Tattvaviveka/Vyakhya/Tatvaviveka-tika: Difference between revisions
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<div class="gr-vyakhya-gadya">मङ्गलाचरणम्</div> | <div class="gr-vyakhya-gadya">मङ्गलाचरणम्</div> | ||
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<span class="shloka-line">प्रणम्य रमणं लक्ष्म्याः पूर्णबोधान्गुरूनपि।</span> | |||
<span class="shloka-line">व्याख्यां तत्वविवेकस्य करिष्यामो यथामति ॥ 1 ॥</span> | |||
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ननु परमपुरुषादितत्वानां विवेकः शास्त्र एव कृतः। तत्किमनेन प्रकरणेन। विक्षिप्तसङ्ग्रहार्थमिति चेन्न॥ सङ्ग्रहस्यापि तत्वसङ्ख्याने कृतत्वात्। सत्यं। तथापि तत्वसङ्ख्यानोक्तार्थे साक्षित्वेन भगवत्प्रणीततत्वविवेकगतवाक्यान्येवाचार्यैरुदाहृतानीत्यदोषः। | ननु परमपुरुषादितत्वानां विवेकः शास्त्र एव कृतः। तत्किमनेन प्रकरणेन। विक्षिप्तसङ्ग्रहार्थमिति चेन्न॥ सङ्ग्रहस्यापि तत्वसङ्ख्याने कृतत्वात्। सत्यं। तथापि तत्वसङ्ख्यानोक्तार्थे साक्षित्वेन भगवत्प्रणीततत्वविवेकगतवाक्यान्येवाचार्यैरुदाहृतानीत्यदोषः। | ||
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इति स्वातन्त्र्योपपादनाय। यस्य तु द्वयमप्यसिद्धं तं प्रत्यागमो दर्शनीयः। अनेन स्वतन्त्रपरतन्त्रभेदमङ्गीकृत्यापि स्वातन्त्र्यं शिवशक्त्यादीनामङ्गीकुर्वाणा निरस्ता भवन्ति। विष्णोरन्यत्परतन्त्रमिति वाक्यशेषः। द्विविधमित्युक्त्या स्वतन्त्रपरतन्त्रप्रमेययोरवान्तरभेदोऽस्तीति सूचितं। अन्यथा द्वे प्रमेये इत्येव ब्रूयात् ॥ तत्र स्वतन्त्रप्रमेयमेकमेवेत्युक्तं। | इति स्वातन्त्र्योपपादनाय। यस्य तु द्वयमप्यसिद्धं तं प्रत्यागमो दर्शनीयः। अनेन स्वतन्त्रपरतन्त्रभेदमङ्गीकृत्यापि स्वातन्त्र्यं शिवशक्त्यादीनामङ्गीकुर्वाणा निरस्ता भवन्ति। विष्णोरन्यत्परतन्त्रमिति वाक्यशेषः। द्विविधमित्युक्त्या स्वतन्त्रपरतन्त्रप्रमेययोरवान्तरभेदोऽस्तीति सूचितं। अन्यथा द्वे प्रमेये इत्येव ब्रूयात् ॥ तत्र स्वतन्त्रप्रमेयमेकमेवेत्युक्तं। | ||
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एतेन ये सर्वोप्ययं संसर्गाभाव एव एवेति मन्यन्ते तन्मतमपास्तं भवति। यथा न च कार्यकारणयोः संसर्गस्तथा वक्ष्यते। अत्यन्तासत्प्रतियोगिकस्य तथात्वानुपपत्तेरिति। | एतेन ये सर्वोप्ययं संसर्गाभाव एव एवेति मन्यन्ते तन्मतमपास्तं भवति। यथा न च कार्यकारणयोः संसर्गस्तथा वक्ष्यते। अत्यन्तासत्प्रतियोगिकस्य तथात्वानुपपत्तेरिति। | ||
