं नेत्याप्तवाक्येनेत्यर्थः। आदिपदेन नभोनैल्यावगाहिप्रत्यक्षग्रहणम्। तथा च तत्रापि विभुत्वानुमानमूलभूताप्तवाक्यादिनैव बाधो नानुमानेन राजगौरवेण राजभृत्येनामात्य इवानुमानं तत्र बाधकमिति चोच्यत इति भावः। यथोक्तम्। दुर्बलस्य प्रमाणस्य बलवानाश्रयो चोच्यत इति भावः। यथोक्तम्। दुर्बलस्य प्रमाणस्य बलवानाश्रयो यदा तदाऽपि विपरीतत्वमिति।। यदा च पुनरिति। नीलं नभ इति प्रत्यक्षानन्तरं यदा स्वयमेव नभो न नीलं विभुत्वादित्यनुमिमीते तदा तत्र तन्मूलाप्तवाक्यादेरभावादनुमानमेव बाधकमिति वक्तव्यमिति भावः। माऽस्तु तत्राप्तवाक्यमात्रेण बाधः। अपि तु विभुत्वस्य नैल्याभावनिरूपितव्याप्तिग्राहकत्वेन यत्प्रबलं भवत्प्रत्यक्षं साक्षितन्मूलकानुमानमेव तत्र बाधकमित्याशयेनाह।। यदा च पुनरिति। तस्मादनुमानात्। अध्यवसायोऽनैल्याध्यवसायः। अत एव प्रागाप्तवाक्यादिनैवेत्युक्तमिति ज्ञातव्यम्।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C13_S01_B04">
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| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-प्रत्यक्षत्वाद्गन्धर्वनगरप्रत्यक्षवद्विप्रतिपन्नमपि प्रत्यक्षं भ्रान्तं किन्न स्यादिति चेत्तर्हि वाक्यत्वाज्जरद्गवादिवाक्यवत्सत्यज्ञानादिवाक्यमप्रमाणं किन्न स्यात्। किञ्च प्रत्यक्षशब्देन प्रत्यक्षाभासविवक्षायां पक्षे तदभावः। प्रमाणाभिप्राये दृष्टान्तेऽनन्वयः। ज्ञानत्वमात्रस्य हेतुत्वे सत्यज्ञानादिवचनजन्यज्ञाने व्यभिचारः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य प्रत्यक्षबाधः ।। छ ।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C13_S01_B04 | | | verse_id = VA_C14_S01 |
| | id = VA_C13_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C14_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्किञ्चसदेवेदमग्र आसीदित्यादिवाक्यनिषेध्यसमर्पकतया सत्यज्ञानादिवाक्यं ब्रह्मणः सत्यतामनुवदतीति चातिप्रसङ्गः। विश्वमिथ्यात्वब्रह्मसत्यत्वे श्रुतिमन्तरा न सिद्ध्यत इति कथमनुवाद इति चेन्न। दृश्यत्वादिहेतुना मिथ्यात्वसाधनात्। भ्रमानुपपत्त्याऽधिष्ठानतया ब्रह्मणोऽपि सत्यत्वकल्पनात्। किञ्च विश्वसत्यत्वानुवाद इति वदता विश्वस्य प्रामाणिकताऽभ्युपेयते न वा। नाद्यः। तत्प्रमाणविरोधात्। निषेध्यस्य स्वेन प्रमाणविषयताऽनभ्युपगमाच्च। न द्वितीयः। असिद्धस्यानुवादायोगात्। लोकसिद्धानुवाद इति चेन्न। लोके च प्रमाणसिद्धमनूद्यते भ्रान्त्या वा। नाद्यः दत्तोरत्वात्। नोत्तरः। तथैव लोकस्य भ्रान्तिसिद्धब्रह्मसद्भावो निषिध्यत इति प्रसङ्गात्। तस्माद्यद्वदन्तीत्यादिवचनं परिहारे विशेषयुक्तिं च विनाऽनुवादायोगात्। व्यावहारिकसत्यत्वस्य च वक्तुमप्रयोजकत्वात्। पारमार्थिकमेव सत्यत्वं जगत्युदितमित्यस्ति श्रुतिविरोधः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य श्रुतिविरोधः।। छ ।। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">ननु विप्रतिपन्नं सन्घट इत्यादिजगत्प्रत्यक्षं भ्रमरूपं प्रत्यक्षत्वाद्गन्धर्वनगरप्रत्यक्षवदित्यनुमानविरोधमाशङ्कते।। प्रत्यक्षत्वादिति। शरदृतौ सायङ्काले रक्तमेघसमुदाये गजाश्वप्राकाराद्युपेतनगराकारतया प्रतीयमानं गन्धर्वनगरमित्युच्यत इति ज्ञातव्यम्। भ्रान्तमिति भावे क्तः। भ्रान्तिरित्यर्थः। तर्हि ब्रह्मस्वरूपस्य सत्यत्वाद्यवगाहिसत्यज्ञानादिवाक्यमप्रमाणं वाक्यत्वाज्जरद्गवादिवाक्यवदित्यपि स्यादित्याद्याभाससाम्यमित्याह।। तर्हीति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">जरद्गवः कम्बलपादुकाभ्यां द्वारि स्थितो गायति भद्रकाणि। तं ब्राह्मणी पृच्छति पुत्रकामा राजन्रुमायां लशुनस्य कोऽर्थः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">इति जरद्गववाक्यम्। आदिपदेन शङ्खः कदल्यां कदली च भेर्यां भेर्यां महच्चाविरभूद्विमानमिति वाक्यं ग्राह्यम्। जगत्प्रत्यक्षस्य भ्रमत्त्वसाधकप्रत्यक्षत्त्वं किमाभासभूतं विवक्षितमुत प्रमाणभूतमथवोभयसाधारणं ज्ञानत्वमात्रम्। नाद्यः। अस्माभिर्जगत्प्रत्यक्षस्याभासत्वानङ्गीकारात्स्वरूपासिद्धिः स्यात्। न द्वितीयः। दृष्टन्तभूते गन्धर्वनगरप्रत्यक्षे प्रमाण त्वाभावेन साधनवैकल्यापत्तेः। न तृतीयः सत्यज्ञानादिवाक्यजन्ये ब्रह्मणः सत्यत्वादिविषयके ज्ञाने व्यभिचारः स्यादित्याह।। किञ्चेत्यादिना ।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 14 == | | <span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशभङ्गः"></span> |
| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C14_S01_B01">
| | == पञ्चदशभङ्गः == |
| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-विश्वं सत्यमित्याद्यागमविरोधश्च व्यावहारिकं सत्त्वमत्रोच्यत इति चेन्न। निर्बीजत्वात्कल्पनायाः। व्यर्थं च प्रपञ्चे व्यावहारिकसत्यत्वप्रतिपादनम्। न हि कश्चिल्लोकिको वैदिको वा व्यावहारिकसत्यतां प्रपञ्चे नाभ्यपैति। तस्माद्वादिप्रसिद्धमिथ्यात्वनिषेधेन पारमार्थिकसत्त्वमेव प्रतिपाद्यते। अप्राप्ते शास्त्रमर्थवदिति न्यायात्। नेह नानेत्यादिश्रुतिनिषेध्यसमर्पकतयाऽनुवदति विश्वसत्यतावाक्यमिति चेन्न। तथा सति विश्वं सत्यमित्यादिवचनविधानसिद्ध्यर्थं नेह नानेत्यनुवाद इति प्रसङ्गात्।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C14_S01_B01 | | | verse_id = VA_C15_S01 |
| | id = VA_C14_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C15_S01_B01 |
| | text = | | | text = वादावली"असत्यमप्रतिष्ठं ये जगदाहुरनीश्वर" मित्यादिनिरवकाशस्मृतिविरोधश्च। न चात्रासत्यशब्दोऽत्यन्तासत्परोऽत्यन्तासत्त्वाभ्युपगन्तुर्वादिन एवाभावादाहुरित्यस्यायोगादिति ।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य स्मृतिविरोधः ।। छ ।। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">चतुर्दशभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">मिथ्यात्वानुमानस्यागमविरोधं चाह।। विश्वं सत्यमितीति।। निर्बीजत्वादिति। विश्वं सत्यमित्यादिश्रुतेर्व्यावहारिकसत्यता प्रतिपादकत्वकल्पनाया निर्बीजत्वादित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु व्यावहारिकसत्यत्वस्य प्रपञ्चे केनाप्यनङ्गीकृतत्वेन तं प्रति तत्प्रतिपादनस्य सार्थकत्वादित्यत आह।। न हीति। लौकिको मूर्खो वैदिको विद्वान्। व्यावहारिकसत्यतामर्थ क्रियाकारित्वादिरूपम्।। नाभ्युपैतीति। येन तं प्रति तत्प्रतिपादनं सार्थकं स्यादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु विश्वं सत्यमित्यादिश्रुत्या पारमार्थिकसत्यत्व प्रतिपादनमपि व्यर्थं तस्यापि सर्वैरङ्गीकृतत्वादित्यत आह।। वादिप्रसिद्धमिति। मायावादिसमयसिद्धमिथ्यात्वनिषेधं हृदि निधायेत्यर्थः। समयानां प्रवाहतोऽनादित्वात्तत्प्राप्तप्रतेषेधः श्रुत्या कर्तुं युक्त एव। अनादिकालतो वृत्ताः समया हि प्रवाहत इत्युक्तत्वादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु लौकिकवैदिकाभ्युपगमसिद्धाऽपि व्यवहारिकी सत्ता श्रुत्या प्रतिपाद्यतां को दोष इति चेन्न। तथात्वेऽपूर्वताभङ्गः स्यात्। कुत इत्यत आह।। अप्राप्त इति। प्रमाणान्तराप्राप्तेऽर्थे तत्प्रतिपादने क्रियमाणे सतीति यावत्। शास्त्रमर्थवत्। सार्थकं भवत्यपूर्वतालाभादित्यर्थः। अन्यथा ज्ञातज्ञापकत्वेन शास्त्रस्यानुपादेयत्वं स्यादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु नेह नानाऽस्ति किञ्चनेति श्रुत्येह ब्रह्मणि किञ्चन किमपि नास्तीति विश्वमिथ्यात्वं प्रतिपाद्यते मिथ्यात्वं च सत्ताप्रतिषेधरूपं प्रतिषेधश्च प्रतियोगिप्रसक्तिपूर्वकः। तथा च विश्वं सत्यमित्यादिवाक्यं नेह नानाऽस्ति किञ्चनेति श्रुतिप्रतिषेध्यं यद्विश्वसत्यत्वं तत्समर्पकतया तत्प्रसञ्जकतया विश्वसत्यतामनुवदति। तथा च निषेधायानुवादरूपत्वान्न विश्वं सत्यमित्यादिवाक्यस्य स्वार्थे तात्पर्यमित्याशङ्कते।। नेह नानेति। वैपरीत्यस्यापि वक्तुं सुवचत्वादित्याह।। तथा सतीति।। वचनविधानसिद्ध्यर्थमिति। वचनेन सत्यत्वविधानसिद्ध्यर्थमिति भावः। तथा च विश्वं सत्यमित्यादिना विश्वस्य सत्यत्वं विधातुं नेह नानेत्यादिना तन्मिथ्यात्वमनूद्यत इत्यपि स्यात्। तथा च नेह नानेति श्रुतेरपि न स्वार्थे तात्पर्यमिति भावः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C14_S01_B02"> | | <span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == षोडशभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्किञ्चसदेवेदमग्र आसीदित्यादिवाक्यनिषेध्यसमर्पकतया सत्यज्ञानादिवाक्यं ब्रह्मणः सत्यतामनुवदतीति चातिप्रसङ्गः। विश्वमिथ्यात्वब्रह्मसत्यत्वे श्रुतिमन्तरा न सिद्ध्यत इति कथमनुवाद इति चेन्न। दृश्यत्वादिहेतुना मिथ्यात्वसाधनात्। भ्रमानुपपत्त्याऽधिष्ठानतया ब्रह्मणोऽपि सत्यत्वकल्पनात्। किञ्च विश्वसत्यत्वानुवाद इति वदता विश्वस्य प्रामाणिकताऽभ्युपेयते न वा। नाद्यः। तत्प्रमाणविरोधात्। निषेध्यस्य स्वेन प्रमाणविषयताऽनभ्युपगमाच्च। न द्वितीयः। असिद्धस्यानुवादायोगात्। लोकसिद्धानुवाद इति चेन्न। लोके च प्रमाणसिद्धमनूद्यते भ्रान्त्या वा। नाद्यः दत्तोरत्वात्। नोत्तरः। तथैव लोकस्य भ्रान्तिसिद्धब्रह्मसद्भावो निषिध्यत इति प्रसङ्गात्। तस्माद्यद्वदन्तीत्यादिवचनं परिहारे विशेषयुक्तिं च विनाऽनुवादायोगात्। व्यावहारिकसत्यत्वस्य च वक्तुमप्रयोजकत्वात्। पारमार्थिकमेव सत्यत्वं जगत्युदितमित्यस्ति श्रुतिविरोधः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य श्रुतिविरोधः।। छ ।।</span>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C14_S01_B02 | | | verse_id = VA_C16_S01 |
| | id = VA_C14_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C16_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्विप्रतिपन्नं सत्यं प्रमाणदृष्टत्वाद्ब्रह्मवदित्यनुमानविरोधश्च। न च साध्यानिरुक्तिः। अबाध्यतायाः साध्यत्वात्। तस्याश्च ब्रह्मणि सिद्धत्वान्नाप्रसिद्धविशेषणता। ननु किमिदं प्रमाणदृष्टत्वम्। तात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वमतात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वं वा। नाद्यः। अस्माकमसिद्धेः। प्रत्यक्षादिप्रमाणानां तत्त्वावेदकताऽनभ्युपगमात्। नोत्तरः। तवासिद्धेः। साधनविकलत्वं च दृष्टान्तस्येति। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु विषमोऽयमुपन्यासो यन्मिथ्यात्वं सत्ताप्ततिषेधरूपमिति युज्यते नेह नानेति श्रुतेर्निषेधायान्यसापेक्षत्वम्। अतः सत्यत्वश्रुतिरनुवादरूपैव। सत्यत्वं तु विधिरूपमतो न विश्वसत्यत्वश्रुतेर्विधानायान्यसापेक्षत्वमतो नेह नानेति श्रुतेर्नानुवादकत्वमिति परः परिहर्तुमुत्सहेताप्यतः प्रसङ्गान्तरमाह।। किञ्चिति।। निषेध्येति। ब्रह्मसत्यत्वेनेत्यर्थः। तथा चासदेवेदमग्र आसीदिति वाक्येन ब्रह्मणोऽसत्त्वं प्रतिपादयितुमसत्त्वस्य सत्त्वप्रतिषेधरूपत्वेन निषेध्यसापेक्षत्वात्सत्यज्ञानादिवाक्यं ब्रह्मणः सत्यतामनुवदीत्यनुवादकत्वान्न तस्यापि स्वार्थे ब्रह्मसत्यत्वे तात्पर्यं स्यादिति भावः। उभयत्रापि समाधानमाशङ्कते।। विश्वमिथ्यात्वेति। यदुक्तं विश्वं सत्यमिति वाक्येन विश्वमिथ्यात्वनिषेधेन तत्सत्यत्वं विधातुं नेह नानाऽस्तीति वाक्येन विश्वमिथ्यात्वमनूद्यत इति। तदयुक्तम्। लोके प्रमाणान्तरसिद्धस्यैवानुवादो दृष्टः। असिद्धस्यानुवदितुमशक्यत्वात्। न च मिथ्यात्वं श्रुतिं विहायप्रमाणान्तरेण सिद्धमतोऽनया श्रुत्यैव सिद्धमिति वक्तव्यम्। तथाऽसदेवेति वाक्येन ब्रह्मणः सत्यत्वं निषेद्धुं सत्यज्ञानादिवाक्यं ब्रह्मसत्यत्वानुवादरूपमिति यदुक्तं तदप्ययुक्तम्। ब्रह्मसत्यत्वस्यापि श्रुतिं विहाय प्रामाणान्तराप्राप्तत्वेनानुवदितुमशक्यतयाऽनया श्रुत्यैव तत्सिद्धमिति वक्तव्यम्। तथा च श्रुतिप्राप्तयोरेव विश्वमिथ्यात्वब्रह्मसत्यत्वयोः श्रुतिमन्तरा प्रमाणान्तराप्राप्तयोर्विश्वं सत्यमसदेवेति श्रुतिभ्यामेव निषेधे श्रुत्योरुन्मत्तवाक्यत्वं स्यादिति भावः। विश्वमिथ्यात्वब्रह्मसत्यत्वे श्रुतिमन्तरा प्रमाणान्तरेणापि सिध्यत इति युक्तं नेह नानेति सत्यं ज्ञानमिति श्रुत्योस्तदनुवादकत्वमतो नोक्तदोष इत्याह।। दृश्यत्वादीति। तथा च दृश्यत्वाद्यनुमानसिद्धं विश्वमिथ्यात्वानुवादित्वं नेह नानेति श्रुतेर्युक्तमिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">भ्रमानुपपत्त्येति। लोके निरधिष्ठानभ्रान्तेरभावेनाधिष्ठानाभावे भ्रमाद्यनुपपत्तेर्जगद्भ्रामाधिष्ठानत्वं ब्रह्मणो वक्तव्यम्। लोके चाधिष्ठानं सत्यमेव दृष्टम्। अधिष्ठानं च सदृशं तथ्यवस्तुद्वयं विना न भ्रान्तिर्भवति क्वापीति वचनात्। तथा च ब्रह्म सत्यं जगदारोपाधिष्ठानत्वाच्छुक्तिवदित्यनुमानेन ब्रह्मसत्यतायाः सिद्धत्वेन तदनुवादित्वं सत्यज्ञानादिवाक्यस्य युक्तमिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">विश्वसत्यत्वेति। विश्वं सत्यमित्यादिवाक्यं विश्वसत्यत्वानुवादरूपमिति वदतेत्यर्थः।। प्रामाणिकतेति। प्रमाणान्तरसिद्धतेत्यर्थः।। तत्प्रमाणेति। माऽस्तु विश्वं सत्यमित्यादिवाक्यविरोधो मिथ्यात्वानुमानस्य किन्तु विश्वं सत्यमिति श्रुतेरनुवादकत्वसिद्ध्यर्थं विश्वं सत्यमित्यस्य यत्प्रमाणसिद्धत्वमङ्गीक्रियते तेनैव प्रमाणेन विरोधः स्यादित्यर्थः। विश्वस्य प्रामाणिकत्वाङ्गीकारे बाधकान्तरमाह।। निषेध्यस्येति। स्वेन मायावादिना। तथा च निषेध्यस्य विश्वसत्यत्वस्य प्रमाणसिद्धत्वं न वक्तव्यमिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">लोकेति।। विश्वं सत्यमिति श्रुतिः प्रमाणसिद्धं विश्वसत्यत्वमनुवदतीति नोच्यते। किन्तु लोकसिद्धं यद्विश्वसत्यत्वं तदेवानुवदतीत्युच्यत इत्यर्थः।। दत्तोत्तरत्वादिति। लोकानां तत्सत्यत्वं येन प्रमाणेन सिद्धं तद्विरोध एव मिथ्यात्वानुमानस्य स्यादिति दत्तोत्तरत्वादित्यर्थः।। तथैवेति। यथा लोके भ्रान्तिसिद्धं विश्वसत्यत्वं विश्वं सत्यमित्यादिवाक्येनानूद्यत इत्युच्यते तथैव शून्यवादिभ्रान्तिसिद्धब्रह्मसद्भावो ब्रह्मसत्यत्वमसदेवेदमग्र इति निषेधाय सत्यज्ञानादिवाक्येनानूद्यत इति स्यादित्यर्थः। अनुवादोऽपि यदिदं वदन्ति तन्न युज्यत इति वाक्यपरिहारे विशेषयुक्तिं च विना न दृष्ट इति गीतातात्पर्यं मनसि निधायाह।। तस्मादिति।। यद्वदन्तीत्यादिवचनमिति। यद्वदन्ति तन्न युज्यत इति वचनमित्यर्थः। अप्रयोजकत्वादिति। न हि कोऽपि लोकेऽर्थक्रियाकारित्वरूपं व्यावहारिकसत्यत्वं नाभ्युपैति। येन तं प्रति तत्प्रतिपादनं सार्थकं स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">उदितमिति। विश्वं सत्यमिति वाक्येनेत्यर्थः।। अस्तीति। मिथ्यात्वानुमानस्य विश्वं सत्यमित्यादिश्रुतिविरोधोऽस्त्येवेत्यर्थः।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 15 ==
