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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "प्रथमावल्ली" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "नमो भगवते तस्मै सर्वतः परमाय ते ।
सर्वप्राणिहृदिस्थाय वामनाय नमो नमः ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस । तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश ॥ १ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् ।
तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥" |
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| id | "Katha-6" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "अग्नौ विष्णुं सदा ध्यायंस्त्रिशोऽग्निं नाचिकेतकम् ।
यश्चयीत स तु प्राप्य स्वर्गं तत्र भयातिगः ॥
उष्य मन्वन्तरं कालममृतत्वं भजेत् क्रमात् ॥ इति ब्रह्मसारे ॥
इच्छन् वाजश्रवो नप्ता ददौ सर्वस्वदक्षिणाम् ।
उद्दालकः स्वर्गलोकं ददौ गाश्च निरिन्द्रियाः ॥
मां दत्वापि न ते गावो दातव्या ईदृशा इति ।
उवाच पुत्रस्तं बालस्तं शशाप पिता स्वयम् ॥" |
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| text | "बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।
किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।
तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "स जगाम यमं बालो ब्रह्मचारी यमस्य तु ।
पत्न्या सम्पूज्यमानोऽपि जग्राहार्घ्यादिकं न तु ॥
आगते तु यमे प्राह यमं सोदकमाहर ॥ ४-६ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् ।
एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
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| text | "तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "इत्युक्तस्स यमस्तं तु सम्पूज्यादाद् वरत्रयम् ॥ ७-८ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्यात् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ ९ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यथा पुरस्तात् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ १० ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "सौमनस्यं पितुश्चैव नाचिकेताग्निगं हरिम् ॥
मुक्ते स्थितञ्च तं विष्णुमिति प्रादात् वरत्रयम् ॥ इति गतिसारे ॥ ९-१० ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ११ ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १२ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "अग्र्यत्वादग्निनामासौ नाचिकेताग्निगो हरिः ॥ ११-१२ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १३ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "लोको विष्णोरनन्तस्य तज्ज्ञानान्नित्य आप्यते ॥
प्रतिष्ठा सर्वलोकस्य स विष्णुस्सर्वहृद्गतः ॥ १३ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "स एव सर्वलोकादिस्तं ज्ञात्वा मुच्यते ध्रुवम् ॥ इति च ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
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| text | "तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः ।
तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः शृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "त्रिभिरेत्य सन्धिं वेदैरविरुद्धः । वेदोक्तप्रकारेण भगवत्तत्वादिकं जानन्नित्यर्थः । त्रिकर्मकृत् यज्ञदानतपःकर्ता । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् इति वचनात् ।" |
|---|
|
| id | "Katha-27" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "त्रिनाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १७ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-28" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "त्रयमेतत् या इष्टका इत्यादि ।" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-30" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वृतस्तृतीयः ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-31" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "प्रेते मुक्ते मनुष्ये नियामकत्वेन भगवानस्तीति ज्ञानिनो वदन्ति । नास्तीत्यज्ञाः । तस्य नियामकस्य स्वरूपं यथावदहं विद्याम् ।" |
|---|
|
| id | "Katha-32" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयोऽणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैवम् ॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-33" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "धारकत्वात् धर्मो भगवान् ।" |
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| id | "Katha-34" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-35" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २२ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-36" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतत् तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २३ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-37" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ॥
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥ २४ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-38" |
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| oldKey | "KKN_C01_S01_V24_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "मरणे स्थितं भगवन्तं मानुप्राक्षीः ।" |