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चेतयतीति चेतनः। अनेवंविधोऽचेतनः। स्मृत इति सर्वं चैतन्यमेवेति मतमपवदति। | चेतयतीति चेतनः। अनेवंविधोऽचेतनः। स्मृत इति सर्वं चैतन्यमेवेति मतमपवदति। | ||
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<div class="gr-mulaprateeka-block">सृतियुक् च द्विधा मतः ॥ 4 ॥मुक्तोऽमुक्त इति....</div> | <div class="gr-mulaprateeka-block">सृतियुक् च द्विधा मतः ॥ 4 ॥मुक्तोऽमुक्त इति....</div> | ||
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गुणशब्दो गणनार्थः। | गुणशब्दो गणनार्थः। | ||
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मुक्तामुक्तयोः। | मुक्तामुक्तयोः। | ||
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नित्यानित्यत्वं नाम विधान्तरं तत्वसङ्ख्याने कथितं॥ तत्कथं द्विविधमेवाचेतनमुच्यत इति। नैष दोषः। पुराणादि येनांशेन नित्यं तमशं नित्यवर्गे निधाय येनांशेनानित्यं तमंशमनित्यवर्गे निधायायं विभाग इत्यङ्गीकारात्। तर्हि नित्यानित्यं क्वास्तीति चेन्न। अंशांश्यादेरत्यन्तभेदाभावेन तृतीयराशिसम्भवात्। अत्र तु बुद्ध्यैव विवेक इत्यविरोधः। अत एव संसृष्टासंसृष्टविभागोऽत्र नोक्तः। सूक्ष्मभागस्य नित्येषूपचयभागस्यानित्येष्वन्तर्भावादिति। | नित्यानित्यत्वं नाम विधान्तरं तत्वसङ्ख्याने कथितं॥ तत्कथं द्विविधमेवाचेतनमुच्यत इति। नैष दोषः। पुराणादि येनांशेन नित्यं तमशं नित्यवर्गे निधाय येनांशेनानित्यं तमंशमनित्यवर्गे निधायायं विभाग इत्यङ्गीकारात्। तर्हि नित्यानित्यं क्वास्तीति चेन्न। अंशांश्यादेरत्यन्तभेदाभावेन तृतीयराशिसम्भवात्। अत्र तु बुद्ध्यैव विवेक इत्यविरोधः। अत एव संसृष्टासंसृष्टविभागोऽत्र नोक्तः। सूक्ष्मभागस्य नित्येषूपचयभागस्यानित्येष्वन्तर्भावादिति। | ||
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सत्वादयो मात्राश्च। उपलक्षणं चैतत्। महदहङ्काराद्यपि ग्राह्यम्। | सत्वादयो मात्राश्च। उपलक्षणं चैतत्। महदहङ्काराद्यपि ग्राह्यम्। | ||
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द्रव्यस्य। सत्यं, सन्ति गुणादयः। किं नाम। यथा भावादयोऽत्यन्तभिन्नाः न तथा गुणादयः। अपि तु स्वाश्रयद्रव्यस्वरूपभूता एव। अतो न ते पृथक्कथ्यन्ते। यदा तु बुद्ध्या विविच्यन्ते तदा विवेकोऽपि कर्तव्य इति। | द्रव्यस्य। सत्यं, सन्ति गुणादयः। किं नाम। यथा भावादयोऽत्यन्तभिन्नाः न तथा गुणादयः। अपि तु स्वाश्रयद्रव्यस्वरूपभूता एव। अतो न ते पृथक्कथ्यन्ते। यदा तु बुद्ध्या विविच्यन्ते तदा विवेकोऽपि कर्तव्य इति। | ||
