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Yamakabharatam: Difference between revisions

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| verse_line1 = ध्यायेत् तं(ध्यायेत्) परमानन्दं यन्माता पतिमयदपरमानन्दम् ।उज्झितपरमानं दम्पत्याद्याद्याश्रमैः सदैव परमानन्दम् ॥१॥
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ध्यायेत् तं(ध्यायेत्) परमानन्दं यन्माता पतिमयदपरमानन्दम्
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| verse_line1 = यस्य करालोलं चक्रं कालः परः स हि कराऽलोऽम् ।यस्य गदा पवमानः सन्(गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा) यो व्यासोऽभवत् सदापवमानः ॥२॥
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यस्य करालोलं चक्रं कालः परः स हि कराऽलोऽम्
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| verse_line1 = परमेषु यदा तेजः परमेषु चकार वासुदेवोऽजः ।मानधि बिभ्रत्सु मनो माऽनधिमाऽऽसीन्न वासुदेवो जः ॥४॥
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| verse_line1 = सोऽजनि देवक्यन्ते यस्मादनुकम्पनावदेव क्यन्ते ।अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥
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| verse_line1 = नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन) ।तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥
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नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन)
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| verse_line1 = ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात् ।तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥
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ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात्
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| verse_line1 = अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली ।अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥
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अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली
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मुखलालनलोला तन्मुखगं जगदचष्ट सालनलोलातत्
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तस्य सुशर्माण्यकरो दरिणो गर्गः सदुक्तिकर्माण्यकरोत्
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तस्य सखा बलनामा ज्येष्ठो भ्राताऽथ यन्निजाबलना मा
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तेन हतो वातरयस्तृणचक्रो नाम दितिसुतोऽवातरयः
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सोऽवनिमध्ये रङ्गन् अरिदरयुग् बालरूपमध्येरं गन्
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अथ साऽन्तरिताऽमानं विष्णुं विश्वोद्भवं (तदाऽ)सदान्तरितामानम्
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चक्रे सोऽर्जुननाशं प्राप्नोति च (त)यत्स्मृतिः सदाऽर्जुनना शम्
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अथ वृन्दावनवासं गोपाश्चक्रुर्जगत्क्षिताऽवनवासम्
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अहनद् वत्सतनूकं(वत्सतनुकं) योऽपाल्लोकं स्वयत्नवत्सतनूकम्(वत्सतनुकं)
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हत्वा धेनुकमूढं बलात् प्रलम्बं च खेट् सधेनुकमूढम्
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गिरिणा रक्षाऽपि कृता व्रजस्य तेन स्वरक्षरक्षापिकृता
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रेमे गोपीष्वरिहा स मन्मथाक्रान्तसुन्दरीपीष्वरिहा।
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मृत्नन्(मृद्गन्) गजमुग्रबलं सबऽलो रङ्गं विवेश सृतिमुग्रबऽम्
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प्रादात् सान्दीपनये मृतपुत्रं ज्ञानदीपसन्दीपनये(सान्दीपनये)
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जित्वा मागधराजं तोषितमकरोत् सदात्मयोगधराजम्
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| verse_line1 = तानिन्द्रस्थलवासांश्चक्रे कृष्णः परो(पुरो) निजस्थलवासान् ।स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥
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तानिन्द्रस्थलवासांश्चक्रे कृष्णः परो(पुरो) निजस्थलवासान्
स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥
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वालिवधानुनयाय प्रणयी सख्यं सुसन्दधे नु नयाय
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मातुः परिभवहान्यै राज्ञा द्युसदामितश्च परिभवहाऽन्यैः(न्यै)
अभवन्नरकमुरारिर्योऽवासीदत्(योऽवात्सीदत्) समस्तनरकमुरारिः ॥३५॥
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सुरतरुमापाऽलिमतात् प्रकाशयञ्छक्तिमात्मनः पाळिमतात्
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शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्)
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यस्याज्ञाबलसारैः पार्थैर्दिग्भ्यो हृतं धनं बलसारैः
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अथ पार्थान् क्रतुराजं प्रापयदमरेट् सरुद्रशक्रतुराजम्
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निहतौ सौभकरूशौ शीतो भातश्च येन तौ भकरूशौ(भाकरूशौ)
अजयद् रुद्रं च रणे बाणार्थेऽवनतिपतितकचन्द्रं चरणे ॥४२॥
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असृजज्ज्वरमुग्रतमःक्षयप्रदो लीलयाऽधिवरमुग्रतमः
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यस्यावेशोरुबलान्न्यहनत् पार्थोऽसुरान् प्रजेशोरुबलान्(त्)
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यस्यावेशात् स बलः प्रचकर्ष पुरं प्रसह्य वेशात् सबलः
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यद्बलवान् क्रोधवशान्निनाय नाशं वृकोदरः क्रोधवशान्
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यद्बलभारवहत्वान्नाचलदुरगादिभिः सुभारवहत्वात्(त्वम्)
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न हि नहुषोऽलं नहितुं धर्मो द्रौणिस्तथेतरो(रे)ऽलं नहितुम्
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क्षात्रं धर्मं स्ववता गुरुवृत्त्यै केशवाज्ञया च मं (मे/मलं) स्ववता
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यद्भक्तप्रवरेण प्रोतः स्वस्मिन् स कीचकः प्रवरेण
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यद्भक्त्याऽनुगृहीतौ पार्थो भीमश्च गोनृपौ नु गृहीतौ(निगृहीतौ)
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यां स्प्रष्टुमिच्छन्तमजातशत्रुं न्यवारयत् स्वस्थमजातशत्रुम्
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यस्य सुनीतिसहायान्न(सुनीतसहायान्न) रिपून् मेनेऽर्जुनः समेतसहा यान्
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ज्ञानं परमं प्रादाद् भीष्मगतः सृतिविमोक्षचरमं प्रादात्
पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥
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तेनावापि सुजातैर्हरिमेधस्तुरगवर्तनेऽपि(तुरगावर्तनेऽपि) सुजातैः
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तदनु स (सु)पाण्डुतनूजै रेमे क्ष्मां पालयन् सुपाण्डुतनूजैः
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सुगतिं (पर)चरमामददान्निजयोग्यां ज्ञानिसुततिं(ति) परमामददात्
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नैव परः केशवतः परमादरस्मात् समश्च सुकेशवतः(सुखकेशवतः)
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इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं यमकभारतम्(महाभारततात्पर्यम्) ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं यमकभारतम्(महाभारततात्पर्यम्) ॥
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Revision as of 17:56, 20 April 2026

