Katha: Difference between revisions
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<span id="gr-C1-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="प्रथमावल्ली"></span> | <span id="gr-C1-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="प्रथमावल्ली"></span> | ||
=== प्रथमावल्ली === | === प्रथमावल्ली === | ||
{{Bhashyam | |||
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| text = नमो भगवते तस्मै सर्वतः परमाय ते । सर्वप्राणिहृदिस्थाय वामनाय नमो नमः ॥ | |||
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| verse_line1 = उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस । तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । | |||
| verse_line2 = अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् । | |||
| verse_line2 = तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥ | |||
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| text = अग्नौ विष्णुं सदा ध्यायंस्त्रिशोऽग्निं नाचिकेतकम् । यश्चयीत स तु प्राप्य स्वर्गं तत्र भयातिगः ॥ उष्य मन्वन्तरं कालममृतत्वं भजेत् क्रमात् ॥ इति ब्रह्मसारे ॥ इच्छन् वाजश्रवो नप्ता ददौ सर्वस्वदक्षिणाम् । उद्दालकः स्वर्गलोकं ददौ गाश्च निरिन्द्रियाः ॥ मां दत्वापि न ते गावो दातव्या ईदृशा इति । उवाच पुत्रस्तं बालस्तं शशाप पिता स्वयम् ॥ | |||
}} | |||
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| verse_line1 = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । | |||
| verse_line2 = किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे । | |||
| verse_line2 = सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । | |||
| verse_line2 = तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥ | |||
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| text = स जगाम यमं बालो ब्रह्मचारी यमस्य तु । पत्न्या सम्पूज्यमानोऽपि जग्राहार्घ्यादिकं न तु ॥ आगते तु यमे प्राह यमं सोदकमाहर ॥ ४-६ ॥ | |||
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| verse_line1 = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् । | |||
| verse_line2 = एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । | |||
| verse_line2 = नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥ | |||
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| text = इत्युक्तस्स यमस्तं तु सम्पूज्यादाद् वरत्रयम् ॥ ७-८ ॥ | |||
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| verse_line1 = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्यात् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो । | |||
| verse_line2 = त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = यथा पुरस्तात् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । | |||
| verse_line2 = सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ १० ॥ | |||
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| text = सौमनस्यं पितुश्चैव नाचिकेताग्निगं हरिम् ॥ मुक्ते स्थितञ्च तं विष्णुमिति प्रादात् वरत्रयम् ॥ इति गतिसारे ॥ ९-१० ॥ | |||
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| verse_line1 = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । | |||
| verse_line2 = उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् । | |||
| verse_line2 = स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १२ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = अग्र्यत्वादग्निनामासौ नाचिकेताग्निगो हरिः ॥ ११-१२ ॥ | |||
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| verse_line1 = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । | |||
| verse_line2 = अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १३ ॥ | |||
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| text = लोको विष्णोरनन्तस्य तज्ज्ञानान्नित्य आप्यते ॥ प्रतिष्ठा सर्वलोकस्य स विष्णुस्सर्वहृद्गतः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । | |||
| verse_line2 = स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = स एव सर्वलोकादिस्तं ज्ञात्वा मुच्यते ध्रुवम् ॥ इति च ॥ | |||
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| text = या इष्टका या इष्टकादेवताः । | |||
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| text = इष्टकादेवतां विष्णुं षष्ठ्युत्तरशतत्रिकम् । यथावदेव विज्ञाय मुच्यते कर्मबन्धनात् ॥ इति च ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः । | |||
| verse_line2 = तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः शृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू । | |||
| verse_line2 = ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥ | |||
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| text = त्रिभिरेत्य सन्धिं वेदैरविरुद्धः । वेदोक्तप्रकारेण भगवत्तत्वादिकं जानन्नित्यर्थः । त्रिकर्मकृत् यज्ञदानतपःकर्ता । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् इति वचनात् । | |||
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| verse_line1 = त्रिनाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् । | |||
| verse_line2 = स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १७ ॥ | |||
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| text = त्रयमेतत् या इष्टका इत्यादि । | |||
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| text = ब्रह्मेति वेद उद्दिष्टस्तस्माद् व्यक्तो यतो हरिः । ब्रह्मजस्तेन कथितस्स एव ज्ञोऽखिलज्ञतः ॥ इति नामनिरुक्ते । | |||
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| text = अनेकरूपां सुवर्णमयीम् । बहुरूपं च पुरटं कार्तस्वरमितीर्यते इत्यभिधानात् । | |||
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| text = यमोऽनुवादसन्तुष्टो वह्नेस्तन्नामतामपि । शृङ्कां स्वर्णमयीं चैव कण्ठमालामदाद् विभुः ॥ इति पाद्मे । | |||
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| text = लोकादिः प्रतिष्ठा ब्रह्मजज्ञो अनन्तलोकाप्तिरित्यादिविशेषणैश्च भगवानेव । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठामिति परामर्शाच्च । भगवतो ह्युरुगायत्वं प्रसिद्धम् । गुहानिहितत्वं च तस्यैव विशेषतः प्रसिद्धम् । न चाग्निपरिज्ञानमात्रेणानन्तलोकाप्तिर्भगवज्ज्ञानं विना । तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिं ल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति इत्यादिश्रुतेः । न च मुख्ये सत्यमुख्यार्थो युज्यते । | |||
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| verse_line1 = एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । | |||
| verse_line2 = एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । | |||
| verse_line2 = एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वृतस्तृतीयः ॥ १९ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = प्रेते मुक्ते मनुष्ये नियामकत्वेन भगवानस्तीति ज्ञानिनो वदन्ति । नास्तीत्यज्ञाः । तस्य नियामकस्य स्वरूपं यथावदहं विद्याम् । | |||
}} | |||
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| text = अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् इति परिहाराच्च मुक्ते स्थितो भगवान् पृच्छ्यते इति सिद्धम् । देहाद्विशेषेण मोचनं नाम मुक्तिरेव । मुक्तेरपि मरणात्मकत्वात् मरणमित्यपि भवति । स्थूलदेहपरित्यागस्तु विस्रंसमानस्येत्यनेनैवोक्तो भवति । | |||
}} | |||
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| text = अग्निस्थं परमात्मानं सामान्याज्जानतोऽपि तु । अजानतस्तु मुक्तौ च जीवान्तःस्थितमीश्वरम् ॥ नियामकं च जीवानां मुक्तानामपि सर्वदा । गुणान् सर्वोत्तमत्वादीनविज्ञाय हरेस्तथा ॥ नैव मुक्तिर्भवेत् तस्मात् कृच्छ्रात् तदवदद्यमः । तस्य गोप्यत्वविज्ञप्त्यै तथाप्यग्निस्थवेदनात् ॥ सुखाधिक्यं भवेन्मुक्तौ तस्मात् तत्पृथगीरितम् ॥ इति तत्त्वसारे । | |||
}} | |||
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| text = स्थाणुमन्येऽनुसयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् इत्युक्त्वा य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः इति वचनाच्च जीवेषु स्थितो भगवान् पृच्छ्यत इति सिद्धम् । मृतजीवे स्थितो मुक्तजीवे स्थितश्चोभयात्मको भगवान् विवक्षित इत्येतस्माच्चाविरोधः । | |||
}} | |||
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| text = गुह्यं तत्परमं ब्रह्म म्रियमाणं शरीरिणम् । सम्प्राप्तमपि जीवेषु जागर्ति स्वपितेष्वपि ॥ इति ब्रह्माण्डे । | |||
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| verse_line1 = देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयोऽणुरेष धर्मः । | |||
| verse_line2 = अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैवम् ॥ २० ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = धारकत्वात् धर्मो भगवान् । | |||
