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Brahmasutra/C3/S1: Difference between revisions

From Anandamakaranda
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इति तदन्तराधिकरणम् ॥ 01 ॥
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शरीरान्तरप्रतिपत्तौ भूतसम्परिष्वक्त एव गच्छति ।
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‘वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’
‘वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’
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॥ इति त्र्यात्मकत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥
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अप्छब्दस्तुत्र्यात्मकत्वादुज्यते । भूयस्त्वाच्चापाम् ।‘तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः’इति च भागवते॥02॥
अप्छब्दस्तुत्र्यात्मकत्वादुज्यते । भूयस्त्वाच्चापाम् ।‘तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः’इति च भागवते॥02॥
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‘यत्र वाव भूतानि तत्र करणानि नित्यानि ह वा एतानि भूतानि च करणानि च नैतानि कदाचिद्वियुज्यन्ते न च विलीयन्ते’
‘यत्र वाव भूतानि तत्र करणानि नित्यानि ह वा एतानि भूतानि च करणानि च नैतानि कदाचिद्वियुज्यन्ते न च विलीयन्ते’
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॥ इति अग्न्याद्यधिकरणम् ॥ 04 ॥
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‘यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः’ इत्यादिश्रुतेर्न प्राणानां जीवेन सह गतिरिति चेन्न भागतोऽग्न्यादिप्राप्तेः ।
‘यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः’ इत्यादिश्रुतेर्न प्राणानां जीवेन सह गतिरिति चेन्न भागतोऽग्न्यादिप्राप्तेः ।
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‘पुरुषस्य मृतौ ब्रह्मन् प्राणा भागत एव तु ।अधिदैवं प्राप्नुवन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ।पुनः शरीरसम्प्राप्तौतमेवानुविशन्ति च’इति ब्राह्मे ।
‘पुरुषस्य मृतौ ब्रह्मन् प्राणा भागत एव तु ।अधिदैवं प्राप्नुवन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ।पुनः शरीरसम्प्राप्तौतमेवानुविशन्ति च’इति ब्राह्मे ।
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ब्रह्माण्डे च-
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‘मृतिकाले जहत्येनं प्राणा भूतानि पञ्च च ।
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‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति’ इति प्रथमाग्नौ श्रूयते न भूतानि जुह्वतीति। अतो नेति चेन्न। ता एव प्रस्तुता आपः श्रद्धारूपेण हूयन्ते ।‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्युपसंहारोपपत्तेः ॥05॥
‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति’ इति प्रथमाग्नौ श्रूयते न भूतानि जुह्वतीति। अतो नेति चेन्न। ता एव प्रस्तुता आपः श्रद्धारूपेण हूयन्ते ।‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्युपसंहारोपपत्तेः ॥05॥
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अग्न्यादिगतिः प्रत्यक्षतः श्रूयते। अतः प्रत्यक्षाश्रवणान्न युक्तमिति चेन्न।
अग्न्यादिगतिः प्रत्यक्षतः श्रूयते। अतः प्रत्यक्षाश्रवणान्न युक्तमिति चेन्न।
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‘अथैनं यजमानं किं न जहाति भूतान्येव भूतैरेव गच्छति भूतैर्भुङ्ते भूतैरुत्पद्यते भूतैश्चरति भूतैर्विचरति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ प्रतीतेः ॥ 06 ॥
‘अथैनं यजमानं किं न जहाति भूतान्येव भूतैरेव गच्छति भूतैर्भुङ्ते भूतैरुत्पद्यते भूतैश्चरति भूतैर्विचरति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ प्रतीतेः ॥ 06 ॥
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‘अपाम सोमममृता अभूम’ इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति-
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॥ इति भाक्ताधिकरणम् ॥ 07 ॥
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भागतस्तदमृतत्वम् ।’नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेरात्मविद एव हि मुख्यम् । वाशब्दात् पारम्पर्येणात्मविदपेक्षया वा । तथा हि श्रुतिः –
भागतस्तदमृतत्वम् ।’नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेरात्मविद एव हि मुख्यम् । वाशब्दात् पारम्पर्येणात्मविदपेक्षया वा । तथा हि श्रुतिः –
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‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽननूक्तोऽन्यद्वाकर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्तततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्द्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत् सृजते’
‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽननूक्तोऽन्यद्वाकर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्तततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्द्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत् सृजते’
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‘अमृतो वाव सोमपो भवति यावदिन्द्रो योवन्मनुर्यावदादित्यः’।
‘अमृतो वाव सोमपो भवति यावदिन्द्रो योवन्मनुर्यावदादित्यः’।
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‘कर्मणा ज्ञानमातनोति ज्ञानेनामृतीभवति अथामृतानि कर्माणि यत एनममृतत्वं नयन्ति’ इति च ॥ 07 ॥
