Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S25: Difference between revisions
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'यथावत्कर्म कर्तुस्तु ज्ञानसाहाय्यकारकम् ।अन्यथाकुर्वतः कर्म निरयाय भविष्यति ॥तथापि कर्म निन्दन्ति न यतः कर्तुमञ्जसा ।शक्यं ज्ञानफलस्यापि बहुत्वान्मोहनाय च''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥३-८॥ | |||
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'देवजीवाभिमानी तु ब्रह्मैव तु चतुर्मुखः ।मानुषाणां तु जीवानामभिमानी पुरञ्जनः ॥स तु राजा हरेः पुत्रस्त्वासुराणां कलिः स्वयम् ।जीवसंसृतिवत्तस्मात्पुरञ्जनकथापि तु ॥तस्माज्जीवसृतिज्ञप्त्यै पुरञ्जनकथां मुनिः ।नारदोऽश्रावयद्विद्वान्नृपं प्राचीनबर्हिषम् ॥प्रायस्तु तत्कथा जीवे स्थिता प्रत्येकशोऽपि तु ।प्रत्येकं यत्तु युज्येत तदुन्नेयं यथा तथा ॥उक्तं भागवतेऽप्येतत्पुराणे यावदिष्यते ।प्रत्येकशस्तु जीवानां तदन्यत्तस्य केवलम्''॥ इति तन्त्रभागवते ॥ १०,१३ ॥ | |||
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नारद उवाच–इति तौ दम्पती तत्र समुह्य समयं मिथः ।तां प्रविश्य पुरीं राजन् मुमुदाते शतं समाः ॥ ४४ ॥'ये पुरञ्जनभृत्याद्या भार्याद्याः सर्व एव च ।तेऽपि मानुषबुध्द्यादेर्विज्ञेया अभिमानिनः ॥गायत्र्याद्यास्तु देवानां तेऽपि चैतेषु संस्थिताः ।अलक्ष्मीद्वापराद्यास्तु आसुरास्तेऽपि मानुषाः''॥ इति च ॥ २०,२१,४४ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'दक्षिणश्रोत्रमार्गेण देवलोकं व्रजत्यसौ ।वामश्रोत्रेण पितृणामिति वेदविदो विदुः''॥ इति प्रवृत्तितन्त्रे ॥ ५१,५२ ॥ | |||
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Revision as of 05:34, 8 April 2026
पञ्चविंशोऽध्यायः
प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम् ।नारदोऽध्यात्मतत्वज्ञः कृपालुः प्रत्यबोधयत् ॥ ३ ॥
नारद उवाच–श्रेयस्त्वं कतमद् राजन् कर्मणाऽऽत्मन ईहसे ।
प्राचीनबर्हिरुवाच–न जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः ।
भो भो प्रजापते राजन् पशून् पश्य त्वयाऽध्वरे ।संज्ञापितान् जीवसङ्घान् निर्घृणेन सहस्रशः ॥ ७ ॥
एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव ।सम्परेतमयः कूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः ॥ ८ ॥
'यथावत्कर्म कर्तुस्तु ज्ञानसाहाय्यकारकम् ।अन्यथाकुर्वतः कर्म निरयाय भविष्यति ॥तथापि कर्म निन्दन्ति न यतः कर्तुमञ्जसा ।शक्यं ज्ञानफलस्यापि बहुत्वान्मोहनाय च॥ इति ब्रह्माण्डे ॥३-८॥
आसीत् पुरञ्जनो नाम राजा राजन् बृहच्छ्रवाः ।तस्याविज्ञातनामाऽऽसीत् सखाऽविज्ञातचेष्टितः ॥ १० ॥
स एकदा हिमवतो दक्षिणेष्वथ सानुषु ।ददर्श नवभिर्द्वारैः पुरीं लक्षितलक्षणाम् ॥ १३ ॥
'देवजीवाभिमानी तु ब्रह्मैव तु चतुर्मुखः ।मानुषाणां तु जीवानामभिमानी पुरञ्जनः ॥स तु राजा हरेः पुत्रस्त्वासुराणां कलिः स्वयम् ।जीवसंसृतिवत्तस्मात्पुरञ्जनकथापि तु ॥तस्माज्जीवसृतिज्ञप्त्यै पुरञ्जनकथां मुनिः ।नारदोऽश्रावयद्विद्वान्नृपं प्राचीनबर्हिषम् ॥प्रायस्तु तत्कथा जीवे स्थिता प्रत्येकशोऽपि तु ।प्रत्येकं यत्तु युज्येत तदुन्नेयं यथा तथा ॥उक्तं भागवतेऽप्येतत्पुराणे यावदिष्यते ।प्रत्येकशस्तु जीवानां तदन्यत्तस्य केवलम्॥ इति तन्त्रभागवते ॥ १०,१३ ॥
यदृच्छयाऽऽगतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् ।भृत्यैर्दशभिरायान्तीमेकैकशतनायकैः ॥ २० ॥
तेषां परिवृढो राजन् सर्वेषां बलिमुद्वहन् ।सस्त्रीकाणां सखा तस्या बहुरूपोऽग्रणीः स्त्रियः ॥ २१ ॥
नारद उवाच–इति तौ दम्पती तत्र समुह्य समयं मिथः ।तां प्रविश्य पुरीं राजन् मुमुदाते शतं समाः ॥ ४४ ॥'ये पुरञ्जनभृत्याद्या भार्याद्याः सर्व एव च ।तेऽपि मानुषबुध्द्यादेर्विज्ञेया अभिमानिनः ॥गायत्र्याद्यास्तु देवानां तेऽपि चैतेषु संस्थिताः ।अलक्ष्मीद्वापराद्यास्तु आसुरास्तेऽपि मानुषाः॥ इति च ॥ २०,२१,४४ ॥
पितृभूर्नृप पुर्या द्वा दक्षिणेन पुरञ्जनः ।राष्ट्रं दक्षिणपाञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५१ ॥
देवभूर्नाम पुर्या द्वा उत्तरेण पुरञ्जनः ।राष्ट्रमुत्तरपाञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५२ ॥
'दक्षिणश्रोत्रमार्गेण देवलोकं व्रजत्यसौ ।वामश्रोत्रेण पितृणामिति वेदविदो विदुः॥ इति प्रवृत्तितन्त्रे ॥ ५१,५२ ॥