| id | "Bruhadaranyaka-1" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S01" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "अश्वब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-2" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ॐ उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः । संवत्सरः आत्मा अश्वस्य मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं, पृथिवी पाजस्यं, दिशः पार्श्वे । अवान्तरदिशः पर्शवः । ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा । नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसान्युवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचन् जघनार्धो यद्विजृम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-3" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S01_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यप्रणीतं बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यम्
प्राणादेरीशितारं परमसुखनिधिं सर्वदोषव्यपेतं सर्वान्तस्थं सुपूर्णं प्रकृतिपतिमजं सर्वबाह्यं सुनित्यम् ।
सर्वज्ञं सर्वशक्तिं सुरमुनिमनुजाद्यैः सदा सेव्यमानं विष्णुं वन्दे सदाऽहं सकलजगदनाद्यन्तमानन्ददं तम् ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-4" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अहर्वा अश्वं पुरस्ताद् महिमाऽन्वजायत । तस्य पूर्वे समुद्रे योनौ रात्रिरेनं पश्चान्महिमाऽन्वजायत तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुर्हयो भूत्वा देवानवहद् वाजी गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥॥ इति अश्वब्राह्मणम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-5" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S01_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अश्वपूर्वापरौ होम्यौ महिमानौ ग्रहौ स्मृतौ ।
अहोरात्राभिमन्तारौ तयोरप्यभिमानिनौ ॥
कामश्चाथ रतिश्चैव विष्णुब्रह्मशरीरजौ ।
समुद्रेकात् समुद्रस्तु विष्णुः पूर्वमुदाहृतः ॥
उपचारेण तूद्रेकादपरश्च चतुर्मुखः ।
स विष्णुर्हयनामा सन् देववाह्येषु संस्थितः ॥
वाजिनामा तु गन्धर्वेष्वर्वनामाऽसुरेषु च ।
मनुष्येष्वश्वनामाऽसौ तद्बन्धुः स्वयमेव सः ॥
तस्मादेवोत्थितिस्तस्य रूपभेदो न तस्य च ।
ऐश्वर्यात् स तथापीशो व्यक्तिभावं गमिष्यति ॥
हत्वा याति यतः शत्रून् हरिस्तस्मात् हयः स्मृतः ।
सर्वदा युद्धकर्तृत्वाद्वाजी चापि प्रकीर्तितः ॥
अर्वाऽभिगमनादुक्त आशुत्वादश्व उच्यते ॥ इति वैहायसे ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-6" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "अश्वमेधब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-7" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् मृत्युनैवेदमावृतमासीद् अशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत् तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चतो ह वै मे कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कंह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-8" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वसंहारकं विष्णुं देवीं जीवांस्तथैव च ।
कालं त्रिगुणसाम्यं च कर्माणि प्राणमिन्द्रियम् ॥ संस्कारं चैव वेदांश्च नर्ते किञ्चिल्लये त्वभूत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-9" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आपो वा अर्कस्तद्यदपांशर आसीत् तत्समहन्यत । सा पृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-10" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अर्कशब्दस्यादित्ये प्रसिद्धत्वादप्शब्दोऽपि तत्रेत्याशङ्कां निवर्तयितुमापो वा अर्क इति पुनर्वचनम् । नादित्येऽर्कशब्दः किन्त्वप्स्वेवार्कशब्द इत्यर्थः । शरो मण्डः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-11" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स त्रेधाऽऽत्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयं अग्निं तृतीयम् । स एष प्राणस्त्रेधा विहितस्तस्य प्राची दिक् शिरोऽसौ चासौ चेर्मावथास्य प्रतीची दिक् पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे, द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरस्स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥३॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-12" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वायुरग्निरिति प्रोक्तो ह्यग्रणीत्वादथाङ्गिनाम् ।
नेतृत्वाददनाच्चापि तस्य स्रष्टा जनार्दनः ॥
स वायुर्वायुरूपेण जगत्पाति शरीरगः ।
आदित्यस्थेन रूपेण जगद्याति प्रकाशयन् ॥
अग्निस्थेन तु रूपेण हूयते सर्वयष्टृभिः ।
आदाय यात्यायुरिति स एवादित्य उच्यते ॥॥
तत्सम्बन्धात्तु तन्नाम सूर्यस्याग्नेस्तथैव च ।
स एष कूर्मरूपेण वायुरण्डोदके स्थितः ॥॥
विष्णुना कूर्मरूपेण धारितोऽनन्तधारकः ।
अस्य पादा हि चत्वारो ह्यण्डोदे कोणसंस्थिताः ॥
उरस्तु भूमिसंश्लिष्टमतिरिच्य भुवं पुनः ।
पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव शिरश्चोदकसंस्थितम् ॥
आकाशमुदरे तस्य द्यौः पृष्ठे संस्थिता विभोः ।
एवंविद्वांस्तु यत्रैति तत्रैव प्रतितिष्ठति ॥ इति प्रभञ्जने ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-13" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनं समभवदशनायां मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत् स संवत्सरोऽभवन्न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं कालमबिभर्यावान् संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात् स भाणमकरोत् सैव वागभवत् ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-14" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आत्मा, ब्रह्मा मे द्वितीयो जायेतेत्यकामयत । वायुरेव ब्रह्मा भवतीति दर्शयितुं वायोः सृष्टिः प्रथममुक्ता ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-15" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स ऐक्षत यदि ह वा इमभिमंस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तथा वाचा तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्चर्चो यजूंषि सामानि च्छन्दां सि यज्ञान् प्रजाः पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वं सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-16" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अभिमंस्ये लीनं करिष्ये चेत् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-17" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूमो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरं श्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-18" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इच्छतो विष्णुयजनं ब्रह्मणः साधनास्मृतेः ।
श्रमात् तापाच्च देहं तं त्यक्तुमिच्छा बभूव ह ॥
इच्छया चाप्युदक्रामत् प्राणैः सह पितामहः ।
यशोवीर्यनिमित्तत्वात् प्राणास्तन्नामकाः स्मृताः ॥
अत्यल्पे चापि सञ्जाते श्रमेऽपि न तदिच्छया ।
तापे प्राणा निःसरन्ति सा च क्रीडा विभोः स्मृता ॥
बृंहमाणं शरीरं तु पुनर्दृष्ट्वा पितामहः ।
प्रवेष्टुं तच्छरीरं च कामयामास स प्रभुः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-19" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोऽकामयत मेध्यं म इदं स्यादात्मान्व्यनेन स्यामिति । ततोऽश्वः समभवत् यदश्वत् तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-20" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पुनस्तस्मिन् प्रवेशाय शवरूपस्य मेध्यताम् ।
ऐच्छत् तेनैव देही स्यामिति तस्मिन् विवेश च ॥
तस्मिन् प्रविश्य स ब्रह्मा द्वितीयं वपुरग्रहीत् ।
दृष्ट्वोपायं महायज्ञेऽथाश्वाकारं पितामहः ॥
श्वैतीभावात् परं यस्मात् तज्जज्ञेऽतोऽश्वनामकम् ।
यदर्थं श्वेततामाप तद्देहो मेध्यतामपि ॥
अश्वमेधः स यज्ञोऽभून्नाम्ना तेन तदा कृतः ।
श्वैतीभावं गते देहे पुनर्मेध्ये यतः स्थितः ॥
अतोऽश्वमेधनामाऽसौ ब्रह्मा शुभचतुर्मुखः ।
अश्वो भूत्वा यतो मेध्यः सोऽभवत् तेन वा स्मृतः ॥
मेधो यज्ञः समुद्दिष्टो याज्ञीयं मेध्यमुच्यते ।
शुद्धं मेध्यमथापि स्यादेवंविद्योऽश्वमेधवित् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-21" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तमनवरुध्यैवामन्यत । तं संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत । पशून् देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात् सर्वदैवत्यं प्रोक्षितं प्राजात्पत्यमालभन्त । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्माऽयमग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेव अप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-22" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S02_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तमश्वरूपमात्मानमनिवारितवद्विभुः ।
चारयामास रूपेण तदन्येन पुमात्मना ॥
सर्वस्मिन् भुवने चाब्दं तदन्ते परमात्मने ।
स्वस्मिन् स्थिताय सङ्कल्प्य यज्ञ आलभतात्मवान् ॥
अजादिकान् पशूनन्यदेवस्थपरमात्मने ।
कर्तृत्वेन पशुत्वेन यत्फलं तदशेषतः ॥
मम स्यादिति मन्वानः सोऽश्वरूपमधारयत् ।
अबुद्धिपूर्वमरणात् स्वर्गश्चापि पशोर्भवेत् ॥
ज्ञानपूर्वमृतेः पुंसः किमु वक्तव्यमित्यजः ।
एवं सूर्योऽप्यश्वमेधनामा संवत्सराभिधः ॥
सूर्ये स्थितो यतो ब्रह्मा ह्यश्वमेधाभिधः स्वयम् ।
सूर्ये ततत्वात् सूर्यात्मा ब्रह्मासौ परिकीर्तितः ॥
अग्नौ स्थितो यतः सोऽर्कस्तस्मादग्निरितीर्यते ।
ब्रह्मातता यतो लोकास्तदात्मानस्ततो मताः ॥
ब्रह्मसूर्याग्निलोकेषु व्याप्तैका देवता हरिः ।
तादृशं नृहरिं ज्ञात्वा पुनर्मृत्युं जयन्नसौ ॥
सदैव वर्तते ब्रह्मा पुनर्मृत्युर्मृतिः स्मृता ।
नैनं मृत्व्यात्मको मृत्युः प्राप्नोति हरिसेवनात् ॥
यस्मान्नृसिंहो मृत्योश्च मृत्युरात्माऽस्य वै भवेत् ।
आततत्वात् तथात्तृत्वादात्मासौ ब्रह्मणः स्मृतः ॥
आदानादात्तनिर्माणादात्तज्ञानात् तथैव च ।
एतासां देवतानां च ब्रह्मेशत्वेन वर्तते ॥
नृसिंहस्य सदा ज्ञानाद्ध्यानाच्च तदनुग्रहात् ॥ इति महासंहितायाम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-23" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "उद्गीथब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-24" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-25" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "द्वया ब्रह्मसुतास्तत्र दैतेया बहवः स्मृताः ।
तमोरूपाः सत्वरूपाः अल्पसङ्ख्याः सुराः स्मृताः ॥
बहुत्वात् तैर्जिता देवाः शङ्करस्य वरेण च ।
यज्ञेन विष्णुमभ्यर्च्य तत्रोद्गातृबलेन च ॥
जयामैनानिति स्मृत्वा वह्न्यादीनप्यचूचुदन् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-26" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-27" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ ह घ्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो घ्राण उदगायत् । यो घ्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-28" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ ह चक्षुरूचुः । त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-29" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ ह श्रोत्रमूचुः । त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो श्रोत्रमुदगायत् । यो श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् ।स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-30" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ ह मन ऊचुसः । त्वं न उद्गायेति तथेति । तेभ्यो मन उदगायत् । यः मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं सङ्कल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं सङ्कल्पयति स एव स पाप्मा । एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-31" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विश्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति। य एवं वेद ॥७॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-32" |
|---|
| oldKey | "R_C03_S03_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "R_C03_S03" |
|---|
| chapter | "R_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "औद्गात्रेऽग्निमुखाः सर्वे इन्द्ररुद्रौ च वेधितौ ॥
असुरैः पापपूगेन मुख्यवायुं ततोऽब्रुवन् ।
दैत्यास्तं वेद्धुमीप्सन्तो ध्वस्ता नेशुश्च सर्वशः ॥
पांसुपिण्डो यथा वज्रशिलां प्राप्यैव नश्यति ।
तस्मादखण्डशक्तिः स मुख्यवायुरुदाहृतः ॥
शापैरथ वरैर्वापि नास्य प्रतिहतिर्भवेत् ।
स्वेच्छयैवानुसारेण विना कुत्रापि पुत्रक ॥
एवंविदपि पापेभ्यः शत्रुभ्योऽपि प्रमुच्यते ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-33" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ते होचुः । क्व नु सोऽभूद् यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरिति । सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-34" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा वा एषा देवता दूर्नाम । दूरं ह्यस्या मृत्युर्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति । य एवं वेद ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-35" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्तासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात् । तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-36" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-37" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् । सा या यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् ।सोऽयमग्निः परेण मृत्युरतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-38" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ घ्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स वायुरभवत् सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-39" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ चक्षुरत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। स आदित्योऽभवत् । सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तः तपति ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-40" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ श्रोत्रमत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। दिशोऽभवन् । ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-41" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ मनोऽत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स चन्द्रमा अभवत् सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति । य एवं वेद ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-42" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V16_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स वायू रुद्रशक्रादेर्वासुदेवबलाश्रयः ॥
विमोच्य पापसङ्घात् तं दिशामन्तेष्वथाक्षिपत् ।
उन्मुच्य मृत्योस्तांश्चैवाधोर्ध्वलोकेषु चावहत् ॥
अग्निर्नासिक्यवायुश्च दिक्पा इन्द्रादयोऽखिलाः ।
सूर्यः सोमश्च रुद्रश्च तेनैव स्वपदे स्थिताः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-43" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ आत्मनेऽन्नाद् यमागायद् यद्धि किञ्चान्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-44" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ते देवा अब्रुवन् एतावद्वा इदं सर्व यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन् अन्न आभजस्वेति । ते वै माऽभिसंविशतेति । तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त । तस्माद् यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्ति । एवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रति बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनुभवति यो वैतमनु भार्यान् बुभूषति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-45" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां रसस्तस्माद् यस्मात् कस्माच्चाङ्गात् प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष ह वा अङ्गानां रसः ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-46" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष उ एव बृहस्पतिर् वाग्वै बृहती तस्या एव पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-47" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V20_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्त्रीगुणैः सर्वपूर्णत्वाद् बृहती तु सरस्वती ।
अनन्तवेदरूपत्वाद् सैव ब्रह्मेति कीर्तिता ॥
विष्णुना बृंहितत्वाद्वा तत्पतिर्वायुरीश्वरः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-48" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर् वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-49" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष उ एव साम । वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् । यद्वैव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः, समोऽनेन सर्वेण तस्मादेव साम, अश्नुते साम्नः सायुज्यं सलोकतां । य एवमेतत् साम वेद ॥ २२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-50" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष उ वा उद्गीथः । प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-51" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V23_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सारत्वात् स्त्रीषु सा देवी सेत्युक्ता सामरूपतः ॥
गीथेत्युक्ता तदुद्गीथः सामाख्योऽर्धतनुस्तथा ।
अर्धनारीनरवपुर्वायुः कुत्रचिदीरितः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-52" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-53" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V24_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अयास्यो विश्वसृग्यज्ञे तेनाविष्टोऽन्वगायत ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-54" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V25" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं ।तस्य वै स्वर एव स्वं ।तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन् वाचि स्वरमिच्छेत । तया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽर्त्विज्यं कुर्यात् ।तस्माद् यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-55" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V26" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद ।भवति हास्य सुवर्णं ।तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं च । एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-56" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V26_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "गृहकोशादिकं यत्स्वं तद्रूप्यस्य स्वरस्थितः ॥
भूषणस्वर्णरूपी च स एवापि स्वरस्थितः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-57" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-58" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V27_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वागिन्द्रियं पीठरूपं तस्य देवस्य संस्थितम् ॥
गानकालेऽन्यदा त्वन्नं प्राणपीठमिति स्मृतम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-59" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V28" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तूयात् तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्माऽमृतं गमयेति स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह ॥ २८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-60" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V29" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्त्यथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-61" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V29_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पवमाना इति प्रोक्ता मुख्यवायुत्वयोगिनः ॥
अनादिकालसम्बद्धा योग्यता सा प्रकीर्तिता ।
सर्वाधिक्यारोहणं तु तेषामेव विमुक्तिगम् ॥
प्रस्तावकाले प्रस्तोतुं योग्यो वायुपदस्य यः ।
जपेद्यजूंषि त्वेतानि त्रीणि विष्णुं सदा स्मरन् ॥
असतो मा सदित्यादि विष्णुप्रार्थनभांिज च ।
द्वात्रिंशल्लक्षणैः सम्यग्युक्ता वायुत्वयोग्यकाः ॥
नियमेनैव विष्णोस्तु प्रादुर्भावा विशेषतः ।
सहस्रारेण चक्रेण चिह्निता दक्षिणे करे ॥
गदयाऽष्टाश्रया चैव शतावर्तेन कम्बुना ।
वामे करे तथाब्जेन सहस्रदलशोभिना ॥
अष्टाविंशल्लक्षणाश्च गिरीशपदयोगिनः ।
चतुविंशतिमारभ्य षोडशादासुराः स्मृताः ॥
अष्टकादृषयश्चोक्तास्तदूनाश्चक्रवर्तिनः ।
असद्दुःखात्मको मृत्युः सदानन्दोऽमृतं स्मृतम् ॥
तमोऽज्ञानात्मको मृत्युर्ज्योतिर्ज्ञानामृतं स्मृतम् ।
मृत्योर्माऽमृतमित्यत्र मृत्युर्मरणमेव च ॥
एवंविद्वायुपदयोग्या उद्गातार एव तु ।
यदा भवेयुस्तेषु तदा याजी तु वृणुयाद्वरम् ॥
आत्मने याजिने वापि ह्युद्गातैवंविधो यदि ।
आगायेत् तद्भवेन्नात्र कार्याऽभीष्टे विचारणा ॥
एवं तं सामनामानं वायुं यो वेद सादरम् ।
तस्येष्टलोकराहित्ये नाशा कार्याऽरिणा क्वचित् ॥
तस्माद्वायुत्वयोग्यैर्हि येषां लोकाः प्रकीर्तिताः ।
तेषामलोकाशङ्का च नैव कार्या कदाचन ॥
यस्मान्नारायणस्यातिप्रियाः प्राणत्वयोगिनः ॥ इत्यादि महासंहितायाम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-62" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "प्रजापतिब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-63" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत् ततोऽहं नामाऽभवत् तस्मादप्येतर्ह्यामंत्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाऽथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात् सर्वस्मात् सर्वान् पाप्मन औषत् तस्मात् पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात् पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-64" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इदमग्रे एतस्याग्रे परमात्मैवासीत् । ततः पुरुषविधो ब्रह्माऽऽसीत् । पुरुषो विष्णुस्तद्विधत्वात् पुरुषविधः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-65" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोऽबिभेत् तस्मादेकाकी बिभेति सहायमीक्षाञ्चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभैष्यत् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-66" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्य त्वेकस्य सहसा यतो भीः समजायत ।
तस्मादद्यापि चैकस्य निर्विवेकं भयं भवेत् ॥
विममर्श ततो ब्रह्मा यस्मान्मद्बाधको न हि ।
मया सृज्या यतः सर्वे इतः पश्चात्तनो हरः ॥
अतः कस्माद्बिभेमीति तस्य भीतिरपोहिता ।
विष्णोरतिप्रियत्वात्तु तदन्येषां पितृत्वतः ॥
कस्माद्भयं भवेत् तस्य समानाद्धि भयं भवेत् ।
विरोधिनोऽधिकाद्वापि हीनाद्वा पारवश्यतः ॥
हीनमेव यतस्तस्य सर्वमेव जगद्वशे ।
न च जातं तदा सर्वं हरिरेव यतः परः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-67" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् स हैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधाऽपातयत् ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव तां समभवत् ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-68" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "न रेमे स ततो ब्रह्मा तस्मादेकस्य नो रतिः ।
अथापि पत्नीमैच्छच्च स स्थूलत्वमुपागतः ॥
दम्पती सहितौ यावद्ब्रह्मा चैव सरस्वती ।
तावद्देहोऽभवद्ब्रह्मा तदा देहं द्विधाऽकरोत् ॥
पातनात् पतिपत्नीत्वशब्द एनोरजायत ।
तस्मात् तयोरेकसुखं भवत्येवार्धपात्रवत् ॥
ततस्तस्यामुमेशादीन् देवान् सर्वान् मनूनपि ।
जनयामास बोधस्य प्राधान्यं हि मनुष्यता ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-69" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोहेयमीक्षाञ्चक्रे कथं नु माऽऽत्मन एव जनयित्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवदृषभ इतरस्तां समेवाभवत् । ततो गावो अजायन्त बडवेतराऽभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्तां समेवाभवत् तत एकशफमजायताऽजेतराभवद् वस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्तां समेवाभवत् ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-70" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोऽवेदहं वाच सृष्टिरस्म्यहं हीदं सर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत् सृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-71" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वज्ञाऽपि तु सा देवी विरिञ्चे भक्तिमत्यपि ।
तद्भार्यतामात्मनश्च नितरां धर्ममीक्षती ॥
अनाद्यनन्तसम्बन्धमुभयोरपि जानती ।
स्त्रीस्वभावं दर्शयन्ती साऽधर्ममिव चैक्षत ॥
नानासृष्टिप्रसिद्ध्यर्थं सा गोत्वादिकमाव्रजत् ।
वृषादिरूपतां सोऽपि प्राप्य सृष्ट्वेदमञ्जसा ॥
सर्जनात् सृष्टिनामाऽभूत् तद्वित्तत्पुत्रतां व्रजेत् ।
पिपीलिकान्तरुद्रादौ यथायोग्यत्वमात्मनः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-72" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S04_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथेत्यभ्यमन्थत् स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत । तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतस्तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवा अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा इदमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नादः सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिर्यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-73" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S03_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अथान्नादमथाप्यन्नं स्रक्ष्यामीति विचिन्तयन् ।
ओष्ठद्वयं ममन्थान्तर्हस्तौ चैव परस्परम् ॥
तन्मुखाच्चैव हस्ताभ्यामन्तरग्निरजायत ।
एवं सर्वस्य हेतुत्वात् सर्वस्यापि पतित्वतः ॥
सर्वे देवा एष एवेत्याहुर्वेदविदो जनाः ।
स्वतन्त्रेषु यतः शब्दा वर्तेयुः सर्व एव च ॥
स रेतसः पुनः सोममसृजद्ब्रह्मविद्धरः ।
सर्वाधिकोऽपि योग्यत्वान्मर्त्यधर्मतया पुरा ॥
अवमो योग्यताहीनानप्यायुर्मात्रतोऽधिकान् ।
यतोऽस्रागतिसृष्टिस्तं देवं यो वेद पूरुषः ॥
विष्णोः प्रसादतः सृष्टिं देवलोके स जायते ।
आत्मयोग्यानुसारेण सुखज्ञानादियुक्तता ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-74" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "अव्याकृतब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-75" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् । तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौ नामाऽयमिदं रूप इति । तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौ नामायमिदं रूप इति स एष इह प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात् विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुलाये तं न पश्यन्त्यकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणनामा भवति वदन्वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेद । अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्माऽनेन ह्येतत्सर्वं वेद यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-76" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विश्वम्भरो वायुः । अकृत्स्नो हि स इत्यस्याभिप्रायः स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदेत्यादि । प्राण इत्यादिनामानि परमेश्वरस्य न सर्वगुणसम्पूर्णतां वदन्ति । किन्तु प्राणनादिकर्मकर्तृत्वमेव वदन्ति । आत्मशब्द एव सर्वगुणपरिपूर्णत्वं वदति । अस्य सर्वस्य गुणजातस्यायमात्मैव पदनीय आश्रयो यस्मादतस्तं सर्वगुणवाचकेनात्मशब्देनैवोपासीत । अनेन ह्येतत्सर्वं वेद यस्मात् सर्वज्ञानप्रदस्तस्मात् सर्वगुणसम्पूर्णः इत्येवोपासनं तस्य युक्तम् । तदुपासनादेव सर्वज्ञत्वादयो भवन्ति किमु तस्येति । पद्यते अनेनेति पदं साधनम् । यथा तत्तत्साधनेन तत्तत्फलं प्राप्नुयादेवं सर्वगुणयुक्तत्वेन भगवदुपासनात् कीर्तिं श्लोकं च विन्दते । शं लोकः श्लोकः परमानन्दं परमं ज्ञानं चेत्यर्थः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-77" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतत् प्रेयः पुत्रात् प्रेयो वित्तात् प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुतं भवति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-78" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स एष विष्णुर्भगवान् पुत्राद्वित्तात् तथाऽऽत्मनः ।
अन्यस्मादपि सर्वस्मात् प्रेष्ठ एव स्वभावतः ॥
आत्मनोऽपि प्रियत्वं तु तेनैव कृतमञ्जसा ।
आत्मनो निरयायैव कुर्यात् कर्माणि नित्यशः ॥
यतोऽतः स्वात्मनश्चापि स्वाप्रियत्वमुदाहृतम् ।
स चेदप्रियकृद्विष्णुर्नात्माऽपि प्रियतां व्रजेत् ॥
अस्मिन् प्रिये प्रियं सर्वं तस्मादेकः प्रियो हरिः ।
स चात्मशब्देनोद्दिष्टो यस्मादाप्तगुणः प्रभुः ॥
अतो विष्णोः प्रियं ब्रूयाद्यः स्वात्माद्यं दुरात्मवान् ।
प्रियरोधं करोषीति तं ब्रूयाद्वैष्णवो महान् ॥
एवं वदन् वैष्णवस्तु समर्थः प्रियरोधने ।
तस्य स्याच्च विशेषेण तदुक्त्यैवापि दुःखिनः ॥
तस्मात् सर्वप्रियो विष्णुरित्युपास्ते सदा प्रियः ।
नास्य प्रियमनित्यं स्यादस्य प्रीतिः सदा भवेत् ॥
तस्मात् सर्वप्रियं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।
