Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S2: Difference between revisions
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एष हरिः । यदपार्थैर्ध्यायति । तत्रार्थान्न विन्दते ॥ २ ॥ | एष हरिः । यदपार्थैर्ध्यायति । तत्रार्थान्न विन्दते ॥ २ ॥ | ||
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'सर्वनामा यतो विष्णुस्तदन्यार्थान्न तु स्मरेत् | 'सर्वनामा यतो विष्णुस्तदन्यार्थान्न तु स्मरेत् । | ||
स्मरंस्तु यावदर्थः स्यादन्यथा स्वात्महा स्मृतः''। इति ब्रह्माण्डे ॥३॥ | |||
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'एतमितः प््रोत्याभिसम्भविताऽस्मि''इति नियतार्थः ॥ ६ ॥ | 'एतमितः प््रोत्याभिसम्भविताऽस्मि''इति नियतार्थः ॥ ६ ॥ | ||
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'यथैकस्तु बहून्सुप्तानसुप्तः पश्यति प्रभुः | 'यथैकस्तु बहून्सुप्तानसुप्तः पश्यति प्रभुः । | ||
एवमीशो बहून् जीवानज्ञान्पश्यति नित्यदृक्''। इति व्योमसंहितायाम् । | |||
'स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति''। इति च । | |||
'यथेष्टभवनाद्विष्णुरनुभूः परिकीर्तितः । | |||
उदधिः कर्मणामीशः सर्वः पूर्णगुणो यतः ॥ | |||
सत्यः केवलसारत्वान्नियमो नियतेरजः''। इति बृहत्संहितायाम् ॥७ ॥ | |||
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चिन्तामयं चिन्ताप्रधानम् ।'यस्मात्सञ्चिन्तितो विष्णुश्चिन्तितं प्रददात्यजः | चिन्तामयं चिन्ताप्रधानम् । | ||
'यस्मात्सञ्चिन्तितो विष्णुश्चिन्तितं प्रददात्यजः । | |||
तस्माच्चिन्तामयं देवं वदन्ति ज्ञानचक्षुषः''। इति च ॥ १३ ॥ | |||
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स्थवीयः पातालमेतस्येत्यादि ॥ १५ ॥ | स्थवीयः पातालमेतस्येत्यादि ॥ १५ ॥ | ||
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'भक्त्या प्राणं वशं नीत्वा जितप्राणो भवत्युत''। इति षाड्गुण्ये ॥ १६ ॥ | 'भक्त्या प्राणं वशं नीत्वा जितप्राणो भवत्युत''। इति षाड्गुण्ये ॥ १६ ॥ | ||
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'जीवस्थो भगवान्विष्णुः क्षेत्रज्ञ इति गीयते | 'जीवस्थो भगवान्विष्णुः क्षेत्रज्ञ इति गीयते । | ||
देहस्थोऽपि स एवात्मा व्याप्तोऽप्यात्मेति भण्यते''। इति तत्त्वनिर्णये । | |||
'हरौ हरेर्भवेन्नीतिस्तदेकत्वस्य चिन्तनम् । | |||
अन्यत्र तन्नियम्यादिचिन्तनं नीतिरुच्यते''। इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ १७ ॥ | |||
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कालो वायुः ।'हरिश्च प्रकृतिश्चैव ब्रह्मवायू तथैव च | कालो वायुः । | ||
