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Nyayavivaranam: Difference between revisions

From Anandamakaranda
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| title        = प्रथमः पादः
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चेतनाचेतनजगन्नियन्त्रेऽशेषसंविदे । नमो नारायणायाजशर्वशक्रादिवन्दित ॥1॥
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कृत्वा भाष्यानुभाष्येऽहमपि वेदार्थसत्पतेः। कृष्णस्य सूत्रानुव्याख्यासन्न्यायविवृत्तिं स्फुटम् ॥2॥
चेतनाचेतनजगन्नियन्त्रेऽशेषसंविदे ।
नमो नारायणायाजशर्वशक्रादिवन्दित ॥1॥
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करोमि मन्दबुद्धीनां बुधानां चोपकारिकाम्। प्रीत्यै तस्यैव देवस्य तत्प्रसादपुरःसरः ॥3॥
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कृत्वा भाष्यानुभाष्येऽहमपि वेदार्थसत्पतेः।
कृष्णस्य सूत्रानुव्याख्यासन्न्यायविवृत्तिं स्फुटम् ॥2॥
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करोमि मन्दबुद्धीनां बुधानां चोपकारिकाम्।  
प्रीत्यै तस्यैव देवस्य तत्प्रसादपुरःसरः ॥3॥
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=== जिज्ञासाधिकरणम् ===
=== जिज्ञासाधिकरणम् ===


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जीवव्यतिरिक्तेश्वरस्याभावात् तस्य च स्वप्रकाशत्वान्न जिज्ञास्यतेति प्राप्ते ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र.सू.१.१.१) इत्याह । ‘तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म’ इति ‘ब्रह्म’शब्देन पूर्णगुणत्वोक्तेर्नानुभवसिद्धाल्पगुणजीवाभेदः । ‘अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति। बृहन्तो ह्यस्मिन् गुणाः’ इति श्रुतेः(श्रुतेरिति) ॥1॥
जीवव्यतिरिक्तेश्वरस्याभावात् तस्य च स्वप्रकाशत्वान्न जिज्ञास्यतेति प्राप्ते ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र.सू.१.१.१) इत्याह । ‘तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म’ इति ‘ब्रह्म’शब्देन पूर्णगुणत्वोक्तेर्नानुभवसिद्धाल्पगुणजीवाभेदः । ‘अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति। बृहन्तो ह्यस्मिन् गुणाः’ इति श्रुतेः(श्रुतेरिति) ॥1॥
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न जीव एवायं ब्रह्मशब्दः । ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते’ इत्यादिना जन्मादिकारणत्वस्यैव ब्रह्मलक्षणत्वोक्तेः ॥2॥
न जीव एवायं ब्रह्मशब्दः । ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते’ इत्यादिना जन्मादिकारणत्वस्यैव ब्रह्मलक्षणत्वोक्तेः ॥2॥
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न च रुद्रादौ सममेतल्लक्षणम्। शास्त्रैकसमधिगम्यत्वात् कारणत्वस्य(कारणस्य) ॥3॥
न च रुद्रादौ सममेतल्लक्षणम्। शास्त्रैकसमधिगम्यत्वात् कारणत्वस्य(कारणस्य) ॥3॥
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न च पाशुपतशास्त्रोदितत्वादि शास्त्रप्रतिपाद्यत्वे कारणम्। किन्तूपक्रमादलिक्षणः समन्वय एव ॥4॥
न च पाशुपतशास्त्रोदितत्वादि शास्त्रप्रतिपाद्यत्वे कारणम्। किन्तूपक्रमादलिक्षणः समन्वय एव ॥4॥
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न च तस्यावाच्यत्वं श्रुत्यभिप्रायः । ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ इत्यादि श्रुतिसहितानुभवस्य बलवत्वात् ॥5॥
न च तस्यावाच्यत्वं श्रुत्यभिप्रायः । ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ इत्यादि श्रुतिसहितानुभवस्य बलवत्वात् ॥5॥
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न चावयवत्वविरोधः ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इति(इत्यादि) श्रुतेरवयवाद्यभेदात् ॥6॥
न चावयवत्वविरोधः ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इति(इत्यादि) श्रुतेरवयवाद्यभेदात् ॥6॥
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न च- ‘ब्रह्मेन्द्रमग्निं जगतः प्रतिष्ठां दिव आत्मानं सवितारं बृहस्पतिम्। चतुर्होतारं प्रदिशोऽनुक्लृप्तं वाचो वीर्यं तपसाऽन्वविन्दत् ।’ इत्यादि शब्दानामन्यविषयत्वम् । श्रुतिसन्देेहेऽनन्यथासिद्धलिङ्गेन निर्णयोपपत्तेः ॥7॥
 
न च-  
‘ब्रह्मेन्द्रमग्निं जगतः प्रतिष्ठां दिव आत्मानं सवितारं बृहस्पतिम्।
चतुर्होतारं प्रदिशोऽनुक्लृप्तं वाचो वीर्यं तपसाऽन्वविन्दत् ।’
इत्यादि शब्दानामन्यविषयत्वम् । श्रुतिसन्देेहेऽनन्यथासिद्धलिङ्गेन निर्णयोपपत्तेः ॥7॥
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अधिभूताध्यात्माधिवेदगतानामपि शब्दानाम् अचेतनत्वजीवान्वयव्यतिरेकित्वनित्यत्वेषु(चेतनजीवान्वयव्यतिरेकनित्यत्वेषु) विद्यमानेष्वपि भगवद्विषयत्वमेवानन्यथा सिद्धलिङ्गैः । ‘तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पुरुषः’ इत्यादिशब्दसहितलिङ्गैश्च । सन्दिग्धश्रुतिलिङ्गाभ्याम् उक्ताभ्यामपि, असन्दिग्धयोः केवलयोरेव(केवलयोरपि) बलवत्वात् ॥8-11॥
अधिभूताध्यात्माधिवेदगतानामपि शब्दानाम् अचेतनत्वजीवान्वयव्यतिरेकित्वनित्यत्वेषु(चेतनजीवान्वयव्यतिरेकनित्यत्वेषु) विद्यमानेष्वपि भगवद्विषयत्वमेवानन्यथा सिद्धलिङ्गैः । ‘तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पुरुषः’ इत्यादिशब्दसहितलिङ्गैश्च । सन्दिग्धश्रुतिलिङ्गाभ्याम् उक्ताभ्यामपि, असन्दिग्धयोः केवलयोरेव(केवलयोरपि) बलवत्वात् ॥8-11॥
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न च चानन्यथासिद्धत्वमन्यत्र श्रुतिलिङ्गादेः । अन्यगतलिङ्गदीनामपि तद्गभगवदपेक्षया(तद्गतभगवदपेक्षया) युक्तेः ॥12॥
न च चानन्यथासिद्धत्वमन्यत्र श्रुतिलिङ्गादेः । अन्यगतलिङ्गदीनामपि तद्गभगवदपेक्षया(तद्गतभगवदपेक्षया) युक्तेः ॥12॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
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बहुलिङ्गसहितश्रुतेरपि सावकाशायाः, निरवकाशश्रुत्यादीनामेव बलवत्वम् । बहवो ह्यत्रादित्यशब्दाः । क्षित्यादिषु उक्त्वाऽऽदित्येऽनुक्तिरित्यादिलिङ्गं च । तथाऽपि निरवकाशा एतमेवेत्यवधारणादयः ॥1॥
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सन्दिग्धश्रुतिलिङ्गाभ्यां निश्चितलिङ्गप्रकरणयोरेव बलवत्वम् । सन्दिग्धश्रुतिर्लिङ्गं  चादितिशब्दोदितत्वं च ॥2॥
सन्दिग्धश्रुतिलिङ्गाभ्यां निश्चितलिङ्गप्रकरणयोरेव बलवत्वम् । सन्दिग्धश्रुतिर्लिङ्गं  चादितिशब्दोदितत्वं च ॥2॥
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द्विवचनश्रुतेरपि(द्विवचनश्रुतेरपि बलं) निरवकाशत्वं नास्ति । विष्णोरेव द्विरूपत्वात् ॥3॥
द्विवचनश्रुतेरपि(द्विवचनश्रुतेरपि बलं) निरवकाशत्वं नास्ति । विष्णोरेव द्विरूपत्वात् ॥3॥
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‘सोहमस्मि’, ‘स एवाहमस्मि’ इत्याद्यभ्यास-अर्थवादसहितबहुश्रुतिभ्योऽपि निरवकाशोपपत्तेरेव प्राबल्यम् ॥4॥
‘सोहमस्मि’, ‘स एवाहमस्मि’ इत्याद्यभ्यास-अर्थवादसहितबहुश्रुतिभ्योऽपि निरवकाशोपपत्तेरेव प्राबल्यम् ॥4॥
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पृथिव्यादिशरीरत्वं च न निरवकाशम् । यौगिकशरीरत्वोपपत्तेः(यौगिकशरीरवत्वोपपत्तेः) विष्णोरपि ॥5॥
पृथिव्यादिशरीरत्वं च न निरवकाशम् । यौगिकशरीरत्वोपपत्तेः(यौगिकशरीरवत्वोपपत्तेः) विष्णोरपि ॥5॥
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‘अक्षरात् परतः परः’ इति श्रुतेरपि ‘नाक्षरात् सम्भवतीह विश्वं’ इत्यस्या निरवकाशत्वम् । अक्षरात् परतः परस्याप्यक्षरान्तरत्ववचनात् ॥6॥
‘अक्षरात् परतः परः’ इति श्रुतेरपि ‘नाक्षरात् सम्भवतीह विश्वं’ इत्यस्या निरवकाशत्वम् । अक्षरात् परतः परस्याप्यक्षरान्तरत्ववचनात् ॥6॥
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श्रुतिसाधारण्येऽपि विशेषश्रुत्यादेः निश्चयः । उभयत्र विशेषश्रुत्यादौ पुनः स सावकाशत्व-निरवकाशत्वबलात् निश्चयः ॥7॥
श्रुतिसाधारण्येऽपि विशेषश्रुत्यादेः निश्चयः । उभयत्र विशेषश्रुत्यादौ पुनः स सावकाशत्व-निरवकाशत्वबलात् निश्चयः ॥7॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
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‘प्राणानां ग्रन्थिरसि’। ‘रुद्रो वै लोकायतनम्’। ‘वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति’ । ‘सर्वे वा एते प्राणाश्च प्राणिनश्च देवाश्च दिव्यानि च लोकाश्च लोकिनश्चालोकिनश्च विष्णावेवोताश्च प्रोताश्च भवन्ति’ इत्यादेः द्युभ्वाद्यायतनत्वमज्ञानां साधारणं लिङ्गम् ॥1॥
‘प्राणानां ग्रन्थिरसि’। ‘रुद्रो वै लोकायतनम्’। ‘वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति’ । ‘सर्वे वा एते प्राणाश्च प्राणिनश्च देवाश्च दिव्यानि च लोकाश्च लोकिनश्चालोकिनश्च विष्णावेवोताश्च प्रोताश्च भवन्ति’ इत्यादेः द्युभ्वाद्यायतनत्वमज्ञानां साधारणं लिङ्गम् ॥1॥
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‘यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मन ओतं प्राणा ओताः’ इत्यत्रोक्तानां लिङ्गानामन्यत्र रुद्रादिविषयत्वे शब्दलिङ्गबाहुल्यम् । ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो माऽऽविशान्तकः’ । ‘प्राणेश्वरः कृत्तिवासाः पिनाकी’, ‘मनो वै रुद्र ओतं च प्रोतं च’, ‘रुद्रो वाव लोकाधारः’ इत्यादिकं शब्दबाहुल्यम् ॥1॥
‘यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मन ओतं प्राणा ओताः’ इत्यत्रोक्तानां लिङ्गानामन्यत्र रुद्रादिविषयत्वे शब्दलिङ्गबाहुल्यम् । ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो माऽऽविशान्तकः’ । ‘प्राणेश्वरः कृत्तिवासाः पिनाकी’, ‘मनो वै रुद्र ओतं च प्रोतं च’, ‘रुद्रो वाव लोकाधारः’ इत्यादिकं शब्दबाहुल्यम् ॥1॥
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तेषामेव लिङ्गशब्दानां ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि’ इत्यादीनां विष्णौ मुख्यवृत्तिरिति बलवत्वम् । तस्य हि रुग्द्रावणादिकर्तृत्वं मुख्यम् ॥1॥
तेषामेव लिङ्गशब्दानां ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि’ इत्यादीनां विष्णौ मुख्यवृत्तिरिति बलवत्वम् । तस्य हि रुग्द्रावणादिकर्तृत्वं मुख्यम् ॥1॥
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‘प्राणो वा आशाया भूयान्’, ‘विष्णुर्वै देवेभ्यो भूयांस्तस्माद् भूयान्नाम’ इत्यादेर्भूमशब्दोऽज्ञानां साधारणः ॥2॥
‘प्राणो वा आशाया भूयान्’, ‘विष्णुर्वै देवेभ्यो भूयांस्तस्माद् भूयान्नाम’ इत्यादेर्भूमशब्दोऽज्ञानां साधारणः ॥2॥
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‘प्राणो वा आशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा प्राणाद्भूयसोऽनुक्तिः ॥2॥
‘प्राणो वा आशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा प्राणाद्भूयसोऽनुक्तिः ॥2॥
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प्राणस्य विष्णोः सकाशात् भूयस्त्वानुक्तिः । ‘च’शब्देन ‘एष तु वा अतिवदति’ इति प्राणाद्विष्णोर्भूयस्त्वोक्तिश्च ॥2॥
प्राणस्य विष्णोः सकाशात् भूयस्त्वानुक्तिः । ‘च’शब्देन ‘एष तु वा अतिवदति’ इति प्राणाद्विष्णोर्भूयस्त्वोक्तिश्च ॥2॥
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विष्णोः चेतनप्रकृतेश्च अविनाशित्वसाम्याद् अक्षरशब्दः साधारणः ॥3॥
विष्णोः चेतनप्रकृतेश्च अविनाशित्वसाम्याद् अक्षरशब्दः साधारणः ॥3॥
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अत्तेत्युक्त्वा ‘न तदश्नाति किञ्चन’ इति विरुद्धता ॥3॥
अत्तेत्युक्त्वा ‘न तदश्नाति किञ्चन’ इति विरुद्धता ॥3॥
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सर्वाधारप्रकृत्याधारत्वं, विष्णोरन्यस्य विरुद्धम् । ‘पतिं विश्वस्यात्मेश्वरं’, ‘विश्वात्मानं परायणम्’ इत्यादिश्रुतेः । (अनशनोक्तिस्तु) अनशनत्वोक्तिस्त्वनुपजीवनार्थत्वेनैव सावकाशता ॥3॥
सर्वाधारप्रकृत्याधारत्वं, विष्णोरन्यस्य विरुद्धम् । ‘पतिं विश्वस्यात्मेश्वरं’, ‘विश्वात्मानं परायणम्’ इत्यादिश्रुतेः । (अनशनोक्तिस्तु) अनशनत्वोक्तिस्त्वनुपजीवनार्थत्वेनैव सावकाशता ॥3॥
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कारणत्वसाम्यात् विष्णोरचेतनप्रकृतेश्च ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिसृष्टिस्थानं साधारणम् ॥4॥
कारणत्वसाम्यात् विष्णोरचेतनप्रकृतेश्च ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिसृष्टिस्थानं साधारणम् ॥4॥
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‘बहु स्यां प्रजायेय’ इत्यन्यस्य अन्यभावादृष्टिः ॥4॥
‘बहु स्यां प्रजायेय’ इत्यन्यस्य अन्यभावादृष्टिः ॥4॥
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अचेतनस्येक्षणादृष्टिः । बहुभावश्रुतिस्त्वन्यभावं विना तत्तन्नियामकतया स्वरूपबहुत्वार्थत्वेनैव युज्यते ॥4॥
अचेतनस्येक्षणादृष्टिः । बहुभावश्रुतिस्त्वन्यभावं विना तत्तन्नियामकतया स्वरूपबहुत्वार्थत्वेनैव युज्यते ॥4॥
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लिङ्गं हृत्पद्मस्थितत्वं साधारणम् ॥5॥
लिङ्गं हृत्पद्मस्थितत्वं साधारणम् ॥5॥
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‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशस्तस्मिन्यदन्तिस्तदन्वेष्टव्यम्’ इत्यनेन, ‘यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ इत्यस्यान्वयाभावः ॥5॥
‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशस्तस्मिन्यदन्तिस्तदन्वेष्टव्यम्’ इत्यनेन, ‘यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ इत्यस्यान्वयाभावः ॥5॥
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आकाशपक्ष एवान्वयाभावः । विष्णुपक्षे तु, योऽन्वेष्टव्यो भगवान्, तस्यान्तर्हृदये यावान् वाऽयमाकाशस्तावानाकाशः, तस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते, स भगवान् अपहतपाप्मा(भगवानात्माऽपहतपाप्मेत्यन्वयः) इत्यन्वयः ॥5॥
आकाशपक्ष एवान्वयाभावः । विष्णुपक्षे तु, योऽन्वेष्टव्यो भगवान्, तस्यान्तर्हृदये यावान् वाऽयमाकाशस्तावानाकाशः, तस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते, स भगवान् अपहतपाप्मा(भगवानात्माऽपहतपाप्मेत्यन्वयः) इत्यन्वयः ॥5॥
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‘कथं नु तद्विजानीयाम्’ इत्यानुकूल्येन ग्रहणं कस्य? इति विचार्यमनुग्रहः ॥6॥
‘कथं नु तद्विजानीयाम्’ इत्यानुकूल्येन ग्रहणं कस्य? इति विचार्यमनुग्रहः ॥6॥
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‘तदेतदिति मन्यन्ते’, ‘कथं नु तद्विजानीयाम्’ इति ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’ (शाश्वतमित्युक्त) इत्युक्तज्ञानिसुखग्रहणमिति विपरीतश्रुतिभ्रमः ॥6॥
‘तदेतदिति मन्यन्ते’, ‘कथं नु तद्विजानीयाम्’ इति ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’ (शाश्वतमित्युक्त) इत्युक्तज्ञानिसुखग्रहणमिति विपरीतश्रुतिभ्रमः ॥6॥
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यज्ज्ञानाच्छाश्वतं सुखं स भगवान् यद्ब्रह्मानिर्देश्यं सुखमिति वदन्ति तदेतत्स्वरूपम् इति(तदेतत्तत्स्वरूपमिति) मन्यन्ते । अतः पूर्ववादविपरीतैव श्रुतिः । पूर्ववादोक्तयोजना तु भ्रम एव ॥6॥
यज्ज्ञानाच्छाश्वतं सुखं स भगवान् यद्ब्रह्मानिर्देश्यं सुखमिति वदन्ति तदेतत्स्वरूपम् इति(तदेतत्तत्स्वरूपमिति) मन्यन्ते । अतः पूर्ववादविपरीतैव श्रुतिः । पूर्ववादोक्तयोजना तु भ्रम एव ॥6॥
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‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति’ इत्यादिलिङ्गानां प्राणादन्यत्रावकाशराहित्यमिति भ्रमः । एवमेव ‘एष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव सन्निधत्ते’ इत्यादिवाक्यात् भ्रमः ॥7॥
‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति’ इत्यादिलिङ्गानां प्राणादन्यत्रावकाशराहित्यमिति भ्रमः । एवमेव ‘एष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव सन्निधत्ते’ इत्यादिवाक्यात् भ्रमः ॥7॥
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लिङ्गानां परमात्मन्यवकाशो विद्यत एवेति तद्राहित्यं भ्रम एव । वामनश्रुतेरेवानकाश इति ईशानाशब्दोक्तो विष्णुरेव ॥7॥
लिङ्गानां परमात्मन्यवकाशो विद्यत एवेति तद्राहित्यं भ्रम एव । वामनश्रुतेरेवानकाश इति ईशानाशब्दोक्तो विष्णुरेव ॥7॥
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वज्रशब्द उद्यतत्वलिङ्गं च तादृग्द्वयम् ॥10॥8॥
वज्रशब्द उद्यतत्वलिङ्गं च तादृग्द्वयम् ॥10॥8॥
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वज्रशब्दस्योद्यतत्वस्य च विष्णावेवावकाशः । उद्यमित्वमेवोद्यतत्वमिति ॥10॥8॥
वज्रशब्दस्योद्यतत्वस्य च विष्णावेवावकाशः । उद्यमित्वमेवोद्यतत्वमिति ॥10॥8॥
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आदित्यादिज्योतिष्ट्वम् उभयलोकसञ्चरणम् ‘आदित्येनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते’ इत्यवधारणमित्यादीनां परमात्मान्यवकाशाभावो बहुतादृक्त्वम् ॥11॥9॥
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‘अयं पुरुषः’ इति संसारी । आत्मशब्दोदित एव विष्णुः । अत आदित्यादिज्योतिष्ट्वं संसारिण एव । ‘आदित्येनैव’ इत्यवधारणं बाह्यज्योतिष्षु प्राधान्यापेक्षयेत्यादि । लोकसञ्चरणं तु जीवमादाय तस्यैव अदुःखेन स्वातन्त्र्यात् ॥11॥
‘अयं पुरुषः’ इति संसारी । आत्मशब्दोदित एव विष्णुः । अत आदित्यादिज्योतिष्ट्वं संसारिण एव । ‘आदित्येनैव’ इत्यवधारणं बाह्यज्योतिष्षु प्राधान्यापेक्षयेत्यादि । लोकसञ्चरणं तु जीवमादाय तस्यैव अदुःखेन स्वातन्त्र्यात् ॥11॥
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पुनः शब्दाः ‘ईशानो वज्रो ज्योतिराकाशः’ इति ॥7॥10-12॥
पुनः शब्दाः ‘ईशानो वज्रो ज्योतिराकाशः’ इति ॥7॥10-12॥
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‘वै, नाम’ इति प्रसिद्धिद्योतकनिपातद्वयम् रूढित्यागेनोक्तयौगिकार्थस्वीकारे विरोधि ॥12॥11॥
‘वै, नाम’ इति प्रसिद्धिद्योतकनिपातद्वयम् रूढित्यागेनोक्तयौगिकार्थस्वीकारे विरोधि ॥12॥11॥
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‘वै, नाम’ इति निर्वहितृत्वे श्रुत्यादिप्रसिद्धिबाहुल्यम् , प्रसिद्धाकाशस्योक्तम् अनामरूपत्वं विरुद्धम् ॥12॥
‘वै, नाम’ इति निर्वहितृत्वे श्रुत्यादिप्रसिद्धिबाहुल्यम् , प्रसिद्धाकाशस्योक्तम् अनामरूपत्वं विरुद्धम् ॥12॥
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लिङ्गं स्वप्नादिदर्शनं कस्य इति ॥13॥
लिङ्गं स्वप्नादिदर्शनं कस्य इति ॥13॥
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सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः जीवेश्वरयोः भेदोक्तेरसङ्ग(त)त्वादि(असङ्गित्वादि) चेश्वरस्यैव इत्यर्थात् भेद एव भवति । जीवस्य तदयुक्तेरीशे सावकाशत्वाच्च ॥13॥
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः जीवेश्वरयोः भेदोक्तेरसङ्ग(त)त्वादि(असङ्गित्वादि) चेश्वरस्यैव इत्यर्थात् भेद एव भवति । जीवस्य तदयुक्तेरीशे सावकाशत्वाच्च ॥13॥
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शब्दो ब्राह्मण इति ॥14॥
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‘ब्राह्मण’शब्दस्य पापालेपलिङ्गस्य च चतुर्मुखस्य(चतुर्मुखेन सह परमात्मनो) सह परमात्मनाऽभेदं विनाऽवकाशराहित्यद् अर्थाद् अभेदप्राप्तिरिति समस्तमेतत् ॥14॥12॥ पूर्वपक्षः॥
‘ब्राह्मण’शब्दस्य पापालेपलिङ्गस्य च चतुर्मुखस्य(चतुर्मुखेन सह परमात्मनो) सह परमात्मनाऽभेदं विनाऽवकाशराहित्यद् अर्थाद् अभेदप्राप्तिरिति समस्तमेतत् ॥14॥12॥ पूर्वपक्षः॥
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‘ब्रह्मणा= वेदेन गम्यते’ इति ‘ब्राह्मण’शब्दो विष्णावेव युज्यत इत्यर्थाद् ‘अज’शब्दोऽपि तस्मिन्नेव । चतुर्मुखस्य कर्मफलाभावायुक्तेः तयोर्भेदोऽर्थादापद्यत एव । उक्तिविरोधश्च तत्रैव । भेदश्रुतिबाहुल्यात् । तल्लिङ्गं स शब्दश्च चतुर्मुखेऽनवकाश इति(इति च) समस्तमेतत् ॥14॥
‘ब्रह्मणा= वेदेन गम्यते’ इति ‘ब्राह्मण’शब्दो विष्णावेव युज्यत इत्यर्थाद् ‘अज’शब्दोऽपि तस्मिन्नेव । चतुर्मुखस्य कर्मफलाभावायुक्तेः तयोर्भेदोऽर्थादापद्यत एव । उक्तिविरोधश्च तत्रैव । भेदश्रुतिबाहुल्यात् । तल्लिङ्गं स शब्दश्च चतुर्मुखेऽनवकाश इति(इति च) समस्तमेतत् ॥14॥
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जीवेश्वराभेदे ईश्वरोक्तावप्यर्थाज्जीव एवोच्यत इत्यर्थात् तथागतिः ॥13॥11॥
जीवेश्वराभेदे ईश्वरोक्तावप्यर्थाज्जीव एवोच्यत इत्यर्थात् तथागतिः ॥13॥11॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
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अवरत्वादिधर्मनियन्तृत्वम्, तत्तादात्म्यवत्वं चेति द्विविधं ह्यवरत्वादि(अवरत्वादि) । ‘निरनिष्टो निरवद्यः‘ इत्यादिश्रुतेः तत्तद्दोषतादात्म्यात्यस्पृष्टिनियमात् विष्णोः, ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति’ इति श्रुतिबलाच्च (नियन्तृत्वमेव)नियन्तृत्वमवरत्वादिकमित्यापतति । श्रुतिद्वयस्यापि निरवकाशत्वात् । मृत्युशब्दादिषु प्रसिद्धेश्च । प्रसिद्धत्वाच्च(प्रसिद्धत्वात्) कर्तृव्युत्पत्तेः । ‘तमेव मृत्युममृतं’, ‘तात दैवं सर्वात्मनावैहि परं परायणम्’ इत्यादेश्च । उपचारकल्पनायाश्च क्लिष्टत्वात्(कष्टत्वात्) । प्रमाणाभावाच्च । नाव्यक्तादिशब्दानां परमात्मविषयत्वङ्गीकारे सर्वमानविरोधः ॥1॥
अवरत्वादिधर्मनियन्तृत्वम्, तत्तादात्म्यवत्वं चेति द्विविधं ह्यवरत्वादि(अवरत्वादि) । ‘निरनिष्टो निरवद्यः‘ इत्यादिश्रुतेः तत्तद्दोषतादात्म्यात्यस्पृष्टिनियमात् विष्णोः, ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति’ इति श्रुतिबलाच्च (नियन्तृत्वमेव)नियन्तृत्वमवरत्वादिकमित्यापतति । श्रुतिद्वयस्यापि निरवकाशत्वात् । मृत्युशब्दादिषु प्रसिद्धेश्च । प्रसिद्धत्वाच्च(प्रसिद्धत्वात्) कर्तृव्युत्पत्तेः । ‘तमेव मृत्युममृतं’, ‘तात दैवं सर्वात्मनावैहि परं परायणम्’ इत्यादेश्च । उपचारकल्पनायाश्च क्लिष्टत्वात्(कष्टत्वात्) । प्रमाणाभावाच्च । नाव्यक्तादिशब्दानां परमात्मविषयत्वङ्गीकारे सर्वमानविरोधः ॥1॥
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रूढिः, (रूढो रूढयोगो महारूढो महायोगो महारूढयोगो - पा) योगः, रूढियोगः, महायोगो, रूढी, रूढियोगो, महायोगो, महारूढियोगो, रूढोपचारो, रूढलक्षणोपचारो, लक्षणेति शब्दवृत्तिभेदात्(भेदः) रूढिपूर्वकत्वेन महायोगवृत्या परमेश्वरे अखिलशब्दव्युत्पत्युपपत्तिः(अनुपपत्तेः) ॥2॥
रूढिः, (रूढो रूढयोगो महारूढो महायोगो महारूढयोगो - पा) योगः, रूढियोगः, महायोगो, रूढी, रूढियोगो, महायोगो, महारूढियोगो, रूढोपचारो, रूढलक्षणोपचारो, लक्षणेति शब्दवृत्तिभेदात्(भेदः) रूढिपूर्वकत्वेन महायोगवृत्या परमेश्वरे अखिलशब्दव्युत्पत्युपपत्तिः(अनुपपत्तेः) ॥2॥
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बहुरूपत्वाद् अधिकरणाधेयत्वादिकं(बहुरूपात्वाधिकरणत्वाधेयत्वादि) तस्यैव युज्यते ॥3॥
बहुरूपत्वाद् अधिकरणाधेयत्वादिकं(बहुरूपात्वाधिकरणत्वाधेयत्वादि) तस्यैव युज्यते ॥3॥
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व्यक्त्यपेक्षया कार्यत्वं(कारणत्वम्) च ॥4॥
व्यक्त्यपेक्षया कार्यत्वं(कारणत्वम्) च ॥4॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
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रुद्रादीनां सकाशात् विष्ण्वादीनामेवाप्तत्वम् । श्रुत्यनुसारित्वात् ॥1॥
रुद्रादीनां सकाशात् विष्ण्वादीनामेवाप्तत्वम् । श्रुत्यनुसारित्वात् ॥1॥
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न च श्रुतेः(न श्रुतेः) रुद्रादिस्मृतिसाम्यम्, किन्तु साक्षिप्रत्यक्षसाम्यमेव निरपेक्षत्वात् ॥2॥
न च श्रुतेः(न श्रुतेः) रुद्रादिस्मृतिसाम्यम्, किन्तु साक्षिप्रत्यक्षसाम्यमेव निरपेक्षत्वात् ॥2॥
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न मृदादीनां वचनाद्यदृष्टिः श्रुत्यप्रामाण्यकारणम् । अपि तु, वचनादिशक्ताया देवताया मृदादिशब्दवाच्यत्वद्योतिकैव ॥3॥
न मृदादीनां वचनाद्यदृष्टिः श्रुत्यप्रामाण्यकारणम् । अपि तु, वचनादिशक्ताया देवताया मृदादिशब्दवाच्यत्वद्योतिकैव ॥3॥
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ईश्वरस्य स्रष्टृत्ववदसतोऽपि स्रष्टृत्वं श्रूयत इति नास्ति । सोऽसच्छब्दो ब्रह्मशब्दवदेव ब्रह्मवाचक इति श्रुतिसाम्यम्(श्रुतेः साम्यम्) ॥4॥
ईश्वरस्य स्रष्टृत्ववदसतोऽपि स्रष्टृत्वं श्रूयत इति नास्ति । सोऽसच्छब्दो ब्रह्मशब्दवदेव ब्रह्मवाचक इति श्रुतिसाम्यम्(श्रुतेः साम्यम्) ॥4॥
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‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’ इति श्रुतिबलान्नैक्यम्। किन्तु भेदापादकमेवैतत्, ‘निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’, ‘परात् परं पुरुषमुपैति(पुरिशयं पुरुषम्) दिव्यम्’ इति सन्निहितवाक्यबलात् । एकीभावशब्दस्तु सान्निध्येऽपि(सामीप्येऽपि)भवति । ‘एकीभूता तु सा सेना पाण्डवानभ्यवर्तत’ इतिवत् । ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥’ इति वाक्यान्तराच्च ॥5॥
 
‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’ इति श्रुतिबलान्नैक्यम्। किन्तु भेदापादकमेवैतत्, ‘निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’, ‘परात् परं पुरुषमुपैति(पुरिशयं पुरुषम्) दिव्यम्’ इति सन्निहितवाक्यबलात् । एकीभावशब्दस्तु सान्निध्येऽपि(सामीप्येऽपि)भवति । ‘एकीभूता तु सा सेना पाण्डवानभ्यवर्तत’ इतिवत् ।  
‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥’ इति वाक्यान्तराच्च ॥5॥
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न च लौकिकसर्वकार्यानुसारेण(लौकिकसर्वकार्याणाम् अनुसारेण) अकर्तृतन्त्रत्वं सर्वानुसारः। किं तर्हि ? तद्वैलक्षण्येन सर्वकर्तृविलक्षणसर्वशक्तित्वमेवाशेषयुक्तिश्रुत्यनुसारि । ‘एष सर्वेश्वरः’ इति श्रुतेः(इत्यादि श्रुतेः) । युक्तिमात्रात् श्रुतियुक्ता हि युक्तिर्बलवती ॥6॥
न च लौकिकसर्वकार्यानुसारेण(लौकिकसर्वकार्याणाम् अनुसारेण) अकर्तृतन्त्रत्वं सर्वानुसारः। किं तर्हि ? तद्वैलक्षण्येन सर्वकर्तृविलक्षणसर्वशक्तित्वमेवाशेषयुक्तिश्रुत्यनुसारि । ‘एष सर्वेश्वरः’ इति श्रुतेः(इत्यादि श्रुतेः) । युक्तिमात्रात् श्रुतियुक्ता हि युक्तिर्बलवती ॥6॥
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न चेश्वरत्यागेन जीवस्यैव कर्तृत्वाङ्गीकारे कल्पनालाघवम्। श्रुतिसिद्धत्वेन अकल्पनात् । अश्रुतजीवकर्तृत्वाङ्गीकारे गौरवमेव । तदभावात्(तदभावे) सिद्धान्ते लघुता । ‘नान्यः कर्ता, स हि स्वतन्त्रः, परमात् परमो हरिः’ इत्यादेश्च । अभेदपक्षस्तु निराकृतः । श्रुत्यनुभवविरोधाच्च ॥7॥
न चेश्वरत्यागेन जीवस्यैव कर्तृत्वाङ्गीकारे कल्पनालाघवम्। श्रुतिसिद्धत्वेन अकल्पनात् । अश्रुतजीवकर्तृत्वाङ्गीकारे गौरवमेव । तदभावात्(तदभावे) सिद्धान्ते लघुता । ‘नान्यः कर्ता, स हि स्वतन्त्रः, परमात् परमो हरिः’ इत्यादेश्च । अभेदपक्षस्तु निराकृतः । श्रुत्यनुभवविरोधाच्च ॥7॥
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शब्दैकसमधिगम्यत्व-सर्वशक्तित्वादीनां विशेषाणामदर्शनं(अदर्शनात्) जीवे । न जीवाद्विशेषादर्शनं परमेश्वरे । विशेषश्रुतेरेव ॥8॥
शब्दैकसमधिगम्यत्व-सर्वशक्तित्वादीनां विशेषाणामदर्शनं(अदर्शनात्) जीवे । न जीवाद्विशेषादर्शनं परमेश्वरे । विशेषश्रुतेरेव ॥8॥
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न च प्रयोजनाभावोऽकर्तृत्वे कारणम् । अशेषकर्तृत्वापादकश्च(अपवादकश्च) । फलापेक्षिणस्त्वपूर्णत्वादेव न सर्वकर्तृत्वादिशक्तिः, इतरस्य पूर्णत्वादेवानन्तशक्तित्वाच्च लीलयैव(..शक्तित्वाल्लीलयैव) कर्तृत्वम् ॥9॥
न च प्रयोजनाभावोऽकर्तृत्वे कारणम् । अशेषकर्तृत्वापादकश्च(अपवादकश्च) । फलापेक्षिणस्त्वपूर्णत्वादेव न सर्वकर्तृत्वादिशक्तिः, इतरस्य पूर्णत्वादेवानन्तशक्तित्वाच्च लीलयैव(..शक्तित्वाल्लीलयैव) कर्तृत्वम् ॥9॥
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नेशस्य पूर्णत्वासिद्धिः । कर्मसापेक्षत्वेऽनीशत्वमनपेक्षत्वे श्रुतेरप्रामाण्यमिति । कर्मणोऽपि तदधीनत्वम् । तथाऽपि तदनुसारेण फलदानमित्यनङ्गीकार एव इष्टश्रुतिप्रामाण्यासिद्धिः ॥10॥
नेशस्य पूर्णत्वासिद्धिः । कर्मसापेक्षत्वेऽनीशत्वमनपेक्षत्वे श्रुतेरप्रामाण्यमिति । कर्मणोऽपि तदधीनत्वम् । तथाऽपि तदनुसारेण फलदानमित्यनङ्गीकार एव इष्टश्रुतिप्रामाण्यासिद्धिः ॥10॥
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सर्वचेतना अपूर्णगुणा इति नियमो न । स्वतन्त्रस्य (च) पूर्णगुणत्वनियमात् ‘अपूर्णोऽयं जीवसङ्घोऽस्वतन्त्रः पूर्णो हरिर्यः स्वतन्त्रः सदैव । न हि स्वतन्त्रोऽपूर्णतां कामयीत पूर्णो यदि स्यादस्वतन्त्रः कुतः सः ॥’ इति श्रुतेः ॥11॥
 
