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Rigbhashyam: Difference between revisions

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== अग्निसूक्तम् ==
{{Adhyaya
| document_id  = RG
| chapter_num  = 1
| section_num  = 1
| title        = अग्निसूक्तम्
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| text =
मण्डलम्—१. अध्यायः –१. अनुवाकः–१. सूक्तम्–१.
 
मङ्गलाचरणम्
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अग्निं नवर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा ऋषिः, गायत्री छन्दः, अग्निर्देवता
| verse_type = mantra
| verse_line1 = नारायणं निखिलपूर्णगुणार्णमुच्चसूर्यामितद्युतिमशेषनिरस्तदोषम् ।
| verse_line2 = सर्वेश्वरं गुरुमजेशनुतं प्रणम्य वक्ष्याम्यृगर्थमतितुष्टिकरं तदस्य ॥ १ ॥
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| verse_type   = mantra
| verse_type = mantra
| verse_line1 = ओ३म् ॥ अग्निमीळेे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ॥ होतारं रत्नधातमम् ॥ १ ॥
| verse_line1 = ओमशेषगुणाधार इति नारायणोऽप्यसौ ।
| commentary1  = rigbhashyam
| verse_line2 = पूर्णो भूतिवरोऽनन्तसुखो यद् व्याहृतीरितः ॥ २ ॥
}}
}}


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| text     =
| text =
अग्निम् ।  ईळे । पुरःऽहितम् । यज्ञस्य । देवम् । ऋत्विजम् । होतारम् । रत्नऽधातमम् ॥ १ ॥
 
व्याहृत्यर्थः गायत्र्यर्थश्च एक एव
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}}
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अग्निम् अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । पु॒रःऽहि॑तम् । य॒ज्ञस्य॑ । दे॒वम् । ऋ॒त्विज॑म् । होता॑रम् । र॒त्न॒ऽधात॑मम् ॥ १
| verse_type = mantra
| verse_line1 = गुणैस्ततः प्रसविता वरणीयो गुणोन्नतेः
| verse_line2 = भारतिज्ञानरूपत्वाद् भर्गो ध्येयोऽखिलैर्जनैः
}}
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नारायणो ध्येयः
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}}
अग्निशब्दार्थो भगवान्
 
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| verse_line1 = प्रेरकोऽशेषबुद्धीनां स गायत्र्यर्थ ईरितः ॥ ३ ॥
}}
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भगवान् सर्ववेदार्थः
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देवशब्दनिरुक्तिः
}}
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| verse_type = mantra
होतृशब्दस्याध्यात्मार्थनिरूपणम्
| verse_line1 = स पूर्णत्वात् पुमान्नाम पौरुषे सूक्त ईरितः ।
| verse_line2 = स एवाखिलवेदार्थः सर्वशास्त्रार्थ एव च ॥ ४ ॥
}}
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........अग्निशब्दोऽयमग्र एवाभिपूज्यताम् अग््रयत्वमग्रनेतृत्वमत्तिमङ्गागनेतृताम् ॥ ९ ॥
| verse_type = mantra
| verse_line1 = स एव सर्वशब्दार्थः इत्याहोपनिषत् परा
}}
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| text     =
| text =
आह तं स्तौम्यशेषस्य पूर्वमेव हितं प्रभुम् । ऋत्विङि्नयामकत्वेन यज्ञानामृत्विजं सदा ॥ १० ॥
 
ऋङ्मन्त्रव्याख्यानं भगवत अतितुष्टिकरम्
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द्योतनाद्विजयात् कान्त्या स्तुत्या व्यवहृतेरपि । गत्या रत्या च देवाख्यं होतृसंस्थं विशेषतः ॥ ११ ॥
 
ऋङ्मन्त्रव्याख्यानकरणे हेतुप्रदर्शनम्
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}}
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अग्निसंस्थेन रूपेण यतोऽग्निर्होतृदेवता
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| verse_line1 = ‘यो देवानाम्’ इति श्रुत्या देवनाम्नां विशेषतः स्पष्टत्वात् तद्गतत्वेन
}}
}}


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इन्द्रियाग्निषु चार्थानां यद्धोता होतृनामकः ॥ रतिधारकोत्तमत्वात् स रत्नधातम ईरितः  ॥ १२ ॥
}}


{{Bhashyam
अग्निशब्दार्थनिर्वचनम्
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| text    =
अग्निस्तुतौ आचारकथनम्
}}
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| verse_type   = mantra
| verse_type = mantra
| verse_line1 = अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत॥ स देवा एह वक्षति ॥ २ ॥
| verse_line1 = अग्रणीत्वं यदग्नित्वमित्यग्रे नाम तद्भवेत् ।
| commentary1  = rigbhashyam
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
 
शब्दार्थनिर्वचने विशेषकारणनिरूपणम्
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}}
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| chapter_id = RG_C01
अग्निः पूर्वेभिः । ऋषिऽभिः । ईड्यः । नूतनैः । उत ॥ सः देवान् ।  आ । इह । वक्षति
| verse_type = mantra
| verse_line1 = (ऋग्भाष्यम्) यथैवाग्न्यादयः शब्दाः प्रवर्तन्ते जनार्दने
| verse_line2 = तथा निरुक्तिं वक्ष्यामो ज्ञानिनां ज्ञानसिद्धये
}}
}}


== अग्निसूक्तम् ==
{{Adhyaya
| document_id  = RG
| chapter_num  = 1
| section_num  = 1
| title        = अग्निसूक्तम्
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| text     =
| text =
अ॒ग्निः । पूर्वे॑भिः । ऋषि॑ऽभिः । ईड्यः॑ । नूत॑नैः । उ॒त । सः । दे॒वान् । आ । इ॒ह । व॒क्ष॒ति॒ ॥ २ ॥
 
मण्डलम्—१. अध्यायः –१. अनुवाकः–१. सूक्तम्–१.
}}
}}


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| text =
स पूर्वैर्नूतर्नैरेष्यैर्विज्ञानादृषिनामकैः । ईड्यो देवादिभिस्सर्वैस्स च देवानिहानयेत् ॥ १३ ॥॥
 
अग्निं नवर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा ऋषिः, गायत्री छन्दः, अग्निर्देवता
}}
}}


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| verse_line1 = अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे । यशसं वीरवत्तमम् ॥३॥
| verse_line1 = ओ३म् ॥ अग्निमीळेे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ॥ होतारं रत्नधातमम् ॥ १ ॥
| commentary1   = rigbhashyam
| commentary1 = rigbhashyam
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| text =
अग्निना रयिम् अश्नवत् पोषम् एव दिवेऽदिवे ॥ यशसम् वीरवत्ऽतमम्
 
अग्निम्   ईळे पुरःऽहितम् यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम् । होतारम् रत्नऽधातमम्
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
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| text     =
| text =
तेनैव रयिमाप्नोति वित्तं विद्याधनात्मकम् ।  दिवसे दिवसे नित्यं पुष्टिमेव न हीनताम् यशश्च पुत्रसंयुक्तं वीर्यवत्तममेव वा १४ ॥॥
 
अग्निम् ।  अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । पु॒रःऽहि॑तम् । य॒ज्ञस्य॑ । दे॒वम् । ऋ॒त्विज॑म् । होता॑रम् । र॒त्न॒ऽधात॑मम्
}}
}}


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अग्निशब्दार्थो भगवान्
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| text    =
अग्निस्तुतिः
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| verse_line1  = अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि । स इद्देवेषु गच्छति ॥
| commentary1  = rigbhashyam
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}}


{{Bhashyam
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| text     =
| text =
अग्ने । यम् । यज्ञम् । अध्वरम् । विश्वतः । परिऽभूः । असि ॥ सः ।  इत् । देवेषु । गच्छति ॥ ४ ॥
 
देवशब्दनिरुक्तिः
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}}
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| text     =
| text =
यं यज्ञं परितो भूत्वा रक्षसि त्वं सदैव च ।  विधिमार्गस्थितं देवान् स एवाप्नोत्यसंशयम् ॥ १५ ॥
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होतृशब्दस्याध्यात्मार्थनिरूपणम्
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| chapter_id    = RG_C01
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| verse_line1  = अग्निर्होता कविक्रतुस्सत्यश्चित्रश्रवस्तमः ॥ देवो देवेभिरागमत् ॥ ५, १ ॥
| commentary1  = rigbhashyam
}}
}}


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| verse_id = RG_C01_S01_V05
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| text     =
| text =
अग्निः । होता । कविऽक्रतुः । सत्यः । चित्रश्रवःऽतमः ॥ देवः । देवेभिः । आ गमत् ५, १
 
........अग्निशब्दोऽयमग्र एवाभिपूज्यताम् अग््रयत्वमग्रनेतृत्वमत्तिमङ्गागनेतृताम्
}}
}}


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| text     =
| text =
सोऽखिलग्रहणप्रज्ञः सद्गुणैः सन्ततोऽखिलम् । यमयत्यग््रयकीर्तीनाम् उत्तमो विबुधैः सह ।  आगन्ताऽखिलभक्तानां पूजास्वीकारतत्परः ॥ १६ ॥  ॥
}}


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आह तं स्तौम्यशेषस्य पूर्वमेव हितं प्रभुम् । ऋत्विङि्नयामकत्वेन यज्ञानामृत्विजं सदा १०
| verse_id      = RG_C01_S01_V06
| document_id  = RG
| chapter_id    = RG_C01
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रङ्करिष्यसि तवेत्तत् सत्यमङ्गिरः ६ ॥
| commentary1  = rigbhashyam
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S01_V06
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| id = RG_C01_S01_V01_B03
| text     =
| text =
निचृद् गायत्री
 
द्योतनाद्विजयात् कान्त्या स्तुत्या व्यवहृतेरपि । गत्या रत्या च देवाख्यं होतृसंस्थं विशेषतः ॥ ११ ॥
}}
}}


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{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S01_V06
| verse_id = RG_C01_S01_V01
| id       = RG_C01_S01_V06_padapatha
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| text     =
| text =
यत् । अङ्ग । दाशुषे । त्वम् । अग्ने । भद्रम् । करिष्यसि ॥ तव । इत् । तत् । सत्यम् अङ्गिरः ॥ ६ ॥
 
अग्निसंस्थेन रूपेण यतोऽग्निर्होतृदेवता
}}
}}


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{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S01_V06
| verse_id = RG_C01_S01_V01
| id       = RG_C01_S01_V06_B01
| id = RG_C01_S01_V01_B05
| text     =
| text =
यजमानाय यद्भद्रं कर्तुमिच्छसि सत्प्रिय । त्वच्चेष्टयैव कर्माणि वर्तयित्वा तदीहनम्    १७
 
इन्द्रियाग्निषु चार्थानां यद्धोता होतृनामकः ॥ रतिधारकोत्तमत्वात् स रत्नधातम ईरितः १२
}}
}}


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{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S01_V06
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| id = RG_C01_S01_gadya
| text     =
| text =
तवैव सत्यमङ्गानां रसयद्वह्निगो हरिः । अङ्गिरा अङ्गिरःपुत्रो यतोऽग्निरभवत् क्वचित्    ॥ १८ ॥
 
अग्निस्तुतौ आचारकथनम्
| extra_class = gr-verse-text gr-gadya
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = RG_C01_S01_V07
| verse_id = RG_C01_S01_V02
| document_id   = RG
| document_id = RG
| chapter_id   = RG_C01
| chapter_id = RG_C01
| verse_type   = mantra
| verse_type = mantra
| verse_line1 = उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धियावयम् नमो भरन्त एमसि ॥ ७
| verse_line1 = अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत॥ स देवा एह वक्षति
| commentary1   = rigbhashyam
| commentary1 = rigbhashyam
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S01_V07
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| text     =
| text =
उप । त्वा । अग्ने । दिवेऽदिवे । दोषाऽवस्तः । धिया । वयम् ॥  नमः । भरन्तः । आ । इमसि ॥ ७ ॥
 
}}
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S01_V07
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| text     =
| text =
वस्तर्दिनमहोरात्रमभीष्ट प्राणिनां सदा । अल्पा अपि वयं बुद्ध्या त्वामुच्चगुणमीश्वरम् । उपयाम मनःकर्मवाग्भिस्त्वन्नमसम्भराः ॥ १९ ॥
}}


{{VerseBlock
अग्निः । पूर्वेभिः । ऋषिऽभिः । ईड्यः । नूतनैः । उत ॥ सः देवान् । आ । इह वक्षति
| verse_id      = RG_C01_S01_V08
| document_id  = RG
| chapter_id    = RG_C01
| verse_type    = mantra
| verse_line1 = राजन्तमध्वराणा ङ्गोपामृतस्य दीदिविम् वर्धमानं स्वे दमे
| commentary1  = rigbhashyam
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S01_V08
| verse_id = RG_C01_S01_V02
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| id = RG_C01_S01_V02_padapatha
| text     =
| text =
यवमध्या विरा गायत्री
 
अ॒ग्निः । पूर्वे॑भिः । ऋषि॑ऽभिः । ईड्यः॑ । नूत॑नैः । उ॒त । सः । दे॒वान् । आ । इ॒ह । व॒क्ष॒ति॒ ॥ २ ॥
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S01_V08
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| text     =
| text =
राजन्तम् । अध्वराणाम् । गोपाम् । ऋतस्य । दीदिविम् ॥ वर्धमानम् । स्वे । दमे ॥ ८ ॥
}}


{{Bhashyam
स पूर्वैर्नूतर्नैरेष्यैर्विज्ञानादृषिनामकैः ईड्यो देवादिभिस्सर्वैस्स च देवानिहानयेत् १३ ॥॥
| verse_id = RG_C01_S01_V08
| id      = RG_C01_S01_V08_B01
| text    =
देदीप्यमानं स्वे सद्मन्यध्वरेशं सदावृधम् यथार्थज्ञानगोपं त्वामुपेमसि पितेव नः ॥ २०
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = RG_C01_S01_V09
| verse_id = RG_C01_S01_V03
| document_id   = RG
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| verse_type   = mantra
| verse_type = mantra
| verse_line1 = स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव ॥ सचस्वानस्स्वस्तये ॥ ९, २, १ ॥
| verse_line1 = अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे । यशसं वीरवत्तमम् ॥३॥
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विरा गायत्री
 
अग्निना । रयिम् । अश्नवत् । पोषम् । एव । दिवेऽदिवे ॥ यशसम् ।  वीरवत्ऽतमम् ॥ ३ ॥
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सः । नः । पिताऽइव । सूनवे । अग्ने । सुऽउपायनः । भव ॥ सचस्व । नः स्वस्तये ९,२,१
 
तेनैव रयिमाप्नोति वित्तं विद्याधनात्मकम् दिवसे दिवसे नित्यं पुष्टिमेव न हीनताम् यशश्च पुत्रसंयुक्तं वीर्यवत्तममेव वा १४ ॥॥
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अग्निस्तुतिः
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मन्त्रादीनाम् ऋष्यादिस्वरूपनिरूपणम्
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भगवतः सर्वविद्यानाम् ऋषित्वे प्रमाणानि
| verse_line1 = अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि । स इद्देवेषु गच्छति ॥
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सर्ववेदानां चतुर्मुखब्रह्मा अपि प्रथमद्रष्टा ऋषिः
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अग्ने । यम् । यज्ञम् । अध्वरम् । विश्वतः । परिऽभूः । असि ॥ सः ।  इत् । देवेषु । गच्छति ॥ ४ ॥
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पञ्चरात्रद्रष्टा शेषः
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गरुडशेषयोः सर्वविद्यामुनित्वे द्वितीयं स्थानम्
यं यज्ञं परितो भूत्वा रक्षसि त्वं सदैव च ।  विधिमार्गस्थितं देवान् स एवाप्नोत्यसंशयम् ॥ १५ ॥
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ऋषिलक्षणम्
| verse_line1 = अग्निर्होता कविक्रतुस्सत्यश्चित्रश्रवस्तमः ॥ देवो देवेभिरागमत् ॥ ५, १ ॥
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विरिञ्चादीनामध्ययने कारणनिरूपणम्
अग्निः । होता । कविऽक्रतुः । सत्यः । चित्रश्रवःऽतमः ॥ देवः । देवेभिः । आ । गमत् ॥ ५, १ ॥
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अवान्तरभेदेन यजुर्वेदादीनाम् ऋषयः
सोऽखिलग्रहणप्रज्ञः सद्गुणैः सन्ततोऽखिलम् । यमयत्यग््रयकीर्तीनाम् उत्तमो विबुधैः सह ।  आगन्ताऽखिलभक्तानां पूजास्वीकारतत्परः ॥ १६ ॥  ॥
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ऋषिस्मरणफलम्
| verse_line1 = यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रङ्करिष्यसि ॥ तवेत्तत् सत्यमङ्गिरः ॥ ६ ॥
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स्वायोग्यार्थप्रतिपादक(प्रार्थनादि)वाक्यानां तात्पर्यम्
निचृद् गायत्री
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सर्ववेदाभिमानिन्यः श्रीः भारती च
यत् । अङ्ग । दाशुषे । त्वम् । अग्ने । भद्रम् । करिष्यसि ॥ तव । इत् । तत् । सत्यम् । अङ्गिरः ॥ ६ ॥
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देवतास्त्रीणामपि स्वभर्त्रनन्तरं सर्ववेदद्रष्ट्रुत्वम्
यजमानाय यद्भद्रं कर्तुमिच्छसि सत्प्रिय ।  त्वच्चेष्टयैव कर्माणि वर्तयित्वा तदीहनम्    ॥ १७ ॥
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श्रीभारत्यादीनां छन्दोऽभिमानित्वेन स्मरणकथनम्
तवैव सत्यमङ्गानां रसयद्वह्निगो हरिः । अङ्गिरा अङ्गिरःपुत्रो यतोऽग्निरभवत् क्वचित्    ॥ १८ ॥
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छन्दोऽभिमानिदेवतानिरूपणम्
| verse_line1 = उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धियावयम् ॥ नमो भरन्त एमसि ॥ ७ ॥
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छन्दस्सु अवान्तरभेदनिरूपणम्
उप । त्वा । अग्ने । दिवेऽदिवे । दोषाऽवस्तः । धिया । वयम् ॥  नमः । भरन्तः । आ । इमसि ॥ ७ ॥
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सर्वविद्याप्रतिपाद्यदेवतासु तारतम्यनिरूपणम्
वस्तर्दिनमहोरात्रमभीष्ट प्राणिनां सदा । अल्पा अपि वयं बुद्ध्या त्वामुच्चगुणमीश्वरम् । उपयाम मनःकर्मवाग्भिस्त्वन्नमसम्भराः ॥ १९ ॥
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मुक्तावपि ज्ञानादिगुणेषु देवानां तारतम्यम्
| verse_line1 = राजन्तमध्वराणा ङ्गोपामृतस्य दीदिविम् । वर्धमानं स्वे दमे ॥ ८ ॥
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विद्यावाच्यदेवतास्वरूपनिरूपणम्
यवमध्या विरा गायत्री
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यास्कनिरुक्तिः न प्रमाणम्, व्यासनिरुक्तिरेव मानम्
राजन्तम् । अध्वराणाम् । गोपाम् । ऋतस्य । दीदिविम् ॥ वर्धमानम् । स्वे । दमे ॥ ८ ॥
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तारतम्यज्ञानेनैव मोक्षः
देदीप्यमानं स्वे सद्मन्यध्वरेशं सदावृधम् ।  यथार्थज्ञानगोपं त्वामुपेमसि पितेव नः ॥ २० ॥
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लक्ष्म्याः ब्रह्माद्युत्तमत्वे मानम्
| verse_line1 = स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव ॥ सचस्वानस्स्वस्तये ॥ ९, २, १ ॥
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ब्रह्मणः रुद्राद्युत्तमत्वे मानम्
विरा गायत्री
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वायोः रुद्राद्युत्तमत्वे प्रमाणम्
सः । नः । पिताऽइव । सूनवे । अग्ने । सुऽउपायनः । भव ॥ सचस्व । नः । स्वस्तये ॥ ९,२,१ ॥
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मन्त्रादीनाम् ऋष्यादिस्वरूपनिरूपणम्
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वायोरिन्द्राद्युत्तमत्वे विप्रतिपत्तिनिरासः
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इति बर्कश्रुतिश्चाह शक्रात् सप्ताक्षितिश्रुतिः ।
 
भगवतः सर्वविद्यानाम् ऋषित्वे प्रमाणानि
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वायोः रुद्राद्युत्तमत्वे मानम्
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वेदादिषु नैकधार्थकत्वमिति निरूपणम्
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अदोषः प्रायशो ब्रह्मा इति निरूपणम्
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विष्णौ योग-रूढ्यादिना शब्दसमन्वयक्रमः
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अभेदस्थलेषु व्याख्यानप्रकारनिरूपणम्
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दार्ढ्यमेवानुदात्तार्थ उदात्तस्योच्चतार्थता ।  नीचता स्वरितस्यार्थः प्रचयस्य यथास्थितिः ॥  समाहारेऽखिला अर्थाः स्वरार्थानामियं स्थितिः ॥ ९८  ॥
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मुक्तावपि ज्ञानादिगुणेषु देवानां तारतम्यम्
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स्वरभेदे कारणनिरूपणम्
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विद्यावाच्यदेवतास्वरूपनिरूपणम्
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वेदार्थव्याख्यानस्य सत्-असत्फलकत्वे कारणनिरूपणम्
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यास्कनिरुक्तिः न प्रमाणम्, व्यासनिरुक्तिरेव मानम्
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योग्यतावशात् वेदार्थज्ञानम्
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तारतम्यज्ञानेनैव मोक्षः
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प्राचीनव्याख्यातृवन्दनादिकरणे कारणनिरूपणम्
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सूपाश्रयो भव त्वं च यद्वदौरससूनवे । रक्ष सन्ततसौख्याय सम्यक्सत्त्वाय वा सदा ॥ २१ ॥  ॥
 
लक्ष्म्याः ब्रह्माद्युत्तमत्वे मानम्
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मुनिस्तु सर्वविद्यानां भगवान् पुरुषोत्तमः ।  विशेषतश्च वेदानां ‘यो ब्रह्माणम्’ इति श्रुतिः ॥
 
ब्रह्मणः रुद्राद्युत्तमत्वे मानम्
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ऋग्वेदादिकमस्यैव श्वसितं प्राह चापरा ॥ २२ ॥
 
वायोः रुद्राद्युत्तमत्वे प्रमाणम्
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‘वाचो बभूवुरुशतीर्हयग्रीवात्’ इति स्फुटम् । वचो भागवतेऽप्यस्ति ब्रह्माण्डेऽपि तथा परम् ॥ २३॥
 
वायोरिन्द्राद्युत्तमत्वे विप्रतिपत्तिनिरासः
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हयग्रीवादिमा विद्याः श्वसितत्वेन निःसृताः ब्रह्मणा स्वीकृतास्ताश्च रुद्रशेषविपा अपि ॥ २४ ॥
 
इति बर्कश्रुतिश्चाह शक्रात् सप्ताक्षितिश्रुतिः
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दक्षाद्याः सनकाद्याश्च शक्राद्या मनवस्तथा । जगृहुस्ते च विश्वस्मिंश्चक्रुर्व्याप्तास्ततोऽखिलाः ॥ २५ ॥
 
वायोः रुद्राद्युत्तमत्वे मानम्
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उक्तं पद्मपुराणे च ‘कपिलो भगवानजः । प्रोवाच ब्रह्मणे विद्याः’  ‘हृदिस्थो बादरायणः ॥ २६॥
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विष्णोरिन्द्रादाधिक्ये विप्रतिपत्तिनिराकरणम्
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ओङ्कारपूर्विका विद्याः प्रेरयत्यखिलेष्वपि । सदैव ब्रह्मणे पूर्वम्’ इति सात्वतसंहिता ॥ २७॥
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सकृन्निगदमात्रेण गृहीतं ब्रह्मणाऽखिलम् । अन्तर्गतस्य व्यासस्य प्रसादान्नित्यशक्तितः ॥ २८ ॥
 
वेदादिषु नैकधार्थकत्वमिति निरूपणम्
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तेन चानन्तशक्तित्वात् युुगपत् समुदीरितम् । प्रथमप्रतिपत्तृत्वान्मुनिर्ब्रह्माऽखिलस्य च ॥ २९ ॥
 
अदोषः प्रायशो ब्रह्मा इति निरूपणम्
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सुपर्णोऽखिलवेदानां पञ्चरात्रस्य नागरा ।
 
विष्णौ योग-रूढ्यादिना शब्दसमन्वयक्रमः
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द्वितीयप्रतिपत्तृत्वान्मुनित्वे सम्प्रकीर्तितौ ॥ ३० ॥
 
सूक्तभेदे कारणनिरूपणम्
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यः पश्यति स्वयं वाक्यं स ऋषिस्तस्य कीर्तितः । अर्वाक्तु द्वादशावृत्तेरधीत्याप्यृषिरेव सः ॥ ३१॥
 
अभेदस्थलेषु व्याख्यानप्रकारनिरूपणम्
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यत्स्वयं प्रतिभातस्य संशयार्थं गुरोर्वचः । सुपर्णादेर्विरिञ्चस्य केवलं धर्मकारणम् ॥ ३२ ॥
 
भेद-अभेद-भेदाभेदस्थलनिरूपणम्
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ऋचामृषिस्ततः शक्रो यजुषां सूर्य एव च । सोमः साम्नां तृतीयास्ते प्रतिपत्तार ईरिताः ॥ ३३ ॥
 
मुक्तस्वरूपनिरूपणम्
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अथर्वाङ्गिरसामग्निरेकर्षिश्चाप्यथर्वणाम् । इत्युक्ताः समुदायस्य सन्त्यन्ये च पृथक् पृथक् ॥ ३४ ॥
 
मोक्षसाधननिरूपणम्
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एतज्ज्ञानाददृष्टस्य फलस्याप्तिः स्फुटं भवेत् । द्रष्टॄणां तु चतुर्थानां ज्ञानादप्यैहिकं भवेत् ॥ ३५ ॥
 
छन्दोज्ञानमपि अवश्यमेवेति निरूपणम्
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ते चैकस्यापि बहवः स्युः सूक्तस्यर्च एव वा ॥
 
गायत्रीमन्त्रजप्तुरेव ब्राह्मणत्वम्
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तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तत्प्राप्तिविशेषतः ॥ ३६॥
 
स्वराणामर्थनिरूपणम्
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तेषां वाक्यस्वरूपेण प्रार्थनादिषु पश्यति विष्णुर्ब्रह्मा सुपर्णो वा तत्तद्योग्यार्थभेदतः ३७
 
दार्ढ्यमेवानुदात्तार्थ उदात्तस्योच्चतार्थता नीचता स्वरितस्यार्थः प्रचयस्य यथास्थितिः समाहारेऽखिला अर्थाः स्वरार्थानामियं स्थितिः ९८  ॥
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सर्ववेदाभिमानित्वाच्छ्रीर्ब्रह्माणी च भारती । द्रष्ट्र्यश्च सर्वविद्यानां व्याख्यातो ब्रह्मणा मरुत् ॥ ३८ ॥
 
स्वरभेदे कारणनिरूपणम्
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स्वभर्त्रनन्तरं द्रष्ट्र्यस्तेभ्यस्तन्नोदिता हिरुक् । ताः स्तुवन्ति हरिं नित्यं विद्याभिस्ते च सर्वशः ॥ ३९ ॥
 
वेदार्थव्याख्यानस्य सत्-असत्फलकत्वे कारणनिरूपणम्
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छन्दस्त्वेन मुनित्वेन तासां स्मृतिरुदीरिता । स्मर्तव्यास्ते च सर्वेऽपि मुनित्वेन पृथक्पृथक् ॥ ४०॥
 
योग्यतावशात् वेदार्थज्ञानम्
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गायत्री बृहती चैव ताः सर्वा गरुडस्तथा । ब्रह्माण्यनुष्टुबिन्द्राणी त्रिष्टप् स्वाहेति चोच्यते ॥ ४१ ॥
 
प्राचीनव्याख्यातृवन्दनादिकरणे कारणनिरूपणम्
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गायत्री जगती चैव वारुणी रोहिणी तथा अनुष्टुप् बृहती चैव तारा पङ्क्तिः शची तथा ४२
 
सूपाश्रयो भव त्वं च यद्वदौरससूनवे रक्ष सन्ततसौख्याय सम्यक्सत्त्वाय वा सदा ॥ २१
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उष्णिक् सौरी जगत्यश्च सर्वदेवस्त्रियो मताः विराण्मित्रावरुणयोर्भार्ये इति च कीर्तिते ॥ ४३
 
मुनिस्तु सर्वविद्यानां भगवान् पुरुषोत्तमः विशेषतश्च वेदानां ‘यो ब्रह्माणम्’ इति श्रुतिः
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अतिछन्दांसि सर्वाणि सर्वदेव्यः प्रकीर्किताः । विराडिति च नामासां तास्ता ऊनाधिकेष्वपि ४४
 
ऋग्वेदादिकमस्यैव श्वसितं प्राह चापरा २२
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निचृद् भुरिग् विरा सञ्ज्ञा प्रस्तारेत्यादि नाम च बह्वीनामेकमानेन त्वेकं नाम च युज्यते ॥ सर्वाभिमानिता चैव तिसृणां तु यथाक्रमम् ॥ ४५
 
‘वाचो बभूवुरुशतीर्हयग्रीवात्’ इति स्फुटम् वचो भागवतेऽप्यस्ति ब्रह्माण्डेऽपि तथा परम् २३॥
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देवता सर्वविद्यानां स्वयं नारायणः प्रभुः ऋते तत्र प्रसिद्धाश्च देवता श्रीस्तथाऽत्र च ४६
 
हयग्रीवादिमा विद्याः श्वसितत्वेन निःसृताः ब्रह्मणा स्वीकृतास्ताश्च रुद्रशेषविपा अपि २४
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ऋते प्रसिद्धा ब्रह्मैव ततस्तेन क्रमेण
 
दक्षाद्याः सनकाद्याश्च शक्राद्या मनवस्तथा । जगृहुस्ते विश्वस्मिंश्चक्रुर्व्याप्तास्ततोऽखिलाः ॥ २५ ॥
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पूर्वप्रसिद्धवर्जं तु शक्रान्ता देवता मताः ४७॥
 
उक्तं पद्मपुराणे च ‘कपिलो भगवानजः । प्रोवाच ब्रह्मणे विद्याः’  ‘हृदिस्थो बादरायणः २६॥
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ब्रह्मवायू गिरौ वीन्द्रशेषरुद्राश्च तत्स्त्रियः शक्रकामौ कामपुत्रमनुदक्षाङ्गिरस्सुताः ॥ ४८
 
ओङ्कारपूर्विका विद्याः प्रेरयत्यखिलेष्वपि सदैव ब्रह्मणे पूर्वम्’ इति सात्वतसंहिता २७॥
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तद्वच्छची रतिः सूर्यसोमधर्मादितत्स्त्रियः प्रधानमरुतो वारिपतिरग्निश्च मारुताः ४९
 
सकृन्निगदमात्रेण गृहीतं ब्रह्मणाऽखिलम् अन्तर्गतस्य व्यासस्य प्रसादान्नित्यशक्तितः २८
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निर्ऋतिः स्त्रियश्च सूर्यादेरश्विनावितरे तथा अनन्तकोटिशतकदशार्धाद्यंशतः क्रमात् ५०
 
तेन चानन्तशक्तित्वात् युुगपत् समुदीरितम् प्रथमप्रतिपत्तृत्वान्मुनिर्ब्रह्माऽखिलस्य च २९
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ज्ञानभक्तिबलैश्वर्यपूर्वाखिलगुणैरपि मुक्तावपि क्रमो ह्येष देवता उदिता इमाः ॥ ५१ ॥
 
सुपर्णोऽखिलवेदानां पञ्चरात्रस्य नागरा
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इन्द्रावरा विशेषेण लिङ्गेनैव पृथक्पृथक् । देवतास्तत्र तत्र स्युरेष एव परो विधिः ५२॥
 
द्वितीयप्रतिपत्तृत्वान्मुनित्वे सम्प्रकीर्तितौ ॥ ३०
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वेदादिवर्णपर्यन्तैर्मूर्तयः केशवस्य तु समासव्यासयोगेन वाच्यास्तात्पर्यतः पृथक् । यथायोगं यथान्यायमन्यासामपि मूर्तयः ॥ ५३
 
यः पश्यति स्वयं वाक्यं स ऋषिस्तस्य कीर्तितः अर्वाक्तु द्वादशावृत्तेरधीत्याप्यृषिरेव सः ३१॥
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ऋक्संहितायां स्वाध्याये निरुक्ते व्यासनिर्मिते प्रवृत्ते चैतदखिलमुक्तं हि प्रभुणा स्वयम् ५४
 
यत्स्वयं प्रतिभातस्य संशयार्थं गुरोर्वचः सुपर्णादेर्विरिञ्चस्य केवलं धर्मकारणम् ३२
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‘सर्वे वेदाश्च’ ‘नामानि’ ‘ता वा एता ऋचस्तथा ‘इन्द्रं मित्रं वरुणम्’ इत्याद्यत्र प्रमा परा ५५
 
ऋचामृषिस्ततः शक्रो यजुषां सूर्य एव च सोमः साम्नां तृतीयास्ते प्रतिपत्तार ईरिताः ३३
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देवतातारतम्यं सर्वोत्कृष्टं च केशवम् । ज्ञात्वैव मुच्यते ह्यस्मान्नान्यथा तु कथञ्चन ५६॥
 
अथर्वाङ्गिरसामग्निरेकर्षिश्चाप्यथर्वणाम् । इत्युक्ताः समुदायस्य सन्त्यन्ये पृथक् पृथक् ॥ ३४
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इति पैङ्गिश्रुतिश्चाह दृश्यतेऽत्र च सर्वशः । ‘न ते महित्वम्’ इत्यादिनैश्वरानेव केवलान् गुणान् विष्णोः श्रुतिर्ह्याह नैव दोषान् कथञ्चन ५७
 
एतज्ज्ञानाददृष्टस्य फलस्याप्तिः स्फुटं भवेत् द्रष्टॄणां तु चतुर्थानां ज्ञानादप्यैहिकं भवेत् ३५
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‘जाता परिबभूव’ इति मर्यादां ब्रह्मणोऽपि हि । ‘नैव रेमे बिभेद् ब्रह्मा ‘नासीत्’ इत्यादिकानपि ॥ ५८
 
ते चैकस्यापि बहवः स्युः सूक्तस्यर्च एव वा
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दोषान् रुद्रे च तानेव ‘न मिनन्ति’ इति पूर्वकान् ।  ‘यं कामये तं तमुग्रं’ ‘रुद्राय धनुः’ इत्यपि  ॥ ५९
 
तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तत्प्राप्तिविशेषतः ३६॥
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‘अस्य देवस्य’ ‘मा शिश्नदेवा अपि गुः’ इत्यपि ‘घ्नञ्छिश्नदेवान्’ इत्याद्या दोषा बहव ईरिताः  ६०
 
तेषां वाक्यस्वरूपेण प्रार्थनादिषु पश्यति विष्णुर्ब्रह्मा सुपर्णो वा तत्तद्योग्यार्थभेदतः ३७
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‘ततो वितिष्ठे योनिः’‘स एतावत्यहम्’ इत्यपि । अन्याश्रयत्वं देव्याश्च कथितं बहुशोऽपि हि
 
सर्ववेदाभिमानित्वाच्छ्रीर्ब्रह्माणी च भारती द्रष्ट्र्यश्च सर्वविद्यानां व्याख्यातो ब्रह्मणा मरुत् ॥ ३८ ॥
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तदाश्रयत्वमन्येषामपि तत्रैव निश्चयात्    ६१
 
स्वभर्त्रनन्तरं द्रष्ट्र्यस्तेभ्यस्तन्नोदिता हिरुक् । ताः स्तुवन्ति हरिं नित्यं विद्याभिस्ते च सर्वशः ३९
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‘ब्रह्मैवाग्रे’ इति ह्युक्त्वा रुद्रादीनां ततो जनिः उक्ता जातानि विश्वानि स पर्यभवदित्यपि । ‘यस्य च्छायामृतं मृत्युः’ इति चादरतोऽब्रवीत्  ॥ ६२
 
छन्दस्त्वेन मुनित्वेन तासां स्मृतिरुदीरिता स्मर्तव्यास्ते च सर्वेऽपि मुनित्वेन पृथक्पृथक् ४०॥
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अनन्तादवरेशाना तस्याः प्राणस्ततश्च वाक् । तस्या रुद्र उमा तस्मादिन्द्रस्तस्यास्ततोऽपरे सौपर्णश्रुतिरित्याह  सप्ताक्षितय इत्यपि ६३
 
गायत्री बृहती चैव ताः सर्वा गरुडस्तथा ब्रह्माण्यनुष्टुबिन्द्राणी त्रिष्टप् स्वाहेति चोच्यते ४१
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वायुरस्मा उपामन्थद् विश्वदेवाय वायवे विश्वैर्देवैः स इत्याद्याः प्रमा अत्रापरा अपि ६४
 
गायत्री जगती चैव वारुणी रोहिणी तथा अनुष्टुप् बृहती चैव तारा पङ्क्तिः शची तथा ४२
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नारायणोऽदितिर्वायुर्वाणी रुद्र उमा विभुः इतरे क्रमाद्धीनाः शतांशाद्वायुतोऽवराः ६५
 
उष्णिक् सौरी जगत्यश्च सर्वदेवस्त्रियो मताः विराण्मित्रावरुणयोर्भार्ये इति कीर्तिते ४३
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‘अयं त एमि तन्वेति’ पूर्वा अन्या अपि स्फुटम् वायोराधिक्यमप्याहुः
 
अतिछन्दांसि सर्वाणि सर्वदेव्यः प्रकीर्किताः । विराडिति च नामासां तास्ता ऊनाधिकेष्वपि ॥ ४४
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इन्द्रं सोमं हुताशनम् ६६
 
निचृद् भुरिग् विरा सञ्ज्ञा प्रस्तारेत्यादि नाम च । बह्वीनामेकमानेन त्वेकं नाम च युज्यते ॥ सर्वाभिमानिता चैव तिसृणां तु यथाक्रमम् ४५
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सूर्यं रुद्रमिमान्् पञ्च देवानेको महात्मनः सृजत्यत्ति महान्प्राण इति चाह तुरश्रुतिः ६७
 
देवता सर्वविद्यानां स्वयं नारायणः प्रभुः ऋते तत्र प्रसिद्धाश्च देवता श्रीस्तथाऽत्र च ४६
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‘वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत न यस्येन्द्रः’ इति ह्याह विष्णोरिन्द्रस्य हीनताम् ॥ ६८ ॥
 
ऋते प्रसिद्धा ब्रह्मैव ततस्तेन क्रमेण च
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‘वेधा अजिन्वत्’ इत्यादि वचनं विष्णुनामतः । आनन्दश्रुतिरप्यस्य जीवतामेव दर्शयेत् ॥ ६९
 
पूर्वप्रसिद्धवर्जं तु शक्रान्ता देवता मताः ४७॥
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आह सूर्यादपीन्द्रस्य वायोर्विष्णोरपीशताम् ‘यः सूर्यं य उषसम्’ ‘म्रियन्ते पञ्च देवताः’ ७०
 
ब्रह्मवायू गिरौ वीन्द्रशेषरुद्राश्च तत्स्त्रियः शक्रकामौ कामपुत्रमनुदक्षाङ्गिरस्सुताः ४८
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‘चक्षुषा द्यौश्चादित्यश्च’ ‘चक्षोः सूर्यो अजायत’ ‘यमादित्यो न वेद’ इति पूर्वा श्रुतिरथापरा ७१
 
तद्वच्छची रतिः सूर्यसोमधर्मादितत्स्त्रियः प्रधानमरुतो वारिपतिरग्निश्च मारुताः ४९
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‘विष्णोर्वातोऽजनिष्ट वातादिन्द्रस्ततो रविः सोमश्चेति लयोऽप्येवं पूर्वे पूर्वे गुणाधिकाः’ ७२
 
निर्ऋतिः स्त्रियश्च सूर्यादेरश्विनावितरे तथा अनन्तकोटिशतकदशार्धाद्यंशतः क्रमात् ५०
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‘विष्णोः प्राणो अजनिष्ट प्राणादिन्द्रो रविर्विधुः लयोऽप्येतादृशस्तेषां पूर्वः पूर्वो गुणाधिकः’  ७३
 
ज्ञानभक्तिबलैश्वर्यपूर्वाखिलगुणैरपि मुक्तावपि क्रमो ह्येष देवता उदिता इमाः ५१
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तुरश्रुतिश्च सौपर्णी पिङ्गश्रुतिरपीदृशी अतः सर्वाधिको विष्णुर्निर्णीतः श्रुतिसञ्चयात् ॥ ७४
 
इन्द्रावरा विशेषेण लिङ्गेनैव पृथक्पृथक् देवतास्तत्र तत्र स्युरेष एव परो विधिः ५२॥
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अतो दोषवचो यत्र तद्वाक्यमवरं वदेत् निर्दोषतैव विष्णोस्तु क्रमान्मध्यगतेष्वपि  ७५
 
वेदादिवर्णपर्यन्तैर्मूर्तयः केशवस्य तु । समासव्यासयोगेन वाच्यास्तात्पर्यतः पृथक् यथायोगं यथान्यायमन्यासामपि मूर्तयः ५३
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‘त्रयोऽर्थाः सर्ववेदेषु दशार्थाः सर्वभारते विष्णोः सहस्रनामापि निरन्तरशतार्थकम्’ ॥७६
 
ऋक्संहितायां स्वाध्याये निरुक्ते व्यासनिर्मिते प्रवृत्ते चैतदखिलमुक्तं हि प्रभुणा स्वयम् ॥ ५४
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इति स्कान्दवचो यस्मादर्थभेदव्यपेक्षया निर्दोषत्वं हरेर्वक्ति दोषमन्येष्वपि क्रमात् ७७
 
‘सर्वे वेदाश्च’ ‘नामानि’ ‘ता वा एता ऋचस्तथा ‘इन्द्रं मित्रं वरुणम्’ इत्याद्यत्र प्रमा परा ५५
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तारतम्यस्य विज्ञप्त्यै वचो दोषस्य चार्थवत्
 
देवतातारतम्यं च सर्वोत्कृष्टं च केशवम् ज्ञात्वैव मुच्यते ह्यस्मान्नान्यथा तु कथञ्चन ॥ ५६॥
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‘गुणाः श्रुताः’ इति ह्याह गुणैकनियतिं हरौ ७८
 
इति पैङ्गिश्रुतिश्चाह दृश्यतेऽत्र च सर्वशः । ‘न ते महित्वम्’ इत्यादिनैश्वरानेव केवलान् । गुणान् विष्णोः श्रुतिर्ह्याह नैव दोषान् कथञ्चन ५७
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‘निर्दोषगुणपूर्णश्च विष्णुरेको न चापरः अपूर्णा दोषरहिता मायैका तद्वशैव च ७९
 
‘जाता परिबभूव’ इति मर्यादां ब्रह्मणोऽपि हि ‘नैव रेमे बिभेद् ब्रह्मा ‘नासीत्’ इत्यादिकानपि ५८
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अदोषः प्रायशो ब्रह्मा दोषवन्तः क्रमात् परे’ इति मान्यश्रुतिश्चाह भेदोऽर्थानां ततो मतः॥ ८०
 
दोषान् रुद्रे च तानेव ‘न मिनन्ति’ इति पूर्वकान् ‘यं कामये तं तमुग्रं’ ‘रुद्राय धनुः’ इत्यपि  ॥ ५९
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रूढिमेव समाश्रित्य विभज्यार्थान् यथाक्रमम् । विदोषगुणपूर्त्यर्थं विष्णौ योगार्थमानयेत् ॥ ८१ ॥
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‘अस्य देवस्य’ ‘मा शिश्नदेवा अपि गुः’ इत्यपि ‘घ्नञ्छिश्नदेवान्’ इत्याद्या दोषा बहव ईरिताः  ॥ ६० ॥
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पश्चादेव यथायोगमितरेष्वपि संनयेत्
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ऋग्वेदसंहितायां च प्रभुणैवं समीरितम्      ॥ ८२ ॥
 
‘ततो वितिष्ठे योनिः’‘स एतावत्यहम्’ इत्यपि । अन्याश्रयत्वं देव्याश्च कथितं बहुशोऽपि हि ।
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पृथग्रूपाणि विष्णोस्तु देवतान्तरगाणि च । अग्न्यादिसूक्तवाच्यानि नाम्ना सूक्तभिदा भवेत्  ८३
 
तदाश्रयत्वमन्येषामपि तत्रैव निश्चयात्    ६१
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‘नकिर्माकिः स्मसि’ इत्यादि प्रोक्ताऽधिक्यविवक्षया ‘आधिक्येऽधिकम्’ इत्येव हरिणा सूत्रमीरितम्  ८४
 
‘ब्रह्मैवाग्रे’ इति ह्युक्त्वा रुद्रादीनां ततो जनिः । उक्ता जातानि विश्वानि स पर्यभवदित्यपि ‘यस्य च्छायामृतं मृत्युः’ इति चादरतोऽब्रवीत्  ६२
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‘कृत्वी हत्वी’ इति पूर्वाश्च ‘तृतीयोऽतिशये’ यतः ।  विश्लिष्टार्थे च विश्लिष्टमूनार्थे चोनमिष्यते। व्यत्ययोऽभेदकरणस्वातन्त्र्येषु समीरितः ८५
 
अनन्तादवरेशाना तस्याः प्राणस्ततश्च वाक् । तस्या रुद्र उमा तस्मादिन्द्रस्तस्यास्ततोऽपरे ।  सौपर्णश्रुतिरित्याह सप्ताक्षितय इत्यपि ६३
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अभेदो हरिरूपाणां गुणानां च क्रियासु च तस्यैवावयवानां च भेदः श्रीब्रह्मपूर्वकैः  ८६
 
वायुरस्मा उपामन्थद् विश्वदेवाय वायवे विश्वैर्देवैः स इत्याद्याः प्रमा अत्रापरा अपि ६४
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मुक्तैरपि जडैर्भेदः कैमुत्यादेव दृश्यते ऋग्वेदसंहितायां प्रोक्तमेतत्समस्तशः ८७
 
नारायणोऽदितिर्वायुर्वाणी रुद्र उमा विभुः इतरे क्रमाद्धीनाः शतांशाद्वायुतोऽवराः ६५
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‘अयं त एमि तन्वेति’ पूर्वा अन्या अपि स्फुटम् वायोराधिक्यमप्याहुः
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मनुष्यगन्धर्वपितृगणकार्मिकतात्विकाः । देवाः शक्रः शिवो ब्रह्मा मुक्तौ सौख्यादिभिर्गुणैः ८९॥
 
इन्द्रं सोमं हुताशनम् ॥ ६६
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शतायुतोत्तरा नित्यमन्योन्यप्रीतिसंयुताः ’इति सिद्धान्तगं वाक्यं स्वयं भगवतेरितम्    ९०॥
 
सूर्यं रुद्रमिमान्् पञ्च देवानेको महात्मनः सृजत्यत्ति महान्प्राण इति चाह तुरश्रुतिः ॥ ६७
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स्वाध्यायस्तत्त्वविज्ञानं विष्णुभक्तिर्विरागता निषिद्धकर्मसन्त्यागो विहितस्य सदा क्रिया    ९१॥
 
‘वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत न यस्येन्द्रः’ इति ह्याह विष्णोरिन्द्रस्य हीनताम् ॥ ६८
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सदा विष्णुस्मृतिश्चैव केवलं मोक्षसाधनम् एतैर्विना न मोक्षः स्याद्भवेदेतैरपि ध्रुवम्    ९२॥
 
‘वेधा अजिन्वत्’ इत्यादि वचनं विष्णुनामतः आनन्दश्रुतिरप्यस्य जीवतामेव दर्शयेत् ॥ ६९
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‘ऋषिच्छन्दोदैवतानि ज्ञात्वाऽर्थं चैव भक्तितः स्वाध्यायेनैव मोक्षः स्याद्विरक्तस्य हरिस्मृतेः’    ९३॥
 
आह सूर्यादपीन्द्रस्य वायोर्विष्णोरपीशताम् ‘यः सूर्यं य उषसम्’ ‘म्रियन्ते पञ्च देवताः’ ॥ ७०
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‘जप्येनैव तु संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥’  ९४
 
‘चक्षुषा द्यौश्चादित्यश्च’ ‘चक्षोः सूर्यो अजायत’ ‘यमादित्यो न वेद’ इति पूर्वा श्रुतिरथापरा ॥ ७१
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‘तस्मान्नित्यं हरिं ध्यायन्कुर्यात् स्वाध्यायमञ्जसा ।’ ‘ऐहिकामुष्मिका भोगा रक्तस्यान्यस्तु मुच्यते ।’  इति स्वाध्यायवचनं स्वयं भगवतोदितम्    ९५
 
‘विष्णोर्वातोऽजनिष्ट वातादिन्द्रस्ततो रविः । सोमश्चेति लयोऽप्येवं पूर्वे पूर्वे गुणाधिकाः’ ७२
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स्वाध्यायात्तु प्रवचने सहस्रगुणितं फलम् अर्थद्रष्टुः कोटिगुणं ततोऽनन्तं नियामके ९६
 
‘विष्णोः प्राणो अजनिष्ट प्राणादिन्द्रो रविर्विधुः लयोऽप्येतादृशस्तेषां पूर्वः पूर्वो गुणाधिकः’  ७३
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तर्कागमाभ्यां नियतिं यः करोत्यधिकं ततः पूर्णं वेदाखिलद्रष्टुर्ब्रह्मणः फलमुच्यते ॥। ९७
 
तुरश्रुतिश्च सौपर्णी पिङ्गश्रुतिरपीदृशी अतः सर्वाधिको विष्णुर्निर्णीतः श्रुतिसञ्चयात् ॥ ७४
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स्तुत्यधर्मस्य भेदेन पदाद्यादिस्वरे भिदा साधारणो विधिस्त्वेष विशेषो यत्र यत्र च ९९
 
अतो दोषवचो यत्र तद्वाक्यमवरं वदेत् निर्दोषतैव विष्णोस्तु क्रमान्मध्यगतेष्वपि  ७५
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क्रमादेव तदन्येषामृष्यादीनां स्वयोग्यतः
 
‘त्रयोऽर्थाः सर्ववेदेषु दशार्थाः सर्वभारते विष्णोः सहस्रनामापि निरन्तरशतार्थकम्’ ॥७६ ॥
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विपर्ययार्थकथने विपरीतं तथा तमः १००
 
इति स्कान्दवचो यस्मादर्थभेदव्यपेक्षया । निर्दोषत्वं हरेर्वक्ति दोषमन्येष्वपि क्रमात् ७७
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यावत्प्रयोजको ज्ञाने तावत्तावच्छुभाधिकः तथैव विपरीतेऽपि स्मृतौ ज्ञाने च तत्समम् ॥ १०१ ॥
 
तारतम्यस्य विज्ञप्त्यै वचो दोषस्य चार्थवत्
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तमोनिरयमानुष्यस्वर्गमोक्षातिरेकतः । योग्यतातारतम्येन फलं सर्वेषु चोच्यते । इति प्रवृत्तवचनं विवेकेऽप्येतदीरितम् १०२
 
‘गुणाः श्रुताः’ इति ह्याह गुणैकनियतिं हरौ ७८
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यादृशो योग्यतां यायात् स ज्ञेयोऽर्थस्तथा स्फुटम् । अनन्तनियमैर्युक्ता अनन्तार्थविशेषिणः वेदा इति समासेन नियमोऽयं समीरितः १०३
 
‘निर्दोषगुणपूर्णश्च विष्णुरेको न चापरः अपूर्णा दोषरहिता मायैका तद्वशैव च ७९
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ऋक्संहितागतं वाक्यमिति चान्यन्नियामकम्
 
अदोषः प्रायशो ब्रह्मा दोषवन्तः क्रमात् परे’ इति मान्यश्रुतिश्चाह भेदोऽर्थानां ततो मतः॥ ८० ॥
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तस्माद्वन्द्याश्च पूज्याश्च ब्रह्माद्या ज्ञानयोजकाः गुरुत्वेन क्रमादेव विशेषेणैव केशवः १०४
 
रूढिमेव समाश्रित्य विभज्यार्थान् यथाक्रमम् विदोषगुणपूर्त्यर्थं विष्णौ योगार्थमानयेत् ८१
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आरभ्य स्वगुरुं यावद्विष्णुरेवोत्तरोत्तराः क्रमान्निष्फलताऽन्यत्र गुरुतत्त्वे समीरिता ॥ १०५ ॥
 
पश्चादेव यथायोगमितरेष्वपि संनयेत्
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एवं स्थितेऽग्निगं विष्णुमग्निनामानमेव च । मधुच्छन्दा ऋक्शतेन वाय्वादिगतमेव च ।  साग्न्यादिं स्तौति सद्भक्त्या तत्तन्नामानमेव च ॥ १०६
 
ऋग्वेदसंहितायां प्रभुणैवं समीरितम्      ८२
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== वायुसूक्तम् ==
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मण्डलम्—१. अध्यायः –१.अनुवाकः–१. सूक्तम्–२.
 