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| verse_line1 = देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । | |||
| verse_line2 = वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् । | |||
| verse_line2 = भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतत् तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । | |||
| verse_line2 = महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व । | |||
| verse_line2 = इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C01_S01_V24" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C01_S01_V24" data-block-id="bhashya-KKN_C01_S01_V24"> | ||
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| text = मरणे स्थितं भगवन्तं मानुप्राक्षीः । | |||
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| verse_line1 = श्वोऽभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । | |||
| verse_line2 = अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्तगीतम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वाम् । | |||
| verse_line2 = जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः क्वाधस्थः प्रजानन् । | |||
| verse_line2 = अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । | |||
| verse_line2 = योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २८ ॥ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="gr-author-note">इति प्रथमाध्याये प्रथमावल्ली ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति प्रथमाध्याये प्रथमावल्ली ॥</div> | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C01_S01_V28" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C01_S01_V28" data-block-id="bhashya-KKN_C01_S01_V28"> | ||
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| text = महति साम्पराये मुक्तौ ॥ | |||
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<span id="gr-C1-S2" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वितीयावल्ली"></span> | <span id="gr-C1-S2" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वितीयावल्ली"></span> | ||
=== द्वितीयावल्ली === | === द्वितीयावल्ली === | ||
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| verse_line1 = अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतेव प्रेयः ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः । | |||
| verse_line2 = तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद् य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । | |||
| verse_line2 = श्रेयो धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामान् अभिध्यायन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । | |||
| verse_line2 = नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥ | |||
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| text = शृङ्कां शृङ्कलाम् ॥ | |||
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| verse_line1 = दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । | |||
| verse_line2 = विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्तः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । | |||
| verse_line2 = दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । | |||
| verse_line2 = अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । | |||
| verse_line2 = आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = न नरेणावरः प्रोक्त एष सुज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । | |||
| verse_line2 = अनन्यप्रोक्ते गतिरस्य नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = अन्यो भगवानन्योऽहमित्यजानन्ननन्यः । तेन प्रोक्ते गतिर्ज्ञानं नास्ति । प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ इति वाक्यशेषात् । | |||
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| text = जीवानां चैव विष्णोश्च यो न वेत्ति भिदां पुमान् । तदनुव्रताश्च ये केचित्तेषां ज्ञानं न जायते ॥ इति ब्रह्मवैवर्ते । | |||
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| verse_line1 = नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । | |||
| verse_line2 = यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । | |||
| verse_line2 = ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्नि रनित्यद्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = आख्यं विष्ण्वाख्यं नित्यं शेवधिरिति जानामि । नित्यमाख्यविष्णुविषयैः द्रव्यैर्मन आदिभिः । आख्यनित्यविषयैर्विष्ण्वाख्यनित्यविषयैः द्रव्यैः । नित्यं भगवन्तं प्राप्तवानस्मि । ध्रुवो भगवान् । अध्रुवैस्तद्भक्तिवर्जितैर्न प्राप्यते ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् । | |||
| verse_line2 = स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = क्रतोरानन्त्यहेतुम् । स्तोमैरपि सर्वात्मना प्राप्तुमशक्यम् । स्तोमेभ्योऽपि महान्तम् । उरुगायमित्युक्तत्वाच्च न जीवविषयोऽयं प्रश्नः । | |||
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| text = शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । शरवत् तन्मयो भवेत् । अभयं तितीर्षतां पारम् । तादृगेव भवति । इत्यादौ सर्वत्र भेदस्यैवोक्तेश्च न जीवाभेदः । | |||
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| text = नाचिकेतं शकेमसीत्युक्तत्वाच्च नाचिकेताग्निस्थो भगवानेवात्रोच्यत इति सिद्धम् । उरुगायं दृष्ट्वा कामस्याप्तिमत्यस्राक्षीः । न च मृत्वा यमं प्राप्तस्य नचिकेतसो मृतोऽस्ति न वेति संशयो युज्यते ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । | |||
| verse_line2 = अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = गह्वरे मुक्तजीवे स्थितम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेनमाप्य । | |||
| verse_line2 = स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = मुक्तजीवे स्थितं विष्णुं विदित्वा जीवतः पृथक् । मोदते मोदनीयं तं प्राप्य मुक्तस्सदैव च ॥ इति महावाराहे । | |||
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| verse_line1 = अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् । | |||
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| text = एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् । सर्वस्यालम्बनं ज्ञात्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति च ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_line1 = न जायते म्रियते वा विपश्चि न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । | |||
| verse_line2 = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥ १८ ॥ | |||
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| text = देहोत्पत्तिविनाशाख्यौ ज्ञानिनोऽप्युद्भवाभवौ । न कुतश्चिद्यतो विष्णुर्जायतेऽतस्तदीक्षणात् ॥ भावाभावौ न विदुषो यस्माज्जीवो न कश्चन । जायते म्रियते वापि स्वरूपेण कथञ्चन ॥ अजो नित्योऽविकारश्च जीवः पुरमणन्नपि ॥ इति च । | |||
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| text = अयं भगवान् कुतोऽपि न बभूव यस्मादतस्तद्वेत्तापि विपश्चिन्न जायते न म्रियते च । यतः कश्चिज्जीवः स्वतो न बभूव । देहसम्बन्धाद्धि जायते । विपश्चितस्तु देहसम्बन्धाभावान्न जायते न म्रियते च ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । | |||
| verse_line2 = उभौ तै न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । | |||
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| text = एवं नित्यस्य जन्तोर्गुहायां निहितः । ए विष्णौ क्रतुर्यस्य सोऽक्रतुस्तन्निश्चयः । आत्मनः सकाशान्महिमानं महामानम् । | |||
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| text = आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । ऐश्वर्याद् भगवान् विष्णुर्विरुद्धं घटयत्यसौ ॥ इति च ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । | |||
| verse_line2 = महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = नायमात्मा प्रवचेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । | |||
| verse_line2 = यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line1 = नाविरतो दुश्चरितात् नाशान्तो नासमाहितः । | |||
| verse_line2 = नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेनैवमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः । | |||
| verse_line2 = मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
<div class="gr-author-note">इति प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥</div> | ||
| Line 744: | Line 814: | ||
<span id="gr-C1-S3" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="तृतीयावल्ली"></span> | <span id="gr-C1-S3" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="तृतीयावल्ली"></span> | ||
=== तृतीयावल्ली === | === तृतीयावल्ली === | ||
