Bhagavadgitabhashya: Difference between revisions
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<div class="gr-doc-title">श्रीमद्भगवद्गीताप्रस्थानम्</div> | <div class="gr-doc-title" data-has-moola="1" data-has-ullekha="1">श्रीमद्भगवद्गीताप्रस्थानम्</div> | ||
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श्रीमद्भगवद्गीताभाष्यम् | श्रीमद्भगवद्गीताभाष्यम् | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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परिपूर्णं गुरूंश्चाऽन् गीतार्थं वक्ष्यामि लेशतः ॥ | परिपूर्णं गुरूंश्चाऽन् गीतार्थं वक्ष्यामि लेशतः ॥ | ||
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| Line 46: | Line 40: | ||
नष्टधर्मज्ञानलोककृपालुभिर्ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो ज्ञानप्रदर्शनाय भगवान् व्यासोऽवततार । | नष्टधर्मज्ञानलोककृपालुभिर्ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो ज्ञानप्रदर्शनाय भगवान् व्यासोऽवततार । | ||
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ततश्चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारसाधनादर्शनाद् वेदार्थाज्ञानाच्च संसारे क्लिश्यमानानां वेदानधिकारिणां स्त्रीशूद्रादीनां च धर्मज्ञानद्वारा मोक्षो भवेदिति कृपालुः सर्ववेदार्थोपबृंहितां तदनुक्तकेवलेश्वरज्ञानदृष्टार्थयुक्तां च सर्वप्राणिनाम् अवगाह्यानवगाह्यरूपां केवलभगवत्स्वरूपपरां परोक्षार्थां महाभारतसंहिताम् अचीक्लृपत् ॥ | ततश्चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारसाधनादर्शनाद् वेदार्थाज्ञानाच्च संसारे क्लिश्यमानानां वेदानधिकारिणां स्त्रीशूद्रादीनां च धर्मज्ञानद्वारा मोक्षो भवेदिति कृपालुः सर्ववेदार्थोपबृंहितां तदनुक्तकेवलेश्वरज्ञानदृष्टार्थयुक्तां च सर्वप्राणिनाम् अवगाह्यानवगाह्यरूपां केवलभगवत्स्वरूपपरां परोक्षार्थां महाभारतसंहिताम् अचीक्लृपत् ॥ | ||
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तच्चोक्तम् - | तच्चोक्तम् - | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘लोकेशा ब्रह्मरुद्राद्याः संसारे क्लेशिनं जनम् । | |||
वेदार्थाज्ञमधीकारवर्जितं च स्त्रियादिकम् ॥ | वेदार्थाज्ञमधीकारवर्जितं च स्त्रियादिकम् ॥ | ||
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वेदादपि परं चक्रे पञ्चमं वेदमुत्तमम् । | वेदादपि परं चक्रे पञ्चमं वेदमुत्तमम् । | ||
भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥ | भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥ | ||
पुराणं भागवतं चेति सम्भिन्नः शास्त्रपुङ्गवः॥’इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । | पुराणं भागवतं चेति सम्भिन्नः शास्त्रपुङ्गवः॥’इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।</span> | ||
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| Line 88: | Line 72: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Upanarada-id">‘ब्रह्माऽपि तन्न जानाति ईषत् सर्वोऽपि जानति(ते)। | |||
बह्वर्थमृषयस्तत्तु भारतं प्रवदन्ति हि ॥’ इत्युपनारदीये। | बह्वर्थमृषयस्तत्तु भारतं प्रवदन्ति हि ॥’ इत्युपनारदीये।</span> | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘ब्रह्माद्यैः प्रार्थितो विष्णुर्भारतं स चकार ह । | |||
यस्मिन् दशार्थाः सर्वत्र न ज्ञेयाः सर्वजन्तुभिः ॥’ | यस्मिन् दशार्थाः सर्वत्र न ज्ञेयाः सर्वजन्तुभिः ॥’</span> इति नारदीये । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘भारतं चापि कृतवान् पञ्चमं वेदमुत्तमम् । | |||
दशावरार्थं सर्वत्र केवलं विष्णुबोधकम् ॥ | दशावरार्थं सर्वत्र केवलं विष्णुबोधकम् ॥</span> | ||
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| Line 101: | Line 85: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">परोक्षार्थं तु सर्वत्र वेदादप्युत्तमं तु यत् ॥’</span> इति स्कान्दे । | |||
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| Line 109: | Line 93: | ||
| text = | | text = | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘यदि विद्याच्चतुर्वेदान् साङ्गोपनिषदान् द्विजः । | |||
न चेत् पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः ॥’(म.भा.१.१.२६८)’ | न चेत् पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः ॥’(म.भा.१.१.२६८)’</span> | ||
}} | }} | ||
| Line 118: | Line 102: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् । | |||
‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रचलिष्यति ।’( म.भा.आदि.१.२९३) | ‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रचलिष्यति ।’( म.भा.आदि.१.२९३)</span> | ||
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| Line 130: | Line 111: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">मन्वादि केचिद् ब्रुवते ह्यास्तीकादि तथाऽपरे । | |||
तथोपरिचराद्यन्ये भारतं परिचक्षते ॥(म.भा.आदि.१.६६) | तथोपरिचराद्यन्ये भारतं परिचक्षते ॥(म.भा.आदि.१.६६)</span> | ||
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| Line 142: | Line 120: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Brahmanda-id">भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा । | |||
देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैः ऋषिभिश्च समन्वितैः । | देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैः ऋषिभिश्च समन्वितैः । | ||
व्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ॥(ब्रह्माण्डपुराणे) | व्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ॥(ब्रह्माण्डपुराणे)</span> | ||
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| Line 152: | Line 130: | ||
| text = | | text = | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते । | |||
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’ (म.भा.१.३००) | निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’ (म.भा.१.३००)</span> | ||
}} | }} | ||
| Line 161: | Line 139: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ’( म.भा.आदि ५.५०)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘विराटोद्योगसारवान्’ ( म भा.१.८९)</span> इत्यादितद्वाक्यपर्यालोचनया, ऋषिसम्प्रदायात्, <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्’ ( वायुप्रोक्तवचनम्)</span> इत्यादिपुराणग्रन्थान्तरगतवाक्यान्यथानुपपत्त्या, नारदाध्ययनादिलिङ्गैश्चावसीयते । | |||
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| Line 190: | Line 165: | ||
तत्र च सर्वभारतार्थसंग्रहां वासुदेवार्जुनसंवादरूपां भारतपारिजातमधुभूतां गीताम् उपनिबबन्ध । | तत्र च सर्वभारतार्थसंग्रहां वासुदेवार्जुनसंवादरूपां भारतपारिजातमधुभूतां गीताम् उपनिबबन्ध । | ||
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| Line 207: | Line 179: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Mahakaurma-id">‘भारतं सर्वशास्त्रेषु भारते गीतिका वरा । | |||
विष्णोः सहस्रनामापि ज्ञेयं पाठ्यं च तद् द्वयम् ॥’ | विष्णोः सहस्रनामापि ज्ञेयं पाठ्यं च तद् द्वयम् ॥’</span> इति महाकौर्मे । | ||
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| Line 219: | Line 188: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने।’(म.भा.१३.१६.१२.)</span> इत्यादि च । | |||
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| Line 253: | Line 222: | ||
{{Uvacha|सञ्जय उवाच}} | {{Uvacha|सञ्जय उवाच}} | ||
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| Line 301: | Line 267: | ||
| verse_line2 = नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line2 = भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line2 = गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥ | | verse_line2 = गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥ | ||
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{{Uvacha|श्रीभगवानुवाच}} | {{Uvacha|श्रीभगवानुवाच}} | ||
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| verse_line2 = न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥ | | verse_line2 = न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥ | ||
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देहिनो भाव एतद्भवति; तदेवासिद्धमिति चेद्, न- <span class="gr-prateeka">देहिनोऽस्मिन् ॥</span> यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः; एवं देहान्तरप्राप्तावपि, ईक्षितृत्वात् । | |||
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न हि जडस्य शरीरस्य कौमाराद्यनुभवः सम्भवति, मृतस्यादर्शनात् । मृतस्य वाय्वाद्यपगमाद् अनुभवाभावः, ‘अहं मनुष्यः’ इत्याद्यनुभवाच्चैतत् सिद्धमिति चेद्, न । सत्येवाविशेषे देहे सुप्त्यादौ ज्ञानादिविशेषादर्शनात् । | |||
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समश्चाभिमानो मनसि । काष्ठादिवच्च । | |||
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श्रुतेश्च । प्रामाण्यं च प्रत्यक्षादिवत् । न च बौद्धादिवत् । अपौरुषेयत्वात्। न ह्यपौरुषेये पौरुषेयाज्ञानादयः कल्पयितुं शक्याः । विना च कस्यचिद् वाक्यस्यापौरुषेयत्वं सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धिः । यश्च तौ नाङ्गीकुरुते नासौ समयी, अप्रयोजकत्वात् । | |||
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माऽस्तु धर्मोऽनिरूप्यत्वाद् इति चेद्, न । सर्वाभिमतस्य प्रमाणं विना निषेद्धुमशक्यत्वात् । न च सिद्धिरप्रामाणिकस्येति चेत् - न । सर्वाभिमतेरेव प्रमाणत्वात् । | |||
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अन्यथा सर्ववाचिकव्यवहारासिद्धेश्च । न च ‘मया श्रुतम्’ इति तव ज्ञातुं शक्यम् । अन्यथा वा प्रत्युत्तरं स्यात् । भ्रान्तिर्वा तव स्यात् । | |||
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सर्वदुःखकारणत्वं वा स्यात् । एको वाऽन्यथा स्यात् । | |||
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रचितत्वे च धर्मप्रमाणस्य कर्तुरज्ञानादिदोषशङ्का स्यात् । न चादोषत्वं स्ववाक्येनैव सिध्यति । | |||
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न च येन केनचिद् अपौरुषेयम् इत्युक्तमआ उक्तवाक्यसमम् । अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात् । अतः प्रामाण्यं श्रुतेः । अतः कुतर्कैः <span class="gr-moola">धीरस्तत्र न मुह्यति</span> ॥ | |||
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अथवा- जीवनाशं देहनाशं वाऽपेक्ष्य शोकः? न तावज्जीवनाशम् , नित्यत्वाद् इत्याह –<span class="gr-prateeka">न त्वेवेति ॥</span> | |||
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नापि देहनाशमित्याह – <span class="gr-prateeka">देहिन इति ॥</span> यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः, एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि ॥ १३ ॥ | |||
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| Line 1,075: | Line 900: | ||
| verse_line2 = आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | ||
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‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – | ‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – नासत इति ॥ असतः कारणस्य सतः ब्रह्मणश्च अभावो न विद्यते । | ||
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| Line 1,233: | Line 1,004: | ||
| verse_line2 = अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥१८ ॥ | | verse_line2 = अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥१८ ॥ | ||