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तत्र यत्खण्डितं गुणादिकं तत्र भेदाभेदौ प्रतिपत्तव्यौ। यत्पुनर्यावद्द्रव्यभावि तत्र भेदो नास्ति। किं तु अत्यन्ताभेद एवेति। | तत्र यत्खण्डितं गुणादिकं तत्र भेदाभेदौ प्रतिपत्तव्यौ। यत्पुनर्यावद्द्रव्यभावि तत्र भेदो नास्ति। किं तु अत्यन्ताभेद एवेति। | ||
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<div class="gr-mulaprateeka-block">कार्यकारणयोश्चैव तथैव गुणतद्वतोः ॥ 11 ॥ क्रियाक्रियावतोस्तद्वत्तथा जातिविशेषयोः। विशिष्टशुद्धयोश्चैव तथैवांशांशिनोरपि ॥ 12 ॥</div> | <div class="gr-mulaprateeka-block">कार्यकारणयोश्चैव तथैव गुणतद्वतोः ॥ 11 ॥ क्रियाक्रियावतोस्तद्वत्तथा जातिविशेषयोः। विशिष्टशुद्धयोश्चैव तथैवांशांशिनोरपि ॥ 12 ॥</div> | ||
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अनेन कार्यकारणादीनां समवायो नास्तीत्युक्तं भवति। तथा गुणादीनामवेकाश्रितत्वं जातेर्नित्यत्वं च निरस्तं भवति। अन्यथा सर्वाभेदादिप्रसङ्गात्॥ | अनेन कार्यकारणादीनां समवायो नास्तीत्युक्तं भवति। तथा गुणादीनामवेकाश्रितत्वं जातेर्नित्यत्वं च निरस्तं भवति। अन्यथा सर्वाभेदादिप्रसङ्गात्॥ | ||
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यद्यपि केवलस्यास्य ज्ञानं न पुरुषार्थोपयोगि तथापि परमपुरुषाधीनतयाऽवगतं भवत्येव मोक्षसाधनमिति द्वे विद्ये वेदितव्ये' इत्यादिश्रुतिसिद्धमिति हिशब्देन सूचयति। | यद्यपि केवलस्यास्य ज्ञानं न पुरुषार्थोपयोगि तथापि परमपुरुषाधीनतयाऽवगतं भवत्येव मोक्षसाधनमिति द्वे विद्ये वेदितव्ये' इत्यादिश्रुतिसिद्धमिति हिशब्देन सूचयति। | ||
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<span class="shloka-line">करतलमिलितामलकप्रख्यं यस्याखिलं विश्वं।</span> | |||
<span class="shloka-line">कमलापरिवृढममलं वन्दे तं वन्द्यपादाब्जम् ॥ 1 ॥</span> | |||
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<div class="gr-author-note">इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिततत्वविवेकप्रकरणविवरणं श्रीजयतीर्थभिक्षुरचितं समाप्तम् ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिततत्वविवेकप्रकरणविवरणं श्रीजयतीर्थभिक्षुरचितं समाप्तम् ॥</div> | ||
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Revision as of 18:20, 25 April 2026
तत्वविवेकविवरणम्
प्रणम्य रमणं लक्ष्म्याः पूर्णबोधान्गुरूनपि। व्याख्यां तत्वविवेकस्य करिष्यामो यथामति ॥ 1 ॥
ननु परमपुरुषादितत्वानां विवेकः शास्त्र एव कृतः। तत्किमनेन प्रकरणेन। विक्षिप्तसङ्ग्रहार्थमिति चेन्न॥ सङ्ग्रहस्यापि तत्वसङ्ख्याने कृतत्वात्। सत्यं। तथापि तत्वसङ्ख्यानोक्तार्थे साक्षित्वेन भगवत्प्रणीततत्वविवेकगतवाक्यान्येवाचार्यैरुदाहृतानीत्यदोषः।
