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| oldKey | "MUN_C01_V01" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-2" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "आनन्दमजरं नित्यमजमक्षयमच्युतम् ।
अनन्तशक्तिं सर्वज्ञं नमस्ये पुरुषोत्तमम् ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-3" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V02" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ।
स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-4" |
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| oldKey | "MUN_C01_V03" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ ।
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-5" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति । परा चैवापरा च ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-6" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V05" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तत्रापरा । ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-7" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘ऋगाद्या अपरा विद्या यदा विष्णोर्न वाचकाः ।
ता एव परमा विद्या यदा विष्णोस्तु वाचकाः ॥’ इति परमसंहितायाम् ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-8" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B02" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘ऋग्भिर्हौत्रेण(ऋग्भिर्होत्रेण) शंसन्ति तथौद्गात्रैः(तथोद्गात्रे) स्तुवन्ति ये ।
विष्णुमेव (च) तथा तस्मै यजुर्भिरपि जुह्वति ॥
स्तुवन्त्यथर्वणैश्चैनं सेतिहासपुराणकैः ।
न विष्णुसदृशं किञ्चित् परमं वाऽपि मन्वते ॥
सर्वोत्तमं तं जानन्तस्ते हि भागवतोत्तमाः ॥’" |
|---|
|
| id | "Mundaka-9" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।
आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते ॥’" |
|---|
|
| id | "Mundaka-10" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।
अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-11" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यस्सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-12" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एतद्ब्रह्म चतुर्मुखः ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-13" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतत् सत्यम् ।
मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यन् तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि ।
तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-14" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तदेतत्सत्यं भगवान् । तत्कामाः कर्माण्याचरथ । तदा साऽपि परविद्या । अन्यथा ‘प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः’ । भगवद्विषयत्वेन कृते एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः । परब्रह्मलोकः ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-15" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने ।
तदाऽऽज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-16" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च ।
अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-17" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-18" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् ।
तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-19" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति ।
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-20" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-21" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अविद्यायामन्तरे वेष्ट्यमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथाऽन्धाः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-22" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अविद्यायां बहुधाः वर्तमाना स्वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत् कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-23" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वा इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-24" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V10_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विष्णोः सर्वेभ्यः किञ्चिदुत्तमत्वं जानन्त इमं लोकमाविशन्ति ।
साम्यं हीनत्वं वा जानन्तो हीनतरं तम एवाविशन्ति(नामाविशन्ति) ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-25" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तपःश्रद्धे येऽभ्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-26" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-27" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-28" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतत् सत्यम् ।
यथा सुदीप्तात् पावकाद् विष्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाऽक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-29" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-30" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V02_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘अपरं त्वक्षरं या सा प्रकृतिर्जडरूपिका ।
अक्षरं परमं श्रीस्तु परतः परमक्षरम् ॥
वासुदेवः परानन्दः इति त्रिविधमक्षरम् ॥’ इति च ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-31" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतस्माज्जायते प्राणो मनस्सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-32" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः ।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-33" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V04_B04" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘विष्ण्वङ्गानां हि नामानि द्युभ्वादीनि तु सर्वशः ।
क्रीडादिशक्तिरूपत्वात् तज्जत्वादन्यवस्तुषु ॥’ इति च ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-34" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मादग्निः समिधो यश्च सूर्यः सोमात् पर्जन्यौषधयः पृथिव्याम् ।
पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-35" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘वासुदेवः पुमान्नामा पूर्णत्वात् स स्वयोषिति ।
रमायां गर्भमदधात् प्रजास्तस्मात् प्रजज्ञिरे ॥’ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-36" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च ।
संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-37" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।
इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-38" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सप्तार्चिषो वृत्तयः । होमाः सम्बन्धाः । लोकाः गोलकाः । गुहाशयां बुद्धौ । ‘लोपः समाने’ इति सूत्रादेकयकारलोपः । प्रतिपुरुषं सप्त सप्त ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-39" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात् स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसाश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-40" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् ।
एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरति ह सोम्य ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-41" |
|---|
| oldKey | "MUN_C03_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "भगवतः कर्म चेष्टा तपो ज्ञानं च परामृतब्रह्माख्यः पुरुषो भगवानेव ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-42" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आविः सन्निहितं गुहाचरं नाम महत् पदम् ।
अत्रैतत् सर्वमर्पितमेजत् प्राणन्निमिषच्च यत् ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-43" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद् यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ।
यदर्चिमद् यदणुभ्योऽणु च यस्मिंल्लोका निहिता लोकिनश्च ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-44" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विज्ञानाद् ब्रह्मणः परम् । ‘नाभिहृदादिह सतोऽम्भसि यस्य पुंसो विज्ञानशक्तिरहमासमनन्तशक्तेः’ इति (हि)भागवते ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-45" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः ।
तदेतत् सत्यं तदमृतं तद् वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-46" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘प्राणः प्रणयनाद्विष्णुर्वक्तृत्वाद्वागुदीरितः ।
मनो मन्तृत्वतो विष्णुः सर्वजीवनियामकः ॥’ इति शब्दनिर्णये ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-47" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V04" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्दधीत ।
आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-48" |
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| oldKey | "MUN_C04_V05" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत् ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-49" |
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| oldKey | "MUN_C04_V06" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-50" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V06_B06" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अमृतस्य मुक्तस्य सेतुः । ‘मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्’ । ‘मुक्तानां परमा गतिः’ इत्यादेः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-51" |
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| oldKey | "MUN_C04_V07" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः ।
स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-52" |
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| oldKey | "MUN_C04_V07_B07" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘हृदयस्थः सदा विष्णुर्बहुधा चैकधाभवेत्(बहुधा चैकधाऽभवत्) ।
चरति स्वेच्छयैवान्तः सर्वजीवान्नियामयन् ॥’ इति प्रवृत्ते ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-53" |
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| oldKey | "MUN_C04_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
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| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ओमित्येवं ध्यायत आत्मानं स्वस्तिवः पराय तमसः परस्तात् ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-54" |
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| oldKey | "MUN_C04_V09" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्यैष महिमा भुवि ।
दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा सम्प्रतिष्ठितः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-55" |
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| oldKey | "MUN_C04_V10" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय ।
तद् विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद् विभाति ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-56" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
तक्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-57" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘परा अप्यवरा यस्मात् स हि विष्णुः परावरः ॥ ११ ॥" |
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| id | "Mundaka-58" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-59" |
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| oldKey | "MUN_C04_V12_B12" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "ब्रह्माण्डमध्यगो नित्यं तपत्येष रवौ स्थितः ॥’ इति च ॥ १२ ॥" |
|---|
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| id | "Mundaka-60" |
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| oldKey | "MUN_C04_V13" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-61" |
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| oldKey | "MUN_C04_V13_B13" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सूर्यादयस्तं न भासयन्ति ॥ १३ ॥" |
|---|
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| id | "Mundaka-62" |
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| oldKey | "MUN_C04_V14" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् पश्चात् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-63" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V14_B14" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इदं ब्रह्मैव विश्वं पूर्णम् । इदमेव (च) वरिष्ठं सर्वोत्तमम् । इदंशब्दानां बहुत्वाद् ब्रह्मविषय एवेदंशब्दः ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-64" |
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| oldKey | "MUN_C05_V01" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-65" |
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| oldKey | "MUN_C05_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वादुवत्सर्वदाऽत्ति । न तु स्वाद्वेव(न त्वस्वाद्वेव) । ‘तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद’ इत्यज्ञानां स्वादुनिषेधात् । जीवाद्यमेव नाश्नाति भगवान् । न तु नाश्नात्येव । ‘तस्येदाहुः पिप्पलं स्वादु’ इत्युक्तत्वात् ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-66" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V02" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-67" |
