Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S2: Difference between revisions
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== द्वितीयोऽध्यायः == | == द्वितीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_line2 = यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं | |||
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| verse_line4 = पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽपि नेदु- | |||
| verse_line5 = स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥ २ ॥ | |||
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अनुपेतं देहादिभिः । अनभिमानात् । अकातरः कातरवददर्शयत् ।उक्तं च स्कान्दे–'नित्यतृप्तः परानन्दो योऽव्ययः परमेश्वरः ।यस्य पुत्रफलं नैव यज्जातं जगदीदृशम् ॥यदधीनश्रियोऽपाङ्गाद् ब्रह्मरुद्रादिसंस्थितिः ।स पुत्रार्थं तपस्तेपे व्यासो रुद्रस्य चेश्वरः ॥कातर्यं दर्शयामास वियोगे लौकिकं हरिः ।कुतः कातरता तस्य नित्यानन्दमहोदधेः''॥ इति ॥'ईशन्नपि हि लोकस्य सर्वस्य जगतो हरिः ।कर्माणि कुरुते विष्णुः कीनाश इव दुर्बलः''। इति चोद्योगे ॥'देवत्वे देववच्चेष्टा मानुषत्वे च मानुषी''इति विष्णुधर्मे ।सर्वभूतहृदयम् अहङ्कारात्मकत्वात् ।'अहङ्कारात्मको रुद्रः शुको द्वैपायनात्मजः''। इति स्कान्दे ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक- | |||
| verse_line2 = मध्यात्मदीपमतितीर्षतां तमोऽन्धम् । | |||
| verse_line3 = संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं | |||
| verse_line4 = तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥ ३ ॥ | |||
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स्वानुभावं ब्रह्म ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् । | |||
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अद्वयं असमाधिकम् । तथा च भाल्लवेयश्रुतिः–'स पुरुषः सोऽद्वय इति । न ह्येनमभि कश्चन । न ह्येनमपि कश्चनेति''इति ।'सोऽद्वयः पुरुषस्तस्मान्न समो नाधिको ह्यतः''। इति महासंहितायाम् ।तत्त्वशब्दार्थस्तत्रैवोक्तः–'अतीतानागते काले यत्तादृशमुदीर्यते ।कुतश्चिदन्यथा नेयात् तत्तत्त्वं तत्त्वतो विदुः''॥ इति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् । | |||
| verse_line2 = उभाभ्यां भाष्यते साक्षाद्भगवान् केवलः स्मृतः ॥ १२ ॥ | |||
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सत्तामात्रम् आनन्दमात्रम् ।तथा च पैङ्गिश्रुतिः–'अथ कस्मादुच्यते सत्तेति । नन्दति नन्दयति चेति''। इति ।न कार्यकारणविषयविशेषितवैषयिकज्ञानम् । केवलमेव तज्ज्ञानम् । स्रष्टृत्वादिभिः कार्यकारणविशेषितं च ।तन्त्रभागवते च–'विषयापेक्षि न ज्ञानं विषयैश्च विशेषितम् ।यत्तदानन्दमात्रं च तद् ब्रह्मेत्यवधार्यताम्''। इति ।यत्किञ्चित् अलोकसिद्धम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया । | |||
| verse_line2 = पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतिगृहीतया ॥ १३ ॥ | |||
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यस्मात् परमात्मैव तत्त्वं तस्मात् तमेव पश्यन्ति मुनयः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | |||
| verse_line2 = क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २२ ॥ | |||
