| id | "Mandu-1" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_I01" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पूर्णानन्दज्ञानशक्तिस्वरूपं नित्यमव्ययम् ।
चतुर्धा सर्वभोक्तारं वन्दे विष्णुं परं पदम् ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-2" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् । तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-3" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मण्डूकरूपिणा वरुणेन चतूरूपो नारायणः स्तूयते(नारायणोऽत्र स्तूयते) ।
‘ध्यायन् नारायणं देवं प्रणवेन समाहितः ।
मण्डूकरूपी वरुणस्तुष्टाव हरिमव्ययम् ॥’ इति पाद्मे ।
‘ओमित्युक्तं तु यद्ब्रह्म तदक्षरमुदाहृतम् ।
ओतमत्र जगद्यस्मादों तस्माद् भगवान् हरिः ॥
तदिदं गुणपूर्त्यैव सर्वमित्येव शब्दितम् ।
भाविभूतभवत्कालेष्वेकरूपतया हरिः ।
सर्वदा नित्य इत्येषा व्याख्योङ्कारस्य कीर्तिता ॥’ इति बृहत्संहितायाम् ।
‘ओमित्याक्रियते यस्मादोङ्कारोऽसावतः परः ।
सर्वत्वमिति पूर्णत्वं तन्नान्यस्य हरेः क्वचित् ॥’ इति नैर्गुण्ये ।
सर्वमोङ्कार एवेत्यन्यस्य पूर्णत्वनिवारणम् । त्रिकालातीतत्वं च तस्यैव । प्रकृतेरपि त्रिकालातीतत्वं विद्यत इत्यन्यदिति विशेषणम् ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-4" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V02" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव । सर्वं ह्येतद् ब्रह्म । अयमात्मा ब्रह्म ॥ २ ॥ सोयमात्मा चतुष्पात् ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-5" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V02_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘परमं यो महद्ब्रह्म’, ‘तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’, ‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्’ इत्यादिषु प्रसिद्धं च ब्रह्मणः (परिपूर्णत्वमित्याह)पूर्णत्वमित्याह– सर्वं ह्येतद् ब्रह्मेति । श्रीब्रह्मादिसकलदेहेषु स्थित्वाऽऽदानादिकर्ता योऽयं कश्चित् प्रतीयते । जीवानामस्वातन्त्र्यदर्शनात् । सोऽपि स एवेति दर्शयति– अयमात्मा ब्रह्मेति ।
‘पूर्णस्तु हरिरेवैको नान्यत् पूर्णं कदाचन ।
विना च प्रकृतिं नान्यत् कालातीतं परात्मनः ॥
कालश्चैव दिशो वेदाः प्रकृत्यात्मान ईरिताः ।
अभिमानात्तु जीवानां न कालातीतता भवेत् ॥
मुक्तानामपि पूर्वत्र कालसम्बन्ध ईरितः ।
पूर्णत्वं च सदा विष्णोः प्रसिद्धं सर्ववेदतः ॥
सोऽयं विष्णू रमाब्रह्मरुद्रानन्तादिगः सदा ।
आदानादनकर्तृत्वादात्मा तेषामगोचरः ॥
इति मण्डूकरूपी सन् ददर्श वरुणः श्रुतिम्(स्वयम्) ॥’ इति हरिवंशेषु ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-6" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः । सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग् वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-7" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "चतुर्धाऽवस्थितो देहे परमात्मा सनातनः ।
वैश्वानरो जागरितस्थानगो गजवक्त्रकः ॥
निर्माता बाह्यसंवित्तेर्जीवानां तदगोचरः ।
अष्टादशमुखान्यस्य पुमाकाराणि सर्वशः ॥
मध्यमं तु गजाकारं चतुर्बाहुः परः पुमान् ।
पादौ हस्तिकरो हस्ता इति सप्ताङ्ग ईरितः ॥
स्थूलान् भोगानिन्द्रियैः स शुभान् भुङ्क्ते न चाशुभान् ।
विश्वं स्थूलं समुद्दिष्टं सर्वगम्यत्वहेतुतः ॥
तत्सम्बन्धी नरोऽनाशाद् वैश्वानर उदाहृतः ।
विनायकस्तु विश्वस्य ध्यानादैद् गजवक्त्रताम् ॥
तथैव तैजसध्यानात् त्रिध्यानादिन्द्र इन्द्रताम् ।
चतुर्ध्यानाच्च रुद्रत्वं रुद्र आप जनार्दनात् ॥
एवम्भूतगुणो विष्णुश्चतुरात्मा परात्परः ॥’ इति महायोगे ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-8" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स्वप्नस्थानोऽन्तप्रज्ञः । सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक् तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-9" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘जाग्रद्दर्शनसंस्काररूपत्वात् स्वप्नगं तु यत् ।
प्रविविक्तं तु तज्ज्ञानकारणोऽन्तर्ज्ञ उच्यते ॥’ इति वाराहे ॥४॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-10" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-11" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘सुषुप्तं तु तमो ज्ञेयं हरिं प्राप्य तदावृतः ।
