Bruhadaranyaka/C4/S1: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 3: | Line 3: | ||
| chapter_num = 4 | | chapter_num = 4 | ||
| title = षडाचार्यब्राह्मणम् | | title = षडाचार्यब्राह्मणम् | ||
}} | }}{{VerseBlock | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C04_S01_V01 | | verse_id = BR_C04_S01_V01 | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| Line 17: | Line 16: | ||
| id = BR_C04_S01_V01_B1 | | id = BR_C04_S01_V01_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अणुर्भगवान् तद्विषयान् निर्णयान् वक्तुं वा । | अणुर्भगवान् तद्विषयान् निर्णयान् वक्तुं वा । | ||
| Line 35: | Line 33: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
प्रतिष्ठा प्रतिमा प्रोक्ता प्रतिरूपेण संस्थितेः । | प्रतिष्ठा प्रतिमा प्रोक्ता प्रतिरूपेण संस्थितेः । | ||
प्रतिमाधिकसादृश्यान्मुख्या विष्णोः सदा रमा ॥ | |||
दीप्तत्वादासमन्तात् सा चाकाश इति गीयते । | |||
प्रत्येकं विष्णुरूपाणामन्यदायतनं पृथक् ॥ इत्यध्यात्मे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 47: | Line 44: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
प्रतिमानमवस्थानं रहस्यं नाम सार्थकम् । | प्रतिमानमवस्थानं रहस्यं नाम सार्थकम् । | ||
चतुष्टयं यदा ज्ञानं सम्यग्विद्याफलं तदा ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 57: | Line 53: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
का प्रज्ञता वागेवेत्यादेर्धर्मधर्म्यभेदः । | का प्रज्ञता वागेवेत्यादेर्धर्मधर्म्यभेदः । | ||
अमिताक्षरं पञ्चरात्रं विद्येत्याहुर्मनीषिणः । | |||
मिताक्षरं श्लोकवाच्यमुभयं वेद ईर्यते ॥ इति ब्रह्मांडे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 68: | Line 63: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सूत्रं तु ब्रह्मसूत्राख्यं महामीमांसिका तथा । | सूत्रं तु ब्रह्मसूत्राख्यं महामीमांसिका तथा । | ||
तथा सांकर्षणं सूत्रं ब्रह्मतर्कादयस्तथा ॥ | |||
प्रकाशिका निर्णयश्च तत्त्वनिर्णय एव च । | |||
व्याख्येति कथिताः सर्वाः स्वयं भगवता कृताः ॥ | |||
बृहत्तर्कादयः सर्वा अनुव्याख्याः प्रकीर्तिताः ॥। | |||
इति प्रतिसंख्याने ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 82: | Line 76: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
वाग्विष्णुर्वाचकत्वेन प्राणः प्रणयनात् स्वयम् । | वाग्विष्णुर्वाचकत्वेन प्राणः प्रणयनात् स्वयम् । | ||
मनो मन्तृत्वतो नित्यं स चक्षुः सर्वदर्शनात् ॥ | |||
श्रोत्रं श्रवणशक्तित्वाद्धृदयं हृद्गतो यतः ॥ इति प्रत्याहारे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 93: | Line 86: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचम् इत्यादि च ॥ | अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचम् इत्यादि च ॥ | ||
| Line 102: | Line 94: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
वागादिषु स्थितं विष्णुं य उपास्ते सदैव तु । | वागादिषु स्थितं विष्णुं य उपास्ते सदैव तु । | ||
वागादिनाम्ना नैनं स प्रजहाति कदाचन ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 112: | Line 103: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अत आयतनमेव वागिंद्रियादि । परमं ब्रह्मेतिवचनान्न वागिंद्रियादिमात्रमुपास्यम् ॥ | अत आयतनमेव वागिंद्रियादि । परमं ब्रह्मेतिवचनान्न वागिंद्रियादिमात्रमुपास्यम् ॥ | ||
| Line 121: | Line 111: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
प्रतिमाद्यं हरित्वेन पृथिव्याद्यमथापि वा । | प्रतिमाद्यं हरित्वेन पृथिव्याद्यमथापि वा । | ||
इंद्रियप्राणजीवाद्यमथवा य उपासते ॥ | |||
