Vadavali: Difference between revisions
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<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः भङ्गः"></span> | |||
== प्रथमः भङ्गः == | == प्रथमः भङ्गः == | ||
<span id="gr-C1-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="प्रथमः भङ्गे"></span> | <span id="gr-C1-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="प्रथमः भङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">प्रथमः भङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">प्रथमः भङ्गे</p> | ||
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<div class="section" id="VA_C01_S01"> | |||
<div class="verse" id="VA_C01_S01_V01" type="mantra" data-doc="VA"> | <div class="verse" id="VA_C01_S01_V01" type="mantra" data-doc="VA"> | ||
<div class="verse-text"> | <div class="verse-text"> | ||
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</div> | </div> | ||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयभङ्गः"></span> | |||
== द्वितीयभङ्गः == | == द्वितीयभङ्गः == | ||
<span id="gr-C2-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वितीयभङ्गे"></span> | <span id="gr-C2-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वितीयभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">द्वितीयभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">द्वितीयभङ्गे</p> | ||
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<div class="section" id="VA_C02_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C02_S01_B01" data-verse="VA_C02_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C02_S01_B01" data-verse="VA_C02_S01"> | ||
<p>मूलम्-तथा हि। अनिर्वचनीयत्वं किं निर्वचनविरहो वा निर्वाच्यविरहो वा। नाद्यः। स्वाभ्युपगतव्यवहारविषयत्वविरोधात्। द्वितीये सत्वविरहो वाऽसत्त्वविरहो वा। नाद्यः। असतोऽनिर्वाच्यतापातात्। नोत्तरः। ब्रह्मणोऽनिर्वाच्यतापातात्। अथ सदसद्वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वमिति मतं तदाऽस्माभिर्जगतः सदसद्रूपताऽनभ्युपगमात्सिद्धसाधनता। अथ प्रत्येकमुभयवैलक्षण्यं विवक्षितं तथाऽप्यसद्ब्रह्मवैलक्षण्याभ्युपगमेन प्रस्तुतदोषानिस्तारः। एतेन सदसत्त्वानधिकरणत्वमनिर्वचनीयत्वमित्यपास्तम्।प्रत्येकं सदसत्त्वाभ्यां विचारपदवीं न यत्। गाहते तदनिर्वाच्यमाहुर्वेदान्त (वादिन) वेदिनः।।इति चेन्न। तादृशवस्तुनोऽ(प्र)सिद्धत्वेनाप्रसिद्धविशेषणत्वात्। असत्त्वविरहे सत्त्वस्य सत्त्वविरहेऽसत्त्वस्य (निपतितत्वे) नियतत्वेनोभयविरहितत्वं व्याहतमेव।</p> | <p>मूलम्-तथा हि। अनिर्वचनीयत्वं किं निर्वचनविरहो वा निर्वाच्यविरहो वा। नाद्यः। स्वाभ्युपगतव्यवहारविषयत्वविरोधात्। द्वितीये सत्वविरहो वाऽसत्त्वविरहो वा। नाद्यः। असतोऽनिर्वाच्यतापातात्। नोत्तरः। ब्रह्मणोऽनिर्वाच्यतापातात्। अथ सदसद्वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वमिति मतं तदाऽस्माभिर्जगतः सदसद्रूपताऽनभ्युपगमात्सिद्धसाधनता। अथ प्रत्येकमुभयवैलक्षण्यं विवक्षितं तथाऽप्यसद्ब्रह्मवैलक्षण्याभ्युपगमेन प्रस्तुतदोषानिस्तारः। एतेन सदसत्त्वानधिकरणत्वमनिर्वचनीयत्वमित्यपास्तम्।प्रत्येकं सदसत्त्वाभ्यां विचारपदवीं न यत्। गाहते तदनिर्वाच्यमाहुर्वेदान्त (वादिन) वेदिनः।।इति चेन्न। तादृशवस्तुनोऽ(प्र)सिद्धत्वेनाप्रसिद्धविशेषणत्वात्। असत्त्वविरहे सत्त्वस्य सत्त्वविरहेऽसत्त्वस्य (निपतितत्वे) नियतत्वेनोभयविरहितत्वं व्याहतमेव।</p> | ||
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</div> | |||
<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयभङ्गः"></span> | |||
== तृतीयभङ्गः == | == तृतीयभङ्गः == | ||
<span id="gr-C3-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="तृतीयभङ्गे"></span> | <span id="gr-C3-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="तृतीयभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">तृतीयभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">तृतीयभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C03_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C03_S01_B01" data-verse="VA_C03_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C03_S01_B01" data-verse="VA_C03_S01"> | ||
<p>मूलम् किञ्च न सदसद्विलक्षणत्वे मानम्। विवादपदं सदसद्विलक्षणमिति प्रतिज्ञायां पक्षस्याप्रसिद्ध विशेषणत्वप्रसङ्गात्।</p> | <p>मूलम् किञ्च न सदसद्विलक्षणत्वे मानम्। विवादपदं सदसद्विलक्षणमिति प्रतिज्ञायां पक्षस्याप्रसिद्ध विशेषणत्वप्रसङ्गात्।</p> | ||
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</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थः भङ्गः"></span> | |||
== चतुर्थः भङ्गः == | == चतुर्थः भङ्गः == | ||
<span id="gr-C4-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="चतुर्थभङ्गे"></span> | <span id="gr-C4-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="चतुर्थभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">चतुर्थभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">चतुर्थभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C04_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C04_S01_B01" data-verse="VA_C04_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C04_S01_B01" data-verse="VA_C04_S01"> | ||
<p>मूलम्-सच्चेन्न बाध्येतेत्यत्र किमिदं सद्विक्षितं किं सत्तायुक्तमथाबाध्यमुत ब्रह्मस्वरूपम्। नाद्यः। सत्तायुक्तस्य प्रपञ्चस्य भवन्मते बाध्यतया यत्सत्तदबाध्यमिति व्याप्त्यसिद्धेः। न द्वितीयः। यदबाध्यं तदबाध्यमिति साध्याविशिष्टत्वात्। न तृतीयः। सिद्धसाधनत्वात्।</p> | <p>मूलम्-सच्चेन्न बाध्येतेत्यत्र किमिदं सद्विक्षितं किं सत्तायुक्तमथाबाध्यमुत ब्रह्मस्वरूपम्। नाद्यः। सत्तायुक्तस्य प्रपञ्चस्य भवन्मते बाध्यतया यत्सत्तदबाध्यमिति व्याप्त्यसिद्धेः। न द्वितीयः। यदबाध्यं तदबाध्यमिति साध्याविशिष्टत्वात्। न तृतीयः। सिद्धसाधनत्वात्।</p> | ||
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</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमभङ्गः"></span> | |||
== पञ्चमभङ्गः == | == पञ्चमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C5-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="पञ्चमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C5-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="पञ्चमभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">पञ्चमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">पञ्चमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C05_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C05_S01_B01" data-verse="VA_C05_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C05_S01_B01" data-verse="VA_C05_S01"> | ||
<p>मूलम्-अविद्यायां चैवंविधायां किं प्रमाणम्। देवदत्तप्रमा तत्स्थप्रमाप्रागभावातिरेकिणोऽनादेर्ध्वंसिका प्रमात्वादविगीतप्रमा यथेत्यनुमानं मानमिति चेन्न। घटोऽयमेतद्धटप्रागभावव्यतिरिक्तानादेर्निवर्तको घटत्वाद्वटान्तरवदित्याभाससमानयोगक्षेमत्वात्। एतेन विगीतो भ्रम एतज्जनकाबाध्यातिरिक्तोपादाननकः विभ्रमत्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति च निरस्तम्। अनादित्वप्रमानिवर्त्यत्वयोर्विरोधाच्च। देवदत्तप्रमा देवदत्तगतैतत्प्रमाप्रागभावातिनिक्तानादेर्निवर्तिका न भवति प्रमात्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति सत्प्रतिपक्षता च।</p> | <p>मूलम्-अविद्यायां चैवंविधायां किं प्रमाणम्। देवदत्तप्रमा तत्स्थप्रमाप्रागभावातिरेकिणोऽनादेर्ध्वंसिका प्रमात्वादविगीतप्रमा यथेत्यनुमानं मानमिति चेन्न। घटोऽयमेतद्धटप्रागभावव्यतिरिक्तानादेर्निवर्तको घटत्वाद्वटान्तरवदित्याभाससमानयोगक्षेमत्वात्। एतेन विगीतो भ्रम एतज्जनकाबाध्यातिरिक्तोपादाननकः विभ्रमत्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति च निरस्तम्। अनादित्वप्रमानिवर्त्यत्वयोर्विरोधाच्च। देवदत्तप्रमा देवदत्तगतैतत्प्रमाप्रागभावातिनिक्तानादेर्निवर्तिका न भवति प्रमात्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति सत्प्रतिपक्षता च।</p> | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठः भङ्गः"></span> | |||
== षष्ठः भङ्गः == | == षष्ठः भङ्गः == | ||
<span id="gr-C6-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="षष्टभङ्गे"></span> | <span id="gr-C6-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="षष्टभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">षष्टभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">षष्टभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C06_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C06_S01_B01" data-verse="VA_C06_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C06_S01_B01" data-verse="VA_C06_S01"> | ||
<p>मूलम्-अथ प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषयावरणस्व निवर्त्यस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकं अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वात् अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीपप्रबावदित्यनुमानं मानमस्तु। अत्र च प्रमाणज्ञानं वस्त्वन्तरपूर्वकमित्युक्ते स्वप्रागभावेन सिद्धसाधनता। तन्निवृत्त्यर्थं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति पदम्। तथाऽपि स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वजनकसामग्रया सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वविषयावरणेति पदम्। तथाऽप्यदृष्टेन सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वनिवर्त्येति पदम्। अर्थान्तरनिवृत्तये आत्माश्रितदाज्ञानसिद्धये च स्वदेशेति पदमिति।</p> | <p>मूलम्-अथ प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषयावरणस्व निवर्त्यस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकं अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वात् अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीपप्रबावदित्यनुमानं मानमस्तु। अत्र च प्रमाणज्ञानं वस्त्वन्तरपूर्वकमित्युक्ते स्वप्रागभावेन सिद्धसाधनता। तन्निवृत्त्यर्थं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति पदम्। तथाऽपि स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वजनकसामग्रया सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वविषयावरणेति पदम्। तथाऽप्यदृष्टेन सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वनिवर्त्येति पदम्। अर्थान्तरनिवृत्तये आत्माश्रितदाज्ञानसिद्धये च स्वदेशेति पदमिति।</p> | ||
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</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमभङ्गः"></span> | |||
