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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "paada" |
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| text | "प्रथमाध्यायः" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् ।
प्राणस्य सर्वचिदचित्परमेश्वरस्य साक्षादधीश्वरमियां शरणं रमेशम् ॥" |
|---|
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| type | "introduction" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः ।
तस्मिन् गतेऽध्वरमभूत् सुरविप्रसङ्घो निश्चेतनस्तदनु पद्मभवोऽमुमस्तौत् ॥
तेन स्तुतः(तैः संस्तुतः .हृ) स भगवान् गिरिशेन्द्रमुख्यान् सर्वानबोधयदजेन सहैव तेऽथ ।
दासत्वमापुरत एव महत्सुराणां दासत्वतः स महिदास इति प्रसिद्धः ॥
शृण्वत्सु तेषु भगवानवदद्रमायै दिव्यां श्रुतिं स परमोऽतिमुदैतरेयीम् ।
सा बह्वृचैः प्रपठिता चतुराननास्याद् यस्यां रहस्यमुदितं परमं हि विष्णोः ॥
महाभूतिः श्रुतिः सैषा महाभूतिर्यतो हरिः ।
विशेषेणात्र कथितः सर्वज्ञः शाश्वतः प्रभुः ॥ इति ऋक्संहितायाम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-4" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "एष पन्था एतत्कर्म एतद्ब्रह्मैतत्सत्यम् । तस्मान्न प्रमाद्येत् तन्नातीयान्न ह्यत्यायन् पूर्वे । येऽत्यायंस्ते ह पराबभूवुः ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-5" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः ।
नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात्, कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥
ब्रह्मैव गुणपूर्णत्वात्, सत्यं साधुस्वरूपतः ।
क्वापि तं विस्मरेन्नैव त्यक्त्वा तं नेतरं व्रजेत् ॥
पूर्वे नैनं तत्यजुर्हि ब्रह्माद्यास्तेन संसृतेः ।
मुक्ताः श्रीश्च तदत्यागान्नित्यमुक्ता गुणाधिका ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-6" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तदुक्तमृषिणा-
‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे ।
बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित आ विवेशेति ।’(ऋ.सं.८.१०१.१४)इति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-7" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुः’इति या वै ता इमाः प्रजास्तिस्रो अत्यायमायंस्तानीमानि वयांसि वङ्गावगधाश्चेरपादाः। ‘न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे’ इति ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-8" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः ।
वर्तितज्ञानतो वङ्गा नरास्तैरवनं सदा ।
अन्नरूपैर्गृध्नवो हि वङ्गावगधनामकाः ॥
राक्षसा असुरा ईरपादा इति समीरिताः ।
धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चतुरात्मकः ॥
वायुर्देवोऽत्रासुराणामैश्वर्य गुण एव हि ।
ईरपादास्ततः प्रोक्तास्ते त्रयो विष्णुमत्यजन् ॥
पराभूतास्ततस्ते तु तमस्यन्धे निपातिताः ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयप्रघट्टके प्रथमोऽध्यायः ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-9" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "ता इमाः प्रजा अर्कमभितो निविष्टा इममेवाग्निम् । बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तरित्यद उ एव बृहद्भुवनेष्वन्तरसावादित्यः । पवमानो हरित आ विविशेति । वायुरेव पवमानो दिशो हरित आविष्टः ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-10" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "देवाश्च ऋषयो मर्त्यसत्तमा इति च त्रयः ॥
आश्रिता विष्णुमेवैकं त्रिस्थानस्थितमच्युतम् ।
अग्निस्थमाश्रिता मर्त्या विष्णुमर्काभिधं परम् ॥
आ जनैरर्चितत्वात् स ह्यर्क इत्युच्यते हरिः ।
अग्नौ कर्माणि कृत्वैव मानुषा मुक्तिभागिनः ॥
कर्मभिः शुद्धसत्त्वानां कर्मत्यागोऽपि नान्यथा ।
आश्रिताः सूर्यगं विष्णुम् ऋषयो बृहदित्यसौ ॥
तेजसा बृंहणादुक्तो, विष्णुरादित्य इत्यपि ।
आदानात् सर्ववस्तूनाम्, स्वाध्यायेनामुमाश्रिताः ॥
मुच्यन्ते ऋषयो नित्यं नान्यथा तु कथञ्चन ।
वायुस्थमाश्रिता देवाः पवमानाभिधं हरिम् ।
संसारात् पावयित्वा यन्महानन्दे मिनोत्ययम् ॥
पवमानस्ततो विष्णुः व्याप्तः सर्वासु दिक्षु च ।
आश्रितो भगवान् सर्वैः सर्वत्रापि, विशेषतः ॥
आश्रयात् पृथगुक्तोऽयं नित्यानन्दो रमापतिः ॥ १ ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-11" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "उक्थमुक्थमिति वै प्रजा वदन्ति, तदिदमेवोक्थमियमेव पृथिवी । इतो हीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । तस्याग्निरर्कः। अन्नमशीतयः, अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । अन्तरिक्षमेवोक्थम् । अन्तरिक्षं वा अनु पतन्त्यन्तरिक्षमनु धावयन्ति॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-12" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तस्य वायुरर्कः। अन्नमशीतयः। अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । असावेव द्यौरुक्थम् । अमुतः प्रदानाद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । तस्यासावादित्योऽर्कः। अन्नमशीतयः, अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते- इत्यधिदैवतम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-13" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथाध्यात्मम्
- पुरुष एवोक्थम्। अयमेव महान् प्रजापतिरहमुक्थमस्मीति विद्यात् ।
तस्य मुखमेवोक्थम्। यथा पृथिवी तथा । तस्य वागर्कः। अन्नमशीतयः, अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते। नासिके एवोक्थं यथाऽन्तरिक्षं तथा । तस्य प्राणोऽर्कः। अन्नमशीतयः, अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । तदेतद् ब्रध्नस्य विष्टपं यदेतन्नासिकायै विनतमिव । ललाटमेवोक्थम्॥
यथा द्यौस्तथा तस्य चक्षुरर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-14" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तृचाशीतिविभिन्नस्य शस्त्रस्यान्नत्वहेतुतः ॥
विष्णोस्तृचाशीतिवत् स्यात् प्रसिद्धान्नमिति स्फुटम् ।
अन्नाभिमानिदेवश्च तृचाशीत्याश्च देवता ॥
सोम एव ततश्चान्नमशीतय इतरितम् ।
अदनाऽऽघ्राणदृष्ट्याख्यभोगत्रयविभागतः ॥
मुखनासाचक्षुषां तद्भोग्यमन्नं हरेः श्रुतम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-15" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अरणं गमनं यस्माद् अर्कः शीघ्रगतित्वतः ॥
श्येन एव, तदाकारा चितिरर्कपदोदिता ।
सुपर्णप्रतिमा सा, यत् तदारूढो जनार्दनः ॥
तस्मात् तस्यार्क इति सा प्रोच्यते वैदिकैः पदैः ।
योऽसौ चितिगतो वीन्द्रः सोऽग्निवातरविष्वपि ॥
तथा वाक्प्राणचक्षुष्षु तस्मात् तेऽर्काः प्रकीर्तिताः।
तेषु स्थिते सुपर्णे च रूपभेदैः पृथक् पृथक् ॥
स्थितो विष्णुस्तदर्कास्ते तस्मादेव प्रकीर्तिताः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-16" |
|---|
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "व्याप्तत्वाज्जीवदेहेषु मुखे विष्णोर्मुखं स्मृतम् ॥
नासयोर्नासिका विष्णोरक्ष्णोरेव तदक्षिणी ।
जीववाक्प्राणचक्षुष्षु तद्वागाद्यास्ततः स्थिताः ॥
विष्णोर्वाग्भार्गवो रामो प्राणोऽस्य नरकेसरी ।
चक्षुस्तु कपिलो विष्णुरग्न्यादीनां च कारणम् ॥
जीववागादिसंस्थं च सुपर्णमधिसंस्थिताः ।
अविशेषोऽपि भगवान् पूर्णैश्वर्यस्वरूपतः ॥
अङ्गाङ्गित्वेनैक एव स्वानन्दानुभवे स्थितः ।
स एव व्यूह्य चात्मानं पृथग्रूप इव स्थितः ॥
सुपर्णनामा भगवान् सुपर्णे च व्यवस्थितः ।
अग्न्यादिषु च तन्नामा वासुदेवः स संस्थितः ॥
अन्ननामा स एवान्ने चेष्टयन् सर्वमास्थितः ।
अन्ने स्थितः स एवेशो ह्यन्नदातृगतिप्रदः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-17" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V03_B05" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्यान्तरिक्षगस्यैव नियमादनुपक्षिणः ।
पतन्ति धावयन्त्यश्वान् नरादींश्च नरादयः ॥
परस्य विष्णोर्धामत्वात् सूर्यो ब्रध्न इतीरितः ।
निहितश्चैव तल्लोको नासिकायां नतस्थले ॥
पृथिव्यां संस्थितो विष्णुः स्त्रीरूपेण द्युलोकतः ।
पतितं सर्वमेवात्ति तथा दिवि च संस्थितः ॥
इतो गतं सर्वमत्ति द्युनामा भगवान् परः ।
भोग्यत्वादाद्य इत्युक्तः एवमाद्यात्तृरूपवान् ॥
एक एव परो विष्णुरत्ताऽन्यैरुपजीव्यतः ।
आद्यो भवति चान्येषाम्, नोपजीव्यो भवेद् यथा ॥
हरिः स सर्वजीवानाम्, न भुज्यन्ते यथाऽमुना ।
सर्वे लोकास्तथा कर्तुं नैवेष्टे कश्चन क्वचित् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-18" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तमिमं प्रथमज्ञानिपुरुषं चतुराननम् ।
वासुदेवाभिधं ब्रह्म प्राप प्रपदयोः पुरा ॥
यस्मात् प्रपेदे भगवान् प्रपदाच्चतुराननम् ।
तस्मात् प्रपदनादेव प्रपदं नाम कीर्तितम् ॥
चतुर्मुखाकारवतां नृणां पादतलोपरि ।
प्रपदाख्या वर्ततेऽतो, न तु पश्वादिनां क्वचित्॥
अयादूर्ध्वं ततो विष्णुः प्रपदाद् ऊरुमत्र च ।
स्थित ऊरू च तावास्ताम् ऊरूर्ध्वगमनाद्धरेः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-19" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V05_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ककिञ्चिदूर्ध्वं ततो गत्वा वायुना सह केशवः ।
वायुमाहोरुगरणं कुर्वत्र स्थित इत्यपि ॥
उर्वेव गरणं चक्रे वायुर्यत्र स्थितः सदा ।
तत्स्थानमुदरं नाम, पुनराह जनार्दनः ॥
उरु स्थानं निवासं मे कुरु विस्तारसंयुतम् ।
तथाऽकरोत् स वायुश्च तदुरोऽभूद् उरुत्वतः ॥
उरोमध्ये च हृदयम्, तत्रवासो (तत्राऽवासो) हरेः सदा ।
सूक्ष्मदृष्टियुता ये तु मुनयः शार्कराक्ष्यकाः ॥
उदरे ते परं ब्रह्म वासुदेवमुपासते ।
हृत्स्थमेव परं विष्णुं ध्यायन्त्यारुणयः सदा ॥
उदरस्थं च हृद्गं च ते उभे ब्रह्म तत्परम् ।
एकमेव यतस्तस्माद उभये ह्यपि तद्विदः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-20" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V05_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तत ऊर्ध्वं गतो विष्णुर्वायुना सह दैवतैः ।
