Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S3: Difference between revisions
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व्यक्त्यपेक्षया जगृह इति । तथा हि तन्त्रभागवते–'ओयमनुपादेयं यद्रूपं नित्यमव्ययम् | व्यक्त्यपेक्षया जगृह इति । तथा हि तन्त्रभागवते– | ||
'ओयमनुपादेयं यद्रूपं नित्यमव्ययम् । | |||
स एवापेक्ष्य रूपाणां व्यक्तिमेव जनार्दनः ॥ | |||
अगृह्णाद् व्यसृजच्चेति कृष्णरामादिकां तनुम् । | |||
पठ्यते भगवानीशो मूढबुद्धिव्यपेक्षया ॥ | |||
तमसा ह्युपगूढस्य यत्तमःपानमीशितुः । | |||
एतत्पुरुषरूपस्य ग्रहणं समुदीर्यते ॥ | |||
कृष्णरामादिरूपाणां लोकव्यक्तिमपेक्षया''। इति ॥ | |||
महदादिभिः सम्भूतं अन्तर्गतमहदादि । न महदादिशरीरम् । 'यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्ति''इति हि श्रुतिः । | |||
'यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशांपते । | |||
सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ | |||
ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् । | |||
भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च । | |||
भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम''। इति मोक्षधर्मे । | |||
'नाऽसीदहो न रात्रिरासीन्नासदासीत् तन्महद्वपुस्तदा | |||
अभवद्विश्वरूपं सा विश्वरूपस्य रजनी''इति भाल्लवेयश्रुतिः । | |||
'न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा । | |||
न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपोऽच्युतो विभुः''। इति वाराहे । | |||
'सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः । | |||
हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित् ॥ | |||
परमानन्दसन्दोहा ज्ञानमात्राश्च सर्वतः । | |||
सर्वे सर्वगुणैः पूर्णाः सर्वे भेदविवर्जिताः ॥ | |||
अन्यूनानधिकाश्चैव गुणैः सर्वैश्च सर्वतः । | |||
देहिदेहभिदा चात्र नेश्वरे विद्यते क्वचित् ॥ | |||
तत्स्वीकारादिशब्दस्तु हस्तस्वीकारवत् स्मृतः । | |||
वैलक्षण्यान्न वा तत्र ज्ञानमात्रार्थमीरितम् ॥ | |||
केवलैश्वर्यसंयोगादीश्वरः प्रकृतेः परः ॥ | |||
जातो गतस्त्विदं रूपं तदित्यादि व्यवह्रियते''। इति महावाराहे । | |||
'एकमेवाद्वितीयं'''नेह नानास्ति किञ्चन'''एवं धर्मान् पृथक् पश्यन्'' | |||
इत्यादि च । | |||
तस्यैवास्थूलत्वाद्यैश्वर्ययोगात् । | |||
तथा च कौर्मे– | |||
'अस्थूलश्चानणुश्चैव स्थूलोऽणुश्चैव सर्वतः । | |||
अवर्णः सर्वतः प्रोक्तः श्यामो रक्तान्तलोचनः ॥ | |||
ऐश्वर्ययोगाद्भगवान् विरुद्धार्थोऽभिधीयते । | |||
तथाऽपि दोषाः परमे नैवाऽहार्याः कथञ्चन ॥ | |||
गुणा विरुद्धा अपि तु समाहार्याश्च सर्वतः ।''इति । | |||
विष्णुधर्मोत्तरे च– | |||
