Chandogya/C1: Difference between revisions
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| verse_line1 = ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = एषां भूतानां पृथिवी रसः । पृथिव्या आपो रसः । अपामोषधयो रसः । ओषधीनां पुरुषो रसः । पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रसः । ऋचः साम रसः । साम्न उद्गीथो रसः । स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = एषां भूतानां पृथिवी रसः । पृथिव्या आपो रसः । अपामोषधयो रसः । ओषधीनां पुरुषो रसः । पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रसः । ऋचः साम रसः । साम्न उद्गीथो रसः । स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = कतमा कतमकर््, कतमत् कतमत् साम, कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति । वागेवकर््, प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = कतमा कतमकर््, कतमत् कतमत् साम, कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति । वागेवकर््, प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च ऋक् च साम च । तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च ऋक् च साम च । तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य काममापयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य काममापयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् । यदि्ध किञ्चानुजानात्योमित्येव तदा हैष उ एव समृदि्धर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् । यदि्ध किञ्चानुजानात्योमित्येव तदा हैष उ एव समृदि्धर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते । ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै । महिम्ना रसेन तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते । ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै । महिम्ना रसेन तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = नाना तु विद्या चाविद्या च । यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति । इति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति । अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीत । तस्येतरैः प्राणैरुपव्याख्यानं भवति ॥ ८१ ॥ | | verse_line1 = नाना तु विद्या चाविद्या च । यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति । इति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति । अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीत । तस्येतरैः प्राणैरुपव्याख्यानं भवति ॥ ८१ ॥ | ||
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| verse_line1 = देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुः । अनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुः । अनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तंहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तंहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ ह मन उद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं सङ्कल्पयते सङ्कल्पनीयं चासङ्कल्पनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अथ ह मन उद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं सङ्कल्पयते सङ्कल्पनीयं चासङ्कल्पनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ ह य एवायं मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = अथ ह य एवायं मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसत एवं हैव स विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माऽऽखणः ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसत एवं हैव स विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माऽऽखणः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येषः । तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान् प्राणानवत्येतमु एवान्ततो वित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येषः । तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान् प्राणानवत्येतमु एवान्ततो वित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = तं हाङ्गिरा उद्गीथमुपासाञ्चक्रे एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसस्तेन ॥ १० ॥ | | verse_line1 = तं हाङ्गिरा उद्गीथमुपासाञ्चक्रे एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसस्तेन ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते । वाग्घि बृहती तस्या एष पतिस्तेन ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते । वाग्घि बृहती तस्या एष पतिस्तेन ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = तं हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते तेन ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = तं हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते तेन ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = तेन तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = तेन तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_line1 = आगता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥ २ ॥ | | verse_line1 = आगता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीत । उद्यन् वा एष प्रजाभ्य उद्गायत्युद्यंस्तमो भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीत । उद्यन् वा एष प्रजाभ्य उद्गायत्युद्यंस्तमो भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ | | verse_line1 = समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन् वाचमभिव्याहरति या वाक् सा ऋक् तस्मात् अप्राणन्ननपानन् ऋचमभिव्याहरति या ऋक् तत्साम तस्मादप्राणन्ननपानन् साम गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन् उद्गायति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन् वाचमभिव्याहरति या वाक् सा ऋक् तस्मात् अप्राणन्ननपानन् ऋचमभिव्याहरति या ऋक् तत्साम तस्मादप्राणन्ननपानन् साम गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन् उद्गायति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानन् तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमोवोद्गीथमुपासीत ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानन् तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमोवोद्गीथमुपासीत ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद् गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो हि गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितं द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थं सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद् गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो हि गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितं द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थं सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ खल्वाशीः समृदि्धरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन् स्यात् तत्सामोपधावेद्यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन् स्यात् तां देवतामुपधावेद्येन च्छन्दसा स्तोष्यन् स्यात् तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात् तं स्तोममुपधावेद्यां दिशमभिष्टोष्यन् स्यात् तां दिशमुपधावेदात्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥६॥३॥ | | verse_line1 = अथ खल्वाशीः समृदि्धरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन् स्यात् तत्सामोपधावेद्यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन् स्यात् तां देवतामुपधावेद्येन च्छन्दसा स्तोष्यन् स्यात् तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात् तं स्तोममुपधावेद्यां दिशमभिष्टोष्यन् स्यात् तां दिशमुपधावेदात्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥६॥३॥ | ||
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| verse_line1 = एतमु एवाहमभ्यागासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयताद् बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | | verse_line1 = एतमु एवाहमभ्यागासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयताद् बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = एतमु एवाहमभ्यागासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणांस्त्वं भूमानमभिगायताद् बहवो वै ते भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = एतमु एवाहमभ्यागासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणांस्त्वं भूमानमभिगायताद् बहवो वै ते भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते इयमेव साग्निरमस्तत्साम ॥ १ ॥ | | verse_line1 = इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते इयमेव साग्निरमस्तत्साम ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = अन्तरिक्षमेवर्ग्वायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत् साम ॥ २ ॥ | | verse_line1 = अन्तरिक्षमेवर्ग्वायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत् साम ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = द्यौरेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते द्यौरेव सादित्योऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = द्यौरेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते द्यौरेव सादित्योऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = नक्षत्राण्येवकः चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत् साम ॥४॥ | | verse_line1 = नक्षत्राण्येवकः चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत् साम ॥४॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साम यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत् साम ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साम यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत् साम ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति । नाम स एषः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः उदितः उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति । नाम स एषः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः उदितः उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्यर्क्च साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात् त्वेवोद्गातैतस्य हि गाता स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = तस्यर्क्च साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात् त्वेवोद्गातैतस्य हि गाता स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथाध्यात्मं वागेवकः प्राणः साम तदेतदेस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथाध्यात्मं वागेवकः प्राणः साम तदेतदेस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते चक्षुरेव साप्राणोऽमस्तत् साम ॥ २ ॥ | | verse_line1 = चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते चक्षुरेव साप्राणोऽमस्तत् साम ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रोत्रमेवङ्गर््मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = श्रोत्रमेवङ्गर््मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत् साम ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत् साम ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवकः तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावदमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवकः तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावदमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात् ते धनसनयः ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात् ते धनसनयः ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ य देतदेवं विद्वान् साम गायत्युभौ साम गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति देवकामास्तांश्च ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = अथ य देतदेवं विद्वान् साम गायत्युभौ साम गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति देवकामास्तांश्च ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = कं ते काममागायानीत्येष ह्येष कामगानस्येष्टे य एवं विद्वान् साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = कं ते काममागायानीत्येष ह्येष कामगानस्येष्टे य एवं विद्वान् साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यः चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैबिलिरिति । ते होचुरुद्गीथे ये कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यः चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैबिलिरिति । ते होचुरुद्गीथे ये कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति पृच्छेति होवाच का साम्नो गतिरिति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति पृच्छेति होवाच का साम्नो गतिरिति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = स्वर इति होवाच स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाचापां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति॥ ३ ॥ | | verse_line1 = स्वर इति होवाच स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाचापां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गसंस्तावं हि सामेति । तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यं उवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥४॥ | | verse_line1 = न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गसंस्तावं हि सामेति । तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यं उवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥४॥ | ||
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| chapter_id = CHU_C01 | | chapter_id = CHU_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवाचास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति । तं ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यत्स्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥ ५ ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवाचास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति । तं ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यत्स्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥ ५ ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणं स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणं स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वान् परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते । तं हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रयाजमुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोक इति स य एतमेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ २ ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वान् परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते । तं हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रयाजमुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोक इति स य एतमेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ २ ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = मटचीहतेषु कुरुष्वाटक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास स हेभ्यं कुल्माषान् खादन्तं बिभिक्षे ॥ १ ॥ | | verse_line1 = मटचीहतेषु कुरुष्वाटक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास स हेभ्यं कुल्माषान् खादन्तं बिभिक्षे ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = तं होवाच नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इत्येतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तं होवाच नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इत्येतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = न वा अजीविष्यमिमान् अखादन्निति होवाच कामो म उदपानमिति स ह खादित्वातिशेषान् जायाय आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान् प्रतिगृह्य निदधौ स ह प्रातः संिजहान उवाच यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = न वा अजीविष्यमिमान् अखादन्निति होवाच कामो म उदपानमिति स ह खादित्वातिशेषान् जायाय आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान् प्रतिगृह्य निदधौ स ह प्रातः संिजहान उवाच यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान् खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोप विवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासाञ्चक्रिरे ॥ ४ ॥ १० ॥ | | verse_line1 = तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान् खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोप विवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासाञ्चक्रिरे ॥ ४ ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैशिषं भगवतो वा अहमवित्त्याऽन्यानवृषि भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैशिषं भगवतो वा अहमवित्त्याऽन्यानवृषि भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = तथेत्यथ तर्ह्येत एव महतिसृष्टास्तुवन्तां यावत्तेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तथेत्यथ तर्ह्येत एव महतिसृष्टास्तुवन्तां यावत्तेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् उद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यादित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेत्यथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यन्नमिति होवाच ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् उद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यादित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेत्यथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यन्नमिति होवाच ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ६ ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ६ ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = तान् होवाचेहैव सा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिञ्चक्रुरो३मदा३मोम्पिबा३मों देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा३हरदन्नपते३न्नमिहा३हराऽहरोमिति ॥ २ ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = तान् होवाचेहैव सा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिञ्चक्रुरो३मदा३मोम्पिबा३मों देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा३हरदन्नपते३न्नमिहा३हराऽहरोमिति ॥ २ ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = अयं वाव लोको हावुकारो वायुर्हायिकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकार आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं याया वाग्विराडनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुप्कारो दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ १ ॥ १३ ॥ ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमोऽध्यायः ॥ | | verse_line1 = अयं वाव लोको हावुकारो वायुर्हायिकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकार आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं याया वाग्विराडनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुप्कारो दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ १ ॥ १३ ॥ ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमोऽध्यायः ॥ | ||
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{{ | {{Commentary | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ | |||
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