| id | "Satprashna-1" |
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| oldKey | "SPB_C01_I01" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "नमो भगवते तस्मै प्राणादिप्रभविष्णवे ।
अमन्दानन्दसान्द्राय वासुदेवाय वेधसे ।" |
|---|
|
| id | "Satprashna-2" |
|---|
| oldKey | "SPB_C01_V01" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
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| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनः । ते हैते ब्रह्मपराः ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणाः । एष ह वै तत् सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-3" |
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| oldKey | "SPB_C01_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "SPB_C01" |
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| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तान् ह स ऋषिरुवाच । भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ । यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत । यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-4" |
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| oldKey | "SPB_C01_V03" |
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| type | "verse" |
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| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ कबन्धी कात्यायनः उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति । तस्मै स होवाच प्रजाकामो ह वै प्रजापतिः। स तपोऽतप्यत ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-5" |
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| oldKey | "SPB_C01_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
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| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "प्रजानां पालनाद्विष्णुः प्रजापतिरितीरितः ।" |
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| id | "Satprashna-6" |
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| oldKey | "SPB_C01_V04" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स मिथुनमुत्पादयते । रयिं च प्राणं चेति । एतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति । आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमाः ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-7" |
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| oldKey | "SPB_C01_V04_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स वायुं सूर्यनामानं चन्द्रनाम्नीं सरस्वतीम् ॥
सूर्याचन्द्रगतौ देवः ससर्ज पुरुषोत्तमः ।
तावाविश्य स्वयं विष्णुः सर्वसृष्टीः करोत्यजः ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-8" |
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| oldKey | "SPB_C01_V05" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च । तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ अथादित्य उदयन् यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु सन्निधत्ते । यद् दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीची यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु सन्निधत्ते ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-9" |
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| oldKey | "SPB_C01_V05_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अमूर्तस्थः स वायुस्तु मूर्तसंस्था सरस्वती ।
आदित्यस्थः स वायुस्तु प्राणानात्मनि सन्नयेत् ॥
प्राच्याः प्राणास्तथेन्द्राद्या दक्षिणाश्च यमादयः ।
प्रतीच्या वरुणाद्यास्तु सोमाद्या उत्तराः स्मृताः ।
शेषमित्राववाचीनौ वीन्द्रकामावुदक्तनौ ।
सभार्याः कोणपैः सार्धं चत्वारो दिशि दिश्यपि ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-10" |
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| oldKey | "SPB_C01_V06" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥
विश्वरूपं करिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् ।
सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-11" |
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| oldKey | "SPB_C01_V07" |
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| type | "verse" |
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| parent | "SPB_C01" |
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| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "संवत्सरो वै प्रजापतिः । तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद् ये ह वै तदिष्टापूर्ते । कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते । तस्मादेते ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-12" |
|---|
| oldKey | "SPB_C01_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
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| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानं अन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद् वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् परायणम् । एतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः ।
तदेष श्लोकः ॥
पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् ।
अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षर आहुरर्पितमिति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-13" |
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| oldKey | "SPB_C01_V08_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "SPB_C01" |
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| chapter | "SPB_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "संवत्सरस्थो भगवान् वागीरावयनस्थितौ ।" |
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| id | "Satprashna-14" |
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| oldKey | "SPB_C01_V09" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C01" |
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| chapter | "SPB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मासो वै प्रजापतिः । तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः । शुक्लः प्राणः । तस्मादेते ऋषयः शुक्ल इष्टिं कुर्वन्ति । इतर इतरस्मिन् । अहोरात्रे वै प्रजापतिः । तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः । प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते । ब्रह्मचर्यमेव तद् यद् रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-15" |