स्थितो मूर्धनि देवेशः श्रितोऽसाविति तच्छिरः ॥
तत्र प्राणात्मना वायुर्मनोरूपेण शङ्करः ।
शेषः सुपर्ण इन्द्रश्च मनांस्येव पृथक् पृथक् ॥
अहम्भावमनो रुद्रः, शेषोऽसौ पाञ्चरात्रकम् ।
वैदिकं गरुडश्चेन्द्रो यज्ञादिविषयं मनः ॥
श्रोत्रं चन्द्रो, रविश्चक्षुर्वागग्निः परिकीर्तितः ।
एते देवास्तदन्ये च सर्वप्राणिषु संस्थितः ॥
उपासते महाविष्णुं परमात्मानमच्युतम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-21" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वाचा हिंसामकुर्वंस्ते विनिन्दन्तः परस्परम् ॥
ते विष्णोराज्ञयाऽवोचन् ‘उत्क्रमाम पृथक् पृथक् ।
देहाद् अब्जभवस्यास्माद्, यस्मिन्नुत्क्रान्त एव हि ॥
शरीरं पद्यते श्रेयान् स न इत्यवधार्यताम् ’।
ततः क्रमेण चाग्न्याद्या निष्क्रान्तास्तेषु सर्वशः ॥
निष्क्रान्तेषु न वै पातः शरीरस्याभवत् क्वचित् ।
वायावुत्क्रान्त एवैतच्छरीरमपतत् क्षितौ ।
उदासीनवदास्तां तौ केशवश्चाब्जसम्भवः॥
तेषां बलपरीक्षार्थं वाय्वादीनां च सर्वशः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-22" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पुनस्ते प्राविशन् सर्वे वह्निसूर्यौ शशी शिवः ॥
नोत्थानमभवत् तेषु प्रविष्टेष्वपि सर्वशः ।
वायौ प्रविष्टे तूत्थानं कायस्यासीत् तदैव च ॥
उच्चैः स्थितत्वादुक्थोऽभूद् वायुरेव ततः प्रभुः ।
उच्चत्वं च गुणाधिक्यम्, त्वमुच्चोऽसीति तेऽब्रुवन् ॥
भृत्या वयं तवैव स्मः त्वमस्माकं पतिः सदा ।
स्पर्धामहे त्वद्बलेन त्वया, नान्येन केनचित्॥
इत्यूचुर्वीन्द्रशेषेशशक्रचन्द्रादिकाः पृथक् ।
वायुः स संस्तुतस्तैश्च प्रसन्नोभूद् दिवौकसाम् ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-23" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तं देवाः प्राणयन्त । स प्रणीतः प्रातायत । प्रातायीती३ तत्प्रातरभवत् । समागादिती३ तत्सायमभवत् । अहरेव प्राणो, रात्रिरपानः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-24" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्माच्छ्रुत्वा परं ब्रह्म देवा नारायणाभिधम् ॥
शिष्यप्रशिष्यादिषु च तेऽनयन् वायुनोदितम् ।
वायुमप्यनयन् सर्वे यशसा तद्गुणोक्तितः ॥
ये ये गुणान् विजानन्ति वायोस्तान् आविशन् मरुत् ।
तत्र तत्र प्रविष्टत्वात् प्रततोऽसौ बभूव ह ॥
प्रततत्वात् प्रातरिति तस्य नामाऽभवद्विभोः ।
सङ्गतश्चाभवज्जीवचिता रूपान्तरेण सः ।
सङ्गतत्वात् सायमिति तद् रूपं नामतोऽभवत् ॥
वायोस्तत्पुनरध्यात्मं प्राणापानाभिधं द्वयम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-25" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "वागग्निश्चक्षुरसावादित्यश्चन्द्रमा मनः, दिशः श्रोत्रं स एष प्रहितां संयोगोऽध्यात्मम्। इमा देवताः। अद उ आविरधिदैवतम् । इत्येतत् तदुक्तं भवति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-26" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अध्यात्ममग्निर्वागाख्यश्चक्षुः सूर्यः प्रकीर्तितः ॥
यज्ञादिसाधने यत्तु मनश्चन्द्रः प्रकीर्तितः ।
मित्रो(मनो) यमश्च वरुणः कुबेरश्च दिगीश्वराः ॥
श्रोत्राभिमानिनः सर्वे, वैदिकश्रवणोचितम् ।
श्रोत्रं चन्द्रस्तथा स्मार्ततान्त्रिकश्रवणोचितम् ॥
यम एव, षडङ्गानां विषयश्रवणोचितम् ।
श्रोत्रं तु वरुणः, काम्यशास्त्रार्थं (मन)मित्र एव च ॥
श्रोत्रं यन्नीतिशास्त्रार्थं कुबेरस्तत्(श्च) प्रकीर्तितः ।
विष्णुना प्रहितानां हि संयोगोऽध्यात्ममेष हि ॥
शिवादीनां च सर्वेषां मनस्त्वं कथितं पुरः(रा) ।
एताः सर्वा देवता हि ब्रह्मवायुसुपर्णकाः ॥
शेषशङ्करशक्राश्च चन्द्रसूर्ययमा अपि ।
अग्निश्च मित्रावरुणौ कुबेराद्याश्च सर्वशः ॥
अधिदैवं स एवैक आधिक्यात् पुरुषोत्तमः ।
देवमात्रास्तदन्ये तु स आविः पुरुषोत्तमः ॥
पूर्णज्ञानस्वरूपत्वाद्, एतावत् कथितं भवेत् ।
तात्पर्यात् सर्ववेदैश्च ..." |
|---|
|
| id | "Aitareya-27" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एतद्ध स्म वै तद् । विद्वानाह हिरण्यदन् (वै)बैदः, न तस्येशेऽयं मह्यं न दद्युरिति ॥
प्रहितां वा अहमध्यात्मं संयोगं निविष्टं वेदैतद्ध । तदनीशानानि ह वा अस्मै भूतानि बलिं हरन्ति य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-28" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V10_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| text | "-... तज्जानन्नवदन् मुनिः ॥
हिरण्यदन्नाम (वै)बैदो, ‘भूतेषु हि सुरानृते ।
मदभीष्टं ममादातुं नैवेष्टे कश्चनाञ्जसा ॥
विष्णुना प्रहितानां हि देवानाम् अहमुत्तमम् ।
वेद संयोगमाध्यात्मम्, ततो मुक्तो यथेष्टभुक् ॥
स्यान्नैवात्रास्ति सन्देहः, स्वेच्छाविहृतिरेव च ।
मन्निषेधे न शक्तोऽस्ति प्रीता देवा हि मे सदा ॥
अधिदैवेन सहिता विष्णुना प्रभविष्णुना’ ।
एतद्धि तेन कथितं मुनिना तत्त्ववेदिना ॥
विष्णुप्रहितदेवानां योगमध्यात्ममञ्जसा ।
वेद तं च नियोक्तारम् उपास्ते विष्णुमव्ययम् ॥
एतादृशोपासनाया योग्यः सन् सततं सुधीः ।
स्वस्वाम्यन्यानि भूतानि हरेयुर्बलिमस्य हि ॥
मुक्तस्य वैष्णवे लोके मुक्तानि च न संशयः ।
इत्येतद्ध्यानयोगाश्च मुनयो देवतास्तथा ॥
मानुषा ज्ञानमात्रेण स्वावरैः पूज्यतामियुः ।
मुक्तामुक्तैर्मुक्तियोग्या इति शास्त्रस्य निर्णयः ॥" |
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| text | "तत्सत्यम्। सदिति प्राणस्तीत्यन्नं यमित्यसावादित्यः। तदेतत् त्रिवृत्। त्रिवृदिव वै चक्षुः, शुक्लं कृष्णं कनीनिकेति स यदि ह वा अपि मृषा वदति सत्यं हैवास्योदितं भवति, य एवमेतत् सत्यस्य सत्यत्वं वेद ॥ ५ ॥" |
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| text | "स एष भगवान् विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ।
सर्वोत्तमत्वात् पूर्णत्वात् सर्वज्ञत्वात् तथैव च ॥
देवतात्रयमन्यच्च पृथक् सत्यमितीर्यते ।
शेषवीन्द्रशिवादिभ्य उत्तमत्वात् सदैव हि ॥
वायुः सदिति सम्प्रोक्तः, जीवेषु तु सुपूर्णतः ।
तीति ब्रह्मा समुद्धिष्टः स एवान्नाभिमानवान् ॥
अन्नं प्रजापतिरिति श्रुतिरन्या ह्यभाषत ।
अतिनादात् सदा वेदैरप्यन्नं स चतुर्मुखः ॥
यमयेत्यदिति य उद्दिष्टो यमयेद् यत्प्रकाशयन्(नात्) ।
देवतात्त्रयमेतत्तु सहितं सत्यमुच्यते ॥
शुक्लकृष्णकनीनासु चक्षुषोऽप्येत आस्थिताः ।
एवं सत्यपदार्थं यो(हि) विज्ञायोपास्त आदरात् ॥
योग्यस्तस्या उपासाया नैवासत्येन दुष्यति ।
देवता मुनयश्चैव योग्या अस्या अपि स्फुटम् ।
मानुषाणां(मनुष्याणां) ज्ञानमात्राद् दोषो नातितरां भवेत् ॥ ५ ॥" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तस्य वाक् तन्तिः। नामानि दामानि । तदस्येदं वाचा तन्त्या नामभिर्दामभिः सर्वं सितम् । सर्वं हीदं नामानी३ । सर्वं वाचाऽभिवदति । वहन्ति ह वा एनं तन्तिसम्बद्धा य एवं वेद ।" |
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| text | "तस्य नारायणस्यैव सर्ववेदात्मिका हि वाक् ।
तन्तिरूपा जगद्बन्धे, नाम ब्रह्मादिकं च यत् ।
विप्रक्षत्रियवैश्यादिरूपं चाखिलमेव तु ॥
दाम, तेनैव बध्नाति सकलं जगदच्युतः ।
सर्वे हि नामवन्तोऽत्र सर्वे वेदोदिता अपि ॥
वेदात्मिक्या यतो वाचा विष्णुर्वदति सोऽखिलम् ।
य एतद्विष्णुवाचैव बद्धं नामाख्यदामभिः ॥
ज्ञात्वा जगदुपास्ते तु योग्यः संस्तदुपासने ।
तं प्रत्येवाखिलान्येव भूतानि सह दैवतैः ॥
बलिं हरन्ति, पञ्चाथ भूतान्येनं वहन्ति च ।
योग्यश्चास्या उपासाया योग्यो ब्रह्मपदस्य यः ॥
भूतयुक्ते रथे तस्मात् स तिष्ठति सुरार्चितः ।
मुक्तः संश्च तदन्येषां ज्ञानमात्राद् विमुक्तिगैः ॥
स्वावरैः सेव्यतैव स्यात् कैश्चिदेव क्वचित्क्वचित्।
तथैव वायुना बद्धं जगदेतत् ततोऽवरम् ॥
सुपर्णशेषगिरिशशक्रसूर्याद्यमञ्जसा ।" |
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| text | "तस्योष्णिग् लोमानि, त्वग् गायत्री, त्रिष्टुप् मांसम्, अनुष्टुप् स्नावानि, अस्थि जगती, पङ्क्तिर्मज्जा, प्राणो बृहती । स च्छन्दोभिश्छन्नः, यच्छन्दोभिश्छन्नस्तस्माच्छन्दांसीत्याचक्षते । छादयन्ति ह वा एनं छन्दांसि पापात् कर्मणः, यस्यां कस्याञ्चिद् दिशि कामयते, य एवमेतच्छन्दसां छन्दस्त्वं वेद ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "विष्णोर्वायोश्च लोमादौ छन्दांस्येवाऽश्रितानि च ।
विष्णोर्विमुक्तवायोश्च लोमाद्यं तु चिदात्मकम् ॥
लोमप्राणादिभेदश्च नैव कश्चिच्चिदात्मनि ।
न्नश्छन्दोभिरेवं स केशवस्तेन चाभिधा ॥
छन्दांसीत्येव तेषां हि, य एवंविदुपासकः ।
निवारयन्ति पापेभ्यश्छन्दांसि किमु केशवः ॥
योग्या अस्याश्च विद्यायाः भृग्वाद्या देवतास्तथा ।
छन्दस्सु संस्थितो विष्णुर्गोपायत्येव तद्विदम् ॥" |
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| text | "तदुक्तमृषिणा- ‘अपश्यं गोपाम्’(ऋ.सं.१.१६४.३१) इत्येष वै गोपा, एष हीदं सर्वं गोपायति । ‘अनिपद्यमानम्’ इति न ह्येष कदाचन संविशति । ‘आ च परा च पथिभिश्चरन्तम्’ इत्या च ह्येष परा च पथिभिश्चरति । ‘स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान’ इति सध्रीचीश्च ह्येष विषूचीश्च वस्ते, इमा एव दिशः । ‘आवरीवर्ति भुवनेष्वन्तः’ इत्येष ह्यन्तर्भुवनेष्वावरीवर्ति ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "मन्त्रोऽप्यर्थमिमं प्राहापश्यं गोपामिति स्म ह ।
एष गोप्ता हि सर्वस्य वायुस्थः पुरुषोत्तमः ॥
छन्दस्सु संस्थितो वायुर्वायौ च स जनार्दनः ।
वायुश्च वायुसंस्थश्च कदाचिन्न हि (नैव) तिष्ठतः ॥
वायुर्हि नित्यसञ्चारी सदा सर्वप्रवृत्तिमान् ।
चोदितः केशवेनैव तत्स्थेनामितशक्तिना ॥
आसमन्तात् पराक्चापि पञ्चभूतेभ्य ईश्वरः ।
वायुस्तत्स्थो हरिश्चैव चरत्यमितपौरुषः ॥
सध्रीचीनासु पूर्वादिदिक्ष्वेतौ चतसृष्वपि ।
नित्यदा वसतः कोणदिक्ष्वथाऽसु विषूचिषु ॥
अन्तश्च सर्वलोकेषु चरतो लोकसाक्षिणौ ।" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अथो ‘आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिः’ इति, सर्वं हीदं प्राणेनाऽवृतम् । सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः । तद्यथाऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात् ॥६ ॥" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "हस्तयोरेतयोरेव नित्याक्षीणं वसु स्थितम् ॥