सर्वचेतना अपूर्णगुणा इति नियमो न । स्वतन्त्रस्य (च) पूर्णगुणत्वनियमात्  
‘अपूर्णोऽयं जीवसङ्घोऽस्वतन्त्रः पूर्णो हरिर्यः स्वतन्त्रः सदैव ।
न हि स्वतन्त्रोऽपूर्णतां कामयीत पूर्णो यदि स्यादस्वतन्त्रः कुतः सः ॥’ इति श्रुतेः ॥11॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
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उक्तविरोधिनसः तत्तत्समयसिद्धाः पूर्वपक्षन्यायाः, तद्विरोधिनोऽन्ये इति प्रसिद्धा एव ॥
उक्तविरोधिनसः तत्तत्समयसिद्धाः पूर्वपक्षन्यायाः, तद्विरोधिनोऽन्ये इति प्रसिद्धा एव ॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
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न च वियतः उत्पत्तिमत्वे अनुभूतियुक्तिबहुवाग्विरोधोऽस्ति, व्यवस्थायोगात् । अवकाशमात्रस्य अव्याकृतात्मकत्वाद् अनुत्पत्तिवचनानां तद्विषयत्वम्, उत्पत्तिवचनानाम् असितवर्ण-भूताकाश-तदभिमानिशरीरविषयत्वम्, पराधीन(विशेषवत्व)विशेषत्वमात्रविषयत्वं चेति व्यवस्था । ‘आकाशो नीलिमोदेति न प्रदेशः कथञ्चन । अभावो हि प्रदेशस्य न ह्यत्राभाव इत्यपि ॥’ इति पैङ्गिश्रुतिः(पैङ्गिश्रुतेः) ॥1॥
 
न च वियतः उत्पत्तिमत्वे अनुभूतियुक्तिबहुवाग्विरोधोऽस्ति, व्यवस्थायोगात् । अवकाशमात्रस्य अव्याकृतात्मकत्वाद् अनुत्पत्तिवचनानां तद्विषयत्वम्, उत्पत्तिवचनानाम् असितवर्ण-भूताकाश-तदभिमानिशरीरविषयत्वम्, पराधीन(विशेषवत्व)विशेषत्वमात्रविषयत्वं चेति व्यवस्था ।  
‘आकाशो नीलिमोदेति न प्रदेशः कथञ्चन ।
अभावो हि प्रदेशस्य न ह्यत्राभाव इत्यपि ॥’ इति पैङ्गिश्रुतिः(पैङ्गिश्रुतेः) ॥1॥
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ततोऽधिकमेतत्सर्वम् अनुभूत्यादिविरुद्धत्वं वायूत्पत्ताविति न, वायोरेव (मुख्यानुत्पत्त्युपपत्तेः)अनुत्पत्त्यनुपपत्तेः । पराधीनविशेषमात्रं(पराधीनविशेषत्वमात्रं) ह्युत्पत्तिः । तदभाव उभयोः स्वातन्त्र्यं विरुद्धमेव । सर्वोत्तमत्वानुपपत्तेः । उभयोरपि पराधीनत्वप्राप्तेश्च अन्योन्यानुरोधे, अननुरोधे तु न सर्वैश्वर्यम्। ज्ञानाविस्मृत्या वायावपि व्यवस्थेत्यतिदेशः । अनुपपत्तिस्तु तत्प्रापिका । पराधीनविशेषवत्त्वमात्रं तु अव्याकृताकाशस्य तदभिमानिप्रकृतेश्च सममेव ॥2॥
ततोऽधिकमेतत्सर्वम् अनुभूत्यादिविरुद्धत्वं वायूत्पत्ताविति न, वायोरेव (मुख्यानुत्पत्त्युपपत्तेः)अनुत्पत्त्यनुपपत्तेः । पराधीनविशेषमात्रं(पराधीनविशेषत्वमात्रं) ह्युत्पत्तिः । तदभाव उभयोः स्वातन्त्र्यं विरुद्धमेव । सर्वोत्तमत्वानुपपत्तेः । उभयोरपि पराधीनत्वप्राप्तेश्च अन्योन्यानुरोधे, अननुरोधे तु न सर्वैश्वर्यम्। ज्ञानाविस्मृत्या वायावपि व्यवस्थेत्यतिदेशः । अनुपपत्तिस्तु तत्प्रापिका । पराधीनविशेषवत्त्वमात्रं तु अव्याकृताकाशस्य तदभिमानिप्रकृतेश्च सममेव ॥2॥
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न च सतः पराधीनविशेषवत्वं(पराधीनविषयत्वं) स्वातन्त्र्यात् ॥3॥
न च सतः पराधीनविशेषवत्वं(पराधीनविषयत्वं) स्वातन्त्र्यात् ॥3॥
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न च विष्णोरेव(विष्णोः) तेजस उत्पत्तौ द्वारकारणवैयर्थ्यम्(एव) । द्वारमनुसृत्यैव विष्णोः प्रवृत्तेः ॥4॥
न च विष्णोरेव(विष्णोः) तेजस उत्पत्तौ द्वारकारणवैयर्थ्यम्(एव) । द्वारमनुसृत्यैव विष्णोः प्रवृत्तेः ॥4॥
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न च तेजस एव अपामुत्पत्यङ्गीकारे घर्मात् स्वेदादिदृष्ट्यनुसारित्वमिति(स्वेदादिदृष्टानुसारित्वमिति) गुणाधिक्यम् । मुख्यार्थपरित्यागप्राप्तेः ॥5॥
न च तेजस एव अपामुत्पत्यङ्गीकारे घर्मात् स्वेदादिदृष्ट्यनुसारित्वमिति(स्वेदादिदृष्टानुसारित्वमिति) गुणाधिक्यम् । मुख्यार्थपरित्यागप्राप्तेः ॥5॥
न च ‘अद्भ्यो वाऽन्नमुत्पद्यते’ इत्याद्युक्तप्रसिद्धान्नाख्यान्यार्थाविरोधेन प्रसिद्धान्ननामस्वीकारे बहुवाक्यानुवर्तितेति गुणः । ‘अन्न’शब्दस्य प्रयोगबाहुल्यात् पृथिव्यामपि शक्तिमत्वात् । अधिकारादीनां निरवकाशत्वाच्च । बहुवाक्यानुरोधोऽप्यत्रैवेति (बहुवाक्यानुरोधोऽप्यत्रैव) ॥6॥
न च ‘अद्भ्यो वाऽन्नमुत्पद्यते’ इत्याद्युक्तप्रसिद्धान्नाख्यान्यार्थाविरोधेन प्रसिद्धान्ननामस्वीकारे बहुवाक्यानुवर्तितेति गुणः । ‘अन्न’शब्दस्य प्रयोगबाहुल्यात् पृथिव्यामपि शक्तिमत्वात् । अधिकारादीनां निरवकाशत्वाच्च । बहुवाक्यानुरोधोऽप्यत्रैवेति (बहुवाक्यानुरोधोऽप्यत्रैव) ॥6॥
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न च रुद्रादीनां लयकारित्वाङ्गीकारे, पितुरन्यस्य(पितुरन्यस्यैव) मारकत्वदृष्टेः लोकदृष्ट्यनुसारित्वमिति(लोकदृष्टानुसारित्वमिति) गुणः । लोकपितृवैरूप्यात् विष्णोर्यथावाक्यमङ्गीकारोपपत्तेः । अन्यथा ‘न विष्णोरन्यो वलियकृन्न विष्णोरन्यो विमुक्तिदः’ इत्यादि श्रुतिविरोधात् । रुद्रस्य तु क्वचित् संहारद्वारत्वेनैव तद्वाक्यानां सावकाशत्वात् ॥7॥
न च रुद्रादीनां लयकारित्वाङ्गीकारे, पितुरन्यस्य(पितुरन्यस्यैव) मारकत्वदृष्टेः लोकदृष्ट्यनुसारित्वमिति(लोकदृष्टानुसारित्वमिति) गुणः । लोकपितृवैरूप्यात् विष्णोर्यथावाक्यमङ्गीकारोपपत्तेः । अन्यथा ‘न विष्णोरन्यो वलियकृन्न विष्णोरन्यो विमुक्तिदः’ इत्यादि श्रुतिविरोधात् । रुद्रस्य तु क्वचित् संहारद्वारत्वेनैव तद्वाक्यानां सावकाशत्वात् ॥7॥
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न च लोकानुसारित्वम् । ‘क्रमादुत्पद्यते, क्रमात् विलीयते, क्रमेणैवोत्पत्तिः वलियश्च(क्रमेणैव ह्यस्योत्पत्तिलयौ), क्रमेणैवास्योत्पत्तिवलियौ’ इत्यादि(इत्यादि बहुश्रुत्यनुरोधश्च) लोकानुसारिबहुश्रुत्यनुरोधश्च यथोत्पत्तलिये।‘द्विविधः क्रम उद्दिष्टो व्युत्क्रमोऽनुक्रमस्तथा । सृष्टावन्यो लये चान्य इति वेदविदो विदुः॥’इति श्रुतेः क्रमवाक्यस्य सावकाशत्वात् वैरूप्यं बहुप्रकारत्वं क्रमस्य ॥8॥
 
न च लोकानुसारित्वम् । ‘क्रमादुत्पद्यते, क्रमात् विलीयते, क्रमेणैवोत्पत्तिः वलियश्च(क्रमेणैव ह्यस्योत्पत्तिलयौ), क्रमेणैवास्योत्पत्तिवलियौ’ इत्यादि(इत्यादि बहुश्रुत्यनुरोधश्च) लोकानुसारिबहुश्रुत्यनुरोधश्च यथोत्पत्तलिये।
‘द्विविधः क्रम उद्दिष्टो व्युत्क्रमोऽनुक्रमस्तथा ।
सृष्टावन्यो लये चान्य इति वेदविदो विदुः॥’
इति श्रुतेः क्रमवाक्यस्य सावकाशत्वात् वैरूप्यं बहुप्रकारत्वं क्रमस्य ॥8॥
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न च ‘केषाञ्चित् क्रमाल्लयः’, ‘केषाञ्चित् व्युत्क्रमाल्लय’ इत्यङ्गीकारे (लोकदृष्टानुसारित्वं)लोकदृष्ट्यनुसारादन्तरा विज्ञानमनसी व्युत्क्रमः । ‘सर्वं वा एतत् क्रमादुत्पद्यते, व्युत्क्रमाल्लीयते(क्रमाद् विलीयते)’ इति श्रुतौ सर्वस्यापि व्युत्क्रमाल्लयसङ्ग्रहात्। तल्लिङ्गस्य तु चराचरव्यपाश्रयविज्ञानादिविषयत्वेवैव सावकाशत्वात् ॥9॥
न च ‘केषाञ्चित् क्रमाल्लयः’, ‘केषाञ्चित् व्युत्क्रमाल्लय’ इत्यङ्गीकारे (लोकदृष्टानुसारित्वं)लोकदृष्ट्यनुसारादन्तरा विज्ञानमनसी व्युत्क्रमः । ‘सर्वं वा एतत् क्रमादुत्पद्यते, व्युत्क्रमाल्लीयते(क्रमाद् विलीयते)’ इति श्रुतौ सर्वस्यापि व्युत्क्रमाल्लयसङ्ग्रहात्। तल्लिङ्गस्य तु चराचरव्यपाश्रयविज्ञानादिविषयत्वेवैव सावकाशत्वात् ॥9॥
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न च (चेतनत्वेन)चेतनत्वसाम्यात् विष्णोरपि देहलयः । ‘सर्वे वा एते चिदात्मानो ब्रह्मंल्लयमनुप्राप्य विष्णोरुदरे संविशन्ति’ इति तस्योदरे (सर्वसङ्ग्रहणादि)सर्वसङ्ग्रहादिश्रुतिभ्यो नित्यत्वावगमात् तद्देहस्य। अश्रुतत्वाच्चान्यथा ॥10॥
न च (चेतनत्वेन)चेतनत्वसाम्यात् विष्णोरपि देहलयः । ‘सर्वे वा एते चिदात्मानो ब्रह्मंल्लयमनुप्राप्य विष्णोरुदरे संविशन्ति’ इति तस्योदरे (सर्वसङ्ग्रहणादि)सर्वसङ्ग्रहादिश्रुतिभ्यो नित्यत्वावगमात् तद्देहस्य। अश्रुतत्वाच्चान्यथा ॥10॥
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न चानादित्वात् जीवस्य पराधीनविशेषाप्राप्तिः । ‘इदं सर्वमसृजत’ इति सर्वस्मिन् गृहीतत्वात् । पराधीनविशेषवत्वेऽप्यनादित्वस्य अविरोधात् ॥11॥
न चानादित्वात् जीवस्य पराधीनविशेषाप्राप्तिः । ‘इदं सर्वमसृजत’ इति सर्वस्मिन् गृहीतत्वात् । पराधीनविशेषवत्वेऽप्यनादित्वस्य अविरोधात् ॥11॥
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न च सर्वदेहे(सर्वदेहस्पर्ष..) स्पर्शज्ञानाद्रसादीनां च तत्र तत्र परिज्ञानाज्जीवस्यानणुत्वम् । उत्क्रान्तिगत्यादेः । आदिशब्देन सूक्ष्मतेजोरूपेण व्याप्त्या स्पर्शादिज्ञानोपपत्तिः । अतोऽणुत्वमनणुत्वं चेति भावः ॥12॥
न च सर्वदेहे(सर्वदेहस्पर्ष..) स्पर्शज्ञानाद्रसादीनां च तत्र तत्र परिज्ञानाज्जीवस्यानणुत्वम् । उत्क्रान्तिगत्यादेः । आदिशब्देन सूक्ष्मतेजोरूपेण व्याप्त्या स्पर्शादिज्ञानोपपत्तिः । अतोऽणुत्वमनणुत्वं चेति भावः ॥12॥
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न च जीवस्य बहुरूपत्वशक्तावीशेन गुणसाम्यम् । ईशशक्त्यैव बहुरूपत्वादेः ॥13॥
न च जीवस्य बहुरूपत्वशक्तावीशेन गुणसाम्यम् । ईशशक्त्यैव बहुरूपत्वादेः ॥13॥
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न च श्रुत्या जीवेश्वरैक्यम् । सर्वमानविरोधात् । श्रुतेः सादृश्यैक्यादिना सावकाशत्वात् । बहुमानविरोधे एकस्य दौर्बल्याच्च । (धर्मिग्राहि)धर्मिग्राहकविरोधाच्च ॥14॥
न च श्रुत्या जीवेश्वरैक्यम् । सर्वमानविरोधात् । श्रुतेः सादृश्यैक्यादिना सावकाशत्वात् । बहुमानविरोधे एकस्य दौर्बल्याच्च । (धर्मिग्राहि)धर्मिग्राहकविरोधाच्च ॥14॥
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न चोत्पत्तिमत्वाद्विनाशित्वं जीवस्य । अनित्यत्वे तदभीष्टमोक्षाद्यसिद्धेः(अभीष्टमोक्षाद्यसिद्धेः) । न हि पराधीनविशेषवत्वमात्रेण विनाशित्वम्, तादृशानामेव नित्यत्वश्रुतिविरोधात् ॥15॥
न चोत्पत्तिमत्वाद्विनाशित्वं जीवस्य । अनित्यत्वे तदभीष्टमोक्षाद्यसिद्धेः(अभीष्टमोक्षाद्यसिद्धेः) । न हि पराधीनविशेषवत्वमात्रेण विनाशित्वम्, तादृशानामेव नित्यत्वश्रुतिविरोधात् ॥15॥
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न च स्वगुणाननुभूतत्यनुपपत्तेः पूर्वं(पूर्वज्ञानादीनां) ज्ञानादीनां सामस्त्येनाभावः । पूर्वमव्यक्तानां पश्चात् सुव्यक्त्युपपत्तेः ॥16॥
न च स्वगुणाननुभूतत्यनुपपत्तेः पूर्वं(पूर्वज्ञानादीनां) ज्ञानादीनां सामस्त्येनाभावः । पूर्वमव्यक्तानां पश्चात् सुव्यक्त्युपपत्तेः ॥16॥
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न चेश्वरस्यैव कर्तृत्वे कल्पनालाघवम् । जीवस्याकर्तृत्वे शास्त्रवैयर्थ्यात् । तस्यापि कर्तृत्वे शास्त्रार्थसिद्धेश्च ॥17॥
न चेश्वरस्यैव कर्तृत्वे कल्पनालाघवम् । जीवस्याकर्तृत्वे शास्त्रवैयर्थ्यात् । तस्यापि कर्तृत्वे शास्त्रार्थसिद्धेश्च ॥17॥
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न च नानाश्रुतेरप्रामाण्यम् । दृष्टभेदानुसारेण तासाम्(तेषाम्) अर्थोपपत्तेः । अप्रामाण्यकल्पनस्य विपरीतज्ञानमूलत्वात् ॥18॥
न च नानाश्रुतेरप्रामाण्यम् । दृष्टभेदानुसारेण तासाम्(तेषाम्) अर्थोपपत्तेः । अप्रामाण्यकल्पनस्य विपरीतज्ञानमूलत्वात् ॥18॥
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न च वैचित्र्यमनाभासत्वे कारणम् । जीवानां सामान्यतः आभासत्वेऽपि (आभासत्वे) विशेषादृष्टात् वैचित्र्योपपत्तेः ॥19॥
न च वैचित्र्यमनाभासत्वे कारणम् । जीवानां सामान्यतः आभासत्वेऽपि (आभासत्वे) विशेषादृष्टात् वैचित्र्योपपत्तेः ॥19॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
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न च प्राणानामुत्पत्यङ्गीकारे,‘प्राणा एवानादयः’ इत्यादिस्पष्टार्थवद्विशेषश्रुतिविरोधः । ‘आत्मैवेदमग्र आसीत् स प्राणमसृजत, स प्राणान्’ इत्यादिवचनाद् अनादित्व एव (स्पष्टार्तश्रुति)स्पष्टार्थवद्विशेषश्रुतिविरोधात् । ‘इदं सर्वमसृजत’इति सामान्यवचनस्याधिक्यं सिद्धान्ते । विशेषमात्रश्रुतेः सावकाशाया(सकाशाद् विशेषा) उभयश्रुतेः प्राबल्यात् ॥1॥
न च प्राणानामुत्पत्यङ्गीकारे,‘प्राणा एवानादयः’ इत्यादिस्पष्टार्थवद्विशेषश्रुतिविरोधः । ‘आत्मैवेदमग्र आसीत् स प्राणमसृजत, स प्राणान्’ इत्यादिवचनाद् अनादित्व एव (स्पष्टार्तश्रुति)स्पष्टार्थवद्विशेषश्रुतिविरोधात् । ‘इदं सर्वमसृजत’इति सामान्यवचनस्याधिक्यं सिद्धान्ते । विशेषमात्रश्रुतेः सावकाशाया(सकाशाद् विशेषा) उभयश्रुतेः प्राबल्यात् ॥1॥
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न च ‘नित्यं मनोऽनादित्वात्’ इति विशेषश्रुतिविरोधः । ‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति विशेषश्रुतेः ॥2॥
न च ‘नित्यं मनोऽनादित्वात्’ इति विशेषश्रुतिविरोधः । ‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति विशेषश्रुतेः ॥2॥
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न च ‘वाग्वाव नित्या’इति विशेषश्रुतिविरोधः, ‘मनसो वाव वागुत्पद्यते(वागुदपद्यत), वाचो व्याहरणम्’ इति विशेषश्रुतेः ॥3॥
न च ‘वाग्वाव नित्या’इति विशेषश्रुतिविरोधः, ‘मनसो वाव वागुत्पद्यते(वागुदपद्यत), वाचो व्याहरणम्’ इति विशेषश्रुतेः ॥3॥
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न च ‘दशेमे पुरुषे प्राणाः आत्मैकादशः’, ‘सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’ इति सङ्ख्याविशेषश्रुत्योरेव (परस्परं)परस्परविरोधः । ‘गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त’ इति सप्तभावस्य बुद्धीन्द्रियविषयत्वेन विशेषितत्वात् सङ्ख्याश्रुत्योः विषयवैलक्षण्यात् ॥4॥
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न च ‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्त्याख्यविशेषवाचकश्रुतिविरोधः, ‘अणूनि वा इन्द्रियाणि तेषां प्रकाशो व्याततः’ इति ततोऽप्यणुत्ववाचकविशेषश्रुतिविरोधात् ॥5॥
न च ‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्त्याख्यविशेषवाचकश्रुतिविरोधः, ‘अणूनि वा इन्द्रियाणि तेषां प्रकाशो व्याततः’ इति ततोऽप्यणुत्ववाचकविशेषश्रुतिविरोधात् ॥5॥
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न च ‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा । तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते ॥’ इत्यादिमाहात्म्यवचनात् मुख्यप्राणस्य नोत्पत्तिरिति वाच्यम् । ‘महत्वान्महतां विष्णुः कर्ता प्राणस्य चैकराट् । किं नाम न सृजेदेष येन शक्त्ये(क्ये)दमावृतम् ॥’ इति श्रुतेस्ततोऽपि माहात्म्याद् विष्णोः ॥6॥
 
न च  
‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा ।
तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते ॥’
इत्यादिमाहात्म्यवचनात् मुख्यप्राणस्य नोत्पत्तिरिति वाच्यम् ।  
‘महत्वान्महतां विष्णुः कर्ता प्राणस्य चैकराट् ।
किं नाम न सृजेदेष येन शक्त्ये(क्ये)दमावृतम् ॥’
इति श्रुतेस्ततोऽपि माहात्म्याद् विष्णोः ॥6॥
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न च प्राणादिपञ्चस्य व्यक्तसद्गुणत्वान् मुख्यप्राणवृत्तित्वमेव । ‘अशेषगुणपूर्णानि मुख्यरूपाणि पञ्च च । तद्दासाः पञ्च चान्येऽपि प्राणाद्याः सद्गुणैर्युताः॥’इति श्रुतेः मुख्यप्राणस्य ततोऽपि व्यक्तसद्गुणत्वात् ॥8॥
 
न च प्राणादिपञ्चस्य व्यक्तसद्गुणत्वान् मुख्यप्राणवृत्तित्वमेव ।  
‘अशेषगुणपूर्णानि मुख्यरूपाणि पञ्च च ।
तद्दासाः पञ्च चान्येऽपि प्राणाद्याः सद्गुणैर्युताः॥’
इति श्रुतेः मुख्यप्राणस्य ततोऽपि व्यक्तसद्गुणत्वात् ॥8॥
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न चाणुत्वे प्राणस्य ‘महान् वै मुख्यप्राणो येन व्याप्तं चराचरम्’ इति दृष्टायुक्तिः । ‘अणुर्वै मुख्यप्राणो य उत्क्रामति नाडीभिः’ इति दृष्टायुक्तेरनणुत्वे(युक्तिरनणुत्वे) प्राणस्य ॥9॥
न चाणुत्वे प्राणस्य ‘महान् वै मुख्यप्राणो येन व्याप्तं चराचरम्’ इति दृष्टायुक्तिः । ‘अणुर्वै मुख्यप्राणो य उत्क्रामति नाडीभिः’ इति दृष्टायुक्तेरनणुत्वे(युक्तिरनणुत्वे) प्राणस्य ॥9॥
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न चेन्द्रियाणां जीवाकरणत्वे दृष्टायुक्तिः । क्वचिदतद्वशत्वस्यापि दृष्टत्वात् । ‘यच्चक्षुषि तिष्ठन्’ इत्यादिदृष्टाऽत्युक्तेरीशाधीनत्वानङ्गीकारे । लौकिकदृष्टेस्त्वीशेनैव जीवानुसारित्वक्लृप्त्योपपत्तेः ॥10॥
न चेन्द्रियाणां जीवाकरणत्वे दृष्टायुक्तिः । क्वचिदतद्वशत्वस्यापि दृष्टत्वात् । ‘यच्चक्षुषि तिष्ठन्’ इत्यादिदृष्टाऽत्युक्तेरीशाधीनत्वानङ्गीकारे । लौकिकदृष्टेस्त्वीशेनैव जीवानुसारित्वक्लृप्त्योपपत्तेः ॥10॥
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न च ईशवशत्वसाम्यात् मुख्यप्राणस्याप्यन्यसाम्यम् ;‘(यदस्मिन्)यस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्’, ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्’ इत्यादि श्रुतेरीशसाम्यस्यापि भावात् । ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः’ इति श्रुतेर्मध्यमत्वोपपत्तेः ॥11॥
न च ईशवशत्वसाम्यात् मुख्यप्राणस्याप्यन्यसाम्यम् ;‘(यदस्मिन्)यस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्’, ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्’ इत्यादि श्रुतेरीशसाम्यस्यापि भावात् । ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः’ इति श्रुतेर्मध्यमत्वोपपत्तेः ॥11॥
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न च विरिञ्चस्यापि कर्तृत्वशक्तेः स एव शरीरादिस्रष्टा ।‘त्रिवृत्क्रिया यतो विष्णो रूपं च तदपेक्षया । रूपापेक्षं तथा नाम व्यवहारस्तदात्मकः ॥ अतो रूपस्य नाम्नश्च व्यवहारस्य चैकराट् । हरिरेव यतः कर्ता पिताऽतो भगवान् प्रभुः ॥’ इत्यादेस्तस्यैव कर्तृत्वशक्तेर्विरिञ्चस्य तु द्वारतयोपपत्तेः(द्वारतयैवोपपत्तेः) ॥12॥
 
न च विरिञ्चस्यापि कर्तृत्वशक्तेः स एव शरीरादिस्रष्टा
‘त्रिवृत्क्रिया यतो विष्णो रूपं च तदपेक्षया ।
रूपापेक्षं तथा नाम व्यवहारस्तदात्मकः ॥
अतो रूपस्य नाम्नश्च व्यवहारस्य चैकराट् ।
हरिरेव यतः कर्ता पिताऽतो भगवान् प्रभुः ॥’
इत्यादेस्तस्यैव कर्तृत्वशक्तेर्विरिञ्चस्य तु द्वारतयोपपत्तेः(द्वारतयैवोपपत्तेः) ॥12॥
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न च मिश्रत्वाद्(विमिश्रत्वाद्) भूतानां मिश्रतायाम्(विमिश्रितायाम्) अविशेषः । ‘अन्नमशितं त्रेधा विधीयते’ इत्यादिना मिश्रतायामपि विशेषोक्तेः ।‘सर्वं च भौतिकं मिश्रं मिश्रत्वेऽपि(मिश्रित्वे) विशेषतः । भौमं मांसमसृग्वारि तेजो मज्जा विशेषतः ॥’ इत्यादेश्च ॥13॥
 
न च मिश्रत्वाद्(विमिश्रत्वाद्) भूतानां मिश्रतायाम्(विमिश्रितायाम्) अविशेषः । ‘अन्नमशितं त्रेधा विधीयते’ इत्यादिना मिश्रतायामपि विशेषोक्तेः
‘सर्वं च भौतिकं मिश्रं मिश्रत्वेऽपि(मिश्रित्वे) विशेषतः ।
भौमं मांसमसृग्वारि तेजो मज्जा विशेषतः ॥’ इत्यादेश्च ॥13॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
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‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति वचनात् स्वाभाविकमरणमेव मुक्तिरिति न मन्तव्यम् । मुक्तिसाधनत्वेन ज्ञानादिगुणाधिक्योपदेशात् मरणे भूतवियोगस्यैवाभावात् । ‘भूतयुक्तः परं लोकमिमं लोकं च गच्छति’ इत्यादिवचनात् (च)॥1॥
‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति वचनात् स्वाभाविकमरणमेव मुक्तिरिति न मन्तव्यम् । मुक्तिसाधनत्वेन ज्ञानादिगुणाधिक्योपदेशात् मरणे भूतवियोगस्यैवाभावात् । ‘भूतयुक्तः परं लोकमिमं लोकं च गच्छति’ इत्यादिवचनात् (च)॥1॥
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‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्यत्र भूतानीति सामान्यनामानुक्त्वाऽपामिति विशेषनामकथनादपामेव सहगतिरिति न वाच्यम् । त्र्यात्मकत्वादपामर्थतः सर्वभूतानां गतिप्राप्तेः ॥2॥
‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्यत्र भूतानीति सामान्यनामानुक्त्वाऽपामिति विशेषनामकथनादपामेव सहगतिरिति न वाच्यम् । त्र्यात्मकत्वादपामर्थतः सर्वभूतानां गतिप्राप्तेः ॥2॥
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न च भूतानि गच्छन्तीति सहैवानुक्तेस्तदभावः । प्राणगतेरुपपत्तित उक्तत्वात् ॥3॥
न च भूतानि गच्छन्तीति सहैवानुक्तेस्तदभावः । प्राणगतेरुपपत्तित उक्तत्वात् ॥3॥
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न च ‘अग्निं वागप्येति’ इत्याद्यन्यथोक्तेः प्राणानां च न सहगतिः द्विरूपत्वात् प्राणानाम् ॥4॥
न च ‘अग्निं वागप्येति’ इत्याद्यन्यथोक्तेः प्राणानां च न सहगतिः द्विरूपत्वात् प्राणानाम् ॥4॥
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न च ‘प्रथमतो भूतानि जुह्वति’ इति विशेषानुक्तेः भूतानामसहगतिः ‘भूतानि जुह्वति’ इत्युपक्रमादपि ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्युपसंहारस्याधिक्यात् तदनुसारेणोपक्रमोक्तश्रद्धाशब्दस्यापि ता एवार्थ इत्यापत्तेः।  उपक्रमविरोधेनोपसंहारानुपपत्तेः। उपक्रमप्रामाण्यार्थमेवोपसंहारानुसारित्वमङ्गीकर्तव्यम् । व्याख्यानस्य पश्चात्तनत्वनियमात् । उपक्रमानुसारित्वनियमेऽप्युपसंहारस्योपसंहारेणैवोपक्रमार्थो ज्ञायते ॥5॥
न च ‘प्रथमतो भूतानि जुह्वति’ इति विशेषानुक्तेः भूतानामसहगतिः ‘भूतानि जुह्वति’ इत्युपक्रमादपि ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्युपसंहारस्याधिक्यात् तदनुसारेणोपक्रमोक्तश्रद्धाशब्दस्यापि ता एवार्थ इत्यापत्तेः।  उपक्रमविरोधेनोपसंहारानुपपत्तेः। उपक्रमप्रामाण्यार्थमेवोपसंहारानुसारित्वमङ्गीकर्तव्यम् । व्याख्यानस्य पश्चात्तनत्वनियमात् । उपक्रमानुसारित्वनियमेऽप्युपसंहारस्योपसंहारेणैवोपक्रमार्थो ज्ञायते ॥5॥
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न च विशेषाश्रवणनियम एव बलवान् । स्थानान्तरश्रवणस्याप्येतदनुरूपत्वात् । आर्थिकश्रवणमप्यनुक्तिं बाधत एव । किमु(किमुत) स्थानान्तरगतं स्पष्टश्रवणमिति कैमुत्यार्थमेव नेष्टादिकारिणां(इष्टाधिकारिणां) प्रतीतेरिति परिहारान्तरमुक्तम् ॥6॥
न च विशेषाश्रवणनियम एव बलवान् । स्थानान्तरश्रवणस्याप्येतदनुरूपत्वात् । आर्थिकश्रवणमप्यनुक्तिं बाधत एव । किमु(किमुत) स्थानान्तरगतं स्पष्टश्रवणमिति कैमुत्यार्थमेव नेष्टादिकारिणां(इष्टाधिकारिणां) प्रतीतेरिति परिहारान्तरमुक्तम् ॥6॥
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न च ‘अपाम सोमममृता अभूम’ इति विशेषत एव मोक्षफलस्याप्युक्तेः कर्मैव (मोक्षसाधनमिति)तत्साधनमिति मन्तव्यम् । ‘नान्यः पन्थाः अयनाय विद्यते’ । ‘स च आत्मानामेव लोकमुपास्ते । यावदिन्द्रो यावन्मनुर्यावदादित्यः’ इत्यादिश्रुतिबलाद् (अमृतत्व)अमृतशब्दस्य यथायोग्यमेवार्थकल्पनोपपत्तेः ॥7॥
न च ‘अपाम सोमममृता अभूम’ इति विशेषत एव मोक्षफलस्याप्युक्तेः कर्मैव (मोक्षसाधनमिति)तत्साधनमिति मन्तव्यम् । ‘नान्यः पन्थाः अयनाय विद्यते’ । ‘स च आत्मानामेव लोकमुपास्ते । यावदिन्द्रो यावन्मनुर्यावदादित्यः’ इत्यादिश्रुतिबलाद् (अमृतत्व)अमृतशब्दस्य यथायोग्यमेवार्थकल्पनोपपत्तेः ॥7॥
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न  (चानुशयस्य)चानुशयस्यापि सहभावात् स्वर्ग एव फलदत्वम्, ‘भुक्तशेषानुशयवान्’ (इत्यादिवचनबलात्)इत्यादिवचनाद्यथायोग्यमेव फलदानोपपत्तेः ॥8॥
न  (चानुशयस्य)चानुशयस्यापि सहभावात् स्वर्ग एव फलदत्वम्, ‘भुक्तशेषानुशयवान्’ (इत्यादिवचनबलात्)इत्यादिवचनाद्यथायोग्यमेव फलदानोपपत्तेः ॥8॥
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Line 1,699: Line 1,867:


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न च मार्गस्यापि सहभावाद्यथागतमेवागमनमिति नियमः । वचनबलाद्यथायोग्यमेवागमनोपपत्तेः ॥9॥
न च मार्गस्यापि सहभावाद्यथागतमेवागमनमिति नियमः । वचनबलाद्यथायोग्यमेवागमनोपपत्तेः ॥9॥
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न च ‘इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते’ इत्युपशब्देनेष्टादिभिराचारस्य सहपाठाच्चरणफलं पुनरावृत्तिं करणफलत्वेन भ्रमात् वदन्तीति वाच्यम् । ‘नान्यः पन्थाः’ इत्यादिवचनादेवोभयोरपि(इतिवचनादेव) चरणशब्देनैवोक्तेर्योग्यत्वात् ॥10॥
न च ‘इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते’ इत्युपशब्देनेष्टादिभिराचारस्य सहपाठाच्चरणफलं पुनरावृत्तिं करणफलत्वेन भ्रमात् वदन्तीति वाच्यम् । ‘नान्यः पन्थाः’ इत्यादिवचनादेवोभयोरपि(इतिवचनादेव) चरणशब्देनैवोक्तेर्योग्यत्वात् ॥10॥
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न च भयफलकामादिमिश्रबुद्धित्वादिष्टा(धि?)दिकारिणां संसारः । अनिष्टकादि(धि?)कारिणां तदभावान्मुक्तिरिति वाच्यम् । तेषां प्रबलदोषश्रुतेः ॥11॥
न च भयफलकामादिमिश्रबुद्धित्वादिष्टा(धि?)दिकारिणां संसारः । अनिष्टकादि(धि?)कारिणां तदभावान्मुक्तिरिति वाच्यम् । तेषां प्रबलदोषश्रुतेः ॥11॥
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न च नरकभोगस्यानित्यत्वकथनात् नित्यनरकोक्तिः विरुद्धा। ‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा । कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु ॥ तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ॥’ इति विभागात् ॥12॥
 
