Upadhikhandanam: Difference between revisions
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नारायणोऽगण्यगुणनित्यैकनिलयाकृतिः । | |||
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अज्ञताऽखिलसंवेत्तुर्घटते न कुतश्चन । उपाधिभेदाद्धटत इति चेत् स स्वभावतः ॥2॥ | |||
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अज्ञानतो वा द्वैतस्य सत्यता स्वत एव चेत् । अनवस्थितिरज्ञानहेतौ वाऽन्योन्यसिद्धिता ॥3॥ | |||
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चक्रकापत्तिरथवा भेदश्चोपाधितः कुतः । विद्यमानस्य भेदस्य ज्ञापको नैव कारकः ॥4॥ | |||
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उपाधिर्दृष्टपूर्वो हि खेऽपि देशान्तरस्य सः । ज्ञापको विद्यमानस्य मूढबुद्धिव्यपेक्षया ॥5॥ | |||
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न चेदुपाधिसम्बन्ध एकदेशेऽथ सर्वगः । एकदेशेऽनवस्था स्यात् सर्वगश्चेन्न भेदकः ॥6॥ | |||
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सुखदुःखादिभोगश्च स्वरूपैक्ये न भेदतः । दृश्यो ह्युपाधिभेदेऽपि हस्तपादादिगो यथा ॥7॥ | |||
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नानादेहगभोगानुसन्धानं योगिनो यथा । न चेद्भोगानुसन्धानं तदिच्छा योगिनः कुतः ॥8॥ | |||
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अनुसन्धानरहितदेहबाहुल्यमन्यथा । सिद्धमेव हि तत्पक्षे विशेषो योगिनः कुतः ॥9॥ | |||
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सिद्धौ हि कर्मभेदस्य स्यादुपाधिविभिन्नता । तत्सिद्धौ चैव तत्सिद्धिरित्यन्योन्यव्यपाश्रयः ॥10॥ | |||
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आत्मस्वभावभेदस्य विदोषत्वेन चाखिलः । प्रत्यक्षादिविरोधाच्च दुष्टः पक्षोऽयमञ्जसा ॥11॥ | |||
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चेष्टालिङ्गेन सात्मत्वे परदेहस्य साधिते । अन्यत्वं स्वात्मनस्तस्मात् सर्वैरेवानुभूयते ॥12॥ | |||
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अज्ञता चाल्पशक्तित्वं दुःखित्वं स्वल्पकर्तृता । सर्वज्ञतादीशगुणविरुद्धा ह्यनुभूतिगाः ॥13॥ | |||
अज्ञता चाल्पशक्तित्वं दुःखित्वं स्वल्पकर्तृता । | |||
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सार्वज्ञादिगुणा विष्णोः श्रुतिषु प्रतिपादिताः । ‘सत्यः सो अस्य महिमे’(ऋ.सं.८.३.४)त्यादिवाक्यान्मृषा न च ॥14॥ | |||
सार्वज्ञादिगुणा विष्णोः श्रुतिषु प्रतिपादिताः । | |||
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न च वेदोक्तमिथ्यात्वे मानं तन्मानताऽपि न । अतोऽज्ञासम्भवादेव नाधिकार्यैक्यवादिनाम् ॥15॥ | |||
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अतो नाज्ञातमिति च विषयो विषयान्तरे । अज्ञाभावात् फलं कस्य योगः शशनृशृङ्गयोः ॥16॥ | |||
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दुर्घटत्वं भूषणं चेत् स्यादविद्यात्वमात्मनः । अन्धन्तमोऽप्यलङ्कारो नित्यदुःखं शिरोमणिः ॥17॥ | |||
दुर्घटत्वं भूषणं चेत् स्यादविद्यात्वमात्मनः । | |||
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अतो ‘परो मात्रये’(ऋ.सं.७.९९)ति पूर्वश्रुतिनिदर्शितः । | |||
