Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S13: Difference between revisions
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| title = त्रयोदशोऽध्यायः | | title = त्रयोदशोऽध्यायः | ||
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| verse_id = BTN_C11_S13_V02 | | verse_id = BTN_C11_S13_V02 | ||
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| verse_line1 = सत्वाद् धर्मो भवेच्छुद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः । | | verse_line1 = सत्वाद् धर्मो भवेच्छुद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः । | ||
| verse_line2 = सात्विकोपात्तया ज्ञानं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ २ ॥ | | verse_line2 = सात्विकोपात्तया ज्ञानं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ २ ॥ | ||
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| Line 31: | Line 30: | ||
| verse_line1 = वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् । | | verse_line1 = वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् । | ||
| verse_line2 = एवं गुणव्यत्ययजो वेदः शाम्यति तद् यथा ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = एवं गुणव्यत्ययजो वेदः शाम्यति तद् यथा ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 57: | Line 57: | ||
| verse_line1 = स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारविनिश्चयम् । | | verse_line1 = स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारविनिश्चयम् । | ||
| verse_line2 = तस्याहं हंसरूपेण समीपमगमं तदा ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = तस्याहं हंसरूपेण समीपमगमं तदा ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 75: | Line 76: | ||
| verse_line1 = वस्तुनो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्नः ईदृशः । | | verse_line1 = वस्तुनो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्नः ईदृशः । | ||
| verse_line2 = कथं घटेत वो विप्रा वक्तुं वाऽनेक आश्रयः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = कथं घटेत वो विप्रा वक्तुं वाऽनेक आश्रयः ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 93: | Line 95: | ||
| verse_line1 = पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः । | | verse_line1 = पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः । | ||
| verse_line2 = को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो निरर्थकः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो निरर्थकः ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 111: | Line 114: | ||
| verse_line1 = मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । | | verse_line1 = मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । | ||
| verse_line2 = अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुद्ध्यध्वमञ्जसा ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुद्ध्यध्वमञ्जसा ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 129: | Line 133: | ||
| verse_line1 = गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः । | | verse_line1 = गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः । | ||
| verse_line2 = जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 147: | Line 152: | ||
| verse_line1 = गुणेषु वाऽऽविशेच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया । | | verse_line1 = गुणेषु वाऽऽविशेच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया । | ||
| verse_line2 = गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 165: | Line 171: | ||
| verse_line1 = यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तितः । | | verse_line1 = यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तितः । | ||
| verse_line2 = मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तु गुणचेतसाम् ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तु गुणचेतसाम् ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 183: | Line 190: | ||
| verse_line1 = यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः । | | verse_line1 = यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः । | ||
| verse_line2 = जाग््रात्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = जाग््रात्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 201: | Line 209: | ||
| verse_line1 = असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां किंकृताऽभिदा । | | verse_line1 = असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां किंकृताऽभिदा । | ||
| verse_line2 = गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 218: | Line 227: | ||
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| verse_line1 = यो जागरे बहुविधान् क्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणो हृदि तत्सदृक्षान् । स्वप्नेऽथ सुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात् त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = यो जागरे बहुविधान् क्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणो हृदि तत्सदृक्षान् । स्वप्नेऽथ सुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात् त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥ ३२ ॥ | ||
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| Line 235: | Line 245: | ||
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| verse_line1 = वीक्षेत विभ््राममिमं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् । विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया स्वप्ने यथा त्रिगुणसर्गकृतो विकल्पः ॥ ३४ ॥ | | verse_line1 = वीक्षेत विभ््राममिमं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् । विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया स्वप्ने यथा त्रिगुणसर्गकृतो विकल्पः ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 252: | Line 263: | ||
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| verse_line1 = दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततर्ष- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः । सन्दृश्यते क्वच यदीदमवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ््रामाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततर्ष- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः । सन्दृश्यते क्वच यदीदमवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ््रामाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ ३५ ॥ | ||
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| Line 269: | Line 281: | ||
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| verse_line1 = देहं च नश्वरमवस्थितमुज्झितं च सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिवृतं मदिरामदान्धः ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = देहं च नश्वरमवस्थितमुज्झितं च सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिवृतं मदिरामदान्धः ॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 286: | Line 299: | ||
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| verse_line1 = देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रति समीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवत् सः ॥ ३७ ॥ | | verse_line1 = देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रति समीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवत् सः ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 304: | Line 318: | ||
| verse_line1 = मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् । | | verse_line1 = मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् । | ||
| verse_line2 = सुहृदं परमात्मानं साम्यासङ्गादयो गुणाः ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = सुहृदं परमात्मानं साम्यासङ्गादयो गुणाः ॥ ४० ॥ | ||
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