Jump to content

Sadacharasmriti: Difference between revisions

From Anandamakaranda
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Line 8: Line 8:
}}
}}
{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V01
| verse_id = SSM_C01_V01
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = यस्मिन् सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।निराशीर्निर्ममो याति परं जयति सोऽच्युतः॥ १॥
| verse_line1 =
यस्मिन् सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा
निराशीर्निर्ममो याति परं जयति सोऽच्युतः॥ १॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V02
| verse_id = SSM_C01_V02
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = स्मृत्वा विष्णुं समुत्थाय कृतशौचो यथाविधि ।धौतदन्तः समाचम्य स्नानं कुर्याद् विधानतः॥ २॥
| verse_line1 =
स्मृत्वा विष्णुं समुत्थाय कृतशौचो यथाविधि
धौतदन्तः समाचम्य स्नानं कुर्याद् विधानतः॥ २॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V03
| verse_id = SSM_C01_V03
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = उद्धृतेति मृदाऽऽलिप्य द्विषडष्टषडक्षरैः ।त्रिर्निमज्याप्यसूक्तेन प्रोक्षयित्वा पुनस्ततः ।मृदाऽऽलिप्य निमज्य त्रिस्त्रिर्जपेदघमर्षणम्॥ ३॥
| verse_line1 =
उद्धृतेति मृदाऽऽलिप्य द्विषडष्टषडक्षरैः
त्रिर्निमज्याप्यसूक्तेन प्रोक्षयित्वा पुनस्ततः
मृदाऽऽलिप्य निमज्य त्रिस्त्रिर्जपेदघमर्षणम्॥ ३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V04
| verse_id = SSM_C01_V04
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = स्रष्टारं सर्वलोकानां स्मृत्वा नारायणं परम् ।यतश्वासो निमज्याप्सु प्रणवेनोत्थितस्ततः ।सिञ्चन् पुरुषसूक्तेन स्वदेहस्थं हरिं स्मरन्॥ ४॥
| verse_line1 =
स्रष्टारं सर्वलोकानां स्मृत्वा नारायणं परम्
यतश्वासो निमज्याप्सु प्रणवेनोत्थितस्ततः
सिञ्चन् पुरुषसूक्तेन स्वदेहस्थं हरिं स्मरन्॥ ४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V05
| verse_id = SSM_C01_V05
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = वसित्वा वास आचभ्य प्रोक्ष्याचम्य च मन्त्रतः ।गायत्र्या चाञ्जलिं दत्वा ध्यात्वा सूर्यगतं हरिम्॥ ५॥
| verse_line1 =
वसित्वा वास आचभ्य प्रोक्ष्याचम्य च मन्त्रतः
गायत्र्या चाञ्जलिं दत्वा ध्यात्वा सूर्यगतं हरिम्॥ ५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V06
| verse_id = SSM_C01_V06
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = मन्त्रतः परिवृत्याथ समाचम्य सुरादिकान् ।तर्पयित्वा निपीड्याथ वासो विस्तृत्य चाञ्जसा॥ ६॥
| verse_line1 =
मन्त्रतः परिवृत्याथ समाचम्य सुरादिकान्
तर्पयित्वा निपीड्याथ वासो विस्तृत्य चाञ्जसा॥ ६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V07
| verse_id = SSM_C01_V07
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = अर्कमण्डलगं विष्णुं ध्यात्वैव त्रिपदीं जपेत् ।सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्॥ ७॥
| verse_line1 =
अर्कमण्डलगं विष्णुं ध्यात्वैव त्रिपदीं जपेत्
सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्॥ ७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V08
| verse_id = SSM_C01_V08
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = आसूर्यदर्शनात्तिष्ठेत् ततस्तूपविशेत वा ।पूर्वां सन्ध्यां सनक्षत्राम् उत्तरां सदिवाकराम् ।उत्तरामुपविश्यैव वाग्यतः सर्वदा जपेत्॥८॥
| verse_line1 =
आसूर्यदर्शनात्तिष्ठेत् ततस्तूपविशेत वा
पूर्वां सन्ध्यां सनक्षत्राम् उत्तरां सदिवाकराम्
उत्तरामुपविश्यैव वाग्यतः सर्वदा जपेत्॥८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V09
| verse_id = SSM_C01_V09
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥९॥
| verse_line1 =
ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V10
| verse_id = SSM_C01_V10
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = गायत्र्यास्त्रिगुणं विष्णुं ध्यायन्नष्टाक्षरं जपेत् ।प्रणम्य देवान् विप्रांश्च गुरूंश्च हरिपार्षदान् ।एवं सर्वोत्तमं विष्णुं ध्यायन्नेवार्चयेद्धरिम्॥ १०॥
| verse_line1 =
गायत्र्यास्त्रिगुणं विष्णुं ध्यायन्नष्टाक्षरं जपेत्
प्रणम्य देवान् विप्रांश्च गुरूंश्च हरिपार्षदान्
एवं सर्वोत्तमं विष्णुं ध्यायन्नेवार्चयेद्धरिम्॥ १०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V11
| verse_id = SSM_C01_V11
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = ध्यानप्रवचनाभ्यां च यथायोग्यमुपासनम् ।धर्मेणेज्यासाधनानि साधयित्वा विधानतः ।स्नात्वा सम्पूजयेद्विष्णुं वेदतन्त्रोक्तमार्गतः॥ ११॥
| verse_line1 =
ध्यानप्रवचनाभ्यां च यथायोग्यमुपासनम्
धर्मेणेज्यासाधनानि साधयित्वा विधानतः