'हरिश्च प्रकृतिश्चैव ब्रह्मवायू तथैव च । | |||
सुपर्णशेषरुद्राश्च शक्रः सूर्ययमावपि ॥ | |||
अग्निर्यमानुजश्चैव कालशब्देरिताः क्रमात् । | |||
पूर्वोक्तास्त्वपरोक्तानां प्रभवः सर्वशो मताः''।इत्युद्दामसंहितायाम् ॥ १८ ॥ | |||
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उदानगत्या ब्रह्मनाड्या । 'अथैकयोर्ध्व उदानः''इति श्रुतेः ।'प्राणापानाविडायां च पिङ्गलायां च वर्ततः | उदानगत्या ब्रह्मनाड्या । 'अथैकयोर्ध्व उदानः''इति श्रुतेः । | ||
'प्राणापानाविडायां च पिङ्गलायां च वर्ततः । | |||
व्यानः सन्धिषु सर्वत्र उदानो ब्रह्मनाडिगः ॥ | |||
सर्वत्रैव समानस्तु समं चरति सर्वगः''। इति भारते ॥ | |||
परं चिन्तयन् ॥ २१,२२ ॥॥ | |||
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'चिन्मात्राणीन्द्रियाण्याहुर्मुक्तानामन्यदैव तु | 'चिन्मात्राणीन्द्रियाण्याहुर्मुक्तानामन्यदैव तु । | ||
तान्येव जडयुक्तानि ह्यभिन्नानि स्वरूपतः''। इति ब्राह्मे ॥ | |||
पवनस्यापि अन्तरात्मा यः तम् । पवनश्चान्तरात्मा चेति वा । | |||
'ईयुस्त्रीन् कर्मणा लोकान् ज्ञानेनैव तदुत्तरान् । | |||
तत्र मुख्या हरिं यान्ति तदन्ये वायुमेव तु ॥ | |||
अपक्वा ये न ते यान्ति वायुं वा हरिमेव वा । | |||
स्थानमात्राश्रितास्ते तु पुनर्जनिविवर्जिताः''। इति ब्रह्मतर्के ॥ २३,२४ ॥ | |||
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हरेः शैंशुमारं चक्रम् । वैश्वानरोदस्तात् ।'वैश्वानरे द्युनद्यां वा सूर्ये वा देह एव वा | हरेः शैंशुमारं चक्रम् । वैश्वानरोदस्तात् । | ||
'वैश्वानरे द्युनद्यां वा सूर्ये वा देह एव वा । | |||
विधूय सर्वपापानि यान्ति किंस्तुघ्नकेशवम्''। इति ब्रह्माण्डे ॥ २५ ॥ | |||
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'पितृयानं देवयानं ब्रह्मयानमिति त्रिधा | 'पितृयानं देवयानं ब्रह्मयानमिति त्रिधा । | ||
गच्छन्वैश्वानरं याति तस्मान्मार्गः स ईरितः''॥ २६ ॥ | |||
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'दक्षिणाः पिङ्गलाः सर्वा इडा वामाः प्रकीर्तिताः | 'दक्षिणाः पिङ्गलाः सर्वा इडा वामाः प्रकीर्तिताः । | ||
नाड्योऽथ मध्यमा प्रोक्ता सुषुम्ना वेदपारगैः''। इति भागवततन्त्रे । | |||
'देवयानस्यमार्गस्था अहःशब्दाभिसञ्ज्ञिताः । | |||
पितृयानस्यमार्गस्था रात्रिशब्दाह्वया मताः''। इति बृहत्तन्त्रे ॥ | |||
'शतायुर्मरणं चैव कालिकं परमावृतिः''। इत्यभिधाने ॥ | |||
पिङ्गलाभिः शतायुषा अहःसञ्ज्ञं देवयानम् इति । इडाभी रात्रिसञ्ज्ञं पितृयानम् । | |||
'विषुवत्ता ब्रह्मयानं विशेषेण सुखं यतः । | |||
पिङ्गला देवयानं स्यात्पिङ्गाख्यसुखदं यतः ॥ | |||
