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| <div class="verse" id="MVK_C01_V01" type="shloka" data-doc="MVK">
| | {{VerseBlock |
| <div class="verse-text">
| | | verse_id = MVK_C01_V01 |
| <div class="shloka">
| | | document_id = MVK |
| <span class="shloka-line">नरसिंहोखिलाज्ञानमतध्वान्तदिवाकरः ।</span>
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| <span class="shloka-line">जयत्यमितसज्ज्ञानसुखशक्तिपयोनिधिः ॥</span>
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| | | verse_line1 = नरसिंहोखिलाज्ञानमतध्वान्तदिवाकरः । |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B01" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <p>‘विमतम् अनारम्भणीयम् अन्यथाप्रतिपादकत्वात्, यदित्थं तत्तथा, यथा सम्प्रतिपन्नम्’ । न हि ब्रह्मात्मैक्यस्य याथार्थ्यं तत्पक्षे । अद्वैतहानेः स्वरूपातिरेके । अनतिरेके स्वप्रकाशत्वादात्मनः सिद्धसाधनता । निर्विशेषत्वादात्मनो नानधिगतो विशेषः । सिद्धत्वाद् स्वरूपस्य विशेषाभावाच्च नाज्ञानं कस्यचिदावरकम् । ‘अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्’ इति च तन्मतम् । अज्ञानासम्भवादेव तन्मतम् अखिलमपाकृतम् । मिथ्यात्वे चैक्यस्यातत्त्वावेदकत्वमागमस्य स्यात् । सत्यता च भेदस्य । एवमेव प्रयोजनमपि निरस्तम् । स्वरूपत्वात् मोक्षस्य पूर्वमेव सिद्धत्वात् । अज्ञानासम्भवेन चतुर्थप्रकाराभावात् पञ्चमप्रकारताऽपि निरस्ता । विषयप्रयोजनाभावादेव अधिकारी च । तदभावादेव सम्बन्धोऽपि ।</p>
| | | verse_id = MVK_C01 |
| </div>
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| | | text = ‘विमतम् अनारम्भणीयम् अन्यथाप्रतिपादकत्वात्, यदित्थं तत्तथा, यथा सम्प्रतिपन्नम्’ । न हि ब्रह्मात्मैक्यस्य याथार्थ्यं तत्पक्षे । अद्वैतहानेः स्वरूपातिरेके । अनतिरेके स्वप्रकाशत्वादात्मनः सिद्धसाधनता । निर्विशेषत्वादात्मनो नानधिगतो विशेषः । सिद्धत्वाद् स्वरूपस्य विशेषाभावाच्च नाज्ञानं कस्यचिदावरकम् । ‘अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्’ इति च तन्मतम् । अज्ञानासम्भवादेव तन्मतम् अखिलमपाकृतम् । मिथ्यात्वे चैक्यस्यातत्त्वावेदकत्वमागमस्य स्यात् । सत्यता च भेदस्य । एवमेव प्रयोजनमपि निरस्तम् । स्वरूपत्वात् मोक्षस्य पूर्वमेव सिद्धत्वात् । अज्ञानासम्भवेन चतुर्थप्रकाराभावात् पञ्चमप्रकारताऽपि निरस्ता । विषयप्रयोजनाभावादेव अधिकारी च । तदभावादेव सम्बन्धोऽपि । |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B02" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।<br/> क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥(भ.गी.१५.१६)</span></span>
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| </div>
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| | | text = ‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥(भ.गी.१५.१६) |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B03" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।<br/> यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥(भ.गी.१५.१७)</span></span>
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| </div>
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| | | text = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥(भ.गी.१५.१७) |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B04" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।<br/> अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥(भ.गी.१५.१८)</span></span>
| | | verse_id = MVK_C01 |
| </div>
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| | | text = यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥(भ.गी.१५.१८) |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B05" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।<br/> स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥(भ.गी.१५.१९)</span></span>
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| </div>
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| | | text = यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥(भ.गी.१५.१९) |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B06" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।<br/> एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥(भ.गी.१५.२०)</span></span>
| | | verse_id = MVK_C01 |
| </div>
| | | id = MVK_C01_B06 |
| | | text = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥(भ.गी.१५.२०) |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B07" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।<br/> मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥’(कठ.१.३.१०)</span></span>
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| </div>
| | | id = MVK_C01_B07 |
| | | text = ‘इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥’(कठ.१.३.१०) |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B08" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘महतः परमव्यक्तम् अव्यक्तात् पुरुषः परः ।<br/> पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥’(कठ.१.३.१०)</span></span>
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| </div>
| | | id = MVK_C01_B08 |
| | | text = ‘महतः परमव्यक्तम् अव्यक्तात् पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥’(कठ.१.३.१०) |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B09" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’(ब्र.सू.३.३.५९)</span></span> । इति विष्णोः पुरुषोत्तमत्वमेव सर्वशास्त्रार्थत्वेन भगवता श्रुत्या चाभिहितम् ।
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| </div>
| | | id = MVK_C01_B09 |
| | | text = ‘भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’(ब्र.सू.३.३.५९) । इति विष्णोः पुरुषोत्तमत्वमेव सर्वशास्त्रार्थत्वेन भगवता श्रुत्या चाभिहितम् । |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B10" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <p>इति सर्वज्ञमुनिना मायावादतमोऽखलिम् ।<br/> निरस्तं तत्त्ववादेन सतां संशयनुत्तये ॥</p>
| | | verse_id = MVK_C01 |
| </div>
| | | id = MVK_C01_B10 |
| | | text = इति सर्वज्ञमुनिना मायावादतमोऽखलिम् । निरस्तं तत्त्ववादेन सतां संशयनुत्तये ॥ |
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| <div class="bhashya" id="MVK_C01_B11" data-verse="MVK_C01">
| | {{Bhashyam |
| <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम् ॥(म.भा.१.१.३४)</span></span>
| | | verse_id = MVK_C01 |
| </div>
| | | id = MVK_C01_B11 |
| | | text = नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम् ॥(म.भा.१.१.३४) |
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| <div class="gr-author-note">इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं मायावादखण्डनम् ॥</div> | | <div class="gr-author-note">इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं मायावादखण्डनम् ॥</div> |