नित्यप्रियकरो विष्णुर्भवेत् तस्याप्यजः स्वयम् ॥इत्यध्यात्मे ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-79" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदाहुर्- यद् ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद् यस्मात् तत्सर्वमभवदिति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-80" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्त आत्मयोग्यतापूर्तिमाप्नुवन्तो महान्तो यदाहुः ब्रह्मविद्यया स्वयोग्यं सर्वं प्राप्यत इति । नित्यनिर्दुःखानन्दानुभवरूपो हि स्वत उत्तमो जीवः । तादृशं रूपमज्ञानात् तिरोहितं ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते एव । न चान्यथाऽभिव्यज्यत इति सन्तो यदाहुः । तत्तत्र केचिन्मनुष्या इति मन्यन्ते । स्वरूपमपि ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते चेत् तद् ब्रह्मापि यस्मात् सर्वमभवत् परिपूर्णमभवत् तस्मात् स्वरूपं ज्ञात्वैवाभवत् किमिति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-81" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात् तत्सर्वमभवत् तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत् पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत आत्मा ह्येषं समभवत्यथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानां यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्जुरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमाने प्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-82" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सत्यम् । तदपि स्वरूपं नित्यापरोक्षज्ञानेन सर्वदा जानात्येव । अत एव सर्वदा परिपूर्णमिति तेषां परिहारः । तदात्मानमेवावेत् तस्मात् तत्सर्वमभवदिति । आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् सदेव सोम्येदमग्र आसीत् इत्यादिवत् सदातनज्ञानं पूर्णभावं चाह ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-83" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकं सन्न व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत । क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति । तस्मात् क्षत्रात् परं नास्ति । तस्मात् ब्रह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मेवान्तत उप निःश्रयति स्वां योनिं य उ एनं हिनस्ति स्वां स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेयां सं हिंसित्वा ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-84" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विष्णोर्ब्राह्मणजातिः सन् ब्रह्मा जज्ञे चतुर्मुखः ।
इतोऽग्रे जगतस्तस्मात् क्षत्रजातिरजायत ॥
वायुः सदाशिवोऽनन्तो गरुडः शक्र एव च ।
कामश्च वरुणश्चैव सोमसूर्यौ यमस्तथा ॥
एवमाद्याः क्षत्रियास्तु देवानां ब्रह्मनिर्मिताः ॥
श्रेयसी सर्वजातिभ्यः क्षत्रजातिरिति श्रुतिः ।
नैव क्षत्रात् परा जातिर्ब्रह्मजातिं विना क्वचित् ॥
ब्राह्मणाच्च परो राजा राजसूयाश्वमेधयोः ।
उपास्ते राजसूयेऽतो ब्राह्मणो राजसूयिनम् ॥
आसीन आसनाधस्तात् तथाऽपि ब्राह्मणो गुरुः ।
तस्मात् स राजसूयान्ते ब्राह्मणान् वन्दयीत च ॥
यः क्षत्रियो ब्राह्मणहा पितृहा स प्रकीर्तितः ।
पापीयानेव भवति हत्वा स्वपितरं यथा ॥ इति वामने ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-85" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-86" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स नैव व्यभवत् स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमिषं वै पूषेयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-87" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विवस्वदिन्द्रवरुणविष्णुभ्योऽन्ये दितेः सुताः ।
रुद्रादन्ये तथा रुद्रा वायोरन्ये च वायवः ॥॥
अग्नेरन्ये च वसवो वैश्या इत्येव कीर्तिताः ।
एक एव हरेर्जातः परिवारविवर्जितः ॥॥
वाय्वादीन् क्षत्रियान् सृष्ट्वा पुनरल्पपरिग्रहः ।
इच्छन् बहुपरीवारं वैश्यान् देवान् ससर्ज ह ॥॥
ततो बहुतरानिच्छन् शूद्रान् देवान् ससर्ज ह ।
अश्विनौ पृथिवी चैव काला मृत्यव एव च ॥ ॥
शूद्रदेवाः समुद्दिष्टा देववर्णा इति स्मृताः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-88" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स नैव व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात् परं नास्त्यथो अबलीयन् बलीयां समाशंसते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वैतत् तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तं सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-89" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्रष्टा स्वयं समुद्दिष्टः पालका देवता इमाः ॥ ॥
धारणं कथमस्य स्याद्गतिश्चास्य कथं परा ।
इति मत्वा हरेर्भक्तिर्धर्मरूपं पुनर्विभुः ॥॥
प्राणिनां धैर्यरूपं च वायो रूपान्तरं पुनः ।
ससर्ज मतिमान् ब्रह्मा विष्णोराज्ञापुरःसरः ॥॥
तस्माद् वायोः परो नास्ति ऋते विष्णुं सनातनम् ।
शेषादीनां क्षत्रियाणां वायुरेवाधिपः स्मृतः ॥॥
धारणाद्धर्म इत्याहुर्वायुर्धारयति प्रजाः ।
अबलोऽपि ततो वायोर्विष्णुभक्त्यादिरूपिणः ॥
प्राप्तुमिच्छति युक्तः सन् विष्णुं सुबलवत्तरम् ।
यथैव युवराजेन महाराजमभीप्सति ॥॥
प्राप्तुं धर्माभिमानी स वायुः सत्याभिमानवान् ।
तस्मादाहुर्धर्मविदं सत्यं वेत्तेति वेदिनः ॥
सत्यज्ञमथ धर्मज्ञं वायुर्देवो यतस्तयोः ॥ इति नारदीये ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-90" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माऽभवत् ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यश्शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येष्वेताभ्यां रूपाभ्यां ब्रह्माभवदथ यो ह वा अस्माल्लोकात् स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽनूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवं विन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-91" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "नैव व्यभवदिति परिवारबहुत्वेन यद्विशिष्टत्वं तन्नाभवदित्यर्थः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-92" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेनर्षिणामथ यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ यन्मनुष्यान् वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवं हैवं विदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं मीमांसितम् ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-93" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V10_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "योऽयं सर्वेषु जीवेषु नियामकतया स्थितः ।
स विष्णुराप्तकामत्वादात्मेत्येवोच्यते बुधैः ॥
स लोकः सर्वभूतानां सर्वजीवेषु संस्थितः ।
वैश्वदेवादिकान् होमान् यज्ञांश्च कुरुते विभुः ॥
कारुण्यात् सर्वदेवेषु तेन देवाश्रयो हरिः ।
ऋषीणामाश्रयश्चापि स्वाध्यायेष्वषिसंस्मृतेः ॥
स हि जीवेषु सन्दिष्टः पिण्डं पुत्रजनिं तथा ।
यत्करोति पितॄणां च संश्रयस्तत एव सः ॥
तृणोदकादिदानेन पशूनामन्नतो नृणाम् ।
उपकाराच्च सर्वेषां प्राणिनामाश्रयो हरिः ॥
यज्ञादीन् देवतादीनामन्नत्वेन पुरैव यत् ।
ब्रह्माद्यैरर्थितः प्रादात् क्षीराब्धेस्तट उत्तरे ॥
अतश्च सर्वलोकानामाश्रयो विष्णुरेव सः ।
एवं यो वेत्ति विष्णोस्तु सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥
सर्वाण्यपि हि भूतानि तस्येच्छन्त्यविनाशिताम् ।
स्वाश्रयस्य यथा नित्यमनाशं प्रार्थयन्ति हि ॥
राजादेरपि तान्येवमुत्तमाश्रयवेदिनः ।
तदेतद्वासुदेवस्य सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥
विदितं सर्ववेदैश्च मीमांसाभिश्च निश्चितम् ॥
इति भविष्यत्पर्वणि ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-94" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छंश्च नातो भूयो विन्देत् तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्योकृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवं श्रोत्रेण हि तच्छ्रुणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदं सर्वं यदिदं किञ्च तदिदं सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥११॥ ॥ इति अव्याकृतब्राह्मणम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-95" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S05_V11_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एको नारायणः पूर्वमासीज्जायां स ऐच्छत ।
विद्यमानामपि सदा भोगार्थं पुरुषोत्तमः ॥
नित्यत्वेऽप्युभयोर्देवोऽवियुक्तस्तु तया यदा ।
एक इत्युच्यते देव्या रममाणः सुतं विभुः ॥
ऐच्छद्ब्रह्मा ततो जज्ञे ततो देवांश्च सर्वशः ।
जाते पुत्रे वित्तमैच्छद्भूतान्यण्डं ततोऽभवत् ॥
अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः कुर्यां कर्मेति चैच्छत ।
ततस्तु कृतवान् यज्ञं स्वस्मै स पुरुषोत्तमः ॥
आहुरात्मेति तं देवं पूर्णत्वाद्विष्णुमव्ययम् ।
तस्मादद्यापि यः कामी स ह्येतावन्तमिच्छति ॥
दैवं वित्तं सुखाद्यं हि मित्राद्यं मानुषं तु यत् ।
इदानीमपि तस्माद्धि कामयेदेवमेव तु ॥
यः कश्चित् पुरुषो वाऽपि तद्वैकल्यादकृत्स्नवान् ।
एकाकिनोऽप्यवैकल्यं यथैव स्यात् तथा शृणु ॥
स्वात्मनस्त्वपृथग्यत्तज्ज्ञानरूपं मनः परम् ।
मुक्तावपि न हेयं यत्तत्स्वात्मेत्येव चिन्तयेत् ॥
जायां तु तादृशीं वाचं बलं तादृक्स्वमात्मजम् ।
श्रोत्रं चक्षुश्च तादृग्यद्वित्तं दैवं च मानुषम् ॥
एवम्भूतं चिन्तनं यत्तत्कर्मेत्येव चिन्तयेत् ।
एतत्षट्कं च हरये सर्वेशाय समर्पयेत् ॥
एवमात्मा प्रिया पुत्रो वित्तं द्विविधमित्यपि ।
पञ्चभिः क्रियते यज्ञः पुरुषः पशुरेव च ॥
मातापितृभ्यामन्नेन तयोः पूर्वेण कर्मणा ।
जन्यस्य कर्मणा चैव साध्यः पञ्चभिरेव तु ॥
एवं हि प्राणिनोऽन्येऽपि जायन्ते नात्र संशयः ।
एतामुपासनां कुर्याद्यो ब्राह्मं पदमाप्य च ॥
सर्वस्यास्य पतिर्भूयाद्विष्णोरेव प्रसादतः ।
ब्राह्मे पदे त्वयोग्या ये ते देवपदमाप्नुयुः ॥
तस्याप्ययोग्या लोकस्य भवेयुरधिकं प्रियाः ।
क्रमान्मुक्तिं व्रजेयुश्च केशवस्य प्रसादतः ॥ इति माहात्म्ये ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-96" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "सप्तान्नब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-97" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पितैकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् । त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत् तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न कस्मात् तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वै तामक्षितिं वेद । सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्लोकाः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-98" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पिता विष्णुः । यत् यदा । तपसा प्राणिनां कर्मभिः । मेधया स्वेच्छया ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-99" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पितैकमस्य साधारणमितीदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते । स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते मिश्रं ह्येतत् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-100" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "द्वे देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं च । तस्माद् देवेभ्यो जुह्वति च प्रजुह्वत्यथो आहुर्दर्शपूर्णमासाविति तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात् ॥३॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-101" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः । पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति । तस्मात् कुमारं जातं घृतं वै वाऽग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं वाऽनुधापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरतृणाद इति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-102" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्वदपपुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येवं विद्वान् सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति ॥५॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-103" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कस्मात् तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति । पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-104" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो वैतामक्षितिं वेदेति । पुरुषो वा अक्षितिः । स हीदमन्नं धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्धैतन्न कुर्यात् क्षीयेत ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-105" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति मुखं प्रतीकं मुखेनात्त्येतत् स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-106" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीभीरित्येतत् सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमायत्तैषा हि नः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वाऽयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-107" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सप्तान्नानि यदा विष्णुः परमः पुरुषो विभुः ।
ससर्ज तेषां स्वार्थानि चकार त्रीणि केशवः ॥
मनो वाचं तथा प्राणं तस्मात् तैस्तुष्टिमेति सः ।
तस्मात् तद्भक्तिकामः स्यात् सङ्कल्पं तत्कृतिं प्रति ॥
कुर्यात् तद्वेदनेच्छां च श्रद्धां तस्य गुणोन्नतौ ।
अश्रद्धामन्यसाम्ये वाऽप्यन्येषामुन्नतौ ततः ॥
अन्येषां तत्स्वरूपत्वे प्राकृतत्वादिकेऽस्य च ।
धृतिं तन्निन्दिवागादौ प्राप्ते तत्रैव चाधृतिम् ॥
तन्मतस्य विसर्गार्थे ह्रियं तद्भक्तिवर्जने ।
तद्विवेके धियं चैव तदज्ञाने भियं तथा ॥
वाचं नित्यं तद्गुणोक्तौ प्राणं तत्कर्मणि स्फुटम् ।
तदन्यकर्मसन्त्यागे चापानं व्यानमस्य च ॥
विरोधिनां निरासित्वेऽथोदानं योगधारणे ।
मनोवागादीन्द्रियाणां समानं नियमेऽत्र तु ॥
अन्नमुक्तेषु सुस्थैर्ये नरः कुर्यात् सदैव हि ।
अनेकगोचरेच्छा स्यात् काम एकाश्रये स्थितः ॥
प्राणः प्रवृत्तिहेतुः स्यादपानस्तु निवर्तने ।
बलकर्मा तथा व्यान उदानो योगकर्मकृत् ॥
देहेन्द्रियमनोनेता समानो नः स्थितिप्रदः ।
मनोवाक्प्राणसान्निध्यप्राधान्याज्जीव उन्नतिः ॥
मनोवाक्प्राणरूपोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।
मनोवाक्प्राणतस्तस्य जाता अन्येऽभिमानिनः ॥
ब्रह्मा सरस्वती वायुर्मनआद्यभिमानिनः ।
सर्वस्यान्तः स्थितं विष्णुमायत्ता वाग्घि नः सदा ॥
सर्ववाचश्च घोषाश्च विष्णोर्नामेति कीर्तिताः ।
तज्ज्ञानां तत्फलं च स्यादज्ञानां तत्फलं न तु ॥
सर्वेन्द्रियगतं ज्ञानं मनआयत्तमीरितम् ।
पृष्टे स्पृष्टोऽप्यनेनाहं स्पृष्ट इत्येव वेत्त्यतः ॥
मनस्यव्याकुलेऽन्यत्र नैव वेत्ति कथञ्चन ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-108" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-109" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥११॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-110" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवाः मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-111" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-112" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्धि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-113" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-114" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-115" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V16_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "लोकवेदसुरज्ञातपित्रादेश्चाभिमानिनः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-116" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्तद्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-117" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुनं समेतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-118" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समास्सर्वेऽनन्तास्स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तं स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्ते अनन्तं स लोकं जयति ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-119" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V19_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "द्युपृथिव्यग्निसूर्यापां सोमस्याप्यभिमानिनः ॥
स इन्द्रः परमैश्वर्यादशत्रुः समवर्जनात् ।
वायुरेते समा व्याप्तौ ब्रह्मेरौ गुणतोऽधिकौ ॥
अनन्ताश्च गुणा ह्येषामन्यजीवव्यपेक्षया ।
तेभ्योऽप्यनन्ता विष्णोस्तु तेषामेवमुपासकः ॥
नित्यलोकोपभोगी स्यादनित्यस्यान्यथा भवेत् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-120" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदशकला ध्रुवैवास्य षोडशी कला ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-121" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स रात्रिभिरेवाच पूर्यते अप च क्षीयते । सोऽमावास्यां रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते । तस्मादेतां रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-122" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V21_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वायुः प्रजापतिः सोऽसौ चन्द्रसंस्थो विशेषतः ॥
रात्रौ रात्रौ क्षयादस्य पूरणाद् रात्रिनामकाः ।
कलाः पञ्चदश प्रोक्ता ध्रुवैवास्य तु षोडशी ॥
अकलोऽपि स चन्द्रस्य कलाभिः प्रोच्यते तथा ।
सोऽमावास्यां यतो रात्रौ प्राणभृत्सु व्यवस्थितः ॥
कल्यावेशादल्पदोषः कृकलासवधोऽपि सन् ।
तस्यां रात्रौ महान् दोषो देवतावेशतो भवेत् ॥
वायुः संवत्सरः प्रोक्तो वत्सो विष्णोरसौ यतः ।
सम्यगेव रतिं याति ." |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-123" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित् पुरुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदशकला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नाभ्यं यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनाऽगादित्येवाहुः ॥ २२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-124" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V22_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "....................... स एवं विदुषि स्थितः ॥
अध्रुवास्तु कला यद्वत् सौम्यस्तस्य तथा धनम् ।
आगमापायवत्त्वात् तु ध्रुवावद्देह उच्यते ॥
नाभिस्थानं शरीरं तु चक्रस्य प्रधिवद्धनम् ।
सर्वस्वविजयेऽप्यस्मात् प्रधिमात्रं हि गच्छति ॥
एवं महागुणान् देवानेवं यो वेद पूरुषः ।
न चैभ्योऽतिप्रियः कश्चिद्विष्णोरस्ति कदाचन ॥
चतुर्थं भोज्यमेवान्नं सर्वसाधारणं स्मृतम् ।
आत्मनोऽतिसमीपत्वं तस्य योऽन्नस्य मन्यते ॥
अक्षयं पापमस्य स्याद्देवब्रह्मस्वहारिणः ।
तदेवमन्त्रयुक्तत्वाद् बलिहोमात्मना द्वयम् ॥
देवानां प्रददौ विष्णुस्तस्मान्नैवेच्छया यजेत् ।
यदीच्छया यजेत् तेषामपहर्ता भविष्यति ॥
देवस्वं तेन येनैव काम्यार्थं विनियोजितम् ।
परकीयेन वित्तेन तस्मिन् विनिमये यथा ॥
चतुष्पाद्भ्यो द्विपद्भ्यश्च पशुभ्यः पयआत्मकम् ।
प्रायच्छत् सप्तमान्नं स गोक्षीरं मुख्यमत्र च ॥
आत्मने चैव देवानां तद्धोमार्थं प्रकल्पितम् ।
संवत्सरं गोपयसा येन होमो हरेः कृतः ॥
भगवत्तत्त्वविदुषा तस्य मुक्तिर्न संशयः ।
अदृष्टभगवद्रूपस्यैतद्दर्शनकारणम् ॥
भगवद्दृष्टिपूतस्तु विना होमेन मुच्यते ।
सप्तान्नसृष्टितत्त्वज्ञस्त्वेकहोमेन मुच्यते ॥
विशेषज्ञो यतः सोऽयं भगवत्तत्त्ववेदने ।
को नाम भगवान् विष्णुः परमानन्दरूपतः ॥
प्राणिनां कर्मभिश्चैव स्वेच्छया च पुनः पुनः ।
सप्तान्नं सृजते यस्मादन्नानामक्षयस्ततः ॥
तस्मादक्षितिनामासौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।
य एवमक्षितिं वेद भगवन्तं सनातनम् ॥
अप्रयत्नेन भोगाः स्युर्यथेष्टास्तस्य सर्वदा ।
सप्तान्नोपासनं यस्माद्देवानां योग्यमुत्तमम् ॥
तस्माद्देवत्वमाप्नोति योग्यो देवपदस्य यः ।
ऊर्जं देवान्नमुद्दिष्टं ऊर्जितास्तु गुणास्तथा ॥
तदप्याप्नोति न नरा योग्या एतदुपासते ।
ज्ञानमात्रेण देवानां सामीप्यं प्राप्नुवन्ति ते ॥
इति नारायणीये ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-125" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानां श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति ॥ २३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-126" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथातः सम्प्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माऽहं यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किञ्चानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता ये वै के च यज्ञास्तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषां सर्वेषां लोक इत्येकता एतावद्वा इदं सर्वमेतस्मात् सर्वं सन्नयमितोऽभुनजदिति तस्मात् पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुः । तस्मादेनमनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात् प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णया कृतं भवति तस्मादेनं सर्वस्मात् पुत्रो मुञ्चति तस्मात् पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिंल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते देवाः प्राणाः अमृता आविशन्ति ॥ २४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-127" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V24_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ब्रह्मेति वेदः । स्वाध्यायादिकर्तृत्वात् पुत्रस्त्वं ब्रह्मेत्याद्युच्यते । आत्मा भवति व्यापको भवति ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-128" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V25" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥ २५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-129" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V26" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ २६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-130" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति स य एवंवित् सर्वेषां भूतानामात्मा भवति यथैषा देवतैवं स यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति यदु किञ्चेमाः प्रजाः शोचन्त्यमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥ २७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-131" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V27_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पृथिव्यादिस्थिता देवाः सरस्वत्यादिकास्त्रयः ॥
अधिकावेशतो देवेष्वतो देवा इति स्मृताः ।
यदावेशात् सर्वमुक्तं सत्यं देवी तु वाघ्धि सा ॥
यदावेशान्न दुःखी स्यादानन्दी दैवतं मनः ।
यदावेशात् सर्वकार्येष्वम्लानः प्राण एव सः ॥
सर्वसामर्थ्ययुक्तः स्यान्न म्रियेत कदाचन ।
एवं सप्तान्नविन्मुक्तस्त्रिभिराविष्ट एव तु ॥
सर्वेषु व्याप्तिमन्वेति न दुःखी प्राणिषु स्थितेः ।
सप्तान्नोपासनायोग्या देवा एकान्ततो हि यत् ॥
देवांश्च पापं नाप्नोति तस्मात् पापं न तस्य तु ।
देवा मनुष्यतामंशैराप्ता ये पुत्रतः फलम् ॥
स्यात् तेषामेव चामुक्तेर्मुक्तानां न तु किञ्चन ।
मुक्तानां देववागादेरावेशः सम्प्रकीर्तितः ॥
प्राणज्ञानं यथाऽवन्ति रहस्यमिति सर्वदा ।
एवं मुक्तस्वरूपं चाप्यवन्त्येव रहस्यतः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-132" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V28" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथातो व्रतमीमांसा । प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे । तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त ।
वदिष्याम्येवाहमिति वाग् ।
दध्रे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः।
श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम् ।
एवमन्यानि कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत् तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्धत्तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नोद्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दध्रिरेऽयं वै नः श्रेष्ठो यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवं स्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन् कुले भवति य एवं वेद । य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-133" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V29" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे तप्स्याम्यहमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति ।
चन्द्रमा एवमन्या देवता यथादैवतं स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुर्म्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुस्सैषा नास्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-134" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V30" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैष श्लोको भवति ॥
यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति । प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति ।
तं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्व इति । यद्वा एतेऽमुं ह्यध्रियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति ।
तस्मादेकमेव व्रतं चरेत् प्राण्याच्चैवापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नुवदिति ।
यद्युच्चरेत् समापिपयिषेत् तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति ॥ ३० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-135" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S06_V30_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "उत्तमः सर्वदेवेषु प्राण एव हरेरनु ।
चतुर्मुखस्य प्राणस्य न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥
तस्माद् विष्णोर्व्रतस्यानु नित्यं प्राणव्रतं चरेत् ।
हंसोपास्तिः श्वासरूपे तयोर्व्रतमुदीरितम् ॥
हंसरूपी हि तौ देवौ श्वसोच्छ्वासप्रवर्तकौ ।
तस्मात् प्राण्यादपान्याच्च सद्रूपं संस्मरन् सदा ॥
नान्यस्योपासनं कुर्यात् तद्भृत्यत्वं विना क्वचित् ।
इन्द्रियाणि ससर्जादौ वासुदेवः प्रजापतिः ॥
अध्यात्ममिन्द्रियाण्याहुरधिदैवं तु देवताः ।
अध्यात्ममग्निर्वाङ्ग्नामा चक्षुरादित्य उच्यते ॥
श्रोत्रं तु चन्द्रमा नाम मनः स्थूलं तु वासवः ।
येन यज्ञादिकं कुर्याच्छेषरुद्रविपास्तथा ॥
मनः सूक्ष्मं ज्ञानयोग्यं शेषो व्याख्यानगोचरम् ।
रुद्रस्तु मननाख्यं च गरुडो ध्यानगोचरम् ॥
वायुः प्राण इति प्रोक्तो येन सर्वं नियम्यते ।
त एते भगवत्सृष्टा व्यूदिरेऽध्यात्मसंस्थिताः ॥
अधिदैवे ज्वलत्कर्मा वह्निः सूर्यस्तु तापकः ।
सोमः कान्तौ वृष्टिकर्मा वासवः शेष एव तु ॥
पञ्चरात्रप्रवृत्तीशो रुद्रस्तत्स्थक्रियापरः ।
सर्वप्रवर्तको वायुर्ज्ञानमोक्षप्रदस्तथा ॥
वेदप्रवृत्तिकृद्धीन्द्रस्तेऽधिदैवे च पस्पृधुः ।
अहं श्रेयानहं श्रेयानिति तानब्रवीद्धरिः ॥
स्वकर्म यस्त्वविश्रान्तं कुर्याच्छ्रेयान् स वः स्मृतः ।
इति श्रुत्वा ततश्चक्रुः कर्म स्वं स्वमनारतम् ॥॥
तानेताञ्छ्रमरूपेण प्राप ब्रह्मा प्रजापतिः ।
श्रान्ताः स्वं भगवत्कर्म न शेकुः सर्वदेवताः ॥
वायुं तु समशक्तित्वान्नाप ब्रह्मा प्रजापतिः ।
तेनासौ भगवत्कर्म सर्वं च कृतवान् सदा ॥
श्रमात् पापात्मको मृत्युर्भगवत्कर्मवर्जनात् ।
अन्यान् देवानवापाशु नैव वायुं कदाचन ॥॥
ते वायुं ज्ञानमैच्छन्त श्रेष्ठोऽयमिति निश्चिताः ।
तं ज्ञात्वा तेन चाविष्टास्तद्भृत्यत्वमुपागताः ॥
तस्मात् प्राणाश्च मरुत इत्येषां नाम संस्थितम् ।
वायोर्देवा हि जायन्ते लयमेष्यन्ति तत्र च ॥
तस्मान्नित्यं तद्व्रताश्च तद्व्रतोऽतो भवेत् सदा ।
अन्यदेवव्रतारम्भं यदि कुर्यात् समापयेत् ॥
तेनासौ वायुना साकं भगवन्तमुपेष्यति ॥ इति नारायणश्रुतौ ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-136" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S07" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "त्रयब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-137" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S07_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-138" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S07_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामेतद्धि सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-139" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S07_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C01_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत्त्रयं सदेकमयमात्माऽऽत्मैकः सन्नेतत्त्रयं तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-140" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S07_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सहैव माति जानातीति समम् । आत्मा प्राणः । नामरूपयोरपि प्राणाधीनत्वादेकमित्युच्यते ।
प्राणो वायुरिति प्रोक्तस्तत्पत्नी नाम भारती ।
रूपं तु तत्सुतो रुद्रो वशे प्राणस्य तद्द्वयम् ॥
अमृतो वायुरुद्दिष्टो नित्यज्ञानात्मकत्वतः ।
सत्यं यथार्थवक्तृत्वाद्भारती रुद्र एव च ॥ इति ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-141" |
|---|
| oldKey | "BR_C01_S07_V03_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C01_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "रुद्रं वेदेषु च प्राणः प्रविष्टश्छादितः सदा ।