इडाऽन्नदानात्पितृणामेवं मार्गाः प्रकीर्तिताः''। इति ब्रह्मतर्के ॥ २७ ॥ | |||
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'अशेषजगदाधारः शिंशुमारो हरिः परः | 'अशेषजगदाधारः शिंशुमारो हरिः परः । | ||
सर्वे ब्रह्मविदो नत्वा तं यान्ति परमं पदम्''। इति ब्रह्माण्डे ॥ | |||
तद्विष्णोर्विश्वाधारं रूपं प्रतिपद्य यत्र कल्पायुषः तं महर्लोकं उपैति । | |||
'मन्वन्तरायुषः स्वर्ग्या महर्लोके तु काल्पिकाः । | |||
आब्रह्मणो जनाद्यास्तु महर्लोकेऽपि ये वराः''। इति ब्राह्मे ॥ २८ ॥ | |||
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ऋते सत्यलोके । अनिदंविदाम् अब्रह्मविदाम् । दुरन्तदुःखं च प्रभवश्च ।'सर्वदुःखविहीना ये मुक्ताः प्रायस्तु तादृशाः | ऋते सत्यलोके । अनिदंविदाम् अब्रह्मविदाम् । दुरन्तदुःखं च प्रभवश्च । | ||
'सर्वदुःखविहीना ये मुक्ताः प्रायस्तु तादृशाः । | |||
अमुक्तास्तु जनाद्येषु विशेषेण तु सत्यगाः''। इति वाराहे ॥ | |||
'विष्णोर्लोकं तदैवैके यान्ति कालान्तरे परे । | |||
आज्ञयैव हरेः केचिदपूर्तेः केचिदञ्जसा । | |||
विहृत्यैवान्यलोकेषु मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह''। इति वामने ॥ ३० ॥ | |||
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ब्रह्मणा सह । विशेषं पृथिवीम् । तेनात्मना पृथिव्यात्मना । ज्योतिर्मय अग्निप्रधानः ।'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः''इति परमात्मसदृशं किञ्चित् ।'ज्ञानिनः प्रलये सर्वे ब्रह्मणा सह पार्थिवम् | ब्रह्मणा सह । विशेषं पृथिवीम् । तेनात्मना पृथिव्यात्मना । ज्योतिर्मय अग्निप्रधानः । | ||
'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः''इति परमात्मसदृशं किञ्चित् । | |||
'ज्ञानिनः प्रलये सर्वे ब्रह्मणा सह पार्थिवम् । | |||
परमात्मानमाविश्य वारिस्थं तत्समन्विताः ॥ | |||
अग्निस्थं तद्युताश्चैव तेन नीताश्च वायुगम् । | |||
नभोगतं तेन नीता मनःस्थं तद्युतास्तथा ॥ | |||
ततो बुद्धिस्थमीशेशं ततोऽहङ्कारगं हरिम् । | |||
ततो विज्ञाननामानं महत्तत्त्वगतं हरिम् ॥ | |||
तत आनन्दनामानमव्यक्तस्थं जनार्दनम् । | |||
प्राप्य नावृत्तिमायान्ति शान्तिभूता निरामयाः ॥ | |||
येषां पदान्तरापेक्षा वाय्वादीनां महात्मनाम् । | |||
आवृत्य ते पुनर्यान्ति ज्ञानिनोऽपि निरामयाः । | |||
अनावृत्तिमसंमूढाः परानन्दैकभागिनः''। इति ब्रह्मतर्के ॥ | |||
'भूम्यब्गमन्ननामानं प्राणमग्न्यादिसंस्थितम् । | |||
मानसं मन आदिस्थं विज्ञानं महति स्थितम् ॥ | |||
आनन्दमव्यक्तगतं क्रमशो यान्ति देवताः । | |||
ब्रह्माद्याः केचिदेवात्र तदन्ये क्रमशोऽपरान्''। | |||
इति बृहत्तन्त्रे ॥ ३१ ॥ | |||
