Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S3: Difference between revisions
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== तृतीयोऽध्यायः == | == तृतीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = सूत उवाच– | |||
| verse_line2 = जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः । | |||
| verse_line3 = सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया ॥ १ ॥ | |||
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व्यक्त्यपेक्षया जगृह इति । तथा हि तन्त्रभागवते–'ओयमनुपादेयं यद्रूपं नित्यमव्ययम् ।स एवापेक्ष्य रूपाणां व्यक्तिमेव जनार्दनः ॥अगृह्णाद् व्यसृजच्चेति कृष्णरामादिकां तनुम् ।पठ्यते भगवानीशो मूढबुद्धिव्यपेक्षया ॥तमसा ह्युपगूढस्य यत्तमःपानमीशितुः ।एतत्पुरुषरूपस्य ग्रहणं समुदीर्यते ॥कृष्णरामादिरूपाणां लोकव्यक्तिमपेक्षया''। इति ॥महदादिभिः सम्भूतं अन्तर्गतमहदादि । न महदादिशरीरम् । 'यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्ति''इति हि श्रुतिः ।'यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशांपते ।सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् ।भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च ।भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम''। इति मोक्षधर्मे ।'नाऽसीदहो न रात्रिरासीन्नासदासीत् तन्महद्वपुस्तदाअभवद्विश्वरूपं सा विश्वरूपस्य रजनी''इति भाल्लवेयश्रुतिः ।'न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा ।न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपोऽच्युतो विभुः''। इति वाराहे ।'सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः ।हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित् ॥परमानन्दसन्दोहा ज्ञानमात्राश्च सर्वतः ।सर्वे सर्वगुणैः पूर्णाः सर्वे भेदविवर्जिताः ॥अन्यूनानधिकाश्चैव गुणैः सर्वैश्च सर्वतः ।देहिदेहभिदा चात्र नेश्वरे विद्यते क्वचित् ॥तत्स्वीकारादिशब्दस्तु हस्तस्वीकारवत् स्मृतः ।वैलक्षण्यान्न वा तत्र ज्ञानमात्रार्थमीरितम् ॥केवलैश्वर्यसंयोगादीश्वरः प्रकृतेः परः ॥जातो गतस्त्विदं रूपं तदित्यादि व्यवह्रियते''। इति महावाराहे ।'एकमेवाद्वितीयं'''नेह नानास्ति किञ्चन'''एवं धर्मान् पृथक् पश्यन्''इत्यादि च ।तस्यैवास्थूलत्वाद्यैश्वर्ययोगात् ।तथा च कौर्मे–'अस्थूलश्चानणुश्चैव स्थूलोऽणुश्चैव सर्वतः ।अवर्णः सर्वतः प्रोक्तः श्यामो रक्तान्तलोचनः ॥ऐश्वर्ययोगाद्भगवान् विरुद्धार्थोऽभिधीयते ।तथाऽपि दोषाः परमे नैवाऽहार्याः कथञ्चन ॥गुणा विरुद्धा अपि तु समाहार्याश्च सर्वतः ।''इति ।विष्णुधर्मोत्तरे च–'गुणाः सर्वेऽपि युज्यन्ते ह्यैश्वर्यात् पुरुषोत्तमे ।दोषाः कथञ्चिन्नैवात्र युज्यन्ते परमो हि सः ॥गुणदोषौ माययैव केचिदाहुरपण्डिताः ।न तत्र माया मायी वा तदीयौ तौ कुतो ह्यतः ॥तस्मान्न मायया सर्वं सर्वमैश्वर्यसम्भवम् ।अमायो हीश्वरो यस्मात् तस्मात् तं परमं विदुः''॥ इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः । | |||
| verse_line2 = तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥ | |||
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यस्यावयवसंस्थानैः । 'नाभ्या आसीदन्तरिक्षम्''इत्यादि । सत्त्वं साधुगुणवत्त्वं ज्ञानबलरूपं वा ।'बलज्ञानसमाहारः सत्त्वमित्यभिधीयते''इति मात्स्ये ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् । | |||
| verse_line2 = यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५ ॥ | |||
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निधानं अत्रैकीभवन्त्यन्त इति । अंशांशेन सामर्थ्यैकदेशेन ।ब्राह्मे च– 'यच्छक्त्यैकांशसम्भूतं जगदेतच्चराचरम्''इति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः । | |||