‘कर्मणा ज्ञानमातनोति ज्ञानेनामृतीभवति अथामृतानि कर्माणि यत एनममृतत्वं नयन्ति’ इति च ॥ 07 ॥
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कृतस्य कर्मणो भोगेन क्षयान्मुक्तिरित्यत आह-
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‘ततः शेषेणेमं लोकमायाति पुनः कर्म कुरुते पुनर्गच्छति पुनरागच्छति’ इति श्रुतेः –
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‘भुक्तशेषानुशयवानिमां प्राप्य भुवं पुनः ।
‘भुक्तशेषानुशयवानिमां प्राप्य भुवं पुनः ।
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आचतुर्दशमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।
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‘यथेतमेव गच्छति यथेतमागच्छति स भुङ्क्ते स कर्म कुरुते स परिवर्तते’ इति गतिप्रकारेणागतिः प्रतीयते । अतो ब्रूते-
‘यथेतमेव गच्छति यथेतमागच्छति स भुङ्क्ते स कर्म कुरुते स परिवर्तते’ इति गतिप्रकारेणागतिः प्रतीयते । अतो ब्रूते-
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‘धूमादभ्रमभ्रादाकाशमाकाशाच्चन्द्रलोकं यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धोमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति’ इति काषायणश्रुतेर्यथागतमन्यथा च॥09॥
‘धूमादभ्रमभ्रादाकाशमाकाशाच्चन्द्रलोकं यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धोमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति’ इति काषायणश्रुतेर्यथागतमन्यथा च॥09॥
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‘तद्य इह रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः कपूयाम्’ इति श्रुतेश्चरणफलमेव गमनागमनं न यज्ञादिकृतः ।
‘तद्य इह रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः कपूयाम्’ इति श्रुतेश्चरणफलमेव गमनागमनं न यज्ञादिकृतः ।
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‘आचार इति सम्प्रोक्तः कर्माङ्गत्वेन शुद्धिदः ।
‘आचार इति सम्प्रोक्तः कर्माङ्गत्वेन शुद्धिदः ।
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इति स्मृतेरिति चेन्न, यज्ञाद्युपलक्षणार्था चरणादिश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिर्मन्यते ॥ 10 ॥
इति स्मृतेरिति चेन्न, यज्ञाद्युपलक्षणार्था चरणादिश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिर्मन्यते ॥ 10 ॥
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तर्हि रमणीयाः कपूया इत्येव स्यात् । चरणशब्दस्यानर्थक्यमिति चेन्न। चरणापेक्षत्वाद्रमणीयत्वादेस्तज्ज्ञापनार्थत्वेनोपपत्तेः ॥ 11 ॥
तर्हि रमणीयाः कपूया इत्येव स्यात् । चरणशब्दस्यानर्थक्यमिति चेन्न। चरणापेक्षत्वाद्रमणीयत्वादेस्तज्ज्ञापनार्थत्वेनोपपत्तेः ॥ 11 ॥
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॥ इति चरणाधिकरणम् ॥ 10 ॥
॥ इति चरणाधिकरणम् ॥ 10 ॥
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‘धर्मं चरत माऽधर्मम्’ इत्यादिप्रयोगात् सुकृतदुश्कृते एव चरणशब्दोक्ते इति बादरिर्मन्यते । तुशब्दात् स्वसिद्धान्तोऽपि स एवेति सूचयति।
‘धर्मं चरत माऽधर्मम्’ इत्यादिप्रयोगात् सुकृतदुश्कृते एव चरणशब्दोक्ते इति बादरिर्मन्यते । तुशब्दात् स्वसिद्धान्तोऽपि स एवेति सूचयति।
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‘तुशब्दस्तुविशेषे स्यात् स्वसिद्धान्तेऽवधारणे’ इति च नाममहोदधौ ॥ 12 ॥
‘तुशब्दस्तुविशेषे स्यात् स्वसिद्धान्तेऽवधारणे’ इति च नाममहोदधौ ॥ 12 ॥
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पुण्याकृतामेव गमनागमने नेतरेषामित्यत आह-
पुण्याकृतामेव गमनागमने नेतरेषामित्यत आह-
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‘‘तद्यइह शुभाकृतो ये वाऽशुभकृतस्तेऽशुभमनुभूयावर्तन्ते पुनः कर्म कुर्वन्ति पुनर्गच्छन्ति पुनरागच्छन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतौ ॥ 13 ॥
‘‘तद्यइह शुभाकृतो ये वाऽशुभकृतस्तेऽशुभमनुभूयावर्तन्ते पुनः कर्म कुर्वन्ति पुनर्गच्छन्ति पुनरागच्छन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतौ ॥ 13 ॥
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‘संयमनमनुभूय केषाञ्चिदारोहः केषाञ्चिदवरोहः । तुशब्दोऽवधारणे ॥
‘संयमनमनुभूय केषाञ्चिदारोहः केषाञ्चिदवरोहः । तुशब्दोऽवधारणे ॥
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‘‘सर्वे वा एतेऽशुभकृतः संयमने प्रपतन्ति तत्र ह ये परद्विषो गुरुद्विषः श्रुतिद्विषस्तदवमन्तारः शठा मूर्खा इति ते वै ततोऽवरुह्यतमसि प्रपतन्ति नैवैत उत्तिष्ठन्तेऽपि कर्हिचिद्वव्रं वा एतदित्याहुरथ येऽन्ये ब्रह्मद्विषः स्तेनाः सुरापा इति ते वै तदनुभूयेमं लोकमनुप्रजन्ति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 04 ॥
‘‘सर्वे वा एतेऽशुभकृतः संयमने प्रपतन्ति तत्र ह ये परद्विषो गुरुद्विषः श्रुतिद्विषस्तदवमन्तारः शठा मूर्खा इति ते वै ततोऽवरुह्यतमसि प्रपतन्ति नैवैत उत्तिष्ठन्तेऽपि कर्हिचिद्वव्रं वा एतदित्याहुरथ येऽन्ये ब्रह्मद्विषः स्तेनाः सुरापा इति ते वै तदनुभूयेमं लोकमनुप्रजन्ति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 04 ॥
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॥ इति अनिष्टादिकार्यधिकरणम् ॥ 11 ॥
॥ इति अनिष्टादिकार्यधिकरणम् ॥ 11 ॥
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‘‘गच्छन्ति पापिनः सर्वे नरकं नात्र संशयः ।
‘‘गच्छन्ति पापिनः सर्वे नरकं नात्र संशयः ।
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‘महातमसि मग्नानां न तेषामुत्थितिः क्वचित् ।
‘महातमसि मग्नानां न तेषामुत्थितिः क्वचित् ।