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">वादावली"असत्यमप्रतिष्ठं ये जगदाहुरनीश्वर" मित्यादिनिरवकाशस्मृतिविरोधश्च। न चात्रासत्यशब्दोऽत्यन्तासत्परोऽत्यन्तासत्त्वाभ्युपगन्तुर्वादिन एवाभावादाहुरित्यस्यायोगादिति ।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य स्मृतिविरोधः ।। छ ।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C15_S01_B01 | | | verse_id = VA_C16_S01 |
| | id = VA_C15_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C16_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-मैवम्। प्रत्यक्षादिप्रमाणानामतत्त्वावेदकत्वे मानाभावात्। प्रत्यक्षादिकं तत्त्वावेदकं प्रमाणत्वात्सत्यज्ञानादिवाक्यवत्। अन्यथा प्रामाण्यमेव न स्यात्। प्रपञ्चस्तत्त्वावेदकप्रमाणदृष्टः। सम्प्रतिपन्नभ्रान्तपदार्थेतरत्वाद्ब्रह्मवत्। आत्मत्वमुपाधिरिति चेन्न। अबाध्यत्वादेरात्मत्वस्य पक्षे सम्भवात्। अन्यथाऽऽत्मत्वस्याप्यभावः स्याद्ब्रह्मणि। |
| | |
| <h4 class="gr-vyakhya-head">पञ्चदशभङ्गः</h4>
| |
| <p class="gr-vyakhya-para">मिथ्यात्वानुमानस्य श्रुतिविरोधमुक्त्वा स्मृतिविरोधं चाह।। असत्यमिति। अप्रतिष्ठ ज्ञाबाध्यम्। इत्यादीत्यादिपदेन त आसुराः स्वयं नष्टा जगतः क्षयकारिण इति वाक्यशेषग्रहणम्।। विरोधश्चेति। अत्र जगदसत्यत्ववादिनामासुरत्वोक्त्या निन्दनादिति भावः। नन्वत्र जगतोऽत्यन्तासत्त्वं वदतां वादिनामेव निन्दा प्रतीयते न तु सदसद्वैलक्षण्यरूपमिथ्यात्वं वदतां मायावादिनामतो नास्माकमेतत्स्मृतिविरोध इत्याशङ्क्य परिहरति।। न चात्रेति। कुतो न चेत्यत आह।। अत्यन्तासत्त्वेति। अत्रासत्यशब्दस्यात्यन्तासत्त्वपरत्वे जगदसत्यमाहुरित्यस्य कस्याप्यभावात्। साङ्ख्यवैशेषेकादिभिर्जगतः पारमार्थिकसत्यत्वाङ्गीकारात्। शून्यवादिभिर्बौद्धैरपि वैभाषिकादिभिर्यत्सत्तत्क्षणिकमित्यङ्गीकुर्वद्भिः पञ्चस्कन्धात्मकस्य जगतः सांवृतसत्त्वाङ्गीकारादाहुरित्यस्यानुपपत्ति प्रसङ्गादतस्तदन्यथाऽनुपपत्त्याऽसत्यशब्दस्यात्यन्तासत्त्वपरत्वानुपपत्तेः सदसद्वैलक्षण्यरूपमिथ्यात्वपरत्वमित्येव वाच्यमिति तथा वदतां मायावादिनामेव निन्दनं स्मृत्यभिप्रेतमिति ज्ञायत इति भावः ।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 16 ==
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्विप्रतिपन्नं सत्यं प्रमाणदृष्टत्वाद्ब्रह्मवदित्यनुमानविरोधश्च। न च साध्यानिरुक्तिः। अबाध्यतायाः साध्यत्वात्। तस्याश्च ब्रह्मणि सिद्धत्वान्नाप्रसिद्धविशेषणता। ननु किमिदं प्रमाणदृष्टत्वम्। तात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वमतात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वं वा। नाद्यः। अस्माकमसिद्धेः। प्रत्यक्षादिप्रमाणानां तत्त्वावेदकताऽनभ्युपगमात्। नोत्तरः। तवासिद्धेः। साधनविकलत्वं च दृष्टान्तस्येति।</span>
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| </div>
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| | verse_id = VA_C16_S01_B01 | | | verse_id = VA_C16_S01 |
| | id = VA_C16_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C16_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च तत्त्वावेदकत्वादिविशेषानवधूय प्रमाणमात्रदृष्टत्वं हेतुः किन्न स्यात्। न ह्यस्य विपक्षे वृत्तिः। वृत्तिव्याप्यताया आत्मन्यभ्युपगमान्न तत्र साधानावृत्तिः। तथाऽपि प्रामाणिकत्वातिरिक्तं सत्यत्वं नास्तीति साध्याविशिष्टतेति चेन्न। स्वपरासम्मतेः। न तावत्स्वरीत्येदमुक्तम्। प्रमाणाविषयस्यापि ब्रह्मणः सत्यत्वाभ्युपगमात्। नाप्यस्मद्रीत्या। ब्रह्मण इव प्रपञ्चस्यास्माभिः प्रामाणिकत्वातिरिक्तस्य सत्यत्वस्याभ्युपगमात्। अन्यथा शशविषामवत्प्रमाणवृत्त्ययोगात्। तथा।पि ब्रह्मणः प्रामाणिकत्वाभावात्साधनविकलो दृष्टान्त इति चेन्न। असाधारणस्य दूषणत्वाभावपक्षे केवलव्यतिरेकित्वोपपत्तेः। ब्रह्मणश्चाप्रामाणिकत्वे शशविषाणवदसत्त्वप्रसङ्गः। स्तवतःसिद्धत्वान्नेति चेन्न। स्वत इति स्वेनेति वा प्रमाणेन विनेति वा। नाद्यः। अनभ्युपगमात्। न हि स्वस्मिन्स्वस्य कारकताऽभ्युपगम्यते। अन्यथा शशविषाणस्याप्येवं सिद्धिः स्यात्। न द्वितीयः। प्रमाणाभावे सत्त्वं न स्यादित्यस्य प्रमाणेन विना सिद्ध्यतीत्यस्यानुत्तरत्वात्। |
| | |
| <h4 class="gr-vyakhya-head">षोडशभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">मिथ्यात्वानुमानस्य प्रत्यक्षागमविरोधमुक्त्वाऽनुमानविरोधं चाह।। विप्रतिपन्नमिति। वियदादिकमित्यर्थः। प्रमाणदृष्टत्वादिति। प्रमाणजन्यज्ञानविषयत्वादित्यर्थः। नन्वबाध्यत्वरूपसत्यत्वाख्यसाध्यस्य कुत्राप्यप्रसिद्धत्वादप्रसिद्धविशेषणत्वमनुमानस्येत्यत आह।। तस्याश्चेति। अबाध्यत्वरूपसत्यताया इत्यर्थः।। तात्त्विकप्रमाणेति। तत्त्वावेदकप्रमाणेत्यर्थः।। अतात्त्विकेति। अत्तत्त्वावेदकेत्यर्थः। तामेवासिद्धिमुपपादयाति।। प्रत्यक्षादीति।। तवासिद्धेरिति। प्रत्यक्षादिप्रमाणानां त्वया तत्त्वावेदकत्वानभ्युपगमादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">साधनविकलत्वं चेति। ब्रह्मणः स्वप्रकाशत्वेनावेद्यता प्रमाणजन्यज्ञानविषयत्वरूपप्रमाणदृष्टत्वाभावादिति भावः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-मैवम्। प्रत्यक्षादिप्रमाणानामतत्त्वावेदकत्वे मानाभावात्। प्रत्यक्षादिकं तत्त्वावेदकं प्रमाणत्वात्सत्यज्ञानादिवाक्यवत्। अन्यथा प्रामाण्यमेव न स्यात्। प्रपञ्चस्तत्त्वावेदकप्रमाणदृष्टः। सम्प्रतिपन्नभ्रान्तपदार्थेतरत्वाद्ब्रह्मवत्। आत्मत्वमुपाधिरिति चेन्न। अबाध्यत्वादेरात्मत्वस्य पक्षे सम्भवात्। अन्यथाऽऽत्मत्वस्याप्यभावः स्याद्ब्रह्मणि।</span>
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| | verse_id = VA_C16_S01_B02 | | | verse_id = VA_C16_S01 |
| | id = VA_C16_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C16_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्-सिद्ध्युपायान्तरस्यानुपन्यस्तत्वात्। स्वतःसिद्धत्वं नाम स्वप्रकाशत्वमिति चेन्न। दत्तोत्तरत्वात्। अर्थक्रियाकारित्वाच्च सत्यत्वसाधनं सम्भवति। स्वाप्नरम्भासम्भोगादौ व्यभिचारइति चेन्न। पक्षसमत्वात्। न हि पक्षे पक्षसदृशे वाव्यभिचारः। रज्जुभुजङ्गादौ व्यभिचार इति चेन्न। तज्ज्ञानस्यैव भयकम्पादिजनकत्वात्। |
| | |
| <p class="gr-vyakhya-para">तत्त्वावेदकप्रमाणदृष्टत्वमेव हेतुतया विवक्षितमित्यभिप्रेत्य तत्रोक्तामसिद्धिं परिहरति।। प्रत्यक्षादीति। प्रत्युत तत्त्वावेदकत्वे मानं चास्तीत्याह।। प्रत्यक्षादिकमिति। अत्राप्रयोजकत्वमाशङ्क्य हेतूच्छित्तिरूपं बाधकतर्कमाह।। अन्यथेति। प्रत्यक्षादीनां तत्त्वावेदकत्वे प्रत्यक्षादिपक्षकानुमानमुक्तिरूप्ये व्यभिचारवारणाय भ्रान्तेति पदार्थविशेषणम्। प्रपञ्चस्यापि ब्रह्मण्यारोपितत्वस्य परेणाङ्गीकृतत्वाद्भ्रान्तपदार्थेतरत्वस्य स्वरूपासिद्धिवारणाय सम्प्रतिपन्नेत्युक्तम्। तथा च प्रातिभासिकेतरत्वादित्युक्तं भवति। तथा च नासिद्धिरिति भावः। न चासिद्धिवारकतया विशेषमस्य वैय्यर्थ्यं शङ्क्यम्। व्याप्तिवत्पक्षधर्मताया अप्यनुमानाङ्गत्वेन तदुपपादकतया सार्थकत्वात्। चक्षुस्तैजसं रूपादिषु पञ्चसु मध्ये रूपस्यैवाभिव्यञ्चकत्वादित्यादावसिद्धिवारकविशेषणस्यापि दर्शनाच्च। अन्यथा व्यभिचारवारकविशेषणमपि न देयं स्यादिति द्रष्टव्यम्। अस्मिन्ननुमाने उपाधिमाशङ्कते।। आत्मत्वमिति। ब्रह्मणि साध्यव्यापकत्वात्साधनवति पक्षे प्रपञ्चे आत्मत्वाभावेन साधनाव्यापकत्वाच्चात्मत्वमुपाधिरिति भावः। साधनव्यापकत्वान्नायमुपाधिरित्याह।। अबाध्यत्वादेरिति। आदिपदेनासत्त्वग्रहणम्। नन्वबाध्यत्वादेः प्रपञ्चे मयाऽङ्गीकारात्साधनव्यापकत्वं भविष्यत्येवेत्यत उक्तं हेतोरिति। प्रातिभासिकेतरत्वहेतुना बाध्यत्वादेः पक्षे साधयितुं शक्यत्वेन साधनव्यापकत्वं युक्तमेवेति भावः। निरुक्तहेतुना प्रपञ्चेऽबाध्यत्वादिरूपात्मत्वानङ्गीकारे बाधकमाह।। अन्यथेति। आत्मत्वस्य ब्रह्मण्यप्यभावः। स्यादित्यपिशब्दसम्बन्धः। तथा च साध्याव्यापकत्वं स्यात्। एवञ्च तत्परिहारायोक्तहेतुनैव तत्राबाध्यत्वादिरूपात्मत्वे साधनीये तत्प्रपञ्चेऽपि समानमिति साधनव्यापकत्वमेवेति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च तत्त्वावेदकत्वादिविशेषानवधूय प्रमाणमात्रदृष्टत्वं हेतुः किन्न स्यात्। न ह्यस्य विपक्षे वृत्तिः। वृत्तिव्याप्यताया आत्मन्यभ्युपगमान्न तत्र साधानावृत्तिः। तथाऽपि प्रामाणिकत्वातिरिक्तं सत्यत्वं नास्तीति साध्याविशिष्टतेति चेन्न। स्वपरासम्मतेः। न तावत्स्वरीत्येदमुक्तम्। प्रमाणाविषयस्यापि ब्रह्मणः सत्यत्वाभ्युपगमात्। नाप्यस्मद्रीत्या। ब्रह्मण इव प्रपञ्चस्यास्माभिः प्रामाणिकत्वातिरिक्तस्य सत्यत्वस्याभ्युपगमात्। अन्यथा शशविषामवत्प्रमाणवृत्त्ययोगात्। तथा।पि ब्रह्मणः प्रामाणिकत्वाभावात्साधनविकलो दृष्टान्त इति चेन्न। असाधारणस्य दूषणत्वाभावपक्षे केवलव्यतिरेकित्वोपपत्तेः। ब्रह्मणश्चाप्रामाणिकत्वे शशविषाणवदसत्त्वप्रसङ्गः। स्तवतःसिद्धत्वान्नेति चेन्न। स्वत इति स्वेनेति वा प्रमाणेन विनेति वा। नाद्यः। अनभ्युपगमात्। न हि स्वस्मिन्स्वस्य कारकताऽभ्युपगम्यते। अन्यथा शशविषाणस्याप्येवं सिद्धिः स्यात्। न द्वितीयः। प्रमाणाभावे सत्त्वं न स्यादित्यस्य प्रमाणेन विना सिद्ध्यतीत्यस्यानुत्तरत्वात्।</span>
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| | verse_id = VA_C16_S01_B03 | | | verse_id = VA_C16_S01 |
| | id = VA_C16_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C16_S01_B05 |
| | text = | | | text = मूलम्-ननु ज्ञानमात्रमेव भयकम्पादिजनकमर्थविशेषितं वा। आद्ये सकलज्ञानानां भयकम्पादिजनकत्वाप्रसङ्गः। द्वितीये सर्पस्यापि तज्जनकत्वमायातमिति चेन्न। सर्पतया ज्ञातरज्जोरेव विशेषणत्वेन व्यभिचाराभावात्। सर्पाजन्यत्वाच्च। आत्मन्यर्थक्रियाकारित्वं नास्तीति चेन्न। तस्य निखिलप्रपञ्चकारणत्वेन श्रुतिशतसमधिगतत्वात्। सोऽपि पक्षनिक्षिप्तश्चेन्महायानिकपक्षपातः स्यात्। तदतिरिक्तात्माभ्युपगमान्नैवमिति चेन्न। तदतिरिक्तस्याप्येतद्विशेषणवत्तया पक्षनिक्षेपात्। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">अवधूय विहाय।। प्रमाणमात्रदृष्टत्वमिति। प्रमाणदृष्टत्वमात्रमित्यर्थः। तथा च सामान्यतः प्रयुक्तस्य हेतोर्विशेषविकल्पेन निराकरणे धूमानुमानस्याप्येतद्देशकालसंलग्नानेतद्देशकालसंलग्नविकल्पेन साधनवैकल्यस्वरूपासिद्धिभ्यां निराकरणसम्भवेनानुमानमात्रोच्छेदः स्यादतस्तत्र यथैतद्देशकालसंलग्नादिविशेषानपहाय धूममात्रं हेतुरिष्यते एवमिहापीति भावः। नन्वस्तु प्रमाणदृष्टत्वहेतोर्विपक्षे शुक्तिरजतादावपि वृत्तेर्व्यभिचार इति मन्दाशङ्कां परिहरति।। न ह्यस्येति। शङ्कार्हेति शेषः। पूर्वोक्तं साधनवैकल्यं परिहरति।। वृत्तिव्याप्यताया इति। प्रमाणभूतवेदान्त वाक्यजन्यवृत्तिरूपज्ञानविषयय्वस्येत्यर्थः। आत्मनि ब्रह्मणि।। अभ्युपगमादिति। अन्यथा ब्रह्मज्ञाननोत्पादनाय प्रवृत्तानां वेदान्तवाक्यानां वैय्यर्थ्यं स्यात्। आत्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यादौ तव्यादिप्रत्ययो न स्यात्। तस्य कर्मणि स्मरणात्। ब्रह्म विचारयितुमारब्धयोर्गुरुशिष्ययोर्मौनं मौढ्यं च स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">प्रामाणिकत्वातिरिक्तमिति। प्रमाणदृष्टत्वातिरिक्तमित्यर्थः।। इदमुच्यत इति। प्रामाणिकत्वं सत्यत्वमुच्यत इत्यर्थः।। प्रमाणाविषयस्यापीति। तथा च लक्षणस्य ब्रह्मण्यसम्भवः स्यादिति भावः। सत्यत्वस्य स्वरूपसत्यत्वरूपस्य ।। अन्यथेति। प्रपञ्चे प्रामाणिकत्वातिरिक्तसत्यत्वानङ्गीकार इत्यर्थः।। शशविषाणवदिति। शशविषाणादौ प्रमाणप्रवृत्तिर्नास्ति घटादौ तु साऽस्तीति तावत्प्रसिद्धम्। तत्कुल इति पृष्टे शशविषाणादौ प्रमाणप्रवृत्त्यवच्छेदकीभूतस्य सत्त्वस्याभावान्न तत्र प्रमाणं प्रवर्तते। घटादौ तु तद्भावात्तत्र प्रमाणं प्रवर्तत इत्युत्तरं वाच्यम्। तथा च प्रमाणप्रवृत्तियोग्यतावच्छेदकीभूतं सत्यत्वं प्रामाणिकत्वातिरिक्तमेवाङ्गीकार्यमिति न साध्याविशिष्टतेति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ब्रह्मण इति। सत्यस्यापीत्यर्थः।। प्रामाणिकत्वाभावादिति। अवेद्यत्वेन प्रमाणजन्यज्ञानविषयत्वरूपप्रमाणिकत्वाभावादित्यर्थः। यद्यपीदं साधनवैकल्यमात्मनि वृत्तिव्याप्यताया अभ्युपगमादिति प्राक् परिहृतम्। तथाऽपि प्रकारन्तरेणापि परिहर्तुं पुनराशङ्कितमित्यदोषः।। केवलव्यतिरेकित्वोपपत्तेरिति। तत्र च शुक्तिरजतादिकं दृष्टान्त इति भावः। तथा च प्रागन्वयित्वमङ्गीकृत्य साधनवैकल्यं परिहृतमिति द्रष्टव्यम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु तर्हि