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| Line 1,278: | Line 1,031: | ||
| verse_line2 = उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥ | | verse_line2 = उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥ | ||
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| Line 1,323: | Line 1,058: | ||
| verse_line2 = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥ | | verse_line2 = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥ | ||
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| Line 1,339: | Line 1,065: | ||
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अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – | अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – न जायत इति ॥ न चेश्वरज्ञानवत् भूत्वा भविता । तद्धि – <span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">‘तदैक्षत’ (छां.उ.६.२.३)</span> । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः । | |||
अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५) | अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५)</span> इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,396: | Line 1,122: | ||
| verse_line2 = नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥ | | verse_line2 = नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
}} | }} | ||
| Line 1,423: | Line 1,140: | ||
| verse_line2 = नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥ | | verse_line2 = नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,511: | Line 1,147: | ||
| text = | | text = | ||
वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – | वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – अच्छेद्य इति ॥ वर्तमानादर्शनाद् युक्तम् अयोग्यत्वम् इति सूचयति वर्तमानापदेशेन । कुतोऽयोग्यता? नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वात् । ‘शाश्वतः’ इत्येकरूपत्वमात्रम् उक्तम् । ‘स्थाणु’शब्देन नैमित्तिकम् अन्यथात्वं निवारयति । नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् । अन्यथा पुनरुक्तेः । ऐक्योक्तावपि अनुक्तविशेषणोपादानाद् नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः । युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,519: | Line 1,155: | ||
| text = | | text = | ||
तत्ता च - | तत्ता च - <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(ऋ.६.४७.१८)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘आभास एव च’ ( ब्र.सू.२.३.५०)</span> इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धा । न चांशत्वविरोधः । तस्यैवांशत्वात् । न चैकरूपैवांशता । प्रमाणं चोभयविधवचनमेव । न चांशस्य प्रतिबिम्बत्वं कल्प्यम्, गाध्यादिष्वपि अंशबाहुरूप्यदृष्टेः, इतरत्रादृष्टेः । | ||
स्थाणुत्वेऽपि | स्थाणुत्वेऽपि <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३)</span> इत्याद्यविरुद्धम् ईश्वरस्य । उभयविधवाक्याद् , अचिन्त्यशक्तेश्च । न च माययैकम् । <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते’ (भाग.१०.४.१९)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘न योगित्वाद् ईश्वरत्वाद्’ (बृ.उ.भा.५.८.१२.उ. वाराहवचनम् )</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘चित्रं न चैतत् त्वयि कार्यकारणे’ (भाग. ५.१८.५.)</span> इत्याद्यैश्वर्येणैव विरुद्धधर्माविरोधोक्तेः । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,806: | Line 1,442: | ||
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साङ्ख्यम् ज्ञानम् । <span class="gr-reference gr-ref-vyasasmruti-id">‘शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते॥’</span> इति भगवद्वचनाद् व्यासस्मृतौ । योग उपायः । | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये’ (भाग.४.१८.३)</span> इति प्रयोगाद् भागवते । नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित् सामस्त्येन, ‘कर्मयोग’ इत्यादिप्रयोगाच्च । निन्दितत्वाच्च इतरयोः मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या । वेदानां त्वेकार्थत्वान्न विरोधः । पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम् । तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च । एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्दार्थ उपादेयो वर्णनीयः । युक्तेश्च । ज्ञानं हि जैवमुक्तम् । उपायश्च वक्ष्यते । ‘बुध्यतेऽनया’ इति बुद्धिः । साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वाग् अभिहिता इत्यर्थः ॥ ३९-४० ॥ | |||
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स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – | स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – यामिमामिति ॥ ‘यामाहुस्तया’ इत्यन्वयः । मोक्षफलम् अपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं प्रवदन्ति । वेदवादरताः कर्मादिवाचकवेदवादरताः; वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः । नान्यदस्तीति वादिनः । >, <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘परोक्षविषया वेदाः’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Aitreyopanishat-id">‘परोक्षप्रिया इव हि देवाः’(ऐ.उ.३.१४)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मां विधत्तेऽभिधत्ते’(भाग.११.२१.४३)</span> इत्यादिभिः पारोक्ष्येण हि प्रायो भगवन्तं वदन्ति । भोगैश्वर्यगतिं प्रति तत्प्राप्तिं प्रति । तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः । तेषां सम्यग् युक्तिनिर्णयात्मिका बुद्धिः समाधौ समाध्यर्थे न विधीयते । सम्यङ् निर्णीतार्थानां हीश्वरे मनःसमाधानं सम्यग् भवति । तद्धि मोक्षसाधनम् । उक्तं चैतदन्यत्र– | ||
>, | >, <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । | ||
स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’(भाग.५.११.३) | स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’(भाग.५.११.३)</span> इति ॥ ४२-४४ ॥ | ||
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कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- | कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- यदेति ॥ निर्वेदं नितरां लाभम् । प्रयोगात् - <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।’(बृह.उ.३.५.१)</span> इत्यादि । | ||
न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति । | न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या अप्युरुक्रमे । | |||
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’ | कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’</span> इति वचनात् । | ||
अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्- | अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । | |||
सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०) | सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०)</span> इत्यादिवचनात् । | ||
तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् । | तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् । | ||
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तारतम्याधिगतेश्च । तथा हि- यदि तारतम्यं न स्यात्, | तारतम्याधिगतेश्च । तथा हि- यदि तारतम्यं न स्यात्, <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘नाऽत्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादम्’(भाग.३.१६.४८)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचित्’(भाग.३.२६.३४)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘एकत्व(मित्युत)मप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति’(भाग.३.३०.१३)</span> इति मुक्तिमप्यनिच्छतामपि मोक्ष एव फलम्, तमिच्छतामपि स (एव) भवति सुप्रतीकादीनामिति कथम् अनिच्छतां स्तुतिरुपपन्ना स्यात् ? वचनाच्च | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृश्यते पुरुषोत्तमे । | |||
तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने ॥ | तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने ॥ | ||
योगिनां भिन्नलिङ्गानाम् आविर्भूतस्वरूपिणाम् । | योगिनां भिन्नलिङ्गानाम् आविर्भूतस्वरूपिणाम् । | ||
प्राप्तानां परमानन्दं तारतम्यं सदैव हि ॥’ | प्राप्तानां परमानन्दं तारतम्यं सदैव हि ॥’</span> इति (इत्याद्युक्तेः )। | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘न त्वाम् अतिशयिष्यन्ति मुक्तावपि कथञ्चन । | |||
मद्भक्तियोगाज्ज्ञानाच्च सर्वान् अतिशयिष्यसि ॥’ | मद्भक्तियोगाज्ज्ञानाच्च सर्वान् अतिशयिष्यसि ॥’</span> इति च । | ||
साम्यवचनं तु प्राचुर्यविषयम्, दुःखाभावविषयं च । तच्चोक्तम्- | साम्यवचनं तु प्राचुर्यविषयम्, दुःखाभावविषयं च । तच्चोक्तम्- <span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘दुःखाभावः परानन्दो लिङ्गभेदः समा(मो) मताः(तः) । | ||
तथाऽपि परमानन्दो ज्ञानभेदात्तु भिद्यते ॥’ | तथाऽपि परमानन्दो ज्ञानभेदात्तु भिद्यते ॥’</span> इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । | ||
अतो न वैराग्यं श्रुतादौ अत्र विवक्षितम् । न च सङ्कोचे मानं किञ्चिद् विद्यमान इतरत्र प्रयोगे । महद्भिः श्रवणीयस्य श्रुतस्य च वेदादेः फलं प्राप्स्यसीत्यर्थः ॥५२ ॥ | अतो न वैराग्यं श्रुतादौ अत्र विवक्षितम् । न च सङ्कोचे मानं किञ्चिद् विद्यमान इतरत्र प्रयोगे । महद्भिः श्रवणीयस्य श्रुतस्य च वेदादेः फलं प्राप्स्यसीत्यर्थः ॥५२ ॥ | ||
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स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति | स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति भाषा , लक्षणमित्यर्थः । उक्तं लक्षणम् अनुवदति लक्षणान्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम् - समाधिस्थस्येति ॥ कम्= ब्रह्माणम्, ईशम्= रुद्रं च वर्तयतीति केशवः । तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Harivamsha-id">‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च । | |||
सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’ | सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’</span> इति वचनान्तराच्च । | ||
किमासीत ? किं प्रत्यासीत ? न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम् - | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव हि । | |||
तथाऽपि धर्मान् पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये । | तथाऽपि धर्मान् पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये । | ||
न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् ॥’</span> | न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् ॥’</span> इति वचनात् ॥५४ ॥ | ||
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गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति | गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति ‘या निशा’ इत्यादिना दर्शयिष्यन्, तल्लक्षणं प्रथमत आह - प्रजहातीति ॥ एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थं प्रवृत्तिं करोति? इति प्रश्नाभिप्रायः । ‘प्रारब्धकर्मणा ईषत्तिरोहितब्रह्मणो वासनया प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तयः सम्भवन्ति’ इत्याशयवान् परिहरति । प्रायः सर्वान् कामान् प्रजहाति । शुकादीनामपि ईषद्दर्शनात् । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’</span> इत्युक्तेः ताम् इच्छन्ति । यदा तु इन्द्रादीनाम् अग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषां ज्ञानम् । तच्चोक्तम्- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात् । | |||
उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’ | उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’</span> इति । | ||
अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् । | अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् । | ||
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न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः । | न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Smruthi-id">‘कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम् । | |||
ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’ | ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’</span> इति स्मृतेः । | ||
मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति - | मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति - मनोगतानिति ॥ विरोधश्चोच्यते - ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (भ.गी.२.५९) इति । न चैतददृष्ट्याऽपलपनीयम् । पुरुषवैशेष्यात् । आत्मना परमात्मना । परमात्मन्येव स्थितः सन् । आत्माख्ये तस्मिन् स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवति । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘विषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः । | |||
देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’ | देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’</span> इत्युक्तं हि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो नाऽत्मा जीवः ॥५५ ॥ | ||
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तदेव स्पष्टयत्युत्तरैस्त्रिभिः श्लोकैः । एतान्येव ज्ञानोपायानि च । तच्चोक्तम् - | तदेव स्पष्टयत्युत्तरैस्त्रिभिः श्लोकैः । एतान्येव ज्ञानोपायानि च । तच्चोक्तम् - <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तद्वै जिज्ञासुभिः साध्यं ज्ञानिनां यत्तु लक्षणम् ।’</span> इति । शोभनाध्यासो रागः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘रसो रागस्तथा रक्तिः शोभनाध्यास उच्यते ।’</span> इत्यभिधानम् ॥५६ ॥ | ||
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सम्मोहः अकार्येच्छा । तथाहि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासु - <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु’</span> इति । तथा चान्यत्र - <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सम्मोहोऽधर्मकामिता’</span> इति । स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिबुद्धि(स्मृति)नाशः । बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः । विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति । तथा ह्युक्तम् - | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा । | |||
दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’ | दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’</span> इति ॥ ६२, ६३ ॥ | ||
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कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? | कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठति । ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक् स्थितिं करोति । प्रसादो नाम स्वतोऽपि प्रायो विषय-अगतिः ॥ ६५ ॥ | ||
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कर्मणो ज्ञानम् अत्युत्तमम् इत्यभिहितं भगवता- ‘दूरेण ह्यवरं कर्म’ (२.४९.) इत्यादौ । एवं चेत् किमिति | कर्मणो ज्ञानम् अत्युत्तमम् इत्यभिहितं भगवता- ‘दूरेण ह्यवरं कर्म’ (२.४९.) इत्यादौ । एवं चेत् किमिति कर्मणि घोरे युद्धाख्ये नियोजयसि निवृत्तधर्मान् विनेत्याह- ज्यायसीति ॥ कर्मणः सकाशाद् बुद्धिर्ज्यायसी चेत् ते तव मता तत् तर्हि ॥ १-२ ॥ | ||
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‘ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेः, आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यप्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामि’ इत्याशयवान् भगवानाह- | ‘ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेः, आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यप्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामि’ इत्याशयवान् भगवानाह- लोक इति ॥ | ||
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द्विविधा अपि जनाः सन्ति- गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत्, तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् । मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः । | द्विविधा अपि जनाः सन्ति- गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत्, तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् । मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः । सांख्यानां ज्ञानिनां सनकादीनाम् । योगिनाम् उपायिनां जनकादीनाम् । ज्ञाननिष्ठा अप्याधिकारिकत्वाद् ईश्वरेच्छया लोकसंग्रहार्थत्वाच्च ये कर्मयोग्या भवन्ति तेऽपि योगिनः । निष्ठा स्थितिः । त्वं तु जनकादिवत् सकर्मैव ज्ञानयोग्यः, न तु सनकादिवत् तत्त्यागेनेत्यर्थः। सन्ति हीश्वरेच्छयैव कर्मकृतः प्रियव्रतादयोऽपि ज्ञानिन एव । तथा ह्युक्तम् ‘ईश्वरेच्छया विनिवेशितकर्माधिकारः’ इति ॥ ३ ॥ | ||
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न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह- | न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह- न हीति ॥५॥ | ||
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तथाऽपि शक्तितस्त्यागः कार्य इत्याह- | तथाऽपि शक्तितस्त्यागः कार्य इत्याह- कर्मेन्द्रियाणीति ॥ | ||
मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह- | मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह- मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति ॥ कर्मयोगं स्ववर्णाश्रमोचितम्, न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः । सन्न्यासादिविधानात्, सामान्यवचनाच्च ॥ ६-७ ॥ | ||
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| Line 2,814: | Line 2,450: | ||
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‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ इति कर्म बन्धकं स्मृतम् ? इत्यत आह- | ‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ इति कर्म बन्धकं स्मृतम् ? इत्यत आह- यज्ञार्थादिति ॥ कर्म बन्धनं यस्य लोकस्य स कर्मबन्धनः । यज्ञो विष्णुः । यज्ञार्थं सङ्गरहितं कर्म न बन्धकमित्यर्थः । ‘मुक्तसङ्गः’ इति विशेषणात् । <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘कामान् यः कामयते’ (मुं. ४. १-२)</span> इति श्रुतेश्च । ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति वक्ष्यमाणत्वाच्च । ‘एतान्यपि तु कर्माणि’ (१८.६) इति च । <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘तस्मान्नेष्टि-याजुकः स्यात्’ (बृ.१.५.२)</span> इति च । विशेषवचनत्वे समेऽपि विशेषणं परिशिष्यते ॥ ९ ॥ | ||
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| Line 2,859: | Line 2,495: | ||
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अत्रार्थवादमाह- | अत्रार्थवादमाह- सहयज्ञा इति ॥ १०-१३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,877: | Line 2,513: | ||
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हेत्वन्तरमाह- | हेत्वन्तरमाह- अन्नादिति ॥ यज्ञः पर्जन्यान्नत्वात् तत्कारणमुच्यते । पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति । तद्धि आपाद्यं कर्मविधये । न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 2,885: | Line 2,521: | ||
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मेघचक्राभिमानी च पर्जन्यः । तच्च | मेघचक्राभिमानी च पर्जन्यः । तच्च यज्ञाद् भवति । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Manusmriti-id">‘अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठति । | |||
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) । | आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) ।</span> | ||
उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति । | उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः, कर्म इतरक्रिया ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,930: | Line 2,566: | ||
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तानि चाक्षराणि नित्यानि । | तानि चाक्षराणि नित्यानि । <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ. ८.६४.६)</span> , ‘अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा’, <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutrani-id">‘अत एव च नित्यत्वम्’ (ब्र.सू. १-३-२९)</span> इत्यादिश्रुतिस्मृति-भगवद्वचनेभ्यः । दोषाश्चोक्ताः सकर्तृकत्वे । | ||
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न चाबुद्धिपूर्वमुत्पन्नानि । तत्प्रमाणाभावात् । निःश्वसित-शब्दस्त्वक्लेशाभिप्रायः, नाबुद्धिपूर्वाभिप्रायः । | न चाबुद्धिपूर्वमुत्पन्नानि । तत्प्रमाणाभावात् । निःश्वसित-शब्दस्त्वक्लेशाभिप्रायः, नाबुद्धिपूर्वाभिप्रायः । <span class="gr-reference gr-ref-Taittariyopanishat-id">‘सोऽकामयत’ (तै. २.११)</span> इत्यादेश्च । <span class="gr-reference gr-ref-Brihdaranyakopanishat-id">‘इष्टं हुतम्’ (बृ. ६.१.२)</span> इत्यादिरूपप्रपञ्चेन सहाभिधानाच्च । महातात्पर्यविरोधाच्च । तच्चोक्तं पुरस्तात् (गी.भा. २.२४)। न ह्यस्वातन्त्र्येणोत्पत्तिकर्तुः प्राधान्यम् । अस्वातन्त्र्यं च तदमतिपूर्वकत्वेन भवति । यथा रोगादीनां पुरुषस्य तज्जत्वेऽपि उत्पत्तिवचनान्यभिव्यक्त्यर्थानि , अभिमानिदेवताविषयाणि च । ‘नित्या’ इत्युक्त्वा ‘उत्सृष्टा’ इति वचनात् । अभिव्यञ्जके कर्तृवचनं चास्ति । ‘कृत्स्नं शतपथं चक्रे’ (मोक्षधर्मे) इति । कथमादित्यस्था वेदाः तेनैव क्रियन्ते ? वचनमात्राच्च निर्णयात्मक-शारीरकोक्तं बलवत् । | ||
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तर्ह्यतीव मनःसमाधानमपि न कार्यमित्यत आह - | तर्ह्यतीव मनःसमाधानमपि न कार्यमित्यत आह - यस्त्विति ॥ रमणं परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । तृप्तिरन्यत्रालम्बुद्धिः । सन्तोषस्तज्जनकं सुखम् । ‘सन्तोषस्तृप्तिकारणम्’ इत्यभिधानात् । परमात्मदर्शनादिनिमित्तं सुखं प्राप्तः । अन्यत्र सर्वात्मनालम्बुद्धिं च । | ||
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‘आत्मरतिरेव’ इत्यवधारणाद् असम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैव कार्यं न विद्यते । | ‘आत्मरतिरेव’ इत्यवधारणाद् असम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैव कार्यं न विद्यते । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pancharatra-id">‘स्थितप्रज्ञस्यापि कार्यो देहादिर्दृश्यते यदा ।स्वधर्मो मम तुष्ट्यर्थः सा हि सर्वैरपेक्षिता ॥’</span> इति वचनाच्च पञ्चरात्रे । | |||
अन्यदाऽन्यरतिरपीषत् सर्वस्य भवति । न च तत्रालम्बुद्धिमात्रमुक्तम् । ‘आत्मतृप्तः’ इति पृथगभिधानात् । कर्तृशब्दः कालावच्छेदेऽपि चायं प्रसिद्धो ‘यो भुङ्क्ते स तु न ब्रूयात्’ इत्यादौ । | अन्यदाऽन्यरतिरपीषत् सर्वस्य भवति । न च तत्रालम्बुद्धिमात्रमुक्तम् । ‘आत्मतृप्तः’ इति पृथगभिधानात् । कर्तृशब्दः कालावच्छेदेऽपि चायं प्रसिद्धो ‘यो भुङ्क्ते स तु न ब्रूयात्’ इत्यादौ । | ||
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न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित् प्रयोजनाश्रयः । अर्थो येन दर्शनादिना भवति सोऽर्थ | न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित् प्रयोजनाश्रयः । अर्थो येन दर्शनादिना भवति सोऽर्थ व्यपाश्रयः । | ||