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| verse_line1 = ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्द्धे । | |||
| verse_line2 = छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः ॥ १ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = आत्मान्तरात्मेति विभुरेक एव द्विधा स्थितः । स विष्णुः परमे वायौ परेभ्योऽप्यृद्धरूपके ॥ शुभान् पिबति भोगान् स च्छायेव विदुषां प्रभुः । आतपः पापिनां नित्यं ... ... । | |||
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| verse_line1 = यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । | |||
| verse_line2 = अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमसि ॥ २ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = .... ... मर्यादा विष्णुयाजिनाम् ॥ संसारस्य च पारस्थस्स विष्णुर्द्विस्वरूपकः ॥ | |||
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| verse_line1 = आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च । | |||
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| verse_line1 = इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । | |||
| verse_line2 = आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । | |||
| verse_line2 = तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । | |||
| verse_line2 = तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्तवविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः । | |||
| verse_line2 = न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदाशुचिः । | |||
| verse_line2 = स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः । | |||
| verse_line2 = सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अथेभ्यश्च परं मनः । | |||
| verse_line2 = मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः । | |||
| verse_line2 = पुरुषान्न परः किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = देवेभ्य इन्द्रियात्मभ्यो ज्यायांसोऽर्थाभिमानिनः । सोमवित्तपसूर्याप्पा अश्व्ग्नीन्द्रेन्द्रसूनवः ॥ यमो दक्षश्चेन्द्रियेशास्सुपर्णी वारुणी तथा । उमेति चार्थमानिन्यस्तिस्रो द्विर्द्व्येकदेवताः ॥ मनोभिमानिनो रुद्रवीन्द्रशेषास्त्रयोऽपि तु । ते श्रेष्ठा अर्थमानिभ्यस्तेभ्यो बुद्धिः सरस्वती ॥ तस्या ब्रह्मा महानात्मा ततोऽव्यक्ताभिधा रमा । तस्यास्तु पुरुषो विष्णुः पूर्णत्वान्नैव तत्समः ॥ कश्चित् कुतश्चिच्छ्रेष्ठस्तु नास्तीति किमु सा कथा॥ १०-१२ ॥ | |||
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| verse_line1 = एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । | |||
| verse_line2 = दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । | |||
| verse_line2 = ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = तस्माद्वागात्मिका देवीरुमाद्यास्तु शिवादिषु । शिवादीन् ब्रह्मवाय्वोस्तु नियच्छेन्महदात्मनोः ॥ तौ रमायां परानन्दे तां विष्णौ परमात्मनि । तद्वशत्वेन तद्ध्यानं नियमो नाम नापरः ॥ कुतस्तु मानुषो देवान्नियच्छेद्विनियामकान् ॥ इति च ॥ स्वभार्यायाः परत्वं सिद्धमिति महतः परमित्येवोक्तम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत । | |||
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| verse_line1 = अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । | |||
| verse_line2 = अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् । | |||
| verse_line2 = उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_line1 = य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । | |||
| verse_line2 = प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पते इति ॥ १७ ॥ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">इति प्रथमाध्याये तृतीयावल्ली ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति प्रथमाध्याये तृतीयावल्ली ॥</div> | ||
| Line 946: | Line 1,011: | ||
<span id="gr-C2-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="प्रथमावल्ली"></span> | <span id="gr-C2-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="प्रथमावल्ली"></span> | ||
=== प्रथमावल्ली === | === प्रथमावल्ली === | ||
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| verse_line1 = पराञ्चि खानि व्यतृणात् स्वयम्भूस्तस्मात् पराक् पश्यति नान्तरात्मन् । | |||
| verse_line2 = कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = पराचः कामाननुयन्ति बालाः ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशान् । | |||
| verse_line2 = अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान् । | |||
| verse_line2 = एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = इदं गुह्यं ब्रह्म प्रवक्ष्यामि । यथा मरणं प्राप्य जीवो भवति तच्च प्रवक्ष्यामि जीवेश्वरभेदज्ञापनाय । यः कर्मफलभोक्ता सुप्त्यादिमान् स जीवः । यः प्रलयादिषु जीवेषु सुप्तेषु जागर्ति स विष्णुः परं ब्रह्मेत्यर्थः । न हि जीवस्य योन्यादिगमनं ब्रह्म । जीवाद्भेदेन ज्ञातं हि ब्रह्म यथावज्ज्ञातं भवति । | |||
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| verse_line1 = स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । | |||
| verse_line2 = महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = य इदं मध्वदं वेदात्मानं जीवमन्तिकात् । | |||
| verse_line2 = ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = जीवस्यान्तिके । न हि स्वस्य स्वयं जीवोऽन्तिके भवति । वस्त्वन्तरस्य हि दूरत्वमन्तिकत्वं वा ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । | |||
| verse_line2 = गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = अम्नामभ्यश्च भूतेभ्यस्तपोनाम्नः शिवादपि । पूर्वं यो जनयामास पूर्वजातं चतुर्मुखम् ॥ स्वात्मानं च गुहासंस्थं सर्वभूतैः सहाभिभूः । यः पश्यति सदा विष्णुस्स एष हृदि संस्थितः ॥ इति च ॥ | |||
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| text = यथा मुखादिन्द्रश्चाग्निश्चेत्यादिना जाता एवेन्द्रादयः कश्यपात् पुनर्जायन्ते न तथा भगवतो ब्रह्मा । किन्त्वजातमेवाद्भ्यः पूर्वमजायत जनयामास । अजायतेति जज्ञे बहुज्ञम् इतिवदन्तर्णीतणिच् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी । | |||
| verse_line2 = गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = अदनादितिर्विष्णुर्यः प्राणसहितः स्थितः । उत्तमो देवताभ्यश्च सोत्मानं विविधात्मना ॥ मत्स्यकूर्मादिरूपेण गुहासंस्थमजीजनत् । भूतैस्सह महाविष्णुः परमात्मा युगे युगे ॥ इति च । | |||
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| text = देवतामयी देवतोत्तमा । प्राणेन सह स्थितो भवति । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं स्वात्मानं भूतैस्सह विविधं जनयामास ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । | |||
| verse_line2 = दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिः हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ | |||
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| text = सर्वज्ञो भगवान् विष्णुररण्योर्गुरुशिष्ययोः । सुभृतः स्तूयते नित्यं जानद्भिः पुरुषोत्तमः ॥ इति च । अर्यते ण आभ्यामित्यरणी ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = यतश्चोदेति सूर्योस्तं यत्र च गच्छति । | |||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S01_V10" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S01_V10" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S01_V10"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V10 | |||
| id = KKN_C02_S01_V10_B01 | |||
| text = यः प्रादुर्भावगो विष्णुर्देहादिषु च संस्थितः । स एव मूलरूपश्च साक्षान्नारायणाभिधः ॥ मूलरूपश्च यो विष्णुः प्रादुर्भावादिगश्च यः । गुणतस्स्वरूपतो वापि विशेषं योऽत्र पश्यति ॥ अत्यल्पमपि मृत्वा स तमोऽन्धं यात्यसंशयम् । भेदाभेदविदश्चात्र तमो यान्ति न संशयः ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V11 | |||
| document_id = KKN | |||
| chapter_id = KKN_C02 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन । | |||
| verse_line2 = मृत्योस्स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S01_V11" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S01_V11" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S01_V11"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V11 | |||
| id = KKN_C02_S01_V11_B01 | |||
| text = तथैवावयवानां च गुणानां च परस्परम् । क्रियाणां तेन चैतेषां भेदविच्चोभयं विदः ॥ यान्त्येवान्धन्तमो नात्र कार्या काचिद्विचारणा ॥ इति च । | |||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V11 | |||
| id = KKN_C02_S01_V11_B01 | |||
| text = भवेदेकत्र संयोग इवशब्दोऽविरुद्धयोः । धर्मयोरुपमायां वा स्वल्पत्वे वा विवक्षिते ॥ इति शब्दनिर्णये । | |||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V11 | |||
| id = KKN_C02_S01_V11_B01 | |||
