Dwadasha/Moola: Difference between revisions
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<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमाध्यायः"></span> | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमाध्यायः"></span> | ||
== प्रथमाध्यायः == | == प्रथमाध्यायः == | ||
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| verse_lines = वन्दे वन्द्यं सदानन्दं वासुदेवं निरञ्जनम् ।¦इन्दिरापतिमाद्यादिवरदेश वरप्रदम् ॥1॥ | |||
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| verse_lines = नमामि निखिलाधीशकिरीटाघृष्टपीठवत् ।¦हृत्तमःशमनेर्काभं श्रीपतेः पादपङ्कजम् ॥2॥ | |||
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| verse_lines = जाम्बूनदाम्बराधारं नितम्बं चिन्त्यमीशितुः ।¦स्वर्णमञ्जीरसंवीतमारूढं जगदम्बया ॥3॥ | |||
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| verse_lines = उदरं चिन्त्यमीशस्य तनुत्वेप्यखलिम्भरम् ।¦वलित्रयाङ्कितं नित्यमुपगूढं श्रियैकया ॥4॥ | |||
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| verse_lines = स्मरणीयमुरो विष्णोरिन्दिरावासमीशितुः ।¦अनन्तमन्तवदिव भुजयोरन्तरं गतम् ॥5॥ | |||
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| verse_lines = शङ्खचक्रगदापद्मधराश्चिन्त्या हरेर्भुजाः ।¦पीनवृत्ता जगद्रक्षाकेवलोद्योगिनोनिशम् ॥6॥ | |||
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| verse_lines = सन्ततं चिन्तयेत् कण्ठं भास्वत्कौस्तुभभासकम् ।¦वैकुण्ठस्याखिला वेदा उद्गीर्यन्तेनिशं यतः ॥7॥ | |||
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| verse_lines = स्मरेत यामिनीनाथसहस्रामितकान्तिमत् ।¦भवतापापनोदीड्यं श्रीपतेर्मुखपङ्कजम् ॥8॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णानन्दसुखोद्भासि मन्दस्मितमधीशितुः ।¦गोविन्दस्य सदा चिन्त्यं नित्यानन्दपदप्रदम् ॥9॥ | |||
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| verse_lines = स्मरामि भवसन्तापहानिदामृतसागरम् ।¦पूर्णानन्दस्य रामस्य सानुरागावलोकनम् ॥10॥ | |||
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| verse_lines = ध्यायेदजस्रमीशस्य पद्मजादिप्रतीक्षितम् ।¦भ्रूभङ्गं पारमेष्ठ्यादिपददायि विमुक्तिदम् ॥11॥ | |||
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| verse_lines = सन्ततं चिन्तयेनन्तमन्तकाले विशेषतः ।¦नैवोदापुर्गृणन्तोन्तं यद्गुणानामजादयः ॥12॥ | |||
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== द्वितीयोध्यायः == | == द्वितीयोध्यायः == | ||
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| verse_lines = सुजनोदधिसंवृद्धिपूर्णचन्द्रो गुणार्णवः ।¦अमन्दानन्दसान्द्रो नः प्रीयतामिन्दिरापतिः ॥1॥ | |||
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| verse_lines = रमाचकोरीविधवे दुष्टदर्पोदवह्नये ।¦सत्पान्थजनगेहाय नमो नारायणाय ते ॥2॥ | |||
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| verse_lines = चिदचिद्भेदमखलिं विधायादाय भुञ्जते ।¦अव्याकृतगृहस्थाय रमाप्रणयिने नमः ॥3॥ | |||