न कामयेन्नैव पश्येज्जीवः स्वात्मतमो विना ॥
कालं च तस्य स्थानस्य पतिः प्राज्ञो हरिः स्वयम् ।
चित्तस्थो दर्शयेद् यस्मात् तैजसः स्वप्नकृद्धरिः ॥
न बाह्यं ज्ञापयेद्यस्माद् प्राज्ञस्तेन जनार्दनः ।
एकीभावं व्रजेतां च तेन विश्वश्च तैजसः ॥
एकीभूतस्त्वतः(एकीभूतस्तदा) प्राज्ञो घनो जीवस्तमोवृतः ।
तन्मात्रस्य सकालस्य घनप्रज्ञः प्रदर्शनात् ॥’ इति प्रकाशिकायाम् ।
आनन्दमयः पूर्णानन्दः । चेतोमुखः ज्ञानस्वरूपमुखः । प्रज्ञानघन इति विपरीतसमासः । घनप्रज्ञ इति वक्ष्यमाणत्वात् । विषयभोगं विनाऽऽनन्दमात्रभुक्त्वादानन्दभुगिति विशेषः । आनन्दमयचेतोमुखत्वसर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्वादिचतुष्टयेऽपि समम् (आनन्दमयचेतोमुखसर्वज्ञत्वसर्वेश्वरादिचतुष्टयेऽपि समः) । अन्यत्रातिदेशार्थमेकत्रानन्दमयत्वं चेतोमुखत्वं चोक्तम् ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-12" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञः एषोऽन्तर्यामी ।
एष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-13" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एष चतूरूप आत्मा सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्वादिलक्षणः ॥
‘परमात्मा चतूरूपः सर्वप्राणिशरीरगः ।
विश्वश्च तैजसः प्राज्ञस्तुरीयश्चेति कथ्यते ॥
तानि रूपाणि सर्वाणि पूर्णानन्दमयानि तु ।
चेतोमुखानि सर्वाणि पूर्णज्ञानस्वरूपतः ॥
मुखशब्दस्तु सर्वस्य देहस्याप्युपलक्षणः ।
तथाऽपि मुखशब्दोऽयं पूर्णत्वं सूचयेद् विभोः ॥
ज्ञानस्य मुख्यवाचित्वान्मुखवाच्यपि सन् स्वतः ॥’ इति मार्कण्डेये ॥
पूर्णानन्दस्वरूपस्य क्रीडा भोगो न चान्यथा ।
यथाऽऽदित्यस्य दीपेन न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-14" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अत्रैते श्लोका भवन्ति ।
बहिःप्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-15" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘प्रमाणस्य प्रमाणं च बलवद् विद्यते मुने ।
ब्रह्मदृष्टान् यतो मन्त्रान् प्रमाणं सलिलेश्वरः ॥
अत्र श्लोका भवन्तीति चकारैव पृथक् पृथक् ॥’ इति गारुडे ।
खण्डचतुष्टयेऽपि(खण्डचतुष्टये) पृथक् पृथक् ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-16" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "दक्षिणाक्षिमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।
आकाशे च हृदि प्राज्ञस्त्रिधा देहे व्यवस्थितः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-17" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "विश्वो हि स्थूलभुङ् नित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् ।
आनन्दभुक् तथा प्राज्ञस्त्रिधा भोगं निबोधत ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-18" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ।
आनन्दं च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं विजानथ ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-19" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्रिषु धामसु यद् भोज्यं भोक्ता यश्च प्रकीर्तितः ।
वेदैतदुभयं यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-20" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्रभवः सर्वभावानां सतामिति विनिश्चयः ।
सर्वं जनयति प्राणश्चेतोंऽशून् पुरुषः पृथक् ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-21" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V12_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘प्रभवः सर्वभावानां विष्णुरेव न संशयः ।
इत्थं सतां निश्चयः स्यादन्यथा त्वसतां भवेत् ॥
सर्वस्य हि प्रणेतृत्वात् प्राणो नारायणः परः’ ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-22" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "विभूतिं प्रसवं त्वन्ये मन्यन्ते सृष्टिचिन्तकाः ।
स्वप्नमायासरूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिता ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-23" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिरिति सृष्टौ विनिश्चिताः ।