| text = अतो नानेव इतीवशब्दोऽत्यल्पविषयो भेदाभेदविषयश्च । प्रथमा य इह नानेव पश्यति इति स्वरूपभेदनिषेधार्थम् । नेह नानास्ति किञ्चन इति किञ्चनशब्दादवयवानां गुणानां क्रियाणां च परस्परं तद्वतां च भेदनिषेधार्थम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V12 | |||
| document_id = KKN | |||
| chapter_id = KKN_C02 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । | |||
| verse_line2 = ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V13 | |||
| document_id = KKN | |||
| chapter_id = KKN_C02 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । | |||
| verse_line2 = ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V14 | |||
| document_id = KKN | |||
| chapter_id = KKN_C02 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । | |||
| verse_line2 = एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S01_V14" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S01_V14" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S01_V14"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V14 | |||
| id = KKN_C02_S01_V14_B01 | |||
| text = भेदाभेद एव निषिध्यते न तु भेद इत्याशङ्कां निवर्तयितुं एवं धर्मान् पृथक् पश्यन् इति भगवद्धर्माणामवयवगुणकर्मणां भेददर्शने पृथग् दोषमाह । पर्वतेषु दुर्गे शिखरे वृष्टमधो विधावति । एवं विष्णोर्धर्मान् पृथक् पश्यन्नन्धन्तमो विधावति ॥ १२-१४ ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
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| verse_id = KKN_C02_S01_V15 | |||
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| chapter_id = KKN_C02 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । | |||
| verse_line2 = एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="gr-author-note">इति द्वितीयाध्याये प्रथमावल्ली ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति द्वितीयाध्याये प्रथमावल्ली ॥</div> | ||
| Line 1,171: | Line 1,256: | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति काठकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये प्रथमावल्ली समाप्ता ॥</div> | <div class="gr-author-note">॥ इति काठकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये प्रथमावल्ली समाप्ता ॥</div> | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S01_V15" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S01_V15" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S01_V15"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V15 | |||
| id = KKN_C02_S01_V15_B01 | |||
| text = विजानतो मुनेरात्मा वायुरपि तादृगेव भवति न तु स एव भवति । किम्वन्ये जीवाः । | |||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S01_V15 | |||
| id = KKN_C02_S01_V15_B01 | |||
| text = सर्वेषां ज्ञानिनामात्मा देवानां च विशेषतः । मुक्तो वायुश्च सादृश्यमेवं विष्णोस्तु गच्छति ॥ न तु तद्रूपतां याति किम्वन्ये देवमानुषाः । आभासाभासरूपास्तु वायोर्देवस्य सर्वशः ॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
<span id="gr-C2-S2" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वितीयावल्ली"></span> | <span id="gr-C2-S2" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="द्वितीयावल्ली"></span> | ||
=== द्वितीयावल्ली === | === द्वितीयावल्ली === | ||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । | |||
| verse_line2 = अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद् वै तत् ॥ १ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V01" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V01" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S02_V01"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S02_V01 | |||
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| text = इदं पुरं भगवदधीनमित्यनुष्ठाय । अजस्येदं पुरमिति स्थितिं कृत्वा । | |||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S02_V01 | |||
| id = KKN_C02_S02_V01_B01 | |||
| text = विमुक्तो निरभीमानात् पूर्वमेवापरोक्षवित् । मुख्यतो मुच्यते पश्चात् दुःखाद्याभासहानतः ॥ इति च ॥ १ ॥ | |||
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| document_id = KKN | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । | |||
| verse_line2 = नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S02_V02 | |||
| id = KKN_C02_S02_V02_B01 | |||
| text = नित्यं हीनोऽखिलैर्दोषैस्साररूपो यतो हरिः । हंस इत्युच्यते तस्माद्वायुस्थश्शुचिषत्स्मृतः ॥ वरसुर्वसुरित्युक्तस्स एवाप्यन्तरिक्षगः । होता सर्वेन्द्रियादिस्थो वेद्यां पूज्यश्च वेदिषत् ॥ अत्यन्नश्चातिथिः प्रोक्तो यस्मादन्नं थमुच्यते । स द्रोणकलशे सोमे स्थित उक्तो दुरोणसत् ॥ नृषु स्थितश्च देवेषु वरेष्वपि स एव तु । ऋतरूपे तथा वेदे व्योमाख्यप्रकृतावपि ॥ व्योतं जगदिदं यस्यां सा व्योम श्रीरुदाहृता । अब्जगोजाद्रिजेष्वेवमास्ते सोऽब्जादिकस्ततः ॥ तथैवर्तेषु मुक्तेषु गतास्ते विष्णुमित्यृताः । वेदैर्मुख्यतया प्रोक्तः ऋतमित्येव चोच्यते ॥ बृहत्पूर्णगुणत्वाच्च स एव पुरुषोत्तमः ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । | |||
| verse_line2 = मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
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| document_id = KKN | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । | |||
| verse_line2 = देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_id = KKN_C02_S02_V05 | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । | |||
| verse_line2 = इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V05" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V05" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S02_V05"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S02_V05 | |||
| id = KKN_C02_S02_V05_B01 | |||
| text = न केवलं प्राण एव चेतनानां विधारकः । किन्तु विष्णुं समाश्रित्य प्राणो जीवान् बिभर्त्ययम् । अतो मुख्याश्रयो विष्णुश्चेतनानां स्वतन्त्रतः ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । | |||
| verse_line2 = यथा मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ | |||
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| document_id = KKN | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । | |||
| verse_line2 = स्थाणुमन्ये नु संयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । | |||
| verse_line2 = तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । | |||
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| document_id = KKN | |||
| chapter_id = KKN_C02 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । | |||
| verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V09" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V09" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S02_V09"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S02_V09 | |||
| id = KKN_C02_S02_V09_B01 | |||
| text = अग्निर्यथैको लोकेषु प्रविष्टोऽन्यो न विद्यते । पाकादिकर्ताऽथाप्यस्य देवस्य प्रतिरूपकाः ॥ रूपं रूपं प्रति ह्येते सन्त्यचेतनवह्नयः ॥ ६९ ॥ | |||
}} | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । | |||
| verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V10" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V10" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S02_V10"> | ||
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| text = एवं देवो वायुरपि धारकोऽन्यो न विद्यते । रूपं रूपं तथाऽप्यस्य प्रत्यभूत् प्रतिरूपकः ॥ अचेतनः स्पर्शगम्यो योऽयमेवं जनार्दनः । एकस्स्वतन्त्रो नान्योऽस्ति सर्वजीवान्तरस्थितः ॥ रूपं रूपं प्रति ह्यस्य प्रतिबिम्बाश्च चेतनाः । बाह्याश्च ते ततो नास्य स्वरूपं ते कथञ्चन ॥ अनादिप्रतिबिम्बाश्च बभूवुस्ते ह्यनन्तकाः ॥ | |||
}} | |||
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| chapter_id = KKN_C02 | |||
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| verse_line1 = सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । | |||
| verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
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| verse_id = KKN_C02_S02_V11 | |||
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| text = सूर्यो यथाऽऽन्तरं चक्षुः प्रतिबिम्बोऽस्य बाह्यकः । बाह्यचक्षुर्गतैर्दोषैरन्तश्चक्षुर्न लिप्यते ॥ अन्तश्चक्षुर्देवता तु बाह्यचक्षुरचेतनम् । एवं बाह्यस्स्वतन्त्रत्वाज्जीवेभ्यः पुरुषोत्तमः ॥ अस्वतन्त्रस्य जीवस्य दुःखैर्नैव हि लिप्यते ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । | |||
| verse_line2 = तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V12" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V12" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S02_V12"> | ||