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‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा ।
‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा ।
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तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ।इति सप्तप्रधानानि बलीयस्तूत्तरोत्तरम् ।एतानि क्रमशो गत्वैवारोहोऽथावरोहणम्’ इति च भारते ॥ 16 ॥
तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ।इति सप्तप्रधानानि बलीयस्तूत्तरोत्तरम् ।एतानि क्रमशो गत्वैवारोहोऽथावरोहणम्’ इति च भारते ॥ 16 ॥
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ईश्वरस्य नरकायुक्तेः ‘सर्वं विसृजति सर्वं विलापयति सर्वं रमयति सर्वं न रमयति सर्वं प्रवर्तयत्यन्तरस्मिन् निविष्टः’ इति कौषारवश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति –
ईश्वरस्य नरकायुक्तेः ‘सर्वं विसृजति सर्वं विलापयति सर्वं रमयति सर्वं न रमयति सर्वं प्रवर्तयत्यन्तरस्मिन् निविष्टः’ इति कौषारवश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति –
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चशब्दाददुःखानुभवेन ।
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‘स स्वर्गे स भूमौ स नरके सोऽन्धे तमसि प्रवृत्तिकृदेक एवानुविष्टो नासौ दुःखभुगीश्वरः प्रभुत्वात् सर्वं पश्यति सर्वं कारयति नासौ दुःखभुग्य एवं वेद’ इति पौत्रायणश्रुतेरविरोधः ।
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‘नरकेऽपि वसन्नीशो नासौ दुःखभुगुच्यते ।नीचोच्चतैव दुःखादेर्भोग इत्यभिधीयते ॥नासौ नीचोच्चतां याति पश्यत्येव प्रभुत्वतः’ इति भागवततन्त्रे ॥ 17 ॥
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‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम्’ इति गतिस्वातन्त्र्यं भूतानां प्रतीयत इत्यत आह-
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इति विद्याकर्माधिकरणम् ॥ 14 ॥
इति विद्याकर्माधिकरणम् ॥ 14 ॥
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विद्याकर्मापेक्षयैतद्वचनम् । तयोरपि प्रकृतत्वात् ।
विद्याकर्मापेक्षयैतद्वचनम् । तयोरपि प्रकृतत्वात् ।
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‘विद्यापथः कर्मपथो द्वौ पन्थानौ प्रकीर्तितौ ।तद्वर्जितस्त्रिधा याति तिर्यग्वा नरकं तमः’इति च भारते॥ 18 ॥
‘विद्यापथः कर्मपथो द्वौ पन्थानौ प्रकीर्तितौ ।तद्वर्जितस्त्रिधा याति तिर्यग्वा नरकं तमः’इति च भारते॥ 18 ॥
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‘यत्र दुःखं सुखं तत्र सर्वत्रापि प्रतीयते ।अपि नीचगतौ किञ्चित् किमु मानुषदेहिनः’ इति वचनान्महातमस्यपि सुखप्राप्तिरित्यत आह-
‘यत्र दुःखं सुखं तत्र सर्वत्रापि प्रतीयते ।अपि नीचगतौ किञ्चित् किमु मानुषदेहिनः’ इति वचनान्महातमस्यपि सुखप्राप्तिरित्यत आह-
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‘अथाविद्वानकर्माऽवाग्गच्छति त्रिधा ह वाऽवाग्गतिस्तिर्यग्यातना तम इति । द्वेवाव सुखानुवृत्ते, न तमः सुखानुवृत्तं केवलं ह्येवात्र दुःखं भवति’ इति श्रुतेर्न तृतीयावाग्गतौ सुखम् ॥ 19 ॥
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‘तिर्यक्षु नरके चैव सुखलेशो विधीयते ।नान्धे तमसि मग्नानां सुखलेशोऽपि कश्चन’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
‘तिर्यक्षु नरके चैव सुखलेशो विधीयते ।नान्धे तमसि मग्नानां सुखलेशोऽपि कश्चन’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
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लोकसिद्धं चैतत्। चशब्दाल्लोकसिद्धिरपि स्मार्तेत्याह ।
लोकसिद्धं चैतत्। चशब्दाल्लोकसिद्धिरपि स्मार्तेत्याह ।
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‘अतिप्रिये यथा राजा न दुःखं सहते क्वचित् ।अत्यप्रिये सुखमपि तथैव परमेश्वरः’इति हि ब्राह्मे ॥ 20 ॥
‘अतिप्रिये यथा राजा न दुःखं सहते क्वचित् ।अत्यप्रिये सुखमपि तथैव परमेश्वरः’इति हि ब्राह्मे ॥ 20 ॥
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‘नारायणप्रसादेन समिद्धज्ञानचक्षुषा । अत्यन्तदुःखसल्लीनान् निश्येषसुखवर्जितान् ॥
‘नारायणप्रसादेन समिद्धज्ञानचक्षुषा । अत्यन्तदुःखसल्लीनान् निश्येषसुखवर्जितान् ॥
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नित्यमेव तथाभूतान् विमिश्रांश्च गणान् बहून् ।
नित्यमेव तथाभूतान् विमिश्रांश्च गणान् बहून् ।
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अपश्यत् त्रिविधान् ब्रह्मा साक्षादेव चतुर्मुखः’
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तृतीये तृतीयतमस श्रवणादेव शब्दानुसारेण संशोकजमोहप्राप्तिः ॥ 22 ॥
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॥ इति महातमोऽधिकरणम् (नतृतीयाधिकरणम्) ॥ 15 ॥
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‘महातमस्त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वं मध्यं तथाऽधरम् ।श्रवणादेव मूर्च्छादिरधरस्य यतो भवेत् ॥तस्मान्न विस्तरेण्यैतत् कथ्यते राजसत्तम’ इति कौर्मे ॥ 23 ॥
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‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्याद्यन्यभावः श्रूयते । स कथमित्यतो ब्रवीति-
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॥ इति तत्स्वाभाव्याधिकरणम् ॥ 16 ॥
॥ इति तत्स्वाभाव्याधिकरणम् ॥ 16 ॥
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धूमादिषु प्रविश्य तद्गतौ गतिः स्थितौ स्थितिरित्यादिरेव तद्भावापत्तिः । न ह्यन्यस्यान्यभावो युज्यते । न च तत्पदप्राप्तिः । गारुडे च-