'गुणाः सर्वेऽपि युज्यन्ते ह्यैश्वर्यात् पुरुषोत्तमे । | |||
दोषाः कथञ्चिन्नैवात्र युज्यन्ते परमो हि सः ॥ | |||
गुणदोषौ माययैव केचिदाहुरपण्डिताः । | |||
न तत्र माया मायी वा तदीयौ तौ कुतो ह्यतः ॥ | |||
तस्मान्न मायया सर्वं सर्वमैश्वर्यसम्भवम् । | |||
अमायो हीश्वरो यस्मात् तस्मात् तं परमं विदुः''॥ इति ॥ १ ॥ | |||
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यस्यावयवसंस्थानैः । 'नाभ्या आसीदन्तरिक्षम्''इत्यादि । सत्त्वं साधुगुणवत्त्वं ज्ञानबलरूपं वा ।'बलज्ञानसमाहारः सत्त्वमित्यभिधीयते''इति मात्स्ये ॥ ३ ॥ | यस्यावयवसंस्थानैः । 'नाभ्या आसीदन्तरिक्षम्''इत्यादि । सत्त्वं साधुगुणवत्त्वं ज्ञानबलरूपं वा । | ||
'बलज्ञानसमाहारः सत्त्वमित्यभिधीयते''इति मात्स्ये ॥ ३ ॥ | |||
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निधानं अत्रैकीभवन्त्यन्त इति । अंशांशेन सामर्थ्यैकदेशेन | निधानं अत्रैकीभवन्त्यन्त इति । अंशांशेन सामर्थ्यैकदेशेन । | ||
ब्राह्मे च– 'यच्छक्त्यैकांशसम्भूतं जगदेतच्चराचरम्''इति ॥ ५ ॥ | |||
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'कुमारो नाम भगवान् स्वयं स्वस्मादजायत | 'कुमारो नाम भगवान् स्वयं स्वस्मादजायत । | ||
दिदेश ब्रह्मणे ब्रह्म ब्रह्मचर्ये स्थितो विभुः ॥ | |||
यस्मात् सनत्कुमारश्च ब्रह्मचर्यमपालयत् । | |||
यः स्थाणोः स्थाणुतां प्रादाद् भगवानव्ययो हरिः''। इति ब्राह्मे ॥ ६ ॥ | |||
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'अवतारस्तृतीयोऽस्य देवर्षिः प्रथितो दिवि | 'अवतारस्तृतीयोऽस्य देवर्षिः प्रथितो दिवि । | ||
महिदासस्त्वैतरेयो यस्तन्त्रं नारदेऽवदत्''। इति च ॥ ८ ॥ | |||
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धर्मकलासर्गः धर्मे स्वांशावतारः । लोकदृष्ट्याऽऽत्मशमोपेतम् ॥ ९ ॥ | धर्मकलासर्गः धर्मे स्वांशावतारः । लोकदृष्ट्याऽऽत्मशमोपेतम् ॥ ९ ॥ | ||
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तन्त्रं साङ्ख्यं वेदानुसारि | तन्त्रं साङ्ख्यं वेदानुसारि । | ||
पाद्मे च– | |||
'कपिलो वासुदेवाख्यस्तन्त्रं साङ्ख्यं जगाद ह । | |||
ब्रह्मादिभ्यश्च देवेभ्यो भृग्वादिभ्यस्तथैव च ॥ | |||
तथैवाऽऽसुरये सर्ववेदार्थैरुपबृंहितम् । | |||
सर्ववेदविरुद्धं च कपिलोऽन्यो जगाद ह ॥ | |||
साङ्ख्यमाऽऽसुरयेऽन्यस्मै कुतर्कपरिबृंहितम्''। इति ॥ १० ॥ | |||
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आन्वीक्षिकीं तत्त्वविद्याम्–'आन्वीक्षिकी कुतर्काख्या तथैवाऽऽन्वीक्षिकी परा''इति मात्स्ये ॥ ११ ॥ | आन्वीक्षिकीं तत्त्वविद्याम्– | ||
'आन्वीक्षिकी कुतर्काख्या तथैवाऽऽन्वीक्षिकी परा''इति मात्स्ये ॥ ११ ॥ | |||
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पृथुशरीराविष्टरूपम्–'आविवेश पृथुं देवः शङ्खी चक्री चतुर्भुजः''इति पाद्मे | पृथुशरीराविष्टरूपम्– | ||