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'पञ्चेन्द्रियैर्ये विषया एष्टव्याः सर्वतो वराः | 'पञ्चेन्द्रियैर्ये विषया एष्टव्याः सर्वतो वराः । | ||
मानसांश्चाखिलान् प्राप्य मुक्तौ मोदन्ति देवताः । | |||
तथोद्रिक्तनिजानन्दा नित्यानन्दा असंवृताः''। इति षाड्गुण्ये ॥ ३२ ॥ | |||
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| text = | | text = | ||
भूतसूक्ष्मेन्द्रियैश्च सह अनादिर्भगवानाकाशगो मनोमयं याति । नादवत्त्वात् सनातनः ।'नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः''। इति मोक्षधर्मे | भूतसूक्ष्मेन्द्रियैश्च सह अनादिर्भगवानाकाशगो मनोमयं याति । नादवत्त्वात् सनातनः । | ||
'नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः''। इति मोक्षधर्मे ॥ | |||
विविधकार्ययुक्तं विकार्यम् । देवमयं देवप्रधानम् । | |||
'मनःस्थितो हरिर्नित्यं सर्वदेवेषु संस्थितः । | |||
देवप्रधानकाल्लोकान्करोत्यनुगतः सदा''। इति वाराहे ॥ | |||
भूतसूक्ष्माणि पञ्चभूतानि जीवाश्च । | |||
'पञ्चभूतैश्च शब्दाद्यैरिन्द्रियैर्जीवराशिभिः । | |||
युक्त आकाशगो विष्णुर्मनःस्थमुपगच्छति''। इति वामने । | |||
योऽसावनादिर्मनोमयस्तमिति वा । विपर्ययश्चेत्तस्यैव गन्तृत्वमिति ज्ञापयितुम् । मतिस्थेन तेन मनःस्थेन च सह विज्ञानतत्वं याति ॥३३॥ | |||
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गुणसन्निरोधं निर्गुणं वासुदेवम् । वासुदेवे एतां गतिं गतो न विषज्जते ।'वासुदेवाश्रिता देवा ब्रह्माद्या मुक्तबन्धनाः | गुणसन्निरोधं निर्गुणं वासुदेवम् । वासुदेवे एतां गतिं गतो न विषज्जते । | ||
'वासुदेवाश्रिता देवा ब्रह्माद्या मुक्तबन्धनाः । | |||
भेददृष्ट्याभिमानेन चावृत्तिं नैव यान्ति ते ॥ | |||
भुञ्जते तु पृथग्भोगान्नानन्दं तत्स्वरूपकम् । | |||
स्वरूपं च पृथक्तेषामाविष्टग्रहवद्भवेत्''इति ब्रह्माण्डे ॥ ३४,३५ ॥ | |||
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यद् भगवानाह । अतो भागवताख्याद्ग्रन्थात् शिवः पन्था न ॥ ३६ ॥ | यद् भगवानाह । अतो भागवताख्याद्ग्रन्थात् शिवः पन्था न ॥ ३६ ॥ | ||
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तद्भागवतं पुराणम् अपश्यत् ।'नित्यज्ञानेन सिद्धं च पुनः पुनरवेक्षते | तद्भागवतं पुराणम् अपश्यत् । | ||
'नित्यज्ञानेन सिद्धं च पुनः पुनरवेक्षते । | |||
लीलयैव हरिर्देवो दुष्टानां मोहनाय च''। | |||
इति ब्रह्मतर्के ॥ ३७ ॥ | |||
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लक्षितश्चास्मिन् पुराणे बुद्ध्यादीनां पारवश्यदर्शनादन्यो नियन्ताऽस्तीति ।'समाधावसमाधौ च निःस्वतन्त्रस्य देहिनः | लक्षितश्चास्मिन् पुराणे बुद्ध्यादीनां पारवश्यदर्शनादन्यो नियन्ताऽस्तीति । | ||