पृथग्रूपाणि विष्णोस्तु देवतान्तरगाणि च । अग्न्यादिसूक्तवाच्यानि नाम्ना सूक्तभिदा भवेत्  ॥ ८३ ॥
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वायो नवर्चम् , मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः ।१-३ वायुः,४-६ इन्द्रवायू, ७-९ मैत्रावरुणः, गायत्री छन्दः
 
‘नकिर्माकिः स्मसि’ इत्यादि प्रोक्ताऽधिक्यविवक्षया ‘आधिक्येऽधिकम्’ इत्येव हरिणा सूत्रमीरितम्  ॥ ८४ ॥
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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‘कृत्वी हत्वी’ इति पूर्वाश्च ‘तृतीयोऽतिशये’ यतः ।  विश्लिष्टार्थे च विश्लिष्टमूनार्थे चोनमिष्यते। व्यत्ययोऽभेदकरणस्वातन्त्र्येषु समीरितः ८५
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| verse_line1 = वायवायाहि दर्शतेमे सोमा अरङ्कृताः ॥ तेषाम्पाहि श्रुधी हवम्
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वायो इति । आ । याहि । दर्शत । इमे । सोमाः । अरम्ऽकृताः ॥  तेषाम् । पाहि । श्रुधि हवम्
 
अभेदो हरिरूपाणां गुणानां च क्रियासु च तस्यैवावयवानां च भेदः श्रीब्रह्मपूर्वकैः  ८६
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| text        =
 
(वायुशब्दनिर्वचनम् )
मुक्तैरपि जडैर्भेदः कैमुत्यादेव दृश्यते । ऋग्वेदसंहितायां च प्रोक्तमेतत्समस्तशः ॥ ८७ ॥
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| text        =
 
वायुशब्दस्य निर्वचनान्तरम्
अभेदः स्वगुणाद्यैश्च मुक्तानामपि सर्वशः । भेदाभेदस्त्वभेदश्च गुणैः संसारिणामपि । जडानामंशतो भेदः समुदायेन चोभयम् ॥ ८८ ॥
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| text        =
 
वेदार्थः भगवद्गुणाधिक्यनिष्टः
मनुष्यगन्धर्वपितृगणकार्मिकतात्विकाः । देवाः शक्रः शिवो ब्रह्मा मुक्तौ सौख्यादिभिर्गुणैः ॥ ८९॥
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बलत्वादयनाच्चैव वायुरित्यभिधीयते वात्यायुरिति वा ज्ञानात् वरणादाश्रयत्वतः ॥ १०७
 
शतायुतोत्तरा नित्यमन्योन्यप्रीतिसंयुताः ’इति सिद्धान्तगं वाक्यं स्वयं भगवतेरितम्    ९०॥
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‘वय बन्धने’ इत्यस्मात् संसारादेर्व्ययादपि व्येत्यस्मिन्निति वा वायुः ‘वय श्रेष्ठत्वे’ इत्यपि  ॥१०८॥
 
स्वाध्यायस्तत्त्वविज्ञानं विष्णुभक्तिर्विरागता निषिद्धकर्मसन्त्यागो विहितस्य सदा क्रिया    ॥ ९१॥
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मुख्यतो वासुदेवे ते गुणाः सन्त्येव सर्वशः अनिषिद्धास्तदन्येषु यथायोग्यतया मताः ॥ १०९
 
सदा विष्णुस्मृतिश्चैव केवलं मोक्षसाधनम् एतैर्विना न मोक्षः स्याद्भवेदेतैरपि ध्रुवम्    ९२॥
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दर्शतस्ततदृष्टित्वात् सर्वज्ञोऽसौ यतो विभुः भक्त्या ह्यलङ्कृताः सोमा मनांसि अन्ये हिरण्यतः ॥ हिरण्यालङ्कृता यस्माद्धूयन्ते वायवे सुताः ॥ ११०
 
‘ऋषिच्छन्दोदैवतानि ज्ञात्वाऽर्थं चैव भक्तितः स्वाध्यायेनैव मोक्षः स्याद्विरक्तस्य हरिस्मृतेः’    ९३॥
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तान् पाहि श्रुधि चाह्वानं स्वातन्त्र्ये व्यत्ययोऽप्ययम् मनोऽपि भोग्यमीशस्य प्रीतिमात्रेण केवलम् ॥ १११
 
‘जप्येनैव तु संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥’  ९४
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गुणाधिक्यं येन भवेद् वेदस्यार्थः स एव हि ।  प्रयोजकत्वान्नान्यस्य फलाभावात्तदर्थता ११२॥
 
‘तस्मान्नित्यं हरिं ध्यायन्कुर्यात् स्वाध्यायमञ्जसा ।’ ‘ऐहिकामुष्मिका भोगा रक्तस्यान्यस्तु मुच्यते ।’ इति स्वाध्यायवचनं स्वयं भगवतोदितम्    ॥ ९५
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उपक्रमादयो यत्र तात्पर्यार्थस्स एव हि ॥ स्तुवन्ति शस्त्रैः स्तोतारो यथावद्यज्ञवेदिनः ११३ २॥
 
स्वाध्यायात्तु प्रवचने सहस्रगुणितं फलम् । अर्थद्रष्टुः कोटिगुणं ततोऽनन्तं नियामके ९६
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
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तर्कागमाभ्यां नियतिं यः करोत्यधिकं ततः पूर्णं वेदाखिलद्रष्टुर्ब्रह्मणः फलमुच्यते ॥। ९७
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वायो इति । उक्थेभिः । जरन्ते । त्वाम् । अच्छ । जरितारः ॥  सुतऽसोमाः अहःऽविदः
 
स्तुत्यधर्मस्य भेदेन पदाद्यादिस्वरे भिदा साधारणो विधिस्त्वेष विशेषो यत्र यत्र च ९९
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वायुस्तुतिः यजमानाभीप्सितसाधनस्वभावा
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क्रमादेव तदन्येषामृष्यादीनां स्वयोग्यतः ।
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वायो इति । तव । प्रऽपृञ्चती । धेना । जिगाति । दाशुषे ॥ उरूची । सोमऽपीतये
 
विपर्ययार्थकथने विपरीतं तथा तमः १००
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वाक् त्वत्स्मम्पर्किणी यज्ञकृते प्रापयतीप्सितम् सोमपायातिमहती महार्थत्वात्त्वदर्थतः ११४॥३
 
यावत्प्रयोजको ज्ञाने तावत्तावच्छुभाधिकः तथैव विपरीतेऽपि स्मृतौ ज्ञाने च तत्समम् १०१
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इन्द्रवायू देवते
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तमोनिरयमानुष्यस्वर्गमोक्षातिरेकतः योग्यतातारतम्येन फलं सर्वेषु चोच्यते । इति प्रवृत्तवचनं विवेकेऽप्येतदीरितम् १०२
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| verse_line1  = इन्द्रवायू इमे सुता उपप्रयोभिरागतम् इन्दवो वामुशन्ति हि
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इन्द्रवायू इति इमे सुताः । उप । प्रयःऽभिः । आ । गतम् । इन्दवः । वाम् । उशन्ति । हि
 
यादृशो योग्यतां यायात् स ज्ञेयोऽर्थस्तथा स्फुटम् अनन्तनियमैर्युक्ता अनन्तार्थविशेषिणः वेदा इति समासेन नियमोऽयं समीरितः १०३
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इन्द्रवायुशब्दवाच्यौ उपेन्द्रसङ्कर्षणौ
ऋक्संहितागतं वाक्यमिति चान्यन्नियामकम् ।
}}
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| text        =
 
भगवतः द्विरूपत्वाद् बहुत्वव्यपदेशः
तस्माद्वन्द्याश्च पूज्याश्च ब्रह्माद्या ज्ञानयोजकाः । गुरुत्वेन क्रमादेव विशेषेणैव केशवः ॥ १०४ ॥
}}
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| text =
इन्द्रः स परमैश्वर्यादिदमुद्दिश्य च द्रुतेः ददर्शेदं दीप्तिमत्त्वादिदं रातीति वा भवेत् ११५
 
आरभ्य स्वगुरुं यावद्विष्णुरेवोत्तरोत्तराः क्रमान्निष्फलताऽन्यत्र गुरुतत्त्वे समीरिता १०५
}}
}}


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| text =
सोमाभिमानिनो देवा वामिच्छन्ति हि सोमगाः
 
एवं स्थितेऽग्निगं विष्णुमग्निनामानमेव च । मधुच्छन्दा ऋक्शतेन वाय्वादिगतमेव च साग्न्यादिं स्तौति सद्भक्त्या तत्तन्नामानमेव च ॥ १०६ ॥
}}
}}


== वायुसूक्तम् ==
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| title        = वायुसूक्तम्
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प्रियैरुपागतं तेनोपेन्द्रः सङ्कर्षणो हरिः ॥ ११६ ॥
 
मण्डलम्—१. अध्यायः –१.अनुवाकः–१. सूक्तम्–२.
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द्विरूपत्वाद् बहुत्वं च विशेषादेव केवलम् । एकस्यैव हरेर्नात्र भेदः शङ्क्यः कथञ्चन  ॥ ११७ ॥
}}


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वायो नवर्चम् , मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः ।१-३ वायुः,४-६ इन्द्रवायू, ७-९ मैत्रावरुणः, गायत्री छन्दः ।
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| text    =
एकमेवाद्वितीयं तत् ‘नेह नानास्ति किञ्चन ।’ ‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥११८ ॥
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| text =
‘यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।  एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानु विधावति’॥ ११९ ॥
}}


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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| text    =
उक्त्वा धर्मान् पृथक्त्वस्य निषेधादेवमेव हि । विशेषो ज्ञायते श्रुत्या भेदादन्यश्च साक्षितः ॥१२०॥४ ॥
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| verse_line1 = वायविन्द्रश्च चेतथस्सुतानां वाजिनीवसू । तावायातमुपद्रवत् ५, ३
| verse_line1 = वायवायाहि दर्शतेमे सोमा अरङ्कृताः तेषाम्पाहि श्रुधी हवम् ॥ १
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वायो इति । इन्द्रः चेतथः सुतानाम् वाजिनीवसू इति वाजिनीऽवसू तौ । आ यातम् उप द्रवत् ५, ३
 
वायो इति । आ । याहि दर्शत इमे सोमाः अरम्ऽकृताः तेषाम् पाहि श्रुधि हवम्
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विजानतः सुतानन्नपतौ सूर्ये सदा स्थितौ । द्रवद्द्रुतं सुतात्पर्यद्योतकोऽभ्यास इष्यते ॥१२१॥ ५, ३ ॥
 
(वायुशब्दनिर्वचनम् )
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निचृद् गायत्री
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वायुशब्दस्य निर्वचनान्तरम्
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| verse_line1  = वायविन्द्रश्च सुन्वत आयातमुपनिष्कृतम् ॥ मक्ष्वि१त्था धिया नरा ॥ ६ ॥
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वायो इति इन्द्रः । च । सुन्वतः । आ । यातम् । उप । निःऽकृतम् ॥ मक्षु । इत्था । धिया । नरा ॥ ६ ॥
 
वेदार्थः भगवद्गुणाधिक्यनिष्टः
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यजन् सुन्वन् कृतस्यानुसारिकर्मैव निष्कृतम् तदर्थं क्षिप्रमायातं धियेत्थम्भूतयाचलौ १२२॥
 
बलत्वादयनाच्चैव वायुरित्यभिधीयते वात्यायुरिति वा ज्ञानात् वरणादाश्रयत्वतः ॥ १०७
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नरौ तावविनाशित्वादुपचारः क्वचिद्भवेत् अमरत्ववद्यतो मोक्षो देवतानां सुनिश्चितः ॥ १२३॥ ६ ॥
 
‘वय बन्धने’ इत्यस्मात् संसारादेर्व्ययादपि व्येत्यस्मिन्निति वा वायुः ‘वय श्रेष्ठत्वे’ इत्यपि  ॥१०८॥
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मित्रावरुणौ देवते
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मुख्यतो वासुदेवे ते गुणाः सन्त्येव सर्वशः । अनिषिद्धास्तदन्येषु यथायोग्यतया मताः १०९
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| verse_line1 = मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणञ्च रिशादसम् धियङ्घृताचीं साधन्ता ७ ॥
| commentary1  = rigbhashyam
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मित्रम् । हुवे । पूतऽदक्षम् वरुणम् । च । रिशादसम् धियम् । घृताचीम् । साधन्ता
 
दर्शतस्ततदृष्टित्वात् सर्वज्ञोऽसौ यतो विभुः भक्त्या ह्यलङ्कृताः सोमा मनांसि अन्ये हिरण्यतः हिरण्यालङ्कृता यस्माद्धूयन्ते वायवे सुताः ११०
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| text =
| text        =
 
मित्रशब्दस्य त्रेधा निरुक्तिः
तान् पाहि श्रुधि चाह्वानं स्वातन्त्र्ये व्यत्ययोऽप्ययम् । मनोऽपि भोग्यमीशस्य प्रीतिमात्रेण केवलम् ॥ १११ ॥
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| text =
| text        =
 
वरुणशब्दनिर्वचनम्
गुणाधिक्यं येन भवेद् वेदस्यार्थः स एव हि ।  प्रयोजकत्वान्नान्यस्य फलाभावात्तदर्थता  ॥ ११२॥
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| text =
मित्वा त्रातीति मित्रोऽयं मितमह्ना करोति वा ।  मितं रातीति वा नित्यं मितं रमयतीति वा १२४
 
उपक्रमादयो यत्र तात्पर्यार्थस्स एव हि ॥ स्तुवन्ति शस्त्रैः स्तोतारो यथावद्यज्ञवेदिनः ११३ २॥
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| text =
आवृणोतीति वरुणस्तमसाऽज्ञानतोऽपि वा ।  वरमुन्नयतीत्यस्मात् वरानन्दत्वतोऽपि वा ॥ १२५ ॥
 
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
}}
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पूता दक्षा अनेनेति पूतदक्ष इतीरितः
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| verse_line1 = वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः सुतसोमा अहर्विदः ॥ २ ॥
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| text =
तमाह्वयामि सुखिनं शमदन् रमते यतः ।  अनूनसुखभोक्तृत्वाद् रिशादा इति कीर्तितः १२६
 
वायो इति उक्थेभिः । जरन्ते । त्वाम् । अच्छ । जरितारः ॥ सुतऽसोमाः । अहःऽविदः
}}
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हरिर्घृतः सुशुद्धत्वाद् घृताची च तदञ्चनात् । स्वधीतिसाधको विष्णुर्भक्तानां च यथार्थतः ॥ १२७ ॥॥
 
वायुस्तुतिः यजमानाभीप्सितसाधनस्वभावा
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| verse_line1 = ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा क्रतुम्बृहन्तमाशाथे
| verse_line1 = वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे उरूची सोम पीतये
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| text =
ऋतेन मित्रावरुणौ ऋतऽवृधौ ऋतऽस्पृशा क्रतुम् बृहन्तम् । आशाथे इति
 
वायो इति । तव । प्रऽपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे उरूची सोमऽपीतये
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| text        =
 
ऋतस्पृक् भगवान्
वाक् त्वत्स्मम्पर्किणी यज्ञकृते प्रापयतीप्सितम् ।  सोमपायातिमहती महार्थत्वात्त्वदर्थतः ॥ ११४॥३ ॥
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संहितायां दैर्घ्ये अर्थविशेषनिरूपणम्
इन्द्रवायू देवते
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नित्यवृद्धः स भगवानृतेनानुपचारतः ऋतस्पृक् वेदवाच्यत्वात् अन्यौ चेद्भगवान् ऋतः । ऋ गतावित्यतः सर्ववस्तुष्वनुगतत्वतः १२८
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| verse_line1 = इन्द्रवायू इमे सुता उपप्रयोभिरागतम् इन्दवो वामुशन्ति हि
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तेन वृद्धौ तत्स्पृशौ च सर्वदा मित्रवारिपौ
 
इन्द्रवायू इति । इमे । सुताः । उप । प्रयःऽभिः । आ । गतम् । इन्दवः । वाम् । उशन्ति । हि ॥ ४
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संहितायां तु दैर्ध्यादिरुक्ताधिक्ये पदेऽन्यथा  ॥ १२९ ॥
 
इन्द्रवायुशब्दवाच्यौ उपेन्द्रसङ्कर्षणौ
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अनन्यार्थत्वविज्ञप्त्यै  ईशाथे च महाक्रतुम् ।
 
भगवतः द्विरूपत्वाद् बहुत्वव्यपदेशः
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इन्द्रः स परमैश्वर्यादिदमुद्दिश्य च द्रुतेः ।  ददर्शेदं दीप्तिमत्त्वादिदं रातीति वा भवेत् ११५
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| verse_line1  = कवीनो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया दक्षन्दधाते अपसम् ॥ ९, ४, २ ॥
सोमाभिमानिनो देवा वामिच्छन्ति हि सोमगाः
| commentary1  = rigbhashyam
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कवी इति । नः । मित्रावरुणा । तुविऽजातौ । उरुऽक्षया ॥ दक्षम् । दधाते इति । अपसम् ९, ४, २
 
प्रियैरुपागतं तेनोपेन्द्रः सङ्कर्षणो हरिः ११६
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............ तुविजौ ब्रह्मजातौ तथाविधौ ।  हरिस्तथैव भूतत्वात् स्थानं क्षय इहोच्यते ॥१३०॥
 
द्विरूपत्वाद् बहुत्वं च विशेषादेव केवलम् एकस्यैव हरेर्नात्र भेदः शङ्क्यः कथञ्चन ॥ ११७ ॥
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कर्मापसं च कर्तारं दक्षं कर्तारमेव वा । अस्मदर्थे दधाते तौ नित्यं बुद्धौ गतागतौ १३१॥
 
एकमेवाद्वितीयं तत् ‘नेह नानास्ति किञ्चन ।’ ‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥११८
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इति द्वितीयं सूक्तम्॥
 
‘यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।  एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानु विधावति’॥ ११९
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== अश्विनीसूक्तम् ==
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मण्डलम्—१. अध्यायः –१.अनुवाकः–१. सूक्तम्—३.
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उक्त्वा धर्मान् पृथक्त्वस्य निषेधादेवमेव हि विशेषो ज्ञायते श्रुत्या भेदादन्यश्च साक्षितः ॥१२०॥४ ॥
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अश्विना द्वादशर्चम्, मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः, १-३ अश्विनौ ४-६ इन्द्रः ।  ७-९ विश्वेदेवाः । १०-१२ सरस्वती ।  गायत्री छन्दः(२, ४,११ निचृत्, ४,११ पिपीलिकामध्या)
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| verse_line1 = अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत्पाणी शुभस्पती पुरुभुजा चनस्यतम् ॥ १
| verse_line1 = वायविन्द्रश्च चेतथस्सुतानां वाजिनीवसू । तावायातमुपद्रवत् ५, ३
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अश्विना यज्वरीः इषः द्रवत्पाणी इति द्रवत्ऽपाणी (शुभस्पती इति शुभःऽपती इति) शुभः पती इति ॥ पुरुऽभुजा चनस्यतम्
 
वायो इति इन्द्रः चेतथः । सुतानाम् । वाजिनीवसू इति वाजिनीऽवसू ॥ तौ यातम् उप द्रवत् ५, ३
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अश्विशब्दनिर्वचनम्
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विजानतः सुतानन्नपतौ सूर्ये सदा स्थितौ द्रवद्द्रुतं सुतात्पर्यद्योतकोऽभ्यास इष्यते ॥१२१॥ ५, ३
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अन्नानि यज्ञयोग्यानि क्षिप्रहस्तौ शुभाधिपौ बहुगोपौ बहुभुजौ नो योयजतमश्विनौ यज्ञे वृत्तान् स्वभागान् वा संयोजयतमाशु वै ॥१३२॥
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आशुवानाद् गतेरश्वी क्षिप्रावगतितोऽथवा । अश्नुतेऽखिलमित्येवाप्यश्वजत्वात् तथाऽश्विनौ ॥ १३३ ॥
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निचृद् गायत्री
निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया ॥ धिष्ण्या वनतङ्गिरः
| verse_line1 = वायविन्द्रश्च सुन्वत आयातमुपनिष्कृतम् ॥ मक्ष्वि१त्था धिया नरा ॥
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अश्विना । पुरुऽदंससा । नरा । शवीरया । धिया ॥ धिष्ण्या । वनतम् । गिरः ॥ २ ॥
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वायो इति इन्द्रः । च । सुन्वतः । आ । यातम् । उप । निःऽकृतम् ॥ मक्षु । इत्था । धिया । नरा
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बहुकर्मकृतौ सौख्यवीर्यात्मिक्या धिया गिरः अस्मदीयाः सम्भजतं धिष्ण्यौ सर्वाश्रयौ सदा १३४
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अश्विनीस्तुतिः
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यजन् सुन्वन् कृतस्यानुसारिकर्मैव निष्कृतम् । तदर्थं क्षिप्रमायातं धियेत्थम्भूतयाचलौ १२२॥
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| verse_line1  = दस्रा युवाकवस्सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः आयातं रुद्रवर्तनी ॥ ३ ॥
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दस्रा । युवाकवः । सुताः । नासत्या । वृक्तऽबर्हिषः ॥ आ । यातम् ।  रुद्रवर्तनी इति रुद्रऽवर्तनी ॥ ३ ॥
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नरौ तावविनाशित्वादुपचारः क्वचिद्भवेत् । अमरत्ववद्यतो मोक्षो देवतानां सुनिश्चितः ॥ १२३॥ ६ ॥
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रुद्रवर्तनिशब्दार्थः
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भेदकौ सर्वशत्रूणां दस्रौ सम्बन्धिनौ हि वाम् ।  सुता युवाकवः सोमा यज्वनः स्तृतबर्हिषः ।  नासत्यौ नासिकासंस्थौ नैव चासद्गुणौ क्वचित् ॥ १३५॥
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मित्रावरुणौ देवते
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रुजां द्रावणतो रुद्रो वायुस्तदनुवर्तनात् । स्नेहतोऽनुवशत्वाद्वा तन्मार्गगतितोऽथवा । ‘कस्मिन्न्वहम्’ इति श्रुत्या वासुदेवोऽश्विनावपि ॥ १३६ ॥
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रुद्रवर्तनिशब्दोक्ताः .................
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| verse_line1 = मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणञ्च रिशादसम् धियङ्घृताचीं साधन्ता ७ ॥
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(पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री) इन्द्रो देवता
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मित्रम् । हुवे । पूतऽदक्षम् । वरुणम् । च । रिशादसम् धियम् । घृताचीम् । साधन्ता
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| verse_line1  = इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः अण्वीभिस्तना पूतासः
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इन्द्र । आ । याहि । चित्रभानो इतिचित्रऽभानो । सुताः । इमे ।  त्वाऽयवः ॥ अण्वीभिः । तना । पूतासः ॥ ४ ॥
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मित्रशब्दस्य त्रेधा निरुक्तिः
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पञ्चधा चित्रशब्दनिर्वचनम्
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वरुणशब्दनिर्वचनम्
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सोम-मनसोरभिमानी चन्द्र एव
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.................... चित्रं भद्रं रतं चितौ
 
मित्वा त्रातीति मित्रोऽयं मितमह्ना करोति वा ।  मितं रातीति वा नित्यं मितं रमयतीति वा ॥ १२४
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चिद्रतेश्चायनीयत्वाद् अदनाद्वा चितोऽभिदा ।  तादृशा रश्मयो ज्ञानमस्येति भगवान् परः १३७
 
आवृणोतीति वरुणस्तमसाऽज्ञानतोऽपि वा ।  वरमुन्नयतीत्यस्मात् वरानन्दत्वतोऽपि वा १२५
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चित्रभानुरिति प्रोक्तस्तेजो वा तादृशं प्रभोः त्वदिच्छव इमे सोमाः पटीभिस्सूक्ष्मतन्तुभिः ॥ विस्तृत्य शोधिताः ....
 
पूता दक्षा अनेनेति पूतदक्ष इतीरितः
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.............सूक्ष्मप्रमाभिर्वा मनांसि च ॥१३८॥
 
तमाह्वयामि सुखिनं शमदन् रमते यतः ।  अनूनसुखभोक्तृत्वाद् रिशादा इति कीर्तितः ॥ १२६ ॥
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सोमानां मनसां चैव देवताः सोमरश्मिगाः । सोमभृत्याः समस्तस्य सोम एवाधिपो हरिः ॥ १३९ ॥
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हरिर्घृतः सुशुद्धत्वाद् घृताची च तदञ्चनात् । स्वधीतिसाधको विष्णुर्भक्तानां च यथार्थतः ॥ १२७ ॥॥
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इन्द्रप्रार्थना
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| verse_line1 = इन्द्रायाहि धियेषितो विप्रजूतस्सुतावतः उप ब्रह्माणि वाघतः
| verse_line1 = ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा क्रतुम्बृहन्तमाशाथे
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| commentary1 = rigbhashyam
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| text =
इन्द्र याहि धिया । इषितः । विप्रऽजूतः । सुतऽवतः । उप ब्रह्माणि वाघतः
 
ऋतेन मित्रावरुणौ ऋतऽवृधौ ऋतऽस्पृशा ॥ क्रतुम् बृहन्तम् आशाथे इति
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ऋतस्पृक् भगवान्
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यज्ञ-होतृ-यजमानानामध्यात्मपरत्वम्
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अस्मद्बुद्ध्या प्रार्थितो वा स्वबुद्ध्या प्रेरितोऽपि वा ।  ब्राह्मणैः प्रेरितो भक्त्या वदतो होतुरञ्जसा ॥ १४० ॥
 
संहितायां दैर्घ्ये अर्थविशेषनिरूपणम्
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ब्रह्माणि सोमयुक्तानि यजमानस्य वेच्छतः
 
नित्यवृद्धः स भगवानृतेनानुपचारतः । ऋतस्पृक् वेदवाच्यत्वात् अन्यौ चेद्भगवान् ऋतः ऋ गतावित्यतः सर्ववस्तुष्वनुगतत्वतः ॥ १२८ ॥
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उपायाह्यपि यः कोऽपि साधको यज्ञकृन्मतः । मानसो वाचिको वा स्याद्यज्ञो होता ह्वयन् स च ॥ १४१॥
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तेन वृद्धौ तत्स्पृशौ च सर्वदा मित्रवारिपौ
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| verse_line1  = इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः सुते दधिष्व नश्चनः ॥ ६, ५ ॥
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इन्द्र । आ । याहि । तूतुजानः । उप । ब्रह्माणि । हरिऽवः ॥ सुते । दधिष्व । नः । चनः ६, ५
 
संहितायां तु दैर्ध्यादिरुक्ताधिक्ये पदेऽन्यथा  १२९
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पञ्चप्राणाः हरिशब्दवाच्याः
अनन्यार्थत्वविज्ञप्त्यै  ईशाथे च महाक्रतुम् ।
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वेगवांस्तूतुजानः स्यात् संसारमुपसंहरन् ।  वर्तते येन हरिवा हरिभिर्वर्ततेऽथ वा ॥ १४२
 
महत्सुखं वा ...........................
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हरणाद्विषयाणां च प्राणा हरय ईरिताः तेषु वर्तत इत्यस्मात्तान् वाऽथ गमयेदसौ ॥१४३
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| verse_line1 = कवीनो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया दक्षन्दधाते अपसम् ९, ४, २ ॥
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हरिवा हरिवान् वाऽपि विष्णुना वर्ततेऽथवा चनो मन इह प्रोक्तं सुखं च क्वचिदीर्यते ॥१४४॥६,५॥
 
कवी इति । नः । मित्रावरुणा तुविऽजातौ । उरुऽक्षया ॥ दक्षम् । दधाते इति । अपसम् ॥ ९, ४, २ ॥
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विश्वेदेवा देवताः
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............ तुविजौ ब्रह्मजातौ तथाविधौ । हरिस्तथैव भूतत्वात् स्थानं क्षय इहोच्यते ॥१३०॥
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| verse_line1 = ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वेदेवास आगत ॥ दाश्वांसो दाशुषस्सुतम् ॥ ७ ॥
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ओमासः चर्षणिऽधृतः । विश्वे । देवासः । आ । गत ॥ दाश्वांसः । दाशुषः । सुतम् ॥ ७
 
कर्मापसं च कर्तारं दक्षं कर्तारमेव वा अस्मदर्थे दधाते तौ नित्यं बुद्धौ गतागतौ १३१॥
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आ समन्तात् स्वीकृता मा ओमा इति च शब्दिताः । ओनामा भगवान् विष्णुस्तेन वा निर्मिताः सुराः ॥ ओता मानेषु मावैषु प्रोता ओमा इतीरिताः ॥१४५॥
 
इति द्वितीयं सूक्तम्॥
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}}


== अश्विनीसूक्तम् ==
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प्रजाश्चर्षणयः प्रोक्ता विश्वे ते च प्रवेशनात् ।  सर्वे वाऽथ विशां वानाच्छब्दः कस्मै यथा भवेत् ॥१४६॥
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मण्डलम्—१. अध्यायः –१.अनुवाकः–१. सूक्तम्—३.
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दातारो यजमाना वा... ..........  ॥ ७ ॥
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अप्शब्दः कर्मवाची
अश्विना द्वादशर्चम्, मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः, १-३ अश्विनौ । ४-६ इन्द्रः ।  ७-९ विश्वेदेवाः । १०-१२ सरस्वती ।  गायत्री छन्दः(२, ४,११ निचृत्, ४,११ पिपीलिकामध्या)
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| verse_line1 = विश्वे देवासो अप्तुरस्सुतमागन्त तूर्णयः उस्रा इव स्वसराणि
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विश्वे । देवासः । अप्ऽतुरः । सुतम् । आ । गन्त । तूर्णयः ॥ उस्राः ऽइव । स्वसराणि ॥ ८ ॥
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अश्विना यज्वरीः । इषः । द्रवत्पाणी इति द्रवत्ऽपाणी । (शुभस्पती इति शुभःऽपती इति) । शुभः । पती इति ॥ पुरुऽभुजा । चनस्यतम् ॥ १ ॥
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..................अप्तुरः कर्मवेगिनः
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उस्रास्तु रश्मयश्चैव स्वसराणि दिनानि च ॥ १४७ ॥ ८ ॥
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अश्विशब्दनिर्वचनम्
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| verse_line1  = विश्वे देवासो अस्रिध एहि मायासो अद्रुहः ॥ मेधञ्जुुषन्त वह्नयः ॥ ९ ॥
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विश्वे । देवासः । अस्रिधः । एहिऽमायासः । अद्रुहः ॥ मेधम् । जुषन्त वह्नयः ॥ ९
 
अन्नानि यज्ञयोग्यानि क्षिप्रहस्तौ शुभाधिपौ बहुगोपौ बहुभुजौ नो योयजतमश्विनौ यज्ञे वृत्तान् स्वभागान् वा संयोजयतमाशु वै ॥१३२॥
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असंसारादस्रिधस्ते देवाश्चेन्मोक्षनिश्चयात् । यथेष्टनिश्चितज्ञाना एहिमायाः समन्ततः ॥१४८ ॥
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आशुवानाद् गतेरश्वी क्षिप्रावगतितोऽथवा अश्नुतेऽखिलमित्येवाप्यश्वजत्वात् तथाऽश्विनौ १३३
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अदुःखत्वादद्रुहस्ते मेधं यज्ञं जुषन्तु नः वह्नयो वहनादस्य                   
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सरस्वतीदेवता
निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = पावका नस्सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती यज्ञं वष्टु धिया वसुः १०
| verse_line1 = अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया धिष्ण्या वनतङ्गिरः
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पावका नः सरस्वती वाजेभिः वाजिनीऽवती यज्ञम् वष्टु धियाऽवसुः १०
 
अश्विना पुरुऽदंससा नरा शवीरया धिया धिष्ण्या वनतम् गिरः
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सरस्वतीशब्दार्थो भगवान्
बहुकर्मकृतौ सौख्यवीर्यात्मिक्या धिया गिरः ।  अस्मदीयाः सम्भजतं धिष्ण्यौ सर्वाश्रयौ सदा ॥ १३४ ॥
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अश्विनीस्तुतिः
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वाजिनीशब्दार्थनिरूपणम्
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वाजिनीवती सरस्वती
| verse_line1 = दस्रा युवाकवस्सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः ॥ आयातं रुद्रवर्तनी ॥ ३ ॥
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...............शोधकत्वात्तु पावका १४९
 
दस्रा । युवाकवः । सुताः । नासत्या । वृक्तऽबर्हिषः ॥ आ । यातम् ।  रुद्रवर्तनी इति रुद्रऽवर्तनी
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सरणात् सर्वगत्वेन सर्वज्ञो वा सरो हरिः । सरसः सरतित्वाद्वा तद्वत्येव सरस्वती । हरौ गुणाः सरश्शब्दा देवी तु हरिवाचिनी ॥ १५०॥
 
रुद्रवर्तनिशब्दार्थः
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हरिप्रियत्वतो वायुः सरस्वांस्तत्प्रियाऽथवा । गुणस्त्वेन ततत्वाद्वा भगवांस्तु सरस्वती ॥ १५१॥
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भेदकौ सर्वशत्रूणां दस्रौ सम्बन्धिनौ हि वाम् सुता युवाकवः सोमा यज्वनः स्तृतबर्हिषः ।  नासत्यौ नासिकासंस्थौ नैव चासद्गुणौ क्वचित् १३५॥
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स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो भगवान्न नपुंसकः स्त्रीपुन्दोषविहीनत्वादपि तच्छब्दगोचरः ॥ १५२
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अन्नेनो वाजिनामीशो वाजिनी सूर्य उच्यते । वाजीनच्छन्दसां वाऽपि स्वामी प्रोक्तः स वाजिनी ॥ १५३॥
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रुजां द्रावणतो रुद्रो वायुस्तदनुवर्तनात् स्नेहतोऽनुवशत्वाद्वा तन्मार्गगतितोऽथवा । ‘कस्मिन्न्वहम्’ इति श्रुत्या वासुदेवोऽश्विनावपि ॥ १३६ ॥
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छन्दांस्यश्वा यतस्तस्य ते चेना अन्यवाजिना अन्नवत्त्वाद्वाजिनी वाग् ज्ञानयुद्धत्वतोऽपि वा ॥१५४॥
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स पुत्रो वागुमा तस्याः पुत्री तद्वाजिनीवती ॥ सरस्वती हरिर्वाऽपि यज्ञं वहतु नोऽशनैः ॥ १५५ ॥
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रुद्रवर्तनिशब्दोक्ताः ................. ॥
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अन्नदा हि सदा देवी धिया सह वसेद्यतः । धियावसुर्नित्यबोधा .............. ॥ १०
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
 
(पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री) इन्द्रो देवता
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| verse_line1 = चोदयित्री सूनृतानाञ्चेेतन्ती सुमतीनाम् यज्ञन्दधे सरस्वती ११
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चोदयित्री सूनृतानाम् चेतन्ती सुऽमतीनाम् यज्ञम् दधे सरस्वती ११
 
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इन्द्र । आ । याहि चित्रभानो इतिचित्रऽभानो सुताः इमे त्वाऽयवः ॥ अण्वीभिः तना पूतासः
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पञ्चधा चित्रशब्दनिर्वचनम्
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सर्वकर्मणां वाक्-बुद्धिमूलत्वम्
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सोम-मनसोरभिमानी चन्द्र एव
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वेदे णिज्लोपनिमित्तकथनम्
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....................सुवाचां प्रेरका सदा ॥ १५६
 
.................... चित्रं भद्रं रतं चितौ
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सुबुद्धिज्ञापिका सैव स्वातन्त्र्याल्लुप्तयो भवेत् ।  अनेनैव प्रकारेण सैव यज्ञादिधारिणी ॥ १५७ ॥ ११ ॥
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चिद्रतेश्चायनीयत्वाद् अदनाद्वा चितोऽभिदा । तादृशा रश्मयो ज्ञानमस्येति भगवान् परः १३७
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| verse_line1 = महो अर्णस्सरस्वती प्रचेतयति केतुना धियो विश्वा विराजति १२, ६, ३, १ ॥
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महः । अर्णः । सरस्वती । प्र । चेतयति । केतुना ॥ धियः विश्वाः । वि । राजति ॥ १२,६,३,१
 
चित्रभानुरिति प्रोक्तस्तेजो वा तादृशं प्रभोः त्वदिच्छव इमे सोमाः पटीभिस्सूक्ष्मतन्तुभिः विस्तृत्य शोधिताः ....
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अर्णो भगवान्
.............सूक्ष्मप्रमाभिर्वा मनांसि च ॥१३८॥
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इति तृतीयं सूक्तम्
 
सोमानां मनसां चैव देवताः सोमरश्मिगाः । सोमभृत्याः समस्तस्य सोम एवाधिपो हरिः १३९
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इन्द्रप्रार्थना
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सूक्त-अनुवाकयोः लक्षणम्
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मूलवेदे शाखादिविभागकारणनिरूपणम्
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अष्टकाध्यायादिविभागभेदे कारणनिरूपणम्
इन्द्र । आ । याहि । धिया । इषितः । विप्रऽजूतः । सुतऽवतः । उप । ब्रह्माणि । वाघतः ॥ ५ ॥
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यज्ञ-होतृ-यजमानानामध्यात्मपरत्वम्
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वेदोद्धारे कारणान्तरनिरूपणम्
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महो अर्णः परं ब्रह्म तेजस्त्वाच्च महत्त्वतः
 
अस्मद्बुद्ध्या प्रार्थितो वा स्वबुद्ध्या प्रेरितोऽपि वा ब्राह्मणैः प्रेरितो भक्त्या वदतो होतुरञ्जसा ॥ १४० ॥
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अरमानन्दरूपत्वात् णो हि निर्वृतिवाचकः ॥ १५८ ॥
 
ब्रह्माणि सोमयुक्तानि यजमानस्य वेच्छतः ।
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तज्ज्ञापयति सा देवी ज्ञानं दत्वा महत्तरम् महो अर्णः स्वयं देवः स्वमात्मानं प्रकाशयेत् । विराजयति विश्वाश्च धियः सुज्ञानदानतः ॥ १५९
 
उपायाह्यपि यः कोऽपि साधको यज्ञकृन्मतः मानसो वाचिको वा स्याद्यज्ञो होता ह्वयन् स च १४१॥
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सूक्तं त्वनारतं प्रोक्तम् अनुवागेककालिका (वेदेषु आवापोद्वापे हेतुनिरूपणम्)  अन्यथात्वं च तत्र स्यादावापोद्वापतस्त्वृचाम् १६०॥
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| verse_line1 = इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः सुते दधिष्व नश्चनः ६, ५ ॥
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वेदानन्तत्वविज्ञप्त्यै तौ चक्रे बादरायणः
 
इन्द्र । आ । याहि । तूतुजानः । उप । ब्रह्माणि । हरिऽवः ॥ सुते । दधिष्व । नः चनः ॥ ६, ५ ॥
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ऋचः स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदं कृतवान् प्रभुः । यजूंषि निगदाच्चैव तथा सामानि सामतः ॥१६१॥
 
पञ्चप्राणाः हरिशब्दवाच्याः
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एवं पुराणवचनादुद्धृता हि ततस्ततः ऋचः शाखात्वमापन्नाः शिष्यतच्छिष्यकैरिमाः ॥१६२॥
 
वेगवांस्तूतुजानः स्यात् संसारमुपसंहरन् वर्तते येन हरिवा हरिभिर्वर्ततेऽथ वा ॥ १४२ ॥
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मानस्तेनेति पूर्वासु ह्यूनता दृश्यतेऽर्थतः शुनःशेपोदिताभ्यश्च पठ्यन्तेऽन्यत्र काश्चन १६३॥
 
हरणाद्विषयाणां च प्राणा हरय ईरिताः तेषु वर्तत इत्यस्मात्तान् वाऽथ गमयेदसौ ॥१४३
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अत्राप्यक्रमतो दृष्टिरिति नैकक्रमो भवेत्
 
हरिवा हरिवान् वाऽपि विष्णुना वर्ततेऽथवा चनो मन इह प्रोक्तं सुखं च क्वचिदीर्यते ॥१४४॥६,५॥
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अनन्तत्वात्तु वेदानां प्रायः कर्मानुसारतः । सङ्क्षेेपं कृतवान् देवः शिष्याश्च तदनुज्ञया ॥ १६४ ॥
 
विश्वेदेवा देवताः
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अष्टकाध्यायवर्गादि भेदं च कृतवान् प्रभुः ।  स्वाध्यायविश्रमार्थाय तस्मात् क्रमविपर्ययः  १६५
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तत्र तत्रैवान्तरिता दृश्यन्ते च खिला अपि यत्रार्थे न विशेषोऽस्ति पदान्तरितताऽत्र च यत्राल्पोऽपि विशेषोऽस्ति पदं नान्तरितं भवेत्  १६६
 
ओमासः । चर्षणिऽधृतः । विश्वे । देवासः । आ । गत ॥ दाश्वांसः दाशुषः सुतम्
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इति तृतीयं सूक्तम्
 
आ समन्तात् स्वीकृता मा ओमा इति च शब्दिताः । ओनामा भगवान् विष्णुस्तेन वा निर्मिताः सुराः ओता मानेषु मावैषु प्रोता ओमा इतीरिताः ॥१४५॥
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–२ सूक्तम् – ४
 
प्रजाश्चर्षणयः प्रोक्ता विश्वे ते च प्रवेशनात् ।  सर्वे वाऽथ विशां वानाच्छब्दः कस्मै यथा भवेत् ॥१४६॥
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सुरूपकृत्नुं दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा ऋषिः,  गायत्री,३ विरा १० निचृत् , इन्द्रः देवतामुद्गलः–  द्वितीयानुवाके चत्वारि सूक्तानि । तत्र सुरूपम् इत्यादिकम् दशर्चं प्रथमसूक्तम् । इन्द्रं पृच्छ इति चतुर्थ्याम् ऋचि लिङ्गदर्शनात् इन्द्रो देवता ॥
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दातारो यजमाना वा... ..........
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| verse_line1 = सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे जुहूमसि द्यविऽद्यवि १ ॥
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सुरूपऽकृत्नुम् । ऊतये । सुदुघाम्ऽइव । गोऽदुहे ॥  जुहूमसि । द्यविऽद्यवि ॥ १ ॥
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अप्शब्दः कर्मवाची
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इष्टार्थसिद्धये रक्षणाय च भगवति प्रार्थना
 
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| verse_line1 = विश्वे देवासो अप्तुरस्सुतमागन्त तूर्णयः ॥ उस्रा इव स्वसराणि ॥ ८ ॥
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विष्णुं सुरूपकर्तारमभिप्रेतार्थसिद्धये त्राणाय वा कामधेनुमिव दोहाय तत्स्थितेः ॥१६७॥
 
विश्वे । देवासः । अप्ऽतुरः । सुतम् । आ । गन्त । तूर्णयः ॥ उस्राः ऽइव स्वसराणि ॥ ८ ॥
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दिने दिने स्वाह्वयामः.......... ॥ १ ॥
 
..................अप्तुरः कर्मवेगिनः ।
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सोमपानार्थमिन्द्रप्रार्थना
उस्रास्तु रश्मयश्चैव स्वसराणि दिनानि च ॥ १४७ ॥ ८ ॥
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| verse_line1 = उप नस्सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब गोदा इद्रेवतो मदः
| verse_line1 = विश्वे देवासो अस्रिध एहि मायासो अद्रुहः मेधञ्जुुषन्त वह्नयः
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उप नः सवना गहि । सोमस्य । सोमऽपाः । पिब गोऽदाः । इत् रेवतः मदः
 
विश्वे देवासः अस्रिधः एहिऽमायासः अद्रुहः मेधम् जुषन्त वह्नयः
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................ज्ञानदोऽस्यैव चाधिकम् ज्ञानाख्यरयियुक्तस्य हिरण्यादिमतोऽपि वा १६८॥
 
असंसारादस्रिधस्ते देवाश्चेन्मोक्षनिश्चयात् यथेष्टनिश्चितज्ञाना एहिमायाः समन्ततः ॥१४८
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सुखकारी भवान् ......  २
 
अदुःखत्वादद्रुहस्ते मेधं यज्ञं जुषन्तु नः । वह्नयो वहनादस्य                   
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विराड् गायत्री
 
सरस्वतीदेवता
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अथ ते अन्तमानाम् विद्याम सुऽमतीनाम् मा । नः । अति । ख्यः गहि
 
पावका नः सरस्वती वाजेभिः वाजिनीऽवती यज्ञम् वष्टु धियाऽवसुः १०
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.................तस्माल्लभेम सुमतीस्तव ।  अन्ते मितास्त्वद्विषया मतयो ह्युत्तमोत्तमाः ॥  अस्मानतीत्य मा पश्य करुणार्द्रदृशा सदा ॥१६९॥ ३ ॥
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सरस्वतीशब्दार्थो भगवान्
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| verse_line1  = परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रम्पृच्छा विपश्चितम् ॥ यस्ते सखिभ्य आवरम् ॥ ४ ॥
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परा । इहि । विग्रम् । अस्तृतम् । इन्द्रम् । पृच्छा । विपःऽचितम् ॥  यः । ते । सखिऽभ्यः । आवरम् ॥ ४ ॥
 
वाजिनीशब्दार्थनिरूपणम्
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| text =
मन्मनो वाऽथ शक्रो वा दूरेऽपि परमेश्वरम् ।  गच्छाग्राह्यमनष्टं च व्याप्तचित्तं य एव च ॥ सखिभ्य उत्तमो नित्यम् ................॥  ४ ॥
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वाजिनीवती सरस्वती
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| verse_line1  = उत ब्रुवन्तु नोनिदो निरन्यतश्चिदारत । दधाना इन्द्र इद्दुवः ॥ ५, ७ ॥
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उत । ब्रुवन्तु । नः । निदः । निः । अन्यतः । चित् । अरत ॥  दधानाः । इन्द्रे । इत् । दुवः ५, ७
 
...............शोधकत्वात्तु पावका १४९
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..................निदस्तस्य समीपगाः १७०॥
 
सरणात् सर्वगत्वेन सर्वज्ञो वा सरो हरिः । सरसः सरतित्वाद्वा तद्वत्येव सरस्वती । हरौ गुणाः सरश्शब्दा देवी तु हरिवाचिनी १५०॥
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तेऽपि ब्रुवन्तु नो देवं प्रापुर्ये चान्यतोऽपि तम् । निर्गत्याज्ञानतस्त्वस्माद् दधाना ईश एव च । दुवः प्राणान् ब्रुवं त्वेव तेऽपि नः परमेश्वरम् ॥१७१॥५ ॥
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हरिप्रियत्वतो वायुः सरस्वांस्तत्प्रियाऽथवा । गुणस्त्वेन ततत्वाद्वा भगवांस्तु सरस्वती १५१॥
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| verse_line1  = उत नः सुभगा अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि ॥ ६ ॥
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उत । नः । सुऽभगान् । अरिः । वोचेयुः । दस्म । कृष्टयः । स्याम । इत् । इन्द्रस्य शर्मणि
 
स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो भगवान्न नपुंसकः स्त्रीपुन्दोषविहीनत्वादपि तच्छब्दगोचरः १५२
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अरयोऽपि प्रजा अस्मान् वोचेयुः सुभगान् सदा ।  शत्रुभेदिंस्तवेन्द्रस्य स्यामैवानुग्रहे सुखे ॥१७२॥  ६ ॥
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अन्नेनो वाजिनामीशो वाजिनी सूर्य उच्यते । वाजीनच्छन्दसां वाऽपि स्वामी प्रोक्तः स वाजिनी १५३॥
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| verse_line1  = एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियन्नृमादनम् पतयन्मन्दयत्सखम् ॥ ७ ॥
| commentary1  = rigbhashyam
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}}


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आ । र्इम् । आशुम् । आशवे । भर । यज्ञऽश्रियम् । नृऽमादनम् । पतयत् मन्दयत्ऽसखम् ॥ ७ ॥
 
छन्दांस्यश्वा यतस्तस्य ते चेना अन्यवाजिना अन्नवत्त्वाद्वाजिनी वाग् ज्ञानयुद्धत्वतोऽपि वा ॥१५४॥
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आशुवीर्य तवैवाशुं सोमं क्षिप्रं मनोऽपि वा ।  आभरस्वोदरे तुष्ट्या हृदि वा यज्ञभूषणम् १७३॥
 
स पुत्रो वागुमा तस्याः पुत्री तद्वाजिनीवती ॥ सरस्वती हरिर्वाऽपि यज्ञं वहतु नोऽशनैः ॥ १५५
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ईमेव पुंमदकरं मदादुत्पतनादिके । हेतुं मन्दत्वहेतुं च तत्सखीनां पुरोगतेः ॥१७४॥७॥
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अन्नदा हि सदा देवी धिया सह वसेद्यतः । धियावसुर्नित्यबोधा .............. १०
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| verse_line1  = अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः प्रावो वाजेषु वाजिनम् ८ ॥
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अस्य । पीत्वा । शतक्रतो इतिशतऽक्रतो । घनः । वृत्राणाम् । अभवः ।  प्र । आवः । वाजेषु । वाजिनम् ॥ ८ ॥
 
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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एनं पीत्वा बहुज्ञानाभूस्तमोभिरनावृतः । प्रसादादेव मुक्तेषु तमो सह्यतया घनः १७५॥
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| verse_line1 = चोदयित्री सूनृतानाञ्चेेतन्ती सुमतीनाम् ॥ यज्ञन्दधे सरस्वती ११ ॥
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आवृतेरेव वृत्राणि ह्यज्ञानान्यन्नदं नरम् प्रावो युद्धेषु योद्धारं भक्तं ज्ञानिनमेव च १७६॥  ८
 
चोदयित्री । सूनृतानाम् । चेतन्ती । सुऽमतीनाम् । यज्ञम् । दधे सरस्वती ११
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सर्वकर्मणां वाक्-बुद्धिमूलत्वम्
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अज्ञानादिभिः सह युद्धे रक्षणाय इन्द्रप्रार्थना
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| verse_line1  = तन्त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामश्शतक्रतो । धनानामिन्द्र सातये ॥ ९ ॥
वेदे णिज्लोपनिमित्तकथनम्
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तम् । त्वा । वाजेषु । वाजिनम् । वाजयामः । शतक्रतो इति  शतक्रतो ॥ धनानाम् । इन्द्र । सातये
 
....................सुवाचां प्रेरका सदा १५६
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योधयामो वयं तं त्वां ज्ञानादिधनलब्धये ।  अज्ञानाद्यस्मदरिभिः ..............
 
सुबुद्धिज्ञापिका सैव स्वातन्त्र्याल्लुप्तयो भवेत् ।  अनेनैव प्रकारेण सैव यज्ञादिधारिणी १५७ ॥ ११
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| verse_line1 = यो रायो३ऽवनिर्महान्त्सुपारस्सुन्वतस्सखा तस्मा इन्द्राय गायत १०, ,
| verse_line1 = महो अर्णस्सरस्वती प्रचेतयति केतुना धियो विश्वा विराजति १२, , ३, १
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यः रायः अवनिः महान् सुऽपारः सुन्वतः सखा ॥ तस्मै इन्द्राय गायत १०, ,
 
}}
महः अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना ॥ धियः विश्वाः वि राजति १२,६,,
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अर्णो भगवान्
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कम्पस्वरस्य अर्थविशेषनिरूपणम्
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............ योऽशेषद्रविणावनिः । सुखदः संसृतेः पारस्तस्मा इन्द्राय गायत १७७
 
इति तृतीयं सूक्तम्
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कम्पोऽशेषग्रहे क्वापि लज्जायां वा पुरातने ।  पृथक्त्वे धृष्यतायां वा हरिणर्क्संहितोदितः ॥१७८ ॥ १० ॥
 
सूक्त-अनुवाकयोः लक्षणम्
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॥ इति चतुर्थं सूक्तम् ॥
 
मूलवेदे शाखादिविभागकारणनिरूपणम्
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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मण्डलम्—१. अध्यायः–१. अनुवाकः–२. सूक्तम्–५.
 
