Talavakara: Difference between revisions
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<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ प्रथमः खण्डः"></span> | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ प्रथमः खण्डः"></span> | ||
== अथ प्रथमः खण्डः == | == अथ प्रथमः खण्डः == | ||
<div class="introduction" id="TLK_C01_I01" data-verse="TLK_C01"> | <div class="introduction" id="TLK_C01_I01" data-block-id="TLK_C01_I01" data-verse="TLK_C01"> | ||
< | <div class="introduction-line">अनन्तगुणपूर्णत्वादगम्याय सुरैरपि ।</div> | ||
< | <div class="introduction-line">सर्वेष्टदात्रे देवानां नमो नारायणाय ते ॥</div> | ||
</div> | </div> | ||
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| verse_line1 = केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । | |||
| verse_line2 = केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः । | |||
| verse_line2 = चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग् गच्छति नो मनः । | |||
| verse_line2 = न विद्म न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि । | |||
| verse_line2 = इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = यद् वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । | |||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । | |||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । | |||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । | |||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । | |||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ९ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">इति प्रथमः खण्डः</div> | <div class="gr-author-note">इति प्रथमः खण्डः</div> | ||
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<div class="gr-author-note">॥ इति प्रथमः खण्डः ॥</div> | <div class="gr-author-note">॥ इति प्रथमः खण्डः ॥</div> | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C01_V09" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C01_V09" data-block-id="bhashya-TLK_C01_V09"> | ||
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| text = वैजयन्ते समासीनमेकान्ते चतुराननम् । विष्णोर्विविदिषुस्तत्त्वं पर्यपृच्छत् सदाशिवः ॥ यदिदं पुरुषावश्यं तत्र तत्र पतेन्मनः । केन तत्प्रेरितं याति प्राणः सर्वोत्तमस्तथा ॥ चक्षुःश्रोत्रं तथा वाचं को देवो विनियोजयेत् । इति पृष्टस्तदा ब्रह्मा प्राह देवमुमापतिम् ॥ ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वाधारमनूपमम् । सर्वज्ञं सर्वशक्तिं च सर्वदोषविवर्जितम् ॥ यः प्राणस्य प्रणेता च चक्षुरादेश्च सर्वशः । अगम्यस्सर्वदेवैश्च परिपूर्णत्वहेतुतः ॥ प्राणादीनां प्रणेता च सर्ववेत्ता च सर्वशः । सर्वोत्तमश्च सर्वत्र स विष्णुरिति धार्यताम् ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ द्वितीयः खण्डः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ द्वितीयः खण्डः"></span> | ||
== अथ द्वितीयः खण्डः == | == अथ द्वितीयः खण्डः == | ||
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| verse_line1 = यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । | |||
| verse_line2 = यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = मन्ये विदितं नाहमन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । | |||
| verse_line2 = यो नस्तद् वेद तद् वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = मन्ये विदितं नाहमन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । | |||
| verse_line2 = यो नस्तद् वेद तद् वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । | |||
| verse_line2 = अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । | |||
| verse_line2 = आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । | |||
| verse_line2 = भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">इति द्वितीयः खण्डः ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति द्वितीयः खण्डः ॥</div> | ||