'समाधावसमाधौ च निःस्वतन्त्रस्य देहिनः । | |||
अन्यो नियन्ता भगवान्वासुदेवः परः प्रभुः''इति ब्रह्मतर्के ॥ ३८ ॥ | |||
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यस्मात् भगवतैष एवोक्तः तस्मात् स एव श्रोतव्यादिः ॥ ३९ ॥ | यस्मात् भगवतैष एवोक्तः तस्मात् स एव श्रोतव्यादिः ॥ ३९ ॥ | ||
Revision as of 16:45, 9 April 2026
एवमीशो बहून् जीवानज्ञान्पश्यति नित्यदृक्। इति व्योमसंहितायाम् । 'स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति। इति च । 'यथेष्टभवनाद्विष्णुरनुभूः परिकीर्तितः । उदधिः कर्मणामीशः सर्वः पूर्णगुणो यतः ॥
सत्यः केवलसारत्वान्नियमो नियतेरजः। इति बृहत्संहितायाम् ॥७ ॥
'यस्मात्सञ्चिन्तितो विष्णुश्चिन्तितं प्रददात्यजः ।
तस्माच्चिन्तामयं देवं वदन्ति ज्ञानचक्षुषः। इति च ॥ १३ ॥
देहस्थोऽपि स एवात्मा व्याप्तोऽप्यात्मेति भण्यते। इति तत्त्वनिर्णये । 'हरौ हरेर्भवेन्नीतिस्तदेकत्वस्य चिन्तनम् ।
अन्यत्र तन्नियम्यादिचिन्तनं नीतिरुच्यते। इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ १७ ॥
'हरिश्च प्रकृतिश्चैव ब्रह्मवायू तथैव च । सुपर्णशेषरुद्राश्च शक्रः सूर्ययमावपि ॥ अग्निर्यमानुजश्चैव कालशब्देरिताः क्रमात् ।
पूर्वोक्तास्त्वपरोक्तानां प्रभवः सर्वशो मताः।इत्युद्दामसंहितायाम् ॥ १८ ॥
'प्राणापानाविडायां च पिङ्गलायां च वर्ततः । व्यानः सन्धिषु सर्वत्र उदानो ब्रह्मनाडिगः ॥ सर्वत्रैव समानस्तु समं चरति सर्वगः। इति भारते ॥
परं चिन्तयन् ॥ २१,२२ ॥॥
तान्येव जडयुक्तानि ह्यभिन्नानि स्वरूपतः। इति ब्राह्मे ॥ पवनस्यापि अन्तरात्मा यः तम् । पवनश्चान्तरात्मा चेति वा । 'ईयुस्त्रीन् कर्मणा लोकान् ज्ञानेनैव तदुत्तरान् । तत्र मुख्या हरिं यान्ति तदन्ये वायुमेव तु ॥ अपक्वा ये न ते यान्ति वायुं वा हरिमेव वा ।
स्थानमात्राश्रितास्ते तु पुनर्जनिविवर्जिताः। इति ब्रह्मतर्के ॥ २३,२४ ॥
'वैश्वानरे द्युनद्यां वा सूर्ये वा देह एव वा ।
विधूय सर्वपापानि यान्ति किंस्तुघ्नकेशवम्। इति ब्रह्माण्डे ॥ २५ ॥
नाड्योऽथ मध्यमा प्रोक्ता सुषुम्ना वेदपारगैः। इति भागवततन्त्रे । 'देवयानस्यमार्गस्था अहःशब्दाभिसञ्ज्ञिताः । पितृयानस्यमार्गस्था रात्रिशब्दाह्वया मताः। इति बृहत्तन्त्रे ॥ 'शतायुर्मरणं चैव कालिकं परमावृतिः। इत्यभिधाने ॥ पिङ्गलाभिः शतायुषा अहःसञ्ज्ञं देवयानम् इति । इडाभी रात्रिसञ्ज्ञं पितृयानम् । 'विषुवत्ता ब्रह्मयानं विशेषेण सुखं यतः । पिङ्गला देवयानं स्यात्पिङ्गाख्यसुखदं यतः ॥
इडाऽन्नदानात्पितृणामेवं मार्गाः प्रकीर्तिताः। इति ब्रह्मतर्के ॥ २७ ॥
