Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S21: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
एकविंशोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच–दैवेन दुर्वितर्क्येण परेणानिमिषेण च ।
'सृष्टौ लये तारतम्यं देवानां ज्ञायते स्फुटम् ।तारतम्यपरिज्ञाने महातात्पर्यमिष्यते ॥अतस्तद्बहुशस्तूक्तमन्यच्चैतत्प्रकाशकम्॥ इति वामने ।'महतो ब्रह्मवायू च तद्भार्ये चाभिमानिनः ।अहमः शेषवीन्द्रौ च रुद्रेन्द्रौ कामतत्स्त्रियः ॥मनसस्त्वनिरुद्धश्च चन्द्रश्चान्ये यथोदितम् ।एवं क्रमो व्यत्ययस्तु सूक्ष्मस्थूलविभेदतः ॥सृष्टौ गुणे च ज्ञानादौ मुक्तिस्थे वाप्ययं क्रमः ।नियमेनान्यथोक्तिस्तु मोहायासुरजन्मनाम्॥ इति वाराहे ॥ १२ ॥
रजः प्रधानान्महतस्त्रिलिङ्गो दैवचोदितात् ।जातः ससर्ज भूतादिर्वियदादीनि पञ्च च ॥ १३ ॥
सोऽशयिष्टाधिसलिल आण्डकोशो निरात्मकः ।साग्रं वै वर्षसाहस्रमन्ववात्सीत् तमीश्वरः ॥ १५ ॥
निरात्मकः न व्यक्तस्तत्रात्मा ॥ १५ ॥
सोऽनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये ।लोकसंस्थां यथापूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया ॥ १७ ॥
संस्थया स्वया भगवति स्थितसामर्थ्येन ॥ १७ ॥
देवस्तानाह संविग्नो मा मा जक्षत रक्षत ।अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं भविष्यथ ॥ २१ ॥
देवताः प्रभया या या दिव्याः प्रमुखतोऽसृजत् ।तेऽहार्षुर्देवयन्तोऽपि विसृष्टां तां प्रभामहः ॥ २२ ॥
देवोऽदेवान् जघनतः सृजति स्मातिलोलुपान् ।त एनं लोलुपतया मैथुनायाभिपेदिरे ॥ २३ ॥
ततो हसन् स भगवानसुरैर्निरपत्रपैः ।अन्वीयमानस्तरसा क्रुद्धो भीतः परापतत् ॥ २४ ॥
'जानन्नपि समर्थोऽपि क्वचिद्ब्रह्मा हरेः प््रिायम् ।ज्ञात्वा करोति कर्माणि ह्यज्ञवच्चाप्यशक्तवत्॥ इति च ॥ २१-२४ ॥
सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः ।विमुञ्चात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह ॥ २८ ॥
'व्यसृजन्मलवद्देहं बाह्यं न तु निजं पुरा ।ब्रह्मा तच्चाहरादित्वं प्राप देवादिदैवतम्॥ इति कौर्मे ॥ २८ ॥
ऊर्जस्वन्तं मन्यमान आत्मानं भगवानजः ।साध्यान् गणान् पितृगणान् परोक्षेणासृजत् प्रभुः ॥ ४२ ॥
'ऊर्जं सारान्नमुद्दिष्टं तद्देवपितृभक्षणम्। इति ब्राह्मे ॥ ४२ ॥
स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः ।तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ॥ ४९ ॥
तेभ्यः स व्यसृजद् देहं परः पुरुष आत्मनः ।तां दृष्ट्वा ये पुरा सृष्टाः प्रशशंसुः प्रजापतिम् ॥ ५० ॥
ये पुरा सृष्टा देवाः ।'दृष्ट्वा तु पौरुषीं सृष्टिं देवाः सुकृतमूचिरे इति च ॥ ४९-५० ॥
तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना ।आदावृषीन् हृषीकेशः ससर्जाभिमताः प्रजाः ॥ ५२ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः ॥
'यत्रापि तु हरेर्नाम तदन्यत्र प्रयुज्यते ।तदान्तरहरेस्तत्र गृहीतिर्नान्यथा भवेत् ॥स्वातन्त्र्यादवरत्वं च परस्यापि प्रयुज्यते ।स्थितस्यापि यथा राज्ञः स्वानां जयपराजयौ॥ इति पाद्मे ॥अतो हृषीकेशो ब्रह्मान्तर्यामी ॥ ५२ ॥