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<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयः खण्डः॥</div> | <div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयः खण्डः॥</div> | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C02_V05" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C02_V05" data-block-id="bhashya-TLK_C02_V05"> | ||
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| text = यं सम्यङ् नैव जानाति कश्चिन्निरवशेषतः । सर्वात्मना विजानामीति तु यस्य मतं भवेत् ॥ तस्याज्ञातस्स भगवान् यो नैवं मन्यते सदा । ज्ञातस्तस्य तथाऽस्यैव निश्शेषं मननं कृतम् ॥ इति यो मन्यते नास्य मतस्स पुरुषोत्तमः । नातिवेद्यो न चावेद्यस्तस्मात् स परमेश्वरः ॥ नेदं जीवस्वरूपं तद् ब्रह्म विष्ण्वाख्यमव्ययम् । किन्तु यत्ते समीपस्थमास ते विनियामकम् ॥ तदेव ब्रह्म विदि्ध त्वं विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् । नियामकं तद्देवानां मर्त्यानां किमुतोत्तमम् ॥ तत्प्रसादं विना जीवे मन्तव्या न प्रवृत्तयः । किमु जीवस्य तद्भावो न मन्तव्य इतीर्यते ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ तृतीयः खण्डः"></span> | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ तृतीयः खण्डः"></span> | ||
== अथ तृतीयः खण्डः == | == अथ तृतीयः खण्डः == | ||
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| verse_line1 = ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानन्त । किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = तेऽग्निमब्रुवन् । जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद् यक्षमिति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = तथेति तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति । अग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपि । इदं सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाक दग्धुम् । स तत एव निववृते । नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीत् मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपि । इदं सर्वमाददीयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाकादातुम् । स तत एव निववृते । नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = अथेन्द्रमब्रुवन् । मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीम् । तां होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥ १२ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">इति तृतीयः खण्डः ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति तृतीयः खण्डः ॥</div> | ||
| Line 281: | Line 275: | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति तृतीयः खण्डः ॥</div> | <div class="gr-author-note">॥ इति तृतीयः खण्डः ॥</div> | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C03_V12" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C03_V12" data-block-id="bhashya-TLK_C03_V12"> | ||
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| text = इत्यत्राख्यायिकां वच्मि शृणु तां त्वं महेश्वर । स्थित्वा देवेषु तद् ब्रह्म व्यजयद्दैत्यदानवान् ॥ देवेभ्योऽर्थाय विजयं ते देवा मेनिरे स्वकम् । आविष्टा असुरैस्तेषां प्रबोधाय जनार्दनः ॥ यक्षरूपः प्रादुरभूदुमाशिवसमन्वितः । ब्रह्मणा चापि सहित एतेभ्योऽपि परो ह्यहम् ॥ एतेऽपि मे भृत्यभूताः परिवार्य व्यवस्थिताः । इति ज्ञापयितुं विष्णुः सह तैरप्युपागतः ॥ यूयमेतानपि ज्ञातुमशक्ताः किमु मामिति । तज्ज्ञानार्थं हुताशश्च नासिक्यो वायुरेव च ॥ इन्द्रश्च क्रमशो जग्मुस्तं ज्ञातुं नैव चाशकन् । तत्रेन्द्रोऽधिकबुदि्धत्वात् पृच्छतीति जनार्दनः ॥ मत्तः शिवाद् ब्रह्मणश्च श्रोतुं नैवापि शक्तिमान् । इति ज्ञापयितुं तत्र नादृश्यत स केशवः ॥ एषैव ज्ञानदाने ते योग्योमेति व्यदर्शयत् ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ चतुर्थः खण्डः"></span> | <span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ चतुर्थः खण्डः"></span> | ||
== अथ चतुर्थः खण्डः == | == अथ चतुर्थः खण्डः == | ||