सत्य इत्युच्यते नित्यं स्वरूपेणामृतः स्मृतः ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-142" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "अजातशत्रुब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-143" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_I01" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वह्रदिस्थभगवद्रूपोपासनाया एव मोक्षजनकत्वसमर्थनम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-144" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति । स होवाच । अजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-145" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-146" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अतीत्य जगद् धर्मवर्जितत्वेन स्थितत्वादतिष्ठाः । उत्तमत्वात् मूर्धा ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-147" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा बृहत्पाण्डुरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्तेऽहरहः सुतः प्रसूतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-148" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-149" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ आकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात् प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-150" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-151" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वयमेवापराजितबहुरूपत्वादपराजिता सेना भगवान् । जिष्णुरुत्तमः । अन्येषां जेता अन्यतस्त्यजायी ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-152" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ अग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-153" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विषासहिः असह्यः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-154" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपं हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माज्जायते ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-155" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः सन्निगच्छति सर्वांस्तानतिरोचते ॥९॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-156" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा असुरीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात् प्राणो जहाति ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-157" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान् ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-158" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-159" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते आत्मन्वी ह भवत्यात्मन्विनी हास्य प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-160" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V13_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आत्मनि हिरण्यगर्भे । आत्मन्वी चित्तवान् । चित्ताभिमानित्वात् तस्य ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-161" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू३ इत्येतावद्धीति, नैतावता विदितं भवतीति । स होवाच गार्ग्य उप त्वा यानीति ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-162" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V14_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वहृदि स्थितं स्वनियामकं भगद्रूपमुपास्यैव मोक्षो भवति । देवतासु भगवन्तमुपास्य तत्तद्देवतासमीपं प्राप्य पुनः स्वहृदिस्थमुपास्यैव मोक्षो भवतीत्यतो नैतावता विदितं भवतीत्युक्तम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-163" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं वै तद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद् ब्रह्म मे वक्ष्यतीति व्येव त्वा ज्ञापयिष्यामीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुस्तमेतैर्नामभिरामन्त्रयाञ्चक्रे बृहन्पाण्डुरवासः सोम राजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिना पेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-164" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V15_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वहृदिस्थभगवद्रूपस्य स्वस्मिन् विशेषसम्बन्धज्ञापनार्थं बृहत्पाण्डुरवास इत्याद्यामन्त्रणम् । तेभ्यो नामभ्योऽप्यस्य शरीरे विशेषसम्बन्ध इत्यतः पाणिपेषणेन जीवमुत्थापयामास भगवान् । येषां बहिरुपासनेन मोक्षस्तेषामपि ह्रद्युपासनं किञ्चित् कर्तव्यमेव ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-165" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाऽभूत्स, कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-166" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच । अजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद् , य एष विज्ञानमयः पुरुषस् तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन् शेते तानि यदा गृह्णाति अथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-167" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V17_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वहृदिस्थेन भगवद्रूपेण विशेषसम्बन्धदर्शनार्थमेव यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूदित्यादि प्रश्नप्रतिवचनं समस्तम् । यत्र यस्मिन् परमेश्वरे विज्ञानमये एष जीवः सुप्तोऽभूत् । यत्रेत्यधिकरणभूत एव य एष विज्ञानमय इति परामृश्यते । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद इत्यादिश्रुतेः । तानि यदा परमात्मा गृह्णाति तदैतत्पुरुषो जीवः स्वपिति नाम ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-168" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यत्रैत् स्वप्नया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जनपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-169" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स यत्र परमात्मा स्वप्नया नाड्या चरति तदा जीवः उच्चावचं निर्गच्छतीव । सर्वदा महाराजवत् प्राणान् गृहीत्वा परमात्मा परिवर्तते । जीवस्तु कदाचिदेव स्वप्ने राजवदात्मानं पश्यति कदाचिद्ब्राह्मणवच्छ्वमार्जरादिवद् वा ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-170" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ यदा सुषुप्तो भवति तदा न कस्यचन वेद, हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिसहस्राणि हृदयात् पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वाऽतिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥१९॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-171" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V19_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आनन्दस्य परमात्मनोऽतिघ्नीं समीपम् । कुमारो रुद्रः । महाराजो वायुः । महाब्राह्मणो ब्रह्मा । न हि जीवो विज्ञानपूर्वकं प्राणानां विज्ञानमादत्ते । न च सर्वप्राणलोकदेवभूतानां स्रष्टा ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-172" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाऽग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति । तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-173" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S01_V20_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आदित्यचन्द्रविद्युत्सु भूतेष्वादर्श एव च ।
गच्छत्पाश्चात्यशब्देन चक्षुश्छायागतं तथा ॥
हिरण्यगर्भसंस्थं च सदोपास्य हरिं परम् ।
तद्देवसार्ष्णितामेत्य हृद्युपास्य हरिं पुनः ॥
मुक्तिमेत्यथ यो बाह्यान् मुक्तिमेष्यति सोऽपि तु ।
हृदि किञ्चिदुपास्यैव विष्णुं मुक्तिमनुव्रजेत् ॥
यानि सूर्यादिनामानि विष्णोस्तानि न संशयः ।
तदुक्तान्येव सूर्यादिराकृष्यैवोपचारतः ॥
विशेषेण तु सम्बन्धो यतः स्वहृदि संस्थिते ।
जीवस्यातो न सोमादिनाम्नाऽऽहूतो हरिः परः ॥
जीवं च वारयेत् तत्र यदा विष्णुः सनातनः ।
स्वप्नं पश्यति जीवोऽयं यदा विज्ञानरूपिणम् ॥
सुषुम्नासंस्थितं विष्णुमेति तत्सुप्तिमेष्यति ।
सम्यग्ज्ञानमयाद्विष्णोरुत्थानं चाप्ययं व्रजेत् ॥
प्राणानां चैव लोकानां देवानां प्राणिनामपि ।
सत्यसत्यो हरिः स्रष्टा पाता विलयकृत् तथा ॥
नियन्ता मोक्षदश्चैव विष्णुरेव सनातनः ॥
इति नारायणश्रुतौ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-174" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "शिशुब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-175" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्ध्ययं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमे वाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणा अन्नं दाम ॥१॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-176" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आधानमवस्थानं सूक्ष्मशरीरम् । प्रत्याधानं विधानं स्थूलशरीरम् । प्राणो नारायणः स्थूणा ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-177" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनिका तयाऽदित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-178" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "दक्षिणाक्षिस्थितं वायुं सप्तदेवा उपासते ।
अक्षीणज्ञानमनसः सदाशिवापुरःसराः ॥
उपास्यमानं तैर्देवैर्मोक्षार्थे वायुमीश्वरम् ।
स्थूणया विष्णुना सार्धं यो विद्यात् सोऽन्नमश्नुते ॥
अक्षीणमेव मुक्तः सन् सर्वदुःखविवर्जितः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-179" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेष श्लोको भवति अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहतं विश्वरूपं तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेत्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपमिति । प्राणा वै यशो विश्वरूपं प्राणानेव तदाह तस्याऽऽसत ऋषयः सप्त तीरे इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्घ्यष्टमी संवित्ता ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-180" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विश्वरूपं यशश्चेति नाम्ना विष्णू रमा तथा ॥
वायुश्च संस्थिता नित्यं सर्वेषां दक्षिणाक्षिगाः ।
पूर्णत्वाद्विश्वतो विष्णो रमायाः स्त्रीषु पूर्णतः ॥
वायोर्जीवेषु पूर्णत्वाद्यशोज्ञानसुखात्मकाः ।
प्राणाश्चैते प्रणेतृत्वात् ऋषयो रुद्रपूर्वकाः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-181" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इमावेव गौतमभरद्वाजावयमेव गौतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निरिमावेव वसिष्ठ कश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचो ह्यन्नमद्यतेऽत्रिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-182" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S02_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "गौतमो नाम रुद्रस्तु सर्वज्ञत्वात् प्रकीर्तितः ।
भरद्वाजस्तु पर्जन्यो वाजमन्नं भरेद्यतः ॥
वृष्ट्यैव विश्वामित्रख्य आदित्यो यत्प्रकाशनात् ।
विश्वं विज्ञापयन्नित्यमग्निस्तु जमदग्निकः ॥
जातं मितं चात्ति यस्माद्वसिष्ठाख्यस्तु वासवः ।
वसतामुत्तमो यस्मात् पृथ्वी कश्यपनामिका ॥
मेघवृष्टं पिबेद्यत्कं शयानैव हि सा सदा ।
द्यौरत्रिरिति सम्प्रोक्ता तत्स्थैर्हि हुतमद्यते ॥
श्रोत्रदिङ्ग्नासिकाबाहुदक्षिणाक्षिषु संस्थिताः ।
द्वितीयेन तु रूपेण देवा एते शिवादयः ॥
एवमेषां तु नामानि वेत्ति यः सर्वभुग्भवेत् ।
उपास्ते वायुमेवैकं सस्थूणं ब्रह्मवेदिना ।
ब्रह्मनामा सदा वायुरेनां वेत्ति विशेषतः ॥
इति तां वेद यो विद्वान् सर्वात्ता स भविष्यति ॥ इति नारायणीये ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-183" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "मूर्तामूर्तब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-184" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे । मूर्तं चैवामूर्तं च, मर्त्यं चामृतं, स्थितं च यच्च, सच्च त्यञ्च ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-185" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विशरणावसादनयुक्तं सत् । ततं सर्वज्ञं च त्यम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-186" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्यमेतत् स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-187" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रलयेऽपि भगवदन्तरेव रता अक्षिताऽवस्थितेति श्रीरन्तरिक्षम् । य एष तपतीत्यादित्यस्थो हिरण्यगर्भ उच्यते ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-188" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद् यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-189" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मण्डले पुरुष इति भगवान् विष्णुः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-190" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथाध्यात्मम् इदमेव मूर्तं यदन्यत् प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-191" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृतमेतद्यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य ह्येष रसः ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-192" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एवमेव चक्षुर्दक्षिणेक्षन्पुरुषश्च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-193" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तं सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत् परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-194" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S03_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्यैवामूर्तरसस्य भगवतो नेति नेतीत्यादेशः । अतस्तस्मादमूर्तसारत्वादित्यर्थः । अथेत्यानन्तर्यार्थे । इति नेति नेति मूर्तामूर्तविलक्षण इत्यर्थः । उभयसादृश्यनिषेधार्थं द्विवारम् । इति नेति निषिध्यमानमप्येतस्मादन्यत्परं नास्ति एष एव परः । मूर्तामूर्तं त्वपरमेवैतदपेक्षया । मूर्तामूर्तमेवाध्यात्मं प्राणा इत्युच्यन्ते । ब्रह्मणो वायोश्चामूर्तत्वात् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-195" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "मैत्रेयीब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-196" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः । उद्यास्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-197" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच । याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद् , अमृतत्वस्य नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-198" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच । मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां, यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-199" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच याज्ञवल्क्यः । प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्व व्याख्यास्यामि । ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-200" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।
न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति ।
न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति ।
न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति ।
न वा ओ अरेक्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति ।
न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति, आत्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति ।
न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति ।
न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति ।
न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-201" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आत्मा नारायणः । तस्यैव हि कामेन पत्यादिः प्रियो भवति । न हि पत्यादीनां जायादीनामहं प्रियः स्यामिति कामनामात्रेण प्रियत्वं भवति । भगवदिच्छ्यैव हि तद्भवति । अन्यथा जायार्थे पत्यर्थे इत्येव स्यात् । प्राधान्यादिदं सर्वं विदितम् । सर्वकारणत्वाच्च सर्वप्राधान्यं भगवतः । प्राधान्याप्राधान्ययोरपि स एव हि हेतुः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-202" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर् योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवाः तं परादुः ।
योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद । भूतानि तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-203" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद भगवदधीनत्वेन न वेद, । तदनाश्रितत्वेन स्थानान्तरे च वेद । परादात् परतो लोकालोकस्यान्धे तमसि । इदं ब्रह्मादिकम् । यदयमात्मा । यत्रायमात्मा । अन्यत्र परिज्ञाने दोषोक्तेस्तत्र परिज्ञानं ह्युक्तं भवति । अन्यथा अन्यदात्मनो ब्रह्म वेदेति स्यात् । यदित्यव्ययत्वाद् यत्रेत्यपि भवति । यथा यस्मादित्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति च सूत्रम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-204" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-205" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-206" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-207" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "दुन्दुभ्याघातादिदृष्टान्तोऽपि तदधीनत्वं तत्कारणत्वं च ज्ञापयति । न हि दुन्दुभ्यादिरेव तच्छब्दः । न च तदुपादानम् । स्थानान्तरे तदुपलम्भात् । न ह्युपादानादुपादेयं स्थानान्तरे भवति । शब्दो हि स्थानान्तरे गत्वा प्रतिश्रुतित्वमप्युपैति । भगवदिच्छाया दृष्टान्तो दुन्दुभ्यादिः । न हि दुन्दुभिं पश्यन् पुरुषो दुन्दुभ्याघाते मुरजशब्दोऽयमिति गृह्णाति । एवं भगवन्तं जानन्नन्याधीनं जगदिति गृह्णाति । किन्तु भगवदिच्छाधीनमित्येव ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-208" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-209" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां सङ्कल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-210" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V11_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तदेव दर्शयति स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेः स यथा सर्वासामपामित्यादिना ॥ न ह्यग्निरेव धूमः । न चाप एव समुद्रः । न ह्यपामाप एवाश्रयः । किन्तु वरुणोऽपां खातो वा । स एव च समुद्र इत्युच्यते ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-211" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायैव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा ओ इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-212" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V12_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एवमेव सैन्धवखिल्यस्य विलीनस्य समस्ताम्भसश्च वरुणोऽपां खातो वा समुद्राख्य आश्रयः । वरुणवदपां खातवद्वाऽनन्तोऽपारो भगवान् जीव एव विज्ञानघनाख्यो भूतसम्बन्धाज्जातः संस्तल्लयमनु भगवन्तमाप्नोति । समुद्रे प्रास्तसैन्धवखिल्यवत् । समुद्रजलस्थानीया मुक्ताः बहव एकस्वभावाः । बहवो हि जलपरमाणवः । सामुद्रजलमेकाश्रयम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-213" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीति
स होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-214" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्र हि द्वैतमिव भवति ।
तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति ।
तदितर इतरं शृणोति ।
तदितर इतरमभिवदति ।
तदितर इतरं मनुते ।
तदितर इतरं विजानाति ।
यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं जिघ्रेत्।
केन कं पश्येत् केन कं शृणुयात् ।
तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं मन्वीत ।
तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति ।
तं केन विजानीयाद् विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-215" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S04_V14_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मुक्तानां सञ्ज्ञाप्यन्यैर्न ज्ञायते शास्त्रं विना । सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्त्वा अलं वा ओ इदं विज्ञानायेत्युक्तेर्न विजानातीत्युक्ते प्रतिज्ञाविरोधः । न च सर्वाज्ञानं पुरुषार्थः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-216" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "मधुब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-217" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-218" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं रेतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-219" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-220" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् वायौ तेजोमयोमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-221" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् आदित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-222" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-223" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-224" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इयं विद्युत् सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-225" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयं स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिंस्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-226" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-227" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-228" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इदं सत्यं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-229" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इदं मानुषं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-230" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयं आत्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं आत्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-231" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिस्सर्वेषां भूतानां राजा ।
तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिताः एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-232" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।
तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् तद्वन्नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् ।
दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाचेति ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-233" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।
तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् ।
दध्यङ् ह वा मधु प्रवोचदृतायं त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-234" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।
दपुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः । पुरस्स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशत् ॥
इति स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरि शयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-235" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।
तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश ॥
इत्ययं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-236" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S05_V19_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "भगवतो रूपं रूपं प्रति जीवाख्यः प्रतिबिम्बो बभूव । बभूवेति सदेव सोम्येदमग्र आसीदितिवदनादित्वार्थे ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-237" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S06" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "वंशब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-238" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S06_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनात् ।
गौपवनः पौतिमाष्यात् ।
पौतिमाष्यो गौपवनात्।
गौपवनः कौशिकात् ।
कौशिकः कौण्डिन्यात् ।
कौण्डिन्यः शाण्डिल्यात् ।
शाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च ।
गौतमः आग्निवेश्यात्॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-239" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S06_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्च अनभिम्लाताच्च ।
अनभिम्लात आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमात् ।
गौतमः सैतवप्राचीनयोग्याभ्यां ।
सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात् ।
पाराशर्यो भारद्वाजात् ।
भारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च ।
गौतमो भारद्वाजात्।
भारद्वाजः पाराशर्यात्, ।
पाराशर्यो बैजवापायनाद् बैजवापायनः ।
कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-240" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S06_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C02_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "धृतकौशिकात् धृतकौशिकः।
पाराशर्यायणात् पाराशर्यायणः ।
पाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्ण्यात् जातूकर्ण्यः ।
आसुरायणाच्च यास्काच्च आसुरायणस्त्रैवर्णेस्त्रैवर्णिः ।
औपबन्धनेरौपबन्धनिः ।
आसुरेः आसुरिर्भारद्वाजात् भारद्वाज
आत्रेयात् आत्रेयो माण्टेः।
माण्टिर्गौतमात् ।
गौतमो वात्स्यात् ।
वात्स्यः शाण्डिल्यात् ।
शाण्डिल्यः कैशोर्यात् काप्यात्।
कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्।
कुमारहारितो गालवात् ।
गालवो विदर्भीकौण्डिन्यात् ।
विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपादो बाभ्रवात्, ।
वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः ।
सौभरो अयास्यात् आङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्राद् ।
आभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्रात् ।
विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्याम् ।
अश्विनौ दधीच आथर्वणात् ।
दध्यङ् आथर्वणोथर्वणो दैवाद्।
अथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् ।
मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात्।
प्रध्वंसन एकऋषेः ।
एकऋषिर्विप्रचित्तेः ।
विप्रचित्तिः व्यष्टेः ।
व्यष्टिः सनारोः ।
सनारुः सनातनात् ।
सनातनः सनकात् ।
सनकः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो।
ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-241" |
|---|
| oldKey | "BR_C02_S06_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C02_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पाराशर्यो जातुकर्ण्यः पराशरसुतावुभौ ।
विप्रायामेव भार्यायां तृतीयः कृष्ण एव च ॥ इति ब्रह्माण्डे ।
परस्य ब्रह्मणो विष्णोर्हयशीर्षादधीतवान् ।
ब्रह्मविद्यामिमां ब्रह्मा ततः सनक एव च ॥ इति गारुडे ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-242" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "आश्वलब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-243" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कःस्विदेषां ब्राह्मणानां अनूचानतमः इति स ह गवां सहस्रमवरुरोध दश दश पादाः एकैकस्याः शृंगयोराबद्धा बभूवुः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-244" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सौम्योदज सामश्रवा३ इति ता होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होता आश्वलो बभूव । सहैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं स्म इति तं ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताऽश्वलः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-245" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्युनाऽऽप्तं सर्वं मृत्युनाऽभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाऽग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक् सोऽयमग्निः स होता स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-246" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तं सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणार्त्विजा चक्षुषाऽऽदित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-247" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं पूर्वपक्षमपरपक्षाभ्यामाप्तं सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षायोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-248" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदमन्तरिक्षमनारम्भणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चंद्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ चंद्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः साऽतिमुक्तिरित्यतिमोक्षाः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-249" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V06_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "होतर्यग्नौ वाचि चैव यो विष्णुं मुक्तिदं स्मरेत् ।