कालात् प्रसूतिं भूतानां मन्यन्ते कालचिन्तकाः ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-24" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V14_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘तां सृष्टिं बहुधा प्राहुर्ज्ञानिनोऽज्ञानिनस्तथा ।
विष्णुर्विकृतिमायाति महदादिस्वरूपिणीम् ॥
तत्तद्विविधभूतिस्तु सृष्टिः प्रोक्ता ह्यपण्डितैः ।
स्वप्नमायास्वरूपां(स्वप्नमायासरूपां) च केचिदज्ञा जना विदुः ॥
अविकारस्य चिन्मात्रस्वेच्छयैवाखिलं जगत् ।
उत्पद्यत इति प्राज्ञाः प्राहुर्ब्रह्मादयोऽखिलाः ॥
पूर्णशक्तेः कुतो माया सार्वज्ञात् स्वप्नवत् कुतः ।
सर्वदोषव्यतीतस्य विकारः कुत इष्यते ॥
तस्मादेवाविकारस्य विष्णोरिच्छावशादिदम् ।
यथार्थमेव सम्भूतमिति वेदवचोऽखिलम् ॥
केचित् कालत एवैतां सृष्टिमाहुरकोविदाः ।
केचिद्रुद्राद् ब्रह्मणश्च प्रधानादिति चापरे ॥
विमूढाः सर्व एवैते यतो नारायणः परः ।
सर्वकर्ता सर्वशक्तिरेक एव न चापरः(एक एव च नापरः) ॥
प्रधानकालब्रह्मेशमुखाः सर्वेऽपि तद्वशाः ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-25" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।
देवस्यैषः स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहेति ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-26" |
|---|
| oldKey | "MAN_C01_V15_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C01" |
|---|
| chapter | "MAN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्यापि विष्णोः सृष्टिं तु केचिदाहुरनैपुणाः ॥
अतृप्तस्यैव भोगार्थं क्रीडार्थं तु विपश्चितः ।
सा च क्रीडा स्वभावोऽस्य कुतोऽतृप्त्या स्पृहा विभोः ॥’ इति हरिवंशेषु ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-27" |
|---|
| oldKey | "MAN_C02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं नप्रज्ञं नाप्रज्ञमदृष्टं अव्यवहार्यं अलक्षणं अचिन्त्यं अव्यपदेश्यं ऐकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते । स आत्मा स विज्ञेयः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-28" |
|---|
| oldKey | "MAN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘विष्णुस्तुरीयरूपेण द्वादशान्ते व्यवस्थितः ।
मुक्तानां प्राप्यरूपोऽसौ व्यवहारे न दृश्यते ॥
सम्यक् समाहितानां तु प्राप्तानां षोडशीं कलाम् ।
अपरोक्षदृशां क्वापि तुरीयं दृश्यते पदम् ॥
अन्तर्बहिश्च सौप्तं च समाधिज्ञानमेव च ।
बहिः शब्दादिकं जानन् पश्यन् स्वप्नं तथैव च ॥
यदा भवति साऽवस्था ह्युभयज्ञानशब्दिता ।
एतत्सर्वं तुरीयेण रूपेण न करोत्यजः ॥
सर्वज्ञानप्रदश्चापि मुक्तस्यैव तुरीयकः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
‘अमुक्तस्य त्वदृश्यत्वात् षोडशीं वा कलामृते ।
तुरीयोऽदृष्ट इत्युक्तो ग्रहणादेरगोचरः ॥
विना मुक्तिं यतस्तेना(ततस्तेना)व्यवहार्य इतीरितः ।
जाग्रदादिप्रवृत्तिस्तु लक्षणं ह्यनुमापकम् ॥
अलक्षणस्तद्राहित्यादचिन्त्यस्तत एव च ।
तत एव ह्यनिर्देश्यश्चिदानन्दैकलक्षणः ॥
मुक्तस्य सर्वव्यापारहेतुरेव तुरीयकः ।
एकः प्रधान उद्दिष्ट आत्मा पूर्णत्वतः श्रुतः ॥
तदेवास्य स्वरूपं यदैकात्म्यं तेन कीर्तितः ।
प्रत्ययो ज्ञानरूपत्वात् सार आनन्दरूपतः ॥
प्रपञ्चो विस्तृतेर्विष्णुः शम आनन्दरूपतः ।
उत्कृष्टानन्दरूपत्वादुपशब्दः प्रकीर्तितः ॥
प्रपञ्चं देहबन्धाख्यं तुरीयः शमयेद्यतः ।
प्रपञ्चोपशमस्तेनाप्युक्तः स भगवान् प्रभुः ॥
निर्दुःखसुखरूपत्वाच्छिवशब्दः श्रुतौ श्रुतः ।
अन्यथाप्रत्ययो द्वैतं शमयेत् तं यतो हरिः ॥
अद्वैतस्तेन चोद्दिष्टस्तुरीयः पुरुषोत्तमः ॥’ इति माहात्म्ये ॥
‘अपेक्ष्य वस्तुयाथार्थ्यं द्वित्वमन्यस्वरूपता ।
इण् गताविति धातोश्च तज्ज्ञानं द्वैतमुच्यते ॥’ इति सङ्कल्पे ।
‘स आत्मा स विज्ञेयः’ इति सोऽयमात्मा चतुष्पादिति चतुर्धा विभक्त उच्यते उपसंहारार्थम् । ‘सोऽयमात्माऽध्यक्षरम्’ इति पृथगारम्भात् ।
‘विश्वादिरूपो यस्त्वात्मा स विज्ञेयो मुमुक्षुभिः ।
निर्विशेषोऽपि भगवांश्चतुर्धा समुदीरितः ॥’ इति प्रत्यये ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-29" |
|---|
| oldKey | "MAN_C02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अत्रैते श्लोकाः भवन्ति ।
निवृत्तेः सर्वदुःखानामीशानः प्रभुरव्ययः ।
अद्वैतः सर्वभावानां देवस्तुर्यो विभुः स्मृतः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-30" |