यमकभारतम्


ध्यायेत् तं(ध्यायेत्) परमानन्दं यन्माता पतिमयदपरमानन्दम् । उज्झितपरमानं दम्पत्याद्याद्याश्रमैः सदैव परमानन्दम् ॥१॥


यस्य करालोलं चक्रं कालः परः स हि कराऽलोऽम् । यस्य गदा पवमानः सन्(गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा) यो व्यासोऽभवत् सदापवमानः ॥२॥


यस्य रमा न मनोगं जगृहे विश्वम्भराऽपि न मनोऽगम् । यस्य पुमानानन्दं भुङ्क्ते यद् धाम कपतिमानानन्दम् ॥३॥


परमेषु यदा तेजः परमेषु चकार वासुदेवोऽजः । मानधि बिभ्रत्सु मनो माऽनधिमाऽऽसीन्न वासुदेवो जः ॥४॥


सोऽजनि देवक्यन्ते यस्मादनुकम्पनावदेव क्यन्ते । अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥


नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन) । तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥


ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात् । तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥


अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली । अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥


मुखलालनलोला तन्मुखगं जगदचष्ट सालनलोलातत् । नाध्यैन्मायामस्य जगत्प्रभोः स्वधिकतततमायामस्य(स्वाधिकतततमायामस्य) ॥९॥


तस्य सुशर्माण्यकरो दरिणो गर्गः सदुक्तिकर्माण्यकरोत् । अवदन्नामानमयं जगदादि वासुदेवनामानमयम् ॥१०॥