तद्ध्यसह्यं बलं वायोरनन्तं, किमु तद्धरेः ।
वायोराधारभूतस्य, ताभ्यां हि क्रतुनामकाः ॥
आवृताः सर्वजीवा हि यथैव कनकावटाः ।
आच्छाद्यन्ते वित्तवद्भिस्ताभ्यामेवं च चेतनाः ॥
आवृता महदाद्यै(द्या)स्तु देहे तिष्ठन्ति चैतयोः ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "विष्टब्धाश्चैव सर्वेऽपि जीवा आकाश एव च ॥
स वायुः प्रकृतिश्चैव विष्टब्धौ केशवेन हि ।
बृहत्वाद् बृहतीत्येव तयोर्नाम प्रकीर्तितम् ॥
वायुकेशवयोः प्राणनाम सर्वप्रणायनात् ।
विशेषतो(विशेषेण) बृहत्प्राणो भगवांस्तत्र केशवः ॥
इति विद्यात् ... ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-40" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथाऽतो विभूतयोऽस्य पुरुषस्य । तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्च । अस्यामोषधयो जायन्ते । अग्निरेनाः स्वदयतीदमाहरतेदमाहरतेति । एवमेतौ वाचं पितरं परिचरतः पृथिवी चाग्निश्च ।
यावदनु पृथिवी यावदन्वग्निस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतयोर्न जीर्यते पृथिव्याश्चाग्नेश्च य एवमेतां वाचो विभूतिं वेद ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-41" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "... तस्य विष्णोरङ्गानामथ वैभवम् ।
उच्यते तस्य वाचा हि सृष्टावग्निः क्षितिस्तथा ॥
शुश्रूषार्थं(षार्थे) तस्य पृथ्वी जनयत्योषधीः प्रभोः ।
ताः पचत्यग्निरुद्युक्त आहृता आहृताः पुनः ॥
आहरेति वचोऽस्यापि शृण्वन्त्येव महर्षयः ।
मुखजत्वात् तयोर्विष्णोर्मुखं जनकमिष्यते ॥
आस्यभोग्यं ततो विष्णोरन्नं तौ कुरुतः सदा ।
सर्वैर्यद्भुज्यते चान्नं तत्र तत्र स्थितो हरिः ॥
तद्भुङ्क्तेऽतस्तदर्थं हि तावन्नं कुरुतस्सदा ।
विष्णोर्वाग्विभवं वेद य उपास्ते च सर्वदा ॥
योग्यः संस्तदुपासायाः स भूम्यग्निसमन्वितः ।
समं तयोर्व्याप्तिमांश्च तद्वन्मुक्तश्च नित्यदा ॥
अनष्टलोको वसति समीपे केशवस्य च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-42" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S01" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "योग्या अस्या उपासायाः पृथिव्यग्निपदस्य ये ॥
योग्यास्ते वै मुख्यतया, तदन्ये तत्र तौ स्थितौ ।
तत्र चर्तुं समर्था स्युर्मुक्तिं प्राप्य यथेच्छया(यदृचछया .प्र.पा) ॥
कादाचित्कोपासने तु, तावत् तेषां च योग्यता ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-43" |
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| oldKey | "AIT_C02_S01_V16_B03" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वेदनं ह्यापरोक्ष्येण मुख्यं भवति नान्यथा ॥
एकदेशविदो यस्मात् परोक्षज्ञानिनोऽखिलाः ।
आपरोक्ष्यं भवेद् यस्मान्नैवोपासामृते क्वचित्॥
तस्मादुपासापूर्वं तु योऽपरोक्षं प्रपश्यति ।
स एव वेद, नान्यस्तु, योग्यस्यैवापरोक्षदृक् ॥
तस्माद्योग्यस्योक्तफलम् अन्येषां किञ्चिदेव हि ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-44" |
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| oldKey | "AIT_C02_S01_V17" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "प्राणेन सृष्टावन्तरिक्षं च वायुश्च । अन्तरिक्षं वा अनु चरन्त्यन्तरिक्षमनु शृण्वन्ति । वायुरस्मै पुण्यं गन्धमावहति । एवमेतौ प्राणं पितरं परिचरतोऽन्तरिक्षं च वायुश्च । यावदन्वन्तरिक्षं यावदनु वायुस्तावानस्य लोको भवति, नास्य तावल्लोको जीर्यते, यावदेतयोर्न जीर्यतेऽन्तरिक्षस्य च वायोश्च य एवमेतां प्राणस्य विभूतिं वेद ।
चक्षुषा सृष्टौ द्यौश्चाऽदित्यश्च । द्यौर्हास्मै वृष्टिमन्नाद्यं सम्प्रयच्छति। आदित्योऽस्य ज्योतिः प्रकाशं करोत्येवमेतौ चक्षुः पितरं परिचरतो द्यौश्चाऽदित्यश्च । यावदनु द्यौर्यावदन्वादित्यस्तावानस्य लोको भवति, नास्य तावल्लोको जीर्यते, यावदेतयोर्न जीर्यते दिवश्चाऽदित्यस्य च, य एवमेतां चक्षुषो विभूतिं वेद ।
श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च चन्द्रमाश्च । दिग्भ्यो हैनमायान्ती३, दिग्भ्यो विशृणोति । चन्द्रमा अस्मै पूर्वपक्षापरपक्षान् विचिनोति पुण्याय कर्मणे । एवमेते श्रोत्रं पितरं परिचरन्ति दिशश्च चन्द्रमाश्च । यावदनु दिशो यावदनु चन्द्रमास्तावानस्य लोको भवति, नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतेषां न जीर्यते दिशां च चन्द्रमसश्च य एवमेतां श्रोत्रस्य विभूतिं वेद ।
मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च । आपो हास्मै श्रद्धां सन्नमन्ते पुण्याय कर्मणे । वरुणोऽस्य प्रजां धर्मेण दाधार । एवमेते मनः पितरं परिचरन्त्यापश्च वरुणश्च । यावदन्वापो यावदनु वरुणस्तावानस्य लोको भवति, नास्य तावल्लोको जीर्यते, यावदेतेषां न जीर्यतेऽपां च वरुणस्य च य एवमेतां मनसो विभूतिं वेद ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-45" |
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| oldKey | "AIT_C02_S01_V17_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "प्राणादिभ्यश्च वाय्वाद्या एवं विष्णोः प्रजज्ञिरे ॥
ब्रह्मशेषसुपर्णेन्द्रशिवाद्या आप ईरिताः ।
ते विष्णोर्मनसा जाताः सर्वे चाबभिमानिनः ॥
वैश्वदेव्यस्ततो ह्यापो, वरुणश्च मनोभवः ।
प्राणिनां पूर्तपुण्येषु श्रद्धारूपमनोऽधिपः ॥
एवं (हि) सर्वा देवता हि विष्ण्वङ्गेभ्यः प्रजज्ञिरे ।
स्वोत्पत्त्यङ्गं च ते विष्णोः शुश्रूषन्ते पृथक् पृथक् ॥
विष्णोः विषयधर्मेषु ज्ञानादिषु चतुर्मुखः ।
श्रद्धां ददाति भूतानाम्, वैदिकश्रवणे विपः ॥
तान्त्रिके शेषरुद्रौ च शक्रो यज्ञादिकर्मणि ।
वायुर्गन्धवहश्चास्य भक्तिज्ञानप्रदस्तथा ॥
भूतानां तस्य विषये, त्वन्तरिक्षं च कर्मणः ।
तदीयस्यैव भोगार्थं जीवानाम्, श्रुतिचारदम् ॥
अन्तरिक्षं च विघ्नेशः, सूर्यस्तत्कर्मसिद्धये ।
भूतानां ज्योतिषो दाता द्यौरप्यन्नाद्यदायिनी ॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-46" |
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| oldKey | "AIT_C02_S01_V18" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "आपा३ इति। आप इति । तदिदमाप एव । इदं वै मूलम्, अदस्तूलम्। अयं पिता, एते पुत्राः। यत्र ह क्वच पुत्रस्य तत्पितुः। यत्र वा पितुस्तत्पुत्रस्य। इत्येतत् तदुक्तं भवति।
एतद्ध स्म वै तद् विद्वानाह महिदास ऐतरेयः। आऽहं मां देवेभ्यो वेदा, ओ मद् देवान् वेद। इतः प्रदाना ह्येते। इतः सम्भृता इति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-47" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "आप इत्येव देवानां ब्रह्मादीनां कथं भवेत् ।
नामेत्यपृच्छल्लक्ष्मीस्तं महिदासं जनार्दनम् ॥
आप इत्येव नामैषां भवतीत्याह स प्रभुः ।
इदं मदाख्यं यद् ब्रह्म ह्याप इत्यभिधीयते ॥
आ पूर्णत्वाद् गुणैः सर्वैस्तन्मूलमखिलस्य च ।
तूलभूतं तदन्यत् तु, पिता ह्येष जनार्दनः ॥
पुत्रा ब्रह्मादयः सर्वे, नैवायं वृक्षमूलवत् ।
स्वतन्त्रत्वाज्जगन्नाथः, पितृत्वात् परमेशितुः ॥
तन्नामाऽप इति ह्येतद् ब्रह्मरुद्रादिनां भवेत् ।
यथा यदव इत्येव रघवः कुरवस्तथा ॥
पुत्रनाम पितुश्च स्यात् तत्तन्त्रत्वात् सुतस्य हि ।
यथा पितामहाद्याश्च पितरो नाम कीर्तिताः ॥
तथापि मुख्यया वृत्त्या व्यवहारव्यवस्थितिः ।
आप इत्येव देवानां सर्वेषां प्रददौ हरिः ॥
स्वकीयमेवमन्यानि पृथक् पृथगदात् प्रभुः ।
नारायणादिनामानि ददौ नान्यस्य केशवः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-48" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V18_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "एवं स भगवान् विष्णुर्महिदासाभिधः प्रभुः ।
जानन्नित्योदितज्ञानादाह देवीमिदं वचः ॥
देवपर्यन्तम् आ व्याप्तिं वेदाहं मम सर्वदा ।
मत्पर्यन्तं (य)तथा व्याप्तिं देवानामपि सर्वशः ॥
मयि देवास्तेषु चाहमिति विद्धिवरानने ।
मयैतानि प्रदत्तानि पदानि ब्रह्मपूर्वकाः ॥
अधितिष्ठन्ति, सत्ताद्या अप्येतेषां मदाज्ञया ।
ज्ञानकर्मबलेहाद्या मद्दत्ता इति किं वदे ॥
सम्भृता मत्त एवैते,......।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-49" |
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| oldKey | "AIT_C02_S01_V19" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स एष गिरिश्चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् प्राणः । तं ब्रह्मगिरिरित्याचक्षते । गिरति ह वै द्विषन्तं पाप्मानं भ्रातृव्यम्, पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-50" |
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| oldKey | "AIT_C02_S01_V19_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | ". ... स एष भगवान् गिरिः ।
(गि)गरणात् सर्वभूतानाम्, चक्षुर्नामास्य दर्शनात् ॥
सर्वश्रोतृत्वतः श्रोत्रम्, मनो मन्तृत्वहेतुतः ।
प्राणनामा प्रणेतृत्वात्, तमेनं गुणपूर्तितः ॥
गिरणाच्चाखिलस्यास्य प्राहुर्ब्रह्मगिरिं प्रभुम् ।
य एवं वेद तं विष्णुम् आपरोक्ष्येण शाश्वतम् ॥
गिरत्येवाखिलं पापं भ्रातृवत् सह संस्थितम्म् ।
पराभवति पाप्माऽस्य द्वेष्टा निरयगः सदा ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-51" |
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| oldKey | "AIT_C02_S01_V20" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C02_S01" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स एषोऽसुः । स एष प्राणः । स एष भूतिश्चाभूतिश्च। तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे । ते बभूवुः । तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूररित्येव प्रश्वसिति । अभूतिरित्यसुराः । ते ह पराबभूवुः। भवत्यात्मना, पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति, य एवं वेद ॥" |
|---|
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "असनाद्भगवान् सोऽसुः सर्वस्यापि जनार्दनः ।
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ॥
स एष भूतिनामाऽपि ज्ञानैश्वर्यादिभूतिदः ।
अज्ञानादिप्रदातृत्वात् स एवाभूतिनामकः ॥