तत्र प्रमेयमित्यनुवादेनैव तत्वसामान्यलक्षणं चोक्तम्। अनारोपितं हि तत्वं। यदि नाम कूर्मरोमादिकमनारोपितं किं तावता तत्वं स्यादित्यतः प्रतीतौ सत्यामिति वाच्यम्। तच्च प्रमेयमिति चैकोऽर्थः।
यथार्थज्ञानं प्रमा। तद्विषयः
प्रमेयंम्
। नन्वीश्वरज्ञानं तावत्प्रमा। तत्र शुक्तिरजतादिकं तद्विषयो न वा। न चेत्तस्यासार्वज्ञ्यप्रसङ्गः। तद्विषयत्वे तदपि तत्वं स्यादिति। मैवं।PRपरमार्थाशेषार्थज्ञत्वमेव सार्वज्ञ्यमित्यङ्गीकारात्। तथाप्यस्मदादीनां शुक्तिरजतादिविभ्रममीश्वरो वेत्ति न वा। वेत्तीति ब्रूमः। विषयविशेषितज्ञानस्यावगमे विषयस्यापि प्रमेयत्वं स्यादिति चेन्न। यत् प्रमया अस्तीति विधीयते तत् प्रमेयमित्यङ्गीकारात्।PRन चेश्वरादिप्रमा शुक्तिरजतादिविधिरूपा। किं तु भ्रान्तोऽयं शुक्तिकाशकलं कलधौततया कल्पयतीत्यनुवादरूपैव। ननु भ्रमेऽपि इदमिति ज्ञानं तावत्प्रमा। किं तावताऽपि न हि तद्विषयः शुक्तिकायां रजतत्वं येन तत् प्रमेयं स्यात्। ननु इदं रजतमित्येकमेव ज्ञानं। सत्यं। अत एव विशिष्टोल्लेखीदमप्रमैवेति उल्लिखितं विशिष्टमतत्वमेवेति। तत्प्रमेयं
द्विविधम्
॥ स्वतन्त्रं परतन्त्रं चेतीतिशब्दोऽध्याहार्यः।
यत् स्वसत्तादौ स्वाधीनं न तु परापेक्षं तत्
स्वतन्त्रम्
॥ यत् पुनस्तत्र परायत्तं तत्
परतन्त्रम्
इति सञ्ज्ञानिरुक्तिरेवानयोर्लक्षणम् ॥ मतं प्रमितमित्युक्तार्थे प्रमाणसद्भावसूचनेन प्रकारान्तरं निरस्तं भवति। तथा हि। यदि प्रमेयमेव न स्यात् तदा प्रत्यक्षादिविरोधः। तस्य च भ्रान्तित्वे बाधकं वाच्यं। न च भ्रान्तिबाधावधिष्ठानावधिविधुरौ विद्येते इति तदेव प्रमेयमस्तु। ननु केशोण्ड्रकादिभ्रमो निरधिष्ठान इति चेन्न। तस्यापि तेजोधिष्ठानत्वाभ्युपगमात्। नास्त्येव प्रमेयमिति ज्ञानस्य प्रमात्वाप्रमात्वयोर्व्याहतिश्च। एके तु एकमेव तत्वमिति मन्यते। तदसत्। प्रत्यक्षादिविरोधात्। भ्रान्तिरियमिति चेन्न। इयमेव प्रतीतिः प्रमा न वा। आद्ये तद्विषयेण तत्बान्तरेण भाव्यं। द्वितीये प्रत्यक्षादेः प्रमात्वेनोक्त एव दोषः। सर्वस्य स्वतन्त्रत्वे नित्यसुखादिप्रसङ्गः। अस्वातन्त्र्ये न कस्यापि प्रवृत्तिः। अन्धपङ्गुवत्स्यादिति चेन्न। प्रत्यासत्तेरेवानुपपत्तेः।अपरे तु भावाभावतया चेतनाचेतनत्वेन वा नित्यानित्यतया वा नामरूपभेदेन वा द्वे तत्वे ब्रुवते। अन्ये तु नामरूपकर्मभेदेन त्रयं। केचिद्द्रव्यगुणकर्मसामान्यात्मना चत्वारि। एके समवायेन सहोक्तानि पञ्च। अपरे रूपविज्ञानवेदनासञ्ज्ञासंस्कारान् पञ्चेत्यादि। तत्सर्वमनुपपन्नं। अत्र केषाञ्चित्स्वरूपेणैवाभावात्। परमप्रमेयस्यच अवान्तरत्वापत्त्या परिगणनस्य वैयर्थ्यप्रसङ्गाच्चेति।