अतो <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘परो मात्रये’(ऋ.सं.७.९९)</span></span>ति पूर्वश्रुतिनिदर्शितः । | |||
<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashwatropanishat-id">‘अन्यमीश’(श्वे.उ.४.७)</span></span>मिति श्रुत्या भिन्नजीवदृशं गतः ॥ भिन्नत्वेनात्मसादृश्यदो <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id">‘यदे’(आथ.उ.३.१.३)</span></span>ति श्रुतेः सदा ॥18॥ | |||
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मायावादतमोव्याप्तमिति तत्त्वदृशा जगत् । भातं सर्वज्ञसूर्येण प्रीतये श्रीपतेः सदा ॥19॥ | |||
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नमोऽमन्दनिजानन्दसान्द्रसुन्दरमूर्तये । इन्दिरापतये नित्याऽनन्दभोजनदायिने ॥20॥ | |||
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Revision as of 17:56, 20 April 2026
उपाधिखण्डनम्
नारायणोऽगण्यगुणनित्यैकनिलयाकृतिः ।
अशेषदोषरहितः प्रीयतां कमलालयः ॥1॥
अज्ञताऽखिलसंवेत्तुर्घटते न कुतश्चन ।
उपाधिभेदाद्धटत इति चेत् स स्वभावतः ॥2॥
अज्ञानतो वा द्वैतस्य सत्यता स्वत एव चेत् ।
अनवस्थितिरज्ञानहेतौ वाऽन्योन्यसिद्धिता ॥3॥
चक्रकापत्तिरथवा भेदश्चोपाधितः कुतः ।
विद्यमानस्य भेदस्य ज्ञापको नैव कारकः ॥4॥
उपाधिर्दृष्टपूर्वो हि खेऽपि देशान्तरस्य सः ।
ज्ञापको विद्यमानस्य मूढबुद्धिव्यपेक्षया ॥5॥
न चेदुपाधिसम्बन्ध एकदेशेऽथ सर्वगः ।
एकदेशेऽनवस्था स्यात् सर्वगश्चेन्न भेदकः ॥6॥
सुखदुःखादिभोगश्च स्वरूपैक्ये न भेदतः ।
दृश्यो ह्युपाधिभेदेऽपि हस्तपादादिगो यथा ॥7॥
नानादेहगभोगानुसन्धानं योगिनो यथा ।
न चेद्भोगानुसन्धानं तदिच्छा योगिनः कुतः ॥8॥
अनुसन्धानरहितदेहबाहुल्यमन्यथा ।
सिद्धमेव हि तत्पक्षे विशेषो योगिनः कुतः ॥9॥
सिद्धौ हि कर्मभेदस्य स्यादुपाधिविभिन्नता ।
तत्सिद्धौ चैव तत्सिद्धिरित्यन्योन्यव्यपाश्रयः ॥10॥
आत्मस्वभावभेदस्य विदोषत्वेन चाखिलः ।
प्रत्यक्षादिविरोधाच्च दुष्टः पक्षोऽयमञ्जसा ॥11॥
चेष्टालिङ्गेन सात्मत्वे परदेहस्य साधिते ।
अन्यत्वं स्वात्मनस्तस्मात् सर्वैरेवानुभूयते ॥12॥
अज्ञता चाल्पशक्तित्वं दुःखित्वं स्वल्पकर्तृता ।
सर्वज्ञतादीशगुणविरुद्धा ह्यनुभूतिगाः ॥13॥
सार्वज्ञादिगुणा विष्णोः श्रुतिषु प्रतिपादिताः ।
‘सत्यः सो अस्य महिमे’(ऋ.सं.८.३.४)त्यादिवाक्यान्मृषा न च ॥14॥
न च वेदोक्तमिथ्यात्वे मानं तन्मानताऽपि न ।
अतोऽज्ञासम्भवादेव नाधिकार्यैक्यवादिनाम् ॥15॥
अतो नाज्ञातमिति च विषयो विषयान्तरे ।
अज्ञाभावात् फलं कस्य योगः शशनृशृङ्गयोः ॥16॥
दुर्घटत्वं भूषणं चेत् स्यादविद्यात्वमात्मनः ।
अन्धन्तमोऽप्यलङ्कारो नित्यदुःखं शिरोमणिः ॥17॥
अतो ‘परो मात्रये’(ऋ.सं.७.९९)ति पूर्वश्रुतिनिदर्शितः ।
‘अन्यमीश’(श्वे.उ.४.७)मिति श्रुत्या भिन्नजीवदृशं गतः ॥ भिन्नत्वेनात्मसादृश्यदो ‘यदे’(आथ.उ.३.१.३)ति श्रुतेः सदा ॥18॥
मायावादतमोव्याप्तमिति तत्त्वदृशा जगत् ।
भातं सर्वज्ञसूर्येण प्रीतये श्रीपतेः सदा ॥19॥
नमोऽमन्दनिजानन्दसान्द्रसुन्दरमूर्तये ।
इन्दिरापतये नित्याऽनन्दभोजनदायिने ॥20॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितम् उपाधिखण्डनं समाप्तम् ॥