Tattvasankhyanam: Difference between revisions
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बन्धो मोक्षः सुखं दुःखमावृत्तिर्ज्योतिरेव च । | | verse_line2 = विष्णुनास्य समस्तस्य समासव्यासयोगतः ॥11॥ | ||
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Revision as of 17:28, 28 April 2026
तत्त्वसङ्ख्यानम्
- तत्वसङ्ख्यानविवरणम् — श्रीजयतीर्थः
स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्त्वमिष्यते ।स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुः भावाभावौ द्विधेतरत् ॥1॥
प्राक्प्रध्वंससदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ।चेतनाचेतनत्वेन भावोऽपि द्विविधो मतः ॥2॥
दुःखस्पृष्टं तदस्पृष्टमिति द्वेधैव चेतनम् ।नित्यादुःखा रमाऽन्ये तु स्पृष्टदुःखास्समस्तशः ॥3॥
स्पृष्टदुःखा विमुक्ताश्च दुःखसंस्था इति द्विधा ।दुःखसंस्था मुक्तियोग्या अयोग्या इति च द्विधा ॥4॥
देवर्षिपितृपनरा इति मुक्तास्तु पञ्चधा ।एवं विमुक्तियोग्याश्च तमोगाः सृतिसंस्थिताः ॥5॥
इति द्विधा मुक्त्ययोग्या दैत्यरक्षपिशाचकाः ।मर्त्याधमाश्चतुर्धैव तमोयोग्याः प्रकीर्तिताः ॥6॥
ते च प्राप्तान्धतमसः सृतिसंस्था इति द्विधा ।नित्यानित्यविभागेन त्रिधैवाचेतनं मतम् ॥7॥
नित्या वेदाः पुराणाद्याः कालः प्रकृतिरेव च ।नित्यानित्यं त्रिधा प्रोक्तमनित्यं द्विविधं स्मृतम् ॥8॥
असंसृष्टं च संसृष्टमसंसृष्टं महानहम् ।बुद्धिर्मनःखानि दश मात्रा भूतानि पञ्च च ॥9॥
संसृष्टमण्डं तद्गं च समस्तं सम्प्रकीर्तितम् ।सृष्टिः स्थितिः संहृतिश्च नियमोऽज्ञानबोधने ॥10॥
बन्धो मोक्षः सुखं दुःखमावृत्तिर्ज्योतिरेव च ।विष्णुनास्य समस्तस्य समासव्यासयोगतः ॥11॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं तत्त्वसङ्ख्यानम् ॥