| verse_line2 = चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६ ॥ | |||
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'कुमारो नाम भगवान् स्वयं स्वस्मादजायत ।दिदेश ब्रह्मणे ब्रह्म ब्रह्मचर्ये स्थितो विभुः ॥यस्मात् सनत्कुमारश्च ब्रह्मचर्यमपालयत् ।यः स्थाणोः स्थाणुतां प्रादाद् भगवानव्ययो हरिः''। इति ब्राह्मे ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः । | |||
| verse_line2 = तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८ ॥ | |||
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'अवतारस्तृतीयोऽस्य देवर्षिः प्रथितो दिवि ।महिदासस्त्वैतरेयो यस्तन्त्रं नारदेऽवदत्''। इति च ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी । | |||
| verse_line2 = भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तमः ॥ ९ ॥ | |||
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धर्मकलासर्गः धर्मे स्वांशावतारः । लोकदृष्ट्याऽऽत्मशमोपेतम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् । | |||
| verse_line2 = प्रोवाचाऽऽसुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १० ॥ | |||
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तन्त्रं साङ्ख्यं वेदानुसारि ।पाद्मे च–'कपिलो वासुदेवाख्यस्तन्त्रं साङ्ख्यं जगाद ह ।ब्रह्मादिभ्यश्च देवेभ्यो भृग्वादिभ्यस्तथैव च ॥तथैवाऽऽसुरये सर्ववेदार्थैरुपबृंहितम् ।सर्ववेदविरुद्धं च कपिलोऽन्यो जगाद ह ॥साङ्ख्यमाऽऽसुरयेऽन्यस्मै कुतर्कपरिबृंहितम्''। इति ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया । | |||
| verse_line2 = आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११ ॥ | |||
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आन्वीक्षिकीं तत्त्वविद्याम्–'आन्वीक्षिकी कुतर्काख्या तथैवाऽऽन्वीक्षिकी परा''इति मात्स्ये ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः । | |||
| verse_line2 = दुग्धवानोेषधीर्विप्रास्तेनायं च उशत्तमः ॥ १४ ॥ | |||
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पृथुशरीराविष्टरूपम्–'आविवेश पृथुं देवः शङ्खी चक्री चतुर्भुजः''इति पाद्मे ।उश इच्छायाम् । सत्यकामः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । | |||
| verse_line2 = चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१ ॥ | |||
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रामात् पूर्वमप्यस्ति व्यासावतारः–'तृतीयं युगमारभ्य व्यासो बहुषु जज्ञिवान्''इति कौर्मे ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी । | |||
| verse_line2 = रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३ ॥ | |||
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आवेशो बलभद्रे ।'शङ्खचक्रभृदीशेशः श्वेतवर्णो महाभुजः ।आविष्टः श्वेतकेशात्मा शेषांशं रोहिणीसुतम्''।इति महावाराहे ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line1 = ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् । | |||
| verse_line2 = बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥ | |||
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'मोहनार्थं दानवानां बालरूपं पथि स्थितम् ।पुत्रं तं कल्पयामास मूढबुद्धिर्जिनः स्वयम् ॥ततः सम्मोहयामास जिनाद्यानसुरांशकान् ।भगवान् वाग्भिरुग्राभिरहिंसावाचिभिर्हरिः''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः । | |||
| verse_line2 = यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥ | |||