तस्य सखा बलनामा ज्येष्ठो भ्राताऽथ यन्निजाबलना मा । यस्य च पर्यङ्कोऽयं पूर्वतनो विष्णुमजसपर्यं कोऽयम् ॥११॥


तेन हतो वातरयस्तृणचक्रो नाम दितिसुतोऽवातरयः । हरमाणो (बा)वालतमं स्वात्मानं कण्ठरोधिनाऽवालतमम् ॥१२॥


सोऽवनिमध्ये रङ्गन् अरिदरयुग् बालरूपमध्येरं गन् । अमुषन्नवनीतमदः (स्व)सगोकुले गोपिकासु नवनीतमदः ॥१३॥


तन्माता कोपमिता तमनुससारात्मवादवाकोपमिता(त्मवाकोपमिता) । जगृहे सा नमनं तं देवं (तं चिन्तयैव)तच्चिन्तयैव सानमनन्तम् ॥१४॥


अथ साऽन्तरिताऽमानं विष्णुं विश्वोद्भवं (तदाऽ)सदान्तरितामानम् । अनयद् दामोदरतां योऽरमयत् सुन्दरीं निजामोदरताम् ॥१५॥


चक्रे सोऽर्जुननाशं प्राप्नोति च (त)यत्स्मृतिः सदाऽर्जुनना शम् । तौ च गतौ निजमोकस्तेनैव नुतेन यन्निजो निजमोकः(यन्निजानिजमोकः) ॥१६॥


अथ वृन्दावनवासं गोपाश्चक्रुर्जगत्क्षिताऽवनवासम् । तत्र बकासुरमारः शौरिरभून्नित्यसंश्रितासुरमारः ॥१७॥


अहनद् वत्सतनूकं(वत्सतनुकं) योऽपाल्लोकं स्वयत्नवत्सतनूकम्(वत्सतनुकं) । सोपाद् वत्सानमरः सहाग्रजो गोपवत्सवत्सानमरः(गोपवत् सुवत्सानमरः) ॥१८॥


सः विभुः श्रीमानहिके ननर्त यस्य श्रमानमा मा न हि के । अकरोन्नद्युदकान्तं कान्तं नीत्वोरगं स नाद्युदकान्तम् ॥१९॥


हत्वा धेनुकमूढं बलात् प्रलम्बं च खेट् सधेनुकमूढम् । व्रजमावीदमृताशः पीत्वा वह्निं चरस्थिरादमृताशः(चरस्थितादमृताशः) ॥२०॥


गिरिणा रक्षाऽपि कृता व्रजस्य तेन स्वरक्षरक्षापिकृता । शक्राय व्यञ्जयता स्वां शक्तिं विश्वमात्मनाऽव्यं जयता ॥२१॥


रेमे गोपीष्वरिहा स मन्मथाक्रान्तसुन्दरीपीष्वरिहा। पूर्णानन्दैकतनुः स विश्वरुक्पावनोऽप्यनन्दैकतनुः (प्यानन्दैकतनुः)॥२२॥


अथ हतयोर्गलिकेशयोः श्वफल्कजप्रापितः पुरीं गलिकेश्योः । भङ्‍क्त्वा धनुराजवरं जघान तेनैव च स्वयं राजवरम् ॥२३॥


मृत्नन्(मृद्गन्) गजमुग्रबलं सबऽलो रङ्गं विवेश सृतिमुग्रबऽम् । हत्वा मल्लौ बलिनौ कंसं च विमोक्षितौ(विमोक्षिता) ततौ लौ बलिनौ(रौ बलिनौ) ॥२४॥


प्रादात् सान्दीपनये मृतपुत्रं ज्ञानदीपसन्दीपनये(सान्दीपनये) । गुर्वर्थेऽज्ञानतमःप्रभेदिता नित्यसम्भृताज्ञानतमः ॥२५॥


जित्वा मागधराजं तोषितमकरोत् सदात्मयोगधराजम् । अनु कुर्वन् निजसदनं चक्रे रम्यां पुरीं(रम्यं पुरं) सुबोधनिजसदनम् ॥२६॥