== सप्तमभङ्गः == | == सप्तमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C7-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="सप्तमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C7-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="सप्तमभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">सप्तमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">सप्तमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C07_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C07_S01_B01" data-verse="VA_C07_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C07_S01_B01" data-verse="VA_C07_S01"> | ||
<p>मूलम्-यत्तु कश्चिदाह नाज्ञानं ज्ञानाभावः। अभावमानागम्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवत्। अभावो ह्यभावस्य प्रत्यक्षस्य वा विषयः। अज्ञानं च न मानगम्यम्। माननिवर्त्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवदिति। तदसत्। अज्ञानस्य मानागम्यत्वे तत्साधनायानुमानकथनायोगात्। एतन्मानगम्यत्वेन मानागम्यमिति व्याघातः। फलव्याप्यताऽभावेऽपि वृत्तिव्याप्यतामात्रेण तत्रानुमानप्रवृत्तिरिति न युक्तम्। अज्ञानस्य वृत्तिव्याप्यतानङ्गीकारात्। न च प्रमाणनिवर्त्यत्वस्य प्रमाणागम्यत्वेन व्याप्तिरस्ति। प्रत्यभिज्ञाप्रमाणनिवर्त्यस्य संस्कारस्य मानगम्यत्वात्। न च त्वदुक्तमर्थं न जानामीत्यादिव्यवहारोऽत्यन्तसुप्ते ज्ञायमाने चाज्ञायमानेऽसम्भाव्यमानोऽज्ञानं गमयतीति युक्तम्।</p> | <p>मूलम्-यत्तु कश्चिदाह नाज्ञानं ज्ञानाभावः। अभावमानागम्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवत्। अभावो ह्यभावस्य प्रत्यक्षस्य वा विषयः। अज्ञानं च न मानगम्यम्। माननिवर्त्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवदिति। तदसत्। अज्ञानस्य मानागम्यत्वे तत्साधनायानुमानकथनायोगात्। एतन्मानगम्यत्वेन मानागम्यमिति व्याघातः। फलव्याप्यताऽभावेऽपि वृत्तिव्याप्यतामात्रेण तत्रानुमानप्रवृत्तिरिति न युक्तम्। अज्ञानस्य वृत्तिव्याप्यतानङ्गीकारात्। न च प्रमाणनिवर्त्यत्वस्य प्रमाणागम्यत्वेन व्याप्तिरस्ति। प्रत्यभिज्ञाप्रमाणनिवर्त्यस्य संस्कारस्य मानगम्यत्वात्। न च त्वदुक्तमर्थं न जानामीत्यादिव्यवहारोऽत्यन्तसुप्ते ज्ञायमाने चाज्ञायमानेऽसम्भाव्यमानोऽज्ञानं गमयतीति युक्तम्।</p> | ||
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</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमभङ्गः"></span> | |||
== अष्टमभङ्गः == | == अष्टमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C8-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="अष्टमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C8-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="अष्टमभङ्गे"></span> | ||
| Line 191: | Line 220: | ||
<p class="adhyaya-trans">अष्टमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">अष्टमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C08_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C08_S01_B01" data-verse="VA_C08_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C08_S01_B01" data-verse="VA_C08_S01"> | ||
<p>मूलम्-न च भावरूपाज्ञाननिराकरणे सिद्धान्तविरोधः। परन्यायेन परनिराकरणात्। न सप्तमः। अत्यन्ताभावपदेनासत्त्वाभिप्रायेऽपसिद्धान्तः। तदतिरिक्तस्याप्रसिद्धत्वात्। भाववैलक्षण्यमिति चेत्तर्हि तत एवासत्त्वापत्त्या नोक्तदोषनिवृत्तिः। तस्मान्न मिथ्यात्वनिरुिक्तः।। छ ।। मिथ्यात्वनिरुिक्तनिरासोपसंहारः ।। छ ।।</p> | <p>मूलम्-न च भावरूपाज्ञाननिराकरणे सिद्धान्तविरोधः। परन्यायेन परनिराकरणात्। न सप्तमः। अत्यन्ताभावपदेनासत्त्वाभिप्रायेऽपसिद्धान्तः। तदतिरिक्तस्याप्रसिद्धत्वात्। भाववैलक्षण्यमिति चेत्तर्हि तत एवासत्त्वापत्त्या नोक्तदोषनिवृत्तिः। तस्मान्न मिथ्यात्वनिरुिक्तः।। छ ।। मिथ्यात्वनिरुिक्तनिरासोपसंहारः ।। छ ।।</p> | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमभङ्गः"></span> | |||
== नवमभङ्गः == | == नवमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C9-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="नवमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C9-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="नवमभङ्गे"></span> | ||
| Line 201: | Line 234: | ||
<p class="adhyaya-trans">नवमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">नवमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C09_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C09_S01_B01" data-verse="VA_C09_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C09_S01_B01" data-verse="VA_C09_S01"> | ||
<p>मूलम्-नापि दृश्यत्वस्य। तथा हि। किमिदं दृश्यत्वम्। दृग्विषयत्वमस्वप्रकाशत्वं वा। आद्ये किं दृग्वृत्तिरूपा चिद्रूपा वा। नाद्यः। आत्मन्यनैकान्त्यात्। तस्यापि वेदान्तजनितवृत्तिविषयत्वात्। वृत्तिजनितफलासम्बन्धान्नानैकान्त्यमिति चेत्। फलं ज्ञातता, व्यवहारो वा। आद्ये घटादावपि तदभावादसिद्धिः।</p> | <p>मूलम्-नापि दृश्यत्वस्य। तथा हि। किमिदं दृश्यत्वम्। दृग्विषयत्वमस्वप्रकाशत्वं वा। आद्ये किं दृग्वृत्तिरूपा चिद्रूपा वा। नाद्यः। आत्मन्यनैकान्त्यात्। तस्यापि वेदान्तजनितवृत्तिविषयत्वात्। वृत्तिजनितफलासम्बन्धान्नानैकान्त्यमिति चेत्। फलं ज्ञातता, व्यवहारो वा। आद्ये घटादावपि तदभावादसिद्धिः।</p> | ||
| Line 213: | Line 247: | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमभङ्गः"></span> | |||
== दशमभङ्गः == | == दशमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C10-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="नवमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C10-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="नवमभङ्गे"></span> | ||
| Line 219: | Line 256: | ||
<p class="adhyaya-trans">नवमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">नवमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C10_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C10_S01_B01" data-verse="VA_C10_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C10_S01_B01" data-verse="VA_C10_S01"> | ||
<p>मूलम्-किञ्च दृश्यत्वं प्रमाणतो वा भ्रान्ता वा। नोभयमपि। अन्यतरासिद्धेः। ननु सामान्यतः प्रयुक्तस्य हेतोर्विशेषविकल्पैर्निराकरणे सर्वानुमानाभावप्रसङ्गः। तथा हि। धूमाद्धूमध्वजसाधने किमेतद्देशकालसंलग्नो धूमो हेतुः किं वाऽनेतद्देशकालसंलग्न इति विकल्प्याद्ये साधनशून्यं निदर्शनम्। द्वितीयेऽसिद्धिरिति दूषणसम्भवादिति। मैवम्। तत्र धूममात्रस्य पर्वतेऽग्निसाधकत्वेनादूषणत्वाभ्युपगमात्। तर्हि किं वक्रो धूमो हेतुरिति विकल्पेन दूषणप्रसङ्ग इति चेन्न। तस्य सामान्यस्यैव हेतुत्वात्। न चास्तु तथा प्रकृतेऽपीति वाच्यम्। प्रमाणभ्रान्तिदृश्ययोर्दृश्यत्वसामान्याभावात्। न हि जलनभोनलिनयोर्नलिनत्वसामान्यमस्ति। तर्हि कथं भ्रान्तिदृश्यत्वमित्यच्यत इति चेन्न। यथा नभो नलिनमित्युच्यते तथैवेत्यवेहि। दृश्यत्वस्य सन्मात्रवृत्तित्वाद्विरुद्धता च। न च शुक्तिरजतं दृश्यमिति वाच्यम्। तत्र शुक्तिकाया एव दृस्यत्वात्।</p> | <p>मूलम्-किञ्च दृश्यत्वं प्रमाणतो वा भ्रान्ता वा। नोभयमपि। अन्यतरासिद्धेः। ननु सामान्यतः प्रयुक्तस्य हेतोर्विशेषविकल्पैर्निराकरणे सर्वानुमानाभावप्रसङ्गः। तथा हि। धूमाद्धूमध्वजसाधने किमेतद्देशकालसंलग्नो धूमो हेतुः किं वाऽनेतद्देशकालसंलग्न इति विकल्प्याद्ये साधनशून्यं निदर्शनम्। द्वितीयेऽसिद्धिरिति दूषणसम्भवादिति। मैवम्। तत्र धूममात्रस्य पर्वतेऽग्निसाधकत्वेनादूषणत्वाभ्युपगमात्। तर्हि किं वक्रो धूमो हेतुरिति विकल्पेन दूषणप्रसङ्ग इति चेन्न। तस्य सामान्यस्यैव हेतुत्वात्। न चास्तु तथा प्रकृतेऽपीति वाच्यम्। प्रमाणभ्रान्तिदृश्ययोर्दृश्यत्वसामान्याभावात्। न हि जलनभोनलिनयोर्नलिनत्वसामान्यमस्ति। तर्हि कथं भ्रान्तिदृश्यत्वमित्यच्यत इति चेन्न। यथा नभो नलिनमित्युच्यते तथैवेत्यवेहि। दृश्यत्वस्य सन्मात्रवृत्तित्वाद्विरुद्धता च। न च शुक्तिरजतं दृश्यमिति वाच्यम्। तत्र शुक्तिकाया एव दृस्यत्वात्।</p> | ||
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</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशभङ्गः"></span> | |||
== एकादशभङ्गः == | == एकादशभङ्गः == | ||
<span id="gr-C11-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="एकादशभङ्गे"></span> | <span id="gr-C11-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="एकादशभङ्गे"></span> | ||
| Line 245: | Line 286: | ||
<p class="adhyaya-trans">एकादशभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">एकादशभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C11_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C11_S01_B01" data-verse="VA_C11_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C11_S01_B01" data-verse="VA_C11_S01"> | ||
<p>मूलम्-न च जडत्वहेतुरपि निगदितदूषणगणलङ्घने जङ्घालः। तथा हि। किमिदं जडत्वं नाम। ज्ञानानाधारत्वं वाऽनात्मत्वं वाऽज्ञानरूपत्वं वाऽस्वप्रकाशत्वं वा।नाद्यः। विशिष्टात्मनि पक्षनिक्षिप्तेऽसिद्धत्वात्। असदात्मनोर्विपक्षभूतयोश्च वर्तमानत्वात्। न द्वितीयः। अनात्मत्वपदेनात्मातिरिक्तत्वं वाऽऽत्मत्वानाधारत्वं वा विवक्षितम्। नाद्यः। तवासिद्धेः। न हि त्वत्पक्षे परमात्मनो जगदतिरिक्तमस्ति। परमार्थतस्तदभावेऽप्यनाद्यविद्याविलसितो भेदोऽस्तीति चेत्तर्ह्यस्माकमसिद्धो हेतुः। असति व्यभिचारश्च।</p> | <p>मूलम्-न च जडत्वहेतुरपि निगदितदूषणगणलङ्घने जङ्घालः। तथा हि। किमिदं जडत्वं नाम। ज्ञानानाधारत्वं वाऽनात्मत्वं वाऽज्ञानरूपत्वं वाऽस्वप्रकाशत्वं वा।नाद्यः। विशिष्टात्मनि पक्षनिक्षिप्तेऽसिद्धत्वात्। असदात्मनोर्विपक्षभूतयोश्च वर्तमानत्वात्। न द्वितीयः। अनात्मत्वपदेनात्मातिरिक्तत्वं वाऽऽत्मत्वानाधारत्वं वा विवक्षितम्। नाद्यः। तवासिद्धेः। न हि त्वत्पक्षे परमात्मनो जगदतिरिक्तमस्ति। परमार्थतस्तदभावेऽप्यनाद्यविद्याविलसितो भेदोऽस्तीति चेत्तर्ह्यस्माकमसिद्धो हेतुः। असति व्यभिचारश्च।</p> | ||
| Line 261: | Line 303: | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशभङ्गः"></span> | |||
== द्वादशभङ्गः == | == द्वादशभङ्गः == | ||
<span id="gr-C12-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वादशभङ्गे"></span> | <span id="gr-C12-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वादशभङ्गे"></span> | ||
| Line 267: | Line 312: | ||
<p class="adhyaya-trans">द्वादशभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">द्वादशभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C12_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C12_S01_B01" data-verse="VA_C12_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C12_S01_B01" data-verse="VA_C12_S01"> | ||