न च नरकभोगस्यानित्यत्वकथनात् नित्यनरकोक्तिः विरुद्धा।
‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा ।
कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु ॥
  तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ॥’ इति विभागात् ॥12॥
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न च सहस्थानादीशस्यापि नरकदुःखप्राप्तिः(दुःखप्राप्तिः) । स्वातन्त्र्यात् कारणाभावात् ॥13॥
न च सहस्थानादीशस्यापि नरकदुःखप्राप्तिः(दुःखप्राप्तिः) । स्वातन्त्र्यात् कारणाभावात् ॥13॥
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न च साधनेन सह श्रुतेस्तद्वत् फलेऽपि जीवस्य स्वातन्त्र्यम् । अविहितत्वेन कारणाभावात् । ‘अथैतयोः पथोः’ इत्यस्य च साधनार्थत्वात् ॥14॥
न च साधनेन सह श्रुतेस्तद्वत् फलेऽपि जीवस्य स्वातन्त्र्यम् । अविहितत्वेन कारणाभावात् । ‘अथैतयोः पथोः’ इत्यस्य च साधनार्थत्वात् ॥14॥
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न च दुःखसहस्थायित्वादन्धेतमस्यपि(अन्धन्तमस्यपि;अन्धतमस्यपि) सुखम् । ईशस्याप्रियत्वेनैव कारणाभावात् ॥15॥
न च दुःखसहस्थायित्वादन्धेतमस्यपि(अन्धन्तमस्यपि;अन्धतमस्यपि) सुखम् । ईशस्याप्रियत्वेनैव कारणाभावात् ॥15॥
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न च धूमादिदेवतासहावस्थानात् कर्मिणोऽपि तत्पदप्राप्तिः । तन्निमित्तविद्याख्यकारणाभावात् ॥16॥
न च धूमादिदेवतासहावस्थानात् कर्मिणोऽपि तत्पदप्राप्तिः । तन्निमित्तविद्याख्यकारणाभावात् ॥16॥
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न च तैस्तैः सहावस्थानादतिचिरत्वम् । ‘वत्सरात् पूर्वमेवतु’ इति क्लृप्तकालादधिकावस्थाने कारणाभावात् ॥17॥
न च तैस्तैः सहावस्थानादतिचिरत्वम् । ‘वत्सरात् पूर्वमेवतु’ इति क्लृप्तकालादधिकावस्थाने कारणाभावात् ॥17॥
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न च व्रीह्यादिजीवैः सहावस्थानात् दुःखप्राप्तिः । शब्दविहितत्वेन पापाख्यकारणाभावात् ॥18॥
न च व्रीह्यादिजीवैः सहावस्थानात् दुःखप्राप्तिः । शब्दविहितत्वेन पापाख्यकारणाभावात् ॥18॥
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‘ईशक्लृत्प्यैव पितरं प्रविश्यायाति न च वैयर्थ्य(वैयर्थ्यात् पितृशरीरगमनं) पितृशरीरगमने मातरम्’ इतीशक्लृप्तत्ववचनात् ॥19॥
‘ईशक्लृत्प्यैव पितरं प्रविश्यायाति न च वैयर्थ्य(वैयर्थ्यात् पितृशरीरगमनं) पितृशरीरगमने मातरम्’ इतीशक्लृप्तत्ववचनात् ॥19॥
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न च पितुः सकाशादन्यतो वौदर्यगर्भस्थशरीरमेव प्रवेष्टुमुपपत्तेः योनिप्रवेशाभाव इति वाच्यम् । ‘योनिद्वारेण देहं च प्राप्नोति प्रायशो नरः’ इति वचनात् सामान्यतो गत्यन्तराभावात् । ‘विशेषकारणादेव विशेषाज्जनिरिष्यते। सामान्यजननं चैव नृणां सामान्यहेतुतः(सामान्यहेतुना)॥’ इति वचनाच्च ॥20॥
 
न च पितुः सकाशादन्यतो वौदर्यगर्भस्थशरीरमेव प्रवेष्टुमुपपत्तेः योनिप्रवेशाभाव इति वाच्यम् । ‘योनिद्वारेण देहं च प्राप्नोति प्रायशो नरः’ इति वचनात् सामान्यतो गत्यन्तराभावात् ।  
‘विशेषकारणादेव विशेषाज्जनिरिष्यते।
सामान्यजननं चैव नृणां सामान्यहेतुतः(सामान्यहेतुना)॥’ इति वचनाच्च ॥20॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
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पश्चाददृष्टेः स्वप्नविषयस्यासत्त्वं न वाच्यम् । अशक्यकरणशक्तिमत्त्वादीश्वरस्य संस्कारेण सृष्ट्वा पुनः संस्कारमात्रतामापाद्य तस्यापि तिरोधानोपपत्तेः। जाग्रत्वमात्रस्य)जाग्रत्वप्रतीतिमात्रस्य भ्रमत्वात्(भ्रान्तित्वात्) ॥1॥
पश्चाददृष्टेः स्वप्नविषयस्यासत्त्वं न वाच्यम् । अशक्यकरणशक्तिमत्त्वादीश्वरस्य संस्कारेण सृष्ट्वा पुनः संस्कारमात्रतामापाद्य तस्यापि तिरोधानोपपत्तेः। जाग्रत्वमात्रस्य)जाग्रत्वप्रतीतिमात्रस्य भ्रमत्वात्(भ्रान्तित्वात्) ॥1॥
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न चाविज्ञानमात्रेण स्वप्नप्रतीत्या ज्ञानशक्त्यैव स्वप्नतिरोधानं नेशेनेति वाच्यम् । बोधे जीवस्यास्वातन्त्र्यात् । ज्ञानाज्ञानयोस्तदन्यत्वे जडत्वात् कैमुत्येनास्वातन्त्र्यात् । तत्स्वरूपत्वे तेनैव व्याख्यातत्वात् । उभयात्मकत्वे दोषद्वयापातात् । अनुभयत्वस्य व्याहतेः(अनुभयत्वे स्वव्याहतेः/अनुभयात्मकत्वे व्याहतेः) । तावन्मात्रनिमित्तत्वे मानाभावात् । सर्वस्येशहेतुत्वे मानाच्च ॥2॥
न चाविज्ञानमात्रेण स्वप्नप्रतीत्या ज्ञानशक्त्यैव स्वप्नतिरोधानं नेशेनेति वाच्यम् । बोधे जीवस्यास्वातन्त्र्यात् । ज्ञानाज्ञानयोस्तदन्यत्वे जडत्वात् कैमुत्येनास्वातन्त्र्यात् । तत्स्वरूपत्वे तेनैव व्याख्यातत्वात् । उभयात्मकत्वे दोषद्वयापातात् । अनुभयत्वस्य व्याहतेः(अनुभयत्वे स्वव्याहतेः/अनुभयात्मकत्वे व्याहतेः) । तावन्मात्रनिमित्तत्वे मानाभावात् । सर्वस्येशहेतुत्वे मानाच्च ॥2॥
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न च कालापेक्षयैव जागरितम् । अचेतनत्वादेव कालस्य । चेतनान्तरस्याप्यस्वातन्त्र्यात् ॥3॥
न च कालापेक्षयैव जागरितम् । अचेतनत्वादेव कालस्य । चेतनान्तरस्याप्यस्वातन्त्र्यात् ॥3॥
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न च परमात्मनोऽन्यत्राभावस्थाने दुःखित्वप्राप्तेर्नाडीषु सुप्तिर्न भवति उभयस्वीकारोपपत्तौ मानस्य क्लृप्त्यकारणम् (इत्यव्यवस्थिति)इत्यनवस्थितिदोषादतिप्रसङ्गात् ॥4॥
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न च प्रबोधस्य पृथगपि कारणदृष्टेः क्वचित् तदेव । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’(न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे) इति श्रुतेस्तत्रापि ईशकृतत्वे सम्यङ्‍मानात् ॥5॥
न च प्रबोधस्य पृथगपि कारणदृष्टेः क्वचित् तदेव । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’(न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे) इति श्रुतेस्तत्रापि ईशकृतत्वे सम्यङ्‍मानात् ॥5॥
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न च राजादीनां पृथग्दर्शनादीशान्तरकल्पना ।‘देशकालविशेषेऽपि स्वप्नादीनां स एव हि । तिरस्कर्ता च कर्ता च न खण्डेशः स राजवत् ॥’ इति श्रुतिमानात् ॥ 6॥
 
न च राजादीनां पृथग्दर्शनादीशान्तरकल्पना
‘देशकालविशेषेऽपि स्वप्नादीनां स एव हि ।
तिरस्कर्ता च कर्ता च न खण्डेशः स राजवत् ॥’ इति श्रुतिमानात् ॥ 6॥
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न च मोहे ब्रह्मप्राप्तिरेव पृथगवस्थात्वादिति वाच्यम् । परिशेषमानादर्धप्राप्तित्वावगमात् ॥7॥
न च मोहे ब्रह्मप्राप्तिरेव पृथगवस्थात्वादिति वाच्यम् । परिशेषमानादर्धप्राप्तित्वावगमात् ॥7॥
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न च स्थानभेदाद्विष्णोरपि भेदः । ‘अयमेव सः’ । ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यादि(इति) श्रुतिबलात् स्थानानां भेदस्तस्याभेद इति व्यवस्थोपपत्तेः ॥8॥
न च स्थानभेदाद्विष्णोरपि भेदः । ‘अयमेव सः’ । ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यादि(इति) श्रुतिबलात् स्थानानां भेदस्तस्याभेद इति व्यवस्थोपपत्तेः ॥8॥
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न च रूपवत्त्वारूपवत्त्ववचनयोः विरोधादप्रामाण्यम् । अप्राकृतरूपवत्त्वमिति व्यवस्थोपपत्तेः ॥9॥
न च रूपवत्त्वारूपवत्त्ववचनयोः विरोधादप्रामाण्यम् । अप्राकृतरूपवत्त्वमिति व्यवस्थोपपत्तेः ॥9॥
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न च परमात्मना चेतनत्वन्यायसाम्येन जीवस्याप्यभेदः । अल्पगुणत्वादिविरोधात्(अत्यल्पगुणत्वादिविरोधात्) ॥10॥
न च परमात्मना चेतनत्वन्यायसाम्येन जीवस्याप्यभेदः । अल्पगुणत्वादिविरोधात्(अत्यल्पगुणत्वादिविरोधात्) ॥10॥
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न च सादृश्यस्य(नच सादृश्यसत्वात्) सत्त्वात् साधनं विनैव जीवस्य तादृक्त्वव्यक्तिः । अनादितः संसारस्यानिवृत्तत्वेन भावात् ॥11॥
न च सादृश्यस्य(नच सादृश्यसत्वात्) सत्त्वात् साधनं विनैव जीवस्य तादृक्त्वव्यक्तिः । अनादितः संसारस्यानिवृत्तत्वेन भावात् ॥11॥
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न च मुक्तत्वादिगुणसाम्यात् ब्रह्मादीनां भक्त्यादिगुणसाम्यम् । ‘यथा यथाऽधिकारो विशिष्यते एवं ज्ञानं भक्तिर्बलं च विशिष्यते । मुक्तावानन्द एते च गुणा विशिष्यन्ते अत आहुर्ब्रह्मणे मुक्ता बलिं हरन्ति’ इत्यादिविशेषदृष्टेः ॥12॥
न च मुक्तत्वादिगुणसाम्यात् ब्रह्मादीनां भक्त्यादिगुणसाम्यम् । ‘यथा यथाऽधिकारो विशिष्यते एवं ज्ञानं भक्तिर्बलं च विशिष्यते । मुक्तावानन्द एते च गुणा विशिष्यन्ते अत आहुर्ब्रह्मणे मुक्ता बलिं हरन्ति’ इत्यादिविशेषदृष्टेः ॥12॥
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न च संहारकर्तुरसंहारादन्यरक्षाया अयोगः । ‘स सृजति स पालयति स विनाशयति’ इत्यादि विशेषवाक्यात् । अन्नदानाद्युपपत्तेश्च ॥13॥
न च संहारकर्तुरसंहारादन्यरक्षाया अयोगः । ‘स सृजति स पालयति स विनाशयति’ इत्यादि विशेषवाक्यात् । अन्नदानाद्युपपत्तेश्च ॥13॥
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न चाव्यक्तस्वभावस्य दर्शने तर्कबाधः । अनन्तशक्तित्वात् विष्णोस्तच्छक्त्या अव्यक्तस्यापि दर्शनोपपत्तेः ॥14॥
न चाव्यक्तस्वभावस्य दर्शने तर्कबाधः । अनन्तशक्तित्वात् विष्णोस्तच्छक्त्या अव्यक्तस्यापि दर्शनोपपत्तेः ॥14॥
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न च गुणानां गुणिस्वरूपत्वं विरुद्धम् । कालादिदृष्टान्तात् ॥15॥
न च गुणानां गुणिस्वरूपत्वं विरुद्धम् । कालादिदृष्टान्तात् ॥15॥
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न च ब्रह्मानन्दादीनामन्यथात्वात् अतच्छब्दत्वं तच्छब्दत्वे लोकोपमत्वं चेति(वेति) विलोमता । ‘अलौकिकास्तस्य शब्दास्तथाऽर्था अलौकिको ह्येष विष्णुः परत्वात् । तथापि शब्दा लौकिका अप्यमुष्मिन् प्रवर्तमाना अधिकार्थान् वदन्ति ॥’ इत्यादि श्रुतिभ्योऽलौकिकत्वावगमात् ॥16॥
न च ब्रह्मानन्दादीनामन्यथात्वात् अतच्छब्दत्वं तच्छब्दत्वे लोकोपमत्वं चेति(वेति) विलोमता । ‘अलौकिकास्तस्य शब्दास्तथाऽर्था अलौकिको ह्येष विष्णुः परत्वात् । तथापि शब्दा लौकिका अप्यमुष्मिन् प्रवर्तमाना अधिकार्थान् वदन्ति ॥’ इत्यादि श्रुतिभ्योऽलौकिकत्वावगमात् ॥16॥
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न च ब्रह्माद्यानन्दवैचित्र्ये(वैचित्र्येऽपि) बिम्बभूतविष्ण्वानन्दवैचित्र्यम् । आदित्यादिवदाधिक्यात् । न हि सूर्यकान्तप्रतिबिम्बस्याग्निजनकत्वशक्तिर्न जलगतस्येत्येतावता सूर्यवैचित्र्यम्(सूर्ये वैचित्र्याम्) । आधिक्यं हि तत्र निमित्तम् । सूर्यचन्द्रादिप्रतिबिम्बं विनाऽन्यत्र तथा विशेषादृष्टेः ॥ 17॥
न च ब्रह्माद्यानन्दवैचित्र्ये(वैचित्र्येऽपि) बिम्बभूतविष्ण्वानन्दवैचित्र्यम् । आदित्यादिवदाधिक्यात् । न हि सूर्यकान्तप्रतिबिम्बस्याग्निजनकत्वशक्तिर्न जलगतस्येत्येतावता सूर्यवैचित्र्यम्(सूर्ये वैचित्र्याम्) । आधिक्यं हि तत्र निमित्तम् । सूर्यचन्द्रादिप्रतिबिम्बं विनाऽन्यत्र तथा विशेषादृष्टेः ॥ 17॥
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न च नानाभावात् विष्णोश्चित्तप्रतिबिम्बरूपता । आधिक्यादेव । प्रतिबिम्बे हि दोषाश्च प्रतीयन्ते । अतो हि श्रुतिः प्रतिषेधति ‘नेदं यदिदमुपासते’ इति ॥ 18॥
न च नानाभावात् विष्णोश्चित्तप्रतिबिम्बरूपता । आधिक्यादेव । प्रतिबिम्बे हि दोषाश्च प्रतीयन्ते । अतो हि श्रुतिः प्रतिषेधति ‘नेदं यदिदमुपासते’ इति ॥ 18॥
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न च नानावतारकौतुकदर्शनात् विष्णोः क्वचिद्देशकालान्तरे कौतुकादेव सृष्ट्यादिकमकुर्वन्(सृप्त्यादि कुर्वन्) अन्यमेव सामस्त्येन नियोजयति । ‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात्’ इति क्रीडायामपि स्वातन्त्र्यात् । ‘स्वातन्त्र्यात् क्रीडते विष्णुर्न च स्वातन्त्र्यमन्यगम् । करोति क्वपि नियता क्रीडा सृष्ट्यादिगास्य(सृष्ट्यादिकाऽस्य) च ॥ नियतक्रीडनादेव कर्ता नान्योऽस्ति कस्यचित् । अस्वतन्त्रो हि चलति चलचित्तादशक्तितः ॥ स्वतन्त्रः पूर्णशक्तिः सन् कुतोऽसौ नियतिं त्यजेत् ॥’ इति श्रुतेश्च ॥19॥
 
न च नानावतारकौतुकदर्शनात् विष्णोः क्वचिद्देशकालान्तरे कौतुकादेव सृष्ट्यादिकमकुर्वन्(सृप्त्यादि कुर्वन्) अन्यमेव सामस्त्येन नियोजयति । ‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात्’ इति क्रीडायामपि स्वातन्त्र्यात् ।
‘स्वातन्त्र्यात् क्रीडते विष्णुर्न च स्वातन्त्र्यमन्यगम् ।
करोति क्वपि नियता क्रीडा सृष्ट्यादिगास्य(सृष्ट्यादिकाऽस्य) च ॥
नियतक्रीडनादेव कर्ता नान्योऽस्ति कस्यचित् ।
अस्वतन्त्रो हि चलति चलचित्तादशक्तितः ॥ स्वतन्त्रः पूर्णशक्तिः सन् कुतोऽसौ नियतिं त्यजेत् ॥’ इति श्रुतेश्च ॥19॥
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न च कर्मान्वयव्यतिरेकात् फलस्येश्वरः फलदातेति प्रलोभमात्रम् । तस्यैव स्वातन्त्र्यात् । ‘कर्माण्यनन्तानि यथेष्टमीशः सम्पाद्य तेषां फलमिच्छयैव । क्वचिद्ददाति क्व च नो ददाति न ह्यानन्त्यात् कर्मणां भोगनाशः । स्वातन्त्र्यं चेत् कर्मणां सर्वभोगः स्यान्न ह्येवं क्वापि तत् केनचित् स्यात् । अतोऽपि(अतो हि) स स्वेच्छया किञ्चिदेव फलं कुर्यात् विफलं प्रायशश्च । क्वचिज्ज्ञानं जनयन् भस्म कुर्यात् स्वेच्छावृत्तिस्तस्य विष्णोः सदैव ॥’ इति ब्रह्माण्डे । ‘स्वतन्त्रः ईश एवैकस्तद्वशं कर्म सर्वदा । अत ईशत्वमीशस्य न हीशोऽन्यः कथञ्चन ॥’ इति श्रुतिः(श्रुतेः) ॥ अतो प्रलोभकल्पने(प्रलोभमात्रकल्पने) श्रुतहानिरश्रुतकल्पना चेति हरिरेव फलप्रदः ॥20॥
 
न च कर्मान्वयव्यतिरेकात् फलस्येश्वरः फलदातेति प्रलोभमात्रम् । तस्यैव स्वातन्त्र्यात् ।  
‘कर्माण्यनन्तानि यथेष्टमीशः सम्पाद्य तेषां फलमिच्छयैव ।
क्वचिद्ददाति क्व च नो ददाति न ह्यानन्त्यात् कर्मणां भोगनाशः ।
स्वातन्त्र्यं चेत् कर्मणां सर्वभोगः स्यान्न ह्येवं क्वापि तत् केनचित् स्यात् ।
अतोऽपि(अतो हि) स स्वेच्छया किञ्चिदेव फलं कुर्यात् विफलं प्रायशश्च ।
क्वचिज्ज्ञानं जनयन् भस्म कुर्यात् स्वेच्छावृत्तिस्तस्य विष्णोः सदैव ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
‘स्वतन्त्रः ईश एवैकस्तद्वशं कर्म सर्वदा ।
अत ईशत्वमीशस्य न हीशोऽन्यः कथञ्चन ॥’ इति श्रुतिः(श्रुतेः) ॥ अतो प्रलोभकल्पने(प्रलोभमात्रकल्पने) श्रुतहानिरश्रुतकल्पना चेति हरिरेव फलप्रदः ॥20॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
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न च प्रतिशाखमुच्यमानानामर्थानां पृथकत्वात् तत्तच्छाखिभिरेव तत्र तत्रोक्तं ज्ञेयमिति नियमः । ‘नानावेदैरितिहासैः पुराणैः सुज्ञेय एको भगवान् युक्तिभिश्च’ इति श्रुतेः सुष्टु ज्ञेयत्वात् विष्णोः ॥1॥
न च प्रतिशाखमुच्यमानानामर्थानां पृथकत्वात् तत्तच्छाखिभिरेव तत्र तत्रोक्तं ज्ञेयमिति नियमः । ‘नानावेदैरितिहासैः पुराणैः सुज्ञेय एको भगवान् युक्तिभिश्च’ इति श्रुतेः सुष्टु ज्ञेयत्वात् विष्णोः ॥1॥
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न चाशक्यतया कस्यापि सर्वगुणोपसंहारो(गुणोपसंहारो) नास्ति । ‘सर्वे गुणाः सर्वदैव ह्युपास्यास्तेनैव(तेन) विद्वान् विधिकृन्नान्यथा स्यात्’ इति श्रुतेर्विहितक्रियालोपप्रसङ्गात् ॥2॥
न चाशक्यतया कस्यापि सर्वगुणोपसंहारो(गुणोपसंहारो) नास्ति । ‘सर्वे गुणाः सर्वदैव ह्युपास्यास्तेनैव(तेन) विद्वान् विधिकृन्नान्यथा स्यात्’ इति श्रुतेर्विहितक्रियालोपप्रसङ्गात् ॥2॥
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केषाञ्चित् सर्वगुणोपसंहारस्य कर्तव्यत्वे सर्वेषामपि तथा स्यात् अनेन नोपसंहर्तव्या अनेनोपसंहर्तव्या इत्यनिर्णीतेरिति न मन्तव्यम् । ‘यस्य यावद्गुणाः स्पष्टं प्रतिभासन्त्युपासते । युगपत् स्वभुजौ यद्वद् ध्यायेत् तावत एव सः । युगपद्ब्रह्मणः सर्वे भासन्ते हि गुणा हरेः । तदन्येषां यथायोग्यं स्वमाहात्म्यानुसारतः ॥’ इति श्रुतेर्युगपद्गुणप्रतीत्यादिमाहात्म्यान्निर्णयोपपत्तेः ॥3॥
 
केषाञ्चित् सर्वगुणोपसंहारस्य कर्तव्यत्वे सर्वेषामपि तथा स्यात् अनेन नोपसंहर्तव्या अनेनोपसंहर्तव्या इत्यनिर्णीतेरिति न मन्तव्यम् । ‘यस्य यावद्गुणाः स्पष्टं प्रतिभासन्त्युपासते ।
युगपत् स्वभुजौ यद्वद् ध्यायेत् तावत एव सः ।
युगपद्ब्रह्मणः सर्वे भासन्ते हि गुणा हरेः ।
तदन्येषां यथायोग्यं स्वमाहात्म्यानुसारतः ॥’ इति श्रुतेर्युगपद्गुणप्रतीत्यादिमाहात्म्यान्निर्णयोपपत्तेः ॥3॥
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न च फलानिर्णीतिः । माहात्म्येनैवान्यत् फलं महतामिति निर्णयोपपत्तेः ॥4॥
न च फलानिर्णीतिः । माहात्म्येनैवान्यत् फलं महतामिति निर्णयोपपत्तेः ॥4॥
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आनन्दादीनां केषाञ्चित् समुच्चये प्राप्ते सर्वगुणसमुच्चयः(सर्वेषां सर्वगुणसमुच्चयः) सर्वेषां स्यादिति न मन्तव्यम् । अल्पशक्तित्वात् तेषां पुंसाम् ॥5॥
आनन्दादीनां केषाञ्चित् समुच्चये प्राप्ते सर्वगुणसमुच्चयः(सर्वेषां सर्वगुणसमुच्चयः) सर्वेषां स्यादिति न मन्तव्यम् । अल्पशक्तित्वात् तेषां पुंसाम् ॥5॥
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प्रियशिरस्त्वादीनामानन्दादिविशेषत्वेनैव दर्शनात् तेषामपि सर्वोपसंहार्यत्वमिति न मन्तव्यम् ।यथायोग्यान्(यथायोगाद्) गुणपूगानुपास्य फलं भवेन्मुक्तिगं नान्यथा स्यात् । ‘नित्यैकाग्र्यव्यङ्ग्यताहेतुतश्च(नित्यैकाग्र्यताहेतुतश्च) साक्षाद्दृशिर्नो तद्विशेषैः(तत्तद्विशेषैः) स्मृतैश्च ॥’ इति श्रुतेः स्वयोग्यगुणैरेव फलभावात् ॥6॥
प्रियशिरस्त्वादीनामानन्दादिविशेषत्वेनैव दर्शनात् तेषामपि सर्वोपसंहार्यत्वमिति न मन्तव्यम् ।यथायोग्यान्(यथायोगाद्) गुणपूगानुपास्य फलं भवेन्मुक्तिगं नान्यथा स्यात् । ‘नित्यैकाग्र्यव्यङ्ग्यताहेतुतश्च(नित्यैकाग्र्यताहेतुतश्च) साक्षाद्दृशिर्नो तद्विशेषैः(तत्तद्विशेषैः) स्मृतैश्च ॥’ इति श्रुतेः स्वयोग्यगुणैरेव फलभावात् ॥6॥
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तर्हि ब्रह्मणोऽन्येषां देवादीनामपि बहुगुणोपासनया कार्यं नास्ति, मध्ये नियमासिद्धेरिति न मन्तव्यम् । तेषां भाव्युत्कर्षं ज्ञात्वा तदभिज्ञस्य ब्रह्मण एव गुणनियमोपदेशोपपत्तेः ।‘यो यो भावो देवतानां विमुक्तौ तत्तत् प्राप्तौ सुगुणानीशितुश्च । ब्रह्मा दिशत्यथ तांस्ते विचिन्त्य तत्तद्भावं प्राप्नुवन्त्यात्मशक्त्या ॥’ इति श्रुतेः ॥7॥
 
तर्हि ब्रह्मणोऽन्येषां देवादीनामपि बहुगुणोपासनया कार्यं नास्ति, मध्ये नियमासिद्धेरिति न मन्तव्यम् । तेषां भाव्युत्कर्षं ज्ञात्वा तदभिज्ञस्य ब्रह्मण एव गुणनियमोपदेशोपपत्तेः
‘यो यो भावो देवतानां विमुक्तौ तत्तत् प्राप्तौ सुगुणानीशितुश्च ।
ब्रह्मा दिशत्यथ तांस्ते विचिन्त्य तत्तद्भावं प्राप्नुवन्त्यात्मशक्त्या ॥’ इति श्रुतेः ॥7॥
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न च नानास्थानेषूक्तगुणानामनुपासनार्थता(अनुपासनार्थत्वम्) । विप्रकीर्णगुणान्(विप्रकीर्णान् गुणान्) पिण्डीकृत्योपासितुस्तत्सदृशफलप्राप्तेः(तादृशफलप्राप्तेः) तथा ध्यानार्थमेव गुणानामुक्तिरित्युपपत्तिः ॥8॥
न च नानास्थानेषूक्तगुणानामनुपासनार्थता(अनुपासनार्थत्वम्) । विप्रकीर्णगुणान्(विप्रकीर्णान् गुणान्) पिण्डीकृत्योपासितुस्तत्सदृशफलप्राप्तेः(तादृशफलप्राप्तेः) तथा ध्यानार्थमेव गुणानामुक्तिरित्युपपत्तिः ॥8॥
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न चाश्वापरोक्ष्यायानन्दादीनामपि लोपेनात्मेत्येतावता पूर्यते । (आत्मशब्दविशेषार्थ)आत्मशब्दार्थविशेषत्वादानन्दादीनाम् ॥9॥
न चाश्वापरोक्ष्यायानन्दादीनामपि लोपेनात्मेत्येतावता पूर्यते । (आत्मशब्दविशेषार्थ)आत्मशब्दार्थविशेषत्वादानन्दादीनाम् ॥9॥
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न चात्मशब्दो विभ्रमकरः । गुणाधिकानामधिकारिणां भगवद्गुणानधिकान् प्रकाशयतीत्यवधारणोपपत्तेः(अवधारणत्वोपपत्तेः) ॥10॥
न चात्मशब्दो विभ्रमकरः । गुणाधिकानामधिकारिणां भगवद्गुणानधिकान् प्रकाशयतीत्यवधारणोपपत्तेः(अवधारणत्वोपपत्तेः) ॥10॥
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अलौकिकगुणानामप्रतीतेर्लौकिकगुणाध्याने तदपाकृतिरेव भवतीति न मन्तव्यम् । लौकिकविलक्षणा अत्युत्तमा इति ध्यानस्यैव प्राधान्यात् ॥11॥
अलौकिकगुणानामप्रतीतेर्लौकिकगुणाध्याने तदपाकृतिरेव भवतीति न मन्तव्यम् । लौकिकविलक्षणा अत्युत्तमा इति ध्यानस्यैव प्राधान्यात् ॥11॥
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ब्रह्मणो ब्रह्माण्याश्च(ब्रह्मणश्च ब्रह्माण्या) स्थानैक्यं गुणतारतम्यं च यथागुणोपासनं मुक्तावाधिक्यं न भवतीत्यत्र लिङ्गम् । समविषमोपासनायुक्तेरिति न मन्तव्यम् ।‘यथाशक्ति स्मृतान् धात्रा गुणान् विष्णोः सरस्वती । स्मरेत् त्रैविक्रमाद्यांस्तु नित्यविक्रान्तिपूर्वकैः । कदाचिल्लोपेयेद्देवी स्थानैक्यं न गुणैस्ततः । साम्यं तयोर्यथाविष्णोर्गुणोपासा फलं भवेत् ॥’ इत्यध्यात्मवचनाद्यथाशक्ति क्रिया देव्याः ॥12॥
 
ब्रह्मणो ब्रह्माण्याश्च(ब्रह्मणश्च ब्रह्माण्या) स्थानैक्यं गुणतारतम्यं च यथागुणोपासनं मुक्तावाधिक्यं न भवतीत्यत्र लिङ्गम् । समविषमोपासनायुक्तेरिति न मन्तव्यम्
‘यथाशक्ति स्मृतान् धात्रा गुणान् विष्णोः सरस्वती ।
स्मरेत् त्रैविक्रमाद्यांस्तु नित्यविक्रान्तिपूर्वकैः ।
कदाचिल्लोपेयेद्देवी स्थानैक्यं न गुणैस्ततः ।
साम्यं तयोर्यथाविष्णोर्गुणोपासा फलं भवेत् ॥’
इत्यध्यात्मवचनाद्यथाशक्ति क्रिया देव्याः ॥12॥
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न चात्मशब्देनास्य पुरुषस्यैतावन्तो गुणा उच्यन्त इति व्यवस्थित्यभावः(व्यवस्थाभावः) । यस्य यावन्तोऽर्था युगपद् ध्यातुं शक्यन्ते तस्य तावन्त इति सन्धेः ॥13॥
न चात्मशब्देनास्य पुरुषस्यैतावन्तो गुणा उच्यन्त इति व्यवस्थित्यभावः(व्यवस्थाभावः) । यस्य यावन्तोऽर्था युगपद् ध्यातुं शक्यन्ते तस्य तावन्त इति सन्धेः ॥13॥
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न च मुमुक्षव इत्यविशेषाद् भरणस्य द्युतेश्च सर्वेषामपेक्षितत्वाच्च(अपेक्षितत्वात्) सम्भृतिद्युव्याप्ती(व्याप्तौ) अपि सामान्ये ।
न च मुमुक्षव इत्यविशेषाद् भरणस्य द्युतेश्च सर्वेषामपेक्षितत्वाच्च(अपेक्षितत्वात्) सम्भृतिद्युव्याप्ती(व्याप्तौ) अपि सामान्ये ।
               ‘सत्यो ज्ञानं(ज्ञानः) परमानन्दरूप आत्मेत्येवं नित्यदोपासनं स्यात् । नान्यत् किञ्चित् समुपासीत धीरः सर्वैर्गुणैर्देवगणा उपासते ॥ गुण्याकारस्मृतेरेव द्युतिमात्रं प्रतीयते । न व्याप्तिर्जगदस्मृत्या नानाशक्तिर्यतो मता ॥ देवानां युगपदज्ज्ञानं मानुषाणां(मनुष्याणां) तथा न तु । पर्यायेणाऽपि(पर्यायेणैव) सत्याः स्युर्नैवान्येषां कथञ्चन ॥’ इत्यादिप्रमाणबलात् ॥14॥
 