भगवान्
इति पूजार्थं।
निर्दोष
इति स्वातन्त्र्योपपादनाय। यस्य तु द्वयमप्यसिद्धं तं प्रत्यागमो दर्शनीयः। अनेन स्वतन्त्रपरतन्त्रभेदमङ्गीकृत्यापि स्वातन्त्र्यं शिवशक्त्यादीनामङ्गीकुर्वाणा निरस्ता भवन्ति। विष्णोरन्यत्परतन्त्रमिति वाक्यशेषः। द्विविधमित्युक्त्या स्वतन्त्रपरतन्त्रप्रमेययोरवान्तरभेदोऽस्तीति सूचितं। अन्यथा द्वे प्रमेये इत्येव ब्रूयात् ॥ तत्र स्वतन्त्रप्रमेयमेकमेवेत्युक्तं।द्विविधं परतन्त्रं च भावोऽभाव इतीरितः । पूर्वापरसदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ॥2॥
भाव
इतीरित एका विधा।
अभाव
इतीरितश्चापरा। एवं परतन्त्रं च द्विविधमिति योज्यं॥
ईरित
ग्रहणाद्ये भावभावविभागं नेच्छन्ति तेषामागमविरोध उक्तो भवति। किं च भावानभ्युपगमे अभाव एव न स्यात्। प्रतियोगिनोऽभावात्। अभावानभ्युपगतौ प्रतीतिविरोधः। विभागानभ्युपगमे तु प्रतीतिविरोध इति। अत्रापि भावाभावपदाभ्यामेव विधिनिषेधात्मकत्वं द्वयोर्लक्षणं सूचितं भवति ॥पूर्ववद्विधाग्रहणेनावान्तरभेदश्च॥
तत्र भावनिरूपणस्य बहुत्वात्पश्चादुद्दिष्टस्याप्यभावस्य प्रभेदमादावाह।
पूर्वत्वेनापरत्वेन सदात्वेन व्यावर्तकेन त्रिविध इत्यनेनैषां लक्षणान्यप्युक्तानि। योऽभावो वस्तूत्पत्तेः प्रागेवास्ति स पूर्वाभावः। यस्तु वस्तुप्रध्वंसात्परत एवास्ति सोऽपराभावः। यस्तु सदाऽस्ति स सदाभाव इति।
ननु यदपेक्षया पूर्वमपरं चेत्युच्यते स एव प्रागभावप्रध्वंसाभावयोः प्रतियोगी। अत्यन्ताभावस्य तु कः प्रतियोगीति। मैवं। तथा सति प्रागभावप्रध्वंसाभावयोः प्रतियोगिनियमो न स्यात् ॥ तस्माद्यस्यासौ स एव प्रतियोगीति वाच्यं। शशविषाणादीनां चाभावोऽत्यन्ताभाव इति स एव प्रतियोगी। अप्रामाणिकस्य कथं प्रतियोगित्वमिति चेत् किमिह तस्य सत्तया कृत्यमस्ति। न हि प्रतियोगित्वं रूपादिवद्धर्मिसत्तासापेक्षं। प्रतीतिमात्रं तूपयुक्तं। तदसतोऽप्यस्तीति। इष्यते प्रामाणिकैरिति शेषः ॥
एतेन ये सर्वोप्ययं संसर्गाभाव एव एवेति मन्यन्ते तन्मतमपास्तं भवति। यथा न च कार्यकारणयोः संसर्गस्तथा वक्ष्यते। अत्यन्तासत्प्रतियोगिकस्य तथात्वानुपपत्तेरिति।भावाभावस्वरूपत्वान्नान्योन्याभावता पृथक् । चेतनाचेतनश्चेति भावश्च द्विविधः स्मृतः ॥3॥
तादात्म्यप्रतियोगिकोऽभावोऽन्योन्याभावः। भेद इति यावत्। स च यदधिकरणस्तत्स्वरूपमेव ॥ न तु प्रागभावादिवत्पृथक्प्रमेयमिति नाभावत्रित्वभङ्गः ॥ धर्मिस्वरूपत्वादिति वक्तव्ये यद्भावाभावस्वरूपत्वादित्युक्तं तत्प्रपञ्चनार्थं। अथ वा यद्यन्योन्याभावो न घटादिभ्यः पृथक् तर्हि तेषामभावत्वं स्यात्। स्यादेवैतत्। सर्वभावानां स्वेन रूपेण भावत्वं रूपान्तरेणाभावत्वमिति भावाभावस्वरूपत्वादित्युक्तं। नन्वन्योन्याभाव इति वक्तव्ये किं भावप्रत्ययेन। मैवं। नायं भावशब्दो भावसाधनः किं तु कर्तृसाधनः। भावश्चात्र प्रकृत इति तल्प्रत्ययोपपत्तिः।