|---|
| oldKey | "MAN_C02_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वदुःखानां निवृत्तेः कारणभूतस्तुरीयो देवः ।
हरिस्तुरीयरूपेण मोक्षदः सम्प्रकीर्तितः ।
‘देवः स सर्वजीवानां गम्यत्वात् समुदीरितः ।
भावा जीवाः समुद्दिष्टा भवन्त्येते यतो विभोः ॥
ईशानामपि मुक्तानां ईशानः सोऽननाच्छ्रतः ॥’ इति प्रत्याहारे ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-31" |
|---|
| oldKey | "MAN_C02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ ।
प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-32" |
|---|
| oldKey | "MAN_C02_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘कार्यकारणबन्धस्य तदधीनत्वतो विभुः ।
विश्वादिरूपो भगवान् बद्ध इत्युच्यते श्रुतौ ।
कुतो बन्धः परस्यास्य बन्धेशस्य चिदात्मनः ॥’ इति च ।
‘स बद्धः स दुःखी स बन्धयति स दुःखयतीति । स जीवः स प्रकृतिः स जीवयति स प्रकरोतीति । सोऽवरः सोऽनित्यः सोऽवरयति सोऽनित्ययति’ इति कौषारवश्रुतिः ।
‘विष्णोर्गुणोक्तिपरता मम नित्यं सुरेश्वराः ।
तदर्थमन्यद्वचनमतस्तस्य विरोधि यत् ॥
तन्ममार्थो न हि क्वापि साऽहं तत्सरणात् सदा ।
सरस्वतीति सम्प्रोक्ता तस्माज्ज्ञेया गुणा हरेः ॥’ इति महोपनिषदि ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-33" |
|---|
| oldKey | "MAN_C02_V04" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "नाऽऽत्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् ।
प्राज्ञः किञ्चन संवेत्ति तुर्यं तत् सर्वदृक् सदा ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-34" |
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| oldKey | "MAN_C02_V04_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MAN_C02" |
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| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "‘नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम्(त सात्यं चापि नानत्वम्) ।
प्राज्ञः संवेदयेत् किञ्चिज्जीवकालतमो विना ॥
सुप्त्यवस्थां सुखं चापि(वाऽपि) विना नान्यत् प्रदर्शयेत् ।
सर्वं तु दर्शयेन्मुक्तौ तुरीयः परमेश्वरः ॥’ इति प्रत्यये ।
‘स्वतन्त्रे कर्तृशब्दः स्यात् प्राज्ञस्यावेदनं यथा ।
सर्वप्रदर्शके चैव तुरीये सर्वदर्शनम् ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।" |
|---|
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| id | "Mandu-35" |
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| oldKey | "MAN_C02_V05" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "द्वैतस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्राज्ञतुर्ययोः ।
बीजनिद्रायुतः प्राज्ञः सा च तुर्ये न विद्यते ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-36" |
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| oldKey | "MAN_C02_V05_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MAN_C02" |
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| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "‘निद्रायुतास्तु विश्वाद्यास्तदधीना यतो हि सा ।
यथा भृत्ययुतः स्वामी न ह्यज्ञानं परात्मनः ॥’ इति च ।
‘अभेदमपि तद्ब्रह्म बहुरूपं विशेषतः ।
करोति न करोतीति व्यवहार्यं स्वशक्तितः ॥’ इति च ।
न संवेदयतीत्यस्वीकारे ‘तुर्यं तत्सर्वदृक् सदा’ ‘द्वैतस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्राज्ञतुर्ययोः’ इति च विरुद्धम् । द्वैतग्रहणाकारणत्वं तुल्यमित्यर्थः ।
‘द्वैतं न ग्राहयेत् तुर्यो न च प्राज्ञः कथञ्चन ।
द्वैतग्रहणबीजं तु निद्रा प्राज्ञं समाश्रिता ॥’ इति प्रकटश्रुतिः ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-37" |
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| oldKey | "MAN_C02_V06" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MAN_C02" |
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| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ प्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया ।
न निद्रां नैव च स्वप्नं तुर्ये पश्यन्ति निश्चिताः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-38" |