नित्यं स मुच्यतेऽध्वर्युसूर्यचक्षुष्षु यः स्मरेत् ॥
अधिकः प्रकाश एवास्य मुक्तावन्येभ्यः इष्यते ।
मुक्तेभ्योऽपि तथोद्गातृवायुप्राणेषु यः स्मरेत् ॥
पूर्णचंद्रं सदा पश्येदधिकाह्लादसंयुतः ।
मनोब्रह्मनिशेशेषु यो विष्णुं सर्वदा स्मरेत् ॥
अप्रयत्नेन लोकं स विष्णोर्याति न संशयः ।
होत्रग्न्यादीनि नामानि विष्णोः सर्वाणि मुख्यतः ॥
तत्सम्बन्धात् तदन्येषां स वै होत्रादिकर्मकृत् ।
तस्माद्धोत्राग्निवागादेरैक्यं श्रुतिषु चोच्यते ॥
होत्रादिषु चतुर्ष्वेष वासुदेवादिरूपधृक् ।
व्यवस्थितो हि तज्ज्ञानादचिरान्मुक्तिमेष्यति ॥
मुक्तिनामा स भगवान् मोक्षदत्वात् प्रकीर्तितः ।
मनुष्येभ्योऽधिकसुखं देवेभ्यो यत्प्रयच्छति ॥
मुक्तावप्यतिमोक्षः स तेन देवः प्रकीर्तितः ।
एता ह्युपासना नित्यं नैव योग्या नृणां श्रुताः ॥
अतिमुक्तिप्रदा यस्माद्देवाद्यास्तासु योगिनः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-250" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ सम्पदः याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होता अस्मिन् यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्रः इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं ताभिर्यजतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-251" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V07_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "याज्याशस्यापुरोवाक्यासंस्थितं यो हरिं स्मरेत् ॥
सर्वप्राणभृतामीशः स भवेन्नात्र संशयः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-252" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञे आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्जवलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अतिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-253" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V08_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "उज्ज्वलच्छब्दवद्द्राविष्वेकमेव हरिं स्मरेत् ॥
सर्वलोकाधिपत्यं स लभते पुरुषोत्तमात् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-254" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-255" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V09_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मनसो देवता ब्रह्मा सर्वदेवेषु संस्थितः ॥
देवब्रह्ममनस्स्वेकं यो विष्णुं सर्वदा स्मरेत् ।
अनन्तनामकं तेन तल्लोकं नित्यमश्नुते ॥
निश्चयेन विमोक्ष्यत्वाद्विश्वे देवा अनन्तकाः ।
अनन्तनामकं विष्णुमुपास्यापि ह्यनन्तकाः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-256" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्योद्गाताऽस्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्या अपानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकं शस्यया ततो ह होता आश्वल उपरराम ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-257" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S01_V10_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पुरोवाक्यादिषु प्राणादिषूपासां करोति यः ।
एकमेव हरिं लोकव्याप्तिमेव लभेदसौ ॥
अत्रापि वासुदेवाद्याश्चत्वारो देवताः स्मृताः ।
देवानां पदहेतुत्वात् सम्पन्नाम्न्य उपासनाः ॥
मुक्तौ भोगविशेषस्य हेतुत्वाच्च प्रकीर्तिताः ।
एताश्च देवतायोग्या न मनुष्येषु कुत्रचित् ॥
मनुष्याणां ज्ञानमात्राद् गुणाधिक्यं भविष्यति ॥इति परमश्रुतौ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-258" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "आर्तभागब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-259" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । कति ग्रहाः कत्यतिग्रहाः इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-260" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्रहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धान् जिघ्रति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-261" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "वाग्वै ग्रहः स नाम्नाऽतिग्रहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥३॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-262" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्रहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-263" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्रहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-264" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्रहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दान् शृणोति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-265" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्रहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-266" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "हस्तो वै ग्रहः स कर्मणाऽतिग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-267" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्रहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-268" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-269" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात् प्राणाः क्रामंत्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-270" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-271" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चंद्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागाऽऽवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेत् तत्सजन इति तौ होत्क्रम्य मंत्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-272" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S02_V13_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आकाशं परमात्मानमेव ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-273" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S03" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "भुज्युब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-274" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S03_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्यक्येति होवाच । मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ते पतंजलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् सुधन्वाऽऽङ्गिरस इति । तं यदा लोकानामन्तान् अपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति क्व पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-275" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S03_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पारीक्षिताः प्रद्युम्नाः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-276" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S03_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन् वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यान्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत् समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्तानिंद्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत् तान् वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद् यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशशंस तस्मात् वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-277" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S03_V02_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अश्वमेधयाजिन इंद्राः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-278" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S04" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "उषस्तब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-279" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा सर्वान्तर य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यः समानेन समानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-280" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S04_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यत्साक्षादपरोक्षात् । साक्षादेवापरोक्षमत्ति अनुभवति स्वरूपमन्यच्च सर्वं पश्यतीति साक्षादपरोक्षात् । आपरोक्ष्येण पश्यतामप्यन्येषां भगवत्प्रसादादेव दर्शनं भवति । न भगवतोऽन्यापेक्षयेति साक्षादिति विशेषणम् । अनन्यापेक्षस्याप्यपूर्णत्वं भवतीत्यतो ब्रह्मेति । अन्येषां नियन्तृत्वं चास्तीत्यत आत्मा । अन्यनियन्तृत्वेप्यन्यापेक्षा नास्तीत्यतः सर्वान्तरः । सर्वं सामार्थ्यं स्वान्तरेवास्तीति । जीवेश्वराभेदनिवृत्त्यर्थं त आत्मेति । साक्षादपरोक्षत्वादिगुणैरेव भेदे सिद्धेऽपि परमार्थतोऽपि जीवेश्वराभेदनिवृत्त्यर्थं त आत्मा इति । तत्र प्रधानतात्पर्यज्ञापनार्थं पुनः पुनरभ्यासः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-281" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S04_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद्व्यपदिष्टं भवति यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं मन्वीया न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीया एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तम् । ततो होषस्तश्चाक्रायण उपरराम ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-282" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S04_V02_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "देवतान्तरस्यापीदं लक्षणं समानमिति पृच्छति यथा विब्रूयादित्यादिना । चतुष्पात्वादिलक्षणं गोरश्वस्यापि यथा सममेवमेव साक्षादपरोक्षत्वादिलक्षणं तत्तद्देवतावादिभिस्तस्यास्तस्या अंगीक्रियत एव । अतो विशेषनाम वक्ति । अ इति । अतोऽन्यद्विष्णोरन्यदार्तम् । अ इति विष्णोर्हि नाम । न ते विष्णो परो मात्रया इत्यादि श्रुतिप्रसिद्धं विष्णोर्लक्षणम् न दृष्टेर्द्रष्टारमित्यादिना वक्ति ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-283" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S05" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "कहोळब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-284" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S05_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाच । । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तमेव मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति ।
एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति ।
या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा । या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । तस्मात् ब्राह्मणः पांडित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद् । बाल्यं च पांडित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात् तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तम् । ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-285" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S05_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ये दव साक्षादिति पुनः प्रश्नो मुक्तानामपि भगवतो भेदोऽस्तीति ज्ञापयितुम् । यदेव ब्रह्म तदन्ये ब्रह्मादयो मुक्ता अपि यन्नैव भवन्ति कदाचन । तमेव मे व्याचक्ष्व मुक्तजीववैलक्षण्येन सहेति द्वितीय एव शब्दार्थः । स तु भगवान् स्वत एवातीताशनायादिरतीतानागतवर्तमानकालेषु ब्रह्मादयस्तु तं विदित्वा तत्प्रसादादेव पश्चादत्येष्यन्ति एतं वै तमित्येतादृशैर्गुणैः साक्षादपरोक्षत्वजीवभेदादिभिर्युक्तमित्यर्थः" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-286" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S06" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "गार्गिब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-287" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S06_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी प्रपच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति, कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेति गन्धर्वलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नुखलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेति अन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु चंद्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेति इंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु इंद्रलोकाः ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि माऽतिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपतदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि माऽतिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-288" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S06_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मुक्तानां तारतम्यं हि गार्गिब्राह्मणेनोच्यते । लोका इति मुक्तानामानन्दानुभवाः स्वरूपभूताः । अप्सु वायाविति स्वरूपस्यैव प्रस्तुतत्वात् । अनतिप्रश्नां वै देवतामतिपृच्छसीति देवतास्वरूपप्रश्नस्यैवावगम्यमानत्वाच्च । न चोपरितनलोकेषु अधस्तनलोकाः आश्रिताः । न च वायुर्गन्धर्वलोकाश्रितः । वाय्वाश्रयत्वश्रुतेः सर्वलोकानाम् । वायुना हि सर्वे लोका नेनीयन्ते इत्यादिना । सप्तस्कन्धगतो लोकान् यो बिभर्ति महाबलः इति हरिवंशेषु । न चानतिप्रश्नत्वं लोकमात्रस्यास्ति । अधस्तनेषु चोपरितना लोकास्तिष्ठन्ति । न च मरुतामेकोऽपि गन्धर्वलोकादवरो विद्यते ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-289" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "अन्तर्यामिब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-290" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनमुद्दालकः आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । । मद्रेष्ववसाम पतंजलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता । तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तद्भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च यो वै तत्काप्य सूत्रं विद्यात् तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत् तदहं वेद तच्चेत् त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वांस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयात् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-291" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पुनस्तस्यैव सर्वनियन्तृत्वमुच्यते ।
योऽन्तरो यमयतीति द्वितीययशब्दो विष्णुशब्दपर्यायः ।
अकयप्रविसम्भूमसखहा विष्णुवाचकाः ।
एकाक्षरा अ इत्येष निर्दोषत्वाज्जनार्दनः ॥
आनन्दत्वात् क इत्युक्तः पूर्णत्वाद्य इतीर्यते । इत्यादि शब्दनिर्णये इति स्वप्रतिज्ञातप्रकारेण ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-292" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यस्रंसिषतास्यांगानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दृब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतत् याज्ञवल्क्यान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-293" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V02_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्यूतं जगदिदं यस्मिन् सूत्रं वायुरसौ स्मृतः ।
तं चापि यमयेद्यस्मादन्तर्यामी हरिः स्मृतः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-294" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-295" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः अप्सु तिष्ठन् अद्भ्यो अन्तरो यं आपो न विदुः यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-296" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः अग्नौ तिष्ठन्, अग्नेः अन्तरो यं अग्निः न वेद, यस्य अग्निः शरीरं यः अग्निमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥५॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-297" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः अन्तरिक्षे तिष्ठन्, अन्तरिक्षात् अन्तरो यं अन्तरिक्षं न वेद, यस्य अन्तरिक्षं शरीरं यः अन्तरिक्षमन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-298" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः वायौ तिष्ठन् वायोरन्तरो यं वायुः न वेद, यस्य वायुः शरीरं यः वायुमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-299" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः दिवि तिष्ठन् दिवः अन्तरो यं द्यौः न वेद, यस्य द्यौः शरीरं यः दिवमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-300" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः आदित्ये तिष्ठन् आदित्यात् अन्तरो यं आदित्यो न वेद, यस्य आदित्यः शरीरं यः आदित्यमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-301" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्यो अन्तरो यं दिशो न विदुः, यस्य दिशः शरीरं यः दिशोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-302" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः चंद्रतारके तिष्ठंश्चंद्रतारकाद् अन्तरो यं चंद्रतारकं न वेद, यस्य चंद्रतारकं शरीरं यश्चंद्रतारकमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-303" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः आकाशे तिष्ठन् आकाशात् अन्तरो यं आकाशो न वेद, यस्य आकाशः शरीरं यः आकाशमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-304" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः तमसि तिष्ठंस्तमसोऽन्तरो यं तमो न वेद, यस्य तमः शरीरं यः तमसोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-305" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद, यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-306" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्यो अन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतानि अन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-307" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः प्राणे तिष्ठन् प्राणाद् अन्तरो यं प्राणो न वेद, यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-308" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः वाचि तिष्ठन् वाचो अन्तरो यं वांग् न वेद, यस्य वाक् शरीरं यः वाचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-309" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यश्चक्षुषि तिष्ठंश्चक्षुषो अन्तरो यं चक्षुः न वेद, यस्य चक्षुः शरीरं यः चक्षुरन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-310" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः श्रोत्रे तिष्ठन् श्रोत्रादन्तरो यं श्रोत्रं न वेद, यस्य श्रोत्रं शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-311" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः मनसि तिष्ठन् मनसो अन्तरो यं मनो न वेद, यस्य मनः शरीरं यः मनोऽन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-312" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यस्त्वचि तिष्ठंस्त्वचो अन्तरो यं त्वंग् न वेद, यस्य त्वक् शरीरं यः त्वचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-313" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद, यस्य विज्ञानं शरीरं यः विज्ञानमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः॥२२॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-314" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यः रेतसि तिष्ठन् रेतसोऽन्तरो यं रेतो न वेद, यस्य रेतः शरीरं यः रेतोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतः श्रोता अमतो मन्ता अविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञातैष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तम् । ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ २३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-315" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S07_V23_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पृथिव्याद्या देवतास्तु देहवद्यद्वशत्वतः ।
शरीरमिति चोच्यन्ते यस्य विष्णोर्महात्मनः ॥
अन्तस्थो देवतानां च न विदुर्यं च देवताः ।
प्रविष्टत्वाद्देवतास्थः सोऽन्तरः स्ववशत्वतः ॥
बाह्यापेक्षां विना यस्तु रमते सोऽन्तरः स्मृतः ।
अतिप्रियत्वाच्च हरेरन्तरत्वमुदाहृतम् ॥
जीवानां स्वप्रियत्वं च विष्णुना नियतं यतः ।
तस्य प्रियत्वं नान्येन देवस्य नियतं क्वचित् ॥
स्वतंत्रः सन्नियन्ताऽसावन्तर्यामी ततः स्मृतः ।
देवतानां स्वभावोऽपि स्वरूपमपि सर्वदा ॥
तदधीनं ततो यामी वासुदेवः प्रकीर्तितः ।
स्वभावसत्तादातृत्वं यन्तृत्वमिति कथ्यते ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-316" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "अक्षरब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-317" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-318" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पूर्वं गार्ग्या जीवानामुत्तरोत्तराश्रयत्वं सर्वेषां भगवदाश्रयत्वं च श्रुतम् । न तु मूलप्रकृतेराधारत्वमाधेयत्वं वा । अतः पुनः पृच्छति । विजिगीषुकथात्वाद् ब्राह्मणानुज्ञया । स्वभर्तुर्विद्याबलं जानन्त्यपि युष्माकमयं जेतुं न शक्य इति ज्ञापयित्वा तेषामुपकारार्थं च पप्रच्छ । न च युक्त्या पूर्वमुपरता । भार्यात्वाद् भगवतोऽन्याधारत्वं नाशंक्यमित्युक्ते भीत्यैवोपरता । भगवतोऽन्याधारत्वं च सर्वाधारमूलप्रकृतेरपि भगवानेवाधार इत्युक्ते युक्तित एव निवारितं भवति । नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रित्यादियुक्तिभिश्च । अस्थूलत्वादियुक्तिभिश्च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-319" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-320" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V02_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "बाणस्त्वयोमयः प्रोक्तः शरो नालोऽस्य कीर्तितः इत्यभिधानम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-321" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-322" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-323" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V04_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "दीप्तेराकाशशब्दोक्ता श्रीर्हि सर्वाश्रया मता ।
तदाश्रयः परो विष्णुः सोऽस्थूलादिगुणो मतः ॥ इति स्कान्दे ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-324" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽथापरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-325" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-326" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-327" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलं अनणु अह्रस्वं अदीर्घं अलोहितं ओहं अच्छायं अतमो अवायु अनाकाशं असंगं अरसं अगन्धं अचक्षुष्कं अश्रोत्रं अवाक् अमनो अतेजस्कं अप्राणं अमुखं अमात्रं अगोत्रं अजरं अभयं अमृतं अरजो अशब्दं अविवृतं असंवृतं अपूर्वं अनपरं अनन्तरं अबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-328" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V08_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रसिद्धस्थूलसूक्ष्मादिवैलक्षण्याज्जनार्दनः ।
अस्थूलादिरिति प्रोक्तो नैव स्थौल्याद्यभावतः ॥ अनावृत्तेस्तमो नास्य स्वातंत्र्यान्नाद्यते क्वचित् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-329" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचंद्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासाः मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृताः तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यो पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां च दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवा दर्वीं पितरोऽन्वायत्ताः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-330" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिंल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-331" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मंत्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-332" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्यध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्यध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युपरराम ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-333" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S08_V12_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "द्यावापृथिव्यौ श्रीभूमी केशौ सूर्यविधू मतौ ॥
दीप्तेः पृथुत्वाज्ज्ञानाच्च तथाऽऽह्लादविधेरपि ।
तदाधारो हरिर्नित्यं स्वातंत्र्येण प्रशासकः ॥
आधारत्वं श्रियो यच्च तच्च विष्णोः प्रशासनात् ।
तद्वशान्न स्वतंत्रत्वं स स्वतंत्रो हरिः सदा ॥ इति महामीमांसायाम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-334" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "शाकल्यब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-335" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-336" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिंशदिंद्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशा इति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-337" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V02_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ये ये वराः सुरास्ते तु परेषां महिमात्मकाः ।
महीत्युक्तं हि माहात्म्यं महिमानो हि तन्मिताः ॥
एवं हि महिमाशब्दस्तद्वशत्वं वदत्ययम् ।
यत्र माहात्म्यवाची स्यान्महत्वं महिमा तथा ॥
त्रयस्त्रिंशत्सुराणां हि परिवारास्ततः परे ।
षण्णामेते त्रयाणां ते ते द्वयोः साधिकस्य तौ ॥
एकस्य सोऽपि क्रमतः पराधीनस्वरूपिणः ।
पराधीनबलाश्चैव पराधीनप्रवृत्तयः ॥
एक एव स्वतंत्रोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-338" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चंद्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदंवसु सर्वं हितमिति तस्मात् वसव इति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-339" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V03_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अग्रं विष्णुं नयेद्यस्मात् सुपर्णोऽग्निरुदाहृतः ॥
प्रथितं हरिमादाय वातीति प्रथिवः स्मृतः ।
तद्भार्या पृथिवी नाम यत्तदिच्छानुसारिणी ॥
सर्वज्ञानात् तथायुष्ट्वात् सूत्रात्मा वायुरुच्यते ।
श्रद्धानामैव तत्पत्नी सर्वस्यान्तर्निरीक्षणात् ॥
अन्तरिक्षमिति प्रोक्ता देवेभ्योऽधिकवीक्षणात् ।
आदिकालस्थितो यस्मादादित्यस्तु सदाशिवः ॥
द्यौरुमा च समुद्दिष्टा वाग्रूपा द्योतिका यतः ।
त एते सर्वदेवेभ्यो विशिष्टास्तद्वशाः परे ॥
नक्षत्रमिंद्र उद्दिष्टश्चंद्रः काम उदाहृतः ।
अत्राणात् सूर्यचंद्राद्यैराह्लादाच्चैव हेतुतः ॥
वासयन्ति जगद्यस्मादेतेऽष्टौ वसवः स्मृताः ।
ज्ञानादिषड्गुणाः षट्सु तदन्येभ्योऽधिका यतः ॥
वसुष्वपि त एवोच्चा वींद्राद्याः पूर्वकीर्तिताः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-340" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदाऽस्माच्छरीरात् मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-341" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V04_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्राणाद्या वायुपुत्रास्तु दश बुद्ध्यभिमानवान् ॥
बृहस्पतिरिति ह्येते रुद्रा इत्येव कीर्तिताः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-342" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-343" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V05_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मासाभिमानिनो ये तु यमचंद्रयुता द्विषट् ॥
धात्रर्यमाद्या आदित्या इंद्राविष्णू विनैव तु ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-344" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कतम इंद्र कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेंद्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-345" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V06_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्तनयित्नोरभीमानी वायुजस्त्विंद्र उच्यते ॥
स एव वज्र इंद्रस्य सोऽशनिश्चाशनादरेः ।
यज्ञो नामेंद्रपुत्रो यो जयन्त इति चोच्यते ॥
स एव पशुमानित्वात् पशवश्चेति कथ्यते ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-346" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेतेषु हीदं सर्वं षडिति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-347" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-348" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-349" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V09_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एवं प्राधान्यतो देवास्त्रयस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः ॥
दक्षाग्निप्रमुखाः सर्वे प्राणा एव हि वायुजाः ।
रुद्रा अपि तदावेशात् पृथंग्नोदीरिता इह ॥
काम एवानुविष्टत्वादनिरुद्धश्च नोदितः ।