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| verse_lines = अमन्दागुणसारोपि मन्दहासेन वीक्षितः ।¦नित्यमिन्दिरयानन्दसान्द्रो यो नौमि तं हरिम् ॥4॥ | |||
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| verse_lines = वशी वशे न कस्यापि योजितो विजिताखिलः ।¦सर्वकर्ता न क्रियते तं नमामि रमापतिम् ॥5॥ | |||
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| verse_lines = अगुणाय गुणोद्रेकस्वरूपायादिकारिणे ।¦विदारितारिसङ्घाय वासुदेवाय ते नमः ॥6॥ | |||
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| verse_lines = आदिदेवाय देवानां पतये सादितारये ।¦अनाद्यज्ञानपाराय नमो वरवराय ते ॥7॥ | |||
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| verse_lines = अजाय जनयित्रेस्य विजिताखलिदानव ।¦अजादिपूज्यपादाय नमस्ते गरुडध्वज ॥8॥ | |||
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| verse_lines = इन्दिरामन्दसान्द्राग्य्रकटाक्षप्रेक्षितात्मने ।¦अस्मदिष्टैककार्याय पूर्णाय हरये नमः ॥9॥ | |||
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<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोध्यायः"></span> | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोध्यायः"></span> | ||
== तृतीयोध्यायः == | == तृतीयोध्यायः == | ||
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| verse_lines = कुरु भुङ्क्ष्व च कर्म निजं नियतं हरिपादविनम्रधिया सततम् ।¦हरिरेव परो हरिरेव गुरुः हरिरेव जगत्पितृमातृगतिः ॥1॥ | |||
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| verse_lines = न ततोस्त्परं जगतीड्यतमं परमात् परतः पुरुषोत्तमतः ।¦तदलं बहुलोकविचिन्तनया प्रवणं कुरु मानसमीशपदे ॥2॥ | |||
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| verse_lines = यततोपि हरेः पदसंस्मरणे सकलं ह्यघमाशु लयं व्रजति ।¦स्मरतस्तु विमुक्तिपदं परमं स्फुटमेष्यति तत्किमपाक्रियते ॥3॥ | |||
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| verse_lines = श?ृणुतामलसत्यवचः परमं शपथेरितमुच्छ्रितबाहुयुगम् ।¦न हरेः परमो न हरेः सदृशः परमः स तु सर्वचिदात्मगणात् ॥4॥ | |||
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| verse_lines = यदि नाम परो न भवेत् स हरिः कथमस्य वशे जगदेतदभूत् ।¦यदि नाम न तस्य वशे सकलं कथमेव तु नित्यसुखं न भवेत् ॥5॥ | |||
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| verse_lines = न कर्मविमामलकालगुणप्रभृतीशमचित्तनु तद्धि यतः ।¦चिदचित्तनु सर्वमसौ तु हरिर्यमयेदिति वैदिकमस्ति वचः ॥6॥ | |||
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| verse_lines = व्यवहारभिदापि गुरोर्जगतां न तु चित्तगता स हि चोद्यपरम् ।¦बहवः पुरुषाः पुरुषप्रवरो हरिरित्यवदत् स्वयमेव हरिः ॥7॥ | |||
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| verse_lines = चतुराननपूर्वविमुक्तगणा हरिमेत्य तु पूर्ववदेव सदा ।¦नियतोच्चविनीचतयैव निजां स्थितिमापुरिति स्म परं वचनम् ॥8॥ | |||
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| verse_lines = आनन्दतीर्थसन्नाम्ना पूर्णप्रज्ञाभिधायुजा ।¦कृतं हर्यष्टकं भक्त्या पठतः प्रियते हरिः ॥9॥ | |||
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== चतुर्थोध्यायः == | == चतुर्थोध्यायः == | ||