<p>मूलम्-परिच्छिन्नत्वहेतुरपि न साध्यसाधकतामध्यस्ते। तथा हि। परिच्छिन्नत्वं नाम देशतः परिच्छिन्नत्वं वा कालतो वाऽन्योन्याभावाधिकरणत्वं वा। नाद्यः। कालाकाशादिभागेऽसिद्धेः। अत एव न द्वितीयः। ब्रह्मव्यतिरिक्तं सकलमपि देशकालाभ्यां परिच्छिन्नमिति चेन्न। व्याघातात्। तथा हि। देशतः परिच्छिन्नत्वं नाम क्वचिन्निष्ठाभावप्रतियोगिता। तथा न सर्वस्याभावं प्रतिजानता किञ्चिदधिष्ठानमभ्युपेयम्। अभावस्याधिष्ठानबोधाधीनबोधत्वात्। तथा च कथं न व्याघातः। सकलमपि ब्रह्मण्यध्यस्तमतस्तत्र नास्तीति निषेधान्नाधिष्ठानाभ्युपगत्या व्याघात इति चेन्न। परिच्छिन्नता नाम बाध्यतेत्यर्थः स्यात्तथात्वे साध्याविशिष्टतयैव दुष्टतापत्तिः। कालपरिच्छेदे चानित्यता सादिता त्रिकालासत्यता वाऽभिप्रेता भवेत्तथा च कालस्यैतादृशपरिच्छेदायोगेनागतः स एव दुरात्मा व्याघातः।</p> | <p>मूलम्-परिच्छिन्नत्वहेतुरपि न साध्यसाधकतामध्यस्ते। तथा हि। परिच्छिन्नत्वं नाम देशतः परिच्छिन्नत्वं वा कालतो वाऽन्योन्याभावाधिकरणत्वं वा। नाद्यः। कालाकाशादिभागेऽसिद्धेः। अत एव न द्वितीयः। ब्रह्मव्यतिरिक्तं सकलमपि देशकालाभ्यां परिच्छिन्नमिति चेन्न। व्याघातात्। तथा हि। देशतः परिच्छिन्नत्वं नाम क्वचिन्निष्ठाभावप्रतियोगिता। तथा न सर्वस्याभावं प्रतिजानता किञ्चिदधिष्ठानमभ्युपेयम्। अभावस्याधिष्ठानबोधाधीनबोधत्वात्। तथा च कथं न व्याघातः। सकलमपि ब्रह्मण्यध्यस्तमतस्तत्र नास्तीति निषेधान्नाधिष्ठानाभ्युपगत्या व्याघात इति चेन्न। परिच्छिन्नता नाम बाध्यतेत्यर्थः स्यात्तथात्वे साध्याविशिष्टतयैव दुष्टतापत्तिः। कालपरिच्छेदे चानित्यता सादिता त्रिकालासत्यता वाऽभिप्रेता भवेत्तथा च कालस्यैतादृशपरिच्छेदायोगेनागतः स एव दुरात्मा व्याघातः।</p> | ||
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</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशभङ्गः"></span> | |||
== त्रयोदशभङ्गः == | == त्रयोदशभङ्गः == | ||
<span id="gr-C13-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="त्रयोदशभङ्गे"></span> | <span id="gr-C13-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="त्रयोदशभङ्गे"></span> | ||
| Line 281: | Line 330: | ||
<p class="adhyaya-trans">त्रयोदशभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">त्रयोदशभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C13_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C13_S01_B01" data-verse="VA_C13_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C13_S01_B01" data-verse="VA_C13_S01"> | ||
<p>मूलम् - सन्घट इत्यादिप्रत्यक्षेण बाधितविषयत्वात्कालात्ययापदिष्टच्च। ननु केयं सत्यता या प्रत्यक्षगोचरा। किं सत्त्वं वा विधिगम्यत्वं वाऽर्थक्रियाकारित्वं वा प्रातिभासिकेतरत्वं वाऽसत्त्वातिरिक्तत्वं वाऽबाध्यत्वं वा। आद्यपञ्चकान्यतमाभ्युपगमे नास्माकं प्रत्यक्षविरोधः। तस्यास्माभिरिनिराकरणात्। न षष्ठः। प्रत्यक्षस्योत्तरकालीनबाधाभावग्राहितायोगात्। तस्मात्सद्गन्धर्वनगरमित्यादिवदयं प्रत्यक्षेण सत्त्वग्रहणप्रवाद इति।</p> | <p>मूलम् - सन्घट इत्यादिप्रत्यक्षेण बाधितविषयत्वात्कालात्ययापदिष्टच्च। ननु केयं सत्यता या प्रत्यक्षगोचरा। किं सत्त्वं वा विधिगम्यत्वं वाऽर्थक्रियाकारित्वं वा प्रातिभासिकेतरत्वं वाऽसत्त्वातिरिक्तत्वं वाऽबाध्यत्वं वा। आद्यपञ्चकान्यतमाभ्युपगमे नास्माकं प्रत्यक्षविरोधः। तस्यास्माभिरिनिराकरणात्। न षष्ठः। प्रत्यक्षस्योत्तरकालीनबाधाभावग्राहितायोगात्। तस्मात्सद्गन्धर्वनगरमित्यादिवदयं प्रत्यक्षेण सत्त्वग्रहणप्रवाद इति।</p> | ||
| Line 297: | Line 347: | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशभङ्गः"></span> | |||
== चतुर्दशभङ्गः == | == चतुर्दशभङ्गः == | ||
<span id="gr-C14-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="चतुर्दशभङ्गे"></span> | <span id="gr-C14-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="चतुर्दशभङ्गे"></span> | ||
| Line 303: | Line 356: | ||
<p class="adhyaya-trans">चतुर्दशभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">चतुर्दशभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C14_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C14_S01_B01" data-verse="VA_C14_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C14_S01_B01" data-verse="VA_C14_S01"> | ||
<p>मूलम्-विश्वं सत्यमित्याद्यागमविरोधश्च व्यावहारिकं सत्त्वमत्रोच्यत इति चेन्न। निर्बीजत्वात्कल्पनायाः। व्यर्थं च प्रपञ्चे व्यावहारिकसत्यत्वप्रतिपादनम्। न हि कश्चिल्लोकिको वैदिको वा व्यावहारिकसत्यतां प्रपञ्चे नाभ्यपैति। तस्माद्वादिप्रसिद्धमिथ्यात्वनिषेधेन पारमार्थिकसत्त्वमेव प्रतिपाद्यते। अप्राप्ते शास्त्रमर्थवदिति न्यायात्। नेह नानेत्यादिश्रुतिनिषेध्यसमर्पकतयाऽनुवदति विश्वसत्यतावाक्यमिति चेन्न। तथा सति विश्वं सत्यमित्यादिवचनविधानसिद्ध्यर्थं नेह नानेत्यनुवाद इति प्रसङ्गात्।</p> | <p>मूलम्-विश्वं सत्यमित्याद्यागमविरोधश्च व्यावहारिकं सत्त्वमत्रोच्यत इति चेन्न। निर्बीजत्वात्कल्पनायाः। व्यर्थं च प्रपञ्चे व्यावहारिकसत्यत्वप्रतिपादनम्। न हि कश्चिल्लोकिको वैदिको वा व्यावहारिकसत्यतां प्रपञ्चे नाभ्यपैति। तस्माद्वादिप्रसिद्धमिथ्यात्वनिषेधेन पारमार्थिकसत्त्वमेव प्रतिपाद्यते। अप्राप्ते शास्त्रमर्थवदिति न्यायात्। नेह नानेत्यादिश्रुतिनिषेध्यसमर्पकतयाऽनुवदति विश्वसत्यतावाक्यमिति चेन्न। तथा सति विश्वं सत्यमित्यादिवचनविधानसिद्ध्यर्थं नेह नानेत्यनुवाद इति प्रसङ्गात्।</p> | ||
| Line 311: | Line 365: | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशभङ्गः"></span> | |||
== पञ्चदशभङ्गः == | == पञ्चदशभङ्गः == | ||
<span id="gr-C15-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="पञ्जदशभङ्गे"></span> | <span id="gr-C15-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="पञ्जदशभङ्गे"></span> | ||
| Line 317: | Line 374: | ||
<p class="adhyaya-trans">पञ्जदशभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">पञ्जदशभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C15_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C15_S01_B01" data-verse="VA_C15_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C15_S01_B01" data-verse="VA_C15_S01"> | ||
<p>वादावली"असत्यमप्रतिष्ठं ये जगदाहुरनीश्वर" मित्यादिनिरवकाशस्मृतिविरोधश्च। न चात्रासत्यशब्दोऽत्यन्तासत्परोऽत्यन्तासत्त्वाभ्युपगन्तुर्वादिन एवाभावादाहुरित्यस्यायोगादिति ।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य स्मृतिविरोधः ।। छ ।।</p> | <p>वादावली"असत्यमप्रतिष्ठं ये जगदाहुरनीश्वर" मित्यादिनिरवकाशस्मृतिविरोधश्च। न चात्रासत्यशब्दोऽत्यन्तासत्परोऽत्यन्तासत्त्वाभ्युपगन्तुर्वादिन एवाभावादाहुरित्यस्यायोगादिति ।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य स्मृतिविरोधः ।। छ ।।</p> | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशभङ्गः"></span> | |||
== षोडशभङ्गः == | == षोडशभङ्गः == | ||
<span id="gr-C16-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="षोडशभङ्गे"></span> | <span id="gr-C16-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="षोडशभङ्गे"></span> | ||
| Line 327: | Line 388: | ||
<p class="adhyaya-trans">षोडशभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">षोडशभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C16_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C16_S01_B01" data-verse="VA_C16_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C16_S01_B01" data-verse="VA_C16_S01"> | ||
<p>मूलम्विप्रतिपन्नं सत्यं प्रमाणदृष्टत्वाद्ब्रह्मवदित्यनुमानविरोधश्च। न च साध्यानिरुक्तिः। अबाध्यतायाः साध्यत्वात्। तस्याश्च ब्रह्मणि सिद्धत्वान्नाप्रसिद्धविशेषणता। ननु किमिदं प्रमाणदृष्टत्वम्। तात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वमतात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वं वा। नाद्यः। अस्माकमसिद्धेः। प्रत्यक्षादिप्रमाणानां तत्त्वावेदकताऽनभ्युपगमात्। नोत्तरः। तवासिद्धेः। साधनविकलत्वं च दृष्टान्तस्येति।</p> | <p>मूलम्विप्रतिपन्नं सत्यं प्रमाणदृष्टत्वाद्ब्रह्मवदित्यनुमानविरोधश्च। न च साध्यानिरुक्तिः। अबाध्यतायाः साध्यत्वात्। तस्याश्च ब्रह्मणि सिद्धत्वान्नाप्रसिद्धविशेषणता। ननु किमिदं प्रमाणदृष्टत्वम्। तात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वमतात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वं वा। नाद्यः। अस्माकमसिद्धेः। प्रत्यक्षादिप्रमाणानां तत्त्वावेदकताऽनभ्युपगमात्। नोत्तरः। तवासिद्धेः। साधनविकलत्वं च दृष्टान्तस्येति।</p> | ||
| Line 351: | Line 413: | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशभङ्गः"></span> | |||
== सप्तदशभङ्गः == | == सप्तदशभङ्गः == | ||
<span id="gr-C17-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="सप्तदशभङ्गे"></span> | <span id="gr-C17-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="सप्तदशभङ्गे"></span> | ||
| Line 357: | Line 422: | ||
<p class="adhyaya-trans">सप्तदशभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">सप्तदशभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C17_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C17_S01_B01" data-verse="VA_C17_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C17_S01_B01" data-verse="VA_C17_S01"> | ||
<p>मूलम्-दोषगम्यत्वमुपाधिश्च। न च दृश्यत्वादिना प्रपञ्चेऽपि तत्साध्यम्। मिथ्यात्वसाधन इवात्रापि दोषप्रसक्तेः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य सोपाधिकत्वसमर्थनम् ।। छ ।।</p> | <p>मूलम्-दोषगम्यत्वमुपाधिश्च। न च दृश्यत्वादिना प्रपञ्चेऽपि तत्साध्यम्। मिथ्यात्वसाधन इवात्रापि दोषप्रसक्तेः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य सोपाधिकत्वसमर्थनम् ।। छ ।।</p> | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C18" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टादशभङ्गः"></span> | |||
== अष्टादशभङ्गः == | == अष्टादशभङ्गः == | ||
<span id="gr-C18-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="अष्टादशभङ्गे"></span> | <span id="gr-C18-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="अष्टादशभङ्गे"></span> | ||
| Line 367: | Line 436: | ||
<p class="adhyaya-trans">अष्टादशभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">अष्टादशभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C18_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C18_S01_B01" data-verse="VA_C18_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C18_S01_B01" data-verse="VA_C18_S01"> | ||
<p>मूलम्-अनिर्वचनीयत्वाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य मिथ्यात्वाभिप्राये निदर्शनस्य साध्यविकल्त्वं च। ननु कादाचित्कत्वहेतुना सकारणकत्वानुमाने कारणस्य सदसद्रूपत्वासम्भवादविद्याकार्यत्वमेव पर्यवस्यतीति चेन्न। केयं कादाचित्कता नाम। कदाचित्प्रतीतता वा कदाचिदुत्पन्नता वा। नाद्यः। व्याप्त्यभावात्। नोत्तरः। हेतोरसिद्धत्वात्। तस्मान्न त्रिविधोऽप्ययं प्रयोगो युक्तिपथमवतरतीति।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य दृष्टन्ते साध्यवैकल्यम् ।। छ ।।</p> | <p>मूलम्-अनिर्वचनीयत्वाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य मिथ्यात्वाभिप्राये निदर्शनस्य साध्यविकल्त्वं च। ननु कादाचित्कत्वहेतुना सकारणकत्वानुमाने कारणस्य सदसद्रूपत्वासम्भवादविद्याकार्यत्वमेव पर्यवस्यतीति चेन्न। केयं कादाचित्कता नाम। कदाचित्प्रतीतता वा कदाचिदुत्पन्नता वा। नाद्यः। व्याप्त्यभावात्। नोत्तरः। हेतोरसिद्धत्वात्। तस्मान्न त्रिविधोऽप्ययं प्रयोगो युक्तिपथमवतरतीति।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य दृष्टन्ते साध्यवैकल्यम् ।। छ ।।</p> | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C19" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनविशंतितमभङ्गः"></span> | |||