अष्टकाध्यायादिविभागभेदे कारणनिरूपणम्
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‘आ त्वा’ दशर्चम् । वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा गायत्री (१ विरा, ३ पिपीलिका मध्या निचृत्,  ५-७, ९ निचृत्, ८ पादनिचृत्) इन्द्रो देवता
 
वेदोद्धारे कारणान्तरनिरूपणम्
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विराड् गायत्री
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महो अर्णः परं ब्रह्म तेजस्त्वाच्च महत्त्वतः ।
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आ । तु । आ । इत । नि । सीदत । इन्द्रम् । अभि । प्र । गायत ॥ सखायः । स्तोमऽवाहसः
 
अरमानन्दरूपत्वात् णो हि निर्वृतिवाचकः १५८
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आर्ची उष्णिक्
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तज्ज्ञापयति सा देवी ज्ञानं दत्वा महत्तरम् । महो अर्णः स्वयं देवः स्वमात्मानं प्रकाशयेत् । विराजयति विश्वाश्च धियः सुज्ञानदानतः १५९
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| verse_line1  = पुरूतमम्पुरूणामीशानं वार्याणाम् इन्द्रं सोमे सचा सुते २ ॥
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पुरुऽतमम् । पुरूणाम् । ईशानम् । वार्याणाम् । इन्द्रम् । सोमे । सचा । सुते
 
सूक्तं त्वनारतं प्रोक्तम् अनुवागेककालिका (वेदेषु आवापोद्वापे हेतुनिरूपणम्)  अन्यथात्वं च तत्र स्यादावापोद्वापतस्त्वृचाम् १६०॥
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सुपूर्णानां पूर्णतमं वरेण्यानामधीश्वरम् सुते सोमे सुखेनैव स चागायत तं प्रभुम् ॥१७१॥  २ ॥
 
वेदानन्तत्वविज्ञप्त्यै तौ चक्रे बादरायणः
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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ऋचः ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदं कृतवान् प्रभुः । यजूंषि निगदाच्चैव तथा सामानि सामतः ॥१६१॥
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| verse_line1  = घा नो योग आभुवत्स राये स पुरन्ध्याम् ॥ गमद्वाजेभिरास नः ॥ ३ ॥
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सः । घ । नः । योगे । आ । भुवत् । सः । राये । सः । पुरम्ऽध्याम् ॥ गमत् । वाजेभिः । आ । सः नः ॥ ३ ॥
 
एवं पुराणवचनादुद्धृता हि ततस्ततः ऋचः शाखात्वमापन्नाः शिष्यतच्छिष्यकैरिमाः ॥१६२॥
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| text        =
 
घशब्द अवधारणार्थः
मानस्तेनेति पूर्वासु ह्यूनता दृश्यतेऽर्थतः । शुनःशेपोदिताभ्यश्च पठ्यन्तेऽन्यत्र काश्चन ॥ १६३॥
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मुक्तौ योगायाऽसमन्ताद् भवेन्नो घोऽवधारणे स एव भगवान् ज्ञानवित्ताय स च बुद्धिगः ॥ १८०॥
 
अत्राप्यक्रमतो दृष्टिरिति नैकक्रमो भवेत्
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बुद्धिः पुराश्रयत्वेन पुरन्धिः पत्न््नयथापि वा । पत्न््नयर्थत्वे तु तादर्थ्यं सोऽन्नैः सह न आव्रजेत् ॥१८१॥३ ॥
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अनन्तत्वात्तु वेदानां प्रायः कर्मानुसारतः । सङ्क्षेेपं कृतवान् देवः शिष्याश्च तदनुज्ञया १६४
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| verse_line1  = यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रवः तस्मा इन्द्राय गायत ४ ॥
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यस्य । सम्ऽस्थे । न । वृण्वते । हरी इति । समत्ऽसु । शत्रवः । तस्मै । इन्द्राय गायत
 
अष्टकाध्यायवर्गादि भेदं च कृतवान् प्रभुः स्वाध्यायविश्रमार्थाय तस्मात् क्रमविपर्ययः  १६५
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यस्य स्थितौ वृणुते हर्यग्रमपि शत्रवः ।  मनः पुरो वा विषयहरणान्मन एव च ।  बुद्धिश्च हरिशब्दोक्ते तमआदीनि शत्रवः ॥१८२॥४
 
तत्र तत्रैवान्तरिता दृश्यन्ते च खिला अपि । यत्रार्थे विशेषोऽस्ति पदान्तरितताऽत्र च । यत्राल्पोऽपि विशेषोऽस्ति पदं नान्तरितं भवेत् ॥ १६६
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निचृद् गायत्री
 
॥ इति तृतीयं सूक्तम् ॥
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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| verse_line1 = सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये ॥ सोमासो दध्याशिरः ॥ ५, ९ ॥
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मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–२ सूक्तम् – ४
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सुतऽपाव्ने । सुताः । इमे । शुचयः । यन्ति । वीतये ॥ सोमासः । दधिऽआशिरः ॥ ५, ९ ॥
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सोमपे शुचयः सोमाः प्राप्त्यै दधिविमिश्रिताः । मनांसि ध्यानयुक्तानि वायान्ति हरये सदा ॥ १८३ ॥५,९ ॥
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सुरूपकृत्नुं दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा ऋषिः,  गायत्री,३ विरा १० निचृत् , इन्द्रः देवतामुद्गलः–  द्वितीयानुवाके चत्वारि सूक्तानि । तत्र सुरूपम् इत्यादिकम् दशर्चं प्रथमसूक्तम् । इन्द्रं पृच्छ इति चतुर्थ्याम् ऋचि लिङ्गदर्शनात् इन्द्रो देवता ॥
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निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो
| verse_line1 = सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे जुहूमसि द्यविऽद्यवि
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त्वम् । सुतस्य । पीतये । सद्यः । वृद्धः । अजायथाः ॥ इन्द्र ।  ज्यैष्ठ्याय । सुक्रतो इति सुऽक्रतो ॥ ६ ॥
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सुरूपऽकृत्नुम् ऊतये । सुदुघाम्ऽइव । गोऽदुहे ॥ जुहूमसि । द्यविऽद्यवि
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सदा पूर्णः शुभज्ञानज्यैष्ठ्यव्यक्त्यै सुताप्तये ।  न क्षुदादेरभिव्यक्तोऽभवः.........
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निचृद् गायत्री
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इष्टार्थसिद्धये रक्षणाय च भगवति प्रार्थना
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| verse_line1  = आ त्वा विशन्त्वाशवस्सोमास इन्द्र गिर्वणः ॥ शन्ते सन्तु प्रचेतसे ॥ ७ ॥
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आ । त्वा । विशन्तु । । आशवः । सोमासः । इन्द्र । गिर्वणः ॥ शम् । ते । सन्तु प्रऽचेतसे ॥ ७ ॥
 
विष्णुं सुरूपकर्तारमभिप्रेतार्थसिद्धये त्राणाय वा कामधेनुमिव दोहाय तत्स्थितेः ॥१६७॥
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......................... गीर्भिर्वृतप्रभो ।  प्रकृष्टचेतास्त्वद्भृत्यो योऽस्मै  स्युः शङ्कराः सुताः १८४॥७
 
दिने दिने स्वाह्वयामः.......... ॥
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पादनिचृद् गायत्री
 
सोमपानार्थमिन्द्रप्रार्थना
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| verse_line1 = त्वां स्तोमा अवीवृधन्त्वामुक्था शतक्रतो त्वां वर्धन्तु नो गिरः
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त्वाम् स्तोमाः अवीवृधन् त्वाम् उक्था शतक्रतो इति शतऽक्रतो ॥ त्वाम् वर्धन्तु नः गिरः
 
उप । नः सवना गहि सोमस्य सोमऽपाः । पिब ॥ गोऽदाः इत् रेवतः मदः
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विष्णोः वृद्धित्वे आकाशदृष्टान्तः
................ज्ञानदोऽस्यैव चाधिकम् ।  ज्ञानाख्यरयियुक्तस्य हिरण्यादिमतोऽपि वा ॥ १६८॥
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व्यञ्जयन्त्यधिकं स्तोमाः साम््नयुक्थान्यृक्षु चैव हि । महागुणैः व्यञ्जयन्तु गिरोऽस्माकमपि प्रभो ॥ १८५ ॥
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सुखकारी भवान् ......॥  २
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आकाशवृद्धिवद् वृद्धिर्विष्णोः स्यान्नैव चान्यथा । ‘न वर्धते नोकनीयान््’ इति ह्येनं श्रुतिर्जगौ १८६॥
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महातात्पर्यरोधाच्च श्रुत्यर्थो नापरो भवेत् । यद्यन्यापेक्षया वृद्धिरीशत्वं स्यात् कुतोऽस्य च ॥ अक्षितोतिरिति ह्यस्मात् पूर्णाभिप्रायतोदिता ॥ १८७॥८ ॥
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विराड् गायत्री
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पादनिचृद् गायत्री
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| verse_line1 = अक्षितोतिः सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्रिणम् यस्मिन्विश्वानि पौंस्या
| verse_line1 = अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम् मानो अतिख्य आगहि
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अक्षितऽऊतिः सनेत् इमम् वाजम् इन्द्रः सहस्रिणम् ॥  यस्मिन् विश्वानि पौंस्या
 
अथ ते अन्तमानाम् विद्याम सुऽमतीनाम् ॥ मा नः । अति । ख्यः गहि
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अनन्तफलदं वाजमस्मत्तो लभतां स च ददातु वा पौरुषाणि शक्तयो यत्र चाखिलाः १८८
 
.................तस्माल्लभेम सुमतीस्तव अन्ते मितास्त्वद्विषया मतयो ह्युत्तमोत्तमाः अस्मानतीत्य मा पश्य करुणार्द्रदृशा सदा ॥१६९॥ ३
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| verse_line1 = परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रम्पृच्छा विपश्चितम् ॥ यस्ते सखिभ्य आवरम् ॥ ४ ॥
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अतश्चानन्तशक्तित्वान्न वृद्ध्याद्याः कथञ्चन सर्वोपेतेत्येतमर्थमभिप्रेत्याह वेदरा १८९॥९
 
परा । इहि । विग्रम् । अस्तृतम् । इन्द्रम् । पृच्छा । विपःऽचितम् ॥  यः । ते । सखिऽभ्यः आवरम्
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भगवति बन्धमुक्ति-संसारवधप्रार्थना
मन्मनो वाऽथ शक्रो वा दूरेऽपि परमेश्वरम् ।  गच्छाग्राह्यमनष्टं च व्याप्तचित्तं य एव च ॥ सखिभ्य उत्तमो नित्यम् ................॥  ४ ॥
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| verse_line1 = मानो मर्ता अभिद्रुहन्तनूनामिन्द्र गिर्वणः ईशानो यवया वधम् ॥ १०, १०,
| verse_line1 = उत ब्रुवन्तु नोनिदो निरन्यतश्चिदारत । दधाना इन्द्र इद्दुवः ,
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मा । नः । मर्ताः अभि द्रुहन् तनूनाम् इन्द्र गिर्वणः ॥ ईशानः यवय वधम् १०,१०,५
 
उत । ब्रुवन्तु । नः । निदः निः अन्यतः चित् अरत ॥  दधानाः इन्द्रे इत् दुवः ,
}}
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मा मर्तानस्तनूनां तु द्रोग्धारः स्युः कथञ्चन ।  ईशोऽस्यपाकुरु वधं तेन नो मुक्तिदानतः १९०॥
 
..................निदस्तस्य समीपगाः १७०॥
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मानुषेभ्यस्तनूनां च नैव नः स्युर्विपत्तयः ।  कालेन दैवतः प्राप्तः स्याददेहत्वतो वधः ॥ १९१ ॥ १० ॥
}}


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तेऽपि ब्रुवन्तु नो देवं प्रापुर्ये चान्यतोऽपि तम् । निर्गत्याज्ञानतस्त्वस्माद् दधाना ईश एव च । दुवः प्राणान् ब्रुवं त्वेव तेऽपि नः परमेश्वरम् ॥१७१॥५
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॥ इति पञ्चमं सूक्तम्
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== इन्द्रसूक्तम् ==
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| title        = इन्द्रसूक्तम्
| verse_line1 = उत नः सुभगा अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः ॥ स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि ॥ ६ ॥
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मण्डलम्—१.अध्यायः–१.अनुवाकः–२. सूक्तम्—६.
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द्वितीयानुवाके तृतीयं सूक्तम् युञ्जन्ति दशर्चम् , वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिःः १-२,४ मरुतः, ३-५ इन्द्रमरुतौ, -१० इन्द्रो देवता गायत्रीछन्दः (१२ विरा, ४.८ निचृत्)
 
उत । नः । सुऽभगान् । अरिः । वोचेयुः । दस्म । कृष्टयः । स्याम । इत् । इन्द्रस्य । शर्मणि ॥ ६ ॥
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अरयोऽपि प्रजा अस्मान् वोचेयुः सुभगान् सदा शत्रुभेदिंस्तवेन्द्रस्य स्यामैवानुग्रहे सुखे ॥१७२॥ 
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| verse_line1 = युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषञ्चरन्तम्परि तस्थुषः रोचन्ते रोचना दिवि
| verse_line1 = एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियन्नृमादनम् पतयन्मन्दयत्सखम्
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युञ्जन्ति ब्रध्नम् अरुषम् चरन्तम् परि तस्थुषः रोचन्ते रोचना दिवि
 
र्इम् आशुम् आशवे भर यज्ञऽश्रियम् नृऽमादनम् पतयत् मन्दयत्ऽसखम्
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पौंस्यानि वासुदेवस्य ब्रध्नं वृद्धं दिवाकरम् अरुणं चरन्तं परितो गिरीन्युञ्जन्ति सर्वदा ॥ १९२
 
आशुवीर्य तवैवाशुं सोमं क्षिप्रं मनोऽपि वा आभरस्वोदरे तुष्ट्या हृदि वा यज्ञभूषणम् १७३॥
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तैरेवान्यानि चन्द्रादि रोचनानि त्रिविष्टपे । रोचयन्ति ॥ १ ॥
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ईमेव पुंमदकरं मदादुत्पतनादिके । हेतुं मन्दत्वहेतुं च तत्सखीनां पुरोगतेः ॥१७४॥७॥
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विराड् गायत्री
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| verse_line1 = युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे शोणा धृष्णू नृवाहसा
| verse_line1 = अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः प्रावो वाजेषु वाजिनम्
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युञ्जन्ति अस्य काम्या हरी इति विऽपक्षसा रथे ॥ शोणा धृष्णू इति नृऽवाहसा
 
अस्य । पीत्वा । शतक्रतो इतिशतऽक्रतो घनः वृत्राणाम् अभवः प्र आवः वाजेषु वाजिनम्
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.........हरी चास्य मनोबुद्धी स्वशक्तयः युञ्जन्त्यधिगुणत्वेन काम्यावश्वावथापि वा ॥ १९३
 
एनं पीत्वा बहुज्ञानाभूस्तमोभिरनावृतः प्रसादादेव मुक्तेषु तमो सह्यतया घनः १७५॥
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विशिष्टपक्षसंयुक्ताविव क्षिप्रतरौ सदा । रथे देहेऽपि वा देवाः स्वमनो बुद्धिमेव च ॥ १९४ ॥
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आवृतेरेव वृत्राणि ह्यज्ञानान्यन्नदं नरम् प्रावो युद्धेषु योद्धारं भक्तं ज्ञानिनमेव च ॥ १७६॥  ८ ॥
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| text    =
अस्य देहे प्रयुञ्जन्ति सूर्यादीन् स्थापयन्ति च सूर्यादिस्थापकत्वं ब्रह्मादीनां भवेत् सदा १९५॥
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| text =
शोणौ च शमणौ प्रोक्तौ सुखप्राप्तौ यतस्सदा श्यामौ मूर्धनि शोणौ च शक्राश्वावग्रगौ स्मृतौ
 
अज्ञानादिभिः सह युद्धे रक्षणाय इन्द्रप्रार्थना
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| verse_line1 = तन्त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामश्शतक्रतो धनानामिन्द्र सातये ॥ ९
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धृष्टौ नॄन् प्रति तं वेशं वहन्तौ तावुभावपि १९६॥२
 
तम् । त्वा । वाजेषु । वाजिनम् । वाजयामः । शतक्रतो इति  शतक्रतो ॥ धनानाम् । इन्द्र । सातये
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| text =
इन्द्रो मरुतश्च देवताः
 
योधयामो वयं तं त्वां ज्ञानादिधनलब्धये ।  अज्ञानाद्यस्मदरिभिः ..............॥  ९ ॥
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| verse_line1 = केतुङ्कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे समुषद्भिरजायथाः
| verse_line1 = यो रायो३ऽवनिर्महान्त्सुपारस्सुन्वतस्सखा तस्मा इन्द्राय गायत १०, ८, ४
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| text =
केतुम् कृण्वन् अकेतवे पेशः मर्याः अपेशसे सम् उषत्ऽभिः अजायथाः
 
यः । रायः अवनिः महान् सुऽपारः सुन्वतः सखा तस्मै इन्द्राय गायत १०, ८, ४
}}
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अज्ञाय कुर्वन् सज्ज्ञानं हेमाहेमाय चेश्वरः ।  उषद्भिः सम्प्रकाशद्भिः शक्तिभिर्व्यक्ततामगाः ॥ १९७ ॥
 
कम्पस्वरस्य अर्थविशेषनिरूपणम्
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मर्या मरणवन्तोऽपि देवा एवम् ............॥
 
............ योऽशेषद्रविणावनिः । सुखदः संसृतेः पारस्तस्मा इन्द्राय गायत १७७
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निचृद् गायत्री, मरुतः देवताः
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कम्पोऽशेषग्रहे क्वापि लज्जायां वा पुरातने । पृथक्त्वे धृष्यतायां वा हरिणर्क्संहितोदितः ॥१७८ १०
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| verse_line1 = आदहस्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे दधाना नाम यज्ञियम् ४ ॥
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आत् । अह । स्वधाम् । अनु । पुनः । गर्भऽत्वम् । आऽर्इरिरे ॥ दधानाः । नाम । यज्ञियम् ॥ ४ ॥
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॥ इति चतुर्थं सूक्तम् ॥
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.......................हरेर्वशात्॥  तदैव सुखमन्वेव पुनर्गूढत्वमापिरे ॥ १९८॥
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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| title        = ऐन्द्रसूक्तम्
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स्वेच्छयैव परेशस्य शक्तयो देवता अपि । यज्ञे वाच्यं दधानाश्च नाम ........ ॥ ४ ॥
 
मण्डलम्—१. अध्यायः–१. अनुवाकः–२. सूक्तम्–५.
}}
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इन्द्रो मरुतश्च देवताः
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‘आ त्वा’ दशर्चम् । वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा गायत्री (१ विरा, ३ पिपीलिका मध्या निचृत्, -७, ९ निचृत्, ८ पादनिचृत्) इन्द्रो देवता
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| verse_line1 = वीळुचिदारुजत्नुभिर्गुहाचिदिन्द्र वह्निभिः ॥ अविन्द उस्रिया अनु ॥ ५, ११ ॥
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वीळुु । चित् । आरुजत्नुऽभिः । गुहा । चित् । इन्द्र । वह्निऽभिः ॥  अविन्दः । उस्रियाः । अनु ॥ ५,११ ॥
 
विराड् गायत्री
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....................... वीु दृढं ह्यपि १९९
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| verse_line1 = आ त्वेता निषीदतेन्द्रमभि प्र गायत ॥ सखायस्स्तोमवाहसः
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आरुजद्भिः स्वसामर्थ्यैर्गुहायां संस्थितोऽपि सन् वहद्भिरखिलं लोकं प्रकाशत्वानि लब्धवान्
 
आ । तु । आ । इत । नि । सीदत । इन्द्रम् । अभि । प्र गायत ॥ सखायः स्तोमऽवाहसः ॥ १ ॥
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देवैर्वैतादृशैः  साकमानुकूल्येन लब्धवान् ॥ २००॥ ५॥
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आर्ची उष्णिक्
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इन्द्रो देवता
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| verse_line1 = देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद्वसुङ्गिरः महामनूषत श्रुतम्
| verse_line1 = पुरूतमम्पुरूणामीशानं वार्याणाम् इन्द्रं सोमे सचा सुते
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देवऽयन्तः यथा मतिम् अच्छ विदत्ऽवसुम् गिरः ॥ महाम् अनूषत श्रुतम्
 
पुरुऽतमम् पुरूणाम् ईशानम् वार्याणाम् इन्द्रम् सोमे सचा सुते
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सम्यक्प्रद्योतयन्तोऽमुं मतिरूपं यथास्थितम् विदद्वित्तं महान्तं च विश्रुतं सुगिरोऽस्तुवन् ॥ २०१ ॥ ६
 
सुपूर्णानां पूर्णतमं वरेण्यानामधीश्वरम् ।  सुते सोमे सुखेनैव स चागायत तं प्रभुम् ॥१७१॥
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इन्द्रो देवता
 
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = इन्द्रेण सं हि दृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा मन्दू समानवर्चसा
| verse_line1 = स घा नो योग आभुवत्स राये स पुरन्ध्याम् गमद्वाजेभिरास नः
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इन्द्रेण सम् हि दृक्षसे सम्ऽजग्मानः अबिभ्युषा मन्दू इति समानऽवर्चसा
 
सः । घ । नः योगे भुवत् सः राये । सः । पुरम्ऽध्याम् गमत् । वाजेभिः । आ । सः नः
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घशब्द अवधारणार्थः
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तस्य सन्दर्शनायैव सङ्गतस्तेन शङ्करः मखात्मा पुरुहूतो वा श्रीभूमी सुखात्मिके  ॥ २०२ ॥७ 
 
मुक्तौ योगायाऽसमन्ताद् भवेन्नो घोऽवधारणे स एव भगवान् ज्ञानवित्ताय स बुद्धिगः १८०॥
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निचृद् गायत्री, इन्द्रो देवता
 
बुद्धिः पुराश्रयत्वेन पुरन्धिः पत्न््नयथापि वा । पत्न््नयर्थत्वे तु तादर्थ्यं सोऽन्नैः सह न आव्रजेत् ॥१८१॥३ ॥
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| verse_line1 = अनवद्यैरभिद्युभिर्मखस्सहस्वदर्चति गणैरिन्द्रस्य काम्यैः
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अनवद्यैः अभिद्युऽभिः मखः सहस्वत् अर्चति ॥ गणैः इन्द्रस्य काम्यैः
 
यस्य सम्ऽस्थे वृण्वते हरी इति । समत्ऽसु । शत्रवः । तस्मै इन्द्राय गायत
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अनवद्यैर्महाज्ञानैः प्रियैर्देवगणैः सह वायुना सहार्चन्ति सुधीत्वात् परमेश्वरम् ॥२०३ ॥ ८
 
यस्य स्थितौ न वृणुते हर्यग्रमपि शत्रवः मनः पुरो वा विषयहरणान्मन एव बुद्धिश्च हरिशब्दोक्ते तमआदीनि शत्रवः ॥१८२॥४
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इन्द्रो देवता
 
निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = अतः परिज्मन्नागहि दिवो वा रोचनादधि समस्मिन्नृञ्जते गिरः ॥ ९ ॥
| verse_line1 = सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये सोमासो दध्याशिरः ५, ९ ॥
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अतः परिऽज्मन् गहि दिवः वा । रोचनात् । अधि सम् । अस्मिन् । ऋञ्जते गिरः ॥ ९ ॥
 
सुतऽपाव्ने सुताः इमे शुचयः यन्ति वीतये सोमासः दधिऽआशिरः ५, ९ ॥
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अनुक्रमणिकोेक्तदेवताविमर्शः
सोमपे शुचयः सोमाः प्राप्त्यै दधिविमिश्रिताः । मनांसि ध्यानयुक्तानि वायान्ति हरये सदा ॥ १८३ ॥५,९ ॥
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अतो हेतोरिहायाहि दिवो वा सूर्यमण्डलात् । परिज्मन् सर्वगास्माकमधिकृत्य समर्हणम् ॥ अस्मिन् गिरः प्राप्नुवन्ति सम्यक्परममुख्यतः ॥ २०४ ॥
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निचृद् गायत्री
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युञ्जन्तीत्यत्र बाहुल्यात् देवयन्तोत इत्यपि । बाहुल्यादृ(ल्यात् दृष्टि)ष्टितो गीर्भिर्विनाऽर्थो  नान्य इष्यते ॥ २०५॥ ९ ॥
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| verse_line1 = इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि इन्द्रं महो वा रजसः १०, १२, ६ ॥
| verse_line1 = त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो ॥ ६ ॥
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इतः । वा । सातिम् ईमहे दिवः वा पार्थिवात् अधि इन्द्रम् । महः वा रजसः १०, १२, ६ ॥
 
त्वम् सुतस्य पीतये सद्यः वृद्धः अजायथाः इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो इति सुऽक्रतो ॥ ६ ॥
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इतो दिवो वा पातालात् सातिं लाभस्वरूपिणम् महतो रञ्जकात् विष्णोर्लोकाद्वा तमधीमहे ॥ २०६ १०,१२,
 
सदा पूर्णः शुभज्ञानज्यैष्ठ्यव्यक्त्यै सुताप्तये न क्षुदादेरभिव्यक्तोऽभवः......... ॥ ६ ॥
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॥ इति षष्टं सूक्तम् ॥
 
निचृद् गायत्री
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== ऐन्द्रसूूक्तम् ==
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मण्डलम् —१.अध्यायः–१. अनुवाकः-२. सूक्तम्—७.
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द्वितीयानुवाके चतुर्थम् ‘इन्द्रं’ दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिः, गायत्री (२ निचृत्, ८, १० पिपीलिकामध्या निचृत्,९ पादनिचृत्) इन्द्रो देवता
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आ । त्वा । विशन्तु । । आशवः । सोमासः । इन्द्र । गिर्वणः शम् । ते । सन्तु । प्रऽचेतसे
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इन्द्रम् इत् । गाथिनः । बृहत् । इन्द्रम् । अर्केभिः । अर्किणः ॥ इन्द्रम् । वाणीः । अनूषत
 
......................... गीर्भिर्वृतप्रभो ।  प्रकृष्टचेतास्त्वद्भृत्यो योऽस्मै  स्युः शङ्कराः सुताः १८४॥७
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तमेव गाथिनः साम्ना स्तुवन्त्यृग्भिश्च बह्वृचाः । बृहन्तमन्यवाणीभिरपि  .............. ॥ १ ॥
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पादनिचृद् गायत्री
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निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = इन्द्र इद्घर्योः सचा सम्मिश्ल आवचो युजा इन्द्रो वज्री हिरण्ययः
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इन्द्रः इत् हर्योः सचा सम्ऽमिश्लः वचःऽयुजा ॥ इन्द्रः वज्री हिरण्ययः
 
त्वाम् स्तोमाः अवीवृधन् त्वाम् उक्था शतक्रतो इति  शतऽक्रतो ॥ त्वाम् वर्धन्तु नः गिरः
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विष्णोः वृद्धित्वे आकाशदृष्टान्तः
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भक्तशरीररथाधिरूढो भगवान्
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हिरण्ययो भगवान्
व्यञ्जयन्त्यधिकं स्तोमाः साम््नयुक्थान्यृक्षु चैव हि । महागुणैः व्यञ्जयन्तु गिरोऽस्माकमपि प्रभो ॥ १८५ ॥
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.................. हर्यो विमिश्रितः ॥ २०७ ॥ रथेऽथवा मनोबुद्ध्योर्वाङ्मात्रेणैव योगिनोः
 
आकाशवृद्धिवद् वृद्धिर्विष्णोः स्यान्नैव चान्यथा । ‘न वर्धते नोकनीयान््’ इति ह्येनं श्रुतिर्जगौ १८६॥
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सचा सुखेन वज्री ज्ञानानन्दो हि धातुतः । हितश्च रमणीयश्च हिरण्यय इतीरितः  २०८ ॥२ 
 
महातात्पर्यरोधाच्च श्रुत्यर्थो नापरो भवेत् । यद्यन्यापेक्षया वृद्धिरीशत्वं स्यात् कुतोऽस्य च ॥ अक्षितोतिरिति ह्यस्मात् पूर्णाभिप्रायतोदिता ॥ १८७॥८
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इन्द्रस्य पर्वतादिनियन्तृत्वमहिमावर्णनम्
पादनिचृद् गायत्री
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इन्द्रः दीर्घाय चक्षसे सूर्यम् रोहयत् । दिवि वि । गोभिः अद्रिम् ऐरयत्
 
अक्षितऽऊतिः सनेत् इमम् वाजम् इन्द्रः सहस्रिणम् ॥  यस्मिन् विश्वानि पौंस्या
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दीर्घकालं दर्शनाय सूर्यमारोहयद्दिवि ज्ञानैरादरयोग्यं च प्राणात्मानं समैरयत्  २०९॥३ 
 
अनन्तफलदं वाजमस्मत्तो लभतां स च ददातु वा पौरुषाणि शक्तयो यत्र चाखिलाः १८८
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निचृद् गायत्री
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अतश्चानन्तशक्तित्वान्न वृद्ध्याद्याः कथञ्चन । सर्वोपेतेत्येतमर्थमभिप्रेत्याह वेदरा १८९॥९
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इन्द्र । वाजेषु । नः । अव । सहस्रऽप्रधनेषु । च ॥ उग्रः ।  उग्राभिः । ऊतिऽभिः ॥ ४ ॥
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भगवति बन्धमुक्ति-संसारवधप्रार्थना
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इन्द्रम् वयम् महाऽधने इन्द्रम् अर्भे हवामहे युजम् वृत्रेषु वज्रिणम् ॥ ५, १३
 
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.................महदल्पधनार्थिनः ।  हवामहेऽरिवर्ज्यं तं तमसां प्रतियोगिनम्  ॥ २१० ५॥
 
मा मर्तानस्तनूनां तु द्रोग्धारः स्युः कथञ्चन ।  ईशोऽस्यपाकुरु वधं तेन नो मुक्तिदानतः १९०॥
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अविद्यावरणापसरणार्थं भगवति प्रार्थना
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मानुषेभ्यस्तनूनां च नैव नः स्युर्विपत्तयः । कालेन दैवतः प्राप्तः स्याददेहत्वतो वधः १९१ १०
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| verse_line1 = स नो वृषन्नमुञ्चरुं सत्रादावन्नपावृधि अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः
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सः । नः । वृषन् । अमुम् । चरुम् । सत्राऽदावन् । अप । वृधि ॥ अस्मभ्यम् । अप्रतिऽस्कुतः ॥ ६ ॥
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॥ इति पञ्चमं सूक्तम् ॥
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अस्मदीयं चरुं भोज्यमानन्दं त(त्व)मपावृणु । मोक्षगं सर्वदातस्त्वमप्रतिद्वन्द्व नो वृषन् ॥२११॥६ ॥
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== इन्द्रसूक्तम् ==
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स्तोमा अपि न साकल्येन विष्णुवाचकाः
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मण्डलम्—१.अध्यायः–१.अनुवाकः–२. सूक्तम्—६.
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| verse_line1  = तुञ्जे तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः ॥ न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥ ७ ॥
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तुञ्जेऽतुञ्जे । ये । उत्ऽतरे । स्तोमाः । इन्द्रस्य । वज्रिणः ॥ न । विन्धे । अस्य सुऽस्तुतिम् ॥ ७ ॥
 
द्वितीयानुवाके तृतीयं सूक्तम् युञ्जन्ति दशर्चम् , वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिःः १-२,४ मरुतः, ३-५ इन्द्रमरुतौ, ६-१० इन्द्रो देवता गायत्रीछन्दः (१२ विरा, ४.८ निचृत्)
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त्वयैव प्रेरणे जाते तत्र तत्र य उत्तराः । तेऽपि स्तोमाः सुष्टुतित्वमस्यानन्त्यान्न चाप्नुयुः  २१२॥७ 
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| verse_line1 = युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषञ्चरन्तम्परि तस्थुषः रोचन्ते रोचना दिवि १ ॥
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भगवतः प्रेरकत्वे वृषदृष्टान्तः
युञ्जन्ति । ब्रध्नम् । अरुषम् । चरन्तम् । परि । तस्थुषः । रोचन्ते ।  रोचना । दिवि ॥ १ ॥
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
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पौंस्यानि वासुदेवस्य ब्रध्नं वृद्धं दिवाकरम् । अरुणं चरन्तं परितो गिरीन्युञ्जन्ति सर्वदा १९२
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| verse_line1  = वृषा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्त्योजसा ईशानो अप्रतिष्कुतः ८ ॥
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वृषा । यूथा इव । वंसगः । कृष्टीः । इयर्ति । ओजसा ॥ ईशानः अप्रतिऽस्कुतः
 
तैरेवान्यानि चन्द्रादि रोचनानि त्रिविष्टपे रोचयन्ति
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प्रतिवीरो वृषा वंसस्तद्गन्ता वंसगो विभीः । यूथान्याकर्षति यथा प्रजाः प्रेरयति प्रभुः । अल्पस्यापि प्रसिद्ध्यैव दृष्टान्तत्वं तु युज्यते  ॥२१३॥८॥
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विराड् गायत्री
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पादनिचृद् गायत्री
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| verse_line1 = य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम्
| verse_line1 = युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे शोणा धृष्णू नृवाहसा
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यः एकः चर्षणीनाम् वसूनाम् इरज्यति इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम्
 
युञ्जन्ति । अस्य काम्या हरी इति विऽपक्षसा रथे शोणा धृष्णू इति नृऽवाहसा
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| text        =
 
पञ्चविधप्रजापालको भगवान्
.........हरी चास्य मनोबुद्धी स्वशक्तयः । युञ्जन्त्यधिगुणत्वेन काम्यावश्वावथापि वा ॥ १९३ ॥
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राजा भवति वित्तानां प्रजानां चैक एव यः । देवगन्धर्वदैतेयपितृमानुषभेदतः प्रजानामपि पञ्चानां सामान्याच्च विशेषतः  ॥२१४॥९
 
विशिष्टपक्षसंयुक्ताविव क्षिप्रतरौ सदा रथे देहेऽपि वा देवाः स्वमनो बुद्धिमेव च ॥ १९४
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केवलशब्दवाच्य इन्द्रः पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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अस्य देहे प्रयुञ्जन्ति सूर्यादीन् स्थापयन्ति च । सूर्यादिस्थापकत्वं च ब्रह्मादीनां भवेत् सदा १९५॥
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| verse_line1  = इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः अस्माकमस्तु केवलः ॥ १०, १४, ७, २ ॥
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इन्द्रम् । वः । विश्वतः । परि । हवामहे । जनेभ्यः ॥ अस्माकम् । अस्तु केवलः ॥ १०, १४, ७, २
 
शोणौ च शमणौ प्रोक्तौ सुखप्राप्तौ यतस्सदा श्यामौ मूर्धनि शोणौ च शक्राश्वावग्रगौ स्मृतौ
}}
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सम्यग्घवामहे सर्वगतं च व्यक्तरूपतः । स्थातुमेकत्र वोऽर्थाय जना नोऽस्तु स केवलः ॥ २१५ ॥  १०,१४,७,२
 
धृष्टौ नॄन् प्रति तं वेशं वहन्तौ तावुभावपि १९६॥२
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॥ इति सप्तमं सूक्तम् ॥
 
इन्द्रो मरुतश्च देवताः
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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| verse_line1 = केतुङ्कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे ॥ समुषद्भिरजायथाः ॥ ३ ॥
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| text =
मण्डलम्—१.अध्यायः–१ .अनुवाकः–३. सूक्तम्– ८.
 
केतुम् । कृण्वन् । अकेतवे । पेशः । मर्याः । अपेशसे ॥ सम् ।  उषत्ऽभिः । अजायथाः ॥ ३ ॥
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‘एन्द्रम्’ दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिः, गायत्री च्छन्दः (१,५,८ निचृत्, २ प्रतिष्ठा, १० वर्धमाना) इन्द्रो देवता
 
अज्ञाय कुर्वन् सज्ज्ञानं हेमाहेमाय चेश्वरः ।  उषद्भिः सम्प्रकाशद्भिः शक्तिभिर्व्यक्ततामगाः ॥ १९७ ॥
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निचृद् गायत्री
 
मर्या मरणवन्तोऽपि देवा एवम् ............॥ ३ ॥
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इन्द्रे ज्ञानप्रार्थना
निचृद् गायत्री, मरुतः देवताः
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| verse_line1 = एन्द्र सानसिं रयिं सजत्वानं सदा सहम् वर्षिष्ठमूतये भर
| verse_line1 = आदहस्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे दधाना नाम यज्ञियम्
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इन्द्र सानसिम् रयिम् सऽजित्वानम् सदाऽसहम् वर्षिष्ठम् ऊतये भर
 
आत् । अह स्वधाम् अनु पुनः गर्भऽत्वम् आऽर्इरिरे दधानाः नाम यज्ञियम्
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जयिना सहितं लाभयुक्तं वित्तं सदाबलम् । वर्षिष्ठं सुमहद्रक्षानिमित्तं नित्यदा भर २१६ ॥ १ ॥
 
.......................हरेर्वशात्॥ तदैव सुखमन्वेव पुनर्गूढत्वमापिरे १९८॥
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| text    =
 
भगवद्दत्तज्ञानादिना बाह्य-आन्तरशत्रुपराजयः
स्वेच्छयैव परेशस्य शक्तयो देवता अपि । यज्ञे वाच्यं दधानाश्च नाम ........ ॥ ४ ॥
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विराड् गायत्री
 
इन्द्रो मरुतश्च देवताः
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| verse_line1 = नियेन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै त्वोतासो न्यर्वता
| verse_line1 = वीळुचिदारुजत्नुभिर्गुहाचिदिन्द्र वह्निभिः अविन्द उस्रिया अनु ५, ११
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नि येन मुष्टिऽहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै त्वाऽऊतासः नि अर्वता
 
वीळुु । चित् आरुजत्नुऽभिः गुहा चित् इन्द्र वह्निऽभिः अविन्दः उस्रियाः अनु ५,११
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उपसर्गावृत्त्या क्रियापदावृत्तिः
....................... वीु दृढं ह्यपि ॥ १९९ ॥
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येनारीन् मुष्टियुद्धेन तमांसि ज्ञानयुद्धतः त्वत्प्रेरिता निरुन्धामः कांश्चिद्वा तुरगादिभिः ॥
 
आरुजद्भिः स्वसामर्थ्यैर्गुहायां संस्थितोऽपि सन् । वहद्भिरखिलं लोकं प्रकाशत्वानि लब्धवान्
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आवृत्त्यैवोपसर्गस्य क्रियाऽऽवृत्तिर्भविष्यति  ॥२१७॥२  ॥
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देवैर्वैतादृशैः साकमानुकूल्येन लब्धवान् २००॥ ५॥
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| verse_line1 = इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रङ्घना ददीमहि जयेम संयुधि स्पृधः ॥ ३ ॥
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इन्द्र । त्वाऽऊतासः । आ । वयम् । वज्रम् । घना । ददीमहि ॥ जयेम । सम् । युधि । स्पृधः ॥ ३ ॥
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इन्द्रो देवता
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त्वत्प्रेरिता ज्ञानरतिं दृढत्वेनाऽददीमहि  ॥ ३  ॥
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| verse_line1 = वयं शूरेभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम् सासह्याम पृतन्यतः
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वयम् शूरेभिः अस्तृऽभिः इन्द्र त्वया युजा वयम् ॥ ससह्याम पृतन्यतः
 
देवऽयन्तः यथा मतिम् अच्छ विदत्ऽवसुम् गिरः ॥ महाम् अनूषत श्रुतम्
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त्वया पृतन्यतः शत्रूनभिष्याम सुयोद्धृभिः ॥२१८॥४
 
सम्यक्प्रद्योतयन्तोऽमुं मतिरूपं यथास्थितम् । विदद्वित्तं महान्तं च विश्रुतं सुगिरोऽस्तुवन्  ॥ २०१ ॥ ६ 
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निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = महा इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे द्यौर्न प्रथिना शवः ५, १५
| verse_line1 = इन्द्रेण सं हि दृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा मन्दू समानवर्चसा
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महान् इन्द्रः पर नु महिऽत्वम् । अस्तु । वज्रिणे द्यौः । न । प्रथिना शवः ५, १५
 
इन्द्रेण सम् हि दृक्षसे सम्ऽजग्मानः अबिभ्युषा मन्दू इति समानऽवर्चसा
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जीवस्य ब्रह्मभावो न चिन्त्यः
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तस्य सन्दर्शनायैव सङ्गतस्तेन शङ्करः । मखात्मा पुरुहूतो वा श्रीभूमी च सुखात्मिके  ॥ २०२ ॥७  ॥
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शवशब्दः सुखबलवाचकः
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यस्मान्महाननादिश्च विष्णुर्जीवोऽवरस्तथा । तस्यैवास्तु महत्त्वं तन्न जीवब्रह्मतां स्मरेत् ।
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निचृद् गायत्री, इन्द्रो देवता
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आकाशवत् प्रथिम्नाऽसौ शवः सुखबले तथा  ॥ २१९॥५॥
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| verse_line1 = (७६) समोहे वाय आशत नरस्तोकस्य सनितौ विप्रासो वा धियायवः
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भगवदज्ञानिनः पशवः
अनवद्यैः । अभिद्युऽभिः । मखः । सहस्वत् । अर्चति ॥ गणैः ।  इन्द्रस्य । काम्यैः ॥ ८ ॥
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अन्यसंवहनेनापि ये तं प्राप्ता जनार्दनम् । ज्ञानलाभेन तु नरस्त एव पशवो परे विप्राश्चैव धिया युक्ता मूर्खाः शूद्रसमा मताः॥२२०॥६॥
 
अनवद्यैर्महाज्ञानैः प्रियैर्देवगणैः सह वायुना च सहार्चन्ति सुधीत्वात् परमेश्वरम्  ॥२०३ ॥ ८ ॥
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भगवत इष्टदत्वे समुद्रदृष्टान्तः
इन्द्रो देवता
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| verse_line1 = यः कुक्षिस्सोमपातमस्समुद्र इव पिन्वते उर्वीरापो न काकुदः
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यः कुक्षिः सोमऽपातमः समुद्रःऽइव पिन्वते उर्वीः आपः काकुदः
 
अतः । परिऽज्मन् । आ । गहि दिवः वा रोचनात् अधि सम् अस्मिन् ऋञ्जते गिरः
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यः कुक्षिस्तस्य देवस्य समुद्र इव सोऽखिलान् । कामान् क्षरति भक्ताय महाप इव तर्पकाः ॥ काकुदस्तस्य जिह्वास्तु बह्व्यो बहुमुखेषु याः  ॥२२१॥७  ॥
 
अनुक्रमणिकोेक्तदेवताविमर्शः
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निचृद् गायत्री
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अतो हेतोरिहायाहि दिवो वा सूर्यमण्डलात् । परिज्मन् सर्वगास्माकमधिकृत्य समर्हणम् अस्मिन् गिरः प्राप्नुवन्ति सम्यक्परममुख्यतः २०४
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| verse_line1  = एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही पक्वा शाखा न दाशुषे
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एव । हि । अस्य । सूनृता । विऽरप्शी । गोऽमती । मही ॥ पक्वा । शाखा । न । दाशुषे ॥ ८ ॥
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युञ्जन्तीत्यत्र बाहुल्यात् देवयन्तोत इत्यपि बाहुल्यादृ(ल्यात् दृष्टि)ष्टितो गीर्भिर्विनाऽर्थो  नान्य इष्यते २०५॥ ९
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एवमेवास्य वाणी च वेदेता महती तथा पक्वा शाखेव यजते वरदात्री विरप्शिनः २२२॥ बलिष्ठस्य हि ते    ................. ॥ ८ 
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| verse_line1 = एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे
| verse_line1 = इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि इन्द्रं महो वा रजसः १०, १२, ६
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एव । हि । ते । विऽभूतयः । ऊतयः । इन्द्र । मावते ॥ सद्यः । चित् । सन्ति । दाशुषे ॥ ९ ॥
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इतः वा । सातिम् । ईमहे । दिवः । वा । पार्थिवात् । अधि ॥ इन्द्रम् । महः । वा । रजसः १०, १२, ६
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............सन्ति सद्योऽपि यजते हि ते मावते ज्ञानिने नित्यमूतयश्च विभूतयः  २२३॥९
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वर्धमाना गायत्री
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इतो दिवो वा पातालात् सातिं लाभस्वरूपिणम् । महतो रञ्जकात् विष्णोर्लोकाद्वा तमधीमहे २०६ ॥ १०,१२,६ 
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एव । हि । अस्य । काम्या । स्तोमः । उक्थम् । च । शंस्या ॥ इन्द्राय । सोमऽपीतये ॥ १०, १६, ८ ॥
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॥ इति षष्टं सूक्तम् ॥
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स्तोमा उक्थानि चैवास्य तस्मै काम्यानि सर्वदा । गेयाः शंस्यानि सोमस्य पीतये नान्यथा पिबेत् ॥ २२४ ॥ १० ॥
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== ऐन्द्रसूूक्तम् ==
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॥ इति अष्टमं सूक्तम् ॥
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम्—९.
 
मण्डलम् —१.अध्यायः–१. अनुवाकः-२. सूक्तम्—७.
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इन्द्रेहि दशर्चम् , ऋषिः - मधुच्छन्दाः, गायत्री छन्दः, इन्द्रो देवता
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द्वितीयानुवाके चतुर्थम् ‘इन्द्रं’ दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिः, गायत्री (२ निचृत्, ८, १० पिपीलिकामध्या निचृत्,९ पादनिचृत्) इन्द्रो देवता
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निचृद् गायत्री
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इन्द्र इहि मत्सि अन्धसः विश्वेभिः सोमपर्वऽभिः ॥  महान् अभिष्टिः ओजसा ॥ १ ॥
 
इन्द्रम् इत् गाथिनः बृहत् इन्द्रम् अर्केभिः अर्किणः ॥  इन्द्रम् वाणीः अनूषत ॥ १ ॥
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तमेव गाथिनः साम्ना स्तुवन्त्यृग्भिश्च बह्वृचाः । बृहन्तमन्यवाणीभिरपि  .............. ॥ १ ॥
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सोमपाः सोमपर्वाणः सर्वं यस्मात्तदिच्छया । अभिष्टिरोजसा नित्यं मदं सुखमवाप्स्यसि  ॥२२५ ॥ १ ॥
 
निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने चक्रिं विश्वानि चक्रये ॥ २ ॥
| verse_line1 = इन्द्र इद्घर्योः सचा सम्मिश्ल आवचो युजा इन्द्रो वज्री हिरण्ययः ॥ २ ॥
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र्इम् एनम् सृजत सुते मन्दिम् । इन्द्राय मन्दिने चक्रिम् विश्वानि चक्रये ॥ २ ॥
 
इन्द्रः इत् हर्योः सचा सम्ऽमिश्लः वचःऽयुजा इन्द्रः वज्री हिरण्ययः ॥ २ ॥
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एनमासृजतेन्दौ च विष्णुं तं मदकारिणम् । मन्दिने विष्णवे सम्यक्कर्मिणं सर्वकर्मिणे  ॥ २२६॥२॥
 
भक्तशरीररथाधिरूढो भगवान्
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निचृद् गायत्री
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हिरण्ययो भगवान्
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मत्स्व । सुऽशिप्र । मन्दिऽभिः । स्तोमेभिः । विश्वऽचर्षणे सचा । एषु । सवनेषु । आ
 
.................. हर्यो विमिश्रितः २०७ रथेऽथवा मनोबुद्ध्योर्वाङ्मात्रेणैव योगिनोः
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स्वानन्द विश्वजीवेश मत्स्वास्मद्रक्षया सह
 
सचा सुखेन वज्री च ज्ञानानन्दो हि धातुतः । हितश्च रमणीयश्च हिरण्यय इतीरितः २०८ ॥२
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इन्द्रस्य पर्वतादिनियन्तृत्वमहिमावर्णनम्
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वेदोच्चारणं भगवद्गुणप्रतिपादनार्थमेव
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असृग्रम् इन्द्र ते गिरेः प्रति त्वाम् उत् अहासत ॥ अजोषाः वृषभम् पतिम्
 
इन्द्रः दीर्घाय चक्षसे सूर्यम् रोहयत् दिवि ॥ वि ।  गोभिः अद्रिम् ऐरयत्
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त्वन्निस्सृता वेदवाचस्त्वां प्रत्येवाप्यनारतम् २२७
 
दीर्घकालं दर्शनाय सूर्यमारोहयद्दिवि । ज्ञानैरादरयोग्यं च प्राणात्मानं समैरयत्  २०९॥३ 
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उच्चैर्मुख्यतया सम्यग्विसृष्टाः स्वपतिं प्रति । अजोषाः स्तुत्यरूपेण त्वत्सेव्यास्त्वदृते क्वचित् ॥ २२८॥४  ॥
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निचृद् गायत्री
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
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सम् । चोदय चित्रम् अर्वाक् राधः इन्द्र वरेण्यम् असत् ।  इत् । ते । विऽभु प्रऽभु ५, १७
 
इन्द्र वाजेषु नः अव सहस्रऽप्रधनेषु उग्रः ।  उग्राभिः ऊतिऽभिः
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इन्द्रे भगवति ऐश्वर्यार्थं प्रार्थना
बहुभिर्युध्यमानेषु युद्धेष्वपि सदाऽव नः । दुष्टोग्रैः सदभिप्रायैः ...... ॥ ४  ॥
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अर्वाङ् नीचान् प्रति त्वस्मान् भद्रं राधः प्रचोदय । अस्त्येव ते विशेषेण प्रकृष्टं शुभमच्युतम्  ॥ २२९॥५॥
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मोक्ष-सासांरिकपुरुषार्थार्थ भगवत्प्रार्थना
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
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अस्मान् सु तत्र चोदय इन्द्र राये । रभस्वतः तुविऽद्युम्न यशस्वतः
 
इन्द्रम् वयम् महाऽधने इन्द्रम् अर्भे हवामहे ॥ युजम् वृत्रेषु वज्रिणम् ५, १३
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रभस्वतः शब्दवतः स्तोतॄनस्मान् यशस्वतः तत्र त्वयि महाराये महाकीर्ते सुचोदय २३०॥६ ।
 
.................महदल्पधनार्थिनः ।  हवामहेऽरिवर्ज्यं तं तमसां प्रतियोगिनम्  ॥ २१० ५॥
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निचृद् गायत्री
 
अविद्यावरणापसरणार्थं भगवति प्रार्थना
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| verse_line1 = स नो वृषन्नमुञ्चरुं सत्रादावन्नपावृधि अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः
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सम् गोऽमत् इन्द्र वाजऽवत् अस्मे इति पृथु श्रवः बृहत् विश्वऽआयुः । धेहि अक्षितम्
 
सः नः वृषन् अमुम् चरुम् सत्राऽदावन् अप वृधि अस्मभ्यम् अप्रतिऽस्कुतः
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अस्मास्वतिबृहज्ज्ञानं नित्यं सन्धेहि चाक्षयम्  ॥ ७ 
 
अस्मदीयं चरुं भोज्यमानन्दं त(त्व)मपावृणु । मोक्षगं सर्वदातस्त्वमप्रतिद्वन्द्व नो वृषन् ॥२११॥६
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स्तोमा अपि न साकल्येन विष्णुवाचकाः
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इन्द्रे विद्या-कीर्ति-अविकलदेहादिप्रार्थना
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| verse_line1 = अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युुम्नं सहस्रसातमम् इन्द्र ता रथिनीरिषः
| verse_line1 = तुञ्जे तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः न विन्धे अस्य सुष्टुतिम्
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तुञ्जेऽतुञ्जे । ये । उत्ऽतरे । स्तोमाः । इन्द्रस्य । वज्रिणः ॥ न । विन्धे । अस्य । सुऽस्तुतिम् ॥ ७ ॥
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अस्मे इति धेहि । श्रवः । बृहत् । द्युम्नम् । सहस्रऽसातमम् इन्द्र । ताः । रथिनीः । इषः ॥ ८
 
त्वयैव प्रेरणे जाते तत्र तत्र य उत्तराः तेऽपि स्तोमाः सुष्टुतित्वमस्यानन्त्यान्न चाप्नुयुः  २१२॥७
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भगवतः प्रेरकत्वे वृषदृष्टान्तः
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प्रार्थनावाक्ये पौनरुक्त्यं न दोषाय
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विद्यां कीर्तिं सदेहान्नं बहुलाभयुतं बृहत् । प्रार्थने पौनरुक्त्यं न चोदयेति ततः पुनः  ॥२३१॥८ ॥
 
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = वसोरिन्द्रं वसुपतिङ्गीर्भिर्गृणन्त ऋग्मियम् होम गन्तारमूतये
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वसोः इन्द्रम् वसुऽपतिम् गीःऽभिः गृणन्तः ऋग्मियम् होम । गन्तारम् ऊतये
 
वृषा यूथा इव वंसगः कृष्टीः इयर्ति ओजसा ईशानः अप्रतिऽस्कुतः
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वसोर्वसूनां च पतिं देवदेवेश्वरं प्रभुम् ऋङ्मेयमाह्वयामोऽत्र गृणन्तोऽभीष्टसिद्धये ॥२३२॥९ ॥
 
प्रतिवीरो वृषा वंसस्तद्गन्ता वंसगो विभीः । यूथान्याकर्षति यथा प्रजाः प्रेरयति प्रभुः अल्पस्यापि प्रसिद्ध्यैव दृष्टान्तत्वं तु युज्यते ॥२१३॥८॥
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निचृद् गायत्री
 
पादनिचृद् गायत्री
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| verse_line1 = सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरिः । इन्द्राय शूषमर्चति १०, १८, ९ ॥
| verse_line1 = य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति ॥ इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम् ॥ ९ ॥
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सुतेऽसुते निऽओकसे बृहत् बृहते इत् अरिः इन्द्राय । शूषम् । अर्चति १०, १८, ९॥
 
यः एकः चर्षणीनाम् वसूनाम् इरज्यति ॥ इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम्
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अविनाश्यरिरुद्दिष्टो बृहच्छूषं सुखं प्रति । सुते सुते सद्गृहाय देवाय बृहतेऽर्चति  ॥ २३३ ॥ १० ॥
 
पञ्चविधप्रजापालको भगवान्
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॥ इति नवमं सूक्तम्
 
राजा भवति वित्तानां प्रजानां चैक एव यः । देवगन्धर्वदैतेयपितृमानुषभेदतः । प्रजानामपि पञ्चानां सामान्याच्च विशेषतः  ॥२१४॥९
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम् – १०
 
केवलशब्दवाच्य इन्द्रः पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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तृतीयानुवाके तृतीयं सूक्तम् ऐन्द्रसूक्तम्  गायन्ति द्वादश मधुच्छन्दाः अनुष्टुप्, इन्द्रो देवता
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| verse_line1 = इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः ॥ अस्माकमस्तु केवलः ॥ १०, १४, ७, २ ॥
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| text     =
विराडनुष्टुप्
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इन्द्रम् । वः । विश्वतः । परि । हवामहे । जनेभ्यः अस्माकम् । अस्तु । केवलः १०, १४, ७, २
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| verse_line1  = गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे
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गायन्ति त्वा । गायत्रिणः । अर्चन्ति । अर्कम् । अर्किणः ब्रह्माणः । त्वा । शतक्रतो इति शतऽक्रतो । उत् । वंशम्ऽइव । येमिरे
 
सम्यग्घवामहे सर्वगतं च व्यक्तरूपतः स्थातुमेकत्र वोऽर्थाय जना नोऽस्तु स केवलः ॥ २१५ १०,१४,७,२
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ऋक्-सामादिभिः भगवत्स्तुतिः
॥ इति सप्तमं सूक्तम् ॥
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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मण्डलम्—१.अध्यायः–१ .अनुवाकः–३. सूक्तम्– ८.
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गायन्ति सामगास्त्वृग्भिः शंसन्त्यृग्वेदिनोऽन्तिकम् । विरिञ्चास्त्वां बहुज्ञान शक्रकेतुमिवोच्छ्रितम् ॥ २३४ ॥
 
‘एन्द्रम्’ दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिः, गायत्री च्छन्दः (१,५,८ निचृत्, २ प्रतिष्ठा, १० वर्धमाना) इन्द्रो देवता
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व्यजानन् .............. ॥ १ ॥
 
निचृद् गायत्री
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इन्द्रे ज्ञानप्रार्थना
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विराडनुष्टुप्
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| verse_line1 = यत्सानोस्सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् । तदिन्द्रो अर्थञ्चेतति यूथेन वृष्णिरेजति
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यत् सानोः सानुम् अरुहत् भूरि । अस्पष्ट । कर्त्वम् ॥  तत् । इन्द्रः । अर्थम् । चेतति । यूथेन वृष्णिः एजति
 
इन्द्र सानसिम् रयिम् सऽजित्वानम् सदाऽसहम् ॥  वर्षिष्ठम् ऊतये भर
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मुक्तामुक्तसमूहेनापि सेव्यो भगवान्
जयिना सहितं लाभयुक्तं वित्तं सदाबलम् । वर्षिष्ठं सुमहद्रक्षानिमित्तं नित्यदा भर  ॥ २१६ ॥ १ ॥
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..........उच्चतोऽप्युच्चं सामर्थ्यं करणे तव । ततोऽपि भूरि यत्तेन चेतत्यर्थमतो भवान् ॥ मुक्तामुक्तसमूहेन शोभते गूढशक्तिमान् ॥ २३५ ॥
 
भगवद्दत्तज्ञानादिना बाह्य-आन्तरशत्रुपराजयः
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उच्चादुच्चं विरिञ्चादिगतं कर्तृत्वमेव यत् । भूरि स्पष्टमभूत्तेन परेशस्य ततश्च सः । चेतत्यर्थानशेषांश्च महायूथेन चेष्टते  ॥ २३६॥ २ ॥
 
विराड् गायत्री
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इन्द्रे अस्मदीयस्तुतिश्रवणार्थं प्रार्थना
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विराडनुष्टुप्
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नि । येन । मुष्टिऽहत्यया । नि । वृत्रा । रुणधामहै ॥ त्वाऽऊतासः । नि अर्वता
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युक्ष्व । हि । केशिना । हरी इति । वृषणा । कक्ष्यऽप्रा ॥ अथ । नः । इन्द्र । सोमऽपाः । गिराम् । उपऽश्रुतिम् । चर ॥ ३ ॥
 
उपसर्गावृत्त्या क्रियापदावृत्तिः
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कक्ष्याभिः पूरकौ पुष्ट्या युङ्क्ष्व त्वं केशिनौ हरी अथोपगम्य शृणु नो गिरः ............. ॥ ३ 
 
येनारीन् मुष्टियुद्धेन तमांसि ज्ञानयुद्धतः त्वत्प्रेरिता निरुन्धामः कांश्चिद्वा तुरगादिभिः
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भुरिग् उष्णिक्
आवृत्त्यैवोपसर्गस्य क्रियाऽऽवृत्तिर्भविष्यति  ॥२१७॥२  ॥
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आ । इहि । स्तोमान् । अभि । स्वर । अभि । गृणीहि । आ । रुव ॥  ब्रह्म । च । नः । वसा इति । सचा । इन्द्र । यज्ञम् । च । वर्धय ॥ ४ ॥
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इन्द्र । त्वाऽऊतासः । आ । वयम् । वज्रम् । घना । ददीमहि जयेम । सम् । युधि । स्पृधः ॥ ३
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..................अभिस्वर च स्तुतिम् २३७
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प्रशंसां कुरु शब्दं च पुनर्हर्षान्महत्तरम् । ब्रह्म यज्ञं च नोऽन्तस्थो बहिष्ठश्चैव वर्धय  ॥ २३८॥४  ॥
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त्वत्प्रेरिता ज्ञानरतिं दृढत्वेनाऽददीमहि  ॥ ३  ॥
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विराडनुष्टुप्
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| verse_line1 = उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनम्पुरु निष्षिधे शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत्सख्येषु च
| verse_line1 = वयं शूरेभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम् सासह्याम पृतन्यतः
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उक्थम् इन्द्राय शंस्यम् वर्धनम् पुरु निःऽसिधे ॥ शक्रः यथा सुतेषु । नः । ररणत् । सख्येषु
 
वयम् शूरेभिः अस्तृऽभिः इन्द्र त्वया युजा वयम् ॥ ससह्याम पृतन्यतः
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नित्यवृद्धविष्णोः वर्धनाभिप्रायः
त्वया पृतन्यतः शत्रूनभिष्याम सुयोद्धृभिः ॥२१८॥४ ॥
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नित्यवृद्धत्वतो विष्णोर्वर्धनं तु प्रकाशनम् । बहुशत्रून्निष्षिदसौ हरिर्दनुजघातकः ॥ २३९ ॥
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निचृद् गायत्री
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अस्मत्सख्याय शब्दं च चकारास्मासु संस्थितः । यथा सुतेषु सोमेषु करोत्यृत्विक्षु च स्थितः  ॥ २४०॥५ ॥
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| verse_line1 = तमित्सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये । स शक्र उत नश्शकदिन्द्रो वसु दयमानः , १९
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तम् इत् सखिऽत्वे र्इमहे तम् राये तम् सुऽवीर्ये सः ।  शक्रः उत । नः । शकत् । इन्द्रः वसु दयमानः , १९
 
महान् इन्द्रः पर नु महिऽत्वम् अस्तु वज्रिणे द्यौः प्रथिना शवः , १५
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जीवस्य ब्रह्मभावो न चिन्त्यः
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शक्रशब्दवाच्यो विष्णुः
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तमेव शरणं नित्यं सखित्वाद्यर्थमीमहे । शक्त्यानन्दस्वरूपत्वाच्छक्रः सर्वत्र चाशकत् ।  अस्माकं च सदा वित्तं दददेव प्रवर्तते  ॥ २४१॥६॥
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शवशब्दः सुखबलवाचकः
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सुऽविवृतम् । सुनिःऽअजम् । इन्द्र । त्वाऽदातम् । इत् । यशः ॥  गवाम् । अप । व्रजम् । वृधि । कृणुष्व राधः अद्रिऽवः ॥ ७ ॥
 
यस्मान्महाननादिश्च विष्णुर्जीवोऽवरस्तथा तस्यैवास्तु महत्त्वं तन्न जीवब्रह्मतां स्मरेत्
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विस्पष्टं सुष्ट्वकाल्यं यशस्त्वद्दत्तमेव हि । गूढं ज्ञानसमूहं त्वं विवृण्वृद्धिं च नः कुरु ॥२४२॥
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आकाशवत् प्रथिम्नाऽसौ शवः सुखबले तथा २१९॥५॥
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अद्रिरादरणीयत्वात् प्राणस्तद्वर्तकोऽद्रिवाः । हरिः शक्रस्तथाऽद्रीणां छेदनाद्वारणादपि  ॥ २४३॥ ७
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नहि । त्वा । रोदसी इति । उभे इति । ऋघायमाणम् । इन्वतः ॥ जेषः । स्वःऽवतीः । अपः । सम् । गाः । अस्मभ्यम् । धूनुहि ॥ ८ ॥
 