मिथ्योपास्तिमतां तेषां निष्कृतिर्न कदाचन । | |||
अतिदुःखे पतन्त्यद्धा तमस्यन्धे पतंगवत् ॥ इत्युपासानिर्णये ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 133: | Line 122: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सर्वेंद्रियेषु या विष्णोरुपासा युगपत् सदा । | सर्वेंद्रियेषु या विष्णोरुपासा युगपत् सदा । | ||
देवानामेव योग्या सा तया देवत्वमाप्नुयुः ॥ | |||
सर्वे देवपदे योग्याः सायुज्यं स्वोत्तमेष्वथ । | |||
सम्प्राप्य ब्रह्मणा सार्धं प्राप्नुयुः पुरुषोत्तमम् ॥ | |||
दुहन्ति सर्वभोगांश्च तेभ्योऽन्ये मुक्तिगा नराः । | |||
स्वोत्तमेभ्यश्च देवेभ्यस्ते मुक्ता हरये सदा ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 147: | Line 135: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
प्रविश्य देहं यो भोगः स्वरूपव्यतिरेकतः । | प्रविश्य देहं यो भोगः स्वरूपव्यतिरेकतः । | ||
सायुज्यमिति तं प्राहुः संयुक्तत्वाद्विशेषतः ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 157: | Line 144: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
इंद्रियेषु स्थितं विष्णुमुपासीत क्रमेण तु । | इंद्रियेषु स्थितं विष्णुमुपासीत क्रमेण तु । | ||
सदा देवपदायोग्यः स मानुषसुरो भवेत् ॥ | |||
मानुषा देवलोकस्थास्ते प्रोक्ताः मानुषाः सुराः । | |||
मानुषा देवसायुज्यं यान्त्युपासनयाऽनया ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 169: | Line 155: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
ऋषभान् गजमिश्रांस्तु क्षत्रियो गुरुदक्षिणाम् । | ऋषभान् गजमिश्रांस्तु क्षत्रियो गुरुदक्षिणाम् । | ||
विप्रो दद्याद् वृषानेव वैश्यो गाः प्रतिविद्यकम् ॥ इति मानसंहितायाम् ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 179: | Line 164: | ||
| id = BR_C04_S01_V02_B1 | | id = BR_C04_S01_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अन्यथा विद्यया मुक्तिः सुराणामन्यथा नृणाम् । | अन्यथा विद्यया मुक्तिः सुराणामन्यथा नृणाम् । | ||
तत्रापि योग्यताभेदात् प्रतिभेदा अवान्तराः ॥ | |||
यया यस्य विमुक्तिः स्यात् तद्दाता मुख्यतो गुरुः । | |||
एकदेशगुरुत्वं स्यादन्यविद्याप्रदस्य तु ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 200: | Line 184: | ||
| id = BR_C04_S01_V03_B1 | | id = BR_C04_S01_V03_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
प्राणसंस्थस्य वै विष्णोः सम्प्रीत्यै भोजनं भवेत् । | प्राणसंस्थस्य वै विष्णोः सम्प्रीत्यै भोजनं भवेत् । | ||
तदिच्छयैव चौर्यादि कुर्युरज्ञा अपि ध्रुवम् ॥ | |||
तथापि तं न जानीयुः प्राणात्मानं जनार्दनम् ॥ इति प्रवृत्ते ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 220: | Line 203: | ||
| id = BR_C04_S01_V04_B1 | | id = BR_C04_S01_V04_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
यच्चक्षुषि स्थितं रूपं विष्णोश्चक्षुस्तदुच्यते । | यच्चक्षुषि स्थितं रूपं विष्णोश्चक्षुस्तदुच्यते । | ||
शब्दादेरप्यापरोक्ष्ये तद्धेतुर्विश्वनामकम् ॥ | |||
तद्गतस्य ततो विष्णोः कण्ठस्थानागमो यदा । | |||
तदा स्वप्नो भवेज्जाग्रद्दर्शनं नैव जायते ॥ | |||
चक्षुर्निमीलनं च स्यात् सर्वेंद्रियगुणैः सह । | |||
चक्षुरात्मा ततो विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 243: | Line 225: | ||
| id = BR_C04_S01_V05_B1 | | id = BR_C04_S01_V05_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सर्वव्यापी तु भगवाननन्त इति कीर्तितः । | सर्वव्यापी तु भगवाननन्त इति कीर्तितः । | ||
दिङ्नामा स तु विज्ञेयो दिक्षुस्थो नित्यदेशनात् ॥ इति च । | |||
}} | }} | ||
| Line 262: | Line 243: | ||