सुखज्ञानादिगुणदं पूर्णं सर्वगुणैः प्रभुम् ।
उपासते तं वाय्वाद्या देवास्तस्माच्च तेऽखिलाः ॥
बभूवुः सुखसज्ज्ञानपूर्वैः सर्वैर्गुणैर्युताः ।
देवानामपि सर्वेषां प्रधानोऽद्यापि मारुतः ॥
स्थित्वा सुप्तेषु विष्णुं तं भूर्भूरित्येव शंसति ।
भूःशब्दार्थो भूतिरिति, वैपरीत्येन चासुराः ॥
अभूतिकारको(अभूतिकारणः .हृ)ऽस्माकमैश्वर्यादिगुणोज्झितिः ।
इत्येवोपासते, तस्मात् पराभूताश्च सर्वशः ॥
ज्ञानैश्वर्यादिभिर्हीनाः पेतुरन्धे तमस्यथ ।
य एवं वेद तं विष्णुं भूतिदं भूतिरूपिणम् ॥
भावाभावं च देवानां दैत्यानां चैवमेव तु ।
ज्ञानैश्वर्यादिभिः सोऽपि भवेत् तस्य परात्मनः ॥
प्रसादात् तस्य पाप्मा च पराभवति सर्वशः ।" |
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स एष मृत्युश्चैवामृतं च । तदुक्तमृषिणा– ‘अपाङ् प्राङेति स्वधया गृभीतः’ इति । अपानेन ह्ययं यतः प्राणो न पराङ् भवति । ‘अमर्त्यो मर्त्येना स योनिः’इति, एतेन हीदं सर्वं सयोनि, मर्त्यानि हीमानि शरीराणी३, अमृतैषा देवता । ‘ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य१न्यं चिक्युर्न निचिक्युरन्यम्’ इति, निचिन्वन्ति हैवेमानि शरीराणी३, अमृतैवैषा देवता । अमृतो ह वा अमुष्मिन् लोके सम्भवति, अमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे, य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "स एष भगवान् विष्णुर्मृत्युदो मोक्षदस्तथा ॥
स एव जीवनकरो यदाऽपानेन संयुतम् ।
प्राणं नियमयत्यस्मिञ्च्छरीरे पुरुषोत्तमः ॥
शरीराद् बहिरेतौ तु यदा निःसारयत्यजः ।
तदा मृत्युप्रदश्चायम्, मुक्तानामपि जीवनम् ॥
प्राणादेव हि, तत्रापि प्राणाधारो जनार्दनः ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "अर्वाक् प्राक् च सदा गच्छेद् वायुरानन्दरूपिणा ॥
अनेनैव गृहीतो हि प्राणोऽपानेन संयुतः ।
अनेन हरिणा यस्मान्नियतो न पराङ् भवेत् ॥
अमर्त्यस्तत्प्रसादेन वायुर्देहैः सह स्थितः ।
अनित्या अपि देहास्ते शश्वत् सन्त्याविमोक्षतः ॥
स्थूलसूक्ष्मविभागेन, किमु वायुर्जगत्प्रभुः ।
नानागती (तु)च तावेतौ, वायुः प्राप्नोति केशवम् ॥
शरीरं तु विनष्टं स्यात् पञ्चत्वमुपगच्छति ।
जडं तज्जडतामेति, चेतना वायुदेवता ॥
चेतनेशं हरिं याति, विरुद्धगमनौ च तौ ।
ऊर्ध्वं गच्छति देवः सः, देहोऽधः पतति क्षितौ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "दृश्यते तच्छरीरं चाप्यदृश्या वायुदेवता ।
य एवं वेद तं वायुम् अमृतं सर्वनायकम् ॥
पूर्णानन्देन हरिणा गृहीतं तद्वशं सदा ।
स मुक्तो लोकमाप्नोति विष्णोर्मुक्तैश्च दृश्यते ॥ इति च ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "‘ब्रह्म’ ‘पन्थाः’ ‘सत्यं’ ‘कर्म’ इति तस्य नारायणस्य वासुदेवाद्याः क्रमेण चतस्रो मूर्तयः । नासिकायां यन्नेत्रयोर्मध्ये विनतमिव किञ्चिन्नतस्थानं तत् सूर्यलोकस्थानीयं विद्यात् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "तथा इति निर्णयः। ‘इरामया’(पृ.सं) इति दैर्घ्यमवधारणार्थम् ।‘दैर्घ्यं प्लुतं च हिङ्कारो बिन्दुरप्यवधारणे’ इति शब्दनिर्णये । ब्रह्मा हैव ता इ ते ।
देशतः कालतोऽर्थाच्च बलतो गुणतस्तथा ।
स्वरूपतोऽपि नैव स्याद् भेदोऽत्यल्पोऽपि यत्र हि ॥
केवलैश्वर्ययोगेन यत्र सङ्ख्या दिवद् भवेत् ।
स्वरस्पर्शविभागेन तत्रोक्तिः स्याद् विभक्तिषु ॥
अचिन्त्यादेव (तु) (तथै)चैश्वर्याद् एकोऽपि बहुरूपवान् ।
प्रकाशयेद्यतो विष्णुः सर्वत्राप्यविशेषवान् ॥
न विशेषो हि रूपाणां मत्स्यादीनां कथञ्चन ।
नैश्वर्ये न बले चैव नाऽनन्दादिगुणेष्वपि ॥
इत्यादिशब्दनिर्णयवचनाद् द्विवचनम् अत्र व्यवहारमात्रम् इति दर्शयितुं ता इत्युक्तम् ।
संहितायां यत्र दैर्घ्यं पदे यत्र न विद्यते ।
उक्तार्थस्य महाधिक्यं श्रुतेस्तत्र विवक्षितम् ॥
इति, अतो ब्रह्मा ह इति दैर्घ्यमपि परब्रह्मत्वविवक्षया ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "अद उ एव नारायणाख्यमधिदैवतम्, अन्यानि दैवतमात्राणि । स्थानान्तरेऽन्येषामपि अधिदैवत्वकथनम् कर्मजदेवाद्यपेक्षया। मुख्याधिदैवतं नारायण एव ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "स्योष्णिग् लोमानि इत्यादि ‘लोमसूष्णिग्’ इत्याद्यर्थे । ‘सप्तसु प्रथमा’ इति सूत्रात् । सच्छन्दोऽभिश्छन्न इति वाक्यशेषात् । ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्’(ऋ.सं.१०.९०.१२) इत्यादिवच्च ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘अङ्गेषु यस्य छन्दांसि देवा लोका मखा अपि ।
तद्वशा नियता नित्यं नमस्तस्मै परात्मने ॥’</span> इति स्कान्दे ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "अस्मै.... पुण्याय कर्मण इति। एतमुद्दिश्य जीवानां पुण्यकर्म कर्तुम् । तैर्हि स्तुत्यादिकर्माणि कृतानि श्रोत्रेण शृणोति भगवान् । दिग्भ्योऽप्यन्य एव विशृणोति जीवः । अन्येषां जीवानां श्रवणजं भोगं स्वश्रोत्रेण दिग्भिरननुगृहीतेनैव भगवान् भुङ्क्ते।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "द्वितीयोऽध्यायः" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "एष इमं लोकमभ्यार्चत् पुरुषरूपेण, य एष तपति प्राणो वाव तदभ्यार्चत् प्राणो ह्येष य एष तपति ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "एष नारायणो देवो वायुना सहेैवेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या । ‘पुरि शेते’ इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति भगवान् स नारायणः । ‘य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद’(बृ.भा.५.७.९) इत्यादिश्रुतिभ्यः । ‘य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते’(छां.उ.१.६.६) इत्युक्त्वा ‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.उ.१.७.६) इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "‘यमादित्यो न वेद’ इत्युक्तत्वान्नादित्यः। ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः’(ब्र.सू.१.१.२१) इति भगवद्वचनम् ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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|---|
| text | "‘वृत्रं यदिन्द्र शवसाऽवधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे ।
यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरस्सतीरुपरा एतसे कः ॥
सीदन्निन्द्रस्य जठरे कनिक्रदन्नृभिर्यतस्सूर्यमारोहयो दिवि’।(ऋ.सं.१०.९०.१३)
‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोस्सूर्यो अजायत ।’ (ऋ.सं.८.४.२९)
‘यस्सूर्यं य उषसं जजान यो अपां नेता स जनास इन्द्रः ।
उद्वेति प्रसविता जनानां महान् केतुरर्णवः सूर्यस्य’।(ऋ.सं.२.१२.७)
‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्यस्तपति तेजसा भ्राजसा च ।
यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति यदक्षरे परमे प्रजाः’।(म.ना.उ.१.३)
‘तमेताः पञ्चदेवताः परिम्रियन्ते विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदित्योऽग्निः’ इत्यादौ सूर्यस्य सर्वत्र पराधीनत्वावगतेश्च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-69" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥’(तं.सासं. उ.प्र.व.अ.६२.श्लो.१७) इति नारसिंहपुराणे ।
‘तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी ।
नैव राजन् रवेः शक्तिः शक्तिर्नारायणस्य सा ॥ इति पाद्मे ।" |
|---|
|
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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|---|
| text | "‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥’(भ.गी.१५.१२) इति च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-71" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया । ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(महोपनिषत्.१) इति महाप्रलये तस्यैवावस्थानश्रुतेः । ‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’(ऋ.सं.१०.१२५.५) इत्यादि ब्रह्मशिवादीनां देव्यधीनपद-प्राप्तिमुक्त्वा तस्या अपि भगवदधीनत्वं ‘मम योनिरप्स्वं१तः समुद्रे । ततो वितिष्ठे भुवना नु विश्वा। परो दिवा पर एना पृथिव्या’(ऋ.सं.१०.१२५.७) इत्याह । ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्’(ऋ.सं.१०.१२५.६-७) इति ब्रह्मरुद्रयोर्देव्याः सकाशात् सृष्टिसंहारौ चोक्तौ ।
‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५)
इत्यादिना विष्णोः प्रसादादेव शिवादीनां पदप्राप्तिकथनाच्च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-72" |
|---|
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते। तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्त’(बृ.२.२.२) इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः ‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.२.२.१) इति मध्यमप्राण-शब्दोक्तस्य ‘प्राणः स्थूणा’(बृ.२.२.१) इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्य-मण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-73" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S02_V02" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तं शतं वर्षाण्यभ्यार्चत् तस्माच्छतं वर्षाणि पुरुषायुषो भवन्ति । तं यच्छतं वर्षाण्यर्भ्याचत्, तस्माच्छतर्चिनस्तस्माच्छतर्चिन इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-74" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S02_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः ।
आजानजाः कर्मदेवास्तात्त्विका दक्ष एव च ॥
शक्रश्चोमा च रुद्रश्च भारती वायुरेव च ।
मुक्ता उक्ताः शतगुणा बलज्ञानसुखादिभिः ॥
विष्णुभक्त्यादिभिश्चैव गुणैः सर्वैः क्रमाधिकाः ।
तस्माद्रमा ततो विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥
नित्यमुक्तः स्वतन्त्रश्च न चान्यस्तादृशः क्वचित् ।
कुत एवाधिकोऽन्यः स्याद् यन्मुक्ता अपि तद्वशाः ॥
रमाऽपि तद्वशा नित्यं स नान्यस्य वशे प्रभुः ।
न भेदः शेषशिवयोः सुपर्णः शेषसंमितः ॥
कामः शक्रसमो नित्यं प्रतिबिम्बाश्च ते क्रमात् ॥’