भगवदज्ञानिनः पशवः
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न त्वामृघायमाणं हि वर्धमानं तु रोदसी सम्प्राप्नुतः श्रीभूमी च सहिते वाऽप्रसादतः ॥ २४४॥
 
अन्यसंवहनेनापि ये तं प्राप्ता जनार्दनम् । ज्ञानलाभेन तु नरस्त एव पशवो परे विप्राश्चैव धिया युक्ता मूर्खाः शूद्रसमा मताः॥२२०॥६॥
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अपः प्रजाः सुखवतीरजयस्त्वद्वशत्वतः । ज्ञानानि सन्धूनुहि च प्रापयोच्चा अपि स्वयम्  ॥ २४५॥८॥
 
भगवत इष्टदत्वे समुद्रदृष्टान्तः
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| verse_line1 = यः कुक्षिस्सोमपातमस्समुद्र इव पिन्वते उर्वीरापो न काकुदः ॥ ७
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आश्रुत्ऽकर्ण । श्रुधि । हवम् । नु चित् दधिष्व मे गिरः इन्द्र । स्तोमम् । इमम् । मम । कृष्व युजः चित् अन्तरम्
 
यः कुक्षिः सोमऽपातमः समुद्रःऽइव पिन्वते उर्वीः आपः काकुदः
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बहुश्रवणकर्णास्मदाह्वानं शृृणु चादरात् औव च गिरो धेहि मयि स्तोमं च मत्कृतम् २४६॥
 
यः कुक्षिस्तस्य देवस्य समुद्र इव सोऽखिलान् कामान् क्षरति भक्ताय महाप इव तर्पकाः ॥ काकुदस्तस्य जिह्वास्तु बह्व्यो बहुमुखेषु याः  ॥२२१॥७ 
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प्रियं योगादपि कुरु ........... ॥ ९  ॥
 
निचृद् गायत्री
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विद्म । हि । त्वा वृषन्ऽतमम् वाजेषु हवनऽश्रुतम् वृषन्ऽतमस्य हूमहे ऊतिम् सहस्रसातमाम् १०
 
एव । हि । अस्य । सूनृता विऽरप्शी गोऽमती मही पक्वा शाखा दाशुषे
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मधुच्छन्दसः शतर्चित्वविवरणम्
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एवमेवास्य वाणी च वेदेता महती तथा । पक्वा शाखेव यजते वरदात्री विरप्शिनः ॥ २२२॥ बलिष्ठस्य हि ते    ................. ॥ ८  ॥
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....................विद्म त्वां शक्तिमत्तमम् । श्रोतारं युत्सु चाह्वानमाह्वयामस्तवावनम् २४७॥
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बहुलाभोत्तममिति ............... १०
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.................स्थानान्तरगते ऋचौ । दृष्ट्वेन्द्रं यज्ञगं याभ्यां मधुच्छन्दाः समस्तुवत् । आतून इति तेनैव न विरुद्धा शतर्चिता  ॥ २४८॥॥
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एव । हि । ते । विऽभूतयः । ऊतयः । इन्द्र । मावते सद्यः । चित् । सन्ति । दाशुषे
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आ । तु । नः । इन्द्र । कौशिक । मन्दसानः । सुतम् । पिब ॥ नव्यम् । आयुः । प्र । सु । तिर । कृधि । सहस्रऽसाम् । ऋषिम् ॥ ११ ॥
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............सन्ति सद्योऽपि यजते हि ते मावते ज्ञानिने नित्यमूतयश्च विभूतयः  ॥ २२३॥९
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मात्रा कुशैर्गृहीतत्वाज्जन्मन्यासीत् स कौशिकः गाधित्वाद्वा हिरण्याण्डकोशस्थत्वात् हरिस्तथा २४९॥
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मन्दसानो नित्यसुखी स्तुत्यमायुश्च नस्तिर । ऋषिं सहस्रलाभं मां कुरु च............... ॥ ११ ॥
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वर्धमाना गायत्री
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वाचां भगवद्विषयकत्वप्रार्थना
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परि त्वा गिर्वणः गिरः इमाः भवन्तु विश्वतः वृद्धऽआयुम् । अनु । वृद्धयः । जुष्टाः । भवन्तु जुष्टयः १२, २०, १०
 
एव । हि अस्य काम्या स्तोमः उक्थम् शंस्या इन्द्राय सोमऽपीतये १०, १६,
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मधुच्छन्दसा पुनर्दृष्टऋक्सङ्ख्याविवरणम्
स्तोमा उक्थानि चैवास्य तस्मै काम्यानि सर्वदा । गेयाः शंस्यानि सोमस्य पीतये नान्यथा पिबेत् ॥ २२४ ॥ १० ॥
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........................त्वा इमा गिरः २५०॥
 
इति अष्टमं सूक्तम् ॥
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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सर्वदा परितः सन्तु मदीयाः सर्वलाभिनम् । वृद्धिरूपा गिरो जुष्टाः सेवारूपाश्च सन्तु नः ॥ २५१॥१२॥
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== इन्द्रसूक्तम् ==
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मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम् – ११
 
मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम्—९.
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इन्द्रम् अष्टौ, मधुच्छन्दाः ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, इन्द्रो देवता
 
इन्द्रेहि दशर्चम् , ऋषिः - मधुच्छन्दाः, गायत्री छन्दः, इन्द्रो देवता
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वेदवाचः इन्द्रप्रकाशकाः
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निचृद् गायत्री
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निचृद् अनुष्टुप्
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| verse_line1 = इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिस्सोमपर्वभिः महा अभिष्टिरोजसा ॥ १ ॥
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इन्द्रम् विश्वाः अवीवृधन् समुद्रऽव्यचसम् गिरः रथिऽतम् । रथिनाम् । वाजानाम् सत्ऽपतिम् पतिम् ॥ १ ॥
 
इन्द्र इहि मत्सि अन्धसः । विश्वेभिः । सोमपर्वऽभिः ॥  महान् अभिष्टिः ओजसा ॥ १ ॥
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.... सम्यगुद्रिक्तगुणव्यक्तिस्तथाऽभिधः १५२
 
सोमपाः सोमपर्वाणः सर्वं यस्मात्तदिच्छया । अभिष्टिरोजसा नित्यं मदं सुखमवाप्स्यसि ॥२२५ ॥ १ ॥
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| verse_line1 = एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने चक्रिं विश्वानि चक्रये
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निचृद् अनुष्टुप्
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आ । र्इम् । एनम् । सृजत । सुते । मन्दिम् । इन्द्राय । मन्दिने ॥ चक्रिम् ।  विश्वानि । चक्रये ॥ २ ॥
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| verse_line1 = सख्येत इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते ॥ त्वामभि प्रणोनुमो जेतारमपराजितम् ॥ २ ॥
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सख्ये । ते । इन्द्र । वाजिनः । मा । भेम । शवसः । पते ॥ त्वाम् । अभि प्र । नोनुमः । जेतारम् । अपराऽजितम् ॥ २
 
एनमासृजतेन्दौ च विष्णुं तं मदकारिणम् मन्दिने विष्णवे सम्यक्कर्मिणं सर्वकर्मिणे  २२६॥२॥
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निचृद् अनुष्टुप्
 
निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न विदस्यन्त्यूतयः यदी वाजस्य गोमतस्स्तोतृभ्यो मंहते मघम् ॥ ३ ॥
| verse_line1 = मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिस्स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे सचैषु सवनेष्वा ॥ ३ ॥
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पूर्वीः । इन्द्रस्य । रातयः । न । वि । दस्यन्ति । ऊतयः ॥ यदि । वाजस्य । गोऽमतः । स्तोतृऽभ्यः । मंहते । मघम् ॥ ३ ॥
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मत्स्व सुऽशिप्र । मन्दिऽभिः । स्तोमेभिः । विश्वऽचर्षणे ॥ सचा । एषु । सवनेषु । आ
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प्रथमानि महत्त्वेन ते दानान्यवनानि च न भिद्यन्ते न नश्यन्ति गोमदन्नं यशस्तथा २५३
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यदि मंहते ददातीशः ............. ॥ ३  ॥
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स्वानन्द विश्वजीवेश मत्स्वास्मद्रक्षया सह ३ 
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| verse_line1 = पुराम्भिन्दुर्युवाकविरमितौजा अजायत इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः ॥ ४
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पुराम् । भिन्दुः । युवा । कविः । अमितऽओजाः । अजायत ॥ इन्द्रः । विश्वस्य । कर्मणः । धर्ता । वज्री । पुरुऽस्तुतः ॥ ४ ॥
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वेदोच्चारणं भगवद्गुणप्रतिपादनार्थमेव
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भुरिग् -उष्णिक्
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| verse_line1 = त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम् त्वान्देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ॥ ५
| verse_line1 = असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत । अजोषा वृषभं पतिम्
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त्वम् वलस्य गोऽमतः अप अवः अद्रिऽवः बिलम् ॥  त्वाम् । देवाः । अबिभ्युषः तुज्यमानासः आविषुः
 
असृग्रम् इन्द्र ते गिरेः प्रति । त्वाम् उत् अहासत ॥  अजोषाः वृषभम् पतिम्
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वलशब्दार्थकथनम्
त्वन्निस्सृता वेदवाचस्त्वां प्रत्येवाप्यनारतम् ॥ २२७ ॥
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सरमाकथानिरूपणम्
उच्चैर्मुख्यतया सम्यग्विसृष्टाः स्वपतिं प्रति । अजोषाः स्तुत्यरूपेण त्वत्सेव्यास्त्वदृते क्वचित् ॥ २२८॥४  ॥
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................वलस्तिर्यग्गतिर्धियः । वाचामन्यार्थबुद्धेस्तु बिलं मूलं तमो हि यत् । तदपावृतवांस्त्वं च प्रदर्श्य विनिवार्य च ॥ २५४ ॥
 
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
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त्वां हि देवा भयापेताः प्रेर्यमाणास्त्वयैव च । छाद्यमानं गिरा दैत्यैररक्षन्निव सद्गिरा २५५॥
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| verse_line1 = सञ्चोेदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम् असदित्ते विभु प्रभु॥ ५, १७ ॥
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इन्द्रस्य गोसवार्थे च समुत्सृष्टा जगत्यपि चर्तुं गावो हृता दैत्यैः सरमारक्षिताः पुरा तस्याः स्वसृत्वमुक्त्वैव तयोच्छिष्टं च गोपयः २५६॥
 
सम् । चोदय । चित्रम् । अर्वाक् राधः इन्द्र । वरेण्यम् ॥ असत् ।  इत् । ते । विऽभु । प्रऽभु ॥ ५, १७
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तदर्थं पणयो नाम ते दैत्या बलपूर्वकाः । इन्द्रेण निहताः पश्चाज्ज्ञात्वा च सरमाकृतम् ॥ २५७॥
 
इन्द्रे भगवति ऐश्वर्यार्थं प्रार्थना
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ताडयित्वा पदा वक्त्रात् सृते पयसि तां भयात् शरणागतां प्रेषयित्वा दूत्येन पणिनां पुनः २५८॥
 
अर्वाङ् नीचान् प्रति त्वस्मान् भद्रं राधः प्रचोदय अस्त्येव ते विशेषेण प्रकृष्टं शुभमच्युतम्  २२९॥५॥
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भित्वा गिरिव्रजं तं च गावो यत्र प्रतिष्ठिताः । निःसारिताः पुनस्ताश्च गोसवेनेष्टमेव च ॥ तदा देवा भीत्यैव परितो जुगुपुः पतिम्  ॥ २५९॥५ ॥
 
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन् उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः ॥ ६ ॥
| verse_line1 = अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः तुविद्युम्न यशस्वतः ॥ ६ ॥
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तव । अहम् । शूर । रातिऽभिः । प्रति । आयम् । सिन्धुम् । आऽवदन् ॥ उप । अतिष्ठन्त । गिर्वणः । विदुः । ते । तस्य । कारवः ॥ ६ ॥
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अस्मान् सु । तत्र । चोदय । इन्द्र । राये । रभस्वतः । तुविऽद्युम्न । यशस्वतः ॥ ६
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तव दानैरहं सिन्धुं नदीं प्रत्यागमं पुनः त्वामावदन् स्तुतिपदैर्यज्ञदीक्षार्थमुद्यतः २६०॥
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उपातिष्ठन्त कर्तारो विदुस्त्वां यो गिरोदित  ॥ ६
 
रभस्वतः शब्दवतः स्तोतॄनस्मान् यशस्वतः । तत्र त्वयि महाराये महाकीर्ते सुचोदय २३०॥६ ।
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वृत्रघ्ने इन्द्रे विद्याप्रार्थना
निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = सङ्गोेमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत् विश्वायुर्धेह्यक्षितम् ॥ ७ ॥
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मायाभिः । इन्द्र । मायिनम् त्वम् शुष्णम् अव अतिरः विदुः । ते । तस्य । मेधिराः । तेषाम् । श्रवांसि उत् तिर ॥ ७ ॥
 
सम् । गोऽमत् । इन्द्र । वाजऽवत् अस्मे इति पृथु श्रवः बृहत् विश्वऽआयुः धेहि अक्षितम् ॥ ७ ॥
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शक्तिभिः शक्तिमन्तं त्वं शोषकं वृत्रमातिरः २६१॥
 
अस्मास्वतिबृहज्ज्ञानं नित्यं सन्धेहि चाक्षयम्  ॥ ७ 
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तमो वा त्वां विदुर्मेधारतास्तेषां श्रवांसि च । विद्या उच्चैस्तरां देहि  .................॥ ७  ॥
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इन्द्रे विद्या-कीर्ति-अविकलदेहादिप्रार्थना
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निचृदनुष्टुप्
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| verse_line1 = अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युुम्नं सहस्रसातमम् इन्द्र ता रथिनीरिषः ॥ ८
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इन्द्रम् ईशानम् ओजसा अभि स्तोमाः अनूषत सहस्रम् । यस्य । रातयः । उत वा सन्ति भूयसीः ॥ ८, २१, ११, ३
 
अस्मे इति धेहि श्रवः बृहत् द्युम्नम् सहस्रऽसातमम् इन्द्र ताः रथिनीः इषः ॥ ८ ॥
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........यस्तुवन्ति त्वां सहौजसा  ॥ २६२ ॥  ८, २१, ११, ३ ॥
 
प्रार्थनावाक्ये पौनरुक्त्यं न दोषाय
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॥ इति एकादशं सूक्तम् ॥
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विद्यां कीर्तिं सदेहान्नं बहुलाभयुतं बृहत् । प्रार्थने पौनरुक्त्यं न चोदयेति ततः पुनः  ॥२३१॥८ ॥
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इति तृतीयोऽनुवाकः
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अनुक्रमणिकोक्तऋषिविषये मानाभावः
वसोः । इन्द्रम् । वसुऽपतिम् । गीःऽभिः । गृणन्तः । ऋग्मियम् ॥ होम । गन्तारम् । ऊतये ॥ ९ ॥
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ऋक्संहितायाः स्वाध्यायात् प्रबन्धाद्व्यासनिर्मितात् ब्राह्मणेभ्यस्तथा मानात् प्रोक्ताः स्युर्मुनयोऽत्र ये २६३॥
 
वसोर्वसूनां च पतिं देवदेवेश्वरं प्रभुम् ऋङ्मेयमाह्वयामोऽत्र गृणन्तोऽभीष्टसिद्धये  ॥२३२॥९
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निचृद् गायत्री
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श्रुत्यभावादलिङ्गाच्च मुनिर्नान्यः प्रतीयते । श्रुतिलिङ्गान्यता यावत्तावत्पूर्वा प्रमा भवेत् ॥ २६४ ॥
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शतर्ग्भिरुत्तराभिस्तु वह्निनामानमच्युतम् अस्तौन्मेधातिथिस्ताभ्य उत्तरा अपि तद्-दृशः २६५॥
 
सुतेऽसुते । निऽओकसे । बृहत् । बृहते । आ । इत् । अरिः ॥ इन्द्राय । शूषम् अर्चति १०, १८, ९॥
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अविनाश्यरिरुद्दिष्टो बृहच्छूषं सुखं प्रति सुते सुते सद्गृहाय देवाय बृहतेऽर्चति  ॥ २३३ ॥ १०
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अन्यत्रगास्तपस्यन् स ता ददर्श कदाचन कालस्थानान्तरत्वं चेत्सङ्ख्यातोऽभ्यधिकं भवेत् २६६॥
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॥ इति नवमं सूक्तम् ॥
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अन्यस्थानगता अन्यदृष्टा अप्यत्रगा यदि । सङ्ख्यान्तर्भावमेष्यन्ति ता इतोपगता यतः ॥ २६७॥
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
== अग्निसूक्तम् ==
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मण्डलम्—१.अध्यायः–१.अनुवाकः–४. सूक्तम्–१२.
 
मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम् – १०
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मेधातिथिः काण्वः ऋषिः, गायत्री च्छन्दः, अग्निः देवता
 
तृतीयानुवाके तृतीयं सूक्तम् ऐन्द्रसूक्तम्  गायन्ति द्वादश मधुच्छन्दाः अनुष्टुप्, इन्द्रो देवता
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अग्निर्देवदूतः
 
विराडनुष्टुप्
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| verse_line1 = अग्निन्दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्
| verse_line1 = गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः ॥ ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥ १
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अग्निम् दूतम् वृणीमहे होतारम् विश्वऽवेदसम् अस्य यज्ञस्य सुऽक्रतुम् ॥ १ ॥
 
गायन्ति त्वा गायत्रिणः अर्चन्ति अर्कम् । अर्किणः ब्रह्माणः । त्वा । शतक्रतो इति शतऽक्रतो । उत् वंशम्ऽइव येमिरे ॥ १ ॥
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ऋक्-सामादिभिः भगवत्स्तुतिः
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दूतलक्षणम्
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यज्ञभागार्थमत्रस्थो देवैः सम्प्रेषितो यतः दूतोऽग्निर्वासुदेवश्च तत्तत्प्रार्थितकृद्यतः । विश्ववेदाः स सर्वज्ञो यज्ञज्ञो यज्ञसुक्रतुः  २६८ ॥ १ ॥
 
गायन्ति सामगास्त्वृग्भिः शंसन्त्यृग्वेदिनोऽन्तिकम् विरिञ्चास्त्वां बहुज्ञान शक्रकेतुमिवोच्छ्रितम् ॥ २३४
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व्यजानन् .............. ॥ १ ॥
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विराडनुष्टुप्
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अग्न्यन्तर्गतः अग्निनामा च परशुरामः
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| verse_line1 = अग्निमग्निं हवीमभिस्सदा हवन्त विश्पतिम् ॥ हव्यवाहम्पुरुप्रियम् ॥ २ ॥
| verse_line1 = यत्सानोस्सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् । तदिन्द्रो अर्थञ्चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥ २ ॥
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अग्निम्ऽअग्निम् । हवीमऽभिः । सदा । हवन्त । विश्पतिम् । हव्यऽवाहम् । पुरुऽप्रियम् ॥ २ ॥
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यत् सानोः सानुम् । आ । अरुहत् । भूरि । अस्पष्ट । कर्त्वम् ॥ तत् । इन्द्रः । अर्थम् । चेतति । यूथेन । वृष्णिः । एजति ॥ २ ॥
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अग्निनामा जामदग्न्यो भगवान् सम्प्रकीर्तितः तस्य रूपबहुत्वेन वीप्सा चैवोपपद्यते हवीमभिर्ऋगाह्वानैराह्वयन्त प्रजापतिम् २६९॥
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निचृद् गायत्री
 
मुक्तामुक्तसमूहेनापि सेव्यो भगवान्
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| verse_line1  = अग्ने देवा इहावह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे असि होता न ईड्यः
..........उच्चतोऽप्युच्चं सामर्थ्यं करणे तव । ततोऽपि भूरि यत्तेन चेतत्यर्थमतो भवान् मुक्तामुक्तसमूहेन शोभते गूढशक्तिमान् २३५
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अग्ने देवान् । इह । आ । वह । जज्ञानः । वृक्तऽबर्हिषे ॥ असि ।  होता । नः । ईड्यः
 
उच्चादुच्चं विरिञ्चादिगतं कर्तृत्वमेव यत् भूरि स्पष्टमभूत्तेन परेशस्य ततश्च सः चेतत्यर्थानशेषांश्च महायूथेन चेष्टते २३६॥ २
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जज्ञानो व्यज्यमानस्तु वृक्तं प्रस्तुतमुच्यते । यजमानो वृक्तबर्हिः  ...................॥ ३  ॥
 
इन्द्रे अस्मदीयस्तुतिश्रवणार्थं प्रार्थना
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
 
विराडनुष्टुप्
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| verse_line1 = ता उशतो विबोधय यदग्ने यासि दूत्यम् देवैरासत्सि बर्हिषि ॥ ४
| verse_line1 = युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा । अथान इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिञ्चर
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तान् उशतः वि बोधय यत् अग्ने यासि दूत्यम् देवैः सत्सि बर्हिषि
 
युक्ष्व हि केशिना हरी इति वृषणा कक्ष्यऽप्रा ॥ अथ नः इन्द्र सोमऽपाः गिराम् उपऽश्रुतिम् चर
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....................बोधयेशेच्छतः सुरान् ॥ २७०॥  देवैः सहोपविशसि.......... 
 
कक्ष्याभिः पूरकौ पुष्ट्या युङ्क्ष्व त्वं केशिनौ हरी ।  अथोपगम्य शृणु नो गिरः ............. ॥
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निचृद्गायत्री
 
भुरिग् उष्णिक्
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| verse_line1 = एहि स्तोमामभि स्वराभि गृणीह्यारुव । ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञञ्च वर्धय
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घृतऽआहवन दीदिऽवः प्रति स्म रिषतः दह अग्ने त्वम् रक्षस्विनः
 
इहि स्तोमान् अभि स्वर अभि । गृणीहि । आ । रुव ब्रह्म । च । नः । वसा इति । सचा । इन्द्र । यज्ञम् वर्धय
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.................... यस्य ते सुघृतं हविः । रिषतो नाशकान् रक्षो जनान् प्रति दहैव च ॥ २७१॥५ 
 
..................अभिस्वर स्तुतिम् २३७
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विराड् गायत्री
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प्रशंसां कुरु शब्दं च पुनर्हर्षान्महत्तरम् । ब्रह्म यज्ञं च नोऽन्तस्थो बहिष्ठश्चैव वर्धय २३८॥४ 
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अग्निना । अग्निः । सम् । इध्यते । कविः । गृहऽपतिः । युवा ॥  हव्यऽवा । जुहुऽआस्यः ॥ ६, २२ ॥
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अग्न्यादीनां दीप्त्यादिगुणदो भगवान्
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यस्याऽस्ये हूयते सोऽग्निः परेशेन समिध्यते । अथवाऽऽहवनीयोऽग्निर्मथितेन समिध्यते  २७२॥६॥
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मेधातिथिना स्वात्मानं प्रति बोधनम्
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उक्थम् । इन्द्राय । शंस्यम् । वर्धनम् । पुरु निःऽसिधे शक्रः । यथा । सुतेषु । नः । ररणत् । सख्येषु । च
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| verse_line1  = कविमग्निमुपस्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे देवममीवचातनम्
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कविम् । अग्निम् । उप । स्तुहि । सत्यऽधर्माणम् । अध्वरे ॥ देवम् ।  अमीवऽचातनम् ॥ ७ ॥
 
नित्यवृद्धविष्णोः वर्धनाभिप्रायः
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सत्यधर्मा सद्गुणभृद्  दुःखघ्नोऽमीवचातनः ।  चातनं कालनं वा स्यात् ..............॥॥
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नित्यवृद्धत्वतो विष्णोर्वर्धनं तु प्रकाशनम् । बहुशत्रून्निष्षिदसौ हरिर्दनुजघातकः २३९
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यः । त्वाम् । अग्नेे । हविःऽपतिः । दूतम् । देव । सपर्यति ॥ तस्य ।  स्म । प्रऽअविता । भव
 
अस्मत्सख्याय शब्दं च चकारास्मासु संस्थितः यथा सुतेषु सोमेषु करोत्यृत्विक्षु च स्थितः २४०॥५
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| verse_line1 = यो अग्निन्देववीतये हविष्मा आविवासति तस्मै पावक मृय ॥ ९
| verse_line1 = तमित्सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये । स शक्र उत नश्शकदिन्द्रो वसु दयमानः ६, १९
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यः अग्निम् देवऽवीतये हविष्मान् आऽविवासति तस्मै पावक मृय
 
तम् इत् सखिऽत्वे र्इमहे तम् । राये । तम् । सुऽवीर्ये सः ।  शक्रः । उत । नः । शकत् । इन्द्रः वसु दयमानः ६, १९
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...................देववीतिस्तु तद्गतिः ॥ २७३॥ आवासयति यस्त्वां च तं त्वं मृय सर्वदा  ॥ ९  ॥
 
शक्रशब्दवाच्यो विष्णुः
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टीकाविवृतिः
तमेव शरणं नित्यं सखित्वाद्यर्थमीमहे । शक्त्यानन्दस्वरूपत्वाच्छक्रः सर्वत्र चाशकत् ।  अस्माकं च सदा वित्तं दददेव प्रवर्तते  ॥ २४१॥६॥
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| verse_line1 = स नः पावक दीदिवोऽग्ने देवा इहावह उप यज्ञं हविश्च नः ॥ १०
| verse_line1 = सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः । गवामपव्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः
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सः नः पावक दीदिऽवः अग्ने देवान् । इह वह ॥ उप यज्ञम् हविः नः १०
 
सुऽविवृतम् सुनिःऽअजम् इन्द्र त्वाऽदातम् इत् यशः ॥  गवाम् अप व्रजम् वृधि कृणुष्व राधः अद्रिऽवः
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त्वत्पूजाविषये देवानावहेन्द्रियमानिनः  ॥ २७४ ॥ १० ॥
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विस्पष्टं सुष्ट्वकाल्यं यशस्त्वद्दत्तमेव हि । गूढं ज्ञानसमूहं त्वं विवृण्वृद्धिं च नः कुरु ॥२४२॥
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| verse_line1  = स नस्स्तवान आभर गायत्रेण नवीयसा ॥ रयिं वीरवतीमिषम् ॥ ११ ॥
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सः । नः । स्तवानः । आ । भर । गायत्रेण । नवीयसा ॥ रयिम् । वीरऽवतीम् । इषम् ॥ ११ ॥
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अद्रिरादरणीयत्वात् प्राणस्तद्वर्तकोऽद्रिवाः हरिः शक्रस्तथाऽद्रीणां छेदनाद्वारणादपि २४३॥ ७ 
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गायत्रेण स्तूयमानो दृश्यमानेन नो रयिम् पुत्रयुक्तामिषं चैव वीर्ययुक्तामथावह ॥२७५ ११
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| verse_line1 = अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः इमं स्तोमञ्जुुषस्व नः १२, २३, १२
| verse_line1 = नहि त्वा रोदसी उभे ऋधायमाणमिन्वतः जेषस्स्वर्वतीरपस्सङ्गा अस्मभ्यन्धूनुहि
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अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिः देवहूतिऽभिः इमम् स्तोमम् जुषस्व नः १२, २३, १२
 
नहि त्वा रोदसी इति उभे इति ऋघायमाणम् । इन्वतः जेषः । स्वःऽवतीः । अपः । सम् गाः अस्मभ्यम् धूनुहि
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ज्वलता तेजसा विश्वदेवाह्वानैर्वृणु स्तुतिम् ॥॥ १२,२३,१२॥
 
न त्वामृघायमाणं हि वर्धमानं तु रोदसी । सम्प्राप्नुतः श्रीभूमी च सहिते वाऽप्रसादतः ॥ २४४॥
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॥ इति द्वादशं सूक्तम् ॥
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== unknown ==
अपः प्रजाः सुखवतीरजयस्त्वद्वशत्वतः । ज्ञानानि सन्धूनुहि च प्रापयोच्चा अपि स्वयम् ॥ २४५॥८॥
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मण्डलम्—१. अध्यायः–१- अनुवाकः–४.सूक्तम्—१३
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| verse_line1 = आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवन्नूचिद्दधिष्व मे गिरः । इन्द्र स्तोममिमम्मम कृष्वायुजश्चिदन्तरम् ॥ ९ ॥
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(सुसमिद्धो द्वादशर्चम्, मेधातिथः काण्वः, गायत्री, आप्रीदेवताः) (इध्मः- सुसमिद्धः अग्निर्देवता)
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आश्रुत्ऽकर्ण । श्रुधि । हवम् । नु । चित् । दधिष्व । मे । गिरः इन्द्र । स्तोमम् । इमम् । मम । कृष्व । युजः । चित् । अन्तरम्
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| verse_line1  = सुसमिद्धो न आवह देवा अग्ने हविष्मते होतः पावक यक्षि च
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सुऽसमिद्धः । नः । आ । वह । देवान् । अग्ने । हविष्मते ॥ होतरिति । पावक । यक्षि । च ॥ १ ॥
 
बहुश्रवणकर्णास्मदाह्वानं शृृणु चादरात् औव च गिरो धेहि मयि स्तोमं मत्कृतम् २४६॥
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अस्मद्धविष्मते देवानाहूय यज चादरात्  ॥२७६ ॥ १ ॥
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प्रियं योगादपि कुरु ........... ॥ ९  ॥
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तनूनपात् अग्निर्देवता
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| verse_line1 = मधुमन्तन्तनूनपाद्यज्ञन्देवेषु नः कवे अद्या कृणुहि वीतये
| verse_line1 = विद्मा हि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवनश्रुतम् वृषन्तमस्य हूमह ऊतिं सहस्रसातमाम् १०
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मधुऽमन्तम् तनूऽनपात् यज्ञम् देवेषु नः कवे अद्य कृणुहि वीतये
 
विद्म हि त्वा वृषन्ऽतमम् वाजेषु हवनऽश्रुतम् वृषन्ऽतमस्य । हूमहे ऊतिम् सहस्रसातमाम् १०
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तनूभ्यो वाक् ततो देवो व्यक्तस्तेन तनूनपात्  ॥ २  ॥
 
मधुच्छन्दसः शतर्चित्वविवरणम्
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नराशंसः अग्निर्देवता
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....................विद्म त्वां शक्तिमत्तमम् । श्रोतारं युत्सु चाह्वानमाह्वयामस्तवावनम् २४७॥
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| verse_line1  = नराशंसमिह प्रियमस्मिन् यज्ञ उपह्वये मधुजिह्वं हविष्कृतम् ॥ ३ ॥
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नराशंसम् । इह । प्रियम् । अस्मिन् । यज्ञे । उप । ह्वये ॥  मधुऽजिह्वम् । हविःऽकृतम् ॥ ३ ॥
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बहुलाभोत्तममिति ............... ॥ १० ॥
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सुसमिद्धादयः अग्नेर्मूर्तयः
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नरैः स्तुत्यो नराशंसो वह्नेरन्याऽथवा तनूः  ॥२७७॥३॥
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.................स्थानान्तरगते ऋचौ । दृष्ट्वेन्द्रं यज्ञगं याभ्यां मधुच्छन्दाः समस्तुवत् । आतून इति तेनैव न विरुद्धा शतर्चिता  ॥ २४८॥॥
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इः-ईतिः अग्निर्देवता
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| verse_line1 = अग्ने सुखतमे रथे देवा ईति आवह असि होता मनुर्हितः
| verse_line1 = आतून इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतम्पिब नव्यमायुः प्रसूतिर कृधी सहस्रसामृषिम् ११
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अग्ने सुखऽतमे रथे देवान् र्इतिः वह असि होता मनुःऽहितः
 
तु नः इन्द्र कौशिक मन्दसानः । सुतम् पिब नव्यम् । आयुः । प्र । सु । तिर । कृधि सहस्रऽसाम् ऋषिम् ११
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अध्यात्मरथविवरणम्
मात्रा कुशैर्गृहीतत्वाज्जन्मन्यासीत् स कौशिकः । गाधित्वाद्वा हिरण्याण्डकोशस्थत्वात् हरिस्तथा ॥ २४९॥
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मनूनां हितत्वेन मनुर्हित इतीरितः  ४ 
 
मन्दसानो नित्यसुखी स्तुत्यमायुश्च नस्तिर । ऋषिं सहस्रलाभं मां कुरु ............... ११
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बर्हिर्देवता
 
वाचां भगवद्विषयकत्वप्रार्थना
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| verse_line1 = स्तृणीत बर्हिरानुषग्घृतपृष्ठम्मनीषिणः यत्रामृतस्य चक्षणम्
| verse_line1 = परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः १२, २०, १०
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स्तृणीत बर्हिः आनुषक् घृतऽपृष्ठम् मनीषिणः यत्र अमृतस्य चक्षणम्
 
परि । त्वा । गिर्वणः गिरः इमाः भवन्तु विश्वतः वृद्धऽआयुम् । अनु । वृद्धयः । जुष्टाः भवन्तु जुष्टयः १२, २०, १०
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आनुषक् सर्वतो देवस्थानं बर्हिः स्तृणीत च ॥२७८॥
 
मधुच्छन्दसा पुनर्दृष्टऋक्सङ्ख्याविवरणम्
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शुद्धस्य विष्णोर्यत् स्थानं घृतपृष्ठं हि तन्मनः । यत्र स्याद् दर्शनं विष्णोर्नित्यामरणधर्मिणः  २७९॥५॥
 
........................त्वा इमा गिरः २५०॥
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| text    =
 
श्रियो दास्यः द्वारो देव्यो देवताः
सर्वदा परितः सन्तु मदीयाः सर्वलाभिनम् । वृद्धिरूपा गिरो जुष्टाः सेवारूपाश्च सन्तु नः ॥ २५१॥१२॥
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| verse_line1  = विश्रयन्तामृतावृधो द्वारो देवीरसश्चतः ॥ अद्या नूनञ्च यष्टवे ६, २४
अष्टावृचः पुनस्तेन दृष्टा अन्यत्र गास्तपः । कुर्वता...............................॥ ॥
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वि । श्रयन्ताम् । ऋतऽवृधः । द्वारः । देवीः । असश्चतः अद्य ।  नूनम् । च । यष्टवे ॥ ६, २४
 
इति दशमं सूक्तम्
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== इन्द्रसूक्तम् ==
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ऋतरूपेण हरिणा समृद्धाया ऋतावृधः । द्वारो देव्यः श्रियो दास्यः श्रयन्तामिह नो मखे ॥ २८०॥
 
मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम् – ११
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मानसे बाह्ययज्ञे वा ह्यसङ्गत्वादसश्चतः । अद्याहनि तथा नूनमद्यैव यजनार्थतः ॥ २८१॥
 
इन्द्रम् अष्टौ, मधुच्छन्दाः ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, इन्द्रो देवता
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द्वारभूतः स भगवानपि साक्षान्मुमुक्षतः । स्त्रीरूपश्च सः ...............            ॥  ॥ ६,२४॥
 
वेदवाचः इन्द्रप्रकाशकाः
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - नक्ता, उषाश्च देवते
 
निचृद् अनुष्टुप्
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नक्तोषसा सुऽपेशसा अस्मिन् यज्ञे उप । ह्वये इदम् ।  नः बर्हिः आऽसदे
 
इन्द्रम् विश्वाः अवीवृधन् समुद्रऽव्यचसम् गिरः रथिऽतम् ।  रथिनाम् । वाजानाम् सत्ऽपतिम् पतिम्
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........नक्ता स्यान्नाक्तो यस्मात् स सर्वतः । उषाः प्रकाशरूपत्वात् सुभद्रे ते उपह्वये २८२
 
.... सम्यगुद्रिक्तगुणव्यक्तिस्तथाऽभिधः  ॥ १५२
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अस्मिन् बर्हिषि संस्थित्यै  .........  ॥ ७  ॥
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निचृद् अनुष्टुप्
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - दैव्यौ होतारौ गार्हपत्याहवनीयौ देवते
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| verse_line1 = ता सुजिह्वा उपह्वये होतारा दैव्या कवी यज्ञन्नो यक्षतामिमम्
| verse_line1 = सख्येत इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते त्वामभि प्रणोनुमो जेतारमपराजितम्
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ता सुऽजिह्वौ उप ह्वये होतारा दैव्या कवी इति यज्ञम् नः यक्षताम् इमम्
 
सख्ये । ते इन्द्र वाजिनः मा भेम शवसः पते त्वाम् । अभि । प्र नोनुमः जेतारम् अपराऽजितम्
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आत्मान्तरात्मेति भगवतो रूपद्वयम्
निचृद् अनुष्टुप्
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| verse_line1 = पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न विदस्यन्त्यूतयः ॥ यदी वाजस्य गोमतस्स्तोतृभ्यो मंहते मघम् ॥ ३ ॥
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......................होतारौ देवगावपि मथ्यमानोऽपरश्चैव वह्नी तद्गोऽथ वा हरिः २८३॥
 
पूर्वीः । इन्द्रस्य । रातयः न । वि । दस्यन्ति । ऊतयः ॥ यदि । वाजस्य । गोऽमतः । स्तोतृऽभ्यः । मंहते । मघम् ॥ ३
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आत्माऽन्तरात्मरूपेण द्विरूपो वा व्यवस्थितः देवेषु यजतां यज्ञमस्मदीयमिमं सदा  २८४॥८॥
 
प्रथमानि महत्त्वेन ते दानान्यवनानि च न भिद्यन्ते न नश्यन्ति गोमदन्नं यशस्तथा ॥ २५३
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निचृद् गायत्री - इा (श्रीः) महीः (भूः भारती च सरस्वती च देवताः
 
यदि मंहते ददातीशः ............. ॥ ३  ॥
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| verse_line1 = इा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः बर्हिस्सीदन्त्वस्रिधः
| verse_line1 = पुराम्भिन्दुर्युवाकविरमितौजा अजायत इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः
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इा सरस्वती मही तिस्रः देवीः मयःऽभुवः बर्हिः सीदन्तु अस्रिधः
 
पुराम् भिन्दुः युवा कविः अमितऽओजाः अजायत इन्द्रः । विश्वस्य । कर्मणः । धर्ता वज्री पुरुऽस्तुतः
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भुरिग् -उष्णिक्
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इा-सरस्वत्यादिनामानः भगवत्स्त्रीरूपविशेषाः
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सरस्वती (भारती) अपि महीशब्दवाच्या
| verse_line1 = त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम् ॥ त्वान्देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ॥ ५ ॥
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ईेड्यत्वाद्धरिः श्रीर्वा भूरूपा सैव चापरा
 
त्वम् । वलस्य । गोऽमतः । अप । अवः । अद्रिऽवः । बिलम् ॥  त्वाम् । देवाः । अबिभ्युषः । तुज्यमानासः आविषुः ॥ ५ ॥
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मही तु भारती नाम वायव्या ब्रह्मणोऽपरा । तद्गतस्तादृशै रूपैः पृथक्स्थो वा हरिस्तथा  ॥२८५ ॥९ ॥
 
वलशब्दार्थकथनम्
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त्वष्टा देवता
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सरमाकथानिरूपणम्
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| verse_line1  = इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुपह्वये ॥ अस्माकमस्तु केवलः ॥ १० ॥
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इह । त्वष्टारम् । अग्रियम् । विश्वऽरूपम् । उप । ह्वये ॥ अस्माकम् । अस्तु । केवलः ॥ १० ॥
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................वलस्तिर्यग्गतिर्धियः वाचामन्यार्थबुद्धेस्तु बिलं मूलं तमो हि यत् । तदपावृतवांस्त्वं च प्रदर्श्य विनिवार्य च २५४
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त्वष्टा तेजस्त्वतो विष्णुर्बलत्वाद्वा समीरितः विश्वरूपकरत्वाच्च विश्वरूपोऽथ पूर्तितः  ॥ २८६ १०
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - वनस्पतिर्देवता
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त्वां हि देवा भयापेताः प्रेर्यमाणास्त्वयैव च । छाद्यमानं गिरा दैत्यैररक्षन्निव सद्गिरा २५५॥
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| verse_line1  = अवसृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः प्रदातुरस्तु चेतनम् ॥ ११ ॥
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अव सृज वनस्पते । देव । देवेभ्यः । हविः ॥ प्र । दातुः ।  अस्तु । चेतनम् ॥ ११
 
इन्द्रस्य गोसवार्थे च समुत्सृष्टा जगत्यपि चर्तुं गावो हृता दैत्यैः सरमारक्षिताः पुरा तस्याः स्वसृत्वमुक्त्वैव तयोच्छिष्टं च गोपयः २५६॥
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वनस्पतिर्भगवान्
तदर्थं पणयो नाम ते दैत्या बलपूर्वकाः । इन्द्रेण निहताः पश्चाज्ज्ञात्वा च सरमाकृतम् ॥ २५७॥
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वननीयपतित्वेन वनस्पतिरितीरितः ज्ञानं तु चेतनम्  ................. ॥ ११
 
ताडयित्वा पदा वक्त्रात् सृते पयसि तां भयात् शरणागतां प्रेषयित्वा दूत्येन पणिनां पुनः २५८॥
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - स्वाहादेवी देवता
 
भित्वा गिरिव्रजं तं च गावो यत्र प्रतिष्ठिताः । निःसारिताः पुनस्ताश्च गोसवेनेष्टमेव च ॥ तदा देवा भीत्यैव परितो जुगुपुः पतिम्  ॥ २५९॥५ ॥
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| verse_line1 = स्वाहा यज्ञङ्कृणोतनेन्द्राय यज्वनो गृहे तत्र देवा उपह्वये १२, १५, १३
| verse_line1 = तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन् उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः
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स्वाहा यज्ञम् कृणोतन इन्द्राय यज्वनः गृहे तत्र देवान् उप ह्वये १२, २५, १३
 
तव । अहम् । शूर रातिऽभिः प्रति आयम् सिन्धुम् आऽवदन् उप । अतिष्ठन्त । गिर्वणः । विदुः ते तस्य कारवः
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| text        =
 
स्वाहाशब्दस्य त्रेधा अर्थविवरणम्
तव दानैरहं सिन्धुं नदीं प्रत्यागमं पुनः । त्वामावदन् स्तुतिपदैर्यज्ञदीक्षार्थमुद्यतः ॥ २६०॥
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.......स्वाहा स्वभागगतिमान् स्मृतः २८७
 
उपातिष्ठन्त कर्तारो विदुस्त्वां यो गिरोदित  ६ 
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अव्ययत्वाद् अमोषश्च  ॥ ॥ १२, २५, १३  ॥
 
वृत्रघ्ने इन्द्रे विद्याप्रार्थना
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== वैश्वदेवसूक्तम् ==
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मण्डलम् –१.अध्यायः–१. अनुवाकः–४.सूक्तम्– १४.
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ऐभिरग्ने द्वादश, मेधातिथिः काण्वः ऋषिः, गायत्री विश्वेदेवाः देवताः
 
मायाभिः । इन्द्र । मायिनम् । त्वम् । शुष्णम् । अव । अतिरः ॥  विदुः । ते । तस्य । मेधिराः । तेषाम् । श्रवांसि । उत् । तिर ॥ ७ ॥
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सोमपानार्थं विश्वेदेवप्रार्थना
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शक्तिभिः शक्तिमन्तं त्वं शोषकं वृत्रमातिरः २६१॥
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| verse_line1  = ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिस्सोमपीतये देवेभिर्याहि यक्षि च ॥ १ ॥
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आ । एभिः । अग्ने । दुवः । गिरः । विश्वेभिः । सोमऽपीतये ॥ देवेभिः । याहि यक्षि । च
 
तमो वा त्वां विदुर्मेधारतास्तेषां श्रवांसि च विद्या उच्चैस्तरां देहि  .................७ 
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...............कामदोहा दुवः स्मृताः ॥ १ ॥
 
निचृदनुष्टुप्
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| verse_line1 = आ त्वा कण्वा अहूषत गृणन्ति विप्र ते धियः देवेभिरग्न आगहि ॥ २
| verse_line1 = इन्द्रमीशानमोजसाऽभि स्तोमा अनूषत सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ८,२१,११,३॥
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आ । त्वा । कण्वाः । अहूषत । गृणन्ति । विप्र । ते । धियः ॥  देवेभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ २ ॥
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इन्द्रम् । ईशानम् । ओजसा । अभि । स्तोमाः । अनूषत सहस्रम् । यस्य । रातयः । उत । वा । सन्ति । भूयसीः ८, २१, ११, ३ ॥
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| verse_line1  = इन्द्रवायू बृहस्पतिम्मित्राग्निम्पूषणम्भगम् आदित्यान्मारुतङ्गणम् ॥ ३ ॥
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इन्द्रवायू इति । बृहस्पतिम् । मित्रा । अग्निम् । पूषणम् । भगम् ॥  आदित्यान् । मारुतम् । गणम् ॥ ३ ॥
 
........यस्तुवन्ति त्वां सहौजसा  ॥ २६२ ॥  ८, २१, ११, ३ ॥
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पूषा-भग-आदित्य-मारुतादिशब्दनिर्वचनम्
॥ इति एकादशं सूक्तम् ॥
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बृहन्पतिर्बृहत्या वा वाच एव बृहस्पतिः ॥२८८॥
 
इति तृतीयोऽनुवाकः
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मित्रेति मित्रावरुणौ पूषा नाम स पोषणात् । पूर्णत्वाद्वा भगः प्रोक्तः पूर्णैश्वर्यादिकत्वतः ॥ २८९ ॥
 
अनुक्रमणिकोक्तऋषिविषये मानाभावः
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आदिस्थत्वात् स आदित्य आददानः प्रयाति वा बहुरूपत्वतश्चैव मानोक्तत्वात्तु मारुतः  ॥ २९० ॥ ३ 
 
ऋक्संहितायाः स्वाध्यायात् प्रबन्धाद्व्यासनिर्मितात् ब्राह्मणेभ्यस्तथा मानात् प्रोक्ताः स्युर्मुनयोऽत्र ये २६३॥
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| verse_line1  = प्रवो भ्रियन्त इन्दवो मत्सरा मादयिष्णवः ॥ द्रप्सा मध्वश्चमूषदः
श्रुत्यभावादलिङ्गाच्च मुनिर्नान्यः प्रतीयते । श्रुतिलिङ्गान्यता यावत्तावत्पूर्वा प्रमा भवेत् २६४
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प्र वः । भ्रियन्ते । इन्दवः । मत्सराः । मादयिष्णवः ॥ द्रप्साः ।  मध्वः । चमूऽसदः ॥ ४
 
शतर्ग्भिरुत्तराभिस्तु वह्निनामानमच्युतम् अस्तौन्मेधातिथिस्ताभ्य उत्तरा अपि तद्-दृशः २६५॥
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इन्दुशब्दः सोम-मनोवृत्तिपरः
अन्यत्रगास्तपस्यन् स ता ददर्श कदाचन । कालस्थानान्तरत्वं चेत्सङ्ख्यातोऽभ्यधिकं भवेत् ॥ २६६॥
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मत्सरा मदकारित्वात्ताच्छील्यादुत्तरं पदम् द्रप्सास्ते द्रवणाच्चैव चमसस्थाश्चमूषदः । शिरश्च चमसं प्रोक्तमिष्टदानात् तथेन्दवः  ॥ २९१॥ ४ 
 
अन्यस्थानगता अन्यदृष्टा अप्यत्रगा यदि सङ्ख्यान्तर्भावमेष्यन्ति ता इतोपगता यतः २६७॥
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== अग्निसूक्तम् ==
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मण्डलम्—१.अध्यायः–१.अनुवाकः–४. सूक्तम्–१२.
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ईते । त्वाम् । अवस्यवः । कण्वासः । वृक्तऽबर्हिषः ॥  हविष्मन्तः । अरम्ऽकृतः । ५ ॥
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अवस्युर्यजमानः स्यादवनार्थप्रवृत्तितः । आत्मस्थं वा बहुवचो बहवो मुनयोऽत्र वा ॥२९२॥
 
मेधातिथिः काण्वः ऋषिः, गायत्री च्छन्दः, अग्निः देवता
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उत्तराणां वचस्त्वेन स्वयं वदति चेश्वरः । अरङ्कृतोऽतिकर्तारस्त्वलङ्कर्तार एव वा  ॥ २९३॥५ ॥
 
अग्निर्देवदूतः
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| verse_line1 = घृतपृष्ठा मनोयुजो ये त्वा वहन्ति वह्नयः ॥ आ देवान् सोमपीतये ॥ ६, २६
| verse_line1 = अग्निन्दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्
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घृतऽपृष्ठाः मनःऽयुजः ये त्वा वहन्ति । वह्नयः देवान् सोमऽपीतये ६, २६
 
अग्निम् दूतम् वृणीमहे होतारम् विश्वऽवेदसम् अस्य यज्ञस्य सुऽक्रतुम्
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दूतलक्षणम्
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स्निग्धपृष्ठाः समारूढा हरिणा वा विदोषिणा मनोमात्रेण योज्याश्च त्वां देवांश्च वहन्ति ये २९४॥६॥
 
यज्ञभागार्थमत्रस्थो देवैः सम्प्रेषितो यतः । दूतोऽग्निर्वासुदेवश्च तत्तत्प्रार्थितकृद्यतः विश्ववेदाः स सर्वज्ञो यज्ञज्ञो यज्ञसुक्रतुः २६८ ॥ १ ॥
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अग्न्यन्तर्गतः अग्निनामा च परशुरामः
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = तान्यजत्रा ऋतावृधोऽग्ने पत्नीवतस्कृधि मध्वस्सुजिह्व पायय
| verse_line1 = अग्निमग्निं हवीमभिस्सदा हवन्त विश्पतिम् हव्यवाहम्पुरुप्रियम्
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तान् यजत्रान् ऋतऽवृधः अग्ने पत्नीऽवतः । कृधि ॥ मध्वः सुऽजिह्व पायय
 
अग्निम्ऽअग्निम् हवीमऽभिः सदा हवन्त विश्पतिम् हव्यऽवाहम् पुरुऽप्रियम्
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तैर्देवान् यजतः स्तोतॄन् ज्ञातेन ब्रह्मणैधितान् पत्नीभिर्योजया गन्तुं सह मध्वश्च पायय
 
अग्निनामा जामदग्न्यो भगवान् सम्प्रकीर्तितः । तस्य रूपबहुत्वेन वीप्सा चैवोपपद्यते हवीमभिर्ऋगाह्वानैराह्वयन्त प्रजापतिम् २६९॥ २
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उदात्तस्वरार्थनिरूपणणम्
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निचृद् गायत्री
निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = ये यजत्रा य ईड्यास्तेते पिबन्तु जिह्वया मधोरग्ने वषकृति
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ये यजत्राः ये ईड्याः ते ते पिबन्तु जिह्वया ॥ मधोः अग्ने वषऽकृति
 
अग्ने देवान् इह वह जज्ञानः वृक्तऽबर्हिषे ॥ असि ।  होता नः ईड्यः
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ते षष्ठ्यतोऽनुदात्तः स्यादुदात्तो बहुवाचकः आवृत्तस्तु भवेदर्थस्ते पिबन्तु वषकृतौ २९६॥८
 
जज्ञानो व्यज्यमानस्तु वृक्तं प्रस्तुतमुच्यते यजमानो वृक्तबर्हिः ...................
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = आकीं सूर्यस्य रोचनाद्विश्वान् देवा उषर्बुधः विप्रो होतेह वक्षति
| verse_line1 = ता उशतो विबोधय यदग्ने यासि दूत्यम् देवैरासत्सि बर्हिषि
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आकीम् सूर्यस्य रोचनात् विश्वान् देवान् उषःऽबुधः ॥ विप्रः होता इह वक्षति
 
तान् उशतः वि बोधय यत् अग्ने । यासि । दूत्यम् । देवैः सत्सि बर्हिषि
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सूर्यस्य रोचनात् स्वर्गादावक्षत्यग्निरिन्दुपान् । उषःप्रकाशनाद् ब्रह्म तद्विदस्त उषर्बुधः  ॥ ९  ॥
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....................बोधयेशेच्छतः सुरान् ॥ २७०॥  देवैः सहोपविशसि.......... ४ 
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विश्वेभिः । सोम्यम् । मधु । अग्ने । इन्द्रेण । वायुना ॥ पिब । मित्रस्य । धामऽभिः ॥ १० ॥
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निचृद्गायत्री
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देवास्ते विष्णुधामत्वान्मित्रधामान ईरिताः  ॥ २९७ ॥ १० ॥
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| verse_line1 = त्वं होता मनुर्हितोऽग्ने यज्ञेषु सीदसि सेम नो अध्वरं यज ॥ ११
| verse_line1 = घृताहवन दीदिवः प्रतिष्म रिषतो दह ॥ अग्ने त्वं रक्षस्विनः
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त्वम् होता मनुःऽहितः अग्ने यज्ञेषु सीदसि सः इमम् । नः । अध्वरम् यज ११
 
घृतऽआहवन दीदिऽवः प्रति स्म रिषतः दह अग्ने त्वम् रक्षस्विनः
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निचृद् गायत्री
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.................... यस्य ते सुघृतं हविः । रिषतो नाशकान् रक्षो जनान् प्रति दहैव च ॥ २७१॥५
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| verse_line1 = युक्ष्वा ह्यरुषी रथे हरितो देव रोहितः ॥ ताभिर्देवा इहावह ॥ १२, २७, १४
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| text =
युक्ष्व । हि । अरुषीः । रथे । हरितः । देव । रोहितः ॥ ताभिः । देवान् । इह । आ । वह ॥ १२ ॥
 
विराड् गायत्री
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| verse_id = RG_C01_S14_V12
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अग्निवाहा अश्वतर्यो दूर्वापद्माग्निसप्रभाः । लोहिताः  क्वचिदश्वाश्च  रोहिन्मृग्योऽपि कुत्रचित् २९८॥ १२,२७,१४॥
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| verse_line1 = अग्निनाग्निस्समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥ ६, २२ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
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इति चतुर्दशं सूक्तम्
 
अग्निना । अग्निः । सम् । इध्यते । कविः । गृहऽपतिः । युवा ॥  हव्यऽवा । जुहुऽआस्यः ६, २२
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== ऋतुसूक्तम् ==
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| title        = ऋतुसूक्तम्
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| text =
मण्डलम् -१अध्यायः–१.अनुवाकः–४. सूक्तम्–१५
 
अग्न्यादीनां दीप्त्यादिगुणदो भगवान्
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(इन्द्रसोमं द्वादशर्चम्, मेधातिथिः काण्वः, गायत्री) (पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री)  ऋतवः(कालाभिमानिदेवताः, इन्द्रश्च देवताः
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यस्याऽस्ये हूयते सोऽग्निः परेशेन समिध्यते । अथवाऽऽहवनीयोऽग्निर्मथितेन समिध्यते २७२॥६॥
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| verse_line1 = इन्द्र सोमम्पिब ऋतुना त्वा विशन्त्विन्दवः मत्सरासस्तदोकसः ॥ १ ॥
| commentary1  = rigbhashyam
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इन्द्र । सोमम् । पिब । ऋतुना । आ । त्वा । विशन्तु । इन्दवः ॥  मत्सरासः । तत्ऽओकसः ॥ १ ॥
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मेधातिथिना स्वात्मानं प्रति बोधनम्
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ऋतुशब्दार्थजिज्ञासा
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पोतृदेवताः मरुतः
| verse_line1 = कविमग्निमुपस्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे ॥ देवममीवचातनम् ॥ ७ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
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ऋतुर्मार्गस्तु नेतृत्वान्नेष्टाऽग्निर्हरिरेव वा ईष्टे न कश्चिदस्येति ग्ना नद्यश्च समीरिताः गतिशीलत्वतो ग्नास्ता ज्ञातृनेतृत्वतो हरिः ॥२९९॥
 
कविम् । अग्निम् । उप । स्तुहि । सत्यऽधर्माणम् । अध्वरे ॥ देवम् अमीवऽचातनम् ॥ ७
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गमनान्नयनाद्वा ग्ना ..............
 
