Aitareya/C2/S4: Difference between revisions
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एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह । | एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह । | ||
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स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥ | स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥ | ||
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पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिमच्युतः ॥ | पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिमच्युतः ॥ | ||
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एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् । | एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् । | ||
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... विशतेति स चाब्रवीत् । | ... विशतेति स चाब्रवीत् । | ||
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अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् । | अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् । | ||
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पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति । | पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति । | ||
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... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः । | ... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः । | ||
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देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ॥ | देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ॥ | ||
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इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः । | इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः । | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥ | ||
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स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ॥ | स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ॥ | ||
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आततगुणत्वादात्मा नारायणः । ब्रह्म पन्थाः सत्यं कर्मेति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च । | आततगुणत्वादात्मा नारायणः । ब्रह्म पन्थाः सत्यं कर्मेति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च । | ||
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मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । | मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । | ||
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मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम् इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्य बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि य एष तपतीत्यादिना बहुशोऽभ्यासाच्च । सूर्यो हि हिरण्याक्षः । सविता देव आगादिति पिङ्गलाक्षः प्रसिद्धः । | मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम् इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्य बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि य एष तपतीत्यादिना बहुशोऽभ्यासाच्च । सूर्यो हि हिरण्याक्षः । सविता देव आगादिति पिङ्गलाक्षः प्रसिद्धः । | ||
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विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः । | विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः । | ||
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यो देवानां नामधा एक एव । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः । | यो देवानां नामधा एक एव । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः । | ||
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णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेत्यादिनान्तेऽपि विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च । | णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेत्यादिनान्तेऽपि विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च । | ||
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आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | ||
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एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । | एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । | ||
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अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैरित्यर्थः । तत्र हेतुस्तदन्यत् ककिञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीदित्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवदासीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं ककिञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव । | अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैरित्यर्थः । तत्र हेतुस्तदन्यत् ककिञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीदित्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवदासीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं ककिञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव । | ||
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उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः । | उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः । | ||
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नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । इति च भारते । | नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । इति च भारते । | ||
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सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलयेऽपि विद्यमानत्वादेव नाग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्वादन्येषामग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति । | सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलयेऽपि विद्यमानत्वादेव नाग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्वादन्येषामग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति । | ||
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प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । | प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । | ||
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ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । | ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । | ||
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आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । | आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । | ||
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गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । अं विष्णुं बिभर्तीत्यम्भो विष्णुलोको दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वादन्तरिक्षं मरीचयः । मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवी मरः । | गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । अं विष्णुं बिभर्तीत्यम्भो विष्णुलोको दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वादन्तरिक्षं मरीचयः । मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवी मरः । | ||
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भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः सुरान् प्रभुः । | भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः सुरान् प्रभुः । | ||
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या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवतास्ता आप इत्युच्यन्ते । आप इत्याप इतीति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्शब्देनोक्तेः । अयं पितैते पुत्रा इति च । आहं मां देवेभ्यो वेद ओमद्देवान् वेदेति च । | या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवतास्ता आप इत्युच्यन्ते । आप इत्याप इतीति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्शब्देनोक्तेः । अयं पितैते पुत्रा इति च । आहं मां देवेभ्यो वेद ओमद्देवान् वेदेति च । | ||
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ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । | ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । | ||
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अमूर्च्छयत् मूर्छिर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वेत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव । न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितो भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानामुपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्यामन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः । | अमूर्च्छयत् मूर्छिर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वेत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव । न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितो भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानामुपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्यामन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः । | ||
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नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । | नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । | ||
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एतमेव पुरुषं व्यासकृष्णकपिलराघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपमदर्शमेवाहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे । रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते इति पदविवेके । अपश्यदित्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम् । अभिव्यैख्यदित्यभिशब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः | एतमेव पुरुषं व्यासकृष्णकपिलराघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपमदर्शमेवाहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे । रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते इति पदविवेके । अपश्यदित्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम् । अभिव्यैख्यदित्यभिशब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः | ||
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प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । | प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । | ||
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परोक्षप्रिया इवेत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियं तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीतीवशब्दः ॥ ३ ॥ | परोक्षप्रिया इवेत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियं तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीतीवशब्दः ॥ ३ ॥ | ||