इति च महासंहितायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-75" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S02_V0३" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स इदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च, तस्मात् मध्यमास्तस्मात् मध्यमा इत्याचक्षते। एतमेव सन्तम् ।
प्राणो वै गृत्सोऽपानो मदः । स यत्प्राणो गृत्सोऽपानो मदस्तस्मात् गृत्समदः। तस्माद् गृत्समद इत्याचक्षते । एतमेव सन्तम् ।
तस्येदं विश्वं मित्रमासीद् । यदिदं किञ्च तद्यदस्येदं विश्वं मित्रमासीद् । यदिदं किञ्च तस्मात् विश्वामित्रस्तस्माद्विश्वामित्र इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
तं देवा अब्रुवन् - अयं वै नः सर्वेषां वाम इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वाम इति तस्माद्वामदेवस्तस्माद् वामदेव इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
स इदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च स यदिदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च तस्माद् अत्रयस्तस्मादत्रय इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-76" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S02_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते, ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-77" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S02_V03_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः ।
नेतृत्वाच्चापनेतृत्वाद् भगवान् पुरुषोत्तमः ॥इति च ।
वामो भद्रः ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-78" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एष उ एव बिभ्रद्वाजः । प्रजा वै वाजस्ता एष बिभर्ति यद् बिभर्ति तस्मात् भारद्वाजस्तस्मात् भारद्वाज इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
तं देवा अब्रुवन् ‘अयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ’ इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ इति तस्माद्वसिष्ठः। तस्माद्वसिष्ठ इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
स इदं सर्वम् अभिप्रागाद् यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभिप्रागाद्यदिदं किञ्च, तस्मात् प्रगाथाः । तस्मात् प्रगाथा इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
स इदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च, तस्मात् पावमान्यः। तस्मात् पावमान्य इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
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| text | "वसिष्ठः वसतामुत्तमः । अभ्यपवयत पावयामास संसारात् ।" |
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| text | "सोऽब्रवीत् ‘अहमिदं सर्वमसानि, यच्च क्षुद्रं यच्च महद्’ इति । ते क्षुद्रसूक्ताश्चाभवन् महासूक्ताश्च । तस्मात् क्षुद्रसूक्ताः। तस्मात् क्षुद्रसूक्ता इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।
सूक्तं बतावोचतेति, तत्सूक्तमभवत् । तस्मात् सूक्तम्। तस्मात् सूक्तमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।" |
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| text | "तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकम् अभवत् । बत इत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्ठूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन् अहम् अल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपः, महाप्राणिषु महारूपश्चासानीति(भवानीति) स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिता भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु ।" |
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| text | "एष वा ऋग् । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत, तस्माद् ऋक् । तस्माद् ऋगित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।
एष वा अर्धर्चः । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्योऽर्द्धेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्योऽर्धेभ्योऽर्चत, तस्माद् अर्धर्चः । तस्मादर्धर्च इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।
एष वै पदम्। एष हीमानि सर्वाणि भूतानि पादि। स यद् इमानि सर्वाणि भूतानि पादि, तस्मात् पदम्। तस्मात् पदमित्यचक्षत एतमेव सन्तम् ।
एष वा अक्षरम्। एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति । न चैनमतिक्षरन्ति । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति, न चैनम् अतिक्षरन्ति, तस्मात् अक्षरम्। तस्मादक्षरमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।
ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव । प्राण ऋच इत्येव विद्यात् ॥ २ ॥" |
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| text | "एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानित्यृक् । गच्छति हि मरणकाले ।
‘ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते बुधैः’ इति हि भारते ।
‘म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः ।
त्यक्त्वा भागेन गच्छन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ॥
गतैर्भागैरपि पुनर्विशेयुर्भोगसिद्धये ।
भोग्यलोकमनुप्राप्तं तस्मात् स्वप्नवदन्तरा ॥’इति च ॥" |
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| text | "‘अर्च= गतिपूजनयोः’, ‘ऋ=गतौ’ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । ‘पद=गतौ’ तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । ‘क्षर= विनाशसन्ततदानयोः’ इति धातोः ।
(समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि)" |
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| text | "‘यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या’(ऋ.सं.१०.८८.१००) ।
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’ ।(ऋ.सं.१.१६४.४६)
‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३)
‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ ॥(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१)
इत्यादिश्रुतिभ्यः । न केवलमृष्यादीनां नाम भगवतः, सर्वे वेदा अपि तस्यैव नामानि, किमु च वेदाः समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि यथायोग्यं योजनीयानि ! एकमेव व्याहरणम्= एकप्रकारमेव नाम । निर्दोषगुणपूर्तिवाचकत्वादेकप्रकारता । प्राणे नारायण एव= नारायणविषय एव व्याहारः । ऋचस्तु विशेषत इन्द्रादिनामवतो विष्णोर्गुणान् अल्पज्ञानाम् अपि प्रकाशयन्तीति प्राणे नारायणे एवेति विद्यात् ।" |
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| text | "उक्तं च बृहत्संहितायाम्–
‘हुङ्कारेण सहैवाब्धिः सर्वाभिभवशक्तिताम् ।
विष्णोर्वक्ति यतो हुं च पराभिभववाचकः ।
ओमिति स्वरते नित्यं वायुर्मेघेषु संस्थितः ।
बलवन्नादसंयुक्तो ह्यधिकोच्चत्वमस्य तु ।
ओङ्कारस्यार्थ उद्दिष्ट उक्तार्थाधिक्यमेव च ।
नादो बली प्रवदति तथा भेरीध्वनिः प्रभोः ।
अनुदात्तस्वरूपत्वाद् औदार्यं वदतीशितुः ॥" |
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| text | "सर्वनामाऽपि भगवान् सर्वशक्तिश्च सर्ववित् ।
ब्रह्मरुद्रादिजीवेभ्यो जडेभ्यः श्रिय एव तु ।
व्यतिरिक्तः सदाऽनन्तसान्द्रानन्दैकरूपकः ।
तस्यैव मुख्यनामानि समाकृष्येतरेष्वपि ।
उपचारात् प्रवर्तन्ते व्यवहारप्रसिद्धये ।
तथैव सर्वनामानि प्रवर्तन्ते च मारुते ।
न तावन्मुख्यवृत्त्यैव, मुख्यतोऽन्यव्यपेक्षया ।
मुख्यतः सर्वनामा तु विष्णुरेको न चापरः ।
तस्मात् प्राणादिशब्दाश्च विष्णावेव हि मुख्यतः ।
अन्यव्यपेक्षया वायौ मुख्यवृत्तिर्विधीयते ।
वायुश्च सूर्यसंस्थः संस्तपत्येतज्जगत्त्रयम् ।
आज्ञयैव हरेर्वायोः शक्त्या सूर्यस्तपत्ययम् ॥’ इत्यादि च ।" |
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| text | "न प्रसिद्धसूर्यस्येयं तापनशक्तिरिति ज्ञापयितुं ‘प्राणो ह्येष य एष तपति’ इत्युक्तम् । ‘प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति’(बृ.उ.३.६.२३,सप्तान्नब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः । प्राणशब्दश्च मुख्यतो विष्णौ प्रवर्तमानोऽपि वायावपि वर्तते । अतः सर्ववेदाद्यभिधेयत्वं वायोरप्यस्ति । ‘प्राणस्य प्राणः’(केन.१.३) इति श्रुतेरुभयोरपि प्राणशब्दः प्रसिद्ध एव ।‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.४.२.१) इति वायोर्विशेषणादुत्तमप्राणो विष्णुरिति च सिद्धम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "द्वावात्मानौ हि वेदेषु द्वौ प्राणौ द्वौ च चेतनौ ।
अज्ञानाभिभवास्पृष्टौ वायुर्नारायणश्च तौ ।
तदन्ये चेतनास्सर्वे प्राणाश्चात्मान एव च ।
अज्ञानाभिभवस्पृष्टास्तस्मात् ते ह्यधमाः श्रुताः ।
मध्यमो वायुरेवैक, उत्तमः केवलो हरिः ।
सर्वशब्दोदितौ तस्माद् एतौ द्वावेव नापरः ।
अन्ये चैव मितैः शब्दैरुच्यन्ते नामितैः क्वचित्।
श्रीरप्यखिलशब्दोक्ता विष्णुवन्न तु मुख्यतः ॥
तस्मादमितनामानावपि तौ मितनामवत् ।
श्रीश्च वायुश्च विष्णुस्तु मुख्योक्तेरमिताभिधः ॥
अनन्तनामकत्वाच्च सोऽनन्तगुण ईरितः ।
पृथङ्नामानि यस्मात् तद्गुणानेव प्रचक्षते ॥’इत्यादि ब्रह्माण्डे ॥ २ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषससाद । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे द्वितीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय ।
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे तृतीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्येव अभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय ।
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागा, वरं ते ददामि’ इति । स होवाच- ‘त्वामेव जानीयाम्’इति ।
तमिन्द्र उवाच- ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद् वैश्वामित्रम् एष तपन्नेवास्मि’ इति होवाच ॥ ३ ॥
(बृहतीसहस्रं सर्वं नारायणस्यान्नम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya-collection"><span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥</span>
