Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S12: Difference between revisions
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== द्वादशोऽध्यायः == | == द्वादशोऽध्यायः == | ||
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'तत्प्राणे प्रपन्न उदतिष्ठत्''इति श्रुतिः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् । | |||
| verse_line2 = यथानुभूतं भ्रमता विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२ ॥ | |||
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यदुकुलक्षयं एष्यत् ।'शापं श्रुत्वा ब्राह्मणानामुद्धवः खिन्नमानसः ।उदासीनं तथा कृष्णमिव सुप्रीतमेव च ॥नशिष्यमाणं स्वकुलं स्वर्यियासुं च केशवम् ।ज्ञात्वा पप्रच्छ भगवत्स्वरूपं तमुपह्वरे ॥मैत्रेयोऽपि तदैवाऽगाद् जिज्ञासुस्तत्त्वमुत्तमम् ।तयोरदात् स भगवान् ज्ञानं निर्मलमञ्जसा ॥षडि्वंशद्वत्सरात् पूर्वं स्वर्गतेः पुरुषोत्तमः ।प्रेषयामास च हरिरुद्धवं बदरीमनु ॥कलापग्रामिणां वक्तुमेतत् तत्त्वमशेषतः ।विदुरं तीर्थयात्रास्थमन्तराले स उद्धवः ॥दृष्ट्वा नशिष्यमाणं च कुलं जिगमिषुं हरिम् ।कथयित्वा बदर्यां च कलापग्रामवासिनाम् ॥प्रोच्य तत्त्वमशेषेण वासुदेवमुखोद्गतम् ।षडि्वंशद्वर्षगमने पुनरागतिमात्मनः ॥तेषामुक्त्वा पुनः कृष्णसन्निधौ विचचार ह ।मैत्रेयो विदुरायैतदूचिवान् कृष्णचोदितः ॥विदुरः पाण्डवानां च विना यदुविनाशनम् ।षडि्वंशद्वर्षतः पूर्वं ज्ञात्वाऽप्यप्रियमेव तत् ॥नावोचद् विदुरो धीमांस्तस्मान्नाप्रियमावदेत्''। इति पाद्मे ॥'तावच्छशास क्षितिमेकचक्रामेकातपत्रामजितेन पार्थः''। इति चोपरि ।'विदुरं चागतं पुनः''। इति च ।भारते चैकविंशद्वर्षात् पूर्वं विदुरस्य युधिष्ठिरभाव उक्तः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु । | |||
| verse_line2 = यावद्बभार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५ ॥ | |||
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योऽर्यमा दण्डमबिभ्रत् स वर्षशतं यावच्छूद्रत्वं बभार ।'न देवानां न दैवीनां सामस्त्येन जनिर्भुवि ।अंशांशेनैव जायन्ते सर्वे त्वाजानजादयः''॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो । | |||
| verse_line2 = स एष भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ २० ॥ | |||
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'संहर्ता भगवान् विष्णुः काल इत्यभिधीयते ।अथवा गुणसर्वस्वं कालशब्दो व्यनक्ति हि''। इति हि स्कान्दे ॥२०॥ | |||
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| verse_line1 = अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् । | |||
| verse_line2 = इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः ॥ २८ ॥ | |||
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स्वैरज्ञातगतिः विविक्तगतिः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः । | |||
| verse_line2 = गृहान्प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥३१॥ | |||
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पितरौ कुन्तीधृतराष्ट्रौ । न चापश्यत् । तस्य मनसि तेषां विपद्भावो बभूव । अन्यथा महाभारतविरोधात् ।स्कान्दे च–'भीमसन्तर्जितो राज्ञस्त्वनुज्ञां प्राप्य यत्नतः ।धृतराष्ट्रो वने वासमकरोद् वत्सरत्रयम् ॥विदुरस्तद्दिदृक्षार्थमागतेषु वनं पुरात् ।पाण्डवेषु तु राजानं प्रविश्यैकत्वमागतः ॥ततो दावाग्निना दग्धं धृतराष्ट्रं च सौबलीम् ।श्रुत्वा कुन्तीं च चिन्तां ते प्रापुः पाण्डुसुतास्तदा''॥'तांस्तदा नारदो विद्वान् शमयामास धर्मवित् ।उक्त्वोत्तमां गतिं तेषां निष्ठां तात्कालिकीं तथा''। इत्यादि ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः । | |||
| verse_line2 = गावद्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः । | |||
| verse_line3 = अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता पितृव्यः क्व गतः सुहृत् ॥ ३२ ॥ | |||