स्नात्वा सम्पूजयेद्विष्णुं वेदतन्त्रोक्तमार्गतः॥ ११॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V12
| verse_id = SSM_C01_V12
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = वैश्वदेवं बलिं चैव कुर्यान्नित्यं तदर्पणम् ।इष्टं दत्तं हुतं जप्तं पूर्तं यच्चात्मनः प्रियम् ।दारान् सुतान् प्रियान् प्राणान् परस्मै सन्निवेदयेन्॥ १२॥
| verse_line1 =
वैश्वदेवं बलिं चैव कुर्यान्नित्यं तदर्पणम्
इष्टं दत्तं हुतं जप्तं पूर्तं यच्चात्मनः प्रियम्
दारान् सुतान् प्रियान् प्राणान् परस्मै सन्निवेदयेन्॥ १२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V13
| verse_id = SSM_C01_V13
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = भुक्तशेषं भगवतो भृत्यातिथिपुरस्सरः ।भुञ्जीत हृद्गतं विष्णुं स्मरंस्तद्गतमानसः ।आचम्य मूलमन्त्रेण कोष्ठं स्वमभिमन्त्रयेत्॥ १३॥
| verse_line1 =
भुक्तशेषं भगवतो भृत्यातिथिपुरस्सरः
भुञ्जीत हृद्गतं विष्णुं स्मरंस्तद्गतमानसः
आचम्य मूलमन्त्रेण कोष्ठं स्वमभिमन्त्रयेत्॥ १३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V14
| verse_id = SSM_C01_V14
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = वेदशास्त्रविनोदेन प्रीणयन् पुरुषोत्तमम् ।अहःशेषं नयेत्सन्ध्याम् उपासीताथ पूर्ववत्॥ १४॥
| verse_line1 =
वेदशास्त्रविनोदेन प्रीणयन् पुरुषोत्तमम्
अहःशेषं नयेत्सन्ध्याम् उपासीताथ पूर्ववत्॥ १४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V15
| verse_id = SSM_C01_V15
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = यामात्परत एवाथ स्वपेद्ध्यायन् जनार्दनम् ।अन्तराले ततो बुद्‍ध्वा स्मरेत बहुशो हरिम्॥ १५॥
| verse_line1 =
यामात्परत एवाथ स्वपेद्ध्यायन् जनार्दनम्
अन्तराले ततो बुद्‍ध्वा स्मरेत बहुशो हरिम्॥ १५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V16
| verse_id = SSM_C01_V16
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्स्वभावम् ।करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ १६॥
| verse_line1 =
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्स्वभावम्
करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ १६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V17
| verse_id = SSM_C01_V17
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥ १७॥
| verse_line1 =
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥ १७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V18
| verse_id = SSM_C01_V18
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ १८॥
| verse_line1 =
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ १८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V19
| verse_id = SSM_C01_V19
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ १९॥
| verse_line1 =
यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ १९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V20
| verse_id = SSM_C01_V20
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥ २०॥
| verse_line1 =
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्
सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥ २०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V21
| verse_id = SSM_C01_V21
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।एतद्बुद्‍ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत'''॥ २१॥
| verse_line1 =
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ
एतद्बुद्‍ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत'''॥ २१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V22
| verse_id = SSM_C01_V22
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः'''॥ २२॥
| verse_line1 =
रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः
ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः'''॥ २२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V23
| verse_id = SSM_C01_V23
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥ २३॥
| verse_line1 =
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥ २३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V24
| verse_id = SSM_C01_V24
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥ २४॥
| verse_line1 =
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥ २४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V25
| verse_id = SSM_C01_V25
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।विष्णुभक्तिपरो दैवो विपरीतस्तथासुरः॥२५॥
| verse_line1 =
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च
विष्णुभक्तिपरो दैवो विपरीतस्तथासुरः॥२५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V26