सत्यधर्मा सद्गुणभृद्  दुःखघ्नोऽमीवचातनः ।  चातनं कालनं वा स्यात् ..............॥॥
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....................ऋतुपात्रमृतुस्तथा । सोमास्तदोकसः प्रोक्ता ऋतुपात्रस्थिता यतः ॥३००॥
| verse_type = mantra
| verse_line1 = यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतन्देव सपर्यति ॥ तस्य स्म प्राविता भव ॥ ८ ॥
}}
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पत्नीनेतृत्वतो नेष्टा नेष्टर्त्विक् सम्प्रकीर्तितः
 
यः । त्वाम् । अग्नेे । हविःऽपतिः । दूतम् । देव । सपर्यति ॥ तस्य स्म । प्रऽअविता । भव ॥ ८ ॥
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ज्ञापयन्ति स्वलिङ्गानीत्यृतवः ष  प्रकीर्तिताः ॥३०१॥
 
यः । अग्निम् । देवऽवीतये । हविष्मान् । आऽविवासति ॥ तस्मै । पावक । मृय ॥ ९ ॥
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पावनाच्चैव पोतारो मरुतः पोतृदेवताः । अग्निस्तु देवतानेष्ठुस्त्वष्टेन्द्रो विष्णुरेव वा  ३०२॥१,२,३
 
...................देववीतिस्तु तद्गतिः ॥ २७३॥ आवासयति यस्त्वां च तं त्वं मृय सर्वदा  ९ 
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(भुरिक् गायत्री) ऋतवः, मरुतश्च देवताः
 
टीकाविवृतिः
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| verse_line1 = स नः पावक दीदिवोऽग्ने देवा इहावह उप यज्ञं हविश्च नः १०
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मरुतः पिबत ऋतुना पोत्रात् यज्ञम् पुनीतन यूयम् हि स्थ सुऽदानवः
 
सः । नः । पावक दीदिऽवः अग्ने देवान् इह । आ वह उप । यज्ञम् हविः नः १०
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ऋतवः, नेष्टा च (विष्णुः, इन्द्रः, अग्निः, त्वष्टा च)देवताः
 
त्वत्पूजाविषये देवानावहेन्द्रियमानिनः  ॥ २७४ ॥ १० ॥
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| verse_line1 = अभि यज्ञङ्गृृणीहि नोऽग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना त्वं हि रत्नधा असि
| verse_line1 = स नस्स्तवान आभर गायत्रेण नवीयसा रयिं वीरवतीमिषम् ११
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अभि यज्ञम् । गृणीहि नः ग्नावः नेष्टरिति पिब ऋतुना त्वम् हि रत्नऽधाः । असि
 
सः नः स्तवानः भर गायत्रेण नवीयसा रयिम् वीरऽवतीम् इषम् ॥ ११
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(भुरिग् गायत्री) ऋतवः, अग्निश्च देवताः
 
गायत्रेण स्तूयमानो दृश्यमानेन नो रयिम् । पुत्रयुक्तामिषं चैव वीर्ययुक्तामथावह ॥२७५ ॥ ११ ॥
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अग्ने । देवान् । इह । आ । वह सादय योनिषु त्रिषु परि भूष पिब ऋतुना
 
अग्ने । शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिः देवहूतिऽभिः इमम् स्तोमम् जुषस्व नः १२, २३, १२
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प्राग्वंशादिस्थानत्रयनिरूपणम्
ज्वलता तेजसा विश्वदेवाह्वानैर्वृणु स्तुतिम् ॥॥ १२,२३,१२॥
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वेद्युत्तरासदश्चैव प्राग्वंशो योनयः स्मृताः । भूष भूषय नो यज्ञम् ........ ॥ ४  ॥
 
॥ इति द्वादशं सूक्तम् ॥
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== unknown ==
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मण्डलम्—१. अध्यायः–१- अनुवाकः–४.सूक्तम्—१३
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ऋतवः, इन्द्रश्च देवताः
 
(सुसमिद्धो द्वादशर्चम्, मेधातिथः काण्वः, गायत्री, आप्रीदेवताः) (इध्मः- सुसमिद्धः अग्निर्देवता)
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ब्राह्मणात् इन्द्र राधसः पिब सोमम् ऋतून् अनु । तव । इत् हि सख्यम् अस्तृतम्
 
सुऽसमिद्धः नः वह देवान् अग्ने हविष्मते ॥ होतरिति पावक यक्षि
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..................ब्राह्मणाच्छंसिपात्रतः । पिबेन्द्र नो राधसोऽर्थे त्वामनु त्वृतुदेवताः ॥३०३॥
 
अस्मद्धविष्मते देवानाहूय यज चादरात्  ॥२७६ ॥ १ ॥
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स्तृतं छिन्नमिति प्रोक्तम् .......... ॥ ५  ॥
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तनूनपात् अग्निर्देवता
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ऋतवः, मित्रावरुणौ च देवताः
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युवम् दक्षम् धृतऽव्रता मित्रावरुणा दुःऽदभम् ऋतुना यज्ञम् अशाथे इति ६, २८
 
मधुऽमन्तम् । तनूऽनपात् यज्ञम् देवेषु नः कवे अद्य कृणुहि वीतये
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.............अस्तभ्यं दुर्दभं स्मृतम् ।  दक्षाख्यं यजमानं चापीशाथे यज्ञमेव च ।  सोमं पीत्वर्तुपात्रेण सहवा तेन चर्तुना ६, २८
 
तनूभ्यो वाक् ततो देवो व्यक्तस्तेन तनूनपात्
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ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
 
नराशंसः अग्निर्देवता
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द्रविणःऽदाः द्रविणसः ग्रावऽहस्तासः अध्वरे यज्ञेषु । देवम् र्इते
 
नराशंसम् इह प्रियम् अस्मिन् । यज्ञे । उप । ह्वये ॥  मधुऽजिह्वम् हविःऽकृतम्
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होता च होतृकाश्चैव द्रविणोदा द्रवीणसः । अग्निश्चैवाग्नयस्तेषां देवता विष्णुमीते  ॥३०५॥ ७ ॥
 
सुसमिद्धादयः अग्नेर्मूर्तयः
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ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
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नरैः स्तुत्यो नराशंसो वह्नेरन्याऽथवा तनूः ॥२७७॥३॥
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द्रविणःऽदाः । ददातु । नः । वसूनि । यानि । शृण्विरे ॥ देवेषु । ता । वनामहे ॥ ८ ॥
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इः-ईतिः अग्निर्देवता
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ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
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द्रविणःऽदाः पिपीषति जुहोत प्र तिष्ठत नेष्ट्रात् ऋतुऽभिः इष्यत
 
अग्ने । सुखऽतमे रथे देवान् र्इतिः वह असि होता मनुःऽहितः
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पातुमिच्छति सोमं स सोमास्तस्मै प्रतिष्ठिताः । ऋतुपात्रैर्देवताभिः सहैवैनमभीप्सत  ॥३०६॥ ९ ॥
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अध्यात्मरथविवरणम्
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यत् । त्वा । तुरीयम् । ऋतुऽभिः । द्रविणःऽदः । यजामहे अध । स्म । नः । ददिः । भव ॥ १०
 
मनूनां च हितत्वेन मनुर्हित इतीरितः 
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चतुर्थवारमपि यत्त्वां यजामो ददिर्भव ॥ १० ॥
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बर्हिर्देवता
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(पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री)  - ऋतवः, अश्विनौ च देवते
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अश्विना पिबतम् मधु दीद्यग्नी इति दीदिऽअग्नी शुचिऽव्रता ॥  ऋतुना यज्ञऽवाहसा ११
 
स्तृणीत बर्हिः आनुषक् घृतऽपृष्ठम् मनीषिणः यत्र । अमृतस्य चक्षणम्
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.................दीद्यग्नी इति दीप्ताग्नी ॥ ११ ॥
 
आनुषक् सर्वतो देवस्थानं बर्हिः स्तृणीत च ॥२७८॥
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(पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री)  -  ऋतवः, विष्णुः अग्निश्च देवताः
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शुद्धस्य विष्णोर्यत् स्थानं घृतपृष्ठं हि तन्मनः । यत्र स्याद् दर्शनं विष्णोर्नित्यामरणधर्मिणः २७९॥५॥
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गार्हऽपत्येन । सन्त्य । ऋतुना । यज्ञऽनीः । असि ॥ देवान् । देवऽयते । यज ॥ १२, २९, १५ ॥
 
श्रियो दास्यः द्वारो देव्यो देवताः
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मासभेदेन भगवतो द्वे द्वे रूपे
| verse_line1 = विश्रयन्तामृतावृधो द्वारो देवीरसश्चतः ॥ अद्या नूनञ्च यष्टवे ॥ ६, २४ ॥
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...............सन्त्योऽग्निः सन्ततत्वतः ॥३०७॥
 
वि । श्रयन्ताम् । ऋतऽवृधः । द्वारः । देवीः । असश्चतः ॥ अद्य ।  नूनम् । च । यष्टवे ॥ ६, २४ ॥
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विष्णुर्वर्त्वधिपो विष्णुः केशवादिस्वरूपतः ‘ग्रहान् सोमस्य मिमते’ इति तस्यैव कथ्यते ॥ गार्हपत्येन पात्रेण यजमानस्तु देवयन् ३०८॥
 
ऋतरूपेण हरिणा समृद्धाया ऋतावृधः द्वारो देव्यः श्रियो दास्यः श्रयन्तामिह नो मखे २८०॥
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देवान्पातीति .............  ॥ १२, २९, १५ 
 
मानसे बाह्ययज्ञे वा ह्यसङ्गत्वादसश्चतः । अद्याहनि तथा नूनमद्यैव यजनार्थतः २८१॥
}}
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(इति एकोनविंशो वर्गः – पञ्चदशं सूक्तम् )
 
द्वारभूतः स भगवानपि साक्षान्मुमुक्षतः । स्त्रीरूपश्च सः ...............            ॥  ॥ ६,२४॥
}}
}}


== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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| chapter_num  = 1
| section_num  = 16
| title        = ऐन्द्रसूक्तम्
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मण्डलम्—१.अध्यायः–१. अनुवाकः–४. सूक्तम्– १६.
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - नक्ता, उषाश्च देवते
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आत्वा नवर्चं, मेधातिथिः काण्वः  गायत्री(३ पिपीलिका मध्या निचृत्,९ विरा) इन्द्रो देवता
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| verse_line1 = आ त्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये इन्द्र त्वा सूरऽचक्षसः
| verse_line1 = नक्तोषासा सुपेशसाऽस्मिन् यज्ञ उपह्वये इदन्नो बर्हिरासदे
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त्वा वहन्तु हरयः वृषणम् सोमऽपीतये इन्द्र त्वा सूरऽचक्षसः
 
नक्तोषसा सुऽपेशसा अस्मिन् यज्ञे उप ह्वये इदम् ।  नः बर्हिः आऽसदे
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..............सुष्ठूरीकुर्वति विषयान् यतः । चक्षूंषीन्द्रस्य हरयस्तेनोक्ताः सूरचक्षसः  ॥ ३०९ ॥ १ ॥
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........नक्ता स्यान्नाक्तो यस्मात् स सर्वतः । उषाः प्रकाशरूपत्वात् सुभद्रे ते उपह्वये २८२
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| verse_line1  = इमा धाना घृतस्नुवो हरी इहोपवक्षतः इन्द्रं सुखतमे रथे २ ॥
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इमाः । धानाः । घृतस्नुवः । हरी इति । इह । उप । वक्षतः ॥ इन्द्रम् । सुखऽतमे । रथे ॥ २ ॥
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अस्मिन् बर्हिषि संस्थित्यै  .........  ॥ ७  ॥
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धानाशब्दस्याध्यात्मार्थनिर्वचनम्
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भक्तिस्नुतानि धानानि बुद्धेर्धाना इति ह्यपि  ॥२  ॥
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पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - दैव्यौ होतारौ गार्हपत्याहवनीयौ देवते
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = इन्द्रम् प्रातर्हवामह इन्द्रम् प्रयत्यध्वरे इन्द्रं सोमस्य पीतये
| verse_line1 = ता सुजिह्वा उपह्वये होतारा दैव्या कवी यज्ञन्नो यक्षतामिमम्
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इन्द्रम् प्रातः हवामहे इन्द्रम् प्रऽयति अध्वरे इन्द्रम् सोमस्य पीतये
 
ता सुऽजिह्वौ उप ह्वये होतारा दैव्या । कवी इति यज्ञम् । नः यक्षताम् इमम्
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आत्मान्तरात्मेति भगवतो रूपद्वयम्
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सोमपीतिशब्दः तृतीयसवनवाची
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‘प्रातः’ इत्यादिवाक्येन सवनत्रयमीरितम् समाप्तत्वात् सोमपीतिस्तृतीयं सवनं स्मृतम् ॥३१०॥
 
......................होतारौ देवगावपि मथ्यमानोऽपरश्चैव वह्नी तद्गोऽथ वा हरिः ॥ २८३॥
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सदा ........ ॥ ३  ॥
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आत्माऽन्तरात्मरूपेण द्विरूपो वा व्यवस्थितः ।  देवेषु यजतां यज्ञमस्मदीयमिमं सदा २८४॥८॥
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| verse_line1 = (१६२) उप नस्सुतमागहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः ॥ सुते हि त्वा हवामहे ॥ ४
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उप । नः । सुतम् । आ । गहि । हरिऽभिः । इन्द्र । केशिऽभिः ॥ सुते । हि । त्वा । हवामहे ॥ ४ ॥
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निचृद् गायत्री - इा (श्रीः) महीः (भूः भारती च सरस्वती च देवताः
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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सोमपाने गौरमृगदृष्टान्तः
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| verse_line1 = सेमन्नः स्तोममागह्युपेदं सवनं सुतम् गौरो न तृषितः पिब ५, ३०
| verse_line1 = इा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः बर्हिस्सीदन्त्वस्रिधः
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सः । इमम् । नः । स्तोमम् । आ । गहि । उप । इदम् । सवनम् । सुतम् ॥ गौरः । न । तृषितः । पिब ॥ ५, ३० ॥
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इा । सरस्वती । मही । तिस्रः । देवीः । मयःऽभुवः ॥ बर्हिः । सीदन्तु । अस्रिधः
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| verse_line1 = इमे सोमास इन्दवस्सुतासो अधि बर्हिषि ॥ ता इन्द्र सहसे पिब
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इमे । सोमासः । इन्दवः । सुतासः । अधि । बर्हिषि ॥ तान् । इन्द्र । सहसे । पिब ॥ ६ ॥
 
इा-सरस्वत्यादिनामानः भगवत्स्त्रीरूपविशेषाः
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सरस्वती (भारती) अपि महीशब्दवाच्या
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भगवतो वृद्धिर्नास्तीति निरूपणम्
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| text =
..... विष्णुविवक्षायां यजमानबलं सहः तदिष्टस्यैव दानाय तद्गुणव्यक्तिरेव वा ॥ ३११॥
 
ईेड्यत्वाद्धरिः श्रीर्वा भूरूपा सैव चापरा
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‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्पूर्णात् पूर्णमुदच्यते’ । ‘हेयोपादेयरहितगुणपूर्णो हरिः सदा अनुग्रहव्यक्तिरेव तद्गुणानां च नान्यथा’॥ ३१२
 
मही तु भारती नाम वायव्या ब्रह्मणोऽपरा तद्गतस्तादृशै रूपैः पृथक्स्थो वा हरिस्तथा  ॥२८५ ॥९
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इत्यादि वेदवाक्येभ्यो नैव वृद्धिर्हरेः क्वचित्  ॥ ६  ॥
 
त्वष्टा देवता
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| verse_line1 = अयन्ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शन्तमः अथा सोमं सुतम् पिब
| verse_line1 = इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुपह्वये अस्माकमस्तु केवलः १०
| commentary1 = rigbhashyam
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अयम् । ते । स्तोमः । अग्रियः । हृदिऽस्पृक् । अस्तु । शम्ऽतमः ॥  अथ । सोमम् । सुतम् । पिब ॥ ७ ॥
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इह । त्वष्टारम् । अग्रियम् । विश्वऽरूपम् । उप । ह्वये अस्माकम् । अस्तु । केवलः १०
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| verse_line1  = विश्वमित्सवनं सुतमिन्द्रो मदाय गच्छति वृत्रहा सोमपीतये
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}}


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| text =
विश्वम् । इत् । सवनम् सुतम् । इन्द्रः । मदाय । गच्छति वृत्रऽहा । सोमऽपीतये
 
त्वष्टा तेजस्त्वतो विष्णुर्बलत्वाद्वा समीरितः विश्वरूपकरत्वाच्च विश्वरूपोऽथ पूर्तितः  २८६ १०
}}
}}


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| text =
विराड् गायत्री
 
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - वनस्पतिर्देवता
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}}


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| verse_line1 = सेमन्नः काममापृण गोभिरश्वैश्शतक्रतो स्तवाम त्वा स्वाध्यः ९, ३१, १६
| verse_line1 = अवसृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः प्रदातुरस्तु चेतनम् ११
| commentary1   = rigbhashyam
| commentary1 = rigbhashyam
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}}


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| text =
कामम् पृण गोभिः अश्वैः शतक्रतो इति शतऽक्रतो ॥  स्तवाम । त्वा सुऽआध्यः ९, ३१, १६
 
अव सृज वनस्पते देव देवेभ्यः हविः प्र । दातुः । अस्तु चेतनम् ११
}}
}}


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पृण सम्पूरय स्वाध्यः सुधीतय इतीरिताः ॥३१३ ॥  ९, ३१, १६  ॥
 
वनस्पतिर्भगवान्
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}}
}}


== ऐन्द्रावरुणसूक्तम् ==
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| document_id  = RG
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| section_num  = 17
| title        = ऐन्द्रावरुणसूक्तम्
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| text =
मण्डलम्–१. अध्यायः-१.अनुवाकः–४– सूक्तम् – १७.
 
वननीयपतित्वेन वनस्पतिरितीरितः । ज्ञानं तु चेतनम्  ................. ॥ ११ ॥
}}
}}


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| text     =
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(इन्द्रावरुणयोर्नवर्चम् , मेधातिथिः काण्वः, छन्दः– गायत्री, २ यवमध्या विरा,  ४ पादनिचृत्(ह्रसीयसी),६ निचृत्, ५ भुरिगार्ची, ८ पिपीलिकामध्या निचृत्,  इन्द्रावरुणौ देवते)
 
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - स्वाहादेवी देवता
}}
}}


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| verse_line1 = (१६८) इन्द्रावरुणयोरहं सम्राजोरव आ वृणे ता नो मृात र्इदृशे
| verse_line1 = स्वाहा यज्ञङ्कृणोतनेन्द्राय यज्वनो गृहे तत्र देवा उपह्वये १२, १५, १३
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| commentary1 = rigbhashyam
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| text =
इन्द्रावरुणयोः । अहम् । सम्ऽराजोः । अवः । आ । वृणे ॥ ता । नः । मृातः । र्इदृशे ॥ १ ॥
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स्वाहा । यज्ञम् । कृणोतन । इन्द्राय । यज्वनः । गृहे तत्र ।  देवान् । उप । ह्वये ॥ १२, २५, १३
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अविकारेण संस्थानमीदृक्त्वं नाम कीर्तितम्
}}
}}


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यवमध्या विरा गायत्री
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स्वाहाशब्दस्य त्रेधा अर्थविवरणम्
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| verse_line1  = गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः ॥ धर्तारा चर्षणीनाम् ॥ २ ॥
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गन्तारा । हि । स्थः । अवसे । हवम् । विप्रस्य । माऽवतः ॥ धर्तारा । चर्षणीनाम्
 
.......स्वाहा स्वभागगतिमान् स्मृतः २८७
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मावतो ज्ञानयुक्तस्य प्रजाश्चर्षणयः स्मृताः  ॥ २  ॥
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अव्ययत्वाद् अमोषश्च ॥ ॥ १२, २५, १३ 
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| verse_line1 = अनुकामन्तर्पयेथामिन्द्रावरुण राय आ ता वान्नेदिष्ठमीमहे
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== वैश्वदेवसूक्तम् ==
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अनुऽकामम् । तर्पयेथाम् । इन्द्रावरुणा । रायः । आ ॥ ता । वाम् । नेदिष्ठम् । र्इमहे ॥ ३ ॥
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मण्डलम् –१.अध्यायः–१. अनुवाकः–४.सूक्तम्– १४.
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नेदिष्ठत्वं समीपत्वं क्षिप्रं शरणमीमहे  ॥३१४॥ ३  ॥
 
ऐभिरग्ने द्वादश, मेधातिथिः काण्वः ऋषिः, गायत्री विश्वेदेवाः देवताः
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पादनिचृद् गायत्री
 
सोमपानार्थं विश्वेदेवप्रार्थना
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| verse_line1 = युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम् भूयाम वाजदाव्नाम्
| verse_line1 = ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिस्सोमपीतये देवेभिर्याहि यक्षि च
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युवाकु हि शचीनाम् युवाकु सुऽमतीनाम् भूयाम वाजऽदाव्नाम्
 
एभिः अग्ने दुवः गिरः । विश्वेभिः । सोमऽपीतये देवेभिः । याहि । यक्षि
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युवयोरेव वाक्यानां सुमतीनां च सर्वशः । भवेमान्नप्रदातॄणां सर्वदा विषया वयम्  ॥ ३१५॥४  ॥
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...............कामदोहा दुवः स्मृताः ॥ १ ॥
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भुरिगार्ची ह्रसीयसी - गायत्री
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| verse_line1 = इन्द्रस्सहस्रदाव्नां वरुणश्शंस्यानाम् क्रतुर्भवत्युक्थ्यः ५, ३२
| verse_line1 = आ त्वा कण्वा अहूषत गृणन्ति विप्र ते धियः देवेभिरग्न आगहि
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इन्द्रः सहस्रऽदाव्नाम् वरुणः शंस्यानाम् क्रतुः भवति उक्थ्यः ५, ३२
 
आ । त्वा । कण्वाः । अहूषत । गृणन्ति विप्र ते धियः देवेभिः । अग्ने गहि
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क्रतुः प्रधान उक्थ्यश्च शस्त्रैस्स्तुत्यो विशेषतः  ५,३२ 
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| verse_line1 = इन्द्रवायू बृहस्पतिम्मित्राग्निम्पूषणम्भगम् आदित्यान्मारुतङ्गणम् ३ ॥
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निचृद् गायत्री
 
इन्द्रवायू इति । बृहस्पतिम् । मित्रा । अग्निम् । पूषणम् । भगम् ॥  आदित्यान् । मारुतम् । गणम् ॥ ३ ॥
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पूषा-भग-आदित्य-मारुतादिशब्दनिर्वचनम्
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तयोः । इत् । अवसा । वयम् । सनेम । नि । च । धीमहि ॥ स्यात् । उत । प्रऽरेचनम् ॥ ६ ॥
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रक्षणेन तयोर्वित्तं ज्ञानं वा प्राप्नुमः सदा । निधीमहि च दानं च स्यादेवास्माकमर्थिने ॥ ३१६॥६  ॥
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बृहन्पतिर्बृहत्या वा वाच एव बृहस्पतिः ॥२८८॥
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| verse_line1  = इन्द्रावरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे ॥ अस्मान्त्सु जिग्युषस्कृतम् ॥ ७ ॥
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इन्द्रावरुणा ॥ वाम् । अहम् । हुवे । चित्राय । राधसे ॥ अस्मान् । सु । जिग्युषः । कृतम् ॥ ७ ॥
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मित्रेति मित्रावरुणौ पूषा नाम स पोषणात् । पूर्णत्वाद्वा भगः प्रोक्तः पूर्णैश्वर्यादिकत्वतः ॥ २८९ ॥
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संहितायां ह्रस्वान्तपदप्रयोगे कारणनिरूपणम्
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ह्रस्वता संहितायां तु देवतैक्यप्रदर्शिनी । स्वरूपैक्यं हरौ तत्तु मत्यैक्यं भिन्नयोरपि  ॥३१७॥ ७॥
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आदिस्थत्वात् स आदित्य आददानः प्रयाति वा । बहुरूपत्वतश्चैव मानोक्तत्वात्तु मारुतः  ॥ २९० ॥ ३  ॥
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = इन्द्रावरुण नूनुवां सिषासन्तीषु धीष्वा अस्मभ्यं शर्म यच्छतम्
| verse_line1 = प्रवो भ्रियन्त इन्दवो मत्सरा मादयिष्णवः द्रप्सा मध्वश्चमूषदः
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इन्द्रावरुणा । नु नु वाम् सिसासन्तीषु धीषु अस्मभ्यम् शर्म यच्छतम्
 
प्र वः भ्रियन्ते इन्दवः मत्सराः मादयिष्णवः द्रप्साः मध्वः चमूऽसदः
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इन्दुशब्दः सोम-मनोवृत्तिपरः
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स्तुत्यादौ परमेश्वर एव स्वतन्त्रः, न जीवः
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अद्य वां नु नुमो लोपः स्वातन्त्र्यार्थे हि सूत्रतः साधयन्तीषु धीष्वेव शर्मास्मभ्यं प्रयच्छतम्
 
मत्सरा मदकारित्वात्ताच्छील्यादुत्तरं पदम् । द्रप्सास्ते द्रवणाच्चैव चमसस्थाश्चमूषदः शिरश्च चमसं प्रोक्तमिष्टदानात् तथेन्दवः २९१॥ ४
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| verse_line1 = प्रवामश्नोतु सुष्टुतिरिन्द्रावरुण यां हुवे या मृधाथे सधस्तुतिम् ॥ ९, ३३, १७, ४
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प्र । वाम् । अश्नोतु सुऽस्तुतिः इन्द्रावरुणा याम् हुवे याम् ऋधाथे इति सधऽस्तुतिम् ॥ ९, ३३, १७, ४
 
ईते त्वाम् अवस्यवः कण्वासः वृक्तऽबर्हिषः हविष्मन्तः अरम्ऽकृतः
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यथास्थितस्तुतिं यां च वर्धयेथे सदैवमे ॥ ३१८ ॥९॥
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== unknown ==
अवस्युर्यजमानः स्यादवनार्थप्रवृत्तितः । आत्मस्थं वा बहुवचो बहवो मुनयोऽत्र वा ॥२९२॥
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मण्डलम्–१.अध्यायः–१.अनुवाकः-५. सूक्तम् –१८.
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सोमानं नवर्चम्, मेधातिथिः  काण्वः ऋषिः, छन्दः– गायत्री,१ विरा,३-६-८ पिपीलिकामध्या निचृत्, ४ निचृत्,,५ पादनिचृत्, छन्दः ।  देवता–१-३ ब्रह्मणस्पतिः, ४ (सोमः) ब्रह्मणस्पतिरिन्द्रश्च, ५ बृहस्पतिः दक्षिणः, ६-८ सदसस्पतिः, ९ सदसस्पतिः नाराशंसो वा देवताः
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उत्तराणां वचस्त्वेन स्वयं वदति चेश्वरः । अरङ्कृतोऽतिकर्तारस्त्वलङ्कर्तार एव वा  ॥ २९३॥५ ॥
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विरा गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
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| verse_line1 = सोमानं स्वरणङ्कृणुहि ब्रह्मणस्पते कक्षीवन्तं य औशिजः
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सोमानम् स्वरणम् कृणुहि ब्रह्मणः पते कक्षीवन्तम् यः औशिजः
 
घृतऽपृष्ठाः । मनःऽयुजः ये त्वा वहन्ति वह्नयः देवान् सोमऽपीतये ६, २६
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सौम्यं शब्दं कृणु त्वं नो विष्णो वायो सुवाक्पते कक्षीवन्तं प्रति हि यो दत्तो यः स उशिक्सुतः । विवक्षितो मुनिः सोऽपि तस्मादर्थोऽपि मां प्रति ॥३१९ ॥ १
 
स्निग्धपृष्ठाः समारूढा हरिणा वा विदोषिणा मनोमात्रेण योज्याश्च त्वां देवांश्च वहन्ति ये २९४॥६॥
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विरा गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
 
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः सनस्सिषक्तु यस्तुरः
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यः । रेवान् । यः । अमीवऽहा । वसुऽवित् । पुष्टिऽवर्धनः ॥ सः । नः । सिषक्तु । यः । तुरः ॥ २ ॥
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तान् यजत्रान् । ऋतऽवृधः । अग्ने । पत्नीऽवतः । कृधि ॥ मध्वः । सुऽजिह्व । पायय
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वित्तवान् रोेगहा ज्ञानवेत्ताऽस्माभिः सयुग् भवेत् तुरो वेगाद्धरिर्वायुः ..................... २ 
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}}


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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
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तैर्देवान् यजतः स्तोतॄन् ज्ञातेन ब्रह्मणैधितान् । पत्नीभिर्योजया गन्तुं सह मध्वश्च पायय ७ 
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| verse_line1 = मानश्शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्मर्त्यस्य रक्षाणो ब्रह्मणस्पते ॥ ३
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मा । नः । शंसः । अररुषः । धूर्तिः । प्रणक् । मर्त्यस्य ॥ रक्ष । नः । ब्रह्मणः । पते ॥ ३ ॥
 
उदात्तस्वरार्थनिरूपणणम्
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..................अररुचातिरोषणात् ।  तस्य धूर्तिर्वचो नोऽस्मान् पूरयेद्रक्ष नो हरे  ॥३॥
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निचृद् गायत्री
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निचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः इन्द्रः सोमश्च देवताः
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| verse_line1 = सघा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः सोमो हिनोति मर्त्यम्
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| commentary1 = rigbhashyam
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सः । घ वीरः रिष्यति यम् इन्द्रः ब्रह्मणः पतिः ॥  सोमः हिनोति मर्त्यम्
 
ये यजत्राः ये ईड्याः ते ते पिबन्तु जिह्वया ॥  मधोः अग्ने वषऽकृति
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घेति हावधृतिश्चैव सोमः सौम्यत्वतो हरिः । उना मया च युक्तत्वादूमैर्युक्तत्वतोऽपि वा ॥३२१ ॥  अमः स इति वा ....................... ॥ ४  ॥
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ते षष्ठ्यतोऽनुदात्तः स्यादुदात्तो बहुवाचकः । आवृत्तस्तु भवेदर्थस्ते पिबन्तु वषकृतौ  ॥ २९६॥८  ॥
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पादनिचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः, सोमः, इन्द्रः, दक्षिणा च देवताः
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| verse_line1 = त्वन्तम्ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम् दक्षिणा पात्वंहसः ५, ३४
| verse_line1 = आकीं सूर्यस्य रोचनाद्विश्वान् देवा उषर्बुधः विप्रो होतेह वक्षति
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त्वम् तम् ब्रह्मणः पते सोमः इन्द्रः । च मर्त्यम् ॥ दक्षिणा पातु अंहसः ५, ३४
 
आकीम् सूर्यस्य रोचनात् विश्वान् देवान् उषःऽबुधः ॥ विप्रः होता इह वक्षति
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.................साक्षाच्छ्रीर्दक्षेनेति तु दक्षिणा दक्षिणा चतुरत्वाद्वा स्वयमेव जनार्दनः ५, ३४
 
सूर्यस्य रोचनात् स्वर्गादावक्षत्यग्निरिन्दुपान् उषःप्रकाशनाद् ब्रह्म तद्विदस्त उषर्बुधः
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - सदसस्पतिः( विष्णुर्वायुः अग्निर्वा) देवता
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| verse_line1 = विश्वेभिस्सोम्यम्मध्वग्न इन्द्रेण वायुना पिबा मित्रस्य धामभिः १०
 
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सदसः । पतिम् । अद्भुतम् । प्रियम् । इन्द्रस्य । काम्यम् ॥ सनिम् ।  मेधाम् । अयासिषम् ॥ ६ ॥
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विश्वेभिः । सोम्यम् । मधु । अग्ने । इन्द्रेण । वायुना ॥ पिब । मित्रस्य । धामऽभिः ॥ १० ॥
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हरि-वायु-अग्निषु शरणागतिः
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सदसस्पतिर्हरिस्साक्षाद् वायुरग्निरथापि वा । लाभज्ञानस्वरूपोऽसौ शरणं तमयासिषम्  ॥३२३॥६॥
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देवास्ते विष्णुधामत्वान्मित्रधामान ईरिताः  ॥ २९७ ॥ १० ॥
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सदसस्पतिर्देवता
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| verse_line1 = यस्मादृतेन सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन सधीनां योगमिन्वति
| verse_line1 = त्वं होता मनुर्हितोऽग्ने यज्ञेषु सीदसि सेम नो अध्वरं यज ११
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यस्मात् ऋते सिध्यति यज्ञः विपःऽचितः । चन ॥ सः । धीनाम् योगम् इन्वति
 
त्वम् होता मनुःऽहितः अग्ने यज्ञेषु सीदसि ॥ सः । इमम् । नः अध्वरम् यज ११
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धीप्रेरकः स ध्येयश्च धीभिर्योगं तदाऽप्नुते  ॥ ७  ॥
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निचृद् गायत्री
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - सदसस्पतिः देवता
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| verse_line1 = आदृध्नोति हविष्कृतिम्प्राञ्चङ्कृणोत्यध्वरम् होत्रा देवेषु गच्छति
| verse_line1 = युक्ष्वा ह्यरुषी रथे हरितो देव रोहितः ताभिर्देवा इहावह १२, २७, १४
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आत् ऋध्नोति हविःऽकृतिम् प्राञ्चम् कृणोति अध्वरम् होत्रा देवेषु गच्छति
 
युक्ष्व । हि अरुषीः रथे हरितः देव रोहितः ताभिः । देवान् । इह वह १२
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तस्माद्धविष्कृतः स्वृद्धिं करोति यजतो विभुः करोति चोत्तमं यज्ञं देवाह्वानानि गच्छति ॥ ३२४॥८
 
अग्निवाहा अश्वतर्यो दूर्वापद्माग्निसप्रभाः लोहिताः क्वचिदश्वाश्च रोहिन्मृग्योऽपि कुत्रचित् २९८॥ १२,२७,१४॥
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सदसस्पतिः(वायुः), नराशंसो (विष्णुः,अग्निः -  वा देवता
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इति चतुर्दशं सूक्तम्
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== ऋतुसूक्तम् ==
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नराशंसम् । सुऽधृष्टमम् । अपश्यम् । सप्रथःऽतमम् ॥ दिवः । न । सद्मऽमखसम् ॥ ९, ३५, १८ ॥
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नराशंसो विष्णुः
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नरैः स्तुत्यो नराशंसो हरिर्धृष्टतमश्च सः । गुणानां प्रथिमाधिक्यात् सप्रथस्तम ईरितः ।  यस्य स्वर्गादपि गृहं मखः प्रियमिवेयते ॥ ३२५॥९, ३५, १८  ॥
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== अग्निमारुतसूक्तम् ==
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मण्डलम्–१. अध्यायः–१.अनुवाकः – ५.सूक्तम्–१९.
 
मण्डलम् -१अध्यायः–१.अनुवाकः–४. सूक्तम्–१५
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(प्रतित्यं नवर्चंं, मेधातिथिः काण्वः ऋषिः,  अग्नामरुतश्च देवते, छन्दः– गायत्री,(२ निचृत्, ९ पिपीलिकामध्या निचृत्,)
 
(इन्द्रसोमं द्वादशर्चम्, मेधातिथिः काण्वः, गायत्री) (पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री)  ऋतवः(कालाभिमानिदेवताः, इन्द्रश्च देवताः
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| verse_line1 = प्रतित्यञ्चारुमध्वरङ्गोेपीथाय प्रहूयसे मरुद्भिरग्न आगहि ॥ १ ॥
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प्रति त्यम् चारुम् अध्वरम् गोऽपीथाय प्र हूयसे ॥  मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ गहि ॥ १ ॥
 
इन्द्र सोमम् पिब ऋतुना । आ त्वा विशन्तु इन्दवः ॥  मत्सरासः तत्ऽओकसः ॥ १ ॥
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यज्ञं प्रतिप्रति त्यं तं सम्यक् शास्त्रोक्तलक्षणम् । आहूयसे  ............................ ॥ १ ॥
 
ऋतुशब्दार्थजिज्ञासा
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निचृद् गायत्री
 
पोतृदेवताः मरुतः
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ऋतुर्मार्गस्तु नेतृत्वान्नेष्टाऽग्निर्हरिरेव वा । ईष्टे न कश्चिदस्येति ग्ना नद्यश्च समीरिताः ॥ गतिशीलत्वतो ग्नास्ता ज्ञातृनेतृत्वतो हरिः ॥२९९॥
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गमनान्नयनाद्वा ग्ना ..............
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....................ऋतुपात्रमृतुस्तथा । सोमास्तदोकसः प्रोक्ता ऋतुपात्रस्थिता यतः ॥३००॥
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पत्नीनेतृत्वतो नेष्टा नेष्टर्त्विक् सम्प्रकीर्तितः ।
}}
 
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ज्ञापयन्ति स्वलिङ्गानीत्यृतवः ष  प्रकीर्तिताः ॥३०१॥
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पावनाच्चैव पोतारो मरुतः पोतृदेवताः । अग्निस्तु देवतानेष्ठुस्त्वष्टेन्द्रो विष्णुरेव वा  ॥ ३०२॥१,२,३ ॥
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(भुरिक् गायत्री) ऋतवः, मरुतश्च देवताः
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मरुतः । पिबत । ऋतुना । पोत्रात् । यज्ञम् । पुनीतन ॥ यूयम् । हि । स्थ । सुऽदानवः ॥ २ ॥
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ऋतवः, नेष्टा च (विष्णुः, इन्द्रः, अग्निः, त्वष्टा च)देवताः
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| verse_line1 = अभि यज्ञङ्गृृणीहि नोऽग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना ॥ त्वं हि रत्नधा असि ॥ ३ ॥
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अभि । यज्ञम् । गृणीहि । नः । ग्नावः । नेष्टरिति । पिब । ऋतुना ॥ त्वम् । हि । रत्नऽधाः । असि ॥
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(भुरिग् गायत्री)  ऋतवः, अग्निश्च देवताः
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| verse_line1 = अग्ने देवा इहावह सादया योनिषु त्रिषु ॥ परि भूष पिब ऋतुना ॥ ४ ॥
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अग्ने । देवान् । इह । आ । वह । सादय । योनिषु । त्रिषु ॥ परि ।  भूष । पिब । ऋतुना ॥ ४ ॥
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प्राग्वंशादिस्थानत्रयनिरूपणम्
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वेद्युत्तरासदश्चैव प्राग्वंशो योनयः स्मृताः । भूष भूषय नो यज्ञम् ........ ॥ ४  ॥
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ऋतवः, इन्द्रश्च देवताः
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ब्राह्मणात् । इन्द्र । राधसः । पिब । सोमम् । ऋतून् । अनु । तव । इत् । हि । सख्यम् । अस्तृतम् ॥ ५ ॥
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..................ब्राह्मणाच्छंसिपात्रतः । पिबेन्द्र नो राधसोऽर्थे त्वामनु त्वृतुदेवताः ॥३०३॥
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स्तृतं छिन्नमिति प्रोक्तम् .......... ॥ ५  ॥
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ऋतवः, मित्रावरुणौ च देवताः
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| verse_line1 = युवन्दक्षन्धृतव्रतमित्रावरुणदूभम् ॥ ऋतुना यज्ञमाशाथे ॥ ६, २८ ॥
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युवम् । दक्षम् । धृतऽव्रता । मित्रावरुणा । दुःऽदभम् ॥ ऋतुना ।  यज्ञम् । अशाथे इति ॥ ६, २८ ॥
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.............अस्तभ्यं दुर्दभं स्मृतम् ।  दक्षाख्यं यजमानं चापीशाथे यज्ञमेव च ।  सोमं पीत्वर्तुपात्रेण सहवा तेन चर्तुना  ॥ ६, २८  ॥
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ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
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| verse_line1 = द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो अध्वरे ॥ यज्ञेषु देवमीते ॥ ७ ॥
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द्रविणःऽदाः । द्रविणसः । ग्रावऽहस्तासः । अध्वरे ॥ यज्ञेषु ।  देवम् । र्इते ॥ ७ ॥
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होता च होतृकाश्चैव द्रविणोदा द्रवीणसः । अग्निश्चैवाग्नयस्तेषां देवता विष्णुमीते  ॥३०५॥ ७ ॥
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ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
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| verse_line1 = द्रविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शृण्विरे ॥ देवेषु ता वनामहे ॥ ८ ॥
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द्रविणःऽदाः । ददातु । नः । वसूनि । यानि । शृण्विरे ॥ देवेषु । ता । वनामहे ॥ ८ ॥
}}
 
{{Bhashyam
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ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
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| verse_line1 = द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत ॥ नेष्ट्रादृतुभिरिष्यत ॥ ९ ॥
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द्रविणःऽदाः । पिपीषति । जुहोत । प्र । च । तिष्ठत ॥ नेष्ट्रात् ।  ऋतुऽभिः । इष्यत ॥ ९ ॥
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पातुमिच्छति सोमं स सोमास्तस्मै प्रतिष्ठिताः । ऋतुपात्रैर्देवताभिः सहैवैनमभीप्सत  ॥३०६॥ ९ ॥
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| verse_line1 = यत्त्वा तुरीयमृतुभिर्द्रविणोदो यजामहे ॥ अध स्मानो ददिर्भव ॥ १० ॥
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यत् । त्वा । तुरीयम् । ऋतुऽभिः । द्रविणःऽदः । यजामहे ॥ अध ।  स्म । नः । ददिः । भव ॥ १० ॥
}}
 
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चतुर्थवारमपि यत्त्वां यजामो ददिर्भव ॥ १० ॥
}}
 
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(पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री)  - ऋतवः, अश्विनौ च देवते
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| verse_line1 = अश्विना पिबतम्मधु दीद्यग्नी शुचिव्रता ॥ ऋतुना यज्ञवाहसा ॥ ११ ॥
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अश्विना । पिबतम् । मधु । दीद्यग्नी इति दीदिऽअग्नी । शुचिऽव्रता ॥  ऋतुना । यज्ञऽवाहसा ॥ ११ ॥
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.................दीद्यग्नी इति दीप्ताग्नी ॥ ११ ॥
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(पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री)  -  ऋतवः, विष्णुः अग्निश्च देवताः
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| verse_line1 = गार्हपत्येन सन्त्य ऋतुना यज्ञनीरसि ॥ देवान्देवय ते यज ॥ १२, २९, १५ ॥
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गार्हऽपत्येन । सन्त्य । ऋतुना । यज्ञऽनीः । असि ॥ देवान् । देवऽयते । यज ॥ १२, २९, १५ ॥
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मासभेदेन भगवतो द्वे द्वे रूपे
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...............सन्त्योऽग्निः सन्ततत्वतः ॥३०७॥
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विष्णुर्वर्त्वधिपो विष्णुः केशवादिस्वरूपतः । ‘ग्रहान् सोमस्य मिमते’ इति तस्यैव कथ्यते ॥ गार्हपत्येन पात्रेण यजमानस्तु देवयन् ॥ ३०८॥
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देवान्पातीति .............  ॥ १२, २९, १५  ॥
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(इति एकोनविंशो वर्गः – पञ्चदशं सूक्तम् )
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== ऐन्द्रसूक्तम् ==
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मण्डलम्—१.अध्यायः–१. अनुवाकः–४. सूक्तम्– १६.
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आत्वा नवर्चं, मेधातिथिः काण्वः  गायत्री(३ पिपीलिका मध्या निचृत्,९ विरा) इन्द्रो देवता
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| verse_line1 = आ त्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये ॥ इन्द्र त्वा सूरऽचक्षसः ॥ १ ॥
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आ । त्वा । वहन्तु । हरयः । वृषणम् । सोमऽपीतये ॥ इन्द्र । त्वा । सूरऽचक्षसः ॥ १ ॥
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..............सुष्ठूरीकुर्वति विषयान् यतः । चक्षूंषीन्द्रस्य हरयस्तेनोक्ताः सूरचक्षसः  ॥ ३०९ ॥ १ ॥
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| verse_line1 = इमा धाना घृतस्नुवो हरी इहोपवक्षतः ॥ इन्द्रं सुखतमे रथे ॥ २ ॥
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इमाः । धानाः । घृतस्नुवः । हरी इति । इह । उप । वक्षतः ॥ इन्द्रम् । सुखऽतमे । रथे ॥ २ ॥
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धानाशब्दस्याध्यात्मार्थनिर्वचनम्
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भक्तिस्नुतानि धानानि बुद्धेर्धाना इति ह्यपि  ॥२  ॥
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = इन्द्रम् प्रातर्हवामह इन्द्रम् प्रयत्यध्वरे ॥ इन्द्रं सोमस्य पीतये ॥ ३ ॥
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इन्द्रम् । प्रातः । हवामहे । इन्द्रम् । प्रऽयति । अध्वरे ॥ इन्द्रम् ।  सोमस्य । पीतये ॥ ३ ॥
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सोमपीतिशब्दः तृतीयसवनवाची
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‘प्रातः’ इत्यादिवाक्येन सवनत्रयमीरितम् । समाप्तत्वात् सोमपीतिस्तृतीयं सवनं स्मृतम् ॥३१०॥
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सदा ........ ॥ ३  ॥
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| verse_line1 = (१६२) उप नस्सुतमागहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः ॥ सुते हि त्वा हवामहे ॥ ४ ॥
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उप । नः । सुतम् । आ । गहि । हरिऽभिः । इन्द्र । केशिऽभिः ॥ सुते । हि । त्वा । हवामहे ॥ ४ ॥
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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सोमपाने गौरमृगदृष्टान्तः
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| verse_line1 = सेमन्नः स्तोममागह्युपेदं सवनं सुतम् ॥ गौरो न तृषितः पिब ॥ ५, ३० ॥
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सः । इमम् । नः । स्तोमम् । आ । गहि । उप । इदम् । सवनम् । सुतम् ॥ गौरः । न । तृषितः । पिब ॥ ५, ३० ॥
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| verse_line1 = इमे सोमास इन्दवस्सुतासो अधि बर्हिषि ॥ ता इन्द्र सहसे पिब ॥ ६ ॥
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इमे । सोमासः । इन्दवः । सुतासः । अधि । बर्हिषि ॥ तान् । इन्द्र । सहसे । पिब ॥ ६ ॥
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भगवतो वृद्धिर्नास्तीति निरूपणम्
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..... विष्णुविवक्षायां यजमानबलं सहः । तदिष्टस्यैव दानाय तद्गुणव्यक्तिरेव वा ॥ ३११॥
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‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्पूर्णात् पूर्णमुदच्यते’ । ‘हेयोपादेयरहितगुणपूर्णो हरिः सदा । अनुग्रहव्यक्तिरेव तद्गुणानां च नान्यथा’॥ ३१२ ॥
}}
 
{{Bhashyam
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इत्यादि वेदवाक्येभ्यो नैव वृद्धिर्हरेः क्वचित्  ॥ ६  ॥
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| verse_line1 = अयन्ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शन्तमः ॥ अथा सोमं सुतम् पिब ॥ ७ ॥
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{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S16_V07
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अयम् । ते । स्तोमः । अग्रियः । हृदिऽस्पृक् । अस्तु । शम्ऽतमः ॥  अथ । सोमम् । सुतम् । पिब ॥ ७ ॥
}}
 
{{VerseBlock
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| verse_line1 = विश्वमित्सवनं सुतमिन्द्रो मदाय गच्छति ॥ वृत्रहा सोमपीतये ॥ ८ ॥
}}
 
{{Bhashyam
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विश्वम् । इत् । सवनम् । सुतम् । इन्द्रः । मदाय । गच्छति ॥ वृत्रऽहा । सोमऽपीतये ॥ ८ ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S16
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विराड् गायत्री
}}
 
{{VerseBlock
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| verse_line1 = सेमन्नः काममापृण गोभिरश्वैश्शतक्रतो ॥ स्तवाम त्वा स्वाध्यः ॥ ९, ३१, १६ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S16_V09
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कामम् । आ । पृण । गोभिः । अश्वैः । शतक्रतो इति शतऽक्रतो ॥  स्तवाम । त्वा । सुऽआध्यः ॥ ९, ३१, १६ ॥
}}
 
{{Bhashyam
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पृण सम्पूरय स्वाध्यः सुधीतय इतीरिताः ॥३१३ ॥  ९, ३१, १६  ॥
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== ऐन्द्रावरुणसूक्तम् ==
{{Adhyaya
| document_id  = RG
| chapter_num  = 1
| section_num  = 17
| title        = ऐन्द्रावरुणसूक्तम्
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{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S17
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मण्डलम्–१. अध्यायः-१.अनुवाकः–४– सूक्तम् – १७.
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S17
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(इन्द्रावरुणयोर्नवर्चम् , मेधातिथिः काण्वः, छन्दः– गायत्री, २ यवमध्या विरा,  ४ पादनिचृत्(ह्रसीयसी),६ निचृत्, ५ भुरिगार्ची, ८ पिपीलिकामध्या निचृत्,  इन्द्रावरुणौ देवते)
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id = RG_C01_S17_V01
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| verse_line1 = (१६८) इन्द्रावरुणयोरहं सम्राजोरव आ वृणे ॥ ता नो मृात र्इदृशे ॥ १ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
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{{Bhashyam
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इन्द्रावरुणयोः । अहम् । सम्ऽराजोः । अवः । आ । वृणे ॥ ता । नः । मृातः । र्इदृशे ॥ १ ॥
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अविकारेण संस्थानमीदृक्त्वं नाम कीर्तितम् ॥ १ ॥
}}
 
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यवमध्या विरा गायत्री
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| verse_line1 = गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः ॥ धर्तारा चर्षणीनाम् ॥ २ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
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गन्तारा । हि । स्थः । अवसे । हवम् । विप्रस्य । माऽवतः ॥ धर्तारा । चर्षणीनाम् ॥ २ ॥
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मावतो ज्ञानयुक्तस्य प्रजाश्चर्षणयः स्मृताः  ॥ २  ॥
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| verse_line1 = अनुकामन्तर्पयेथामिन्द्रावरुण राय आ ॥ ता वान्नेदिष्ठमीमहे ॥ ३ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
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अनुऽकामम् । तर्पयेथाम् । इन्द्रावरुणा । रायः । आ ॥ ता । वाम् । नेदिष्ठम् । र्इमहे ॥ ३ ॥
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नेदिष्ठत्वं समीपत्वं क्षिप्रं शरणमीमहे  ॥३१४॥ ३  ॥
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पादनिचृद् गायत्री
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| verse_line1 = युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम् ॥ भूयाम वाजदाव्नाम् ॥ ४ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
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युवाकु । हि । शचीनाम् । युवाकु । सुऽमतीनाम् ॥ भूयाम ।  वाजऽदाव्नाम् ॥ ४ ॥
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| verse_id = RG_C01_S17_V04
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युवयोरेव वाक्यानां सुमतीनां च सर्वशः । भवेमान्नप्रदातॄणां सर्वदा विषया वयम्  ॥ ३१५॥४  ॥
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भुरिगार्ची ह्रसीयसी - गायत्री
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| verse_line1 = इन्द्रस्सहस्रदाव्नां वरुणश्शंस्यानाम् ॥ क्रतुर्भवत्युक्थ्यः ॥ ५, ३२ ॥
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| verse_id = RG_C01_S17_V05
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इन्द्रः । सहस्रऽदाव्नाम् । वरुणः । शंस्यानाम् ॥ क्रतुः । भवति ।  उक्थ्यः ॥ ५, ३२ ॥
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| verse_id = RG_C01_S17_V05
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{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S17
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निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = तयोरिदवसा वयं सनेम नि च धीमहि ॥ स्यादुत प्ररेचनम् ॥ ६ ॥
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रक्षणेन तयोर्वित्तं ज्ञानं वा प्राप्नुमः सदा । निधीमहि च दानं च स्यादेवास्माकमर्थिने ॥ ३१६॥६  ॥
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| verse_line1 = इन्द्रावरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे ॥ अस्मान्त्सु जिग्युषस्कृतम् ॥ ७ ॥
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इन्द्रावरुणा ॥ वाम् । अहम् । हुवे । चित्राय । राधसे ॥ अस्मान् । सु । जिग्युषः । कृतम् ॥ ७ ॥
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संहितायां ह्रस्वान्तपदप्रयोगे कारणनिरूपणम्
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ह्रस्वता संहितायां तु देवतैक्यप्रदर्शिनी । स्वरूपैक्यं हरौ तत्तु मत्यैक्यं भिन्नयोरपि  ॥३१७॥ ७॥
}}
 
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = इन्द्रावरुण नूनुवां सिषासन्तीषु धीष्वा ॥ अस्मभ्यं शर्म यच्छतम् ॥ ८ ॥
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इन्द्रावरुणा । नु । नु । वाम् । सिसासन्तीषु । धीषु । आ ॥ अस्मभ्यम् । शर्म । यच्छतम् ॥ ८ ॥
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स्तुत्यादौ परमेश्वर एव स्वतन्त्रः, न जीवः
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अद्य वां नु नुमो लोपः स्वातन्त्र्यार्थे हि सूत्रतः । साधयन्तीषु धीष्वेव शर्मास्मभ्यं प्रयच्छतम्  ॥ ८  ॥
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| verse_line1 = प्रवामश्नोतु सुष्टुतिरिन्द्रावरुण यां हुवे ॥ या मृधाथे सधस्तुतिम् ॥ ९, ३३, १७, ४ ॥
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प्र । वाम् । अश्नोतु । सुऽस्तुतिः । इन्द्रावरुणा । याम् । हुवे ॥ याम् । ऋधाथे इति । सधऽस्तुतिम् ॥ ९, ३३, १७, ४ ॥
}}
 