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| verse_lines = निजपूर्णसुखामितबोधतनुः परशक्तिरनन्तगुणः परमः ।¦अजरारमरणः सकलार्तिहरः कमलापतिरीड्यतमोवतु नः ॥1॥ | |||
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| verse_lines = यदसुप्तिगतोपि हरिः सुखवान् सुखरूपिणमाहुरतो निगमाः ।¦स्वमतिप्रभवं जगदस्य यतः परबोधतनुं च ततः खपतिम् ॥2॥ | |||
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| verse_lines = बहुचित्रजगद्बहुधाकरणात् परशक्तिरनन्तगुणः परमः ।¦सुखरूपममुष्य पदं परमं स्मरतस्तु भविष्यति तत्सततम् ॥3॥ | |||
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| verse_lines = स्मरणे हि परेशितुरस्य विभोर्मलिनानि मनांसि कुतः करणम् ।¦विमलं हि पदं परमं स्वरतं तरुणार्कसवर्णमजस्य हरेः ॥4॥ | |||
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| verse_lines = विमलैः श्रुतिशाणनिशाततमैः सुमनोसिभिराशु निहत्य दृढम् ।¦बलिनं निजवैरिणमात्मतमोभिदमीशमनन्तमुपास्व हरिम् ॥5॥ | |||
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| verse_lines = स हि विश्वसृजो विभुशम्भुपुरन्दरसूर्यमुखानपरानमरान् ।¦सृजतीड्यतमोवति हन्ति निजं पदमापयति प्रणतान्सुधिया ॥6॥ | |||
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| verse_lines = परमोपि रमेशितुरस्य समो न हि कश्चिदभून्न भविष्यति च ।¦क्वचिदद्यतनोपि न पूर्णसदागणितेड्यगुणानुभवैकतनोः ॥7॥ | |||
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| verse_lines = इति देववरस्य हरेः स्तवनं कृतवान् मुनिरुत्तममादरतः ।¦सुखतीर्थापदाभिहितः पठतस्तदिदं भवति ध्रुवमुच्चसुखम् ॥8॥ | |||
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== पञ्चमोध्यायः == | == पञ्चमोध्यायः == | ||
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| verse_lines = वासुदेवापरिमेयसुधामन् शुद्धसदोदित सुन्दरीकान्त ।¦धराधरधारणवेधुरधर्तः सौधृतिदीधितिवेधृविधातः ॥1॥ | |||
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| verse_lines = अधिक बन्धं रन्धय बोधाच्छिन्धि पिधानं बन्धुरमद्धा ।¦केशव केशव शासक वन्दे पाशधरार्चित शूरवरेश ॥2॥ | |||
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| verse_lines = आनन्दतीर्थमुनीन्द्रकृता हरिगीतिरियं परमादरतः ।¦परलोकवलिोकनसूर्यनिभा हरिभक्तिविवर्धनशौण्डतमा ॥8॥ | |||
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<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोध्यायः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोध्यायः"></span> | ||
== षष्ठोध्यायः == | == षष्ठोध्यायः == | ||
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| verse_lines = मत्स्यकरूप लयोदविहारिन् वेदविनेत्र चतुर्मुखवन्द्य ।¦कूर्मस्वरूपक मन्दरधारिन् लोकविधारक देववरेण्य ॥1॥ | |||
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| verse_lines = सूकररूपक दानवशत्रो भूमिविधारक यज्ञवराङ्ग ।¦देव नृसिंह हिरण्यकशत्रो सर्वभयान्तक दैवतबन्धो ॥2॥ | |||
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| verse_lines = वामन वामन माणववेष दैत्यवरान्तक कारणरूप ।¦राम भृगूद्वह सूर्जितदीप्ते क्षत्रकुलान्तक शम्भुवरेण्य ॥3॥ | |||