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ब्रह्माण्डे च–'धृतराष्ट्रे मृते सूतः सञ्जयः पाण्डुसूनवे ।गतिं शशंस कुन्त्याश्च गान्धारीधृतराष्ट्रयोः''॥ इत्यादि ॥।पितृव्योऽपि धृतराष्ट्र एव । द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था ।'यत्राधिकं तत्परता बहुवारमपि ध्रुवम् ।तद्वदन्ति महाप्राज्ञा लोकवेदानुसारतः''। इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् । | |||
| verse_line2 = अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३४ ॥ | |||
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पितृव्यौ गान्धारीधृतराष्ट्रौ ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = सञ्जय उवाच— | |||
| verse_line2 = अहं च व्यंसितो राजन् पित्रोर्वः कुलनन्दन । | |||
| verse_line3 = न वेद साध्व्या गान्धार्या मुषितोऽस्मि महात्मभिः ॥ ३७ ॥ | |||
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मुषितोऽस्मि इति प्रलापः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_line2 = नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवान् क्वगतावितः । | |||
| verse_line3 = अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता क्व गता च तपस्विनी । | |||
| verse_line4 = कर्णधार इवापारे सीदतां पारदर्शनः ॥ ४० ॥ | |||
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क्व गतावित्यदृष्टापेक्षया ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_line1 = यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् । | |||
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अपरिहार्यत्वादशोच्याः ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_line1 = धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया । | |||
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गमनकाले सह भ्रात्रा ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_line1 = स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि । | |||
| verse_line2 = अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्तेऽ)विगतेक्षणः ॥ ५३ ॥ | |||
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आस्त इत्याद्यतीतार्थे ।'स एष तर्ह्यध्यास्त आसनं पार्थिवोचितम्''इत्यादिवत् ।'सुप्तिङ्उपग्रहलिङ्गनराणां कालहलच्स्वरकर्तृयङां च ।व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन''।इति महाव्याकरणे ।'व्यासादयो वर्तमानमतीतानागते तथा ।व्यत्यस्यापि वदन्त्यद्धा मोहनार्थं दुरात्मनाम् ॥पौर्वापर्यं यतो नैव सदैव परिवर्तनात् ।अतश्च व्यत्ययादेतद्वदन्ति ज्ञानचक्षुषः''। इति ब्राह्मे ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_line1 = विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् । | |||
| verse_line2 = ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५५ ॥ | |||
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'विज्ञानात्मा विरिञ्चोऽयं यस्तस्मिंल्लीयते जगत् ।यादांसि सागरे यद्वत् स क्षेत्रज्ञे जनार्दने ॥हृदिस्थे च स च व्याप्ते स्वात्मन्येकीभवत्युत ।प्रलयौ भेदवन्तौ तु पूर्वोक्तौ ब्रह्मकृष्णयोः ॥अन्तस्थस्य बहिष्ठे तु तस्य तस्मिन्नभेदतः''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ।काले तस्य तत्र लयो भविष्यतीति ध्यानमात्रं विलापनम् ।'अविद्यमानमपि यो ध्यायेतैवं विनिश्चितः ।उच्यते तस्य कर्तेति तथैव मुनयोऽमलाः ।जगद्विलापयामासुरित्युच्यन्तेऽथ तत्स्मृतेः ।नच तत्स्मृतिमात्रेण लयो भवति निश्चितम्''। इति हि नारदीये ।'स्वरूपं जायमानं च आकाशं च घटे द्विधा ।स्वरूपं जायमाने तु घटे निर्भेदमेव हि ॥भिन्नवद् व्यवहारस्य समर्थं तल्लये च तत् ।तद्वदेवावतारेषु देहस्थश्च हरिः स्वयम् ॥भिन्नवद् व्यवहाराय शक्तो लीने जगत्यपि ।स एव पूर्ववज्ज्ञेयो निर्विशेषेण केशवः ॥जायमानं घटे जाते जायते तल्लये तु न ।तस्माद्भिन्नं महाकाशादेवं जीवोऽपि कीर्तितः ॥उपाधेश्चैव नित्यत्वान्नैव जीवो विनश्यति ।स्वरूपत्वादुपाधेश्च न भिन्नोपाधिकल्पनम् ॥न चाभिन्नत्वमीशेन चिन्मात्रत्वं च युज्यते''। इति ब्रह्मतर्के ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_line1 = ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः । | |||