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| text = चेतनाभासको जीवः परमश्चेतनो हरिः ॥ स्वतन्त्रत्वात् स्वतन्त्रो हि नैव दोषेण लिप्यते ॥ इति महाकौर्मे ॥ | |||
}} | |||
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| text = स एक एव सर्वभूतान्तरात्मा । तस्य रूपं रूपं प्रतिरूपाख्यो जीवो बभूव । बहिश्चासौ परमात्मनो नितरां भिन्नः । परतन्त्रत्वात् । | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
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| verse_line1 = नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । | |||
| verse_line2 = तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥ | |||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V13" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V13" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S02_V13"> | ||
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| text = आत्मैवेदमग्र आसीत् इत्यादिवदनादित्वापेक्षया । | |||
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| text = आत्मनि स्थं हरिं जानन् मुच्यते नात्र संशयः । जीवैक्येन तु तं जानन् तमस्यन्धे पतेद् ध्रुवम् ॥ इति च ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । | |||
| verse_line2 = कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति न भाति वा ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । | |||
| verse_line2 = तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयाध्याये द्वितीयावल्ली समाप्ता ॥</div> | <div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयाध्याये द्वितीयावल्ली समाप्ता ॥</div> | ||
| Line 1,414: | Line 1,502: | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति काठकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये द्वितीयावल्ली समाप्ता॥</div> | <div class="gr-author-note">॥ इति काठकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये द्वितीयावल्ली समाप्ता॥</div> | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V15" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S02_V15" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S02_V15"> | ||
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| text = एतदेव भगवद्रूपं परमं सुखम् । ज्ञानिसुखं तु तद्विप्लुण्मात्रम् । ब्रह्मादीनां च मुक्तानां सुखं विष्णुसुखस्य तु । प्रतिबिम्बस्तु विप्लुट्को विष्णोरेव परं सुखम् ॥ सम्यग् भाति न भातीति जानीयां तत्कथं न्वहम् । तत्प्रसादमृते दिव्यमनिर्देश्यं परं सुखम् ॥ इति च महावराहे ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
<span id="gr-C2-S3" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="तृतीयावल्ली"></span> | <span id="gr-C2-S3" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="तृतीयावल्ली"></span> | ||
=== तृतीयावल्ली === | === तृतीयावल्ली === | ||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । | |||
| verse_line2 = तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S03_V01" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S03_V01" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S03_V01"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S03_V01 | |||
| id = KKN_C02_S03_V01_B01 | |||
| text = सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्मूलं भूमिवदस्य तु । जगदाख्यस्य वृक्षस्य शाखा देवास्ततोऽधमाः ॥ वृक्षमूलं रमादेवी सोऽश्व आशुगतेर्हरिः । तद्व्याप्तत्वात् तदन्नत्वादश्वत्थोऽयं प्रकीर्तितः ॥ प्रवाहतस्त्वनादिश्च मुख्यतस्त्वमृतो हरिः । मुख्यामृतस्स एवैको जगन्नित्यं प्रवाहतः ॥ | |||
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| verse_id = KKN_C02_S03_V02 | |||
| document_id = KKN | |||
| chapter_id = KKN_C02 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । | |||
| verse_line2 = महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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{{Bhashyam | |||
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| id = KKN_C02_S03_V02_B01 | |||
| text = प्राणाख्ये तु हरौ सर्वमेजत्यस्माच्च निस्सृतम् । वज्रवद्भयदं चैव स्वधर्मस्यातिलङ्घने ॥ २ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः । | |||
| verse_line2 = भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः । | |||
| verse_line2 = ततः स्वर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = यथादर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव दृश्यते तथा गन्धर्वलोके । छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| id = KKN_C02_S03_V05_B01 | |||
| text = जीवे स्थितस्तु भगवान् दृश्यते ज्ञानदृष्टिभिः । आदर्शे मुखवत् सम्यङ् न तथा पितृलोकगः ॥ ततः किञ्चित् स्पष्टतया गान्धर्वे दृश्यते हरिः । अत्यातपे न छायायां यथैवाहनि दृश्यते ॥ स्पष्टं तथा ब्रह्मलोके दृश्यते पुरुषोत्तमः ॥ इति च ॥ ३-५ ॥ | |||
}} | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । | |||
| verse_line2 = पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । | |||
| verse_line2 = सत्त्वादपि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । | |||
| verse_line2 = तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| id = KKN_C02_S03_V08_B01 | |||
| text = पुनः इन्द्रियेभ्यः परं मनः इत्यादि देवतानां तारतम्यज्ञानपूर्वकं भगवतः सर्वोत्तमत्वज्ञान एव सर्ववाक्यानां महातात्पर्यमिति ज्ञापयितुम् । | |||
}} | |||
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| id = KKN_C02_S03_V08_B01 | |||
| text = तारतम्यपरिज्ञानपूर्वकं सर्वतो हरेः । आधिक्ये सर्ववाक्यानां तात्पर्यं महदिष्यते ॥ इति च ॥ ६-७ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् । | |||
| verse_line2 = हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = प्रादुर्भावानृते विष्णुमिन्द्रियैर्नैव पश्यति । प्रादुर्भावानपि यदा ज्ञानदृष्ट्यैव पश्यति ॥ तदैव मुच्यते योगी न दुष्टैरिन्द्रियैः क्वचित् ॥ इति च ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । | |||
| verse_line2 = बुद्धिश्च न विचेष्टति तमाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । | |||
| verse_line2 = अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = प्रभवाप्ययौ प्रति हि योगः । भगवतस्सकाशात् प्रभवाप्ययौ ॥ ९-११ ॥ | |||
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| verse_line1 = नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । | |||
| verse_line2 = अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । | |||
| verse_line2 = अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥ | |||
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| text = अधिकस्सतोऽयं भगवान् सर्वस्मादपि केशवः । अस्तीति नामकस्तस्माज्ज्ञातव्यस्स तथैव च ॥ अनाधिक्यं जानतां तु कथं स उपलभ्यते । प्रकृतेः पुरुषाणां च तत्त्वं भावयति स्फुटम् ॥ तत्त्वभावस्ततो विष्णुस्तत्प्रसादात् तु तस्य हि । आधिक्यं ज्ञायते सत्तः प्रसादश्च तथाविदः ॥ अनादिकालादाधिक्यं सर्वस्माज्जानतो हरेः । पुनः पुनर्वृद्धिमेति तज्ज्ञानं हि भवे भवे ॥ येषामाधिक्यविज्ञानं नैव पूर्वं हरेर्भवेत् । तेषां पश्चाच्च नैव स्यादभिभूतं तु तत् पुनः ॥ व्यञ्जकाद् व्यक्तिमभ्येति तस्मात् तज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ इति च ॥ १२-१३ ॥ | |||
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| verse_line1 = यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः । | |||
| verse_line2 = अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यथ ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = अन्तःकरणकामानां त्यागो व्यक्तिश्चिदात्मानाम् । कामानां तु तदा मुक्तो मृतिं नैवाभियास्यति ॥ | |||
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| verse_line1 = यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । | |||
| verse_line2 = अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावदनुशासनम् ॥ १५ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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{{Bhashyam | |||
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| text = मिथ्याज्ञानग्रन्थिभिस्तु नितरां मुच्यते यदा । तदाऽमृतत्वमेवैति तदर्थं चानुशासनम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = शतं चैका च हृदयस्य नाड्य स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । | |||
| verse_line2 = तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वगन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । | |||
| verse_line2 = तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
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| text = शरीरभूतो विष्णोस्तु जीवस्तद्वशगो यतः । अधिष्ठितश्च तेनैव विजानीयात् पृथक् ततः ॥ स्वाख्याच्छरीराज्जीवात् तु प्रवृहेद् विष्णुमव्ययम् ॥ इति च ॥ | |||