धूमादिषु प्रविश्य तद्गतौ गतिः स्थितौ स्थितिरित्यादिरेव तद्भावापत्तिः । न ह्यन्यस्यान्यभावो युज्यते । न च तत्पदप्राप्तिः । गारुडे च-
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धूमादिभावप्राप्तिश्च तद्गतौ गतिरेव तु ।
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बहुस्थानगमनात् कल्पान्तमप्येवं स्यादित्यत आह-
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॥ इति नातिचिरेणाधिकरणम् (अचिरप्राप्त्यधिकरणम्) ॥ 17 ॥
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‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत् ते रमणीयां योनिमापद्यन्ते’ इति विशेषान्नातिचिरेण ॥स्वर्गाल्लोकादवाक् प्राप्तो वत्सरात्पूर्वमेव तु ।मातुः शरीरमाप्नोति पर्यटन् यत्र तत्र च’ इति च नारदीये ॥ 25 ॥
‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत् ते रमणीयां योनिमापद्यन्ते’ इति विशेषान्नातिचिरेण ॥स्वर्गाल्लोकादवाक् प्राप्तो वत्सरात्पूर्वमेव तु ।मातुः शरीरमाप्नोति पर्यटन् यत्र तत्र च’ इति च नारदीये ॥ 25 ॥
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‘त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते’ इति श्रवणादनर्थफलत्वं यज्ञादेरित्यतो वक्ति-
‘त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते’ इति श्रवणादनर्थफलत्वं यज्ञादेरित्यतो वक्ति-
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अन्याधिष्ठिते व्रीह्यादिशरीरे प्रवेशः । न तु भोगोऽस्य । ‘धूमोभूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्यादिपूर्वोक्तिवत् ॥
अन्याधिष्ठिते व्रीह्यादिशरीरे प्रवेशः । न तु भोगोऽस्य । ‘धूमोभूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्यादिपूर्वोक्तिवत् ॥
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‘सोऽवाग्गतः स्थावरान् प्रविश्याभोगेनैव व्रजन् स्थूलं शरीरमेति स्थूलाच्छरीराद्भोगाननुभुङ्क्ते’ इत्यभिलापात् कौषारवश्रुतौ ।
‘सोऽवाग्गतः स्थावरान् प्रविश्याभोगेनैव व्रजन् स्थूलं शरीरमेति स्थूलाच्छरीराद्भोगाननुभुङ्क्ते’ इत्यभिलापात् कौषारवश्रुतौ ।
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‘स्वर्गादवाग्गतो देही व्रीह्यादीतरदेहगः ।अभुञ्जंस्तु क्रमेणैव देहमाप्नोति कालतः’इति वाराहे ॥ 26 ॥
‘स्वर्गादवाग्गतो देही व्रीह्यादीतरदेहगः ।अभुञ्जंस्तु क्रमेणैव देहमाप्नोति कालतः’इति वाराहे ॥ 26 ॥
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हिंसारूपत्वात् पापस्यापि सम्भवाद्धुःखं च भवत्विति चेन्न। शब्दविहितत्वात्॥
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‘हिंसा त्ववैदिका या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत्।वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथञ्चन’ इति वाराहे॥ 27 ॥
‘हिंसा त्ववैदिका या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत्।वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथञ्चन’ इति वाराहे॥ 27 ॥
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‘स्वर्गादवाग्गतश्चापि मातुरेवोदरं व्रजेत्’ इति वचनात्  ‘य एव गृही भवति यो वा रेतः सिञ्चति तमेवानुविशति’इति श्रुतिः कथमित्यत आह-
‘स्वर्गादवाग्गतश्चापि मातुरेवोदरं व्रजेत्’ इति वचनात्  ‘य एव गृही भवति यो वा रेतः सिञ्चति तमेवानुविशति’इति श्रुतिः कथमित्यत आह-
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॥ इति रेतोऽधिकरणम् ॥ 19 ॥
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‘ततो रेतस्सिचमेवानुप्रविशत्यथ मातरमथ प्रसूयते स कर्म कुरुते’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः पितरमेव प्रथमतो विशति। मातृप्राप्तेः पश्चादपि भाव्यत्वात् ॥ 28 ॥
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‘देहं गर्भस्थितं क्वापि प्रविशेत् स्वर्गतो गतः’ इति वचनात् पश्चादेव प्रविशतीत्यत आह-
‘देहं गर्भस्थितं क्वापि प्रविशेत् स्वर्गतो गतः’ इति वचनात् पश्चादेव प्रविशतीत्यत आह-
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॥ इति योन्यधिकरणम् ॥ 20 ॥
॥ इति योन्यधिकरणम् ॥ 20 ॥
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 03-01 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 03-01 ॥
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पितृशरीरान्मातृयोनिमनुप्रविश्य तत एव शरीरमाप्नोति ।
पितृशरीरान्मातृयोनिमनुप्रविश्य तत एव शरीरमाप्नोति ।
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‘दिवः स्थास्नून् गच्छति स्थास्नुभ्यः पितरं पितुर्मातरं मातुः शरीरं शरीरेण जायत इति सम्मितम् ।अथासम्मितं स्थास्नुभ्यो जायते पितुर्मातुरन्तरे वा गर्भे वा बहिर्वा’ इति पौष्यायणश्रुतेः ॥
‘दिवः स्थास्नून् गच्छति स्थास्नुभ्यः पितरं पितुर्मातरं मातुः शरीरं शरीरेण जायत इति सम्मितम् ।अथासम्मितं स्थास्नुभ्यो जायते पितुर्मातुरन्तरे वा गर्भे वा बहिर्वा’ इति पौष्यायणश्रुतेः ॥
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‘स्थावराणि दिवः प्राप्तः स्थावरेभ्यश्च पूरुषम् ।
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देहेन जायते जन्तुरिति सामान्यतो जनिः ।
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स्थास्नुष्वथापि पुरुषे प्रमादायामथापि वा ।गर्भे वा बहिरेवाथ क्वचित् स्थानान्तरेषु च’इति ब्राह्मे ॥ 29 ॥
स्थास्नुष्वथापि पुरुषे प्रमादायामथापि वा ।गर्भे वा बहिरेवाथ क्वचित् स्थानान्तरेषु च’इति ब्राह्मे ॥ 29 ॥