== एकोनविशंतितमभङ्गः == | == एकोनविशंतितमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C19-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="एकोनविशंतितमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C19-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="एकोनविशंतितमभङ्गे"></span> | ||
| Line 377: | Line 450: | ||
<p class="adhyaya-trans">एकोनविशंतितमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">एकोनविशंतितमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C19_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C19_S01_B01" data-verse="VA_C19_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C19_S01_B01" data-verse="VA_C19_S01"> | ||
<p>मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः</p> | <p>मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः</p> | ||
| Line 401: | Line 475: | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C20" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="विंशतिततमभङ्गः"></span> | |||
== विंशतिततमभङ्गः == | == विंशतिततमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C20-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="विंशतिततमभभङ्गे"></span> | <span id="gr-C20-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="विंशतिततमभभङ्गे"></span> | ||
| Line 407: | Line 484: | ||
<p class="adhyaya-trans">विंशतिततमभभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">विंशतिततमभभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C20_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C20_S01_B01" data-verse="VA_C20_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C20_S01_B01" data-verse="VA_C20_S01"> | ||
<p>मूलम्-एवमनेकानुमानप्रतिहतत्वान्न दृश्यत्वानुमानं समञ्जसमिति सिद्धम्।। छ ।। दृश्यत्वादिहेतुत्रयभङ्गः ।। छ ।।</p> | <p>मूलम्-एवमनेकानुमानप्रतिहतत्वान्न दृश्यत्वानुमानं समञ्जसमिति सिद्धम्।। छ ।। दृश्यत्वादिहेतुत्रयभङ्गः ।। छ ।।</p> | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C21" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकविंशतितमभङ्गः"></span> | |||
== एकविंशतितमभङ्गः == | == एकविंशतितमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C21-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="एकविंशतितमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C21-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="एकविंशतितमभङ्गे"></span> | ||
| Line 417: | Line 498: | ||
<p class="adhyaya-trans">एकविंशतितमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">एकविंशतितमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C21_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C21_S01_B01" data-verse="VA_C21_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C21_S01_B01" data-verse="VA_C21_S01"> | ||
<p>मूलम्-किञ्च जगतो मिथ्यात्वाभावे न बाधकं पश्यामः। सत्यत्वे कथं प्रकाशेत। न तावत्स्वातः। जडत्वात्। नापि परतः। प्रकाशान्तरेण सम्बन्धाभावात्। असम्बद्धस्य प्रकाशनेऽतिप्रसङ्गात्। असत्त्वे तु चित्प्रकाशारोपितस्याधिष्ठानाध्यस्तत्वसम्बन्धेन प्रकाशोपपत्तिरिति चेन्न। विचारागोचरत्वात्। तथा हि। कथं प्रकाशेतेति कोऽर्थः। कथं प्रकाशः स्यादिति वा कथं प्रकाशाश्रय इति वा कथं प्रकाशविषय इति वा। न प्रथमद्वितीयौ। अनभ्युपगमात्। तृतीयेऽपि किं प्रकाशशब्देन चैतन्यं विवक्षितं वृत्तिर्वा। नाद्यः। चैतन्याविषयत्वेऽपि बाधकाभावात्। वृत्तिविषयत्वेनैव व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतिति व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतीति को दोषः। असङ्गश्रुतिस्तु परमेश्वरस्य पापादिसम्बन्धाभाववादिनी।</p> | <p>मूलम्-किञ्च जगतो मिथ्यात्वाभावे न बाधकं पश्यामः। सत्यत्वे कथं प्रकाशेत। न तावत्स्वातः। जडत्वात्। नापि परतः। प्रकाशान्तरेण सम्बन्धाभावात्। असम्बद्धस्य प्रकाशनेऽतिप्रसङ्गात्। असत्त्वे तु चित्प्रकाशारोपितस्याधिष्ठानाध्यस्तत्वसम्बन्धेन प्रकाशोपपत्तिरिति चेन्न। विचारागोचरत्वात्। तथा हि। कथं प्रकाशेतेति कोऽर्थः। कथं प्रकाशः स्यादिति वा कथं प्रकाशाश्रय इति वा कथं प्रकाशविषय इति वा। न प्रथमद्वितीयौ। अनभ्युपगमात्। तृतीयेऽपि किं प्रकाशशब्देन चैतन्यं विवक्षितं वृत्तिर्वा। नाद्यः। चैतन्याविषयत्वेऽपि बाधकाभावात्। वृत्तिविषयत्वेनैव व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतिति व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतीति को दोषः। असङ्गश्रुतिस्तु परमेश्वरस्य पापादिसम्बन्धाभाववादिनी।</p> | ||
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</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C22" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वाविंशतितमभङ्गः"></span> | |||
== द्वाविंशतितमभङ्गः == | == द्वाविंशतितमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C22-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वाविंशतितमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C22-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वाविंशतितमभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">द्वाविंशतितमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">द्वाविंशतितमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C22_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C22_S01_B01" data-verse="VA_C22_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C22_S01_B01" data-verse="VA_C22_S01"> | ||
<p>मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः</p> | <p>मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः</p> | ||
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</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C23" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोविंशतितमभङ्गः"></span> | |||
== त्रयोविंशतितमभङ्गः == | == त्रयोविंशतितमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C23-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="त्रयोविंशतितमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C23-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="त्रयोविंशतितमभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">त्रयोविंशतितमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">त्रयोविंशतितमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C23_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C23_S01_B01" data-verse="VA_C23_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C23_S01_B01" data-verse="VA_C23_S01"> | ||
<p>मूलम्-एवमनेकानुमानप्रतिहतत्वान्न दृश्यत्वानुमानं समञ्जसमिति सिद्धम्।। छ ।। दृश्यत्वादिहेतुत्रयभङ्गः ।। छ ।।</p> | <p>मूलम्-एवमनेकानुमानप्रतिहतत्वान्न दृश्यत्वानुमानं समञ्जसमिति सिद्धम्।। छ ।। दृश्यत्वादिहेतुत्रयभङ्गः ।। छ ।।</p> | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C24" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्विंशतितमभङ्गः"></span> | |||
== चतुर्विंशतितमभङ्गः == | == चतुर्विंशतितमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C24-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="चतुर्विंशतितमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C24-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="चतुर्विंशतितमभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">चतुर्विंशतितमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">चतुर्विंशतितमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C24_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C24_S01_B01" data-verse="VA_C24_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C24_S01_B01" data-verse="VA_C24_S01"> | ||
<p>मूलम्-अस्य पटस्यावयवित्वादिनैतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभाव प्रतियोगित्वसाधनमप्यत्यन्ताभावस्य निष्प्रतियोगिकत्वेन बाधितम्। एतत्तन्तुषु नास्तीति साधने सिद्धसाधनम्। कार्यकारणयोरभेदेनाधाराधेयभावाभावात्। एतत्तन्तुकार्यं न भवतीति साधनेऽकार्यत्वस्यान्यकार्यत्वस्य वा सिद्ध्याऽर्थान्तरत्वम्। आकाशादिषु चैवं प्रयोगाभावेन सर्वजगन्मिथ्यात्वासिद्धिश्च।। छ ।। अंशित्वानुमानस्य बाधः ।। छ ।।</p> | <p>मूलम्-अस्य पटस्यावयवित्वादिनैतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभाव प्रतियोगित्वसाधनमप्यत्यन्ताभावस्य निष्प्रतियोगिकत्वेन बाधितम्। एतत्तन्तुषु नास्तीति साधने सिद्धसाधनम्। कार्यकारणयोरभेदेनाधाराधेयभावाभावात्। एतत्तन्तुकार्यं न भवतीति साधनेऽकार्यत्वस्यान्यकार्यत्वस्य वा सिद्ध्याऽर्थान्तरत्वम्। आकाशादिषु चैवं प्रयोगाभावेन सर्वजगन्मिथ्यात्वासिद्धिश्च।। छ ।। अंशित्वानुमानस्य बाधः ।। छ ।।</p> | ||
</div> | </div> | ||
</div> | |||
<span id="gr-C25" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चविंशतितमभङ्गः"></span> | |||
== पञ्चविंशतितमभङ्गः == | == पञ्चविंशतितमभङ्गः == | ||
<span id="gr-C25-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="पञ्चविंशतितमभङ्गे"></span> | <span id="gr-C25-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="पञ्चविंशतितमभङ्गे"></span> | ||
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<p class="adhyaya-trans">पञ्चविंशतितमभङ्गे</p> | <p class="adhyaya-trans">पञ्चविंशतितमभङ्गे</p> | ||
</div> | </div> | ||
<div class="section" id="VA_C25_S01"> | |||
<div class="bhashya" id="VA_C25_S01_B01" data-verse="VA_C25_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C25_S01_B01" data-verse="VA_C25_S01"> | ||