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| verse_line1 = ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद्विजयेऽमहीयध्वमिति । ततो ह वै विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्माद् वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = ते ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् । स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श । स ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा३ इति । न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम् । अथाध्यात्मम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेनैव तदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यम् । स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = उपनिषदं भो ब्रूहीति । उक्ता त उपनिषद् । ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा । वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = यो वा एतामुपनिषदमेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति ज्येये प्रतितिष्ठति ॥ १० ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥</div> | <div class="gr-author-note">॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥</div> | ||
| Line 389: | Line 372: | ||
<div class="gr-author-note">इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं तलवकारोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं तलवकारोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥</div> | ||
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| verse_id = TLK_C04_V10 | |||
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| text = उमा सा सम्यगाचष्ट तस्मै विष्णुं परं पदम् । यस्माद् ब्रह्मा च वायुश्च शेषवीन्द्रौ शिवस्तथा ॥ सभार्या गर्विणो नासन् सुरेभ्यस्तेऽधिकास्ततः । इन्द्रस्तु प्रथमं ब्रह्म व्यजानात् तेन तूत्तमः ॥ दक्षादिभ्यस्तथा कामः स ज्ञातुं पूर्वमुक्तवान् । दक्षो बृहस्पतिश्चैव मनुः कामात्मजस्तथा ॥ सूर्याचन्द्रमसौ धर्मो वरुणश्चोचुरोमिति । नासिक्यवायुरग्निश्च प्रथमं तदपश्यताम् ॥ सर्वदेवाधिकास्तस्माद् एते देवाः प्रकीर्तिताः । एतेभ्यश्चेन्द्रकामौ तु ताभ्यां ब्रह्मादयोऽधिकाः ॥ एतेषामवमो वह्निः परमो विष्णुरुच्यते । अन्तराले स्थितास्त्वन्ये ब्रह्माद्याः पूर्वमीरिताः ॥ अग्निः पश्चाद्व्यजानात् तदिन्द्रवाक्यात् ततोऽवमः । तस्माद्विष्ण्वभिसम्बन्धात् पारावर्यं सुरेष्विदम् ॥ व्यद्योतयद्विद्युदादीन् कपिलाख्यस्तु यो हरिः । अक्ष्णोर्निमेषणं कृत्वा यः शेते क्षीरसागरे ॥ स एवैकः परं ब्रह्मेत्येवं तस्योपदेशनम् । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे यं मनो गच्छतीव च ॥ सम्यङ् न गच्छति क्वापि मनो येन स्मरत्यपि । सोऽनिरुद्धाख्य ईशेशः परं ब्रह्मेति कीर्त्यते ॥ स विष्णुस्तद्वनं नाम ततत्वाद् वननीयतः । एवमेनं तु यो वेद भवेत् सर्वैरपेक्षितः ॥ एतत् श्रुत्वा हरोऽपृच्छद् ब्रह्माणं पुनरेव तु । विद्याकारं मम ब्रूहीत्युक्तो ब्रह्माऽऽह तं पुनः ॥ विद्यावेद्यं तव प्रोक्तमास्थानं ते वदाम्यहम् । तपोदानस्वधर्मेषु ये स्थितास्तेषु तिष्ठति ॥ विद्यास्थानानि तस्यास्तु वेदा अङ्गानि निर्णयः । वेदैतामेवमखिलां यो विष्णौ प्रतितिष्ठति ॥ इत्यादि ब्रह्मसारे ॥ विद्युतः सूर्यादिप्रकाशान् । आसमन्ताद्व्यद्युतत्प्राकाशयत् । यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ इति वचनात् । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति च । न्यमीमिषदा आ समन्तान्निमीलिताक्षमभवत् । स वै किलायं पुरुषः पुरातनो य एक आसीदविशेष आत्मनि । अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु ॥ इति वचनात् । पूर्णत्वाच्च आः । अभीक्ष्णं सङ्कल्प इति मनसो विशेषणम् । सङ्कल्पकमित्यर्थः । सप्रतिष्ठां सायतनामुपनिषदं ब्रूहीत्युक्ते सम्यगेव मयोपनिषत्स्वरूपमुक्तम् । तत्र वक्तव्यं नास्ति । तपो दमः कर्म च विद्यायाः प्रतिष्ठा । तद्वत्सु विद्या प्रतितिष्ठतीत्यर्थः । सत्यमिति मीमांसा । निर्णीयते यतः सम्यगिदं सत्यमिति स्फुटम् । श्रुतिस्मृत्युदितं सर्वं व्यक्तं मीमांसयैतया ॥ सत्यमित्युच्यते तस्मान्मीमांसा ब्रह्मनिश्चयाः ॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ऋग्यजुस्सामाथर्वाख्याः पञ्चरात्रं च भारतम् । मूलरामायणं चैव पुराणं भगवत्परम् ॥ वेदा इत्युच्यते सदि्भः शिक्षाद्यं स्मृतयस्तथा । अङ्गानि सत्यं मीमांसा तद्विद्यायतनं त्रयम् ॥ इति विद्यानिर्णये ॥ यश्चिदानन्दसच्छक्तिसम्पूर्णो भगवान् परः । नमोऽस्तु विष्णवे तस्मै प्रेयसे मे परात्मने ॥ | |||
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Latest revision as of 19:13, 1 June 2026
तलवकारोपनिषद्भाष्यम्
अथ प्रथमः खण्डः
अनन्तगुणपूर्णत्वादगम्याय सुरैरपि ।
सर्वेष्टदात्रे देवानां नमो नारायणाय ते ॥
केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः ।चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग् गच्छति नो मनः ।न विद्म न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥ ३ ॥
अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि ।इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ४ ॥
यद् वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ५ ॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ६ ॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति ।तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ७ ॥
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ८ ॥
यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।तदेव ब्रह्म त्वं विदि्ध नेदं यदिदमुपास ते ॥ ९ ॥
वैजयन्ते समासीनमेकान्ते चतुराननम् । विष्णोर्विविदिषुस्तत्त्वं पर्यपृच्छत् सदाशिवः ॥ यदिदं पुरुषावश्यं तत्र तत्र पतेन्मनः । केन तत्प्रेरितं याति प्राणः सर्वोत्तमस्तथा ॥ चक्षुःश्रोत्रं तथा वाचं को देवो विनियोजयेत् । इति पृष्टस्तदा ब्रह्मा प्राह देवमुमापतिम् ॥ ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वाधारमनूपमम् । सर्वज्ञं सर्वशक्तिं च सर्वदोषविवर्जितम् ॥ यः प्राणस्य प्रणेता च चक्षुरादेश्च सर्वशः । अगम्यस्सर्वदेवैश्च परिपूर्णत्वहेतुतः ॥ प्राणादीनां प्रणेता च सर्ववेत्ता च सर्वशः । सर्वोत्तमश्च सर्वत्र स विष्णुरिति धार्यताम् ॥
अथ द्वितीयः खण्डः
यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् ।यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते ॥ १ ॥
मन्ये विदितं नाहमन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।यो नस्तद् वेद तद् वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥
मन्ये विदितं नाहमन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।यो नस्तद् वेद तद् वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥
यं सम्यङ् नैव जानाति कश्चिन्निरवशेषतः । सर्वात्मना विजानामीति तु यस्य मतं भवेत् ॥ तस्याज्ञातस्स भगवान् यो नैवं मन्यते सदा । ज्ञातस्तस्य तथाऽस्यैव निश्शेषं मननं कृतम् ॥ इति यो मन्यते नास्य मतस्स पुरुषोत्तमः । नातिवेद्यो न चावेद्यस्तस्मात् स परमेश्वरः ॥ नेदं जीवस्वरूपं तद् ब्रह्म विष्ण्वाख्यमव्ययम् । किन्तु यत्ते समीपस्थमास ते विनियामकम् ॥ तदेव ब्रह्म विदि्ध त्वं विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् । नियामकं तद्देवानां मर्त्यानां किमुतोत्तमम् ॥ तत्प्रसादं विना जीवे मन्तव्या न प्रवृत्तयः । किमु जीवस्य तद्भावो न मन्तव्य इतीर्यते ॥
अथ तृतीयः खण्डः
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानन्त । किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥
तेऽग्निमब्रुवन् । जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद् यक्षमिति ॥ ३ ॥
तथेति तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति । अग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपि । इदं सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥
तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाक दग्धुम् । स तत एव निववृते । नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति॥ ६ ॥
अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति ॥ ७ ॥
तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीत् मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपि । इदं सर्वमाददीयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥
तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाकादातुम् । स तत एव निववृते । नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥ १० ॥
अथेन्द्रमब्रुवन् । मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे ॥ ११ ॥
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीम् । तां होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥ १२ ॥
इत्यत्राख्यायिकां वच्मि शृणु तां त्वं महेश्वर । स्थित्वा देवेषु तद् ब्रह्म व्यजयद्दैत्यदानवान् ॥ देवेभ्योऽर्थाय विजयं ते देवा मेनिरे स्वकम् । आविष्टा असुरैस्तेषां प्रबोधाय जनार्दनः ॥ यक्षरूपः प्रादुरभूदुमाशिवसमन्वितः । ब्रह्मणा चापि सहित एतेभ्योऽपि परो ह्यहम् ॥ एतेऽपि मे भृत्यभूताः परिवार्य व्यवस्थिताः । इति ज्ञापयितुं विष्णुः सह तैरप्युपागतः ॥ यूयमेतानपि ज्ञातुमशक्ताः किमु मामिति । तज्ज्ञानार्थं हुताशश्च नासिक्यो वायुरेव च ॥ इन्द्रश्च क्रमशो जग्मुस्तं ज्ञातुं नैव चाशकन् । तत्रेन्द्रोऽधिकबुदि्धत्वात् पृच्छतीति जनार्दनः ॥ मत्तः शिवाद् ब्रह्मणश्च श्रोतुं नैवापि शक्तिमान् । इति ज्ञापयितुं तत्र नादृश्यत स केशवः ॥ एषैव ज्ञानदाने ते योग्योमेति व्यदर्शयत् ॥