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आत्मनीश्वर इति न जीवैक्यमुच्यते । परेषामपि ब्रह्मादीनां यतोऽवरत्वं स परावरः ।'भेददृष्ट्याभिमानेन''इति च कापिलेये ।'ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्य-गताभिमानाः''इति च ।'विद्याऽऽत्मनि भिदाबोधः'''यत्र हि द्वैतमिव भवति''।'अन्यमीशमस्य महिमानमिति''।'अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति''।'छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति''।'एको बहूनां यो विदधाति कामान्''।'सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये''।'सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः''।'यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः''।'शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन्''इत्यादि च ।'मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ।बहवः पुरुषाः ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह''। इत्यादि मोक्षधर्मे ॥'भेददृष्ट्याभिमानेन पश्यन्तो यान्ति तत्पदम्"– इति वायुप्रोक्ते ।'अनुपपत्तेस्तु न शारीरः",'भेदव्यपेशाच्च",'शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनम-धीयते",'पृथगुपदेशात्''इत्यादि च ।सत्यत्वं च भेदस्योक्तं भाल्लवेयश्रुतौ–'स्थाणुर्होच्चक्राम स प्रजापतिमुवाच । कोऽसि के स्म कः स इति । स होवाच योऽस्मि ये स्थ यः स इति । अथ हैनमुपाक्रोशत् । सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदेति । मैवारुवण्यो मैवारुवण्यो मैवारुवण्य इति''इति ।'सत्यमेनम्'''सत्यः सो अस्य''इति चोक्तम् ।महासंहितायां च–'त्रिविधं जीवसङ्घं च परमात्मानमव्ययम् ।तेषां भेदं च ये सत्यं विदुर्मोहविवर्जिताः ॥ते यान्ति परमं स्थानं विष्णोरेवाचलं ध्रुवम् ।जीवेश्वरभिदां भ्रान्तिं केचिदाहुरपण्डिताः ॥अनारतं तमो यान्ति परमात्मविनिन्दनात् ।पराधीनश्च बद्धश्च स्वल्पज्ञानसुखेहितः ॥अल्पशक्तिः सदोषश्च जीवात्माऽनीदृशः परः ।वदता तु तयोरैक्यं किं तेनादुष्कृतं कृतम् ॥अन्तर्याम्यैक्यवाचीनि वचनानीह यानि तु ।तानि दृष्ट्वा भ्रमन्तीह दुरात्मानोऽल्पचेतसः ॥अस्यास्मि त्वमहं स्वात्मेत्यभिधागोचरो यतः ।सर्वान्तरत्वात् पुरुषस्त्वन्तर्यामी नियामयन् ॥अतो भ्रमन्ति वचनैरासुरा मोहतत्परैः ।तन्मोहने परा प्रीतिर्देवानां परमस्य च ॥अतो महान्धकारेषु पतन्त्यज्ञानमोहिताः''। इत्यादि ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै- | |||
| verse_line2 = र्युक्तः परः पुरुष एव इहास्य धत्ते । | |||
| verse_line3 = स्थित्यादये हरिविरिञ्चहरेति सञ्ज्ञाः | |||
| verse_line4 = श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनौ नृणां स्युः ॥ २४ ॥ | |||
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विष्णोरेव त्रिसञ्ज्ञाः । वामनपुराणे च–'ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाणि त्रीणि विष्णोर्महात्मनः ।ब्रह्मणि ब्रह्मरूपः स शिवरूपी शिवे स्थितः ॥पृथगेव स्थितो देवो विष्णुरूपी जनार्दनः''। इति ।त्रयोऽपि गुणा विष्ण्वाश्रयाः । तथाऽपि सत्त्वतनौ जीवे श्रेयांसि स्युः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः । | |||
| verse_line2 = तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २५ ॥ | |||
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मेघरूपत्वात् धूम उत्तमः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् । | |||
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सात्त्विकानां वासुदेवे भक्तिरुत्पद्यते ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै । | |||
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भूतेशप्रजेशादीन् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया । | |||
| verse_line2 = सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः ॥ ३१ ॥ | |||
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आत्ममायया स्वेच्छया । सदसद्रूपया प्रकृत्या च ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव । | |||