(इन्द्रकर्तृकं महाव्रतम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये ।
महाव्रतं कर्म चक्रे, हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः ।
भृगुरध्वर्युरभवद्, ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् ।
उद्गाता वायुरभवत्, स्वयं नारायणः प्रभुः ।
सादस्यमकरोत् तत्र, तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।</span>
(विश्वामित्रेण बृहतीसहस्रफठनम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् ।
वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् ।
आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् ।
शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः ।
ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः ।
तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः ।
द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः ।
प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् ।
अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् ।
तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् ।
ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् ।
ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः ।
प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वरं ददानीत्युक्तः स मुनिः प्राह जनार्दनम् ।
सम्यक्त्वामेव जानीयाम् इति मोक्षे सुखोच्चताम् ।
इच्छंस्तं प्राह भगवान् इन्द्रस्थो वायुसंयुतः ।
सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् ।
यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)।
अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि ।
सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि ।
सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।</span>
(विष्णौ सर्वशब्दसमन्वयक्रमप्रदर्शनम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः ।
अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये ।
जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः ।
इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः ।
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ।
ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि ।
ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः ।
सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः ।
प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः ।
बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः ।
सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते ।
स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते ।
अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा ।
साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च ।
दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते ।
तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा ।
यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा।
वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्।
विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।</span>
(शक्राविष्टो विष्णुः; न चापरः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः।
आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्।
त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः।
अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः।
हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि।
तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया।
द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’।
इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः ।
अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ।
प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्।
विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः।
इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च ।
तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि।
नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।</span>
(‘प्राणो वा अहम्’ इत्युपदेशः भगवतैव कृतः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वाऽपि त्वामेव जानीयाम् इति वरस्वीकाराद् इन्द्रादेव च, इन्द्राविष्टो भगवान् अत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते ; एष तपन्नेवास्मि इति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपति इत्युक्तत्वात् ।</span>
(भगवतस्तदीयरूपाणां च नास्ति भेदः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।</span>
(न शचीपतिः सर्वशब्दवाच्यः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।</span>
‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३)
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’(ऋ.सं.१.१६४.४६) । इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सप्तार्द्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोऽस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६) इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः ।</span>
(नारायणादिनामानि नान्यस्य)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।<br/>नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) ॥’ इति श्रुतिः ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यो देवानां नामधा एक एव’ इत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । ‘एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति श्रुतिः । ‘एको नारायण आसीत् तत्समो वा, अधिको वा नास्ति’ इति च ।
‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्स्तपति तेजसा भ्राजसा च’(म.ना.उ.१.३) ।
‘यमन्तःसमुद्रे कवयोऽवयन्ति यदक्षरे परमे प्रजा’(तै.आ.१०.१.१) ।
इत्युक्तस्य समुद्रशायिन एव नारायणस्य
‘तद् एवर्तं तद् सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.४.३) । इति परब्रह्मत्वावधारणाच्च विष्णोः परं सदृशं वा नास्त्येव । अतस्तदत्रोच्यत इत्यपि न वक्तव्यम् ।</span>
(विष्णुः सर्वेश्वरः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।<br/>न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.सं.७.९९.१) ॥इत्यादेश्च ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम्’(ऋ.सं.४.३०.१) । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव ।<br/> ‘किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्’ इत्यादिप्रश्नस्यापि<br/>‘परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।<br/>परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥</span>
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।<br/>दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।<br/>यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।<br/>विष्णोर्नामसहस्रम्... ॥’(म.भा.अनु.अ.१४९)
इत्येव भारते परिहाराच्च ।
(मित्रं मे दक्षिणा रमा)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्याध्यायि ।
‘दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।<br/>धन्याश्चर्योऽहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ।<br/>इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥’ इति नारदवचनम् ।
न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना अचेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते ।
‘मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।<br/>तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥’इति भारते</span>
(विष्णुरेव बृहतीसहस्रप्रतिपाद्यः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः ।
‘महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।<br/>तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥
तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।<br/>तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥’इति गारुडे
विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः’(तै.ब्रा.३.७.९.३) । इत्युक्त्वा ‘तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा’ इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । ‘सदिति प्राण’ इति श्रुतेः ।
‘सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।<br/>साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥’ इति शब्दनिर्णये ।</span>
(बृहतीसहस्रपठनफलम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">प्रियधाम्न उप= समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् ।
बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।<br/>द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ।<br/>तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥ इति च गारुडे ।</span>
(इन्द्रे विशेषावेशस्तात्कालिकः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । ‘प्राणस्तथाऽनुगमाद्’(ब्र.सू.१.१.२८) इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा ‘न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन्’(ब्र.सू.१.१.२९) इति वक्तुः= बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्य इन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । ‘अध्यात्मसम्बन्ध’ शब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः= परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्हि ‘अध्यात्मभूमा’ इत्येव स्यात्; सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।</span>
