Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S10: Difference between revisions
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== दशमोऽध्यायः == | == दशमोऽध्यायः == | ||
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'अमात्या मन्त्रिणो दूताः श्रेणयश्च पुरोहिताः ।पुरं जनपदं चेति सप्त प्रणिधयः स्मृताः''। इति ब्राह्मे ॥ ४ ॥ | |||
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'पालनानुग्रहजयान् गौणेऽण्डे संस्थितो हरिः ।करोत्यसौ बहिःसंस्थो न करोतीव निर्गुणः''। इति पाद्मे ॥अतो नानुरूपानुरूपाश्च ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line5 = निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु ॥ २२ ॥ | |||
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सत्वादिशक्तिषु ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line2 = स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् । | |||
| verse_line3 = अनामरूपात्मनि रूपनामनी | |||
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'श्रीर्भूर्दुर्गेति या भिन्ना जीवमाया महात्मनः ।आत्ममाया तदिच्छा स्याद् गुणमाया जडात्मिका''।इति महासंहितायाम् ॥'अप्रसिद्धेस्तद्गुणानामनामाऽसौ प्रकीर्तितः ।अप्राकृतत्वात् रूपस्याप्यरूपोऽसावुदीर्यते''। इति वासुदेवाध्यात्मे ॥२३॥ | |||
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| verse_line4 = भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे ॥ २६ ॥ | |||
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सात्त्विकानामनुग्राहकः ।'अगुणोऽपि परो देवो ह्यनुगृह्णाति सात्त्विकान् ।देवांस्तु मानवान् मध्यानुपेक्ष्य क्लेश्यतेऽसुरान्''। इति ब्रह्मदर्शने ।'सात्त्वतः सात्त्विकस्नेहात् सत्त्वो ह्यानन्दरूपतः''इति ब्रह्मवैवर्ते ।'धारकत्वाद्धर्मरूपो ह्यैश्वर्यादेर्भगो ह्यसौ ।सत्य आनन्दरूपत्वादृतो ज्ञानस्वरूपतः ॥यशो ह्यलं प्रसिद्धत्वाद् दया हि करुणाकरः''। इति तन्त्रभागवते ।एवंविधगुणस्वरूपाणि रूपाणि दधद् युगे युगे ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं | |||
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| verse_line3 = यासां गृहात्पुष्करलोचनः पतिः | |||
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'अग्निपुत्रा महात्मानस्तपसा स्त्रीत्वमापिरे ।भर्तारं च जगद्योनिं वासुदेवमजं विभुम्''। इति महाकौर्मे ॥ ३१ ॥ | |||
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स्नेहमात्रात् ॥ ३३ ॥ | |||
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गविष्ठ आदित्यः ।'असौ वाव गविष्ठोऽप्सूदेत्यप्स्वस्तमेति''इति माध्यन्दिनायनश्रुतिः ॥ ३७ ॥ | |||
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कुरूणां मधूनां च नः ॥ ४६ ॥ | |||
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तदाश्रया बुद्धिः । तज्ज्ञानिनामपि प्रकृतिस्थानां न तत्सङ्गः । किमु तस्येति व्यत्यासदृष्टान्तः ।'व्यत्यासोऽनन्वयश्चैव प्रसिद्धोऽभूत एव च ।सर्वसंहारिकश्चेति दृष्टान्तः पञ्चधा स्मृतः''। इति ब्राह्मे ॥ ७५ ॥ | |||
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| verse_line1 = तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः । | |||
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मतयो यथा यथामति मेनिरे ॥ ७६ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥}} | |||
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Revision as of 05:32, 8 April 2026
दशमोऽध्यायः
निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितंप्रवृत्तिविज्ञानविधूतविभ्रमः।
'अमात्या मन्त्रिणो दूताः श्रेणयश्च पुरोहिताः ।पुरं जनपदं चेति सप्त प्रणिधयः स्मृताः। इति ब्राह्मे ॥ ४ ॥
अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः ।नानुरूपाऽनुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ २० ॥
'पालनानुग्रहजयान् गौणेऽण्डे संस्थितो हरिः ।करोत्यसौ बहिःसंस्थो न करोतीव निर्गुणः। इति पाद्मे ॥अतो नानुरूपानुरूपाश्च ॥ २० ॥
स्त्रिय ऊचुः—स वै किलायं पुरुषः पुरातनो
सत्वादिशक्तिषु ॥ २२ ॥
स एव भूयो निजवीर्यचोदितांस्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।
'श्रीर्भूर्दुर्गेति या भिन्ना जीवमाया महात्मनः ।आत्ममाया तदिच्छा स्याद् गुणमाया जडात्मिका।इति महासंहितायाम् ॥'अप्रसिद्धेस्तद्गुणानामनामाऽसौ प्रकीर्तितः ।अप्राकृतत्वात् रूपस्याप्यरूपोऽसावुदीर्यते। इति वासुदेवाध्यात्मे ॥२३॥
यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाःजीवन्ति तत्रैष हि सात्वतः किल ।
सात्त्विकानामनुग्राहकः ।'अगुणोऽपि परो देवो ह्यनुगृह्णाति सात्त्विकान् ।देवांस्तु मानवान् मध्यानुपेक्ष्य क्लेश्यतेऽसुरान्। इति ब्रह्मदर्शने ।'सात्त्वतः सात्त्विकस्नेहात् सत्त्वो ह्यानन्दरूपतःइति ब्रह्मवैवर्ते ।'धारकत्वाद्धर्मरूपो ह्यैश्वर्यादेर्भगो ह्यसौ ।सत्य आनन्दरूपत्वादृतो ज्ञानस्वरूपतः ॥यशो ह्यलं प्रसिद्धत्वाद् दया हि करुणाकरः। इति तन्त्रभागवते ।एवंविधगुणस्वरूपाणि रूपाणि दधद् युगे युगे ॥ २६ ॥
एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समंनिरस्तशोकं बत साधु कुर्वते ।
'अग्निपुत्रा महात्मानस्तपसा स्त्रीत्वमापिरे ।भर्तारं च जगद्योनिं वासुदेवमजं विभुम्। इति महाकौर्मे ॥ ३१ ॥
अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः ।परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात् प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम् ॥ ३३ ॥
स्नेहमात्रात् ॥ ३३ ॥
तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः ।सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥ ३७ ॥
गविष्ठ आदित्यः ।'असौ वाव गविष्ठोऽप्सूदेत्यप्स्वस्तमेतिइति माध्यन्दिनायनश्रुतिः ॥ ३७ ॥
यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान्कुरून् मधून् वाऽथ सुहृद्दिदृक्षया ।
कुरूणां मधूनां च नः ॥ ४६ ॥
यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः ।न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ७५ ॥
तदाश्रया बुद्धिः । तज्ज्ञानिनामपि प्रकृतिस्थानां न तत्सङ्गः । किमु तस्येति व्यत्यासदृष्टान्तः ।'व्यत्यासोऽनन्वयश्चैव प्रसिद्धोऽभूत एव च ।सर्वसंहारिकश्चेति दृष्टान्तः पञ्चधा स्मृतः। इति ब्राह्मे ॥ ७५ ॥
तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः ।अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ७६ ॥
मतयो यथा यथामति मेनिरे ॥ ७६ ॥