               ‘सत्यो ज्ञानं(ज्ञानः) परमानन्दरूप आत्मेत्येवं नित्यदोपासनं स्यात् ।
नान्यत् किञ्चित् समुपासीत धीरः सर्वैर्गुणैर्देवगणा उपासते ॥
गुण्याकारस्मृतेरेव द्युतिमात्रं प्रतीयते ।
न व्याप्तिर्जगदस्मृत्या नानाशक्तिर्यतो मता ॥
देवानां युगपदज्ज्ञानं मानुषाणां(मनुष्याणां) तथा न तु ।
पर्यायेणाऽपि(पर्यायेणैव) सत्याः स्युर्नैवान्येषां कथञ्चन ॥’ इत्यादिप्रमाणबलात् ॥14॥
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क्वचिद् बहुगुणाः क्वचिदल्पगुणाः श्रुतिष्वेवोच्यन्ते इत्युपसंहारस्याप्रयोजनतेति न वाच्यम् । ‘गुणा सर्वे ब्रह्मणैव(सर्वे गुणा ब्रह्मणैव) ह्युपास्या नान्यैर्देवैः किमु सर्वैर्मनुष्यैः ।’ इति श्रुतेः(इत्यादि श्रुतेः) । (सर्वगुणोपासन्यापि)सर्वगुणोपासकस्याप्यधिकारिणो भावादेकत्रापृथक्सर्वगुणानुक्तेः(सर्वगुणानुक्तेश्च) बलादुपसंहारानतेः ॥15॥
क्वचिद् बहुगुणाः क्वचिदल्पगुणाः श्रुतिष्वेवोच्यन्ते इत्युपसंहारस्याप्रयोजनतेति न वाच्यम् । ‘गुणा सर्वे ब्रह्मणैव(सर्वे गुणा ब्रह्मणैव) ह्युपास्या नान्यैर्देवैः किमु सर्वैर्मनुष्यैः ।’ इति श्रुतेः(इत्यादि श्रुतेः) । (सर्वगुणोपासन्यापि)सर्वगुणोपासकस्याप्यधिकारिणो भावादेकत्रापृथक्सर्वगुणानुक्तेः(सर्वगुणानुक्तेश्च) बलादुपसंहारानतेः ॥15॥
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न च मुक्तावुपासनभावे(उपासनाभावे) फलादिकमपि स्यादित्यतिप्रसङ्गः । उपासनायाः संस्काराख्यकारणस्य सत्त्वात् । ‘न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’ इत्यवृद्धिप्रमाणभावाच्च ॥16॥
न च मुक्तावुपासनभावे(उपासनाभावे) फलादिकमपि स्यादित्यतिप्रसङ्गः । उपासनायाः संस्काराख्यकारणस्य सत्त्वात् । ‘न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’ इत्यवृद्धिप्रमाणभावाच्च ॥16॥
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न च कर्मकरणशक्तेरप्यदूरत्वात् तत्संश्रयनियमः । उपासनाख्यकार्ये(उपासनाख्ये कार्ये) नित्यकृतिसंस्कारो न तथा कर्मणीति कार्यवैशेष्यात् ॥17॥
न च कर्मकरणशक्तेरप्यदूरत्वात् तत्संश्रयनियमः । उपासनाख्यकार्ये(उपासनाख्ये कार्ये) नित्यकृतिसंस्कारो न तथा कर्मणीति कार्यवैशेष्यात् ॥17॥
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(न च योग्यताख्य.....)न चायोग्यताख्यविशिष्टकारणाज्ज्ञानिष्वपि केषाञ्चिन्मोक्षो न भवतीति नियमः । ज्ञानिनां मोक्षं ददात्येवेश्वरः(ईश्वरस्वभावात्) स्वभावात् । अयोग्यानां ज्ञानस्यैवानुपपत्तेः(ज्ञानस्यैवोत्पत्त्यनुपपत्तेः/ज्ञानस्यैवानुत्पत्त्युपपत्तेः) ॥18॥
(न च योग्यताख्य.....)न चायोग्यताख्यविशिष्टकारणाज्ज्ञानिष्वपि केषाञ्चिन्मोक्षो न भवतीति नियमः । ज्ञानिनां मोक्षं ददात्येवेश्वरः(ईश्वरस्वभावात्) स्वभावात् । अयोग्यानां ज्ञानस्यैवानुपपत्तेः(ज्ञानस्यैवोत्पत्त्यनुपपत्तेः/ज्ञानस्यैवानुत्पत्त्युपपत्तेः) ॥18॥
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न च प्रयत्नानुसारिणो मुक्तावाधिकारिका आनन्दादयः(मुक्तावाधिकारिकानन्दादयः) । अधिकारानुसारित्वात् प्रयत्नस्य । कथञ्चिदधिकयत्ने(अधिके यत्ने) तत्साधनादिवस्तूनां दूषणप्राप्तेः । ‘स्वाधिकाराधिको यत्नः प्रायशो नोपपद्यते । कथञ्चिदधिके यत्ने दोषः कश्चित् समापतेत् ॥’ इति वचनाच्च ॥19॥
 
न च प्रयत्नानुसारिणो मुक्तावाधिकारिका आनन्दादयः(मुक्तावाधिकारिकानन्दादयः) । अधिकारानुसारित्वात् प्रयत्नस्य । कथञ्चिदधिकयत्ने(अधिके यत्ने) तत्साधनादिवस्तूनां दूषणप्राप्तेः ।  
‘स्वाधिकाराधिको यत्नः प्रायशो नोपपद्यते ।
कथञ्चिदधिके यत्ने दोषः कश्चित् समापतेत् ॥’ इति वचनाच्च ॥19॥
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न चैकस्मादेको विशिष्टो दृष्ट एवेति प्राणाद् विशिष्टजीवाभावे दृष्टवैरूप्यमिति दोषः । ‘यः सर्वमवजानीयादृते देवं नारायणं देवीं च परमां श्रियम् । स प्राणानवरुद्ध्येमं मन्त्रमावर्तयीत । आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः । घोषा इदस्य शृण्विरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम ॥’ इति । ‘स ह्येषां भूतानां वरिष्ठो न ह्येतस्मात् कश्चनोपरि विना देवं नारायणं देवीं च परमां श्रियम्’ इति प्रतिक्रियाविधानादिविरोधात् ॥20॥
 
न चैकस्मादेको विशिष्टो दृष्ट एवेति प्राणाद् विशिष्टजीवाभावे दृष्टवैरूप्यमिति दोषः ।
‘यः सर्वमवजानीयादृते देवं नारायणं देवीं च परमां श्रियम् । स प्राणानवरुद्ध्येमं मन्त्रमावर्तयीत ।
आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः ।
घोषा इदस्य शृण्विरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम ॥’ इति ।  
‘स ह्येषां भूतानां वरिष्ठो न ह्येतस्मात् कश्चनोपरि विना देवं नारायणं देवीं च परमां श्रियम्’ इति प्रतिक्रियाविधानादिविरोधात् ॥20॥
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Line 2,612: Line 2,876:


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‘अस्ति भगवः प्राणाद्भूय’ इति प्रश्नाद्यभावात् प्राणस्यैवोन्नतिप्रतीतेर्न विष्णोरपि ततः परत्वमिति न मन्तव्यम् । ‘एष तु वा अतिवदति’ इति विशेषणात् प्रश्नप्रतिवचनप्रतिसन्धानोपपत्तेः ॥21॥
‘अस्ति भगवः प्राणाद्भूय’ इति प्रश्नाद्यभावात् प्राणस्यैवोन्नतिप्रतीतेर्न विष्णोरपि ततः परत्वमिति न मन्तव्यम् । ‘एष तु वा अतिवदति’ इति विशेषणात् प्रश्नप्रतिवचनप्रतिसन्धानोपपत्तेः ॥21॥
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न च सत्यादीनामभेदानुक्तेरन्यत्वम् । ‘सत्यं पूर्णं विज्ञानं पूर्णं कृतिः पूर्णा निष्ठा पूर्णा श्रद्धा(मतिः पूर्णा श्रद्धा पूर्णा) पूर्णा मति पूर्णा सुखं पूर्णं भूमा पूर्णोऽहं पूर्ण आत्मा पूर्णो नात्र किञ्चिदूनं पूर्णमेवाधस्तात् पूर्णमुपरिष्ठात् पूर्णं मध्यतः पूर्णं सर्वतः । तदेष श्लोको भवति ।’‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥’ इति श्रुतेः सर्वेषामनूनत्वात् । ‘सत्याद्या अहमात्मान्ता यद्गुणाः समुदीरिताः । तस्मै नमो भगवते यस्मादेव विमुच्यते ॥’ इति वचनाच्च ॥22॥
 
न च सत्यादीनामभेदानुक्तेरन्यत्वम् । ‘सत्यं पूर्णं विज्ञानं पूर्णं कृतिः पूर्णा निष्ठा पूर्णा श्रद्धा(मतिः पूर्णा श्रद्धा पूर्णा) पूर्णा मति पूर्णा सुखं पूर्णं भूमा पूर्णोऽहं पूर्ण आत्मा पूर्णो नात्र किञ्चिदूनं पूर्णमेवाधस्तात् पूर्णमुपरिष्ठात् पूर्णं मध्यतः पूर्णं सर्वतः । तदेष श्लोको भवति ।’
‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥’ इति श्रुतेः सर्वेषामनूनत्वात् ।  
‘सत्याद्या अहमात्मान्ता यद्गुणाः समुदीरिताः ।
तस्मै नमो भगवते यस्मादेव विमुच्यते ॥’ इति वचनाच्च ॥22॥
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न च श्रियोऽप्रयत्नत्वादनुपासनं संसारो वा । नित्यं भगवदुपस्थितेरतिप्रियत्वात् संस्कारपाटवान्नित्योपासोपपत्तेश्च ॥23॥
न च श्रियोऽप्रयत्नत्वादनुपासनं संसारो वा । नित्यं भगवदुपस्थितेरतिप्रियत्वात् संस्कारपाटवान्नित्योपासोपपत्तेश्च ॥23॥
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न च बन्धदार्ढ्ये श्रवणादीनामफलता । अन्यथोपासां विनैव श्रवणादिज्ञानमात्रेण मुक्तिरिति दोषः ।‘श्रवणादित्रयोत्पन्नदृष्ट्यैव स्वेच्छया हरिः । प्रसन्नो मुक्तिदो नित्यमन्यथा न कथञ्चन ॥’ इतीश्वरेच्छानियतिश्रुतेः ॥24॥
 
न च बन्धदार्ढ्ये श्रवणादीनामफलता । अन्यथोपासां विनैव श्रवणादिज्ञानमात्रेण मुक्तिरिति दोषः
‘श्रवणादित्रयोत्पन्नदृष्ट्यैव स्वेच्छया हरिः ।
प्रसन्नो मुक्तिदो नित्यमन्यथा न कथञ्चन ॥’ इतीश्वरेच्छानियतिश्रुतेः ॥24॥
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न च गुर्वधीनत्वे ज्ञानमोक्षयोर्ज्ञानिनोऽपि कदाचित् गुरुकोपाज्ज्ञानपराभावेन(पराभवेन)अमुक्तिप्रसङ्गान्न गुर्वधीनत्वमिति । ‘ज्ञानिनो गुरुशापेऽपि नामुक्तिः संसृतेः क्वचित् । आनन्दह्रासदोषेण सैव मुक्तिर्विदुष्यति ॥’ इति वचनान्मुक्तिदूषणेनैव गुरुशापादेः(कोपादेः) कृतार्थत्वात् । ज्ञानिनो ब्रह्मवस्तुवैभवेन मुक्तिः स्यादिति गुरोर्वरेण वा मुक्त्युपपत्तेः(मुक्त्यनुपपत्तेः) ॥25॥
 
न च गुर्वधीनत्वे ज्ञानमोक्षयोर्ज्ञानिनोऽपि कदाचित् गुरुकोपाज्ज्ञानपराभावेन(पराभवेन)अमुक्तिप्रसङ्गान्न गुर्वधीनत्वमिति ।  
‘ज्ञानिनो गुरुशापेऽपि नामुक्तिः संसृतेः क्वचित् ।
आनन्दह्रासदोषेण सैव मुक्तिर्विदुष्यति ॥’
इति वचनान्मुक्तिदूषणेनैव गुरुशापादेः(कोपादेः) कृतार्थत्वात् । ज्ञानिनो ब्रह्मवस्तुवैभवेन मुक्तिः स्यादिति गुरोर्वरेण वा मुक्त्युपपत्तेः(मुक्त्यनुपपत्तेः) ॥25॥
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शिष्यस्यापि पुरुषत्वसाम्यात् धारणादेस्तत्प्रयत्नस्य न दौर्बल्यमिति न मन्तव्यम् । ‘गुरुप्रसादो बलवान्’ इत्यादिविशेषोक्तेः(विशेषोपपत्तेः) ॥26॥
शिष्यस्यापि पुरुषत्वसाम्यात् धारणादेस्तत्प्रयत्नस्य न दौर्बल्यमिति न मन्तव्यम् । ‘गुरुप्रसादो बलवान्’ इत्यादिविशेषोक्तेः(विशेषोपपत्तेः) ॥26॥
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न चोत्तमगुरुस्वीकारार्थत्वेन प्राप्तसन्त्यागनिमित्तदोषः । तत्र दोषे मानाभावात् ॥27॥
न चोत्तमगुरुस्वीकारार्थत्वेन प्राप्तसन्त्यागनिमित्तदोषः । तत्र दोषे मानाभावात् ॥27॥
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न च विद्या कर्म वा संसारनिवृत्तिकारणमिति कारणानिर्णयः । ‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इत्यवधारणात् विद्यावचनस्य प्राधान्यात् ॥28॥
न च विद्या कर्म वा संसारनिवृत्तिकारणमिति कारणानिर्णयः । ‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इत्यवधारणात् विद्यावचनस्य प्राधान्यात् ॥28॥
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न च विद्यावचनस्य प्राधान्यं(विद्यावचनप्राधान्यं) भ्रमः । ‘प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ इति भगवतस्तस्मिन्नेव (अभ्यधिकप्रीतिवचनात्)अधिकप्रीतिवचनात् । ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः’ इति तत्प्रीतेरेव मोक्षवचनाच्च ॥29॥
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न च कस्यचिद्विशेषज्ञानोपपत्तेर्भक्त्यादिकं विना मुक्तिः । ‘भक्त्यैवैनं जानाति भक्त्यैवैनं पश्यति भक्त्यैव बन्धात् विमुच्यते भक्त्यैवानन्दीभवति’, ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः’, ‘भिनत्ति कर्मसङ्घातं प्रसन्नो भगवान् हरिः’ इत्याद्यागमात् ॥30॥
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न च ‘दृष्ट्वैव तं मुच्यते नापरेण’, ‘यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः’, ‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा’ इत्यादि सामान्यालापमात्रेण दर्शनस्याविशेषः । ‘यथायोग्यमेवैष आत्मानं दर्शयति यथाधिकारं देवेभ्योऽतो ब्रह्मैवैनमभिपश्यत्यथात्मैवात्मानमभिपश्यति, सुस्थिरो ह्येष नियमः’ इति दर्शनविशेषनियमस्य सुस्थिरत्ववचनात् । यावान्यश्चास्मीति ब्रह्मण एव ज्ञानोपपत्तेः । ‘यावान्’ इत्यत्रापि सामान्यविशेषज्ञानोपपत्तेश्च ॥31॥
न च ‘दृष्ट्वैव तं मुच्यते नापरेण’, ‘यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः’, ‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा’ इत्यादि सामान्यालापमात्रेण दर्शनस्याविशेषः । ‘यथायोग्यमेवैष आत्मानं दर्शयति यथाधिकारं देवेभ्योऽतो ब्रह्मैवैनमभिपश्यत्यथात्मैवात्मानमभिपश्यति, सुस्थिरो ह्येष नियमः’ इति दर्शनविशेषनियमस्य सुस्थिरत्ववचनात् । यावान्यश्चास्मीति ब्रह्मण एव ज्ञानोपपत्तेः । ‘यावान्’ इत्यत्रापि सामान्यविशेषज्ञानोपपत्तेश्च ॥31॥
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न च भगवतः सर्वत्र गुणसाम्यात् यस्य कस्यापि रूपस्य दर्शनात् सर्वेषां मुक्तिः ।‘समोऽपि भगवान् स्वबिम्बदर्शन एवैनं मोचयति । यथा समेष्वपि कर्मसु स्वकृतमेवैनं भोजयति ॥’ इति श्रुत्युक्तस्वकृतप्राप्तिदृष्टान्तात् ॥32॥
 
न च भगवतः सर्वत्र गुणसाम्यात् यस्य कस्यापि रूपस्य दर्शनात् सर्वेषां मुक्तिः
‘समोऽपि भगवान् स्वबिम्बदर्शन एवैनं मोचयति ।
यथा समेष्वपि कर्मसु स्वकृतमेवैनं भोजयति ॥’ इति श्रुत्युक्तस्वकृतप्राप्तिदृष्टान्तात् ॥32॥
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भक्तिरेवैनमिति भक्तेरेव पृथङ्‍मोचकत्वदर्शनान्नेशकृत्यमिति न मन्तव्यम् ।‘अनादितो गुणाः सन्तो भक्त्याद्या न ह्यमूमुचन् । जीवं तद्गुणसुव्यक्तिं कृत्वैनं मोचयेद्धरिः । कञ्चिन्न मोचयेद्वाऽसौ स्वातन्त्र्यं तस्य तेन हि(तेन तस्य हि) । भक्तिवाक्करणत्वेन सावकाशेशवागथ । भक्त्यैनं मोचयेद् विष्णुरिति मानत्वमेष्यति ॥’ इति ब्रह्मतर्कवचनादनादिगुणविस्तरे सत्यप्यव्यक्त्यादिना तदिच्छां विना मोक्षाप्राप्तेः ॥33॥
 
भक्तिरेवैनमिति भक्तेरेव पृथङ्‍मोचकत्वदर्शनान्नेशकृत्यमिति न मन्तव्यम्
‘अनादितो गुणाः सन्तो भक्त्याद्या न ह्यमूमुचन् ।
जीवं तद्गुणसुव्यक्तिं कृत्वैनं मोचयेद्धरिः ।
कञ्चिन्न मोचयेद्वाऽसौ स्वातन्त्र्यं तस्य तेन हि(तेन तस्य हि) ।
भक्तिवाक्करणत्वेन सावकाशेशवागथ ।
भक्त्यैनं मोचयेद् विष्णुरिति मानत्वमेष्यति ॥’
इति ब्रह्मतर्कवचनादनादिगुणविस्तरे सत्यप्यव्यक्त्यादिना तदिच्छां विना मोक्षाप्राप्तेः ॥33॥
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न चांशिमार्गस्यांशेनागम्यत्वात् तयोर्भेदः । साधनोत्तमस्यादृष्टस्यांशिकृतस्यांशेन भुज्यमानत्वात् । अन्यथाऽदृष्टं विना शरीराद्यनुपपत्तेः(शरीर अनुपपत्तेः) ॥34॥
न चांशिमार्गस्यांशेनागम्यत्वात् तयोर्भेदः । साधनोत्तमस्यादृष्टस्यांशिकृतस्यांशेन भुज्यमानत्वात् । अन्यथाऽदृष्टं विना शरीराद्यनुपपत्तेः(शरीर अनुपपत्तेः) ॥34॥
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न च गुणान्तरसन्धानस्य क्वचित्(क्वापि) दर्शनमात्रेण समाधिकाङ्गदेवतान्तरगुणा अप्यङ्गदेवतान्तर उपसंहर्तव्याः । नानागुणत्वेन तेषां श्रुतिषु दृष्टेः । अनिषिद्धगुणानां वाक्यान्वयन्यायेनोपसंहारान्न शाखास्वित्यादिविशेषः । उत्तमेष्वधमगुणापेक्षया मन्त्रादिवद्वेति ॥35॥
न च गुणान्तरसन्धानस्य क्वचित्(क्वापि) दर्शनमात्रेण समाधिकाङ्गदेवतान्तरगुणा अप्यङ्गदेवतान्तर उपसंहर्तव्याः । नानागुणत्वेन तेषां श्रुतिषु दृष्टेः । अनिषिद्धगुणानां वाक्यान्वयन्यायेनोपसंहारान्न शाखास्वित्यादिविशेषः । उत्तमेष्वधमगुणापेक्षया मन्त्रादिवद्वेति ॥35॥
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न च भूमगुणस्योपासकं प्रति विशेषाभावेऽपि तत्तदिष्टगुणानुसारेण फलोपपत्तिरित्यविशेषः । ‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते’  इत्यादिशिष्टेः ॥36॥
न च भूमगुणस्योपासकं प्रति विशेषाभावेऽपि तत्तदिष्टगुणानुसारेण फलोपपत्तिरित्यविशेषः । ‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते’  इत्यादिशिष्टेः ॥36॥
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न च भूमगुण उपासकानामेकप्रकारेणैव प्रतीयत इत्यङ्गीकार्यम् । विशेषस्य कल्पनोपपत्तेरिति न मन्तव्यम् । ‘यावानेवाधिकारेषु विशेषोऽनून एव हि ।ततो(अतो) भूमत्वदृष्टौ च ब्रह्मादीनां पृथक् पृथक् ॥’ इति विशेषस्यानूनत्ववचनात् ॥37॥
 
न च भूमगुण उपासकानामेकप्रकारेणैव प्रतीयत इत्यङ्गीकार्यम् । विशेषस्य कल्पनोपपत्तेरिति न मन्तव्यम् ।  
‘यावानेवाधिकारेषु विशेषोऽनून एव हि
ततो(अतो) भूमत्वदृष्टौ च ब्रह्मादीनां पृथक् पृथक् ॥’ इति विशेषस्यानूनत्ववचनात् ॥37॥
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न च शुद्धमोक्षसाधनवैरूप्यान्मोक्षसाधनत्वेनोपदिष्टं विना (विष्णावेव)विष्णोरेवोपासनान्तरस्याकर्तव्यता । अविघ्नतासाधनत्वात् ॥38॥
न च शुद्धमोक्षसाधनवैरूप्यान्मोक्षसाधनत्वेनोपदिष्टं विना (विष्णावेव)विष्णोरेवोपासनान्तरस्याकर्तव्यता । अविघ्नतासाधनत्वात् ॥38॥
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न च काम्यसाधनानामपि गुणानामङ्गत्वादेवोपसंहर्तव्यतानियमः । अनुपसंहारे विरोधाभावात् । काम्यानामनियताङ्गत्वाच्च । ‘अर्थादिधर्मसिद्धौ हि न नियत्याऽङ्गमिष्यते’ इति ब्रह्मतर्के ॥39॥
न च काम्यसाधनानामपि गुणानामङ्गत्वादेवोपसंहर्तव्यतानियमः । अनुपसंहारे विरोधाभावात् । काम्यानामनियताङ्गत्वाच्च । ‘अर्थादिधर्मसिद्धौ हि न नियत्याऽङ्गमिष्यते’ इति ब्रह्मतर्के ॥39॥
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न च देवादीनामिति(देवानामिति) तत्रैव विशेषवचनाभावात् ‘ब्रह्मा शिरसि ललाटे रुद्रः’ इत्यादीनां नावश्योपास्यता । ‘देवादीनामेव ध्यायेदङ्गेषु अङ्गदेवताः परस्य विशिष्टा हि गुणा मुक्तौ देवानां(देवादीनां) भवन्ति ते हि तादृशास्ते हि हरेरनुरूपाः’ इति श्रुतेर्गुणवैशेष्यात् ॥40॥
न च देवादीनामिति(देवानामिति) तत्रैव विशेषवचनाभावात् ‘ब्रह्मा शिरसि ललाटे रुद्रः’ इत्यादीनां नावश्योपास्यता । ‘देवादीनामेव ध्यायेदङ्गेषु अङ्गदेवताः परस्य विशिष्टा हि गुणा मुक्तौ देवानां(देवादीनां) भवन्ति ते हि तादृशास्ते हि हरेरनुरूपाः’ इति श्रुतेर्गुणवैशेष्यात् ॥40॥
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न च क्रियात्वादुपासनाया(उपसंहारस्य) अग्निष्टोमादिवत् प्रतिशाखं वक्तव्यता । ‘उपासना यजनं चेति साम्यं तत्तद्विशेषान् संहरेत् सर्वतश्च । तथाकर्तॄणां तत्फलानां विशेषाद् व्यर्था हि शाखा अन्यथैवं च सार्थाः ॥’ इत्युपासनाविशेषाणामधिकारिविशेषाणां(.....त्वधिकारिविशेषाणांं चागऽमेवगमात् ॥41॥
 
न च क्रियात्वादुपासनाया(उपसंहारस्य) अग्निष्टोमादिवत् प्रतिशाखं वक्तव्यता ।
‘उपासना यजनं चेति साम्यं तत्तद्विशेषान् संहरेत् सर्वतश्च ।
तथाकर्तॄणां तत्फलानां विशेषाद् व्यर्था हि शाखा अन्यथैवं च सार्थाः ॥’ इत्युपासनाविशेषाणामधिकारिविशेषाणां(.....त्वधिकारिविशेषाणांं चागऽमेवगमात् ॥41॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
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न च ज्ञानिन औदार्यान्मोक्षादन्यफलेच्छाया एवासम्भवात् तदुक्तिः प्रशंसामात्रमिति वाच्यम् । प्रायशो न सम्भवत्येव । कस्यचित् सौभरिवत् सा भवति(सौभर्यादिवद्भवति) चेज्ज्ञानेनैवाशेषमभीप्सितं(अशेषमीप्सितं) भवतीति व्यवस्थोपपत्तेः ॥1॥
न च ज्ञानिन औदार्यान्मोक्षादन्यफलेच्छाया एवासम्भवात् तदुक्तिः प्रशंसामात्रमिति वाच्यम् । प्रायशो न सम्भवत्येव । कस्यचित् सौभरिवत् सा भवति(सौभर्यादिवद्भवति) चेज्ज्ञानेनैवाशेषमभीप्सितं(अशेषमीप्सितं) भवतीति व्यवस्थोपपत्तेः ॥1॥
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न चाधिकारे समेपि तेषामेवोच्चावचशक्तियोगात् फलभेदोपपत्तेरधिकारविशेषकल्पनं व्यर्थम् । भक्त्याद्यधिकारतारतम्येन(भक्त्याद्यधिकारानुसारेण) शास्त्रात् फलप्राप्तेः सर्वेषामविशेषात्  । दृश्यमानत्वाच्च भक्त्याद्यधिकारतारतम्यस्य । उच्चवचशक्तेरपि तन्निबन्धनत्वात् ॥2॥
न चाधिकारे समेपि तेषामेवोच्चावचशक्तियोगात् फलभेदोपपत्तेरधिकारविशेषकल्पनं व्यर्थम् । भक्त्याद्यधिकारतारतम्येन(भक्त्याद्यधिकारानुसारेण) शास्त्रात् फलप्राप्तेः सर्वेषामविशेषात्  । दृश्यमानत्वाच्च भक्त्याद्यधिकारतारतम्यस्य । उच्चवचशक्तेरपि तन्निबन्धनत्वात् ॥2॥
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न च ज्ञानिनामात्मस्वरूपदार्ढ्यात् सत्प्रवृत्तिविपरीतप्रवृत्योरविशेषः । ‘एतावतोऽधिका नास्ति प्राप्तिरित्यन्ततः स्थिता ।या स्थितिस्तां समाप्नोति यथाशक्ति प्रयत्नतः ॥
 
न च ज्ञानिनामात्मस्वरूपदार्ढ्यात् सत्प्रवृत्तिविपरीतप्रवृत्योरविशेषः ।  
‘एतावतोऽधिका नास्ति प्राप्तिरित्यन्ततः स्थिता
या स्थितिस्तां समाप्नोति यथाशक्ति प्रयत्नतः ॥
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‘विपरीतप्रवृत्तेस्तु तस्य(तस्या) ह्रासोऽधिकं भवेत् ॥’ इति वचनात् स्थितिविशेषोपपत्तेः ॥4-5॥
‘विपरीतप्रवृत्तेस्तु तस्य(तस्या) ह्रासोऽधिकं भवेत् ॥’ इति वचनात् स्थितिविशेषोपपत्तेः ॥4-5॥
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न च सर्वजीवानामेकप्रकार एव निजस्वभावश्चैतन्यमिति फलेऽप्यविशेषः । निषेधसामान्यविधिक्रियाणां विभक्तत्वात् । ‘नादेवो देवपदमन्विच्छेदन्विच्छन् यात्यधरं तमः । न देवः स्वीयं पदमन्विच्छन् विदुष्यति । तदेव ह्यस्य स्वम्’ इति निषेधविभागः । ‘स्थिरं ज्ञानं स्थिरो हरावभिषङ्गः स्थिरमोजो बलं विराग एतद्धि सामान्यं देवानाम् । अथान्येषामस्थिराण्येवेतानि(.....अस्थिराण्येव एतानि/अस्थिराण्येतानि) सर्वाण्यथापि यथायोगं विनेयानि‘ इति सामान्यविभागः । ‘ज्ञानदानमेव देवानां विहितं तप एवर्षीणामाचार एव मनुष्याणां तदविरोधेनान्यानि करणीयानि’ इति विधिविभागः । ‘चरन्ति देवा विहितं समस्तमर्धमेव मुनयो दशांशतो मनुष्याः’ इति क्रियाविभागः ॥6॥
न च सर्वजीवानामेकप्रकार एव निजस्वभावश्चैतन्यमिति फलेऽप्यविशेषः । निषेधसामान्यविधिक्रियाणां विभक्तत्वात् । ‘नादेवो देवपदमन्विच्छेदन्विच्छन् यात्यधरं तमः । न देवः स्वीयं पदमन्विच्छन् विदुष्यति । तदेव ह्यस्य स्वम्’ इति निषेधविभागः । ‘स्थिरं ज्ञानं स्थिरो हरावभिषङ्गः स्थिरमोजो बलं विराग एतद्धि सामान्यं देवानाम् । अथान्येषामस्थिराण्येवेतानि(.....अस्थिराण्येव एतानि/अस्थिराण्येतानि) सर्वाण्यथापि यथायोगं विनेयानि‘ इति सामान्यविभागः । ‘ज्ञानदानमेव देवानां विहितं तप एवर्षीणामाचार एव मनुष्याणां तदविरोधेनान्यानि करणीयानि’ इति विधिविभागः । ‘चरन्ति देवा विहितं समस्तमर्धमेव मुनयो दशांशतो मनुष्याः’ इति क्रियाविभागः ॥6॥
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न च स्वातन्त्र्याद् देवानामेव ज्ञानादिफलं, न किञ्चिदन्येषामिति वाच्यम् ।‘ त्वरयैव मनुष्याणां सिद्धिरत्वरयैव तु । देवानां तत्प्रसादेन मुक्त्या एव सतां नृणाम् ॥’ इति मानुषमुक्त्यर्थमेव देवानामत्वरया सिद्धिश्रुतेः ॥7॥
 
न च स्वातन्त्र्याद् देवानामेव ज्ञानादिफलं, न किञ्चिदन्येषामिति वाच्यम्
त्वरयैव मनुष्याणां सिद्धिरत्वरयैव तु ।
देवानां तत्प्रसादेन मुक्त्या एव सतां नृणाम् ॥’ इति मानुषमुक्त्यर्थमेव देवानामत्वरया सिद्धिश्रुतेः ॥7॥
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न च गृहस्थानामशेषकर्मविशेषयोग्यत्वादाधिक्यं मुक्तौ । त्वरयैव गृहिणः साधयन्ति मुक्तिमत्वरयैव यतयस्तेभ्यश्चात्वरया देवास्तेषु च ब्रह्मा । तदेष श्लोकः । ‘शतं परानभिपश्यैव देवं ब्रह्माऽचरद्दुश्चरं यत्तपोऽग्र्यम् । विहाय रागं मनसश्चोपरिष्ठः(मनसश्चापि विष्ठां) ततोऽभवत् परमेष्ठी स मुक्तौ ॥’ इति । ‘यो हि त्वरया साधयेत् स मन्दं सुखमाप्नुयात् । यो ह्यत्वरया स महत् ॥’ इति श्रुतेर्गृहिस्थो यतीनां तेभ्यो देवानामत्वरया सिद्धेः । बहुकालसाधनात् बहुकर्माधिकारमात्रस्य दुर्बलत्वात् ॥8॥
 
न च गृहस्थानामशेषकर्मविशेषयोग्यत्वादाधिक्यं मुक्तौ । त्वरयैव गृहिणः साधयन्ति मुक्तिमत्वरयैव यतयस्तेभ्यश्चात्वरया देवास्तेषु च ब्रह्मा । तदेष श्लोकः ।  
‘शतं परानभिपश्यैव देवं ब्रह्माऽचरद्दुश्चरं यत्तपोऽग्र्यम् ।
विहाय रागं मनसश्चोपरिष्ठः(मनसश्चापि विष्ठां) ततोऽभवत् परमेष्ठी स मुक्तौ ॥’ इति । ‘यो हि त्वरया साधयेत् स मन्दं सुखमाप्नुयात् । यो ह्यत्वरया स महत् ॥’ इति श्रुतेर्गृहिस्थो यतीनां तेभ्यो देवानामत्वरया सिद्धेः । बहुकालसाधनात् बहुकर्माधिकारमात्रस्य दुर्बलत्वात् ॥8॥
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न चाविष्कारेण कथनादशेषतोऽपि योग्या ज्ञानिनो भवन्तीत्यास्थानचत्वरादिषु स्थित्वैव प्रकथनीयम् । न ह्येवं त्वरमाणे सिद्धिभर्वति । अयोग्यानामपि ग्रहण(श्रवण)प्रसङ्गात् । तस्मात् विचार्य योग्यानामेवात्वरयैव कथयित्वा सिद्धिर्भवति । ‘त्यक्त्वा त्वरां ब्रह्मविद्यां वदेत जनाय योग्याय सदैव विद्वान्’ इति श्रुतेः । ‘मा न स्तेनेभ्यः’ इत्यादेश्च ॥9॥
न चाविष्कारेण कथनादशेषतोऽपि योग्या ज्ञानिनो भवन्तीत्यास्थानचत्वरादिषु स्थित्वैव प्रकथनीयम् । न ह्येवं त्वरमाणे सिद्धिभर्वति । अयोग्यानामपि ग्रहण(श्रवण)प्रसङ्गात् । तस्मात् विचार्य योग्यानामेवात्वरयैव कथयित्वा सिद्धिर्भवति । ‘त्यक्त्वा त्वरां ब्रह्मविद्यां वदेत जनाय योग्याय सदैव विद्वान्’ इति श्रुतेः । ‘मा न स्तेनेभ्यः’ इत्यादेश्च ॥9॥
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न च विरोधाभावात् साधनानुष्ठानजन्मन्येवापरोक्षज्ञानं मुक्तिश्चेति नियमः । प्रतिबन्धे सति तन्निरासेनात्वरयैव सिद्ध्युपपत्तेः । ‘यद्यारब्धं कर्म निबन्धकं स्यात् प्रेत्यैव पश्येद्योगमेवान्ववेक्ष्य’ इत्यादिश्रुतेः । ‘अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्’(भ.गी.६.४५) इति (च) भगवद्वचनम् ॥10-11॥
न च विरोधाभावात् साधनानुष्ठानजन्मन्येवापरोक्षज्ञानं मुक्तिश्चेति नियमः । प्रतिबन्धे सति तन्निरासेनात्वरयैव सिद्ध्युपपत्तेः । ‘यद्यारब्धं कर्म निबन्धकं स्यात् प्रेत्यैव पश्येद्योगमेवान्ववेक्ष्य’ इत्यादिश्रुतेः । ‘अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्’(भ.गी.६.४५) इति (च) भगवद्वचनम् ॥10-11॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
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न च श्रवणाद्यनवृत्त्याऽपरोक्षज्ञानोदये सर्वेषां सुशक्यत्वमिति गुणः । महाफलत्वात् सर्वेषामशक्यताया एवोपपन्नत्वात् । अन्यथा सर्वसुशक्यस्यैव साधनतया सर्वेषां मोक्षापत्तेः ॥1॥
न च श्रवणाद्यनवृत्त्याऽपरोक्षज्ञानोदये सर्वेषां सुशक्यत्वमिति गुणः । महाफलत्वात् सर्वेषामशक्यताया एवोपपन्नत्वात् । अन्यथा सर्वसुशक्यस्यैव साधनतया सर्वेषां मोक्षापत्तेः ॥1॥
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न च शश्वदतिप्रसिद्धत्वात् आत्मशब्दोदितं स्वामित्वं न नित्यश उपास्यम् । अन्येभ्योऽधिकफलत्वेन सविशेषत्वादात्मत्वस्य ॥2॥
न च शश्वदतिप्रसिद्धत्वात् आत्मशब्दोदितं स्वामित्वं न नित्यश उपास्यम् । अन्येभ्योऽधिकफलत्वेन सविशेषत्वादात्मत्वस्य ॥2॥
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तर्हि विशेषवत्वादेव प्रतीकमपीश्वर इत्युपास्यमिति नास्ति(इति च नास्ति/न) । यत्र सन्धिरुपपत्तिर्विद्यते तस्यैव ग्राह्यत्वात् । अन्यस्येशत्वग्रहणस्य मिथ्याज्ञानत्वादेवानुपपत्तेः ॥3॥
तर्हि विशेषवत्वादेव प्रतीकमपीश्वर इत्युपास्यमिति नास्ति(इति च नास्ति/न) । यत्र सन्धिरुपपत्तिर्विद्यते तस्यैव ग्राह्यत्वात् । अन्यस्येशत्वग्रहणस्य मिथ्याज्ञानत्वादेवानुपपत्तेः ॥3॥
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न च प्रतिदिनं विविधगुणन्यासेन भगवत्प्रीत्युपपत्तेर्न ब्रह्मतादृष्टिनियम इति वाच्यम् । अशेषगुणान्तर्भावेन तस्यैवाधिकसाधनत्वात् ॥4॥
न च प्रतिदिनं विविधगुणन्यासेन भगवत्प्रीत्युपपत्तेर्न ब्रह्मतादृष्टिनियम इति वाच्यम् । अशेषगुणान्तर्भावेन तस्यैवाधिकसाधनत्वात् ॥4॥
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न च विविधस्थानेष्वादित्यादीनां चरणाद्विष्ण्वङ्गेष्वादित्यादिमतिनियमो नास्तीति वाच्यम् । तत्कृतावेव कृत्यस्याप्तत्वादादित्यादीनाम् ॥5॥
न च विविधस्थानेष्वादित्यादीनां चरणाद्विष्ण्वङ्गेष्वादित्यादिमतिनियमो नास्तीति वाच्यम् । तत्कृतावेव कृत्यस्याप्तत्वादादित्यादीनाम् ॥5॥
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न च ज्ञानस्य सम्यक्तद्विषयत्वमात्रेण पूर्तेरासनादिना न कार्यमिति वाच्यम् । आसनादिना निश्चलत्वादिविशेषकार्योपपत्तेः ॥6॥
न च ज्ञानस्य सम्यक्तद्विषयत्वमात्रेण पूर्तेरासनादिना न कार्यमिति वाच्यम् । आसनादिना निश्चलत्वादिविशेषकार्योपपत्तेः ॥6॥
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न चान्यस्यापि साधनस्य कर्तुं शक्यत्वान्न यावन्मुक्ति ध्यानं कार्यमिति वाच्यम् । ध्यानं विनाऽपरोक्षज्ञानाख्यविशेषकार्यानुपपत्तेः ॥7॥
न चान्यस्यापि साधनस्य कर्तुं शक्यत्वान्न यावन्मुक्ति ध्यानं कार्यमिति वाच्यम् । ध्यानं विनाऽपरोक्षज्ञानाख्यविशेषकार्यानुपपत्तेः ॥7॥
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न च ज्ञानोदयेऽशेषकर्मक्षये कृतकृत्यत्वात् तदैव मुक्तिः, न चेत् कर्माक्षय इति वाच्यम् । प्रारब्धस्यैव कृतस्य यावज्ज्ञानं संस्थितेः ।‘ कर्माणि क्षपयेद्विष्णुरप्रारब्धानि विद्यया । प्रारब्धानि तु भोगेन क्षपयन् स्वगतिं नयेत् ॥’ इति वचनात् ॥8॥
 