मन्वावेशादिंद्रजस्तु संख्यायामनुवेशितः ॥
अश्विनौ निर्ऋतिश्चैव कुबेरश्च विनायकः ।
अर्यम्ण्यंशादिचतुर्षु विशेषावेशसंयुताः ॥
अत्रोक्ता अपि पृथिव्याद्या अन्तर्यामिब्राह्मणे भवन्ति ।
षट्सु प्रधानास्तिस्रो हि वायुवींद्रमहेश्वराः ।
स्वभार्याणां स्वाश्रयत्वात् ते लोका ज्ञानरूपतः ॥
पदैक्याद्ब्रह्मवाय्वोस्तु पदसाम्याच्छिवस्य च ।
शेषस्यापि तु नैवोक्तिः पृथक् श्रद्धा च मारुतः ॥
द्वौ देवाविति सम्प्रोक्तावन्नं श्रद्धा प्रकीर्तिता ।
अतीतत्वाद्देवताभ्यो नेतृत्वाच्चान्नमुच्यते ॥
श्रद्धेति वायोः पत्नी सा प्राणो वै विष्णुरुत्तमः ।
णेत्येवानन्द उद्दिष्ट आसमन्तात् प्रकृष्टतः ॥
प्राणो हि भगवान् विष्णुरध्यर्धो वायुरुच्यते ।
अध्यर्धा हि गुणा नित्यं वायोरध्यर्ध एव तत् ॥
न चैकत्वं भवेद्वायोस्तद्विशिष्टो यतो हरिः ।
न च द्वितीयता तस्मिन् प्रीतिरत्यधिका हरेः ॥
तेनाध्यर्द्धगुणो यस्मात् सर्वस्माद् देवतागणात् ।
न चाशक्यं न चाप्राप्यमतोऽध्यर्ध इतीरितः ॥
अत्यन्तरंगं यत्तस्मान्न हरेः पृथगीरिता ।
श्रीः स्वरूपविभेदेऽपि सर्वोत्कृष्टाऽपि नित्यशः ॥
तस्या अपि परो विष्णुर्गुणैः सर्वैरदोषवान् ।
एक इत्युच्यते नित्यं यस्मान्नान्यस्तथाविधः ॥
तत्परो वा गुणोद्रेके ब्रह्माऽसौ गुणपूर्तितः ।
तथात्वेन यतो नित्यमविकारेण याति हि ॥ त्यदित्युक्तास्ततो विष्णुः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-350" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पृथिव्येव यस्यायतनं अग्निर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-351" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "काम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-352" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावदित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-353" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आकाश एव यस्यायतनं श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-354" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-355" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति असुरिति होवाच ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-356" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आप एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् । सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-357" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "रेत एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-358" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V17_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "शारीरो मनुरुद्दिष्टः कामः प्रद्युम्न उच्यते ।
आदित्यस्थस्तथा रुद्रः श्रोत्रश्चंद्र उदाहृतः ॥
छायामयस्तु निर्ऋतिरादर्शे सूर्य एव च ।
पर्जन्यस्त्वप्सु पुरुषः शक्रः पुत्राभिमानवान् ॥
अमृतं वायुरुद्दिष्टं स्त्रियः श्रीर्गीरुमा तथा ।
सत्यं ब्रह्मा समुद्दिष्टो गरुत्मच्छेषका दिशः ॥
आदेशनाद्दिशः प्रोक्ताः मृत्युर्यम उदाहृतः ।
अन्तर्गतेन रूपेण वायुरेव त्वसुः स्मृतः ॥
पालकेन स्वरूपेण ब्रह्मैवात्र प्रजापतिः ।
प्रकाशस्त्वान्तरो ज्योतिर्लोको बाह्य इतीर्यते ॥
मनःस्थिता मनोनाम्नी बोधरूपत्वतो रमा ।।
सैवाग्निस्थाऽदनान्नित्यमग्निरित्येव गीयते ॥
हृदयं बुद्धिसंस्था सा त्वयनं हृदि यत्ततः ।
चक्षुः सा दृष्टिहेतुत्वाद्दृष्टानां लोक एव सा ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-359" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "शाकल्येति होवाच । याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अंगारावक्रयणमकृता३ इति ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-360" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्येति होवाच । शाकल्यो यदिदं कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ सदेवा सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-361" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V19_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति याज्ञवल्क्यवचनम् । सर्वप्रतिष्ठात्वेन ब्रह्मणोऽपि ज्ञानं भवतीति किं ब्रह्म विद्वानित्यस्य चोत्तरम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-362" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "किं देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीति आदित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-363" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V20_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यदि दिशो वेत्थ तर्हि किं देवतोऽस्याम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-364" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "किं देवतोऽस्यां दक्षिणस्यां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन् यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-365" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V21_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एवं यमस्याश्रयश्च यज्ञमान्यनिरुद्धकः ॥
दक्षिणामानिनी देवी रतिरेव तदाश्रयः ।
श्रद्धारूपः सदा कामस्तस्या अपि समाश्रयः ॥
हृदयात्मिक्युमा तस्य कामस्यापि समाश्रयः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-366" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "किं देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति अप्स्विति कस्मिन्वापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-367" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V22_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अब्देवता सदा चंद्रो वरुणस्य समाश्रयः ॥
रेत आत्मा सुरगुरुः सोमस्यापि समाश्रयः ।
तस्याप्युमैवाश्रयः स्यात् .." |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-368" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "किं देवतोस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-369" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V23_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "...... तस्यैव तु दिगीशितुः ॥
सोमस्य दीक्षारूपा तु शतरूपा समाश्रयः ।
तस्याः सत्यात्मको देवो मनुरेव समाश्रयः ॥
तस्याप्युमैवाश्रया सा स्रष्टृरूपस्य नित्यदा ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-370" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "किं देवतोस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन्नु प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक्प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-371" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V24_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मध्यदिक्स्वामिनोऽग्नेश्च स्वाधारो वाग्बृहस्पतिः ॥
तस्याप्युमैव हृदयरूपा नित्यं समाश्रयः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-372" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V25" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्मत् स्यात् श्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-373" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V25_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्याः समाश्रयो रुद्रस्त्वमहञ्चेति रूपवान् ॥
अहंकारात्मको नित्यमात्मोमा परिकीर्तिता ।
बुद्ध्यात्मनैवाततत्वाद्यद्यस्यानाश्रयो हरः ॥
तदा बोधात्मिका शक्तिर्नास्या देहाभिरक्षणे ।
अरक्षितान्मानुषादीन् श्वानो वाऽद्युर्वयांसि वा ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-374" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V26" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति कस्मिन्न्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नुदान प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान् पुरुषान् निरूह्य प्रत्यूह्यात्यक्रामत् तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति तंह न मे शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-375" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V26_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "शिवस्य च तथोमायाः प्राणात्मा शेष आश्रयः ।
शेषस्यापानरूपा सा भारत्येव व्यपाश्रयः ॥
तस्या व्यानाभिधो वायुर्विशिष्टानो यतो हि सः ।
उन्नेतृत्वादुदानाख्या तस्या श्रीराश्रयः सदा ॥
समानाख्यो हरिस्तस्याः सहैव ह्यनयत्यसौ ।
स्वावरस्यानकास्त्वन्ये सर्वेषां चेष्टको हि सः ॥
स एष भगवान्नैवं श्रीवदन्याश्रयो हरिः ।
न च ब्रह्मादिवद्विष्णुर्नैवासौ बद्धवत् क्वचित् ॥
न च मुक्तवदीशेशः कुत एव जडोपमः ।
अग्राह्योऽशीर्यसंगोऽसावसितश्च न रिष्यति ॥
न हि सर्वात्मना क्वापि केनचिज्ज्ञायते क्वचित् ।
स्वल्पोऽपि शीर्यते नैव कारणात् कालतोऽपि वा ॥
न लिप्यते जगन्नाथः क्वचिद्दोषेण केनचित् ।
भूतपूर्वो भविष्यो वा बन्धो नास्य कुतश्चन ॥
न च नाशो भवेत् क्वापि न नशिष्यति च क्वचित् ।
अन्यत् सर्वं गृहीतं हि तेन ज्ञानादिना सदा ॥
अशीर्यत्वादयोऽन्येषां सर्वेषां तत्प्रसादतः ।
अतस्तस्यापि वैषम्यान्नेति नेत्याह तं श्रुतिः ॥ इत्यादि च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-376" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो व कामयते तं वः पृच्छामीति सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणाः न दधृषुः ॥ २७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-377" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V28" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ ।
यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।
तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ २८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-378" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V29" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यंदि त्वच उत्पटः ।
तस्मात् तदा तृणात् प्रैति रसो वृक्षादिवाऽहतात् ॥ २९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-379" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V30" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मांसान्यस्य शकराणि किन्नाटं स्राव तत्स्थिरम् ।
अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-380" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V31" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।
मर्त्यः स्विन् मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ३१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-381" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V32" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत्प्रजायते ।
धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥ ३२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-382" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V33" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ३३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-383" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V34" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः ।
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् ॥ तिष्ठमानस्य तद्विद इति ॥ ७ ॥ ३४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-384" |
|---|
| oldKey | "BR_C03_S09_V34_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C03_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यथा वनस्पतौ वृक्ष इत्ययंशब्दोऽमृषा तथैव पुरुषे पुरुषशब्दो विद्यमान एव । स च नित्यत्वे सम्भवति । पुरुकालेऽपि सन्पुरुष इति । स्रावमध्ये यत्स्थिरं विद्यतेऽस्थि सल्लीनं तद्दारुसंश्लिष्टपाशवत् । वृक्षो मूलाद्रोहतीत्यंगीकारमात्रम् । यत्समूलमावृहेयुरिति तस्यापि दूषणात् । अन्यस्य रेतसो जननमपि जीवतः पुरुषान्तरस्य भावे । प्रलये तु सर्वप्रलयात् कस्मादुत्पत्तिः । तत्पृष्टं सर्वं वक्तुमशक्यत्वात् पुरुषस्य पुनरुत्पत्तौ कारणं भगवन्तं जानन्तोऽपि तूष्णीमृषयो बभूवुः । पुरुषनामकत्वान्नित्यस्य जीवस्य यावन्मुक्तिः पुनरुत्पत्या भवितव्यं न शरीरेण सह नाशः । तस्य च स्वोत्पत्तावस्वातंत्र्यादन्येनोत्पादकेन भाव्यम् । कोऽसाविति प्रश्नाशयः । तेषु तूष्णीम्भूतेषु स्वयमेव परिहरति विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेति । तस्याप्यन्य उत्पादक इत्याशंका मा भूदिति जात एव न जायत इत्याह । पुरुषान्तरापेक्षया पुनःशब्दो न तु क्रियाभ्यासापेक्षया । एक एव हरिर्बन्धुः पुनरन्यो न विद्यते इतिवत् । रातिरिष्टः । तिष्ठमानस्य तद्विदः परायणम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-385" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "षडाचार्यब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-386" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे । अथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज । तं होवाच याज्ञवल्क्य किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्नण्वन्तानिति उयुभयमेव सम्राड् इति होवाच ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-387" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अणुर्भगवान् तद्विषयान् निर्णयान् वक्तुं वा ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-388" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणवामेत्यब्रवीत् । मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छैलिनोऽब्रवीद् वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य वागेव सम्राति होवाच वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायत ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥२॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-389" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V02_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रतिष्ठा प्रतिमा प्रोक्ता प्रतिरूपेण संस्थितेः ।
प्रतिमाधिकसादृश्यान्मुख्या विष्णोः सदा रमा ॥
दीप्तत्वादासमन्तात् सा चाकाश इति गीयते ।
प्रत्येकं विष्णुरूपाणामन्यदायतनं पृथक् ॥ इत्यध्यात्मे ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-390" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् म उदंकः शौल्बायनः प्राणो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छौल्बायनोऽब्रवीत् प्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्येनदुपासीत का प्रियता याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट् कामायायाज्यं याजयत्यप्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्णात्यपि तत्र वधाशंकं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट् कामाय प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-391" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V03_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्राणसंस्थस्य वै विष्णोः सम्प्रीत्यै भोजनं भवेत् ।
तदिच्छयैव चौर्यादि कुर्युरज्ञा अपि ध्रुवम् ॥
तथापि तं न जानीयुः प्राणात्मानं जनार्दनम् ॥ इति प्रवृत्ते ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-392" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् मे बर्कुः वार्ष्णः चक्षुः वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तद्वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति होवाच चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्राक्षमिति तत्सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-393" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V04_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यच्चक्षुषि स्थितं रूपं विष्णोश्चक्षुस्तदुच्यते ।
शब्दादेरप्यापरोक्ष्ये तद्धेतुर्विश्वनामकम् ॥
तद्गतस्य ततो विष्णोः कण्ठस्थानागमो यदा ।
तदा स्वप्नो भवेज्जाग्रद्दर्शनं नैव जायते ॥
चक्षुर्निमीलनं च स्यात् सर्वेंद्रियगुणैः सह ।
चक्षुरात्मा ततो विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-394" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तद्भारद्वाजोऽब्रवीत् श्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽनन्त इत्येनदुपासीत का अनन्ता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशः दिशो वै सम्राट् श्रोत्रं श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-395" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V05_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वव्यापी तु भगवाननन्त इति कीर्तितः ।
दिङ्नामा स तु विज्ञेयो दिक्षुस्थो नित्यदेशनात् ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-396" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीन्मे सत्यकामो जाबालः मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तज्जाबालोऽब्रवीत् मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽऽनन्द इत्येनदुपासीत का आनन्दता याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनोजहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥६॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-397" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V06_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मनःस्थितस्य यद्विष्णोः सम्बन्धादेव कामतः ।
जातः सुतः सुखे हेतुः परानन्दो हरिः किमु ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-398" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यः हृदयं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छाकल्योऽब्रवीत् हृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतनं हृदयं वै सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं हृदयं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥७॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-399" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S01_V07_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सदा प्रतिष्ठितानि भवन्ति । विशेषतोपि प्रतिष्ठितानि सुप्तौ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-400" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S02" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "कूर्चब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-401" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "जनको वै वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददीतैवमेवैताभिरुपनिषद्भिः समाहितात्माऽस्येवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व गमिष्यसीति नाहं तद्भगवान् वेद यत्र गमिष्यामीत्यथ वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति स होवाच ब्रवीतु भगवानिति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-402" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S02_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वयोग्यं ज्ञानं श्रोतुं सिंहासनादवरुह्योपसदनं कृत्वोवाच । यत्स्वात्मना प्राप्यं मुक्तौ तदुपास्यैव मुक्तिर्भवतीत्यतः प्राप्यं पृच्छति ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-403" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तं वा एतमिन्धं सन्तमिंद्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-404" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैतद्वामेऽक्षिणि पुरुषरूपमेषाऽस्य पत्नी विराट् तयोरेष संस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिंडोऽथैनयोरेतत् प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः सञ्चरणीयैषा हृदयदूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्रधा भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतददास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-405" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S02_V03_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "राज्ञां हृदयसंस्थो य इंद्रो नाम जनार्दनः ।
स इंद्रे च यमे चैव स प्राप्यो मुक्तराजभिः ॥
तस्मात् तेषामुपास्यः स विराण् नाम तदाश्रया ।
श्रीस्तयोः स्तुतिरेषा हि प्राणेन क्रियते सदा ॥
कर्णौ पिधाय या ज्ञेया सर्ववेदात्मिका हि सा ।
काशनात् सर्वजीवानामाकाश इति सा स्तुतिः ॥
जाग्रतां सर्वजीवानां स विष्णुर्दक्षिणाक्षिगः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-406" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणाः दक्षिणा दिक् दक्षिणाः प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अर्वाची दिगर्वाञ्चः प्राणाः सर्वाः दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्यते असितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः स होवाच जनको ह वैदेहोऽभयं त्वागच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-407" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S02_V04_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्य पूर्वदिशींद्राग्नी सभार्यौ सम्प्रतिष्ठितौ ॥
यमराक्षसौ दक्षिणस्यां वरुणो वायुरेव च ।
पश्चिमस्यामुत्तरस्यां सोमेशानौ प्रतिष्ठितौ ॥
ब्रह्मा प्रधानवायुश्च तथोर्ध्वायां दिशि स्थितौ ।
अधरायां शेषकामौ सभार्याः सर्व एव च ॥
एकैकस्यां हि चत्वारो नेतृत्वात् प्राणनामकाः ।
इंद्रियाभिमतेश्चैव प्राणा इत्येव शब्दिताः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-408" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "ज्योतिर्ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-409" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ । स ह कामप्रश्नमेव वव्रे । तं हास्मै ददौ तंह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-410" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्यो वरं दत्वा राज्ञा संवादकामुकः ।
वैदेहनगरं प्रायात् सन्तो यच्छास्त्रलोलुपाः ॥ इति स्कान्दे ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-411" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इत्यादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-412" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चंद्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चंद्रमसैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-413" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-414" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-415" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-416" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V06_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आत्मा भगवानेवास्य ज्योतिः ।
भावेऽभावेऽपि सूर्यादेर्जीवानां विष्णुरेव हि ।
ज्योतिस्तथाप्यभावे तु तज्ज्ञेयं हि विशेषतः ॥
अस्वतांत्र्यात्तु जीवस्य द्योतयन् बुद्धिमस्य सः ।
प्रवर्तयति सर्वेशस्तमस्यपि जनार्दनः ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-417" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनु सञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-418" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V07_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वातंत्र्याद्ध्यायतीवासौ ध्याययन् जीवमंजसा ।
गृह्णातीव ग्राहयन् स जीवं सर्वेश्वरेश्वरः ॥
सदा विज्ञानपूर्णोऽसौ समानोऽसौ सदा समः ।
अविकारात् समानः सन् जीवमादाय सञ्चरेत् ॥
उभौ लौकौ स्वापकत्वाद्भूत्वाऽसौ स्वप्ननामकः ।
इमं लोकं जाग्रदाख्यं मृत्युरूपात्मकं सदा ॥
बहुपापैकहेतुत्वात् तारयेत् स्वप्नमानयन् ।
इमं लोकं च भूराख्यं तारयित्वाऽन्तरिक्षगम् ॥
जीवं कुर्यान्मृतौ विष्णुर्भूलोकः क्षिप्रमृत्युमान् ।
बहवो मृत्यवश्चात्र मृत्यो रूपाण्यतस्त्वयम् ॥
पापहेतुत्वतश्चायं भूर्लोको मृत्युरूपकः ।
जाग्रच्च पृथिवी चैव द्यौः सुषुप्तिस्तथैव च ॥
स्वप्नश्चैवान्तरिक्षं च ज्ञेया अन्योन्यनामकाः ।
तद्द्ययभिप्रायिका तस्मादुभौ लोकाविति श्रुतिः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-419" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वाऽयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-420" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V08_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स वा अयं जायमान इति च द्व्याश्रया श्रुतिः ।
यस्य ज्योतिरयं विष्णुः स परामृश्यते तथा ॥
यदा तु भगवानुक्तस्तदा स्वातंत्र्यतो विभुः ।
म्रियमाणो जायमान इत्युक्तस्तन्नियामकः ॥
फलदानाय पापानां ग्रहस्संसर्ग उच्यते ।
मोक्षदाने फलादानाद्विजहातीति चोच्यते ॥
जीवोऽपि मुक्तिकाले तु हाता पापस्य कथ्यते ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-421" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानं तस्मिन् सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं चाथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन् आनन्दांश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहृत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वापित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-422" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्राऽऽनन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिण्यः स्रवन्त्यः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-423" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V10_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वर्गः सुषुप्तिरित्याख्या मुक्तेरपि यतः समा ॥
परलोको यतो मुख्यो मुक्तिरेव न चापरः ।
अतो द्युसुप्तिमोक्षाणामभिप्रायमिदं वचः ॥
सुप्तिरित्यादिकं स्वेति विष्णोराख्या सुखत्वतः ।
पुनरागमनं नाम मुक्तानामपि विद्यते ॥
प्रलये तु प्रविश्यैनं भगवन्तं जनार्दनम् ।
स्थित्वा ज्ञानाविलोपेन निर्गच्छन्ति पुनस्ततः ॥
न च ज्ञानसुखादीनां तेषां सृष्टौ लयेऽपि वा ।
विशेषः कश्चिदन्तश्च बहिश्चैव रमन्ति ते ॥
स्वापयत्येनमिति स स्वपितीत्युच्यते हरिः ।
आनन्दपापलोकादेर्दर्शनं स्वप्नसुप्तयोः ॥
अपि विष्णोः सदैवास्ति न जीवस्य कथञ्चन ।
अत्रायं भगवान् विष्णुर्जीवस्य स्वयमेव तु ॥
ज्योतिर्विशेषतो भूयान्नैवान्यज्ज्योतिरत्र यत् ।
न हि जीवः स्वयं द्रष्टुं सुप्तः शक्नोति हि ध्रुवम् ॥
अतः स नैव जीवोऽयं सर्वं पश्यति सूक्ष्मदृक् ।
स्वप्नेऽन्तरिक्षे स्वर्गे वा न रथाद्याः पुरा स्थिताः ॥
तदैव तत्कर्मयोग्यान्निर्मिमीते हरिः स्वयम् ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-424" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेते श्लोका भवन्ति ।
स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति ।
शुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-425" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V11_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "शुक्रं जीवमादाय ।
शोकेन रत्या युक्तत्वाच्छुक्रो जीव उदाहृतः ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-426" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा ।
स ईयतेऽमृतो यत्र कामं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-427" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V12_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अंशेन जीवमादाय क्वचिदीशो बहिर्नयेत् ।
स्वप्नेषु फल्गुनं यद्वत् कृष्णः कैलासमानयत् ॥
वासनारूपकान् प्रायस्त्वन्तरेव प्रदर्शयेत् ।
अतो बहिः कुलायादित्यपि वाङ्ग् न विरुद्ध्यते ॥ इति ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-428" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि ।
उतेव स्त्रीभिस्सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-429" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V13_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "उच्चावचेषु रूपेषु प्रविशन् पुरुषोत्तमः ।
बहुरूपत्वमायाति स्वप्ने स जगतः प्रभुः ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-430" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति ।
तं नायतं बोधयेदित्याहुर्दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यतेऽथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-431" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V14_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "जीवस्य मृतिकाले च स्वप्नकाले च केशवः ॥
एवंविधानि कर्माणि कुर्वाणोऽपि न दृश्यते ।
तथा जागरिते सुप्तौ मुक्तैरेव तु दृश्यते ॥
तथाऽपि नायतेऽभ्यस्तं ज्ञानी ब्रूयाज्जनार्दनम् ।
यस्य गोचरतां विष्णुः कदाचिन्न प्रपद्यते ॥
तस्यायतस्य पापस्य भेषजं न हि विद्यते ।
सुप्तिकालोऽप्ययं विष्णोः सदा जागरितात्मकः ॥
यानि जागरिते पश्येत् तानि सुप्तेऽपि पश्यति ।
नित्यज्ञानस्वरूपत्वाद्भगवान् पुरुषोत्तमः ॥
नित्यानन्यप्रकाशत्वेऽप्यन्यज्योतिर्यदा भवेत् ।
तदा स्यात् संशयोऽज्ञानामित्यत्रेति विशेषणम् ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-432" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नायैव स यत् तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-433" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V15_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तत्र सुषुप्तिमात्राभिप्रायेण स वा एष एतस्मिन् प्रसाद इत्याह ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-434" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव स यत् तत्र यत् किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-435" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V16_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वप्नाख्योऽन्तः स्थानं स्वप्नान्तम् ।