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| oldKey | "MAN_C02_V07" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MAN_C02" |
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| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अन्यथागृह्णतः स्वप्नो निद्रा तत्त्वमजानतः ।
विपर्यासे तयोः क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते ॥ ७ ॥" |
|---|
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| id | "Mandu-39" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "विपरीतज्ञानादपि विपरीतज्ञानान्तरं जायते ।" |
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| id | "Mandu-40" |
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| oldKey | "MAN_C02_V08" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुद्ध्यते ।
अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुद्ध्यते तदा ॥ ८ ॥" |
|---|
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| id | "Mandu-41" |
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| oldKey | "MAN_C02_V08_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "‘अनादिमायया विष्णोरिच्छया स्वापितो यदा ।
तया प्रबोधमायाति तदा विष्णुं प्रपश्यति ॥’ इति प्रकाशिकायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-42" |
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| oldKey | "MAN_C02_V09" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MAN_C02" |
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| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥ ९ ॥" |
|---|
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| id | "Mandu-43" |
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| oldKey | "MAN_C02_V09_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MAN_C02" |
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| chapter | "MAN_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "‘तन्वा स्वस्वामिसम्बन्धः प्रपञ्चोऽस्य शरीरिणः ।
वस्तुतोऽसौ न चैवास्ति परमस्य वशे यतः ॥
तन्वादिकस्तथाऽप्येष ह्यभिमानात् प्रदृश्यते ।
अतः स विद्यत इति ह्यङ्गीकारो(त्वङ्गीकारो) भवेद्यदि ॥
तथाऽपि भगवज्ज्ञानात् स निवर्तेदसंशयम् ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।
अद्वैतमनन्यथा ज्ञातं परब्रह्मादि वस्तु (वस्तु तत्) । द्वैतं द्विधा ज्ञातमन्यथाज्ञातमज्ञैः । परमार्थतः परमेश्वरात् । तस्यैव मायामात्रं तदिच्छया निर्मितम् । तदन्यथाज्ञानं तस्मात् तदिच्छयैव निवर्तते ।
‘परेण ब्रह्मणा यत्तु द्विधा न ज्ञातमञ्जसा ।
तदद्वैतं परं ब्रह्म तदेव ज्ञातमन्यथा ॥
जीवेन द्वैतमुद्दिष्टं मिथ्याज्ञानं तदेव च ।
परमार्थात् पराद् विष्णोर्जातमिच्छावशादनु ॥
मायेतीच्छा समुद्दिष्टा मायामात्रं तदुद्भवम् ।
उत्तमत्वात् परार्थोऽसौ भगवान् विष्णुरव्ययः(विष्णुरच्युतः) ॥’ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-44" |
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| oldKey | "MAN_C02_V10" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C02" |
|---|
| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।
उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इति ॥ १० ॥" |
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| id | "Mandu-45" |
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| oldKey | "MAN_C02_V10_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MAN_C02" |
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| chapter | "MAN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अनन्यथा इतमवगतमद्वैतम् । द्वैतं वस्तुस्वरूपापेक्षया द्विधा ह्यन्यथा ज्ञातमित्यर्थः(वस्तुस्वरूपापेक्षया द्विधा ह्यन्यथाज्ञानमित्यर्थः) । अतो विकल्पः शरीरादिसम्बन्धः केनचिदज्ञानादिना कारणेन कल्पितोऽप्युपदेशान्निवर्तते । अयं सतां वादः- ज्ञाते सति ब्रह्मणि(परब्रह्मणि) द्वैतमन्यथाज्ञानं निवर्तते इति ।
विकल्पो देहबन्धादिः केनचित् कारणेन तु ।
कल्पितो(कल्पितोऽपि) विनिवर्तेत(निवर्तेत) गुरुवाक्यादसंशयः(संशयम्) ॥