<p>मूलम्-किञ्च किमत्र पटस्यासत्त्वमापाद्यते संसर्गनिषेधो वा क्रियते। नाद्यः त्वद्दर्शनविरोधात्। सत्त्वमात्रं निषिध्यते नासत्त्वमापाद्यत इति चेन्न। तन्निषेधे तद्ध्रौव्यात्। सत्त्वनिषेधे चैतन्तुनिष्ठपदवैय्यर्थ्यम्। न च सिद्धसाधनतापरिहारार्थं विशेषणमिति वक्तव्यम्। एतत्पटात्यन्ताभावस्यास्माकमसिद्धेः। एतेन दृष्टान्तोऽपि साध्यविकलतया प्रत्युक्तो वेदितव्यः। ननु पटान्तरस्यात्यन्ताभावो न चेत्पटः किन्न स्यात्। किमत्र पटसंसर्गः स्यात्पटो वा। आद्ये न व्याप्तिसिद्धिः। द्वितीये सिद्धसाधनम्। नाप्युत्तरः। तन्तुपटसंसर्गाभावस्य सिद्धत्वात्। अथायं पट एतत्तन्तुजन्यो न भवतीति प्रतिज्ञावाक्यार्थः स्यात्तर्हि तस्यांशित्वमपि न स्यादिति हेतोरसिद्धिः स्यात्। न तत्त्वतस्यदप्यस्तीति चेन्न। अतात्त्विकावयवित्वस्यास्माकमसिद्धेः। इह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्यक्षविरुद्धं चैतत्।</p> | <p>मूलम्-किञ्च किमत्र पटस्यासत्त्वमापाद्यते संसर्गनिषेधो वा क्रियते। नाद्यः त्वद्दर्शनविरोधात्। सत्त्वमात्रं निषिध्यते नासत्त्वमापाद्यत इति चेन्न। तन्निषेधे तद्ध्रौव्यात्। सत्त्वनिषेधे चैतन्तुनिष्ठपदवैय्यर्थ्यम्। न च सिद्धसाधनतापरिहारार्थं विशेषणमिति वक्तव्यम्। एतत्पटात्यन्ताभावस्यास्माकमसिद्धेः। एतेन दृष्टान्तोऽपि साध्यविकलतया प्रत्युक्तो वेदितव्यः। ननु पटान्तरस्यात्यन्ताभावो न चेत्पटः किन्न स्यात्। किमत्र पटसंसर्गः स्यात्पटो वा। आद्ये न व्याप्तिसिद्धिः। द्वितीये सिद्धसाधनम्। नाप्युत्तरः। तन्तुपटसंसर्गाभावस्य सिद्धत्वात्। अथायं पट एतत्तन्तुजन्यो न भवतीति प्रतिज्ञावाक्यार्थः स्यात्तर्हि तस्यांशित्वमपि न स्यादिति हेतोरसिद्धिः स्यात्। न तत्त्वतस्यदप्यस्तीति चेन्न। अतात्त्विकावयवित्वस्यास्माकमसिद्धेः। इह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्यक्षविरुद्धं चैतत्।</p> | ||
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<div class="bhashya" id="VA_C25_S01_B03" data-verse="VA_C25_S01"> | <div class="bhashya" id="VA_C25_S01_B03" data-verse="VA_C25_S01"> | ||
<p>मूलम्-अथ तत्रागमविरोधस्तर्ह्यरूपित्वमपि तस्यागमसिद्धमेव। नानुमानादिति। तस्मात्कालातीतादोषं क्वचित्स्वीकुर्वताऽत्रापि समानन्यायतया सा चाभ्युपेयैव।। छ ।। अंशित्वानुमाननिरासः।। छ ।।</p> | <p>मूलम्-अथ तत्रागमविरोधस्तर्ह्यरूपित्वमपि तस्यागमसिद्धमेव। नानुमानादिति। तस्मात्कालातीतादोषं क्वचित्स्वीकुर्वताऽत्रापि समानन्यायतया सा चाभ्युपेयैव।। छ ।। अंशित्वानुमाननिरासः।। छ ।।</p> | ||
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Revision as of 20:14, 29 April 2026
प्रथमः भङ्गः
प्रथमः भङ्गे
प्रथमः भङ्गे
नमोऽगणितकल्याणगुणपूर्णाय विष्णवे। सत्याशेषजगज्जन्मपूर्वकर्त्र मुरद्विषे ।। 1 ।।
मूलम्--ननु कथं सत्यता जगतोऽङ्गीकाराधिकारिणी। विमतं मिथ्या दृश्यत्वाज्जडत्वात् परिच्छिन्नत्वाच्छुक्तिरजतवदित्यनुमानविरोधादिति। मैवम्। मिथ्यात्वानिरुक्तेः।
मूलम्-तत्किमनिर्वचनीयत्वं वा असत्त्वं वा सद्विविक्तत्वं वा प्रमाणाविषयत्वं वा अप्रमाणविषयत्वं वा अविद्यातत्कार्ययोरन्यरत्वं वा स्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणतया प्रतीयमानत्वं वा। नाद्यः। विकल्पासहत्वात्।।
द्वितीयभङ्गः
द्वितीयभङ्गे
द्वितीयभङ्गे
मूलम्-तथा हि। अनिर्वचनीयत्वं किं निर्वचनविरहो वा निर्वाच्यविरहो वा। नाद्यः। स्वाभ्युपगतव्यवहारविषयत्वविरोधात्। द्वितीये सत्वविरहो वाऽसत्त्वविरहो वा। नाद्यः। असतोऽनिर्वाच्यतापातात्। नोत्तरः। ब्रह्मणोऽनिर्वाच्यतापातात्। अथ सदसद्वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वमिति मतं तदाऽस्माभिर्जगतः सदसद्रूपताऽनभ्युपगमात्सिद्धसाधनता। अथ प्रत्येकमुभयवैलक्षण्यं विवक्षितं तथाऽप्यसद्ब्रह्मवैलक्षण्याभ्युपगमेन प्रस्तुतदोषानिस्तारः। एतेन सदसत्त्वानधिकरणत्वमनिर्वचनीयत्वमित्यपास्तम्।प्रत्येकं सदसत्त्वाभ्यां विचारपदवीं न यत्। गाहते तदनिर्वाच्यमाहुर्वेदान्त (वादिन) वेदिनः।।इति चेन्न। तादृशवस्तुनोऽ(प्र)सिद्धत्वेनाप्रसिद्धविशेषणत्वात्। असत्त्वविरहे सत्त्वस्य सत्त्वविरहेऽसत्त्वस्य (निपतितत्वे) नियतत्वेनोभयविरहितत्वं व्याहतमेव।
मूलम्-ननु निषेधसमुच्चयस्य तात्त्विकत्वानभ्युपगमान्न व्याघातः। तत्तत्प्रतियोगिदुर्निरूपतामात्रप्रकटनाय तत्तद्विलक्षणताभिलापादिति चेन्न। तथा सति तस्यानिर्वचनीयतापातात्। यथा खलु सत्त्वासत्त्वे भवन्मते दुर्निरूपत्वान्न जगतो विद्येते तथाऽनिर्वचनीयताया अपि दुर्निरूपत्वेन तदभावो ध्रुवः स्यात्। असत्त्वविरहे सत्त्वसमित्यादिव्याप्त्यसिद्धेर्न व्याहतिरिति चेन्न। आत्मादौ व्याप्तिसम्भवात्।
मूलम्-तत्रात्मत्वप्रयुक्तं सत्त्वमिति चेत्किं तदात्मत्वम्। घटादिव्यावृत्ताऽऽत्मवृत्तिर्जातिर्वा किंवा सत्त्वं उताबाध्यत्वं ज्ञानत्वं वा ज्ञानाधारत्वं वा स्वप्रकाशत्वं वा आत्मपदावाच्यत्वं वा तल्लक्ष्यत्वं वा। नाद्यः। आत्मन एकत्वेन तत्र जातेरयोगात्। कल्पितात्मभेदसद्भावान्नैवमिति चेन्न। कल्पितात्मनां पक्ष(कुक्षि)निक्षिप्ततया तस्यानुपाधित्वात्। न द्वितीयः। साध्यविशिष्टत्वात्।
मूलम्-न तृतीयः। असति व्यभिचारात्। तस्यापि बाध्यत्वे नासत्त्वस्यास्ति बाधकमित्यात्मवचनविरोधात्। न चतुर्थः। पक्षैकदेशाव्यावृत्तेः न पञ्चमः। आत्मन्यभावात्। तद्वतस्तस्य पक्षनिक्षेपात्। न षष्ठः। स्वप्रकाशताया उपर्यपाकार्यत्वात्। न सप्तमः। आत्मन्यभावात्। नान्त्यः। पक्षाव्यावृत्तेः।।
मूलम्-न च वाच्यमात्मादौ न विकल्पोऽवकल्पने तस्य तवापि सिद्धत्वादिति। अस्माभिरुक्तप्रकारान्यतरस्वीकारेऽपि त्वन्मते दोषग्रासानिस्तारात्। तस्मादसत्त्वविरहे सत्त्वमित्यादिव्याप्तिसिद्धेरुभयविरहित्वं व्याहतमेवेति सिद्धम्।
तृतीयभङ्गः
तृतीयभङ्गे
तृतीयभङ्गे
मूलम् किञ्च न सदसद्विलक्षणत्वे मानम्। विवादपदं सदसद्विलक्षणमिति प्रतिज्ञायां पक्षस्याप्रसिद्ध विशेषणत्वप्रसङ्गात्।
मूलम्-सत्त्वासत्त्वे एकवस्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगिनी धर्मत्वाद्रूपरसवदित्यनुमाने वस्तुशब्दस्य सच्छब्दपर्यायत्वात्सत्त्वं सन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगीति व्याघातः। प्रमेयत्वाभिधेयत्वादावनैकान्तिकश्च। अविरुद्धत्वमुपाधिश्च।
मूलम्-किञ्च घटत्वाघटत्वे एकधर्मिनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगिनी धर्मत्वाद्रूपरसवदित्याभाससमानयोगक्षेमश्च। सच्चेन्न बाध्येतासच्चेन्न प्रतीयेतेत्यर्थापत्तिरेवानिर्वचनीये प्रमाणमिति चेन्न।
चतुर्थः भङ्गः
चतुर्थभङ्गे
चतुर्थभङ्गे
मूलम्-सच्चेन्न बाध्येतेत्यत्र किमिदं सद्विक्षितं किं सत्तायुक्तमथाबाध्यमुत ब्रह्मस्वरूपम्। नाद्यः। सत्तायुक्तस्य प्रपञ्चस्य भवन्मते बाध्यतया यत्सत्तदबाध्यमिति व्याप्त्यसिद्धेः। न द्वितीयः। यदबाध्यं तदबाध्यमिति साध्याविशिष्टत्वात्। न तृतीयः। सिद्धसाधनत्वात्।
मूलम्-असच्चेन्न प्रतीयेतेत्यत्रासतोऽसत्त्वेन प्रतीतिर्निषिध्यते सत्त्वेन वा। आद्येऽसद्व्यवहारलोपप्रसङ्गः द्वितीये भ्रान्तिव्यवहारलोपप्रसङ्गः। प्रकृतादन्यात्मना प्रतीतेरेव भ्रान्तित्वात्। तत्र चान्याकारस्यासतः सत्त्वेन प्रतिभासाङ्गीकारात्। तस्यानिर्वचनीयत्वं ब्रूम इति चेन्न।
मूलम्-तदपि किं प्रकृतेनैव रूपेण प्रतीयते भ्रान्तावन्याकारेण वा। आद्ये भ्रान्तिव्यवहारलोपप्रसङ्गः। द्वितीयेऽसतः सत्त्वेन प्रतीतिरनिवार्या। अथ तस्याप्यनिर्वचनीयत्वं मन्यसे तर्ह्यनवस्था। तथा च निर्णयदर्शनं दुःशकं प्रसज्येत।
मूलम्-न द्वितीयः। अपदर्शनत्वात्। न तृतीयः। विचारागोचरत्वात्। तथा हि। काऽसौ सद्विविक्तता नाम। किं परजातिविरहोऽब्रह्मत्वं वाऽसत्त्वं वाऽबाध्येतरत्वं वा। नाद्यः। तेनापि जगति जातेरनिराकरणात्। न द्वितीयः। सिद्धसाधनत्वात्। न तृतीयः। अपसिद्धान्तात्। चतुर्थेऽपि ब्रह्मेतरत्वाभ्युपगमेन सिद्धसाधनत्वात्। अबाद्येतरत्वं नाम बाध्यत्वमिति चेन्न। बाध्यत्वानिरूपणात्।
वादावलीतत्किमन्यथाज्ञातस्य सम्यग्ज्ञातत्वं प्रतिपन्नोपाधौ निषेधप्रतियोगित्वं वा। नाद्यः। सिद्धसाधनत्वात्। अस्माभिरपि सर्वमनिर्वचनीयमित्याद्यन्यथाज्ञातस्य जगतो यथावज्ज्ञातताभ्युपगमात्।
मूलम्द्वितीये किमेकदेशकालप्रतिपन्नस्य कालान्तरादौ निषेधप्रतियोगित्वमुत त्रिकालाखिलदेशनिषेधप्रतियोगित्वम्। नाद्यः। अंशे सिद्धसाधनत्वात्। रीत्यन्तरेणानित्यत्वादेरेवोक्तत्वात्। न द्वितीयः। नित्यसर्वगतयोः कालाकाशयोस्तादृशबाधप्रतिज्ञाने व्याघातात्।
मूलम्-काचेयं प्रतिपन्नता नाम। प्रमाणप्रतिपन्नता भ्रान्तिप्रतिपन्नता वा। नाद्यः। प्रमाणप्रतिपन्नस्य त्रिकालाखिलदेशनिषेधप्रतियोगितासाधनेऽतिप्रसङ्गत्। द्वितीये वक्तव्यं कोऽयं निषेधः। अभाववेदनं सद्विविक्तत्ववेदनं वा। नाद्यः। अत्यन्तासत्त्वापातात्। न द्वितीयः। तस्यैवाद्याप्यनिरूपणात्। न चतुर्थः। विचारगोचरत्वात्।
वादावलीतथा हि। प्रमाणाविषयत्वं नाम यत्किञ्चित्प्रमाणाविषयत्वं वा प्रमाणमात्राविषयत्वं वा। नाद्यः। गन्धादेः श्रोत्राद्यविषयतासिद्ध्या सिद्धसाधनत्वात्। न द्वितीयः। ब्रह्मणोऽपि मिथ्यात्वापातात्। प्रमाणाविषयत्वे प्रपञ्चस्य तत्पक्षीकरणायोगाच्च। अतत्त्वावेदकप्रत्यक्षादिसिद्धतया पक्षीकरणमुपपन्नमिति चेन्न। प्रत्यक्षादेरतत्त्वावेदकत्वे मानाभावात्। विषयस्यासत्त्वादेव तत्सिद्धिरिति चेत्तदेव कुतः।
मूलम्-किञ्चात्त्वावेदकं प्रमाणं चेति व्याघातः। अतत्त्वावेदकं प्रमाणं चेच्छुक्तिरजतज्ञानमपि प्रमाणं किन्न स्यात्। अतत्त्वावेदकत्वाविशेषात्। प्रमाणं चेन्नातत्त्वावेदकम्। अद्वैतवाक्यवत्। न पञ्चमः। सर्वमनिर्वचनीयं क्षणिकं ब्रह्माकार्यमित्याद्यप्रमाणविषयताभ्युपगमेन सिद्धसाधनत्वात्। भ्रमप्रतीतत्वं विवक्षिमिति चेत्। तथा सति तस्यासत्त्वेन सिद्धान्तविरोधः। न षष्ठः।
वादावलीकेयमविद्या नाम। अनाद्यनिर्वाच्या वा अनादिभावरूपत्वे सति विज्ञानविलाप्या वा भ्रमोपादानं वा। नाद्यः। अनिर्वाच्यासिद्ध्याऽप्रसिद्धविशेषणत्वात्। आकाशादौ लक्षणस्यातिव्याप्तेश्च। ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यानादित्वानभ्युपगमान्नैवमिति चेत्। एवं तर्हि लक्षणस्यासम्भवः।
मूलम्-न द्वितीयः। अनादित्वस्यासम्भवित्वात्। अनादिभावरूपस्य विज्ञानविलापनाऽसम्भवाच्च ब्रह्मवत्। भावाभावविलक्षणाविद्याया अभावविलक्षणतामात्रेण बावत्वोपचारादात्मवदनादिभावत्वेना निवर्त्यत्वानुमानानुपपत्तिरिति चेन्न। अभावविलक्षणतामात्रेणाप्यानादेर निवर्त्यत्वानुमानसम्भवात्। न चात्मत्वादिरुपाधिः। अत्यन्तासति व्यभिचारात्।
मूलम्-न तृतीयः। भ्रमशब्देनार्थो ज्ञानं वा। नाद्यः। पदार्थस्यासत्त्वेन तदुपादानतया असम्भवात्। न द्वितीयः। अन्तःकरणेऽतिव्याप्तेः। भ्रमस्याविद्योपादानकताऽभावेनासम्भवित्वाच्च। तदनुपादानत्वे सत्यत्वं स्यादिति चेत्। स्यादेव। तथा सति प्रमाणज्ञानवदेव विषयापहारलक्षणबाधस्याप्यप्रसङ्ग इति चेन्न। तव व्याप्त्यसिद्धेः।
मूलम्-तत्त्वावेदकस्यापि त्वयाऽऽविद्यकत्वाभ्युपगमात्। एतावन्तं कालं रजतमभादित्यनुभवविरोधाच्च। अनिर्वचनीयस्यापि भ्रमस्याभावविलक्षणतया तथात्वेनानुसन्धानोपपत्तिरिति चेन्न। स्वरूपसत एवासीदिति प्रतिसन्धानात्। एतावन्तं कालमिहादर्शे मुखमासीत्। स्फटिकश्च लोहित आसीदित्याद्यनुसन्धानान्नैवमिति चेत्। एतावन्तं कालं मुखमद्राक्षमित्येवानुसन्धानेनानुसन्धानान्तरे विवादात्।। छ ।। अविद्यालक्षणनिरासः।।
पञ्चमभङ्गः
पञ्चमभङ्गे
पञ्चमभङ्गे
मूलम्-अविद्यायां चैवंविधायां किं प्रमाणम्। देवदत्तप्रमा तत्स्थप्रमाप्रागभावातिरेकिणोऽनादेर्ध्वंसिका प्रमात्वादविगीतप्रमा यथेत्यनुमानं मानमिति चेन्न। घटोऽयमेतद्धटप्रागभावव्यतिरिक्तानादेर्निवर्तको घटत्वाद्वटान्तरवदित्याभाससमानयोगक्षेमत्वात्। एतेन विगीतो भ्रम एतज्जनकाबाध्यातिरिक्तोपादाननकः विभ्रमत्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति च निरस्तम्। अनादित्वप्रमानिवर्त्यत्वयोर्विरोधाच्च। देवदत्तप्रमा देवदत्तगतैतत्प्रमाप्रागभावातिनिक्तानादेर्निवर्तिका न भवति प्रमात्वात्सम्प्रतिपन्नवदिति सत्प्रतिपक्षता च।
षष्ठः भङ्गः
षष्टभङ्गे
षष्टभङ्गे
मूलम्-अथ प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषयावरणस्व निवर्त्यस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकं अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वात् अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीपप्रबावदित्यनुमानं मानमस्तु। अत्र च प्रमाणज्ञानं वस्त्वन्तरपूर्वकमित्युक्ते स्वप्रागभावेन सिद्धसाधनता। तन्निवृत्त्यर्थं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति पदम्। तथाऽपि स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वजनकसामग्रया सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वविषयावरणेति पदम्। तथाऽप्यदृष्टेन सिद्धसाधनम्। तन्निवृत्त्यर्थं स्वनिवर्त्येति पदम्। अर्थान्तरनिवृत्तये आत्माश्रितदाज्ञानसिद्धये च स्वदेशेति पदमिति।
