Karmanirnaya/Moola: Difference between revisions
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| verse_text = महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजत्ययं वै लोकः प्रथमा महानाम्न्यन्तरिक्षलोको द्वितीयासौ लोकस्तृतीया सर्वेभ्यो वा एष लोकेभ्यस्सन्निर्मितो यत्षोशी तद्यन्महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजति सर्वेभ्यः एवैनं तल्लोकेभ्यस्सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यो लोकेभ्यस्सन्निर्मितेन षोशिना राध्नोति य एवं वेद । (ऐतरेयब्राह्मणम् २.१६.४) | |||
| verse_lines = महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजत्ययं वै लोकः प्रथमा महानाम्न्यन्तरिक्षलोको द्वितीयासौ लोकस्तृतीया सर्वेभ्यो वा एष लोकेभ्यस्सन्निर्मितो यत्षोशी तद्यन्महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजति सर्वेभ्यः एवैनं तल्लोकेभ्यस्सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यो लोकेभ्यस्सन्निर्मितेन षोशिना राध्नोति य एवं वेद । (ऐतरेयब्राह्मणम् २.१६.४) | |||
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| verse_lines = विदा मघवन् विदा गातुमनुशंसिषो दिशः ।¦शिक्षा शचीनां पते पूर्वीणां पुरुवसो ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = आभिष्ट्वमभिष्टिभिः प्रचेतन प्रचेतय।¦इन्द्र द्युम्नाय न इष एवाहि शक्रः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = राये वाजाय वज्रिवः शविष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे।¦मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस आ याहि पिब मत्स्व ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = विदा रायः सुवीर्यं भुवो वाजानां पतिर्वशाँ अनु।¦मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे यः शविष्ठः शूराणाम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = यो मंहिष्ठो मघोनां चिकित्वो अभि नो नय।¦इन्द्रो विदे तमु स्तुषे वशी हि शक्रः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = तमूतये हवामहे जेतारमपराजितम् ।¦स नः पर्षदति द्विषः क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् ।¦सनः पर्षदति द्विषः स नः पर्षदति स्रिधः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वस्य यत्ते अद्रिवः सुम्न आधेहि नो वसो।¦पूर्तिः शविष्ठ शस्यत ईशे हि शक्रः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = नूनं तं नव्यं सन्यसे प्रभो जनस्य वृत्रहन् । समन्येषु ब्रवावहै शूरो यो गोषु गच्छति सखा सुशेवो अद्वयाः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = नूनं तं नव्यं सन्यसे प्रभो जनस्य वृत्रहन् । समन्येषु ब्रवावहै शूरो यो गोषु गच्छति सखा सुशेवो अद्वयाः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = एवाह्येवैवाह्यग्नाँ३ इ । एवाह्येवैवाहीन्द्रँ । एवाह्येवैवाहि विष्णाँ३ उ । एवाह्येवैवाहि पूषन् । एवा ह्येवैवाहि देवाः। एवा हि शक्रो वशी हि शक्रो वशाँ अनु ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = आयोमन्याय मन्यव उपोमन्याय मन्यवे । उपेहि विश्वध ॥ विदा मघवन्विदो३म् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रप्र वस्त्रिष्टुभमिषं मन्दद्वीरायेन्दवे ।¦धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१) | |||
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| verse_lines = नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम् ।¦पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.२) | |||
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| verse_lines = ता अस्य सूददोहसः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः ।¦जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.३) | |||
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| verse_lines = अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत ।¦अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/८) | |||
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| verse_text = अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्वणत् । पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम् ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/९) | |||
| verse_lines = अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्वणत् । पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम् ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/९) | |||
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| verse_lines = आयत्पतन्त्येन्यस्सुदुघा अनपस्फुरः ।¦अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१०) | |||
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| verse_text = यो व्यतीँरफाणयत्सुयुक्ताँ उप दाशुषे । तक्वो नेता तदिद्वषुरुपमा यो अमुच्यत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१३) | |||
| verse_lines = यो व्यतीँरफाणयत्सुयुक्ताँ उप दाशुषे । तक्वो नेता तदिद्वषुरुपमा यो अमुच्यत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१३) | |||
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| verse_text = अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः । भिनत्कनीन(निन) ओदनं पच्यमानं परो गिरा ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१४) | |||
| verse_lines = अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः । भिनत्कनीन(निन) ओदनं पच्यमानं परो गिरा ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१४) | |||
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| verse_lines = अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम् ।¦स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम् ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१५) | |||
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| verse_text = स यो व्याप्तो गतश्रीरिव मन्येताविहृतं षोळशिनं शंसयेन्नेच्छन्दसां कृच्छ्रादवपद्या इत्यथ यः पाप्मानमपजिघांसुः स्याद् विहृतं षोळशिनं शंसयेद् व्यतिषक्त इव वै पुरुषः पाप्मना व्यतिषक्तमेवास्मै तत् पाप्मानं शमलमप हन्त्यप पाप्मानं हते य एवं वेद । | |||
| verse_lines = स यो व्याप्तो गतश्रीरिव मन्येताविहृतं षोळशिनं शंसयेन्नेच्छन्दसां कृच्छ्रादवपद्या इत्यथ यः पाप्मानमपजिघांसुः स्याद् विहृतं षोळशिनं शंसयेद् व्यतिषक्त इव वै पुरुषः पाप्मना व्यतिषक्तमेवास्मै तत् पाप्मानं शमलमप हन्त्यप पाप्मानं हते य एवं वेद । | |||
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| verse_lines = उद्यद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि । मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.७) | |||
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| verse_lines = अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते ।¦ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषं जठर आवृषस्व ॥ २ ॥ (ऋ.मं.१०, सू.९६.१३) | |||
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| verse_text = महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्यो वा एष च्छन्दोभ्यः सन्निर्मितो यत् षोळशी तद्यन्महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्य एवैनं तच्छन्दोभ्यः सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यश्छन्दोभ्यः सन्निर्मितेन षोळशिना राध्नोति य एवं वेद॥(ऐ.ब्रा.४.४,(चतुर्थपञ्चिका.४)) | |||
| verse_lines = महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्यो वा एष च्छन्दोभ्यः सन्निर्मितो यत् षोळशी तद्यन्महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्य एवैनं तच्छन्दोभ्यः सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यश्छन्दोभ्यः सन्निर्मितेन षोळशिना राध्नोति य एवं वेद॥(ऐ.ब्रा.४.४,(चतुर्थपञ्चिका.४)) | |||
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