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| oldKey | "SPB_C01_V09_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "मासस्थितः स भगवान् पक्षयोर्वाक् च मारुतः ॥
अहोरात्रे तु भगवान् प्राणो ह्यहनि वाङ् निशि ।
दम्पत्योर्भगवान् विष्णुर्भार्यास्था तु सरस्वती ।
भर्तृस्थः स स्वयं वायुरेवं जानन् विमुच्यते ॥
इति प्रजापतिसंहितायाम्" |
|---|
|
| id | "Satprashna-16" |
|---|
| oldKey | "SPB_C01_V10" |
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| type | "verse" |
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| parent | "SPB_C01" |
|---|
| chapter | "SPB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अन्नं वै प्रजापतिः । ततो ह वै तद्रेतः । तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति । तद् ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ॥ ये मिथुनमुत्पादयन्ते ।
तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ।
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-17" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V01" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन् कत्येव देवाः प्रजा विधारयन्ते । कतर एतत् प्रकाशयन्ते । कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-18" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V02" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मै स होवाच । आकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्राकाश्या अभिवदन्ति । वयमेतद् बाणमवष्टभ्य विधारयाम इति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-19" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वायुरग्निरित्यत्र भूतवायुरुच्यते ।" |
|---|
|
| id | "Satprashna-20" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तान् वरिष्ठः प्राण उवाच । मा मोहमापद्यथाहमेवैतत् पञ्चधाऽऽत्मानं विभज्यैतद् बाणमवष्टभ्य विधारयामीति । तेऽश्रद्दधाना बभूवुः । सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव । तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रमन्ते । तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-21" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्राणशब्देन प्रधानवायुः ।" |
|---|
|
| id | "Satprashna-22" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यथा मधुमक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रमन्ते । तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रतिष्ठन्ते । एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं चेति । ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ।
एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-23" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं च ब्रह्म च ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-24" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे ।
तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमाः यत् प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-25" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाऽङ्गिरसामपि ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-26" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-27" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः ।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-28" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "व्रात्यस्त्वं प्राणैकऋषिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः ।
वयमद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-29" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ।
या मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-30" |
|---|
| oldKey | "SPB_C02_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C02" |
|---|
| chapter | "SPB_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्राणस्यैतद्वशे सर्वं त्रिदिवे यत् प्रतिष्ठितम् ।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-31" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ । भगवन् कुत एष प्राणो जायते । कथमायात्यस्मिन् शरीरे । आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते । केनोत्क्रमते । कथं बाह्यमभिधत्ते । कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-32" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मै स होवाचातिप्रश्नान् पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति । तस्मात् तेऽहं ब्रवीमि ॥ आत्मत एष प्राणो जायते । यथैषा पुरुषे च्छाया एतस्मिन्नेतदाततम् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-33" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आत्मतः परमात्मतः॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-34" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मनोकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे ॥ यथा सम्राडेवाधिकृतान् विनियुङ्क्त एतान् ग्रामानधितिष्ठस्वैतान् ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव सन्निधत्ते ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-35" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विष्णोर्वायुः समुत्पन्नो वायोः सर्वाश्च देवताः ।
प्राणाद्यास्तान्नयन् प्राण आज्ञापयति राजवत् ॥
स्वयं च पञ्चरूपस्सन् दद्यान्मोक्षादिकं प्रभुः ॥
इति प्रभञ्जने" |
|---|
|
| id | "Satprashna-36" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रतिष्ठते । मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति । हृदि ह्येष आत्मा ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-37" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अत्रैतदेकशतं नाडीनाम् । तासां शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिं प्रतिशाखानाडीसहस्राण्यासु व्यानश्चरति । अथैकयोर्ध्वं उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-38" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ तेजो ह वा उदानः । तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-39" |
|---|
| oldKey | "SPB_C03_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C03" |
|---|
| chapter | "SPB_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति । प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति ॥ य एवं विद्वान् प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति ।
तदेष श्लोकः ॥
उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।
अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते ॥विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-40" |
|---|
| oldKey | "SPB_C04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C04" |
|---|
| chapter | "SPB_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति । कान्यस्मिन् जाग्रति । कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति । कस्यैतत् सुखं भवति । कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-41" |
|---|
| oldKey | "SPB_C04_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C04" |
|---|
| chapter | "SPB_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डले एकीभवन्ति ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवन्ति । तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥" |
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| id | "Satprashna-42" |
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| oldKey | "SPB_C04_V02_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "SPB_C04" |
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| chapter | "SPB_C04" |
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| verseType | null |
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| text | "रश्मीनामविशेषेऽपि ह्यन्यदृष्टिव्यपेक्षया ।
सूर्यस्य मण्डलं यान्तीत्युच्यन्ते तददर्शनात् ॥
एवं विष्णोस्तु सामीप्याद्देवानां सुप्तिगस्य तु ।
व्यवहाराकरत्वाच्च एकीभाव इतीर्यते ॥ इति च" |
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| id | "Satprashna-43" |
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| oldKey | "SPB_C04_V03" |
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| type | "verse" |
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| parent | "SPB_C04" |
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| chapter | "SPB_C04" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्राणाग्नयः एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद् गार्हपत्यात् प्रणीयते । प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ यदुच्छ्वासनिःश्वासवेतावाहुती समं नयति स समानो मनो ह वाव यजमान इष्टफलमेवोदानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ३ ॥" |
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| id | "Satprashna-44" |
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| oldKey | "SPB_C04_V04" |
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| type | "verse" |
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| parent | "SPB_C04" |
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| chapter | "SPB_C04" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरे च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति । दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ स यदा तेजसाऽभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान् न पश्यति । अथ यदेतस्मिन् शरीरे सुखं भवति ॥ ४ ॥" |
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| id | "Satprashna-45" |
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| oldKey | "SPB_C04_V04_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "SPB_C04" |
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| chapter | "SPB_C04" |
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| verseType | null |
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| text | "भगवतः शरीरवत् सादृश्ययुक्ते जीवे सुखं भवति । कस्यैतत्सुखं भवतीति पृष्टत्वात् । न ह्यचेतनस्य शरीरस्य सुखं भवति । यस्यात्मा शरीरमिति च श्रुतिः ।" |
|---|
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| id | "Satprashna-46" |
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| oldKey | "SPB_C04_V04_B02" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "SPB_C04" |
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| chapter | "SPB_C04" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "सादृश्याद्देहवज्जीवो विष्णोस्तस्य सुखं भवेत् ।
सुप्तौ तस्य सुखार्थं हि भगवान् सुप्तिमानयेत् ॥ इति च" |
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| id | "Satprashna-47" |
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| oldKey | "SPB_C04_V05" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "SPB_C04" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते ।
एवं ह वैतत्सर्वं परे आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥
पृथिवी च पृथिवीमात्रा च आपश्च आपोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च । चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसनं च रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ च दातव्यं च पादौ च गन्तव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं च अहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-48" |
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| oldKey | "SPB_C04_V06" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "SPB_C04" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः ।
स यो ह वैतदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वं भवति ।
तदेष श्लोकः
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र ।
तदेतदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ६ ॥" |
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| id | "Satprashna-49" |
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| oldKey | "SPB_C05_V01" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "SPB_C05" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ तस्मै स होवाच । एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायनेनैकतरमन्वेति ॥ १ ॥" |
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| id | "Satprashna-50" |
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| chapter | "SPB_C05" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते । स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥
अथ यदि द्वितीयमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतैनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यते एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् । स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-51" |