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स यद् वाक्यादिकं प्रमाणं कुरुते , यदुक्तप्रकारेण तिष्ठतीत्यर्थः ॥ २१ ॥ | |||
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विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह- | विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह- प्रकृतेरिति॥ प्रकृतेर्गुणैः इन्द्रियादिभिः । प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि । तत्सम्बन्धीनि च । न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया ॥ २७ ॥ | ||
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कर्मभेदस्य गुणभेदस्य च | कर्मभेदस्य गुणभेदस्य च तत्त्ववित् । गुणा इन्द्रियादीनि । गुणेषु विषयेषु ॥ २८ ॥ | ||
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प्रकृतेर्गुणेषु इन्द्रियादिषु सम्मूढाः । इन्द्रियाद्यभिमानाद्धि विषयादिसङ्गः । गुणकर्मसु विषयेषु कर्मसु च । | प्रकृतेर्गुणेषु इन्द्रियादिषु सम्मूढाः । इन्द्रियाद्यभिमानाद्धि विषयादिसङ्गः । गुणकर्मसु विषयेषु कर्मसु च । <span class="gr-reference gr-ref-Pramanashloka-id">‘शब्दाद्या इन्द्रियाद्याश्च सत्त्वाद्याश्च शुभानि च । अप्रधानानि च गुणा निगद्यन्ते निरुक्तिगैः ॥’</span> | ||
इत्यभिधानात् । सत्त्वाद्यङ्गीकारे- ‘गुणा गुणेषु’ इत्ययुक्तं स्यात् ॥ २९ ॥ | इत्यभिधानात् । सत्त्वाद्यङ्गीकारे- ‘गुणा गुणेषु’ इत्ययुक्तं स्यात् ॥ २९ ॥ | ||
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अतः सर्वाणि कर्माणि | अतः सर्वाणि कर्माणि मय्येव सन्न्यस्य भ्रान्त्या जीवेऽध्यारोपितानि मय्येव विसृज्य ‘भगवानेव सर्वाणि कर्माणि करोति’ इति, मत्पूजेति च । आत्मानं मामधिकृत्य यच्चेतः तद् अध्यात्मचेतः । सन्न्यासस्तु भगवान् करोतीति । निर्ममत्वं नाहं करोमीति ॥ ३० ॥ | ||
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फलमाह- | फलमाह- ये म इति ॥ ये त्वेवं निवृत्तकमिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा । किमु अपरोक्षज्ञानिनः ? न तु साधनान्तरमुच्यते । <span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये । अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते । सर्वं तदन्तराधाय मुक्तये साधनं भवेत् । न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् ॥’</span> | ||
इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । | इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । | ||
अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥ | अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥ | ||
| Line 3,315: | Line 2,951: | ||
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तथाऽपि शक्तितो निग्रहः कार्यः । निग्रहात् सद्यः प्रयोजना-भावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह- | तथाऽपि शक्तितो निग्रहः कार्यः । निग्रहात् सद्यः प्रयोजना-भावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह- इन्द्रियस्येति ॥ | ||
तथा ह्युक्तम् - | तथा ह्युक्तम् - <span class="gr-reference gr-ref-Pramanashloka-id">‘संस्कारो बलवानेव ब्रह्माद्या अपि तद्वशाः । तथाऽपि सोऽन्यथाकर्तुं शक्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥’ इति ॥ ३४ ॥</span> | ||
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| Line 3,334: | Line 2,970: | ||
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तथाऽप्युग्रं युद्धकर्म ? इत्यत आह- | तथाऽप्युग्रं युद्धकर्म ? इत्यत आह- श्रेयानिति ॥ ३५ ॥ | ||
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यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स | यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स एष कामः । क्रोधो ऽप्येष एव तज्जन्यत्वात् । ‘कामात् क्रोधोऽभिजायते’ (२.६२) इति ह्युक्तम् । यत्रापि गुरुनिन्दादिनिमित्तः क्रोधस्तत्रापि भक्तिनिमित्त-अनिन्दा-कामनिमित्त एव । ये त्वन्यथा वदन्ति ते शङ्करान्न सूक्ष्मं जानन्ति । उक्तं च ‘ऋते कामं न कोपाद्या जायन्ते हि कथञ्चन’ इति । महाशनः । महद्धि कामभोग्यम् । महाब्रह्महत्यादिकारणत्वान् महापाप्मा । सर्वपुरुषार्थविरोधित्वाद् वैरी ॥ ३७ ॥ | ||
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शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्माऽपरोक्ष्याय न प्रकाशते ; कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि, किमु अल्पज्ञानिनः ! | शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्माऽपरोक्ष्याय न प्रकाशते ; कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि, किमु अल्पज्ञानिनः ! कामरूपेण कामाख्येन नित्यवैरिणा । दुष्पूरेण दुःखेन हि कामः पूर्यते । न हीन्द्रादिपदं सुखेन लभ्यते । यद्यपीन्द्रादिपदं प्राप्तम्, पुनर्ब्रह्मादिपदमिच्छतीत्यलम्बुद्धिर्नास्तीती अनलः । उक्तं च- <span class="gr-reference gr-ref-Pramanashloka-id">‘ज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमो बुद्धेर्मलं तथा । आदर्शस्याथ जीवस्य गर्भोल्बोपि हि कामकः ॥’ इति ॥३९ ॥</span> | ||
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वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह- | वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह- इन्द्रियाणीति ॥ एतैर्ज्ञानमावृत्य बुध्यादिभिर्हि विषयैः ज्ञानमावृतं भवति ॥ ४० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,541: | Line 3,177: | ||
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पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह - | पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह - इममिति ॥ १-३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,574: | Line 3,210: | ||
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‘मयि सर्वाणि’(३.३०) इत्युक्तं तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति - | ‘मयि सर्वाणि’(३.३०) इत्युक्तं तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति - अपरमिति ॥ ४-५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,799: | Line 3,435: | ||
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कर्म कुर्वित्युक्तम् । तस्य कर्मणो दुर्ज्ञेयत्वमाह सम्यग् वक्तुम् - | कर्म कुर्वित्युक्तम् । तस्य कर्मणो दुर्ज्ञेयत्वमाह सम्यग् वक्तुम् - किं कर्मेति ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,013: | Line 3,649: | ||
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द्रव्यं जुह्वतीति | द्रव्यं जुह्वतीति द्रव्ययज्ञाः । तपः परमेश्वरार्पणबुध्या तत्र जुह्वतीति तपोयज्ञा इत्यादि । ‘इदं तपो हविः तद् ब्रह्माग्नौ जुहोमि तत्पूजार्थम्’ इति होमः । तदर्पण एव च होमबुद्धिः ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 4,031: | Line 3,667: | ||
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अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणम् अपाने जुह्वति, अपानं च प्राणे । कुम्भकस्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ २९ ॥ | |||
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| Line 4,373: | Line 4,009: | ||
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इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - | इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - संन्यासस्त्विति ॥ योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति । अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य । मोक्षाद्येव हि फलम् । अन्यत् फलम् अल्पत्वाद् अफलमेवेत्याशयः । तच्चोक्तम्- <span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते’ ।</span> इति पाद्मे । यत्तु महत्फलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति । यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः । महाफलश्च योगयुक्तश्चेत् संन्यास इत्याह - योगयुक्त इति ॥ मुनिः संन्यासी । तथाचोक्तम्- <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः।’</span> इति ॥ ६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,671: | Line 5,307: | ||
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आसक्तमनाः अतीव स्नेहयुक्तमनाः । मदाश्रयः ‘भगवानेव मया सर्वं कारयति, स एव च मे शरणम्, तस्मिन्नेव चाहं स्थितः’ इति स्थितः । ‘असंशयम्’, ‘समग्रम्’ इति क्रियाविशेषणम् ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 5,689: | Line 5,325: | ||
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इदं मद्विषयं ज्ञानम् । विज्ञानं विशेषज्ञानम् ॥ २ ॥ | |||
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| Line 5,707: | Line 5,343: | ||
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दौर्लभ्यं ज्ञानस्याह - | दौर्लभ्यं ज्ञानस्याह - मनुष्याणामिति ॥ ३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,725: | Line 5,361: | ||
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प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह - | प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह - भूमिरित्यदिना ॥ महतो हङ्कार एवान्तर्भावः । ॥४ ॥ | ||
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अहमेव परतरः । | अहमेव परतरः । मत्तोऽन्यत् परतरं न किञ्चिद् अपि । ( इदं ज्ञानम्) ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
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तर्हि किमिति सर्वेऽपि नात्यायन्? इत्यत आह - | तर्हि किमिति सर्वेऽपि नात्यायन्? इत्यत आह - न मामिति ॥ दुष्कृतित्वात् मूढाः । अत एव नराधमाः । अपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः । अत एव आसुरं भावमाश्रिताः । स च वक्ष्यते- ‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च’(१६.७) इत्यादिना । अपहारः= अभिभवः । उक्तं चैतद् व्यासयोगे- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘ज्ञानं स्वभावो जीवानां मायया ह्यभिभूयते’।</span> इति । | |||
असुषु रता असुराः । तच्चोक्तं नारदीये- <span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘ज्ञानप्रधाना देवास्तु असुरास्तु रता असौ’ ।</span> । इति ॥ १५, १६ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 6,002: | Line 5,638: | ||
| text = | | text = | ||
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । तच्चोक्तं ब्राह्मे- <span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">‘जन्मभिर्बहुभिः ज्ञात्वा ततो मां प्रतिपद्यते’।</span> इति ॥ १९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 6,056: | Line 5,692: | ||
| text = | | text = | ||
यां यां ब्रह्मादिरूपां तनुम् । उक्तं च नारदीये- <span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘अन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता’।</span> इति । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः’।(म.भा.शां.प.३४२.३)</span> इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु । <span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarta-id">‘अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते’ ।</span> इत्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते ॥॥ २१-२३ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 6,074: | Line 5,710: | ||