अन्तः स्थानं स्थलं वासः प्रदेश इति चोच्यते । इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-436" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-437" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसञ्चरति । पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसञ्चरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-438" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V18_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "शुभाशुभं तु दृष्ट्वैव स्वप्ने जागरितेऽपि च ।
असंस्पृष्टः सदा दुःखैश्चरतीशः पुनः पुनः ॥
स्वप्नसुप्त्यात्मकं कूलमेकं बुद्धात्मकं परम् ।
महामत्स्य इवासंगी चरत्येको जनार्दनः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-439" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्त संहत्य पक्षौ सल्लयायैव ध्रियते, एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति । यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते । न कञ्चन स्वप्नं पश्यति॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-440" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V19_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यं विष्णुं श्येनवच्छ्रान्तो जीवो जागरिते भ्रमन् ।
स्वप्ने च सुप्तावभ्येति संश्रान्तः सद्गृहं यथा ॥
स्वित्यानन्दः परो विष्णुस्तमाप्तः सुप्तः उच्यते ।
सम्प्राप्य तमयं जीवः कामयेन्नैव किञ्चन ॥
न च स्वप्नसमभ्रान्तिज्ञानं याति कदाचन ।
सुषुप्तौ च किमु ज्ञानान्मुक्तौ प्राप्तो जनार्दनम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-441" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिंगलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छाययति गर्तमिव पतति । यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-442" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V20_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "निहितो भगवान्यत्र हिता नाड्यः प्रकीर्तिताः ।
नानावर्णो हरिस्तासु नानारूपी व्यवस्थितः ॥
तासां मध्ये सुषुम्ना च तत्र सुप्तिं व्रजत्ययम् ।
ता एव कण्ठदेशस्था जीवस्तत्र व्यवस्थितः ॥
स्वप्नान् पश्यति जाग्रद्वद्भयं च प्रतिपद्यते ।
अ इत्यादिश्यते विष्णुरविद्या तन्निरीक्षणम् ॥
तेन स्वप्नानयं पश्येज्जीवो जागरितं तथा ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-443" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयं रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-444" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V21_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "छन्दसामप्यवाच्यत्वादतिच्छन्दा हरिः स्मृतः ।
तेनाश्लिष्टो ह्ययं जीवः सुप्तो मुक्तोऽथवा भवेत् ॥
विष्णोरूपं हि यन्नित्यमभयं पापवर्जितम् ।
आप्तकामं च पूर्णत्वादात्मकामं सुखत्वतः ॥
शोकं विना सुरमणाच्छोकान्तरमितीरितम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-445" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा ओवा वेदा अवेदा अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चांडालोऽचांडालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-446" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V23_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तेनाश्लिष्टः स्वपुत्राणां दायादानां न वै पिता ॥
तेषां दुःखाददुःखित्वान्न माता लोकमान्यपि ।
अलोकमानान्नो लोको देवोऽपि स्वाधिकारतः ॥
वर्षणादेर्व्युत्थितत्वान्न देवो वेदमान्यपि ।
अवेदमानान्नो वेदः पापी पापफलाप्ययात् ॥
अपापः श्रमणश्चापि यतिधर्मात् समुत्थितेः ।
अयतिस्तापसश्चैवमनिष्टं पुण्यमप्यमुम् ॥
नान्वेत्येवंविधो मुक्तो विष्णोः सम्प्राप्तिमात्रतः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-447" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ॥ २३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-448" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति। न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ।ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-449" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V25" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते ।न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-450" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V26" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वै तन्न वदति वदन् वै तं न वदति । न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति। ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥ २६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-451" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति । न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-452" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V28" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते । न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत॥ २८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-453" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V29" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-454" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V30" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्वै तन्न विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥ ३० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-455" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V30_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "द्रष्ट्रन्तरनिषेधेन तस्यैव सर्वद्रष्टृत्वमेव च यत्र वा अन्यदिव स्यादित्यादिनोपसंह्रीयते । अन्यथाऽन्योऽन्यत् पश्येदित्यादिकमनर्थकम् । न ह्येकस्यान्यत्वेऽन्यस्यानन्यत्वं भवति । अतो द्वितीयोऽन्यशब्दः व्यर्थ एव स्यात् । न च तत्पक्षे दृश्यत्वादिकमात्मनो विद्यते । तस्माद् यत्र किञ्चिदपि स्वातंत्र्यमन्यस्य भवति तत्रैव भगवतोऽन्यः पुरुषो भगवद्दृष्टादन्यत् पश्यतीत्यादि युज्यते तदेव नास्ति स्वतः । अतो नान्योऽन्यत्पश्येदित्यर्थः । अन्यदिवेतीवशब्दोऽल्पस्वातंत्र्याद्यर्थे । राज्ञः पृथगिव भृत्य इतिवत् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-456" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V31" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्येत् अन्योऽन्यज्जिघ्रेत् अन्योऽन्यद्रसयेत् अन्योऽन्यद्वदेत् अन्योऽन्यच्छृणुयात् अन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात् ॥ ३१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-457" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V32" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषाऽस्य परमा गतिरेषाऽस्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-458" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V32_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यदि जगदेव न स्यात् तदा कथं मोक्षेऽप्यन्यानि भूतानि मात्रां उपजीवन्तीति युज्यते । मोक्षप्रकरणं चैतत् । स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि इति भगवद्वचनम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-459" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V33" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यो ह वै मनुष्याणां राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोकः आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो माऽन्तेभ्य उदरौत्सीदिति ॥ ३३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-460" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V33_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अन्येभ्यस्तु विमुक्तेभ्य आनन्दश्चक्रवर्तिनाम् ।
मुक्तानां हि शतोद्रिक्तः पितॄणां तेभ्य एव च ॥
तेभ्योऽप्यृषीणां मुक्तानां कर्मदेवाभिधायिनाम् ।
तेभ्यश्च मुक्तदेवानां तेभ्यश्चोमापतेस्तथा ॥
तस्माच्च ब्रह्मणस्त्वेवं मुक्तस्य गरुडादपि ।
एष एव ततो विष्णुः पूर्णानन्दः प्रकीर्तितः ॥
यस्य ब्रह्माऽपि मुक्तः सन् विप्लुण्मात्रं समश्नुते ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-461" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V34" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-462" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V34_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वदा जीवमादाय नियमाद् विष्णुरेव हि ।
जाग्रदादिषु संयाति नान्यथा तु कथञ्चन ॥
एवं नियमविज्ञप्त्यै जीवास्वातंत्र्यवित्तये ।
परिवृत्तिमवस्थासु साभ्यासा वक्ति हि श्रुतिः ॥ इति निर्णये ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-463" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V35" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यथानः सुसमाहितमुत्सर्जत् यायादेवमेवायं शरीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढं उत्सर्जद्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३५॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-464" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V35_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ग्रामादिकमुत्सर्जद्यायात् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-465" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V36" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाऽणिमानं निगच्छति तद्यथाऽऽम्रमौदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-466" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V36_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अणिमानं भगवन्तम् ।
स य एषोऽणिमा तेजः परस्यां देवतायाम् इति हि श्रुतिः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-467" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V37" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्ययमागच्छतीत्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥३७॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-468" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V37_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इदं मुक्तजीवस्वरूपमायाति । अतोऽनेन सहेदं परं ब्रह्मायातीति परब्रह्मणः पूजार्थं प्रतिकल्पन्ते । यथा राज्ञो ध्वजादिकं दृष्ट्वाऽयं ध्वज आगच्छति तस्माद् राजाऽऽयातीति पूजां प्रतिकल्पन्ते तद्वत् । अन्यथेदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति द्विरुक्तिर्व्यर्था स्यात् । वीप्सात्वे त्वयमायातीत्येकप्रकारेण शब्दाभ्यासः स्यात् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-469" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V38" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-470" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S03_V38_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "जीवमादाय गच्छन्तमनुयान्ति दिवौकसः ।
प्राणाभिमानिनो विष्णुं नृपं परिजना यथा ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-471" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "शारीरब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-472" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यत्रायमात्मा बल्यं न्येत्य सम्मोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति । स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति । स यत्रैव चाक्षुषः पुरुषः परांग् पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-473" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V01_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वेषां बलकारित्वाद् बल्यो विष्णुः प्रकीर्तितः ।
तं यदा प्राप्य जीवात्मा मृतेः पूर्वं विमुग्धताम् ॥
याति विष्णुं तदा देवा यान्ति तेजःस्वरूपिणः ।
तानादाय हरिश्चक्षुःस्थानाद्धृदयमाव्रजेत् ॥
तदा न किञ्चिज्जानाति जीवो ब्रह्मसमाश्रितः ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-474" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुषो वा मूर्ध्नो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनुत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति स विज्ञानमेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-475" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V02_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "हृदये संस्थितो जीवो विशेषेण हरिस्तथा ।
चक्षुरादिषु रूपाणि जाग्रत्काले तयोः सदा ॥
बहूनि सन्ति तान्येव यदैकीभावमाप्नुयुः ।
हृदयस्थेन रूपेण तदा जीवो न किञ्चन ॥
जानातीति विदुः प्राज्ञास्तदा विष्णोः स्वतेजसा ।
द्योतते हृदयाग्रं च तेन द्वारेण केशवः ॥
निष्क्रामेज्जीवमादाय प्राण एनमनुव्रजेत् ।
प्राणमन्ये तथा देवा विद्या कर्म च योग्यता ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-476" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वा अन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-477" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V03_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यथा तृणजलूकैवं भगवान् पुरुषोत्तमः ।
जीवस्य सूक्ष्मरूपं तु प्राप्य स्थूलं परित्यजेत् ॥
इदं शरीरं भूतेषु विलापयति केशवः ।
अविद्यां चैव जीवस्य गमयेज्ज्ञानसर्जनात् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-478" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यथा पेशस्करी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वा अन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-479" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V04_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वर्णकारो यथा स्वर्णमलमग्नौ निहत्य च ।
शुद्धेन तेन चात्मेष्टं कुरुते रूपमंजसा ॥
एवं स भगवान् विष्णुर्जीवस्वर्णस्य यन्मलम् ।
अविद्याकामकर्माद्यमात्माग्नौ नाश्य सर्वकृत् ॥
स्वेच्छया कुरुते रूपं यद्योग्यं तस्य मुक्तिगम् ।
पितृजीवस्य पित्र्यं स गान्धर्वं तस्य चैव हि ॥
दैवं तु देवजीवस्य प्राजापत्यं प्रजापतेः ।
ब्रह्मणो ब्राह्ममेवेति नित्यानन्दस्वरूपकम् ॥
न योग्यतां विना क्वापि पूर्वप्रज्ञाश्रुतेः क्वचित् ।
यदा मुक्तो भवेद् ब्रह्मा तदा ब्रह्मा स मुख्यतः ॥
एवं प्रजापतिश्चैव तथैवान्येऽपि सर्वशः ।
यथा हि स्वर्णरूप्याद्यं मलहानौ हि तद्भवेत् ॥
पूर्वं तु योग्यतामात्रं द्विजत्वं बालके यथा ॥ इत्यादि च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-480" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयोः वायुमयः आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयस्सर्वमयस्तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनाथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-481" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V05_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मयट् प्राचुर्ये स्वरूपे च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-482" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेष श्लोको भवति ।
तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिंगं मनो यत्र निषिक्तमस्य ।
प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् ॥
तस्माल्लोकात् पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकामः आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-483" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V06_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अयोग्यकामराहित्यान्मुक्तो निष्काम उच्यते ।
अ इत्युक्तः परो विष्णुस्तत्कामोऽकाम ईरितः ॥
तथा कामयमानः स योग्यकामस्य चापि तु ।
कादाचित्कसमुद्भूतेर्भगवत्कामनां विना ॥
कामितस्याखिलस्याप्तेराप्तकामश्च मुक्तिगः ।
चिदानन्दात्मकं रूपं कामत्वेन भविष्यति ॥
यतस्तेनैवाप्तकाम इति मुक्तोऽभिधीयते ।
मुक्तस्य न पुनः प्राणा उत्क्रामन्ति कदाचन ॥
जीवोऽपि ब्रह्मशब्दोक्तो जडाद्गुणबृहत्वतः ।
प्राप्नोति परमं ब्रह्म प्रलये प्रलये सदा ॥
मअन्यदा स्वेच्छया विष्णोः स्वरूपाद् बहिरेष्यति ।
स्वेच्छयाऽन्तर्बहिर्वैवं रमते मुक्त आत्मवान् ॥ इत्यादि च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-484" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V06_B2" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "न चामुक्तस्य कथञ्चिदाप्तकामता मुख्यतः ।ब्रह्माप्येतीतिवचनात् पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव । यद्यज्ञाननाशात् परिज्ञानमात्रं तदा स्वस्य ब्रह्मतां विजानातीत्येव स्यात् । न तु ब्रह्माप्येतीति । न हि राजपुत्रः पूर्वमात्मानमजानन् पश्चाद् राजपुत्र इति विज्ञाय राजपुत्रमप्येतीत्युच्यते । किन्तु राजपुत्रत्वेनात्मानं व्यजानादित्येवोच्यते । विस्मृतकण्ठमणिरपि विज्ञात इत्येवोच्यते न तु प्राप्त इति । अतः पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-485" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेष श्लोको भवति ।
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति ॥
तद्यथाऽहिर्निलयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-486" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V07_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अथ मर्त्योऽमृतो भवति । अथ मुक्त्यनन्तरं न कदाचिन्मृतिरस्य भविष्यतीत्यर्थः । मुक्त एव परे ब्रह्मणीच्छया प्रविशति निःसरति च । दर्शनादीन् ब्रह्मणो भोगांश्च करोति । स्वरूपभूताः कामा मुक्तानां भवन्तीत्यतो हृदि श्रिता इति विशेषणम् । हृदयस्यैव मोचनात् तत्स्थाः कामा मुक्तानामपगच्छन्तीति युक्तमेव । न ह्यमुक्तस्य कदाचित् सर्वे कामा मुच्यन्ते । सुप्त्यादावप्यभिभव एव वासनाया विद्यमानत्वात् । वासनाया हि पुनरुद्भवः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-487" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेते श्लोका भवन्ति ।
अणुः पन्था विततः पुराणो मां स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।
तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वो विमुक्ताः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-488" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V08_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तत्प्राप्तेः सुखहेतुत्वात् पन्था इति हरिः श्रुतः ।
अणुश्च विततश्चासौ यतोऽन्तर्बहिरेव च ॥
श्रिया स्पृष्टः श्रीपतित्वादनु वित्तस्तथैव च ।
तस्य प्रसादात् संयान्ति तल्लोकं सर्वमोक्षिणः ॥
ऊर्ध्वः स भगवान् सर्वविशिष्टो यत्सदैव हि ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-489" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्मिञ्च्छ्लुक्लमुत नीलमाहुः पिंगलं हरितं लोहितं च ।
एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत् तैजसश्च ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-490" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V09_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "रूपमाहुः पञ्चविधं तस्य विष्णोर्महात्मनः ॥
शुक्लं तु वासुदेवाख्यमनिरुद्धं तु नीलकम् ।
संकर्षणं पिंगलं च प्रद्युम्नं हरितं स्मृतम् ॥
नारायणं लोहितं स्यात् पञ्चरूपाण्यजे हरौ ।
पञ्चभेदविभिन्नो यस्त्वभिन्नोऽपि स्वरूपतः ॥
स पन्था ब्रह्मणा ज्ञातः पद्मजेनैव सन्ततम् ।
परब्रह्मस्वरूपज्ञो महातेजः श्रियस्तथा ॥
सम्यक्स्वरूपविज्ञानात् तैजसत्वेन कीर्तितः ।
भगवत्कर्मकर्तृत्वात् पुण्यकृच्चाभिधीयते ॥
एवंविधोऽपि तस्यैव प्रसादाद्याति तां गतिम् ।
अतः पन्थास्समुद्दिष्टो भगवान् केशवः स्वयम् ॥
स्वगताखिलभेदेन विहीनोऽपि स सर्वदा ।
सर्वेषां व्यवहाराणां भेदोत्थानां स ईश्वरः ॥
अभिन्नोऽपि ह्यतो भिन्नः पञ्चभेदादिना मृषा ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-491" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-492" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V10_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अन्यथोपासका येऽस्य ते यान्ति ह्यधरं तमः ॥
ततः किञ्चिद्विशेषेण दुर्ज्ञानस्याविनिन्दकाः ।
सम्यगाचार्यवचनमवज्ञाय विरोधिनि ॥
सत्वबुद्धिं यतः कुर्युरतस्तेऽधिकपापिनः ।
अप्राप्तत्यागिनः प्राप्तनिष्ठाहीनो हि दोषवान् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-493" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वांसो बुधो जनाः ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-494" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V11_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "नित्यदुःखस्वरूपत्वादनन्दं तत्तमो मतम् ।
बोधके विद्यमानेऽपि ये विदुर्न परं हरिम् ॥
तेऽपि यान्ति तमो घोरं नित्योद्रिक्तासुखात्मकम् ॥ इत्यादि च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-495" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-496" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V12_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यदि जीवः परात्मानमयमस्मीति वेदितुम् ।
योग्यः शरीरच्छेदादेः कथं दुःखी तदा भवेत् ॥
दुःखी शरीरसम्बन्धाज्जीवो विष्णोः प्रसादतः ।
अदुःखी विप्लुडानन्दं मुक्त एव च भोक्ष्यति ॥
नित्यमुक्तः पूर्णसुखः स्वतंत्रः पुरुषोत्तमः ।
परतंत्रः कथं जीवो योग्यः सोऽस्मीति वेदितुम् ॥
तस्मात् सोऽस्मीति नैवायं विजानीयात् कदाचन ।
तदीयोऽस्मीति जानीयात् सर्वदैव बुधस्ततः ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-497" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्मा अस्मिन् सन्दोघे गहने प्रविष्टः ।
स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-498" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V13_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यस्य ज्ञातो नित्यबुद्धो भगवान् पुरुषोत्तमः ।
तस्य लोकः स एवैको यो लोकः परमात्मनः ॥
स हि विष्णुः परो वायोरपि कर्ता प्रकीर्तितः ।
विश्वो वायुः समुद्दिष्टः पूर्णत्वाज्जीवसङ्घतः ॥
तदन्यस्यापि सर्वस्य कर्तैको विष्णुरेव हि ।
प्रविष्टो गहने देहमध्ये सन्दोहनामनि ॥
तज्ज्ञानी याति तं लोकं तत्प्रसादाच्च वर्तते ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-499" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदीर्महती विनष्टिः ।
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-500" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदैतमनुपश्यन्त्यात्मानं देवमंजसा ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-501" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यस्मादर्वाक् संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते ।
तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-502" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V16_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "न वत्सराश्च नाहानि यस्य नित्याविकारतः ॥
ज्योतिषां ज्योतिरचलं तद्देवाः समुपासते ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-503" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः ।
तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-504" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V17_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्राणश्चक्षुस्तथैवान्नं मनः श्रोत्रं च पञ्चमम् ॥
मूलप्रकृतिसंयुक्तं यद्गतं प्रतिपूरुषम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-505" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रम् ।
मनसो ये मनो विदुस्ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-506" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-507" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V19_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्य रूपगुणाद्येषु न कश्चिद्भेद इष्यते ॥
तद्भेददर्शी संयाति मृत्योर्मृत्य्वभिधं तमः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-508" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमयं ध्रुवम् ।
विरजः पर आकाशादज आत्मा महान् ध्रुवः ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-509" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायेद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् " इति ॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-510" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V21_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्मादेकप्रकारेण द्रष्टव्यो भगवान् हरिः ॥
परिमाणविहीनत्वादप्रमेय इतीरितः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-511" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन् शेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवत्येतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्त्येतद्ध स्म वैतत् पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते । किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-512" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V22_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वमस्य वशे यस्माद्धरिः सर्ववशी ततः ।
सर्वस्य ब्रह्मरुद्रादेरन ईशान एव च ॥
गुणाधिकः पालकश्चेत्यतोऽधिपतिरीरितः ॥ "इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-513" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V22_B2" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "भूत एवाधिपतिर्नास्याधिपत्यमादिमत् ।
नित्यबोधात्मकत्वाद्यो मुनिः प्रोक्तो जनार्दनः ।
तं विद्वांश्च मुनिर्नाम बोधस्तस्याप्यमुख्यतः ।
यं विदित्वा विमुक्ताश्चायुक्तकामविवर्जिताः ॥
उत्पत्तिलयहीनाश्च नित्यानन्दैकभोगिनः । आनन्दभिक्षां विष्णूत्थां चरन्त्यज्ञानवर्जिताः ॥
स एष मोक्षदो विष्णुर्यत्कल्याणं कृतं मया। पापं कृतं मयेत्येतन्न कदाचित् करिष्यति ॥
कृते मया पुण्यपापे इति यच्चेतनात्मनाम् ।तत्सर्वमत एवोक्तं विष्णोः सर्वेश्वरेश्वरात् ॥
तीर्णो हि वर्तते नित्यं पुण्यपापे जनार्दनः ।
नैनं कदाचित् तपतः पुण्यपापे जनार्दनम् ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-514" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतदृचाभ्युक्तम् ।
एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् ।
तस्यैव स्यात् पदं वित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति ॥
तस्मादेवंवित् शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति
नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति
नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति
विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राड् इति होवाच याज्ञवल्क्यः
सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-515" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V23_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "शान्तिस्तु भगवन्निष्ठा दमो मदविनिग्रहः ।
हृदिस्थविष्णौ सन्तोषः सदैवोपरमः स्मृतः ॥
तितिक्षा द्वन्द्वसहता क्षमा क्रोधासमुत्थितिः ॥इति शब्दनिर्णये ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-516" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा एष महानज आत्माऽन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-517" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V25" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ २६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-518" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S04_V25_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "न मरिष्यतीति ह्यमरो न मृतो यत्ततोऽमृतः ॥
ब्रह्मायमाप्तकामत्वादेवं यो वेद तं परम् ।