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यथास्थितस्तुतिं यां च वर्धयेथे सदैवमे ॥ ३१८ ॥९॥
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== unknown ==
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मण्डलम्–१.अध्यायः–१.अनुवाकः-५. सूक्तम् –१८.
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सोमानं नवर्चम्, मेधातिथिः  काण्वः ऋषिः, छन्दः– गायत्री,१ विरा,३-६-८ पिपीलिकामध्या निचृत्, ४ निचृत्,,५ पादनिचृत्, छन्दः ।  देवता–१-३ ब्रह्मणस्पतिः, ४ (सोमः) ब्रह्मणस्पतिरिन्द्रश्च, ५ बृहस्पतिः दक्षिणः, ६-८ सदसस्पतिः, ९ सदसस्पतिः नाराशंसो वा देवताः
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विरा गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
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| verse_line1 = सोमानं स्वरणङ्कृणुहि ब्रह्मणस्पते ॥ कक्षीवन्तं य औशिजः ॥ १ ॥
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सोमानम् । स्वरणम् । कृणुहि । ब्रह्मणः । पते ॥ कक्षीवन्तम् । यः । औशिजः ॥ १ ॥
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सौम्यं शब्दं कृणु त्वं नो विष्णो वायो सुवाक्पते । कक्षीवन्तं प्रति हि यो दत्तो यः स उशिक्सुतः । विवक्षितो मुनिः सोऽपि तस्मादर्थोऽपि मां प्रति  ॥३१९ ॥ १ ॥
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विरा गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
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| verse_line1 = यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः ॥ सनस्सिषक्तु यस्तुरः ॥ २ ॥
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यः । रेवान् । यः । अमीवऽहा । वसुऽवित् । पुष्टिऽवर्धनः ॥ सः । नः । सिषक्तु । यः । तुरः ॥ २ ॥
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वित्तवान् रोेगहा ज्ञानवेत्ताऽस्माभिः सयुग् भवेत् । तुरो वेगाद्धरिर्वायुः ..................... ॥ २  ॥
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
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| verse_line1 = मानश्शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्मर्त्यस्य ॥ रक्षाणो ब्रह्मणस्पते ॥ ३ ॥
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मा । नः । शंसः । अररुषः । धूर्तिः । प्रणक् । मर्त्यस्य ॥ रक्ष । नः । ब्रह्मणः । पते ॥ ३ ॥
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..................अररुचातिरोषणात् ।  तस्य धूर्तिर्वचो नोऽस्मान् पूरयेद्रक्ष नो हरे  ॥३॥
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निचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः इन्द्रः सोमश्च देवताः
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| verse_line1 = सघा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः ॥ सोमो हिनोति मर्त्यम् ॥ ४ ॥
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सः । घ । वीरः । न । रिष्यति । यम् । इन्द्रः । ब्रह्मणः । पतिः ॥  सोमः । हिनोति । मर्त्यम् ॥ ४ ॥
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घेति हावधृतिश्चैव सोमः सौम्यत्वतो हरिः । उना मया च युक्तत्वादूमैर्युक्तत्वतोऽपि वा ॥३२१ ॥  अमः स इति वा ....................... ॥ ४  ॥
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पादनिचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः, सोमः, इन्द्रः, दक्षिणा च देवताः
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| verse_line1 = त्वन्तम्ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम् ॥ दक्षिणा पात्वंहसः ॥ ५, ३४ ॥
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त्वम् । तम् । ब्रह्मणः । पते । सोमः । इन्द्रः । च । मर्त्यम् ॥ दक्षिणा । पातु । अंहसः ॥ ५, ३४ ॥
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.................साक्षाच्छ्रीर्दक्षेनेति तु दक्षिणा । दक्षिणा चतुरत्वाद्वा स्वयमेव जनार्दनः  ॥ ५, ३४  ॥
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - सदसस्पतिः( विष्णुर्वायुः अग्निर्वा) देवता
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| verse_line1 = सदसस्पतिमद्भुतम्प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् ॥ सनिम्मेधामयासिषम् ॥ ६ ॥
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हरि-वायु-अग्निषु शरणागतिः
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सदसस्पतिर्हरिस्साक्षाद् वायुरग्निरथापि वा । लाभज्ञानस्वरूपोऽसौ शरणं तमयासिषम्  ॥३२३॥६॥
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सदसस्पतिर्देवता
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| verse_line1 = यस्मादृतेन सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन ॥ सधीनां योगमिन्वति ॥ ७ ॥
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यस्मात् । ऋते । न । सिध्यति । यज्ञः । विपःऽचितः । चन ॥ सः । धीनाम् । योगम् । इन्वति ॥ ७ ॥
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धीप्रेरकः स ध्येयश्च धीभिर्योगं तदाऽप्नुते  ॥ ७  ॥
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - सदसस्पतिः देवता
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| verse_line1 = आदृध्नोति हविष्कृतिम्प्राञ्चङ्कृणोत्यध्वरम् ॥ होत्रा देवेषु गच्छति ॥ ८ ॥
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{{Bhashyam
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आत् । ऋध्नोति । हविःऽकृतिम् । प्राञ्चम् । कृणोति । अध्वरम् ॥  होत्रा । देवेषु । गच्छति ॥ ८ ॥
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तस्माद्धविष्कृतः स्वृद्धिं करोति यजतो विभुः । करोति चोत्तमं यज्ञं देवाह्वानानि गच्छति  ॥ ३२४॥८  ॥
}}
 
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सदसस्पतिः(वायुः), नराशंसो (विष्णुः,अग्निः -  वा देवता
}}
 
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| verse_line1 = नराशंसं सुधृष्टममपश्यं सप्रथस्तमम् ॥ दिवो न सद्ममखसम् ॥ ९, ३५, १९ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
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{{Bhashyam
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नराशंसम् । सुऽधृष्टमम् । अपश्यम् । सप्रथःऽतमम् ॥ दिवः । न । सद्मऽमखसम् ॥ ९, ३५, १८ ॥
}}
 
{{Bhashyam
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नराशंसो विष्णुः
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = RG_C01_S18_V09
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नरैः स्तुत्यो नराशंसो हरिर्धृष्टतमश्च सः । गुणानां प्रथिमाधिक्यात् सप्रथस्तम ईरितः ।  यस्य स्वर्गादपि गृहं मखः प्रियमिवेयते ॥ ३२५॥९, ३५, १८  ॥
}}
 
== अग्निमारुतसूक्तम् ==
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| title        = अग्निमारुतसूक्तम्
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मण्डलम्–१. अध्यायः–१.अनुवाकः – ५.सूक्तम्–१९.
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{{Bhashyam
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(प्रतित्यं नवर्चंं, मेधातिथिः काण्वः ऋषिः,  अग्नामरुतश्च देवते, छन्दः– गायत्री,(२ निचृत्, ९ पिपीलिकामध्या निचृत्,)
}}
 
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| verse_line1 = प्रतित्यञ्चारुमध्वरङ्गोेपीथाय प्रहूयसे ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ १ ॥
| commentary1 = rigbhashyam
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{{Bhashyam
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प्रति । त्यम् । चारुम् । अध्वरम् । गोऽपीथाय । प्र । हूयसे ॥  मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ १ ॥
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{{Bhashyam
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यज्ञं प्रतिप्रति त्यं तं सम्यक् शास्त्रोक्तलक्षणम् । आहूयसे  ............................ ॥ १ ॥
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निचृद् गायत्री
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| verse_line1 = न हि देवो न मर्त्यो महस्तव क्रतुम्परः ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ २ ॥
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नहि । देवः । न । मर्त्यः । महः । तव । क्रतुम् । परः । मरुत्ऽभिः ।  अग्ने । आ । गहि ॥ २ ॥
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महान्नैव त्वदन्योऽस्ति (हि) क्रतुं प्रति ॥ ३२६ ॥
}}
 
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विष्णौ हि मुख्यतोऽर्थोऽयमग्नौ कांश्चिदृते सुरान्  ॥ २  ॥
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| verse_line1 = ये महो रजसो विदुर्विश्वे देवासो अद्रुहः ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ३॥
| commentary1 = rigbhashyam
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ये । महः । रजसः । विदुः । विश्वे । देवासः । अद्रुहः ।  मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ३ ॥
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महतो रञ्जकात् स्वर्गादद्रोग्धारोऽखिलं विदुः  ॥ ३  ॥
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| verse_line1 = य उग्रा अर्कमानृचुरनाधृष्टास ओजसा ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ४ ॥
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ये । उग्राः । अर्कम् । आनृचुः । अनाधृष्टासः । ओजसा ॥ मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥  ४ ॥
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प्राप्ता अर्कं विशेषेण सन्निधिस्तत्र यद्धरेः ॥ ४  ॥
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| verse_line1 = ये शुभ्रा घोरवर्पस सुक्षत्रासो रिशादसः ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ५, ३६ ॥
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| verse_id = RG_C01_S19_V05
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ये । शुभ्राः । घोरऽवर्पसः । सुऽक्षत्रासः । रिशादसः ॥ मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ५, ३६ ॥
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प्राण-इन्द्रिय-अग्न्यादिगतभगवद्रूपविशेषाः
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शुद्धा घोरबलाः क्षेत्रत्रातारः क्षतितोऽपि वा ।  रम्यसत्सुखभोक्तारो मरुतो मारुतत्वतः ॥ ३२८ ॥
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एतादृशानि रूपाणि प्राणाग्निस्थानि चेशितुः । पृथग् वा तादृशान्येव देवगान्यपि सर्वशः  ॥३२९॥५॥
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| verse_line1 = न हि देवो न मर्त्यो महस्तव क्रतुम्परः ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥
| verse_line1 = येनाकस्याधि रोचने दिवि देवास आसते ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥
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{{Bhashyam
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नहि । देवः । न । मर्त्यः । महः । तव । क्रतुम् । परः । मरुत्ऽभिः ।  अग्ने । आ । गहि ॥ २ ॥
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ये । नाकस्य अधि रोचने दिवि । देवासः । आसते । मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ६ ॥
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महान्नैव त्वदन्योऽस्ति (हि) क्रतुं प्रति ॥ ३२६ ॥
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विष्णौ हि मुख्यतोऽर्थोऽयमग्नौ कांश्चिदृते सुरान्  ॥ २  ॥
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ये । महः रजसः विदुः विश्वे । देवासः । अद्रुहः ।  मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ३ ॥
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महतो रञ्जकात् स्वर्गादद्रोग्धारोऽखिलं विदुः  ॥ ३  ॥
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ये । उग्राः । अर्कम् । आनृचुः । अनाधृष्टासः । ओजसा ॥ मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ गहि ॥  ४ ॥
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प्राप्ता अर्कं विशेषेण सन्निधिस्तत्र यद्धरेः ॥ ४  ॥
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प्राण-इन्द्रिय-अग्न्यादिगतभगवद्रूपविशेषाः
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शुद्धा घोरबलाः क्षेत्रत्रातारः क्षतितोऽपि वा ।  रम्यसत्सुखभोक्तारो मरुतो मारुतत्वतः ॥ ३२८ ॥
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एतादृशानि रूपाणि प्राणाग्निस्थानि चेशितुः । पृथग् वा तादृशान्येव देवगान्यपि सर्वशः  ॥३२९॥५॥
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स्वर्गोपरि प्रकाशे च सूर्यादावासते सुराः । नाको निर्दुःखरूपत्वाद् द्यौः प्रकाशस्वरूपतः  ॥३३०॥६॥
स्वर्गोपरि प्रकाशे च सूर्यादावासते सुराः । नाको निर्दुःखरूपत्वाद् द्यौः प्रकाशस्वरूपतः  ॥३३०॥६॥
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ये । ईङ्खयन्ति । पर्वतान् । तिरः । समुद्रम् । अर्णवम् ॥  मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ७ ॥
ये । ईङ्खयन्ति । पर्वतान् । तिरः । समुद्रम् । अर्णवम् ॥  मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ७ ॥
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समुद्रशब्दार्थः प्रकृतिः
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प्रतोलयन्ति च गिरींस्तिरस्कृत्य च सागरम् । पुरुषान् प्रकृतिं वाऽपि पर्ववन्तो हि जन्मना ॥
प्रतोलयन्ति च गिरींस्तिरस्कृत्य च सागरम् । पुरुषान् प्रकृतिं वाऽपि पर्ववन्तो हि जन्मना ॥
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पुरुषाः सुसमुद्रेकात् समुद्रः प्रकृतिर्मता ॥ ३३१॥
पुरुषाः सुसमुद्रेकात् समुद्रः प्रकृतिर्मता ॥ ३३१॥
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प्रकृतेः पुरुषाणां च प्रेरकः सन् सदा हरे । स्वरूपैर्बहुभिर्युक्त आयाहि सम सद्गुणैः  ॥३३२॥ ७ ॥
प्रकृतेः पुरुषाणां च प्रेरकः सन् सदा हरे । स्वरूपैर्बहुभिर्युक्त आयाहि सम सद्गुणैः  ॥३३२॥ ७ ॥
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ऋक्संहिताभाष्ये  प्रथमोध्यायः ॥ १ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ऋक्संहिताभाष्ये  प्रथमोध्यायः ॥ १ ॥
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ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
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आ । ये । तन्वन्ति । रश्मिऽभिः । तिरः । समुद्रम् । ओजसा ।  मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ८ ॥
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पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
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अभि । त्वा । पूर्वऽपीतये । सृजामि । सोम्यम् ॥ मधु । मरुत्ऽभिः ।  अग्ने । आ । गहि ॥ ९, ३७, १, १९ ॥
अभि । त्वा । पूर्वऽपीतये । सृजामि । सोम्यम् ॥ मधु । मरुत्ऽभिः ।  अग्ने । आ । गहि ॥ ९, ३७, १, १९ ॥
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॥ इति प्रथममण्डले प्रथमाष्टके प्रथमोऽध्यायः ॥
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Revision as of 18:33, 20 April 2026

श्रीश्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितम् ऋग्भाष्यम्
मङ्गलाचरणम्
नारायणं निखिलपूर्णगुणार्णमुच्चसूर्यामितद्युतिमशेषनिरस्तदोषम् ।सर्वेश्वरं गुरुमजेशनुतं प्रणम्य वक्ष्याम्यृगर्थमतितुष्टिकरं तदस्य ॥ १ ॥


ओमशेषगुणाधार इति नारायणोऽप्यसौ ।पूर्णो भूतिवरोऽनन्तसुखो यद् व्याहृतीरितः ॥ २ ॥


व्याहृत्यर्थः गायत्र्यर्थश्च एक एव
गुणैस्ततः प्रसविता वरणीयो गुणोन्नतेः ।भारतिज्ञानरूपत्वाद् भर्गो ध्येयोऽखिलैर्जनैः ॥


नारायणो ध्येयः
प्रेरकोऽशेषबुद्धीनां स गायत्र्यर्थ ईरितः ॥ ३ ॥


भगवान् सर्ववेदार्थः
स पूर्णत्वात् पुमान्नाम पौरुषे सूक्त ईरितः ।स एवाखिलवेदार्थः सर्वशास्त्रार्थ एव च ॥ ४ ॥


स एव सर्वशब्दार्थः इत्याहोपनिषत् परा ।


ऋङ्मन्त्रव्याख्यानं भगवत अतितुष्टिकरम्
ऋङ्मन्त्रव्याख्यानकरणे हेतुप्रदर्शनम्
‘यो देवानाम्’ इति श्रुत्या देवनाम्नां विशेषतः । स्पष्टत्वात् तद्गतत्वेन


अग्निशब्दार्थनिर्वचनम्
अग्रणीत्वं यदग्नित्वमित्यग्रे नाम तद्भवेत् ।


शब्दार्थनिर्वचने विशेषकारणनिरूपणम्
(ऋग्भाष्यम्) यथैवाग्न्यादयः शब्दाः प्रवर्तन्ते जनार्दने ।तथा निरुक्तिं वक्ष्यामो ज्ञानिनां ज्ञानसिद्धये ॥ ८ ॥


अग्निसूक्तम्

मण्डलम्—१. अध्यायः –१. अनुवाकः–१. सूक्तम्–१.
अग्निं नवर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा ऋषिः, गायत्री छन्दः, अग्निर्देवता
ओ३म् ॥ अग्निमीळेे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ॥ होतारं रत्नधातमम् ॥ १ ॥


अग्निम् । ईळे । पुरःऽहितम् । यज्ञस्य । देवम् । ऋत्विजम् । होतारम् । रत्नऽधातमम् ॥ १ ॥
अग्निम् । अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । पु॒रःऽहि॑तम् । य॒ज्ञस्य॑ । दे॒वम् । ऋ॒त्विज॑म् । होता॑रम् । र॒त्न॒ऽधात॑मम् ॥ १ ॥
अग्निशब्दार्थो भगवान्
देवशब्दनिरुक्तिः
होतृशब्दस्याध्यात्मार्थनिरूपणम्
........अग्निशब्दोऽयमग्र एवाभिपूज्यताम् । अग््रयत्वमग्रनेतृत्वमत्तिमङ्गागनेतृताम् ॥ ९ ॥
आह तं स्तौम्यशेषस्य पूर्वमेव हितं प्रभुम् । ऋत्विङि्नयामकत्वेन यज्ञानामृत्विजं सदा ॥ १० ॥
द्योतनाद्विजयात् कान्त्या स्तुत्या व्यवहृतेरपि । गत्या रत्या च देवाख्यं होतृसंस्थं विशेषतः ॥ ११ ॥
अग्निसंस्थेन रूपेण यतोऽग्निर्होतृदेवता ।
इन्द्रियाग्निषु चार्थानां यद्धोता होतृनामकः ॥ रतिधारकोत्तमत्वात् स रत्नधातम ईरितः ॥ १२ ॥
अग्निस्तुतौ आचारकथनम्
अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत॥ स देवा एह वक्षति ॥ २ ॥


पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
अग्निः । पूर्वेभिः । ऋषिऽभिः । ईड्यः । नूतनैः । उत ॥ सः देवान् । आ । इह । वक्षति ॥ २ ॥
अ॒ग्निः । पूर्वे॑भिः । ऋषि॑ऽभिः । ईड्यः॑ । नूत॑नैः । उ॒त । सः । दे॒वान् । आ । इ॒ह । व॒क्ष॒ति॒ ॥ २ ॥
स पूर्वैर्नूतर्नैरेष्यैर्विज्ञानादृषिनामकैः । ईड्यो देवादिभिस्सर्वैस्स च देवानिहानयेत् ॥ १३ ॥॥
अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे । यशसं वीरवत्तमम् ॥३॥


अग्निना । रयिम् । अश्नवत् । पोषम् । एव । दिवेऽदिवे ॥ यशसम् । वीरवत्ऽतमम् ॥ ३ ॥
तेनैव रयिमाप्नोति वित्तं विद्याधनात्मकम् । दिवसे दिवसे नित्यं पुष्टिमेव न हीनताम् ॥ यशश्च पुत्रसंयुक्तं वीर्यवत्तममेव वा ॥ १४ ॥॥
अग्निस्तुतिः
अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि । स इद्देवेषु गच्छति ॥


अग्ने । यम् । यज्ञम् । अध्वरम् । विश्वतः । परिऽभूः । असि ॥ सः । इत् । देवेषु । गच्छति ॥ ४ ॥
यं यज्ञं परितो भूत्वा रक्षसि त्वं सदैव च । विधिमार्गस्थितं देवान् स एवाप्नोत्यसंशयम् ॥ १५ ॥
अग्निर्होता कविक्रतुस्सत्यश्चित्रश्रवस्तमः ॥ देवो देवेभिरागमत् ॥ ५, १ ॥


अग्निः । होता । कविऽक्रतुः । सत्यः । चित्रश्रवःऽतमः ॥ देवः । देवेभिः । आ । गमत् ॥ ५, १ ॥
सोऽखिलग्रहणप्रज्ञः सद्गुणैः सन्ततोऽखिलम् । यमयत्यग््रयकीर्तीनाम् उत्तमो विबुधैः सह । आगन्ताऽखिलभक्तानां पूजास्वीकारतत्परः ॥ १६ ॥ ॥
यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रङ्करिष्यसि ॥ तवेत्तत् सत्यमङ्गिरः ॥ ६ ॥


निचृद् गायत्री
यत् । अङ्ग । दाशुषे । त्वम् । अग्ने । भद्रम् । करिष्यसि ॥ तव । इत् । तत् । सत्यम् । अङ्गिरः ॥ ६ ॥
यजमानाय यद्भद्रं कर्तुमिच्छसि सत्प्रिय । त्वच्चेष्टयैव कर्माणि वर्तयित्वा तदीहनम् ॥ १७ ॥
तवैव सत्यमङ्गानां रसयद्वह्निगो हरिः । अङ्गिरा अङ्गिरःपुत्रो यतोऽग्निरभवत् क्वचित् ॥ १८ ॥
उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धियावयम् ॥ नमो भरन्त एमसि ॥ ७ ॥


उप । त्वा । अग्ने । दिवेऽदिवे । दोषाऽवस्तः । धिया । वयम् ॥ नमः । भरन्तः । आ । इमसि ॥ ७ ॥
वस्तर्दिनमहोरात्रमभीष्ट प्राणिनां सदा । अल्पा अपि वयं बुद्ध्या त्वामुच्चगुणमीश्वरम् । उपयाम मनःकर्मवाग्भिस्त्वन्नमसम्भराः ॥ १९ ॥
राजन्तमध्वराणा ङ्गोपामृतस्य दीदिविम् । वर्धमानं स्वे दमे ॥ ८ ॥


यवमध्या विरा गायत्री
राजन्तम् । अध्वराणाम् । गोपाम् । ऋतस्य । दीदिविम् ॥ वर्धमानम् । स्वे । दमे ॥ ८ ॥
देदीप्यमानं स्वे सद्मन्यध्वरेशं सदावृधम् । यथार्थज्ञानगोपं त्वामुपेमसि पितेव नः ॥ २० ॥
स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव ॥ सचस्वानस्स्वस्तये ॥ ९, २, १ ॥


विरा गायत्री
सः । नः । पिताऽइव । सूनवे । अग्ने । सुऽउपायनः । भव ॥ सचस्व । नः । स्वस्तये ॥ ९,२,१ ॥
मन्त्रादीनाम् ऋष्यादिस्वरूपनिरूपणम्
भगवतः सर्वविद्यानाम् ऋषित्वे प्रमाणानि
सर्ववेदानां चतुर्मुखब्रह्मा अपि प्रथमद्रष्टा ऋषिः
पञ्चरात्रद्रष्टा शेषः
गरुडशेषयोः सर्वविद्यामुनित्वे द्वितीयं स्थानम्
ऋषिलक्षणम्
विरिञ्चादीनामध्ययने कारणनिरूपणम्
अवान्तरभेदेन यजुर्वेदादीनाम् ऋषयः
ऋषिस्मरणफलम्
स्वायोग्यार्थप्रतिपादक(प्रार्थनादि)वाक्यानां तात्पर्यम्
सर्ववेदाभिमानिन्यः श्रीः भारती च
देवतास्त्रीणामपि स्वभर्त्रनन्तरं सर्ववेदद्रष्ट्रुत्वम्
श्रीभारत्यादीनां छन्दोऽभिमानित्वेन स्मरणकथनम्
छन्दोऽभिमानिदेवतानिरूपणम्
छन्दस्सु अवान्तरभेदनिरूपणम्
सर्वविद्याप्रतिपाद्यदेवतासु तारतम्यनिरूपणम्
मुक्तावपि ज्ञानादिगुणेषु देवानां तारतम्यम्
विद्यावाच्यदेवतास्वरूपनिरूपणम्
यास्कनिरुक्तिः न प्रमाणम्, व्यासनिरुक्तिरेव मानम्
तारतम्यज्ञानेनैव मोक्षः
लक्ष्म्याः ब्रह्माद्युत्तमत्वे मानम्
ब्रह्मणः रुद्राद्युत्तमत्वे मानम्
वायोः रुद्राद्युत्तमत्वे प्रमाणम्
वायोरिन्द्राद्युत्तमत्वे विप्रतिपत्तिनिरासः
इति बर्कश्रुतिश्चाह शक्रात् सप्ताक्षितिश्रुतिः ।
वायोः रुद्राद्युत्तमत्वे मानम्
विष्णोरिन्द्रादाधिक्ये विप्रतिपत्तिनिराकरणम्
वेदादिषु नैकधार्थकत्वमिति निरूपणम्
अदोषः प्रायशो ब्रह्मा इति निरूपणम्
विष्णौ योग-रूढ्यादिना शब्दसमन्वयक्रमः
सूक्तभेदे कारणनिरूपणम्
अभेदस्थलेषु व्याख्यानप्रकारनिरूपणम्
भेद-अभेद-भेदाभेदस्थलनिरूपणम्
मुक्तस्वरूपनिरूपणम्
मोक्षसाधननिरूपणम्
छन्दोज्ञानमपि अवश्यमेवेति निरूपणम्
गायत्रीमन्त्रजप्तुरेव ब्राह्मणत्वम्
स्वराणामर्थनिरूपणम्
दार्ढ्यमेवानुदात्तार्थ उदात्तस्योच्चतार्थता । नीचता स्वरितस्यार्थः प्रचयस्य यथास्थितिः ॥ समाहारेऽखिला अर्थाः स्वरार्थानामियं स्थितिः ॥ ९८ ॥
स्वरभेदे कारणनिरूपणम्
वेदार्थव्याख्यानस्य सत्-असत्फलकत्वे कारणनिरूपणम्
योग्यतावशात् वेदार्थज्ञानम्
प्राचीनव्याख्यातृवन्दनादिकरणे कारणनिरूपणम्
सूपाश्रयो भव त्वं च यद्वदौरससूनवे । रक्ष सन्ततसौख्याय सम्यक्सत्त्वाय वा सदा ॥ २१ ॥ ॥
मुनिस्तु सर्वविद्यानां भगवान् पुरुषोत्तमः । विशेषतश्च वेदानां ‘यो ब्रह्माणम्’ इति श्रुतिः ॥
ऋग्वेदादिकमस्यैव श्वसितं प्राह चापरा ॥ २२ ॥
‘वाचो बभूवुरुशतीर्हयग्रीवात्’ इति स्फुटम् । वचो भागवतेऽप्यस्ति ब्रह्माण्डेऽपि तथा परम् ॥ २३॥
हयग्रीवादिमा विद्याः श्वसितत्वेन निःसृताः । ब्रह्मणा स्वीकृतास्ताश्च रुद्रशेषविपा अपि ॥ २४ ॥
दक्षाद्याः सनकाद्याश्च शक्राद्या मनवस्तथा । जगृहुस्ते च विश्वस्मिंश्चक्रुर्व्याप्तास्ततोऽखिलाः ॥ २५ ॥
उक्तं पद्मपुराणे च ‘कपिलो भगवानजः । प्रोवाच ब्रह्मणे विद्याः’ ‘हृदिस्थो बादरायणः ॥ २६॥
ओङ्कारपूर्विका विद्याः प्रेरयत्यखिलेष्वपि । सदैव ब्रह्मणे पूर्वम्’ इति सात्वतसंहिता ॥ २७॥
सकृन्निगदमात्रेण गृहीतं ब्रह्मणाऽखिलम् । अन्तर्गतस्य व्यासस्य प्रसादान्नित्यशक्तितः ॥ २८ ॥
तेन चानन्तशक्तित्वात् युुगपत् समुदीरितम् । प्रथमप्रतिपत्तृत्वान्मुनिर्ब्रह्माऽखिलस्य च ॥ २९ ॥
सुपर्णोऽखिलवेदानां पञ्चरात्रस्य नागरा ।
द्वितीयप्रतिपत्तृत्वान्मुनित्वे सम्प्रकीर्तितौ ॥ ३० ॥
यः पश्यति स्वयं वाक्यं स ऋषिस्तस्य कीर्तितः । अर्वाक्तु द्वादशावृत्तेरधीत्याप्यृषिरेव सः ॥ ३१॥
यत्स्वयं प्रतिभातस्य संशयार्थं गुरोर्वचः । सुपर्णादेर्विरिञ्चस्य केवलं धर्मकारणम् ॥ ३२ ॥
ऋचामृषिस्ततः शक्रो यजुषां सूर्य एव च । सोमः साम्नां तृतीयास्ते प्रतिपत्तार ईरिताः ॥ ३३ ॥
अथर्वाङ्गिरसामग्निरेकर्षिश्चाप्यथर्वणाम् । इत्युक्ताः समुदायस्य सन्त्यन्ये च पृथक् पृथक् ॥ ३४ ॥
एतज्ज्ञानाददृष्टस्य फलस्याप्तिः स्फुटं भवेत् । द्रष्टॄणां तु चतुर्थानां ज्ञानादप्यैहिकं भवेत् ॥ ३५ ॥
ते चैकस्यापि बहवः स्युः सूक्तस्यर्च एव वा ॥
तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तत्प्राप्तिविशेषतः ॥ ३६॥
तेषां वाक्यस्वरूपेण प्रार्थनादिषु पश्यति । विष्णुर्ब्रह्मा सुपर्णो वा तत्तद्योग्यार्थभेदतः ॥ ३७ ॥
सर्ववेदाभिमानित्वाच्छ्रीर्ब्रह्माणी च भारती । द्रष्ट्र्यश्च सर्वविद्यानां व्याख्यातो ब्रह्मणा मरुत् ॥ ३८ ॥
स्वभर्त्रनन्तरं द्रष्ट्र्यस्तेभ्यस्तन्नोदिता हिरुक् । ताः स्तुवन्ति हरिं नित्यं विद्याभिस्ते च सर्वशः ॥ ३९ ॥
छन्दस्त्वेन मुनित्वेन तासां स्मृतिरुदीरिता । स्मर्तव्यास्ते च सर्वेऽपि मुनित्वेन पृथक्पृथक् ॥ ४०॥
गायत्री बृहती चैव ताः सर्वा गरुडस्तथा । ब्रह्माण्यनुष्टुबिन्द्राणी त्रिष्टप् स्वाहेति चोच्यते ॥ ४१ ॥
गायत्री जगती चैव वारुणी रोहिणी तथा । अनुष्टुप् बृहती चैव तारा पङ्क्तिः शची तथा ॥ ४२ ॥
उष्णिक् सौरी जगत्यश्च सर्वदेवस्त्रियो मताः । विराण्मित्रावरुणयोर्भार्ये इति च कीर्तिते ॥ ४३ ॥
अतिछन्दांसि सर्वाणि सर्वदेव्यः प्रकीर्किताः । विराडिति च नामासां तास्ता ऊनाधिकेष्वपि ॥ ४४ ॥
निचृद् भुरिग् विरा सञ्ज्ञा प्रस्तारेत्यादि नाम च । बह्वीनामेकमानेन त्वेकं नाम च युज्यते ॥ सर्वाभिमानिता चैव तिसृणां तु यथाक्रमम् ॥ ४५ ॥
देवता सर्वविद्यानां स्वयं नारायणः प्रभुः । ऋते तत्र प्रसिद्धाश्च देवता श्रीस्तथाऽत्र च ॥ ४६ ॥
ऋते प्रसिद्धा ब्रह्मैव ततस्तेन क्रमेण च ।
पूर्वप्रसिद्धवर्जं तु शक्रान्ता देवता मताः ॥ ४७॥
ब्रह्मवायू गिरौ वीन्द्रशेषरुद्राश्च तत्स्त्रियः । शक्रकामौ कामपुत्रमनुदक्षाङ्गिरस्सुताः ॥ ४८ ॥
तद्वच्छची रतिः सूर्यसोमधर्मादितत्स्त्रियः । प्रधानमरुतो वारिपतिरग्निश्च मारुताः ॥ ४९ ॥
निर्ऋतिः स्त्रियश्च सूर्यादेरश्विनावितरे तथा । अनन्तकोटिशतकदशार्धाद्यंशतः क्रमात् ॥ ५० ॥
ज्ञानभक्तिबलैश्वर्यपूर्वाखिलगुणैरपि । मुक्तावपि क्रमो ह्येष देवता उदिता इमाः ॥ ५१ ॥
इन्द्रावरा विशेषेण लिङ्गेनैव पृथक्पृथक् । देवतास्तत्र तत्र स्युरेष एव परो विधिः ॥ ५२॥
वेदादिवर्णपर्यन्तैर्मूर्तयः केशवस्य तु । समासव्यासयोगेन वाच्यास्तात्पर्यतः पृथक् । यथायोगं यथान्यायमन्यासामपि मूर्तयः ॥ ५३ ॥
ऋक्संहितायां स्वाध्याये निरुक्ते व्यासनिर्मिते । प्रवृत्ते चैतदखिलमुक्तं हि प्रभुणा स्वयम् ॥ ५४ ॥
‘सर्वे वेदाश्च’ ‘नामानि’ ‘ता वा एता ऋचस्तथा । ‘इन्द्रं मित्रं वरुणम्’ इत्याद्यत्र प्रमा परा ॥ ५५ ॥
देवतातारतम्यं च सर्वोत्कृष्टं च केशवम् । ज्ञात्वैव मुच्यते ह्यस्मान्नान्यथा तु कथञ्चन ॥ ५६॥
इति पैङ्गिश्रुतिश्चाह दृश्यतेऽत्र च सर्वशः । ‘न ते महित्वम्’ इत्यादिनैश्वरानेव केवलान् । गुणान् विष्णोः श्रुतिर्ह्याह नैव दोषान् कथञ्चन ॥ ५७ ॥
‘जाता परिबभूव’ इति मर्यादां ब्रह्मणोऽपि हि । ‘नैव रेमे बिभेद् ब्रह्मा ‘नासीत्’ इत्यादिकानपि ॥ ५८ ॥
दोषान् रुद्रे च तानेव ‘न मिनन्ति’ इति पूर्वकान् । ‘यं कामये तं तमुग्रं’ ‘रुद्राय धनुः’ इत्यपि ॥ ५९ ॥
‘अस्य देवस्य’ ‘मा शिश्नदेवा अपि गुः’ इत्यपि । ‘घ्नञ्छिश्नदेवान्’ इत्याद्या दोषा बहव ईरिताः ॥ ६० ॥
‘ततो वितिष्ठे योनिः’‘स एतावत्यहम्’ इत्यपि । अन्याश्रयत्वं देव्याश्च कथितं बहुशोऽपि हि ।
तदाश्रयत्वमन्येषामपि तत्रैव निश्चयात् ॥ ६१ ॥
‘ब्रह्मैवाग्रे’ इति ह्युक्त्वा रुद्रादीनां ततो जनिः । उक्ता जातानि विश्वानि स पर्यभवदित्यपि । ‘यस्य च्छायामृतं मृत्युः’ इति चादरतोऽब्रवीत् ॥ ६२ ॥
अनन्तादवरेशाना तस्याः प्राणस्ततश्च वाक् । तस्या रुद्र उमा तस्मादिन्द्रस्तस्यास्ततोऽपरे । सौपर्णश्रुतिरित्याह सप्ताक्षितय इत्यपि ॥ ६३ ॥
वायुरस्मा उपामन्थद् विश्वदेवाय वायवे । विश्वैर्देवैः स इत्याद्याः प्रमा अत्रापरा अपि ॥ ६४ ॥
नारायणोऽदितिर्वायुर्वाणी रुद्र उमा विभुः । इतरे च क्रमाद्धीनाः शतांशाद्वायुतोऽवराः ॥ ६५ ॥
‘अयं त एमि तन्वेति’ पूर्वा अन्या अपि स्फुटम् ॥ वायोराधिक्यमप्याहुः
इन्द्रं सोमं हुताशनम् ॥ ६६ ॥
सूर्यं रुद्रमिमान्् पञ्च देवानेको महात्मनः । सृजत्यत्ति महान्प्राण इति चाह तुरश्रुतिः ॥ ६७ ॥
‘वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत । न यस्येन्द्रः’ इति ह्याह विष्णोरिन्द्रस्य हीनताम् ॥ ६८ ॥
‘वेधा अजिन्वत्’ इत्यादि वचनं विष्णुनामतः । आनन्दश्रुतिरप्यस्य जीवतामेव दर्शयेत् ॥ ६९ ॥
आह सूर्यादपीन्द्रस्य वायोर्विष्णोरपीशताम् । ‘यः सूर्यं य उषसम्’ ‘म्रियन्ते पञ्च देवताः’ ॥ ७० ॥
‘चक्षुषा द्यौश्चादित्यश्च’ ‘चक्षोः सूर्यो अजायत’ । ‘यमादित्यो न वेद’ इति पूर्वा श्रुतिरथापरा ॥ ७१ ॥
‘विष्णोर्वातोऽजनिष्ट वातादिन्द्रस्ततो रविः । सोमश्चेति लयोऽप्येवं पूर्वे पूर्वे गुणाधिकाः’ ॥ ७२ ॥
‘विष्णोः प्राणो अजनिष्ट प्राणादिन्द्रो रविर्विधुः । लयोऽप्येतादृशस्तेषां पूर्वः पूर्वो गुणाधिकः’ ॥ ७३ ॥
तुरश्रुतिश्च सौपर्णी पिङ्गश्रुतिरपीदृशी । अतः सर्वाधिको विष्णुर्निर्णीतः श्रुतिसञ्चयात् ॥ ७४ ॥
अतो दोषवचो यत्र तद्वाक्यमवरं वदेत् । निर्दोषतैव विष्णोस्तु क्रमान्मध्यगतेष्वपि ॥ ७५ ॥
‘त्रयोऽर्थाः सर्ववेदेषु दशार्थाः सर्वभारते । विष्णोः सहस्रनामापि निरन्तरशतार्थकम्’ ॥७६ ॥
इति स्कान्दवचो यस्मादर्थभेदव्यपेक्षया । निर्दोषत्वं हरेर्वक्ति दोषमन्येष्वपि क्रमात् ॥ ७७ ॥
तारतम्यस्य विज्ञप्त्यै वचो दोषस्य चार्थवत् ।
‘गुणाः श्रुताः’ इति ह्याह गुणैकनियतिं हरौ ॥ ७८ ॥
‘निर्दोषगुणपूर्णश्च विष्णुरेको न चापरः । अपूर्णा दोषरहिता मायैका तद्वशैव च ॥ ७९ ॥
अदोषः प्रायशो ब्रह्मा दोषवन्तः क्रमात् परे’ । इति मान्यश्रुतिश्चाह भेदोऽर्थानां ततो मतः॥ ८० ॥
रूढिमेव समाश्रित्य विभज्यार्थान् यथाक्रमम् । विदोषगुणपूर्त्यर्थं विष्णौ योगार्थमानयेत् ॥ ८१ ॥
पश्चादेव यथायोगमितरेष्वपि संनयेत् ।
ऋग्वेदसंहितायां च प्रभुणैवं समीरितम् ॥ ८२ ॥
पृथग्रूपाणि विष्णोस्तु देवतान्तरगाणि च । अग्न्यादिसूक्तवाच्यानि नाम्ना सूक्तभिदा भवेत् ॥ ८३ ॥
‘नकिर्माकिः स्मसि’ इत्यादि प्रोक्ताऽधिक्यविवक्षया । ‘आधिक्येऽधिकम्’ इत्येव हरिणा सूत्रमीरितम् ॥ ८४ ॥
‘कृत्वी हत्वी’ इति पूर्वाश्च ‘तृतीयोऽतिशये’ यतः । विश्लिष्टार्थे च विश्लिष्टमूनार्थे चोनमिष्यते। व्यत्ययोऽभेदकरणस्वातन्त्र्येषु समीरितः ॥ ८५ ॥
अभेदो हरिरूपाणां गुणानां च क्रियासु च । तस्यैवावयवानां च भेदः श्रीब्रह्मपूर्वकैः ॥ ८६ ॥
मुक्तैरपि जडैर्भेदः कैमुत्यादेव दृश्यते । ऋग्वेदसंहितायां च प्रोक्तमेतत्समस्तशः ॥ ८७ ॥
अभेदः स्वगुणाद्यैश्च मुक्तानामपि सर्वशः । भेदाभेदस्त्वभेदश्च गुणैः संसारिणामपि । जडानामंशतो भेदः समुदायेन चोभयम् ॥ ८८ ॥
मनुष्यगन्धर्वपितृगणकार्मिकतात्विकाः । देवाः शक्रः शिवो ब्रह्मा मुक्तौ सौख्यादिभिर्गुणैः ॥ ८९॥
शतायुतोत्तरा नित्यमन्योन्यप्रीतिसंयुताः । ’इति सिद्धान्तगं वाक्यं स्वयं भगवतेरितम् ॥ ९०॥
स्वाध्यायस्तत्त्वविज्ञानं विष्णुभक्तिर्विरागता । निषिद्धकर्मसन्त्यागो विहितस्य सदा क्रिया ॥ ९१॥
सदा विष्णुस्मृतिश्चैव केवलं मोक्षसाधनम् । एतैर्विना न मोक्षः स्याद्भवेदेतैरपि ध्रुवम् ॥ ९२॥
‘ऋषिच्छन्दोदैवतानि ज्ञात्वाऽर्थं चैव भक्तितः । स्वाध्यायेनैव मोक्षः स्याद्विरक्तस्य हरिस्मृतेः’ ॥ ९३॥
‘जप्येनैव तु संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥’ ९४ ॥
‘तस्मान्नित्यं हरिं ध्यायन्कुर्यात् स्वाध्यायमञ्जसा ।’ ‘ऐहिकामुष्मिका भोगा रक्तस्यान्यस्तु मुच्यते ।’ इति स्वाध्यायवचनं स्वयं भगवतोदितम् ॥ ९५ ॥
स्वाध्यायात्तु प्रवचने सहस्रगुणितं फलम् । अर्थद्रष्टुः कोटिगुणं ततोऽनन्तं नियामके ॥ ९६ ॥
तर्कागमाभ्यां नियतिं यः करोत्यधिकं ततः । पूर्णं वेदाखिलद्रष्टुर्ब्रह्मणः फलमुच्यते ॥। ९७ ॥
स्तुत्यधर्मस्य भेदेन पदाद्यादिस्वरे भिदा । साधारणो विधिस्त्वेष विशेषो यत्र यत्र च ॥ ९९ ॥
क्रमादेव तदन्येषामृष्यादीनां स्वयोग्यतः ।
विपर्ययार्थकथने विपरीतं तथा तमः ॥ १०० ॥
यावत्प्रयोजको ज्ञाने तावत्तावच्छुभाधिकः । तथैव विपरीतेऽपि स्मृतौ ज्ञाने च तत्समम् ॥ १०१ ॥
तमोनिरयमानुष्यस्वर्गमोक्षातिरेकतः । योग्यतातारतम्येन फलं सर्वेषु चोच्यते । इति प्रवृत्तवचनं विवेकेऽप्येतदीरितम् ॥ १०२ ॥
यादृशो योग्यतां यायात् स ज्ञेयोऽर्थस्तथा स्फुटम् । अनन्तनियमैर्युक्ता अनन्तार्थविशेषिणः । वेदा इति समासेन नियमोऽयं समीरितः ॥ १०३ ॥
ऋक्संहितागतं वाक्यमिति चान्यन्नियामकम् ।
तस्माद्वन्द्याश्च पूज्याश्च ब्रह्माद्या ज्ञानयोजकाः । गुरुत्वेन क्रमादेव विशेषेणैव केशवः ॥ १०४ ॥
आरभ्य स्वगुरुं यावद्विष्णुरेवोत्तरोत्तराः । क्रमान्निष्फलताऽन्यत्र गुरुतत्त्वे समीरिता ॥ १०५ ॥
एवं स्थितेऽग्निगं विष्णुमग्निनामानमेव च । मधुच्छन्दा ऋक्शतेन वाय्वादिगतमेव च । साग्न्यादिं स्तौति सद्भक्त्या तत्तन्नामानमेव च ॥ १०६ ॥

वायुसूक्तम्

मण्डलम्—१. अध्यायः –१.अनुवाकः–१. सूक्तम्–२.
वायो नवर्चम् , मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः ।१-३ वायुः,४-६ इन्द्रवायू, ७-९ मैत्रावरुणः, गायत्री छन्दः ।
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
वायवायाहि दर्शतेमे सोमा अरङ्कृताः ॥ तेषाम्पाहि श्रुधी हवम् ॥ १ ॥


वायो इति । आ । याहि । दर्शत । इमे । सोमाः । अरम्ऽकृताः ॥ तेषाम् । पाहि । श्रुधि । हवम् ॥ १ ॥
(वायुशब्दनिर्वचनम् )
वायुशब्दस्य निर्वचनान्तरम्
वेदार्थः भगवद्गुणाधिक्यनिष्टः
बलत्वादयनाच्चैव वायुरित्यभिधीयते । वात्यायुरिति वा ज्ञानात् वरणादाश्रयत्वतः ॥ १०७ ॥
‘वय बन्धने’ इत्यस्मात् संसारादेर्व्ययादपि । व्येत्यस्मिन्निति वा वायुः ‘वय श्रेष्ठत्वे’ इत्यपि ॥१०८॥
मुख्यतो वासुदेवे ते गुणाः सन्त्येव सर्वशः । अनिषिद्धास्तदन्येषु यथायोग्यतया मताः ॥ १०९ ॥
दर्शतस्ततदृष्टित्वात् सर्वज्ञोऽसौ यतो विभुः । भक्त्या ह्यलङ्कृताः सोमा मनांसि अन्ये हिरण्यतः ॥ हिरण्यालङ्कृता यस्माद्धूयन्ते वायवे सुताः ॥ ११० ॥
तान् पाहि श्रुधि चाह्वानं स्वातन्त्र्ये व्यत्ययोऽप्ययम् । मनोऽपि भोग्यमीशस्य प्रीतिमात्रेण केवलम् ॥ १११ ॥
गुणाधिक्यं येन भवेद् वेदस्यार्थः स एव हि । प्रयोजकत्वान्नान्यस्य फलाभावात्तदर्थता ॥ ११२॥
उपक्रमादयो यत्र तात्पर्यार्थस्स एव हि ॥ स्तुवन्ति शस्त्रैः स्तोतारो यथावद्यज्ञवेदिनः ॥ ११३ ॥ २॥
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः । सुतसोमा अहर्विदः ॥ २ ॥


वायो इति । उक्थेभिः । जरन्ते । त्वाम् । अच्छ । जरितारः ॥ सुतऽसोमाः । अहःऽविदः ॥ २ ॥
वायुस्तुतिः यजमानाभीप्सितसाधनस्वभावा
वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे ॥ उरूची सोम पीतये ॥ ३ ॥


वायो इति । तव । प्रऽपृञ्चती । धेना । जिगाति । दाशुषे ॥ उरूची । सोमऽपीतये ॥ ३ ॥
वाक् त्वत्स्मम्पर्किणी यज्ञकृते प्रापयतीप्सितम् । सोमपायातिमहती महार्थत्वात्त्वदर्थतः ॥ ११४॥३ ॥
इन्द्रवायू देवते
इन्द्रवायू इमे सुता उपप्रयोभिरागतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ ४ ॥


इन्द्रवायू इति । इमे । सुताः । उप । प्रयःऽभिः । आ । गतम् । इन्दवः । वाम् । उशन्ति । हि ॥ ४ ॥
इन्द्रवायुशब्दवाच्यौ उपेन्द्रसङ्कर्षणौ
भगवतः द्विरूपत्वाद् बहुत्वव्यपदेशः
इन्द्रः स परमैश्वर्यादिदमुद्दिश्य च द्रुतेः । ददर्शेदं दीप्तिमत्त्वादिदं रातीति वा भवेत् ॥ ११५ ॥
सोमाभिमानिनो देवा वामिच्छन्ति हि सोमगाः ।
प्रियैरुपागतं तेनोपेन्द्रः सङ्कर्षणो हरिः ॥ ११६ ॥
द्विरूपत्वाद् बहुत्वं च विशेषादेव केवलम् । एकस्यैव हरेर्नात्र भेदः शङ्क्यः कथञ्चन ॥ ११७ ॥
एकमेवाद्वितीयं तत् ‘नेह नानास्ति किञ्चन ।’ ‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥११८ ॥
‘यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानु विधावति’॥ ११९ ॥
उक्त्वा धर्मान् पृथक्त्वस्य निषेधादेवमेव हि । विशेषो ज्ञायते श्रुत्या भेदादन्यश्च साक्षितः ॥१२०॥४ ॥
वायविन्द्रश्च चेतथस्सुतानां वाजिनीवसू । तावायातमुपद्रवत् ॥ ५, ३ ॥


वायो इति । इन्द्रः । च । चेतथः । सुतानाम् । वाजिनीवसू इति वाजिनीऽवसू ॥ तौ । आ । यातम् । उप । द्रवत् ॥ ५, ३ ॥
विजानतः सुतानन्नपतौ सूर्ये सदा स्थितौ । द्रवद्द्रुतं सुतात्पर्यद्योतकोऽभ्यास इष्यते ॥१२१॥ ५, ३ ॥
निचृद् गायत्री
वायविन्द्रश्च सुन्वत आयातमुपनिष्कृतम् ॥ मक्ष्वि१त्था धिया नरा ॥ ६ ॥


वायो इति इन्द्रः । च । सुन्वतः । आ । यातम् । उप । निःऽकृतम् ॥ मक्षु । इत्था । धिया । नरा ॥ ६ ॥
यजन् सुन्वन् कृतस्यानुसारिकर्मैव निष्कृतम् । तदर्थं क्षिप्रमायातं धियेत्थम्भूतयाचलौ ॥ १२२॥
नरौ तावविनाशित्वादुपचारः क्वचिद्भवेत् । अमरत्ववद्यतो मोक्षो देवतानां सुनिश्चितः ॥ १२३॥ ६ ॥
मित्रावरुणौ देवते
मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणञ्च रिशादसम् ॥ धियङ्घृताचीं साधन्ता ॥ ७ ॥


मित्रम् । हुवे । पूतऽदक्षम् । वरुणम् । च । रिशादसम् ॥ धियम् । घृताचीम् । साधन्ता ॥ ७ ॥
मित्रशब्दस्य त्रेधा निरुक्तिः
वरुणशब्दनिर्वचनम्
मित्वा त्रातीति मित्रोऽयं मितमह्ना करोति वा । मितं रातीति वा नित्यं मितं रमयतीति वा ॥ १२४ ॥
आवृणोतीति वरुणस्तमसाऽज्ञानतोऽपि वा । वरमुन्नयतीत्यस्मात् वरानन्दत्वतोऽपि वा ॥ १२५ ॥
पूता दक्षा अनेनेति पूतदक्ष इतीरितः ।
तमाह्वयामि सुखिनं शमदन् रमते यतः । अनूनसुखभोक्तृत्वाद् रिशादा इति कीर्तितः ॥ १२६ ॥
हरिर्घृतः सुशुद्धत्वाद् घृताची च तदञ्चनात् । स्वधीतिसाधको विष्णुर्भक्तानां च यथार्थतः ॥ १२७ ॥॥
ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा ॥ क्रतुम्बृहन्तमाशाथे ॥ ८ ॥


ऋतेन । मित्रावरुणौ । ऋतऽवृधौ । ऋतऽस्पृशा ॥ क्रतुम् । बृहन्तम् । आशाथे इति ॥ ८ ॥
ऋतस्पृक् भगवान्
संहितायां दैर्घ्ये अर्थविशेषनिरूपणम्
नित्यवृद्धः स भगवानृतेनानुपचारतः । ऋतस्पृक् वेदवाच्यत्वात् अन्यौ चेद्भगवान् ऋतः । ऋ गतावित्यतः सर्ववस्तुष्वनुगतत्वतः ॥ १२८ ॥
तेन वृद्धौ तत्स्पृशौ च सर्वदा मित्रवारिपौ ॥
संहितायां तु दैर्ध्यादिरुक्ताधिक्ये पदेऽन्यथा ॥ १२९ ॥
अनन्यार्थत्वविज्ञप्त्यै ईशाथे च महाक्रतुम् ।
महत्सुखं वा ........................... ॥ ८ ॥
कवीनो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षन्दधाते अपसम् ॥ ९, ४, २ ॥


कवी इति । नः । मित्रावरुणा । तुविऽजातौ । उरुऽक्षया ॥ दक्षम् । दधाते इति । अपसम् ॥ ९, ४, २ ॥
............ तुविजौ ब्रह्मजातौ तथाविधौ । हरिस्तथैव भूतत्वात् स्थानं क्षय इहोच्यते ॥१३०॥
कर्मापसं च कर्तारं दक्षं कर्तारमेव वा । अस्मदर्थे दधाते तौ नित्यं बुद्धौ गतागतौ ॥ १३१॥
॥ इति द्वितीयं सूक्तम्॥

अश्विनीसूक्तम्

मण्डलम्—१. अध्यायः –१.अनुवाकः–१. सूक्तम्—३.
अश्विना द्वादशर्चम्, मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः, १-३ अश्विनौ । ४-६ इन्द्रः । ७-९ विश्वेदेवाः । १०-१२ सरस्वती । गायत्री छन्दः(२, ४,११ निचृत्, ४,११ पिपीलिकामध्या)
अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत्पाणी शुभस्पती ॥ पुरुभुजा चनस्यतम् ॥ १ ॥


अश्विना । यज्वरीः । इषः । द्रवत्पाणी इति द्रवत्ऽपाणी । (शुभस्पती इति शुभःऽपती इति) । शुभः । पती इति ॥ पुरुऽभुजा । चनस्यतम् ॥ १ ॥
अश्विशब्दनिर्वचनम्
अन्नानि यज्ञयोग्यानि क्षिप्रहस्तौ शुभाधिपौ । बहुगोपौ बहुभुजौ नो योयजतमश्विनौ ॥ यज्ञे वृत्तान् स्वभागान् वा संयोजयतमाशु वै ॥१३२॥
आशुवानाद् गतेरश्वी क्षिप्रावगतितोऽथवा । अश्नुतेऽखिलमित्येवाप्यश्वजत्वात् तथाऽश्विनौ ॥ १३३ ॥
निचृद् गायत्री
अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया ॥ धिष्ण्या वनतङ्गिरः ॥ २ ॥


अश्विना । पुरुऽदंससा । नरा । शवीरया । धिया ॥ धिष्ण्या । वनतम् । गिरः ॥ २ ॥
बहुकर्मकृतौ सौख्यवीर्यात्मिक्या धिया गिरः । अस्मदीयाः सम्भजतं धिष्ण्यौ सर्वाश्रयौ सदा ॥ १३४ ॥
अश्विनीस्तुतिः
दस्रा युवाकवस्सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः ॥ आयातं रुद्रवर्तनी ॥ ३ ॥


दस्रा । युवाकवः । सुताः । नासत्या । वृक्तऽबर्हिषः ॥ आ । यातम् । रुद्रवर्तनी इति रुद्रऽवर्तनी ॥ ३ ॥
रुद्रवर्तनिशब्दार्थः
भेदकौ सर्वशत्रूणां दस्रौ सम्बन्धिनौ हि वाम् । सुता युवाकवः सोमा यज्वनः स्तृतबर्हिषः । नासत्यौ नासिकासंस्थौ नैव चासद्गुणौ क्वचित् ॥ १३५॥
रुजां द्रावणतो रुद्रो वायुस्तदनुवर्तनात् । स्नेहतोऽनुवशत्वाद्वा तन्मार्गगतितोऽथवा । ‘कस्मिन्न्वहम्’ इति श्रुत्या वासुदेवोऽश्विनावपि ॥ १३६ ॥
रुद्रवर्तनिशब्दोक्ताः ................. ॥ ३ ॥
(पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री) इन्द्रो देवता
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः ॥ अण्वीभिस्तना पूतासः ॥ ४ ॥


इन्द्र । आ । याहि । चित्रभानो इतिचित्रऽभानो । सुताः । इमे । त्वाऽयवः ॥ अण्वीभिः । तना । पूतासः ॥ ४ ॥
पञ्चधा चित्रशब्दनिर्वचनम्
सोम-मनसोरभिमानी चन्द्र एव
.................... चित्रं भद्रं रतं चितौ ॥
चिद्रतेश्चायनीयत्वाद् अदनाद्वा चितोऽभिदा । तादृशा रश्मयो ज्ञानमस्येति भगवान् परः ॥ १३७ ॥
चित्रभानुरिति प्रोक्तस्तेजो वा तादृशं प्रभोः । त्वदिच्छव इमे सोमाः पटीभिस्सूक्ष्मतन्तुभिः ॥ विस्तृत्य शोधिताः ....
.............सूक्ष्मप्रमाभिर्वा मनांसि च ॥१३८॥
सोमानां मनसां चैव देवताः सोमरश्मिगाः । सोमभृत्याः समस्तस्य सोम एवाधिपो हरिः ॥ १३९ ॥
इन्द्रप्रार्थना
इन्द्रायाहि धियेषितो विप्रजूतस्सुतावतः ॥ उप ब्रह्माणि वाघतः ॥ ५ ॥


इन्द्र । आ । याहि । धिया । इषितः । विप्रऽजूतः । सुतऽवतः । उप । ब्रह्माणि । वाघतः ॥ ५ ॥
यज्ञ-होतृ-यजमानानामध्यात्मपरत्वम्
अस्मद्बुद्ध्या प्रार्थितो वा स्वबुद्ध्या प्रेरितोऽपि वा । ब्राह्मणैः प्रेरितो भक्त्या वदतो होतुरञ्जसा ॥ १४० ॥
ब्रह्माणि सोमयुक्तानि यजमानस्य वेच्छतः ।
उपायाह्यपि यः कोऽपि साधको यज्ञकृन्मतः । मानसो वाचिको वा स्याद्यज्ञो होता ह्वयन् स च ॥ १४१॥
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः ॥ सुते दधिष्व नश्चनः ॥ ६, ५ ॥


इन्द्र । आ । याहि । तूतुजानः । उप । ब्रह्माणि । हरिऽवः ॥ सुते । दधिष्व । नः । चनः ॥ ६, ५ ॥
पञ्चप्राणाः हरिशब्दवाच्याः
वेगवांस्तूतुजानः स्यात् संसारमुपसंहरन् । वर्तते येन हरिवा हरिभिर्वर्ततेऽथ वा ॥ १४२ ॥
हरणाद्विषयाणां च प्राणा हरय ईरिताः । तेषु वर्तत इत्यस्मात्तान् वाऽथ गमयेदसौ ॥१४३ ॥
हरिवा हरिवान् वाऽपि विष्णुना वर्ततेऽथवा । चनो मन इह प्रोक्तं सुखं च क्वचिदीर्यते ॥१४४॥६,५॥
विश्वेदेवा देवताः
ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वेदेवास आगत ॥ दाश्वांसो दाशुषस्सुतम् ॥ ७ ॥