मूलम्नानेनानुमानेन त्वदभिमताज्ञानसिद्धिः। जडेऽज्ञानानभ्युपगमेनान्तःकरणवृत्तिलक्षणप्रमाणज्ञानानं तथाविधवस्तुपूर्वकत्वाभावेऽपि हेतोस्तत्र सद्भावादनैकान्तिकत्वात्। व्यर्थं च स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति विशेषणम्। स्वनिवर्त्यविशेषणेनैव तद्व्यावृत्तेः। न हि भावः स्वप्रागभावनिवर्तकः। अपि तु भावोत्पत्तिरेव तत्प्रागभावनिवर्तिका। भावाभावयोः सहावस्थानविरोधात्। अतः स्वनिवर्त्यविशेषणेनैव स्वप्रागभावव्यावृत्तेर्व्यर्थं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तेति विशेषणम्।
मूलम्-किञ्च सत्यतथाविधवस्तुपूर्वकत्वे साध्ये सिद्धसाधनम्। अनिर्वचनियतथाविधवस्तुपूर्वकत्वे साध्ये साध्यविकलो दृष्टन्तः। अविशेषिततथाविधवस्तुपूर्वकत्वे साध्येऽप्रसिद्धविशेषणता। प्रामाणिकाप्रामाणिकयोः साधारणधर्मस्याप्यप्रामाणिकत्वात्। अनिर्वचनीयस्य केनापि प्रमाणेनाप्रमितत्वात्। न हि शशविषाणगोविषाण योर्विषाणत्वसामान्यमस्ति। ज्ञानप्रतिबन्धकपापस्यसिद्धतया सिद्धसाधनत्वं च। ज्ञाननिवर्त्यत्वात्तस्यापि।
मूलम्-किञ्च किमिदं प्रकाशकत्वं नाम। ज्ञापकत्वं वा ज्ञापकाप्यायकत्वं वा ज्ञानत्वं वा। नाद्यः। चक्षुरादौ व्यभिचारात्। दृष्टान्तस्य साधनविकलत्वाच्च। ज्ञाने ज्ञानकारणत्वाभावेनासिद्धेश्च। न द्वितीयः। असिद्धेः। अञ्जनादौ व्यभिचाराच्च। न तृतीयः। साधनविकलत्वात् दृष्टान्तस्य। न किञ्चिदहमवेदिषमिति परामर्शसिद्धः सौषुप्तिकानुभवोऽस्तु प्रमाणमिति चेन्न। तस्य ज्ञानाभावविषयतयोपपत्तेः। नन्वभावप्रतीतेर्धर्मिप्रतियोगिबोधपराधीनतया तदभावे तस्यानुभवितुमयोग्यत्वमिति चेन्न। साक्षिणा धर्मिप्रतियोगिग्रहणोपपत्तेः।
सप्तमभङ्गः
सप्तमभङ्गे
सप्तमभङ्गे
मूलम्-यत्तु कश्चिदाह नाज्ञानं ज्ञानाभावः। अभावमानागम्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवत्। अभावो ह्यभावस्य प्रत्यक्षस्य वा विषयः। अज्ञानं च न मानगम्यम्। माननिवर्त्यत्वात्। सम्प्रतिपन्नवदिति। तदसत्। अज्ञानस्य मानागम्यत्वे तत्साधनायानुमानकथनायोगात्। एतन्मानगम्यत्वेन मानागम्यमिति व्याघातः। फलव्याप्यताऽभावेऽपि वृत्तिव्याप्यतामात्रेण तत्रानुमानप्रवृत्तिरिति न युक्तम्। अज्ञानस्य वृत्तिव्याप्यतानङ्गीकारात्। न च प्रमाणनिवर्त्यत्वस्य प्रमाणागम्यत्वेन व्याप्तिरस्ति। प्रत्यभिज्ञाप्रमाणनिवर्त्यस्य संस्कारस्य मानगम्यत्वात्। न च त्वदुक्तमर्थं न जानामीत्यादिव्यवहारोऽत्यन्तसुप्ते ज्ञायमाने चाज्ञायमानेऽसम्भाव्यमानोऽज्ञानं गमयतीति युक्तम्।
मूलम्-किमत्र सर्वानुवादेन व्यवहारः किं वा सामान्यतः। नाद्यः तादृशव्यवहरस्यैवाभावात्। भावे वा त्वदुक्तं न प्रमाणतो जानामीत्येवम्परत्वोपपत्तेः। प्रतिवादिवाक्यादधिगतार्थस्यानुवादपुरस्सरं प्रमाणाभावेन निरसनदर्शनात्। न च त्वदुक्ते प्रमाणज्ञानं मम नास्तीत्यस्य विशिष्टविषयज्ञानस्य प्रमाणत्वात्तिद्विशेषणतयाऽर्थस्यापि प्रमाणेनाधिगमात्स्ववचनव्याघात इति युक्तम्। एतत्प्रमाणज्ञानस्य प्रमाणाभावविषयत्वेऽपि तदर्थस्यानेतद्विषयत्वात्। अन्यथा भ्रमो ममासीदित्यादिप्रमाणज्ञानस्यापि विशिष्टभ्रमविषयतया भ्रमविषयस्यापि प्रमाणिकतापातात्।
मूलम्-न द्वितीयः सामान्यानुवादेन विशेषव्यवहारोपपत्तेः। विशेषस्याप्यधिगमानधिगमयोर्नैवं व्यवहार इति चेन्न। अस्ति कश्चिद्विशेष इति सामान्यतो ज्ञातत्वात्। किञ्च भावरूपाविद्याभ्युपगमेऽपि किं पूर्वमर्थो ज्ञातो न वा। सर्वथाऽपि प्रश्नायोगः। अस्माकं तु सर्वं वस्तु ज्ञाततयाऽज्ञाततया वा साक्षिचैतन्यविषय एवेति प्रमाणज्ञानोदयात्प्रागज्ञातत्वविशेषितोऽर्थः साक्षिसिद्धोऽनुवादगोचरो भवति च प्रश्नार्ह इति चेन्न। साक्षिसिद्धतयाऽपि सिद्धेऽर्थे व्यवहारायोगात्। साक्षिणा ज्ञातेऽपि प्रमाणबुभुत्सया व्यवहार इति चेन्न। साक्षिसिद्धेत्वे प्रमाणबुभुत्साया निष्फलत्वात्। तथा च त्वयाऽपि सामान्यतः सिद्धोऽर्थो विशेषज्ञानायानूद्यत इति वक्तव्यम्। वयमपि सामान्यतः साक्षिसिद्धस्य विशेषप्रमाणबुभुत्सया व्यवहारं ब्रुमः। तस्मान्नाविद्या निरूपणगोचरतामाचरतीति कुतस्तत्कार्यं कुतस्तरां चाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य साध्यता सिद्ध्यतीति।। छ ।। अविद्याप्रमाणनिरासः ।। छ ।।
अष्टमभङ्गः
अष्टमभङ्गे
अष्टमभङ्गे
मूलम्-न च भावरूपाज्ञाननिराकरणे सिद्धान्तविरोधः। परन्यायेन परनिराकरणात्। न सप्तमः। अत्यन्ताभावपदेनासत्त्वाभिप्रायेऽपसिद्धान्तः। तदतिरिक्तस्याप्रसिद्धत्वात्। भाववैलक्षण्यमिति चेत्तर्हि तत एवासत्त्वापत्त्या नोक्तदोषनिवृत्तिः। तस्मान्न मिथ्यात्वनिरुिक्तः।। छ ।। मिथ्यात्वनिरुिक्तनिरासोपसंहारः ।। छ ।।
नवमभङ्गः
नवमभङ्गे
नवमभङ्गे
मूलम्-नापि दृश्यत्वस्य। तथा हि। किमिदं दृश्यत्वम्। दृग्विषयत्वमस्वप्रकाशत्वं वा। आद्ये किं दृग्वृत्तिरूपा चिद्रूपा वा। नाद्यः। आत्मन्यनैकान्त्यात्। तस्यापि वेदान्तजनितवृत्तिविषयत्वात्। वृत्तिजनितफलासम्बन्धान्नानैकान्त्यमिति चेत्। फलं ज्ञातता, व्यवहारो वा। आद्ये घटादावपि तदभावादसिद्धिः।
मूलम्-अतीतानागतनित्यानुमेयेषु ज्ञातताभावाद्भागासिद्धिश्च। तथा हि। अवेद्यत्वे सत्यपरोक्षव्यवहारयोग्यत्वं स्वप्रकाशत्वमिति तल्लक्षणमबिदधता चित्सुखेनापरोक्षव्यवहारयोग्यताविशेषणकृत्याभिधानप्रस्तावेऽभिहितम्। न चावेद्यत्वमित्येतावदेवास्तु तल्लक्षणमिति वाच्यम्। तथा सत्यतीतानागतनित्यानुमेयेषु चातिव्याप्तेः। फलव्याप्यतालक्षणवेद्यत्वस्य तत्राभावादिति। द्वितीये पुनरनैकान्त्यमेव। आत्मनोऽपि वृत्तिजन्यव्यवहारविषयत्वात्। चिद्रूपदृग्विषयत्वन्तु घटादावस्माभिर्नाङ्गीक्रियत इति भागासिद्धिः। स्वप्रकाशत्वं च निर्वक्तव्यं यदभावो दृश्यत्वम्। अवेद्यत्वमिति चेत्तर्हि वेद्यत्वं दृश्यत्वमित्युक्तं स्यात्। तथा च प्रागुक्तविकल्पदोषापातः।
मूलम्-स्वव्यवहारे स्वातिरिक्तसंविदनपेक्षत्वं स्वप्रकाशत्वं तदभावो दृश्यत्वमिति चेत्तर्ह्यात्मनोऽप्यद्वितीयव्यवहारे संविदन्तरापेक्षासद्भावाद्व्यभिचारः। निर्विकल्पकस्वव्यवहारे संविदन्तरानपेक्ष आत्मेति चेत्तर्हि घटोऽपि तथैवेत्यसिद्धिः। घटे निर्विकल्पकव्यवहार एव नास्तीति चेदात्मन्यपि स नास्त्येव। सुषुप्तावस्तीति चेन्न। तस्यापि निर्विकल्पकत्वे विवादात्। अवेद्यत्वे सत्यपरोक्षव्यवहारविषयत्वं स्वप्रकाशत्वमिति चेन्न। व्याहतत्वेनासम्भवित्वात्। कथञ्चिदव्याहतत्वेऽपि विशेषणाभावेनोत विशेष्याभावेनाथोभयाभावेन दृश्यत्वं निर्वक्तव्यम्। तत्राद्येऽवेद्यत्वाभावो वेद्यत्वमेव हेतुरस्तु किं विशेष्येण। तस्य चोक्तं दूषणम्। द्वितीये स्वरूपासिद्धिः। तृतीये व्यर्थविशेष्यत्वं विशेष्यासिद्धिश्चेति।। छ ।। दृश्यत्वविकल्पनिरासः ।। छ ।।
दशमभङ्गः
नवमभङ्गे
नवमभङ्गे
मूलम्-किञ्च दृश्यत्वं प्रमाणतो वा भ्रान्ता वा। नोभयमपि। अन्यतरासिद्धेः। ननु सामान्यतः प्रयुक्तस्य हेतोर्विशेषविकल्पैर्निराकरणे सर्वानुमानाभावप्रसङ्गः। तथा हि। धूमाद्धूमध्वजसाधने किमेतद्देशकालसंलग्नो धूमो हेतुः किं वाऽनेतद्देशकालसंलग्न इति विकल्प्याद्ये साधनशून्यं निदर्शनम्। द्वितीयेऽसिद्धिरिति दूषणसम्भवादिति। मैवम्। तत्र धूममात्रस्य पर्वतेऽग्निसाधकत्वेनादूषणत्वाभ्युपगमात्। तर्हि किं वक्रो धूमो हेतुरिति विकल्पेन दूषणप्रसङ्ग इति चेन्न। तस्य सामान्यस्यैव हेतुत्वात्। न चास्तु तथा प्रकृतेऽपीति वाच्यम्। प्रमाणभ्रान्तिदृश्ययोर्दृश्यत्वसामान्याभावात्। न हि जलनभोनलिनयोर्नलिनत्वसामान्यमस्ति। तर्हि कथं भ्रान्तिदृश्यत्वमित्यच्यत इति चेन्न। यथा नभो नलिनमित्युच्यते तथैवेत्यवेहि। दृश्यत्वस्य सन्मात्रवृत्तित्वाद्विरुद्धता च। न च शुक्तिरजतं दृश्यमिति वाच्यम्। तत्र शुक्तिकाया एव दृस्यत्वात्।
मूलम्-ननु रजतसंविदः कथं शुक्तिकाविषयो विरोधादिति चेन्न। रजतसंविद इति कोऽर्थः। किं रजतविषयाया इति रचतत्वोल्लेखिसंविद इति वा। नाद्यः। अनभ्युपगमात्। द्वितीये को विरोधः। स्वविषयशुक्तिकामेवान्याकारेण गृह्णातीत्यस्याविरुद्धत्वात्। ननु तर्ह्यपि रजतेऽस्ति कथञ्चिदृश्यतेति चेन्न। तस्य दृश्यत्वाभासत्वात्। तादृशस्य पक्षेऽनन्वयात्। किञ्च रजतस्य फलव्याप्यतया वृत्तिव्याप्यतया वा दृश्यत्वम्। नोभयमपि। अध्यस्ततयैव तत्सिद्ध्यभ्युपगमात्। न च तत्प्रतीतावुपायान्तरं वाऽस्ति। सन्निकर्षाभावात्। आत्मनोऽपि दृयशत्वादनैकान्तिकता च। नात्मा दृश्यत इति चेन्न। व्याहतेः। न ह्यज्ञाते धर्मिणि धर्मविधानं तन्निषेधो वा युज्यते। आत्मा दृश्यो वस्तुत्वाद्धटवत्। अयं घट एतद्धटात्मान्यान्यदृश्यान्यः प्रमेयत्वाद्धटवदिति च तस्य दृश्यत्वसिद्धेः।
मूलम्किञ्च दृश्यत्वाभावे तदविद्यानिवृत्त्याभावेन मोक्षाभावप्रसङ्गः। न च त्वत्पक्षे ब्रह्मज्ञानं नाम यत्किञ्चित्स्यात्। षष्ठ्यर्थस्य विषयताऽनतिरेकात्। यद्धि श्रुतमयेन ज्ञानेन तत्त्वमभिधाय चिन्तामयीमवस्थामवलम्बमानस्यान्तःकरणपरिणामवृत्तिरूपं ज्ञानमुपजायते तेन भवेदविद्यानिवृत्तिरिति चेन्न। तथाऽभ्युपगमे परमात्त्मनोऽपि दृश्यतया व्यभिचारानिस्तारात्। आत्मनोऽपि वृत्तिव्याप्यत्वेऽपि फलव्याप्यताया अभावान्न दृश्यत्वमिति चेन्न। दत्तोत्तरत्वात्। विषयत्वाभावेऽप्यात्माकारज्ञानमात्मज्ञानं तेन भवेदविद्यानिवृत्तिरिति चेन्न। विचारागोचरत्वात्।
मूलम्-तथा हि। आत्माकारमिति कोऽर्थः। आत्माकार एवाकारो यस्येति वाऽऽत्माकार इवाकारो यस्येति वाऽऽत्माऽऽकारो यस्येति वा। नाद्यः। ज्ञानज्ञेययोरेकाकारताऽनुपलम्भात्। एकैव सत्ता ज्ञानज्ञेययोराकारोऽस्तीति चेन्न। अनुगतसत्ताया अनङ्गीकारात्। सत्तयैकाकारत्वे च वेदान्तवाक्यजनितज्ञानमात्माकारमेव कुतः। घटाकारमपि किन्न स्यात्। न च परेणात्मनि सत्ता नामाकारोऽङ्गीक्रियो। निराकारताऽङ्गीकारात्। न द्वितीयः। अत्यन्तसादृश्यस्यानुपलम्भात्। किञ्चित्सादृश्यस्य प्रागिवातिप्रसञ्जकत्वात्। तृतीयेऽपि पक्षे नात्मा साक्षाज्ज्ञानस्याकारः सम्भवति। आधाराधेयभावस्यासम्भवात्। अतः परिशेषाद्विषयतया व्यावर्तकत्वेन चात्मा ज्ञानस्याकार इवेति वक्तव्यम्। तदेव च विषयत्वमिति यत्किञ्चिदेतत्।
मूलम्-ननु भवेदिदं यदि दृग्विषयत्वं दृश्यत्वम्। स्वप्रतिबद्धव्यवहारे स्वातिरिक्तसंविदपेक्षानियतिर्दृश्यत्वम्। कथमेतादृशी दृश्यता कथितदूषणगणग्रस्ता स्यात्। मैवम्। अतिरिक्तपदेन पारमार्थिकभेदवत्त्वं वाऽऽविद्यकभेदवत्त्वं वा। नाद्यः। तवासिद्धेः। न द्वितीयः। ममासिद्धेः। सामान्यतः प्रयोग इति च प्रागेव परास्तम्। संविदपेक्षानियतत्वमात्रस्य हेतुत्वोपपत्तेर्व्यर्थविशेषणत्वं च। न चास्ति रजतेऽपि ज्ञानावेक्षा व्यवहाराय तस्याध्यस्ततयैव सिद्ध्यभ्युपगमादित्यवादिष्म। अत्यन्तासत्यनैकान्त्यं च। न च तदपि मिथ्येति वाच्यम्। तथा सति रजतादेरसद्विलक्षणत्वप्रतिपादन प्रयासवैय्यर्थ्यापातात्। न च बाध्यत्वमसतो युज्यते। अप्रतीत्यङ्गीकारात्। नापि तस्यानिर्वचनीयत्वम्। तत्र प्रमाणाभावादिति।। छ ।। दृश्यत्वहेतुनिरासः ।। छ ।।
एकादशभङ्गः
एकादशभङ्गे
एकादशभङ्गे
मूलम्-न च जडत्वहेतुरपि निगदितदूषणगणलङ्घने जङ्घालः। तथा हि। किमिदं जडत्वं नाम। ज्ञानानाधारत्वं वाऽनात्मत्वं वाऽज्ञानरूपत्वं वाऽस्वप्रकाशत्वं वा।नाद्यः। विशिष्टात्मनि पक्षनिक्षिप्तेऽसिद्धत्वात्। असदात्मनोर्विपक्षभूतयोश्च वर्तमानत्वात्। न द्वितीयः। अनात्मत्वपदेनात्मातिरिक्तत्वं वाऽऽत्मत्वानाधारत्वं वा विवक्षितम्। नाद्यः। तवासिद्धेः। न हि त्वत्पक्षे परमात्मनो जगदतिरिक्तमस्ति। परमार्थतस्तदभावेऽप्यनाद्यविद्याविलसितो भेदोऽस्तीति चेत्तर्ह्यस्माकमसिद्धो हेतुः। असति व्यभिचारश्च।