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को विशेषस्तवान्येभ्यः ? इत्यत आह - | को विशेषस्तवान्येभ्यः ? इत्यत आह - अव्यक्तमिति ॥ कार्यदेहादिवर्जितः(तम्) । तद्वानिव प्रतीयस इत्यत आह - व्यक्तिमापन्नमिति ॥ कार्यदेहाद्यापन्नम् । तच्चोक्तम्- <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सदसतः परम्’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Shvetashvatara-id">‘न तस्य कार्यम्(श्वे.उ.६,८)’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Shvetashvatara-id">‘अपाणिपादः’(श्वे.उ.३,१९)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आनन्ददेहं पुरुषं मन्यन्ते गौणदेहिकम्’</span> इत्यादौ । भावं याथार्थ्यम् । (तच्चा)तथाऽब्रवीत्- <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘याथातथ्यमजानन्तः परं तस्य विमोहिताः’</span> । इति ॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,092: | Line 5,728: | ||
| text = | | text = | ||
अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह - | अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह - नाहमिति ॥ योगेन= सामर्थ्योपायेन, मायया च । मयैव मूढो नाभिजानाति । तथाऽऽह पाद्मे- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘आत्मनः प्रावृतिं चैव लोकचित्तस्य बन्धनम् । | |||
स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः ॥’</span> | स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः ॥’</span> इति ॥२५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,112: | Line 5,748: | ||
| text = | | text = | ||
न च मां माया बध्नातीत्याह - | न च मां माया बध्नातीत्याह - वेदेति ॥ न कश्चन अतिसमर्थोऽपि स्वसामर्थ्यात् ॥ २६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,130: | Line 5,766: | ||
| text = | | text = | ||
द्वन्द्वमोहेन सुखदुःखादिविषयमोहेन । इच्छाद्वेषयोः प्रवृद्धयोर्न हि किञ्चिज्ज्ञातुं शक्यम् । कारणान्तरमेतत् । सर्गे सर्गकालं आरभ्यैव । शरीरे हि सति (सन्ति) इच्छादयः । पूर्वं त्वज्ञानमात्रम् ॥ २७ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 6,148: | Line 5,784: | ||
| text = | | text = | ||
विपरीताश्च केचित् सन्तीत्याह - | विपरीताश्च केचित् सन्तीत्याह - येषामिति ॥ २८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,271: | Line 5,907: | ||
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परमक्षरं (परं) ब्रह्म । वेदादिशङ्कानि(व्या)वृत्त्यर्थम् एतत् । आत्मन्यधि यत् तद् | परमक्षरं (परं) ब्रह्म । वेदादिशङ्कानि(व्या)वृत्त्यर्थम् एतत् । आत्मन्यधि यत् तद् अध्यात्मम् । आत्माऽधिकारे यत् तदिति वा । तथा हि- जैवस्वभावः । स्वाख्यो भाव इति व्युत्पत्त्या जीवो वा स्वभावः । सर्वदा अस्त्येवैकप्रकारेणेति भावः । अन्तःकरणादिव्यावृत्त्यर्थो ‘भाव’शब्दः । न ह्येकप्रकारेण स्थितिरन्तःकरणादेः, विकारित्वात् । स्वशब्दः ईश्वरव्यावृत्त्यर्थः । भूतानाम्= जीवानाम्, भावानाम्= जडपदार्थानां चोद्भवकरेश्वरक्रिया विसर्गः । विशेषेण सर्जनम् = विसर्ग इत्यर्थः ॥ १-३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,416: | Line 6,052: | ||
| text = | | text = | ||
ध्येयमाह- | ध्येयमाह- कविमिति ॥ कविं सर्वज्ञम् , <span class="gr-reference gr-ref-Atharvana-id">‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.१०)</span> इति श्रुतिः । <span class="gr-reference gr-ref-brahma-id">‘त्वं कविः सर्ववेदनात्’</span> इति च ब्राह्मे । धातारं धारणपोषणकर्तारम् । <span class="gr-reference gr-ref-Dhathu-id">‘डुधाञ्= धारणपोषणयोः’</span> इति धातोः । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘धाता विधाता परमोत सन्दृक्’(कृ.य.का.५.प्र.७.अनु.४)</span> इति च श्रुतिः । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘ब्रह्मा स्थाणुः’</span> इत्यारभ्य <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘तस्य प्रसादादिच्छन्ति तदादिष्टफलं गतिम्।’(म.भा.शां.प.३३४.३४-३९)</span> इति च मोक्षधर्मे । तमसः अव्यक्तात् परतः स्थितम्- तमसः परस्तादिति ॥ <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">अव्यक्तं वै तमः, परस्ताद्धि स ततः’</span> इति पिप्पलादशाखायाम् । | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘मृत्युर्वा व तमः’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-bruhadaranyaka-id">मृत्युर्वै ज्योतिरमृतम्’(बृ.३.३.२९)</span> इति श्रुतेः ॥९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 6,511: | Line 6,147: | ||
| text = | | text = | ||
नित्ययुक्तस्य नित्योपायवतः । योगिनः परिपूर्णयोगस्य ॥ १४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 6,529: | Line 6,165: | ||
| text = | | text = | ||
तत्प्राप्तिं स्तौति - | तत्प्राप्तिं स्तौति - माम् इति ॥ ‘परमां (सं)सिद्धिं गता हि ते’ इति तत्र हेतुः ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,615: | Line 6,251: | ||
| text = | | text = | ||
अव्यक्तः भगवान् । ‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते’ इति ‘मामुपेत्य’(८.१६) इत्युक्तस्य परामर्शात् । <span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘अव्यक्तं परमं विष्णुः’</span> इति प्रयोगाच्च गारुडे । धाम स्वरूपम् । | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तेजः स्वरूपं च गृहं प्राज्ञैर्धामेति गीयते’</span> इत्यभिधानात्॥ २१ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 6,634: | Line 6,270: | ||
| text = | | text = | ||
परमसाधनमाह- | परमसाधनमाह- पुरुष इति ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,652: | Line 6,288: | ||
| text = | | text = | ||
यत्कालाद्यभिमानिदेवतागता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह - | यत्कालाद्यभिमानिदेवतागता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह - यत्रेत्यादिना ॥ ‘काले’ इत्युपलक्षणम् । अग्न्यादेरपि वक्ष्यमाणत्वात् ॥२३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,832: | Line 6,468: | ||
| text = | | text = | ||
तज्ज्ञानाद्याह- | तज्ज्ञानाद्याह- मयेति ॥ तर्हि किमिति न दृश्यत इत्यत आह- अव्यक्तमूर्तिनेति ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,870: | Line 6,506: | ||
| text = | | text = | ||
‘मत्स्थानि’(९.४), ‘न च मत्स्थानि’(९.५) इत्यस्य दृष्टान्तमाह- | ‘मत्स्थानि’(९.४), ‘न च मत्स्थानि’(९.५) इत्यस्य दृष्टान्तमाह- यथाऽऽकाशस्थित इति ॥ न हि आकाशस्थितो(ऽपि) वायुः स्पर्शाद्याप्नोति ॥ ६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,888: | Line 6,524: | ||
| text = | | text = | ||
ज्ञानप्रदर्शनार्थं प्रलयादि प्रपञ्चयति- | ज्ञानप्रदर्शनार्थं प्रलयादि प्रपञ्चयति- सर्वभूतानीत्यादिना ॥ ७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,906: | Line 6,542: | ||
| text = | | text = | ||
प्रकृत्यवष्टम्भस्तु यथा कश्चित् समर्थोऽपि पादेन गन्तुम्, लीलया दण्डमवष्टभ्य गच्छति । | प्रकृत्यवष्टम्भस्तु यथा कश्चित् समर्थोऽपि पादेन गन्तुम्, लीलया दण्डमवष्टभ्य गच्छति । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि।’(कुम्भ-म.भा.शां.प.३४७.४५)</span> इति च मोक्षधर्मे । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं दैवं मां (त्वं) ज्ञातुमर्हसि।’(मोक्षधर्मे)</span> इति च । | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्(त्वां च मूर्तितः) । | |||
प्रधानविनियोगस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति(त्वामेव विशते बुधः) ॥’(कुम्भ-म.भा.१३.४५.४११) | प्रधानविनियोगस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति(त्वामेव विशते बुधः) ॥’(कुम्भ-म.भा.१३.४५.४११)</span> इति च । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘न कुत्रचिच्छक्तिरनन्तरूपा विहन्यते तस्य महेश्वरस्य । | |||
तथाऽपि मायामधिरुह्य देवः प्रवर्तते सृष्टिविलापनेषु ॥’ | तथाऽपि मायामधिरुह्य देवः प्रवर्तते सृष्टिविलापनेषु ॥’</span> इति ऋग्वेदखिलेषु । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मय्यनन्तगुणेनन्ते गुणतोनन्तविग्रहे।’</span> इति भागवते । | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Atharvanaveda-id">‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म इति, (बृ)बृंहति (बृ)बृंहयति ।’</span> इति च आथर्वणे । | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते।’</span> इति च । | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि’(ऋ.मं.१.अनु.१५४.मं.१)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.मं.७.अनु.९९.मं.२)</span> इत्यादेश्च । | |||
प्रकृतेर्वशादवशम् । | प्रकृतेर्वशादवशम् । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘त्वमेवैतत्सर्जने सर्वकर्मण्यनन्तशक्तोऽपि स्वमाययैव । | |||
मायावशं चावशं लोकमेतत् तस्मात् स्रक्ष्यस्यत्सि पासीश विष्णो ॥’ | मायावशं चावशं लोकमेतत् तस्मात् स्रक्ष्यस्यत्सि पासीश विष्णो ॥’</span> इति गौतमखिलेषु ॥ ८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,959: | Line 6,595: | ||
| text = | | text = | ||
उदासीनवदिति चेत् स्वयमेव प्रकृतिः सूयते? इत्यत आह- | उदासीनवदिति चेत् स्वयमेव प्रकृतिः सूयते? इत्यत आह- मयेति ॥ प्रकृतिसूतिद्रष्टा कर्ता (च) अहमेवेत्यर्थः । तथा च श्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">‘यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम्।’(म.ना.१.४)</span> इति ॥१० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,006: | Line 6,642: | ||
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तेषां फलमाह - | तेषां फलमाह - मोघाशा इति ॥ वृथाशाः । भगवद्द्वेषिभिः आशासितं(आमुष्मिकम्) न किञ्चिदाप्यते । यज्ञादिकर्माणि च वृथैव तेषां, ज्ञानं च । केनापि ब्रह्मरुद्रादिभक्त्याद्युपायेन न कश्चित् पुरुषार्थ आमुष्मिकः तैराप्यत इत्यर्थः । वक्ष्यति च - ‘तानहं द्विषतः क्रूरान्’(१६.१९) इत्यादि । मोक्षधर्मे च - | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् । | |||
मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीस्समाः । | मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीस्समाः । | ||
यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् (प्रभुम्) । | यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् (प्रभुम्) । | ||
कथं स न भवेद् द्वेष्य आलोकान्तस्य कस्यचित् ॥(कथं नाम भवेद् द्वेष्य आात्मा लोकस्य कस्यचित्)’(गी.प्रे-म.भा.१२.३४६.६-७) | कथं स न भवेद् द्वेष्य आलोकान्तस्य कस्यचित् ॥(कथं नाम भवेद् द्वेष्य आात्मा लोकस्य कस्यचित्)’(गी.प्रे-म.भा.१२.३४६.६-७)</span> इति । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘सर्वोत्कृष्टो(ष्टे) ज्ञानभक्ती ह(हि) यस्य नारायणे पुष्करविष्टराद्ये । | |||
सर्वावमो(मे) द्वेषयुतश्च तस्मिन् भ्रूणानन्तघ्नोऽ(प्य)स्य समो न चैव ॥’ | सर्वावमो(मे) द्वेषयुतश्च तस्मिन् भ्रूणानन्तघ्नोऽ(प्य)स्य समो न चैव ॥’</span> इति च सामवेदे शाण्डिल्यशाखायाम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 7,020: | Line 6,656: | ||
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<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘द्वेषाच्चेद्यादयो नृपाः’(भाग.७.१.३२)</span> , | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘वैरेण यन्नृपतयः शिशुपालपौण्ड्रसाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । | |||
ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमीयु(मापु)रनुरक्तधियः पुनः किम्॥’(भाग.११.५.४९) | ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमीयु(मापु)रनुरक्तधियः पुनः किम्॥’(भाग.११.५.४९)</span> | ||
इत्यादि तु भगवतो भक्तप्रियत्वज्ञापनार्थम्, (नित्यध्यानस्तुत्यर्थं च ।) स्वभक्तस्य कदाचिच्छापबलाद् द्वेषिणोऽपि भक्तिफलमेव भगवान् ददातीति । | |||
}} | }} | ||