ओमासः । चर्षणिऽधृतः । विश्वे । देवासः । आ । गत ॥ दाश्वांसः । दाशुषः । सुतम् ॥ ७ ॥
आ समन्तात् स्वीकृता मा ओमा इति च शब्दिताः । ओनामा भगवान् विष्णुस्तेन वा निर्मिताः सुराः ॥ ओता मानेषु मावैषु प्रोता ओमा इतीरिताः ॥१४५॥
प्रजाश्चर्षणयः प्रोक्ता विश्वे ते च प्रवेशनात् । सर्वे वाऽथ विशां वानाच्छब्दः कस्मै यथा भवेत् ॥१४६॥
दातारो यजमाना वा... .......... ॥ ७ ॥
अप्शब्दः कर्मवाची
विश्वे देवासो अप्तुरस्सुतमागन्त तूर्णयः ॥ उस्रा इव स्वसराणि ॥ ८ ॥


विश्वे । देवासः । अप्ऽतुरः । सुतम् । आ । गन्त । तूर्णयः ॥ उस्राः ऽइव । स्वसराणि ॥ ८ ॥
..................अप्तुरः कर्मवेगिनः ।
उस्रास्तु रश्मयश्चैव स्वसराणि दिनानि च ॥ १४७ ॥ ८ ॥
विश्वे देवासो अस्रिध एहि मायासो अद्रुहः ॥ मेधञ्जुुषन्त वह्नयः ॥ ९ ॥


विश्वे । देवासः । अस्रिधः । एहिऽमायासः । अद्रुहः ॥ मेधम् । जुषन्त । वह्नयः ॥ ९ ॥
असंसारादस्रिधस्ते देवाश्चेन्मोक्षनिश्चयात् । यथेष्टनिश्चितज्ञाना एहिमायाः समन्ततः ॥१४८ ॥
अदुःखत्वादद्रुहस्ते मेधं यज्ञं जुषन्तु नः । वह्नयो वहनादस्य ॥ ९ ॥
सरस्वतीदेवता
पावका नस्सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती ॥ यज्ञं वष्टु धिया वसुः ॥ १० ॥


पावका । नः । सरस्वती । वाजेभिः । वाजिनीऽवती ॥ यज्ञम् । वष्टु । धियाऽवसुः ॥ १० ॥
सरस्वतीशब्दार्थो भगवान्
वाजिनीशब्दार्थनिरूपणम्
वाजिनीवती सरस्वती
...............शोधकत्वात्तु पावका ॥ १४९ ॥
सरणात् सर्वगत्वेन सर्वज्ञो वा सरो हरिः । सरसः सरतित्वाद्वा तद्वत्येव सरस्वती । हरौ गुणाः सरश्शब्दा देवी तु हरिवाचिनी ॥ १५०॥
हरिप्रियत्वतो वायुः सरस्वांस्तत्प्रियाऽथवा । गुणस्त्वेन ततत्वाद्वा भगवांस्तु सरस्वती ॥ १५१॥
स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो भगवान्न नपुंसकः । स्त्रीपुन्दोषविहीनत्वादपि तच्छब्दगोचरः ॥ १५२ ॥
अन्नेनो वाजिनामीशो वाजिनी सूर्य उच्यते । वाजीनच्छन्दसां वाऽपि स्वामी प्रोक्तः स वाजिनी ॥ १५३॥
छन्दांस्यश्वा यतस्तस्य ते चेना अन्यवाजिना । अन्नवत्त्वाद्वाजिनी वाग् ज्ञानयुद्धत्वतोऽपि वा ॥१५४॥
स पुत्रो वागुमा तस्याः पुत्री तद्वाजिनीवती ॥ सरस्वती हरिर्वाऽपि यज्ञं वहतु नोऽशनैः ॥ १५५ ॥
अन्नदा हि सदा देवी धिया सह वसेद्यतः । धियावसुर्नित्यबोधा .............. ॥ १० ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
चोदयित्री सूनृतानाञ्चेेतन्ती सुमतीनाम् ॥ यज्ञन्दधे सरस्वती ॥ ११ ॥


चोदयित्री । सूनृतानाम् । चेतन्ती । सुऽमतीनाम् । यज्ञम् । दधे । सरस्वती ॥ ११ ॥
सर्वकर्मणां वाक्-बुद्धिमूलत्वम्
वेदे णिज्लोपनिमित्तकथनम्
....................सुवाचां प्रेरका सदा ॥ १५६ ॥
सुबुद्धिज्ञापिका सैव स्वातन्त्र्याल्लुप्तयो भवेत् । अनेनैव प्रकारेण सैव यज्ञादिधारिणी ॥ १५७ ॥ ११ ॥
महो अर्णस्सरस्वती प्रचेतयति केतुना ॥ धियो विश्वा विराजति ॥ १२, ६, ३, १ ॥


महः । अर्णः । सरस्वती । प्र । चेतयति । केतुना ॥ धियः । विश्वाः । वि । राजति ॥ १२,६,३,१ ॥
अर्णो भगवान्
॥ इति तृतीयं सूक्तम् ॥
सूक्त-अनुवाकयोः लक्षणम्
मूलवेदे शाखादिविभागकारणनिरूपणम्
अष्टकाध्यायादिविभागभेदे कारणनिरूपणम्
वेदोद्धारे कारणान्तरनिरूपणम्
महो अर्णः परं ब्रह्म तेजस्त्वाच्च महत्त्वतः ।
अरमानन्दरूपत्वात् णो हि निर्वृतिवाचकः ॥ १५८ ॥
तज्ज्ञापयति सा देवी ज्ञानं दत्वा महत्तरम् । महो अर्णः स्वयं देवः स्वमात्मानं प्रकाशयेत् । विराजयति विश्वाश्च धियः सुज्ञानदानतः ॥ १५९ ॥
सूक्तं त्वनारतं प्रोक्तम् अनुवागेककालिका ॥ (वेदेषु आवापोद्वापे हेतुनिरूपणम्) अन्यथात्वं च तत्र स्यादावापोद्वापतस्त्वृचाम् ॥ १६०॥
वेदानन्तत्वविज्ञप्त्यै तौ चक्रे बादरायणः ।
ऋचः स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदं कृतवान् प्रभुः । यजूंषि निगदाच्चैव तथा सामानि सामतः ॥१६१॥
एवं पुराणवचनादुद्धृता हि ततस्ततः । ऋचः शाखात्वमापन्नाः शिष्यतच्छिष्यकैरिमाः ॥१६२॥
मानस्तेनेति पूर्वासु ह्यूनता दृश्यतेऽर्थतः । शुनःशेपोदिताभ्यश्च पठ्यन्तेऽन्यत्र काश्चन ॥ १६३॥
अत्राप्यक्रमतो दृष्टिरिति नैकक्रमो भवेत् ।
अनन्तत्वात्तु वेदानां प्रायः कर्मानुसारतः । सङ्क्षेेपं कृतवान् देवः शिष्याश्च तदनुज्ञया ॥ १६४ ॥
अष्टकाध्यायवर्गादि भेदं च कृतवान् प्रभुः । स्वाध्यायविश्रमार्थाय तस्मात् क्रमविपर्ययः ॥ १६५ ॥
तत्र तत्रैवान्तरिता दृश्यन्ते च खिला अपि । यत्रार्थे न विशेषोऽस्ति पदान्तरितताऽत्र च । यत्राल्पोऽपि विशेषोऽस्ति पदं नान्तरितं भवेत् ॥ १६६ ॥
॥ इति तृतीयं सूक्तम् ॥

ऐन्द्रसूक्तम्

मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–२ सूक्तम् – ४
सुरूपकृत्नुं दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा ऋषिः, गायत्री,३ विरा १० निचृत् , इन्द्रः देवतामुद्गलः– द्वितीयानुवाके चत्वारि सूक्तानि । तत्र सुरूपम् इत्यादिकम् दशर्चं प्रथमसूक्तम् । इन्द्रं पृच्छ इति चतुर्थ्याम् ऋचि लिङ्गदर्शनात् इन्द्रो देवता ॥
सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे ॥ जुहूमसि द्यविऽद्यवि ॥ १ ॥


सुरूपऽकृत्नुम् । ऊतये । सुदुघाम्ऽइव । गोऽदुहे ॥ जुहूमसि । द्यविऽद्यवि ॥ १ ॥
इष्टार्थसिद्धये रक्षणाय च भगवति प्रार्थना
विष्णुं सुरूपकर्तारमभिप्रेतार्थसिद्धये । त्राणाय वा कामधेनुमिव दोहाय तत्स्थितेः ॥१६७॥
दिने दिने स्वाह्वयामः.......... ॥ १ ॥
सोमपानार्थमिन्द्रप्रार्थना
उप नस्सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब ॥ गोदा इद्रेवतो मदः ॥ २ ॥


उप । नः । सवना । आ । गहि । सोमस्य । सोमऽपाः । पिब ॥ गोऽदाः । इत् । रेवतः । मदः ॥ २ ॥
................ज्ञानदोऽस्यैव चाधिकम् । ज्ञानाख्यरयियुक्तस्य हिरण्यादिमतोऽपि वा ॥ १६८॥
सुखकारी भवान् ......॥ २ ॥
विराड् गायत्री
अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम् ॥ मानो अतिख्य आगहि ॥ ३ ॥


अथ । ते । अन्तमानाम् । विद्याम । सुऽमतीनाम् ॥ मा । नः । अति । ख्यः । आ । गहि ॥ ३ ॥
.................तस्माल्लभेम सुमतीस्तव । अन्ते मितास्त्वद्विषया मतयो ह्युत्तमोत्तमाः ॥ अस्मानतीत्य मा पश्य करुणार्द्रदृशा सदा ॥१६९॥ ३ ॥
परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रम्पृच्छा विपश्चितम् ॥ यस्ते सखिभ्य आवरम् ॥ ४ ॥


परा । इहि । विग्रम् । अस्तृतम् । इन्द्रम् । पृच्छा । विपःऽचितम् ॥ यः । ते । सखिऽभ्यः । आवरम् ॥ ४ ॥
मन्मनो वाऽथ शक्रो वा दूरेऽपि परमेश्वरम् । गच्छाग्राह्यमनष्टं च व्याप्तचित्तं य एव च ॥ सखिभ्य उत्तमो नित्यम् ................॥ ४ ॥
उत ब्रुवन्तु नोनिदो निरन्यतश्चिदारत । दधाना इन्द्र इद्दुवः ॥ ५, ७ ॥


उत । ब्रुवन्तु । नः । निदः । निः । अन्यतः । चित् । अरत ॥ दधानाः । इन्द्रे । इत् । दुवः ॥ ५, ७ ॥
..................निदस्तस्य समीपगाः ॥ १७०॥
तेऽपि ब्रुवन्तु नो देवं प्रापुर्ये चान्यतोऽपि तम् । निर्गत्याज्ञानतस्त्वस्माद् दधाना ईश एव च । दुवः प्राणान् ब्रुवं त्वेव तेऽपि नः परमेश्वरम् ॥१७१॥५ ॥
उत नः सुभगा अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः ॥ स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि ॥ ६ ॥


उत । नः । सुऽभगान् । अरिः । वोचेयुः । दस्म । कृष्टयः । स्याम । इत् । इन्द्रस्य । शर्मणि ॥ ६ ॥
अरयोऽपि प्रजा अस्मान् वोचेयुः सुभगान् सदा । शत्रुभेदिंस्तवेन्द्रस्य स्यामैवानुग्रहे सुखे ॥१७२॥ ६ ॥
एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियन्नृमादनम् ॥ पतयन्मन्दयत्सखम् ॥ ७ ॥


आ । र्इम् । आशुम् । आशवे । भर । यज्ञऽश्रियम् । नृऽमादनम् । पतयत् । मन्दयत्ऽसखम् ॥ ७ ॥
आशुवीर्य तवैवाशुं सोमं क्षिप्रं मनोऽपि वा । आभरस्वोदरे तुष्ट्या हृदि वा यज्ञभूषणम् ॥ १७३॥
ईमेव पुंमदकरं मदादुत्पतनादिके । हेतुं मन्दत्वहेतुं च तत्सखीनां पुरोगतेः ॥१७४॥७॥
अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः ॥ प्रावो वाजेषु वाजिनम् ॥ ८ ॥


अस्य । पीत्वा । शतक्रतो इतिशतऽक्रतो । घनः । वृत्राणाम् । अभवः । प्र । आवः । वाजेषु । वाजिनम् ॥ ८ ॥
एनं पीत्वा बहुज्ञानाभूस्तमोभिरनावृतः । प्रसादादेव मुक्तेषु तमो सह्यतया घनः ॥ १७५॥
आवृतेरेव वृत्राणि ह्यज्ञानान्यन्नदं नरम् । प्रावो युद्धेषु योद्धारं भक्तं ज्ञानिनमेव च ॥ १७६॥ ८ ॥
अज्ञानादिभिः सह युद्धे रक्षणाय इन्द्रप्रार्थना
तन्त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामश्शतक्रतो । धनानामिन्द्र सातये ॥ ९ ॥


तम् । त्वा । वाजेषु । वाजिनम् । वाजयामः । शतक्रतो इति शतक्रतो ॥ धनानाम् । इन्द्र । सातये ॥ ९ ॥
योधयामो वयं तं त्वां ज्ञानादिधनलब्धये । अज्ञानाद्यस्मदरिभिः ..............॥ ९ ॥
यो रायो३ऽवनिर्महान्त्सुपारस्सुन्वतस्सखा ॥ तस्मा इन्द्राय गायत ॥ १०, ८, ४ ॥


यः । रायः । अवनिः । महान् । सुऽपारः । सुन्वतः । सखा ॥ तस्मै । इन्द्राय । गायत ॥ १०, ८, ४ ॥
कम्पस्वरस्य अर्थविशेषनिरूपणम्
............ योऽशेषद्रविणावनिः । सुखदः संसृतेः पारस्तस्मा इन्द्राय गायत ॥ १७७ ॥
कम्पोऽशेषग्रहे क्वापि लज्जायां वा पुरातने । पृथक्त्वे धृष्यतायां वा हरिणर्क्संहितोदितः ॥१७८ ॥ १० ॥
॥ इति चतुर्थं सूक्तम् ॥

ऐन्द्रसूक्तम्

मण्डलम्—१. अध्यायः–१. अनुवाकः–२. सूक्तम्–५.
‘आ त्वा’ दशर्चम् । वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा गायत्री (१ विरा, ३ पिपीलिका मध्या निचृत्, ५-७, ९ निचृत्, ८ पादनिचृत्) इन्द्रो देवता
विराड् गायत्री
आ त्वेता निषीदतेन्द्रमभि प्र गायत ॥ सखायस्स्तोमवाहसः ॥ १ ॥


आ । तु । आ । इत । नि । सीदत । इन्द्रम् । अभि । प्र । गायत ॥ सखायः । स्तोमऽवाहसः ॥ १ ॥
आर्ची उष्णिक्
पुरूतमम्पुरूणामीशानं वार्याणाम् ॥ इन्द्रं सोमे सचा सुते ॥ २ ॥


पुरुऽतमम् । पुरूणाम् । ईशानम् । वार्याणाम् । इन्द्रम् । सोमे । सचा । सुते ॥ २ ॥
सुपूर्णानां पूर्णतमं वरेण्यानामधीश्वरम् । सुते सोमे सुखेनैव स चागायत तं प्रभुम् ॥१७१॥ २ ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
स घा नो योग आभुवत्स राये स पुरन्ध्याम् ॥ गमद्वाजेभिरास नः ॥ ३ ॥


सः । घ । नः । योगे । आ । भुवत् । सः । राये । सः । पुरम्ऽध्याम् ॥ गमत् । वाजेभिः । आ । सः । नः ॥ ३ ॥
घशब्द अवधारणार्थः
मुक्तौ योगायाऽसमन्ताद् भवेन्नो घोऽवधारणे । स एव भगवान् ज्ञानवित्ताय स च बुद्धिगः ॥ १८०॥
बुद्धिः पुराश्रयत्वेन पुरन्धिः पत्न््नयथापि वा । पत्न््नयर्थत्वे तु तादर्थ्यं सोऽन्नैः सह न आव्रजेत् ॥१८१॥३ ॥
यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रवः ॥ तस्मा इन्द्राय गायत ॥ ४ ॥


यस्य । सम्ऽस्थे । न । वृण्वते । हरी इति । समत्ऽसु । शत्रवः । तस्मै । इन्द्राय । गायत ॥ ४ ॥
यस्य स्थितौ न वृणुते हर्यग्रमपि शत्रवः । मनः पुरो वा विषयहरणान्मन एव च । बुद्धिश्च हरिशब्दोक्ते तमआदीनि शत्रवः ॥१८२॥४ ॥
निचृद् गायत्री
सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये ॥ सोमासो दध्याशिरः ॥ ५, ९ ॥


सुतऽपाव्ने । सुताः । इमे । शुचयः । यन्ति । वीतये ॥ सोमासः । दधिऽआशिरः ॥ ५, ९ ॥
सोमपे शुचयः सोमाः प्राप्त्यै दधिविमिश्रिताः । मनांसि ध्यानयुक्तानि वायान्ति हरये सदा ॥ १८३ ॥५,९ ॥
निचृद् गायत्री
त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः ॥ इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो ॥ ६ ॥


त्वम् । सुतस्य । पीतये । सद्यः । वृद्धः । अजायथाः ॥ इन्द्र । ज्यैष्ठ्याय । सुक्रतो इति सुऽक्रतो ॥ ६ ॥
सदा पूर्णः शुभज्ञानज्यैष्ठ्यव्यक्त्यै सुताप्तये । न क्षुदादेरभिव्यक्तोऽभवः......... ॥ ६ ॥
निचृद् गायत्री
आ त्वा विशन्त्वाशवस्सोमास इन्द्र गिर्वणः ॥ शन्ते सन्तु प्रचेतसे ॥ ७ ॥


आ । त्वा । विशन्तु । । आशवः । सोमासः । इन्द्र । गिर्वणः ॥ शम् । ते । सन्तु । प्रऽचेतसे ॥ ७ ॥
......................... गीर्भिर्वृतप्रभो । प्रकृष्टचेतास्त्वद्भृत्यो योऽस्मै स्युः शङ्कराः सुताः ॥ १८४॥७ ॥
पादनिचृद् गायत्री
त्वां स्तोमा अवीवृधन्त्वामुक्था शतक्रतो ॥ त्वां वर्धन्तु नो गिरः ॥ ८ ॥


त्वाम् । स्तोमाः । अवीवृधन् । त्वाम् । उक्था । शतक्रतो इति शतऽक्रतो ॥ त्वाम् । वर्धन्तु । नः । गिरः ॥ ८ ॥
विष्णोः वृद्धित्वे आकाशदृष्टान्तः
व्यञ्जयन्त्यधिकं स्तोमाः साम््नयुक्थान्यृक्षु चैव हि । महागुणैः व्यञ्जयन्तु गिरोऽस्माकमपि प्रभो ॥ १८५ ॥
आकाशवृद्धिवद् वृद्धिर्विष्णोः स्यान्नैव चान्यथा । ‘न वर्धते नोकनीयान््’ इति ह्येनं श्रुतिर्जगौ ॥ १८६॥
महातात्पर्यरोधाच्च श्रुत्यर्थो नापरो भवेत् । यद्यन्यापेक्षया वृद्धिरीशत्वं स्यात् कुतोऽस्य च ॥ अक्षितोतिरिति ह्यस्मात् पूर्णाभिप्रायतोदिता ॥ १८७॥८ ॥
पादनिचृद् गायत्री
अक्षितोतिः सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्रिणम् ॥ यस्मिन्विश्वानि पौंस्या ॥ ९ ॥


अक्षितऽऊतिः । सनेत् । इमम् । वाजम् । इन्द्रः । सहस्रिणम् ॥ यस्मिन् । विश्वानि । पौंस्या ॥ ९ ॥
अनन्तफलदं वाजमस्मत्तो लभतां स च । ददातु वा पौरुषाणि शक्तयो यत्र चाखिलाः ॥ १८८ ॥
अतश्चानन्तशक्तित्वान्न वृद्ध्याद्याः कथञ्चन । सर्वोपेतेत्येतमर्थमभिप्रेत्याह वेदरा ॥ १८९॥९ ॥
भगवति बन्धमुक्ति-संसारवधप्रार्थना
मानो मर्ता अभिद्रुहन्तनूनामिन्द्र गिर्वणः ॥ ईशानो यवया वधम् ॥ १०, १०, ५ ॥


मा । नः । मर्ताः । अभि । द्रुहन् । तनूनाम् । इन्द्र । गिर्वणः ॥ ईशानः । यवय । वधम् ॥ १०,१०,५ ॥
मा मर्तानस्तनूनां तु द्रोग्धारः स्युः कथञ्चन । ईशोऽस्यपाकुरु वधं तेन नो मुक्तिदानतः ॥ १९०॥
मानुषेभ्यस्तनूनां च नैव नः स्युर्विपत्तयः । कालेन दैवतः प्राप्तः स्याददेहत्वतो वधः ॥ १९१ ॥ १० ॥
॥ इति पञ्चमं सूक्तम् ॥

इन्द्रसूक्तम्

मण्डलम्—१.अध्यायः–१.अनुवाकः–२. सूक्तम्—६.
द्वितीयानुवाके तृतीयं सूक्तम् । युञ्जन्ति दशर्चम् , वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिःः १-२,४ मरुतः, ३-५ इन्द्रमरुतौ, ६-१० इन्द्रो देवता गायत्रीछन्दः (१२ विरा, ४.८ निचृत्)
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषञ्चरन्तम्परि तस्थुषः ॥ रोचन्ते रोचना दिवि ॥ १ ॥


युञ्जन्ति । ब्रध्नम् । अरुषम् । चरन्तम् । परि । तस्थुषः । रोचन्ते । रोचना । दिवि ॥ १ ॥
पौंस्यानि वासुदेवस्य ब्रध्नं वृद्धं दिवाकरम् । अरुणं चरन्तं परितो गिरीन्युञ्जन्ति सर्वदा ॥ १९२ ॥
तैरेवान्यानि चन्द्रादि रोचनानि त्रिविष्टपे । रोचयन्ति ॥ १ ॥
विराड् गायत्री
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे ॥ शोणा धृष्णू नृवाहसा ॥ २ ॥


युञ्जन्ति । अस्य । काम्या । हरी इति । विऽपक्षसा । रथे ॥ शोणा । धृष्णू इति । नृऽवाहसा ॥ २ ॥
.........हरी चास्य मनोबुद्धी स्वशक्तयः । युञ्जन्त्यधिगुणत्वेन काम्यावश्वावथापि वा ॥ १९३ ॥
विशिष्टपक्षसंयुक्ताविव क्षिप्रतरौ सदा । रथे देहेऽपि वा देवाः स्वमनो बुद्धिमेव च ॥ १९४ ॥
अस्य देहे प्रयुञ्जन्ति सूर्यादीन् स्थापयन्ति च । सूर्यादिस्थापकत्वं च ब्रह्मादीनां भवेत् सदा ॥ १९५॥
शोणौ च शमणौ प्रोक्तौ सुखप्राप्तौ यतस्सदा । श्यामौ मूर्धनि शोणौ च शक्राश्वावग्रगौ स्मृतौ ॥
धृष्टौ नॄन् प्रति तं वेशं वहन्तौ तावुभावपि ॥ १९६॥२ ॥
इन्द्रो मरुतश्च देवताः
केतुङ्कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे ॥ समुषद्भिरजायथाः ॥ ३ ॥


केतुम् । कृण्वन् । अकेतवे । पेशः । मर्याः । अपेशसे ॥ सम् । उषत्ऽभिः । अजायथाः ॥ ३ ॥
अज्ञाय कुर्वन् सज्ज्ञानं हेमाहेमाय चेश्वरः । उषद्भिः सम्प्रकाशद्भिः शक्तिभिर्व्यक्ततामगाः ॥ १९७ ॥
मर्या मरणवन्तोऽपि देवा एवम् ............॥ ३ ॥
निचृद् गायत्री, मरुतः देवताः
आदहस्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे ॥ दधाना नाम यज्ञियम् ॥ ४ ॥


आत् । अह । स्वधाम् । अनु । पुनः । गर्भऽत्वम् । आऽर्इरिरे ॥ दधानाः । नाम । यज्ञियम् ॥ ४ ॥
.......................हरेर्वशात्॥ तदैव सुखमन्वेव पुनर्गूढत्वमापिरे ॥ १९८॥
स्वेच्छयैव परेशस्य शक्तयो देवता अपि । यज्ञे वाच्यं दधानाश्च नाम ........ ॥ ४ ॥
इन्द्रो मरुतश्च देवताः
वीळुचिदारुजत्नुभिर्गुहाचिदिन्द्र वह्निभिः ॥ अविन्द उस्रिया अनु ॥ ५, ११ ॥


वीळुु । चित् । आरुजत्नुऽभिः । गुहा । चित् । इन्द्र । वह्निऽभिः ॥ अविन्दः । उस्रियाः । अनु ॥ ५,११ ॥
....................... वीु दृढं ह्यपि ॥ १९९ ॥
आरुजद्भिः स्वसामर्थ्यैर्गुहायां संस्थितोऽपि सन् । वहद्भिरखिलं लोकं प्रकाशत्वानि लब्धवान् ।
देवैर्वैतादृशैः साकमानुकूल्येन लब्धवान् ॥ २००॥ ५॥
इन्द्रो देवता
देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद्वसुङ्गिरः ॥ महामनूषत श्रुतम् ॥ ६ ॥


देवऽयन्तः । यथा । मतिम् । अच्छ । विदत्ऽवसुम् । गिरः ॥ महाम् । अनूषत । श्रुतम् ॥ ६ ॥
सम्यक्प्रद्योतयन्तोऽमुं मतिरूपं यथास्थितम् । विदद्वित्तं महान्तं च विश्रुतं सुगिरोऽस्तुवन् ॥ २०१ ॥ ६ ॥
इन्द्रो देवता
इन्द्रेण सं हि दृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा ॥ मन्दू समानवर्चसा ॥ ७ ॥


इन्द्रेण । सम् । हि । दृक्षसे । सम्ऽजग्मानः । अबिभ्युषा ॥ मन्दू इति । समानऽवर्चसा ॥ ७ ॥
तस्य सन्दर्शनायैव सङ्गतस्तेन शङ्करः । मखात्मा पुरुहूतो वा श्रीभूमी च सुखात्मिके ॥ २०२ ॥७ ॥
निचृद् गायत्री, इन्द्रो देवता
अनवद्यैरभिद्युभिर्मखस्सहस्वदर्चति ॥ गणैरिन्द्रस्य काम्यैः ॥ ८ ॥


अनवद्यैः । अभिद्युऽभिः । मखः । सहस्वत् । अर्चति ॥ गणैः । इन्द्रस्य । काम्यैः ॥ ८ ॥
अनवद्यैर्महाज्ञानैः प्रियैर्देवगणैः सह । वायुना च सहार्चन्ति सुधीत्वात् परमेश्वरम् ॥२०३ ॥ ८ ॥
इन्द्रो देवता
अतः परिज्मन्नागहि दिवो वा रोचनादधि ॥ समस्मिन्नृञ्जते गिरः ॥ ९ ॥


अतः । परिऽज्मन् । आ । गहि । दिवः । वा । रोचनात् । अधि ॥ सम् । अस्मिन् । ऋञ्जते । गिरः ॥ ९ ॥
अनुक्रमणिकोेक्तदेवताविमर्शः
अतो हेतोरिहायाहि दिवो वा सूर्यमण्डलात् । परिज्मन् सर्वगास्माकमधिकृत्य समर्हणम् ॥ अस्मिन् गिरः प्राप्नुवन्ति सम्यक्परममुख्यतः ॥ २०४ ॥
युञ्जन्तीत्यत्र बाहुल्यात् देवयन्तोत इत्यपि । बाहुल्यादृ(ल्यात् दृष्टि)ष्टितो गीर्भिर्विनाऽर्थो नान्य इष्यते ॥ २०५॥ ९ ॥
इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि ॥ इन्द्रं महो वा रजसः ॥ १०, १२, ६ ॥


इतः । वा । सातिम् । ईमहे । दिवः । वा । पार्थिवात् । अधि ॥ इन्द्रम् । महः । वा । रजसः ॥ १०, १२, ६ ॥
इतो दिवो वा पातालात् सातिं लाभस्वरूपिणम् । महतो रञ्जकात् विष्णोर्लोकाद्वा तमधीमहे ॥ २०६ ॥ १०,१२,६ ॥
॥ इति षष्टं सूक्तम् ॥

ऐन्द्रसूूक्तम्

मण्डलम् —१.अध्यायः–१. अनुवाकः-२. सूक्तम्—७.
द्वितीयानुवाके चतुर्थम् ‘इन्द्रं’ दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिः, गायत्री (२ निचृत्, ८, १० पिपीलिकामध्या निचृत्,९ पादनिचृत्) इन्द्रो देवता
इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः ॥ इन्द्रं वाणीरनूषत ॥ १ ॥


इन्द्रम् । इत् । गाथिनः । बृहत् । इन्द्रम् । अर्केभिः । अर्किणः ॥ इन्द्रम् । वाणीः । अनूषत ॥ १ ॥
तमेव गाथिनः साम्ना स्तुवन्त्यृग्भिश्च बह्वृचाः । बृहन्तमन्यवाणीभिरपि .............. ॥ १ ॥
निचृद् गायत्री
इन्द्र इद्घर्योः सचा सम्मिश्ल आवचो युजा ॥ इन्द्रो वज्री हिरण्ययः ॥ २ ॥


इन्द्रः । इत् । हर्योः । सचा । सम्ऽमिश्लः । आ । वचःऽयुजा ॥ इन्द्रः । वज्री । हिरण्ययः ॥ २ ॥
भक्तशरीररथाधिरूढो भगवान्
हिरण्ययो भगवान्
.................. हर्यो विमिश्रितः ॥ २०७ ॥ रथेऽथवा मनोबुद्ध्योर्वाङ्मात्रेणैव योगिनोः ॥
सचा सुखेन वज्री च ज्ञानानन्दो हि धातुतः । हितश्च रमणीयश्च हिरण्यय इतीरितः ॥ २०८ ॥२ ॥
इन्द्रस्य पर्वतादिनियन्तृत्वमहिमावर्णनम्
इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आसूर्यं रोहयद्दिवि ॥ वि गोभिरद्रिमैरयत् ॥ ३ ॥


इन्द्रः । दीर्घाय । चक्षसे । आ । सूर्यम् । रोहयत् । दिवि ॥ वि । गोभिः । अद्रिम् । ऐरयत् ॥ ३ ॥
दीर्घकालं दर्शनाय सूर्यमारोहयद्दिवि । ज्ञानैरादरयोग्यं च प्राणात्मानं समैरयत् ॥ २०९॥३ ॥
निचृद् गायत्री
इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च ॥ उग्र उग्राभिरूतिभिः ॥ ४ ॥


इन्द्र । वाजेषु । नः । अव । सहस्रऽप्रधनेषु । च ॥ उग्रः । उग्राभिः । ऊतिऽभिः ॥ ४ ॥
बहुभिर्युध्यमानेषु युद्धेष्वपि सदाऽव नः । दुष्टोग्रैः सदभिप्रायैः ...... ॥ ४ ॥
मोक्ष-सासांरिकपुरुषार्थार्थ भगवत्प्रार्थना
इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे ॥ युजं वृत्रेषु वज्रिणम् ॥ ५, १३ ॥


इन्द्रम् । वयम् । महाऽधने । इन्द्रम् । अर्भे । हवामहे ॥ युजम् । वृत्रेषु । वज्रिणम् ॥ ५, १३ ॥
.................महदल्पधनार्थिनः । हवामहेऽरिवर्ज्यं तं तमसां प्रतियोगिनम् ॥ २१० ॥ ५॥
अविद्यावरणापसरणार्थं भगवति प्रार्थना
स नो वृषन्नमुञ्चरुं सत्रादावन्नपावृधि ॥ अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः ॥ ६ ॥


सः । नः । वृषन् । अमुम् । चरुम् । सत्राऽदावन् । अप । वृधि ॥ अस्मभ्यम् । अप्रतिऽस्कुतः ॥ ६ ॥
अस्मदीयं चरुं भोज्यमानन्दं त(त्व)मपावृणु । मोक्षगं सर्वदातस्त्वमप्रतिद्वन्द्व नो वृषन् ॥२११॥६ ॥
स्तोमा अपि न साकल्येन विष्णुवाचकाः
तुञ्जे तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः ॥ न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥ ७ ॥


तुञ्जेऽतुञ्जे । ये । उत्ऽतरे । स्तोमाः । इन्द्रस्य । वज्रिणः ॥ न । विन्धे । अस्य । सुऽस्तुतिम् ॥ ७ ॥
त्वयैव प्रेरणे जाते तत्र तत्र य उत्तराः । तेऽपि स्तोमाः सुष्टुतित्वमस्यानन्त्यान्न चाप्नुयुः ॥ २१२॥७ ॥
भगवतः प्रेरकत्वे वृषदृष्टान्तः
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
वृषा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्त्योजसा ॥ ईशानो अप्रतिष्कुतः ॥ ८ ॥


वृषा । यूथा इव । वंसगः । कृष्टीः । इयर्ति । ओजसा ॥ ईशानः । अप्रतिऽस्कुतः ॥ ८ ॥
प्रतिवीरो वृषा वंसस्तद्गन्ता वंसगो विभीः । यूथान्याकर्षति यथा प्रजाः प्रेरयति प्रभुः । अल्पस्यापि प्रसिद्ध्यैव दृष्टान्तत्वं तु युज्यते ॥२१३॥८॥
पादनिचृद् गायत्री
य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति ॥ इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम् ॥ ९ ॥


यः । एकः । चर्षणीनाम् । वसूनाम् । इरज्यति ॥ इन्द्रः । पञ्च । क्षितीनाम् ॥ ९ ॥
पञ्चविधप्रजापालको भगवान्
राजा भवति वित्तानां प्रजानां चैक एव यः । देवगन्धर्वदैतेयपितृमानुषभेदतः । प्रजानामपि पञ्चानां सामान्याच्च विशेषतः ॥२१४॥९ ॥
केवलशब्दवाच्य इन्द्रः पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः ॥ अस्माकमस्तु केवलः ॥ १०, १४, ७, २ ॥


इन्द्रम् । वः । विश्वतः । परि । हवामहे । जनेभ्यः ॥ अस्माकम् । अस्तु । केवलः ॥ १०, १४, ७, २ ॥
सम्यग्घवामहे सर्वगतं च व्यक्तरूपतः । स्थातुमेकत्र वोऽर्थाय जना नोऽस्तु स केवलः ॥ २१५ ॥ ॥ १०,१४,७,२ ॥
॥ इति सप्तमं सूक्तम् ॥

ऐन्द्रसूक्तम्

मण्डलम्—१.अध्यायः–१ .अनुवाकः–३. सूक्तम्– ८.
‘एन्द्रम्’ दशर्चम्, वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाः ऋषिः, गायत्री च्छन्दः (१,५,८ निचृत्, २ प्रतिष्ठा, १० वर्धमाना) इन्द्रो देवता
निचृद् गायत्री
इन्द्रे ज्ञानप्रार्थना
एन्द्र सानसिं रयिं सजत्वानं सदा सहम् ॥ वर्षिष्ठमूतये भर ॥ १ ॥


आ । इन्द्र । सानसिम् । रयिम् । सऽजित्वानम् । सदाऽसहम् ॥ वर्षिष्ठम् । ऊतये । भर ॥ १ ॥
जयिना सहितं लाभयुक्तं वित्तं सदाबलम् । वर्षिष्ठं सुमहद्रक्षानिमित्तं नित्यदा भर ॥ २१६ ॥ १ ॥
भगवद्दत्तज्ञानादिना बाह्य-आन्तरशत्रुपराजयः
विराड् गायत्री
नियेन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै ॥ त्वोतासो न्यर्वता ॥ २ ॥


नि । येन । मुष्टिऽहत्यया । नि । वृत्रा । रुणधामहै ॥ त्वाऽऊतासः । नि । अर्वता ॥ २ ॥
उपसर्गावृत्त्या क्रियापदावृत्तिः
येनारीन् मुष्टियुद्धेन तमांसि ज्ञानयुद्धतः । त्वत्प्रेरिता निरुन्धामः कांश्चिद्वा तुरगादिभिः ॥
आवृत्त्यैवोपसर्गस्य क्रियाऽऽवृत्तिर्भविष्यति ॥२१७॥२ ॥
इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रङ्घना ददीमहि ॥ जयेम संयुधि स्पृधः ॥ ३ ॥


इन्द्र । त्वाऽऊतासः । आ । वयम् । वज्रम् । घना । ददीमहि ॥ जयेम । सम् । युधि । स्पृधः ॥ ३ ॥
त्वत्प्रेरिता ज्ञानरतिं दृढत्वेनाऽददीमहि ॥ ३ ॥
वयं शूरेभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम् ॥ सासह्याम पृतन्यतः ॥ ४ ॥


वयम् । शूरेभिः । अस्तृऽभिः । इन्द्र । त्वया । युजा । वयम् ॥ ससह्याम । पृतन्यतः ॥ ४ ॥
त्वया पृतन्यतः शत्रूनभिष्याम सुयोद्धृभिः ॥२१८॥४ ॥
निचृद् गायत्री
महा इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे ॥ द्यौर्न प्रथिना शवः ॥ ५, १५ ॥


महान् । इन्द्रः । पर । च । नु । महिऽत्वम् । अस्तु । वज्रिणे ॥ द्यौः । न । प्रथिना । शवः ॥ ५, १५ ॥
जीवस्य ब्रह्मभावो न चिन्त्यः
शवशब्दः सुखबलवाचकः
यस्मान्महाननादिश्च विष्णुर्जीवोऽवरस्तथा । तस्यैवास्तु महत्त्वं तन्न जीवब्रह्मतां स्मरेत् ।
आकाशवत् प्रथिम्नाऽसौ शवः सुखबले तथा ॥ २१९॥५॥
(७६) समोहे वाय आशत नरस्तोकस्य सनितौ ॥ विप्रासो वा धियायवः ॥ ६ ॥


भगवदज्ञानिनः पशवः
अन्यसंवहनेनापि ये तं प्राप्ता जनार्दनम् । ज्ञानलाभेन तु नरस्त एव पशवो परे । विप्राश्चैव धिया युक्ता मूर्खाः शूद्रसमा मताः॥२२०॥६॥
भगवत इष्टदत्वे समुद्रदृष्टान्तः
यः कुक्षिस्सोमपातमस्समुद्र इव पिन्वते ॥ उर्वीरापो न काकुदः ॥ ७ ॥


यः । कुक्षिः । सोमऽपातमः । समुद्रःऽइव । पिन्वते ॥ उर्वीः । आपः । न । काकुदः ॥ ७ ॥
यः कुक्षिस्तस्य देवस्य समुद्र इव सोऽखिलान् । कामान् क्षरति भक्ताय महाप इव तर्पकाः ॥ काकुदस्तस्य जिह्वास्तु बह्व्यो बहुमुखेषु याः ॥२२१॥७ ॥
निचृद् गायत्री
एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही ॥ पक्वा शाखा न दाशुषे ॥ ८ ॥


एव । हि । अस्य । सूनृता । विऽरप्शी । गोऽमती । मही ॥ पक्वा । शाखा । न । दाशुषे ॥ ८ ॥
एवमेवास्य वाणी च वेदेता महती तथा । पक्वा शाखेव यजते वरदात्री विरप्शिनः ॥ २२२॥ बलिष्ठस्य हि ते ................. ॥ ८ ॥
एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते ॥ सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे ॥ ९ ॥


एव । हि । ते । विऽभूतयः । ऊतयः । इन्द्र । मावते ॥ सद्यः । चित् । सन्ति । दाशुषे ॥ ९ ॥
............सन्ति सद्योऽपि यजते हि ते । मावते ज्ञानिने नित्यमूतयश्च विभूतयः ॥ २२३॥९ ॥
वर्धमाना गायत्री
एवा ह्यस्य काम्यास्तोम उक्थं च शंस्या ॥ इन्द्राय सोमपीतये ॥ १०, १६, ८ ॥


एव । हि । अस्य । काम्या । स्तोमः । उक्थम् । च । शंस्या ॥ इन्द्राय । सोमऽपीतये ॥ १०, १६, ८ ॥
स्तोमा उक्थानि चैवास्य तस्मै काम्यानि सर्वदा । गेयाः शंस्यानि सोमस्य पीतये नान्यथा पिबेत् ॥ २२४ ॥ १० ॥
॥ इति अष्टमं सूक्तम् ॥

ऐन्द्रसूक्तम्

मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम्—९.
इन्द्रेहि दशर्चम् , ऋषिः - मधुच्छन्दाः, गायत्री छन्दः, इन्द्रो देवता
निचृद् गायत्री
इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिस्सोमपर्वभिः ॥ महा अभिष्टिरोजसा ॥ १ ॥


इन्द्र । आ । इहि । मत्सि । अन्धसः । विश्वेभिः । सोमपर्वऽभिः ॥ महान् । अभिष्टिः । ओजसा ॥ १ ॥
सोमपाः सोमपर्वाणः सर्वं यस्मात्तदिच्छया । अभिष्टिरोजसा नित्यं मदं सुखमवाप्स्यसि ॥२२५ ॥ १ ॥
एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने ॥ चक्रिं विश्वानि चक्रये ॥ २ ॥


आ । र्इम् । एनम् । सृजत । सुते । मन्दिम् । इन्द्राय । मन्दिने ॥ चक्रिम् । विश्वानि । चक्रये ॥ २ ॥
एनमासृजतेन्दौ च विष्णुं तं मदकारिणम् । मन्दिने विष्णवे सम्यक्कर्मिणं सर्वकर्मिणे ॥ २२६॥२॥
निचृद् गायत्री
मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिस्स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे ॥ सचैषु सवनेष्वा ॥ ३ ॥


मत्स्व । सुऽशिप्र । मन्दिऽभिः । स्तोमेभिः । विश्वऽचर्षणे ॥ सचा । एषु । सवनेषु । आ ॥ ३ ॥
स्वानन्द विश्वजीवेश मत्स्वास्मद्रक्षया सह ॥ ३ ॥
वेदोच्चारणं भगवद्गुणप्रतिपादनार्थमेव
असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत । अजोषा वृषभं पतिम् ॥ ४ ॥


असृग्रम् । इन्द्र । ते । गिरेः । प्रति । त्वाम् । उत् । अहासत ॥ अजोषाः । वृषभम् । पतिम् ॥ ४ ॥
त्वन्निस्सृता वेदवाचस्त्वां प्रत्येवाप्यनारतम् ॥ २२७ ॥
उच्चैर्मुख्यतया सम्यग्विसृष्टाः स्वपतिं प्रति । अजोषाः स्तुत्यरूपेण त्वत्सेव्यास्त्वदृते क्वचित् ॥ २२८॥४ ॥
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
सञ्चोेदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम् ॥ असदित्ते विभु प्रभु॥ ५, १७ ॥


सम् । चोदय । चित्रम् । अर्वाक् । राधः । इन्द्र । वरेण्यम् ॥ असत् । इत् । ते । विऽभु । प्रऽभु ॥ ५, १७ ॥
इन्द्रे भगवति ऐश्वर्यार्थं प्रार्थना
अर्वाङ् नीचान् प्रति त्वस्मान् भद्रं राधः प्रचोदय । अस्त्येव ते विशेषेण प्रकृष्टं शुभमच्युतम् ॥ २२९॥५॥
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री
अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः ॥ तुविद्युम्न यशस्वतः ॥ ६ ॥


अस्मान् । सु । तत्र । चोदय । इन्द्र । राये । रभस्वतः । तुविऽद्युम्न । यशस्वतः ॥ ६ ॥
रभस्वतः शब्दवतः स्तोतॄनस्मान् यशस्वतः । तत्र त्वयि महाराये महाकीर्ते सुचोदय ॥ २३०॥६ ।
निचृद् गायत्री
सङ्गोेमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत् ॥ विश्वायुर्धेह्यक्षितम् ॥ ७ ॥


सम् । गोऽमत् । इन्द्र । वाजऽवत् । अस्मे इति । पृथु । श्रवः । बृहत् ॥ विश्वऽआयुः । धेहि । अक्षितम् ॥ ७ ॥
अस्मास्वतिबृहज्ज्ञानं नित्यं सन्धेहि चाक्षयम् ॥ ७ ॥
इन्द्रे विद्या-कीर्ति-अविकलदेहादिप्रार्थना
अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युुम्नं सहस्रसातमम् ॥ इन्द्र ता रथिनीरिषः ॥ ८ ॥


अस्मे इति । धेहि । श्रवः । बृहत् । द्युम्नम् । सहस्रऽसातमम् ॥ इन्द्र । ताः । रथिनीः । इषः ॥ ८ ॥
प्रार्थनावाक्ये पौनरुक्त्यं न दोषाय
विद्यां कीर्तिं सदेहान्नं बहुलाभयुतं बृहत् । प्रार्थने पौनरुक्त्यं न चोदयेति ततः पुनः ॥२३१॥८ ॥
वसोरिन्द्रं वसुपतिङ्गीर्भिर्गृणन्त ऋग्मियम् ॥ होम गन्तारमूतये ॥ ९ ॥


वसोः । इन्द्रम् । वसुऽपतिम् । गीःऽभिः । गृणन्तः । ऋग्मियम् ॥ होम । गन्तारम् । ऊतये ॥ ९ ॥
वसोर्वसूनां च पतिं देवदेवेश्वरं प्रभुम् । ऋङ्मेयमाह्वयामोऽत्र गृणन्तोऽभीष्टसिद्धये ॥२३२॥९ ॥
निचृद् गायत्री
सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरिः । इन्द्राय शूषमर्चति ॥ १०, १८, ९ ॥


सुतेऽसुते । निऽओकसे । बृहत् । बृहते । आ । इत् । अरिः ॥ इन्द्राय । शूषम् । अर्चति ॥ १०, १८, ९॥
अविनाश्यरिरुद्दिष्टो बृहच्छूषं सुखं प्रति । सुते सुते सद्गृहाय देवाय बृहतेऽर्चति ॥ २३३ ॥ १० ॥
॥ इति नवमं सूक्तम् ॥

ऐन्द्रसूक्तम्

मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम् – १०
तृतीयानुवाके तृतीयं सूक्तम् ऐन्द्रसूक्तम् गायन्ति द्वादश मधुच्छन्दाः अनुष्टुप्, इन्द्रो देवता
विराडनुष्टुप्
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः ॥ ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥ १ ॥


गायन्ति । त्वा । गायत्रिणः । अर्चन्ति । अर्कम् । अर्किणः ॥ ब्रह्माणः । त्वा । शतक्रतो इति शतऽक्रतो । उत् । वंशम्ऽइव । येमिरे ॥ १ ॥
ऋक्-सामादिभिः भगवत्स्तुतिः
गायन्ति सामगास्त्वृग्भिः शंसन्त्यृग्वेदिनोऽन्तिकम् । विरिञ्चास्त्वां बहुज्ञान शक्रकेतुमिवोच्छ्रितम् ॥ २३४ ॥
व्यजानन् .............. ॥ १ ॥
विराडनुष्टुप्
यत्सानोस्सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् । तदिन्द्रो अर्थञ्चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥ २ ॥


यत् । सानोः । सानुम् । आ । अरुहत् । भूरि । अस्पष्ट । कर्त्वम् ॥ तत् । इन्द्रः । अर्थम् । चेतति । यूथेन । वृष्णिः । एजति ॥ २ ॥
मुक्तामुक्तसमूहेनापि सेव्यो भगवान्
..........उच्चतोऽप्युच्चं सामर्थ्यं करणे तव । ततोऽपि भूरि यत्तेन चेतत्यर्थमतो भवान् ॥ मुक्तामुक्तसमूहेन शोभते गूढशक्तिमान् ॥ २३५ ॥
उच्चादुच्चं विरिञ्चादिगतं कर्तृत्वमेव यत् । भूरि स्पष्टमभूत्तेन परेशस्य ततश्च सः । चेतत्यर्थानशेषांश्च महायूथेन चेष्टते ॥ २३६॥ २ ॥
इन्द्रे अस्मदीयस्तुतिश्रवणार्थं प्रार्थना
विराडनुष्टुप्
युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा । अथान इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिञ्चर ॥ ३ ॥


युक्ष्व । हि । केशिना । हरी इति । वृषणा । कक्ष्यऽप्रा ॥ अथ । नः । इन्द्र । सोमऽपाः । गिराम् । उपऽश्रुतिम् । चर ॥ ३ ॥
कक्ष्याभिः पूरकौ पुष्ट्या युङ्क्ष्व त्वं केशिनौ हरी । अथोपगम्य शृणु नो गिरः ............. ॥ ३ ॥
भुरिग् उष्णिक्
एहि स्तोमामभि स्वराभि गृणीह्यारुव । ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञञ्च वर्धय ॥ ४ ॥


आ । इहि । स्तोमान् । अभि । स्वर । अभि । गृणीहि । आ । रुव ॥ ब्रह्म । च । नः । वसा इति । सचा । इन्द्र । यज्ञम् । च । वर्धय ॥ ४ ॥
..................अभिस्वर च स्तुतिम् ॥ २३७ ॥
प्रशंसां कुरु शब्दं च पुनर्हर्षान्महत्तरम् । ब्रह्म यज्ञं च नोऽन्तस्थो बहिष्ठश्चैव वर्धय ॥ २३८॥४ ॥
विराडनुष्टुप्
उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनम्पुरु निष्षिधे ॥ शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत्सख्येषु च ॥ ५ ॥


उक्थम् । इन्द्राय । शंस्यम् । वर्धनम् । पुरु निःऽसिधे ॥ शक्रः । यथा । सुतेषु । नः । ररणत् । सख्येषु । च ॥ ५ ॥
नित्यवृद्धविष्णोः वर्धनाभिप्रायः
नित्यवृद्धत्वतो विष्णोर्वर्धनं तु प्रकाशनम् । बहुशत्रून्निष्षिदसौ हरिर्दनुजघातकः ॥ २३९ ॥
अस्मत्सख्याय शब्दं च चकारास्मासु संस्थितः । यथा सुतेषु सोमेषु करोत्यृत्विक्षु च स्थितः ॥ २४०॥५ ॥
तमित्सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये । स शक्र उत नश्शकदिन्द्रो वसु दयमानः ॥ ६, १९ ॥


तम् । इत् । सखिऽत्वे । र्इमहे । तम् । राये । तम् । सुऽवीर्ये ॥ सः । शक्रः । उत । नः । शकत् । इन्द्रः । वसु । दयमानः ॥ ६, १९ ॥
शक्रशब्दवाच्यो विष्णुः
तमेव शरणं नित्यं सखित्वाद्यर्थमीमहे । शक्त्यानन्दस्वरूपत्वाच्छक्रः सर्वत्र चाशकत् । अस्माकं च सदा वित्तं दददेव प्रवर्तते ॥ २४१॥६॥
सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः । गवामपव्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः ॥ ७ ॥


सुऽविवृतम् । सुनिःऽअजम् । इन्द्र । त्वाऽदातम् । इत् । यशः ॥ गवाम् । अप । व्रजम् । वृधि । कृणुष्व । राधः । अद्रिऽवः ॥ ७ ॥
विस्पष्टं सुष्ट्वकाल्यं यशस्त्वद्दत्तमेव हि । गूढं ज्ञानसमूहं त्वं विवृण्वृद्धिं च नः कुरु ॥२४२॥
अद्रिरादरणीयत्वात् प्राणस्तद्वर्तकोऽद्रिवाः । हरिः शक्रस्तथाऽद्रीणां छेदनाद्वारणादपि ॥ २४३॥ ७ ॥
नहि त्वा रोदसी उभे ऋधायमाणमिन्वतः ॥ जेषस्स्वर्वतीरपस्सङ्गा अस्मभ्यन्धूनुहि ॥ ८ ॥


नहि । त्वा । रोदसी इति । उभे इति । ऋघायमाणम् । इन्वतः ॥ जेषः । स्वःऽवतीः । अपः । सम् । गाः । अस्मभ्यम् । धूनुहि ॥ ८ ॥
न त्वामृघायमाणं हि वर्धमानं तु रोदसी । सम्प्राप्नुतः श्रीभूमी च सहिते वाऽप्रसादतः ॥ २४४॥
अपः प्रजाः सुखवतीरजयस्त्वद्वशत्वतः । ज्ञानानि सन्धूनुहि च प्रापयोच्चा अपि स्वयम् ॥ २४५॥८॥
आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवन्नूचिद्दधिष्व मे गिरः । इन्द्र स्तोममिमम्मम कृष्वायुजश्चिदन्तरम् ॥ ९ ॥


आश्रुत्ऽकर्ण । श्रुधि । हवम् । नु । चित् । दधिष्व । मे । गिरः ॥ इन्द्र । स्तोमम् । इमम् । मम । कृष्व । युजः । चित् । अन्तरम् ॥ ९ ॥
बहुश्रवणकर्णास्मदाह्वानं शृृणु चादरात् । औव च गिरो धेहि मयि स्तोमं च मत्कृतम् ॥ २४६॥
प्रियं योगादपि कुरु ........... ॥ ९ ॥
विद्मा हि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवनश्रुतम् ॥ वृषन्तमस्य हूमह ऊतिं सहस्रसातमाम् ॥ १० ॥


विद्म । हि । त्वा । वृषन्ऽतमम् । वाजेषु । हवनऽश्रुतम् ॥ वृषन्ऽतमस्य । हूमहे । ऊतिम् । सहस्रसातमाम् ॥ १० ॥
मधुच्छन्दसः शतर्चित्वविवरणम्
....................विद्म त्वां शक्तिमत्तमम् । श्रोतारं युत्सु चाह्वानमाह्वयामस्तवावनम् ॥ २४७॥
बहुलाभोत्तममिति ............... ॥ १० ॥
.................स्थानान्तरगते ऋचौ । दृष्ट्वेन्द्रं यज्ञगं याभ्यां मधुच्छन्दाः समस्तुवत् । आतून इति तेनैव न विरुद्धा शतर्चिता ॥ २४८॥॥
आतून इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतम्पिब ॥ नव्यमायुः प्रसूतिर कृधी सहस्रसामृषिम् ॥ ११ ॥


आ । तु । नः । इन्द्र । कौशिक । मन्दसानः । सुतम् । पिब ॥ नव्यम् । आयुः । प्र । सु । तिर । कृधि । सहस्रऽसाम् । ऋषिम् ॥ ११ ॥
मात्रा कुशैर्गृहीतत्वाज्जन्मन्यासीत् स कौशिकः । गाधित्वाद्वा हिरण्याण्डकोशस्थत्वात् हरिस्तथा ॥ २४९॥
मन्दसानो नित्यसुखी स्तुत्यमायुश्च नस्तिर । ऋषिं सहस्रलाभं मां कुरु च............... ॥ ११ ॥
वाचां भगवद्विषयकत्वप्रार्थना
परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः ॥ वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ १२, २०, १० ॥


परि । त्वा । गिर्वणः । गिरः । इमाः । भवन्तु । विश्वतः ॥ वृद्धऽआयुम् । अनु । वृद्धयः । जुष्टाः । भवन्तु । जुष्टयः ॥ १२, २०, १० ॥
मधुच्छन्दसा पुनर्दृष्टऋक्सङ्ख्याविवरणम्
........................त्वा इमा गिरः ॥ २५०॥
सर्वदा परितः सन्तु मदीयाः सर्वलाभिनम् । वृद्धिरूपा गिरो जुष्टाः सेवारूपाश्च सन्तु नः ॥ २५१॥१२॥
अष्टावृचः पुनस्तेन दृष्टा अन्यत्र गास्तपः । कुर्वता...............................॥ ॥
॥ इति दशमं सूक्तम् ॥

