Katha/Moola: Difference between revisions
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<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमोध्यायः"></span> | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमोध्यायः"></span> | ||
== प्रथमोध्यायः == | == प्रथमोध्यायः == | ||
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| verse_text = उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस । तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस । तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।¦अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् ।¦तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।¦किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।¦सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।¦तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् ।¦एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।¦नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्यात् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।¦त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा पुरस्तात् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।¦सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।¦उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ।¦स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।¦अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।¦स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः ।¦तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः शृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।¦ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = त्रिनाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् ।¦स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।¦एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।¦एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वृतस्तृतीयः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयोऽणुरेष धर्मः ।¦अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैवम् ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।¦वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।¦भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = एतत् तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।¦महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।¦इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ॥¦आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = श्वोऽभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।¦अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्तगीतम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वाम् ।¦जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः क्वाधस्थः प्रजानन् ।¦अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।¦योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २८ ॥ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतेव प्रेयः ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः ।¦तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद् य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।¦श्रेयो धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामान् अभिध्यायन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।¦नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।¦विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्तः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।¦दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।¦अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।¦आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = न नरेणावरः प्रोक्त एष सुज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।¦अनन्यप्रोक्ते गतिरस्य नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।¦यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।¦ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्नि रनित्यद्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।¦स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।¦अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेनमाप्य ।¦स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।¦यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मैतद्ध्येवाक्षरं परम् ।¦एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।¦एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = न जायते म्रियते वा विपश्चि न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।¦अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ।¦उभौ तै न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।¦तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।¦कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।¦महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = नायमात्मा प्रवचेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।¦यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = नाविरतो दुश्चरितात् नाशान्तो नासमाहितः ।¦नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेनैवमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः ।¦मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्द्धे ।¦छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।¦अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमसि ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च ।¦बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।¦आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।¦तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा ।¦तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्तवविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।¦न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदाशुचिः ।¦स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः ।¦सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अथेभ्यश्च परं मनः ।¦मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ।¦पुरुषान्न परः किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।¦दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।¦ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत ।¦क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।¦अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् ।¦उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।¦प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पते इति ॥ १७ ॥ ॥ | |||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयाध्यायः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयाध्यायः"></span> | ||
== द्वितीयाध्यायः == | == द्वितीयाध्यायः == | ||
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| verse_lines = पराञ्चि खानि व्यतृणात् स्वयम्भूस्तस्मात् पराक् पश्यति नान्तरात्मन् ।¦कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = पराचः कामाननुयन्ति बालाः ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशान् ।¦अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान् ।¦एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।¦महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = य इदं मध्वदं वेदात्मानं जीवमन्तिकात् ।¦ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।¦गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी ।¦गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।¦दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिः हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = यतश्चोदेति सूर्योस्तं यत्र च गच्छति ।¦तं देवास्सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।¦मृत्योस्स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।¦मृत्योस्स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।¦ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।¦ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।¦नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।¦इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । | |||
| verse_lines = हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।¦यथा मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।¦स्थाणुमन्ये नु संयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।¦तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।¦तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।¦एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।¦एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।¦एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।¦एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।¦तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।¦तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।¦कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति न भाति वा ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।¦तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।¦तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥¦तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।¦महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः ।¦भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः ।¦ततः स्वर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = यथादर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव दृश्यते तथा गन्धर्वलोके । छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।¦पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।¦सत्त्वादपि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।¦तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् ।¦हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।¦बुद्धिश्च न विचेष्टति तमाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।¦अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।¦अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।¦अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावदनुशासनम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = शतं चैका च हृदयस्य नाड्य स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।¦तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वगन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः ।¦तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥¦तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।¦ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽभूद् विमृत्युः अन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥ | |||
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