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| verse_lines = राघव राघव राक्षसशत्रो मारुतिवल्लभ जानकिकान्त ।¦देवकिनन्दन सुन्दररूप रुक्मिणिवल्लभ पाण्डवबन्धो ॥4॥ | |||
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| verse_lines = देवकिनन्दन नन्दकुमार वृन्दावनाञ्चन गोकुलचन्द्र ।¦कन्दफलाशन सुन्दररूप नन्दितगोकुलवन्दितपाद ॥5॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रसुतावक नन्दकहस्त चन्दनचर्चित सुन्दरिनाथ ।¦इन्दीवरोदरदलनयन मन्दरधारिन् गोविन्द वन्दे ॥6॥ | |||
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| verse_lines = चन्द्रशतानन कुन्दसुहास नन्दितदैवतानन्दसुपूर्ण ।¦दैत्यविमोहक नित्यसुखादे देवसुबोधक बुद्धस्वरूप ॥7॥ | |||
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| verse_lines = दुष्टकुलान्तक कल्किस्वरूप धर्मविवर्धन मूलयुगादे ।¦नारायणामलकारणमूर्ते पूर्णगुणार्णव नित्यसुबोध ॥8॥ | |||
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| verse_lines = आनन्दतीर्थमुनीन्द्रकृता हरिगाथा ।¦पापहरा शुभा नित्यसुखार्था ॥9॥ | |||
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== सप्तमोध्यायः == | == सप्तमोध्यायः == | ||
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| verse_lines = विश्वस्थितिप्रलयसर्गमहाविभूतिवृत्तिप्रकाशनियमावृतिबन्धमोक्षाः ।¦यस्या अपाङ्गलवमात्रत ऊर्जिता सा श्रीर्यत्कटाक्षबलवत्यजितं नमामि ॥1॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मेशशक्ररविधर्मशशाङ्कपूर्वगीर्वाणसन्ततिरियं यदपाङ्गलेशम् ।¦आश्रित्य विश्वविजयं विसृजत्यचिन्त्या श्रीर्यत्कटाक्षबलवत्यजितं नमामि ॥2॥ | |||
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| verse_lines = धर्मार्थकामसुमतिप्रचयाद्यशेषसन्मङ्गलं विदधते यदपाङ्गलेशम् ।¦आश्रित्य तत्प्रणतसत्प्रणता अपीड्या श्रीर्यत्कटाक्षबलवत्यजितं नमामि ॥3॥ | |||
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| verse_lines = षड्वर्गनिग्रहनिरस्तसमस्तदोषा ध्यायन्ति विष्णुमृषयो यदपाङ्गलेशम् ।¦आश्रित्य यानपि समेत्य न याति दुःखं श्रीर्यत्कटाक्षबलवत्यजितं नमामि ॥4॥ | |||
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| verse_lines = शेषाहिवैरिशिवशक्रमनुप्रधानचित्रोरुकर्मरचनं यदपाङ्गलेशम् ।¦आश्रित्य विश्वमखलिं विदधाति धाता श्रीर्यत्कटाक्षबलवत्यजितं नमामि ॥5॥ | |||
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| verse_lines = शक्रोग्रदीधितिहिमाकरसूर्यसूनुपूर्वं निहत्य निखलिं यदपाङ्गलेशम् ।¦आश्रित्य नृत्यति शिवः प्रकटोरुशक्तिः श्रीर्यत्कटाक्षबलवत्यजितं नमामि ॥6॥ | |||
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| verse_lines = तत्पादपङ्कजमहासनतामवाप शर्वादिवन्द्यचरणो यदपाङ्गलेशम् ।¦आश्रित्य नागपतिरन्यसुरैर्दुरापां श्रीर्यत्कटाक्षबलवत्यजितं नमामि ॥7॥ | |||
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| verse_lines = नागारिरुग्रबलपौरुष आप विष्णोर्वाहत्वमुत्तमजवो यदपाङ्गलेशम् ।¦आश्रित्य शक्रमुखदेवगणैरचिन्त्यं श्रीर्यत्कटाक्षबलवत्यजितं नमामि ॥8॥ | |||