| verse_id = SSM_C01_V26
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः॥२६॥
| verse_line1 =
स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित्
सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः॥२६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V27
| verse_id = SSM_C01_V27
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = धर्मो भवत्यधर्मोऽपि कृतो भक्तैस्तवाच्युत ।पापं भवति धर्मोऽपि यो न भक्तैः कृतो हरेः॥२७॥
| verse_line1 =
धर्मो भवत्यधर्मोऽपि कृतो भक्तैस्तवाच्युत
पापं भवति धर्मोऽपि यो न भक्तैः कृतो हरेः॥२७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V28
| verse_id = SSM_C01_V28
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।नित्यं भवेच्च मन्निष्ठो बुभूषुः पुरुषस्सदा॥२८॥
| verse_line1 =
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु
नित्यं भवेच्च मन्निष्ठो बुभूषुः पुरुषस्सदा॥२८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V29
| verse_id = SSM_C01_V29
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = एष नित्यः सदाचारो गृहिणो वनिनस्तथा ।वैश्वदेवं बलिं दन्तधावनं चाप्यृते वटोः॥२९॥
| verse_line1 =
एष नित्यः सदाचारो गृहिणो वनिनस्तथा
वैश्वदेवं बलिं दन्तधावनं चाप्यृते वटोः॥२९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V30
| verse_id = SSM_C01_V30
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = एवमेव यतेः स्वीयवित्तेन तु विना सदा ।मूलमन्त्रैः सदा स्नानं विष्णोरेव च तर्पणम्॥३०॥
| verse_line1 =
एवमेव यतेः स्वीयवित्तेन तु विना सदा
मूलमन्त्रैः सदा स्नानं विष्णोरेव च तर्पणम्॥३०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V31
| verse_id = SSM_C01_V31
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = विशेषो निष्क्रिययतेरजलाञ्जलिना तथा ।तर्पणं तु हरेरेव यतेरन्यस्य चोदितम्। समिद्धोमो वटोश्चैव स्मृत्वा विष्णुं हुताशने॥३१॥
| verse_line1 =
विशेषो निष्क्रिययतेरजलाञ्जलिना तथा
तर्पणं तु हरेरेव यतेरन्यस्य चोदितम्। समिद्धोमो वटोश्चैव स्मृत्वा विष्णुं हुताशने॥३१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V32
| verse_id = SSM_C01_V32
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = सर्ववर्णाश्रमैर्विष्णुरेक एवेज्यते सदा ।रमाब्रह्मादयस्तस्य परिवारत एव तु॥३२॥
| verse_line1 =
सर्ववर्णाश्रमैर्विष्णुरेक एवेज्यते सदा
रमाब्रह्मादयस्तस्य परिवारत एव तु॥३२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V33
| verse_id = SSM_C01_V33
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः ।सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥३३॥
| verse_line1 =
कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥३३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V34
| verse_id = SSM_C01_V34
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे ।सर्वाणि रूपाणि विचिन्त्य धीरः नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते॥ ३४॥
| verse_line1 =
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे
सर्वाणि रूपाणि विचिन्त्य धीरः नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते॥ ३४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V35
| verse_id = SSM_C01_V35
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान्प्रदिशश्चतस्रः ।तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते॥ ३५॥
| verse_line1 =
धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान्प्रदिशश्चतस्रः
तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते॥ ३५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V36
| verse_id = SSM_C01_V36
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = आनन्दतीर्थमुनिना व्यासवाक्यसमुद्धृतिः ।सदाचारस्य विषये कृता सङ्क्षेपतः शुभा॥ ३६॥
| verse_line1 =
आनन्दतीर्थमुनिना व्यासवाक्यसमुद्धृतिः
सदाचारस्य विषये कृता सङ्क्षेपतः शुभा॥ ३६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = SSM_C01_V37
| verse_id = SSM_C01_V37
| document_id   = SSM
| document_id = SSM
| chapter_id   = SSM_C01
| chapter_id = SSM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type = shloka
| verse_line1 = अशेषकल्याणगुणनित्यानुभवसत्तनुः ।अशेषदोषरहितः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥ ३९॥
| verse_line1 =
अशेषकल्याणगुणनित्यानुभवसत्तनुः
अशेषदोषरहितः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥ ३९॥
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = SSM_C01
| verse_id = SSM_C01
| id       = SSM_C01_author-note
| id = SSM_C01_author_note
| text     =
| text =
 