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| oldKey | "MUN_C05_V02_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘नास्तीशोऽस्या यतोऽन्यो हि ततोऽनीशा हरेर्मतिः ।
तया मुह्यति जीवस्तमन्यं ज्ञात्वा विमुच्यते ॥
जीवादन्यः स्वतन्त्रोऽयं(स्वतन्त्रो यो) यतोऽतः पुरुषोत्तमः ॥’ इति ब्रह्मसारे ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-68" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-69" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पुण्यं चानिष्टं विधूय ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-70" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्राणो ह्येष सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी ।
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-71" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-72" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-73" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V06_B06" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘सत्यो हि भगवान् विष्णुः सद्गुणत्वात् प्रकीर्तितः ।
आसुरास्तद्विरुद्धत्वादनृताः परिकीर्तिताः ।
तस्य विष्णोर्निधानं तु वैकुण्ठो लोक उत्तमः ॥’ इति च ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-74" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ।
दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-75" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V07_B05" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वगत्वाद्दूरेऽन्तिके च ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-76" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-77" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V08_B08" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘नान्यैर्देवैर्हरिं पश्येत् ज्ञानरूपेण वायुना ।
ब्रह्मणा परमज्ञानरूपेण हरिणा तथा ॥
प्रसन्नेनैव तं पश्येदन्येऽनुज्ञाप्रदायिनः ॥’ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-78" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश ।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-79" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेत् भूतिकामः ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-80" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वेदैतत् परमं ब्रह्मधाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-81" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स आत्मज्ञार्चको ब्रह्मणो धाम प्राणं वेद । यत्र विश्वं पूर्णं ब्रह्म निहितम् ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-82" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र ।
पर्याप्तकामस्य कृतात्मनश्च इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-83" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-84" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात् तपसो वाऽप्यलिङ्गात् ।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-85" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सम्प्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः ।
ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीराः मुक्तात्मानः सर्वमेवापियन्ति ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-86" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V05_B05" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वतो देहादेर्मुक्ताः सन्तः सर्वगं(सर्वं) भगवन्तं प्राप्य तमेवापियन्ति ।
‘देहादेः सर्वतो मुक्ताः सर्वगं पुरुषोत्तमम् ।
प्राप्य तस्मिन् प्रविश्याथ मोदन्तेऽन्तर्बहिस्तथा ॥’ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-87" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-88" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V06_B06" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ब्रह्मलोकेषु स्थित्वा परान्तकाले परिमुच्यन्ति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-89" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-90" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘अविरोधश्च (सादृश्यादेक.....)सादृश्यमेकदेशस्थितिस्तथा ।
एकीभावस्त्रिधा प्रोक्तो नैकीभावः स्वरूपयोः ।
कुतोऽभूतस्य भवनं स्वरूपस्यैक्यमेव हि ॥
अतो नदीनां जीवानां विरुद्धानां नृणामपि ।
अब्धिना हरिणा चैव तथैव च नरान्तरैः ॥
एकीभावस्तु संश्लेषो विरोधस्य च वर्जनम् ।
स्वरूपैक्यं कुतस्तेषां नित्यभिन्नस्वरूपिणाम् ॥
हरेरपि स्वरूपाणामेकीभावो यदोच्यते ।
संश्लेष एव सिद्धत्वात् स्वरूपैक्यस्य नो भवः ॥’ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Mundaka-91" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति नामरूपेऽविहाय ।
तथा विद्वान्नामरूपाद् विमुक्तः परात् परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Mundaka-92" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V08_B08" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "‘अगम्यनामरूपत्वादमुक्तैर्मुक्तिगा नराः ।
विहीननामरूपास्तु न हि तद्रहितत्वतः ॥
अशरीरो यथा वायुः सामान्यागम्यदेहतः ।
एवं नद्यः समुद्रस्थाः सामान्यागम्यरूपतः ॥’ इति च ।" |
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| id | "Mundaka-93" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥" |
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| id | "Mundaka-94" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09_B09" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| text | "‘परं ब्रह्म विदित्वा तु बृंहितः स्यात् स्वयोग्यतः(बृंहिताच्च स्वयोग्यतः) ।
नायोग्यं किञ्चिदाप्नोति कुत एव हरेर्गुणान् ॥’ इति च ।" |
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| id | "Mundaka-95" |
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| oldKey | "MUN_C06_V10" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तदेष श्लोकः ।
क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षीन् श्रद्धयन्तः ।
तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥" |
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| id | "Mundaka-96" |
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| oldKey | "MUN_C06_V11" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच । नैतदचीर्णव्रतोऽधीते ।
ॐ नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥" |
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| id | "Mundaka-97" |
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| oldKey | "MUN_C06_V11_B1" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| text | "प्रीयतां भगवान् मह्यं प्रेष्ठप्रेष्ठतमः सदा ।
मम नित्यं नमाम्येनं परमोदारसद्गुणम् ॥" |
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