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| verse_lines = आनन्दतीर्थमुनिसन्मुखपङ्कजोत्थं साक्षाद्रमाहरिमनःप्रियमुत्तमार्थम् ।¦भक्त्या पठत्यजितमात्मनि सन्निधाय यः स्तोत्रमेतदभियाति तयोरभीष्टम् ॥9॥ | |||
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<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोध्यायः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोध्यायः"></span> | ||
== अष्टमोध्यायः == | == अष्टमोध्यायः == | ||
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| verse_lines = वन्दिताशेषवन्द्योरुवृन्दारकं चन्दनाचर्चितोदारपीनांसकम् ।¦इन्दिराचञ्चलापाङ्गनीराजितं मन्दरोद्धारिवृत्तोद्भुजाभोगिनम् ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥1॥ | |||
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| verse_lines = सृष्टिसंहारलीलावलिासाततं पुष्टषाड्गुण्यसद्विग्रहोल्लासिनम् ।¦दुष्टनिश्शेषसंहारकर्मोद्यतं हृष्टपुष्टानुशिष्टप्रजासंश्रयम् ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥2॥ | |||
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| verse_lines = उन्नतप्रार्थिताशेषसंसाधकं सन्नतालौकिकानन्ददश्रीपदम् ।¦भिन्नकर्माशयप्राणिसम्प्रेरकं तन्न किं नेति विद्वत्सु मीमांसितम् ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥3॥ | |||
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| verse_lines = विप्रमुख्यैः सदा वेदवादोन्मुखैः सुप्रतापैः क्षितिशेश्वरैश्चार्चितम् ।¦अप्रतर्क्योरुसंविद्गुणं निर्मलं सप्रकाशाजरानन्दरूपं परम् ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥4॥ | |||
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| verse_lines = अत्ययो यस्य केनापि न क्वापि हि प्रत्ययो यद्गुणेषूत्तमानां परः ।¦सत्यसङ्कल्प एको वरेण्यो वशी मत्यनूनैः सदा वेदवादोदितः ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥5॥ | |||
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| verse_lines = पश्यतां दुःखसन्ताननिर्मूलनं दृश्यतां दृश्यतामित्यजेशार्चितम् ।¦नश्यतां दूरगं सर्वदाप्यात्मगं वश्यतां स्वेच्छया सज्जनेष्वागतम् ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥6॥ | |||
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| verse_lines = अग्रजं यः ससर्जाजमग्र्याकृतिं विग्रहो यस्य सर्वे गुणा एव हि ।¦उग्र आद्योपि यस्यात्मजाग्य्रात्मजः सद्गृहीतः सदा यः परं दैवतम् ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥7॥ | |||
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| verse_lines = अच्युतो यो गुणैर्नित्यमेवाखिलैः प्रच्युतोशेषदोषैः सदा पूर्तितः ।¦उच्यते सर्ववेदोरुवादैरजः स्वर्चितो ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वैः सदा ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥8॥ | |||
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| verse_lines = धार्यते येन विश्वं सदाजादिकं वार्यतेशेषदुःखं निजध्यायिनाम् ।¦पार्यते सर्वमन्यैर्न यत्पार्यते कार्यते चाखिलं सर्वभूतैः सदा ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥9॥ | |||
