Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S13: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ | ||
Revision as of 08:59, 10 April 2026
व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः ।ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि भृगूद्वह ॥ २ ॥
मासशब्देनाहान्युच्यन्ते । तथाहि महाभारते–
'अहस्तु मासशब्दोक्तं यत्र चिन्तायुतं व्रजेत् ।
एवं संवत्सराद्यं च विपरीते विपर्ययः। इति नाममहोदधौ ॥ २ ॥अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः ।यदाऽऽत्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८ ॥
अङ्गं पृथिवीम् ।
'यदा त्यागादिरुच्येत पृथिव्याद्यङ्गकल्पना ।
तदा ज्ञेया न हि स्वाङ्गं कदाचिद् विष्णुरुत्सृजेत्। इति ब्रह्मतर्के ॥८॥मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः ।प्रत्युलूकश्च हुङ्कारैरनिद्रौ शून्यमिच्छतः ॥ १४ ॥
अग्नौ पदं करोति ।
'यदुलूको वदति मोघमेतद् यत् कपोतः पदमग्नौ कृणोतिइति हि श्रुतिः ॥ १४ ॥
भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः ।कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४ ॥
यथाऽन्येषां सुखं भविष्यति तथा । नित्यसुखत्वाद्धरेः ।
'अत्युत्तमानां कुशलप्रश्नो लोकसुखेच्छया ।
नित्यदाऽऽप्तसुखत्वात्तु न तेषां युज्यते क्वचित्। इति नारदीये ॥३४॥कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे ।अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९ ॥
पूर्वं चिरोषितः ॥ ३९ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