Revision as of 08:59, 10 April 2026

साधनविचारोऽयमध्यायः । वैराग्यार्थे गत्यादिनिरूपणा प्रथमपादे।

भूतबन्धो हि बन्धः। ‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति वाराहे । तच्च मरणे भवति।

भूतानां विनिवृत्तिस्तु मरणं समुदाहृतम् । भूतानां सम्प्रयोगश्च जनिरित्येव पण्डितैः’ इति च भारते ॥

अतः किं साधनैरित्यत आह-

तदन्तराधिकरणम्

ॐ तदन्तरप्रतिपत्तौरंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ॐ ॥ 01-295 ॥


इति तदन्तराधिकरणम् ॥ 01 ॥
शरीरान्तरप्रतिपत्तौ भूतसम्परिष्वक्त एव गच्छति ।
‘वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इति प्रश्नपरिहाराभ्याम् ॥ 01 ॥

त्र्यात्मकत्वाधिकरणम्

ॐ त्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् ॐ ॥ 02-296 ॥


॥ इति त्र्यात्मकत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥
अप्छब्दस्तुत्र्यात्मकत्वादुज्यते । भूयस्त्वाच्चापाम् ।‘तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः’इति च भागवते॥02॥

प्राणागत्यधिकरणम्

ॐ प्राणगतेश्च ॐ ॥ 03-297 ॥


॥ इति प्राणागत्यधिकरणम् ॥ 03 ॥
‘यत्र वाव भूतानि तत्र करणानि नित्यानि ह वा एतानि भूतानि च करणानि च नैतानि कदाचिद्वियुज्यन्ते न च विलीयन्ते’ इति भाल्लवेयश्रुतेः प्राणगतेर्भूतान्यपि सन्ति इति सिद्धम् ॥ 03 ॥

अग्न्याद्यधिकरणम्

ॐ अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ॐ ॥ 04-298 ॥


॥ इति अग्न्याद्यधिकरणम् ॥ 04 ॥
‘यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः’ इत्यादिश्रुतेर्न प्राणानां जीवेन सह गतिरिति चेन्न भागतोऽग्न्यादिप्राप्तेः ।
‘पुरुषस्य मृतौ ब्रह्मन् प्राणा भागत एव तु ।अधिदैवं प्राप्नुवन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ।पुनः शरीरसम्प्राप्तौतमेवानुविशन्ति च’इति ब्राह्मे ।
ब्रह्माण्डे च-
‘मृतिकाले जहत्येनं प्राणा भूतानि पञ्च च । भागतो भागतस्त्वेनमनुगच्छन्ति सर्वशः’ इति ॥ 04 ॥

प्रथमश्रवणाधिकरणम्

ॐ प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॐ ॥ 05-299 ॥


॥ इति प्रथमश्रवणाधिकरणम् ॥ 05 ॥
‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति’ इति प्रथमाग्नौ श्रूयते न भूतानि जुह्वतीति। अतो नेति चेन्न। ता एव प्रस्तुता आपः श्रद्धारूपेण हूयन्ते ।‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्युपसंहारोपपत्तेः ॥05॥

