Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S28: Difference between revisions
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| title = अष्टाविंशोऽध्यायः | | title = अष्टाविंशोऽध्यायः | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रंशते स्थानादसत्याभिनिवेशतः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रंशते स्थानादसत्याभिनिवेशतः ॥ २ ॥ | ||
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| Line 38: | Line 37: | ||
| verse_line1 = तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः । | | verse_line1 = तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः । | ||
| verse_line2 = मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्धि नानार्थदं मनः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्धि नानार्थदं मनः ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = कि ं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् । | | verse_line1 = कि ं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् । | ||
| verse_line2 = वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 74: | Line 75: | ||
| verse_line1 = छायाप्रत्युदकाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः । | | verse_line1 = छायाप्रत्युदकाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः । | ||
| verse_line2 = एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 124: | Line 126: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ १० ॥ | | verse_line1 = प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ १० ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 168: | Line 172: | ||
| verse_line1 = यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थकृत् । | | verse_line1 = यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थकृत् । | ||
| verse_line2 = स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 186: | Line 191: | ||
| verse_line1 = शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः । | | verse_line1 = शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः । | ||
| verse_line2 = अहङ्कारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नाऽत्मनः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = अहङ्कारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नाऽत्मनः ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेह गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेह गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 220: | Line 227: | ||
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| verse_line1 = अमूलमेतद् बहुरूपरूपं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = अमूलमेतद् बहुरूपरूपं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 238: | Line 246: | ||
| verse_line1 = ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् । | | verse_line1 = ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् । | ||
| verse_line2 = आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥१९॥ | | verse_line2 = आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥१९॥ | ||
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| Line 256: | Line 265: | ||
| verse_line1 = यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य । | | verse_line1 = यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य । | ||
| verse_line2 = तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ २० ॥ | | verse_line2 = तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ २० ॥ | ||
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| Line 274: | Line 284: | ||
| verse_line1 = विज्ञानमेतत् त्रिपदस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ । | | verse_line1 = विज्ञानमेतत् त्रिपदस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ । | ||
| verse_line2 = समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 291: | Line 302: | ||
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| verse_line1 = न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥ | | verse_line1 = न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 308: | Line 320: | ||
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| verse_line1 = अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 325: | Line 338: | ||
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| verse_line1 = नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः स्वं कृतिरर्थसाम्यम् ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः स्वं कृतिरर्थसाम्यम् ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 358: | Line 372: | ||
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| verse_line1 = तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत तमःकषायम् ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत तमःकषायम् ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 375: | Line 390: | ||
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| verse_line1 = तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुद्यन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुद्यन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३२ ॥ | ||
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| Line 392: | Line 408: | ||
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| verse_line1 = यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३३ ॥ | | verse_line1 = यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 409: | Line 426: | ||
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| verse_line1 = पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३४ ॥ | | verse_line1 = पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 426: | Line 444: | ||
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| verse_line1 = एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामो येनेरिता वाग्रचनाश्चरन्ति ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामो येनेरिता वाग्रचनाश्चरन्ति ॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 444: | Line 463: | ||
| verse_line1 = एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले । | | verse_line1 = एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले । | ||
| verse_line2 = आत्माऽमृते स्वमात्मानमचलं यन्न पश्यति ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = आत्माऽमृते स्वमात्मानमचलं यन्न पश्यति ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 462: | Line 482: | ||
| verse_line1 = यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम् । | | verse_line1 = यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम् । | ||
| verse_line2 = व्यर्थो नाप्यर्थवादोऽयं द्वयं विन्दन्ति सूरयः ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = व्यर्थो नाप्यर्थवादोऽयं द्वयं विन्दन्ति सूरयः ॥ ३८ ॥ | ||
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