| Line 7,061: | Line 6,697: | ||
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नेतरे द्विषन्तीति दर्शयितुं देवानाह - | नेतरे द्विषन्तीति दर्शयितुं देवानाह - महात्मान इति ॥ १३, १४ ॥ | ||
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सर्वत्रैक एव नारायणः स्थित इति | सर्वत्रैक एव नारायणः स्थित इति एकत्वेन । पृथक्त्वेन सर्वतो वैलक्षण्येन । बहुधा तस्य रूपम् । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो नीलमथार्जुनम्’(आभाति शुक्लमिव लोहितमिव अथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् इति कुम्भ-म.भा.५.४४.२६)</span> इति हि सनत्सुजा(तीये)ते । ‘दैवमेवापरे’(४.२५) इत्युक्तप्रकारेण बहवो वा बहुधा ॥१५ ॥ | ||
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| Line 7,097: | Line 6,733: | ||
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प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह - | प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह - अहं क्रतुरित्यादिना ॥ क्रतवोऽग्निष्टोमादयः । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘उद्दिश्य देवान् द्रव्याणां त्यागो यज्ञ इतीरितः’</span> इत्यभिधानात् ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,181: | Line 6,817: | ||
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तथाऽपि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद् वरमिति दर्शयति- | तथाऽपि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद् वरमिति दर्शयति- त्रैविद्या इत्यादिना ॥ २०-२१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,222: | Line 6,858: | ||
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तर्हि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्याद्यसत्यमित्यत आह - | तर्हि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्याद्यसत्यमित्यत आह - येऽपीति ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,240: | Line 6,876: | ||
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कारणमाहाविधिपूर्वकत्वे - | कारणमाहाविधिपूर्वकत्वे - अहं हीति ॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,258: | Line 6,894: | ||
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फलं विविच्याह - | फलं विविच्याह - यान्तीति ॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,326: | Line 6,962: | ||
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तर्हि स्नेहादिमत्त्वाद् अल्पभक्तस्यापि कस्यचित् बहु फलं ददासि । विपरीतस्यापि कस्यचित् विपरीतम् ? इत्यत आह - | तर्हि स्नेहादिमत्त्वाद् अल्पभक्तस्यापि कस्यचित् बहु फलं ददासि । विपरीतस्यापि कस्यचित् विपरीतम् ? इत्यत आह - समोऽहमिति ॥ तर्हि न भक्तिप्रयोजनम् ? इत्यत आह - ये भजन्तीति ॥ मयि ते तेषु चाप्यहम् इति । मम ते वशाः, तेषामहं वश इति । उक्तं च पैङ्गिखिलेषु- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ये वै भजन्ते परमं पुमांसं तेषां वशः स तु ते तद्वशाश्च ।’</span> इति । तद्वशा एव ते सर्वदा । तथाऽपि बुद्धिपूर्वकत्वाबुद्धिपूर्वकत्वेन भेदः । उद्धवादिवत्, शिशुपालादिवच्च । तच्चोक्तं तत्रैव- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अबुद्धिपूर्वाद् यो वशस्तस्य ध्यानात् पुनर्वशो भवते बुद्धिपूर्वम्’</span> इति ॥ २९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,455: | Line 7,091: | ||
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प्रीयमाणाय श्रुत्वा सन्तोषं प्राप्नुवते ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 7,473: | Line 7,109: | ||
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प्रभवं प्रभावम् । मदीयां जगदुत्पत्तिं वा । तद्वशत्वात् तस्येत्युच्यते । यद्यस्ति तर्हि देवादयोऽपि जानन्ति सर्वज्ञत्वात्, अतो नास्तीति भावः । ‘अहमादिर्हि’ इति तु उत्पत्तिरपि यस्य वशा, कुतस्तस्य जनिरिति ज्ञापनार्थम् । ‘अहं सर्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयः’(७.३) इति चोक्तम् । उक्तं चैतत् सर्वमन्यत्रापि- | |||
<span class="gr-reference gr-ref-TaittariyaBrahmana-id">‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः । | |||
अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेन अथा को वेद यत आ बभूव ॥’(तै.ब्रा.२.८९.५,ऋ.म.१०.सू.१२९.मं.६) | अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेन अथा को वेद यत आ बभूव ॥’(तै.ब्रा.२.८९.५,ऋ.म.१०.सू.१२९.मं.६)</span> इति । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘न तत्प्रभावमृषयश्च देवा विदुः कुतोऽन्येऽल्पधृतिप्रमाणाः।’</span> इति ऋग्वेदखिलेषु । अन्यस्तु अर्थो ‘यो मामजम्’(१०.०३) इति वाक्यादेव ज्ञायते ॥२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 7,494: | Line 7,130: | ||
| text = | | text = | ||
अनः= चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्य इति | अनः= चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्य इति अनादिः । अजत्वेन सिद्धेः इतरस्य । | ||
॥३ ॥ | ॥३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,609: | Line 7,245: | ||
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सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह- | सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह- अहमित्यादिना ॥ ८-११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,657: | Line 7,293: | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्म परिपूर्णम्- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म । बृहति(बृंहति) बृंहयति च’</span> इति च श्रुतिः । ‘बृह (बृंह) बृहि = वृद्धौ’ इति च पठन्ति । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘परमं यो महद् ब्रह्म’(कुम्भ-म.भा.१३.२५४.९)</span> इति च । विविधमासीदिति विभुः । तथाहि वारुणशाखायाम्- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विभु प्रभु प्रथमं मेहनावत इति । स ह्येव प्राभवद् विविधोऽभवत्’</span> इति । <span class="gr-reference gr-ref-Taittariyopanishat-id">‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’(तै.उ.२.६.)</span> इत्यादेश्च ॥ १२-१५ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 7,675: | Line 7,311: | ||
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विभूतयः विविधभूतयः ॥ १६ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 7,702: | Line 7,338: | ||
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न जायते, अर्दयति च संसारम् इति | न जायते, अर्दयति च संसारम् इति जनार्दनः । तथा च बाभ्रव्यशाखायाम्- <span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘स भूतः स जनार्दन इति स ह्यासीत् स नासीत् सोऽर्दयति’</span> इति ॥१८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,800: | Line 7,436: | ||
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सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगद् अनेन इति | सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगद् अनेन इति कपिलः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘प्रीतिः सुखं कम् आनन्दः’</span> इत्याद्यभिधानात् । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छा.४.१०.५)</span> इति च । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् । | |||
सुखादनन्तात् पालना(ल्लीयनाच्च)ल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति॥’ | सुखादनन्तात् पालना(ल्लीयनाच्च)ल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति॥’</span> इति च (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम् ॥२६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,856: | Line 7,492: | ||
| text = | | text = | ||
आनन्दरूपत्वात् पूर्णत्वात् लोकरमणत्वाच्च | आनन्दरूपत्वात् पूर्णत्वात् लोकरमणत्वाच्च रामः । <span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘आनन्दरूपो निष्परीमाण एष लोकश्चैतस्माद् रमते तेन रामः ।’</span> इति शाण्डिल्यशाखायाम् । रश्च अमश्चेति व्युत्पत्तिः ॥३१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,960: | Line 7,596: | ||
| text = | | text = | ||
मया विना यद् भूतं स्यात् तन्नास्ति । | मया विना यद् भूतं स्यात् तन्नास्ति । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘विश्वरूपः अनन्तगतेः अनन्तभागः अनन्तगः अनन्तः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४)</span> इत्यादि हि मोक्षधर्मे ॥ ३९,४० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,978: | Line 7,614: | ||
| text = | | text = | ||
‘यद्यद् विभूतिमत्’इति विस्तरः । विष्ण्वादीनि तु स्वरूपाण्येव । अन्यानि तु तेजोयुक्तानि(तेजोंऽश) । तथा च पैङ्गिखिलेषु- | ‘यद्यद् विभूतिमत्’इति विस्तरः । विष्ण्वादीनि तु स्वरूपाण्येव । अन्यानि तु तेजोयुक्तानि(तेजोंऽश) । तथा च पैङ्गिखिलेषु- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विशेषका रुद्रवैन्येन्द्रदेवराजन्याद्या अंशयुतान्यजीवाः । | ||
कृष्णव्यासौ रामकृष्णौ च रामः कपिलयज्ञप्रमुखाः स्वयं सः ॥’ | कृष्णव्यासौ रामकृष्णौ च रामः कपिलयज्ञप्रमुखाः स्वयं सः ॥’</span> इति । <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘स एवैको भार्गवदाशरथिकृष्णाद्यास्तु अवंशयुता अन्यजीवाः’</span> इति च गौतमखिलेषु । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः । | |||
कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः स्मृताः। | कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः स्मृताः। | ||
एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ॥’(भाग.१.३.२७-२८)</span> | एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ॥’(भाग.१.३.२७-२८)</span> इति च भागवते । ऋष्यादीन् अंशयुतत्वेनोक्त्वा वराहादीन् स्वरूपत्वेनाह । तु शब्द एवार्थे । अन्यस्तु विशेषो न कुत्राप्यवगतः । अंशत्वं च तत्राप्यवगतम्- ‘उद्बबर्हात्मनः केशौ’ इति । <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मृडयन्ति’(भाग१.३.२९)</span> इति बहुवचनं चायुक्तम् । न हि अन्तराऽन्यदुक्त्वा पूर्वम् अपरामृश्य तत्क्रिया उच्यमाना दृष्टा कुत्रचित् ॥ ४१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,009: | Line 7,645: | ||
| text = | | text = | ||
‘किम्’ इति वक्ष्यमाणप्राधान्यज्ञापनार्थम् । न तूक्तनिष्फलत्वज्ञापनाय । तथा सति नोच्येत । | ‘किम्’ इति वक्ष्यमाणप्राधान्यज्ञापनार्थम् । न तूक्तनिष्फलत्वज्ञापनाय । तथा सति नोच्येत । <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अज्ञात्वैनं सर्वविशेषयुक्तं देवं वरं को हि मुच्येत बन्धात्।’</span> इति च ऋर्ग्वेदखिलेषु । त्वं तु बहुफलप्राप्तियोग्य इति ‘तव’ इति विशेषणम् । अन्यस्तुत्यर्थत्वेन प्रसिद्धश्च एकत्र किंशब्दः - | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘रागद्वेषौ यदि स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् । | |||
तावुभौ यदि न (रागद्वेषौ न चेत्) स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् ॥’ | तावुभौ यदि न (रागद्वेषौ न चेत्) स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् ॥’</span> इत्यादौ । प्राधान्यं च सिद्धमेकत्र दर्शनात् सर्वत्र भगवद्दर्शनस्य ‘यो मां पश्यति सर्वत्र’(६.३०) इत्यादौ ॥४२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,171: | Line 7,807: | ||
| text = | | text = | ||
सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम् ॥ १०, ११ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 8,190: | Line 7,826: | ||