| verse_line2 = निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाधुना॥ ५६ ॥ | |||
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'त्रिगुणात्मिका तथा ज्ञानं विष्णुशक्तिस्तथैव च ।मायाशब्देन भण्यन्ते शब्दतत्त्वार्थवेदिभिः''। इति नाममहोदधौ ॥अत्र सत्वादयो मायागुणाः ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_line1 = स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि । | |||
| verse_line2 = कलेवरं हास्यति ह तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५७ ॥ | |||
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'परावरे तथैवाऽरादुभयार्थाभिधायिनः''इति च ॥ ५७ ॥ | |||
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| verse_line1 = विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन । | |||
| verse_line2 = हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५९ ॥ | |||
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एतत्सर्वं पूर्वमेव ज्ञात्वा तस्मादेव कारणात् विदुरस्तीर्थानि ययौ ॥ ५९ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:33, 8 April 2026
द्वादशोऽध्यायः
प्रत्युज्जग्मुः प्रहर्षेण प्राणांस्तन्व इवाऽगतान् ।अभिसङ्गम्य विधिवत्परिष्वङ्गाभिवन्दनैः ॥ ५ ॥
'तत्प्राणे प्रपन्न उदतिष्ठत्इति श्रुतिः ॥ ५ ॥
इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् ।यथानुभूतं भ्रमता विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२ ॥
यदुकुलक्षयं एष्यत् ।'शापं श्रुत्वा ब्राह्मणानामुद्धवः खिन्नमानसः ।उदासीनं तथा कृष्णमिव सुप्रीतमेव च ॥नशिष्यमाणं स्वकुलं स्वर्यियासुं च केशवम् ।ज्ञात्वा पप्रच्छ भगवत्स्वरूपं तमुपह्वरे ॥मैत्रेयोऽपि तदैवाऽगाद् जिज्ञासुस्तत्त्वमुत्तमम् ।तयोरदात् स भगवान् ज्ञानं निर्मलमञ्जसा ॥षडि्वंशद्वत्सरात् पूर्वं स्वर्गतेः पुरुषोत्तमः ।प्रेषयामास च हरिरुद्धवं बदरीमनु ॥कलापग्रामिणां वक्तुमेतत् तत्त्वमशेषतः ।विदुरं तीर्थयात्रास्थमन्तराले स उद्धवः ॥दृष्ट्वा नशिष्यमाणं च कुलं जिगमिषुं हरिम् ।कथयित्वा बदर्यां च कलापग्रामवासिनाम् ॥प्रोच्य तत्त्वमशेषेण वासुदेवमुखोद्गतम् ।षडि्वंशद्वर्षगमने पुनरागतिमात्मनः ॥तेषामुक्त्वा पुनः कृष्णसन्निधौ विचचार ह ।मैत्रेयो विदुरायैतदूचिवान् कृष्णचोदितः ॥विदुरः पाण्डवानां च विना यदुविनाशनम् ।षडि्वंशद्वर्षतः पूर्वं ज्ञात्वाऽप्यप्रियमेव तत् ॥नावोचद् विदुरो धीमांस्तस्मान्नाप्रियमावदेत्। इति पाद्मे ॥'तावच्छशास क्षितिमेकचक्रामेकातपत्रामजितेन पार्थः। इति चोपरि ।'विदुरं चागतं पुनः। इति च ।भारते चैकविंशद्वर्षात् पूर्वं विदुरस्य युधिष्ठिरभाव उक्तः ॥ १२ ॥
अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु ।यावद्बभार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५ ॥
योऽर्यमा दण्डमबिभ्रत् स वर्षशतं यावच्छूद्रत्वं बभार ।'न देवानां न दैवीनां सामस्त्येन जनिर्भुवि ।अंशांशेनैव जायन्ते सर्वे त्वाजानजादयः॥ १५ ॥
प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो ।स एष भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ २० ॥
'संहर्ता भगवान् विष्णुः काल इत्यभिधीयते ।अथवा गुणसर्वस्वं कालशब्दो व्यनक्ति हि। इति हि स्कान्दे ॥२०॥
अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् ।इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः ॥ २८ ॥
स्वैरज्ञातगतिः विविक्तगतिः ॥ २८ ॥
अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः ।गृहान्प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥३१॥
पितरौ कुन्तीधृतराष्ट्रौ । न चापश्यत् । तस्य मनसि तेषां विपद्भावो बभूव । अन्यथा महाभारतविरोधात् ।स्कान्दे च–'भीमसन्तर्जितो राज्ञस्त्वनुज्ञां प्राप्य यत्नतः ।धृतराष्ट्रो वने वासमकरोद् वत्सरत्रयम् ॥विदुरस्तद्दिदृक्षार्थमागतेषु वनं पुरात् ।पाण्डवेषु तु राजानं प्रविश्यैकत्वमागतः ॥ततो दावाग्निना दग्धं धृतराष्ट्रं च सौबलीम् ।श्रुत्वा कुन्तीं च चिन्तां ते प्रापुः पाण्डुसुतास्तदा॥'तांस्तदा नारदो विद्वान् शमयामास धर्मवित् ।उक्त्वोत्तमां गतिं तेषां निष्ठां तात्कालिकीं तथा। इत्यादि ॥ ३१ ॥
तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः ।गावद्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः ।
ब्रह्माण्डे च–'धृतराष्ट्रे मृते सूतः सञ्जयः पाण्डुसूनवे ।गतिं शशंस कुन्त्याश्च गान्धारीधृतराष्ट्रयोः॥ इत्यादि ॥।पितृव्योऽपि धृतराष्ट्र एव । द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था ।'यत्राधिकं तत्परता बहुवारमपि ध्रुवम् ।तद्वदन्ति महाप्राज्ञा लोकवेदानुसारतः। इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ ३२ ॥
पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् ।अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३४ ॥
पितृव्यौ गान्धारीधृतराष्ट्रौ ॥ ३४ ॥
सञ्जय उवाच—अहं च व्यंसितो राजन् पित्रोर्वः कुलनन्दन ।
मुषितोऽस्मि इति प्रलापः ॥ ३७ ॥
युधिष्ठिर उवाच—नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवान् क्वगतावितः ।
क्व गतावित्यदृष्टापेक्षया ॥ ४० ॥
यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् ।सर्वथा हि न शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४४ ॥
अपरिहार्यत्वादशोच्याः ॥ ४४ ॥
धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया ।दक्षिणेन हिमवता ऋषीणामाश्रमं गतः ॥ ५१ ॥
गमनकाले सह भ्रात्रा ॥ ५१ ॥
स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि ।अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्तेऽ)विगतेक्षणः ॥ ५३ ॥
आस्त इत्याद्यतीतार्थे ।'स एष तर्ह्यध्यास्त आसनं पार्थिवोचितम्इत्यादिवत् ।'सुप्तिङ्उपग्रहलिङ्गनराणां कालहलच्स्वरकर्तृयङां च ।व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन।इति महाव्याकरणे ।'व्यासादयो वर्तमानमतीतानागते तथा ।व्यत्यस्यापि वदन्त्यद्धा मोहनार्थं दुरात्मनाम् ॥पौर्वापर्यं यतो नैव सदैव परिवर्तनात् ।अतश्च व्यत्ययादेतद्वदन्ति ज्ञानचक्षुषः। इति ब्राह्मे ॥ ५३ ॥
विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् ।ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५५ ॥
'विज्ञानात्मा विरिञ्चोऽयं यस्तस्मिंल्लीयते जगत् ।यादांसि सागरे यद्वत् स क्षेत्रज्ञे जनार्दने ॥हृदिस्थे च स च व्याप्ते स्वात्मन्येकीभवत्युत ।प्रलयौ भेदवन्तौ तु पूर्वोक्तौ ब्रह्मकृष्णयोः ॥अन्तस्थस्य बहिष्ठे तु तस्य तस्मिन्नभेदतः॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ।काले तस्य तत्र लयो भविष्यतीति ध्यानमात्रं विलापनम् ।'अविद्यमानमपि यो ध्यायेतैवं विनिश्चितः ।उच्यते तस्य कर्तेति तथैव मुनयोऽमलाः ।जगद्विलापयामासुरित्युच्यन्तेऽथ तत्स्मृतेः ।नच तत्स्मृतिमात्रेण लयो भवति निश्चितम्। इति हि नारदीये ।'स्वरूपं जायमानं च आकाशं च घटे द्विधा ।स्वरूपं जायमाने तु घटे निर्भेदमेव हि ॥भिन्नवद् व्यवहारस्य समर्थं तल्लये च तत् ।तद्वदेवावतारेषु देहस्थश्च हरिः स्वयम् ॥भिन्नवद् व्यवहाराय शक्तो लीने जगत्यपि ।स एव पूर्ववज्ज्ञेयो निर्विशेषेण केशवः ॥जायमानं घटे जाते जायते तल्लये तु न ।तस्माद्भिन्नं महाकाशादेवं जीवोऽपि कीर्तितः ॥उपाधेश्चैव नित्यत्वान्नैव जीवो विनश्यति ।स्वरूपत्वादुपाधेश्च न भिन्नोपाधिकल्पनम् ॥न चाभिन्नत्वमीशेन चिन्मात्रत्वं च युज्यते। इति ब्रह्मतर्के ॥ ५५ ॥
ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः ।निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाधुना॥ ५६ ॥
'त्रिगुणात्मिका तथा ज्ञानं विष्णुशक्तिस्तथैव च ।मायाशब्देन भण्यन्ते शब्दतत्त्वार्थवेदिभिः। इति नाममहोदधौ ॥अत्र सत्वादयो मायागुणाः ॥ ५६ ॥
स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि ।कलेवरं हास्यति ह तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५७ ॥
'परावरे तथैवाऽरादुभयार्थाभिधायिनःइति च ॥ ५७ ॥
विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन ।हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५९ ॥
एतत्सर्वं पूर्वमेव ज्ञात्वा तस्मादेव कारणात् विदुरस्तीर्थानि ययौ ॥ ५९ ॥