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| id | "Katha-39" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "श्वोऽभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्तगीतम् ॥ २५ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-40" |
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| oldKey | "KKN_C01_S01_V26" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वाम् ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २६ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-41" |
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| oldKey | "KKN_C01_S01_V27" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः क्वाधस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २७ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-42" |
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| oldKey | "KKN_C01_S01_V28" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २८ ॥ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-43" |
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| oldKey | "KKN_C01_S01_V28_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "महति साम्पराये मुक्तौ ॥" |
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| id | "Katha-44" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "paada" |
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| text | "द्वितीयावल्ली" |
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| id | "Katha-45" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतेव प्रेयः ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद् य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥ २ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामान् अभिध्यायन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।
नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥" |
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| text | "शृङ्कां शृङ्कलाम् ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।
विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्तः ॥ ४ ॥" |
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| text | "अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।
आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "न नरेणावरः प्रोक्त एष सुज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।
अनन्यप्रोक्ते गतिरस्य नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "अन्यो भगवानन्योऽहमित्यजानन्ननन्यः । तेन प्रोक्ते गतिर्ज्ञानं नास्ति । प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ इति वाक्यशेषात् ।" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।
ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्नि रनित्यद्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "आख्यं विष्ण्वाख्यं नित्यं शेवधिरिति जानामि । नित्यमाख्यविष्णुविषयैः द्रव्यैर्मन आदिभिः । आख्यनित्यविषयैर्विष्ण्वाख्यनित्यविषयैः द्रव्यैः । नित्यं भगवन्तं प्राप्तवानस्मि । ध्रुवो भगवान् । अध्रुवैस्तद्भक्तिवर्जितैर्न प्राप्यते ॥ १० ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "क्रतोरानन्त्यहेतुम् । स्तोमैरपि सर्वात्मना प्राप्तुमशक्यम् । स्तोमेभ्योऽपि महान्तम् । उरुगायमित्युक्तत्वाच्च न जीवविषयोऽयं प्रश्नः ।" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "गह्वरे मुक्तजीवे स्थितम् ॥ १२ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेनमाप्य ।
स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "प्रवृह्य जीवात् पृथक्कृत्य ।" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मैतद्ध्येवाक्षरं परम् ।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् ।
सर्वस्यालम्बनं ज्ञात्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति च ॥ १७ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "न जायते म्रियते वा विपश्चि न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥ १८ ॥" |
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| id | "Katha-70" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "देहोत्पत्तिविनाशाख्यौ ज्ञानिनोऽप्युद्भवाभवौ ।
न कुतश्चिद्यतो विष्णुर्जायतेऽतस्तदीक्षणात् ॥
भावाभावौ न विदुषो यस्माज्जीवो न कश्चन ।
जायते म्रियते वापि स्वरूपेण कथञ्चन ॥
अजो नित्योऽविकारश्च जीवः पुरमणन्नपि ॥ इति च ।" |
|---|
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तै न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-72" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "जीवस्यापि स्वतो मरणाभावादुभौ तौ न विजानीतः ।" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥" |
|---|
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| id | "Katha-74" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "एवं नित्यस्य जन्तोर्गुहायां निहितः । ए विष्णौ क्रतुर्यस्य सोऽक्रतुस्तन्निश्चयः । आत्मनः सकाशान्महिमानं महामानम् ।" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "ऐश्वर्यादेव आसीनो दूरं व्रजति इत्यादि ।" |
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| id | "Katha-77" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥" |
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| id | "Katha-78" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "नायमात्मा प्रवचेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-79" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "नाविरतो दुश्चरितात् नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेनैवमाप्नुयात् ॥ २४ ॥" |
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| id | "Katha-80" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-81" |
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| type | "section" |
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| parent | null |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "paada" |
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| text | "तृतीयावल्ली" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्द्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः ॥ १ ॥" |
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| id | "Katha-83" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "आत्मान्तरात्मेति विभुरेक एव द्विधा स्थितः ।
स विष्णुः परमे वायौ परेभ्योऽप्यृद्धरूपके ॥
शुभान् पिबति भोगान् स च्छायेव विदुषां प्रभुः ।
आतपः पापिनां नित्यं ... ... ।" |
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| id | "Katha-84" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमसि ॥ २ ॥" |
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| id | "Katha-85" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "KKN_C01_S03" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | null |
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| text | ".... ... मर्यादा विष्णुयाजिनाम् ॥
संसारस्य च पारस्थस्स विष्णुर्द्विस्वरूपकः ॥" |
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| id | "Katha-86" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥" |
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| id | "Katha-87" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-88" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥" |
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| id | "Katha-89" |
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| type | "verse" |
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| parent | "KKN_C01_S03" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥" |
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| id | "Katha-90" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यस्तवविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदाशुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥" |
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| text | "विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अथेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥" |
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| text | "महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ।
पुरुषान्न परः किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| text | "देवेभ्य इन्द्रियात्मभ्यो ज्यायांसोऽर्थाभिमानिनः ।
सोमवित्तपसूर्याप्पा अश्व्ग्नीन्द्रेन्द्रसूनवः ॥
यमो दक्षश्चेन्द्रियेशास्सुपर्णी वारुणी तथा ।
उमेति चार्थमानिन्यस्तिस्रो द्विर्द्व्येकदेवताः ॥
मनोभिमानिनो रुद्रवीन्द्रशेषास्त्रयोऽपि तु ।
ते श्रेष्ठा अर्थमानिभ्यस्तेभ्यो बुद्धिः सरस्वती ॥
तस्या ब्रह्मा महानात्मा ततोऽव्यक्ताभिधा रमा ।
तस्यास्तु पुरुषो विष्णुः पूर्णत्वान्नैव तत्समः ॥
कश्चित् कुतश्चिच्छ्रेष्ठस्तु नास्तीति किमु सा कथा॥ १०-१२ ॥" |
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| text | "एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥" |
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| text | "यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥" |
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| text | "तस्माद्वागात्मिका देवीरुमाद्यास्तु शिवादिषु ।
शिवादीन् ब्रह्मवाय्वोस्तु नियच्छेन्महदात्मनोः ॥
तौ रमायां परानन्दे तां विष्णौ परमात्मनि ।
तद्वशत्वेन तद्ध्यानं नियमो नाम नापरः ॥
कुतस्तु मानुषो देवान्नियच्छेद्विनियामकान् ॥ इति च ॥
स्वभार्यायाः परत्वं सिद्धमिति महतः परमित्येवोक्तम् ॥ १३ ॥" |
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| text | "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥" |
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| text | "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥" |
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| text | "नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥" |
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| chapter | "KKN_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पते इति ॥ १७ ॥ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "प्रथमावल्ली" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "पराञ्चि खानि व्यतृणात् स्वयम्भूस्तस्मात् पराक् पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥" |
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| text | "तृणु कात्करणे इति धातुः ॥ १ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "पराचः कामाननुयन्ति बालाः ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशान् ।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "इदं गुह्यं ब्रह्म प्रवक्ष्यामि । यथा मरणं प्राप्य जीवो भवति तच्च प्रवक्ष्यामि जीवेश्वरभेदज्ञापनाय । यः कर्मफलभोक्ता सुप्त्यादिमान् स जीवः । यः प्रलयादिषु जीवेषु सुप्तेषु जागर्ति स विष्णुः परं ब्रह्मेत्यर्थः । न हि जीवस्य योन्यादिगमनं ब्रह्म । जीवाद्भेदेन ज्ञातं हि ब्रह्म यथावज्ज्ञातं भवति ।" |
|---|
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| id | "Katha-109" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "य इदं मध्वदं वेदात्मानं जीवमन्तिकात् ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "जीवस्यान्तिके । न हि स्वस्य स्वयं जीवोऽन्तिके भवति । वस्त्वन्तरस्य हि दूरत्वमन्तिकत्वं वा ॥ ५ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६ ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "अम्नामभ्यश्च भूतेभ्यस्तपोनाम्नः शिवादपि ।
पूर्वं यो जनयामास पूर्वजातं चतुर्मुखम् ॥
स्वात्मानं च गुहासंस्थं सर्वभूतैः सहाभिभूः ।
यः पश्यति सदा विष्णुस्स एष हृदि संस्थितः ॥ इति च ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-115" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "अदनादितिर्विष्णुर्यः प्राणसहितः स्थितः ।
उत्तमो देवताभ्यश्च सोत्मानं विविधात्मना ॥
मत्स्यकूर्मादिरूपेण गुहासंस्थमजीजनत् ।
भूतैस्सह महाविष्णुः परमात्मा युगे युगे ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Katha-116" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।
दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिः हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-117" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "सर्वज्ञो भगवान् विष्णुररण्योर्गुरुशिष्ययोः ।
सुभृतः स्तूयते नित्यं जानद्भिः पुरुषोत्तमः ॥ इति च ।
अर्यते ण आभ्यामित्यरणी ॥ ८ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-118" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यतश्चोदेति सूर्योस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवास्सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-119" |
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| chapter | "KKN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।
मृत्योस्स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥" |
|---|
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| id | "Katha-120" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "यः प्रादुर्भावगो विष्णुर्देहादिषु च संस्थितः ।
स एव मूलरूपश्च साक्षान्नारायणाभिधः ॥
मूलरूपश्च यो विष्णुः प्रादुर्भावादिगश्च यः ।
गुणतस्स्वरूपतो वापि विशेषं योऽत्र पश्यति ॥
अत्यल्पमपि मृत्वा स तमोऽन्धं यात्यसंशयम् ।
भेदाभेदविदश्चात्र तमो यान्ति न संशयः ॥ १० ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-121" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।
मृत्योस्स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-122" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "तथैवावयवानां च गुणानां च परस्परम् ।
क्रियाणां तेन चैतेषां भेदविच्चोभयं विदः ॥
यान्त्येवान्धन्तमो नात्र कार्या काचिद्विचारणा ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Katha-123" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।
ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-124" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-125" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।
एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-126" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "भेदाभेद एव निषिध्यते न तु भेद इत्याशङ्कां निवर्तयितुं एवं धर्मान् पृथक् पश्यन् इति भगवद्धर्माणामवयवगुणकर्मणां भेददर्शने पृथग् दोषमाह । पर्वतेषु दुर्गे शिखरे वृष्टमधो विधावति । एवं विष्णोर्धर्मान् पृथक् पश्यन्नन्धन्तमो विधावति ॥ १२-१४ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-127" |
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| oldKey | "KKN_C02_S01_V15" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-128" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "विजानतो मुनेरात्मा वायुरपि तादृगेव भवति न तु स एव भवति । किम्वन्ये जीवाः ।" |
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| id | "Katha-129" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "द्वितीयावल्ली" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद् वै तत् ॥ १ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-131" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "इदं पुरं भगवदधीनमित्यनुष्ठाय । अजस्येदं पुरमिति स्थितिं कृत्वा ।" |
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| id | "Katha-132" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "नित्यं हीनोऽखिलैर्दोषैस्साररूपो यतो हरिः ।
हंस इत्युच्यते तस्माद्वायुस्थश्शुचिषत्स्मृतः ॥
वरसुर्वसुरित्युक्तस्स एवाप्यन्तरिक्षगः ।
होता सर्वेन्द्रियादिस्थो वेद्यां पूज्यश्च वेदिषत् ॥