प्रसभं सगजबलस्य क्षत्रस्योच्चैः समगधराजबलस्य । मानं शिशुपालवरं हत्वा भैष्मीमवाप शिशुपालवरम् ॥२७॥


हंसो (डिभि)डिभकश्चपलावमुना संसूदितौ यवनकश्च पला । कीर्तिर्विमला विरता प्रतता विश्वाधिपावनीलाविरता ॥२८॥


सत्याजाम्बवतीर्या भार्या विन्दाद्या भानुसाम्बवतीर्याः । प्रद्युम्नं (स्वमोदरतः)मोदरतः प्राप ज्येष्ठं हरिः सुतं मोदरतः ॥२९॥


यत्परिवारतयेशा जाता देवा नृपात्मजा रतयेशाः । यद्भरितं विषसर्पप्रभृति ध्वान्तं न मारुतिं विषसर्प ॥३०॥


येन हिडिम्बबकाद्या रक्षोधीशा निपातिता बबकाद्याः । भीमे प्रीतिममेयां व्यञ्जयता तेनैव(तेन) शेषपाति ममे याम् ॥३१॥


अथ कृष्णावरणे तान् प्राप्तान् राज्ञोऽशृणोत् सदावरणेतान् । द्रष्टुं यातः सबलस्तां चानैषीत् पृथासुतांस्ततः सबलः ॥३२॥


तानिन्द्रस्थलवासांश्चक्रे कृष्णः परो(पुरो) निजस्थलवासान् । स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥


वालिवधानुनयाय प्रणयी सख्यं सुसन्दधे नु नयाय । वासवजेन विशेषात् तेनैव पुनर्नृजन्मजेन विशेषात् ॥३४॥


मातुः परिभवहान्यै राज्ञा द्युसदामितश्च परिभवहाऽन्यैः(न्यै) । अभवन्नरकमुरारिर्योऽवासीदत्(योऽवात्सीदत्) समस्तनरकमुरारिः ॥३५॥


नीतो दिवि देववरै रेमे सत्यासमन्वितोऽदेववरैः । सर्वर्तुवने शशिना निशि सत्यां वासरे वनेऽशशिना ॥३६॥


सुरतरुमापाऽलिमतात् प्रकाशयञ्छक्तिमात्मनः पाळिमतात् । सुरवरवीरेषु दरी प्रधानजीवेश्वरः परेषुदरी ॥३७॥


पुरमभियायारिदरी दत्वा भद्रां पृथासुतायारिदरी । शक्रपुरीमभियातः प्रादाद् वह्नेर्वनं सतामभियातः ॥३९॥


शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्) । तं स्वात्मेन्द्रवरेण व्यधुनोद् भीमेन धूतरुद्रवरेण ॥३९॥


यस्याज्ञाबलसारैः पार्थैर्दिग्भ्यो हृतं धनं बलसारैः । जित्वा क्ष्मामविशेषां प्रसह्य भूपान् समस्तकामविशेषाम् ॥४०॥


अथ पार्थान् क्रतुराजं प्रापयदमरेट् सरुद्रशक्रतुराजम् । पूजा तेनावापि च्छिन्नश्चैद्यः सृतिं गते नावाऽपि ॥४१॥


निहतौ सौभकरूशौ शीतो भातश्च येन तौ भकरूशौ(भाकरूशौ) । अजयद् रुद्रं च रणे बाणार्थेऽवनतिपतितकचन्द्रं चरणे ॥४२॥


असृजज्ज्वरमुग्रतमःक्षयप्रदो लीलयाऽधिवरमुग्रतमः । क्रीडामात्रं विश्वं प्रकाशयन्नात्मनः स विहरकमात्रं विश्वम् ॥४३॥


यस्यावेशोरुबलान्न्यहनत् पार्थोऽसुरान् प्रजेशोरुबलान्(त्) । वरदानादस्यैव जगत्प्रभोरीरणात् समनुगतनादस्यैव ॥४४॥


यस्यावेशात् स बलः प्रचकर्ष पुरं प्रसह्य वेशात् सबलः । कुरुपतिनाम नु यमुना कृष्टा(कृष्णा) येनाहुरर्ह्यमतनु(येनाहुरर्घ्यमतनु) यमुना ॥४५॥