सर्वे ब्रह्मविदो नत्वा तं यान्ति परमं पदम्। इति ब्रह्माण्डे ॥ तद्विष्णोर्विश्वाधारं रूपं प्रतिपद्य यत्र कल्पायुषः तं महर्लोकं उपैति । 'मन्वन्तरायुषः स्वर्ग्या महर्लोके तु काल्पिकाः ।
आब्रह्मणो जनाद्यास्तु महर्लोकेऽपि ये वराः। इति ब्राह्मे ॥ २८ ॥
'सर्वदुःखविहीना ये मुक्ताः प्रायस्तु तादृशाः । अमुक्तास्तु जनाद्येषु विशेषेण तु सत्यगाः। इति वाराहे ॥ 'विष्णोर्लोकं तदैवैके यान्ति कालान्तरे परे । आज्ञयैव हरेः केचिदपूर्तेः केचिदञ्जसा ।
विहृत्यैवान्यलोकेषु मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह। इति वामने ॥ ३० ॥
'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यःइति परमात्मसदृशं किञ्चित् । 'ज्ञानिनः प्रलये सर्वे ब्रह्मणा सह पार्थिवम् । परमात्मानमाविश्य वारिस्थं तत्समन्विताः ॥ अग्निस्थं तद्युताश्चैव तेन नीताश्च वायुगम् । नभोगतं तेन नीता मनःस्थं तद्युतास्तथा ॥ ततो बुद्धिस्थमीशेशं ततोऽहङ्कारगं हरिम् । ततो विज्ञाननामानं महत्तत्त्वगतं हरिम् ॥ तत आनन्दनामानमव्यक्तस्थं जनार्दनम् । प्राप्य नावृत्तिमायान्ति शान्तिभूता निरामयाः ॥ येषां पदान्तरापेक्षा वाय्वादीनां महात्मनाम् । आवृत्य ते पुनर्यान्ति ज्ञानिनोऽपि निरामयाः । अनावृत्तिमसंमूढाः परानन्दैकभागिनः। इति ब्रह्मतर्के ॥ 'भूम्यब्गमन्ननामानं प्राणमग्न्यादिसंस्थितम् । मानसं मन आदिस्थं विज्ञानं महति स्थितम् ॥ आनन्दमव्यक्तगतं क्रमशो यान्ति देवताः । ब्रह्माद्याः केचिदेवात्र तदन्ये क्रमशोऽपरान्।
इति बृहत्तन्त्रे ॥ ३१ ॥
मानसांश्चाखिलान् प्राप्य मुक्तौ मोदन्ति देवताः ।
तथोद्रिक्तनिजानन्दा नित्यानन्दा असंवृताः। इति षाड्गुण्ये ॥ ३२ ॥
'नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः। इति मोक्षधर्मे ॥ विविधकार्ययुक्तं विकार्यम् । देवमयं देवप्रधानम् । 'मनःस्थितो हरिर्नित्यं सर्वदेवेषु संस्थितः । देवप्रधानकाल्लोकान्करोत्यनुगतः सदा। इति वाराहे ॥ भूतसूक्ष्माणि पञ्चभूतानि जीवाश्च । 'पञ्चभूतैश्च शब्दाद्यैरिन्द्रियैर्जीवराशिभिः । युक्त आकाशगो विष्णुर्मनःस्थमुपगच्छति। इति वामने ।
योऽसावनादिर्मनोमयस्तमिति वा । विपर्ययश्चेत्तस्यैव गन्तृत्वमिति ज्ञापयितुम् । मतिस्थेन तेन मनःस्थेन च सह विज्ञानतत्वं याति ॥३३॥
'वासुदेवाश्रिता देवा ब्रह्माद्या मुक्तबन्धनाः । भेददृष्ट्याभिमानेन चावृत्तिं नैव यान्ति ते ॥ भुञ्जते तु पृथग्भोगान्नानन्दं तत्स्वरूपकम् ।
स्वरूपं च पृथक्तेषामाविष्टग्रहवद्भवेत्इति ब्रह्माण्डे ॥ ३४,३५ ॥
'नित्यज्ञानेन सिद्धं च पुनः पुनरवेक्षते । लीलयैव हरिर्देवो दुष्टानां मोहनाय च।
इति ब्रह्मतर्के ॥ ३७ ॥
'समाधावसमाधौ च निःस्वतन्त्रस्य देहिनः ।
अन्यो नियन्ता भगवान्वासुदेवः परः प्रभुःइति ब्रह्मतर्के ॥ ३८ ॥