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| verse_lines = सर्वपापानि यत्संस्मृतेः सङ्क्षयं सर्वदा यान्ति भक्त्या विशुद्धात्मनाम् ।¦शर्वगुर्वादिगीर्वाणसंस्थानदः कुर्वते कर्म यत्प्रीतये सज्जनाः ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥10॥ | |||
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| verse_lines = अक्षयं कर्म यस्मिन् परे स्वर्पितं प्रक्षयं यान्ति दुःखानि यन्नामतः ।¦अक्षरो योजरः सर्वदैवामृतः कुक्षिगं यस्य विश्वं सदाजादिकम् ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥11॥ | |||
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| verse_lines = नन्दितीर्थोरुसन्नामिनो नन्दिनः सन्दधानाः सदानन्ददेवे मतिम् ।¦मन्दहासारुणापाङ्गदत्तोन्नतिं नन्दिताशेषदेवादिवृन्दं सदा ।¦प्रीणयामो वासुदेवं देवतामण्डलाखण्डमण्डनं प्रीणयामो वासुदेवम् ॥12॥ | |||
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== नवमोध्यायः == | == नवमोध्यायः == | ||
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| verse_lines = अतिमत तमोगिरिसमितिविभेदन पितामहभूतिद गुणगणनलिय ।¦शुभतमकथाशय परम सदोदित जगदेककारण राम रमारमण ॥1॥ | |||
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| verse_lines = खरतरनिशिचरदहन परामृत रघुवर मानद भव मम शरणम् ।¦शुभतमकथाशय परम सदोदित जगदेककारण राम रमारमण ॥11॥ | |||
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| verse_lines = सुललिततनुवर वरद महाबल यदुवर पार्थप भव मम शरणम् ।¦शुभतमकथाशय परम सदोदित जगदेककारण राम रमारमण ॥12॥ | |||
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| verse_lines = दितिसुतमोहन विमलविबोधन परगुणबुद्ध हे भव मम शरणम् ।¦शुभतमकथाशय परम सदोदित जगदेककारण राम रमारमण ॥13॥ | |||
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| verse_lines = कलिमलहुतवह सुभग महोत्सव शरणद कल्कीश हे भव मम शरणम् ।¦शुभतमकथाशय परम सदोदित जगदेककारण राम रमारमण ॥14॥ | |||
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<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोध्यायः"></span> | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोध्यायः"></span> | ||
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<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोध्यायः"></span> | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोध्यायः"></span> | ||
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Latest revision as of 20:51, 16 June 2026
द्वादशस्तोत्रम् — मूलम्
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प्रथमाध्यायः
वन्दे वन्द्यं सदानन्दं वासुदेवं निरञ्जनम् ।
नमामि निखिलाधीशकिरीटाघृष्टपीठवत् ।
जाम्बूनदाम्बराधारं नितम्बं चिन्त्यमीशितुः ।
उदरं चिन्त्यमीशस्य तनुत्वेप्यखलिम्भरम् ।
स्मरणीयमुरो विष्णोरिन्दिरावासमीशितुः ।
शङ्खचक्रगदापद्मधराश्चिन्त्या हरेर्भुजाः ।
सन्ततं चिन्तयेत् कण्ठं भास्वत्कौस्तुभभासकम् ।
स्मरेत यामिनीनाथसहस्रामितकान्तिमत् ।
पूर्णानन्दसुखोद्भासि मन्दस्मितमधीशितुः ।
स्मरामि भवसन्तापहानिदामृतसागरम् ।
ध्यायेदजस्रमीशस्य पद्मजादिप्रतीक्षितम् ।
सन्ततं चिन्तयेनन्तमन्तकाले विशेषतः ।