आप्तकामोऽभयश्चैव भवेद् विष्णोरनुग्रहात् ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-519" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "मैत्रेयीब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-520" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुः मैत्रेयी च कात्यायनी च । तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद् वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-521" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-522" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनामृताऽहो नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यादमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-523" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेत्थ तदेव मे ब्रूहीति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-524" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियामवृद्धं तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-525" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V05_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रियां वाचमवर्धयद्भवती ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-526" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच न वा ओ पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा ओ जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा ओ पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा ओ वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा ओ पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति । न वा ओ ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा ओ क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा ओ लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति । न वा ओ वेदानां कामाय वेदाः प्रियाः भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा ओ सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा ओ द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-527" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद । लोकास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो लोकान् । वेद देवास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-528" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दान् शक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-529" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा शंखस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शंखस्य तु ग्रहणेन शंखध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-530" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-531" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथाऽऽर्द्रेन्धाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि इष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-532" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तमेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् । स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा ओऽयमात्माऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-533" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V12_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "बाह्याभ्यन्तरविशेषाभावेन सर्वत्र लवणरसघन एव ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-534" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापीपिपन् न वा अहमिमं विजानातीति स होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा ओऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-535" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V13_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "न वा अहमिमं विजानातीति । ओयमिमं परमात्मानं जीवो न विजानातीत्यत्रैव भगवान् मोहान्तं मोहाख्यं नाशमापीपिपत् प्रापयामास । अतोऽहं ब्रह्मास्मीत्यादिष्वप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाचीति सिद्धम् । अन्यथा कथमहं विजानातीति युज्येत ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-536" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत् केन कं जिघ्रेत् केन कं रसयेत् तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं शृणुयात् तत् केन कं मन्वीत तत् केन कं स्पृशेत् तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनाऽसि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-537" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S05_V14_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एतावद्विज्ञातुः परमात्मनो विज्ञानादिकमेव ह्यमृतत्वं मोक्षः ।
विष्णोर्ज्ञानादिकं मोक्षस्तदभावे कुतः सुखम् ।
ज्ञेयाभावान्न हि ज्ञानं ज्ञानाभावे हि शून्यता ।
तस्माज्ज्ञेययुतो मोक्षः सुखरूपत्वतः सदा ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-538" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S06" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "वंशब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-539" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S06_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनात् ।
गौपवनः पौतिमाष्यात् ।
पौतिमाष्यो गौपवनात्।
गौपवनः कौशिकात् ।
कौशिकः कौंडिन्यात् ।
कौंडिन्यः शांडिल्यात् ।
शांडिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-540" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S06_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "गौतमः आग्निवेश्यादाग्निवेश्यः गार्ग्याद् ।
गार्ग्यो गार्ग्याद् ।
गार्ग्यो गौतमात्।
गौतमः सैतवात् ।
सैतवः पाराशर्यायणात् ।
पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद् ।
गार्ग्यायण उद्दालकायनाद् ।
उद्दालकायनो जाबालायनाज्जाबालायनो माध्यंदिनायनान्माध्यंदिनायनः सौकरायणात् ।
सौकरायणः काषायणात् ।
काषायणः सायकायनात् ।
सायकायनः कौशिकायनेः॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-541" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S06_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C04_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "कौशिकायनिः घृतकौशिकात्
घृतकौशिकः पाराशर्यायणात् ।
पाराशर्यायणः पाराशर्यात् ।
पाराशर्यो जातूकर्ण्यात् ।
जातूकर्ण्यः आसुरायणाच्च यास्काच्च आसुरायणस्त्रैवर्णेस्त्रैवर्णिः औपबन्धनेरौपन्धनिरासुरेः आसुरिर्भारद्वाजात् भारद्वाजः आत्रेयात् आत्रेयो माण्टेः माण्टिर्गौतमात् गौतमो वात्स्यात् वात्स्यः शांडिल्यात् शांडिल्यः कैशोर्यात् काप्यात् कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् कुमारहारितो गालवात् गालवो विदर्भी कौंडिन्यात् विदर्भीकौंडिन्यो वत्सनपादो बाभ्रवात् वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः सौभरो अयास्यात् आंगिरसादयास्य आंगिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्रात् विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणात् दध्यंग्ङाथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात् प्रध्वंसन एकऋषेः एकऋषिर्विप्रचित्तेः विप्रचित्तिः व्यष्टेः व्यष्टिः सनारोस्सनारुः सनातनात् सनातनः सनकात् ।
सनकः परमेष्ठिनः।
परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-542" |
|---|
| oldKey | "BR_C04_S06_V03_B1" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C04_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अवरेभ्योऽपि शृण्वन्ति परमाश्च क्वचित् क्वचित् ।
लीलयैव न चैतेषां परमत्वं विहीयते ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-543" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S01" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "प्रथमं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-544" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-545" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S01_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अवतारा महाविष्णोः सर्वे पूर्णाः प्रकीर्तिताः ।
पूर्णं च तत्परं रूपं पूर्णात् पूर्णाः समुद्गताः ॥
परावरत्वं तेषां तु व्यक्तिमात्रविशेषतः ।
न देशकालसामथ्यैः पारावर्यं कथञ्चन ॥
पूर्वरूपस्य पूर्णस्य पूर्णं यदवतारगम् ।
रूपं तदात्मन्यादाय पूर्णमेवावतिष्ठते ॥
लौकिकव्यवहारो यो भूभारक्षपणादिकः ।
तददृष्टिं विना नान्यो लयः कृष्णादिनां क्वचित् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-546" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ॐ खं ब्रह्म खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदेनैन यद्वेदितव्यम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-547" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S01_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ओताः सर्वगुणाः यस्मादस्मिन्नों विष्णुरुच्यते ।
खं प्रकाशस्वरूपत्वात् ब्रह्मतद्व्याप्तरूपतः ॥
पुनः खं सुखरूपत्वम् पुराणं तदनादितः ॥
वायोश्च रतिदं यस्माद्वायुरं ब्रह्म तत्परम् ।
ख्यातत्वाच्चापि तत्खं स्याद्रौहिणेयस्तथाऽवदत् ॥
वेदोऽयं ज्ञानरूपत्वादिति यं ब्राह्मणा विदुः ।
निर्दोषत्वाद इत्युक्तस्तेन वेद्यं सदाऽखिलम् ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-548" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S02" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "द्वितीयं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-549" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं, देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्ठा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-550" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनं मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-551" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्त्रयं शिक्षेद्दमं दानं दयामिति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-552" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S02_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ज्ञानदानं तु देवानां फलदानं तु कर्मणाम् ।
विष्णुना विहितं पूर्वं पुनर्देवनरासुराः ॥
ब्रह्माणमपि पप्रच्छुर्देवानां सद्गुणोच्छ्रितेः ।
अनहंकारमात्रं तु ब्रह्मणा विहितं सदा ॥
सर्वोच्चमोक्षसम्प्राप्त्यै नराणां ज्ञानसाधनम् ॥
देवादीनां दानमेव हविरादेः प्रकीर्तितम् ।
तमःप्राप्तिविलम्बाय दैत्यानां विहिता दया ॥ इति प्रवृत्ते ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-553" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S03" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "तृतीयं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-554" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S03_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद्ब्रह्मैतत्सत्यं तदेतत्त्र्यक्षरं हृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-555" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S03_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "हरणाद्यज्ञभागादेर्ज्ञानादेर्दानतस्तथा ।
यानादव्यवधानेन परस्य ब्रह्मणस्तथा ॥
ब्रह्मा हृदय इत्युक्तस्तस्यैवंविदपि ध्रुवम् ।
हृतिदानस्वर्गयानपात्रं स्यात् तत्प्रसादतः ॥
हृत्वैवास्मै ददत्यद्धा स्वकीयाश्चान्य एव च ॥ इति निर्णये ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-556" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S04" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "चतुर्थं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-557" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्धैतदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमांल्लोकान् जित इन्वसावसद्य एवमेतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यं ह्येव ब्रह्म ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-558" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S05" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "पञ्चमं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-559" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S05_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आप एवेदमग्र आसुस्ता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवांस्ते देवाः सत्यमेवोपासते ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-560" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S05_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सदा सर्वगुणापानादापो नारायणः स्मृतः ।
द्वितीयं रूपमसृजद्वासुदेवं स आत्मनः ॥
ब्रह्म सत्यमिति प्राहुर्वासुदेवाभिधं प्रभुम् ।
तस्माद् ब्रह्माऽजनि ततो देवाः सर्वेऽपि जज्ञिरे ॥
तस्माद्ब्रह्मादयो देवा वासुदेवमुपासते ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-561" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S05_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतत् त्र्यक्षरं सत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतं सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वांसमनृतं हिनस्ति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-562" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S05_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ततत्वादन्यथाज्ञानं तीत्येव समुदीर्यते ॥
तस्याधस्तात् सदात्मा तु सादयन्ननृतं हरिः ।
उपरिष्टाच्च यन्नामा नाशयन्ननृतं स्थितः ॥
एवं यो वेद तं विष्णुं नास्य मिथ्यादृशिर्भवेत् ।
योग्यतापेक्षयोपासाऽथापरोक्ष्याच्च तत्फलम् ॥
सम्यग्ददात्यन्यथा च भवेदेवोपकारिणी ।
अत्ययोग्याय चेत् सा स्याद्विपरीतफलप्रदा ॥
वैपरीत्यं तु विघ्नः स्यान्न तु पापं कथञ्चन ॥ इत्याधारे ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-563" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S06" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "षष्ठं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-564" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S06_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्यत्तत् सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मंडलं पश्यति नैनमेते रश्मयःप्रत्याययन्ति ॥१॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-565" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S06_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S06" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स वासुदेवो भगवानादित्यस्थो जनार्दनः ।
आदित्यनामा सम्प्रोक्तो आदानाद्धविषां सदा ॥
स एव दक्षिणाक्षिस्थस्तच्च रूपद्वयं हरेः ।
अन्योऽन्यस्मिन् स्थितं नित्यं प्राणैश्च सह रश्मिभिः ॥
दक्षिणाक्षिस्थितो विष्णुर्यदाऽस्मादुत्क्रमिष्यति ।
तदैव म्रियमाणस्तु जीवः पश्येद्विरश्मिकम् ॥
सूर्यस्य मंडलं नास्य प्रतीयन्ते हि रश्मयः ।
तत्क्षणे नियमेनैव केषाञ्चित् सप्तभिर्दिनैः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-566" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S07" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "सप्तमं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-567" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S07_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे सुवरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षर तस्योपनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-568" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S07_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे सुवरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-569" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S07_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S07" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्य विष्णोः शिरो नाम भावनाद् भूरिति स्मृतम् ।
भावनं रक्षणं प्रोक्तं दृष्ट्या वाचा च रक्षति ॥
उत्पादनाद्भुनामा स्याद् दक्षिणो बाहुरस्य तु ।
विनाशनाद्व इत्युक्तः सव्यो बाहुः परात्मनः ॥
स्वित्यानन्दस्समुद्दिष्टो वरिति ज्ञानमुच्यते ।
मुक्तिदानेन तद्दानात् सुवस्य पदद्वयम् ॥
दक्षिणश्चैव सव्यश्च क्रमाद्वर्णद्वयोदितौ ।
पादावस्य हि तत्प्राप्तिर्मुक्तिरित्यभिधीयते ॥
अहमेषो ह्यहेयत्वाज्जीवेन सहभावतः ।
असावहरिति प्रोक्तः सर्वलोकप्रकाशनात् ॥
तद्वेदनात् सर्वपापं हन्ति चैव जहाति च ।
कानिचिद्धन्ति पापानि कल्पादीन् संजहाति च ॥ इति प्रवृत्ते ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-570" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S08" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "अष्टमं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-571" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S08_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन् अन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-572" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S08_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S08" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मनोमयो ज्ञानमयः प्रधानं मय उच्यते ।
महाज्ञानात्मकश्चैव भारूपः सद्गुणात्मकः ॥
सर्वप्रशासको विष्णुः ......।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-573" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S09" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "नवमं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-574" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S09_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद् विद्युत् विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद्ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-575" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S09_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S09" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "......... विद्युत्सर्वस्य वेदनात् ।
य एनं वेद वेत्तारं सर्वस्य परमेश्वरम् ॥
पादेभ्यो मोचयित्वैनं स्वात्मानं वेदयेद्धरिः ॥ इति माहात्म्ये ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-576" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S10" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "दशमं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-577" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S10_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S10" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-578" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S10_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S10" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सरस्वती तु गोरूपा तस्या देवादयोऽखिलाः ।
स्तनानेवोपजीवन्ति तस्या वायुः पतिः प्रभुः ॥
वत्सो मनोऽभिमान्यस्याः सरस्वत्याः सदाशिवः ॥ इति प्रभंजने ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-579" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S11" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "एकादशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-580" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S11_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S11" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तःपुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषं शृणोति ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-581" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S11_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S11" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अग्निनामा तु भगवानौदर्याग्नौ प्रतिष्ठितः ।
विश्वैर्गुणैः समेतत्वादनन्तत्वाच्च स प्रभुः ॥
वैश्वानर इति प्रोक्तः सोऽग्निरंगप्रणेतृतः ।
तस्य विष्णोस्तुतिरियं क्रियते वायुना सदा ॥
कर्णौ पिधाय या नित्यं श्रोतुं शक्याऽखिलैः सदा ॥ इति तंत्रमालायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-582" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S12" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "द्वादशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-583" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S12_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S12" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स चंद्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-584" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S12_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S12" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रवहं वायुपुत्रं च सूर्यसोमौ च विद्युतम् ।
प्राप्य प्रधानवायुं च याति तत्परमं पदम् ॥ इति ब्रह्मांडे ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-585" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S13" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "त्रयोदशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-586" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S13_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S13" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतद्वै परमं तपो यद् व्याधितस्तप्यते परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-587" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S13_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S13" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "व्याधीञ्छवहृतिं चैव शवदाहादिकं तथा ।
विष्णवे तप इत्येव चिन्तयन् याति तत्परम् ॥ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-588" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S13_V01_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S13" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ओशितोऽपि क्लेशादीनतीतैष्यानपीह यः ।
विष्णवे तप इत्येव प्रार्पयेत् स परं व्रजेत् ॥
विष्णोः स्वरूपवेत्ता चेदन्यथा न कथञ्चन ।
यथा स्वरूपवेत्तुः स्यादेकैकापि ह्युपासना ॥
मोक्षाय सहिताः सर्वा अप्यज्ञस्य न तु क्वचित् ।
यथावत् केशवं ज्ञात्वा स्वयोग्यैकामुपासनाम् ॥
अपि कृत्वा हरिं दृष्ट्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-589" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S14" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "चतुर्दशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-590" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S14_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S14" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्यक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह्येव देवते एकधा भूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किंस्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माह पाणिनामा प्रातृदः कस्त्वेनयोरेकधा भूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै वि अन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-591" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S14_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S14" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अन्नाभिमानी ब्रह्मैव प्राणो वायुरुदाहृतः ।
अन्योन्यानुप्रविष्टौ तौ सर्वदैव सुसंस्थितौ ॥
वायुं विना ब्रह्मणोऽपि शरीरं पूतिमेष्यति ।
वायुश्च शोषमायाति विना ब्रह्माणमंजसा ॥
तयोरेवं परिज्ञानी वासिष्ठः पाणिनामकः ।
ब्रह्मवायुविदे कार्यं किं मया साध्वसाधु वा ॥
नासाधुना साधयितुं शक्योऽसौ साधुनाऽपि वा ।
नार्थोऽस्य कृतकृत्यत्वाद्यदि वेद परं हरिम् ॥
इति प्रशस्य तज्ज्ञानं वसिष्ठं प्राब्रवीत् ततः ।
अन्योन्यानुप्रवेशेन ब्रह्मवाय्वोर्विशेषतः ॥
प्रयोजनं कस्य भवेदिति तं प्रातृदोऽब्रवीत् ।
ब्रह्मा निवेशनीयः स्याद्वायुश्चास्य रतिप्रदः ॥
अतः प्रयोजनं तुल्यमन्योन्यात्मप्रवेशनात् ॥ इति सन्धाने ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-592" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S15" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "पञ्चदशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-593" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S15_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S15" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदं सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मा उक्थविद्वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-594" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S16" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "षोडशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-595" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S16_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S16" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-596" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S17" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "सप्तदशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-597" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S17_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S17" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-598" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S18" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "अष्टादशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-599" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S18_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S18" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणे हि वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमत्र प्राप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-600" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S18_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S18" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "उत्थापनादुक्थनामा मोक्षे प्राप्यो यतोऽखिलैः ।
यजुश्चाथ क्षतात्त्राणात् क्षत्रं सम्यक्त्वकारणात् ॥
सर्वेषां साम च प्रोक्तो वायुरेव जगत्पतिः ॥ इति च ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-601" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "एकोनविंशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-602" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-603" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-604" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-605" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ऋग्यजुःसामसंस्थो यो भगवान् पुरुषोत्तमः ।
स द्वितीयपदेनोक्तो गायत्र्याः प्रथमेन तु ॥
भूम्यन्तरिक्षस्वर्गस्थतृतीयेन समीरगः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-606" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परो रजा य एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति सर्वमु ह्येवैष रज उपर्युपरि तपति एवं हैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-607" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "चतुर्थपादो गायत्र्याः प्रणवः समुदीरितः ॥
तद्वाच्यो भगवान् सूर्यमंडलस्था तु या रमा ।
सत्वात्मिक्येव तत्संस्थो रज आख्यप्रधानतः ॥
परः परोरजस्तस्माद्य एवं वेद तं प्रभुम् ।
लोकानां चैव वेदानां सर्वेषां प्राणिनामपि ॥
सदैवाधिपतिर्भूत्वा यशःश्रीमांश्च जायते ।
गायत्र्युपासने योग्यो ब्रह्मैव हि चतुर्मुखः ॥
तस्मादुक्तफलं सर्वं सर्वोपासा च तस्य हि ।
अंशेनोपासनान्येषां फलमल्पं च योग्यतः ॥
गायत्र्या न ह्ययोग्योऽपि द्विजो योग्योऽपि न क्वचित् ।
ऋते विरिञ्चं तस्मात् तु तस्यैव ह्यखिलं फलम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-608" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सैषा गायत्र्येतस्मिंस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद्धैतत्सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानीं द्वौ विवदमानावेयातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादहमदर्श मिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद्वै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलं सत्यादो जीय इत्येवमेषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयांस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणांस्तत्रे तद्यद्गयांस्तत्रे तस्मात् गायत्रीनाम स यामेवामूं सावित्रीमन्वाहैषैव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणांस्त्रायते ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-609" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अभिमानिनी तु गायत्र्या मुख्या श्रीः परिकीर्तिता ।
ब्रह्माण्यमुख्याऽतो ज्ञेया सा तु ब्रह्माणमाश्रिता ॥
ब्रह्मा तु मुख्यगायत्री सा परोरज आश्रयेत् ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-610" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तां हैतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वाग् अनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति तन्न तथा कुर्याद्गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयाद्यदि ह वा अप्येवंविद्बह्विव प्रतिगृह्णाति न ह वै तद्गायत्र्या एकञ्च न पदं प्रति ॥६॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-611" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तामाहुः परमां देवीं वृणीमह ऋगात्मिकाम् ॥
नैव सा प्रतिमा मुख्या गायत्री परमा स्मृता ।
गायत्रीमुख्यवेत्तारो योग्या ब्रह्मपदस्य ये ॥
तेषां प्रतिग्रहाद्दोषो न कश्चन भविष्यति ।
न चैकपदविज्ञानफलायालं सुखानि च ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-612" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स य इमांस्त्रींल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात् । सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद्द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत्प्रतिगृह्णीयात् ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-613" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विष्णोर्यदा भगवतो लोकान् वेदांश्च चेतनान् ।
विरिञ्चिजन्मन्यखिलान् प्रतिगृह्णन्ति कृत्स्नशः ॥
गायत्रीपदविज्ञानफलमात्रं तदा भवेत् ।
प्रणवप्रतिपाद्यं यत् तुरीयं भगवत्पदम् ॥
सर्वगं वासुदेवाख्यं न तत्केनचिदाप्यते ।
गायत्रीत्रिपदज्ञेयमनिरुद्धादिकं त्रयम् ॥
ब्रह्मा व्याप्नोति मुक्तः सन् वासुदेवं न कश्चन ।
लोकस्थमनिरुद्धं च प्रद्युम्नं वेदगं तथा ॥
संकर्षणं वायुसंस्थं व्याप्य ब्रह्मा विमुक्तिगः ।
गायत्रीज्ञानसामर्थ्यात् प्रणवज्ञानशक्तितः ॥
वासुदेवं च सम्पश्येन्न व्याप्नोति कथञ्चन ।