सहस्रशब्दोऽनन्तवाची । तदपि ‘पाकशासनविक्रमः’ इत्यादिवत् प्रत्यायनार्थमेव । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- | सहस्रशब्दोऽनन्तवाची । तदपि ‘पाकशासनविक्रमः’ इत्यादिवत् प्रत्यायनार्थमेव । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अनन्तशक्तिः परमोऽनन्तवीर्यः सोऽनन्ततेजाश्च ततस्ततोऽपि ।’</span> इति । महातात्पर्याच्च बाहुल्यम् । न च परिमाणोक्त्या किञ्चित् प्रयोजनम् ॥१२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 8,303: | Line 7,939: | ||
| text = | | text = | ||
‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - | ‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - अप्रमेयमिति ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,556: | Line 8,192: | ||
| text = | | text = | ||
यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् | यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः । अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेः(त्) हृषीकेशः । केशत्वं त्वंशूनां तन्नियत(न्तृ)त्वादेः । प्रमाणं तु ‘शशिसूर्यनेत्रम्’(११.१९) इत्यत्रोक्तम् । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च (हृषीकेशः) । तेषां विशेषतः ईशत्वं च <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘यः प्राणे तिष्ठन्’(बृ.५.७.१६)</span> इत्यादौ सिद्धम् । <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे’(भाग.२.६.३३)</span> इत्यादिप्रयोगाच्च । इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धः । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत् केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः । | |||
बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् । | बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् । | ||
बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् । | बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् । | ||
अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन । | अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन । | ||
हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति | हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति</span> ॥ ३६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,569: | Line 8,205: | ||
| chapter_id = BGB_C11 | | chapter_id = BGB_C11 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । | ||
कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । | | verse_line2 = अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
}} | }} | ||
| Line 9,169: | Line 8,804: | ||
| text = | | text = | ||
पिण्डीकृत्योपसंहरति- | पिण्डीकृत्योपसंहरति- ये तु धर्म्यामृतमिति ॥ धर्मः= विष्णुः, तद्विषयं च धर्म्यम् । ‘धर्म्यम् अमृतम्= मृत्यादिसंसारनाशकं च’ इति धर्म्यामृतम् । श्रत्= आस्तिक्यम् । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘श्रन्नामास्तिक्यमुच्यते’</span> इति ह्यभिधानम् । तद् दधानाः श्रद्दधानाः ॥२० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,243: | Line 8,878: | ||
| text = | | text = | ||
‘यद्विकारि’ येन विकारेण युक्तम् । यतश्च यत् यतो याति = प्रवर्तते । स च प्रवर्तकः । यतश्च यत् इति अस्मात् प्रवर्तते क्षेत्रमिति वचनम् । स च य इति स्वरूपमात्रम् ॥ १-४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 9,306: | Line 8,941: | ||
| text = | | text = | ||
‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- | ‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- अमानित्वमित्यादिना ॥ आत्माल्पत्वं ज्ञात्वापि महत्त्वप्रदर्शनं दम्भः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ज्ञात्वापि स्वात्मनोल्पत्वं डम्भो माहात्म्य(भावनम्)दर्शनम्’ इति ह्यभिधानम् ।</span> आर्जवं मनोवाक्कायकर्म\ाम् अवैपरीत्यम् ॥ ८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,333: | Line 8,968: | ||
| text = | | text = | ||
सक्तिः = स्नेहः । स एवातिपक्वः= अभिष्वङ्गः । | सक्तिः = स्नेहः । स एवातिपक्वः= अभिष्वङ्गः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्नेहः सक्तिः स एवातिपक्वो(क्तो)भिष्वङ्ग उच्यते।’</span> इति ह्यभिधानम् ॥ १०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,360: | Line 8,995: | ||
| text = | | text = | ||
तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अपरोक्षज्ञानार्थं शास्त्र(ज्ञानम्)दर्शनम् ॥ ११-१२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 9,378: | Line 9,013: | ||
| text = | | text = | ||
‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् | ‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् अनादिमत् । अन्यथा ‘अनादि’ इत्येव स्यात् । | ||
॥ १३ ॥ | ॥ १३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,406: | Line 9,041: | ||
| text = | | text = | ||
सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति | सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति सर्वेन्द्रियगुणाभासम् । इन्द्रियवर्जितत्वाद्यर्थ उक्तः पुरस्तात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 9,517: | Line 9,152: | ||
| text = | | text = | ||
‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - | ‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - उपद्रष्टेति ॥ अनुमन्ता अन्वनु विशेषतो निरूपकः ॥२३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,604: | Line 9,239: | ||
| text = | | text = | ||
साङ्ख्येन वेदोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानेन । कर्मिणामपि श्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वा दृष्टिः । श्रावकाणां च ज्ञात्वा ध्यात्वा । साङ्ख्यानां च ध्यात्वा । तथा च गौपवनश्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘कर्मकृच्चापि तच्छ्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वाऽनुपश्यति । | |||
श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति । | श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति । | ||
अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’</span> | अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’</span> इति । | ||
‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥ | ‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,643: | Line 9,278: | ||
| text = | | text = | ||
पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- | पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- यावदित्यादिना ॥ २७-२९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,679: | Line 9,314: | ||
| text = | | text = | ||
एकस्थम् एकस्मिन्नेव विष्णौ स्थितम् । तत एव च विष्णोः विस्तारम् ॥३१ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 9,697: | Line 9,332: | ||
| text = | | text = | ||
न च व्ययादिस्तस्येत्याह - | न च व्ययादिस्तस्येत्याह - अनादित्वादिति ॥ सादि हि प्रायो व्ययि, गुणात्मकं च । ‘न करोति’ इत्यादेरर्थ उक्तः पुरस्तात् । न लौकिकक्रियादिस्तस्य । अतो <span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘न प्रज्ञम्’(मां.२.१)</span> इत्यादिवदिति ॥ ३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,804: | Line 9,439: | ||
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महद् ब्रह्म प्रकृतिः । सा च ‘श्रीः-भूः-दुर्गा’ इति भिन्ना । उमासरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः । तथा च काषायणश्रुतिः- | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘श्रीर्भूमिर्दुर्गा महती तु माया सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिक च । | |||
उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः ॥’ | उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः ॥’</span> इति । | ||
‘मम योनिः’ इति गर्भाधानार्था योनिः । नतु माता । वाक्यशेषात् । तथाहि सामवेदे शार्कराक्ष्यश्रुतौ- | ‘मम योनिः’ इति गर्भाधानार्था योनिः । नतु माता । वाक्यशेषात् । तथाहि सामवेदे शार्कराक्ष्यश्रुतौ- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विष्णोर्योनिर्गर्भसन्धारणार्था महामाया सर्वदुःखैर्विहीना । | |||
तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं (प्रदर्शयन्ती) प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा ॥’ | तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं (प्रदर्शयन्ती) प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा ॥’</span> इति । | ||
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| Line 9,855: | Line 9,490: | ||
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बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय - | बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय - सत्त्वमित्यादिना ॥ ४,५, ६ ॥ | ||
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अज्ञानं जायते यतः तद् | अज्ञानं जायते यतः तद् अज्ञानजम् । ‘प्रमादमोहौ तमसः’(१४.१७) इति वाक्यशेषात् ॥८ ॥ | ||
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| Line 9,972: | Line 9,607: | ||
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रजसस्तु फलं दुःखमिति ॥ अल्पसुखं दुःखम् । तथाहि शार्कराक्षशाखायाम्- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘रजसो ह्येव जायते मात्रया सुखं दुःखम्, तस्मात् तान् सुखिनो दुःखिन इत्याचक्षते ।’</span> इति । अन्यथा दुःखस्यातिकष्टत्वात् तमोऽधिकत्वं रजसो न स्यात् ॥ ९-१६ ॥ | |||
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ब्रह्मणः मायायाः ॥ २७ ॥ | |||
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अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानि इति | अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानि इति अधश्चोर्ध्वं च प्रसृताः । गुणैः सत्त्वादिभिः । प्रतीतिमात्रसुखत्वात् प्रवाला विषयाः । मूलानि भगवद्रूपादीनि । भगवानपि कर्मानुबन्धेन हि फलं ददाति । तथाहि भाल्लवेयशाखायाम्- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ब्रह्म वा अस्य पृथङ् मूलम्, प्रकृतिः समूलम्, सत्त्वादयो अर्वाचीनमूलम् । भूतानि शाखाः, छन्दांसि पर्णा(त्रा)णि, देवनृतिर्यञ्चश्च शाखाः । पत्रेभ्यो हि फलं जायते । मात्राः शिफाः । मुक्तिः फलम्, अमुक्तिः फलम् । मोक्षो रसः, अमोक्षो रसः । अव्यक्ते च शाखाः, व्यक्ते च शाखा । अव्यक्ते च मूलम्, व्यक्ते च मूलम् । एषोऽश्वत्थो गुणालोलपत्रो न स्थीयते न न स्थीयते ; न ह्येष कदाचनान्यथा जायते, नान्यथा जायते ’</span> इति ॥ २ ॥ | |||
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साधनान्तरमाह - | साधनान्तरमाह - निर्मानेति ॥ ५ ॥ | ||
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स्वरूपं कथयति- | स्वरूपं कथयति- न तदित्यादिना ॥ ६॥ | ||
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| Line 10,342: | Line 9,977: | ||
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भोगो अस्यापि साधितः पुरस्तात् । इन्द्रियद्वाराऽपि सोऽपि भुङ्क्ते । | भोगो अस्यापि साधितः पुरस्तात् । इन्द्रियद्वाराऽपि सोऽपि भुङ्क्ते । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘(यद्य) तद्य इमे वीणायां गायन्ति एतं ते गायन्ति’(छां.१.३.९)</span> इति च श्रुतिः । गुणान्वितमेव भुङ्क्ते । <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७)</span> इति श्रुतेः ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,360: | Line 9,995: | ||