अश्रुतत्वाधिकरणम्

ॐ अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणं प्रतीतेः ॐ ॥ 06-300 ॥


॥ इति अश्रुतत्वाधिकरणम् ॥ 06 ॥
अग्न्यादिगतिः प्रत्यक्षतः श्रूयते। अतः प्रत्यक्षाश्रवणान्न युक्तमिति चेन्न।
‘अथैनं यजमानं किं न जहाति भूतान्येव भूतैरेव गच्छति भूतैर्भुङ्ते भूतैरुत्पद्यते भूतैश्चरति भूतैर्विचरति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ प्रतीतेः ॥ 06 ॥

भाक्ताधिकरणम्

ॐ भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति ॐ॥ 07-301 ॥


‘अपाम सोमममृता अभूम’ इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति-
॥ इति भाक्ताधिकरणम् ॥ 07 ॥
भागतस्तदमृतत्वम् ।’नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेरात्मविद एव हि मुख्यम् । वाशब्दात् पारम्पर्येणात्मविदपेक्षया वा । तथा हि श्रुतिः –
‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽननूक्तोऽन्यद्वाकर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्तततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्द्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत् सृजते’
‘अमृतो वाव सोमपो भवति यावदिन्द्रो योवन्मनुर्यावदादित्यः’।
‘कर्मणा ज्ञानमातनोति ज्ञानेनामृतीभवति अथामृतानि कर्माणि यत एनममृतत्वं नयन्ति’ इति च ॥ 07 ॥

कृतात्ययाधिकरणम्

ॐ कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम् ॐ ॥ 08-302 ॥


कृतस्य कर्मणो भोगेन क्षयान्मुक्तिरित्यत आह-
॥ इति कृतात्ययाधिकरणम् ॥ 08 ॥
‘ततः शेषेणेमं लोकमायाति पुनः कर्म कुरुते पुनर्गच्छति पुनरागच्छति’ इति श्रुतेः –
‘भुक्तशेषानुशयवानिमां प्राप्य भुवं पुनः । कर्म कृत्वा पुनर्गच्छेत् पुनरायाति नित्यशः ॥
आचतुर्दशमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।

दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ॥ अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति’॥

इत्यादिस्मृतेश्च शेषवानेवायाति ॥ 08 ॥

यथेताधिकरणम्

ॐ यथेतमनेवं च ॐ ॥ 09-303 ॥


‘यथेतमेव गच्छति यथेतमागच्छति स भुङ्क्ते स कर्म कुरुते स परिवर्तते’ इति गतिप्रकारेणागतिः प्रतीयते । अतो ब्रूते-
॥इति यथेताधिकरणम् ॥ 09 ॥
‘धूमादभ्रमभ्रादाकाशमाकाशाच्चन्द्रलोकं यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धोमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति’ इति काषायणश्रुतेर्यथागतमन्यथा च॥09॥

चरणाधिकरणम्

ॐ चरणादिति चेन्न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॐ॥ 10-304 ॥


‘तद्य इह रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः कपूयाम्’ इति श्रुतेश्चरणफलमेव गमनागमनं न यज्ञादिकृतः ।
‘आचार इति सम्प्रोक्तः कर्माङ्गत्वेन शुद्धिदः । अशुद्धिदस्त्वानाचारश्चरणं तूभयं मतम्’ ॥
इति स्मृतेरिति चेन्न, यज्ञाद्युपलक्षणार्था चरणादिश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिर्मन्यते ॥ 10 ॥
ॐ आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॐ ॥ 11-305 ॥


तर्हि रमणीयाः कपूया इत्येव स्यात् । चरणशब्दस्यानर्थक्यमिति चेन्न। चरणापेक्षत्वाद्रमणीयत्वादेस्तज्ज्ञापनार्थत्वेनोपपत्तेः ॥ 11 ॥
ॐ सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॐ ॥ 12-306 ॥


॥ इति चरणाधिकरणम् ॥ 10 ॥
‘धर्मं चरत माऽधर्मम्’ इत्यादिप्रयोगात् सुकृतदुश्कृते एव चरणशब्दोक्ते इति बादरिर्मन्यते । तुशब्दात् स्वसिद्धान्तोऽपि स एवेति सूचयति।
‘तुशब्दस्तुविशेषे स्यात् स्वसिद्धान्तेऽवधारणे’ इति च नाममहोदधौ ॥ 12 ॥

अनिष्टादिकार्यधिकरणम्

ॐ अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॐ ॥ 13-307 ॥


पुण्याकृतामेव गमनागमने नेतरेषामित्यत आह-
‘‘तद्यइह शुभाकृतो ये वाऽशुभकृतस्तेऽशुभमनुभूयावर्तन्ते पुनः कर्म कुर्वन्ति पुनर्गच्छन्ति पुनरागच्छन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतौ ॥ 13 ॥
ॐ संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात् ॐ ॥ 14-308 ॥


‘संयमनमनुभूय केषाञ्चिदारोहः केषाञ्चिदवरोहः । तुशब्दोऽवधारणे ॥
‘‘सर्वे वा एतेऽशुभकृतः संयमने प्रपतन्ति तत्र ह ये परद्विषो गुरुद्विषः श्रुतिद्विषस्तदवमन्तारः शठा मूर्खा इति ते वै ततोऽवरुह्यतमसि प्रपतन्ति नैवैत उत्तिष्ठन्तेऽपि कर्हिचिद्वव्रं वा एतदित्याहुरथ येऽन्ये ब्रह्मद्विषः स्तेनाः सुरापा इति ते वै तदनुभूयेमं लोकमनुप्रजन्ति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 04 ॥
ॐ स्मरन्ति च ॐ ॥ 15-309 ॥