व्यतिरेकेऽसाधारण्यं स्यात्। तथा हि। यत्र सत्यत्वाभावस्तत्र प्रामाणिकत्वाभाव इति व्यतिरेकव्याप्तौ प्रामाणिकत्वाभावरूपसाध्यवत्त्वेन सपक्षभूते ब्रह्मणि सत्यत्वाभावरूपहेतोरवर्तमानत्वादित्यत उक्तमसाधारण्यस्य दूषणत्वाभावपक्ष इति। आसाधारणस्यासाधारणानैकान्तिकस्य। नित्यव्यावृत्तगन्धवत्त्वाद्भूः किमनित्या वाऽनित्यव्यावृत्तगन्धवत्त्वाद्भूः किं नित्येतिवत्सत्त्वव्यावृत्तिप्रामाणिकत्ववत्त्वात्किं प्रपञ्चो मिथ्योत मिथ्याभूतरजतादिव्यावृत्तप्रामाणिकत्ववत्त्वात्किं प्रपञ्चः सत्य इति सांशयिकत्वेन साध्यनिश्चयप्रतिबन्धकतयाऽसाधारणानैकान्तिकत्वस्य दूषणत्वं वक्तव्यम्। तत्र यद्येककोटौ विशेषदर्शनावतारस्तर्ह्यनुमितिर्भवत्येवेति नासाधारण्यस्य दोषत्वम्। एवञ्च प्रकृते सत्यत्वाभावे शशविषाणाद्यविशेषापत्त्या प्रमाणप्रवृत्त्ययोगेन प्रमाणप्रवृत्तियोग्यतावच्छेदकत्वेन सत्यत्वस्यैव सिद्धिरित्यनुकूलतर्करूपविशेषदर्शनेन सत्यत्वस्यैव सिद्ध्या सन्देहानुपपत्तौ सत्यत्वानुमितेरेवोत्पत्त्याऽसाधारण्यस्यादोषत्वेन केवलव्यतिरेकित्वोपपत्तेरित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">यथोक्तं मणौ प्रत्यक्षखण्डे सुवर्णतैजसवादे। संशयः सत्प्रतिपक्षो वाऽसाधारण्यस्य दूषकतायां द्वारं तदिह विशेषदर्शनादसम्भवीत्यसाधारण्यं न दोषायेति। पूवमन्वयिनि साधनवैकल्यशङ्कायां केवलव्यतिरेकित्वमङ्गीकृत्य समाधानमुक्तमिदानीं साधनवैकल्यशङ्कैव त्वया न कर्तुं शक्यत इत्याह।। ब्रह्मणश्चेति।। असत्त्वप्रसङ्ग इति। तथा च तदसिद्धिप्रसङ्गो वस्तुसिद्धेर्मानाधीनत्वादिति भावः। यथाऽऽहुः पदार्थविदः। मानाधीना मेयसिद्धिरिति। ब्रह्मणः प्रामाणिकत्वाभावे शशविषाणवदसिद्धिःक स्यादिति तर्के प्रामाणिकत्वाभावेऽपि तत्सिद्धिः सम्भवतीत्यप्रयोजकतामाशङ्कते।। स्वतःसिद्धत्वादिति ।। नेतीति। असत्त्वप्रसङ्गे नेत्यर्थः। अनभ्युपगमेवोपपादयति।। न हीति। स्वस्मिन्स्वविषये कारकताज्ञापकता निर्विशेषवादिना परेण कर्तृत्वकर्मत्वयोरेकत्र विरोधेनानङ्गीकारादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अन्यथेति। प्रामाणिकत्वाभावेऽपि स्वतः सिद्धत्वाङ्गीकार इत्यर्थः।। एवं सिद्धिः स्यादिति। ब्रह्मवत्स्वेनैव सिद्धिः स्यादित्यर्थः।। प्रमाणाभाव इति। ब्रह्मणोऽप्रामाणिकत्वे शशविषाणवदसत्त्वोपपत्त्या तदसिद्धिः स्यादिति प्रसङ्गस्येत्यर्थः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-सिद्ध्युपायान्तरस्यानुपन्यस्तत्वात्। स्वतःसिद्धत्वं नाम स्वप्रकाशत्वमिति चेन्न। दत्तोत्तरत्वात्। अर्थक्रियाकारित्वाच्च सत्यत्वसाधनं सम्भवति। स्वाप्नरम्भासम्भोगादौ व्यभिचारइति चेन्न। पक्षसमत्वात्। न हि पक्षे पक्षसदृशे वाव्यभिचारः। रज्जुभुजङ्गादौ व्यभिचार इति चेन्न। तज्ज्ञानस्यैव भयकम्पादिजनकत्वात्।</span>
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| | verse_id = VA_C16_S01_B04 | | | verse_id = VA_C16_S01 |
| | id = VA_C16_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C16_S01_B06 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च विशिष्टस्याप्यात्मनोऽर्थक्रियाभ्युपगमादात्मांशस्य सा कथं न स्यात्। व्यावहारिकत्वं च विश्वसत्यतायां प्रमाणम्। अभिज्ञाऽभिवदनादीनामपि शुक्तिमात्रविषयत्वात् ।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्यानुमानविरोधः।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">कुतोऽनुत्तरत्वमित्यत आह।। सिद्ध्युपायान्तरस्येति। प्रामाणिकत्वाभावेऽपि प्रकारान्तरेण तत्सिद्धिर्भविष्यतीति। एवं तत्सिद्धावुपायान्तरमेवोत्तरत्वेनोपन्यसनीयं न तु प्रमाणेन विना तत्सिद्धिरित्यर्थः।। दत्तोत्तरत्वादिति। स्वप्रकाशत्वमपि स्वेनैव प्रकाशो वा प्रमाणेन विना प्रकाशो वा। नाद्यः कर्तृत्वकर्मत्वयोरेकत्र विरोधेनानभ्युपगमात्। अन्यथा शशविषाणस्यापि स्वेनैव प्रकाशः स्यात्। न द्वितीयः। प्रमाणाभावे सत्त्वं न स्यादित्यस्य प्रमाणेन वाना प्रकाश इत्यस्यानुत्तरत्वात्। सिद्ध्युपायान्तरस्यानुपन्यस्तत्वादित्युत्तरस्य दत्तप्रायत्वादित्यर्थः। मिथ्यात्वानुमानस्य पुनरप्यनुमानान्तरविरोधमाह।। अर्थक्रियेति। विमतं सत्यमर्थक्रियाकारित्वादात्मवदित्यर्थः।। स्वाप्नरम्भासम्भोगादाविति। स्वाप्नकामिनीसम्भोगादावित्यर्थः। "कदली कामिनी रम्भे"त्यभिधानात्। आदिपदेन स्वाप्नमन्त्रग्रहणम्। तत्रापि चरमधातूत्सर्गाभीष्टसिद्धिरूपार्थक्रियाकारित्वे सत्यपि सत्यत्वाभावादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">पक्षसमत्वादिति। वासनामयस्यापि स्वाप्नकामिनीसम्भोगादेरप्यर्थक्रियाकारित्वेन सत्यत्वसाधनादित्यर्थः। तथाऽपि कुतो न व्यभिचार इत्यत आह ।। न हीति। पक्षसदृशे सन्दिग्धसाध्यवत्त्वेन पक्षतुल्ये निश्चितसाध्याभाववत्त्वाभावेन विपक्षत्वाभावादिति भावः। स्थलान्तरे व्यभिचारमाशङ्कते ।। रज्जुभुजङ्गादाविति। भुजाभ्यां गच्छतीति भुजङ्गः। भुजङ्गः सर्पदासयोरित्यभिधानात्। रज्जवारोपितभुजङ्ग इत्यर्थः। आदिपदेन शुक्तिरजतादिकं च ग्राह्यम्। तत्र भयकम्पादिरूपार्थक्रियाकारित्वेऽपि सत्यत्वाभावादिति भावः। तज्ज्ञानस्यैवेति। रज्जुसर्पादिज्ञानस्यैवेत्यर्थः। सत्यसर्पस्थलेऽपि सत्यपि सर्पे तदज्ञाने भयाद्यजननाज्ज्ञानस्यैवार्थक्रियाकारित्वं दृष्टम्। तथेहापि ज्ञानस्यैवार्थक्रियाकारित्वं तर्हि ज्ञान एव व्यभिचार इति न वाच्यम्। एतावन्तं कालं सर्पभ्रम आसीदित्यनुभवबलेन ज्ञानस्वरूपस्य सत्यत्वेन साध्यस्यापि सत्त्वान्न व्यभिचार इति भावः। यथोक्तम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">सर्पभ्रमादावपि हि ज्ञानमस्त्येव तादृशम्। तदेवार्थक्रियाकारि तत्सदेवार्थकारकमिति।</p>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C16_S01_B05"> | | <span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == सप्तदशभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-ननु ज्ञानमात्रमेव भयकम्पादिजनकमर्थविशेषितं वा। आद्ये सकलज्ञानानां भयकम्पादिजनकत्वाप्रसङ्गः। द्वितीये सर्पस्यापि तज्जनकत्वमायातमिति चेन्न। सर्पतया ज्ञातरज्जोरेव विशेषणत्वेन व्यभिचाराभावात्। सर्पाजन्यत्वाच्च। आत्मन्यर्थक्रियाकारित्वं नास्तीति चेन्न। तस्य निखिलप्रपञ्चकारणत्वेन श्रुतिशतसमधिगतत्वात्। सोऽपि पक्षनिक्षिप्तश्चेन्महायानिकपक्षपातः स्यात्। तदतिरिक्तात्माभ्युपगमान्नैवमिति चेन्न। तदतिरिक्तस्याप्येतद्विशेषणवत्तया पक्षनिक्षेपात्।</span>
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| | verse_id = VA_C16_S01_B05 | | | verse_id = VA_C17_S01 |
| | id = VA_C16_S01_B05_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C17_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-दोषगम्यत्वमुपाधिश्च। न च दृश्यत्वादिना प्रपञ्चेऽपि तत्साध्यम्। मिथ्यात्वसाधन इवात्रापि दोषप्रसक्तेः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य सोपाधिकत्वसमर्थनम् ।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। ज्ञानमात्रमेवेति। सर्पादिरूपज्ञेयविशेषानवच्छिन्नमेवेत्यर्थः।। अर्थेति। अर्यत इति व्युत्पत्त्याऽर्थशब्दो ज्ञेयवाची। सर्पादिरूपज्ञेयविशेषावच्छिन्नमित्यर्थः। सकलज्ञानानां घटादिज्ञानानाम्। तज्जनकत्वं भयकम्पादिजनकत्वम्। विशिष्टस्य यद्भवति तद्विशेषणस्यापि भवतीति न्यायाल्लम्बकर्णमानयेत्यादिवदिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">रज्जोरेवेति। न सर्पस्येत्यर्थः। विशेषणत्वे व्यावर्तकत्वे। अतिप्रसङ्गभञ्जकत्वेऽङ्गीकृते सतीत्यर्थः। अयम्भावः। अर्थक्रियाकारित्वहेतो रज्जुसर्पे न व्यभिचारः। तस्य भयकम्पादिजनकत्वाभावेन हेतोरेवाभावात्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु तर्हि भयकम्पादेरकारणकत्वप्रसङ्ग इति चेन्न। रज्जोरेव तत्कारणत्वात्। तर्हि सर्वरज्जूनामपि भयादिजनकत्वं स्यादिति चेन्न। सर्पतया ज्ञाताया एव रज्जोस्तज्जनकत्वाङ्गीकारात्। ज्ञातं लिङ्गं करणमितिवदिति सर्पज्ञानस्यैव भयकम्पादिजनकत्वादित्युक्तमपि समाधानमङ्गीकुर्म इत्याशयेनाह।। सर्पाजन्यत्वाच्चेति। अयम्भावः। अर्थक्रियाकारित्वहेतोर्न रज्जुसर्पे व्यभिचारः। तत्र तज्ज्ञानस्यैवार्थक्रियाकारित्वेन भयकम्पादेः सर्पाजन्यत्वेन तत्र हेतोरेवाभावात्। न चार्थाविशेषितज्ञानस्य भयकम्पादिजनकत्वे सकलज्ञानानामपि तज्जनकत्वप्रसङ्गादर्थ विशेषितस्यैव तज्जनकत्वे वाच्ये विशिष्टस्य यद्भवति तद्विशेषणस्यापि तद्भवतीति न्यायेन सर्पस्यापि तज्जनकत्वं प्राप्तमिति पुनस्तत्रैव व्चभिचार इति वाच्यम्। अस्य न्यायस्य चित्रगुमानय कुरूणां क्षेत्रं कर्षति, गुरुणां टीकां लिखति, काशीनिवासी समागत इत्यादौ व्यभिचारित्वेन दुष्टत्वादिति। दृष्टान्ते साधनवैकल्यमाशङ्कते।। आत्मनीति। तस्यात्मनः।। निखिलेति। सकलजगज्जननादिरूपार्थक्रियाकारणत्वेनेत्यर्थः।। श्रुतिशतेति। शतशब्दो बहुवचनः। स इदं सर्वमसृजत, यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, अक्षरात्सम्भवतीह विश्वमित्यादिबहुश्रुतिसमधिगतत्वादित्यर्थः। तथा च न साधनवैकल्यमिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">सोऽपीति। सकलजगज्जननरूपार्थक्रियकारित्वेन श्रुतिशत समधिगतोऽप्यात्माऽस्माभिर्मिथ्यात्वानुमाने वियदादिविश्वमिव पक्षे निक्षिप्तस्तथा च तस्य सत्यत्वाभावेन साध्यवैकल्यापत्त्या न तस्य भवदनुमाने दृष्टान्तत्वं युक्तमित्यर्थः। चेदित्यन्तरं तर्हीति शेषः। महायानिको बौद्धः। बौद्धविशेषेण शून्यवादिना हि शून्यमेव तत्त्वमित्यङ्गीकृत्यात्मादेः सर्वस्य मिथ्यात्वमङ्गीकृतम्। त्वयाऽपि तथाऽङ्गीकारे शून्यवादिसकाशाद्वैलक्षण्यं मायावादिनस्तव न स्यादिति भावः। शून्यवादिपक्षपाताभावेन तद्वैलक्षण्यं ममास्तीत्याशङ्कते।। तदतिरिक्तात्मेति। श्रुतिशताम्नातजगत्कारणत्वविशिष्टसगुणब्रह्मव्यतिरिक्तस्यात्मनो निर्गणस्य ब्रह्मणोऽङ्गीकारात्। शून्यवादिना चेत्थमनङ्गीकारान्नैव शून्यवादिपक्षपातेन मम तत्साम्यमित्यर्थः।। तदतिरिक्तस्यापीति। निखिलजगत्कारणत्वादि विशिष्टसगुणब्रह्मव्यतिरिक्तं यन्निर्गुणं तदपि जगज्जन्मादिकारणत्वरूपविशेषणविशिष्टमेव। यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमित्याद्युक्त्वाऽक्षरात्सम्भवतीहमिति श्रुत्याऽक्षरस्य जगज्जन्मादिकारणत्वाभिधानात्। अक्षरशब्दवाच्यस्य त्वन्मते निर्गणत्वात्तथा च तस्यापि पक्षनिक्षिप्तत्वेन मिथ्यात्वप्राप्त्या शून्यवादिपक्षपात एव तवेति न तद्वैलक्षण्यं तवेत्यर्थः। इतोऽपि सगुणनिर्गुणभेदेन ब्रह्मद्वैविध्यमङ्गीकृत्य शून्यवादिवैलक्षण्यमभिलषता त्वयाऽकामेनापि सकलप्रपञ्चजन्मादिकारणत्वरूपार्थक्रियाकारित्वं निर्गुणस्य ब्रह्मणोऽङ्गीकर्तव्यमेवेत्याह।। किञ्चेति। विशिष्टस्यात्मनः सगुणब्रह्मणः।। अर्थक्रियेति। तत्कारणत्वेनेत्यर्थः।। आत्मांशस्येति। विशिष्टस्यात्मनोंऽशस्य तदन्तर्गतस्य निर्गुणरूपविशेष्यांशस्येत्यर्थः। साऽर्थक्रिया। तत्कारित्वमिति यावत्। कथं न स्यादिति। दण्ड्यानयने देवदत्तानयनस्याप्यनुभवसिद्धत्वादित्यर्थः। तथा च शून्यवादिवैलण्यायार्थ क्रियाकारिणोऽप्यात्मनः सत्यत्वेऽङ्गीकार्ये साध्यवैकल्याभावेन युक्तं तस्य दृष्टान्तत्वमिति भावः।</p>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C16_S01_B06"> | | <span id="gr-C18" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टादशभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == अष्टादशभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च विशिष्टस्याप्यात्मनोऽर्थक्रियाभ्युपगमादात्मांशस्य सा कथं न स्यात्। व्यावहारिकत्वं च विश्वसत्यतायां प्रमाणम्। अभिज्ञाऽभिवदनादीनामपि शुक्तिमात्रविषयत्वात् ।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्यानुमानविरोधः।। छ ।।</span>
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| | verse_id = VA_C16_S01_B06 | | | verse_id = VA_C18_S01 |
| | id = VA_C16_S01_B06_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C18_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-अनिर्वचनीयत्वाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य मिथ्यात्वाभिप्राये निदर्शनस्य साध्यविकल्त्वं च। ननु कादाचित्कत्वहेतुना सकारणकत्वानुमाने कारणस्य सदसद्रूपत्वासम्भवादविद्याकार्यत्वमेव पर्यवस्यतीति चेन्न। केयं कादाचित्कता नाम। कदाचित्प्रतीतता वा कदाचिदुत्पन्नता वा। नाद्यः। व्याप्त्यभावात्। नोत्तरः। हेतोरसिद्धत्वात्। तस्मान्न त्रिविधोऽप्ययं प्रयोगो युक्तिपथमवतरतीति।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य दृष्टन्ते साध्यवैकल्यम् ।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">विश्वसत्यत्वेऽनुमानान्तरं चाह।। व्यावहारिकत्वं चेति। अभिज्ञाऽभिवदनहानोपादानादिव्यवहारविषयत्वं च विश्वसत्यतायां प्रमाणमित्यर्थः। तथा च विश्वं सत्यं व्यावहारिकत्वाद्ब्रह्मवद्व्यतिरेकेण शशविषाणवदित्यनुमानं द्रष्टव्यम्। नन्वेवं सति शुक्तिरजते व्यभिचारः स्यात्। मिथ्याभूतस्यापि रजतस्येदं रजतमित्याद्यभिज्ञाऽभिवदनहानोपादानादिव्यवहारविषयत्वादित्याशङ्क्य तत्र हेतोरेवाभावान्न व्यभिचार इत्याह।। अभिज्ञेत्यादिना। अभिज्ञाऽनुभवः। अभिवदनमभिलपनम्। आदिपदेन हानोपादानादिग्रहणम्। तता चाभिज्ञाऽभिवदनादीनांव्यवहाराणामपीत्यर्थः। बाध्यत्वसमुच्चयार्थोऽपिशब्दः। यथाऽन्यथा विज्ञातस्य सम्यग्विज्ञानविषयत्वरूपबाध्यत्वं शुक्तिकाशकलमात्रविषयमेवमभिज्ञादिव्यवहाराणामपि शुक्तिकामात्रविषयकतया रजतविषयकत्वाभावेन तत्र हेतोरेवैभावाच्छुक्तेश्च सत्यत्वान्न व्यभिचार इति भावः ।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 17 == | | <span id="gr-C19" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनविशंतितमभङ्गः"></span> |
| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C17_S01_B01">
| | == एकोनविशंतितमभङ्गः == |
| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-दोषगम्यत्वमुपाधिश्च। न च दृश्यत्वादिना प्रपञ्चेऽपि तत्साध्यम्। मिथ्यात्वसाधन इवात्रापि दोषप्रसक्तेः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य सोपाधिकत्वसमर्थनम् ।। छ ।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C17_S01_B01 | | | verse_id = VA_C19_S01 |
| | id = VA_C17_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C19_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">सप्तदशभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">मिथ्यात्वानुमानस्योपाधित्वमप्याह।। दोषगम्यत्वमिति। दोषसहकृतेन्द्रियगम्यत्वं तज्जन्यज्ञानविषयत्वमित्यर्थः। उपाधिश्चिते। मिथ्यात्वोपेते रजते साध्यव्यापकत्वाद्दृश्यत्वोपेते प्रपञ्चे तदभावेन साधनाव्यापकत्वाच्चेत्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु साधनव्यापकोऽयमुपाधिः। न च प्रपञ्चस्य दोषगम्यत्वे विवाद इति वाच्यम्। प्रपञ्चो दोषगम्यो दृश्यत्वादेरित्येवं दृश्यत्वादिना प्रपञ्चेऽपि तत्साधनादित्याशङ्क्य परिहरति।। न चेति। कुतो न चेदित्यत आह।। मिथ्यात्वसाधन इवेति। यथा दृश्यत्वेन मिथ्यात्वे साध्ये दोषगम्यत्वमुपाधिरेवं दृश्यत्वेन दोषगम्यत्वे साध्येऽत्रापि मित्यात्वमुपाघधिरिति दोषप्रसक्तेः। तथा च परस्परोपाधिभावेनानुमानं दुष्टमिति भावः। यद्वा दृश्यत्वेन मिथ्यात्वे साध्ये यथा ब्रह्मणि व्यभिचाररूपो दोषो युक्त एवं दृश्यत्वेन दोषगम्यत्वे साध्येऽत्रापि ब्रह्मणि व्यभिचाररूपदोषप्रसक्तेरित्यर्थः। तथा च ब्रह्मणि दृश्यत्वे सत्यपि दोषगम्यत्वाभावेन व्यभिचारापत्त्या दृश्यत्वेन दोषगम्यत्वस्य प्रपञ्चे साधयितुमशक्यतया साधनाव्यापकत्वेन युक्तं तस्योपाधित्वमिति भावः ।। छ ।।</p>
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| == अध्याय 18 ==
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-अनिर्वचनीयत्वाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य मिथ्यात्वाभिप्राये निदर्शनस्य साध्यविकल्त्वं च। ननु कादाचित्कत्वहेतुना सकारणकत्वानुमाने कारणस्य सदसद्रूपत्वासम्भवादविद्याकार्यत्वमेव पर्यवस्यतीति चेन्न। केयं कादाचित्कता नाम। कदाचित्प्रतीतता वा कदाचिदुत्पन्नता वा। नाद्यः। व्याप्त्यभावात्। नोत्तरः। हेतोरसिद्धत्वात्। तस्मान्न त्रिविधोऽप्ययं प्रयोगो युक्तिपथमवतरतीति।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य दृष्टन्ते साध्यवैकल्यम् ।। छ ।।</span>
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| | verse_id = VA_C18_S01_B01 | | | verse_id = VA_C19_S01 |
| | id = VA_C18_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C19_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-ननु यदुक्तं यद्भ्रन्तिकल्पितं तत्साधिष्ठानमिति तन्न। स्वाप्नपदार्थे व्यभिचारात्। तथा हि स्वाप्नास्तावत्पदार्थाः भ्रान्तिकल्पिताः। सत्यत्वे हि तेऽनादिनित्या उतोत्पत्तिविनाशवन्तः। आद्ये प्रागूर्ध्वञ्चोपलभ्येरन्। द्वितीये किन्न बोधानन्तरमुपलभ्यन्ते। तदैवोत्पद्यविनष्टा इति चेन्न। असम्भाववितत्वात्। किञ्चैवमुपादानानि निमित्तानि चोपलब्धव्यानि। अपि चैतानन्तः पश्यति बहिर्वा। नाद्यः। अल्पप्रदेशे महतां दर्शनासम्भवात्। नोत्तरः। पार्श्वस्थानामप्युपलम्भप्रसङ्गात्। केन चैते करणेनोपलभ्यन्ते। न तावद्बाह्येन्द्रियैः तेषां तदोपरतत्वात्। नापि मनसा। तस्य बहिरस्वातन्त्र्यात्।। किञ्च काश्यां सुप्तो मधुरां पश्यति तथा हेमन्ते सुप्तो वसन्तम्। न च तत्र तयोः सम्भवः। तस्माद्भ्रान्तिकल्पिताः। न चात्र किञ्चिदधिष्ठानमस्ति। आत्मनो भेदेनोपलम्भात्। न ह्यहं गज इति तदा प्रतीतिरस्तीति। एतदप्यविमर्शसुन्दरम्। तेषां सत्यत्वात्। तेन निरधिष्ठानत्वेऽपि न विरोधः |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">अष्टादशभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">पूर्वमविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वं वा मिथ्यात्वमिति विकल्पस्य केयमविद्या नामेत्यादिना लक्षणप्रमाणाभावेनाविद्यां निराकृत्य तस्मान्नाविद्या निरूपणगोचरतामाचरतीति कुतस्तत्कार्यं कुतस्तरां चाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य साध्यता सिध्यता सिध्यतीति दूषणमुक्तम्। इदानीमेतादृशमिथ्यात्वसाधने साध्यवैकल्यरूपदोषान्तरं चाह।। अनिर्वचनीयत्वाविद्येति।। तत्कार्यत्वेति। अविद्योपादानकत्वरूपतत्कार्यत्वेत्यर्थः। अविद्याया मिथ्यात्वे तत्कार्येऽव्याप्त्यापत्तेः। अविद्याकार्यत्वस्य मिथ्यात्वेऽविद्यायाम व्याप्त्यापत्तेरननुगमपरिहारायान्यतरेत्युक्तम्। नन्वेतादृशमिथ्यात्वसाधने सत्यभूताविद्याशब्दप्रकृतिकार्यत्वस्य प्रपञ्चेऽस्माभिरङ्गीकारादर्थान्तरता स्यादतस्तत्परिहारायानिर्वचनीयेत्यविद्याविशेषणमुक्तम्।। साध्यविकलत्वं चेति। शुक्तिरजतस्यात्यन्तासत्त्वेन निरुपादानकतयाऽविद्योपादानकत्वरूप तत्कार्यत्वाभावादित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु परिशेषेणानिर्वचनीयाविद्याकार्यत्वं प्रपञ्चे शुक्तिरजते च सिध्यति। तथा हि। प्रपञ्चः शुक्तिरजतं वा सकारणकं कादाचित्कत्वादङ्कुरादिवत्। व्यतिरेकेण ब्रह्मवदित्यनुमानेन प्रपञ्चशुक्तिरजतयोः सकारणकत्वे सिद्धे तत्कारणं सदसद्वा। नाद्यः। सत्यस्य ब्रह्मवत्क्रियावेशशून्यस्य कारणत्वायोगात्। न द्वितीयः। सकलसामर्थ्यविधुरस्य शशविषाणवत्कारणत्वानुपपत्तेरित्येवं परिशेषेण कारणत्वस्य सदसत्त्वयोर्निषेधे सदसद्विलक्षणनिर्वचनीयाविद्याकार्यत्वेन परिशेषेण सिद्ध्यतीति नोक्तदोष इति शङ्कते।। नन्वित्यादिना।। व्याप्त्यभावादिति। कदाचित्प्रतीयमाने ब्रह्माणि सकारणत्वाभावात्। तार्किकरीत्या संयुक्तसमवायादिरूपसन्निकर्षसद्भावदशायामेव कदाचित्प्रतीयमानघटत्वरूपत्वादिजातौ च नित्यतया सकारणकत्वाभावेन व्यभिचारादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">असिद्धत्वादिति। विश्वं सत्यं वशे विष्णोर्नित्यमेव प्रवाहतः। अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तत इत्यादि वाक्यैर्जगत्प्रवाहस्यानादित्वावगमेन कदाचिदुत्पन्नत्वाभावाद्धेतोरसिद्धिः स्यात्। तथा शुक्तिरजतस्याप्यत्यनतासत्त्वेन कदाचिदुत्पन्नत्वाभावाद्दृष्टन्ते हेतोरसिद्धिः स्यात्। साधनवैकल्यं स्यादिति यावदित्यर्तः।। त्रिविधोऽपीति। दृश्यत्वजडत्वपरिच्छिन्नत्वरूपत्रिविधोऽप्यनुमानप्रयोग इत्यर्थः।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
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| == अध्याय 19 ==
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः</span>
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| | verse_id = VA_C19_S01_B01 | | | verse_id = VA_C19_S01 |
| | id = VA_C19_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C19_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-ननु सत्यत्वे बाधकमुक्तम्। मैवम्। उत्पत्तिविनाशाङ्गीकारात्। न चप्रागूर्ध्वमुपलम्भप्रसङ्गः विद्युदादिवत्तात्कालिकत्वसम्भवात्। तर्ह्युपादानाद्युपलब्धिः स्यादिति चेन्न। वासनोपादानकत्वात्। वासनानां चातीन्द्रियत्वादनुपलब्धिर्युज्यते। निमित्तादिकं त्वदृष्टेश्वरादिकमिति। अतीन्द्रियकार्यस्यापि त्र्यणुकवदुपलम्भः सम्भवति। अत एवान्तर्मनस उपलब्धिर्युज्यते। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">एकोनविशंतितमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">परार्थानुमानस्य शब्दरूपत्वात्प्रयोग इत्युक्तम्। दृशत्वानुमानस्य तर्कपराहतिं चाह।। किं च यदीत्यादिना। स्यादित्यनन्तरं तर्हीति शेषः।। कल्प्यमानेति। आरोप्यमाणेत्यर्थः।। प्रसज्येतेति। अधिष्ठानञ्च सदृशं तथ्यवस्तुद्वयं विना। न भ्रान्तिर्भवति क्वापीति वचनादिति भावः। तथा च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारप्रसङ्ग इति वाक्यशेषः। न चारोप्यस्यात्यन्तासत्त्वेन निर्धर्मिकत्वात्कथं तत्सादृश्यमधिष्ठानप्रधानयोरपेक्षितमित्युच्यत इति चेन्न। आरोप्यस्य यत्किञ्चित्प्रतियोगिकसादृश्यानाश्रयत्वेऽपि किञ्चिन्निष्ठसादृश्यप्रतियोगित्वसम्भवात्। प्रतियोगित्वस्य च रूपादिवद्धर्मिसत्तासापेक्षत्वाभावात्। परमते घटत्वादिजातिवदस्मन्मते सादृश्यमखण्डमेव। यथोक्तं सुधायाम्। सादृश्यं हि पदार्थान्तरमिति। पदार्थान्तरमखण्डमिति तदर्थः। न तु तद्गतं भूयोधर्मवत्त्वरूपं येनारोप्यस्यासतो निर्धर्मकत्वात्कथं तद्गतं भूयोधर्मवत्त्वरूपं सादृस्यमधिष्ठानप्रधानयोरुच्यत इति शङ्कानवकाश इति द्रष्टव्यम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">इष्टापत्तिरिति चेत्तत्राह।। न चेति। अधिष्ठानत्वेन प्रधानत्वेन च सत्यद्वयं तावदपेक्षितम्। अधिष्ठानप्रधानयोश्चारोप्यसादृश्यमपेक्षितम्। तथा चारोप्यजगत्सदृशमधिष्ठानं प्रधानं च जगदेवेति वाच्यम्। जगत एव जगता सादृश्यसम्भवादन्यस्य च तदसम्भवादतो जगद्द्वयमपेक्षितम्। न च तदङ्गीकारस्तव युक्त इत्यर्थः। कुतो न युक्त इत्यत आह।। पिण्याकेति। तैलयन्त्रखण्डिततिलादेः सकाशात्तैलनिष्पत्त्यनन्तरं यत्पिष्ठमवशिष्टते तत्पिण्याकमित्युच्यते। गतस्येति कर्मणि षष्ठी। गतं प्रतीत्यर्थः। तत्त्वनिर्णयटीकानुसारेण खारित्यतः पूर्वं पिशाचस्येति पूरणीयम्। कर्तरि चेयं षष्ठी। पिशाचकर्तृकखारीपरिमिततैलदानप्रतिज्ञावदित्यर्थः। खारीति परिमितिविशेषस्य सञ्ज्ञा। खारि द्रोणी निकुञ्चक इत्यभिधानात्।। अधिकापातादिति। स्वापेक्षितापेक्षयाऽप्यधिकस्यापातादित्यर्थः। यथा केनचित्पिण्याकं देहीति याचिते सति तं प्रति पिण्याकेन खारीपरिमिततैलन्दास्यमिति केनचित्पिशाचेन प्रतिज्ञाते सति पिण्याकयाचकस्य यथाऽधिकलाभो जातस्तद्वत्परिदृस्यमानस्यैकस्य जगतः सत्यत्वमपेक्ष्यमाणं मां प्रत्यस्य जगतो भ्रान्तिकल्पितत्ववचनेनोक्तरीत्या सत्यभूतजगद्द्वयलाभेनापेक्षिता दप्यधिकलाभो मम जात इत्यविवेकितया पिशाचतुल्यो भवानिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">दृश्यत्वानुमानस्य व्यापकनिवृत्त्या व्याप्यनिवृत्तिरूपप्रमाणविरोधश्च स्यादित्याह।। किञ्चेति। कुतो नास्तीत्यत आह।। सत्यजगद्द्वयेति। तथात्वे गौरवं स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अस्यैवेति। भ्रान्तिकल्पिततया त्वयोच्यमानस्यास्यैव परिदृश्यमानस्येत्यर्थः।। प्रमाणविरोध इति। अनुमानरूपप्रमाणविरोध इत्यर्थः। अनुमानप्रयोगप्रकारं दर्शयति।। तथा चेति। अप्रयोजकतापरिहाराय विपक्षे बाधकतर्कमाह।। विपक्षे त्विति।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-ननु यदुक्तं यद्भ्रन्तिकल्पितं तत्साधिष्ठानमिति तन्न। स्वाप्नपदार्थे व्यभिचारात्। तथा हि स्वाप्नास्तावत्पदार्थाः भ्रान्तिकल्पिताः। सत्यत्वे हि तेऽनादिनित्या उतोत्पत्तिविनाशवन्तः। आद्ये प्रागूर्ध्वञ्चोपलभ्येरन्। द्वितीये किन्न बोधानन्तरमुपलभ्यन्ते। तदैवोत्पद्यविनष्टा इति चेन्न। असम्भाववितत्वात्। किञ्चैवमुपादानानि निमित्तानि चोपलब्धव्यानि। अपि चैतानन्तः पश्यति बहिर्वा। नाद्यः। अल्पप्रदेशे महतां दर्शनासम्भवात्। नोत्तरः। पार्श्वस्थानामप्युपलम्भप्रसङ्गात्। केन चैते करणेनोपलभ्यन्ते। न तावद्बाह्येन्द्रियैः तेषां तदोपरतत्वात्। नापि मनसा। तस्य बहिरस्वातन्त्र्यात्।। किञ्च काश्यां सुप्तो मधुरां पश्यति तथा हेमन्ते सुप्तो वसन्तम्। न च तत्र तयोः सम्भवः। तस्माद्भ्रान्तिकल्पिताः। न चात्र किञ्चिदधिष्ठानमस्ति। आत्मनो भेदेनोपलम्भात्। न ह्यहं गज इति तदा प्रतीतिरस्तीति। एतदप्यविमर्शसुन्दरम्। तेषां सत्यत्वात्। तेन निरधिष्ठानत्वेऽपि न विरोधः</span>
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| | verse_id = VA_C19_S01_B02 | | | verse_id = VA_C19_S01 |
| | id = VA_C19_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C19_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्-निरधिष्ठानत्वमसिद्धम्। आत्मनोऽधिष्ठानत्वादिति चेन्न। आत्मनोऽधिष्ठानत्वासम्भवात्। नात्मा जगदारोपाधिष्ठानम्। अविषयत्वात्। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा पर्वतो न सर्षपारोपाधिष्ठानम्। प्रपञ्चो वा नात्मन्यध्यस्तः। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा सर्षपो न पर्वतेऽध्यस्तः। विरुद्धाकारप्रतीतावध्यासाङ्गीकारे तस्य कदाऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्गः। -किञ्च यदि जगदात्मन्यारोपितं स्यात्तदाऽऽत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्यते। यद्यत्रारोपितं तत्ततो भिन्नत्वेन न प्रतीयते। यथा शुक्तिकायामारोपितं रजतं न शुक्तिकाया भिन्नत्वेन प्रतीयते भ्रान्तौ। दृश्यते चेदमिदानीं जगदात्मनो भिन्नत्वेन। तस्मान्न तत्रारोपितमिति। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">स्वाप्नाः पदार्था घटपटकरितुरगादयः।। प्रागूर्ध्वं चेति। स्वप्नात्प्राक् स्वप्नादूर्ध्वं स्वप्नानन्तरमित्यर्थः। बोधानन्तरं प्रबोधानन्तरम्। जाग्रदवस्थायां किन्नोपलभ्यन्ते उत्पत्तिविनाशवतां घटादीनामिवोपलम्भप्रसङ्ग इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तदैवेति। स्वप्नावस्थायामेवेत्यर्थः। विद्युदादिवदिति शेषः। अतो न प्रागूर्ध्वमुपलम्भप्रसङ्ग इति भावः। विद्युदादिवत्सम्भावितत्वमप्यङ्गीकृत्याह।। किञ्चैवमिति। स्वाप्नपदार्थानां तदैवोत्पद्यविनष्टत्वाङ्गीकार इत्यर्थः। उपादानानि स्वाप्नघटादिपदार्थोपादानानि मृदादीनि। निमित्तानि दण्डादीनि। एतान्स्वाप्नान् गजतुरजादिरथान्। अन्तर्देहान्तः। बहिर्देहात्। अल्पदेशे देहान्तःस्थेऽल्पावकाशे। महतां स्थूलानां गजतुरगादीनाम्।। असम्भवादिति। तथात्वे देहविदारणं स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">उपरतत्वादिति। विषयज्ञानजननव्यापारविनिर्मुक्तत्वादित्यर्थः।। बहिरस्वातन्त्र्यादिति। मनसः स्वातन्त्र्येण बाह्येन्द्रियानधिष्ठानत्वेन बहिःपदार्थविषयकज्ञानजनकत्वाभावादित्यर्थः। मनो हि बाह्येन्द्रियाधिष्ठानेनैव बाह्यपदार्थज्ञानं जनयति नान्यथेत्यनुभवसिद्धम्। इन्द्रियाणि च तदोपरतानीति भावः। हेमन्ते हेमन्तर्तौ, वसन्तं वसन्तर्तुम्।। न च तत्र तयोरिति। काश्यां मधुराया हेमन्ते वसन्तस्य च सम्भवो नेत्यर्थः। भिन्नदेशयोर्भिन्नकालयोश्च सहावस्थानस्य विरुद्धत्वादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु स्वाप्नपदार्थानामात्मैवाधिष्ठानमस्तीति चेत्तत्राह।। आत्मन इति। स्वप्नपदार्थाद्भेदेनेत्यर्थः। लोके ह्यधिष्ठानमारोप्याभिन्नतयैव प्रतीयत इत्यनुभवसिद्धम्। न चात्र तथा प्रतीतिरस्तीत्याह।। न हीति। तदा स्वप्नावस्थायाम्। अस्तीति।। तथा च निरधिष्ठानत्वहेतोः स्वाप्नपदार्थेषु व्यभिचारः सुस्थ इति भावः।। अविमर्शसुन्दरमिति। विमर्शो विचारस्तदभाव एव सुन्दरं न तु विमर्शे कृते सतीत्यर्थः। तेषां स्वाप्नपदार्थानाम्। तेनाकल्पितत्वसाध्यसमर्थनेन।। न विरोध इति। आरोपितत्व एव ह्यधिष्ठानापेक्षा न तु सत्यत्व इति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-ननु सत्यत्वे बाधकमुक्तम्। मैवम्। उत्पत्तिविनाशाङ्गीकारात्। न चप्रागूर्ध्वमुपलम्भप्रसङ्गः विद्युदादिवत्तात्कालिकत्वसम्भवात्। तर्ह्युपादानाद्युपलब्धिः स्यादिति चेन्न। वासनोपादानकत्वात्। वासनानां चातीन्द्रियत्वादनुपलब्धिर्युज्यते। निमित्तादिकं त्वदृष्टेश्वरादिकमिति। अतीन्द्रियकार्यस्यापि त्र्यणुकवदुपलम्भः सम्भवति। अत एवान्तर्मनस उपलब्धिर्युज्यते।</span>