अत्यन्नश्चातिथिः प्रोक्तो यस्मादन्नं थमुच्यते ।
स द्रोणकलशे सोमे स्थित उक्तो दुरोणसत् ॥
नृषु स्थितश्च देवेषु वरेष्वपि स एव तु ।
ऋतरूपे तथा वेदे व्योमाख्यप्रकृतावपि ॥
व्योतं जगदिदं यस्यां सा व्योम श्रीरुदाहृता ।
अब्जगोजाद्रिजेष्वेवमास्ते सोऽब्जादिकस्ततः ॥
तथैवर्तेषु मुक्तेषु गतास्ते विष्णुमित्यृताः ।
वेदैर्मुख्यतया प्रोक्तः ऋतमित्येव चोच्यते ॥
बृहत्पूर्णगुणत्वाच्च स एव पुरुषोत्तमः ॥ २ ॥" |
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| text | "ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥" |
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| text | "अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥" |
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| text | "न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥" |
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| text | "न केवलं प्राण एव चेतनानां विधारकः । किन्तु विष्णुं समाश्रित्य प्राणो जीवान् बिभर्त्ययम् । अतो मुख्याश्रयो विष्णुश्चेतनानां स्वतन्त्रतः ॥ ३५ ॥" |
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| text | "हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥" |
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| text | "योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।
स्थाणुमन्ये नु संयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।
एतद्वै तत् ॥ ८ ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥" |
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| text | "अग्निर्यथैको लोकेषु प्रविष्टोऽन्यो न विद्यते ।
पाकादिकर्ताऽथाप्यस्य देवस्य प्रतिरूपकाः ॥
रूपं रूपं प्रति ह्येते सन्त्यचेतनवह्नयः ॥ ६९ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥" |
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| text | "एवं देवो वायुरपि धारकोऽन्यो न विद्यते ।
रूपं रूपं तथाऽप्यस्य प्रत्यभूत् प्रतिरूपकः ॥
अचेतनः स्पर्शगम्यो योऽयमेवं जनार्दनः ।
एकस्स्वतन्त्रो नान्योऽस्ति सर्वजीवान्तरस्थितः ॥
रूपं रूपं प्रति ह्यस्य प्रतिबिम्बाश्च चेतनाः ।
बाह्याश्च ते ततो नास्य स्वरूपं ते कथञ्चन ॥
अनादिप्रतिबिम्बाश्च बभूवुस्ते ह्यनन्तकाः ॥" |
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| text | "सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "सूर्यो यथाऽऽन्तरं चक्षुः प्रतिबिम्बोऽस्य बाह्यकः ।
बाह्यचक्षुर्गतैर्दोषैरन्तश्चक्षुर्न लिप्यते ॥
अन्तश्चक्षुर्देवता तु बाह्यचक्षुरचेतनम् ।
एवं बाह्यस्स्वतन्त्रत्वाज्जीवेभ्यः पुरुषोत्तमः ॥
अस्वतन्त्रस्य जीवस्य दुःखैर्नैव हि लिप्यते ॥ ११ ॥" |
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| text | "एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥" |
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| text | "चेतनाभासको जीवः परमश्चेतनो हरिः ॥
स्वतन्त्रत्वात् स्वतन्त्रो हि नैव दोषेण लिप्यते ॥ इति महाकौर्मे ॥" |
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| text | "नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥" |
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| text | "आत्मैवेदमग्र आसीत् इत्यादिवदनादित्वापेक्षया ।" |
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| text | "तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति न भाति वा ॥ १४ ॥" |
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| text | "न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥" |
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| text | "एतदेव भगवद्रूपं परमं सुखम् । ज्ञानिसुखं तु तद्विप्लुण्मात्रम् ।
ब्रह्मादीनां च मुक्तानां सुखं विष्णुसुखस्य तु ।
प्रतिबिम्बस्तु विप्लुट्को विष्णोरेव परं सुखम् ॥
सम्यग् भाति न भातीति जानीयां तत्कथं न्वहम् ।
तत्प्रसादमृते दिव्यमनिर्देश्यं परं सुखम् ॥ इति च महावराहे ॥ १४ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "तृतीयावल्ली" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥
तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ १ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्मूलं भूमिवदस्य तु । जगदाख्यस्य वृक्षस्य शाखा देवास्ततोऽधमाः ॥
वृक्षमूलं रमादेवी सोऽश्व आशुगतेर्हरिः ।
तद्व्याप्तत्वात् तदन्नत्वादश्वत्थोऽयं प्रकीर्तितः ॥
प्रवाहतस्त्वनादिश्च मुख्यतस्त्वमृतो हरिः ।
मुख्यामृतस्स एवैको जगन्नित्यं प्रवाहतः ॥" |
|---|
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| id | "Katha-157" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥" |
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| text | "प्राणाख्ये तु हरौ सर्वमेजत्यस्माच्च निस्सृतम् ।
वज्रवद्भयदं चैव स्वधर्मस्यातिलङ्घने ॥ २ ॥" |
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| text | "भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः ।
ततः स्वर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥" |
|---|
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| text | "यथादर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव दृश्यते तथा गन्धर्वलोके । छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥" |
|---|