'आविवेश पृथुं देवः शङ्खी चक्री चतुर्भुजः''इति पाद्मे । | |||
उश इच्छायाम् । सत्यकामः ॥ १४ ॥ | |||
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रामात् पूर्वमप्यस्ति व्यासावतारः–'तृतीयं युगमारभ्य व्यासो बहुषु जज्ञिवान्''इति कौर्मे ॥ २१ ॥ | रामात् पूर्वमप्यस्ति व्यासावतारः– | ||
'तृतीयं युगमारभ्य व्यासो बहुषु जज्ञिवान्''इति कौर्मे ॥ २१ ॥ | |||
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आवेशो बलभद्रे ।'शङ्खचक्रभृदीशेशः श्वेतवर्णो महाभुजः | आवेशो बलभद्रे । | ||
'शङ्खचक्रभृदीशेशः श्वेतवर्णो महाभुजः । | |||
आविष्टः श्वेतकेशात्मा शेषांशं रोहिणीसुतम्''। | |||
इति महावाराहे ॥ २३ ॥ | |||
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'मोहनार्थं दानवानां बालरूपं पथि स्थितम् | 'मोहनार्थं दानवानां बालरूपं पथि स्थितम् । | ||
पुत्रं तं कल्पयामास मूढबुद्धिर्जिनः स्वयम् ॥ | |||
ततः सम्मोहयामास जिनाद्यानसुरांशकान् । | |||
भगवान् वाग्भिरुग्राभिरहिंसावाचिभिर्हरिः''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २४ ॥ | |||
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विदासिनः उन्नतात् भिन्नाद् वा । 'त्रिविधाः पुरुषा लोके नीचमध्य-विदासिनः''इति ब्राह्मे ।'चतुर्धा वर्णरूपेण जगदेतद् विदासितम्''इति च ॥ २६ ॥ | विदासिनः उन्नतात् भिन्नाद् वा । 'त्रिविधाः पुरुषा लोके नीचमध्य-विदासिनः''इति ब्राह्मे । | ||
'चतुर्धा वर्णरूपेण जगदेतद् विदासितम्''इति च ॥ २६ ॥ | |||
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एते प्रोक्तावताराः । मूलरूपी कृष्णः स्वयमेव ।'जीवास्तत्प्रतिबिम्बांशा वराहाद्याः स्वयं हरिः | एते प्रोक्तावताराः । मूलरूपी कृष्णः स्वयमेव । | ||
'जीवास्तत्प्रतिबिम्बांशा वराहाद्याः स्वयं हरिः । | |||
दृश्यते बहुधा विष्णुरैश्वर्यादेक एव तु''। इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ २८ ॥ | |||
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एतत् जडरूपम् ।'नारायणवराहाद्याः परमं रूपमीशितुः | एतत् जडरूपम् । | ||
'नारायणवराहाद्याः परमं रूपमीशितुः । | |||
जैवं तु प्रतिबिम्बाख्यं जडमारोपितं हरेः ॥ | |||
एवं हि त्रिविधं तस्य रूपं विष्णोर्महात्मनः''। इति पाद्मे ॥ ३० ॥ | |||
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दृश्यत्वं जडरूपत्वम् ।'अविज्ञाय परं देहमानन्दात्मानमव्ययम् | दृश्यत्वं जडरूपत्वम् । | ||
'अविज्ञाय परं देहमानन्दात्मानमव्ययम् । | |||
आरोपयन्ति जनिमत् पञ्चभूतात्मकं जडम्''। इति स्कान्दे ॥ ३१ ॥ | |||