न च ज्ञानोदयेऽशेषकर्मक्षये कृतकृत्यत्वात् तदैव मुक्तिः, न चेत् कर्माक्षय इति वाच्यम् । प्रारब्धस्यैव कृतस्य यावज्ज्ञानं संस्थितेः
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
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न च ‘वाक् पूर्वरूपं मन उत्तररूपं’, ‘मनः पूर्वरूपं वागुत्तररूपम्’ इत्युक्तेः व्यामिश्रत्वादनिर्णीतिरेव । ‘वाक् पूर्वरूपं मन उत्तररूपं’ इति वाचः पूर्ववर्णदेवतात्वनिर्देशमात्रेण ‘मनःपूर्वरूपं’ इत्यनेन साम्यम् । ‘मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयत्यथ वाचा व्याहरति’ इति युक्तितो विशेषो मनःपूर्वकत्वस्यैव श्रुत इति प्राधान्यं मनस एव(एवेति) हि ज्ञायते ।‘सृष्टौ च विलये चैव सदा पूर्वप्रवर्तने ।नियन्तृत्वे च वचसो मनोऽधीशं(मनोऽधीशः) शिवो हि तत् ॥’ इति श्रुतेश्च ॥1॥
 
न च ‘वाक् पूर्वरूपं मन उत्तररूपं’, ‘मनः पूर्वरूपं वागुत्तररूपम्’ इत्युक्तेः व्यामिश्रत्वादनिर्णीतिरेव । ‘वाक् पूर्वरूपं मन उत्तररूपं’ इति वाचः पूर्ववर्णदेवतात्वनिर्देशमात्रेण ‘मनःपूर्वरूपं’ इत्यनेन साम्यम् । ‘मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयत्यथ वाचा व्याहरति’ इति युक्तितो विशेषो मनःपूर्वकत्वस्यैव श्रुत इति प्राधान्यं मनस एव(एवेति) हि ज्ञायते
‘सृष्टौ च विलये चैव सदा पूर्वप्रवर्तने
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न च मनःपूर्वकत्वनियमादशेषदृष्टादृष्टव्यापाराणां तस्य प्राणादनूनता‘इन्द्रियस्थैः स्वरूपैस्तु ज्ञानानि जनयत्यसौ । मनस्स्थेन विशेषेण कार्मै कर्मकृदेव च । पृथक्स्थितेन रूपेण जीवं धारयति प्रभुः । जीवस्थितेन रूपेण वेदयत्यहमित्यपि । प्राण एको वशी नित्यं बाह्यान्तःकरणेश्वरः । तान्येतान्यवशान्येव तथापि कृपयैव सः । पृथक्शक्तोऽपि तद्गैस्तु स्वरूपैस्तद्गकार्यकृत् । तस्येशो भगवान् विष्णुरेवमेष यथाऽन्यगः ॥’ इत्यादिश्रुतेः प्राणस्यैवाढ्यतावगमात् ॥2॥
 
न च मनःपूर्वकत्वनियमादशेषदृष्टादृष्टव्यापाराणां तस्य प्राणादनूनता
‘इन्द्रियस्थैः स्वरूपैस्तु ज्ञानानि जनयत्यसौ ।
मनस्स्थेन विशेषेण कार्मै कर्मकृदेव च ।
पृथक्स्थितेन रूपेण जीवं धारयति प्रभुः ।
जीवस्थितेन रूपेण वेदयत्यहमित्यपि ।
प्राण एको वशी नित्यं बाह्यान्तःकरणेश्वरः ।
तान्येतान्यवशान्येव तथापि कृपयैव सः ।
पृथक्शक्तोऽपि तद्गैस्तु स्वरूपैस्तद्गकार्यकृत् ।
तस्येशो भगवान् विष्णुरेवमेष यथाऽन्यगः ॥’ इत्यादिश्रुतेः प्राणस्यैवाढ्यतावगमात् ॥2॥
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‘सोऽध्यक्षे’ इत्यस्याप्येवमेवाशङ्का परिहारश्च । श्रुतिबाहुल्यमेवाशङ्कायां(शङ्कायां) परिहारे च विशेषहेतुः ॥3॥
‘सोऽध्यक्षे’ इत्यस्याप्येवमेवाशङ्का परिहारश्च । श्रुतिबाहुल्यमेवाशङ्कायां(शङ्कायां) परिहारे च विशेषहेतुः ॥3॥
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न च भूतानामुत्पत्तिक्रमवैपरीत्येन लयोक्तेर्मुक्तलिययोर्विशेषभावाच्चैकस्मिन्नेव भूते सर्वेषां लयोऽर्थतः क्लृप्त इति वाच्यम् । तत्तद्भूतोद्भवत्वात् तत्तद्देवानां तत्समानानां(तत्समानां) च विशेषवचनाभावे स्वसमानलयस्थान एव लयोपपत्तेः । विशेषश्रुतेश्च ॥4-5॥
न च भूतानामुत्पत्तिक्रमवैपरीत्येन लयोक्तेर्मुक्तलिययोर्विशेषभावाच्चैकस्मिन्नेव भूते सर्वेषां लयोऽर्थतः क्लृप्त इति वाच्यम् । तत्तद्भूतोद्भवत्वात् तत्तद्देवानां तत्समानानां(तत्समानां) च विशेषवचनाभावे स्वसमानलयस्थान एव लयोपपत्तेः । विशेषश्रुतेश्च ॥4-5॥
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न च प्रकृतेः (असंसारादिना)संसाराभावादिनेशेनाप्यन्यथाकर्तुमशक्यत्वेन सुदृढत्वात् सर्वसाम्यमेवेश्वरेण, न चेत् संसारित्वमिति युक्तम् । ईश्वरस्य महामहिमत्वात् । नित्यमसंसारित्वस्य(नित्यासंसारित्वस्य) नित्यं तदनुग्रहेणैवोपपत्तेः ।‘ सदाऽनित्यतयाऽनित्यं नित्यं नित्यात्मना यतः । नित्ययैव स्वशक्त्यैशो नियामयति नित्यदा ॥’‘ द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावश्चेतना धृतिः । प्रकृतिः पुरुषश्चैव न सन्ति यदुपेक्षया ॥’ इत्यादिश्रुतेश्च ॥6॥
 
न च प्रकृतेः (असंसारादिना)संसाराभावादिनेशेनाप्यन्यथाकर्तुमशक्यत्वेन सुदृढत्वात् सर्वसाम्यमेवेश्वरेण, न चेत् संसारित्वमिति युक्तम् । ईश्वरस्य महामहिमत्वात् । नित्यमसंसारित्वस्य(नित्यासंसारित्वस्य) नित्यं तदनुग्रहेणैवोपपत्तेः
सदाऽनित्यतयाऽनित्यं नित्यं नित्यात्मना यतः ।
नित्ययैव स्वशक्त्यैशो नियामयति नित्यदा ॥’‘ द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावश्चेतना धृतिः ।
प्रकृतिः पुरुषश्चैव न सन्ति यदुपेक्षया ॥’ इत्यादिश्रुतेश्च ॥6॥
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न चान्यदेवादीनां प्राणाधीनत्वात् तत्प्राप्तिनियमात् परप्राप्तिर्नास्त्येव ।‘प्राणं प्राप्य परं देवास्तदन्ये चैव तद्गताः । प्राप्नुवन्ति परं देवं वसन्ति च यथासुखम् ॥’ इति विशेषश्रुतेः ॥7॥
 
न चान्यदेवादीनां प्राणाधीनत्वात् तत्प्राप्तिनियमात् परप्राप्तिर्नास्त्येव
‘प्राणं प्राप्य परं देवास्तदन्ये चैव तद्गताः ।
प्राप्नुवन्ति परं देवं वसन्ति च यथासुखम् ॥’ इति विशेषश्रुतेः ॥7॥
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न च सत्यसङ्कल्पत्वादेरीश्वरसङ्कल्पाद्यनुसारित्वनियमे संसारसमानधर्मत्वं मुक्तेरिति वाच्यम् । कृतार्थत्वेनैव विशेषोपपत्तेः ।‘अपूर्णतादिभावो वा दुःखं वा नास्ति किञ्चन ।मुक्तस्य पारतन्त्र्येऽपि तारतम्येऽप्यतः सुखी ॥’ इति च श्रुतिः ॥8॥
 
न च सत्यसङ्कल्पत्वादेरीश्वरसङ्कल्पाद्यनुसारित्वनियमे संसारसमानधर्मत्वं मुक्तेरिति वाच्यम् । कृतार्थत्वेनैव विशेषोपपत्तेः
‘अपूर्णतादिभावो वा दुःखं वा नास्ति किञ्चन
मुक्तस्य पारतन्त्र्येऽपि तारतम्येऽप्यतः सुखी ॥’ इति च श्रुतिः ॥8॥
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न च प्रारब्धकर्मशेषत्वात्(प्रारब्धकर्मशेषवत्वात्) उत्क्रान्तावविशेषो ज्ञानिनः । ज्ञानोदयानन्तरं सर्वदा ज्ञानफलस्यानुवृत्तेः(ज्ञानफलस्यानुप्रवृत्तेः) ।‘प्रारब्धकर्मशेषस्तु विरजातरणावधिः । स्वोदयात् फलदं ज्ञानमादेहं कर्म वाऽऽरवेः(चारवेः) ।तथापि प्रकृतेर्बन्धो ब्रह्मणा सह भिद्यते ॥’ इति हि श्रुतिः(इति श्रुतिः) । ‘शरीरे पाप्मनो हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते । स तेजसि सूर्ये सम्पन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं हैव स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सम्प्राप्नोति(स प्राप्नोति) विरजां नदीं तत्सुकृतदुष्कृते विधूनुते’ ‘ते ब्रह्मलोके तु परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे’ इति च । ‘अन्यथाभावनियमोऽनृतता कार्यकारणे’ इति च ॥9॥
 
न च प्रारब्धकर्मशेषत्वात्(प्रारब्धकर्मशेषवत्वात्) उत्क्रान्तावविशेषो ज्ञानिनः । ज्ञानोदयानन्तरं सर्वदा ज्ञानफलस्यानुवृत्तेः(ज्ञानफलस्यानुप्रवृत्तेः)
‘प्रारब्धकर्मशेषस्तु विरजातरणावधिः ।
स्वोदयात् फलदं ज्ञानमादेहं कर्म वाऽऽरवेः(चारवेः)
तथापि प्रकृतेर्बन्धो ब्रह्मणा सह भिद्यते ॥’ इति हि श्रुतिः(इति श्रुतिः) । ‘शरीरे पाप्मनो हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते । स तेजसि सूर्ये सम्पन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं हैव स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सम्प्राप्नोति(स प्राप्नोति) विरजां नदीं तत्सुकृतदुष्कृते विधूनुते’ ‘ते ब्रह्मलोके तु परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे’ इति च । ‘अन्यथाभावनियमोऽनृतता कार्यकारणे’ इति च ॥9॥
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न च कृष्यादिलौकिकसाधनस्य फलस्मरणानपेक्षत्वात् स्वर्गमोक्षयोरपि तथात्वमिति वाच्यम् । ‘क्रियानुवृत्तिर्लौकिके साधने तु मनोनुवृत्तिर्वैदिके साधने स्यात् ।भवेत् फलं सर्वथेत्येव तस्मात् स्मरेत् सदा निश्चितत्वेन विद्वान् ॥’ इति श्रुतेस्तदनुसार्यनुवृत्तेः लौकिकवैदिकयोः साम्यात् । अतोऽत्र फलानुस्मरणं लवनादिकृष्यनुवृत्तिवद्द्रष्टव्यम् । वचनप्रामाण्यात् ॥10॥
 
न च कृष्यादिलौकिकसाधनस्य फलस्मरणानपेक्षत्वात् स्वर्गमोक्षयोरपि तथात्वमिति वाच्यम् ।  
‘क्रियानुवृत्तिर्लौकिके साधने तु मनोनुवृत्तिर्वैदिके साधने स्यात्
भवेत् फलं सर्वथेत्येव तस्मात् स्मरेत् सदा निश्चितत्वेन विद्वान् ॥’ इति श्रुतेस्तदनुसार्यनुवृत्तेः लौकिकवैदिकयोः साम्यात् । अतोऽत्र फलानुस्मरणं लवनादिकृष्यनुवृत्तिवद्द्रष्टव्यम् । वचनप्रामाण्यात् ॥10॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
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न च तत्र तत्र मार्गस्यान्यथोक्तेरधिकारिभेदेन पृथङ्‍(पृथक् पृथक्)मार्गसुक्रमोपपत्तिरिति वाच्यम् । ‘सर्वे वा एत उत्क्रामन्ति तेऽर्चिषमेवाभियन्ति(.....वाभिसम्यन्ति) ततो वायुं ततोऽहः पूर्वपक्षमित्येष उ एव(एव उ एव) ब्रह्मपथः । द्वे स्रुती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च’ इति विशेषश्रुतितो ज्ञानिनामेकमार्गस्यैव प्राप्तत्वात्(प्राप्तेः) । ‘एष एव ब्रह्मपथः’ इत्यवधारणविरोधोऽन्यथा(विरोधादन्यथा) । एजदिति वैदिकानुष्ठानवत उक्तेर्नाधोगतिविरोधः ।‘पुनरावर्तिनो ये तु तेषां धूम्रपथो ध्रुवः । अन्येषामर्चिरादिश्च तद्भेदो मध्यसंस्थितिः ।धूमार्चिरादिदेवेभ्यः प्राप्यानुज्ञां तु मध्यगाः ।विहृत्य स्वेष्टदेशेषु तदूर्ध्वं याति वाघरम्(चाघरम्) । अत्यल्पानामविज्ञाताऽप्यनुज्ञावर्तिनां भवेत् । पुंद्वारेण स्वदृष्ट्या वा यथायोग्यं विमुच्यताम् ।अतो न मार्गभेदोऽस्ति न हि मार्गोऽत्र सम्भवः ।प्रेतत्वं चाधरो(वाऽधरो) मार्गः पापजत्वात् तयोः(द्वयोः) पृथक् ॥’ इति स्मृतेश्च ॥1-4॥
 
न च तत्र तत्र मार्गस्यान्यथोक्तेरधिकारिभेदेन पृथङ्‍(पृथक् पृथक्)मार्गसुक्रमोपपत्तिरिति वाच्यम् । ‘सर्वे वा एत उत्क्रामन्ति तेऽर्चिषमेवाभियन्ति(.....वाभिसम्यन्ति) ततो वायुं ततोऽहः पूर्वपक्षमित्येष उ एव(एव उ एव) ब्रह्मपथः । द्वे स्रुती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च’ इति विशेषश्रुतितो ज्ञानिनामेकमार्गस्यैव प्राप्तत्वात्(प्राप्तेः) । ‘एष एव ब्रह्मपथः’ इत्यवधारणविरोधोऽन्यथा(विरोधादन्यथा) । एजदिति वैदिकानुष्ठानवत उक्तेर्नाधोगतिविरोधः
‘पुनरावर्तिनो ये तु तेषां धूम्रपथो ध्रुवः ।
अन्येषामर्चिरादिश्च तद्भेदो मध्यसंस्थितिः
धूमार्चिरादिदेवेभ्यः प्राप्यानुज्ञां तु मध्यगाः
विहृत्य स्वेष्टदेशेषु तदूर्ध्वं याति वाघरम्(चाघरम्) ।
अत्यल्पानामविज्ञाताऽप्यनुज्ञावर्तिनां भवेत् ।  
पुंद्वारेण स्वदृष्ट्या वा यथायोग्यं विमुच्यताम्
अतो न मार्गभेदोऽस्ति न हि मार्गोऽत्र सम्भवः
प्रेतत्वं चाधरो(वाऽधरो) मार्गः पापजत्वात् तयोः(द्वयोः) पृथक् ॥’ इति स्मृतेश्च ॥1-4॥
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न च सोमादग्निमग्नेरिन्द्रमिति सोमादग्नेरवरस्यापि(खमस्यापि) प्राप्तेः प्रधानवायोरप्यवरोऽन्यः प्राप्योऽस्त्विति वाच्यम् । उत्तमत्वात् तस्यैव ब्रह्मप्रापयितृत्वशक्तेः । ‘वायुरेव ब्रह्म गमयति तस्य ह्येषा(हैषा) शक्तिः । न ह्यन्यो ब्रह्म गमयति प्रियो ह्येनद्गमयति । न ह्यन्यः प्रियो ब्रह्मणः’ इति श्रुतेः । मार्गे त्ववरस्यापि यथामार्गं पश्चात् प्राप्तिर्भवति लोकवत् । न हि राजानं यः कश्चित् प्रापयति क्लृप्तमतिप्रियं चातिहाय(चापहाय) ॥5॥
न च सोमादग्निमग्नेरिन्द्रमिति सोमादग्नेरवरस्यापि(खमस्यापि) प्राप्तेः प्रधानवायोरप्यवरोऽन्यः प्राप्योऽस्त्विति वाच्यम् । उत्तमत्वात् तस्यैव ब्रह्मप्रापयितृत्वशक्तेः । ‘वायुरेव ब्रह्म गमयति तस्य ह्येषा(हैषा) शक्तिः । न ह्यन्यो ब्रह्म गमयति प्रियो ह्येनद्गमयति । न ह्यन्यः प्रियो ब्रह्मणः’ इति श्रुतेः । मार्गे त्ववरस्यापि यथामार्गं पश्चात् प्राप्तिर्भवति लोकवत् । न हि राजानं यः कश्चित् प्रापयति क्लृप्तमतिप्रियं चातिहाय(चापहाय) ॥5॥
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न च चतुर्मुखस्य प्राप्तिपर्यन्तं(मुक्तिपर्यन्तं) सन्ततत्वनियमात् बन्धस्य तावद्भगवत्प्राप्तिर्नास्तीति नियमः ।‘यान्ति देवं परं केचित् पूर्वं केचिल्लये विभुम् ।योग्यतातारतम्येन विशेषोऽथमपीष्यते ॥’ इति श्रुतेस्तथाप्राप्तत्वात् । न च परब्रह्मणः एव ब्रह्मशब्दमुख्यार्थत्वेन प्रथमप्राप्तत्वादपोहायुक्तेस्तस्यैव प्राप्तिनियमः । ‘यान्ति देवं परं केचित्’ इति प्रमाणप्राप्तत्वादेव । न च परप्राप्तिर्यस्याभीष्टा तस्य तत्प्राप्तिरिति नियमः ।‘क्रमानुरागी भगवान् क्रमात् पुम्भिरवाप्यते ।अतः क्रमात् समृद्धे तु ज्ञाने ब्रह्मलये नरैः ।प्राप्यते नियमेनैव कैश्चिदेवाप्यते मृतौ ॥’ इति भगवतः क्रमानुरागित्वश्रुतेः । न च बहुधाश्रुतेर्यथासौकर्यं चतुर्मुखस्य परस्य वा प्राप्तिरिति वाच्यम् । श्रुत्युक्तानुवृत्तेरेव न्याय्यत्वात् । ‘सप्रतीकाश्चतुर्मुखमप्रतीकाः परममु हैते गच्छन्त्यागच्छन्ति च चतुर्मुखात् परमं परमाच्चतुर्मुखं(पराच्चतुर्मुखं) यावद्विलयमथ सह चतुर्मुखेन विमुच्यन्ते आनन्दी(आनन्दिनो)भवन्ति’ इति हि श्रुतिः । अन्तर्भेदाधिकरणत्वात् समुदायोक्तिः ॥6॥
 
न च चतुर्मुखस्य प्राप्तिपर्यन्तं(मुक्तिपर्यन्तं) सन्ततत्वनियमात् बन्धस्य तावद्भगवत्प्राप्तिर्नास्तीति नियमः
‘यान्ति देवं परं केचित् पूर्वं केचिल्लये विभुम्
योग्यतातारतम्येन विशेषोऽथमपीष्यते ॥’ इति श्रुतेस्तथाप्राप्तत्वात् । न च परब्रह्मणः एव ब्रह्मशब्दमुख्यार्थत्वेन प्रथमप्राप्तत्वादपोहायुक्तेस्तस्यैव प्राप्तिनियमः । ‘यान्ति देवं परं केचित्’ इति प्रमाणप्राप्तत्वादेव । न च परप्राप्तिर्यस्याभीष्टा तस्य तत्प्राप्तिरिति नियमः
‘क्रमानुरागी भगवान् क्रमात् पुम्भिरवाप्यते
अतः क्रमात् समृद्धे तु ज्ञाने ब्रह्मलये नरैः
प्राप्यते नियमेनैव कैश्चिदेवाप्यते मृतौ ॥’ इति भगवतः क्रमानुरागित्वश्रुतेः । न च बहुधाश्रुतेर्यथासौकर्यं चतुर्मुखस्य परस्य वा प्राप्तिरिति वाच्यम् । श्रुत्युक्तानुवृत्तेरेव न्याय्यत्वात् । ‘सप्रतीकाश्चतुर्मुखमप्रतीकाः परममु हैते गच्छन्त्यागच्छन्ति च चतुर्मुखात् परमं परमाच्चतुर्मुखं(पराच्चतुर्मुखं) यावद्विलयमथ सह चतुर्मुखेन विमुच्यन्ते आनन्दी(आनन्दिनो)भवन्ति’ इति हि श्रुतिः । अन्तर्भेदाधिकरणत्वात् समुदायोक्तिः ॥6॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
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न च ‘एतं सेतुं तीर्त्वा’ इत्यत्रातिक्रमोक्ते र्मुक्तो ब्रह्म तीत्वा गच्छतीति(गच्छति) । तरतीति सामान्य प्रतीतेः(सामान्यरूपप्रतीतेः) ब्रह्म तीर्त्वेदं गच्छतीति विशेषानुक्तेः । ‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वा ब्रह्म सम्पद्यत’ इति विशेषोक्तेश्चैतं सेतुं प्रत्यन्यत् तीर्त्वेत्यन्यथोपपत्तेः(.....त्यर्थोपपत्तेः) ॥1॥
न च ‘एतं सेतुं तीर्त्वा’ इत्यत्रातिक्रमोक्ते र्मुक्तो ब्रह्म तीत्वा गच्छतीति(गच्छति) । तरतीति सामान्य प्रतीतेः(सामान्यरूपप्रतीतेः) ब्रह्म तीर्त्वेदं गच्छतीति विशेषानुक्तेः । ‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वा ब्रह्म सम्पद्यत’ इति विशेषोक्तेश्चैतं सेतुं प्रत्यन्यत् तीर्त्वेत्यन्यथोपपत्तेः(.....त्यर्थोपपत्तेः) ॥1॥
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न च कृतिमत्त्वादमुक्त एवोच्यते । ‘स तत्र पर्येति’ इत्यादौ ‘स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति मुक्तस्य स्पष्टं प्रतिभातत्वाच्छ्रुतौ । स तत्र पर्येतीति श्रुत्यैक्यप्रतीतेश्च । एवम्भूतस्यापि प्रकरणत्वं परिकल्प्य(प्रकल्प्य) श्रुतिबाधाङ्गीकारे सा श्रुतिरप्येवं विभज्य ‘किं योजयितुं न(न योजयितुं) शक्या’ इति(शक्यते इति) श्रुतेरेवाभावप्रसङ्गः । ‘सत्यं ज्ञानम्’ इत्यादावपि सत्यमित्यस्यान्यमित्यनेननान्वय इत्यादिप्रसङ्गात् ॥2॥
न च कृतिमत्त्वादमुक्त एवोच्यते । ‘स तत्र पर्येति’ इत्यादौ ‘स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति मुक्तस्य स्पष्टं प्रतिभातत्वाच्छ्रुतौ । स तत्र पर्येतीति श्रुत्यैक्यप्रतीतेश्च । एवम्भूतस्यापि प्रकरणत्वं परिकल्प्य(प्रकल्प्य) श्रुतिबाधाङ्गीकारे सा श्रुतिरप्येवं विभज्य ‘किं योजयितुं न(न योजयितुं) शक्या’ इति(शक्यते इति) श्रुतेरेवाभावप्रसङ्गः । ‘सत्यं ज्ञानम्’ इत्यादावपि सत्यमित्यस्यान्यमित्यनेननान्वय इत्यादिप्रसङ्गात् ॥2॥
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न च परञ्ज्योतिःशब्देनादित्यज्योतिरङ्गीकारे ‘स तेजसि सूर्ये सम्पन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं हैव स पाप्मना विनिर्मुक्त’ इत्यादिनैकार्थतेति प्रयोजनम् । ‘अथ किमुच्यते परं ज्योतिरित्यात्मैव परञ्ज्योतिः स हि परमो द्योतते जीवाच्चाजीवाच्च तस्मादाहुः परञ्ज्योतिरिति । तमेष(तमेवैष) जीवोऽभिसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति तस्यैव परञ्ज्योतिष्ट्वोक्तेः । सावकाशलिङ्गान्निरवकाशश्रुतेरेव बलवत्वात्(सावकाशश्रुतेर्निरवकाशश्रुतेरेवातिबलवत्वात्) ॥3॥
न च परञ्ज्योतिःशब्देनादित्यज्योतिरङ्गीकारे ‘स तेजसि सूर्ये सम्पन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं हैव स पाप्मना विनिर्मुक्त’ इत्यादिनैकार्थतेति प्रयोजनम् । ‘अथ किमुच्यते परं ज्योतिरित्यात्मैव परञ्ज्योतिः स हि परमो द्योतते जीवाच्चाजीवाच्च तस्मादाहुः परञ्ज्योतिरिति । तमेष(तमेवैष) जीवोऽभिसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति तस्यैव परञ्ज्योतिष्ट्वोक्तेः । सावकाशलिङ्गान्निरवकाशश्रुतेरेव बलवत्वात्(सावकाशश्रुतेर्निरवकाशश्रुतेरेवातिबलवत्वात्) ॥3॥
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न च परमगतित्वादीश्वराभुक्ता अपि भोगा मुक्तौ भवन्ति । ईश्वरस्य स्वत एव पूर्णानन्दत्वादभोगस्यापि सम्भवादिति वाच्यम् । पूर्णानन्दः पूर्णभुक् पूर्णकर्ता पूर्णज्ञानः पूर्णभाः पूर्णशक्तिः । ‘आश्चर्यत्वात्(पूर्णैश्वर्याद्) भगवान् वासुदेवो विरुद्धशक्तिर्न च दोषस्पृगीशः’ इत्याश्चर्यतयैव ब्रह्मण उभयोक्तेः । सावकाशोपपत्तिमात्रान्निरवकाशश्रुतियुक्तोपपत्तेरेव बलवत्वात् ॥4॥
न च परमगतित्वादीश्वराभुक्ता अपि भोगा मुक्तौ भवन्ति । ईश्वरस्य स्वत एव पूर्णानन्दत्वादभोगस्यापि सम्भवादिति वाच्यम् । पूर्णानन्दः पूर्णभुक् पूर्णकर्ता पूर्णज्ञानः पूर्णभाः पूर्णशक्तिः । ‘आश्चर्यत्वात्(पूर्णैश्वर्याद्) भगवान् वासुदेवो विरुद्धशक्तिर्न च दोषस्पृगीशः’ इत्याश्चर्यतयैव ब्रह्मण उभयोक्तेः । सावकाशोपपत्तिमात्रान्निरवकाशश्रुतियुक्तोपपत्तेरेव बलवत्वात् ॥4॥
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न च पारगतत्वात्(पारङ्गतत्वात्) मुक्तस्य चिन्मात्रदेहोऽपि नास्तीति वाच्यम् । अकृत्रिमत्वात् तस्य देहस्याप्यनपगमात्(देहस्यानपगमनात्) । ‘अथ विमुक्तस्य चिन्मात्र एव देहो भवति चिन्मात्राणि करणानि तैरीशानुगृहीतैर्भोगान् भुङ्क्ते’ इति श्रुतेः ॥5॥
न च पारगतत्वात्(पारङ्गतत्वात्) मुक्तस्य चिन्मात्रदेहोऽपि नास्तीति वाच्यम् । अकृत्रिमत्वात् तस्य देहस्याप्यनपगमात्(देहस्यानपगमनात्) । ‘अथ विमुक्तस्य चिन्मात्र एव देहो भवति चिन्मात्राणि करणानि तैरीशानुगृहीतैर्भोगान् भुङ्क्ते’ इति श्रुतेः ॥5॥
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न च भगवदोकः(भगवदोकसि) स्थितत्वात् मुक्तस्य तस्याप्योकस्त्वसाम्येन तत्तदुपायसाध्यभोगसाधनत्वं वाच्यम् । निर्दोषत्वात् तदोकसो मुक्तस्य च सङ्कल्पादेवेति श्रुत्युक्तानुसारेणोपपत्तेः(श्रुत्यनुसारेणोपपत्तेः) ॥6॥
न च भगवदोकः(भगवदोकसि) स्थितत्वात् मुक्तस्य तस्याप्योकस्त्वसाम्येन तत्तदुपायसाध्यभोगसाधनत्वं वाच्यम् । निर्दोषत्वात् तदोकसो मुक्तस्य च सङ्कल्पादेवेति श्रुत्युक्तानुसारेणोपपत्तेः(श्रुत्यनुसारेणोपपत्तेः) ॥6॥
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न च परगृहगतत्वादस्य राजगृहगतस्यैव स्वाधमा अपि कदाचिदीशते । निर्दोषत्वादेव मुक्तस्येश्वरस्य तत्रस्थानां मुक्तान्तराणां च राजदोषवद्दोषासम्भवाद्यथायोग्यमेव स्वीकारोपपत्तेः । ‘मुक्तानां पतयो देवा देवानां च प्रजापतिः ।तस्य विष्णुर्न चैवेदं पारावर्यं विनश्यति ॥’ इति च श्रुतिः ॥7॥
 
न च परगृहगतत्वादस्य राजगृहगतस्यैव स्वाधमा अपि कदाचिदीशते । निर्दोषत्वादेव मुक्तस्येश्वरस्य तत्रस्थानां मुक्तान्तराणां च राजदोषवद्दोषासम्भवाद्यथायोग्यमेव स्वीकारोपपत्तेः ।  
‘मुक्तानां पतयो देवा देवानां च प्रजापतिः
तस्य विष्णुर्न चैवेदं पारावर्यं विनश्यति ॥’ इति च श्रुतिः ॥7॥
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न च देहभावे तत्कार्यदुःखादिस्तदभावे भोगासम्भव इति दोषः ।‘देहाभावाच्च भावाच्च निर्भोगित्वं च दुःखिताम् ।यान्त्यमुक्ता नोभयं च मुक्तानां वशिता यतः ॥’ इति श्रुत्यैव विशेषक्लृप्तेः ॥8॥
 
न च देहभावे तत्कार्यदुःखादिस्तदभावे भोगासम्भव इति दोषः
‘देहाभावाच्च भावाच्च निर्भोगित्वं च दुःखिताम्
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न च सङ्कल्पादेव समस्तसम्भवात् सृष्ट्यादिसमस्तकार्यसम्भवः ।‘व्यापारो जगतो शुद्धमपि वह्निकार्यकरं भवेत् ।(अयोग्यशक्तितश्चैव)अयोग्याशक्तितस्त्वेव नाधिकानन्दसम्भवः । न हि कश्चित् सुशक्तोऽपि चकाराचेतनं चितिम् । न च कामस्तथा भूयात् ततः स्यात् सत्यकामता(सत्यकामिता) ॥’ इति श्रुत्या विशेषक्लृप्तेरेव ।‘मुक्तानां न जगद्यत्नस्तथापि विबुधाः सदा ।मुक्तानां तु नियन्तारस्तेषां ब्रह्माऽस्य वै हरिः ॥’ इति च विशेषक्लृप्तिः ॥9॥
 