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| | verse_id = VA_C19_S01_B03 | | | verse_id = VA_C19_S01 |
| | id = VA_C19_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C19_S01_B05 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च ब्रह्मणि प्रपञ्चस्यारोपितत्वं वदन्नत्यत्र प्रपञ्चस्य सत्तामङ्गीकरोति न वा। आद्ये परस्य मिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिः। न चेत्कस्य कुत्रारोपः न हि शशविषाणं क्वचिदारोप्यते। नास्माभिरन्यत्र सतः प्रपञ्चस्य ब्रह्मण्यारोपोऽभिधीयते। येन सर्वमिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिरापद्येत। किन्त्वनिर्वचनीयरूपः कश्चिदनात्माकारोऽयं प्रपञ्चे ब्रह्मण्यारोपित इत्यङ्गीक्रियत इत् चेन्न। अनात्माकारः प्रपञ्च इति कोऽर्थः। किमात्मनोऽन्य उतात्मविरुद्ध उतात्माभावो वा। नाद्यद्वितीयौ। क्वचित्प्रपञ्चस्य सत्यतापातात्। न तृतीयः। आत्मन्यात्माभावारोपस्य क्वाप्यदृष्टत्वात्। न हि कश्चिदहमहं न भवामीति भ्रान्तो दृश्यते। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु तर्ह्युपादानभूतानां वासनानामेवोपलब्धिः स्यादिति चेत्तत्राह।। वासनानां चेति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु घटादिस्वाप्नपदार्थोपादानानां वासनानामतीन्द्रियत्वेनोपालम्भासम्भवेऽपि निमित्तकारणानामुपलब्धिः स्यादिति चेन्न। अदृष्टादेहेव निमित्तत्वेन दण्डादेस्तदनङ्गीकारात्तस्य चातीन्द्रियत्वाद्युक्तानुपलब्धिरित्याशयेनाह।। निमित्तादिकं त्विति। ईश्वरादिकमित्यत्रादिपदेन कालो ग्राह्यः। नन्वतीन्द्रियवासनाकार्याणां स्वाप्नपदार्थानां कथमैन्द्रियकत्वं युज्यते। स्वाप्नपदार्था अतीन्द्रिया अतीन्द्रियकार्यत्वात् द्व्यणुकवद्व्यतिरेकेण घटादिवच्चेत्यनुमानविरोधादिति चेन्न। अतीन्द्रियद्व्यणुककार्ये त्र्यणुके व्यभिचारादित्याह।। अतीन्द्रियकार्यस्यापीति। अपि चैतानन्तः पश्यति बहिर्वा केन च ते करणेनोपलभ्यन्त इत्याशङ्क्य यद्दूषणमुक्तं तदप्यत एवापास्तमित्याह।। अत एवेति। वासनोपादानकत्वेन बाह्यपदार्थविलक्षणत्वादेवेत्यर्थः। तथा चाल्पदेशेऽपि महतां दर्शनसम्भवान्न देहविदारणम्। नापि मनसोपलब्ध्यङ्गीकारे मनसो बहिरस्वातन्त्र्यमित्युक्तदोषः। तेषां बाह्यपदार्थत्वाभावेन स्वातन्त्र्येण मनसस्तज्ज्ञानजनकत्वसम्भवादिति भावः। भेदेनेति। स्वाप्नपदार्थाद्भेदेनेत्यर्थः। अधिष्ठानं ह्यारोप्यसम्भिन्नतया प्रतीयते न चात्र तथा प्रतीतिरस्तीत्याह।। न हीति।। तदा स्वप्नेऽस्तीति। तथा च निरधिष्ठानत्वहेतोः स्वप्नपदार्थे व्यभिचारः सिद्ध इति भावः। न विरोध इति। आरोपितत्व एवाधिष्ठानापेक्षा न तु सत्यत्व इति भावः। तर्ह्युपादानभूतानां वासनानामेवोपलब्धिः स्यादिति चेत्तत्राह।। वासनानां चेति। नन्वतीन्द्रियवासनोपादानकत्वात्स्वाप्नपदार्थानामप्यतीन्द्रियत्वं स्यादिति चेत्तत्राह।। अतीन्द्रियेति। अतीन्द्रियभूतवासनाकार्यस्यापि प्रपञ्चस्येत्यर्थः।। त्र्यणुकवदिति। अतीन्द्रियद्व्यणुककार्यस्यापि त्र्युणुकस्य यथोपलम्भस्तथेत्यर्थः। तथा चातीन्द्रियोपादनानकस्याप्यतीन्द्रियत्वमिति व्याप्तेस्त्र्यणुके व्यभिचार इत्यर्थः।। अत एवेति। वासनोपादानकत्वादेवेत्यर्थः। देहान्तर्मनसा करणेनोपलब्धिर्युज्यत इति भावः। बाह्यमृदाद्युपादानकत्वे हि तदनुपपत्तिः स्यादिति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-निरधिष्ठानत्वमसिद्धम्। आत्मनोऽधिष्ठानत्वादिति चेन्न। आत्मनोऽधिष्ठानत्वासम्भवात्। नात्मा जगदारोपाधिष्ठानम्। अविषयत्वात्। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा पर्वतो न सर्षपारोपाधिष्ठानम्। प्रपञ्चो वा नात्मन्यध्यस्तः। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा सर्षपो न पर्वतेऽध्यस्तः। विरुद्धाकारप्रतीतावध्यासाङ्गीकारे तस्य कदाऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्गः। -किञ्च यदि जगदात्मन्यारोपितं स्यात्तदाऽऽत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्यते। यद्यत्रारोपितं तत्ततो भिन्नत्वेन न प्रतीयते। यथा शुक्तिकायामारोपितं रजतं न शुक्तिकाया भिन्नत्वेन प्रतीयते भ्रान्तौ। दृश्यते चेदमिदानीं जगदात्मनो भिन्नत्वेन। तस्मान्न तत्रारोपितमिति।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C19_S01_B04 | | | verse_id = VA_C19_S01 |
| | id = VA_C19_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C19_S01_B06 |
| | text = | | | text = मूलम्-विमत आत्माऽऽत्माभावारोपाधिष्ठानं न भवति। आत्मत्वाद्देवदत्त्वत्। ननु निष्प्रधानत्वमसिद्धम्। पूर्वपूर्वप्रपञ्चस्योत्तरोत्तरप्रपञ्चारोपे प्रधानत्वादिति चेन्न। असत्त्वात्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतुनां प्रतिकूलतर्कपराहतिः।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितो निरधिष्ठानत्वादित्यनुमाने स्वरूपासिद्धिमाशङ्कते।। निरधिष्ठानत्वमिति।। अविषयत्वादिति। आरोपाविषयत्वादित्यर्थः। यथा रजतारोपे घटोऽन्वयदृष्टान्तो यदधिष्ठानं तदारोपविषयो यथा शुक्तिकाशकलं व्यतिरेकदृष्टान्त इति ज्ञातव्यम्। हेत्वन्तरमाह।। तद्विरुद्धतयेति। पराक्त्वेन प्रतीयमानजगद्विरुद्धतया प्रत्यक्त्वेन प्रतीयमानत्वादित्यर्थः। यद्विरुद्धतया प्रतीयते न तत्तदारोपाधिष्ठानमिति व्याप्तौ दृष्टान्तमाह।। यथा पर्वत इति। स्वल्पपरिमाणोपेतसर्षपविरुद्धतया महत्परिमाणवत्त्वेन प्रतीयमानः पर्वतो न सर्षपारोपाधिष्ठानमित्यर्थः। प्रपञ्चपक्षकमप्यनुमानमाह।। प्रपञ्चो वेति। अप्रयोजकताशङ्कापरिहाराय विपक्षे बाधकमाह।। विरुद्धाकारेति। तस्याध्यसस्य। भ्रान्त्युत्तरकाले प्रतीयत एवेत्यत उक्तं भ्रान्ताविति।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C19_S01_B05"> | | <span id="gr-C20" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="विंशतिततमभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == विंशतिततमभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च ब्रह्मणि प्रपञ्चस्यारोपितत्वं वदन्नत्यत्र प्रपञ्चस्य सत्तामङ्गीकरोति न वा। आद्ये परस्य मिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिः। न चेत्कस्य कुत्रारोपः न हि शशविषाणं क्वचिदारोप्यते। नास्माभिरन्यत्र सतः प्रपञ्चस्य ब्रह्मण्यारोपोऽभिधीयते। येन सर्वमिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिरापद्येत। किन्त्वनिर्वचनीयरूपः कश्चिदनात्माकारोऽयं प्रपञ्चे ब्रह्मण्यारोपित इत्यङ्गीक्रियत इत् चेन्न। अनात्माकारः प्रपञ्च इति कोऽर्थः। किमात्मनोऽन्य उतात्मविरुद्ध उतात्माभावो वा। नाद्यद्वितीयौ। क्वचित्प्रपञ्चस्य सत्यतापातात्। न तृतीयः। आत्मन्यात्माभावारोपस्य क्वाप्यदृष्टत्वात्। न हि कश्चिदहमहं न भवामीति भ्रान्तो दृश्यते।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C19_S01_B05 | | | verse_id = VA_C20_S01 |
| | id = VA_C19_S01_B05_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C20_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-एवमनेकानुमानप्रतिहतत्वान्न दृश्यत्वानुमानं समञ्जसमिति सिद्धम्।। छ ।। दृश्यत्वादिहेतुत्रयभङ्गः ।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। अन्यत्रेति। आरोपादन्यत्रेत्यर्थः।। कस्य कुत्रेति। अन्यत्र विद्यमानस्यैव ह्यन्यत्रारोप इति भावः। अन्यत्रासतोऽप्यारोपः किन्न स्यादिति चेत्तत्राह।। न हीति। शङ्कते।। नास्माभिरिति । तार्किकरीत्येति शेषः।। प्रतिज्ञाहानिरिति। प्रधानस्य सत्यत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अनिर्वचनीयरूप इति। तथा चानिर्वचनीयार्थावभासो भ्रम इत्युक्तं भवति।। किमात्मनोऽन्य इत्यादि। तदन्तद्विरुद्धतदभावानां त्रयाणां नत्रर्थत्वादिति भावः। आत्मधर्मविरुद्ध आत्मविरुद्धधर्मवान्। तृतीयपक्षापेक्षया प्रथमद्वितीयपक्षयोरुभयोरप्याद्यत्वादाद्यावित्युक्तमिति ज्ञातव्यम्।। क्वचित्प्रपञ्चस्येति। आरोपस्य प्रधानसापेक्षत्वात्तस्य चारोप्यादधिकसत्ताकत्वादिति भावः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C19_S01_B06"> | | <span id="gr-C21" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकविंशतितमभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == एकविंशतितमभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-विमत आत्माऽऽत्माभावारोपाधिष्ठानं न भवति। आत्मत्वाद्देवदत्त्वत्। ननु निष्प्रधानत्वमसिद्धम्। पूर्वपूर्वप्रपञ्चस्योत्तरोत्तरप्रपञ्चारोपे प्रधानत्वादिति चेन्न। असत्त्वात्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतुनां प्रतिकूलतर्कपराहतिः।। छ ।।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C19_S01_B06 | | | verse_id = VA_C21_S01 |
| | id = VA_C19_S01_B06_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C21_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च जगतो मिथ्यात्वाभावे न बाधकं पश्यामः। सत्यत्वे कथं प्रकाशेत। न तावत्स्वातः। जडत्वात्। नापि परतः। प्रकाशान्तरेण सम्बन्धाभावात्। असम्बद्धस्य प्रकाशनेऽतिप्रसङ्गात्। असत्त्वे तु चित्प्रकाशारोपितस्याधिष्ठानाध्यस्तत्वसम्बन्धेन प्रकाशोपपत्तिरिति चेन्न। विचारागोचरत्वात्। तथा हि। कथं प्रकाशेतेति कोऽर्थः। कथं प्रकाशः स्यादिति वा कथं प्रकाशाश्रय इति वा कथं प्रकाशविषय इति वा। न प्रथमद्वितीयौ। अनभ्युपगमात्। तृतीयेऽपि किं प्रकाशशब्देन चैतन्यं विवक्षितं वृत्तिर्वा। नाद्यः। चैतन्याविषयत्वेऽपि बाधकाभावात्। वृत्तिविषयत्वेनैव व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतिति व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतीति को दोषः। असङ्गश्रुतिस्तु परमेश्वरस्य पापादिसम्बन्धाभाववादिनी। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। असत्त्वादिति। प्रधानस्यारोप्यादधिकसत्ताकत्वनियमेन पूर्वपूर्वप्रपञ्चस्यारोपितत्वेनासत्यत्वान्न तस्योत्तरोत्तरारोपे प्रधानत्वं सम्भवतीति भावः। असत्यत्वादित्येव पाठः। यथोक्तं तत्त्वनिर्णयटीकायाम्। असत्यत्वान्न पूर्वपूर्वप्रपञ्च उत्तरोत्तरारोपे प्रधानमिति ।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 21 ==
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C21_S01_B01">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च जगतो मिथ्यात्वाभावे न बाधकं पश्यामः। सत्यत्वे कथं प्रकाशेत। न तावत्स्वातः। जडत्वात्। नापि परतः। प्रकाशान्तरेण सम्बन्धाभावात्। असम्बद्धस्य प्रकाशनेऽतिप्रसङ्गात्। असत्त्वे तु चित्प्रकाशारोपितस्याधिष्ठानाध्यस्तत्वसम्बन्धेन प्रकाशोपपत्तिरिति चेन्न। विचारागोचरत्वात्। तथा हि। कथं प्रकाशेतेति कोऽर्थः। कथं प्रकाशः स्यादिति वा कथं प्रकाशाश्रय इति वा कथं प्रकाशविषय इति वा। न प्रथमद्वितीयौ। अनभ्युपगमात्। तृतीयेऽपि किं प्रकाशशब्देन चैतन्यं विवक्षितं वृत्तिर्वा। नाद्यः। चैतन्याविषयत्वेऽपि बाधकाभावात्। वृत्तिविषयत्वेनैव व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतिति व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतीति को दोषः। असङ्गश्रुतिस्तु परमेश्वरस्य पापादिसम्बन्धाभाववादिनी।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C21_S01_B01 | | | verse_id = VA_C21_S01 |