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अतः परं जडेश्वररूपयोः परम् । अव्यूढगुणबृंहितंं अनादिकाले कदाचिदप्य-नपगतसत्वादिगुणबृंहितम् । अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | अतः परं जडेश्वररूपयोः परम् । अव्यूढगुणबृंहितंं अनादिकाले कदाचिदप्य-नपगतसत्वादिगुणबृंहितम् । अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | ||
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अविद्यया जीवे कृते परमेश्वरे प्रतिषिद्धे इति ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥ | अविद्यया जीवे कृते परमेश्वरे प्रतिषिद्धे इति ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥ | ||
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विशारदः परमेश्वरः । तन्मतिः माया । यदा नैनं शोचयामीत्युपरता तदा सम्पन्न एव ॥ ३४ ॥ | विशारदः परमेश्वरः । तन्मतिः माया । यदा नैनं शोचयामीत्युपरता तदा सम्पन्न एव ॥ ३४ ॥ | ||
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'अप्रयत्नात् स्वतन्त्रत्वात् फलानां च विवर्जनात् | 'अप्रयत्नात् स्वतन्त्रत्वात् फलानां च विवर्जनात् । | ||
क्रियायाश्च स्वरूपत्वादकर्तेति च तं विदुः ॥ | |||
कर्तृत्वं भ्रान्तिजं प्राहुरतत्तत्त्वविदो जनाः । | |||
ऐश्वर्यजं तु कर्तृत्वं सम्यक् तत्तत्त्ववेदिनः''। इति पाद्मे ३५ ॥ | |||
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'धर्मः कं शरणं गतः''इत्यस्य तमेव व्यासरूपिणमिति परिहार उच्यते– 'इदं भागवतम्''इत्यादिना ॥ ४० ॥ | 'धर्मः कं शरणं गतः''इत्यस्य तमेव व्यासरूपिणमिति परिहार उच्यते– 'इदं भागवतम्''इत्यादिना ॥ ४० ॥ | ||
Revision as of 16:45, 9 April 2026
'ओयमनुपादेयं यद्रूपं नित्यमव्ययम् । स एवापेक्ष्य रूपाणां व्यक्तिमेव जनार्दनः ॥ अगृह्णाद् व्यसृजच्चेति कृष्णरामादिकां तनुम् । पठ्यते भगवानीशो मूढबुद्धिव्यपेक्षया ॥ तमसा ह्युपगूढस्य यत्तमःपानमीशितुः । एतत्पुरुषरूपस्य ग्रहणं समुदीर्यते ॥ कृष्णरामादिरूपाणां लोकव्यक्तिमपेक्षया। इति ॥ महदादिभिः सम्भूतं अन्तर्गतमहदादि । न महदादिशरीरम् । 'यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तिइति हि श्रुतिः । 'यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशांपते । सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् । भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च । भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम। इति मोक्षधर्मे । 'नाऽसीदहो न रात्रिरासीन्नासदासीत् तन्महद्वपुस्तदा अभवद्विश्वरूपं सा विश्वरूपस्य रजनीइति भाल्लवेयश्रुतिः । 'न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा । न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपोऽच्युतो विभुः। इति वाराहे । 'सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः । हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित् ॥ परमानन्दसन्दोहा ज्ञानमात्राश्च सर्वतः । सर्वे सर्वगुणैः पूर्णाः सर्वे भेदविवर्जिताः ॥ अन्यूनानधिकाश्चैव गुणैः सर्वैश्च सर्वतः । देहिदेहभिदा चात्र नेश्वरे विद्यते क्वचित् ॥ तत्स्वीकारादिशब्दस्तु हस्तस्वीकारवत् स्मृतः । वैलक्षण्यान्न वा तत्र ज्ञानमात्रार्थमीरितम् ॥ केवलैश्वर्यसंयोगादीश्वरः प्रकृतेः परः ॥ जातो गतस्त्विदं रूपं तदित्यादि व्यवह्रियते। इति महावाराहे । 'एकमेवाद्वितीयंनेह नानास्ति किञ्चनएवं धर्मान् पृथक् पश्यन् इत्यादि च । तस्यैवास्थूलत्वाद्यैश्वर्ययोगात् । तथा च कौर्मे– 'अस्थूलश्चानणुश्चैव स्थूलोऽणुश्चैव सर्वतः । अवर्णः सर्वतः प्रोक्तः श्यामो रक्तान्तलोचनः ॥ ऐश्वर्ययोगाद्भगवान् विरुद्धार्थोऽभिधीयते । तथाऽपि दोषाः परमे नैवाऽहार्याः कथञ्चन ॥ गुणा विरुद्धा अपि तु समाहार्याश्च सर्वतः ।इति । विष्णुधर्मोत्तरे च– 'गुणाः सर्वेऽपि युज्यन्ते ह्यैश्वर्यात् पुरुषोत्तमे । दोषाः कथञ्चिन्नैवात्र युज्यन्ते परमो हि सः ॥ गुणदोषौ माययैव केचिदाहुरपण्डिताः । न तत्र माया मायी वा तदीयौ तौ कुतो ह्यतः ॥ तस्मान्न मायया सर्वं सर्वमैश्वर्यसम्भवम् ।
अमायो हीश्वरो यस्मात् तस्मात् तं परमं विदुः॥ इति ॥ १ ॥
दिदेश ब्रह्मणे ब्रह्म ब्रह्मचर्ये स्थितो विभुः ॥ यस्मात् सनत्कुमारश्च ब्रह्मचर्यमपालयत् ।
यः स्थाणोः स्थाणुतां प्रादाद् भगवानव्ययो हरिः। इति ब्राह्मे ॥ ६ ॥
पाद्मे च– 'कपिलो वासुदेवाख्यस्तन्त्रं साङ्ख्यं जगाद ह । ब्रह्मादिभ्यश्च देवेभ्यो भृग्वादिभ्यस्तथैव च ॥ तथैवाऽऽसुरये सर्ववेदार्थैरुपबृंहितम् । सर्ववेदविरुद्धं च कपिलोऽन्यो जगाद ह ॥
साङ्ख्यमाऽऽसुरयेऽन्यस्मै कुतर्कपरिबृंहितम्। इति ॥ १० ॥
'आविवेश पृथुं देवः शङ्खी चक्री चतुर्भुजःइति पाद्मे ।
उश इच्छायाम् । सत्यकामः ॥ १४ ॥
'शङ्खचक्रभृदीशेशः श्वेतवर्णो महाभुजः । आविष्टः श्वेतकेशात्मा शेषांशं रोहिणीसुतम्।
इति महावाराहे ॥ २३ ॥
पुत्रं तं कल्पयामास मूढबुद्धिर्जिनः स्वयम् ॥ ततः सम्मोहयामास जिनाद्यानसुरांशकान् ।
भगवान् वाग्भिरुग्राभिरहिंसावाचिभिर्हरिः॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २४ ॥
'जीवास्तत्प्रतिबिम्बांशा वराहाद्याः स्वयं हरिः ।
दृश्यते बहुधा विष्णुरैश्वर्यादेक एव तु। इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ २८ ॥
'नारायणवराहाद्याः परमं रूपमीशितुः । जैवं तु प्रतिबिम्बाख्यं जडमारोपितं हरेः ॥
एवं हि त्रिविधं तस्य रूपं विष्णोर्महात्मनः। इति पाद्मे ॥ ३० ॥
'अविज्ञाय परं देहमानन्दात्मानमव्ययम् ।
आरोपयन्ति जनिमत् पञ्चभूतात्मकं जडम्। इति स्कान्दे ॥ ३१ ॥
क्रियायाश्च स्वरूपत्वादकर्तेति च तं विदुः ॥ कर्तृत्वं भ्रान्तिजं प्राहुरतत्तत्त्वविदो जनाः ।
ऐश्वर्यजं तु कर्तृत्वं सम्यक् तत्तत्त्ववेदिनः। इति पाद्मे ३५ ॥