॥ इति अनिष्टादिकार्यधिकरणम् ॥ 11 ॥
‘‘गच्छन्ति पापिनः सर्वे नरकं नात्र संशयः । ‘तत्र भुक्त्वा पतन्त्येव ये द्विषन्ति जनार्दनम् ।
‘महातमसि मग्नानां न तेषामुत्थितिः क्वचित् । ‘इतरेषां तु पापानां व्युत्थानं विद्यतेऽपि च ।
‘सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । ‘इति सर्वत्र नियमः पञ्चकष्टे तु तत् सदा’ इत्यादि ॥ 15 ॥

सप्ताधिकरणम्

ॐ अपि सप्त ॐ ॥ 16-310 ॥


॥ इति सप्ताधिकरणम् ॥ 12 ॥
‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा । कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु ॥
तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ।इति सप्तप्रधानानि बलीयस्तूत्तरोत्तरम् ।एतानि क्रमशो गत्वैवारोहोऽथावरोहणम्’ इति च भारते ॥ 16 ॥

तद्व्यापाराधिकरणम्

ॐ तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॐ ॥ 17-311 ॥


ईश्वरस्य नरकायुक्तेः ‘सर्वं विसृजति सर्वं विलापयति सर्वं रमयति सर्वं न रमयति सर्वं प्रवर्तयत्यन्तरस्मिन् निविष्टः’ इति कौषारवश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति –
॥ इति तद्व्यापाराधिकरणम् ॥ 13 ॥
चशब्दाददुःखानुभवेन ।
‘स स्वर्गे स भूमौ स नरके सोऽन्धे तमसि प्रवृत्तिकृदेक एवानुविष्टो नासौ दुःखभुगीश्वरः प्रभुत्वात् सर्वं पश्यति सर्वं कारयति नासौ दुःखभुग्य एवं वेद’ इति पौत्रायणश्रुतेरविरोधः ।
‘नरकेऽपि वसन्नीशो नासौ दुःखभुगुच्यते ।नीचोच्चतैव दुःखादेर्भोग इत्यभिधीयते ॥नासौ नीचोच्चतां याति पश्यत्येव प्रभुत्वतः’ इति भागवततन्त्रे ॥ 17 ॥

विद्याकर्माधिकरणम्

ॐ विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॐ ॥ 18-312 ॥


‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम्’ इति गतिस्वातन्त्र्यं भूतानां प्रतीयत इत्यत आह-
इति विद्याकर्माधिकरणम् ॥ 14 ॥
विद्याकर्मापेक्षयैतद्वचनम् । तयोरपि प्रकृतत्वात् ।
‘विद्यापथः कर्मपथो द्वौ पन्थानौ प्रकीर्तितौ ।तद्वर्जितस्त्रिधा याति तिर्यग्वा नरकं तमः’इति च भारते॥ 18 ॥

महातमोऽधिकरणम्

ॐ न तृतीये तथोपलब्धेः ॐ ॥ 19-313 ॥


‘यत्र दुःखं सुखं तत्र सर्वत्रापि प्रतीयते ।अपि नीचगतौ किञ्चित् किमु मानुषदेहिनः’ इति वचनान्महातमस्यपि सुखप्राप्तिरित्यत आह-
‘अथाविद्वानकर्माऽवाग्गच्छति त्रिधा ह वाऽवाग्गतिस्तिर्यग्यातना तम इति । द्वेवाव सुखानुवृत्ते, न तमः सुखानुवृत्तं केवलं ह्येवात्र दुःखं भवति’ इति श्रुतेर्न तृतीयावाग्गतौ सुखम् ॥ 19 ॥
ॐ स्मर्यतेऽपि च लोके ॐ ॥ 20-314 ॥


‘तिर्यक्षु नरके चैव सुखलेशो विधीयते ।नान्धे तमसि मग्नानां सुखलेशोऽपि कश्चन’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
लोकसिद्धं चैतत्। चशब्दाल्लोकसिद्धिरपि स्मार्तेत्याह ।
‘अतिप्रिये यथा राजा न दुःखं सहते क्वचित् ।अत्यप्रिये सुखमपि तथैव परमेश्वरः’इति हि ब्राह्मे ॥ 20 ॥
ॐ दर्शनाच्च ॐ ॥ 21-315 ॥


‘नारायणप्रसादेन समिद्धज्ञानचक्षुषा । अत्यन्तदुःखसल्लीनान् निश्येषसुखवर्जितान् ॥
नित्यमेव तथाभूतान् विमिश्रांश्च गणान् बहून् । निरस्ताशेषदुःखांश्च नित्यानन्दैकभागिनः ॥
अपश्यत् त्रिविधान् ब्रह्मा साक्षादेव चतुर्मुखः’ इति दर्शनवचनाच्च पाद्मे॥ 21 ॥
ॐ तृतीये शब्दावरोधः संशोकजस्य ॐ ॥ 22-316 ॥


तृतीये तृतीयतमस श्रवणादेव शब्दानुसारेण संशोकजमोहप्राप्तिः ॥ 22 ॥
ॐ स्मरणाच्च ॐ ॥ 23-317 ॥


॥ इति महातमोऽधिकरणम् (नतृतीयाधिकरणम्) ॥ 15 ॥
‘महातमस्त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वं मध्यं तथाऽधरम् ।श्रवणादेव मूर्च्छादिरधरस्य यतो भवेत् ॥तस्मान्न विस्तरेण्यैतत् कथ्यते राजसत्तम’ इति कौर्मे ॥ 23 ॥