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| text = यस्यात्मा शरीरम् । य आत्मानमन्तरो यमयति इति च । | |||
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| text = जनानां हृदये इत्युक्तत्वाच्च जीवात् पृथग् हरिरिति सिद्धम् ॥ | |||
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| id = KKN_C02_S03_V17_B01 | |||
| text = देहाङ्गुष्ठमितो देहे जीवाङ्गुष्ठमितो हृदि । जीवस्य स तु विज्ञेयो जीवात् भेदेन मुक्तये ॥ इति च ॥ | |||
}} | |||
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| text = संसारिशरीरेणाभेदो वादिना केनापि नाङ्गीकृतः । न च लोकसिद्धः । जनानामिति भेदात् । न जीवोऽङ्गुष्ठमात्रः । अतो विष्णोर्जीवाद्भेद उक्तः । | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् । | |||
| verse_line2 = ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽभूद् विमृत्युः अन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥ | |||
| commentary1 = katha | |||
}} | |||
<div class="gr-author-note">इति द्वितीयाध्याये तृतीयावल्ली समाप्ता॥</div> | <div class="gr-author-note">इति द्वितीयाध्याये तृतीयावल्ली समाप्ता॥</div> | ||
| Line 1,700: | Line 1,798: | ||
<div class="gr-author-note">इति काठकोपनिषत् समाप्ता ॥</div> | <div class="gr-author-note">इति काठकोपनिषत् समाप्ता ॥</div> | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S03_V18" | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-KKN_C02_S03_V18" data-block-id="bhashya-KKN_C02_S03_V18"> | ||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = KKN_C02_S03_V18 | |||
| id = KKN_C02_S03_V18_B01 | |||
| text = अतः सर्वोत्तमो विष्णुरिति सिद्धम् ॥ नमो भगवते तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे । यस्याहमाप्त आप्तेभ्यो यो म आप्ततमः सदा ॥ | |||
}} | |||
</div> | </div> | ||
Latest revision as of 19:04, 1 June 2026
काठकोपनिषद्भाष्यम्
प्रथमोध्यायः
प्रथमावल्ली
नमो भगवते तस्मै सर्वतः परमाय ते । सर्वप्राणिहृदिस्थाय वामनाय नमो नमः ॥
उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस । तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश ॥ १ ॥
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥
स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् ।तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥
अग्नौ विष्णुं सदा ध्यायंस्त्रिशोऽग्निं नाचिकेतकम् । यश्चयीत स तु प्राप्य स्वर्गं तत्र भयातिगः ॥ उष्य मन्वन्तरं कालममृतत्वं भजेत् क्रमात् ॥ इति ब्रह्मसारे ॥ इच्छन् वाजश्रवो नप्ता ददौ सर्वस्वदक्षिणाम् । उद्दालकः स्वर्गलोकं ददौ गाश्च निरिन्द्रियाः ॥ मां दत्वापि न ते गावो दातव्या ईदृशा इति । उवाच पुत्रस्तं बालस्तं शशाप पिता स्वयम् ॥
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥
स जगाम यमं बालो ब्रह्मचारी यमस्य तु । पत्न्या सम्पूज्यमानोऽपि जग्राहार्घ्यादिकं न तु ॥ आगते तु यमे प्राह यमं सोदकमाहर ॥ ४-६ ॥
आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् ।एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥
इत्युक्तस्स यमस्तं तु सम्पूज्यादाद् वरत्रयम् ॥ ७-८ ॥
शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्यात् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ ९ ॥
यथा पुरस्तात् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ १० ॥
सौमनस्यं पितुश्चैव नाचिकेताग्निगं हरिम् ॥ मुक्ते स्थितञ्च तं विष्णुमिति प्रादात् वरत्रयम् ॥ इति गतिसारे ॥ ९-१० ॥
स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ११ ॥
स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ।स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १२ ॥
अग्र्यत्वादग्निनामासौ नाचिकेताग्निगो हरिः ॥ ११-१२ ॥
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १३ ॥
लोको विष्णोरनन्तस्य तज्ज्ञानान्नित्य आप्यते ॥ प्रतिष्ठा सर्वलोकस्य स विष्णुस्सर्वहृद्गतः ॥ १३ ॥
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥
स एव सर्वलोकादिस्तं ज्ञात्वा मुच्यते ध्रुवम् ॥ इति च ॥
या इष्टका या इष्टकादेवताः ।
इष्टकादेवतां विष्णुं षष्ठ्युत्तरशतत्रिकम् । यथावदेव विज्ञाय मुच्यते कर्मबन्धनात् ॥ इति च ॥ १४ ॥
तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः ।तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः शृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥
त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥
त्रिभिरेत्य सन्धिं वेदैरविरुद्धः । वेदोक्तप्रकारेण भगवत्तत्वादिकं जानन्नित्यर्थः । त्रिकर्मकृत् यज्ञदानतपःकर्ता । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् इति वचनात् ।
त्रिनाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् ।स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १७ ॥
त्रयमेतत् या इष्टका इत्यादि ।
ब्रह्मेति वेद उद्दिष्टस्तस्माद् व्यक्तो यतो हरिः । ब्रह्मजस्तेन कथितस्स एव ज्ञोऽखिलज्ञतः ॥ इति नामनिरुक्ते ।
अनेकरूपां सुवर्णमयीम् । बहुरूपं च पुरटं कार्तस्वरमितीर्यते इत्यभिधानात् ।
यमोऽनुवादसन्तुष्टो वह्नेस्तन्नामतामपि । शृङ्कां स्वर्णमयीं चैव कण्ठमालामदाद् विभुः ॥ इति पाद्मे ।
लोकादिः प्रतिष्ठा ब्रह्मजज्ञो अनन्तलोकाप्तिरित्यादिविशेषणैश्च भगवानेव । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठामिति परामर्शाच्च । भगवतो ह्युरुगायत्वं प्रसिद्धम् । गुहानिहितत्वं च तस्यैव विशेषतः प्रसिद्धम् । न चाग्निपरिज्ञानमात्रेणानन्तलोकाप्तिर्भगवज्ज्ञानं विना । तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिं ल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति इत्यादिश्रुतेः । न च मुख्ये सत्यमुख्यार्थो युज्यते ।
एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वृतस्तृतीयः ॥ १९ ॥
प्रेते मुक्ते मनुष्ये नियामकत्वेन भगवानस्तीति ज्ञानिनो वदन्ति । नास्तीत्यज्ञाः । तस्य नियामकस्य स्वरूपं यथावदहं विद्याम् ।
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् इति परिहाराच्च मुक्ते स्थितो भगवान् पृच्छ्यते इति सिद्धम् । देहाद्विशेषेण मोचनं नाम मुक्तिरेव । मुक्तेरपि मरणात्मकत्वात् मरणमित्यपि भवति । स्थूलदेहपरित्यागस्तु विस्रंसमानस्येत्यनेनैवोक्तो भवति ।
अग्निस्थं परमात्मानं सामान्याज्जानतोऽपि तु । अजानतस्तु मुक्तौ च जीवान्तःस्थितमीश्वरम् ॥ नियामकं च जीवानां मुक्तानामपि सर्वदा । गुणान् सर्वोत्तमत्वादीनविज्ञाय हरेस्तथा ॥ नैव मुक्तिर्भवेत् तस्मात् कृच्छ्रात् तदवदद्यमः । तस्य गोप्यत्वविज्ञप्त्यै तथाप्यग्निस्थवेदनात् ॥ सुखाधिक्यं भवेन्मुक्तौ तस्मात् तत्पृथगीरितम् ॥ इति तत्त्वसारे ।
स्थाणुमन्येऽनुसयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् इत्युक्त्वा य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः इति वचनाच्च जीवेषु स्थितो भगवान् पृच्छ्यत इति सिद्धम् । मृतजीवे स्थितो मुक्तजीवे स्थितश्चोभयात्मको भगवान् विवक्षित इत्येतस्माच्चाविरोधः ।
गुह्यं तत्परमं ब्रह्म म्रियमाणं शरीरिणम् । सम्प्राप्तमपि जीवेषु जागर्ति स्वपितेष्वपि ॥ इति ब्रह्माण्डे ।
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयोऽणुरेष धर्मः ।अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैवम् ॥ २० ॥
धारकत्वात् धर्मो भगवान् ।
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २१ ॥
शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २२ ॥
एतत् तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २३ ॥
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ॥
मरणे स्थितं भगवन्तं मानुप्राक्षीः ।
श्वोऽभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्तगीतम् ॥ २५ ॥
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वाम् ।जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २६ ॥
अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः क्वाधस्थः प्रजानन् ।अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २७ ॥
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २८ ॥ ॥
महति साम्पराये मुक्तौ ॥
द्वितीयावल्ली
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतेव प्रेयः ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः ।तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद् य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।श्रेयो धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥ २ ॥
स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामान् अभिध्यायन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥
शृङ्कां शृङ्कलाम् ॥
दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्तः ॥ ४ ॥
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥
न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥
न नरेणावरः प्रोक्त एष सुज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।अनन्यप्रोक्ते गतिरस्य नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥
अन्यो भगवानन्योऽहमित्यजानन्ननन्यः । तेन प्रोक्ते गतिर्ज्ञानं नास्ति । प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ इति वाक्यशेषात् ।
जीवानां चैव विष्णोश्च यो न वेत्ति भिदां पुमान् । तदनुव्रताश्च ये केचित्तेषां ज्ञानं न जायते ॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ।
नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥
जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्नि रनित्यद्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥
आख्यं विष्ण्वाख्यं नित्यं शेवधिरिति जानामि । नित्यमाख्यविष्णुविषयैः द्रव्यैर्मन आदिभिः । आख्यनित्यविषयैर्विष्ण्वाख्यनित्यविषयैः द्रव्यैः । नित्यं भगवन्तं प्राप्तवानस्मि । ध्रुवो भगवान् । अध्रुवैस्तद्भक्तिवर्जितैर्न प्राप्यते ॥ १० ॥
कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥
क्रतोरानन्त्यहेतुम् । स्तोमैरपि सर्वात्मना प्राप्तुमशक्यम् । स्तोमेभ्योऽपि महान्तम् । उरुगायमित्युक्तत्वाच्च न जीवविषयोऽयं प्रश्नः ।
शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । शरवत् तन्मयो भवेत् । अभयं तितीर्षतां पारम् । तादृगेव भवति । इत्यादौ सर्वत्र भेदस्यैवोक्तेश्च न जीवाभेदः ।
नाचिकेतं शकेमसीत्युक्तत्वाच्च नाचिकेताग्निस्थो भगवानेवात्रोच्यत इति सिद्धम् । उरुगायं दृष्ट्वा कामस्याप्तिमत्यस्राक्षीः । न च मृत्वा यमं प्राप्तस्य नचिकेतसो मृतोऽस्ति न वेति संशयो युज्यते ॥ ११ ॥
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥
गह्वरे मुक्तजीवे स्थितम् ॥ १२ ॥
एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेनमाप्य ।स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥
प्रवृह्य जीवात् पृथक्कृत्य ।
मुक्तजीवे स्थितं विष्णुं विदित्वा जीवतः पृथक् । मोदते मोदनीयं तं प्राप्य मुक्तस्सदैव च ॥ इति महावाराहे ।
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मैतद्ध्येवाक्षरं परम् ।एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् । सर्वस्यालम्बनं ज्ञात्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति च ॥ १७ ॥
न जायते म्रियते वा विपश्चि न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥ १८ ॥
देहोत्पत्तिविनाशाख्यौ ज्ञानिनोऽप्युद्भवाभवौ । न कुतश्चिद्यतो विष्णुर्जायतेऽतस्तदीक्षणात् ॥ भावाभावौ न विदुषो यस्माज्जीवो न कश्चन । जायते म्रियते वापि स्वरूपेण कथञ्चन ॥ अजो नित्योऽविकारश्च जीवः पुरमणन्नपि ॥ इति च ।
अयं भगवान् कुतोऽपि न बभूव यस्मादतस्तद्वेत्तापि विपश्चिन्न जायते न म्रियते च । यतः कश्चिज्जीवः स्वतो न बभूव । देहसम्बन्धाद्धि जायते । विपश्चितस्तु देहसम्बन्धाभावान्न जायते न म्रियते च ॥ १८ ॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ।उभौ तै न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
जीवस्यापि स्वतो मरणाभावादुभौ तौ न विजानीतः ।
अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥
एवं नित्यस्य जन्तोर्गुहायां निहितः । ए विष्णौ क्रतुर्यस्य सोऽक्रतुस्तन्निश्चयः । आत्मनः सकाशान्महिमानं महामानम् ।
जीवाद् गुणपरीमाणं यस्माद्विष्णोर्महत्तरम् । तस्माज्जीवात् स महिमा विष्णुरित्युच्यते श्रुतौ ॥ इति च ॥
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥
ऐश्वर्यादेव आसीनो दूरं व्रजति इत्यादि ।
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । ऐश्वर्याद् भगवान् विष्णुर्विरुद्धं घटयत्यसौ ॥ इति च ॥ २१ ॥
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥
नायमात्मा प्रवचेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥
नाविरतो दुश्चरितात् नाशान्तो नासमाहितः ।नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेनैवमाप्नुयात् ॥ २४ ॥
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः ।मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥
तृतीयावल्ली
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्द्धे ।छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः ॥ १ ॥
आत्मान्तरात्मेति विभुरेक एव द्विधा स्थितः । स विष्णुः परमे वायौ परेभ्योऽप्यृद्धरूपके ॥ शुभान् पिबति भोगान् स च्छायेव विदुषां प्रभुः । आतपः पापिनां नित्यं ... ... ।
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमसि ॥ २ ॥
.... ... मर्यादा विष्णुयाजिनाम् ॥ संसारस्य च पारस्थस्स विष्णुर्द्विस्वरूपकः ॥
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च ।बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा ।तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥
यस्तवविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदाशुचिः ।स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः ।सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अथेभ्यश्च परं मनः ।मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ।पुरुषान्न परः किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥
देवेभ्य इन्द्रियात्मभ्यो ज्यायांसोऽर्थाभिमानिनः । सोमवित्तपसूर्याप्पा अश्व्ग्नीन्द्रेन्द्रसूनवः ॥ यमो दक्षश्चेन्द्रियेशास्सुपर्णी वारुणी तथा । उमेति चार्थमानिन्यस्तिस्रो द्विर्द्व्येकदेवताः ॥ मनोभिमानिनो रुद्रवीन्द्रशेषास्त्रयोऽपि तु । ते श्रेष्ठा अर्थमानिभ्यस्तेभ्यो बुद्धिः सरस्वती ॥ तस्या ब्रह्मा महानात्मा ततोऽव्यक्ताभिधा रमा । तस्यास्तु पुरुषो विष्णुः पूर्णत्वान्नैव तत्समः ॥ कश्चित् कुतश्चिच्छ्रेष्ठस्तु नास्तीति किमु सा कथा॥ १०-१२ ॥
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥
यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥
तस्माद्वागात्मिका देवीरुमाद्यास्तु शिवादिषु । शिवादीन् ब्रह्मवाय्वोस्तु नियच्छेन्महदात्मनोः ॥ तौ रमायां परानन्दे तां विष्णौ परमात्मनि । तद्वशत्वेन तद्ध्यानं नियमो नाम नापरः ॥ कुतस्तु मानुषो देवान्नियच्छेद्विनियामकान् ॥ इति च ॥ स्वभार्यायाः परत्वं सिद्धमिति महतः परमित्येवोक्तम् ॥ १३ ॥
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत ।क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् ।उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पते इति ॥ १७ ॥ ॥
द्वितीयाध्यायः
प्रथमावल्ली
पराञ्चि खानि व्यतृणात् स्वयम्भूस्तस्मात् पराक् पश्यति नान्तरात्मन् ।कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥
तृणु कात्करणे इति धातुः ॥ १ ॥
पराचः कामाननुयन्ति बालाः ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशान् ।अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान् ।एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥
इदं गुह्यं ब्रह्म प्रवक्ष्यामि । यथा मरणं प्राप्य जीवो भवति तच्च प्रवक्ष्यामि जीवेश्वरभेदज्ञापनाय । यः कर्मफलभोक्ता सुप्त्यादिमान् स जीवः । यः प्रलयादिषु जीवेषु सुप्तेषु जागर्ति स विष्णुः परं ब्रह्मेत्यर्थः । न हि जीवस्य योन्यादिगमनं ब्रह्म । जीवाद्भेदेन ज्ञातं हि ब्रह्म यथावज्ज्ञातं भवति ।
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥
य इदं मध्वदं वेदात्मानं जीवमन्तिकात् ।ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥
जीवस्यान्तिके । न हि स्वस्य स्वयं जीवोऽन्तिके भवति । वस्त्वन्तरस्य हि दूरत्वमन्तिकत्वं वा ॥ ५ ॥
यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६ ॥
अम्नामभ्यश्च भूतेभ्यस्तपोनाम्नः शिवादपि । पूर्वं यो जनयामास पूर्वजातं चतुर्मुखम् ॥ स्वात्मानं च गुहासंस्थं सर्वभूतैः सहाभिभूः । यः पश्यति सदा विष्णुस्स एष हृदि संस्थितः ॥ इति च ॥
यथा मुखादिन्द्रश्चाग्निश्चेत्यादिना जाता एवेन्द्रादयः कश्यपात् पुनर्जायन्ते न तथा भगवतो ब्रह्मा । किन्त्वजातमेवाद्भ्यः पूर्वमजायत जनयामास । अजायतेति जज्ञे बहुज्ञम् इतिवदन्तर्णीतणिच् ॥ ६ ॥
या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी ।गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७ ॥
अदनादितिर्विष्णुर्यः प्राणसहितः स्थितः । उत्तमो देवताभ्यश्च सोत्मानं विविधात्मना ॥ मत्स्यकूर्मादिरूपेण गुहासंस्थमजीजनत् । भूतैस्सह महाविष्णुः परमात्मा युगे युगे ॥ इति च ।
देवतामयी देवतोत्तमा । प्राणेन सह स्थितो भवति । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं स्वात्मानं भूतैस्सह विविधं जनयामास ॥ ७ ॥
अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिः हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥
सर्वज्ञो भगवान् विष्णुररण्योर्गुरुशिष्ययोः । सुभृतः स्तूयते नित्यं जानद्भिः पुरुषोत्तमः ॥ इति च । अर्यते ण आभ्यामित्यरणी ॥ ८ ॥
यतश्चोदेति सूर्योस्तं यत्र च गच्छति ।तं देवास्सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९ ॥
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।मृत्योस्स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥
यः प्रादुर्भावगो विष्णुर्देहादिषु च संस्थितः । स एव मूलरूपश्च साक्षान्नारायणाभिधः ॥ मूलरूपश्च यो विष्णुः प्रादुर्भावादिगश्च यः । गुणतस्स्वरूपतो वापि विशेषं योऽत्र पश्यति ॥ अत्यल्पमपि मृत्वा स तमोऽन्धं यात्यसंशयम् । भेदाभेदविदश्चात्र तमो यान्ति न संशयः ॥ १० ॥
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।मृत्योस्स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥
तथैवावयवानां च गुणानां च परस्परम् । क्रियाणां तेन चैतेषां भेदविच्चोभयं विदः ॥ यान्त्येवान्धन्तमो नात्र कार्या काचिद्विचारणा ॥ इति च ।