मूलम्न द्वितीयः। आत्मत्वस्य प्रागुक्तप्रकारान्तर्भावे साध्याविशिष्टतासिद्ध्यनैकान्त्यान्यतमापातात्। एतेन यत्त्वयाऽऽत्मत्वमभिप्रेतं तदेवास्त्वस्माकमिति परिहृतम्। अस्माकमुक्तप्रकारान्यतरसङ्ग्रहसम्भवात्। न तृतीयः। वृत्तिज्ञानभागेऽसिद्धत्वात्।
मूलम्आत्मनो ज्ञानस्वरूपता न निर्वाह्यतामारोहति। तथा हि। तज्ज्ञानं सविषयं निर्विषयं वा। आद्ये स्वविषयं परविषयं वा। नाद्यः। स्ववृत्तिविरोधात्। न द्वितीयः । मोक्षे ज्ञआनाभावप्रसङ्गात्। नोत्तरः। ज्ञानत्वस्यैवाभावप्रसङ्गात्। निर्विषयज्ञानरूपत्वे चास्तु प्रपञ्चेऽपि तादृग्ज्ञानरूपत्वमित्यसिद्धिप्रसङ्गः।
मूलम्न चतुर्थः। स्वकर्मकसंविद्रूपतामन्तरेण स्वप्रकाशान्तरस्योत्तरत्र वारयिष्यमाणत्वात्। स्वकर्मकप्रकाशत्वस्यात्मन्यपि तवाभावादिति। एतेनाचेतनत्वं जडत्वमिति निरस्तम्। उक्तपक्षाबहिर्भावात्। अस्माभिर्ज्ञातृत्वानाधारत्वस्य जडत्वेनाभिलापान्नास्मत्प्रतिबन्धी।। छ ।। जडत्वहेतुनिरासः ।। छ ।।
द्वादशभङ्गः
द्वादशभङ्गे
द्वादशभङ्गे
मूलम्-परिच्छिन्नत्वहेतुरपि न साध्यसाधकतामध्यस्ते। तथा हि। परिच्छिन्नत्वं नाम देशतः परिच्छिन्नत्वं वा कालतो वाऽन्योन्याभावाधिकरणत्वं वा। नाद्यः। कालाकाशादिभागेऽसिद्धेः। अत एव न द्वितीयः। ब्रह्मव्यतिरिक्तं सकलमपि देशकालाभ्यां परिच्छिन्नमिति चेन्न। व्याघातात्। तथा हि। देशतः परिच्छिन्नत्वं नाम क्वचिन्निष्ठाभावप्रतियोगिता। तथा न सर्वस्याभावं प्रतिजानता किञ्चिदधिष्ठानमभ्युपेयम्। अभावस्याधिष्ठानबोधाधीनबोधत्वात्। तथा च कथं न व्याघातः। सकलमपि ब्रह्मण्यध्यस्तमतस्तत्र नास्तीति निषेधान्नाधिष्ठानाभ्युपगत्या व्याघात इति चेन्न। परिच्छिन्नता नाम बाध्यतेत्यर्थः स्यात्तथात्वे साध्याविशिष्टतयैव दुष्टतापत्तिः। कालपरिच्छेदे चानित्यता सादिता त्रिकालासत्यता वाऽभिप्रेता भवेत्तथा च कालस्यैतादृशपरिच्छेदायोगेनागतः स एव दुरात्मा व्याघातः।
मूलम्- कुतश्चाकाशादेः कालपरिच्छेदाध्यवसायः। जडत्वहेतुनेति चेन्न। तस्यापाकृतत्वात्। घटादौ कार्यताप्रयुक्तत्वाच्च परिच्छिन्नत्वस्य। यज्जडं तत्कार्यमिति चेन्न। अविद्यायां व्यभिचारात्। तस्याश्च कार्यत्वेऽनादित्वपरिभाषा परिलुप्येत। तत्कारणस्याभावश्च। पञ्चमप्रकारं मोक्षमाचक्षाणस्य जडत्वहेतोर्मोक्षे नित्यतयाऽभ्युपगते व्यभिचारः। तस्य च कालपरिच्छिन्नत्वे पुनरावृत्तिप्रसङ्गः। न हि सहस्राक्षोऽपि क्षयं क्षेप्तुं क्षम (त) इत्युन्मत्तवादश्च स्यात्। न तृतीयः। नेति नेतीत्यादिना ब्रह्मण्यपि जगदन्योन्याभावाधिकरणतायाः श्रुतत्वात्। सोऽपि भेदोऽविद्याविलसित इति चेन्न। तत्किमिदानीं परमार्थभेदभिन्नत्वं हेतुः। तथा सति पक्षे तदसिद्धिः स्यात्। विरुद्धता च स्यादिति।। छ ।। परिच्छिन्नत्वहेतुनिरासः।। छ ।।
त्रयोदशभङ्गः
त्रयोदशभङ्गे
त्रयोदशभङ्गे
मूलम् - सन्घट इत्यादिप्रत्यक्षेण बाधितविषयत्वात्कालात्ययापदिष्टच्च। ननु केयं सत्यता या प्रत्यक्षगोचरा। किं सत्त्वं वा विधिगम्यत्वं वाऽर्थक्रियाकारित्वं वा प्रातिभासिकेतरत्वं वाऽसत्त्वातिरिक्तत्वं वाऽबाध्यत्वं वा। आद्यपञ्चकान्यतमाभ्युपगमे नास्माकं प्रत्यक्षविरोधः। तस्यास्माभिरिनिराकरणात्। न षष्ठः। प्रत्यक्षस्योत्तरकालीनबाधाभावग्राहितायोगात्। तस्मात्सद्गन्धर्वनगरमित्यादिवदयं प्रत्यक्षेण सत्त्वग्रहणप्रवाद इति।
मूलम्-मैवम्। अबाध्यतायाः प्रत्यक्षग्राह्यत्वात्। न च तस्योत्तरकालीनबाधाभावाग्राहकत्वमिति वाच्यम्। तदानीमबाध्यताग्रहणेनैव तत्सिद्धेः। तत्कालीनाबाध्यता गन्धर्वनगरेऽपि गृह्यत इति चेत्। सत्यम्। तथाऽप्यस्ति विशेषः। प्रामाण्यं हि ज्ञानस्योत्सर्गतोऽपवादादप्रामाण्यमिति विद्वत्सम्मतिः। तथा च तत्र बाधकादप्रामाण्यमुपस्थाप्यते प्रकृते तु तादृशबाधकादर्शनात्त्रिकालाबाध्यतैव निरपवादात्सिध्यतीति।
मूलम्-अस्त्वनुमानमेव बाधकं प्रत्यक्षस्येति चेन्न। प्रत्यक्षविरोधेन प्राप्तमरणावस्थस्य प्रत्यक्षविरोधाक्षमत्वात्। अन्यथा दहनशैत्यानुमानमपि तदुष्णतावगाहिप्रत्यक्षबाधकत्वेन प्रमाणं प्रसज्येत। यदा च प्रत्यक्षं समबलप्रत्यक्षान्तरेण न बाध्यते हन्त तदा का वार्ता तत्पादोपजीविनो वराकस्य तर्कस्य तद्बाधकत्वे। नभोमलिनतामाकलयत्प्रत्यक्षममूर्तानुमानेन बाधितं दृष्टमिति चेन्न। तत्राप्याप्तवाक्यादिनैव बाधाभ्युपगमेनासम्प्रतिपत्तेः। यदा च पुनः स्वयमेवानुमिमीते तदाऽपि बलवत्प्रत्यक्षग-हीतव्याप्तिकादेव तस्मादध्यवसायः।
मूलम्-प्रत्यक्षत्वाद्गन्धर्वनगरप्रत्यक्षवद्विप्रतिपन्नमपि प्रत्यक्षं भ्रान्तं किन्न स्यादिति चेत्तर्हि वाक्यत्वाज्जरद्गवादिवाक्यवत्सत्यज्ञानादिवाक्यमप्रमाणं किन्न स्यात्। किञ्च प्रत्यक्षशब्देन प्रत्यक्षाभासविवक्षायां पक्षे तदभावः। प्रमाणाभिप्राये दृष्टान्तेऽनन्वयः। ज्ञानत्वमात्रस्य हेतुत्वे सत्यज्ञानादिवचनजन्यज्ञाने व्यभिचारः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य प्रत्यक्षबाधः ।। छ ।।
चतुर्दशभङ्गः
चतुर्दशभङ्गे
चतुर्दशभङ्गे
मूलम्-विश्वं सत्यमित्याद्यागमविरोधश्च व्यावहारिकं सत्त्वमत्रोच्यत इति चेन्न। निर्बीजत्वात्कल्पनायाः। व्यर्थं च प्रपञ्चे व्यावहारिकसत्यत्वप्रतिपादनम्। न हि कश्चिल्लोकिको वैदिको वा व्यावहारिकसत्यतां प्रपञ्चे नाभ्यपैति। तस्माद्वादिप्रसिद्धमिथ्यात्वनिषेधेन पारमार्थिकसत्त्वमेव प्रतिपाद्यते। अप्राप्ते शास्त्रमर्थवदिति न्यायात्। नेह नानेत्यादिश्रुतिनिषेध्यसमर्पकतयाऽनुवदति विश्वसत्यतावाक्यमिति चेन्न। तथा सति विश्वं सत्यमित्यादिवचनविधानसिद्ध्यर्थं नेह नानेत्यनुवाद इति प्रसङ्गात्।
मूलम्किञ्चसदेवेदमग्र आसीदित्यादिवाक्यनिषेध्यसमर्पकतया सत्यज्ञानादिवाक्यं ब्रह्मणः सत्यतामनुवदतीति चातिप्रसङ्गः। विश्वमिथ्यात्वब्रह्मसत्यत्वे श्रुतिमन्तरा न सिद्ध्यत इति कथमनुवाद इति चेन्न। दृश्यत्वादिहेतुना मिथ्यात्वसाधनात्। भ्रमानुपपत्त्याऽधिष्ठानतया ब्रह्मणोऽपि सत्यत्वकल्पनात्। किञ्च विश्वसत्यत्वानुवाद इति वदता विश्वस्य प्रामाणिकताऽभ्युपेयते न वा। नाद्यः। तत्प्रमाणविरोधात्। निषेध्यस्य स्वेन प्रमाणविषयताऽनभ्युपगमाच्च। न द्वितीयः। असिद्धस्यानुवादायोगात्। लोकसिद्धानुवाद इति चेन्न। लोके च प्रमाणसिद्धमनूद्यते भ्रान्त्या वा। नाद्यः दत्तोरत्वात्। नोत्तरः। तथैव लोकस्य भ्रान्तिसिद्धब्रह्मसद्भावो निषिध्यत इति प्रसङ्गात्। तस्माद्यद्वदन्तीत्यादिवचनं परिहारे विशेषयुक्तिं च विनाऽनुवादायोगात्। व्यावहारिकसत्यत्वस्य च वक्तुमप्रयोजकत्वात्। पारमार्थिकमेव सत्यत्वं जगत्युदितमित्यस्ति श्रुतिविरोधः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य श्रुतिविरोधः।। छ ।।
पञ्चदशभङ्गः
पञ्जदशभङ्गे
पञ्जदशभङ्गे
वादावली"असत्यमप्रतिष्ठं ये जगदाहुरनीश्वर" मित्यादिनिरवकाशस्मृतिविरोधश्च। न चात्रासत्यशब्दोऽत्यन्तासत्परोऽत्यन्तासत्त्वाभ्युपगन्तुर्वादिन एवाभावादाहुरित्यस्यायोगादिति ।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य स्मृतिविरोधः ।। छ ।।
षोडशभङ्गः
षोडशभङ्गे
षोडशभङ्गे
मूलम्विप्रतिपन्नं सत्यं प्रमाणदृष्टत्वाद्ब्रह्मवदित्यनुमानविरोधश्च। न च साध्यानिरुक्तिः। अबाध्यतायाः साध्यत्वात्। तस्याश्च ब्रह्मणि सिद्धत्वान्नाप्रसिद्धविशेषणता। ननु किमिदं प्रमाणदृष्टत्वम्। तात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वमतात्त्विकप्रमाणदृष्टत्वं वा। नाद्यः। अस्माकमसिद्धेः। प्रत्यक्षादिप्रमाणानां तत्त्वावेदकताऽनभ्युपगमात्। नोत्तरः। तवासिद्धेः। साधनविकलत्वं च दृष्टान्तस्येति।
मूलम्-मैवम्। प्रत्यक्षादिप्रमाणानामतत्त्वावेदकत्वे मानाभावात्। प्रत्यक्षादिकं तत्त्वावेदकं प्रमाणत्वात्सत्यज्ञानादिवाक्यवत्। अन्यथा प्रामाण्यमेव न स्यात्। प्रपञ्चस्तत्त्वावेदकप्रमाणदृष्टः। सम्प्रतिपन्नभ्रान्तपदार्थेतरत्वाद्ब्रह्मवत्। आत्मत्वमुपाधिरिति चेन्न। अबाध्यत्वादेरात्मत्वस्य पक्षे सम्भवात्। अन्यथाऽऽत्मत्वस्याप्यभावः स्याद्ब्रह्मणि।
मूलम्-किञ्च तत्त्वावेदकत्वादिविशेषानवधूय प्रमाणमात्रदृष्टत्वं हेतुः किन्न स्यात्। न ह्यस्य विपक्षे वृत्तिः। वृत्तिव्याप्यताया आत्मन्यभ्युपगमान्न तत्र साधानावृत्तिः। तथाऽपि प्रामाणिकत्वातिरिक्तं सत्यत्वं नास्तीति साध्याविशिष्टतेति चेन्न। स्वपरासम्मतेः। न तावत्स्वरीत्येदमुक्तम्। प्रमाणाविषयस्यापि ब्रह्मणः सत्यत्वाभ्युपगमात्। नाप्यस्मद्रीत्या। ब्रह्मण इव प्रपञ्चस्यास्माभिः प्रामाणिकत्वातिरिक्तस्य सत्यत्वस्याभ्युपगमात्। अन्यथा शशविषामवत्प्रमाणवृत्त्ययोगात्। तथा।पि ब्रह्मणः प्रामाणिकत्वाभावात्साधनविकलो दृष्टान्त इति चेन्न। असाधारणस्य दूषणत्वाभावपक्षे केवलव्यतिरेकित्वोपपत्तेः। ब्रह्मणश्चाप्रामाणिकत्वे शशविषाणवदसत्त्वप्रसङ्गः। स्तवतःसिद्धत्वान्नेति चेन्न। स्वत इति स्वेनेति वा प्रमाणेन विनेति वा। नाद्यः। अनभ्युपगमात्। न हि स्वस्मिन्स्वस्य कारकताऽभ्युपगम्यते। अन्यथा शशविषाणस्याप्येवं सिद्धिः स्यात्। न द्वितीयः। प्रमाणाभावे सत्त्वं न स्यादित्यस्य प्रमाणेन विना सिद्ध्यतीत्यस्यानुत्तरत्वात्।
मूलम्-सिद्ध्युपायान्तरस्यानुपन्यस्तत्वात्। स्वतःसिद्धत्वं नाम स्वप्रकाशत्वमिति चेन्न। दत्तोत्तरत्वात्। अर्थक्रियाकारित्वाच्च सत्यत्वसाधनं सम्भवति। स्वाप्नरम्भासम्भोगादौ व्यभिचारइति चेन्न। पक्षसमत्वात्। न हि पक्षे पक्षसदृशे वाव्यभिचारः। रज्जुभुजङ्गादौ व्यभिचार इति चेन्न। तज्ज्ञानस्यैव भयकम्पादिजनकत्वात्।
मूलम्-ननु ज्ञानमात्रमेव भयकम्पादिजनकमर्थविशेषितं वा। आद्ये सकलज्ञानानां भयकम्पादिजनकत्वाप्रसङ्गः। द्वितीये सर्पस्यापि तज्जनकत्वमायातमिति चेन्न। सर्पतया ज्ञातरज्जोरेव विशेषणत्वेन व्यभिचाराभावात्। सर्पाजन्यत्वाच्च। आत्मन्यर्थक्रियाकारित्वं नास्तीति चेन्न। तस्य निखिलप्रपञ्चकारणत्वेन श्रुतिशतसमधिगतत्वात्। सोऽपि पक्षनिक्षिप्तश्चेन्महायानिकपक्षपातः स्यात्। तदतिरिक्तात्माभ्युपगमान्नैवमिति चेन्न। तदतिरिक्तस्याप्येतद्विशेषणवत्तया पक्षनिक्षेपात्।
मूलम्-किञ्च विशिष्टस्याप्यात्मनोऽर्थक्रियाभ्युपगमादात्मांशस्य सा कथं न स्यात्। व्यावहारिकत्वं च विश्वसत्यतायां प्रमाणम्। अभिज्ञाऽभिवदनादीनामपि शुक्तिमात्रविषयत्वात् ।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्यानुमानविरोधः।। छ ।।
सप्तदशभङ्गः
सप्तदशभङ्गे
सप्तदशभङ्गे
मूलम्-दोषगम्यत्वमुपाधिश्च। न च दृश्यत्वादिना प्रपञ्चेऽपि तत्साध्यम्। मिथ्यात्वसाधन इवात्रापि दोषप्रसक्तेः।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य सोपाधिकत्वसमर्थनम् ।। छ ।।
अष्टादशभङ्गः
अष्टादशभङ्गे
अष्टादशभङ्गे
मूलम्-अनिर्वचनीयत्वाविद्यातत्कार्ययोरन्यतरत्वस्य मिथ्यात्वाभिप्राये निदर्शनस्य साध्यविकल्त्वं च। ननु कादाचित्कत्वहेतुना सकारणकत्वानुमाने कारणस्य सदसद्रूपत्वासम्भवादविद्याकार्यत्वमेव पर्यवस्यतीति चेन्न। केयं कादाचित्कता नाम। कदाचित्प्रतीतता वा कदाचिदुत्पन्नता वा। नाद्यः। व्याप्त्यभावात्। नोत्तरः। हेतोरसिद्धत्वात्। तस्मान्न त्रिविधोऽप्ययं प्रयोगो युक्तिपथमवतरतीति।। छ ।। मिथ्यात्वानुमानस्य दृष्टन्ते साध्यवैकल्यम् ।। छ ।।
एकोनविशंतितमभङ्गः
एकोनविशंतितमभङ्गे
एकोनविशंतितमभङ्गे
मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः
मूलम्-ननु यदुक्तं यद्भ्रन्तिकल्पितं तत्साधिष्ठानमिति तन्न। स्वाप्नपदार्थे व्यभिचारात्। तथा हि स्वाप्नास्तावत्पदार्थाः भ्रान्तिकल्पिताः। सत्यत्वे हि तेऽनादिनित्या उतोत्पत्तिविनाशवन्तः। आद्ये प्रागूर्ध्वञ्चोपलभ्येरन्। द्वितीये किन्न बोधानन्तरमुपलभ्यन्ते। तदैवोत्पद्यविनष्टा इति चेन्न। असम्भाववितत्वात्। किञ्चैवमुपादानानि निमित्तानि चोपलब्धव्यानि। अपि चैतानन्तः पश्यति बहिर्वा। नाद्यः। अल्पप्रदेशे महतां दर्शनासम्भवात्। नोत्तरः। पार्श्वस्थानामप्युपलम्भप्रसङ्गात्। केन चैते करणेनोपलभ्यन्ते। न तावद्बाह्येन्द्रियैः तेषां तदोपरतत्वात्। नापि मनसा। तस्य बहिरस्वातन्त्र्यात्।। किञ्च काश्यां सुप्तो मधुरां पश्यति तथा हेमन्ते सुप्तो वसन्तम्। न च तत्र तयोः सम्भवः। तस्माद्भ्रान्तिकल्पिताः। न चात्र किञ्चिदधिष्ठानमस्ति। आत्मनो भेदेनोपलम्भात्। न ह्यहं गज इति तदा प्रतीतिरस्तीति। एतदप्यविमर्शसुन्दरम्। तेषां सत्यत्वात्। तेन निरधिष्ठानत्वेऽपि न विरोधः