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिता सदाचारस्मृतिः समाप्ता॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिता सदाचारस्मृतिः समाप्ता॥
| extra_class = gr-author-note
}}
}}


[[Category:Sanskrit Documents]]
[[Category:Sanskrit Documents]]
[[Category:Sadacharasmriti]]
[[Category:Sadacharasmriti]]

Revision as of 17:55, 20 April 2026

सदाचारस्मृतिः


यस्मिन् सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो याति परं जयति सोऽच्युतः॥ १॥


स्मृत्वा विष्णुं समुत्थाय कृतशौचो यथाविधि । धौतदन्तः समाचम्य स्नानं कुर्याद् विधानतः॥ २॥


उद्धृतेति मृदाऽऽलिप्य द्विषडष्टषडक्षरैः ।

त्रिर्निमज्याप्यसूक्तेन प्रोक्षयित्वा पुनस्ततः ।

मृदाऽऽलिप्य निमज्य त्रिस्त्रिर्जपेदघमर्षणम्॥ ३॥


स्रष्टारं सर्वलोकानां स्मृत्वा नारायणं परम् ।

यतश्वासो निमज्याप्सु प्रणवेनोत्थितस्ततः ।

सिञ्चन् पुरुषसूक्तेन स्वदेहस्थं हरिं स्मरन्॥ ४॥


वसित्वा वास आचभ्य प्रोक्ष्याचम्य च मन्त्रतः । गायत्र्या चाञ्जलिं दत्वा ध्यात्वा सूर्यगतं हरिम्॥ ५॥


मन्त्रतः परिवृत्याथ समाचम्य सुरादिकान् । तर्पयित्वा निपीड्याथ वासो विस्तृत्य चाञ्जसा॥ ६॥


अर्कमण्डलगं विष्णुं ध्यात्वैव त्रिपदीं जपेत् । सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्॥ ७॥