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विदासिनः उन्नतात् भिन्नाद् वा । 'त्रिविधाः पुरुषा लोके नीचमध्य-विदासिनः''इति ब्राह्मे ।'चतुर्धा वर्णरूपेण जगदेतद् विदासितम्''इति च ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । | |||
| verse_line2 = इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥ | |||
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एते प्रोक्तावताराः । मूलरूपी कृष्णः स्वयमेव ।'जीवास्तत्प्रतिबिम्बांशा वराहाद्याः स्वयं हरिः ।दृश्यते बहुधा विष्णुरैश्वर्यादेक एव तु''। इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । | |||
| verse_line2 = मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥ | |||
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एतत् जडरूपम् ।'नारायणवराहाद्याः परमं रूपमीशितुः ।जैवं तु प्रतिबिम्बाख्यं जडमारोपितं हरेः ॥एवं हि त्रिविधं तस्य रूपं विष्णोर्महात्मनः''। इति पाद्मे ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले । | |||
| verse_line2 = एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१ ॥ | |||
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दृश्यत्वं जडरूपत्वम् ।'अविज्ञाय परं देहमानन्दात्मानमव्ययम् ।आरोपयन्ति जनिमत् पञ्चभूतात्मकं जडम्''। इति स्कान्दे ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् । | |||
| verse_line2 = अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | |||
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अतः परं जडेश्वररूपयोः परम् । अव्यूढगुणबृंहितंं अनादिकाले कदाचिदप्य-नपगतसत्वादिगुणबृंहितम् । अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा । | |||
| verse_line2 = अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥ | |||
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अविद्यया जीवे कृते परमेश्वरे प्रतिषिद्धे इति ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line1 = यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः । | |||
| verse_line2 = सम्पन्न एवेति विदुर्महिमि्न स्वे महीयते ॥ ३४ ॥ | |||
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विशारदः परमेश्वरः । तन्मतिः माया । यदा नैनं शोचयामीत्युपरता तदा सम्पन्न एव ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥ | |||
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'अप्रयत्नात् स्वतन्त्रत्वात् फलानां च विवर्जनात् ।क्रियायाश्च स्वरूपत्वादकर्तेति च तं विदुः ॥कर्तृत्वं भ्रान्तिजं प्राहुरतत्तत्त्वविदो जनाः ।ऐश्वर्यजं तु कर्तृत्वं सम्यक् तत्तत्त्ववेदिनः''। इति पाद्मे ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | |||
| verse_line2 = उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥ ४० ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे तृतीयोध्यायः ॥}} | |||
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'धर्मः कं शरणं गतः''इत्यस्य तमेव व्यासरूपिणमिति परिहार उच्यते– 'इदं भागवतम्''इत्यादिना ॥ ४० ॥ | |||
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Revision as of 05:32, 8 April 2026
तृतीयोऽध्यायः
सूत उवाच–जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः ।