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "जीवे स्थितस्तु भगवान् दृश्यते ज्ञानदृष्टिभिः ।
आदर्शे मुखवत् सम्यङ् न तथा पितृलोकगः ॥
ततः किञ्चित् स्पष्टतया गान्धर्वे दृश्यते हरिः ।
अत्यातपे न छायायां यथैवाहनि दृश्यते ॥
स्पष्टं तथा ब्रह्मलोके दृश्यते पुरुषोत्तमः ॥ इति च ॥ ३-५ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-163" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-164" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।
सत्त्वादपि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-165" |
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| chapter | "KKN_C02" |
|---|
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| text | "अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।
तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-166" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "पुनः इन्द्रियेभ्यः परं मनः इत्यादि देवतानां तारतम्यज्ञानपूर्वकं भगवतः सर्वोत्तमत्वज्ञान एव सर्ववाक्यानां महातात्पर्यमिति ज्ञापयितुम् ।" |
|---|
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| id | "Katha-167" |
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| chapter | "KKN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् ।
हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-168" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "प्रादुर्भावानृते विष्णुमिन्द्रियैर्नैव पश्यति ।
प्रादुर्भावानपि यदा ज्ञानदृष्ट्यैव पश्यति ॥
तदैव मुच्यते योगी न दुष्टैरिन्द्रियैः क्वचित् ॥ इति च ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Katha-169" |
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| chapter | "KKN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तमाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥" |
|---|
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| id | "Katha-170" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥" |
|---|
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| id | "Katha-171" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "प्रभवाप्ययौ प्रति हि योगः । भगवतस्सकाशात् प्रभवाप्ययौ ॥ ९-११ ॥" |
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| id | "Katha-172" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥" |
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| id | "Katha-173" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥" |
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| id | "Katha-174" |
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| chapter | "KKN_C02" |
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| text | "अधिकस्सतोऽयं भगवान् सर्वस्मादपि केशवः ।
अस्तीति नामकस्तस्माज्ज्ञातव्यस्स तथैव च ॥
अनाधिक्यं जानतां तु कथं स उपलभ्यते ।
प्रकृतेः पुरुषाणां च तत्त्वं भावयति स्फुटम् ॥
तत्त्वभावस्ततो विष्णुस्तत्प्रसादात् तु तस्य हि ।
आधिक्यं ज्ञायते सत्तः प्रसादश्च तथाविदः ॥
अनादिकालादाधिक्यं सर्वस्माज्जानतो हरेः ।
पुनः पुनर्वृद्धिमेति तज्ज्ञानं हि भवे भवे ॥
येषामाधिक्यविज्ञानं नैव पूर्वं हरेर्भवेत् ।
तेषां पश्चाच्च नैव स्यादभिभूतं तु तत् पुनः ॥
व्यञ्जकाद् व्यक्तिमभ्येति तस्मात् तज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ इति च ॥ १२-१३ ॥" |
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| text | "यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यथ ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥" |
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| text | "अन्तःकरणकामानां त्यागो व्यक्तिश्चिदात्मानाम् ।
कामानां तु तदा मुक्तो मृतिं नैवाभियास्यति ॥" |
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| text | "यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावदनुशासनम् ॥ १५ ॥" |
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| text | "मिथ्याज्ञानग्रन्थिभिस्तु नितरां मुच्यते यदा ।
तदाऽमृतत्वमेवैति तदर्थं चानुशासनम् ॥ १५ ॥" |
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| text | "शतं चैका च हृदयस्य नाड्य स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वगन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥" |
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| text | "अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥" |
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| text | "शरीरभूतो विष्णोस्तु जीवस्तद्वशगो यतः ।
अधिष्ठितश्च तेनैव विजानीयात् पृथक् ततः ॥
स्वाख्याच्छरीराज्जीवात् तु प्रवृहेद् विष्णुमव्ययम् ॥ इति च ॥" |
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| text | "मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।
ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽभूद् विमृत्युः अन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥" |
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| text | "अतः सर्वोत्तमो विष्णुरिति सिद्धम् ॥
नमो भगवते तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ।
यस्याहमाप्त आप्तेभ्यो यो म आप्ततमः सदा ॥" |
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