भवेदेकत्र संयोग इवशब्दोऽविरुद्धयोः । धर्मयोरुपमायां वा स्वल्पत्वे वा विवक्षिते ॥ इति शब्दनिर्णये ।
अतो नानेव इतीवशब्दोऽत्यल्पविषयो भेदाभेदविषयश्च । प्रथमा य इह नानेव पश्यति इति स्वरूपभेदनिषेधार्थम् । नेह नानास्ति किञ्चन इति किञ्चनशब्दादवयवानां गुणानां क्रियाणां च परस्परं तद्वतां च भेदनिषेधार्थम् ॥ ११ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३ ॥
यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥
भेदाभेद एव निषिध्यते न तु भेद इत्याशङ्कां निवर्तयितुं एवं धर्मान् पृथक् पश्यन् इति भगवद्धर्माणामवयवगुणकर्मणां भेददर्शने पृथग् दोषमाह । पर्वतेषु दुर्गे शिखरे वृष्टमधो विधावति । एवं विष्णोर्धर्मान् पृथक् पश्यन्नन्धन्तमो विधावति ॥ १२-१४ ॥
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥
विजानतो मुनेरात्मा वायुरपि तादृगेव भवति न तु स एव भवति । किम्वन्ये जीवाः ।
सर्वेषां ज्ञानिनामात्मा देवानां च विशेषतः । मुक्तो वायुश्च सादृश्यमेवं विष्णोस्तु गच्छति ॥ न तु तद्रूपतां याति किम्वन्ये देवमानुषाः । आभासाभासरूपास्तु वायोर्देवस्य सर्वशः ॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ १५ ॥
द्वितीयावल्ली
पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद् वै तत् ॥ १ ॥
इदं पुरं भगवदधीनमित्यनुष्ठाय । अजस्येदं पुरमिति स्थितिं कृत्वा ।
विमुक्तो निरभीमानात् पूर्वमेवापरोक्षवित् । मुख्यतो मुच्यते पश्चात् दुःखाद्याभासहानतः ॥ इति च ॥ १ ॥
हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥
नित्यं हीनोऽखिलैर्दोषैस्साररूपो यतो हरिः । हंस इत्युच्यते तस्माद्वायुस्थश्शुचिषत्स्मृतः ॥ वरसुर्वसुरित्युक्तस्स एवाप्यन्तरिक्षगः । होता सर्वेन्द्रियादिस्थो वेद्यां पूज्यश्च वेदिषत् ॥ अत्यन्नश्चातिथिः प्रोक्तो यस्मादन्नं थमुच्यते । स द्रोणकलशे सोमे स्थित उक्तो दुरोणसत् ॥ नृषु स्थितश्च देवेषु वरेष्वपि स एव तु । ऋतरूपे तथा वेदे व्योमाख्यप्रकृतावपि ॥ व्योतं जगदिदं यस्यां सा व्योम श्रीरुदाहृता । अब्जगोजाद्रिजेष्वेवमास्ते सोऽब्जादिकस्ततः ॥ तथैवर्तेषु मुक्तेषु गतास्ते विष्णुमित्यृताः । वेदैर्मुख्यतया प्रोक्तः ऋतमित्येव चोच्यते ॥ बृहत्पूर्णगुणत्वाच्च स एव पुरुषोत्तमः ॥ २ ॥
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥
न केवलं प्राण एव चेतनानां विधारकः । किन्तु विष्णुं समाश्रित्य प्राणो जीवान् बिभर्त्ययम् । अतो मुख्याश्रयो विष्णुश्चेतनानां स्वतन्त्रतः ॥ ३५ ॥
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।यथा मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।स्थाणुमन्ये नु संयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥
य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥
अग्निर्यथैको लोकेषु प्रविष्टोऽन्यो न विद्यते । पाकादिकर्ताऽथाप्यस्य देवस्य प्रतिरूपकाः ॥ रूपं रूपं प्रति ह्येते सन्त्यचेतनवह्नयः ॥ ६९ ॥
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥
एवं देवो वायुरपि धारकोऽन्यो न विद्यते । रूपं रूपं तथाऽप्यस्य प्रत्यभूत् प्रतिरूपकः ॥ अचेतनः स्पर्शगम्यो योऽयमेवं जनार्दनः । एकस्स्वतन्त्रो नान्योऽस्ति सर्वजीवान्तरस्थितः ॥ रूपं रूपं प्रति ह्यस्य प्रतिबिम्बाश्च चेतनाः । बाह्याश्च ते ततो नास्य स्वरूपं ते कथञ्चन ॥ अनादिप्रतिबिम्बाश्च बभूवुस्ते ह्यनन्तकाः ॥
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥
सूर्यो यथाऽऽन्तरं चक्षुः प्रतिबिम्बोऽस्य बाह्यकः । बाह्यचक्षुर्गतैर्दोषैरन्तश्चक्षुर्न लिप्यते ॥ अन्तश्चक्षुर्देवता तु बाह्यचक्षुरचेतनम् । एवं बाह्यस्स्वतन्त्रत्वाज्जीवेभ्यः पुरुषोत्तमः ॥ अस्वतन्त्रस्य जीवस्य दुःखैर्नैव हि लिप्यते ॥ ११ ॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥
चेतनाभासको जीवः परमश्चेतनो हरिः ॥ स्वतन्त्रत्वात् स्वतन्त्रो हि नैव दोषेण लिप्यते ॥ इति महाकौर्मे ॥
स एक एव सर्वभूतान्तरात्मा । तस्य रूपं रूपं प्रतिरूपाख्यो जीवो बभूव । बहिश्चासौ परमात्मनो नितरां भिन्नः । परतन्त्रत्वात् ।
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥
आत्मैवेदमग्र आसीत् इत्यादिवदनादित्वापेक्षया ।
आत्मनि स्थं हरिं जानन् मुच्यते नात्र संशयः । जीवैक्येन तु तं जानन् तमस्यन्धे पतेद् ध्रुवम् ॥ इति च ॥ १३ ॥
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति न भाति वा ॥ १४ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥
एतदेव भगवद्रूपं परमं सुखम् । ज्ञानिसुखं तु तद्विप्लुण्मात्रम् । ब्रह्मादीनां च मुक्तानां सुखं विष्णुसुखस्य तु । प्रतिबिम्बस्तु विप्लुट्को विष्णोरेव परं सुखम् ॥ सम्यग् भाति न भातीति जानीयां तत्कथं न्वहम् । तत्प्रसादमृते दिव्यमनिर्देश्यं परं सुखम् ॥ इति च महावराहे ॥ १४ ॥
तृतीयावल्ली
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥
सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्मूलं भूमिवदस्य तु । जगदाख्यस्य वृक्षस्य शाखा देवास्ततोऽधमाः ॥ वृक्षमूलं रमादेवी सोऽश्व आशुगतेर्हरिः । तद्व्याप्तत्वात् तदन्नत्वादश्वत्थोऽयं प्रकीर्तितः ॥ प्रवाहतस्त्वनादिश्च मुख्यतस्त्वमृतो हरिः । मुख्यामृतस्स एवैको जगन्नित्यं प्रवाहतः ॥
यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥
प्राणाख्ये तु हरौ सर्वमेजत्यस्माच्च निस्सृतम् । वज्रवद्भयदं चैव स्वधर्मस्यातिलङ्घने ॥ २ ॥
भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः ।भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥
इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः ।ततः स्वर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
यथादर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव दृश्यते तथा गन्धर्वलोके । छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥
जीवे स्थितस्तु भगवान् दृश्यते ज्ञानदृष्टिभिः । आदर्शे मुखवत् सम्यङ् न तथा पितृलोकगः ॥ ततः किञ्चित् स्पष्टतया गान्धर्वे दृश्यते हरिः । अत्यातपे न छायायां यथैवाहनि दृश्यते ॥ स्पष्टं तथा ब्रह्मलोके दृश्यते पुरुषोत्तमः ॥ इति च ॥ ३-५ ॥
इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥
इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।सत्त्वादपि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥
अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥
पुनः इन्द्रियेभ्यः परं मनः इत्यादि देवतानां तारतम्यज्ञानपूर्वकं भगवतः सर्वोत्तमत्वज्ञान एव सर्ववाक्यानां महातात्पर्यमिति ज्ञापयितुम् ।
तारतम्यपरिज्ञानपूर्वकं सर्वतो हरेः । आधिक्ये सर्ववाक्यानां तात्पर्यं महदिष्यते ॥ इति च ॥ ६-७ ॥
न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् ।हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥
प्रादुर्भावानृते विष्णुमिन्द्रियैर्नैव पश्यति । प्रादुर्भावानपि यदा ज्ञानदृष्ट्यैव पश्यति ॥ तदैव मुच्यते योगी न दुष्टैरिन्द्रियैः क्वचित् ॥ इति च ॥ ९ ॥
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।बुद्धिश्च न विचेष्टति तमाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥
प्रभवाप्ययौ प्रति हि योगः । भगवतस्सकाशात् प्रभवाप्ययौ ॥ ९-११ ॥
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥
अधिकस्सतोऽयं भगवान् सर्वस्मादपि केशवः । अस्तीति नामकस्तस्माज्ज्ञातव्यस्स तथैव च ॥ अनाधिक्यं जानतां तु कथं स उपलभ्यते । प्रकृतेः पुरुषाणां च तत्त्वं भावयति स्फुटम् ॥ तत्त्वभावस्ततो विष्णुस्तत्प्रसादात् तु तस्य हि । आधिक्यं ज्ञायते सत्तः प्रसादश्च तथाविदः ॥ अनादिकालादाधिक्यं सर्वस्माज्जानतो हरेः । पुनः पुनर्वृद्धिमेति तज्ज्ञानं हि भवे भवे ॥ येषामाधिक्यविज्ञानं नैव पूर्वं हरेर्भवेत् । तेषां पश्चाच्च नैव स्यादभिभूतं तु तत् पुनः ॥ व्यञ्जकाद् व्यक्तिमभ्येति तस्मात् तज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ इति च ॥ १२-१३ ॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यथ ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥
अन्तःकरणकामानां त्यागो व्यक्तिश्चिदात्मानाम् । कामानां तु तदा मुक्तो मृतिं नैवाभियास्यति ॥
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावदनुशासनम् ॥ १५ ॥
मिथ्याज्ञानग्रन्थिभिस्तु नितरां मुच्यते यदा । तदाऽमृतत्वमेवैति तदर्थं चानुशासनम् ॥ १५ ॥
शतं चैका च हृदयस्य नाड्य स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वगन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः ।तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥
शरीरभूतो विष्णोस्तु जीवस्तद्वशगो यतः । अधिष्ठितश्च तेनैव विजानीयात् पृथक् ततः ॥ स्वाख्याच्छरीराज्जीवात् तु प्रवृहेद् विष्णुमव्ययम् ॥ इति च ॥
यस्यात्मा शरीरम् । य आत्मानमन्तरो यमयति इति च ।
जनानां हृदये इत्युक्तत्वाच्च जीवात् पृथग् हरिरिति सिद्धम् ॥
देहाङ्गुष्ठमितो देहे जीवाङ्गुष्ठमितो हृदि । जीवस्य स तु विज्ञेयो जीवात् भेदेन मुक्तये ॥ इति च ॥
संसारिशरीरेणाभेदो वादिना केनापि नाङ्गीकृतः । न च लोकसिद्धः । जनानामिति भेदात् । न जीवोऽङ्गुष्ठमात्रः । अतो विष्णोर्जीवाद्भेद उक्तः ।
मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽभूद् विमृत्युः अन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥
अतः सर्वोत्तमो विष्णुरिति सिद्धम् ॥ नमो भगवते तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे । यस्याहमाप्त आप्तेभ्यो यो म आप्ततमः सदा ॥