व्यक्त्यपेक्षया जगृह इति । तथा हि तन्त्रभागवते–'ओयमनुपादेयं यद्रूपं नित्यमव्ययम् ।स एवापेक्ष्य रूपाणां व्यक्तिमेव जनार्दनः ॥अगृह्णाद् व्यसृजच्चेति कृष्णरामादिकां तनुम् ।पठ्यते भगवानीशो मूढबुद्धिव्यपेक्षया ॥तमसा ह्युपगूढस्य यत्तमःपानमीशितुः ।एतत्पुरुषरूपस्य ग्रहणं समुदीर्यते ॥कृष्णरामादिरूपाणां लोकव्यक्तिमपेक्षया। इति ॥महदादिभिः सम्भूतं अन्तर्गतमहदादि । न महदादिशरीरम् । 'यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तिइति हि श्रुतिः ।'यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशांपते ।सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् ।भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च ।भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम। इति मोक्षधर्मे ।'नाऽसीदहो न रात्रिरासीन्नासदासीत् तन्महद्वपुस्तदाअभवद्विश्वरूपं सा विश्वरूपस्य रजनीइति भाल्लवेयश्रुतिः ।'न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा ।न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपोऽच्युतो विभुः। इति वाराहे ।'सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः ।हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित् ॥परमानन्दसन्दोहा ज्ञानमात्राश्च सर्वतः ।सर्वे सर्वगुणैः पूर्णाः सर्वे भेदविवर्जिताः ॥अन्यूनानधिकाश्चैव गुणैः सर्वैश्च सर्वतः ।देहिदेहभिदा चात्र नेश्वरे विद्यते क्वचित् ॥तत्स्वीकारादिशब्दस्तु हस्तस्वीकारवत् स्मृतः ।वैलक्षण्यान्न वा तत्र ज्ञानमात्रार्थमीरितम् ॥केवलैश्वर्यसंयोगादीश्वरः प्रकृतेः परः ॥जातो गतस्त्विदं रूपं तदित्यादि व्यवह्रियते। इति महावाराहे ।'एकमेवाद्वितीयंनेह नानास्ति किञ्चनएवं धर्मान् पृथक् पश्यन्इत्यादि च ।तस्यैवास्थूलत्वाद्यैश्वर्ययोगात् ।तथा च कौर्मे–'अस्थूलश्चानणुश्चैव स्थूलोऽणुश्चैव सर्वतः ।अवर्णः सर्वतः प्रोक्तः श्यामो रक्तान्तलोचनः ॥ऐश्वर्ययोगाद्भगवान् विरुद्धार्थोऽभिधीयते ।तथाऽपि दोषाः परमे नैवाऽहार्याः कथञ्चन ॥गुणा विरुद्धा अपि तु समाहार्याश्च सर्वतः ।इति ।विष्णुधर्मोत्तरे च–'गुणाः सर्वेऽपि युज्यन्ते ह्यैश्वर्यात् पुरुषोत्तमे ।दोषाः कथञ्चिन्नैवात्र युज्यन्ते परमो हि सः ॥गुणदोषौ माययैव केचिदाहुरपण्डिताः ।न तत्र माया मायी वा तदीयौ तौ कुतो ह्यतः ॥तस्मान्न मायया सर्वं सर्वमैश्वर्यसम्भवम् ।अमायो हीश्वरो यस्मात् तस्मात् तं परमं विदुः॥ इति ॥ १ ॥
यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः ।तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥
यस्यावयवसंस्थानैः । 'नाभ्या आसीदन्तरिक्षम्इत्यादि । सत्त्वं साधुगुणवत्त्वं ज्ञानबलरूपं वा ।'बलज्ञानसमाहारः सत्त्वमित्यभिधीयतेइति मात्स्ये ॥ ३ ॥
एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५ ॥
निधानं अत्रैकीभवन्त्यन्त इति । अंशांशेन सामर्थ्यैकदेशेन ।ब्राह्मे च– 'यच्छक्त्यैकांशसम्भूतं जगदेतच्चराचरम्इति ॥ ५ ॥
स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः ।चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६ ॥
'कुमारो नाम भगवान् स्वयं स्वस्मादजायत ।दिदेश ब्रह्मणे ब्रह्म ब्रह्मचर्ये स्थितो विभुः ॥यस्मात् सनत्कुमारश्च ब्रह्मचर्यमपालयत् ।यः स्थाणोः स्थाणुतां प्रादाद् भगवानव्ययो हरिः। इति ब्राह्मे ॥ ६ ॥
तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८ ॥
'अवतारस्तृतीयोऽस्य देवर्षिः प्रथितो दिवि ।महिदासस्त्वैतरेयो यस्तन्त्रं नारदेऽवदत्। इति च ॥ ८ ॥
तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी ।भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तमः ॥ ९ ॥
धर्मकलासर्गः धर्मे स्वांशावतारः । लोकदृष्ट्याऽऽत्मशमोपेतम् ॥ ९ ॥
पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् ।प्रोवाचाऽऽसुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १० ॥
तन्त्रं साङ्ख्यं वेदानुसारि ।पाद्मे च–'कपिलो वासुदेवाख्यस्तन्त्रं साङ्ख्यं जगाद ह ।ब्रह्मादिभ्यश्च देवेभ्यो भृग्वादिभ्यस्तथैव च ॥तथैवाऽऽसुरये सर्ववेदार्थैरुपबृंहितम् ।सर्ववेदविरुद्धं च कपिलोऽन्यो जगाद ह ॥साङ्ख्यमाऽऽसुरयेऽन्यस्मै कुतर्कपरिबृंहितम्। इति ॥ १० ॥
षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया ।आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११ ॥
आन्वीक्षिकीं तत्त्वविद्याम्–'आन्वीक्षिकी कुतर्काख्या तथैवाऽऽन्वीक्षिकी पराइति मात्स्ये ॥ ११ ॥
ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः ।दुग्धवानोेषधीर्विप्रास्तेनायं च उशत्तमः ॥ १४ ॥
पृथुशरीराविष्टरूपम्–'आविवेश पृथुं देवः शङ्खी चक्री चतुर्भुजःइति पाद्मे ।उश इच्छायाम् । सत्यकामः ॥ १४ ॥
ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् ।चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१ ॥
रामात् पूर्वमप्यस्ति व्यासावतारः–'तृतीयं युगमारभ्य व्यासो बहुषु जज्ञिवान्इति कौर्मे ॥ २१ ॥
एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३ ॥
आवेशो बलभद्रे ।'शङ्खचक्रभृदीशेशः श्वेतवर्णो महाभुजः ।आविष्टः श्वेतकेशात्मा शेषांशं रोहिणीसुतम्।इति महावाराहे ॥ २३ ॥
ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥
'मोहनार्थं दानवानां बालरूपं पथि स्थितम् ।पुत्रं तं कल्पयामास मूढबुद्धिर्जिनः स्वयम् ॥ततः सम्मोहयामास जिनाद्यानसुरांशकान् ।भगवान् वाग्भिरुग्राभिरहिंसावाचिभिर्हरिः॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २४ ॥
अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः ।यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥
विदासिनः उन्नतात् भिन्नाद् वा । 'त्रिविधाः पुरुषा लोके नीचमध्य-विदासिनःइति ब्राह्मे ।'चतुर्धा वर्णरूपेण जगदेतद् विदासितम्इति च ॥ २६ ॥
एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥
एते प्रोक्तावताराः । मूलरूपी कृष्णः स्वयमेव ।'जीवास्तत्प्रतिबिम्बांशा वराहाद्याः स्वयं हरिः ।दृश्यते बहुधा विष्णुरैश्वर्यादेक एव तु। इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ २८ ॥
एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः ।मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥
एतत् जडरूपम् ।'नारायणवराहाद्याः परमं रूपमीशितुः ।जैवं तु प्रतिबिम्बाख्यं जडमारोपितं हरेः ॥एवं हि त्रिविधं तस्य रूपं विष्णोर्महात्मनः। इति पाद्मे ॥ ३० ॥
यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१ ॥
दृश्यत्वं जडरूपत्वम् ।'अविज्ञाय परं देहमानन्दात्मानमव्ययम् ।आरोपयन्ति जनिमत् पञ्चभूतात्मकं जडम्। इति स्कान्दे ॥ ३१ ॥
अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः ॥ ३२ ॥
अतः परं जडेश्वररूपयोः परम् । अव्यूढगुणबृंहितंं अनादिकाले कदाचिदप्य-नपगतसत्वादिगुणबृंहितम् । अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् पुनर्भवः ॥ ३२ ॥
यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा ।अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥
अविद्यया जीवे कृते परमेश्वरे प्रतिषिद्धे इति ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥
यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः ।सम्पन्न एवेति विदुर्महिमि्न स्वे महीयते ॥ ३४ ॥
विशारदः परमेश्वरः । तन्मतिः माया । यदा नैनं शोचयामीत्युपरता तदा सम्पन्न एव ॥ ३४ ॥
एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥
'अप्रयत्नात् स्वतन्त्रत्वात् फलानां च विवर्जनात् ।क्रियायाश्च स्वरूपत्वादकर्तेति च तं विदुः ॥कर्तृत्वं भ्रान्तिजं प्राहुरतत्तत्त्वविदो जनाः ।ऐश्वर्यजं तु कर्तृत्वं सम्यक् तत्तत्त्ववेदिनः। इति पाद्मे ३५ ॥
इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥ ४० ॥
'धर्मः कं शरणं गतःइत्यस्य तमेव व्यासरूपिणमिति परिहार उच्यते– 'इदं भागवतम्इत्यादिना ॥ ४० ॥