| | id = VA_C21_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C21_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-न द्वितीयः करणसामर्थ्येन विषयविषयिभावोपपत्तेः। किञ्चाध्यस्तत्वेन प्रकाशने जीवेऽध्यासपक्षे सर्वदा प्रकाशः स्यात्। ब्रह्मण्यध्यासे न कदाचित्। बहुजीवपक्षेऽपि जीवेऽध्यासे सर्वदा सर्वेषां प्रपञ्चः प्रकाशेत। ब्रह्माधिष्ठानत्वे तु न कस्यापि कदाऽपि तथापि सत्यत्वे दृश्यत्वं न युज्यते। दृग्दृश्ययोः संसर्गानिरूपणादिति चेन्न। संयोगासम्भवे समवायवदन्यस्यापि तयोरसम्भवे कल्प्यत्वात्। विषयविषयिभावस्य सम्भवात्। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">एकविंशतितमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">विपक्षे बाधकाभावादप्रयोजको दृश्यत्वहेतुरित्याह।। किञ्चेति।। प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं यदि न स्यात्तर्हि दृग्विषयत्वरूपं दृश्यत्वमेव न स्यात्सत्यत्वे दृग्दृश्ययोः सम्बन्धानिरूपणादिति हेतूच्छित्तिरेव बाधिकेत्यभिप्रेत्य सत्यत्वे दृग्दृश्ययोः सम्बन्धानुपपत्तिमुपपादयति।। सत्यत्व इति। प्रकाशेत ज्ञायेत। अत्र सर्वत्र प्रकाशशब्दो ज्ञानपर इत्यवगन्तव्यम्।। जडत्वादिति। जगतोऽस्वप्रकाशस्वरूपत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">प्रकाशान्तरेणेति। वृत्तिज्ञानख्येनेत्यर्थः। संयोगसमवाययोरसम्भवाद्विषयविषयिभावस्य च दुर्निरूपत्वदिति भावः। अस्त्वसम्बद्धस्यापि प्रकाशनमित्यत आह।। असम्बद्धस्येति।। अतिप्रसङ्गादिति। काशीस्थघटस्याप्यत्र प्रकाशः स्यादिति भावः। मिथ्यात्वे त्वाध्यासिकसम्बन्धसद्भावात्प्रकाशः सम्भवतीत्याह।। असत्त्वे त्विति। मिथ्यात्वे त्वित्यर्थः।। चित्प्रकाशेति। अधिष्ठानचैतन्यरूपप्रकाशेत्यर्थः।। अधिष्ठानेत्यादि। आध्यासिकसम्बन्धेनेत्यर्थः। प्रकाशः प्रकाशस्वरूपः।। अनभ्युपगमादिति। जडस्य जगतः प्रकाशरूपत्वप्रकाशाश्रयत्वयोरनभ्युपगमादित्यर्थः। चैतन्यमधिष्ठानचैतन्यम्।। चैतन्याविषयत्वेऽपीति। चैतन्यरूपप्रकाशाविषयत्वेऽपीत्यर्थः।। बाधकाभावादिति। सत्यत्वे कथं प्रकाशतेत्यस्य कथं चैतन्यरूपप्रकाशविषयः स्यात्। चैतन्यरूपप्रकाशविषयो न स्यादिति यावदित्यर्थः। तथा च सत्यस्यापि चैतन्यरूपप्रकाशविषयत्वे बाधकाभावेन तर्के इष्टापत्तिरिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु चैतन्यरूपप्रकाशाविषयत्वे घटादिव्यवहार एव न स्यात्। व्यवहारस्य व्यवहर्तव्यज्ञानसाध्यत्वादित्येवं व्यवहारानुपपत्तिरेव बाधिका। ततश्च तदन्यथाऽनुपपत्त्या चित्प्रकाशविषयत्वमङ्गीकार्यमिति नेष्टापत्तिरित्यतोऽन्यथैवोपपत्तिमाह।। वृत्तीति। वृत्तिरूपज्ञानविषयत्वेनेत्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु चक्षुरादिजन्यवृत्त्यविषये सुखादौ कथं व्यवहारः स्यादित्यत आह।। चैतन्यस्यापीति। साक्षिरूपचैतन्यस्यापीत्यर्थः।। स्वाभाविकमिति।। विषयकत्वमिति शेषः। सुखादिविषयकत्वमित्यर्थः। तथा च सुखादेः साक्षिविषयत्वेन व्यवहारः सम्भवतीति भावः। नन्वसङ्गो ह्ययं पुरुष इति श्रुत्या साक्षिचैतन्यस्यासङ्गत्वावगमात्कथं तस्य सुखादिविषयसम्बन्ध इत्यत आह।। असङ्गश्रुतिस्त्विति। असङ्गत्वश्रुतिस्त्वित्यर्थः।। पापादीति। न तु सुखादिविषयसम्बन्धाभाववादिनीत्यर्थः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C21_S01_B02">
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| <div class="teeka-block">
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न द्वितीयः करणसामर्थ्येन विषयविषयिभावोपपत्तेः। किञ्चाध्यस्तत्वेन प्रकाशने जीवेऽध्यासपक्षे सर्वदा प्रकाशः स्यात्। ब्रह्मण्यध्यासे न कदाचित्। बहुजीवपक्षेऽपि जीवेऽध्यासे सर्वदा सर्वेषां प्रपञ्चः प्रकाशेत। ब्रह्माधिष्ठानत्वे तु न कस्यापि कदाऽपि तथापि सत्यत्वे दृश्यत्वं न युज्यते। दृग्दृश्ययोः संसर्गानिरूपणादिति चेन्न। संयोगासम्भवे समवायवदन्यस्यापि तयोरसम्भवे कल्प्यत्वात्। विषयविषयिभावस्य सम्भवात्।</span>
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| </div>
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = VA_C21_S01_B02 | | | verse_id = VA_C21_S01 |
| | id = VA_C21_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C21_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-न च तदनिरूपणम्। ज्ञानजन्यफलाधारत्वलक्षणं तत्तत्प्रतीतियोग्यत्वं विषयत्वमस्त्विति चेत्तत्फलं ज्ञातता व्यवहारो वा। नाद्यः। अतीतादौ तदसम्भवेनाविषयत्वापत्तेः। न द्वितीयः। गगनादावभावादिति। मैवम्। अतीतादौ ज्ञातताऽभ्युपगमे विरोधाभावात्। अन्यथा तद्व्यवहारायोगात्। अतीतादावनुगतविषयत्वं नास्तीति चेत्प्रतिनियतमेवास्तु। व्यवहारोऽपि तत्तद्योग्यमेव ज्ञानजन्यफलं किन्न स्यात्। तस्मान्नानुमानं विश्वमिथ्यात्वे मानम्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतूनामप्रयोजकत्वम्।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">सत्यत्वे वृत्तिरूपप्रकाशविषयःक कथं न स्यादिति द्वितीयपक्षोऽप्ययुक्त इत्याह।। न द्वितीय इति।। करणसामर्थ्येनेति। घटसन्निकृष्टकरणजन्यत्वेनैव वृत्तेर्घटविषयत्वोपपत्तेरित्यर्थः। असत्त्वे तु चित्प्रकाशारोपितस्येत्यादिनोक्तमाध्यासिकसम्बन्धेन प्रकाशं दूषयति।। किञ्चाध्यस्तत्वेनेति। एकजीववादिमते दोषमाह।। जीवेऽध्यासपक्ष इति। जीवचैतन्यमविद्योपाधिकं सत्सर्वगतमन्तःकरणोपाधिकत्वं तु परिच्छिन्नमित्यङ्गीकृतत्वेनाविद्योपाधिकसर्वगतजीवचैतन्येऽध्यासपक्षे जीवचैतन्यस्यैकत्वात्स्वास्मिन्नध्यस्तः प्रपञ्चः स्वस्य सर्वदा प्रकाशेतेत्यर्थः।। न कदाचिदिति। अधिष्ठानभूतब्रह्मण इन्द्रियजन्यज्ञानाविषयत्वेन तदध्यस्तस्य प्रपञ्चस्य क्वचिदपि न प्रकाशः स्यादित्यर्थः।। सर्वदेति। उक्तरीत्या यस्मिञ्जीवचैतन्येऽध्यस्तः प्रपञअचस्तस्य जीवस्य सर्वदा प्रकाशेतेत्यर्थः।। सर्वेषामिति। घटाधिष्ठानचैतन्यसर्वसाधारणत्वेन तत्रारोपितः प्रपञ्चः सर्वेषां प्रकाशेतेत्यर्थः। इदं च दूषणं नैकजीववादिमते सम्भवति। कल्पकजीवव्यतिरिक्तजीवानामभावादिति ज्ञातव्यम्।। ब्रह्माधिष्ठाने त्विति। ब्रह्मैवाधिष्ठानं यस्य तद्ब्रह्माधिष्ठानं जगत्तस्मिन्नङ्गीक्रियमाणे सति जगतो ब्रह्मण्यध्यस्तत्वपक्ष इति यावत्।। न कस्यापि कदाऽपीति। तस्येन्द्रियजन्यज्ञानविषयत्वेन तत्रारोपितः प्रपञ्चः कस्यापि कदाऽपि न प्रकाशेतेत्यर्थः।। संसार्गानिरूपणादितीति। संयोगसमवाययोरसम्भवादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">संयोगासम्भव इति। तन्तुपटयोरिति शेषः। उपलक्षणमेतत्। दण्डपुरुषयोः समवायासम्भवे संयोगवदित्यपि द्रष्टव्यम्।। तयोरिति। दृग्दृश्ययोः संयोगसमवाययोरसम्भव इत्यर्थः। अन्यस्यापि विषयविषयिभावस्य कल्प्यत्वादित्यन्वयः।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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|
| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C21_S01_B03"> | | <span id="gr-C22" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वाविंशतितमभङ्गः"></span> |
| <div class="teeka-block">
| | == द्वाविंशतितमभङ्गः == |
| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-न च तदनिरूपणम्। ज्ञानजन्यफलाधारत्वलक्षणं तत्तत्प्रतीतियोग्यत्वं विषयत्वमस्त्विति चेत्तत्फलं ज्ञातता व्यवहारो वा। नाद्यः। अतीतादौ तदसम्भवेनाविषयत्वापत्तेः। न द्वितीयः। गगनादावभावादिति। मैवम्। अतीतादौ ज्ञातताऽभ्युपगमे विरोधाभावात्। अन्यथा तद्व्यवहारायोगात्। अतीतादावनुगतविषयत्वं नास्तीति चेत्प्रतिनियतमेवास्तु। व्यवहारोऽपि तत्तद्योग्यमेव ज्ञानजन्यफलं किन्न स्यात्। तस्मान्नानुमानं विश्वमिथ्यात्वे मानम्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतूनामप्रयोजकत्वम्।। छ ।।</span>
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| </div>
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| | verse_id = VA_C21_S01_B03 | | | verse_id = VA_C22_S01 |
| | id = VA_C21_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C22_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। तदनिरूपणमिति। सर्वत्रानुगतविषयत्वनिरूपणं कर्तुमशक्यमित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु कथं तदनिरूपणं, ज्ञानजन्यफलाधारत्वं वा तत्प्रतीतिविषयत्वयोग्यत्वं वा विषयत्वमिति चेन्न। ज्ञानजन्यफलं ज्ञातता तदाधारत्वमतीतानागतयोर्न सम्भवति। असति धर्मिणि धर्मजननायोगेन तत्र तदाधारत्वासम्भवेनातीतानागतज्ञानयोर्निविषयत्वोपपत्तेः। न द्वितीयः। आत्माश्रयादित्याशङ्क्याह।। ज्ञानजन्येत्यादि।। नास्ति चेदिति। उक्तदूषणेनानुगतं न सम्भवति चेदित्यर्थः।। प्रतिनियतमेवेति। यत्सन्निकृष्टेन करणेन यज्ज्ञानं जायते स तस्य विषय इति प्रतिनियत एव ज्ञातताया असम्भवेन ज्ञानजन्यं फलं दुर्निरूपमिति चेत्तत्राह।। व्यवहारोऽपीति। तत्तद्योग्यमेव ज्ञानजन्यं फलं व्यवहारः किन्न स्यादित्यन्वयः। तथा च व्यवहार एव ज्ञानजन्यं फलं भविष्यतीति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु पटव्यवहारस्य कथं घटज्ञानजन्यफलत्वमिति मन्दाशङ्कापरिहाराय तत्तद्योग्यमेवेत्युक्तम्। तत्तज्ज्ञानजन्यत्वयोग्यमेवेत्यर्थः। तथा च पटज्ञानजन्यत्वयोग्यं फलं पटव्यवहार एवेत्यर्थः।। तस्मादिति। विपक्षे बाधकाभावेनाप्रयोजकत्वादित्यर्थः।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 22 ==
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः</span>
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| | verse_id = VA_C22_S01_B01 | | | verse_id = VA_C22_S01 |
| | id = VA_C22_S01_B01_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C22_S01_B02 |
| | text = | | | text = मूलम्-ननु यदुक्तं यद्भ्रन्तिकल्पितं तत्साधिष्ठानमिति तन्न। स्वाप्नपदार्थे व्यभिचारात्। तथा हि स्वाप्नास्तावत्पदार्थाः भ्रान्तिकल्पिताः। सत्यत्वे हि तेऽनादिनित्या उतोत्पत्तिविनाशवन्तः। आद्ये प्रागूर्ध्वञ्चोपलभ्येरन्। द्वितीये किन्न बोधानन्तरमुपलभ्यन्ते। तदैवोत्पद्यविनष्टा इति चेन्न। असम्भाववितत्वात्। किञ्चैवमुपादानानि निमित्तानि चोपलब्धव्यानि। अपि चैतानन्तः पश्यति बहिर्वा। नाद्यः। अल्पप्रदेशे महतां दर्शनासम्भवात्। नोत्तरः। पार्श्वस्थानामप्युपलम्भप्रसङ्गात्। केन चैते करणेनोपलभ्यन्ते। न तावद्बाह्येन्द्रियैः तेषां तदोपरतत्वात्। नापि मनसा। तस्य बहिरस्वातन्त्र्यात्।। किञ्च काश्यां सुप्तो मधुरां पश्यति तथा हेमन्ते सुप्तो वसन्तम्। न च तत्र तयोः सम्भवः। तस्माद्भ्रान्तिकल्पिताः। न चात्र किञ्चिदधिष्ठानमस्ति। आत्मनो भेदेनोपलम्भात्। न ह्यहं गज इति तदा प्रतीतिरस्तीति। एतदप्यविमर्शसुन्दरम्। तेषां सत्यत्वात्। तेन निरधिष्ठानत्वेऽपि न विरोधः |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">द्वाविंशतितमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">परार्थानुमानस्य शब्दरूपत्वात्प्रयोग इत्युक्तम्। दृशत्वानुमानस्य तर्कपराहतिं चाह।। किं च यदीत्यादिना। स्यादित्यनन्तरं तर्हीति शेषः।। कल्प्यमानेति। आरोप्यमाणेत्यर्थः।। प्रसज्येतेति। अधिष्ठानञ्च सदृशं तथ्यवस्तुद्वयं विना। न भ्रान्तिर्भवति क्वापीति वचनादिति भावः। तथा च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारप्रसङ्ग इति वाक्यशेषः। न चारोप्यस्यात्यन्तासत्त्वेन निर्धर्मिकत्वात्कथं तत्सादृश्यमधिष्ठानप्रधानयोरपेक्षितमित्युच्यत इति चेन्न। आरोप्यस्य यत्किञ्चित्प्रतियोगिकसादृश्यानाश्रयत्वेऽपि किञ्चिन्निष्ठसादृश्यप्रतियोगित्वसम्भवात्। प्रतियोगित्वस्य च रूपादिवद्धर्मिसत्तासापेक्षत्वाभावात्। परमते घटत्वादिजातिवदस्मन्मते सादृश्यमखण्डमेव। यथोक्तं सुधायाम्। सादृश्यं हि पदार्थान्तरमिति। पदार्थान्तरमखण्डमिति तदर्थः। न तु तद्गतं भूयोधर्मवत्त्वरूपं येनारोप्यस्यासतो निर्धर्मकत्वात्कथं तद्गतं भूयोधर्मवत्त्वरूपं सादृस्यमधिष्ठानप्रधानयोरुच्यत इति शङ्कानवकाश इति द्रष्टव्यम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">इष्टापत्तिरिति चेत्तत्राह।। न चेति। अधिष्ठानत्वेन प्रधानत्वेन च सत्यद्वयं तावदपेक्षितम्। अधिष्ठानप्रधानयोश्चारोप्यसादृश्यमपेक्षितम्। तथा चारोप्यजगत्सदृशमधिष्ठानं प्रधानं च जगदेवेति वाच्यम्। जगत एव जगता सादृश्यसम्भवादन्यस्य च तदसम्भवादतो जगद्द्वयमपेक्षितम्। न च तदङ्गीकारस्तव युक्त इत्यर्थः। कुतो न युक्त इत्यत आह।। पिण्याकेति। तैलयन्त्रखण्डिततिलादेः सकाशात्तैलनिष्पत्त्यनन्तरं यत्पिष्ठमवशिष्टते तत्पिण्याकमित्युच्यते। गतस्येति कर्मणि षष्ठी। गतं प्रतीत्यर्थः। तत्त्वनिर्णयटीकानुसारेण खारित्यतः पूर्वं पिशाचस्येति पूरणीयम्। कर्तरि चेयं षष्ठी। पिशाचकर्तृकखारीपरिमिततैलदानप्रतिज्ञावदित्यर्थः। खारीति परिमितिविशेषस्य सञ्ज्ञा। खारि द्रोणी निकुञ्चक इत्यभिधानात्।। अधिकापातादिति। स्वापेक्षितापेक्षयाऽप्यधिकस्यापातादित्यर्थः। यथा केनचित्पिण्याकं देहीति याचिते सति तं प्रति पिण्याकेन खारीपरिमिततैलन्दास्यमिति केनचित्पिशाचेन प्रतिज्ञाते सति पिण्याकयाचकस्य यथाऽधिकलाभो जातस्तद्वत्परिदृस्यमानस्यैकस्य जगतः सत्यत्वमपेक्ष्यमाणं मां प्रत्यस्य जगतो भ्रान्तिकल्पितत्ववचनेनोक्तरीत्या सत्यभूतजगद्द्वयलाभेनापेक्षिता दप्यधिकलाभो मम जात इत्यविवेकितया पिशाचतुल्यो भवानिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">दृश्यत्वानुमानस्य व्यापकनिवृत्त्या व्याप्यनिवृत्तिरूपप्रमाणविरोधश्च स्यादित्याह।। किञ्चेति। कुतो नास्तीत्यत आह।। सत्यजगद्द्वयेति। तथात्वे गौरवं स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अस्यैवेति। भ्रान्तिकल्पिततया त्वयोच्यमानस्यास्यैव परिदृश्यमानस्येत्यर्थः।। प्रमाणविरोध इति। अनुमानरूपप्रमाणविरोध इत्यर्थः। अनुमानप्रयोगप्रकारं दर्शयति।। तथा चेति। अप्रयोजकतापरिहाराय विपक्षे बाधकतर्कमाह।। विपक्षे त्विति।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-ननु यदुक्तं यद्भ्रन्तिकल्पितं तत्साधिष्ठानमिति तन्न। स्वाप्नपदार्थे व्यभिचारात्। तथा हि स्वाप्नास्तावत्पदार्थाः भ्रान्तिकल्पिताः। सत्यत्वे हि तेऽनादिनित्या उतोत्पत्तिविनाशवन्तः। आद्ये प्रागूर्ध्वञ्चोपलभ्येरन्। द्वितीये किन्न बोधानन्तरमुपलभ्यन्ते। तदैवोत्पद्यविनष्टा इति चेन्न। असम्भाववितत्वात्। किञ्चैवमुपादानानि निमित्तानि चोपलब्धव्यानि। अपि चैतानन्तः पश्यति बहिर्वा। नाद्यः। अल्पप्रदेशे महतां दर्शनासम्भवात्। नोत्तरः। पार्श्वस्थानामप्युपलम्भप्रसङ्गात्। केन चैते करणेनोपलभ्यन्ते। न तावद्बाह्येन्द्रियैः तेषां तदोपरतत्वात्। नापि मनसा। तस्य बहिरस्वातन्त्र्यात्।। किञ्च काश्यां सुप्तो मधुरां पश्यति तथा हेमन्ते सुप्तो वसन्तम्। न च तत्र तयोः सम्भवः। तस्माद्भ्रान्तिकल्पिताः। न चात्र किञ्चिदधिष्ठानमस्ति। आत्मनो भेदेनोपलम्भात्। न ह्यहं गज इति तदा प्रतीतिरस्तीति। एतदप्यविमर्शसुन्दरम्। तेषां सत्यत्वात्। तेन निरधिष्ठानत्वेऽपि न विरोधः</span>