| id = BR_C04_S01_V06_B1 | | id = BR_C04_S01_V06_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
मनःस्थितस्य यद्विष्णोः सम्बन्धादेव कामतः । | मनःस्थितस्य यद्विष्णोः सम्बन्धादेव कामतः । | ||
जातः सुतः सुखे हेतुः परानन्दो हरिः किमु ॥ इति ब्रह्मतर्के । | |||
}} | }} | ||
| Line 297: | Line 277: | ||
| id = BR_C04_S01_V07_B1 | | id = BR_C04_S01_V07_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सदा प्रतिष्ठितानि भवन्ति । विशेषतोपि प्रतिष्ठितानि सुप्तौ ॥ | सदा प्रतिष्ठितानि भवन्ति । विशेषतोपि प्रतिष्ठितानि सुप्तौ ॥ | ||
| Line 306: | Line 285: | ||
| id = BR_C04_S01_V07_B1 | | id = BR_C04_S01_V07_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
हृदये सर्वशो व्यापी प्रादेशः पुरुषोत्तमः । | हृदये सर्वशो व्यापी प्रादेशः पुरुषोत्तमः । | ||
जीवानां स्थानमुद्दिष्टः सर्वदैव सनातनः ॥ | |||
हृत्कर्णिकामूलगतः सोऽङ्गुष्ठाग्रप्रमाणकः । | |||
मूलेश इति नामास्मिन् सर्वे जीवाः प्रतिष्ठिताः ॥ | |||
अंगुष्ठमात्रे पुरुषे कर्णिकाग्रस्थिते हरौ । | |||
प्रविशन्ति सुषुप्तौ तु प्रबुध्यन्ते ततस्तथा ॥ | |||
सोऽयं त्रिरूपो भगवान् हृदयाख्यः प्रकीर्तितः ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 321: | Line 299: | ||
| id = BR_C04_S01_V07_B1 | | id = BR_C04_S01_V07_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
स्थानमायतनं प्रोक्तं प्रतिष्ठा धारकः पुमान् इति च ॥ | स्थानमायतनं प्रोक्तं प्रतिष्ठा धारकः पुमान् इति च ॥ | ||
Revision as of 16:49, 9 April 2026
प्रतिमाधिकसादृश्यान्मुख्या विष्णोः सदा रमा ॥ दीप्तत्वादासमन्तात् सा चाकाश इति गीयते ।
प्रत्येकं विष्णुरूपाणामन्यदायतनं पृथक् ॥ इत्यध्यात्मे ॥अमिताक्षरं पञ्चरात्रं विद्येत्याहुर्मनीषिणः ।
मिताक्षरं श्लोकवाच्यमुभयं वेद ईर्यते ॥ इति ब्रह्मांडे ॥तथा सांकर्षणं सूत्रं ब्रह्मतर्कादयस्तथा ॥ प्रकाशिका निर्णयश्च तत्त्वनिर्णय एव च । व्याख्येति कथिताः सर्वाः स्वयं भगवता कृताः ॥ बृहत्तर्कादयः सर्वा अनुव्याख्याः प्रकीर्तिताः ॥।
इति प्रतिसंख्याने ॥मनो मन्तृत्वतो नित्यं स चक्षुः सर्वदर्शनात् ॥
श्रोत्रं श्रवणशक्तित्वाद्धृदयं हृद्गतो यतः ॥ इति प्रत्याहारे ॥इंद्रियप्राणजीवाद्यमथवा य उपासते ॥ मिथ्योपास्तिमतां तेषां निष्कृतिर्न कदाचन ।
अतिदुःखे पतन्त्यद्धा तमस्यन्धे पतंगवत् ॥ इत्युपासानिर्णये ॥देवानामेव योग्या सा तया देवत्वमाप्नुयुः ॥ सर्वे देवपदे योग्याः सायुज्यं स्वोत्तमेष्वथ । सम्प्राप्य ब्रह्मणा सार्धं प्राप्नुयुः पुरुषोत्तमम् ॥ दुहन्ति सर्वभोगांश्च तेभ्योऽन्ये मुक्तिगा नराः ।
स्वोत्तमेभ्यश्च देवेभ्यस्ते मुक्ता हरये सदा ॥ इति च ॥सदा देवपदायोग्यः स मानुषसुरो भवेत् ॥ मानुषा देवलोकस्थास्ते प्रोक्ताः मानुषाः सुराः ।
मानुषा देवसायुज्यं यान्त्युपासनयाऽनया ॥ इति च ॥तत्रापि योग्यताभेदात् प्रतिभेदा अवान्तराः ॥ यया यस्य विमुक्तिः स्यात् तद्दाता मुख्यतो गुरुः ।
एकदेशगुरुत्वं स्यादन्यविद्याप्रदस्य तु ॥ इति च ॥
तदिच्छयैव चौर्यादि कुर्युरज्ञा अपि ध्रुवम् ॥
तथापि तं न जानीयुः प्राणात्मानं जनार्दनम् ॥ इति प्रवृत्ते ॥
शब्दादेरप्यापरोक्ष्ये तद्धेतुर्विश्वनामकम् ॥ तद्गतस्य ततो विष्णोः कण्ठस्थानागमो यदा । तदा स्वप्नो भवेज्जाग्रद्दर्शनं नैव जायते ॥ चक्षुर्निमीलनं च स्यात् सर्वेंद्रियगुणैः सह ।
चक्षुरात्मा ततो विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ॥ इति च ॥
जीवानां स्थानमुद्दिष्टः सर्वदैव सनातनः ॥ हृत्कर्णिकामूलगतः सोऽङ्गुष्ठाग्रप्रमाणकः । मूलेश इति नामास्मिन् सर्वे जीवाः प्रतिष्ठिताः ॥ अंगुष्ठमात्रे पुरुषे कर्णिकाग्रस्थिते हरौ । प्रविशन्ति सुषुप्तौ तु प्रबुध्यन्ते ततस्तथा ॥
सोऽयं त्रिरूपो भगवान् हृदयाख्यः प्रकीर्तितः ॥ इति च ॥