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| oldKey | "SPB_C05_V03" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "SPB_C05" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तदैतौ श्लोकौ भवतः ॥
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥
ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत् तत् कवयो वेदयन्ते ।
तमोङ्कारेणैवायनेनान्वेति विद्वान् यत् तच्छान्तमजरममृतमभयं परं च ॥ इति ॥" |
|---|
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| id | "Satprashna-52" |
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| oldKey | "SPB_C05_V03_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "SPB_C05" |
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| verseType | null |
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| text | "प्रणवेन हरिं ध्यायन् ब्रह्मलोकं समेत्य च ।
ज्ञानं चतुर्मुखात् प्राप्य मुच्यते नात्र संशयः ॥" |
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| id | "Satprashna-53" |
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| oldKey | "SPB_C06_V01" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "SPB_C06" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैनं प्रश्नमपृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ । तं मह्यं ब्रवीहीति ।
तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद । यद्यहमिममवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति । समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति । तस्मान्नार्हाम्यहमनृतं वक्तुम् । स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-54" |
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| oldKey | "SPB_C06_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "SPB_C06" |
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| chapter | "SPB_C06" |
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| verseType | null |
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| text | "कर्मेति पुष्करः प्रोक्त उषा नामाभिमानिनी ।
लोकाभिमानी पर्जन्यः स्वाहा वै मन्त्रदेवता ॥
तपोभिमानी वह्निश्च वरुणो वीर्यदेवता ।
अन्नस्य देवता सोमो मनो नामानिरुद्धकः ॥
इन्द्रियेशाश्च सूर्याद्याश्चक्षुराद्यभिमानिनः ।
रुद्रो वीन्द्रः शेषकामौ मनसस्त्वेव देवताः ॥
श्रद्धेति वायोः पत्नी स्यात् सर्वेषां प्रभवाप्यया ।
तस्याश्च कारणं प्राणः सर्वेषामुत्तमोत्तमः ॥
तस्यापीशः कारणं च वासुदेवः परोऽव्ययः ।
न तस्य सदृशः कश्चित् कुत एवोत्तमो भवेत् ॥
तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्विदित्वैवं परात्परम् ॥ इति तत्त्वविवेके ।" |
|---|
|
| id | "Satprashna-55" |
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| oldKey | "SPB_C06_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "SPB_C06" |
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| chapter | "SPB_C06" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥ स ईक्षाञ्चक्रे । कस्मिन् न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि । कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ स प्राणमसृजत । प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योऽतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु नाम च ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-56" |
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| oldKey | "SPB_C06_V02_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C06" |
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| chapter | "SPB_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥
इति मन्त्रोक्त एव क्रमः । न हीन्द्रियेभ्यो मनः पश्चात् । तत्प्राक् श्रुतेश्च इति च भगवद्वचनम् ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-57" |
|---|
| oldKey | "SPB_C06_V02_B02" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C06" |
|---|
| chapter | "SPB_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विष्णोः प्राणस्ततः श्रद्धा तस्या रुद्रो मनोभिधः ।
तस्मादिन्द्रस्त्विन्द्रियात्मा तस्य सोमोऽन्नदेवता ॥
ततश्च वरुणस्सृष्टस्तस्मादग्निस्ततोऽवरः ।
आकाशदेवता विघ्नस्ततो वायोः सुतो मरुत् ॥
तस्मादग्निः पावकाख्यः प्रथमोऽग्नेः सुतस्ततः ।
ततः पर्जन्य उद्भूतः स्वाहातो मन्त्रदेवता ॥
उदात्मको बुधस्तस्या उषा नामात्मिका ततः ।
ततः शनिः पृथिव्यात्मा कर्मात्मा पुष्करस्ततः ॥
क्रमात् प्रत्यवरा ह्येते मुक्ताः सर्वगुणैरपि ।
नित्यमुक्तस्ततो विष्णुः प्राणादप्युत्तमोत्तमः ॥ इति च" |
|---|
|
| id | "Satprashna-58" |
|---|
| oldKey | "SPB_C06_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C06" |
|---|
| chapter | "SPB_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथेमाः नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति । भिद्येते चासां नामरूपे । पुरुष इत्येवं प्रोच्यते । स एषोऽकलोऽमृतो भवति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-59" |
|---|
| oldKey | "SPB_C06_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C06" |
|---|
| chapter | "SPB_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "समुद्रे इत्येव प्रोच्यते । पुरुषे इत्येवं प्रोच्यते । भिद्येते तासां नामरूपे । भिद्येते चासां नामरूपे इत्युक्तत्वात् । अज्ञैरनवगतान्यपि समुद्रे स्थितानां नदीनां विष्णौ स्थितानां मुक्तानां च भिन्नान्येव नामरूपाणि सन्त्येवेत्यर्थः ।" |
|---|
|
| id | "Satprashna-60" |
|---|
| oldKey | "SPB_C06_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C06" |
|---|
| chapter | "SPB_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेष श्लोकः" |
|---|
|
| id | "Satprashna-61" |
|---|
| oldKey | "SPB_C06_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "SPB_C06" |
|---|
| chapter | "SPB_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तान् होवाच । एतावदेवाहमेतत् परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति ते हि तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Satprashna-62" |
|---|
| oldKey | "SPB_C06_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "SPB_C06" |
|---|
| chapter | "SPB_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "नमो नमोस्तु हरये प्रेष्ठप्रेष्ठतमाय मे ।
परमानन्दसन्दोहसान्द्रानन्दवपुष्मते ॥" |
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