तत्स्वाभाव्याधिकरणम्

ॐ तत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॐ ॥ 24-318 ॥


‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्याद्यन्यभावः श्रूयते । स कथमित्यतो ब्रवीति-
॥ इति तत्स्वाभाव्याधिकरणम् ॥ 16 ॥
धूमादिषु प्रविश्य तद्गतौ गतिः स्थितौ स्थितिरित्यादिरेव तद्भावापत्तिः । न ह्यन्यस्यान्यभावो युज्यते । न च तत्पदप्राप्तिः । गारुडे च-
धूमादिभावप्राप्तिश्च तद्गतौ गतिरेव तु । स्थितौ स्थितिः प्रवशश्च लघुत्वादिस्तथैव च ॥
न ह्यन्यस्यान्यथाभावो न च तत्पदमिष्यते । विद्यागम्यं पदं यस्मात् न तत्प्राप्यं हि कर्मणा॥
एकदेशस्वभावेन वागभेदाऽपि युज्यते । यथा जीवः परं ब्रह्म ब्रह्मेदं जगदित्यपि’ इति ॥ 24 ॥

नातिचिरेणाधिकरणम्

ॐ नातिचिरेण विशेषात् ॐ ॥ 25-319 ॥


बहुस्थानगमनात् कल्पान्तमप्येवं स्यादित्यत आह-
॥ इति नातिचिरेणाधिकरणम् (अचिरप्राप्त्यधिकरणम्) ॥ 17 ॥
‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत् ते रमणीयां योनिमापद्यन्ते’ इति विशेषान्नातिचिरेण ॥स्वर्गाल्लोकादवाक् प्राप्तो वत्सरात्पूर्वमेव तु ।मातुः शरीरमाप्नोति पर्यटन् यत्र तत्र च’ इति च नारदीये ॥ 25 ॥

अन्या(धिष्ठिता)धिकरणम्

ॐ अन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् ॐ ॥ 26-320 ॥


‘त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते’ इति श्रवणादनर्थफलत्वं यज्ञादेरित्यतो वक्ति-
अन्याधिष्ठिते व्रीह्यादिशरीरे प्रवेशः । न तु भोगोऽस्य । ‘धूमोभूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्यादिपूर्वोक्तिवत् ॥
‘सोऽवाग्गतः स्थावरान् प्रविश्याभोगेनैव व्रजन् स्थूलं शरीरमेति स्थूलाच्छरीराद्भोगाननुभुङ्क्ते’ इत्यभिलापात् कौषारवश्रुतौ ।
‘स्वर्गादवाग्गतो देही व्रीह्यादीतरदेहगः ।अभुञ्जंस्तु क्रमेणैव देहमाप्नोति कालतः’इति वाराहे ॥ 26 ॥
ॐ अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॐ ॥ 27-321 ॥


॥ इति अन्या(धिष्ठिता)धिकरणम् ॥ 18 ॥
हिंसारूपत्वात् पापस्यापि सम्भवाद्धुःखं च भवत्विति चेन्न। शब्दविहितत्वात्॥
‘हिंसा त्ववैदिका या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत्।वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथञ्चन’ इति वाराहे॥ 27 ॥

रेतोऽधिकरणम्

ॐ रेतःसिग्योगोऽथ ॐ ॥ 28-322 ॥


‘स्वर्गादवाग्गतश्चापि मातुरेवोदरं व्रजेत्’ इति वचनात् ‘य एव गृही भवति यो वा रेतः सिञ्चति तमेवानुविशति’इति श्रुतिः कथमित्यत आह-
॥ इति रेतोऽधिकरणम् ॥ 19 ॥
‘ततो रेतस्सिचमेवानुप्रविशत्यथ मातरमथ प्रसूयते स कर्म कुरुते’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः पितरमेव प्रथमतो विशति। मातृप्राप्तेः पश्चादपि भाव्यत्वात् ॥ 28 ॥

योन्यधिकरणम्

ॐ योनेः शरीरम् ॐ ॥ 29-323 ॥


‘देहं गर्भस्थितं क्वापि प्रविशेत् स्वर्गतो गतः’ इति वचनात् पश्चादेव प्रविशतीत्यत आह-
॥ इति योन्यधिकरणम् ॥ 20 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 03-01 ॥
पितृशरीरान्मातृयोनिमनुप्रविश्य तत एव शरीरमाप्नोति ।
‘दिवः स्थास्नून् गच्छति स्थास्नुभ्यः पितरं पितुर्मातरं मातुः शरीरं शरीरेण जायत इति सम्मितम् ।अथासम्मितं स्थास्नुभ्यो जायते पितुर्मातुरन्तरे वा गर्भे वा बहिर्वा’ इति पौष्यायणश्रुतेः ॥
‘स्थावराणि दिवः प्राप्तः स्थावरेभ्यश्च पूरुषम् । पुरुषात् स्त्रियमापन्नस्ततो देहं यथाक्रमम् ॥
देहेन जायते जन्तुरिति सामान्यतो जनिः । विशेषजननं चापि प्रोच्यमानं निबोध मे ॥
स्थास्नुष्वथापि पुरुषे प्रमादायामथापि वा ।गर्भे वा बहिरेवाथ क्वचित् स्थानान्तरेषु च’इति ब्राह्मे ॥ 29 ॥