एष एव सतां वादो ज्ञाते ब्रह्मणि तत्त्वतः ।
निवर्ततेऽन्यथाज्ञानं तत आनन्दमेत्यसौ ॥ इति च ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-46" |
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| oldKey | "MAN_C03_V01" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C03" |
|---|
| chapter | "MAN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा अकार उकारो मकार इति ॥ १ ॥
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा । आप्तेरादिमत्त्वाद् वा ।
आप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति । य एवं वेद ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-47" |
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| oldKey | "MAN_C04_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अधिकं सर्वतोऽविनाशि(सर्वत अविनाशि) चेत्यध्यक्षरम् । अधिका एव मात्रा अंशा यस्य तदधिमात्रम् । अ इत्यनेनाभिधानेनाक्रियत इत्यकारः । तत्र पूर्वोक्तो वैश्वानरः प्रथमा मात्रेत्याद्यनुवादः(तत्र पूर्वोक्तो वैश्वानरोऽकारः । प्रथमा.....) । अकार इत्यादिकं विधेयम् । प्राज्ञस्तैजसश्चादिरस्येत्यादिमान् । सुप्तेरुत्थाने प्राज्ञाद्विभक्तो भवति विश्वः । स्वप्नादुत्थाने तैजसात् । आदिश्चास्योपासकस्य भवति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-48" |
|---|
| oldKey | "MAN_C03_V02" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C03" |
|---|
| chapter | "MAN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रा । उत्कर्षादुभयत्वाद् वा । उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति । य एवं वेद ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-49" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V02_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "शरीराभिमानादुत्थाप्य कर्षतीत्युत्कर्षः । निद्रा विषयानुभवश्चानेन क्रियत इत्युभयत्वम् । समानः सर्वेषां मध्यस्थो भवति ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-50" |
|---|
| oldKey | "MAN_C03_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C03" |
|---|
| chapter | "MAN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा । मितेरपीतेर्वा । मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति । य एवं वेद ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-51" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मितेरन्तर्गमनात् ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-52" |
|---|
| oldKey | "MAN_C03_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C03" |
|---|
| chapter | "MAN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अत्रैते श्लोकाः भवन्ति-
विश्वस्यात्वविवक्षायामादिसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-53" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मात्रासम्प्रतिपत्तौ अंशध्याने । आदिमत्वं विश्वस्य विद्यते । तदुपासकस्यापि भवतीत्यादि सामान्यम् ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-54" |
|---|
| oldKey | "MAN_C03_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C03" |
|---|
| chapter | "MAN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तैजसस्योत्वविज्ञान उत्कर्षो दृश्यते स्फुटम् ।
मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादुभयत्वं तथाविधम् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-55" |
|---|
| oldKey | "MAN_C03_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C03" |
|---|
| chapter | "MAN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासम्प्रतिपत्तौ तु लयसामान्यमेव च ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-56" |
|---|
| oldKey | "MAN_C03_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C03" |
|---|
| chapter | "MAN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्रिषु धामसु यत् तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितम् ।
स पूज्यस्सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-57" |
|---|
| oldKey | "MAN_C03_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C03" |