नित्यमुक्तश्च सृतियुक् परतन्त्रोऽपि चेतनः । द्विधैव श्रीर्नित्यमुक्ता सृतियुक्च द्विधा मतः ॥4॥
नित्यमुक्त इति कदापि संसारसम्बन्धो यस्य नास्त्यसावुच्यते। कदाचित्संसारसम्बन्धवान्सृतियुक्। ननु नित्यमुक्तो विष्णुरेव स्वातन्त्र्यात्। अयं तु परतन्त्रविभागोऽभिधीयते। तत्कथं तदन्तर्गतोऽपि चेतनो नित्यमुक्त इति। अत उक्तं
परतन्त्रोऽपीति।
तथा प्रमाणादिति भावः। अथ वा नित्यमुक्तश्चेत्परतन्त्रो न स्यादित्यत इदमुक्तं।
एव
कारेण संसारस्य मिथ्यात्वान्नित्यमुक्त एव चेतन इति मतमपाकरोति ॥
अन्ये तु सृतियुज इति प्रसिद्धमेव॥
तत्प्रभेदमाह।
मुक्तोऽमुक्त इति ह्यत्र ब्रह्मान्ता उत्तरोत्तरम् । मुक्ताः शतगुणाः प्रोक्ताः रमा तेभ्योऽखिलैर्गुणैः ॥5॥
अत्र
मुक्तामुक्तयोर्मध्ये।
हि
शब्देन युवा स्यादित्यादिश्रुतिप्रसिद्धिं सूचयति।
बहुगुणेति
गुणशब्दो गणनार्थः।नित्यं बहुगुणोद्रिक्ता ततोऽनन्तगुणो हरिः । अमुक्तास्त्रिविधास्तत्र नीचमध्योच्चभेदतः ॥6॥
स्वरूपाविर्भाव एव मुक्तिरिति भावः।
तत्र
मुक्तामुक्तयोः।मुक्तियोग्यास्तत्र चोच्चा नित्यावर्तास्तु मध्यमाः । नीचा नित्यतमोयोग्या द्विधैवाचेतनं मतम् ॥7॥
तु
शब्दोऽवधारणे। तेन यः साधनमनुतिष्ठति स सर्वोऽपि मुच्यत इति मतमपाकृतं भवति। दुःखसंस्था मुक्तियोग्या इत्यादिविभागोऽप्यनेन सङ्गृहीतो भवति। यतः स्वरूपाविर्भावमात्रं मुक्तिर्नागन्तुको लाभोऽतो मुक्तानां भेदवत्त्वे मुक्तियोग्या अपि भेदवन्त इति स्फुटमेवेति नोक्तं। नित्यतमोयोग्या अपि द्वेधा। प्राप्ततमसः सृतिसंस्थाश्चेति। ते च प्रत्येकं दैत्यादिभेदेन चतुर्धा इत्यपि द्रष्टव्यं॥
एव
कारेण सर्वनित्यत्वं सर्वानित्यत्वं च व्यावर्तयति। सर्वनित्यत्वे कारकवैयर्थ्यं। अभिव्यक्त्यर्थमिति चेत्। तदाऽभिव्यक्तेरप्यसत्या एवोत्पत्तिः। न चेदुक्तवैयर्थ्यानिस्तारः। व्यक्तेरपि व्यक्त्यङ्गीकृतावनवस्था। सर्वानित्यत्वे चोपादानाद्यभावेन सृष्ट्यनुपपत्तिः। क्षणभंगस्तु प्रत्यभिज्ञादिना परास्त इति। नित्यत्वानित्यत्वाभ्यां भेदो नित्यानित्यत्वभेदः।
नित्यानित्यत्वं नाम विधान्तरं तत्वसङ्ख्याने कथितं॥ तत्कथं द्विविधमेवाचेतनमुच्यत इति। नैष दोषः। पुराणादि येनांशेन नित्यं तमशं नित्यवर्गे निधाय येनांशेनानित्यं तमंशमनित्यवर्गे निधायायं विभाग इत्यङ्गीकारात्। तर्हि नित्यानित्यं क्वास्तीति चेन्न। अंशांश्यादेरत्यन्तभेदाभावेन तृतीयराशिसम्भवात्। अत्र तु बुद्ध्यैव विवेक इत्यविरोधः। अत एव संसृष्टासंसृष्टविभागोऽत्र नोक्तः। सूक्ष्मभागस्य नित्येषूपचयभागस्यानित्येष्वन्तर्भावादिति।नित्यानित्यत्वभेदेन देशः कालः श्रुतिस्तथा । भूतेन्द्रियप्राणगुणसूक्ष्मरूपं च नित्यकम् ॥8॥