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| | id = VA_C22_S01_B02_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C22_S01_B03 |
| | text = | | | text = मूलम्-ननु सत्यत्वे बाधकमुक्तम्। मैवम्। उत्पत्तिविनाशाङ्गीकारात्। न चप्रागूर्ध्वमुपलम्भप्रसङ्गः विद्युदादिवत्तात्कालिकत्वसम्भवात्। तर्ह्युपादानाद्युपलब्धिः स्यादिति चेन्न। वासनोपादानकत्वात्। वासनानां चातीन्द्रियत्वादनुपलब्धिर्युज्यते। निमित्तादिकं त्वदृष्टेश्वरादिकमिति। अतीन्द्रियकार्यस्यापि त्र्यणुकवदुपलम्भः सम्भवति। अत एवान्तर्मनस उपलब्धिर्युज्यते। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">स्वाप्नाः पदार्था घटपटकरितुरगादयः।। प्रागूर्ध्वं चेति। स्वप्नात्प्राक् स्वप्नादूर्ध्वं स्वप्नानन्तरमित्यर्थः। बोधानन्तरं प्रबोधानन्तरम्। जाग्रदवस्थायां किन्नोपलभ्यन्ते उत्पत्तिविनाशवतां घटादीनामिवोपलम्भप्रसङ्ग इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तदैवेति। स्वप्नावस्थायामेवेत्यर्थः। विद्युदादिवदिति शेषः। अतो न प्रागूर्ध्वमुपलम्भप्रसङ्ग इति भावः। विद्युदादिवत्सम्भावितत्वमप्यङ्गीकृत्याह।। किञ्चैवमिति। स्वाप्नपदार्थानां तदैवोत्पद्यविनष्टत्वाङ्गीकार इत्यर्थः। उपादानानि स्वाप्नघटादिपदार्थोपादानानि मृदादीनि। निमित्तानि दण्डादीनि। एतान्स्वाप्नान् गजतुरजादिरथान्। अन्तर्देहान्तः। बहिर्देहात्। अल्पदेशे देहान्तःस्थेऽल्पावकाशे। महतां स्थूलानां गजतुरगादीनाम्।। असम्भवादिति। तथात्वे देहविदारणं स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">उपरतत्वादिति। विषयज्ञानजननव्यापारविनिर्मुक्तत्वादित्यर्थः।। बहिरस्वातन्त्र्यादिति। मनसः स्वातन्त्र्येण बाह्येन्द्रियानधिष्ठानत्वेन बहिःपदार्थविषयकज्ञानजनकत्वाभावादित्यर्थः। मनो हि बाह्येन्द्रियाधिष्ठानेनैव बाह्यपदार्थज्ञानं जनयति नान्यथेत्यनुभवसिद्धम्। इन्द्रियाणि च तदोपरतानीति भावः। हेमन्ते हेमन्तर्तौ, वसन्तं वसन्तर्तुम्।। न च तत्र तयोरिति। काश्यां मधुराया हेमन्ते वसन्तस्य च सम्भवो नेत्यर्थः। भिन्नदेशयोर्भिन्नकालयोश्च सहावस्थानस्य विरुद्धत्वादिति भावः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु स्वाप्नपदार्थानामात्मैवाधिष्ठानमस्तीति चेत्तत्राह।। आत्मन इति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">स्वप्नपदार्थाद्भेदेनेत्यर्थः। लोके ह्यधिष्ठानमारोप्याभिन्नतयैव प्रतीयत इत्यनुभवसिद्धम्। न चात्र तथा प्रतीतिरस्तीत्याह।। न हीति। तदा स्वप्नावस्थायाम्। अस्तीति।। तथा च निरधिष्ठानत्वहेतोः स्वाप्नपदार्थेषु व्यभिचारः सुस्थ इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अविमर्शसुन्दरमिति। विमर्शो विचारस्तदभाव एव सुन्दरं न तु विमर्शे कृते सतीत्यर्थः। तेषां स्वाप्नपदार्थानाम्। तेनाकल्पितत्वसाध्यसमर्थनेन।। न विरोध इति। आरोपितत्व एव ह्यधिष्ठानापेक्षा न तु सत्यत्व इति भावः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-ननु सत्यत्वे बाधकमुक्तम्। मैवम्। उत्पत्तिविनाशाङ्गीकारात्। न चप्रागूर्ध्वमुपलम्भप्रसङ्गः विद्युदादिवत्तात्कालिकत्वसम्भवात्। तर्ह्युपादानाद्युपलब्धिः स्यादिति चेन्न। वासनोपादानकत्वात्। वासनानां चातीन्द्रियत्वादनुपलब्धिर्युज्यते। निमित्तादिकं त्वदृष्टेश्वरादिकमिति। अतीन्द्रियकार्यस्यापि त्र्यणुकवदुपलम्भः सम्भवति। अत एवान्तर्मनस उपलब्धिर्युज्यते।</span>
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| | id = VA_C22_S01_B03_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C22_S01_B04 |
| | text = | | | text = मूलम्-निरधिष्ठानत्वमसिद्धम्। आत्मनोऽधिष्ठानत्वादिति चेन्न। आत्मनोऽधिष्ठानत्वासम्भवात्। नात्मा जगदारोपाधिष्ठानम्। अविषयत्वात्। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा पर्वतो न सर्षपारोपाधिष्ठानम्। प्रपञ्चो वा नात्मन्यध्यस्तः। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा सर्षपो न पर्वतेऽध्यस्तः। विरुद्धाकारप्रतीतावध्यासाङ्गीकारे तस्य कदाऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्गः। किञ्च यदि जगदात्मन्यारोपितं स्यात्तदाऽऽत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्यते। यद्यत्रारोपितं तत्ततो भिन्नत्वेन न प्रतीयते। यथा शुक्तिकायामारोपितं रजतं न शुक्तिकाया भिन्नत्वेन प्रतीयते भ्रान्तौ। दृश्यते चेदमिदानीं जगदात्मनो भिन्नत्वेन। तस्मान्न तत्रारोपितमिति। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु तर्ह्युपादानभूतानां वासनानामेवोपलब्धिः स्यादिति चेत्तत्राह।। वासनानां चेति।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु घटादिस्वाप्नपदार्थोपादानानां वासनानामतीन्द्रियत्वेनोपालम्भासम्भवेऽपि निमित्तकारणानामुपलब्धिः स्यादिति चेन्न। अदृष्टादेहेव निमित्तत्वेन दण्डादेस्तदनङ्गीकारात्तस्य चातीन्द्रियत्वाद्युक्तानुपलब्धिरित्याशयेनाह।। निमित्तादिकं त्विति। ईश्वरादिकमित्यत्रादिपदेन कालो ग्राह्यः। नन्वतीन्द्रियवासनाकार्याणां स्वाप्नपदार्थानां कथमैन्द्रियकत्वं युज्यते। स्वाप्नपदार्था अतीन्द्रिया अतीन्द्रियकार्यत्वात् द्व्यणुकवद्व्यतिरेकेण घटादिवच्चेत्यनुमानविरोधादिति चेन्न। अतीन्द्रियद्व्यणुककार्ये त्र्यणुके व्यभिचारादित्याह।। अतीन्द्रियकार्यस्यापीति। अपि चैतानन्तः पश्यति बहिर्वा केन च ते करणेनोपलभ्यन्त इत्याशङ्क्य यद्दूषणमुक्तं तदप्यत एवापास्तमित्याह।। अत एवेति। वासनोपादानकत्वेन बाह्यपदार्थविलक्षणत्वादेवेत्यर्थः। तथा चाल्पदेशेऽपि महतां दर्शनसम्भवान्न देहविदारणम्। नापि मनसोपलब्ध्यङ्गीकारे मनसो बहिरस्वातन्त्र्यमित्युक्तदोषः। तेषां बाह्यपदार्थत्वाभावेन स्वातन्त्र्येण मनसस्तज्ज्ञानजनकत्वसम्भवादिति भावः। भेदेनेति। स्वाप्नपदार्थाद्भेदेनेत्यर्थः। अधिष्ठानं ह्यारोप्यसम्भिन्नतया प्रतीयते न चात्र तथा प्रतीतिरस्तीत्याह।। न हीति।। तदा स्वप्नेऽस्तीति। तथा च निरधिष्ठानत्वहेतोः स्वप्नपदार्थे व्यभिचारः सिद्ध इति भावः। न विरोध इति। आरोपितत्व एवाधिष्ठानापेक्षा न तु सत्यत्व इति भावः। तर्ह्युपादानभूतानां वासनानामेवोपलब्धिः स्यादिति चेत्तत्राह।। वासनानां चेति। नन्वतीन्द्रियवासनोपादानकत्वात्स्वाप्नपदार्थानामप्यतीन्द्रियत्वं स्यादिति चेत्तत्राह।। अतीन्द्रियेति। अतीन्द्रियभूतवासनाकार्यस्यापि प्रपञ्चस्येत्यर्थः।। त्र्यणुकवदिति। अतीन्द्रियद्व्यणुककार्यस्यापि त्र्युणुकस्य यथोपलम्भस्तथेत्यर्थः। तथा चातीन्द्रियोपादनानकस्याप्यतीन्द्रियत्वमिति व्याप्तेस्त्र्यणुके व्यभिचार इत्यर्थः।। अत एवेति। वासनोपादानकत्वादेवेत्यर्थः। देहान्तर्मनसा करणेनोपलब्धिर्युज्यत इति भावः। बाह्यमृदाद्युपादानकत्वे हि तदनुपपत्तिः स्यादिति भावः।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-निरधिष्ठानत्वमसिद्धम्। आत्मनोऽधिष्ठानत्वादिति चेन्न। आत्मनोऽधिष्ठानत्वासम्भवात्। नात्मा जगदारोपाधिष्ठानम्। अविषयत्वात्। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा पर्वतो न सर्षपारोपाधिष्ठानम्। प्रपञ्चो वा नात्मन्यध्यस्तः। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा सर्षपो न पर्वतेऽध्यस्तः। विरुद्धाकारप्रतीतावध्यासाङ्गीकारे तस्य कदाऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्गः। किञ्च यदि जगदात्मन्यारोपितं स्यात्तदाऽऽत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्यते। यद्यत्रारोपितं तत्ततो भिन्नत्वेन न प्रतीयते। यथा शुक्तिकायामारोपितं रजतं न शुक्तिकाया भिन्नत्वेन प्रतीयते भ्रान्तौ। दृश्यते चेदमिदानीं जगदात्मनो भिन्नत्वेन। तस्मान्न तत्रारोपितमिति।</span>
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| | id = VA_C22_S01_B04_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C22_S01_B05 |
| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च ब्रह्मणि प्रपञ्चस्यारोपितत्वं वदन्नत्यत्र प्रपञ्चस्य सत्तामङ्गीकरोति न वा। आद्ये परस्य मिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिः। न चेत्कस्य कुत्रारोपः न हि शशविषाणं क्वचिदारोप्यते। नास्माभिरन्यत्र सतः प्रपञ्चस्य ब्रह्मण्यारोपोऽभिधीयते। येन सर्वमिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिरापद्येत। किन्त्वनिर्वचनीयरूपः कश्चिदनात्माकारोऽयं प्रपञ्चे ब्रह्मण्यारोपित इत्यङ्गीक्रियत इत् चेन्न। अनात्माकारः प्रपञ्च इति कोऽर्थः। किमात्मनोऽन्य उतात्मविरुद्ध उतात्माभावो वा। नाद्यद्वितीयौ। क्वचित्प्रपञ्चस्य सत्यतापातात्। न तृतीयः। आत्मन्यात्माभावारोपस्य क्वाप्यदृष्टत्वात्। न हि कश्चिदहमहं न भवामीति भ्रान्तो दृश्यते। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितो निरधिष्ठानत्वादित्यनुमाने स्वरूपासिद्धिमाशङ्कते।। निरधिष्ठानत्वमिति।। अविषयत्वादिति। आरोपाविषयत्वादित्यर्थः। यथा रजतारोपे घटोऽन्वयदृष्टान्तो यदधिष्ठानं तदारोपविषयो यथा शुक्तिकाशकलं व्यतिरेकदृष्टान्त इति ज्ञातव्यम्। हेत्वन्तरमाह।। तद्विरुद्धतयेति। पराक्त्वेन प्रतीयमानजगद्विरुद्धतया प्रत्यक्त्वेन प्रतीयमानत्वादित्यर्थः। यद्विरुद्धतया प्रतीयते न तत्तदारोपाधिष्ठानमिति व्याप्तौ दृष्टान्तमाह।। यथा पर्वत इति। स्वल्पपरिमाणोपेतसर्षपविरुद्धतया महत्परिमाणवत्त्वेन प्रतीयमानः पर्वतो न सर्षपारोपाधिष्ठानमित्यर्थः। प्रपञ्चपक्षकमप्यनुमानमाह।। प्रपञ्चो वेति। अप्रयोजकताशङ्कापरिहाराय विपक्षे बाधकमाह।। विरुद्धाकारेति। तस्याध्यसस्य। भ्रान्त्युत्तरकाले प्रतीयत एवेत्यत उक्तं भ्रान्ताविति।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च ब्रह्मणि प्रपञ्चस्यारोपितत्वं वदन्नत्यत्र प्रपञ्चस्य सत्तामङ्गीकरोति न वा। आद्ये परस्य मिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिः। न चेत्कस्य कुत्रारोपः न हि शशविषाणं क्वचिदारोप्यते। नास्माभिरन्यत्र सतः प्रपञ्चस्य ब्रह्मण्यारोपोऽभिधीयते। येन सर्वमिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिरापद्येत। किन्त्वनिर्वचनीयरूपः कश्चिदनात्माकारोऽयं प्रपञ्चे ब्रह्मण्यारोपित इत्यङ्गीक्रियत इत् चेन्न। अनात्माकारः प्रपञ्च इति कोऽर्थः। किमात्मनोऽन्य उतात्मविरुद्ध उतात्माभावो वा। नाद्यद्वितीयौ। क्वचित्प्रपञ्चस्य सत्यतापातात्। न तृतीयः। आत्मन्यात्माभावारोपस्य क्वाप्यदृष्टत्वात्। न हि कश्चिदहमहं न भवामीति भ्रान्तो दृश्यते।</span>
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| | verse_id = VA_C22_S01_B05 | | | verse_id = VA_C22_S01 |
| | id = VA_C22_S01_B05_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C22_S01_B06 |
| | text = | | | text = मूलम्-विमत आत्माऽऽत्माभावारोपाधिष्ठानं न भवति। आत्मत्वाद्देवदत्त्वत्। ननु निष्प्रधानत्वमसिद्धम्। पूर्वपूर्वप्रपञ्चस्योत्तरोत्तरप्रपञ्चारोपे प्रधानत्वादिति चेन्न। असत्त्वात्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतुनां प्रतिकूलतर्कपराहतिः।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। अन्यत्रेति। आरोपादन्यत्रेत्यर्थः।। कस्य कुत्रेति। अन्यत्र विद्यमानस्यैव ह्यन्यत्रारोप इति भावः। अन्यत्रासतोऽप्यारोपः किन्न स्यादिति चेत्तत्राह।। न हीति। शङ्कते।। नास्माभिरिति । तार्किकरीत्येति शेषः।। प्रतिज्ञाहानिरिति। प्रधानस्य सत्यत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अनिर्वचनीयरूप इति। तथा चानिर्वचनीयार्थावभासो भ्रम इत्युक्तं भवति।। किमात्मनोऽन्य इत्यादि। तदन्तद्विरुद्धतदभावानां त्रयाणां नत्रर्थत्वादिति भावः। आत्मधर्मविरुद्ध आत्मविरुद्धधर्मवान्। तृतीयपक्षापेक्षया प्रथमद्वितीयपक्षयोरुभयोरप्याद्यत्वादाद्यावित्युक्तमिति ज्ञातव्यम्।। क्वचित्प्रपञ्चस्येति। आरोपस्य प्रधानसापेक्षत्वात्तस्य चारोप्यादधिकसत्ताकत्वादिति भावः।</p>
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| | == त्रयोविंशतितमभङ्गः == |
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| <span class="shloka-line">मूलम्-विमत आत्माऽऽत्माभावारोपाधिष्ठानं न भवति। आत्मत्वाद्देवदत्त्वत्। ननु निष्प्रधानत्वमसिद्धम्। पूर्वपूर्वप्रपञ्चस्योत्तरोत्तरप्रपञ्चारोपे प्रधानत्वादिति चेन्न। असत्त्वात्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतुनां प्रतिकूलतर्कपराहतिः।। छ ।।</span>
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| | verse_id = VA_C22_S01_B06 | | | verse_id = VA_C23_S01 |
| | id = VA_C22_S01_B06_Bhavaprakashaha | | | id = VA_C23_S01_B01 |
| | text = | | | text = मूलम्-एवमनेकानुमानप्रतिहतत्वान्न दृश्यत्वानुमानं समञ्जसमिति सिद्धम्।। छ ।। दृश्यत्वादिहेतुत्रयभङ्गः ।। छ ।। |