द्वितीयोध्यायः
सुजनोदधिसंवृद्धिपूर्णचन्द्रो गुणार्णवः ।
रमाचकोरीविधवे दुष्टदर्पोदवह्नये ।
चिदचिद्भेदमखलिं विधायादाय भुञ्जते ।
अमन्दागुणसारोपि मन्दहासेन वीक्षितः ।
वशी वशे न कस्यापि योजितो विजिताखिलः ।
अगुणाय गुणोद्रेकस्वरूपायादिकारिणे ।
आदिदेवाय देवानां पतये सादितारये ।
अजाय जनयित्रेस्य विजिताखलिदानव ।
इन्दिरामन्दसान्द्राग्य्रकटाक्षप्रेक्षितात्मने ।
तृतीयोध्यायः
कुरु भुङ्क्ष्व च कर्म निजं नियतं हरिपादविनम्रधिया सततम् ।
न ततोस्त्परं जगतीड्यतमं परमात् परतः पुरुषोत्तमतः ।
यततोपि हरेः पदसंस्मरणे सकलं ह्यघमाशु लयं व्रजति ।
श?ृणुतामलसत्यवचः परमं शपथेरितमुच्छ्रितबाहुयुगम् ।
यदि नाम परो न भवेत् स हरिः कथमस्य वशे जगदेतदभूत् ।
न कर्मविमामलकालगुणप्रभृतीशमचित्तनु तद्धि यतः ।
व्यवहारभिदापि गुरोर्जगतां न तु चित्तगता स हि चोद्यपरम् ।
चतुराननपूर्वविमुक्तगणा हरिमेत्य तु पूर्ववदेव सदा ।
आनन्दतीर्थसन्नाम्ना पूर्णप्रज्ञाभिधायुजा ।
चतुर्थोध्यायः
निजपूर्णसुखामितबोधतनुः परशक्तिरनन्तगुणः परमः ।
यदसुप्तिगतोपि हरिः सुखवान् सुखरूपिणमाहुरतो निगमाः ।
बहुचित्रजगद्बहुधाकरणात् परशक्तिरनन्तगुणः परमः ।
स्मरणे हि परेशितुरस्य विभोर्मलिनानि मनांसि कुतः करणम् ।
विमलैः श्रुतिशाणनिशाततमैः सुमनोसिभिराशु निहत्य दृढम् ।
स हि विश्वसृजो विभुशम्भुपुरन्दरसूर्यमुखानपरानमरान् ।
परमोपि रमेशितुरस्य समो न हि कश्चिदभून्न भविष्यति च ।
इति देववरस्य हरेः स्तवनं कृतवान् मुनिरुत्तममादरतः ।
पञ्चमोध्यायः
वासुदेवापरिमेयसुधामन् शुद्धसदोदित सुन्दरीकान्त ।
अधिक बन्धं रन्धय बोधाच्छिन्धि पिधानं बन्धुरमद्धा ।
नारायणामल कारण वन्दे कारण कारण पूर्णवरेण्य ।
गोविन्द गोविन्द पुरन्दर वन्दे स्कन्दसुनन्दनवन्दितपाद ।
मधुसूदन दानवसादन वन्दे दैवतमोदित वेदितपाद ।
वामन वामन भामन वन्दे सामन सीमन सामन सानो ।
हृषीकेश सुकेश परेश विवन्दे शरणेश कलेश बलेश सुखेश ।
आनन्दतीर्थमुनीन्द्रकृता हरिगीतिरियं परमादरतः ।
षष्ठोध्यायः
मत्स्यकरूप लयोदविहारिन् वेदविनेत्र चतुर्मुखवन्द्य ।
सूकररूपक दानवशत्रो भूमिविधारक यज्ञवराङ्ग ।
वामन वामन माणववेष दैत्यवरान्तक कारणरूप ।
राघव राघव राक्षसशत्रो मारुतिवल्लभ जानकिकान्त ।
देवकिनन्दन नन्दकुमार वृन्दावनाञ्चन गोकुलचन्द्र ।
इन्द्रसुतावक नन्दकहस्त चन्दनचर्चित सुन्दरिनाथ ।
चन्द्रशतानन कुन्दसुहास नन्दितदैवतानन्दसुपूर्ण ।
दुष्टकुलान्तक कल्किस्वरूप धर्मविवर्धन मूलयुगादे ।
आनन्दतीर्थमुनीन्द्रकृता हरिगाथा ।
सप्तमोध्यायः
विश्वस्थितिप्रलयसर्गमहाविभूतिवृत्तिप्रकाशनियमावृतिबन्धमोक्षाः ।
ब्रह्मेशशक्ररविधर्मशशाङ्कपूर्वगीर्वाणसन्ततिरियं यदपाङ्गलेशम् ।
धर्मार्थकामसुमतिप्रचयाद्यशेषसन्मङ्गलं विदधते यदपाङ्गलेशम् ।
षड्वर्गनिग्रहनिरस्तसमस्तदोषा ध्यायन्ति विष्णुमृषयो यदपाङ्गलेशम् ।
शेषाहिवैरिशिवशक्रमनुप्रधानचित्रोरुकर्मरचनं यदपाङ्गलेशम् ।
शक्रोग्रदीधितिहिमाकरसूर्यसूनुपूर्वं निहत्य निखलिं यदपाङ्गलेशम् ।
तत्पादपङ्कजमहासनतामवाप शर्वादिवन्द्यचरणो यदपाङ्गलेशम् ।
नागारिरुग्रबलपौरुष आप विष्णोर्वाहत्वमुत्तमजवो यदपाङ्गलेशम् ।
आनन्दतीर्थमुनिसन्मुखपङ्कजोत्थं साक्षाद्रमाहरिमनःप्रियमुत्तमार्थम् ।
अष्टमोध्यायः
वन्दिताशेषवन्द्योरुवृन्दारकं चन्दनाचर्चितोदारपीनांसकम् ।
सृष्टिसंहारलीलावलिासाततं पुष्टषाड्गुण्यसद्विग्रहोल्लासिनम् ।