इन्द्रसूक्तम्

मण्डलम्–१,अध्यायः–१.अनुवाकः–३. सूक्तम् – ११
इन्द्रम् अष्टौ, मधुच्छन्दाः ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, इन्द्रो देवता
वेदवाचः इन्द्रप्रकाशकाः
निचृद् अनुष्टुप्
इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्र व्यचसङ्गिरः ॥ रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिम्पतिम् ॥ १ ॥


इन्द्रम् । विश्वाः । अवीवृधन् । समुद्रऽव्यचसम् । गिरः ॥ रथिऽतम् । रथिनाम् । वाजानाम् । सत्ऽपतिम् । पतिम् ॥ १ ॥
.... सम्यगुद्रिक्तगुणव्यक्तिस्तथाऽभिधः ॥ १५२ ॥ १ ॥
निचृद् अनुष्टुप्
सख्येत इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते ॥ त्वामभि प्रणोनुमो जेतारमपराजितम् ॥ २ ॥


सख्ये । ते । इन्द्र । वाजिनः । मा । भेम । शवसः । पते ॥ त्वाम् । अभि । प्र । नोनुमः । जेतारम् । अपराऽजितम् ॥ २ ॥
निचृद् अनुष्टुप्
पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न विदस्यन्त्यूतयः ॥ यदी वाजस्य गोमतस्स्तोतृभ्यो मंहते मघम् ॥ ३ ॥


पूर्वीः । इन्द्रस्य । रातयः । न । वि । दस्यन्ति । ऊतयः ॥ यदि । वाजस्य । गोऽमतः । स्तोतृऽभ्यः । मंहते । मघम् ॥ ३ ॥
प्रथमानि महत्त्वेन ते दानान्यवनानि च । न भिद्यन्ते न नश्यन्ति गोमदन्नं यशस्तथा ॥ २५३ ॥
यदि मंहते ददातीशः ............. ॥ ३ ॥
पुराम्भिन्दुर्युवाकविरमितौजा अजायत ॥ इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः ॥ ४ ॥


पुराम् । भिन्दुः । युवा । कविः । अमितऽओजाः । अजायत ॥ इन्द्रः । विश्वस्य । कर्मणः । धर्ता । वज्री । पुरुऽस्तुतः ॥ ४ ॥
भुरिग् -उष्णिक्
त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम् ॥ त्वान्देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ॥ ५ ॥


त्वम् । वलस्य । गोऽमतः । अप । अवः । अद्रिऽवः । बिलम् ॥ त्वाम् । देवाः । अबिभ्युषः । तुज्यमानासः । आविषुः ॥ ५ ॥
वलशब्दार्थकथनम्
सरमाकथानिरूपणम्
................वलस्तिर्यग्गतिर्धियः । वाचामन्यार्थबुद्धेस्तु बिलं मूलं तमो हि यत् । तदपावृतवांस्त्वं च प्रदर्श्य विनिवार्य च ॥ २५४ ॥
त्वां हि देवा भयापेताः प्रेर्यमाणास्त्वयैव च । छाद्यमानं गिरा दैत्यैररक्षन्निव सद्गिरा ॥ २५५॥
इन्द्रस्य गोसवार्थे च समुत्सृष्टा जगत्यपि । चर्तुं गावो हृता दैत्यैः सरमारक्षिताः पुरा । तस्याः स्वसृत्वमुक्त्वैव तयोच्छिष्टं च गोपयः ॥ २५६॥
तदर्थं पणयो नाम ते दैत्या बलपूर्वकाः । इन्द्रेण निहताः पश्चाज्ज्ञात्वा च सरमाकृतम् ॥ २५७॥
ताडयित्वा पदा वक्त्रात् सृते पयसि तां भयात् । शरणागतां प्रेषयित्वा दूत्येन पणिनां पुनः ॥ २५८॥
भित्वा गिरिव्रजं तं च गावो यत्र प्रतिष्ठिताः । निःसारिताः पुनस्ताश्च गोसवेनेष्टमेव च ॥ तदा देवा भीत्यैव परितो जुगुपुः पतिम् ॥ २५९॥५ ॥
तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन् ॥ उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः ॥ ६ ॥


तव । अहम् । शूर । रातिऽभिः । प्रति । आयम् । सिन्धुम् । आऽवदन् ॥ उप । अतिष्ठन्त । गिर्वणः । विदुः । ते । तस्य । कारवः ॥ ६ ॥
तव दानैरहं सिन्धुं नदीं प्रत्यागमं पुनः । त्वामावदन् स्तुतिपदैर्यज्ञदीक्षार्थमुद्यतः ॥ २६०॥
उपातिष्ठन्त कर्तारो विदुस्त्वां यो गिरोदित ॥ ६ ॥
वृत्रघ्ने इन्द्रे विद्याप्रार्थना
मायाभिरिन्द्र मायिनन्त्वं शुष्णमवातिरः ॥ विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर ॥ ७ ॥


मायाभिः । इन्द्र । मायिनम् । त्वम् । शुष्णम् । अव । अतिरः ॥ विदुः । ते । तस्य । मेधिराः । तेषाम् । श्रवांसि । उत् । तिर ॥ ७ ॥
शक्तिभिः शक्तिमन्तं त्वं शोषकं वृत्रमातिरः ॥ २६१॥
तमो वा त्वां विदुर्मेधारतास्तेषां श्रवांसि च । विद्या उच्चैस्तरां देहि .................॥ ७ ॥
निचृदनुष्टुप्
इन्द्रमीशानमोजसाऽभि स्तोमा अनूषत ॥ सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥ ८,२१,११,३॥


इन्द्रम् । ईशानम् । ओजसा । अभि । स्तोमाः । अनूषत ॥ सहस्रम् । यस्य । रातयः । उत । वा । सन्ति । भूयसीः ॥ ८, २१, ११, ३ ॥
........यस्तुवन्ति त्वां सहौजसा ॥ २६२ ॥ ८, २१, ११, ३ ॥
॥ इति एकादशं सूक्तम् ॥
इति तृतीयोऽनुवाकः
अनुक्रमणिकोक्तऋषिविषये मानाभावः
ऋक्संहितायाः स्वाध्यायात् प्रबन्धाद्व्यासनिर्मितात् । ब्राह्मणेभ्यस्तथा मानात् प्रोक्ताः स्युर्मुनयोऽत्र ये ॥ २६३॥
श्रुत्यभावादलिङ्गाच्च मुनिर्नान्यः प्रतीयते । श्रुतिलिङ्गान्यता यावत्तावत्पूर्वा प्रमा भवेत् ॥ २६४ ॥
शतर्ग्भिरुत्तराभिस्तु वह्निनामानमच्युतम् । अस्तौन्मेधातिथिस्ताभ्य उत्तरा अपि तद्-दृशः ॥ २६५॥
अन्यत्रगास्तपस्यन् स ता ददर्श कदाचन । कालस्थानान्तरत्वं चेत्सङ्ख्यातोऽभ्यधिकं भवेत् ॥ २६६॥
अन्यस्थानगता अन्यदृष्टा अप्यत्रगा यदि । सङ्ख्यान्तर्भावमेष्यन्ति ता इतोपगता यतः ॥ २६७॥

अग्निसूक्तम्

मण्डलम्—१.अध्यायः–१.अनुवाकः–४. सूक्तम्–१२.
मेधातिथिः काण्वः ऋषिः, गायत्री च्छन्दः, अग्निः देवता
अग्निर्देवदूतः
अग्निन्दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् ॥ अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्


अग्निम् । दूतम् । वृणीमहे । होतारम् । विश्वऽवेदसम् ॥ अस्य । यज्ञस्य । सुऽक्रतुम् ॥ १ ॥
दूतलक्षणम्
यज्ञभागार्थमत्रस्थो देवैः सम्प्रेषितो यतः । दूतोऽग्निर्वासुदेवश्च तत्तत्प्रार्थितकृद्यतः । विश्ववेदाः स सर्वज्ञो यज्ञज्ञो यज्ञसुक्रतुः ॥ २६८ ॥ १ ॥
अग्न्यन्तर्गतः अग्निनामा च परशुरामः
अग्निमग्निं हवीमभिस्सदा हवन्त विश्पतिम् ॥ हव्यवाहम्पुरुप्रियम् ॥ २ ॥


अग्निम्ऽअग्निम् । हवीमऽभिः । सदा । हवन्त । विश्पतिम् । हव्यऽवाहम् । पुरुऽप्रियम् ॥ २ ॥
अग्निनामा जामदग्न्यो भगवान् सम्प्रकीर्तितः । तस्य रूपबहुत्वेन वीप्सा चैवोपपद्यते । हवीमभिर्ऋगाह्वानैराह्वयन्त प्रजापतिम् ॥ २६९॥ २ ॥
निचृद् गायत्री
अग्ने देवा इहावह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे ॥ असि होता न ईड्यः ॥ ३ ॥


अग्ने । देवान् । इह । आ । वह । जज्ञानः । वृक्तऽबर्हिषे ॥ असि । होता । नः । ईड्यः ॥ ३ ॥
जज्ञानो व्यज्यमानस्तु वृक्तं प्रस्तुतमुच्यते । यजमानो वृक्तबर्हिः ...................॥ ३ ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
ता उशतो विबोधय यदग्ने यासि दूत्यम् ॥ देवैरासत्सि बर्हिषि ॥ ४ ॥


तान् । उशतः । वि । बोधय । यत् । अग्ने । यासि । दूत्यम् । देवैः । आ । सत्सि । बर्हिषि ॥ ४ ॥
....................बोधयेशेच्छतः सुरान् ॥ २७०॥ देवैः सहोपविशसि.......... ॥ ४ ॥
निचृद्गायत्री
घृताहवन दीदिवः प्रतिष्म रिषतो दह ॥ अग्ने त्वं रक्षस्विनः ॥ ५ ॥


घृतऽआहवन । दीदिऽवः । प्रति । स्म । रिषतः । दह ॥ अग्ने । त्वम् । रक्षस्विनः ॥ ५ ॥
.................... यस्य ते सुघृतं हविः । रिषतो नाशकान् रक्षो जनान् प्रति दहैव च ॥ २७१॥५ ॥
विराड् गायत्री
अग्निनाग्निस्समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा ॥ हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥ ६, २२ ॥


अग्निना । अग्निः । सम् । इध्यते । कविः । गृहऽपतिः । युवा ॥ हव्यऽवा । जुहुऽआस्यः ॥ ६, २२ ॥
अग्न्यादीनां दीप्त्यादिगुणदो भगवान्
यस्याऽस्ये हूयते सोऽग्निः परेशेन समिध्यते । अथवाऽऽहवनीयोऽग्निर्मथितेन समिध्यते ॥ २७२॥६॥
मेधातिथिना स्वात्मानं प्रति बोधनम्
कविमग्निमुपस्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे ॥ देवममीवचातनम् ॥ ७ ॥


कविम् । अग्निम् । उप । स्तुहि । सत्यऽधर्माणम् । अध्वरे ॥ देवम् । अमीवऽचातनम् ॥ ७ ॥
सत्यधर्मा सद्गुणभृद् दुःखघ्नोऽमीवचातनः । चातनं कालनं वा स्यात् ..............॥॥
यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतन्देव सपर्यति ॥ तस्य स्म प्राविता भव ॥ ८ ॥


यः । त्वाम् । अग्नेे । हविःऽपतिः । दूतम् । देव । सपर्यति ॥ तस्य । स्म । प्रऽअविता । भव ॥ ८ ॥
यो अग्निन्देववीतये हविष्मा आविवासति ॥ तस्मै पावक मृय ॥ ९ ॥


यः । अग्निम् । देवऽवीतये । हविष्मान् । आऽविवासति ॥ तस्मै । पावक । मृय ॥ ९ ॥
...................देववीतिस्तु तद्गतिः ॥ २७३॥ आवासयति यस्त्वां च तं त्वं मृय सर्वदा ॥ ९ ॥
टीकाविवृतिः
स नः पावक दीदिवोऽग्ने देवा इहावह ॥ उप यज्ञं हविश्च नः ॥ १० ॥


सः । नः । पावक । दीदिऽवः । अग्ने । देवान् । इह । आ । वह ॥ उप । यज्ञम् । हविः । च । नः ॥ १० ॥
त्वत्पूजाविषये देवानावहेन्द्रियमानिनः ॥ २७४ ॥ १० ॥
स नस्स्तवान आभर गायत्रेण नवीयसा ॥ रयिं वीरवतीमिषम् ॥ ११ ॥


सः । नः । स्तवानः । आ । भर । गायत्रेण । नवीयसा ॥ रयिम् । वीरऽवतीम् । इषम् ॥ ११ ॥
गायत्रेण स्तूयमानो दृश्यमानेन नो रयिम् । पुत्रयुक्तामिषं चैव वीर्ययुक्तामथावह ॥२७५ ॥ ११ ॥
अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः ॥ इमं स्तोमञ्जुुषस्व नः ॥ १२, २३, १२ ॥


अग्ने । शुक्रेण । शोचिषा । विश्वाभिः । देवहूतिऽभिः ॥ इमम् । स्तोमम् । जुषस्व । नः ॥ १२, २३, १२ ॥
ज्वलता तेजसा विश्वदेवाह्वानैर्वृणु स्तुतिम् ॥॥ १२,२३,१२॥
॥ इति द्वादशं सूक्तम् ॥

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मण्डलम्—१. अध्यायः–१- अनुवाकः–४.सूक्तम्—१३
(सुसमिद्धो द्वादशर्चम्, मेधातिथः काण्वः, गायत्री, आप्रीदेवताः) (इध्मः- सुसमिद्धः अग्निर्देवता)
सुसमिद्धो न आवह देवा अग्ने हविष्मते ॥ होतः पावक यक्षि च ॥ १ ॥


सुऽसमिद्धः । नः । आ । वह । देवान् । अग्ने । हविष्मते ॥ होतरिति । पावक । यक्षि । च ॥ १ ॥
अस्मद्धविष्मते देवानाहूय यज चादरात् ॥२७६ ॥ १ ॥
तनूनपात् अग्निर्देवता
मधुमन्तन्तनूनपाद्यज्ञन्देवेषु नः कवे ॥ अद्या कृणुहि वीतये ॥ २ ॥


मधुऽमन्तम् । तनूऽनपात् । यज्ञम् । देवेषु । नः । कवे ॥ अद्य । कृणुहि । वीतये ॥ २ ॥
तनूभ्यो वाक् ततो देवो व्यक्तस्तेन तनूनपात् ॥ २ ॥
नराशंसः अग्निर्देवता
नराशंसमिह प्रियमस्मिन् यज्ञ उपह्वये ॥ मधुजिह्वं हविष्कृतम् ॥ ३ ॥


नराशंसम् । इह । प्रियम् । अस्मिन् । यज्ञे । उप । ह्वये ॥ मधुऽजिह्वम् । हविःऽकृतम् ॥ ३ ॥
सुसमिद्धादयः अग्नेर्मूर्तयः
नरैः स्तुत्यो नराशंसो वह्नेरन्याऽथवा तनूः ॥२७७॥३॥
इः-ईतिः अग्निर्देवता
अग्ने सुखतमे रथे देवा ईति आवह ॥ असि होता मनुर्हितः ॥ ४ ॥


अग्ने । सुखऽतमे । रथे । देवान् । र्इतिः । आ । वह ॥ असि । होता । मनुःऽहितः ॥ ४ ॥
अध्यात्मरथविवरणम्
मनूनां च हितत्वेन मनुर्हित इतीरितः ॥ ४ ॥
बर्हिर्देवता
स्तृणीत बर्हिरानुषग्घृतपृष्ठम्मनीषिणः ॥ यत्रामृतस्य चक्षणम् ॥ ५ ॥


स्तृणीत । बर्हिः । आनुषक् । घृतऽपृष्ठम् । मनीषिणः ॥ यत्र । अमृतस्य । चक्षणम् ॥ ५ ॥
आनुषक् सर्वतो देवस्थानं बर्हिः स्तृणीत च ॥२७८॥
शुद्धस्य विष्णोर्यत् स्थानं घृतपृष्ठं हि तन्मनः । यत्र स्याद् दर्शनं विष्णोर्नित्यामरणधर्मिणः ॥ २७९॥५॥
श्रियो दास्यः द्वारो देव्यो देवताः
विश्रयन्तामृतावृधो द्वारो देवीरसश्चतः ॥ अद्या नूनञ्च यष्टवे ॥ ६, २४ ॥


वि । श्रयन्ताम् । ऋतऽवृधः । द्वारः । देवीः । असश्चतः ॥ अद्य । नूनम् । च । यष्टवे ॥ ६, २४ ॥
ऋतरूपेण हरिणा समृद्धाया ऋतावृधः । द्वारो देव्यः श्रियो दास्यः श्रयन्तामिह नो मखे ॥ २८०॥
मानसे बाह्ययज्ञे वा ह्यसङ्गत्वादसश्चतः । अद्याहनि तथा नूनमद्यैव यजनार्थतः ॥ २८१॥
द्वारभूतः स भगवानपि साक्षान्मुमुक्षतः । स्त्रीरूपश्च सः ............... ॥ ॥ ६,२४॥
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - नक्ता, उषाश्च देवते
नक्तोषासा सुपेशसाऽस्मिन् यज्ञ उपह्वये ॥ इदन्नो बर्हिरासदे ॥ ७ ॥


नक्तोषसा । सुऽपेशसा । अस्मिन् । यज्ञे । उप । ह्वये ॥ इदम् । नः । बर्हिः । आऽसदे ॥ ७ ॥
........नक्ता स्यान्नाक्तो यस्मात् स सर्वतः । उषाः प्रकाशरूपत्वात् सुभद्रे ते उपह्वये ॥ २८२ ॥
अस्मिन् बर्हिषि संस्थित्यै ......... ॥ ७ ॥
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - दैव्यौ होतारौ गार्हपत्याहवनीयौ देवते
ता सुजिह्वा उपह्वये होतारा दैव्या कवी ॥ यज्ञन्नो यक्षतामिमम् ॥ ८ ॥


ता । सुऽजिह्वौ । उप । ह्वये । होतारा । दैव्या । कवी इति ॥ यज्ञम् । नः । यक्षताम् । इमम् ॥ ८ ॥
आत्मान्तरात्मेति भगवतो रूपद्वयम्
......................होतारौ देवगावपि । मथ्यमानोऽपरश्चैव वह्नी तद्गोऽथ वा हरिः ॥ २८३॥
आत्माऽन्तरात्मरूपेण द्विरूपो वा व्यवस्थितः । देवेषु यजतां यज्ञमस्मदीयमिमं सदा ॥ २८४॥८॥
निचृद् गायत्री - इा (श्रीः) महीः (भूः भारती च सरस्वती च देवताः
इा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः ॥ बर्हिस्सीदन्त्वस्रिधः ॥ ९ ॥


इा । सरस्वती । मही । तिस्रः । देवीः । मयःऽभुवः ॥ बर्हिः । सीदन्तु । अस्रिधः ॥ ९ ॥
इा-सरस्वत्यादिनामानः भगवत्स्त्रीरूपविशेषाः
सरस्वती (भारती) अपि महीशब्दवाच्या
ईेड्यत्वाद्धरिः श्रीर्वा भूरूपा सैव चापरा ।
मही तु भारती नाम वायव्या ब्रह्मणोऽपरा । तद्गतस्तादृशै रूपैः पृथक्स्थो वा हरिस्तथा ॥२८५ ॥९ ॥
त्वष्टा देवता
इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुपह्वये ॥ अस्माकमस्तु केवलः ॥ १० ॥


इह । त्वष्टारम् । अग्रियम् । विश्वऽरूपम् । उप । ह्वये ॥ अस्माकम् । अस्तु । केवलः ॥ १० ॥
त्वष्टा तेजस्त्वतो विष्णुर्बलत्वाद्वा समीरितः । विश्वरूपकरत्वाच्च विश्वरूपोऽथ पूर्तितः ॥ २८६ ॥ १० ॥
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - वनस्पतिर्देवता
अवसृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः ॥ प्रदातुरस्तु चेतनम् ॥ ११ ॥


अव । सृज । वनस्पते । देव । देवेभ्यः । हविः ॥ प्र । दातुः । अस्तु । चेतनम् ॥ ११ ॥
वनस्पतिर्भगवान्
वननीयपतित्वेन वनस्पतिरितीरितः । ज्ञानं तु चेतनम् ................. ॥ ११ ॥
पिपीलिका मध्या निचृद् गायत्री - स्वाहादेवी देवता
स्वाहा यज्ञङ्कृणोतनेन्द्राय यज्वनो गृहे ॥ तत्र देवा उपह्वये ॥ १२, १५, १३ ॥


स्वाहा । यज्ञम् । कृणोतन । इन्द्राय । यज्वनः । गृहे ॥ तत्र । देवान् । उप । ह्वये ॥ १२, २५, १३ ॥
स्वाहाशब्दस्य त्रेधा अर्थविवरणम्
.......स्वाहा स्वभागगतिमान् स्मृतः ॥ २८७ ॥
अव्ययत्वाद् अमोषश्च ॥ ॥ १२, २५, १३ ॥

वैश्वदेवसूक्तम्

मण्डलम् –१.अध्यायः–१. अनुवाकः–४.सूक्तम्– १४.
ऐभिरग्ने द्वादश, मेधातिथिः काण्वः ऋषिः, गायत्री विश्वेदेवाः देवताः
सोमपानार्थं विश्वेदेवप्रार्थना
ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिस्सोमपीतये ॥ देवेभिर्याहि यक्षि च ॥ १ ॥


आ । एभिः । अग्ने । दुवः । गिरः । विश्वेभिः । सोमऽपीतये ॥ देवेभिः । याहि । यक्षि । च ॥ १ ॥
...............कामदोहा दुवः स्मृताः ॥ १ ॥
आ त्वा कण्वा अहूषत गृणन्ति विप्र ते धियः ॥ देवेभिरग्न आगहि ॥ २ ॥


आ । त्वा । कण्वाः । अहूषत । गृणन्ति । विप्र । ते । धियः ॥ देवेभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ २ ॥
इन्द्रवायू बृहस्पतिम्मित्राग्निम्पूषणम्भगम् ॥ आदित्यान्मारुतङ्गणम् ॥ ३ ॥


इन्द्रवायू इति । बृहस्पतिम् । मित्रा । अग्निम् । पूषणम् । भगम् ॥ आदित्यान् । मारुतम् । गणम् ॥ ३ ॥
पूषा-भग-आदित्य-मारुतादिशब्दनिर्वचनम्
बृहन्पतिर्बृहत्या वा वाच एव बृहस्पतिः ॥२८८॥
मित्रेति मित्रावरुणौ पूषा नाम स पोषणात् । पूर्णत्वाद्वा भगः प्रोक्तः पूर्णैश्वर्यादिकत्वतः ॥ २८९ ॥
आदिस्थत्वात् स आदित्य आददानः प्रयाति वा । बहुरूपत्वतश्चैव मानोक्तत्वात्तु मारुतः ॥ २९० ॥ ३ ॥
प्रवो भ्रियन्त इन्दवो मत्सरा मादयिष्णवः ॥ द्रप्सा मध्वश्चमूषदः ॥ ४ ॥


प्र । वः । भ्रियन्ते । इन्दवः । मत्सराः । मादयिष्णवः ॥ द्रप्साः । मध्वः । चमूऽसदः ॥ ४ ॥
इन्दुशब्दः सोम-मनोवृत्तिपरः
मत्सरा मदकारित्वात्ताच्छील्यादुत्तरं पदम् । द्रप्सास्ते द्रवणाच्चैव चमसस्थाश्चमूषदः । शिरश्च चमसं प्रोक्तमिष्टदानात् तथेन्दवः ॥ २९१॥ ४ ॥
हविष्मन्तो अरङ्कृतः ॥ ५ ॥


ईते । त्वाम् । अवस्यवः । कण्वासः । वृक्तऽबर्हिषः ॥ हविष्मन्तः । अरम्ऽकृतः । ५ ॥
अवस्युर्यजमानः स्यादवनार्थप्रवृत्तितः । आत्मस्थं वा बहुवचो बहवो मुनयोऽत्र वा ॥२९२॥
उत्तराणां वचस्त्वेन स्वयं वदति चेश्वरः । अरङ्कृतोऽतिकर्तारस्त्वलङ्कर्तार एव वा ॥ २९३॥५ ॥
घृतपृष्ठा मनोयुजो ये त्वा वहन्ति वह्नयः ॥ आ देवान् सोमपीतये ॥ ६, २६ ॥


घृतऽपृष्ठाः । मनःऽयुजः । ये । त्वा । वहन्ति । वह्नयः ॥ आ । देवान् । सोमऽपीतये ॥ ६, २६ ॥
स्निग्धपृष्ठाः समारूढा हरिणा वा विदोषिणा । मनोमात्रेण योज्याश्च त्वां देवांश्च वहन्ति ये ॥ २९४॥६॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
तान्यजत्रा ऋतावृधोऽग्ने पत्नीवतस्कृधि ॥ मध्वस्सुजिह्व पायय ॥ ७ ॥


तान् । यजत्रान् । ऋतऽवृधः । अग्ने । पत्नीऽवतः । कृधि ॥ मध्वः । सुऽजिह्व । पायय ॥ ७ ॥
तैर्देवान् यजतः स्तोतॄन् ज्ञातेन ब्रह्मणैधितान् । पत्नीभिर्योजया गन्तुं सह मध्वश्च पायय ॥ ७ ॥
उदात्तस्वरार्थनिरूपणणम्
निचृद् गायत्री
ये यजत्रा य ईड्यास्तेते पिबन्तु जिह्वया ॥ मधोरग्ने वषकृति ॥ ८ ॥


ये । यजत्राः । ये । ईड्याः । ते । ते । पिबन्तु । जिह्वया ॥ मधोः । अग्ने । वषऽकृति ॥ ८ ॥
ते षष्ठ्यतोऽनुदात्तः स्यादुदात्तो बहुवाचकः । आवृत्तस्तु भवेदर्थस्ते पिबन्तु वषकृतौ ॥ २९६॥८ ॥
आकीं सूर्यस्य रोचनाद्विश्वान् देवा उषर्बुधः ॥ विप्रो होतेह वक्षति ॥ ९ ॥


आकीम् । सूर्यस्य । रोचनात् । विश्वान् । देवान् । उषःऽबुधः ॥ विप्रः । होता । इह । वक्षति ॥ ९ ॥
सूर्यस्य रोचनात् स्वर्गादावक्षत्यग्निरिन्दुपान् । उषःप्रकाशनाद् ब्रह्म तद्विदस्त उषर्बुधः ॥ ९ ॥
विश्वेभिस्सोम्यम्मध्वग्न इन्द्रेण वायुना ॥ पिबा मित्रस्य धामभिः ॥ १० ॥


विश्वेभिः । सोम्यम् । मधु । अग्ने । इन्द्रेण । वायुना ॥ पिब । मित्रस्य । धामऽभिः ॥ १० ॥
देवास्ते विष्णुधामत्वान्मित्रधामान ईरिताः ॥ २९७ ॥ १० ॥
त्वं होता मनुर्हितोऽग्ने यज्ञेषु सीदसि ॥ सेम नो अध्वरं यज ॥ ११ ॥


त्वम् । होता । मनुःऽहितः । अग्ने । यज्ञेषु । सीदसि ॥ सः । इमम् । नः । अध्वरम् । यज ॥ ११ ॥
निचृद् गायत्री
युक्ष्वा ह्यरुषी रथे हरितो देव रोहितः ॥ ताभिर्देवा इहावह ॥ १२, २७, १४ ॥


युक्ष्व । हि । अरुषीः । रथे । हरितः । देव । रोहितः ॥ ताभिः । देवान् । इह । आ । वह ॥ १२ ॥
अग्निवाहा अश्वतर्यो दूर्वापद्माग्निसप्रभाः । लोहिताः क्वचिदश्वाश्च रोहिन्मृग्योऽपि कुत्रचित् ॥ २९८॥ १२,२७,१४॥
॥ इति चतुर्दशं सूक्तम् ॥

ऋतुसूक्तम्

मण्डलम् -१अध्यायः–१.अनुवाकः–४. सूक्तम्–१५
(इन्द्रसोमं द्वादशर्चम्, मेधातिथिः काण्वः, गायत्री) (पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री) ऋतवः(कालाभिमानिदेवताः, इन्द्रश्च देवताः
इन्द्र सोमम्पिब ऋतुना त्वा विशन्त्विन्दवः ॥ मत्सरासस्तदोकसः ॥ १ ॥


इन्द्र । सोमम् । पिब । ऋतुना । आ । त्वा । विशन्तु । इन्दवः ॥ मत्सरासः । तत्ऽओकसः ॥ १ ॥
ऋतुशब्दार्थजिज्ञासा
पोतृदेवताः मरुतः
ऋतुर्मार्गस्तु नेतृत्वान्नेष्टाऽग्निर्हरिरेव वा । ईष्टे न कश्चिदस्येति ग्ना नद्यश्च समीरिताः ॥ गतिशीलत्वतो ग्नास्ता ज्ञातृनेतृत्वतो हरिः ॥२९९॥
गमनान्नयनाद्वा ग्ना ..............
....................ऋतुपात्रमृतुस्तथा । सोमास्तदोकसः प्रोक्ता ऋतुपात्रस्थिता यतः ॥३००॥
पत्नीनेतृत्वतो नेष्टा नेष्टर्त्विक् सम्प्रकीर्तितः ।
ज्ञापयन्ति स्वलिङ्गानीत्यृतवः ष प्रकीर्तिताः ॥३०१॥
पावनाच्चैव पोतारो मरुतः पोतृदेवताः । अग्निस्तु देवतानेष्ठुस्त्वष्टेन्द्रो विष्णुरेव वा ॥ ३०२॥१,२,३ ॥
(भुरिक् गायत्री) ऋतवः, मरुतश्च देवताः
मरुतः पिबत ऋतुना पोत्राद्यज्ञम्पुनीतन ॥ यूयं हिष्ठा सुदानवः ॥ २ ॥


मरुतः । पिबत । ऋतुना । पोत्रात् । यज्ञम् । पुनीतन ॥ यूयम् । हि । स्थ । सुऽदानवः ॥ २ ॥
ऋतवः, नेष्टा च (विष्णुः, इन्द्रः, अग्निः, त्वष्टा च)देवताः
अभि यज्ञङ्गृृणीहि नोऽग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना ॥ त्वं हि रत्नधा असि ॥ ३ ॥


अभि । यज्ञम् । गृणीहि । नः । ग्नावः । नेष्टरिति । पिब । ऋतुना ॥ त्वम् । हि । रत्नऽधाः । असि ॥
(भुरिग् गायत्री) ऋतवः, अग्निश्च देवताः
अग्ने देवा इहावह सादया योनिषु त्रिषु ॥ परि भूष पिब ऋतुना ॥ ४ ॥


अग्ने । देवान् । इह । आ । वह । सादय । योनिषु । त्रिषु ॥ परि । भूष । पिब । ऋतुना ॥ ४ ॥
प्राग्वंशादिस्थानत्रयनिरूपणम्
वेद्युत्तरासदश्चैव प्राग्वंशो योनयः स्मृताः । भूष भूषय नो यज्ञम् ........ ॥ ४ ॥
ऋतवः, इन्द्रश्च देवताः
ब्राह्मणादिन्द्र राधसः पिबा सोममृतूरनु ॥ तवेद्धि सख्यमस्तृतम् ॥ ५ ॥


ब्राह्मणात् । इन्द्र । राधसः । पिब । सोमम् । ऋतून् । अनु । तव । इत् । हि । सख्यम् । अस्तृतम् ॥ ५ ॥
..................ब्राह्मणाच्छंसिपात्रतः । पिबेन्द्र नो राधसोऽर्थे त्वामनु त्वृतुदेवताः ॥३०३॥
स्तृतं छिन्नमिति प्रोक्तम् .......... ॥ ५ ॥
ऋतवः, मित्रावरुणौ च देवताः
युवन्दक्षन्धृतव्रतमित्रावरुणदूभम् ॥ ऋतुना यज्ञमाशाथे ॥ ६, २८ ॥


युवम् । दक्षम् । धृतऽव्रता । मित्रावरुणा । दुःऽदभम् ॥ ऋतुना । यज्ञम् । अशाथे इति ॥ ६, २८ ॥
.............अस्तभ्यं दुर्दभं स्मृतम् । दक्षाख्यं यजमानं चापीशाथे यज्ञमेव च । सोमं पीत्वर्तुपात्रेण सहवा तेन चर्तुना ॥ ६, २८ ॥
ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो अध्वरे ॥ यज्ञेषु देवमीते ॥ ७ ॥


द्रविणःऽदाः । द्रविणसः । ग्रावऽहस्तासः । अध्वरे ॥ यज्ञेषु । देवम् । र्इते ॥ ७ ॥
होता च होतृकाश्चैव द्रविणोदा द्रवीणसः । अग्निश्चैवाग्नयस्तेषां देवता विष्णुमीते ॥३०५॥ ७ ॥
ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
द्रविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शृण्विरे ॥ देवेषु ता वनामहे ॥ ८ ॥


द्रविणःऽदाः । ददातु । नः । वसूनि । यानि । शृण्विरे ॥ देवेषु । ता । वनामहे ॥ ८ ॥
ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत ॥ नेष्ट्रादृतुभिरिष्यत ॥ ९ ॥


द्रविणःऽदाः । पिपीषति । जुहोत । प्र । च । तिष्ठत ॥ नेष्ट्रात् । ऋतुऽभिः । इष्यत ॥ ९ ॥
पातुमिच्छति सोमं स सोमास्तस्मै प्रतिष्ठिताः । ऋतुपात्रैर्देवताभिः सहैवैनमभीप्सत ॥३०६॥ ९ ॥
यत्त्वा तुरीयमृतुभिर्द्रविणोदो यजामहे ॥ अध स्मानो ददिर्भव ॥ १० ॥


यत् । त्वा । तुरीयम् । ऋतुऽभिः । द्रविणःऽदः । यजामहे ॥ अध । स्म । नः । ददिः । भव ॥ १० ॥
चतुर्थवारमपि यत्त्वां यजामो ददिर्भव ॥ १० ॥
(पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री) - ऋतवः, अश्विनौ च देवते
अश्विना पिबतम्मधु दीद्यग्नी शुचिव्रता ॥ ऋतुना यज्ञवाहसा ॥ ११ ॥


अश्विना । पिबतम् । मधु । दीद्यग्नी इति दीदिऽअग्नी । शुचिऽव्रता ॥ ऋतुना । यज्ञऽवाहसा ॥ ११ ॥
.................दीद्यग्नी इति दीप्ताग्नी ॥ ११ ॥
(पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री) - ऋतवः, विष्णुः अग्निश्च देवताः
गार्हपत्येन सन्त्य ऋतुना यज्ञनीरसि ॥ देवान्देवय ते यज ॥ १२, २९, १५ ॥


गार्हऽपत्येन । सन्त्य । ऋतुना । यज्ञऽनीः । असि ॥ देवान् । देवऽयते । यज ॥ १२, २९, १५ ॥
मासभेदेन भगवतो द्वे द्वे रूपे
...............सन्त्योऽग्निः सन्ततत्वतः ॥३०७॥
विष्णुर्वर्त्वधिपो विष्णुः केशवादिस्वरूपतः । ‘ग्रहान् सोमस्य मिमते’ इति तस्यैव कथ्यते ॥ गार्हपत्येन पात्रेण यजमानस्तु देवयन् ॥ ३०८॥
देवान्पातीति ............. ॥ १२, २९, १५ ॥
(इति एकोनविंशो वर्गः – पञ्चदशं सूक्तम् )

ऐन्द्रसूक्तम्

मण्डलम्—१.अध्यायः–१. अनुवाकः–४. सूक्तम्– १६.
आत्वा नवर्चं, मेधातिथिः काण्वः गायत्री(३ पिपीलिका मध्या निचृत्,९ विरा) इन्द्रो देवता
आ त्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये ॥ इन्द्र त्वा सूरऽचक्षसः ॥ १ ॥


आ । त्वा । वहन्तु । हरयः । वृषणम् । सोमऽपीतये ॥ इन्द्र । त्वा । सूरऽचक्षसः ॥ १ ॥
..............सुष्ठूरीकुर्वति विषयान् यतः । चक्षूंषीन्द्रस्य हरयस्तेनोक्ताः सूरचक्षसः ॥ ३०९ ॥ १ ॥
इमा धाना घृतस्नुवो हरी इहोपवक्षतः ॥ इन्द्रं सुखतमे रथे ॥ २ ॥


इमाः । धानाः । घृतस्नुवः । हरी इति । इह । उप । वक्षतः ॥ इन्द्रम् । सुखऽतमे । रथे ॥ २ ॥
धानाशब्दस्याध्यात्मार्थनिर्वचनम्
भक्तिस्नुतानि धानानि बुद्धेर्धाना इति ह्यपि ॥२ ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
इन्द्रम् प्रातर्हवामह इन्द्रम् प्रयत्यध्वरे ॥ इन्द्रं सोमस्य पीतये ॥ ३ ॥


इन्द्रम् । प्रातः । हवामहे । इन्द्रम् । प्रऽयति । अध्वरे ॥ इन्द्रम् । सोमस्य । पीतये ॥ ३ ॥
सोमपीतिशब्दः तृतीयसवनवाची
‘प्रातः’ इत्यादिवाक्येन सवनत्रयमीरितम् । समाप्तत्वात् सोमपीतिस्तृतीयं सवनं स्मृतम् ॥३१०॥
सदा ........ ॥ ३ ॥
(१६२) उप नस्सुतमागहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः ॥ सुते हि त्वा हवामहे ॥ ४ ॥


उप । नः । सुतम् । आ । गहि । हरिऽभिः । इन्द्र । केशिऽभिः ॥ सुते । हि । त्वा । हवामहे ॥ ४ ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
सोमपाने गौरमृगदृष्टान्तः
सेमन्नः स्तोममागह्युपेदं सवनं सुतम् ॥ गौरो न तृषितः पिब ॥ ५, ३० ॥


सः । इमम् । नः । स्तोमम् । आ । गहि । उप । इदम् । सवनम् । सुतम् ॥ गौरः । न । तृषितः । पिब ॥ ५, ३० ॥
इमे सोमास इन्दवस्सुतासो अधि बर्हिषि ॥ ता इन्द्र सहसे पिब ॥ ६ ॥


इमे । सोमासः । इन्दवः । सुतासः । अधि । बर्हिषि ॥ तान् । इन्द्र । सहसे । पिब ॥ ६ ॥
भगवतो वृद्धिर्नास्तीति निरूपणम्
..... विष्णुविवक्षायां यजमानबलं सहः । तदिष्टस्यैव दानाय तद्गुणव्यक्तिरेव वा ॥ ३११॥
‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्पूर्णात् पूर्णमुदच्यते’ । ‘हेयोपादेयरहितगुणपूर्णो हरिः सदा । अनुग्रहव्यक्तिरेव तद्गुणानां च नान्यथा’॥ ३१२ ॥
इत्यादि वेदवाक्येभ्यो नैव वृद्धिर्हरेः क्वचित् ॥ ६ ॥
अयन्ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शन्तमः ॥ अथा सोमं सुतम् पिब ॥ ७ ॥


अयम् । ते । स्तोमः । अग्रियः । हृदिऽस्पृक् । अस्तु । शम्ऽतमः ॥ अथ । सोमम् । सुतम् । पिब ॥ ७ ॥
विश्वमित्सवनं सुतमिन्द्रो मदाय गच्छति ॥ वृत्रहा सोमपीतये ॥ ८ ॥


विश्वम् । इत् । सवनम् । सुतम् । इन्द्रः । मदाय । गच्छति ॥ वृत्रऽहा । सोमऽपीतये ॥ ८ ॥
विराड् गायत्री
सेमन्नः काममापृण गोभिरश्वैश्शतक्रतो ॥ स्तवाम त्वा स्वाध्यः ॥ ९, ३१, १६ ॥


कामम् । आ । पृण । गोभिः । अश्वैः । शतक्रतो इति शतऽक्रतो ॥ स्तवाम । त्वा । सुऽआध्यः ॥ ९, ३१, १६ ॥
पृण सम्पूरय स्वाध्यः सुधीतय इतीरिताः ॥३१३ ॥ ९, ३१, १६ ॥

ऐन्द्रावरुणसूक्तम्

मण्डलम्–१. अध्यायः-१.अनुवाकः–४– सूक्तम् – १७.
(इन्द्रावरुणयोर्नवर्चम् , मेधातिथिः काण्वः, छन्दः– गायत्री, २ यवमध्या विरा, ४ पादनिचृत्(ह्रसीयसी),६ निचृत्, ५ भुरिगार्ची, ८ पिपीलिकामध्या निचृत्, इन्द्रावरुणौ देवते)
(१६८) इन्द्रावरुणयोरहं सम्राजोरव आ वृणे ॥ ता नो मृात र्इदृशे ॥ १ ॥


इन्द्रावरुणयोः । अहम् । सम्ऽराजोः । अवः । आ । वृणे ॥ ता । नः । मृातः । र्इदृशे ॥ १ ॥
अविकारेण संस्थानमीदृक्त्वं नाम कीर्तितम् ॥ १ ॥
यवमध्या विरा गायत्री
गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः ॥ धर्तारा चर्षणीनाम् ॥ २ ॥


गन्तारा । हि । स्थः । अवसे । हवम् । विप्रस्य । माऽवतः ॥ धर्तारा । चर्षणीनाम् ॥ २ ॥
मावतो ज्ञानयुक्तस्य प्रजाश्चर्षणयः स्मृताः ॥ २ ॥
अनुकामन्तर्पयेथामिन्द्रावरुण राय आ ॥ ता वान्नेदिष्ठमीमहे ॥ ३ ॥


अनुऽकामम् । तर्पयेथाम् । इन्द्रावरुणा । रायः । आ ॥ ता । वाम् । नेदिष्ठम् । र्इमहे ॥ ३ ॥
नेदिष्ठत्वं समीपत्वं क्षिप्रं शरणमीमहे ॥३१४॥ ३ ॥
पादनिचृद् गायत्री
युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम् ॥ भूयाम वाजदाव्नाम् ॥ ४ ॥


युवाकु । हि । शचीनाम् । युवाकु । सुऽमतीनाम् ॥ भूयाम । वाजऽदाव्नाम् ॥ ४ ॥
युवयोरेव वाक्यानां सुमतीनां च सर्वशः । भवेमान्नप्रदातॄणां सर्वदा विषया वयम् ॥ ३१५॥४ ॥
भुरिगार्ची ह्रसीयसी - गायत्री
इन्द्रस्सहस्रदाव्नां वरुणश्शंस्यानाम् ॥ क्रतुर्भवत्युक्थ्यः ॥ ५, ३२ ॥


इन्द्रः । सहस्रऽदाव्नाम् । वरुणः । शंस्यानाम् ॥ क्रतुः । भवति । उक्थ्यः ॥ ५, ३२ ॥
क्रतुः प्रधान उक्थ्यश्च शस्त्रैस्स्तुत्यो विशेषतः ॥ ५,३२ ॥
निचृद् गायत्री
तयोरिदवसा वयं सनेम नि च धीमहि ॥ स्यादुत प्ररेचनम् ॥ ६ ॥


तयोः । इत् । अवसा । वयम् । सनेम । नि । च । धीमहि ॥ स्यात् । उत । प्रऽरेचनम् ॥ ६ ॥
रक्षणेन तयोर्वित्तं ज्ञानं वा प्राप्नुमः सदा । निधीमहि च दानं च स्यादेवास्माकमर्थिने ॥ ३१६॥६ ॥
इन्द्रावरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे ॥ अस्मान्त्सु जिग्युषस्कृतम् ॥ ७ ॥


इन्द्रावरुणा ॥ वाम् । अहम् । हुवे । चित्राय । राधसे ॥ अस्मान् । सु । जिग्युषः । कृतम् ॥ ७ ॥
संहितायां ह्रस्वान्तपदप्रयोगे कारणनिरूपणम्
ह्रस्वता संहितायां तु देवतैक्यप्रदर्शिनी । स्वरूपैक्यं हरौ तत्तु मत्यैक्यं भिन्नयोरपि ॥३१७॥ ७॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
इन्द्रावरुण नूनुवां सिषासन्तीषु धीष्वा ॥ अस्मभ्यं शर्म यच्छतम् ॥ ८ ॥


इन्द्रावरुणा । नु । नु । वाम् । सिसासन्तीषु । धीषु । आ ॥ अस्मभ्यम् । शर्म । यच्छतम् ॥ ८ ॥
स्तुत्यादौ परमेश्वर एव स्वतन्त्रः, न जीवः
अद्य वां नु नुमो लोपः स्वातन्त्र्यार्थे हि सूत्रतः । साधयन्तीषु धीष्वेव शर्मास्मभ्यं प्रयच्छतम् ॥ ८ ॥
प्रवामश्नोतु सुष्टुतिरिन्द्रावरुण यां हुवे ॥ या मृधाथे सधस्तुतिम् ॥ ९, ३३, १७, ४ ॥


प्र । वाम् । अश्नोतु । सुऽस्तुतिः । इन्द्रावरुणा । याम् । हुवे ॥ याम् । ऋधाथे इति । सधऽस्तुतिम् ॥ ९, ३३, १७, ४ ॥
यथास्थितस्तुतिं यां च वर्धयेथे सदैवमे ॥ ३१८ ॥९॥

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मण्डलम्–१.अध्यायः–१.अनुवाकः-५. सूक्तम् –१८.
सोमानं नवर्चम्, मेधातिथिः काण्वः ऋषिः, छन्दः– गायत्री,१ विरा,३-६-८ पिपीलिकामध्या निचृत्, ४ निचृत्,,५ पादनिचृत्, छन्दः । देवता–१-३ ब्रह्मणस्पतिः, ४ (सोमः) ब्रह्मणस्पतिरिन्द्रश्च, ५ बृहस्पतिः दक्षिणः, ६-८ सदसस्पतिः, ९ सदसस्पतिः नाराशंसो वा देवताः
विरा गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
सोमानं स्वरणङ्कृणुहि ब्रह्मणस्पते ॥ कक्षीवन्तं य औशिजः ॥ १ ॥


सोमानम् । स्वरणम् । कृणुहि । ब्रह्मणः । पते ॥ कक्षीवन्तम् । यः । औशिजः ॥ १ ॥
सौम्यं शब्दं कृणु त्वं नो विष्णो वायो सुवाक्पते । कक्षीवन्तं प्रति हि यो दत्तो यः स उशिक्सुतः । विवक्षितो मुनिः सोऽपि तस्मादर्थोऽपि मां प्रति ॥३१९ ॥ १ ॥
विरा गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः ॥ सनस्सिषक्तु यस्तुरः ॥ २ ॥


यः । रेवान् । यः । अमीवऽहा । वसुऽवित् । पुष्टिऽवर्धनः ॥ सः । नः । सिषक्तु । यः । तुरः ॥ २ ॥
वित्तवान् रोेगहा ज्ञानवेत्ताऽस्माभिः सयुग् भवेत् । तुरो वेगाद्धरिर्वायुः ..................... ॥ २ ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः (विष्णुः वायुश्च) देवता
मानश्शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्मर्त्यस्य ॥ रक्षाणो ब्रह्मणस्पते ॥ ३ ॥


मा । नः । शंसः । अररुषः । धूर्तिः । प्रणक् । मर्त्यस्य ॥ रक्ष । नः । ब्रह्मणः । पते ॥ ३ ॥
..................अररुचातिरोषणात् । तस्य धूर्तिर्वचो नोऽस्मान् पूरयेद्रक्ष नो हरे ॥३॥
निचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः इन्द्रः सोमश्च देवताः
सघा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः ॥ सोमो हिनोति मर्त्यम् ॥ ४ ॥


सः । घ । वीरः । न । रिष्यति । यम् । इन्द्रः । ब्रह्मणः । पतिः ॥ सोमः । हिनोति । मर्त्यम् ॥ ४ ॥
घेति हावधृतिश्चैव सोमः सौम्यत्वतो हरिः । उना मया च युक्तत्वादूमैर्युक्तत्वतोऽपि वा ॥३२१ ॥ अमः स इति वा ....................... ॥ ४ ॥
पादनिचृद् गायत्री - ब्रह्मणस्पतिः, सोमः, इन्द्रः, दक्षिणा च देवताः
त्वन्तम्ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम् ॥ दक्षिणा पात्वंहसः ॥ ५, ३४ ॥


त्वम् । तम् । ब्रह्मणः । पते । सोमः । इन्द्रः । च । मर्त्यम् ॥ दक्षिणा । पातु । अंहसः ॥ ५, ३४ ॥
.................साक्षाच्छ्रीर्दक्षेनेति तु दक्षिणा । दक्षिणा चतुरत्वाद्वा स्वयमेव जनार्दनः ॥ ५, ३४ ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - सदसस्पतिः( विष्णुर्वायुः अग्निर्वा) देवता
सदसस्पतिमद्भुतम्प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् ॥ सनिम्मेधामयासिषम् ॥ ६ ॥


सदसः । पतिम् । अद्भुतम् । प्रियम् । इन्द्रस्य । काम्यम् ॥ सनिम् । मेधाम् । अयासिषम् ॥ ६ ॥
हरि-वायु-अग्निषु शरणागतिः
सदसस्पतिर्हरिस्साक्षाद् वायुरग्निरथापि वा । लाभज्ञानस्वरूपोऽसौ शरणं तमयासिषम् ॥३२३॥६॥
सदसस्पतिर्देवता
यस्मादृतेन सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन ॥ सधीनां योगमिन्वति ॥ ७ ॥


यस्मात् । ऋते । न । सिध्यति । यज्ञः । विपःऽचितः । चन ॥ सः । धीनाम् । योगम् । इन्वति ॥ ७ ॥
धीप्रेरकः स ध्येयश्च धीभिर्योगं तदाऽप्नुते ॥ ७ ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री - सदसस्पतिः देवता
आदृध्नोति हविष्कृतिम्प्राञ्चङ्कृणोत्यध्वरम् ॥ होत्रा देवेषु गच्छति ॥ ८ ॥


आत् । ऋध्नोति । हविःऽकृतिम् । प्राञ्चम् । कृणोति । अध्वरम् ॥ होत्रा । देवेषु । गच्छति ॥ ८ ॥
तस्माद्धविष्कृतः स्वृद्धिं करोति यजतो विभुः । करोति चोत्तमं यज्ञं देवाह्वानानि गच्छति ॥ ३२४॥८ ॥
सदसस्पतिः(वायुः), नराशंसो (विष्णुः,अग्निः - वा देवता
नराशंसं सुधृष्टममपश्यं सप्रथस्तमम् ॥ दिवो न सद्ममखसम् ॥ ९, ३५, १९ ॥


नराशंसम् । सुऽधृष्टमम् । अपश्यम् । सप्रथःऽतमम् ॥ दिवः । न । सद्मऽमखसम् ॥ ९, ३५, १८ ॥
नराशंसो विष्णुः
नरैः स्तुत्यो नराशंसो हरिर्धृष्टतमश्च सः । गुणानां प्रथिमाधिक्यात् सप्रथस्तम ईरितः । यस्य स्वर्गादपि गृहं मखः प्रियमिवेयते ॥ ३२५॥९, ३५, १८ ॥

अग्निमारुतसूक्तम्

मण्डलम्–१. अध्यायः–१.अनुवाकः – ५.सूक्तम्–१९.
(प्रतित्यं नवर्चंं, मेधातिथिः काण्वः ऋषिः, अग्नामरुतश्च देवते, छन्दः– गायत्री,(२ निचृत्, ९ पिपीलिकामध्या निचृत्,)
प्रतित्यञ्चारुमध्वरङ्गोेपीथाय प्रहूयसे ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ १ ॥


प्रति । त्यम् । चारुम् । अध्वरम् । गोऽपीथाय । प्र । हूयसे ॥ मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ १ ॥
यज्ञं प्रतिप्रति त्यं तं सम्यक् शास्त्रोक्तलक्षणम् । आहूयसे ............................ ॥ १ ॥
निचृद् गायत्री
न हि देवो न मर्त्यो महस्तव क्रतुम्परः ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ २ ॥


नहि । देवः । न । मर्त्यः । महः । तव । क्रतुम् । परः । मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ २ ॥
महान्नैव त्वदन्योऽस्ति (हि) क्रतुं प्रति ॥ ३२६ ॥
विष्णौ हि मुख्यतोऽर्थोऽयमग्नौ कांश्चिदृते सुरान् ॥ २ ॥
ये महो रजसो विदुर्विश्वे देवासो अद्रुहः ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ३॥


ये । महः । रजसः । विदुः । विश्वे । देवासः । अद्रुहः । मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ३ ॥
महतो रञ्जकात् स्वर्गादद्रोग्धारोऽखिलं विदुः ॥ ३ ॥
य उग्रा अर्कमानृचुरनाधृष्टास ओजसा ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ४ ॥


ये । उग्राः । अर्कम् । आनृचुः । अनाधृष्टासः । ओजसा ॥ मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ४ ॥
प्राप्ता अर्कं विशेषेण सन्निधिस्तत्र यद्धरेः ॥ ४ ॥
ये शुभ्रा घोरवर्पस सुक्षत्रासो रिशादसः ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ५, ३६ ॥


ये । शुभ्राः । घोरऽवर्पसः । सुऽक्षत्रासः । रिशादसः ॥ मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ५, ३६ ॥
प्राण-इन्द्रिय-अग्न्यादिगतभगवद्रूपविशेषाः
शुद्धा घोरबलाः क्षेत्रत्रातारः क्षतितोऽपि वा । रम्यसत्सुखभोक्तारो मरुतो मारुतत्वतः ॥ ३२८ ॥
एतादृशानि रूपाणि प्राणाग्निस्थानि चेशितुः । पृथग् वा तादृशान्येव देवगान्यपि सर्वशः ॥३२९॥५॥
येनाकस्याधि रोचने दिवि देवास आसते ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ६ ॥


ये । नाकस्य । अधि । रोचने । दिवि । देवासः । आसते । मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ६ ॥
स्वर्गोपरि प्रकाशे च सूर्यादावासते सुराः । नाको निर्दुःखरूपत्वाद् द्यौः प्रकाशस्वरूपतः ॥३३०॥६॥
य ईङ्खयन्ति पर्वतान् तिरस्समुद्रमर्णवम् ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ७ ॥


ये । ईङ्खयन्ति । पर्वतान् । तिरः । समुद्रम् । अर्णवम् ॥ मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ७ ॥
समुद्रशब्दार्थः प्रकृतिः
प्रतोलयन्ति च गिरींस्तिरस्कृत्य च सागरम् । पुरुषान् प्रकृतिं वाऽपि पर्ववन्तो हि जन्मना ॥
पुरुषाः सुसमुद्रेकात् समुद्रः प्रकृतिर्मता ॥ ३३१॥
प्रकृतेः पुरुषाणां च प्रेरकः सन् सदा हरे । स्वरूपैर्बहुभिर्युक्त आयाहि सम सद्गुणैः ॥३३२॥ ७ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ऋक्संहिताभाष्ये प्रथमोध्यायः ॥ १ ॥
ऋतवः, द्रविणोदाश्च (अग्निः) देवताः
आये तन्वन्ति रश्मिभिस्तिरस्समुद्रमोजसा ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ८ ॥


आ । ये । तन्वन्ति । रश्मिऽभिः । तिरः । समुद्रम् । ओजसा । मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ८ ॥
पिपीलिकामध्या निचृद् गायत्री
अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि सोम्यम्मधु ॥ मरुद्भिरग्न आगहि ॥ ९, ३७, १, १९ ॥


अभि । त्वा । पूर्वऽपीतये । सृजामि । सोम्यम् ॥ मधु । मरुत्ऽभिः । अग्ने । आ । गहि ॥ ९, ३७, १, १९ ॥
इत्येकोनविंशं सूक्तम्
॥ इति प्रथममण्डले प्रथमाष्टके प्रथमोऽध्यायः ॥