देश
शब्देनाव्याकृताकाश उच्यते।
काल
इति तत्प्रवाहः।
श्रुतिः
वेदः।
भूतानि
आकाशादीनि।
इन्द्रियाणि
एकादश।
प्राणः
अहंकारकार्यविशेषः।
गुणाः
सत्वादयो मात्राश्च। उपलक्षणं चैतत्। महदहङ्काराद्यपि ग्राह्यम्।एषां विकारोऽनित्यः स्यान्नित्या एव हि चेतनाः । गुणक्रियाजातिपूर्वा धर्मा सर्वेऽपि वस्तुनः ॥9॥
एषां
यथासम्भवं कालादीनां
विकारः
उपचितादिभागः। तत्र कालस्य क्षणाद्यवयवाः। महदादीनामुपचयांशः। एवमेषां महदादीनां विकारं कार्यं ब्रह्मांडं तदन्तर्गतं सर्वमनित्यमिति।
हि
शब्दस्तत्र प्रमाणं सूचयति। यथोक्तं जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः। इति। न चैवं नित्यत्वानित्यत्वयोरचेतनविभागत्वोक्तिविरोधः। अचेतनं नित्यानित्यभेदाद्द्विधैव। न तु नित्यमेव नाप्यनित्यमेवेत्येवंपरा सा। न त्वचेतनमेवैवंविधमिति व्याख्येयत्वात्। उपलक्षणं चैतत्। अन्यदप्येवं प्रामाणिकं ग्राह्यं। यथा स्वतन्त्रतत्वस्य भावत्वं चेतनत्वं नित्यमुक्तत्वं नित्यत्वं वा अभावस्याचेतनत्वं तत्रापि प्रागभावस्यानादित्वे सत्यनित्यत्वं प्रध्वंसाभावस्य सादित्वे सति नित्यत्वं अत्यन्ताभावस्यानादिनित्यत्वमिति। विभागस्यान्यनिषेधार्थत्वाभावात्।
गुणाः
रूपाद्याः।
क्रिया
उत्क्षेपणाद्याः ॥
जातिः
सत्ताद्या॥ पूर्वपदेन शक्तिसादृश्यविशिष्टादिग्रहणम्।
वस्तुनः
द्रव्यस्य। सत्यं, सन्ति गुणादयः। किं नाम। यथा भावादयोऽत्यन्तभिन्नाः न तथा गुणादयः। अपि तु स्वाश्रयद्रव्यस्वरूपभूता एव। अतो न ते पृथक्कथ्यन्ते। यदा तु बुद्ध्या विविच्यन्ते तदा विवेकोऽपि कर्तव्य इति।रूपमेव द्विधं तच्च यावद्वस्तु च खण्डितम् । खण्डिते भेद ऐक्यं च यावद्वस्तु न भेदवत् ॥10॥
तच्च
गुणादिकं द्रव्यरूपं
द्विधं
द्विविधम्।
यावद्वस्तु
यावत्कालं द्रव्यं भवति तावत्तिष्ठति।
किञ्चित्खण्डितं
सत्यपि द्रव्ये स्वयं नश्यतीत्येवं द्विविधं। किं ततः प्रकृते। तत्राहखण्डितं रूपमेवात्र विकारोऽपि विकारिणः । कार्यकारणयोश्चैव तथैव गुणतद्वतोः ॥11॥
अत्र
तत्वे।
विकारः
कार्यद्रव्यं।
विकारिणः
स्वोपादानद्रव्यस्य।
खण्डितमेव रूपं
। ततो भिन्नाभिन्नमेवेति। एवं चात्यन्ताभेदस्य भेदाभेदयोश्च कानि स्थलानीत्याकाङ्क्षायां सङ्कलय्याह
क्रियाक्रियावतोस्तद्वत् तथा जातिविशेषयोः । विशिष्टशुद्धयोश्चैव तथैवांशांशिनोरपि ॥12॥