अनन्तत्वाद्वासुदेवः कथं व्याप्यो भवेत् प्रभुः ॥
वर्णत्रयात्मप्रकृतिमतीतः सूर्यमंडले ।
गुणत्रयात्मिकां बाह्ये यतोऽतः स परोरजाः ॥
यतो न व्याप्यते सोऽसौ ब्रह्मणाऽपि कथञ्चन ।
अतः प्रतिग्रहो नास्य वासुदेवस्य विद्यते ॥ इति प्रकाशिकायाम् ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-614" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स काम ऋद्ध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठते अहमदः प्रापमिति वा ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-615" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अष्टाक्षरत्वाद् गायत्र्याः प्रोक्ता सैकपदीति च ।
प्रणवेन सहैतास्तु गायत्र्याश्चतुरस्तदा ॥
अकाराद्यतिशान्तान्तः प्रणवोऽष्टाक्षरो यतः ।
पादः प्रणवसंयुक्तो गायत्री सा पृथग्यदा ॥
द्विपदीति तदा प्रोक्ता त्रिपदी स्वपदैस्त्रिभिः ।
चतुष्पदी सप्रणवा ब्रह्मणोऽन्यैर्न गम्यते ॥
अपदी च ततः प्रोक्ता गायत्र्येवमुपस्थिता ।
कामाप्राप्तिमपूर्तिं वा शत्रवे सा करिष्यति ॥
असावदो मैव प्रापन्नास्मै कामः समृध्यताम् ।
उपस्थिता चेदित्थं सा यद्यदोऽहं समाप्नुयाम् ॥
इति सा कामपूर्तिं च स्वस्य सम्यक् करिष्यति ।
सम्यग्ब्रह्मपदावाप्तिं तद्योग्यां मुक्तिमेव च ॥
ब्रह्मणोपासितो दद्याद् गायत्र्याः पुरुषोत्तमः ।
अलेपं सर्वपापेभ्यो विशेषेण प्रतिग्रहात् ॥
तद्योग्यां मुक्तिमन्येषां यथायोग्यमुपासितः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-616" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद्गायत्रीविदब्रूथा अथ कथं हस्तीभूतो वहसीति मुखं ह्यस्याः सम्राण्न विदाञ्चकारेति होवाच तस्याग्निरेव मुखं यदि ह वा अपि बह्विवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्सन्दहत्येवं हैवैवंविद्यद्यपि बह्विव पापं कुरुते सर्वमेव तत्संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः सम्भवति ॥९॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-617" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S19_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S19" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वक्तव्यो भगवान् विष्णुर्गायत्र्या मुखसंस्थितः ॥
अग्निमंडलगो नित्यमग्निनामाऽग्रणीत्वतः ।
गायत्र्यास्तु परिज्ञानं ज्ञाते मुख्यगते हरौ ॥
सफलं भवेदन्यथा तु न सम्यक्फलदं भवेत् ।
गायत्रीमुखगो विष्णुर्ज्ञेयः सर्वात्मना ततः ॥
संहर्ता सर्वदोषाणामग्निस्थः सर्वदाहकः ।
नित्यानन्दोऽग्निवर्णश्च रामः परशुभृत् सदा ॥ इति गायत्रीसंहितायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-618" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "विंशं ब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-619" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-620" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सूर्यमंडलनाम्ना तु पात्रेण स्वमुखं हरिः ।
पिधायैव जगत्सर्वं पश्यत्यमितविक्रमः ॥
उदकं पीयते तेन तमसस्त्रायते जगत् ।
यतोऽतः पात्रमुद्दिष्टं विद्वद्भिः सूर्यमंडलम् ॥
पूषा पूर्णत्वतो विष्णुर्दृष्टये विष्णुधर्मिणः ।
स्वमुखं प्रकाशयेदेकं नान्यथा तु कथञ्चन ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-621" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।
समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-622" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "नान्यो यत्तादृशो ज्ञाता तस्मादेकऋषिर्हरिः ।
यमो नियमानात् प्रोक्तः सूर्य ऊरीकृतेरयम् ॥
ज्ञेयः प्रजापतेरेव प्राजापत्यस्ततः स्मृतः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-623" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-624" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्राणे स्थितो यः पुरुषः सोऽसावहमिति स्मृतः ॥
अहेयत्वादसुत्वाच्च मेयत्वाच्चास्मिनामकः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-625" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-626" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अदोषत्वाद् अ इत्युक्तो वायुस्तन्निलयो यतः ॥
अनिलं तत एवासावमृतं चेति कीर्त्यते ।
तदाश्रयोऽपि ह्यमृतः किमु साक्षात्स्वयं हरिः ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-627" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-628" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "क्रतुश्च ज्ञानरूपत्वात् स एव हि जनार्दनः ।" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-629" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-630" |
|---|
| oldKey | "BR_C05_S20_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C05_S20" |
|---|
| chapter | "BR_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सोऽग्निरंगप्रणेतृत्वात् विश्वज्ञानविदां वरः ॥ इति च ।
जुहुराणं अल्पं कुर्वत् । न वा अहमिमं जानातीतिवत् । सर्वत्राप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाच्येव ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-631" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "प्रथमब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-632" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-633" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-634" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति । प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-635" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो ह वै सम्पदं वेद सर्वं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै सम्पच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसम्पन्ना सं हास्मै पद्यते थं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-636" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो ह वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥५॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-637" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजापते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-638" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ते हेमे प्राणा अहं श्रेयसे विविदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-639" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "वाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तः चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-640" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "चक्षुः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्त श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-641" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा बधिराः अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-642" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धाः अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-643" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "रेतो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच । कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबाः अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-644" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ ह प्राणः उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पट्वीशशङ्कून् संवृहेदेवं हैवेमान् प्राणान् सम्बबर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रामीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥१३॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-645" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद्वा अहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति चक्षुर्यद्वा अहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीति श्रोत्रं यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद्वा अहं प्रजापतिरस्मि त्वं तत्प्रजापतिरसीति रेतः तस्योमे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्च आ श्वभ्यः आ क्रिमिभ्यः आ कीटपतंगेभ्यः तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं परिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वा चाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते तस्मादेवं विद्वानशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेत् ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-646" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S01_V14_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C06_S01" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अहं श्रेयोविवादं तु येन कृत्वाऽखिलाः सुराः ।
असमर्थाः स्वरक्षायां स वायुः सुरनायकः ॥
विवदन्तोऽखिला देवा ययुर्नारायणं प्रभुम् ।
अहं श्रेयानहं श्रेयानिति वायुपुरःसराः ॥
उक्तं भगवता तेन येन त्यक्तेऽखिला अपि ।
स्थातुं न शक्ताः स श्रेयानित्युक्ताः पुनरागताः ॥
उत्क्रान्ताश्च पुनः सर्वे तद्विज्ञप्त्यै पृथक् पृथक् ।
सुपर्णशेषरुद्रेंद्रसूर्यादिषु पृथक् पृथक् ॥
उत्क्रान्तेषु ब्रह्मदेहाच्छरीरं न पपात ह ।
ऋत उत्क्रान्तमेकं तु तदन्ये निविशन्ति च ॥
प्राण उच्चिक्रमिषति स्थातुं नाशक्नुवन् परे ।
प्राणं विना न च ब्रह्मा तं विना प्राण एव च ॥
अन्योन्यापाश्रयाच्छक्तौ स्थातुमन्ये कुतस्ततः ।
तस्मात् प्राणो वरो देवेष्विति सर्वेऽपि मेनिरे ॥ इति पवमाने ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-647" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "द्वितीयब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-648" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम । स आजगाम जैबलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति । स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टो न्वसि पित्रेति । ओमिति होवाच ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-649" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयन्त्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति नेति होवाच
वेत्थ यथाऽसौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न सम्पूर्यता३ इति नेति होवाच ।
वेत्थो यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती३ इति नेति हैवोव ।
अथ वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि नर्षेर्वचः श्रुतं
द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानां
ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति
नाहमत एकञ्चन वेदेति होवाच ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-650" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैनं वसत्योपमंत्रयाञ्चक्रे नादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरं तं होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ततो नैकञ्चन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-651" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्चन वेद, सर्वमहं तत् तुभ्यमवोचं प्रैहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति ॥ स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहरयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-652" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच प्रतिज्ञातो स एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-653" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो अश्वानां दासीनां प्रवराणां परिधानस्य मा नो भवान् । बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यावदान्यो अभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचाहस्मैव पूर्व उपयन्ति सहोपायनकीर्त्या उवास ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-654" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराध्यस्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मण उवास ।
तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वेवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-655" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गाराः अवान्तरदिशो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-656" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरंगारा ह्रादुनयो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः सम्भवति ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-657" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निधूर्मो रात्रिरर्चिश्चंद्रमा अंगारा नक्षत्राणि विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवति ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-658" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः सम्भवति ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-659" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽंगारा अभिनन्दा विष्फुलिंगास्तस्मिन्ने तस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-660" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरंगारा अंगारा विष्फुलिंगा विष्फुलिंगाः तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णो सम्भवति ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-661" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ् आदित्य एति ।
मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्यात् वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानव एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति
ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-662" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकान् जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणाऽऽदित्य एति ।
मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चंद्रं ते चंद्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानं आप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति ।
तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद् वायुं वायोः वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ ततो जायन्ते ते लोकान् प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्ते ।
अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतंगा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-663" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S02_V15_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C06_S02" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "द्युपर्जन्यधरापुंस्त्रीसंस्थितं पञ्चरूपिणम् ।
नारायणं वासुदेवं तथा संकर्षणं प्रभुम् ॥
प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च क्रमाद् ध्यायंस्तु सर्वदा ।
पञ्चाग्निविन्नाम भवेत् स याति परमं पदम् ॥
नास्य संसर्गदोषोऽपि कदाचन भविष्यति ॥ इति त्रैविद्ये ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-664" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "तृतीयब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-665" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहं उपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति सम्भृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थंसन्नीय जुहोति
यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामांस्तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि
ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा
या तिरश्चीनि पद्यतेऽहं विधरणी इति तां त्वा घृतस्य धारया यजेंसराधनीं महं स्वाहा ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-666" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
श्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
मनसे स्वाहा प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रव मवनयति ।
रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-667" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवस्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-668" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकशफमसि हिंकृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमसि उद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे सन्दीप्तमसि विभुरसि प्रभुरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-669" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैनमुद्यच्छत्यामं स्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स मां राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-670" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा । भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा । धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशन्ति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशमेकपुंडरीकमसि अहं मनुष्याणामेकपुंडरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-671" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तं हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-672" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैंग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-673" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतमु हैव मधुकः पैंग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-674" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकाय आयस्थूणायन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-675" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-676" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरन् शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वाऽनन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-677" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S03_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S03" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियंगवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-678" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "चतुर्थब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-679" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-680" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स ह प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाऽध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजन् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-681" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणो समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृंक्तेऽथ यदिदमविद्वानधोपहासं चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृंजते ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-682" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्यभिप्राण्यादिंद्रियेण ते आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमार हारीत आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिंद्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-683" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदभिमृशेदनु वा मंत्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कात्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मा मैत्विंद्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकांगुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-684" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमंत्रयेत मयि तेज इंद्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-685" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मात् मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमंत्रयेत ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-686" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिंद्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-687" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सा चेदस्मै दद्यादिंद्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥
स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेत् ।
अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे ॥
स त्वमंगकषायोऽसि दिग्धविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-688" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायाभिप्राण्यापान्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-689" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ यामिच्छेद् गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्याभिप्राण्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-690" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ यस्य जायायै जारः स्यात् तं चेत् द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमं शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रं पशूंस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशा पराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिंद्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवं विद्वान् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवं विच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥१२॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-691" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कंसेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥१३॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-692" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो गौरो जायेत वेदमनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातां ईश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-693" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिंगलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-694" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-695" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ य इच्छेद्दुहिता मे पंडिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-696" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पंडितो विजिगीथः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयित्वा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-697" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं वेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहाऽनुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-698" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैनामभिपद्यते - अमोऽहमस्मि सा त्वं, सा त्वमस्यमोहं, सामाहमस्मि ऋक् त्वं , द्यौरहं पृथिवी त्वं, तावेहि संरभावहै, सह रेतो दधावहै, पुंसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-699" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि ।
विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।
आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥
गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके ।
गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-700" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ ।
तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये ॥
यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिंद्रेण गर्भिणी ।
वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति ॥ २२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-701" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीं समिंगयति । सर्वत एवा ते गर्भं एजतु सहावैतु जरायुणा इंद्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयस्तमिंद्र निर्जहि गर्भेण सावरं सहेति ॥ २३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-702" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "जातोऽग्निमुपसमाधायांक आधाय कंसे पृषदाज्यं सन्नीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोति अस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्द्यां मा च्छैत्सीः प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा मयि प्राणांस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा ।
यत्कर्मणात्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम् ।
अग्निष्टस्त्विष्टकृद्विद्वान् स्विष्टं सुहुतं करोतु नः स्वाहेति ॥ २४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-703" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V25" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथास्य दक्षिणं कर्ममभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतं संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः त्वयि सर्वं दधामीति ॥ २५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-704" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V26" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-705" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति , यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-706" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S04_V28" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S04" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथास्य मातरमभिमंत्रयत इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् ।
सा त्वं वीरवती भव याऽस्मान् वीरवतोऽकरदिति
तं वा एतमाहुरतिपिता बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रायच्छ्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति ॥ २८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-707" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S05" |
|---|
| type | "section" |
|---|
| parent | null |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "brahmanam" |
|---|
| text | "पञ्चमब्राह्मणम्" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-708" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S05_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ वंशः पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्
कात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्रात्
गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्रात्
भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्
पाराशरीपुत्र औपस्वस्तिपुत्रात्
औपस्वस्तिपुत्रः पाराशरीपुत्रात्
पाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्
कात्यायनीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-709" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S05_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आत्रेयीपुत्रात् आत्रेयीपुत्रो
गौतमीपुत्रात् गौतमीपुत्रः
भारद्वाजीपुत्राद् भारद्वाजीपुत्रः
पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रः
वात्सीपुत्रात् वात्सीपुत्रः
पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो बर्कारुणीपुत्रात्
बार्कारुणीपुत्रो आर्तभागीपुत्रात्
आर्तभागीपुत्रः शौंगीपुत्रात् शौंगीपुत्रः
सांकृतीपुत्रात् सांकृतीपुत्र
आलम्बायनीपुत्राद् आलम्बायनीपुत्रः
आलम्बीपुत्राद् आलम्बीपुत्रो
जायन्तीपुत्रात् जायन्तीपुत्रो
मांडूकायनीपुत्रात् माण्डूकायनीपुत्रः
माण्डूकीपुत्रान्माण्डूकीपुत्रः शांडिलीपुत्राच्छांडिलीपुत्रो राथीतरीपुत्राद्
राथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्राद् भालुकीपुत्रः
क्रौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ
वेदभृतीपुत्रात् वेदभृतीपुत्रः
कार्शिकेयीपुत्रात् कार्शिकेयीपुत्रः
प्राचीनयोगीपुत्रात् प्राचीनयोगीपुत्रः
सांजीवीपुत्रात् सांजीवीपुत्रः
प्राश्नीपुत्रात् आसुरिवासिनः प्राश्नीपुत्रा
आसुरायणाद् असुरायणः
आसुरेरासुरिः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-710" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S05_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "याज्ञवल्क्याद् याज्ञवल्क्यः
उद्दालकाद् उद्दालकः
अरुणात् अरुणः
उपवेशेः उपवेशिः
कुश्रेः कुश्रिः
वाजस्रवसो वाजश्रवा
जिह्वावतो बाध्योगात् जिह्वावान् बाध्योगो
असितात् वार्षगणाद् असितो वार्षगणः
हरितात् कश्यापात् हरितः कश्यपः
शिल्पात् कश्यपात् शिल्पः कश्यपः
कश्यपात् नैध्रुवेः कश्यपो नैध्रुविः
वाचो वागम्भ्रिण्या अम्भ्रिण्यादादित्यादादित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-711" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S05_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BR_C06_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "समानमा सांजीवीपुत्रात्
सांजीवीपुत्रो माण्डूकायनेः
माण्डूकायनिः मांडव्यात्
मांडव्यः कौत्सात्
कौत्सो माहिक्लेः
माहिक्लिः वामकक्षायणात्
वामकक्षायणः शाण्डिल्यात्
शाण्डिल्यो वात्स्यात्
वात्स्यः कुश्रेः
कुश्रिर्यज्ञवर्चसो
राजस्तम्बायनात् यज्ञवर्चा राजस्तम्बायनः
तुरात् कावषेयात् तुरः कावषेयः
प्रजापतेः प्रजापतिः ब्रह्मणो
ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bruhadaranyaka-712" |
|---|
| oldKey | "BR_C06_S05_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BR_C06_S05" |
|---|
| chapter | "BR_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पञ्चाग्निविद्यया चैव तथैव प्राणविद्यया ।
प्रजातिकर्मणा चैव तथा ज्ञानप्रदानतः ॥
आचार्यवंशविज्ञानाद्यः पूज्यः पुरुषोत्तमः ।
सर्वान्तर्यामिको नित्यो नमस्तस्मै परात्मने ॥ इति सद्भावे ।" |
|---|
|