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तया सदसद्रूपया । विज्ञानेन विजृम्भितः विज्ञानेन सम्पूर्णः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः । | |||
| verse_line2 = स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३४ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥}} | |||
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तद्गुणान् एव भुङ्क्ते न दोषान् ।'सर्वत्र सारभुग् देवो नासारं स कदाचन''इति वामनपुराणे ।'अनश्नन्''इत्यशुभापेक्षया परवशत्वापेक्षया क्ऌप्त्यपेक्षया च ।'अक्ऌप्त्या च स्वतन्त्रत्वादशुभस्य च वर्जनात् ।अभोक्ता शुभभोक्तृत्वाद् भोक्तेत्येव च तं विदुः ॥अन्यूनानधिकत्वाच्च पूर्णस्वानन्दभोजनात् ।विरागाच्च परस्यास्य भोक्तृत्वप्रतिषेधनम्''। इति स्कान्दे ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
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Revision as of 05:32, 8 April 2026
द्वितीयोऽध्यायः
सूत उवाच–यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं
अनुपेतं देहादिभिः । अनभिमानात् । अकातरः कातरवददर्शयत् ।उक्तं च स्कान्दे–'नित्यतृप्तः परानन्दो योऽव्ययः परमेश्वरः ।यस्य पुत्रफलं नैव यज्जातं जगदीदृशम् ॥यदधीनश्रियोऽपाङ्गाद् ब्रह्मरुद्रादिसंस्थितिः ।स पुत्रार्थं तपस्तेपे व्यासो रुद्रस्य चेश्वरः ॥कातर्यं दर्शयामास वियोगे लौकिकं हरिः ।कुतः कातरता तस्य नित्यानन्दमहोदधेः॥ इति ॥'ईशन्नपि हि लोकस्य सर्वस्य जगतो हरिः ।कर्माणि कुरुते विष्णुः कीनाश इव दुर्बलः। इति चोद्योगे ॥'देवत्वे देववच्चेष्टा मानुषत्वे च मानुषीइति विष्णुधर्मे ।सर्वभूतहृदयम् अहङ्कारात्मकत्वात् ।'अहङ्कारात्मको रुद्रः शुको द्वैपायनात्मजः। इति स्कान्दे ॥ २ ॥
यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-मध्यात्मदीपमतितीर्षतां तमोऽन्धम् ।
स्वानुभावं ब्रह्म ॥ ३ ॥
वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ११ ॥
अद्वयं असमाधिकम् । तथा च भाल्लवेयश्रुतिः–'स पुरुषः सोऽद्वय इति । न ह्येनमभि कश्चन । न ह्येनमपि कश्चनेतिइति ।'सोऽद्वयः पुरुषस्तस्मान्न समो नाधिको ह्यतः। इति महासंहितायाम् ।तत्त्वशब्दार्थस्तत्रैवोक्तः–'अतीतानागते काले यत्तादृशमुदीर्यते ।कुतश्चिदन्यथा नेयात् तत्तत्त्वं तत्त्वतो विदुः॥ इति ॥ ११ ॥
सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् ।उभाभ्यां भाष्यते साक्षाद्भगवान् केवलः स्मृतः ॥ १२ ॥
सत्तामात्रम् आनन्दमात्रम् ।तथा च पैङ्गिश्रुतिः–'अथ कस्मादुच्यते सत्तेति । नन्दति नन्दयति चेति। इति ।न कार्यकारणविषयविशेषितवैषयिकज्ञानम् । केवलमेव तज्ज्ञानम् । स्रष्टृत्वादिभिः कार्यकारणविशेषितं च ।तन्त्रभागवते च–'विषयापेक्षि न ज्ञानं विषयैश्च विशेषितम् ।यत्तदानन्दमात्रं च तद् ब्रह्मेत्यवधार्यताम्। इति ।यत्किञ्चित् अलोकसिद्धम् ॥ १२ ॥
तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतिगृहीतया ॥ १३ ॥
यस्मात् परमात्मैव तत्त्वं तस्मात् तमेव पश्यन्ति मुनयः ॥ १३ ॥
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २२ ॥