अथ चतुर्थः खण्डः
ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद्विजयेऽमहीयध्वमिति । ततो ह वै विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥
तस्माद् वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुः ॥ २ ॥
ते ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥
तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् । स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श । स ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ४ ॥
तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा३ इति । न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम् । अथाध्यात्मम् ॥ ५ ॥
यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेनैव तदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पः ॥ ६ ॥
तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यम् । स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥ ७ ॥
उपनिषदं भो ब्रूहीति । उक्ता त उपनिषद् । ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ८ ॥
तस्मै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा । वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ९ ॥
यो वा एतामुपनिषदमेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति ज्येये प्रतितिष्ठति ॥ १० ॥
उमा सा सम्यगाचष्ट तस्मै विष्णुं परं पदम् । यस्माद् ब्रह्मा च वायुश्च शेषवीन्द्रौ शिवस्तथा ॥ सभार्या गर्विणो नासन् सुरेभ्यस्तेऽधिकास्ततः । इन्द्रस्तु प्रथमं ब्रह्म व्यजानात् तेन तूत्तमः ॥ दक्षादिभ्यस्तथा कामः स ज्ञातुं पूर्वमुक्तवान् । दक्षो बृहस्पतिश्चैव मनुः कामात्मजस्तथा ॥ सूर्याचन्द्रमसौ धर्मो वरुणश्चोचुरोमिति । नासिक्यवायुरग्निश्च प्रथमं तदपश्यताम् ॥ सर्वदेवाधिकास्तस्माद् एते देवाः प्रकीर्तिताः । एतेभ्यश्चेन्द्रकामौ तु ताभ्यां ब्रह्मादयोऽधिकाः ॥ एतेषामवमो वह्निः परमो विष्णुरुच्यते । अन्तराले स्थितास्त्वन्ये ब्रह्माद्याः पूर्वमीरिताः ॥ अग्निः पश्चाद्व्यजानात् तदिन्द्रवाक्यात् ततोऽवमः । तस्माद्विष्ण्वभिसम्बन्धात् पारावर्यं सुरेष्विदम् ॥ व्यद्योतयद्विद्युदादीन् कपिलाख्यस्तु यो हरिः । अक्ष्णोर्निमेषणं कृत्वा यः शेते क्षीरसागरे ॥ स एवैकः परं ब्रह्मेत्येवं तस्योपदेशनम् । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे यं मनो गच्छतीव च ॥ सम्यङ् न गच्छति क्वापि मनो येन स्मरत्यपि । सोऽनिरुद्धाख्य ईशेशः परं ब्रह्मेति कीर्त्यते ॥ स विष्णुस्तद्वनं नाम ततत्वाद् वननीयतः । एवमेनं तु यो वेद भवेत् सर्वैरपेक्षितः ॥ एतत् श्रुत्वा हरोऽपृच्छद् ब्रह्माणं पुनरेव तु । विद्याकारं मम ब्रूहीत्युक्तो ब्रह्माऽऽह तं पुनः ॥ विद्यावेद्यं तव प्रोक्तमास्थानं ते वदाम्यहम् । तपोदानस्वधर्मेषु ये स्थितास्तेषु तिष्ठति ॥ विद्यास्थानानि तस्यास्तु वेदा अङ्गानि निर्णयः । वेदैतामेवमखिलां यो विष्णौ प्रतितिष्ठति ॥ इत्यादि ब्रह्मसारे ॥ विद्युतः सूर्यादिप्रकाशान् । आसमन्ताद्व्यद्युतत्प्राकाशयत् । यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ इति वचनात् । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति च । न्यमीमिषदा आ समन्तान्निमीलिताक्षमभवत् । स वै किलायं पुरुषः पुरातनो य एक आसीदविशेष आत्मनि । अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु ॥ इति वचनात् । पूर्णत्वाच्च आः । अभीक्ष्णं सङ्कल्प इति मनसो विशेषणम् । सङ्कल्पकमित्यर्थः । सप्रतिष्ठां सायतनामुपनिषदं ब्रूहीत्युक्ते सम्यगेव मयोपनिषत्स्वरूपमुक्तम् । तत्र वक्तव्यं नास्ति । तपो दमः कर्म च विद्यायाः प्रतिष्ठा । तद्वत्सु विद्या प्रतितिष्ठतीत्यर्थः । सत्यमिति मीमांसा । निर्णीयते यतः सम्यगिदं सत्यमिति स्फुटम् । श्रुतिस्मृत्युदितं सर्वं व्यक्तं मीमांसयैतया ॥ सत्यमित्युच्यते तस्मान्मीमांसा ब्रह्मनिश्चयाः ॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ऋग्यजुस्सामाथर्वाख्याः पञ्चरात्रं च भारतम् । मूलरामायणं चैव पुराणं भगवत्परम् ॥ वेदा इत्युच्यते सदि्भः शिक्षाद्यं स्मृतयस्तथा । अङ्गानि सत्यं मीमांसा तद्विद्यायतनं त्रयम् ॥ इति विद्यानिर्णये ॥ यश्चिदानन्दसच्छक्तिसम्पूर्णो भगवान् परः । नमोऽस्तु विष्णवे तस्मै प्रेयसे मे परात्मने ॥