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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "स्वतन्त्रं परतन्त्रं च प्रमेयं द्विविधं मतम् ।
स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुः निर्दोषाखलिसद्गुणः ॥1॥" |
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| id | "Tattvaviveka-2" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "द्विविधं परतन्त्रं च भावोऽभाव इतीरितः ।
पूर्वापरसदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ॥2॥" |
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| id | "Tattvaviveka-3" |
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| oldKey | "TV_C01_B03" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "भावाभावस्वरूपत्वान्नान्योन्याभावता पृथक् ।
चेतनाचेतनश्चेति भावश्च द्विविधः स्मृतः ॥3॥" |
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| id | "Tattvaviveka-4" |
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| oldKey | "TV_C01_B04" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नित्यमुक्तश्च सृतियुक् परतन्त्रोऽपि चेतनः ।
द्विधैव श्रीर्नित्यमुक्ता सृतियुक्च द्विधा मतः ॥4॥" |
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| id | "Tattvaviveka-5" |
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| oldKey | "TV_C01_B05" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "मुक्तोऽमुक्त इति ह्यत्र ब्रह्मान्ता उत्तरोत्तरम् ।
मुक्ताः शतगुणाः प्रोक्ताः रमा तेभ्योऽखिलैर्गुणैः ॥5॥" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नित्यं बहुगुणोद्रिक्ता ततोऽनन्तगुणो हरिः ।
अमुक्तास्त्रिविधास्तत्र नीचमध्योच्चभेदतः ॥6॥" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "मुक्तियोग्यास्तत्र चोच्चा नित्यावर्तास्तु मध्यमाः ।
नीचा नित्यतमोयोग्या द्विधैवाचेतनं मतम् ॥7॥" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नित्यानित्यत्वभेदेन देशः कालः श्रुतिस्तथा ।
भूतेन्द्रियप्राणगुणसूक्ष्मरूपं च नित्यकम् ॥8॥" |
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| id | "Tattvaviveka-9" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "एषां विकारोऽनित्यः स्यान्नित्या एव हि चेतनाः ।
गुणक्रियाजातिपूर्वा धर्मा सर्वेऽपि वस्तुनः ॥9॥" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "रूपमेव द्विधं तच्च यावद्वस्तु च खण्डितम् ।
खण्डिते भेद ऐक्यं च यावद्वस्तु न भेदवत् ॥10॥" |
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| id | "Tattvaviveka-11" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "खण्डितं रूपमेवात्र विकारोऽपि विकारिणः ।
कार्यकारणयोश्चैव तथैव गुणतद्वतोः ॥11॥" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "क्रियाक्रियावतोस्तद्वत् तथा जातिविशेषयोः ।
विशिष्टशुद्धयोश्चैव तथैवांशांशिनोरपि ॥12॥" |
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| id | "Tattvaviveka-13" |
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| oldKey | "TV_C01_B13" |
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| chapter | "TV_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "य एतत्परतन्त्रं तु सर्वमेव हरेः सदा ।
वशमित्येव जानाति संसारात् मुच्यते हि सः ॥13॥" |
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