आत्मनीश्वर इति न जीवैक्यमुच्यते । परेषामपि ब्रह्मादीनां यतोऽवरत्वं स परावरः ।'भेददृष्ट्याभिमानेनइति च कापिलेये ।'ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्य-गताभिमानाःइति च ।'विद्याऽऽत्मनि भिदाबोधःयत्र हि द्वैतमिव भवति।'अन्यमीशमस्य महिमानमिति।'अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।'छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति।'एको बहूनां यो विदधाति कामान्।'सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये।'सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः।'यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।'शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन्इत्यादि च ।'मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ।बहवः पुरुषाः ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह। इत्यादि मोक्षधर्मे ॥'भेददृष्ट्याभिमानेन पश्यन्तो यान्ति तत्पदम्"– इति वायुप्रोक्ते ।'अनुपपत्तेस्तु न शारीरः",'भेदव्यपेशाच्च",'शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनम-धीयते",'पृथगुपदेशात्इत्यादि च ।सत्यत्वं च भेदस्योक्तं भाल्लवेयश्रुतौ–'स्थाणुर्होच्चक्राम स प्रजापतिमुवाच । कोऽसि के स्म कः स इति । स होवाच योऽस्मि ये स्थ यः स इति । अथ हैनमुपाक्रोशत् । सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदेति । मैवारुवण्यो मैवारुवण्यो मैवारुवण्य इतिइति ।'सत्यमेनम्सत्यः सो अस्यइति चोक्तम् ।महासंहितायां च–'त्रिविधं जीवसङ्घं च परमात्मानमव्ययम् ।तेषां भेदं च ये सत्यं विदुर्मोहविवर्जिताः ॥ते यान्ति परमं स्थानं विष्णोरेवाचलं ध्रुवम् ।जीवेश्वरभिदां भ्रान्तिं केचिदाहुरपण्डिताः ॥अनारतं तमो यान्ति परमात्मविनिन्दनात् ।पराधीनश्च बद्धश्च स्वल्पज्ञानसुखेहितः ॥अल्पशक्तिः सदोषश्च जीवात्माऽनीदृशः परः ।वदता तु तयोरैक्यं किं तेनादुष्कृतं कृतम् ॥अन्तर्याम्यैक्यवाचीनि वचनानीह यानि तु ।तानि दृष्ट्वा भ्रमन्तीह दुरात्मानोऽल्पचेतसः ॥अस्यास्मि त्वमहं स्वात्मेत्यभिधागोचरो यतः ।सर्वान्तरत्वात् पुरुषस्त्वन्तर्यामी नियामयन् ॥अतो भ्रमन्ति वचनैरासुरा मोहतत्परैः ।तन्मोहने परा प्रीतिर्देवानां परमस्य च ॥अतो महान्धकारेषु पतन्त्यज्ञानमोहिताः। इत्यादि ॥ २२ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-र्युक्तः परः पुरुष एव इहास्य धत्ते ।
विष्णोरेव त्रिसञ्ज्ञाः । वामनपुराणे च–'ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाणि त्रीणि विष्णोर्महात्मनः ।ब्रह्मणि ब्रह्मरूपः स शिवरूपी शिवे स्थितः ॥पृथगेव स्थितो देवो विष्णुरूपी जनार्दनः। इति ।त्रयोऽपि गुणा विष्ण्वाश्रयाः । तथाऽपि सत्त्वतनौ जीवे श्रेयांसि स्युः ॥ २४ ॥
पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः ।तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २५ ॥
मेघरूपत्वात् धूम उत्तमः ॥ २५ ॥
भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् ।सत्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पते नेतराविह ॥ २६ ॥
सात्त्विकानां वासुदेवे भक्तिरुत्पद्यते ॥ २६ ॥
रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै ।पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २८ ॥
भूतेशप्रजेशादीन् ॥ २८ ॥
स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया ।सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः ॥ ३१ ॥
आत्ममायया स्वेच्छया । सदसद्रूपया प्रकृत्या च ॥ ३१ ॥
तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥ ३२ ॥
तया सदसद्रूपया । विज्ञानेन विजृम्भितः विज्ञानेन सम्पूर्णः ॥ ३२ ॥
असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः ।स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३४ ॥
तद्गुणान् एव भुङ्क्ते न दोषान् ।'सर्वत्र सारभुग् देवो नासारं स कदाचनइति वामनपुराणे ।'अनश्नन्इत्यशुभापेक्षया परवशत्वापेक्षया क्ऌप्त्यपेक्षया च ।'अक्ऌप्त्या च स्वतन्त्रत्वादशुभस्य च वर्जनात् ।अभोक्ता शुभभोक्तृत्वाद् भोक्तेत्येव च तं विदुः ॥अन्यूनानधिकत्वाच्च पूर्णस्वानन्दभोजनात् ।विरागाच्च परस्यास्य भोक्तृत्वप्रतिषेधनम्। इति स्कान्दे ॥ ३४ ॥