कार्यमुपादेयं पटादि। कारणमुपादानं नन्त्वादि। तयोर्भेद ऐक्यं चेति योज्यम्॥
च
शब्दो वक्ष्यमाणैः सह समुच्चयार्थः। केचित्परमाणव एव तथा तथा सन्निविष्टाः पटादिबुद्धिविषयाः। न तु पटो नामास्तीति ब्रुवते। अन्ये तु कार्यकारणयोरत्यन्तभेदं ब्रुवते ॥ तदुभयनिरासाय एवकारः ॥ खण्डितमेवेत्युक्तत्वान्नात्रात्यन्ताभेदोऽस्ति। प्रागूर्ध्वं सत्स्वापि तन्तुषु पटाभावात् खण्डितत्वं। तथाशब्द उपमायां समुच्चये वा। गुणगुणिनोरपि कार्यकारणवद्भेदाभेदौ प्रतिपत्तव्यौ। यदि गुणोऽयावद्द्रव्यभावी स्यात् यथा चूतफलस्यश्यामत्वादयः॥ यावद्द्रव्यभावी त्वत्यन्ताभिन्न एवेति। परमाणवो रूपादिस्वभावाः। न तु गुणगुणिभावोस्तीत्येके। गुणगुणिनोरत्यन्तभेद इत्यपरे॥ तदेवकारेणापाकरोति। क्रियाक्रियावतोरपि गुणगुणिवद्भेदाभेदौ अत्यन्ताभेदश्च ज्ञातव्यः। तत्र पटचलनयोर्भेदाभेदौ। सत्यपि पटे चलनाभावात्। चेतनक्रिययोरत्यन्ताभेदः। क्रियाया अपि नित्यत्वात्। जातिविशेषयोर्जातिव्यक्त्योरपि भेदाभेदावभेदश्च यथासम्भवं ज्ञातव्यः। तत्र ब्राह्मणत्वपिण्डयोर्भेदाभेदौ। महापातकेन जातेरपायात्। घटत्वघटयोरत्यन्ताभेद एव। विशिष्टशुद्धयोर्विशिष्टस्य विशेष्यस्वरूपस्य च भेदाभेदावभेदश्चेति ज्ञातव्यं। तत्र पर्वतस्याग्निमतश्च भेदाभेदौ। पर्वतसद्भावेप्यग्नमतोऽभावात्। विष्णोः सर्वज्ञस्य चात्यन्ताभेद एव। एवकारेण विशिष्टस्यैवानभ्युपगमं सर्वत्र भेदाभेदाभ्युपगमं च व्यावर्तयति॥ तथा
शब्द उपमायां।
अपि
शब्दः समुच्चये ॥ अंशांशिनोरत्यन्ताभेदो भेदाभेदौ च ज्ञातव्यौ। तत्रैकांशेन भेदाभेदौ। तस्मिन्नपगतेऽप्यंशिनोऽवस्थानात्। सर्वैस्त्वत्यन्ताभेद एवेति। एवकारः कारणातिरिक्तांशाभावात्किमस्य पृथग्ग्रहणेनेत्यस्यापाकरणार्थः। प्रत्यक्षत एव पटाद्यंशिनां तन्त्वाद्यतिरिक्तांशप्रतीतेः। किञ्चाकाशस्य तावदंशाः सन्तीत्यङ्गीकार्यं। अन्यथा आकाशे विहगशरीरभावाभावौ न स्यातां। संयोगः स्वात्यन्ताभावसमानाश्रय इति चेन्न। विरोधात्। अन्यथा सर्वत्र भावाभावविरोधाभावप्रसङ्गात्। न चोपाधिकृतांशसद्भावादविरोधः। उपाधेरपि विहगशरीरसमानयोगक्षेमत्वात्। न चाकाशस्योपादानकारणमस्ति। तस्मात्कार्यकारणातिरिक्तांशांशिनौ अङ्गीकार्यौ। अत्र सर्वत्रोपपत्तिः शास्त्रोक्ताऽनुसन्धेया।
अनेन कार्यकारणादीनां समवायो नास्तीत्युक्तं भवति। तथा गुणादीनामवेकाश्रितत्वं जातेर्नित्यत्वं च निरस्तं भवति। अन्यथा सर्वाभेदादिप्रसङ्गात्॥यद्यपि केवलस्यास्य ज्ञानं न पुरुषार्थोपयोगि तथापि परमपुरुषाधीनतयाऽवगतं भवत्येव मोक्षसाधनमिति द्वे विद्ये वेदितव्ये' इत्यादिश्रुतिसिद्धमिति हिशब्देन सूचयति।
करतलमिलितामलकप्रख्यं यस्याखिलं विश्वं। कमलापरिवृढममलं वन्दे तं वन्द्यपादाब्जम् ॥ 1 ॥