न च सङ्कल्पादेव समस्तसम्भवात् सृष्ट्यादिसमस्तकार्यसम्भवः
‘व्यापारो जगतो शुद्धमपि वह्निकार्यकरं भवेत् ।
(अयोग्यशक्तितश्चैव)अयोग्याशक्तितस्त्वेव नाधिकानन्दसम्भवः ।
न हि कश्चित् सुशक्तोऽपि चकाराचेतनं चितिम् ।
न च कामस्तथा भूयात् ततः स्यात् सत्यकामता(सत्यकामिता) ॥’ इति श्रुत्या विशेषक्लृप्तेरेव
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मुक्तानां तु नियन्तारस्तेषां ब्रह्माऽस्य वै हरिः ॥’ इति च विशेषक्लृप्तिः ॥9॥
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न च वशित्वान्मुक्तस्यापि वृद्धिः । कृतकृत्यत्वेन निःश्रमत्वादुपासनादावभ्यासपाटवात् निर्दोषत्वात् स्नेहाधिक्याच्च तस्यैव परमसुखरूपत्वेन फलस्वरूपत्वात्
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न चानन्तत्वात् कालस्य त्रयोदशीपञ्चदशीवत् कदाचित् समस्तस्यापि सम्भवान्मुक्तस्यापि पुनरावृत्त्याशङ्केति वाच्यम् । सत्यकामत्वादिमाहात्म्यात् ।‘अदोषकामसत्यत्वात् मुक्तानामपुनर्भवः( न पुनर्भवः) । यस्मात् स कामयेदेव नित्यमात्मापुनर्भवम् ॥’ इति(इति च श्रुतिः) ॥ 11 ॥इत्यनन्तमहान्यायमीमांसापारवारिधेः । उत्तारणात्यशक्त्यैव व्याकुलीकृतचेतसाम्(भूतचेतसाम्) ॥ मन्दानामुपकाराय महतां चोच्छ्रितात्मनाम् । तद्विशेषपरिज्ञानप्रदीप्तार्काभचेतसाम् ॥ विशेषगाढे मनसि नितरामुपकारकः(नितरां चोपकारकः) । न्यायप्लवो मयाऽकारि सङ्क्षेपात् प्रमिताक्षरैः ॥ (विस्तारो)विस्तरोऽप्ययमेव स्यात् तद्विशेषातिवेदिनाम् ।व्याख्यानुव्याख्यायोरेव विस्तारो(विस्तरो) यदुदीरितः ॥ अनल्पचेतसां पुंसामलं विज्ञानसिद्धये । तन्न्यायोद्धरणे(ऽ)शक्ता अपि ह्येतेन सुस्थिरम् ॥न्यायानुगं मनः कुर्युरितिसङ्ग्रहलालसाः(कुर्युरतिसङ्ग्रहलालसाः) ।को नामाशेषविद्योरुसागरोन्मथनोद्धृतम्॥ साक्षाद्विद्याधिराजेन न्यायामृतमनुत्तमम् । अशेषतोऽधिगच्छेत वन्द्यो वृन्दारकोऽपि सन् ॥ एवं सुदुर्लभेऽप्यद्धा महान्यायपरामृते । केचनाधिक्रियन्तेऽत्र(च) तत्प्रसादानुरञ्जिताः ॥ ब्रह्माद्या अमृते यद्वत् सागरोन्मथनोद्धृते । अहं तु तत्प्रसादैकमहास्पदबलोद्धतः ॥ न्यायमृतार्णवमिममवगाह्य विभज्य च । सङ्क्षेपविस्तराभ्यां च चकार(चकर) व्याकृतिं कृतिम् ॥ तत्प्रसादमृते कस्य शक्तिः संसारसागरे । मग्नस्य चेतनस्य स्यात् तत्कृतानुकूतौ क्वचित् ॥ नित्यानन्दामृतस्यन्दितत्कटाक्षैधितस्य(कटाक्षेधितस्य) तु । का नु शक्तिर्भवेन्नैव ततः को वाऽतिविस्मयः ॥ विद्याविद्ये सुखं दुःखमशक्तिः शक्तिरेव च । उत्पत्तिस्थितिनाशाश्च विशेषाश्च परेखिलाः(विशेषाश्चापरेऽखिलाः) ॥ चेतनाचेतनस्यास्य समस्तस्य यदिच्छया । स मम स्वकृतेनैव प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥ यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपणि दिव्यान्यलं बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । वायो रामवचो नयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥ (नमोऽब्जभव.....)नमोऽजभवभूर्यक्षपुरःसरसुराश्रय । नारायणारणं मह्यं मापते प्रेयसां प्रिय ॥
 
न चानन्तत्वात् कालस्य त्रयोदशीपञ्चदशीवत् कदाचित् समस्तस्यापि सम्भवान्मुक्तस्यापि पुनरावृत्त्याशङ्केति वाच्यम् । सत्यकामत्वादिमाहात्म्यात्
‘अदोषकामसत्यत्वात् मुक्तानामपुनर्भवः( न पुनर्भवः) ।
यस्मात् स कामयेदेव नित्यमात्मापुनर्भवम् ॥’ इति(इति च श्रुतिः) ॥ 11
इत्यनन्तमहान्यायमीमांसापारवारिधेः
उत्तारणात्यशक्त्यैव व्याकुलीकृतचेतसाम्(भूतचेतसाम्) ॥
मन्दानामुपकाराय महतां चोच्छ्रितात्मनाम् ।
तद्विशेषपरिज्ञानप्रदीप्तार्काभचेतसाम् ॥
विशेषगाढे मनसि नितरामुपकारकः(नितरां चोपकारकः) ।
न्यायप्लवो मयाऽकारि सङ्क्षेपात् प्रमिताक्षरैः ॥
(विस्तारो)विस्तरोऽप्ययमेव स्यात् तद्विशेषातिवेदिनाम्
व्याख्यानुव्याख्यायोरेव विस्तारो(विस्तरो) यदुदीरितः ॥
अनल्पचेतसां पुंसामलं विज्ञानसिद्धये । तन्न्यायोद्धरणे(ऽ)शक्ता अपि ह्येतेन सुस्थिरम्
न्यायानुगं मनः कुर्युरितिसङ्ग्रहलालसाः(कुर्युरतिसङ्ग्रहलालसाः)
को नामाशेषविद्योरुसागरोन्मथनोद्धृतम्॥
साक्षाद्विद्याधिराजेन न्यायामृतमनुत्तमम् ।
अशेषतोऽधिगच्छेत वन्द्यो वृन्दारकोऽपि सन् ॥
एवं सुदुर्लभेऽप्यद्धा महान्यायपरामृते ।
केचनाधिक्रियन्तेऽत्र(च) तत्प्रसादानुरञ्जिताः ॥
ब्रह्माद्या अमृते यद्वत् सागरोन्मथनोद्धृते ।
अहं तु तत्प्रसादैकमहास्पदबलोद्धतः ॥
न्यायमृतार्णवमिममवगाह्य विभज्य च ।
सङ्क्षेपविस्तराभ्यां च चकार(चकर) व्याकृतिं कृतिम् ॥
तत्प्रसादमृते कस्य शक्तिः संसारसागरे ।
मग्नस्य चेतनस्य स्यात् तत्कृतानुकूतौ क्वचित् ॥
नित्यानन्दामृतस्यन्दितत्कटाक्षैधितस्य(कटाक्षेधितस्य) तु ।
का नु शक्तिर्भवेन्नैव ततः को वाऽतिविस्मयः ॥
विद्याविद्ये सुखं दुःखमशक्तिः शक्तिरेव च ।
उत्पत्तिस्थितिनाशाश्च विशेषाश्च परेखिलाः(विशेषाश्चापरेऽखिलाः) ॥
चेतनाचेतनस्यास्य समस्तस्य यदिच्छया ।
स मम स्वकृतेनैव प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपणि दिव्यान्यलं बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
वायो रामवचो नयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥
(नमोऽब्जभव.....)नमोऽजभवभूर्यक्षपुरःसरसुराश्रय ।
नारायणारणं मह्यं मापते प्रेयसां प्रिय ॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
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Revision as of 17:55, 20 April 2026

न्यायविवरणम्

प्रथमोध्यायः

प्रथमः पादः

चेतनाचेतनजगन्नियन्त्रेऽशेषसंविदे । नमो नारायणायाजशर्वशक्रादिवन्दित ॥1॥
कृत्वा भाष्यानुभाष्येऽहमपि वेदार्थसत्पतेः। कृष्णस्य सूत्रानुव्याख्यासन्न्यायविवृत्तिं स्फुटम् ॥2॥
करोमि मन्दबुद्धीनां बुधानां चोपकारिकाम्। प्रीत्यै तस्यैव देवस्य तत्प्रसादपुरःसरः ॥3॥

जिज्ञासाधिकरणम्


जीवव्यतिरिक्तेश्वरस्याभावात् तस्य च स्वप्रकाशत्वान्न जिज्ञास्यतेति प्राप्ते ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र.सू.१.१.१) इत्याह । ‘तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म’ इति ‘ब्रह्म’शब्देन पूर्णगुणत्वोक्तेर्नानुभवसिद्धाल्पगुणजीवाभेदः । ‘अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति। बृहन्तो ह्यस्मिन् गुणाः’ इति श्रुतेः(श्रुतेरिति) ॥1॥

जन्माधिकरणम्


न जीव एवायं ब्रह्मशब्दः । ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते’ इत्यादिना जन्मादिकारणत्वस्यैव ब्रह्मलक्षणत्वोक्तेः ॥2॥

शास्त्रयोनित्वाधिकरणम्


न च रुद्रादौ सममेतल्लक्षणम्। शास्त्रैकसमधिगम्यत्वात् कारणत्वस्य(कारणस्य) ॥3॥

समन्वयाधिकरणम्


न च पाशुपतशास्त्रोदितत्वादि शास्त्रप्रतिपाद्यत्वे कारणम्। किन्तूपक्रमादलिक्षणः समन्वय एव ॥4॥

ईक्षत्यधिकरणम्


न च तस्यावाच्यत्वं श्रुत्यभिप्रायः । ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ इत्यादि श्रुतिसहितानुभवस्य बलवत्वात् ॥5॥

आनन्दमयाधिकरणम्


न चावयवत्वविरोधः ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इति(इत्यादि) श्रुतेरवयवाद्यभेदात् ॥6॥

अन्तस्थत्वाधिकरणम


न च-

‘ब्रह्मेन्द्रमग्निं जगतः प्रतिष्ठां दिव आत्मानं सवितारं बृहस्पतिम्।

चतुर्होतारं प्रदिशोऽनुक्लृप्तं वाचो वीर्यं तपसाऽन्वविन्दत् ।’
इत्यादि शब्दानामन्यविषयत्वम् । श्रुतिसन्देेहेऽनन्यथासिद्धलिङ्गेन निर्णयोपपत्तेः ॥7॥

छन्दोधिकरणम् (गायत्र्यधिकरणम्)


अधिभूताध्यात्माधिवेदगतानामपि शब्दानाम् अचेतनत्वजीवान्वयव्यतिरेकित्वनित्यत्वेषु(चेतनजीवान्वयव्यतिरेकनित्यत्वेषु) विद्यमानेष्वपि भगवद्विषयत्वमेवानन्यथा सिद्धलिङ्गैः । ‘तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पुरुषः’ इत्यादिशब्दसहितलिङ्गैश्च । सन्दिग्धश्रुतिलिङ्गाभ्याम् उक्ताभ्यामपि, असन्दिग्धयोः केवलयोरेव(केवलयोरपि) बलवत्वात् ॥8-11॥

पादान्त्यप्राणाधिकरणम्


न च चानन्यथासिद्धत्वमन्यत्र श्रुतिलिङ्गादेः । अन्यगतलिङ्गदीनामपि तद्गभगवदपेक्षया(तद्गतभगवदपेक्षया) युक्तेः ॥12॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥

द्वितीयः पादः

सर्वगतत्वाधिकरणम्


बहुलिङ्गसहितश्रुतेरपि सावकाशायाः, निरवकाशश्रुत्यादीनामेव बलवत्वम् । बहवो ह्यत्रादित्यशब्दाः । क्षित्यादिषु उक्त्वाऽऽदित्येऽनुक्तिरित्यादिलिङ्गं च । तथाऽपि निरवकाशा एतमेवेत्यवधारणादयः ॥1॥

अत्तृत्वाधिकरणम्


सन्दिग्धश्रुतिलिङ्गाभ्यां निश्चितलिङ्गप्रकरणयोरेव बलवत्वम् । सन्दिग्धश्रुतिर्लिङ्गं चादितिशब्दोदितत्वं च ॥2॥

गुहाधिकरणम्


द्विवचनश्रुतेरपि(द्विवचनश्रुतेरपि बलं) निरवकाशत्वं नास्ति । विष्णोरेव द्विरूपत्वात् ॥3॥

अन्तराधिकरणम्


‘सोहमस्मि’, ‘स एवाहमस्मि’ इत्याद्यभ्यास-अर्थवादसहितबहुश्रुतिभ्योऽपि निरवकाशोपपत्तेरेव प्राबल्यम् ॥4॥

अन्तर्याम्यधिकरणम्


पृथिव्यादिशरीरत्वं च न निरवकाशम् । यौगिकशरीरत्वोपपत्तेः(यौगिकशरीरवत्वोपपत्तेः) विष्णोरपि ॥5॥

अदृश्यत्वाधिकरणम्


‘अक्षरात् परतः परः’ इति श्रुतेरपि ‘नाक्षरात् सम्भवतीह विश्वं’ इत्यस्या निरवकाशत्वम् । अक्षरात् परतः परस्याप्यक्षरान्तरत्ववचनात् ॥6॥

वैश्वानराधिकरणम्


श्रुतिसाधारण्येऽपि विशेषश्रुत्यादेः निश्चयः । उभयत्र विशेषश्रुत्यादौ पुनः स सावकाशत्व-निरवकाशत्वबलात् निश्चयः ॥7॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥

तृतीयः पादः

द्युभ्वाधिकरणम्


‘प्राणानां ग्रन्थिरसि’। ‘रुद्रो वै लोकायतनम्’। ‘वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति’ । ‘सर्वे वा एते प्राणाश्च प्राणिनश्च देवाश्च दिव्यानि च लोकाश्च लोकिनश्चालोकिनश्च विष्णावेवोताश्च प्रोताश्च भवन्ति’ इत्यादेः द्युभ्वाद्यायतनत्वमज्ञानां साधारणं लिङ्गम् ॥1॥
‘यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मन ओतं प्राणा ओताः’ इत्यत्रोक्तानां लिङ्गानामन्यत्र रुद्रादिविषयत्वे शब्दलिङ्गबाहुल्यम् । ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो माऽऽविशान्तकः’ । ‘प्राणेश्वरः कृत्तिवासाः पिनाकी’, ‘मनो वै रुद्र ओतं च प्रोतं च’, ‘रुद्रो वाव लोकाधारः’ इत्यादिकं शब्दबाहुल्यम् ॥1॥
तेषामेव लिङ्गशब्दानां ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि’ इत्यादीनां विष्णौ मुख्यवृत्तिरिति बलवत्वम् । तस्य हि रुग्द्रावणादिकर्तृत्वं मुख्यम् ॥1॥

भूमाधिकरणम्


‘प्राणो वा आशाया भूयान्’, ‘विष्णुर्वै देवेभ्यो भूयांस्तस्माद् भूयान्नाम’ इत्यादेर्भूमशब्दोऽज्ञानां साधारणः ॥2॥
‘प्राणो वा आशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा प्राणाद्भूयसोऽनुक्तिः ॥2॥
प्राणस्य विष्णोः सकाशात् भूयस्त्वानुक्तिः । ‘च’शब्देन ‘एष तु वा अतिवदति’ इति प्राणाद्विष्णोर्भूयस्त्वोक्तिश्च ॥2॥

अक्षराधिकरणम्


विष्णोः चेतनप्रकृतेश्च अविनाशित्वसाम्याद् अक्षरशब्दः साधारणः ॥3॥
अत्तेत्युक्त्वा ‘न तदश्नाति किञ्चन’ इति विरुद्धता ॥3॥
सर्वाधारप्रकृत्याधारत्वं, विष्णोरन्यस्य विरुद्धम् । ‘पतिं विश्वस्यात्मेश्वरं’, ‘विश्वात्मानं परायणम्’ इत्यादिश्रुतेः । (अनशनोक्तिस्तु) अनशनत्वोक्तिस्त्वनुपजीवनार्थत्वेनैव सावकाशता ॥3॥

सदधिकरणम्


कारणत्वसाम्यात् विष्णोरचेतनप्रकृतेश्च ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिसृष्टिस्थानं साधारणम् ॥4॥
‘बहु स्यां प्रजायेय’ इत्यन्यस्य अन्यभावादृष्टिः ॥4॥
अचेतनस्येक्षणादृष्टिः । बहुभावश्रुतिस्त्वन्यभावं विना तत्तन्नियामकतया स्वरूपबहुत्वार्थत्वेनैव युज्यते ॥4॥

दहराधिकरणम्


लिङ्गं हृत्पद्मस्थितत्वं साधारणम् ॥5॥
‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशस्तस्मिन्यदन्तिस्तदन्वेष्टव्यम्’ इत्यनेन, ‘यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ इत्यस्यान्वयाभावः ॥5॥
आकाशपक्ष एवान्वयाभावः । विष्णुपक्षे तु, योऽन्वेष्टव्यो भगवान्, तस्यान्तर्हृदये यावान् वाऽयमाकाशस्तावानाकाशः, तस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते, स भगवान् अपहतपाप्मा(भगवानात्माऽपहतपाप्मेत्यन्वयः) इत्यन्वयः ॥5॥

अनुकृत्यधिकरणम्


‘कथं नु तद्विजानीयाम्’ इत्यानुकूल्येन ग्रहणं कस्य? इति विचार्यमनुग्रहः ॥6॥
‘तदेतदिति मन्यन्ते’, ‘कथं नु तद्विजानीयाम्’ इति ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’ (शाश्वतमित्युक्त) इत्युक्तज्ञानिसुखग्रहणमिति विपरीतश्रुतिभ्रमः ॥6॥
यज्ज्ञानाच्छाश्वतं सुखं स भगवान् यद्ब्रह्मानिर्देश्यं सुखमिति वदन्ति तदेतत्स्वरूपम् इति(तदेतत्तत्स्वरूपमिति) मन्यन्ते । अतः पूर्ववादविपरीतैव श्रुतिः । पूर्ववादोक्तयोजना तु भ्रम एव ॥6॥

वामनाधिकरणम्


‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति’ इत्यादिलिङ्गानां प्राणादन्यत्रावकाशराहित्यमिति भ्रमः । एवमेव ‘एष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव सन्निधत्ते’ इत्यादिवाक्यात् भ्रमः ॥7॥
लिङ्गानां परमात्मन्यवकाशो विद्यत एवेति तद्राहित्यं भ्रम एव । वामनश्रुतेरेवानकाश इति ईशानाशब्दोक्तो विष्णुरेव ॥7॥

देवताधिकरणम्


अपशूद्राधिकरणम्


कम्पनाधिकरणम्


वज्रशब्द उद्यतत्वलिङ्गं च तादृग्द्वयम् ॥10॥8॥
वज्रशब्दस्योद्यतत्वस्य च विष्णावेवावकाशः । उद्यमित्वमेवोद्यतत्वमिति ॥10॥8॥

ज्योतिरधिकरणम्


आदित्यादिज्योतिष्ट्वम् उभयलोकसञ्चरणम् ‘आदित्येनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते’ इत्यवधारणमित्यादीनां परमात्मान्यवकाशाभावो बहुतादृक्त्वम् ॥11॥9॥
‘अयं पुरुषः’ इति संसारी । आत्मशब्दोदित एव विष्णुः । अत आदित्यादिज्योतिष्ट्वं संसारिण एव । ‘आदित्येनैव’ इत्यवधारणं बाह्यज्योतिष्षु प्राधान्यापेक्षयेत्यादि । लोकसञ्चरणं तु जीवमादाय तस्यैव अदुःखेन स्वातन्त्र्यात् ॥11॥

आकाशाधिकरणम्


पुनः शब्दाः ‘ईशानो वज्रो ज्योतिराकाशः’ इति ॥7॥10-12॥
‘वै, नाम’ इति प्रसिद्धिद्योतकनिपातद्वयम् रूढित्यागेनोक्तयौगिकार्थस्वीकारे विरोधि ॥12॥11॥
‘वै, नाम’ इति निर्वहितृत्वे श्रुत्यादिप्रसिद्धिबाहुल्यम् , प्रसिद्धाकाशस्योक्तम् अनामरूपत्वं विरुद्धम् ॥12॥

सुषुप्त्यधिकरणम्


लिङ्गं स्वप्नादिदर्शनं कस्य इति ॥13॥
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः जीवेश्वरयोः भेदोक्तेरसङ्ग(त)त्वादि(असङ्गित्वादि) चेश्वरस्यैव इत्यर्थात् भेद एव भवति । जीवस्य तदयुक्तेरीशे सावकाशत्वाच्च ॥13॥

ब्राह्मणाधिकरणम्


शब्दो ब्राह्मण इति ॥14॥
‘ब्राह्मण’शब्दस्य पापालेपलिङ्गस्य च चतुर्मुखस्य(चतुर्मुखेन सह परमात्मनो) सह परमात्मनाऽभेदं विनाऽवकाशराहित्यद् अर्थाद् अभेदप्राप्तिरिति समस्तमेतत् ॥14॥12॥ पूर्वपक्षः॥
‘ब्रह्मणा= वेदेन गम्यते’ इति ‘ब्राह्मण’शब्दो विष्णावेव युज्यत इत्यर्थाद् ‘अज’शब्दोऽपि तस्मिन्नेव । चतुर्मुखस्य कर्मफलाभावायुक्तेः तयोर्भेदोऽर्थादापद्यत एव । उक्तिविरोधश्च तत्रैव । भेदश्रुतिबाहुल्यात् । तल्लिङ्गं स शब्दश्च चतुर्मुखेऽनवकाश इति(इति च) समस्तमेतत् ॥14॥


जीवेश्वराभेदे ईश्वरोक्तावप्यर्थाज्जीव एवोच्यत इत्यर्थात् तथागतिः ॥13॥11॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥

चतुर्थः पादः

आनुमानिकाधिकरणम्


अवरत्वादिधर्मनियन्तृत्वम्, तत्तादात्म्यवत्वं चेति द्विविधं ह्यवरत्वादि(अवरत्वादि) । ‘निरनिष्टो निरवद्यः‘ इत्यादिश्रुतेः तत्तद्दोषतादात्म्यात्यस्पृष्टिनियमात् विष्णोः, ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति’ इति श्रुतिबलाच्च (नियन्तृत्वमेव)नियन्तृत्वमवरत्वादिकमित्यापतति । श्रुतिद्वयस्यापि निरवकाशत्वात् । मृत्युशब्दादिषु प्रसिद्धेश्च । प्रसिद्धत्वाच्च(प्रसिद्धत्वात्) कर्तृव्युत्पत्तेः । ‘तमेव मृत्युममृतं’, ‘तात दैवं सर्वात्मनावैहि परं परायणम्’ इत्यादेश्च । उपचारकल्पनायाश्च क्लिष्टत्वात्(कष्टत्वात्) । प्रमाणाभावाच्च । नाव्यक्तादिशब्दानां परमात्मविषयत्वङ्गीकारे सर्वमानविरोधः ॥1॥

नसङ्ख्योपसङ्ग्रहाधिकरणम्


रूढिः, (रूढो रूढयोगो महारूढो महायोगो महारूढयोगो - पा) योगः, रूढियोगः, महायोगो, रूढी, रूढियोगो, महायोगो, महारूढियोगो, रूढोपचारो, रूढलक्षणोपचारो, लक्षणेति शब्दवृत्तिभेदात्(भेदः) रूढिपूर्वकत्वेन महायोगवृत्या परमेश्वरे अखिलशब्दव्युत्पत्युपपत्तिः(अनुपपत्तेः) ॥2॥

नसङ्ख्योपसङ्ग्रहाधिकरणम्


बहुरूपत्वाद् अधिकरणाधेयत्वादिकं(बहुरूपात्वाधिकरणत्वाधेयत्वादि) तस्यैव युज्यते ॥3॥

आकाशाधिकरणम्


व्यक्त्यपेक्षया कार्यत्वं(कारणत्वम्) च ॥4॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥

द्वितीयोध्यायः

प्रथमः पादः

स्मृत्यधिकरणम्


रुद्रादीनां सकाशात् विष्ण्वादीनामेवाप्तत्वम् । श्रुत्यनुसारित्वात् ॥1॥

नविलक्षणत्वाधिकरणम्


न च श्रुतेः(न श्रुतेः) रुद्रादिस्मृतिसाम्यम्, किन्तु साक्षिप्रत्यक्षसाम्यमेव निरपेक्षत्वात् ॥2॥

अभिमान्यधिकरणम्


न मृदादीनां वचनाद्यदृष्टिः श्रुत्यप्रामाण्यकारणम् । अपि तु, वचनादिशक्ताया देवताया मृदादिशब्दवाच्यत्वद्योतिकैव ॥3॥

असदधिकरणम्


ईश्वरस्य स्रष्टृत्ववदसतोऽपि स्रष्टृत्वं श्रूयत इति नास्ति । सोऽसच्छब्दो ब्रह्मशब्दवदेव ब्रह्मवाचक इति श्रुतिसाम्यम्(श्रुतेः साम्यम्) ॥4॥

भोक्त्रधिकरणम्


‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’ इति श्रुतिबलान्नैक्यम्। किन्तु भेदापादकमेवैतत्, ‘निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’, ‘परात् परं पुरुषमुपैति(पुरिशयं पुरुषम्) दिव्यम्’ इति सन्निहितवाक्यबलात् । एकीभावशब्दस्तु सान्निध्येऽपि(सामीप्येऽपि)भवति । ‘एकीभूता तु सा सेना पाण्डवानभ्यवर्तत’ इतिवत् ।

‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।

एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥’ इति वाक्यान्तराच्च ॥5॥

आरम्भणाधिकरणम्


न च लौकिकसर्वकार्यानुसारेण(लौकिकसर्वकार्याणाम् अनुसारेण) अकर्तृतन्त्रत्वं सर्वानुसारः। किं तर्हि ? तद्वैलक्षण्येन सर्वकर्तृविलक्षणसर्वशक्तित्वमेवाशेषयुक्तिश्रुत्यनुसारि । ‘एष सर्वेश्वरः’ इति श्रुतेः(इत्यादि श्रुतेः) । युक्तिमात्रात् श्रुतियुक्ता हि युक्तिर्बलवती ॥6॥

इतरव्यपदेशाधिकरणम्


न चेश्वरत्यागेन जीवस्यैव कर्तृत्वाङ्गीकारे कल्पनालाघवम्। श्रुतिसिद्धत्वेन अकल्पनात् । अश्रुतजीवकर्तृत्वाङ्गीकारे गौरवमेव । तदभावात्(तदभावे) सिद्धान्ते लघुता । ‘नान्यः कर्ता, स हि स्वतन्त्रः, परमात् परमो हरिः’ इत्यादेश्च । अभेदपक्षस्तु निराकृतः । श्रुत्यनुभवविरोधाच्च ॥7॥

श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वाधिकरणम्


शब्दैकसमधिगम्यत्व-सर्वशक्तित्वादीनां विशेषाणामदर्शनं(अदर्शनात्) जीवे । न जीवाद्विशेषादर्शनं परमेश्वरे । विशेषश्रुतेरेव ॥8॥

प्रयोजनाधिकरणम्


न च प्रयोजनाभावोऽकर्तृत्वे कारणम् । अशेषकर्तृत्वापादकश्च(अपवादकश्च) । फलापेक्षिणस्त्वपूर्णत्वादेव न सर्वकर्तृत्वादिशक्तिः, इतरस्य पूर्णत्वादेवानन्तशक्तित्वाच्च लीलयैव(..शक्तित्वाल्लीलयैव) कर्तृत्वम् ॥9॥

वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम्


नेशस्य पूर्णत्वासिद्धिः । कर्मसापेक्षत्वेऽनीशत्वमनपेक्षत्वे श्रुतेरप्रामाण्यमिति । कर्मणोऽपि तदधीनत्वम् । तथाऽपि तदनुसारेण फलदानमित्यनङ्गीकार एव इष्टश्रुतिप्रामाण्यासिद्धिः ॥10॥

सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम्


सर्वचेतना अपूर्णगुणा इति नियमो न । स्वतन्त्रस्य (च) पूर्णगुणत्वनियमात्

‘अपूर्णोऽयं जीवसङ्घोऽस्वतन्त्रः पूर्णो हरिर्यः स्वतन्त्रः सदैव ।

न हि स्वतन्त्रोऽपूर्णतां कामयीत पूर्णो यदि स्यादस्वतन्त्रः कुतः सः ॥’ इति श्रुतेः ॥11॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥

द्वितीयः पादः


उक्तविरोधिनसः तत्तत्समयसिद्धाः पूर्वपक्षन्यायाः, तद्विरोधिनोऽन्ये इति प्रसिद्धा एव ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥

तृतीयः पादः

वियदधिकरणम्


न च वियतः उत्पत्तिमत्वे अनुभूतियुक्तिबहुवाग्विरोधोऽस्ति, व्यवस्थायोगात् । अवकाशमात्रस्य अव्याकृतात्मकत्वाद् अनुत्पत्तिवचनानां तद्विषयत्वम्, उत्पत्तिवचनानाम् असितवर्ण-भूताकाश-तदभिमानिशरीरविषयत्वम्, पराधीन(विशेषवत्व)विशेषत्वमात्रविषयत्वं चेति व्यवस्था ।

‘आकाशो नीलिमोदेति न प्रदेशः कथञ्चन ।

अभावो हि प्रदेशस्य न ह्यत्राभाव इत्यपि ॥’ इति पैङ्गिश्रुतिः(पैङ्गिश्रुतेः) ॥1॥

मातरिश्वाधिकरणम्


ततोऽधिकमेतत्सर्वम् अनुभूत्यादिविरुद्धत्वं वायूत्पत्ताविति न, वायोरेव (मुख्यानुत्पत्त्युपपत्तेः)अनुत्पत्त्यनुपपत्तेः । पराधीनविशेषमात्रं(पराधीनविशेषत्वमात्रं) ह्युत्पत्तिः । तदभाव उभयोः स्वातन्त्र्यं विरुद्धमेव । सर्वोत्तमत्वानुपपत्तेः । उभयोरपि पराधीनत्वप्राप्तेश्च अन्योन्यानुरोधे, अननुरोधे तु न सर्वैश्वर्यम्। ज्ञानाविस्मृत्या वायावपि व्यवस्थेत्यतिदेशः । अनुपपत्तिस्तु तत्प्रापिका । पराधीनविशेषवत्त्वमात्रं तु अव्याकृताकाशस्य तदभिमानिप्रकृतेश्च सममेव ॥2॥

असम्भवाधिकारणम्


न च सतः पराधीनविशेषवत्वं(पराधीनविषयत्वं) स्वातन्त्र्यात् ॥3॥

तेजोऽधिकारणम्


न च विष्णोरेव(विष्णोः) तेजस उत्पत्तौ द्वारकारणवैयर्थ्यम्(एव) । द्वारमनुसृत्यैव विष्णोः प्रवृत्तेः ॥4॥

अबधिकरणम्


न च तेजस एव अपामुत्पत्यङ्गीकारे घर्मात् स्वेदादिदृष्ट्यनुसारित्वमिति(स्वेदादिदृष्टानुसारित्वमिति) गुणाधिक्यम् । मुख्यार्थपरित्यागप्राप्तेः ॥5॥ न च ‘अद्भ्यो वाऽन्नमुत्पद्यते’ इत्याद्युक्तप्रसिद्धान्नाख्यान्यार्थाविरोधेन प्रसिद्धान्ननामस्वीकारे बहुवाक्यानुवर्तितेति गुणः । ‘अन्न’शब्दस्य प्रयोगबाहुल्यात् पृथिव्यामपि शक्तिमत्वात् । अधिकारादीनां निरवकाशत्वाच्च । बहुवाक्यानुरोधोऽप्यत्रैवेति (बहुवाक्यानुरोधोऽप्यत्रैव) ॥6॥

पृथिव्यधिकरणम्


न च रुद्रादीनां लयकारित्वाङ्गीकारे, पितुरन्यस्य(पितुरन्यस्यैव) मारकत्वदृष्टेः लोकदृष्ट्यनुसारित्वमिति(लोकदृष्टानुसारित्वमिति) गुणः । लोकपितृवैरूप्यात् विष्णोर्यथावाक्यमङ्गीकारोपपत्तेः । अन्यथा ‘न विष्णोरन्यो वलियकृन्न विष्णोरन्यो विमुक्तिदः’ इत्यादि श्रुतिविरोधात् । रुद्रस्य तु क्वचित् संहारद्वारत्वेनैव तद्वाक्यानां सावकाशत्वात् ॥7॥

तदभिध्यानाधिकरणम्/विपर्ययाधिकरणम्


न च लोकानुसारित्वम् । ‘क्रमादुत्पद्यते, क्रमात् विलीयते, क्रमेणैवोत्पत्तिः वलियश्च(क्रमेणैव ह्यस्योत्पत्तिलयौ), क्रमेणैवास्योत्पत्तिवलियौ’ इत्यादि(इत्यादि बहुश्रुत्यनुरोधश्च) लोकानुसारिबहुश्रुत्यनुरोधश्च यथोत्पत्तलिये।

‘द्विविधः क्रम उद्दिष्टो व्युत्क्रमोऽनुक्रमस्तथा ।

सृष्टावन्यो लये चान्य इति वेदविदो विदुः॥’
इति श्रुतेः क्रमवाक्यस्य सावकाशत्वात् वैरूप्यं बहुप्रकारत्वं क्रमस्य ॥8॥

अन्तराधिकरणम्


न च ‘केषाञ्चित् क्रमाल्लयः’, ‘केषाञ्चित् व्युत्क्रमाल्लय’ इत्यङ्गीकारे (लोकदृष्टानुसारित्वं)लोकदृष्ट्यनुसारादन्तरा विज्ञानमनसी व्युत्क्रमः । ‘सर्वं वा एतत् क्रमादुत्पद्यते, व्युत्क्रमाल्लीयते(क्रमाद् विलीयते)’ इति श्रुतौ सर्वस्यापि व्युत्क्रमाल्लयसङ्ग्रहात्। तल्लिङ्गस्य तु चराचरव्यपाश्रयविज्ञानादिविषयत्वेवैव सावकाशत्वात् ॥9॥

आत्माधिकरणम्


न च (चेतनत्वेन)चेतनत्वसाम्यात् विष्णोरपि देहलयः । ‘सर्वे वा एते चिदात्मानो ब्रह्मंल्लयमनुप्राप्य विष्णोरुदरे संविशन्ति’ इति तस्योदरे (सर्वसङ्ग्रहणादि)सर्वसङ्ग्रहादिश्रुतिभ्यो नित्यत्वावगमात् तद्देहस्य। अश्रुतत्वाच्चान्यथा ॥10॥

ज्ञाधिकरणम्


न चानादित्वात् जीवस्य पराधीनविशेषाप्राप्तिः । ‘इदं सर्वमसृजत’ इति सर्वस्मिन् गृहीतत्वात् । पराधीनविशेषवत्वेऽप्यनादित्वस्य अविरोधात् ॥11॥

उत्क्रान्त्यधिकरणम्


न च सर्वदेहे(सर्वदेहस्पर्ष..) स्पर्शज्ञानाद्रसादीनां च तत्र तत्र परिज्ञानाज्जीवस्यानणुत्वम् । उत्क्रान्तिगत्यादेः । आदिशब्देन सूक्ष्मतेजोरूपेण व्याप्त्या स्पर्शादिज्ञानोपपत्तिः । अतोऽणुत्वमनणुत्वं चेति भावः ॥12॥

व्यतिरेकाधिकरणम्


न च जीवस्य बहुरूपत्वशक्तावीशेन गुणसाम्यम् । ईशशक्त्यैव बहुरूपत्वादेः ॥13॥

पृथगधिकरणम्


न च श्रुत्या जीवेश्वरैक्यम् । सर्वमानविरोधात् । श्रुतेः सादृश्यैक्यादिना सावकाशत्वात् । बहुमानविरोधे एकस्य दौर्बल्याच्च । (धर्मिग्राहि)धर्मिग्राहकविरोधाच्च ॥14॥

यावदधिकरणम्


न चोत्पत्तिमत्वाद्विनाशित्वं जीवस्य । अनित्यत्वे तदभीष्टमोक्षाद्यसिद्धेः(अभीष्टमोक्षाद्यसिद्धेः) । न हि पराधीनविशेषवत्वमात्रेण विनाशित्वम्, तादृशानामेव नित्यत्वश्रुतिविरोधात् ॥15॥

पुंस्त्वाधिकरणम्


न च स्वगुणाननुभूतत्यनुपपत्तेः पूर्वं(पूर्वज्ञानादीनां) ज्ञानादीनां सामस्त्येनाभावः । पूर्वमव्यक्तानां पश्चात् सुव्यक्त्युपपत्तेः ॥16॥

कर्तृत्वाधिकरणम्


न चेश्वरस्यैव कर्तृत्वे कल्पनालाघवम् । जीवस्याकर्तृत्वे शास्त्रवैयर्थ्यात् । तस्यापि कर्तृत्वे शास्त्रार्थसिद्धेश्च ॥17॥

अंशाधिकरणम्


न च नानाश्रुतेरप्रामाण्यम् । दृष्टभेदानुसारेण तासाम्(तेषाम्) अर्थोपपत्तेः । अप्रामाण्यकल्पनस्य विपरीतज्ञानमूलत्वात् ॥18॥

अदृष्टाधिकरणम्


न च वैचित्र्यमनाभासत्वे कारणम् । जीवानां सामान्यतः आभासत्वेऽपि (आभासत्वे) विशेषादृष्टात् वैचित्र्योपपत्तेः ॥19॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥

चतुर्थः पादः

प्राणोत्पधिकरमणम्


न च प्राणानामुत्पत्यङ्गीकारे,‘प्राणा एवानादयः’ इत्यादिस्पष्टार्थवद्विशेषश्रुतिविरोधः । ‘आत्मैवेदमग्र आसीत् स प्राणमसृजत, स प्राणान्’ इत्यादिवचनाद् अनादित्व एव (स्पष्टार्तश्रुति)स्पष्टार्थवद्विशेषश्रुतिविरोधात् । ‘इदं सर्वमसृजत’इति सामान्यवचनस्याधिक्यं सिद्धान्ते । विशेषमात्रश्रुतेः सावकाशाया(सकाशाद् विशेषा) उभयश्रुतेः प्राबल्यात् ॥1॥

तत्प्रागधिकरणम्


न च ‘नित्यं मनोऽनादित्वात्’ इति विशेषश्रुतिविरोधः । ‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति विशेषश्रुतेः ॥2॥

तत्पूर्वकत्वाधिकरणम्


न च ‘वाग्वाव नित्या’इति विशेषश्रुतिविरोधः, ‘मनसो वाव वागुत्पद्यते(वागुदपद्यत), वाचो व्याहरणम्’ इति विशेषश्रुतेः ॥3॥

सप्तगत्यधिकरणम्


न च ‘दशेमे पुरुषे प्राणाः आत्मैकादशः’, ‘सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’ इति सङ्ख्याविशेषश्रुत्योरेव (परस्परं)परस्परविरोधः । ‘गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त’ इति सप्तभावस्य बुद्धीन्द्रियविषयत्वेन विशेषितत्वात् सङ्ख्याश्रुत्योः विषयवैलक्षण्यात् ॥4॥

अण्वधिकरणम्


न च ‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्त्याख्यविशेषवाचकश्रुतिविरोधः, ‘अणूनि वा इन्द्रियाणि तेषां प्रकाशो व्याततः’ इति ततोऽप्यणुत्ववाचकविशेषश्रुतिविरोधात् ॥5॥

श्रेष्ठाधिकरणम्


न च

‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा ।

तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते ॥’
इत्यादिमाहात्म्यवचनात् मुख्यप्राणस्य नोत्पत्तिरिति वाच्यम् । 

‘महत्वान्महतां विष्णुः कर्ता प्राणस्य चैकराट् ।

किं नाम न सृजेदेष येन शक्त्ये(क्ये)दमावृतम् ॥’
इति श्रुतेस्ततोऽपि माहात्म्याद् विष्णोः ॥6॥

पञ्चवृत्त्यधिकरणम्


न च प्राणादिपञ्चस्य व्यक्तसद्गुणत्वान् मुख्यप्राणवृत्तित्वमेव ।

‘अशेषगुणपूर्णानि मुख्यरूपाणि पञ्च च ।

तद्दासाः पञ्च चान्येऽपि प्राणाद्याः सद्गुणैर्युताः॥’
इति श्रुतेः मुख्यप्राणस्य ततोऽपि व्यक्तसद्गुणत्वात् ॥8॥

अण्वधिकरणम्


न चाणुत्वे प्राणस्य ‘महान् वै मुख्यप्राणो येन व्याप्तं चराचरम्’ इति दृष्टायुक्तिः । ‘अणुर्वै मुख्यप्राणो य उत्क्रामति नाडीभिः’ इति दृष्टायुक्तेरनणुत्वे(युक्तिरनणुत्वे) प्राणस्य ॥9॥

ज्योतिरधिकरणम्


न चेन्द्रियाणां जीवाकरणत्वे दृष्टायुक्तिः । क्वचिदतद्वशत्वस्यापि दृष्टत्वात् । ‘यच्चक्षुषि तिष्ठन्’ इत्यादिदृष्टाऽत्युक्तेरीशाधीनत्वानङ्गीकारे । लौकिकदृष्टेस्त्वीशेनैव जीवानुसारित्वक्लृप्त्योपपत्तेः ॥10॥

इन्द्रियाधिकरणम्


न च ईशवशत्वसाम्यात् मुख्यप्राणस्याप्यन्यसाम्यम् ;‘(यदस्मिन्)यस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्’, ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्’ इत्यादि श्रुतेरीशसाम्यस्यापि भावात् । ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः’ इति श्रुतेर्मध्यमत्वोपपत्तेः ॥11॥

सञ्ज्ञाधिकरणम्


न च विरिञ्चस्यापि कर्तृत्वशक्तेः स एव शरीरादिस्रष्टा ।

‘त्रिवृत्क्रिया यतो विष्णो रूपं च तदपेक्षया ।

रूपापेक्षं तथा नाम व्यवहारस्तदात्मकः ॥
अतो रूपस्य नाम्नश्च व्यवहारस्य चैकराट् ।
हरिरेव यतः कर्ता पिताऽतो भगवान् प्रभुः ॥’
इत्यादेस्तस्यैव कर्तृत्वशक्तेर्विरिञ्चस्य तु द्वारतयोपपत्तेः(द्वारतयैवोपपत्तेः) ॥12॥

मांसाधिकरणम्


न च मिश्रत्वाद्(विमिश्रत्वाद्) भूतानां मिश्रतायाम्(विमिश्रितायाम्) अविशेषः । ‘अन्नमशितं त्रेधा विधीयते’ इत्यादिना मिश्रतायामपि विशेषोक्तेः ।

‘सर्वं च भौतिकं मिश्रं मिश्रत्वेऽपि(मिश्रित्वे) विशेषतः ।

भौमं मांसमसृग्वारि तेजो मज्जा विशेषतः ॥’ इत्यादेश्च ॥13॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥

तृतीयोध्यायः

प्रथमः पादः

तदन्तराधिकरणम्


‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति वचनात् स्वाभाविकमरणमेव मुक्तिरिति न मन्तव्यम् । मुक्तिसाधनत्वेन ज्ञानादिगुणाधिक्योपदेशात् मरणे भूतवियोगस्यैवाभावात् । ‘भूतयुक्तः परं लोकमिमं लोकं च गच्छति’ इत्यादिवचनात् (च)॥1॥

त्र्यात्मकत्वाधिकरणम्


‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्यत्र भूतानीति सामान्यनामानुक्त्वाऽपामिति विशेषनामकथनादपामेव सहगतिरिति न वाच्यम् । त्र्यात्मकत्वादपामर्थतः सर्वभूतानां गतिप्राप्तेः ॥2॥

प्राणगत्यधिकरणम्


न च भूतानि गच्छन्तीति सहैवानुक्तेस्तदभावः । प्राणगतेरुपपत्तित उक्तत्वात् ॥3॥

अग्न्याद्यधिकरणम्


न च ‘अग्निं वागप्येति’ इत्याद्यन्यथोक्तेः प्राणानां च न सहगतिः द्विरूपत्वात् प्राणानाम् ॥4॥

प्रथमाधिकरणम्


न च ‘प्रथमतो भूतानि जुह्वति’ इति विशेषानुक्तेः भूतानामसहगतिः ‘भूतानि जुह्वति’ इत्युपक्रमादपि ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्युपसंहारस्याधिक्यात् तदनुसारेणोपक्रमोक्तश्रद्धाशब्दस्यापि ता एवार्थ इत्यापत्तेः। उपक्रमविरोधेनोपसंहारानुपपत्तेः। उपक्रमप्रामाण्यार्थमेवोपसंहारानुसारित्वमङ्गीकर्तव्यम् । व्याख्यानस्य पश्चात्तनत्वनियमात् । उपक्रमानुसारित्वनियमेऽप्युपसंहारस्योपसंहारेणैवोपक्रमार्थो ज्ञायते ॥5॥

अश्रुतत्वाधिकरणम्


न च विशेषाश्रवणनियम एव बलवान् । स्थानान्तरश्रवणस्याप्येतदनुरूपत्वात् । आर्थिकश्रवणमप्यनुक्तिं बाधत एव । किमु(किमुत) स्थानान्तरगतं स्पष्टश्रवणमिति कैमुत्यार्थमेव नेष्टादिकारिणां(इष्टाधिकारिणां) प्रतीतेरिति परिहारान्तरमुक्तम् ॥6॥

भाक्ताधिकरणम्


न च ‘अपाम सोमममृता अभूम’ इति विशेषत एव मोक्षफलस्याप्युक्तेः कर्मैव (मोक्षसाधनमिति)तत्साधनमिति मन्तव्यम् । ‘नान्यः पन्थाः अयनाय विद्यते’ । ‘स च आत्मानामेव लोकमुपास्ते । यावदिन्द्रो यावन्मनुर्यावदादित्यः’ इत्यादिश्रुतिबलाद् (अमृतत्व)अमृतशब्दस्य यथायोग्यमेवार्थकल्पनोपपत्तेः ॥7॥

कृत्ययाधिकरणम्


न (चानुशयस्य)चानुशयस्यापि सहभावात् स्वर्ग एव फलदत्वम्, ‘भुक्तशेषानुशयवान्’ (इत्यादिवचनबलात्)इत्यादिवचनाद्यथायोग्यमेव फलदानोपपत्तेः ॥8॥

यथेताधिकरणम्


न च मार्गस्यापि सहभावाद्यथागतमेवागमनमिति नियमः । वचनबलाद्यथायोग्यमेवागमनोपपत्तेः ॥9॥

चरणाधिकरणम्


न च ‘इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते’ इत्युपशब्देनेष्टादिभिराचारस्य सहपाठाच्चरणफलं पुनरावृत्तिं करणफलत्वेन भ्रमात् वदन्तीति वाच्यम् । ‘नान्यः पन्थाः’ इत्यादिवचनादेवोभयोरपि(इतिवचनादेव) चरणशब्देनैवोक्तेर्योग्यत्वात् ॥10॥

अनिष्टाधिकरणम्


न च भयफलकामादिमिश्रबुद्धित्वादिष्टा(धि?)दिकारिणां संसारः । अनिष्टकादि(धि?)कारिणां तदभावान्मुक्तिरिति वाच्यम् । तेषां प्रबलदोषश्रुतेः ॥11॥

अपिसप्ताधिकरणम्


न च नरकभोगस्यानित्यत्वकथनात् नित्यनरकोक्तिः विरुद्धा।
‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा ।
कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु ॥
तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ॥’ इति विभागात् ॥12॥

तत्राप्यधिकरणम्


न च सहस्थानादीशस्यापि नरकदुःखप्राप्तिः(दुःखप्राप्तिः) । स्वातन्त्र्यात् कारणाभावात् ॥13॥

विद्याधिकरणम्


न च साधनेन सह श्रुतेस्तद्वत् फलेऽपि जीवस्य स्वातन्त्र्यम् । अविहितत्वेन कारणाभावात् । ‘अथैतयोः पथोः’ इत्यस्य च साधनार्थत्वात् ॥14॥

तृतीयाधिकरणम्


न च दुःखसहस्थायित्वादन्धेतमस्यपि(अन्धन्तमस्यपि;अन्धतमस्यपि) सुखम् । ईशस्याप्रियत्वेनैव कारणाभावात् ॥15॥

तत्स्वाभाव्याधिकरणम्


न च धूमादिदेवतासहावस्थानात् कर्मिणोऽपि तत्पदप्राप्तिः । तन्निमित्तविद्याख्यकारणाभावात् ॥16॥

नातिचिरेणाधिकरणम्


न च तैस्तैः सहावस्थानादतिचिरत्वम् । ‘वत्सरात् पूर्वमेवतु’ इति क्लृप्तकालादधिकावस्थाने कारणाभावात् ॥17॥

अन्याधिकरणम्


न च व्रीह्यादिजीवैः सहावस्थानात् दुःखप्राप्तिः । शब्दविहितत्वेन पापाख्यकारणाभावात् ॥18॥

रेतोऽधिकरणम्


‘ईशक्लृत्प्यैव पितरं प्रविश्यायाति न च वैयर्थ्य(वैयर्थ्यात् पितृशरीरगमनं) पितृशरीरगमने मातरम्’ इतीशक्लृप्तत्ववचनात् ॥19॥

unknown


न च पितुः सकाशादन्यतो वौदर्यगर्भस्थशरीरमेव प्रवेष्टुमुपपत्तेः योनिप्रवेशाभाव इति वाच्यम् । ‘योनिद्वारेण देहं च प्राप्नोति प्रायशो नरः’ इति वचनात् सामान्यतो गत्यन्तराभावात् ।

‘विशेषकारणादेव विशेषाज्जनिरिष्यते।

सामान्यजननं चैव नृणां सामान्यहेतुतः(सामान्यहेतुना)॥’ इति वचनाच्च ॥20॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥

द्वितीयः पादः

सन्ध्याधिकरणम्


पश्चाददृष्टेः स्वप्नविषयस्यासत्त्वं न वाच्यम् । अशक्यकरणशक्तिमत्त्वादीश्वरस्य संस्कारेण सृष्ट्वा पुनः संस्कारमात्रतामापाद्य तस्यापि तिरोधानोपपत्तेः। जाग्रत्वमात्रस्य)जाग्रत्वप्रतीतिमात्रस्य भ्रमत्वात्(भ्रान्तित्वात्) ॥1॥

पराभिध्यानादिकरणम्


न चाविज्ञानमात्रेण स्वप्नप्रतीत्या ज्ञानशक्त्यैव स्वप्नतिरोधानं नेशेनेति वाच्यम् । बोधे जीवस्यास्वातन्त्र्यात् । ज्ञानाज्ञानयोस्तदन्यत्वे जडत्वात् कैमुत्येनास्वातन्त्र्यात् । तत्स्वरूपत्वे तेनैव व्याख्यातत्वात् । उभयात्मकत्वे दोषद्वयापातात् । अनुभयत्वस्य व्याहतेः(अनुभयत्वे स्वव्याहतेः/अनुभयात्मकत्वे व्याहतेः) । तावन्मात्रनिमित्तत्वे मानाभावात् । सर्वस्येशहेतुत्वे मानाच्च ॥2॥

देहयोगाधिकरणम्


न च कालापेक्षयैव जागरितम् । अचेतनत्वादेव कालस्य । चेतनान्तरस्याप्यस्वातन्त्र्यात् ॥3॥

तदभावाधिकरणम्


न च परमात्मनोऽन्यत्राभावस्थाने दुःखित्वप्राप्तेर्नाडीषु सुप्तिर्न भवति उभयस्वीकारोपपत्तौ मानस्य क्लृप्त्यकारणम् (इत्यव्यवस्थिति)इत्यनवस्थितिदोषादतिप्रसङ्गात् ॥4॥

प्रबोधाधिकरणम्


न च प्रबोधस्य पृथगपि कारणदृष्टेः क्वचित् तदेव । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’(न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे) इति श्रुतेस्तत्रापि ईशकृतत्वे सम्यङ्‍मानात् ॥5॥

कर्मानुस्मृत्यधिकरणम्


न च राजादीनां पृथग्दर्शनादीशान्तरकल्पना ।

‘देशकालविशेषेऽपि स्वप्नादीनां स एव हि ।

तिरस्कर्ता च कर्ता च न खण्डेशः स राजवत् ॥’ इति श्रुतिमानात् ॥ 6॥

सम्पत्यधिकरणम्


न च मोहे ब्रह्मप्राप्तिरेव पृथगवस्थात्वादिति वाच्यम् । परिशेषमानादर्धप्राप्तित्वावगमात् ॥7॥

स्थानतोप्यधिकरणम्


न च स्थानभेदाद्विष्णोरपि भेदः । ‘अयमेव सः’ । ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यादि(इति) श्रुतिबलात् स्थानानां भेदस्तस्याभेद इति व्यवस्थोपपत्तेः ॥8॥

अरूपाधिकरणम्


न च रूपवत्त्वारूपवत्त्ववचनयोः विरोधादप्रामाण्यम् । अप्राकृतरूपवत्त्वमिति व्यवस्थोपपत्तेः ॥9॥

उपमाधिकरणम्


न च परमात्मना चेतनत्वन्यायसाम्येन जीवस्याप्यभेदः । अल्पगुणत्वादिविरोधात्(अत्यल्पगुणत्वादिविरोधात्) ॥10॥

अम्बुवदधिकरणम्


न च सादृश्यस्य(नच सादृश्यसत्वात्) सत्त्वात् साधनं विनैव जीवस्य तादृक्त्वव्यक्तिः । अनादितः संसारस्यानिवृत्तत्वेन भावात् ॥11॥

वृद्धिह्रासाधिकरणम्


न च मुक्तत्वादिगुणसाम्यात् ब्रह्मादीनां भक्त्यादिगुणसाम्यम् । ‘यथा यथाऽधिकारो विशिष्यते एवं ज्ञानं भक्तिर्बलं च विशिष्यते । मुक्तावानन्द एते च गुणा विशिष्यन्ते अत आहुर्ब्रह्मणे मुक्ता बलिं हरन्ति’ इत्यादिविशेषदृष्टेः ॥12॥

प्रकृताधिकरणम्


न च संहारकर्तुरसंहारादन्यरक्षाया अयोगः । ‘स सृजति स पालयति स विनाशयति’ इत्यादि विशेषवाक्यात् । अन्नदानाद्युपपत्तेश्च ॥13॥

अव्यक्तत्वाधिकरणम्


न चाव्यक्तस्वभावस्य दर्शने तर्कबाधः । अनन्तशक्तित्वात् विष्णोस्तच्छक्त्या अव्यक्तस्यापि दर्शनोपपत्तेः ॥14॥

अहिकुण्डलाधिकरणम्


न च गुणानां गुणिस्वरूपत्वं विरुद्धम् । कालादिदृष्टान्तात् ॥15॥

परमताधिकरणम्


न च ब्रह्मानन्दादीनामन्यथात्वात् अतच्छब्दत्वं तच्छब्दत्वे लोकोपमत्वं चेति(वेति) विलोमता । ‘अलौकिकास्तस्य शब्दास्तथाऽर्था अलौकिको ह्येष विष्णुः परत्वात् । तथापि शब्दा लौकिका अप्यमुष्मिन् प्रवर्तमाना अधिकार्थान् वदन्ति ॥’ इत्यादि श्रुतिभ्योऽलौकिकत्वावगमात् ॥16॥

स्थानविशेषाधिकरणम्


न च ब्रह्माद्यानन्दवैचित्र्ये(वैचित्र्येऽपि) बिम्बभूतविष्ण्वानन्दवैचित्र्यम् । आदित्यादिवदाधिक्यात् । न हि सूर्यकान्तप्रतिबिम्बस्याग्निजनकत्वशक्तिर्न जलगतस्येत्येतावता सूर्यवैचित्र्यम्(सूर्ये वैचित्र्याम्) । आधिक्यं हि तत्र निमित्तम् । सूर्यचन्द्रादिप्रतिबिम्बं विनाऽन्यत्र तथा विशेषादृष्टेः ॥ 17॥

तथाऽन्यत्वाधिकरणम्


न च नानाभावात् विष्णोश्चित्तप्रतिबिम्बरूपता । आधिक्यादेव । प्रतिबिम्बे हि दोषाश्च प्रतीयन्ते । अतो हि श्रुतिः प्रतिषेधति ‘नेदं यदिदमुपासते’ इति ॥ 18॥

सर्वगत्वाधिकरणम्


न च नानावतारकौतुकदर्शनात् विष्णोः क्वचिद्देशकालान्तरे कौतुकादेव सृष्ट्यादिकमकुर्वन्(सृप्त्यादि कुर्वन्) अन्यमेव सामस्त्येन नियोजयति । ‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात्’ इति क्रीडायामपि स्वातन्त्र्यात् ।
‘स्वातन्त्र्यात् क्रीडते विष्णुर्न च स्वातन्त्र्यमन्यगम् ।
करोति क्वपि नियता क्रीडा सृष्ट्यादिगास्य(सृष्ट्यादिकाऽस्य) च ॥
नियतक्रीडनादेव कर्ता नान्योऽस्ति कस्यचित् ।
अस्वतन्त्रो हि चलति चलचित्तादशक्तितः ॥ स्वतन्त्रः पूर्णशक्तिः सन् कुतोऽसौ नियतिं त्यजेत् ॥’ इति श्रुतेश्च ॥19॥

unknown


न च कर्मान्वयव्यतिरेकात् फलस्येश्वरः फलदातेति प्रलोभमात्रम् । तस्यैव स्वातन्त्र्यात् ।

‘कर्माण्यनन्तानि यथेष्टमीशः सम्पाद्य तेषां फलमिच्छयैव ।

क्वचिद्ददाति क्व च नो ददाति न ह्यानन्त्यात् कर्मणां भोगनाशः ।
स्वातन्त्र्यं चेत् कर्मणां सर्वभोगः स्यान्न ह्येवं क्वापि तत् केनचित् स्यात् ।
अतोऽपि(अतो हि) स स्वेच्छया किञ्चिदेव फलं कुर्यात् विफलं प्रायशश्च ।
क्वचिज्ज्ञानं जनयन् भस्म कुर्यात् स्वेच्छावृत्तिस्तस्य विष्णोः सदैव ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
‘स्वतन्त्रः ईश एवैकस्तद्वशं कर्म सर्वदा ।
अत ईशत्वमीशस्य न हीशोऽन्यः कथञ्चन ॥’ इति श्रुतिः(श्रुतेः) ॥ अतो प्रलोभकल्पने(प्रलोभमात्रकल्पने) श्रुतहानिरश्रुतकल्पना चेति हरिरेव फलप्रदः ॥20॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥

तृतीयः पादः

सर्ववेदाधिकरणम्


न च प्रतिशाखमुच्यमानानामर्थानां पृथकत्वात् तत्तच्छाखिभिरेव तत्र तत्रोक्तं ज्ञेयमिति नियमः । ‘नानावेदैरितिहासैः पुराणैः सुज्ञेय एको भगवान् युक्तिभिश्च’ इति श्रुतेः सुष्टु ज्ञेयत्वात् विष्णोः ॥1॥

उपसंहाराधिकरणम्


न चाशक्यतया कस्यापि सर्वगुणोपसंहारो(गुणोपसंहारो) नास्ति । ‘सर्वे गुणाः सर्वदैव ह्युपास्यास्तेनैव(तेन) विद्वान् विधिकृन्नान्यथा स्यात्’ इति श्रुतेर्विहितक्रियालोपप्रसङ्गात् ॥2॥

प्राप्त्यधिकरणम्


केषाञ्चित् सर्वगुणोपसंहारस्य कर्तव्यत्वे सर्वेषामपि तथा स्यात् अनेन नोपसंहर्तव्या अनेनोपसंहर्तव्या इत्यनिर्णीतेरिति न मन्तव्यम् । ‘यस्य यावद्गुणाः स्पष्टं प्रतिभासन्त्युपासते ।
युगपत् स्वभुजौ यद्वद् ध्यायेत् तावत एव सः ।
युगपद्ब्रह्मणः सर्वे भासन्ते हि गुणा हरेः ।
तदन्येषां यथायोग्यं स्वमाहात्म्यानुसारतः ॥’ इति श्रुतेर्युगपद्गुणप्रतीत्यादिमाहात्म्यान्निर्णयोपपत्तेः ॥3॥

सर्वाभेदाधिकरणम्


न च फलानिर्णीतिः । माहात्म्येनैवान्यत् फलं महतामिति निर्णयोपपत्तेः ॥4॥

आनन्दाधिकरणम्


आनन्दादीनां केषाञ्चित् समुच्चये प्राप्ते सर्वगुणसमुच्चयः(सर्वेषां सर्वगुणसमुच्चयः) सर्वेषां स्यादिति न मन्तव्यम् । अल्पशक्तित्वात् तेषां पुंसाम् ॥5॥

प्रियशिरस्त्वाधिकरणम्


प्रियशिरस्त्वादीनामानन्दादिविशेषत्वेनैव दर्शनात् तेषामपि सर्वोपसंहार्यत्वमिति न मन्तव्यम् ।यथायोग्यान्(यथायोगाद्) गुणपूगानुपास्य फलं भवेन्मुक्तिगं नान्यथा स्यात् । ‘नित्यैकाग्र्यव्यङ्ग्यताहेतुतश्च(नित्यैकाग्र्यताहेतुतश्च) साक्षाद्दृशिर्नो तद्विशेषैः(तत्तद्विशेषैः) स्मृतैश्च ॥’ इति श्रुतेः स्वयोग्यगुणैरेव फलभावात् ॥6॥

इतराधिकरणम्


तर्हि ब्रह्मणोऽन्येषां देवादीनामपि बहुगुणोपासनया कार्यं नास्ति, मध्ये नियमासिद्धेरिति न मन्तव्यम् । तेषां भाव्युत्कर्षं ज्ञात्वा तदभिज्ञस्य ब्रह्मण एव गुणनियमोपदेशोपपत्तेः ।

‘यो यो भावो देवतानां विमुक्तौ तत्तत् प्राप्तौ सुगुणानीशितुश्च ।

ब्रह्मा दिशत्यथ तांस्ते विचिन्त्य तत्तद्भावं प्राप्नुवन्त्यात्मशक्त्या ॥’ इति श्रुतेः ॥7॥

आध्यानाधिकरणम्


न च नानास्थानेषूक्तगुणानामनुपासनार्थता(अनुपासनार्थत्वम्) । विप्रकीर्णगुणान्(विप्रकीर्णान् गुणान्) पिण्डीकृत्योपासितुस्तत्सदृशफलप्राप्तेः(तादृशफलप्राप्तेः) तथा ध्यानार्थमेव गुणानामुक्तिरित्युपपत्तिः ॥8॥

आत्मगृहीत्यधिकरणम्


न चाश्वापरोक्ष्यायानन्दादीनामपि लोपेनात्मेत्येतावता पूर्यते । (आत्मशब्दविशेषार्थ)आत्मशब्दार्थविशेषत्वादानन्दादीनाम् ॥9॥

अनव्याधिकरणम्


न चात्मशब्दो विभ्रमकरः । गुणाधिकानामधिकारिणां भगवद्गुणानधिकान् प्रकाशयतीत्यवधारणोपपत्तेः(अवधारणत्वोपपत्तेः) ॥10॥

कार्याधिकरणम्


अलौकिकगुणानामप्रतीतेर्लौकिकगुणाध्याने तदपाकृतिरेव भवतीति न मन्तव्यम् । लौकिकविलक्षणा अत्युत्तमा इति ध्यानस्यैव प्राधान्यात् ॥11॥

समानाधिकरणम्


ब्रह्मणो ब्रह्माण्याश्च(ब्रह्मणश्च ब्रह्माण्या) स्थानैक्यं गुणतारतम्यं च यथागुणोपासनं मुक्तावाधिक्यं न भवतीत्यत्र लिङ्गम् । समविषमोपासनायुक्तेरिति न मन्तव्यम् ।

‘यथाशक्ति स्मृतान् धात्रा गुणान् विष्णोः सरस्वती ।

स्मरेत् त्रैविक्रमाद्यांस्तु नित्यविक्रान्तिपूर्वकैः ।
कदाचिल्लोपेयेद्देवी स्थानैक्यं न गुणैस्ततः ।
साम्यं तयोर्यथाविष्णोर्गुणोपासा फलं भवेत् ॥’
इत्यध्यात्मवचनाद्यथाशक्ति क्रिया देव्याः ॥12॥

नवाधिकरणम्


न चात्मशब्देनास्य पुरुषस्यैतावन्तो गुणा उच्यन्त इति व्यवस्थित्यभावः(व्यवस्थाभावः) । यस्य यावन्तोऽर्था युगपद् ध्यातुं शक्यन्ते तस्य तावन्त इति सन्धेः ॥13॥

सम्भृत्यधिकरणम्


न च मुमुक्षव इत्यविशेषाद् भरणस्य द्युतेश्च सर्वेषामपेक्षितत्वाच्च(अपेक्षितत्वात्) सम्भृतिद्युव्याप्ती(व्याप्तौ) अपि सामान्ये ।
             ‘सत्यो ज्ञानं(ज्ञानः) परमानन्दरूप आत्मेत्येवं नित्यदोपासनं स्यात् ।
नान्यत् किञ्चित् समुपासीत धीरः सर्वैर्गुणैर्देवगणा उपासते ॥
गुण्याकारस्मृतेरेव द्युतिमात्रं प्रतीयते ।
न व्याप्तिर्जगदस्मृत्या नानाशक्तिर्यतो मता ॥
देवानां युगपदज्ज्ञानं मानुषाणां(मनुष्याणां) तथा न तु ।
पर्यायेणाऽपि(पर्यायेणैव) सत्याः स्युर्नैवान्येषां कथञ्चन ॥’ इत्यादिप्रमाणबलात् ॥14॥

पुरुषाधिकरणम्


क्वचिद् बहुगुणाः क्वचिदल्पगुणाः श्रुतिष्वेवोच्यन्ते इत्युपसंहारस्याप्रयोजनतेति न वाच्यम् । ‘गुणा सर्वे ब्रह्मणैव(सर्वे गुणा ब्रह्मणैव) ह्युपास्या नान्यैर्देवैः किमु सर्वैर्मनुष्यैः ।’ इति श्रुतेः(इत्यादि श्रुतेः) । (सर्वगुणोपासन्यापि)सर्वगुणोपासकस्याप्यधिकारिणो भावादेकत्रापृथक्सर्वगुणानुक्तेः(सर्वगुणानुक्तेश्च) बलादुपसंहारानतेः ॥15॥

वेधाधिकरणम्


न च मुक्तावुपासनभावे(उपासनाभावे) फलादिकमपि स्यादित्यतिप्रसङ्गः । उपासनायाः संस्काराख्यकारणस्य सत्त्वात् । ‘न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’ इत्यवृद्धिप्रमाणभावाच्च ॥16॥

हान्यधिकरणम्


न च कर्मकरणशक्तेरप्यदूरत्वात् तत्संश्रयनियमः । उपासनाख्यकार्ये(उपासनाख्ये कार्ये) नित्यकृतिसंस्कारो न तथा कर्मणीति कार्यवैशेष्यात् ॥17॥

छन्दाधिकरणम्


(न च योग्यताख्य.....)न चायोग्यताख्यविशिष्टकारणाज्ज्ञानिष्वपि केषाञ्चिन्मोक्षो न भवतीति नियमः । ज्ञानिनां मोक्षं ददात्येवेश्वरः(ईश्वरस्वभावात्) स्वभावात् । अयोग्यानां ज्ञानस्यैवानुपपत्तेः(ज्ञानस्यैवोत्पत्त्यनुपपत्तेः/ज्ञानस्यैवानुत्पत्त्युपपत्तेः) ॥18॥

अनियमाधिकरणम्


न च प्रयत्नानुसारिणो मुक्तावाधिकारिका आनन्दादयः(मुक्तावाधिकारिकानन्दादयः) । अधिकारानुसारित्वात् प्रयत्नस्य । कथञ्चिदधिकयत्ने(अधिके यत्ने) तत्साधनादिवस्तूनां दूषणप्राप्तेः ।

‘स्वाधिकाराधिको यत्नः प्रायशो नोपपद्यते ।

कथञ्चिदधिके यत्ने दोषः कश्चित् समापतेत् ॥’ इति वचनाच्च ॥19॥

यावदधिकरणम्


न चैकस्मादेको विशिष्टो दृष्ट एवेति प्राणाद् विशिष्टजीवाभावे दृष्टवैरूप्यमिति दोषः ।
‘यः सर्वमवजानीयादृते देवं नारायणं देवीं च परमां श्रियम् । स प्राणानवरुद्ध्येमं मन्त्रमावर्तयीत ।
आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः ।
घोषा इदस्य शृण्विरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम ॥’ इति । 
‘स ह्येषां भूतानां वरिष्ठो न ह्येतस्मात् कश्चनोपरि विना देवं नारायणं देवीं च परमां श्रियम्’ इति प्रतिक्रियाविधानादिविरोधात् ॥20॥

इयदामननाधिकरणम्


‘अस्ति भगवः प्राणाद्भूय’ इति प्रश्नाद्यभावात् प्राणस्यैवोन्नतिप्रतीतेर्न विष्णोरपि ततः परत्वमिति न मन्तव्यम् । ‘एष तु वा अतिवदति’ इति विशेषणात् प्रश्नप्रतिवचनप्रतिसन्धानोपपत्तेः ॥21॥

व्यतिहाराधिकरणम्


न च सत्यादीनामभेदानुक्तेरन्यत्वम् । ‘सत्यं पूर्णं विज्ञानं पूर्णं कृतिः पूर्णा निष्ठा पूर्णा श्रद्धा(मतिः पूर्णा श्रद्धा पूर्णा) पूर्णा मति पूर्णा सुखं पूर्णं भूमा पूर्णोऽहं पूर्ण आत्मा पूर्णो नात्र किञ्चिदूनं पूर्णमेवाधस्तात् पूर्णमुपरिष्ठात् पूर्णं मध्यतः पूर्णं सर्वतः । तदेष श्लोको भवति ।’

‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥’ 	इति श्रुतेः सर्वेषामनूनत्वात् । 

‘सत्याद्या अहमात्मान्ता यद्गुणाः समुदीरिताः ।

तस्मै नमो भगवते यस्मादेव विमुच्यते ॥’ इति वचनाच्च ॥22॥

सत्याधिकरणम्


न च श्रियोऽप्रयत्नत्वादनुपासनं संसारो वा । नित्यं भगवदुपस्थितेरतिप्रियत्वात् संस्कारपाटवान्नित्योपासोपपत्तेश्च ॥23॥

कामाधिकरणम्


न च बन्धदार्ढ्ये श्रवणादीनामफलता । अन्यथोपासां विनैव श्रवणादिज्ञानमात्रेण मुक्तिरिति दोषः ।

‘श्रवणादित्रयोत्पन्नदृष्ट्यैव स्वेच्छया हरिः ।

प्रसन्नो मुक्तिदो नित्यमन्यथा न कथञ्चन ॥’ इतीश्वरेच्छानियतिश्रुतेः ॥24॥

निर्धारणाधिकरणम्


न च गुर्वधीनत्वे ज्ञानमोक्षयोर्ज्ञानिनोऽपि कदाचित् गुरुकोपाज्ज्ञानपराभावेन(पराभवेन)अमुक्तिप्रसङ्गान्न गुर्वधीनत्वमिति ।

‘ज्ञानिनो गुरुशापेऽपि नामुक्तिः संसृतेः क्वचित् ।

आनन्दह्रासदोषेण सैव मुक्तिर्विदुष्यति ॥’
इति वचनान्मुक्तिदूषणेनैव गुरुशापादेः(कोपादेः) कृतार्थत्वात् । ज्ञानिनो ब्रह्मवस्तुवैभवेन मुक्तिः स्यादिति गुरोर्वरेण वा मुक्त्युपपत्तेः(मुक्त्यनुपपत्तेः) ॥25॥

प्रदानाधिकरणम्


शिष्यस्यापि पुरुषत्वसाम्यात् धारणादेस्तत्प्रयत्नस्य न दौर्बल्यमिति न मन्तव्यम् । ‘गुरुप्रसादो बलवान्’ इत्यादिविशेषोक्तेः(विशेषोपपत्तेः) ॥26॥

लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणम्


न चोत्तमगुरुस्वीकारार्थत्वेन प्राप्तसन्त्यागनिमित्तदोषः । तत्र दोषे मानाभावात् ॥27॥

पूर्वविकल्पाधिकरणम्


न च विद्या कर्म वा संसारनिवृत्तिकारणमिति कारणानिर्णयः । ‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इत्यवधारणात् विद्यावचनस्य प्राधान्यात् ॥28॥

विद्याधिकरणम्


न च विद्यावचनस्य प्राधान्यं(विद्यावचनप्राधान्यं) भ्रमः । ‘प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ इति भगवतस्तस्मिन्नेव (अभ्यधिकप्रीतिवचनात्)अधिकप्रीतिवचनात् । ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः’ इति तत्प्रीतेरेव मोक्षवचनाच्च ॥29॥