यद्बलवान् क्रोधवशान्निनाय नाशं वृकोदरः क्रोधवशान् । लेभे चान्यागम्यं स्थानं पुष्पाणि धाम चान्यागम्यम् ॥४६॥


यद्बलभारवहत्वान्नाचलदुरगादिभिः सुभारवहत्वात्(त्वम्) । धर्मादरिहाऽपि पदं भीमो येनैव साहसं (लिहाऽऽपि)रिहाऽऽपि पदम् ॥४७॥


न हि नहुषोऽलं नहितुं धर्मो द्रौणिस्तथेतरो(रे)ऽलं नहितुम् । नो राट् कर्णो(र्णौ) ब्रह्मवरी येन ध्वस्तोस्त्रमग्रहीत् सुब्रह्म वरी(सब्रह्मवरी) ॥४८॥


क्षात्रं धर्मं स्ववता गुरुवृत्त्यै केशवाज्ञया च मं (मे/मलं) स्ववता । सर्वं सेहे मनसा भीमेनेशैकमानिना हेमनसा ॥४९॥


यद्भक्तप्रवरेण प्रोतः स्वस्मिन् स कीचकः प्रवरेण । पतितास्तस्य सहायाः कृष्णार्थे मानिनः समस्य सहायाः ॥५०॥


यद्भक्त्याऽनुगृहीतौ पार्थो भीमश्च गोनृपौ नु गृहीतौ(निगृहीतौ)। ऋणमुक्त्यै सुव्यत्यस्त्यै क्रमशो वीरावमुञ्चतां सुव्यत्यस्त्यै ॥५१॥


यद्भक्त्याऽमितयाऽलं कृष्णा कार्ये विवेश कृष्णाकार्ये । यामीरार्द्धतनुत्वान्नापाद् भीमादृतेऽपि नापाद् भीमात् ॥५२॥


यां स्प्रष्टुमिच्छन्तमजातशत्रुं न्यवारयत् स्वस्थमजातशत्रुम् । शंरूपाने नित्यरतेरियं श्रीरिति स्म देवेड्यदितेरियं श्रीः ॥५३॥


मनसामनसाऽमनसा मनसा यमनन्तमजस्रमवेदनुया । विलयं विलयं विलयं विलयन्निखिऽलं त्वशुभं प्रचकार च यः(या) ॥५४॥


सोऽगाद् दूतमुखेन प्रभुणेदं वर्तते यदूतमुखेन । पार्थार्थे बहुतनुतां यत्र प्रकाशयन्(त्) स्वयं सबहुतनुताम् ॥५५॥


गुरुकर्णनदीजानवधीच्चक्षुर्बलेन जनदीजादी । शक्त्या निजया परवान् स्वजनानुद्रेचयन्ननन्तयाऽपरवान् ॥५६॥


यस्य सुनीतिसहायान्न(सुनीतसहायान्न) रिपून् मेनेऽर्जुनः समेतसहा यान् । अकरोच्चासु परासुप्रततिं सेनासु धावनासुपरासु ॥५७॥


येन जयद्रथमारः पार्थः(पात्रा) शत्रूनवापतद्रथमारः । यद्विरहादपि देहे स रथः शश्वत् स्थितेः सदादपि देहे ॥५८॥


यद्भरितो भरताभः प्रभुरम्भाभावितोऽभिभरताभः । भीमो रभसाऽभिभवी प्रसभं भा भाभिभूर्भसा(भासा) भिभवी ॥५९॥


यदनुग्रहिपूर्णत्वाद्(यदनुग्रहपूर्णत्वाद्) भीमः सर्वानरीननहिपूर्णत्वात् । अदहत् बाहुबलेन क्रोधाग्नावाहितान् निजाहुबलेन ॥६० ॥


कृष्णाभीमाप्ततमः शीर्णं येन स्वकीयहृदयमाप्ततमः । धृतराष्ट्रसुतानवधीत् भीमेन स्थापितो मनसि सुसुतानवधीत् ॥६१॥