|---|
| chapter | "MAN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम् ।
मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यतेऽगतिरिति ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-58" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अमात्रेऽप्यगतिर्न विद्यते । प्रतिदिवसं विभाग एकीभावश्च विद्यते विश्वादीनाम् । तुरीयस्य तन्न विद्यत इत्यमात्रः । विश्वादीनां व्यवहारकारणत्वं विद्यते । तुरीयस्य तन्न विद्यत इत्यतो गम्यत्वमपि नास्तीत्याशङ्कां निवर्तयति– ‘अगतिर्न विद्यते’ इति । ‘आत्मानं संविशति’ इति गतिवचनात् ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-59" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V08_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘आदिमत्त्वेन सामान्यमुपास्येन भवेदिति ।
उपासकस्य सञ्जानन् सर्ववन्द्यो भवेत् पुमान् ॥
सामान्यत्रयमप्येतत् तुल्यं मुक्तिगतत्वतः ।
अमात्रत्वं तुरीयस्याप्यविभागाद् दिने दिने ॥
जाग्रदादेरकर्ताऽपि गम्योऽसौ ज्ञानिनां भवेत् ॥’ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-60" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V08_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘आदिमत्त्वादिसामान्यं तुल्यं मोक्षोपभोग्यतः ।
अमात्रत्वं तुरीयस्याप्यविभागाद्दिने दिने ॥’ इत्यात्मसंहितायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-61" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत ओङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-62" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V02_I01" |
|---|
| type | "leading-bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अत्रैते श्लोका भवन्ति ।
ओङ्कारं पादशो विद्यात् पादा मात्रा न संशयः ।
ओङ्कार पादशो ज्ञात्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-63" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् ।
प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-64" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवस्य परं स्मृतः ।
अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-65" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च ।
एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-66" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्रणवं हीश्वरं विद्यात् सर्वस्य हृदये स्थितम् ।
सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-67" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।
ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः ।
स मुनिर्नेतरो जन इति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mandu-68" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तुरीयं नादनामानं हरिं ज्ञात्वा परं पदम् ।
तमेव प्रविशेच्छुद्धरूपी तत्सदृशात्मवान् ॥
ज्ञानानन्दौ च शक्तिश्च तथाऽपि न समाः क्वचित् ।
विमुक्तस्यापि जीवस्य पारतन्त्र्यं च नित्यदा ॥
चतूरूपस्यास्य विष्णोर्नाम प्रणव इत्यपि ।
जाग्रदादिप्रणयनात् स एव ब्रह्म बृंहणात् ॥
ओमित्याक्रियमाणत्वादोङ्कारः सम्प्रकीर्तितः ।
आदिमत्वादयो ह्यर्था ओमित्यस्य श्रुतौ श्रुताः ॥
अपूर्वः कारणाभावान्नाशाभावादनन्तरः ।
पराधीनस्थित्यभावादनपर उदाहृतः ॥
सर्वगत्वादबाह्यश्च तं ज्ञात्वा प्रविमुच्यते ॥ इति च ॥
‘परत्वमपरत्वं च विष्णोरेकस्य वै यदा ।
श्रूयते न तु सामर्थ्यभेदस्तत्र कथञ्चन ॥
अवतारस्य पूर्वत्वात् पौर्वापर्यमुदाहृतम् ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-69" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V07_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पूर्वावतारे पश्चिमावतारेऽपि पूर्ण एवेति प्रणवो ह्यपरं ब्रह्मेत्यादेरर्थः ।" |
|---|
|
| id | "Mandu-70" |
|---|
| oldKey | "MAN_C04_V07_B04" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MAN_C04" |
|---|
| chapter | "MAN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एकोऽपि निर्विशेषोऽपि चतुर्धा व्यवहारभाक् ।
यस्तं वन्दे चिदानन्दं(चिदात्मानम्; सदानन्दम्) विष्णुं विश्वादिरूपिणम् ॥" |
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|