Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S14: Difference between revisions
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १३ ॥}} | |||
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Revision as of 05:35, 8 April 2026
चतुर्दशोऽध्यायः
पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये ।आत्मानं च परं ब्रह्म सर्वत्र सदसन्मये ॥ ४ ॥
आत्मनि परमात्मनि ॥ ४ ॥
नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् ।अतिवादान् त्यजेत् तर्कान् पक्षं कञ्चिन्न संश्रयेत् ॥ ७ ॥
न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् ।न व्याख्यामुपजीवेत नारम्भानारभेत् क्वचित् ॥ ८ ॥
अप्रयोजकं पक्षं न संश्रयेत् ।'नाप्रयोजनपक्षी स्यान्न वृथा शिष्यबन्धकृत् ।न चोदासीनशास्त्राणि न विरुद्धानि चाभ्यसेत् ॥'न व्याख्ययोपजीवेत न निषिद्धान्समाचरेत् ।एवं भूतो यतिर्याति तदेकशरणो हरिम्॥ इति समाचारे ॥ ७-८ ॥
विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे ।मनो वैकारिके हुत्वा मायायां वै जुहोत्यमुम् ॥ ४४ ॥
चित्ते मनोवृत्त्यभिमानिनि । अर्थविभ्रमे अर्थेषु भ्रममाणे ।'चित्ताख्याग्नेरधीनं हि जगदेतद्विचिन्तयेत् ।मनोनामेन्द्रवशगमग्निं च प्रविचिन्तयेत्॥ इत्यादि च ॥ ४४ ॥
स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् ।व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्प्रियः ॥ ४६ ॥
'अशास्त्रीयत्वान्मुखतः शास्त्रापेतमिदं विदुः ।शास्त्रनिर्णयगम्यत्वाच्छास्त्रीयमभिधीयते॥ इति च ॥