भीमविपाटितदेहानदर्शयत्(विपातित/निपातित) स्वानरीन् विपाटितदेहान् । कृष्णाया हितकारी सम्यगीरप्रियः सदाऽहितकारी ॥६२॥


अथ हरिणा पीतबलं द्रौणेरस्त्रं महारिणाऽपीतबलम् । दधता वासोमरणं नीतं चक्रेऽभिमन्युजं सोमरणम् ॥६३॥


तस्य च रक्षा सुकृता जनार्दनेनेशशेषकेक्षासुकृता । पार्थेषु प्रेमवता नित्यं भर्त्रासुतासुविप्रेमवता ॥६४॥


ज्ञानं परमं प्रादाद् भीष्मगतः सृतिविमोक्षचरमं प्रादात् । पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥


तेनावापि सुजातैर्हरिमेधस्तुरगवर्तनेऽपि(तुरगावर्तनेऽपि) सुजातैः । पाण्डुसुतैः (सवसूकैराप्तैर्व्यासात्मना)सवसूकैः प्राप्तैर्व्यासात्मना च सुसवसूकैः ॥६६॥


तदनु स (सु)पाण्डुतनूजै रेमे क्ष्मां पालयन् सुपाण्डुतनूजैः । अनुपमसुखरूपोऽजः परमः श्रीवल्लभः सति खरूपो जः(सुखरूपो जः/सति सुखरूपोजः) ॥६७॥


सुगतिं (पर)चरमामददान्निजयोग्यां ज्ञानिसुततिं(ति) परमामददात् । पार्थानां सयदूनां स (परम)पितृप्रेष्यादिनामिनां सयदूनाम् ॥६८॥


रेमे तत्रापिसुखी परमोऽनन्तो ननन्द तत्रापि सुखी । प्राणेनेन्दिरया च प्रयुतो नित्यं महागुणेन्दिरया च ॥६९॥


एवं सर्वाणि हरे रूपाणि श्रीपतेः सुपर्वाणिहरेः । पूर्णसुखानि सुभान्ति प्रततानि निरन्तराणि (नि)सुभान्ति ॥७०॥


राम राम महाबाहो माया ते सुदुरासदा । वाद सादद को लोके पादावेव तवासजेत् ॥७१॥


जेत् सवातव वेदापाऽके लोकोदद सादवा । दासरादुसुतेयामाहोवाहा मम राम रा(राः) ॥७२॥


देवानां पतयो नित्यं मतं यस्य न जानते(नो मतं यस्य जानते) । तस्मै देव नमस्तेऽहं भवतेऽसुरमारये ॥७३॥


समस्तदेवजनकवासुदेवपरामृत । वासुदेव परामृत ज्ञानमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥७४॥


देवादे देवऽलोकप पूर्णानन्दमहोदधे । सर्वज्ञेश रमानाथ देवाऽदेऽदेऽव लोकप ॥७५॥


यो निर्ममेऽशेषपुराणविद्यां यो निर्ममेशे षपुराणविद्याम् । योनिर्ममेशेषपुराणविद्यां योऽनिर्ममेशेषपुराणविद्याम् ॥७६॥


अनन्तपारामितविक्रमेश प्रभो रमापारमनन्तपार । महागुणाढ्यापरिमेयसत्त्व रमालयाशेषमहागुणाढ्य ॥७७॥


भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा । भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ॥७८॥


नैव परः केशवतः परमादरस्मात् समश्च सुकेशवतः(सुखकेशवतः)। सोऽयं शपथवरो नः शश्वत् सन्धारितः सुशपथवरोऽनः ॥७९॥


कृष्णकथेयं यमिता (सुश)सुखतीर्थेनोदिताऽनने यं यमिता । भक्तिमता परमेशे सर्वोद्रेका सदानुताऽप रमेशे ॥८०॥


इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा । पूर्ण गुणैर्धिक(गुणैरधिक) पूर्णज्ञानेच्छाभक्तिभिः(पूर्णज्ञानेच्छाशक्तिभिः) स्वधिकपूर्ण(र्णः) ॥८१॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं यमकभारतम्(महाभारततात्पर्यम्) ॥