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| <p class="gr-vyakhya-para">।। असत्त्वादिति। प्रधानस्यारोप्यादधिकसत्ताकत्वनियमेन पूर्वपूर्वप्रपञ्चस्यारोपितत्वेनासत्यत्वान्न तस्योत्तरोत्तरारोपे प्रधानत्वं सम्भवतीति भावः। असत्यत्वादित्येव पाठः। यथोक्तं तत्त्वनिर्णयटीकायाम्। असत्यत्वान्न पूर्वपूर्वप्रपञ्च उत्तरोत्तरारोपे प्रधानमिति ।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
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| </div>
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| == अध्याय 24 == | | <span id="gr-C24" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्विंशतितमभङ्गः"></span> |
| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C24_S01_B01">
| | == चतुर्विंशतितमभङ्गः == |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <div class="teeka-body">
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| <div class="shloka-block gr-moola-ref">
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| <span class="shloka-line">मूलम्-अस्य पटस्यावयवित्वादिनैतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभाव प्रतियोगित्वसाधनमप्यत्यन्ताभावस्य निष्प्रतियोगिकत्वेन बाधितम्। एतत्तन्तुषु नास्तीति साधने सिद्धसाधनम्। कार्यकारणयोरभेदेनाधाराधेयभावाभावात्। एतत्तन्तुकार्यं न भवतीति साधनेऽकार्यत्वस्यान्यकार्यत्वस्य वा सिद्ध्याऽर्थान्तरत्वम्। आकाशादिषु चैवं प्रयोगाभावेन सर्वजगन्मिथ्यात्वासिद्धिश्च।। छ ।। अंशित्वानुमानस्य बाधः ।। छ ।।</span>
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| </div>
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">चतुर्विंशतितमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">oअयं पट एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगी अवयवित्वात्पटान्तरवदित्यनुमानमाशङ्क्य निराकरोति।। अस्य पटस्येति। अवयवित्वमंशित्वम्। आदिपदेन पटत्वरूपहेतुसङ्ग्रहः। पटान्तररूपदृष्टान्तान्तरसङ्ग्रहश्च।। निष्प्रतियोगिकत्वेनेति। अप्रामाणिकात्यन्तासत्प्रतियोगिकत्वेनेत्यर्थः।। बाधितमिति। पक्षीभूतस्य पटस्य प्रामाणिकत्वेनात्यन्ताभावप्रतियोगित्वाभावात्तत्साधनं बाधितमित्यर्थः। तदेवोपपादयति।। कार्यकारणयोरिति।। अकार्यत्वस्येति। सर्वथाऽकार्यत्वादेतत्तन्तुकार्यो न भवतीति सिध्यतीति भावः। अन्यकार्यत्वस्येति। विशेषनिषेधः शेषविध्यनुज्ञापक इति न्यायादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अर्थान्तरत्वमिति। मिथ्यात्वालाभादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">एवं प्रयोगाभावेनेति। तेषां नित्यत्वेनोपादानाभावात्तन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वसाधनं न सम्भवतीत्यर्थः ।। छ ।।</p>
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| }} | | }} |
| </div>
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| </div>
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| </div>
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| == अध्याय 25 == | | <span id="gr-C25" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चविंशतितमभङ्गः"></span> |
| <div class="gr-teeka-entry" data-parent="VA_C25_S01_B01">
| | == पञ्चविंशतितमभङ्गः == |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-किञ्च किमत्र पटस्यासत्त्वमापाद्यते संसर्गनिषेधो वा क्रियते। नाद्यः त्वद्दर्शनविरोधात्। सत्त्वमात्रं निषिध्यते नासत्त्वमापाद्यत इति चेन्न। तन्निषेधे तद्ध्रौव्यात्। सत्त्वनिषेधे चैतन्तुनिष्ठपदवैय्यर्थ्यम्। न च सिद्धसाधनतापरिहारार्थं विशेषणमिति वक्तव्यम्। एतत्पटात्यन्ताभावस्यास्माकमसिद्धेः। एतेन दृष्टान्तोऽपि साध्यविकलतया प्रत्युक्तो वेदितव्यः। ननु पटान्तरस्यात्यन्ताभावो न चेत्पटः किन्न स्यात्। किमत्र पटसंसर्गः स्यात्पटो वा। आद्ये न व्याप्तिसिद्धिः। द्वितीये सिद्धसाधनम्। नाप्युत्तरः। तन्तुपटसंसर्गाभावस्य सिद्धत्वात्। अथायं पट एतत्तन्तुजन्यो न भवतीति प्रतिज्ञावाक्यार्थः स्यात्तर्हि तस्यांशित्वमपि न स्यादिति हेतोरसिद्धिः स्यात्। न तत्त्वतस्यदप्यस्तीति चेन्न। अतात्त्विकावयवित्वस्यास्माकमसिद्धेः। इह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्यक्षविरुद्धं चैतत्।</span>
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| </div>
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| | text = | | | text = मूलम्-किञ्च किमत्र पटस्यासत्त्वमापाद्यते संसर्गनिषेधो वा क्रियते। नाद्यः त्वद्दर्शनविरोधात्। सत्त्वमात्रं निषिध्यते नासत्त्वमापाद्यत इति चेन्न। तन्निषेधे तद्ध्रौव्यात्। सत्त्वनिषेधे चैतन्तुनिष्ठपदवैय्यर्थ्यम्। न च सिद्धसाधनतापरिहारार्थं विशेषणमिति वक्तव्यम्। एतत्पटात्यन्ताभावस्यास्माकमसिद्धेः। एतेन दृष्टान्तोऽपि साध्यविकलतया प्रत्युक्तो वेदितव्यः। ननु पटान्तरस्यात्यन्ताभावो न चेत्पटः किन्न स्यात्। किमत्र पटसंसर्गः स्यात्पटो वा। आद्ये न व्याप्तिसिद्धिः। द्वितीये सिद्धसाधनम्। नाप्युत्तरः। तन्तुपटसंसर्गाभावस्य सिद्धत्वात्। अथायं पट एतत्तन्तुजन्यो न भवतीति प्रतिज्ञावाक्यार्थः स्यात्तर्हि तस्यांशित्वमपि न स्यादिति हेतोरसिद्धिः स्यात्। न तत्त्वतस्यदप्यस्तीति चेन्न। अतात्त्विकावयवित्वस्यास्माकमसिद्धेः। इह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्यक्षविरुद्धं चैतत्। |
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| <h4 class="gr-vyakhya-head">पञ्चविंशतितमभङ्गः</h4>
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| <p class="gr-vyakhya-para">असत्त्वमित्यादि। एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगीति साधनेन पटस्यासत्त्वमापाद्यते। सत्त्वे पर्यवसानं क्रियत इति यावत्। उतैतत्तन्तुषु पटसंसर्गो नास्तीति तत्संसर्गनिषेधो वा क्रियत इत्यर्थः।। स(त्व)द्दर्शनेति। सन्पट इत्यादिसत्त्वावगाहिप्रत्यक्षविरोधादित्यर्थः।। निषिध्यत इति। अत्यन्ताभावप्रतियोगीत्यनेनेत्यर्थः।। नासत्त्वमिति। तथा च न प्रत्यक्षविरोध इति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">तन्निषेध इति। परस्परविरुद्धयोरन्यतर निषेधस्यान्यतरविधिनान्तरीयकत्वेन सतत्वनिषेधेऽसत्त्वस्य ध्रौव्याद्ध्रुवत्वन्निश्चयादित्यर्थः। वैय्यर्थ्यमिति। एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगीत्यनेनैतत्तन्तुषु सत्तवमात्रनिषेधाभिप्राये विशिष्यैतत्तन्तुषु नास्तीति निषेधस्यव्यर्थत्वेनैतत्तन्तुनिष्ठपदवैय्यर्थ्यं स्यादित्यर्थः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु तन्त्वन्तरनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वेन सिद्धसाधनतापरिहारार्थत्वान्नैतत्तन्तुनिष्ठविशेषणवैय्यर्थ्यमित्याशङ्क्याह।। न चेति। प्रामाणिकप्रतियोगिकात्यन्ताभावस्यास्माभिरनङ्गीकारेणैतत्पटस्य प्रामाणिकतया तदत्यन्ताभावसम्भवेन तद्धटितसाध्यस्याप्रसिद्धिरित्याह।। एतत्पटेति।। दृष्टान्तोऽपीति। पटान्तरस्यापि प्रामाणिकततैतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वाभावेन साध्यविकल इत्यर्थः। प्रत्युक्तो निराकृतः। दृष्टान्ते एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्व मनङ्गीकृत्य साध्यवैकल्योक्तावनिष्टमाशङ्कते।। नन्विति।। अत्यन्ताभावो न चेदिति। पटान्तरस्यैतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं नास्तीत्यस्यैतत्तन्तुषु तदत्यन्ताभावो न चेदिति फलितोऽर्थः। पटः किन्न स्यादित्याक्षेपः। एतत्तन्तुषु पट एव स्यादित्यर्थः। परस्परविरुद्धयोरन्यतर निषेधस्यान्यतरविधिनान्तरीयकत्वादिति भावः। अत्र विकल्पयति।। किमत्रेति। एतत्तन्तुषु पटात्यन्ताभावो नास्ति चेत्पट एव स्यादित्यस्य पटसंसर्गः स्यादित्यर्थो वा पट एव स्यादित्यर्थो वेत्यर्थः।। न व्याप्तिसिद्धिरिति। यत्रैतत्तन्तुषु पटात्यन्ताभावाभावस्तत्रैतत्पटसंसर्ग इति व्याप्तौ दृष्टन्ताभावादित्यर्थः। यद्येतत्तन्तुषु पटसंसर्गात्यन्ताभावो नास्तीति स्यात्तर्ह्येव तत्रैतत्पटसंसर्गः स्यादित्यापादयितुं शक्यते परस्परविरुद्धयोरित्युक्तन्यायसम्भवात्। पटात्यन्ताभावो नास्ति चेत्तर्हि पटसंसर्गापादनमयुक्तमेव। उक्तव्याप्त्यनवकाशादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">सिद्धसाधनमिति। इष्टापादनमित्यर्थः। एतत्तन्तुषु पटात्यन्ताभावाभावे पट एव स्यादित्युक्तेऽनिष्टाभावेनेष्टापादनरूपत्वात्तर्काभासोऽयम्। पटान्तरस्याप्येतत्तन्तुषु संयोगेन सत्त्वसम्भवादिति भावः। तस्मात्साध्यवैकल्यं स्यादेवेति हृदयम्।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">नाप्युत्तर इति। पटसंसर्गनिषेधः क्रियत इत्युत्तरो द्वितीयः पक्षो नेत्यर्थः।। सिद्धत्वादिति। कार्यकारणयोरभेदेन भेदगर्भसंसर्गाभावस्य सिद्धत्वेन सिद्धसाधनता स्यादित्यर्थः।। अंशित्वमपि नेति। अवयवित्वं नामांशित्वम्। तच्चांशित्वं नामावयवरूपांशित्वं तद्वित्त्वं च तत्कारणकत्वम्। तथा चैतत्पटस्यैतत्तन्तुनिष्ठजन्यत्वाभावे एतत्तन्तुकारणकत्वरूपावयवित्वापरपर्यायं यदंशित्वं तदपि न स्यादित्यसिद्धिः स्यादित्यर्थः। असिद्धिपरिहारं शङ्कते।। न तत्त्वत इति। परमार्थतोऽवयवकारणकत्वरूपमवयवित्वं नास्त्येव। तथा चातात्त्विकावयवित्वस्य हेतुत्वेन विवक्षितत्वान्न स्वरूपासिद्धिरिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अस्माकमिति। उभयवादिसिद्धस्यैव हेतूकर्तव्यत्वादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">इह तन्तुष्विति। तथा च तन्तुषु पटनिष्ठत्वावगाहिप्रत्वक्षविरुद्धत्वात्तन्तुनिष्ठत्वाभावसाधकमयं पट इत्युक्तानुमानं प्रत्यक्षबाधितमित्यर्थः।।</p>
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| }} | | }} |
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-नन्विह नभसि नीलिमेति प्रत्यक्षाभिमतप्रत्ययबाधेनारूपित्वानुमानप्रवृत्तिवदत्राप्यनुमान प्रवृत्त्युपपत्तिः किन्न स्यादिति चेन्न। तथा सति दहनशैत्यानुमानादेरप्यप्रतिबद्धप्रसरेण बाधपरिभाषापरिमोषापातात्। उभयवादिसम्प्रतिपन्नप्रामाण्ये प्रत्यक्षादौ जाग्रति बाधः सुखं प्रसरेदिति चेत्तत्किं प्रकृते प्रत्यक्षप्रामाण्यानभ्युपगमे कारणम्। अनुमानविरोध इति चेत्समं दहनशैत्यानुमानेऽपि। न च प्रत्यक्षस्यानुमानबाधितत्वे दृष्टान्तं पश्यामः। नभोनीलिमाप्रतितिभ्रमताऽप्यागमाद्यवगम्यैव। अनुमानस्याप्रसरात्। तथा हि। महत्त्वान्नभसो रूपं निषिध्यतेऽगन्धवत्त्वाद्वा स्पर्शरहितत्वाद्वा। न त्रयमपि। तत एवाशब्दत्वप्रसङ्गात्।</span>
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| <p class="gr-vyakhya-para">नभसि नैल्यप्रत्ययस्य निर्दोषार्थेन्द्रियसन्निकर्षरूपप्रत्यक्षत्वाभावादभिमतेत्युक्तम्। बाधेनेति। बाधकत्वेनेत्यर्थः।। अरूपित्वानुमानेति। अरूपित्वसाधकविभुत्वानुमानेत्यर्थः। तथा च यथा नीलं नभ इति प्रत्यक्षं नभो न नीलरूपवद्विभूत्वादित्यनुमानबाध्यं दृष्टं तथेहाप्ययं पट इत्यनुमानमेवेह तन्तुषु पट इति प्रत्यक्षबाधकमेव किन्न स्यादिति भावः।।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">अप्रतिबद्धप्रसरेणेति। स्पार्शनप्रत्यक्षाप्रतिबद्धत्वप्रसरेणेत्यर्थः। तथा च तत्राप्यनुमानेनैव प्रत्यक्षबाधोऽस्त्विति भावः। बाधपरिमोषोऽपलापोच्छेदः। तथा च कालात्ययापदिष्टमात्रोच्छेदः स्यादित्यर्थः। दहनशैत्यानुमानमेव प्रत्यक्षबाधितम्। औष्ण्यावगाहिस्पार्शनप्रामाण्यस्योभयवादिसम्प्रतिपन्नत्वात्। न चैवं प्रकृते। इह तन्तुषु पटसत्त्वावगाहिप्रत्यक्षप्रामाण्यस्योभयानभ्युपगमादतोऽत्रानुमानेनैव प्रत्यक्षबाधोऽस्त्वित्याशयेन शङ्कते।। उभयवादीति। प्रामाण्ये प्रामाण्योपेते जाग्रति सति।। प्रत्यक्षेति। तन्तुपटसत्त्वावगाहिप्रत्यक्षेत्यर्थः।। अनुमानेति। अयं पट इत्यनुमानेत्यर्थः। विरोधः कारणमिति वर्तते।। सममिति। तत्राप्यनुमानविरोधेन स्पार्शनप्रत्यक्षप्रामाण्यमप्युभयवादिसम्प्रतिपन्नं नेति वदाम इति सममित्यर्थः। दृष्टान्तं च न पश्याम इत्यन्वयः।</p>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु नभोनैल्यप्रत्यक्षं विभुत्वानुमानबाध्यं दृष्टमिति तदेव दृष्टन्तो भविष्यतीत्यत आह।। नभोनीलिमेति। कुत इत्यत आह।। अनुमानस्येति। नभसो नीरूपित्व इति शेषः। एतदेवोपपादयति।। तथा हीत्यादिना। महत्त्वान्महत्परिमाणवत्त्वाद्विभूत्वादित्यर्थः। कालादिदृष्टान्तोऽपि द्रष्टव्यः।। न त्रयमपीति। नभो नीरूपं महत्त्वादगन्धवत्त्वात्स्पार्शनरहितत्वात्कालादिवदित्यनुमानत्रयमपि न युक्तमित्यर्थः। कुत इत्यत आभाससामानयोगक्षेमत्वादित्याह।। तत एवेति। महत्त्वादिहेतुत्रयादेवेत्यर्थः।। अशब्दत्वेति। शब्दगुणकत्वाभावप्रसङ्गादित्यर्थः। नभः शब्दगुणकं न भवति महत्त्वात्कालादिवदिति भावः।</p>
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| <div class="teeka-title">भावप्रकाशः</div>
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| <span class="shloka-line">मूलम्-अथ तत्रागमविरोधस्तर्ह्यरूपित्वमपि तस्यागमसिद्धमेव। नानुमानादिति। तस्मात्कालातीतादोषं क्वचित्स्वीकुर्वताऽत्रापि समानन्यायतया सा चाभ्युपेयैव।। छ ।। अंशित्वानुमाननिरासः।। छ ।।</span>
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| <p class="gr-vyakhya-para">ननु नभसः शब्दगुणकत्वाभावो नानुमातुं शक्यते नभसः शब्दगुणकत्वस्यागमसिद्धत्वेनानुमानस्य तद्विरोधापत्तेरित्याशङ्कते।। अथेति। प्रकृतेऽप्येतत्समानमित्याह।। तर्हीति। तस्य नभसः।। नानुमानादितीति। तथा च प्रत्यक्षस्यानुमानबाधितत्वे दृष्टान्तं न पश्याम इत्युक्तं सिद्धमिति भावः। अत्राप्ययं पट इत्यनुमानेऽपि। सा इह तन्तुषु पट इति प्रत्यक्षबाधिता।। छ ।।</p>
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