उन्नतप्रार्थिताशेषसंसाधकं सन्नतालौकिकानन्ददश्रीपदम् ।
विप्रमुख्यैः सदा वेदवादोन्मुखैः सुप्रतापैः क्षितिशेश्वरैश्चार्चितम् ।
अत्ययो यस्य केनापि न क्वापि हि प्रत्ययो यद्गुणेषूत्तमानां परः ।
पश्यतां दुःखसन्ताननिर्मूलनं दृश्यतां दृश्यतामित्यजेशार्चितम् ।
अग्रजं यः ससर्जाजमग्र्याकृतिं विग्रहो यस्य सर्वे गुणा एव हि ।
अच्युतो यो गुणैर्नित्यमेवाखिलैः प्रच्युतोशेषदोषैः सदा पूर्तितः ।
धार्यते येन विश्वं सदाजादिकं वार्यतेशेषदुःखं निजध्यायिनाम् ।
सर्वपापानि यत्संस्मृतेः सङ्क्षयं सर्वदा यान्ति भक्त्या विशुद्धात्मनाम् ।
अक्षयं कर्म यस्मिन् परे स्वर्पितं प्रक्षयं यान्ति दुःखानि यन्नामतः ।
नन्दितीर्थोरुसन्नामिनो नन्दिनः सन्दधानाः सदानन्ददेवे मतिम् ।
नवमोध्यायः
अतिमत तमोगिरिसमितिविभेदन पितामहभूतिद गुणगणनलिय ।
विधिभवमुखसुरसततसुवन्दित रमामनोहर भव मम शरणम् ।
अगणितगुणगणमयशरीर हे विगतगुणेतर भव मम शरणम् ।
अपरिमितसुखनिधिविमलसुदेह हे विगतसुखेतर भव मम शरणम् ।
प्रचलितलयजलविहरणशाश्वत सुखमय मीन हे भव मम शरणम् ।
सुरदितिजसुबलवलिुलितमन्दरधर परकूर्म हे भव मम शरणम् ।
सगिरिवरधरातलवह सुसूकर परम विबोध हे भव मम शरणम् ।
अतिबलदितिसुतहृदयविभेदन जय नृहरेमल भव मम शरणम् ।
बलिमुखदितिसुतविजयविनाशन जगदवनाजित भव मम शरणम् ।
अविजितकुनृपतिसमितिविखण्डन रमावर वीरप भव मम शरणम् ।
खरतरनिशिचरदहन परामृत रघुवर मानद भव मम शरणम् ।
सुललिततनुवर वरद महाबल यदुवर पार्थप भव मम शरणम् ।
दितिसुतमोहन विमलविबोधन परगुणबुद्ध हे भव मम शरणम् ।
कलिमलहुतवह सुभग महोत्सव शरणद कल्कीश हे भव मम शरणम् ।
अखलिजनिवलिय परसुखकारण परपुरुषोत्तम भव मम शरणम् ।
इति तव नुतिवरसततरतेर्भव सुशरणमुरुसुखतीर्थमुनेर्भगवन् ।
दशमोध्यायः
अवनः श्रीपतिरप्रतिरधिकेशादिभवादे ।
सुरवन्द्याधिप सद्वर भरिताशेषगुणालम् ।
सकलध्वान्तविनाशक परमानन्दसुधाहो ।
त्रिजगत्पोत सदार्चितचरणाशापतिधातो ।
त्रिगुणातीत विधारक परितो देहि सुभक्तिम् ।
शरणं कारणभावन भव मे तात सदालम् ।
मरणप्राणद पालक जगदीशाव सुभक्तिम् ।
तरुणादित्यसवर्णकचरणाब्जामलकीर्ते ।
सलिलप्रोत्थसरागकमणिवर्णोच्चनखादे ।
खजतूणीनिभपावनवरजङ्घमितशक्ते ।
इभहस्तप्रभशोभनपरमोरुस्थरमाले ।
असनोत्फुल्लसुपुष्पकसमवर्णावरणान्ते ।
शतमोदोद्भवसुन्दरवरपद्मोत्थितनाभे ।
जगदागूहकपल्लवसमकुक्षे शरणादे ।
जगदम्बामलसुन्दरगृलवक्षोवरयोगिन् ।
दितिजान्तप्रद चक्रदरगदायुग्वरबाहो ।
परमज्ञानमहानिधिवदनश्रीरमणेन्दो ।
निखिलाघौघविनाशक परसौख्यप्रददृष्टे ।
परमानन्दतीर्थमुनिराजो हरिगाथाम् ।
एकादशोध्यायः
उदीर्णमजरं दिव्यममृतस्यन्द्यधीशितुः ।
सर्ववेदपदोद्गीतमिन्दिरावासमुत्तमम् ।
सर्वदेवादिदेवस्य विदारितमहत्तमः ।
उदारमादरान्नित्यमनिन्द्यं सुन्दरीपतेः ।
इन्दीवरोदरनिभं सुपूर्णं वादिमोहदम् ।
दातृसर्वामरैश्वर्यविमुक्त्यादेरहो वरम् ।
दूराद् दूरतरं यत्तु तदेवान्तिकमन्तिकात् ।
पूर्णसर्वगुणैकार्णमनाद्यन्तं सुरेशितुः ।
आनन्दतीर्थमुनिना हरेरानन्दरूपिणः ।
द्वादशोध्यायः
आनन्द मुकुन्द अरविन्दनयन ।
सुन्दरीमन्दिर गोविन्द वन्दे ।
चन्द्रकमन्दिरनन्दक वन्दे ।
चन्द्रसुरेन्द्रसुवन्दित वन्दे ।
मन्दारस्यन्दकस्यन्दन वन्दे ।
वृन्दारकवृन्दसुवन्दित वन्दे ।
मन्दारस्यन्दितमन्दिर वन्दे ।
मन्दिरस्यन्दनस्यन्दक वन्दे ।
इन्दिरानन्दकसुन्दर वन्दे ।
आनन्दचन्द्रिकास्यन्दन वन्दे ।