श्रुत्यधिकरणम्


न च कस्यचिद्विशेषज्ञानोपपत्तेर्भक्त्यादिकं विना मुक्तिः । ‘भक्त्यैवैनं जानाति भक्त्यैवैनं पश्यति भक्त्यैव बन्धात् विमुच्यते भक्त्यैवानन्दीभवति’, ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः’, ‘भिनत्ति कर्मसङ्घातं प्रसन्नो भगवान् हरिः’ इत्याद्यागमात् ॥30॥

अनुबन्धाधिकरणम्


न च ‘दृष्ट्वैव तं मुच्यते नापरेण’, ‘यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः’, ‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा’ इत्यादि सामान्यालापमात्रेण दर्शनस्याविशेषः । ‘यथायोग्यमेवैष आत्मानं दर्शयति यथाधिकारं देवेभ्योऽतो ब्रह्मैवैनमभिपश्यत्यथात्मैवात्मानमभिपश्यति, सुस्थिरो ह्येष नियमः’ इति दर्शनविशेषनियमस्य सुस्थिरत्ववचनात् । यावान्यश्चास्मीति ब्रह्मण एव ज्ञानोपपत्तेः । ‘यावान्’ इत्यत्रापि सामान्यविशेषज्ञानोपपत्तेश्च ॥31॥

प्रज्ञान्तराधिकरणम्


न च भगवतः सर्वत्र गुणसाम्यात् यस्य कस्यापि रूपस्य दर्शनात् सर्वेषां मुक्तिः ।

‘समोऽपि भगवान् स्वबिम्बदर्शन एवैनं मोचयति ।

यथा समेष्वपि कर्मसु स्वकृतमेवैनं भोजयति ॥’ इति श्रुत्युक्तस्वकृतप्राप्तिदृष्टान्तात् ॥32॥

सामान्याधिकरणम्


भक्तिरेवैनमिति भक्तेरेव पृथङ्‍मोचकत्वदर्शनान्नेशकृत्यमिति न मन्तव्यम् ।

‘अनादितो गुणाः सन्तो भक्त्याद्या न ह्यमूमुचन् ।

जीवं तद्गुणसुव्यक्तिं कृत्वैनं मोचयेद्धरिः ।
कञ्चिन्न मोचयेद्वाऽसौ स्वातन्त्र्यं तस्य तेन हि(तेन तस्य हि) ।
भक्तिवाक्करणत्वेन सावकाशेशवागथ ।
भक्त्यैनं मोचयेद् विष्णुरिति मानत्वमेष्यति ॥’
इति ब्रह्मतर्कवचनादनादिगुणविस्तरे सत्यप्यव्यक्त्यादिना तदिच्छां विना मोक्षाप्राप्तेः ॥33॥

परेणाधिकरणम्


न चांशिमार्गस्यांशेनागम्यत्वात् तयोर्भेदः । साधनोत्तमस्यादृष्टस्यांशिकृतस्यांशेन भुज्यमानत्वात् । अन्यथाऽदृष्टं विना शरीराद्यनुपपत्तेः(शरीर अनुपपत्तेः) ॥34॥

एकाधिकरणम्


न च गुणान्तरसन्धानस्य क्वचित्(क्वापि) दर्शनमात्रेण समाधिकाङ्गदेवतान्तरगुणा अप्यङ्गदेवतान्तर उपसंहर्तव्याः । नानागुणत्वेन तेषां श्रुतिषु दृष्टेः । अनिषिद्धगुणानां वाक्यान्वयन्यायेनोपसंहारान्न शाखास्वित्यादिविशेषः । उत्तमेष्वधमगुणापेक्षया मन्त्रादिवद्वेति ॥35॥

अङ्गावबद्धाधिकरणम्


न च भूमगुणस्योपासकं प्रति विशेषाभावेऽपि तत्तदिष्टगुणानुसारेण फलोपपत्तिरित्यविशेषः । ‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते’ इत्यादिशिष्टेः ॥36॥

भूमाधिकरणम्


न च भूमगुण उपासकानामेकप्रकारेणैव प्रतीयत इत्यङ्गीकार्यम् । विशेषस्य कल्पनोपपत्तेरिति न मन्तव्यम् ।

‘यावानेवाधिकारेषु विशेषोऽनून एव हि ।

ततो(अतो) भूमत्वदृष्टौ च ब्रह्मादीनां पृथक् पृथक् ॥’ इति विशेषस्यानूनत्ववचनात् ॥37॥

नानाधिकरणम्


न च शुद्धमोक्षसाधनवैरूप्यान्मोक्षसाधनत्वेनोपदिष्टं विना (विष्णावेव)विष्णोरेवोपासनान्तरस्याकर्तव्यता । अविघ्नतासाधनत्वात् ॥38॥

विकल्पाधिकरणम्


न च काम्यसाधनानामपि गुणानामङ्गत्वादेवोपसंहर्तव्यतानियमः । अनुपसंहारे विरोधाभावात् । काम्यानामनियताङ्गत्वाच्च । ‘अर्थादिधर्मसिद्धौ हि न नियत्याऽङ्गमिष्यते’ इति ब्रह्मतर्के ॥39॥

कामाधिकरणम्


न च देवादीनामिति(देवानामिति) तत्रैव विशेषवचनाभावात् ‘ब्रह्मा शिरसि ललाटे रुद्रः’ इत्यादीनां नावश्योपास्यता । ‘देवादीनामेव ध्यायेदङ्गेषु अङ्गदेवताः परस्य विशिष्टा हि गुणा मुक्तौ देवानां(देवादीनां) भवन्ति ते हि तादृशास्ते हि हरेरनुरूपाः’ इति श्रुतेर्गुणवैशेष्यात् ॥40॥

अङ्गाधिकरणम्


न च क्रियात्वादुपासनाया(उपसंहारस्य) अग्निष्टोमादिवत् प्रतिशाखं वक्तव्यता ।
‘उपासना यजनं चेति साम्यं तत्तद्विशेषान् संहरेत् सर्वतश्च ।
तथाकर्तॄणां तत्फलानां विशेषाद् व्यर्था हि शाखा अन्यथैवं च सार्थाः ॥’ इत्युपासनाविशेषाणामधिकारिविशेषाणां(.....त्वधिकारिविशेषाणांं चागऽमेवगमात् ॥41॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥

चतुर्थः पादः

पुरुषार्थाधिकरणम्


न च ज्ञानिन औदार्यान्मोक्षादन्यफलेच्छाया एवासम्भवात् तदुक्तिः प्रशंसामात्रमिति वाच्यम् । प्रायशो न सम्भवत्येव । कस्यचित् सौभरिवत् सा भवति(सौभर्यादिवद्भवति) चेज्ज्ञानेनैवाशेषमभीप्सितं(अशेषमीप्सितं) भवतीति व्यवस्थोपपत्तेः ॥1॥

सर्वात्रिकाधिकरणम्


न चाधिकारे समेपि तेषामेवोच्चावचशक्तियोगात् फलभेदोपपत्तेरधिकारविशेषकल्पनं व्यर्थम् । भक्त्याद्यधिकारतारतम्येन(भक्त्याद्यधिकारानुसारेण) शास्त्रात् फलप्राप्तेः सर्वेषामविशेषात् । दृश्यमानत्वाच्च भक्त्याद्यधिकारतारतम्यस्य । उच्चवचशक्तेरपि तन्निबन्धनत्वात् ॥2॥

अविशेषाधिकरणम्


न च ज्ञानिनामात्मस्वरूपदार्ढ्यात् सत्प्रवृत्तिविपरीतप्रवृत्योरविशेषः ।

‘एतावतोऽधिका नास्ति प्राप्तिरित्यन्ततः स्थिता ।

या स्थितिस्तां समाप्नोति यथाशक्ति प्रयत्नतः ॥

उभयलिङ्गाधिकरणम्


‘विपरीतप्रवृत्तेस्तु तस्य(तस्या) ह्रासोऽधिकं भवेत् ॥’ इति वचनात् स्थितिविशेषोपपत्तेः ॥4-5॥

अथाऽधिकारिकाकाधिकरणम्


न च सर्वजीवानामेकप्रकार एव निजस्वभावश्चैतन्यमिति फलेऽप्यविशेषः । निषेधसामान्यविधिक्रियाणां विभक्तत्वात् । ‘नादेवो देवपदमन्विच्छेदन्विच्छन् यात्यधरं तमः । न देवः स्वीयं पदमन्विच्छन् विदुष्यति । तदेव ह्यस्य स्वम्’ इति निषेधविभागः । ‘स्थिरं ज्ञानं स्थिरो हरावभिषङ्गः स्थिरमोजो बलं विराग एतद्धि सामान्यं देवानाम् । अथान्येषामस्थिराण्येवेतानि(.....अस्थिराण्येव एतानि/अस्थिराण्येतानि) सर्वाण्यथापि यथायोगं विनेयानि‘ इति सामान्यविभागः । ‘ज्ञानदानमेव देवानां विहितं तप एवर्षीणामाचार एव मनुष्याणां तदविरोधेनान्यानि करणीयानि’ इति विधिविभागः । ‘चरन्ति देवा विहितं समस्तमर्धमेव मुनयो दशांशतो मनुष्याः’ इति क्रियाविभागः ॥6॥

फलश्रुत्यधिकरणम्


न च स्वातन्त्र्याद् देवानामेव ज्ञानादिफलं, न किञ्चिदन्येषामिति वाच्यम् ।

‘ त्वरयैव मनुष्याणां सिद्धिरत्वरयैव तु ।

देवानां तत्प्रसादेन मुक्त्या एव सतां नृणाम् ॥’ इति मानुषमुक्त्यर्थमेव देवानामत्वरया सिद्धिश्रुतेः ॥7॥

कृत्स्नभावाधिकरणम्


न च गृहस्थानामशेषकर्मविशेषयोग्यत्वादाधिक्यं मुक्तौ । त्वरयैव गृहिणः साधयन्ति मुक्तिमत्वरयैव यतयस्तेभ्यश्चात्वरया देवास्तेषु च ब्रह्मा । तदेष श्लोकः ।

‘शतं परानभिपश्यैव देवं ब्रह्माऽचरद्दुश्चरं यत्तपोऽग्र्यम् ।

विहाय रागं मनसश्चोपरिष्ठः(मनसश्चापि विष्ठां) ततोऽभवत् परमेष्ठी स मुक्तौ ॥’ इति । ‘यो हि त्वरया साधयेत् स मन्दं सुखमाप्नुयात् । यो ह्यत्वरया स महत् ॥’ इति श्रुतेर्गृहिस्थो यतीनां तेभ्यो देवानामत्वरया सिद्धेः । बहुकालसाधनात् बहुकर्माधिकारमात्रस्य दुर्बलत्वात् ॥8॥

अन्वयाधिकरणम्


न चाविष्कारेण कथनादशेषतोऽपि योग्या ज्ञानिनो भवन्तीत्यास्थानचत्वरादिषु स्थित्वैव प्रकथनीयम् । न ह्येवं त्वरमाणे सिद्धिभर्वति । अयोग्यानामपि ग्रहण(श्रवण)प्रसङ्गात् । तस्मात् विचार्य योग्यानामेवात्वरयैव कथयित्वा सिद्धिर्भवति । ‘त्यक्त्वा त्वरां ब्रह्मविद्यां वदेत जनाय योग्याय सदैव विद्वान्’ इति श्रुतेः । ‘मा न स्तेनेभ्यः’ इत्यादेश्च ॥9॥

मुक्तिफलाधिकरणम्


न च विरोधाभावात् साधनानुष्ठानजन्मन्येवापरोक्षज्ञानं मुक्तिश्चेति नियमः । प्रतिबन्धे सति तन्निरासेनात्वरयैव सिद्ध्युपपत्तेः । ‘यद्यारब्धं कर्म निबन्धकं स्यात् प्रेत्यैव पश्येद्योगमेवान्ववेक्ष्य’ इत्यादिश्रुतेः । ‘अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्’(भ.गी.६.४५) इति (च) भगवद्वचनम् ॥10-11॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥

चतुर्थोध्यायः

प्रथमः पादः

आवृत्त्यधिकरणम्


न च श्रवणाद्यनवृत्त्याऽपरोक्षज्ञानोदये सर्वेषां सुशक्यत्वमिति गुणः । महाफलत्वात् सर्वेषामशक्यताया एवोपपन्नत्वात् । अन्यथा सर्वसुशक्यस्यैव साधनतया सर्वेषां मोक्षापत्तेः ॥1॥

आत्माधिकरणम्


न च शश्वदतिप्रसिद्धत्वात् आत्मशब्दोदितं स्वामित्वं न नित्यश उपास्यम् । अन्येभ्योऽधिकफलत्वेन सविशेषत्वादात्मत्वस्य ॥2॥

प्रतीकाधिकरणम्


तर्हि विशेषवत्वादेव प्रतीकमपीश्वर इत्युपास्यमिति नास्ति(इति च नास्ति/न) । यत्र सन्धिरुपपत्तिर्विद्यते तस्यैव ग्राह्यत्वात् । अन्यस्येशत्वग्रहणस्य मिथ्याज्ञानत्वादेवानुपपत्तेः ॥3॥

ब्रह्माधिकरणम्


न च प्रतिदिनं विविधगुणन्यासेन भगवत्प्रीत्युपपत्तेर्न ब्रह्मतादृष्टिनियम इति वाच्यम् । अशेषगुणान्तर्भावेन तस्यैवाधिकसाधनत्वात् ॥4॥

आदित्याधिकरणम्


न च विविधस्थानेष्वादित्यादीनां चरणाद्विष्ण्वङ्गेष्वादित्यादिमतिनियमो नास्तीति वाच्यम् । तत्कृतावेव कृत्यस्याप्तत्वादादित्यादीनाम् ॥5॥

आसीनाधिकरणम्


न च ज्ञानस्य सम्यक्तद्विषयत्वमात्रेण पूर्तेरासनादिना न कार्यमिति वाच्यम् । आसनादिना निश्चलत्वादिविशेषकार्योपपत्तेः ॥6॥

आप्रायणाधिकरणम्


न चान्यस्यापि साधनस्य कर्तुं शक्यत्वान्न यावन्मुक्ति ध्यानं कार्यमिति वाच्यम् । ध्यानं विनाऽपरोक्षज्ञानाख्यविशेषकार्यानुपपत्तेः ॥7॥

तदधिगमाधिकरणम्


न च ज्ञानोदयेऽशेषकर्मक्षये कृतकृत्यत्वात् तदैव मुक्तिः, न चेत् कर्माक्षय इति वाच्यम् । प्रारब्धस्यैव कृतस्य यावज्ज्ञानं संस्थितेः ।

‘ कर्माणि क्षपयेद्विष्णुरप्रारब्धानि विद्यया ।

प्रारब्धानि तु भोगेन क्षपयन् स्वगतिं नयेत् ॥’ इति वचनात् ॥8॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥

द्वितीयः पादः

वाङ्मासाधिकरणम्


न च ‘वाक् पूर्वरूपं मन उत्तररूपं’, ‘मनः पूर्वरूपं वागुत्तररूपम्’ इत्युक्तेः व्यामिश्रत्वादनिर्णीतिरेव । ‘वाक् पूर्वरूपं मन उत्तररूपं’ इति वाचः पूर्ववर्णदेवतात्वनिर्देशमात्रेण ‘मनःपूर्वरूपं’ इत्यनेन साम्यम् । ‘मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयत्यथ वाचा व्याहरति’ इति युक्तितो विशेषो मनःपूर्वकत्वस्यैव श्रुत इति प्राधान्यं मनस एव(एवेति) हि ज्ञायते ।

‘सृष्टौ च विलये चैव सदा पूर्वप्रवर्तने ।

नियन्तृत्वे च वचसो मनोऽधीशं(मनोऽधीशः) शिवो हि तत् ॥’ इति श्रुतेश्च ॥1॥

मनःप्राणाधिकरणम्


न च मनःपूर्वकत्वनियमादशेषदृष्टादृष्टव्यापाराणां तस्य प्राणादनूनता

‘इन्द्रियस्थैः स्वरूपैस्तु ज्ञानानि जनयत्यसौ ।

मनस्स्थेन विशेषेण कार्मै कर्मकृदेव च ।
पृथक्स्थितेन रूपेण जीवं धारयति प्रभुः ।
जीवस्थितेन रूपेण वेदयत्यहमित्यपि ।
प्राण एको वशी नित्यं बाह्यान्तःकरणेश्वरः ।
तान्येतान्यवशान्येव तथापि कृपयैव सः ।
पृथक्शक्तोऽपि तद्गैस्तु स्वरूपैस्तद्गकार्यकृत् ।
तस्येशो भगवान् विष्णुरेवमेष यथाऽन्यगः ॥’ इत्यादिश्रुतेः प्राणस्यैवाढ्यतावगमात् ॥2॥

अध्यक्षाधिकरणम्


‘सोऽध्यक्षे’ इत्यस्याप्येवमेवाशङ्का परिहारश्च । श्रुतिबाहुल्यमेवाशङ्कायां(शङ्कायां) परिहारे च विशेषहेतुः ॥3॥

नैकस्मिन्नधिकरणम्


न च भूतानामुत्पत्तिक्रमवैपरीत्येन लयोक्तेर्मुक्तलिययोर्विशेषभावाच्चैकस्मिन्नेव भूते सर्वेषां लयोऽर्थतः क्लृप्त इति वाच्यम् । तत्तद्भूतोद्भवत्वात् तत्तद्देवानां तत्समानानां(तत्समानां) च विशेषवचनाभावे स्वसमानलयस्थान एव लयोपपत्तेः । विशेषश्रुतेश्च ॥4-5॥

समनाधिकरणम्


न च प्रकृतेः (असंसारादिना)संसाराभावादिनेशेनाप्यन्यथाकर्तुमशक्यत्वेन सुदृढत्वात् सर्वसाम्यमेवेश्वरेण, न चेत् संसारित्वमिति युक्तम् । ईश्वरस्य महामहिमत्वात् । नित्यमसंसारित्वस्य(नित्यासंसारित्वस्य) नित्यं तदनुग्रहेणैवोपपत्तेः ।

‘ सदाऽनित्यतयाऽनित्यं नित्यं नित्यात्मना यतः ।

नित्ययैव स्वशक्त्यैशो नियामयति नित्यदा ॥’‘ द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावश्चेतना धृतिः ।
प्रकृतिः पुरुषश्चैव न सन्ति यदुपेक्षया ॥’ इत्यादिश्रुतेश्च ॥6॥

पराधिकरणम्


न चान्यदेवादीनां प्राणाधीनत्वात् तत्प्राप्तिनियमात् परप्राप्तिर्नास्त्येव ।

‘प्राणं प्राप्य परं देवास्तदन्ये चैव तद्गताः ।

प्राप्नुवन्ति परं देवं वसन्ति च यथासुखम् ॥’ इति विशेषश्रुतेः ॥7॥

अविभागाधिकरणम्


न च सत्यसङ्कल्पत्वादेरीश्वरसङ्कल्पाद्यनुसारित्वनियमे संसारसमानधर्मत्वं मुक्तेरिति वाच्यम् । कृतार्थत्वेनैव विशेषोपपत्तेः ।

‘अपूर्णतादिभावो वा दुःखं वा नास्ति किञ्चन ।

मुक्तस्य पारतन्त्र्येऽपि तारतम्येऽप्यतः सुखी ॥’ इति च श्रुतिः ॥8॥

तदोकोऽधिकरणम्


न च प्रारब्धकर्मशेषत्वात्(प्रारब्धकर्मशेषवत्वात्) उत्क्रान्तावविशेषो ज्ञानिनः । ज्ञानोदयानन्तरं सर्वदा ज्ञानफलस्यानुवृत्तेः(ज्ञानफलस्यानुप्रवृत्तेः) ।

‘प्रारब्धकर्मशेषस्तु विरजातरणावधिः ।

स्वोदयात् फलदं ज्ञानमादेहं कर्म वाऽऽरवेः(चारवेः) ।
तथापि प्रकृतेर्बन्धो ब्रह्मणा सह भिद्यते ॥’ इति हि श्रुतिः(इति श्रुतिः) । ‘शरीरे पाप्मनो हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते । स तेजसि सूर्ये सम्पन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं हैव स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सम्प्राप्नोति(स प्राप्नोति) विरजां नदीं तत्सुकृतदुष्कृते विधूनुते’ ‘ते ब्रह्मलोके तु परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे’ इति च । ‘अन्यथाभावनियमोऽनृतता कार्यकारणे’ इति च ॥9॥

योग्याधिकरणम्


न च कृष्यादिलौकिकसाधनस्य फलस्मरणानपेक्षत्वात् स्वर्गमोक्षयोरपि तथात्वमिति वाच्यम् ।

‘क्रियानुवृत्तिर्लौकिके साधने तु मनोनुवृत्तिर्वैदिके साधने स्यात् ।

भवेत् फलं सर्वथेत्येव तस्मात् स्मरेत् सदा निश्चितत्वेन विद्वान् ॥’ इति श्रुतेस्तदनुसार्यनुवृत्तेः लौकिकवैदिकयोः साम्यात् । अतोऽत्र फलानुस्मरणं लवनादिकृष्यनुवृत्तिवद्द्रष्टव्यम् । वचनप्रामाण्यात् ॥10॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥

तृतीयः पादः

अतिवाहिकाधिकरणम्


न च तत्र तत्र मार्गस्यान्यथोक्तेरधिकारिभेदेन पृथङ्‍(पृथक् पृथक्)मार्गसुक्रमोपपत्तिरिति वाच्यम् । ‘सर्वे वा एत उत्क्रामन्ति तेऽर्चिषमेवाभियन्ति(.....वाभिसम्यन्ति) ततो वायुं ततोऽहः पूर्वपक्षमित्येष उ एव(एव उ एव) ब्रह्मपथः । द्वे स्रुती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च’ इति विशेषश्रुतितो ज्ञानिनामेकमार्गस्यैव प्राप्तत्वात्(प्राप्तेः) । ‘एष एव ब्रह्मपथः’ इत्यवधारणविरोधोऽन्यथा(विरोधादन्यथा) । एजदिति वैदिकानुष्ठानवत उक्तेर्नाधोगतिविरोधः ।

‘पुनरावर्तिनो ये तु तेषां धूम्रपथो ध्रुवः ।

अन्येषामर्चिरादिश्च तद्भेदो मध्यसंस्थितिः ।

धूमार्चिरादिदेवेभ्यः प्राप्यानुज्ञां तु मध्यगाः । विहृत्य स्वेष्टदेशेषु तदूर्ध्वं याति वाघरम्(चाघरम्) ।

अत्यल्पानामविज्ञाताऽप्यनुज्ञावर्तिनां भवेत् । 

पुंद्वारेण स्वदृष्ट्या वा यथायोग्यं विमुच्यताम् । अतो न मार्गभेदोऽस्ति न हि मार्गोऽत्र सम्भवः ।

प्रेतत्वं चाधरो(वाऽधरो) मार्गः पापजत्वात् तयोः(द्वयोः) पृथक् ॥’ इति स्मृतेश्च ॥1-4॥

वैद्युताधिकरणम्


न च सोमादग्निमग्नेरिन्द्रमिति सोमादग्नेरवरस्यापि(खमस्यापि) प्राप्तेः प्रधानवायोरप्यवरोऽन्यः प्राप्योऽस्त्विति वाच्यम् । उत्तमत्वात् तस्यैव ब्रह्मप्रापयितृत्वशक्तेः । ‘वायुरेव ब्रह्म गमयति तस्य ह्येषा(हैषा) शक्तिः । न ह्यन्यो ब्रह्म गमयति प्रियो ह्येनद्गमयति । न ह्यन्यः प्रियो ब्रह्मणः’ इति श्रुतेः । मार्गे त्ववरस्यापि यथामार्गं पश्चात् प्राप्तिर्भवति लोकवत् । न हि राजानं यः कश्चित् प्रापयति क्लृप्तमतिप्रियं चातिहाय(चापहाय) ॥5॥

कार्याधिकरणम्


न च चतुर्मुखस्य प्राप्तिपर्यन्तं(मुक्तिपर्यन्तं) सन्ततत्वनियमात् बन्धस्य तावद्भगवत्प्राप्तिर्नास्तीति नियमः ।

‘यान्ति देवं परं केचित् पूर्वं केचिल्लये विभुम् । योग्यतातारतम्येन विशेषोऽथमपीष्यते ॥’ इति श्रुतेस्तथाप्राप्तत्वात् । न च परब्रह्मणः एव ब्रह्मशब्दमुख्यार्थत्वेन प्रथमप्राप्तत्वादपोहायुक्तेस्तस्यैव प्राप्तिनियमः । ‘यान्ति देवं परं केचित्’ इति प्रमाणप्राप्तत्वादेव । न च परप्राप्तिर्यस्याभीष्टा तस्य तत्प्राप्तिरिति नियमः । ‘क्रमानुरागी भगवान् क्रमात् पुम्भिरवाप्यते । अतः क्रमात् समृद्धे तु ज्ञाने ब्रह्मलये नरैः ।

प्राप्यते नियमेनैव कैश्चिदेवाप्यते मृतौ ॥’ इति भगवतः क्रमानुरागित्वश्रुतेः । न च बहुधाश्रुतेर्यथासौकर्यं चतुर्मुखस्य परस्य वा प्राप्तिरिति वाच्यम् । श्रुत्युक्तानुवृत्तेरेव न्याय्यत्वात् । ‘सप्रतीकाश्चतुर्मुखमप्रतीकाः परममु हैते गच्छन्त्यागच्छन्ति च चतुर्मुखात् परमं परमाच्चतुर्मुखं(पराच्चतुर्मुखं) यावद्विलयमथ सह चतुर्मुखेन विमुच्यन्ते आनन्दी(आनन्दिनो)भवन्ति’ इति हि श्रुतिः । अन्तर्भेदाधिकरणत्वात् समुदायोक्तिः ॥6॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥

चतुर्थः पादः

सम्पद्याद्यधिकरणम्


न च ‘एतं सेतुं तीर्त्वा’ इत्यत्रातिक्रमोक्ते र्मुक्तो ब्रह्म तीत्वा गच्छतीति(गच्छति) । तरतीति सामान्य प्रतीतेः(सामान्यरूपप्रतीतेः) ब्रह्म तीर्त्वेदं गच्छतीति विशेषानुक्तेः । ‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वा ब्रह्म सम्पद्यत’ इति विशेषोक्तेश्चैतं सेतुं प्रत्यन्यत् तीर्त्वेत्यन्यथोपपत्तेः(.....त्यर्थोपपत्तेः) ॥1॥

मुक्ताधिकरणम्


न च कृतिमत्त्वादमुक्त एवोच्यते । ‘स तत्र पर्येति’ इत्यादौ ‘स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति मुक्तस्य स्पष्टं प्रतिभातत्वाच्छ्रुतौ । स तत्र पर्येतीति श्रुत्यैक्यप्रतीतेश्च । एवम्भूतस्यापि प्रकरणत्वं परिकल्प्य(प्रकल्प्य) श्रुतिबाधाङ्गीकारे सा श्रुतिरप्येवं विभज्य ‘किं योजयितुं न(न योजयितुं) शक्या’ इति(शक्यते इति) श्रुतेरेवाभावप्रसङ्गः । ‘सत्यं ज्ञानम्’ इत्यादावपि सत्यमित्यस्यान्यमित्यनेननान्वय इत्यादिप्रसङ्गात् ॥2॥

आत्माधिकरणम्


न च परञ्ज्योतिःशब्देनादित्यज्योतिरङ्गीकारे ‘स तेजसि सूर्ये सम्पन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं हैव स पाप्मना विनिर्मुक्त’ इत्यादिनैकार्थतेति प्रयोजनम् । ‘अथ किमुच्यते परं ज्योतिरित्यात्मैव परञ्ज्योतिः स हि परमो द्योतते जीवाच्चाजीवाच्च तस्मादाहुः परञ्ज्योतिरिति । तमेष(तमेवैष) जीवोऽभिसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति तस्यैव परञ्ज्योतिष्ट्वोक्तेः । सावकाशलिङ्गान्निरवकाशश्रुतेरेव बलवत्वात्(सावकाशश्रुतेर्निरवकाशश्रुतेरेवातिबलवत्वात्) ॥3॥

अविभागाधिकरणम्


न च परमगतित्वादीश्वराभुक्ता अपि भोगा मुक्तौ भवन्ति । ईश्वरस्य स्वत एव पूर्णानन्दत्वादभोगस्यापि सम्भवादिति वाच्यम् । पूर्णानन्दः पूर्णभुक् पूर्णकर्ता पूर्णज्ञानः पूर्णभाः पूर्णशक्तिः । ‘आश्चर्यत्वात्(पूर्णैश्वर्याद्) भगवान् वासुदेवो विरुद्धशक्तिर्न च दोषस्पृगीशः’ इत्याश्चर्यतयैव ब्रह्मण उभयोक्तेः । सावकाशोपपत्तिमात्रान्निरवकाशश्रुतियुक्तोपपत्तेरेव बलवत्वात् ॥4॥

ब्राह्माधिकरणम्


न च पारगतत्वात्(पारङ्गतत्वात्) मुक्तस्य चिन्मात्रदेहोऽपि नास्तीति वाच्यम् । अकृत्रिमत्वात् तस्य देहस्याप्यनपगमात्(देहस्यानपगमनात्) । ‘अथ विमुक्तस्य चिन्मात्र एव देहो भवति चिन्मात्राणि करणानि तैरीशानुगृहीतैर्भोगान् भुङ्क्ते’ इति श्रुतेः ॥5॥

सङ्कल्पाधिकरणम्


न च भगवदोकः(भगवदोकसि) स्थितत्वात् मुक्तस्य तस्याप्योकस्त्वसाम्येन तत्तदुपायसाध्यभोगसाधनत्वं वाच्यम् । निर्दोषत्वात् तदोकसो मुक्तस्य च सङ्कल्पादेवेति श्रुत्युक्तानुसारेणोपपत्तेः(श्रुत्यनुसारेणोपपत्तेः) ॥6॥

अनन्याधिपत्याधिकरणम्


न च परगृहगतत्वादस्य राजगृहगतस्यैव स्वाधमा अपि कदाचिदीशते । निर्दोषत्वादेव मुक्तस्येश्वरस्य तत्रस्थानां मुक्तान्तराणां च राजदोषवद्दोषासम्भवाद्यथायोग्यमेव स्वीकारोपपत्तेः ।

‘मुक्तानां पतयो देवा देवानां च प्रजापतिः ।

तस्य विष्णुर्न चैवेदं पारावर्यं विनश्यति ॥’ इति च श्रुतिः ॥7॥

अभावाधिकरणम्


न च देहभावे तत्कार्यदुःखादिस्तदभावे भोगासम्भव इति दोषः ।

‘देहाभावाच्च भावाच्च निर्भोगित्वं च दुःखिताम् ।

यान्त्यमुक्ता नोभयं च मुक्तानां वशिता यतः ॥’ इति श्रुत्यैव विशेषक्लृप्तेः ॥8॥

जगद्व्यापाराधिकरणम्


न च सङ्कल्पादेव समस्तसम्भवात् सृष्ट्यादिसमस्तकार्यसम्भवः ।

‘व्यापारो जगतो शुद्धमपि वह्निकार्यकरं भवेत् । (अयोग्यशक्तितश्चैव)अयोग्याशक्तितस्त्वेव नाधिकानन्दसम्भवः ।

न हि कश्चित् सुशक्तोऽपि चकाराचेतनं चितिम् ।
न च कामस्तथा भूयात् ततः स्यात् सत्यकामता(सत्यकामिता) ॥’ इति श्रुत्या विशेषक्लृप्तेरेव ।

‘मुक्तानां न जगद्यत्नस्तथापि विबुधाः सदा ।

मुक्तानां तु नियन्तारस्तेषां ब्रह्माऽस्य वै हरिः ॥’ इति च विशेषक्लृप्तिः ॥9॥

स्थित्यधिकरणम्


न च वशित्वान्मुक्तस्यापि वृद्धिः । कृतकृत्यत्वेन निःश्रमत्वादुपासनादावभ्यासपाटवात् निर्दोषत्वात् स्नेहाधिक्याच्च तस्यैव परमसुखरूपत्वेन फलस्वरूपत्वात् ।

‘अभ्यासपाटवात् स्नेहादश्रमत्वादुपासना ।

भक्तिश्च सुखरूपैव मुक्तानां न तु साधनम् ॥’ इति च श्रुतिः ॥10॥

अनावृत्त्यधिकरणम्


न चानन्तत्वात् कालस्य त्रयोदशीपञ्चदशीवत् कदाचित् समस्तस्यापि सम्भवान्मुक्तस्यापि पुनरावृत्त्याशङ्केति वाच्यम् । सत्यकामत्वादिमाहात्म्यात् ।

‘अदोषकामसत्यत्वात् मुक्तानामपुनर्भवः( न पुनर्भवः) ।

यस्मात् स कामयेदेव नित्यमात्मापुनर्भवम् ॥’ इति(इति च श्रुतिः) ॥ 11 ॥

इत्यनन्तमहान्यायमीमांसापारवारिधेः ।

उत्तारणात्यशक्त्यैव व्याकुलीकृतचेतसाम्(भूतचेतसाम्) ॥
मन्दानामुपकाराय महतां चोच्छ्रितात्मनाम् ।
तद्विशेषपरिज्ञानप्रदीप्तार्काभचेतसाम् ॥
विशेषगाढे मनसि नितरामुपकारकः(नितरां चोपकारकः) ।
न्यायप्लवो मयाऽकारि सङ्क्षेपात् प्रमिताक्षरैः ॥
(विस्तारो)विस्तरोऽप्ययमेव स्यात् तद्विशेषातिवेदिनाम् ।

व्याख्यानुव्याख्यायोरेव विस्तारो(विस्तरो) यदुदीरितः ॥

अनल्पचेतसां पुंसामलं विज्ञानसिद्धये । तन्न्यायोद्धरणे(ऽ)शक्ता अपि ह्येतेन सुस्थिरम् ॥

न्यायानुगं मनः कुर्युरितिसङ्ग्रहलालसाः(कुर्युरतिसङ्ग्रहलालसाः) । को नामाशेषविद्योरुसागरोन्मथनोद्धृतम्॥

साक्षाद्विद्याधिराजेन न्यायामृतमनुत्तमम् ।
अशेषतोऽधिगच्छेत वन्द्यो वृन्दारकोऽपि सन् ॥
एवं सुदुर्लभेऽप्यद्धा महान्यायपरामृते ।
केचनाधिक्रियन्तेऽत्र(च) तत्प्रसादानुरञ्जिताः ॥
ब्रह्माद्या अमृते यद्वत् सागरोन्मथनोद्धृते ।
अहं तु तत्प्रसादैकमहास्पदबलोद्धतः ॥
न्यायमृतार्णवमिममवगाह्य विभज्य च ।
सङ्क्षेपविस्तराभ्यां च चकार(चकर) व्याकृतिं कृतिम् ॥
तत्प्रसादमृते कस्य शक्तिः संसारसागरे ।
मग्नस्य चेतनस्य स्यात् तत्कृतानुकूतौ क्वचित् ॥
नित्यानन्दामृतस्यन्दितत्कटाक्षैधितस्य(कटाक्षेधितस्य) तु ।
का नु शक्तिर्भवेन्नैव ततः को वाऽतिविस्मयः ॥
विद्याविद्ये सुखं दुःखमशक्तिः शक्तिरेव च ।
उत्पत्तिस्थितिनाशाश्च विशेषाश्च परेखिलाः(विशेषाश्चापरेऽखिलाः) ॥
चेतनाचेतनस्यास्य समस्तस्य यदिच्छया ।
स मम स्वकृतेनैव प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपणि दिव्यान्यलं बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
वायो रामवचो नयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥
(नमोऽब्जभव.....)नमोऽजभवभूर्यक्षपुरःसरसुराश्रय ।
नारायणारणं मह्यं मापते प्रेयसां प्रिय ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