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तर्हि किमिति न दृश्यते ? इत्यत आह - | तर्हि किमिति न दृश्यते ? इत्यत आह - उत्क्रामन्तमित्यादि ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,378: | Line 10,013: | ||
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यतन्तः ज्ञानं प्राप्य । अकृतात्मानः अशुद्धबुद्धयः ॥ ११ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 10,396: | Line 10,031: | ||
| text = | | text = | ||
पूर्वोक्तमेव ज्ञानं प्रपञ्चयति - | पूर्वोक्तमेव ज्ञानं प्रपञ्चयति - यदादित्यगतमित्यादिना ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,414: | Line 10,049: | ||
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गां भूमिम् ॥ १३ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 10,441: | Line 10,076: | ||
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वेदनिर्णयात्मिका मीमांसा= वेदान्तः । तथाहि सामवेदे प्राचीनशाल(ला)श्रुतिः- | वेदनिर्णयात्मिका मीमांसा= वेदान्तः । तथाहि सामवेदे प्राचीनशाल(ला)श्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘स वेदान्तकृत् स कालक इति । स ह्येव युक्तिसूत्रकृत् स कालक इति’</span> इति ॥१५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,504: | Line 10,139: | ||
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क्षरभूतानि ब्रह्मादीनि । | क्षरभूतानि ब्रह्मादीनि । कूटस्थः प्रकृतिः । तथा च शार्कराक्ष्यश्रुतिः- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘प्रजापतिप्रमुखाः सर्वजीवाः क्षरोऽक्षरः पुरुषो वै प्रधानम् । | |||
तदुत्तमं चान्यमुदाहरन्ति जालाजालं मातरिश्वानमेकम् ॥’ | तदुत्तमं चान्यमुदाहरन्ति जालाजालं मातरिश्वानमेकम् ॥’</span> इति॥ १६-२० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,550: | Line 10,185: | ||
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तपः ब्रह्मचर्यादि । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ब्रह्मचर्यादिकं तपः’</span> इति ह्यभिधानम् ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 10,569: | Line 10,204: | ||
पैशुनं परोपद्रवनिमित्तदोषाणां राजादेः कथनम् । | पैशुनं परोपद्रवनिमित्तदोषाणां राजादेः कथनम् । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘परोपद्रवहेतूनां दोषाणां पैशुनं वचः । | |||
राजादेस्तु मदाद्भीतेरदृष्टिर्दर्प उच्यते ॥’ | राजादेस्तु मदाद्भीतेरदृष्टिर्दर्प उच्यते ॥’</span> इति ह्यभिधानम् । | ||
लौल्यं= रागः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘रागो लौल्यं तथा रक्तिः’</span> इत्यभिधानात् । | |||
अचापलं स्थैर्यम् । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘चपलश्चञ्चलोऽस्थिरः’</span> इत्यभिधानात् ॥२ ॥ | |||
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| Line 10,626: | Line 10,261: | ||
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क्षमा तु क्रोधाभावेन सहापकर्तुरनपकृतिः । ‘अक्रोधोदोषकृच्छत्रोः क्षमावान् स निगद्यते’ इत्यभिधानात् । दैवीं सम्पदम् अभि जातः प्रति जातः॥३-७॥ | |||
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| Line 10,889: | Line 10,524: | ||
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अतो विभज्याह- | अतो विभज्याह- त्रिविधेत्यादिना ॥ २ ॥ | ||
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| Line 10,907: | Line 10,542: | ||
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सत्त्वानुरूपा चित्तानुरूपा । यो यच्छ्रद्धः स एव स सात्त्विकश्रद्धः सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥ | |||
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| Line 10,925: | Line 10,560: | ||
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कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - | कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - यजन्त इत्यादिना ॥ ४॥ | ||
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पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- | पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- ओं तत् सत् इत्यादिना ॥ परस्य ब्रह्मणो ह्येतानि नामानि- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘ओतं जगद् यत्र स्वयं च पूर्णो वेदोक्तरूपोऽनुपचारतश्च । | |||
सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’ | सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’</span> इति हि ऋग्वेदखिलेषु । | ||
द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः । | द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः । | ||
}} | }} | ||
| Line 11,162: | Line 10,797: | ||
| text = | | text = | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छा.६.२.१)</span> इति च । <span class="gr-reference gr-ref-Taittareeya-id">‘ओम् इति ब्रह्म’(तै.उ.१.८.१)</span> इति च । तेन ब्रह्मणा । आत्मपूजार्थम् । वेदविधिः व्यञ्जनम् । मा तूक्ता पुरस्तात् ॥ २४ ॥ | |||
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| Line 11,180: | Line 10,815: | ||
| text = | | text = | ||
‘तत् फलं मे स्यात्’ | ‘तत् फलं मे स्यात्’ इत्यनभिसन्धाय ॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,226: | Line 10,861: | ||
सद्भावशब्देन प्रजननं सूचितम् । ‘ओम्’ इत्युक्त्वा, अनभिसन्धाय फलम्, यज्ञदानतपआदिकृताम् अतिप्रीतेः नामसाम्याद् ब्रह्मैव निष्पादितं भवतीत्याशयः । तथा च ऋग्वेदखिलेषु- | सद्भावशब्देन प्रजननं सूचितम् । ‘ओम्’ इत्युक्त्वा, अनभिसन्धाय फलम्, यज्ञदानतपआदिकृताम् अतिप्रीतेः नामसाम्याद् ब्रह्मैव निष्पादितं भवतीत्याशयः । तथा च ऋग्वेदखिलेषु- | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘ओं यज्ञाद्या निष्फलं कर्म तत् स्यात् सद् वै तदर्थं कर्म वदन्ति वेदाः । तच्छब्दानां सन्निधेर्ब्रह्मप्रीतेः तद्रूपत्वाज्जनितं ब्रह्म तस्य ॥’</span> इति ॥ २६-२८ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 11,282: | Line 10,917: | ||
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फलानिच्छया अकरणेन वा काम्यकर्मणो न्यासः सन्न्यासः । त्यागस्तु फलत्याग एव । तथाहि प्राचीनशालश्रुतिः- | फलानिच्छया अकरणेन वा काम्यकर्मणो न्यासः सन्न्यासः । त्यागस्तु फलत्याग एव । तथाहि प्राचीनशालश्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अनिच्छयाकर्मणा वापि काम्यकर्मन्यासो न्यासः, फलत्यागस्तु त्यागः।’</span> इति ॥ १, २ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,318: | Line 10,953: | ||
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तत्प्रकारं चाह - | तत्प्रकारं चाह - निश्चयमित्यादिना ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,381: | Line 11,016: | ||
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यज्ञभेद उक्तो ‘द्रव्ययज्ञाः’(४.२८) इत्यादिना । दाने तु अभयदानमन्तर्भवति । एतेषां मध्ये यत्किञ्चिद् यज्ञादिकं कर्तव्यमेवेत्यर्थः । अन्यथा | यज्ञभेद उक्तो ‘द्रव्ययज्ञाः’(४.२८) इत्यादिना । दाने तु अभयदानमन्तर्भवति । एतेषां मध्ये यत्किञ्चिद् यज्ञादिकं कर्तव्यमेवेत्यर्थः । अन्यथा <span class="gr-reference gr-ref-Smriti-id">‘ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा । | ||
यदीच्छेत् मोक्षमास्थातुम् उत्तमाश्रममाश्रयेत् ॥’ | यदीच्छेत् मोक्षमास्थातुम् उत्तमाश्रममाश्रयेत् ॥’</span> इत्यादिव्यासस्मृतिविरोधः । ज्ञानयज्ञविद्याऽभयदानब्रह्मचर्यादितपसो हि ते । अतो यद्वचोऽन्यथा प्रतीयते अधिकारभेदेन तद् योज्यम् । अन्यथेतरेषां गत्यभावात् ॥ १० ॥ | ||
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अन्यः त्यागार्थो न युक्त इत्याह- | अन्यः त्यागार्थो न युक्त इत्याह- न हीति ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 11,418: | Line 11,053: | ||
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त्यागं स्तौति- | त्यागं स्तौति- अनिष्टमिति ॥ १२ ॥ | ||
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पुनः संन्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह - | पुनः संन्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह - पञ्चेत्यादिना ॥ साङ्ख्यकृतान्ते ज्ञानसिद्धान्ते ॥ १३ ॥ | ||
}} | }} | ||
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अधिष्ठानं देहादिः । कर्ता विष्णुः । स हि ‘सर्वस्य कर्ता’ इत्युक्तम् । जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम् । करणम् इन्द्रियादि च । चेष्टाः क्रियाः । हस्तादिक्रियाभिः होमादिकर्माणि जायन्ते । ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम् । पूर्वतनचेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति । दैवम् अदृष्टम् । तथाचायास्यश्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘देहो ब्रह्माथेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः’</span> । इति ॥ १४, १५ ॥ | |||
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केवलं निष्क्रियम् । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘एनं केवलमात्मानं निष्क्रियत्वाद् वदन्ति हि।’</span> इति तत्रैव ॥१६ ॥ | |||
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तज्ज्ञानं स्तौति- | तज्ज्ञानं स्तौति- यस्येति ॥ यस्त्वीषद् बध्यते स ईषदहङ्कारी च ॥१७ ॥ | ||
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एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः ? अकर्तृत्वात् , इत्यत आह- | एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः ? अकर्तृत्वात् , इत्यत आह- ज्ञानमिति ॥ त्रिविधा कर्मचोदना । एतत् त्रिविधमपेक्ष्य कर्मविधिरिति त्रिविधा इत्युच्यते । कारणानि सङ्क्षिप्याऽह- करणमिति ॥ कर्मसङ्ग्रहः कर्मकारणसङ्क्षेपः । अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतम् । | ||
}} | }} | ||
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पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह- | पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह- ज्ञानमित्यादिना ॥ गुणसङ्ख्याने गुणगणनप्रकरणे ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 11,572: | Line 11,207: | ||
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एकं भावं विष्णुम् ॥ २० ॥ | |||
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परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमपपि अनुचितं यः सूचयति स | परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमपपि अनुचितं यः सूचयति स दीर्घसूत्री । | ||
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">परेण यः कृतो दोषो दीर्घकालकृतोऽपि वा । | |||
यस्तस्य सूचको दोषाद् दीर्घसूत्री स उच्यते ॥’ | यस्तस्य सूचको दोषाद् दीर्घसूत्री स उच्यते ॥’</span> इत्यभिधानात् ॥२८ ॥ | ||
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नैष्कर्म्यसिद्धिं नैष्कर्म्यफलां योगसिद्धिम् ॥ ४९ ॥ | |||
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यथा येनोपायेन सिद्धिं प्राप्तो ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध । या सिद्धिः ज्ञानस्य परा निष्ठा ॥ ५० ॥ | |||
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ब्रह्मभूयाय कल्पते । ब्रह्मणि भावो ब्रह्मभूयम् । ब्रह्मणि स्थितिः सर्वदा तन्मनस्कतेत्यर्थः ॥ ५३ ॥ | |||
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पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति- | पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति- सर्वकर्माणीत्यादिना ॥ ५६ ॥ | ||
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