Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S9: Difference between revisions
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| verse_line1 = वासो बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि । | | verse_line1 = वासो बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि । | ||
| verse_line2 = एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = तदेवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा । यथेषुकारो नृपतिं व््राजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = तदेवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा । यथेषुकारो नृपतिं व््राजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_line1 = सत्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः । | | verse_line1 = सत्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः । | ||
| verse_line2 = परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ॥ १८ ॥ | ||
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| verse_line1 = कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः । | | verse_line1 = कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः । | ||
| verse_line2 = याति तत्साम्यतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन् ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = याति तत्साम्यतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन् ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- र्बिभ््रात् स्म सत्वनिधनं सततात्युदर्कम् । तत्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- र्बिभ््रात् स्म सत्वनिधनं सततात्युदर्कम् । तत्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन् । सोऽन्ते सुकृच्छ्रमवरुद्धमनाः स्वदेहं सृष्ट्वा स्वबीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन् । सोऽन्ते सुकृच्छ्रमवरुद्धमनाः स्वदेहं सृष्ट्वा स्वबीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 153: | Line 157: | ||
| verse_line1 = न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् । | | verse_line1 = न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् । | ||
| verse_line2 = ब््राह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = ब््राह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१ ॥ | ||
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