आसूर्यदर्शनात्तिष्ठेत् ततस्तूपविशेत वा ।

पूर्वां सन्ध्यां सनक्षत्राम् उत्तरां सदिवाकराम् ।

उत्तरामुपविश्यैव वाग्यतः सर्वदा जपेत्॥८॥


ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥९॥


गायत्र्यास्त्रिगुणं विष्णुं ध्यायन्नष्टाक्षरं जपेत् ।

प्रणम्य देवान् विप्रांश्च गुरूंश्च हरिपार्षदान् ।

एवं सर्वोत्तमं विष्णुं ध्यायन्नेवार्चयेद्धरिम्॥ १०॥


ध्यानप्रवचनाभ्यां च यथायोग्यमुपासनम् ।

धर्मेणेज्यासाधनानि साधयित्वा विधानतः ।

स्नात्वा सम्पूजयेद्विष्णुं वेदतन्त्रोक्तमार्गतः॥ ११॥


वैश्वदेवं बलिं चैव कुर्यान्नित्यं तदर्पणम् ।

इष्टं दत्तं हुतं जप्तं पूर्तं यच्चात्मनः प्रियम् ।

दारान् सुतान् प्रियान् प्राणान् परस्मै सन्निवेदयेन्॥ १२॥


भुक्तशेषं भगवतो भृत्यातिथिपुरस्सरः ।

भुञ्जीत हृद्गतं विष्णुं स्मरंस्तद्गतमानसः ।

आचम्य मूलमन्त्रेण कोष्ठं स्वमभिमन्त्रयेत्॥ १३॥


वेदशास्त्रविनोदेन प्रीणयन् पुरुषोत्तमम् । अहःशेषं नयेत्सन्ध्याम् उपासीताथ पूर्ववत्॥ १४॥


यामात्परत एवाथ स्वपेद्ध्यायन् जनार्दनम् । अन्तराले ततो बुद्‍ध्वा स्मरेत बहुशो हरिम्॥ १५॥


कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्स्वभावम् । करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ १६॥


द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥ १७॥


उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ १८॥


यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ १९॥


यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥ २०॥


इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुद्‍ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥ २१॥


रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः । ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः॥ २२॥


ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥ २३॥


ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥ २४॥


द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च । विष्णुभक्तिपरो दैवो विपरीतस्तथासुरः॥२५॥


स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् । सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः॥२६॥


धर्मो भवत्यधर्मोऽपि कृतो भक्तैस्तवाच्युत । पापं भवति धर्मोऽपि यो न भक्तैः कृतो हरेः॥२७॥


मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । नित्यं भवेच्च मन्निष्ठो बुभूषुः पुरुषस्सदा॥२८॥


एष नित्यः सदाचारो गृहिणो वनिनस्तथा । वैश्वदेवं बलिं दन्तधावनं चाप्यृते वटोः॥२९॥


एवमेव यतेः स्वीयवित्तेन तु विना सदा । मूलमन्त्रैः सदा स्नानं विष्णोरेव च तर्पणम्॥३०॥


विशेषो निष्क्रिययतेरजलाञ्जलिना तथा । तर्पणं तु हरेरेव यतेरन्यस्य चोदितम्। समिद्धोमो वटोश्चैव स्मृत्वा विष्णुं हुताशने॥३१॥


सर्ववर्णाश्रमैर्विष्णुरेक एवेज्यते सदा । रमाब्रह्मादयस्तस्य परिवारत एव तु॥३२॥


कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥३३॥


वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे । सर्वाणि रूपाणि विचिन्त्य धीरः नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते॥ ३४॥


धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान्प्रदिशश्चतस्रः । तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते॥ ३५॥


आनन्दतीर्थमुनिना व्यासवाक्यसमुद्धृतिः । सदाचारस्य विषये कृता सङ्क्षेपतः शुभा॥ ३६॥


अशेषकल्याणगुणनित्यानुभवसत्तनुः । अशेषदोषरहितः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥ ३९॥


॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिता सदाचारस्मृतिः समाप्ता॥