मूलम्-ननु सत्यत्वे बाधकमुक्तम्। मैवम्। उत्पत्तिविनाशाङ्गीकारात्। न चप्रागूर्ध्वमुपलम्भप्रसङ्गः विद्युदादिवत्तात्कालिकत्वसम्भवात्। तर्ह्युपादानाद्युपलब्धिः स्यादिति चेन्न। वासनोपादानकत्वात्। वासनानां चातीन्द्रियत्वादनुपलब्धिर्युज्यते। निमित्तादिकं त्वदृष्टेश्वरादिकमिति। अतीन्द्रियकार्यस्यापि त्र्यणुकवदुपलम्भः सम्भवति। अत एवान्तर्मनस उपलब्धिर्युज्यते।
मूलम्-निरधिष्ठानत्वमसिद्धम्। आत्मनोऽधिष्ठानत्वादिति चेन्न। आत्मनोऽधिष्ठानत्वासम्भवात्। नात्मा जगदारोपाधिष्ठानम्। अविषयत्वात्। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा पर्वतो न सर्षपारोपाधिष्ठानम्। प्रपञ्चो वा नात्मन्यध्यस्तः। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा सर्षपो न पर्वतेऽध्यस्तः। विरुद्धाकारप्रतीतावध्यासाङ्गीकारे तस्य कदाऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्गः। -किञ्च यदि जगदात्मन्यारोपितं स्यात्तदाऽऽत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्यते। यद्यत्रारोपितं तत्ततो भिन्नत्वेन न प्रतीयते। यथा शुक्तिकायामारोपितं रजतं न शुक्तिकाया भिन्नत्वेन प्रतीयते भ्रान्तौ। दृश्यते चेदमिदानीं जगदात्मनो भिन्नत्वेन। तस्मान्न तत्रारोपितमिति।
मूलम्-किञ्च ब्रह्मणि प्रपञ्चस्यारोपितत्वं वदन्नत्यत्र प्रपञ्चस्य सत्तामङ्गीकरोति न वा। आद्ये परस्य मिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिः। न चेत्कस्य कुत्रारोपः न हि शशविषाणं क्वचिदारोप्यते। नास्माभिरन्यत्र सतः प्रपञ्चस्य ब्रह्मण्यारोपोऽभिधीयते। येन सर्वमिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिरापद्येत। किन्त्वनिर्वचनीयरूपः कश्चिदनात्माकारोऽयं प्रपञ्चे ब्रह्मण्यारोपित इत्यङ्गीक्रियत इत् चेन्न। अनात्माकारः प्रपञ्च इति कोऽर्थः। किमात्मनोऽन्य उतात्मविरुद्ध उतात्माभावो वा। नाद्यद्वितीयौ। क्वचित्प्रपञ्चस्य सत्यतापातात्। न तृतीयः। आत्मन्यात्माभावारोपस्य क्वाप्यदृष्टत्वात्। न हि कश्चिदहमहं न भवामीति भ्रान्तो दृश्यते।
मूलम्-विमत आत्माऽऽत्माभावारोपाधिष्ठानं न भवति। आत्मत्वाद्देवदत्त्वत्। ननु निष्प्रधानत्वमसिद्धम्। पूर्वपूर्वप्रपञ्चस्योत्तरोत्तरप्रपञ्चारोपे प्रधानत्वादिति चेन्न। असत्त्वात्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतुनां प्रतिकूलतर्कपराहतिः।। छ ।।
विंशतिततमभङ्गः
विंशतिततमभभङ्गे
विंशतिततमभभङ्गे
मूलम्-एवमनेकानुमानप्रतिहतत्वान्न दृश्यत्वानुमानं समञ्जसमिति सिद्धम्।। छ ।। दृश्यत्वादिहेतुत्रयभङ्गः ।। छ ।।
एकविंशतितमभङ्गः
एकविंशतितमभङ्गे
एकविंशतितमभङ्गे
मूलम्-किञ्च जगतो मिथ्यात्वाभावे न बाधकं पश्यामः। सत्यत्वे कथं प्रकाशेत। न तावत्स्वातः। जडत्वात्। नापि परतः। प्रकाशान्तरेण सम्बन्धाभावात्। असम्बद्धस्य प्रकाशनेऽतिप्रसङ्गात्। असत्त्वे तु चित्प्रकाशारोपितस्याधिष्ठानाध्यस्तत्वसम्बन्धेन प्रकाशोपपत्तिरिति चेन्न। विचारागोचरत्वात्। तथा हि। कथं प्रकाशेतेति कोऽर्थः। कथं प्रकाशः स्यादिति वा कथं प्रकाशाश्रय इति वा कथं प्रकाशविषय इति वा। न प्रथमद्वितीयौ। अनभ्युपगमात्। तृतीयेऽपि किं प्रकाशशब्देन चैतन्यं विवक्षितं वृत्तिर्वा। नाद्यः। चैतन्याविषयत्वेऽपि बाधकाभावात्। वृत्तिविषयत्वेनैव व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतिति व्यवहारोपपत्तेः। चैतन्यस्यापि स्वाभाविकं भविष्यतीति को दोषः। असङ्गश्रुतिस्तु परमेश्वरस्य पापादिसम्बन्धाभाववादिनी।
मूलम्-न द्वितीयः करणसामर्थ्येन विषयविषयिभावोपपत्तेः। किञ्चाध्यस्तत्वेन प्रकाशने जीवेऽध्यासपक्षे सर्वदा प्रकाशः स्यात्। ब्रह्मण्यध्यासे न कदाचित्। बहुजीवपक्षेऽपि जीवेऽध्यासे सर्वदा सर्वेषां प्रपञ्चः प्रकाशेत। ब्रह्माधिष्ठानत्वे तु न कस्यापि कदाऽपि तथापि सत्यत्वे दृश्यत्वं न युज्यते। दृग्दृश्ययोः संसर्गानिरूपणादिति चेन्न। संयोगासम्भवे समवायवदन्यस्यापि तयोरसम्भवे कल्प्यत्वात्। विषयविषयिभावस्य सम्भवात्।
मूलम्-न च तदनिरूपणम्। ज्ञानजन्यफलाधारत्वलक्षणं तत्तत्प्रतीतियोग्यत्वं विषयत्वमस्त्विति चेत्तत्फलं ज्ञातता व्यवहारो वा। नाद्यः। अतीतादौ तदसम्भवेनाविषयत्वापत्तेः। न द्वितीयः। गगनादावभावादिति। मैवम्। अतीतादौ ज्ञातताऽभ्युपगमे विरोधाभावात्। अन्यथा तद्व्यवहारायोगात्। अतीतादावनुगतविषयत्वं नास्तीति चेत्प्रतिनियतमेवास्तु। व्यवहारोऽपि तत्तद्योग्यमेव ज्ञानजन्यफलं किन्न स्यात्। तस्मान्नानुमानं विश्वमिथ्यात्वे मानम्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतूनामप्रयोजकत्वम्।। छ ।।
द्वाविंशतितमभङ्गः
द्वाविंशतितमभङ्गे
द्वाविंशतितमभङ्गे
मूलम्-किञ्च यदि जगत् भ्रान्तिकल्पितं स्यात्तर्हि कल्प्यमानजगत्सदृशसत्याधिष्ठानप्रधानपूर्वकमङ्गीकार्यं प्रसज्येत। न च सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारो युक्तः। पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारीतैलप्रदानप्रतिज्ञावदधिकापातात्। ततो नेदं जगद्भ्रान्तिकल्पितमिति तर्कपराहतं दृश्यत्वाद्यनुमानम्। किञ्च कल्पनाया आरोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानपूर्वकत्वं व्यापकम्। तच्चात्र नास्ति। सत्यजगद्द्वयाङ्गीकारादस्यैव जगतः सत्यत्वाह्गीकारस्य लघुत्त्वात्। अतो व्याप्यकल्पनापि नास्तीति प्रमाणविरोधः। तथा च प्रयोगः प्रपञ्चो न भ्रान्तिकल्पितः। निरधिष्ठानत्वान्निष्प्रधानत्वादात्मवद्व्यतिरेकेण वा रजतवत्। विपक्षे त्वारोप्यसदृशाधिष्ठानप्रधानभूतसत्यजगद्द्व्यङ्गीकारप्रसङ्गो बाधकः
मूलम्-ननु यदुक्तं यद्भ्रन्तिकल्पितं तत्साधिष्ठानमिति तन्न। स्वाप्नपदार्थे व्यभिचारात्। तथा हि स्वाप्नास्तावत्पदार्थाः भ्रान्तिकल्पिताः। सत्यत्वे हि तेऽनादिनित्या उतोत्पत्तिविनाशवन्तः। आद्ये प्रागूर्ध्वञ्चोपलभ्येरन्। द्वितीये किन्न बोधानन्तरमुपलभ्यन्ते। तदैवोत्पद्यविनष्टा इति चेन्न। असम्भाववितत्वात्। किञ्चैवमुपादानानि निमित्तानि चोपलब्धव्यानि। अपि चैतानन्तः पश्यति बहिर्वा। नाद्यः। अल्पप्रदेशे महतां दर्शनासम्भवात्। नोत्तरः। पार्श्वस्थानामप्युपलम्भप्रसङ्गात्। केन चैते करणेनोपलभ्यन्ते। न तावद्बाह्येन्द्रियैः तेषां तदोपरतत्वात्। नापि मनसा। तस्य बहिरस्वातन्त्र्यात्।। किञ्च काश्यां सुप्तो मधुरां पश्यति तथा हेमन्ते सुप्तो वसन्तम्। न च तत्र तयोः सम्भवः। तस्माद्भ्रान्तिकल्पिताः। न चात्र किञ्चिदधिष्ठानमस्ति। आत्मनो भेदेनोपलम्भात्। न ह्यहं गज इति तदा प्रतीतिरस्तीति। एतदप्यविमर्शसुन्दरम्। तेषां सत्यत्वात्। तेन निरधिष्ठानत्वेऽपि न विरोधः
मूलम्-ननु सत्यत्वे बाधकमुक्तम्। मैवम्। उत्पत्तिविनाशाङ्गीकारात्। न चप्रागूर्ध्वमुपलम्भप्रसङ्गः विद्युदादिवत्तात्कालिकत्वसम्भवात्। तर्ह्युपादानाद्युपलब्धिः स्यादिति चेन्न। वासनोपादानकत्वात्। वासनानां चातीन्द्रियत्वादनुपलब्धिर्युज्यते। निमित्तादिकं त्वदृष्टेश्वरादिकमिति। अतीन्द्रियकार्यस्यापि त्र्यणुकवदुपलम्भः सम्भवति। अत एवान्तर्मनस उपलब्धिर्युज्यते।
मूलम्-निरधिष्ठानत्वमसिद्धम्। आत्मनोऽधिष्ठानत्वादिति चेन्न। आत्मनोऽधिष्ठानत्वासम्भवात्। नात्मा जगदारोपाधिष्ठानम्। अविषयत्वात्। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा पर्वतो न सर्षपारोपाधिष्ठानम्। प्रपञ्चो वा नात्मन्यध्यस्तः। तद्विरुद्धतया प्रतीयमानत्वात्। यथा सर्षपो न पर्वतेऽध्यस्तः। विरुद्धाकारप्रतीतावध्यासाङ्गीकारे तस्य कदाऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्गः। किञ्च यदि जगदात्मन्यारोपितं स्यात्तदाऽऽत्मनो भिन्नत्वेन न दृश्यते। यद्यत्रारोपितं तत्ततो भिन्नत्वेन न प्रतीयते। यथा शुक्तिकायामारोपितं रजतं न शुक्तिकाया भिन्नत्वेन प्रतीयते भ्रान्तौ। दृश्यते चेदमिदानीं जगदात्मनो भिन्नत्वेन। तस्मान्न तत्रारोपितमिति।
मूलम्-किञ्च ब्रह्मणि प्रपञ्चस्यारोपितत्वं वदन्नत्यत्र प्रपञ्चस्य सत्तामङ्गीकरोति न वा। आद्ये परस्य मिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिः। न चेत्कस्य कुत्रारोपः न हि शशविषाणं क्वचिदारोप्यते। नास्माभिरन्यत्र सतः प्रपञ्चस्य ब्रह्मण्यारोपोऽभिधीयते। येन सर्वमिथ्यात्वप्रतिज्ञाहानिरापद्येत। किन्त्वनिर्वचनीयरूपः कश्चिदनात्माकारोऽयं प्रपञ्चे ब्रह्मण्यारोपित इत्यङ्गीक्रियत इत् चेन्न। अनात्माकारः प्रपञ्च इति कोऽर्थः। किमात्मनोऽन्य उतात्मविरुद्ध उतात्माभावो वा। नाद्यद्वितीयौ। क्वचित्प्रपञ्चस्य सत्यतापातात्। न तृतीयः। आत्मन्यात्माभावारोपस्य क्वाप्यदृष्टत्वात्। न हि कश्चिदहमहं न भवामीति भ्रान्तो दृश्यते।
मूलम्-विमत आत्माऽऽत्माभावारोपाधिष्ठानं न भवति। आत्मत्वाद्देवदत्त्वत्। ननु निष्प्रधानत्वमसिद्धम्। पूर्वपूर्वप्रपञ्चस्योत्तरोत्तरप्रपञ्चारोपे प्रधानत्वादिति चेन्न। असत्त्वात्।। छ ।। मिथ्यात्वहेतुनां प्रतिकूलतर्कपराहतिः।। छ ।।
त्रयोविंशतितमभङ्गः
त्रयोविंशतितमभङ्गे
त्रयोविंशतितमभङ्गे
मूलम्-एवमनेकानुमानप्रतिहतत्वान्न दृश्यत्वानुमानं समञ्जसमिति सिद्धम्।। छ ।। दृश्यत्वादिहेतुत्रयभङ्गः ।। छ ।।
चतुर्विंशतितमभङ्गः
चतुर्विंशतितमभङ्गे
चतुर्विंशतितमभङ्गे
मूलम्-अस्य पटस्यावयवित्वादिनैतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभाव प्रतियोगित्वसाधनमप्यत्यन्ताभावस्य निष्प्रतियोगिकत्वेन बाधितम्। एतत्तन्तुषु नास्तीति साधने सिद्धसाधनम्। कार्यकारणयोरभेदेनाधाराधेयभावाभावात्। एतत्तन्तुकार्यं न भवतीति साधनेऽकार्यत्वस्यान्यकार्यत्वस्य वा सिद्ध्याऽर्थान्तरत्वम्। आकाशादिषु चैवं प्रयोगाभावेन सर्वजगन्मिथ्यात्वासिद्धिश्च।। छ ।। अंशित्वानुमानस्य बाधः ।। छ ।।
पञ्चविंशतितमभङ्गः
पञ्चविंशतितमभङ्गे
पञ्चविंशतितमभङ्गे
मूलम्-किञ्च किमत्र पटस्यासत्त्वमापाद्यते संसर्गनिषेधो वा क्रियते। नाद्यः त्वद्दर्शनविरोधात्। सत्त्वमात्रं निषिध्यते नासत्त्वमापाद्यत इति चेन्न। तन्निषेधे तद्ध्रौव्यात्। सत्त्वनिषेधे चैतन्तुनिष्ठपदवैय्यर्थ्यम्। न च सिद्धसाधनतापरिहारार्थं विशेषणमिति वक्तव्यम्। एतत्पटात्यन्ताभावस्यास्माकमसिद्धेः। एतेन दृष्टान्तोऽपि साध्यविकलतया प्रत्युक्तो वेदितव्यः। ननु पटान्तरस्यात्यन्ताभावो न चेत्पटः किन्न स्यात्। किमत्र पटसंसर्गः स्यात्पटो वा। आद्ये न व्याप्तिसिद्धिः। द्वितीये सिद्धसाधनम्। नाप्युत्तरः। तन्तुपटसंसर्गाभावस्य सिद्धत्वात्। अथायं पट एतत्तन्तुजन्यो न भवतीति प्रतिज्ञावाक्यार्थः स्यात्तर्हि तस्यांशित्वमपि न स्यादिति हेतोरसिद्धिः स्यात्। न तत्त्वतस्यदप्यस्तीति चेन्न। अतात्त्विकावयवित्वस्यास्माकमसिद्धेः। इह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्यक्षविरुद्धं चैतत्।
मूलम्-नन्विह नभसि नीलिमेति प्रत्यक्षाभिमतप्रत्ययबाधेनारूपित्वानुमानप्रवृत्तिवदत्राप्यनुमान प्रवृत्त्युपपत्तिः किन्न स्यादिति चेन्न। तथा सति दहनशैत्यानुमानादेरप्यप्रतिबद्धप्रसरेण बाधपरिभाषापरिमोषापातात्। उभयवादिसम्प्रतिपन्नप्रामाण्ये प्रत्यक्षादौ जाग्रति बाधः सुखं प्रसरेदिति चेत्तत्किं प्रकृते प्रत्यक्षप्रामाण्यानभ्युपगमे कारणम्। अनुमानविरोध इति चेत्समं दहनशैत्यानुमानेऽपि। न च प्रत्यक्षस्यानुमानबाधितत्वे दृष्टान्तं पश्यामः। नभोनीलिमाप्रतितिभ्रमताऽप्यागमाद्यवगम्यैव। अनुमानस्याप्रसरात्। तथा हि। महत्त्वान्नभसो रूपं निषिध्यतेऽगन्धवत्त्वाद्वा स्पर्शरहितत्वाद्वा। न त्रयमपि। तत एवाशब्दत्वप्रसङ्गात्।
मूलम्-अथ तत्रागमविरोधस्तर्ह्यरूपित्वमपि तस्यागमसिद्धमेव। नानुमानादिति। तस्मात्कालातीतादोषं क्वचित्स्वीकुर्वताऽत्रापि समानन्यायतया सा चाभ्युपेयैव।। छ ।। अंशित्वानुमाननिरासः।। छ ।।