(अन्तर्यामिदृष्ट्याऽभेदव्यवहारः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्’(ब्र.सू.१.१.३०) इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ (ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र च ‘अहं भूमिमददामार्याय’(ऋ.सं.४.२६.२) इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदाऽपि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते ‘भूमिम् अददाम्’ इत्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात्(विष्णुर्हि आर्याय इन्द्राय भूमिमदात्(ताम्रपर्णि) । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोध-सूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वाद् ‘अहं मनुरभवम्’ इत्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।</span>
(मुक्तावपि पञ्चभेदाः सुनित्याः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।<br/>जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥
जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।<br/>न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव च (वा) ॥
य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।’(भ.गी.१६.८)
‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।’(भ.गी.१६.१४)
‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।’(भ.गी.१६.९)
‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।<br/>मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ.गी.१६.२०) ॥ इत्यादि च ।</span>
(सर्वान्तर्यामित्वादिना विष्णोः सर्वशब्दवाच्यत्वम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’ इत्यादौ अहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दार्थः(अस्मच्छब्दस्थः/अस्मच्छब्दाद्यर्थः) । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ इति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा, तत्रैव प्रमाणत्वेन विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्यायिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात्, सर्वगुणत्वात्, सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते; न तु सर्वस्वरूपत्वम् ।
उक्तं च भारते ।
‘स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।<br/>सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति ।</span>
(श्रुतिवचनानि नाभेदपराणि)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘‘ ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्’(ऋ.सं.८.४.१७) इति पुरुषेणैव ‘इदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’, ‘आ तृणाद् आकरीषात् सर्वं भगवान् इति मिथ्यादृष्टिरेव’ (एषा.हृ)’’ इति च श्रुतिः ।
‘हिरण्मयो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’,
‘अमृतो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’,
‘स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च ।
न हि भेदाभावे ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे’ इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">एकत्वे तु ‘ददृशे’ इत्येतावता पूर्यते; ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यः’ इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । नच ‘कर्तृकर्मविरोधो नामास्ति’ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि ।
(न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो मायावादिनः)
न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते ।
‘विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।<br/>सितस्य (गुडस्य) पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥’ इति शब्दनिर्णये ।
न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि ।</span>
(मुक्तावपि तारतम्यम् अप्रतिहतम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति’(क.ठ.२.३.१३) इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः’(क.ठ.६.११) इत्यादि कर्माणि च । ‘यस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे’ इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः(काठके न दृश्यते) ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।
अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥आदध्ना(घ्ना)स उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे’(ऋ.सं.१०.७१.७) ॥
इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् ।
‘श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।<br/>अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।<br/>क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥
उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।<br/>ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं(सदा.हृ) हरिम् ॥
नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।<br/>सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥’
इति ब्रह्मसारे ।</span>
(वेदमन्त्रेषु मुक्तलोकवर्णनम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यत्र ब्रह्मा पवमान च्छन्दस्यां वाचं वदन् ।<br/>ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिल्ँलोके स्वर्हितम् ।<br/>तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।<br/>यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।<br/>लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।<br/>देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।<br/>कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव’(ऋ.सं.९.११३.६-११) ॥</span>
(श्रुतिसूत्राणि मुक्तभेदावेदकानि)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानाम्, दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानाम्, गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानम्, सोमयागादिकम्, कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते; ‘अमृतं कृधि’ इति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् । ‘मुक्तः प्रतिज्ञानात्’(ब्र.सू.४.४.२) । ‘सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः’(ब्र.सू.४.४.८) । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) । ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’(ब्र.सू.४.४.२२) । ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’(ब्र.सू.४.४.२३) इत्यादि मुक्तसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ‘ग्राव्णा सोमे महीयते’(ऋ.सं.९.११३.६) इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।</span>
(सूत्राणुसारेण श्रुतेरर्थ उपवर्णनीयः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ‘ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः’(भ.गी.१३.५) इति (हि) विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि ।
‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।<br/>योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’इति आदित्यपुराणे ।</span>
(न मुक्तिर्भोगरहिता)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च निर्णयकानि(निर्णयात्मकानि. हृ) भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् ।
‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः(ग्रहत्वमाप. हृ ) ।<br/>तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥
विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।<br/>न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥
बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।<br/>विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥’ इति स्कान्दे ।
‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।<br/>सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् ।
तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥</span> ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥" |
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| text | "अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥" |
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| text | "वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये ।
महाव्रतं कर्म चक्रे, हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः ।
भृगुरध्वर्युरभवद्, ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् ।
उद्गाता वायुरभवत्, स्वयं नारायणः प्रभुः ।
सादस्यमकरोत् तत्र, तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।" |
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| text | "बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् ।
वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् ।
आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् ।
शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः ।
ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः ।
तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः ।
द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः ।
प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् ।
अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् ।
तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् ।
ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् ।
ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः ।
प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।" |
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| text | "न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)।
अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि ।
सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि ।
सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।" |
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| text | "यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः ।
अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये ।
जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः ।
इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः ।
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ।
ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि ।
ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः ।
सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः ।
प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः ।
बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः ।
सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते ।
स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।" |
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| text | "सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते ।
अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा ।
साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च ।
दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते ।
तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा ।
यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा।
वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्।
विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।" |
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| text | "इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः।
आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्।
त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः।
अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः।
हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि।
तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया।
द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’।
इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः ।
अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ।
प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्।
विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः।
इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च ।
तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि।
नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।" |
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| text | "स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।" |
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| text | "न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-100" |
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| oldKey | "AIT_C02_S02_V08" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य यानि व्यञ्जनानि तच्छरीरम् । यो घोषः स आत्मा । य ऊष्माणः स प्राणः । एतद्ध स्म वै तद्विद्वान् वसिष्ठो वसिष्ठो बभूव । तत एतन्नामधेयं लेभे । एतदु हैवेन्द्रो विश्वामित्राय प्रोवाच। एतदु हैवेन्द्रो भरद्वाजाय प्रोवाच । तस्मात् स तेन बन्धुना यज्ञेषु हूयते ।
तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति शतसंवत्सरस्याह्नां सहस्राणि भवन्ति । व्यञ्जनैरेव रात्रीराप्नुवन्ति । स्वरैरहानि । तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् ।
तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य परस्तात् प्रज्ञामयो देवतामयो ब्रह्ममयोऽमृतमयः सम्भूय देवता अप्येति । य एवं वेद । तद्योऽहं सोऽसौ, योऽसौ सोऽहं । तदुक्तमृषिणा - सूर्य आत्मा 'जगतस्थस्थुषश्च' इति । एतदु हैवोपेक्षेतोपेक्षेत ॥४ ॥
इति श्रीमन्महैतरेयोपनिषत्सु द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-101" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "यावतीभिर्ऋग्भिः शंसिताभिः षट् त्रिंशत्सहस्राण्यक्षराणि भवन्ति । यस्मात् कस्मादपि च्छन्दसस्तावत्यः शंसनीयास्तदा सम्पादितं बृहतीसहस्रं भवति । तत्र या व्यञ्जनाभि(मानि)देवता सैव सर्वप्राणिनां शरीराभिमानिदेवता स्वायम्भुवो मनुः । घोषाभिमानिदेवता सर्वजीवाभिमानी ब्रह्मा । ऊष्माभिमानी वायुः ।
व्यञ्जनानां शरीरस्य चाभिमानी मनुः स्मृतः ।
घोषाणां सर्वजीवानामभिमानी चतुर्मुखः ॥
ऊष्माभिमानी वायुश्च प्रतिपाद्यो जनार्दनः ।
एतेषामधिपं विष्णुं बृहत्युक्थस्य देवताम् ॥
उपास्यैव वसिष्ठोऽभूद् वसिष्ठः शक्र एव च ।
एतां विद्यां कौशिकाय भरद्वाजाय चादरात्(चाददात्. हृ) ॥
एतद्विद्याबलेनैव विद्याधीशेन बन्धुना ।
यज्ञेष्वाहूयते नित्यमिन्द्रो विष्णुप्रसादतः ॥" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति शतसंवत्सरस्याह्नां सहस्राणि भवन्ति । व्यञ्जनैरेव रात्रीराप्नोति (राप्नुवन्ति) । स्वरैरहानि । तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य परस्तात् प्रज्ञामयो देवतामयो ब्रह्ममयोऽमृतमयः सम्भूय देवता अप्येति, य एवं वेद । तद्योऽहं सोऽसौ । योऽसौ सोऽहं । तदुक्तमृषिणा - सूर्य आत्मा ‘जगतस्थस्थुषश्च’(ऋ.सं.१०.११४.१) इति । एतदु हैवोपेक्षेतोपेक्षेत ॥४ ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-104" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "एवं ज्ञात्वाऽपि(त्वैव) सम्पाद्य बृहतीनां सहस्रकम् ।
ज्ञानान्नारायणस्यैव प्रकृष्टज्ञानसन्ततेः ॥
स एव मे मयो विष्णुः प्रकृष्टज्ञानरूपकः ।" |
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| id | "Aitareya-105" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "प्राधान्यं मयशब्दोऽयं वक्ति विष्णोः सदैव हि ॥
प्रधानोऽस्य हरिर्यस्मात् प्रज्ञारूपोऽधिदेवता ।
ब्रह्मामृतं(च) तेनायं ब्रह्मादिमय उच्यते ॥
सर्वोत्तमस्वरूपत्वाद्विष्णुरुक्तः स देवता ।
ब्रह्म पूर्णगुणत्वाच्च, नित्यत्वाद् अमृतं तथा ॥
एतादृशं च (तु) यो विष्णुं प्रधानं वेत्ति सर्वदा ।
प्रज्ञादिभिर्गुणैः स्वस्मात् परेभ्यश्च सदाऽधिकम् ॥
प्रज्ञादेवब्रह्मामृतमयः स परिकीर्तितः ।
प्रज्ञादिमय एवं स भूत्वा देवान् क्रमेण च ॥
एति मारुतपर्यन्तान्, मारुतेन च केशवम् ।
सम्पादनाच्च विद्याया अस्याः परत एव च ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "द्वासप्ततिसहस्राणि रूपाणि हि रमापतेः ।
बृहतीसहस्रसंस्थानि स्वरव्यञ्जनभेदतः ॥
तान्येव पुरुषस्थानि यस्मात् पुरुषसंस्थितम् ।
बृहतीसहस्रं तच्छंस्यं व्यज्यते न ह्यृते नरम् ॥
द्वासप्ततिसहस्राणि तान्येवाहर्निशासु च ।
विष्णुरूपाणि सूर्येऽपि त्वहोरात्रं हि सूर्यगम् ॥
तस्माद्योऽयमहं नामा सदाऽहेयत्वहेतुतः ।
स एवासौ सूर्यसंस्थः साक्षान्नारायणः प्रभुः ॥
योऽसौ सूर्यगतो विष्णुः सोऽहेयो भास्करादिभिः ।
एवं मनुष्यजीवेषु सूर्यादिषु च संस्थितः ॥
एक एव परो विष्णुरिति जीवसमीपगम् ।
ईक्षेन्नारायणं देवं सर्वजीवेश्वरेश्वरम् ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "सम्पन्नस्य परस्तादेवानन्तरमेव; न पुनः कर्मान्तरेण शरीरारम्भ एवंविदो भवति । प्रज्ञामयो देवतामय इत्यादि पृथक् पृथङ् ‘मय’शब्दोऽनिरुद्धादिचतुर्मूर्तीनामपि परस्परसाम्येन सर्वजीवेभ्य आधिक्यं ज्ञातव्यमिति दर्शयितुम् ।
‘अन्तर्यामिस्वरूपेण ज्ञापयन्ननिरुद्धकः ।
प्रज्ञेत्युक्तो द्योतनाच्च प्रद्युम्नो देवतोदितः ॥
अमं करोति यच्छास्त्रमृतं स्वस्मिन् पुनः पुनः ।
सङ्कर्षणोऽमृतं तस्माद्, वासुदेवस्तु बृंहणात् ॥
जीवानां मुक्तिदानेन ब्रह्मेति कथितः प्रभुः ।
एवमेकोऽपि भगवांश्चतुर्धा समुदीरितः ॥’ इत्यादि चातुरात्म्ये ।" |
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| id | "Aitareya-108" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "सम्भूयेत्यत्र ‘सम्’ इत्युपसर्गाद् बृहतीसहस्रसम्पादनानन्तरं भगवदाधिक्यं पुनराधिक्येन ज्ञायत इत्युक्तं भवति । भगवदाधिक्यमधिकं ज्ञात्वा देवता अपि एति= क्रमेण प्राप्नोति ।
‘द्वासप्ततिसहस्राणां रूपाणां पर्युपासनात् ।
आधिक्यं ज्ञायते विष्णोर्नितरां हि पुनः पुनः ॥
प्राप्नोति देवताश्चैव केशवान्ताः क्रमेण तु ।
योग्या अस्याश्च विद्यायाः देवा ऋषय एव च ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।
(अहंनामा विष्णुः)
बृहतीसहस्रस्थितानि विष्णुरूपाणि पुरुषे स्थितानि पुरुषैरहेयत्वाद् अहंनामकानि तान्येव सूर्ये स्थितानि, यान्येव सूर्ये स्थितानि तान्यपि सूर्यादिभिरहेयत्वादहंनामकानि । एतदेवोक्तं नारायणाख्यं परं ब्रह्मैव सर्वदा उप= समीपे ईक्षेत ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-109" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "नात्र जीवेश्वराभेदो विवक्षितः । ‘उप= समीपे ईक्षेत’ इति समीपे दर्शनवचनात् । न च निरर्थकत्वम् उपसर्गस्याङ्गीकर्तुं युक्तम् । न ह्यार्षेषु वेदादिषु व्याकरण-निरुक्तादिषु चोपसर्गाणां वैयर्थ्यमङ्गीकृतं कुत्रचित् ।
उक्तं च भगवता व्यासेन–
‘नानर्थकः स्वरो वाऽपि वर्णो वा कुत्रचिद् भवेत् ।
पदं वाक्यं कुतश्च स्यान्नाल्पार्थमपि कुत्रचित् ॥
उच्चाराद्यर्थमपि वा नास्ति किञ्चित् स्वरादिकम् ।
महार्थमेव सर्वं हि वेदे वा वैदिकेऽपि वा ॥’ इति ।
सुकरं च सर्वपदानाम् अनर्थकत्वकल्पनम् । यैश्च वाक्यैरर्थवत्वं प्रतीयते तेषामप्यनर्थकत्वमेव स्याद्, विशेषाभावात् । न च मानुषवाक्येन वेदपदानाम् आनर्थक्यं कल्प्यम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-110" |
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| oldKey | "AIT_C02_S02_V10_B07" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "जीवेश्वरैक्यङ्गीकारे ‘योऽहं सोऽसौ’ इत्येव पूर्यते; पुनः ‘योऽसौ सोऽहम्’ इति व्यर्थम् ? न ह्यस्य तेनैक्ये तस्यानेन भेदशङ्का भवति । ‘अस्य तस्य’ इति भेदाङ्गीकारे नाभेदो मुख्यः ; किन्तु ? तदधीनत्वमेवान्यस्य भवति, स्नेहविशेषो वा । ‘चैत्रो मैत्रः, मैत्रश्चैत्रः’ इतिवत् । तत्र ह्युभयस्नेहापेक्षया पुनर्वचनं युज्यते । अभ्यासत्वे ह्येकप्रकारेण प्रयोगो दृष्टः । अत्र हि प्रयोगद्वैविध्यं दृश्यते ।
‘एकप्रकारा बहुशो वागभ्यास इतीरितः ।
अर्थान्तरार्था द्विविधा प्रयुक्तेति हि निर्णयः ॥’ इति गारुडे ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-111" |
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| oldKey | "AIT_C02_S02_V10_B08" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S02" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "अहंशब्दस्याहेयत्वाङ्गीकारे नराहेयत्वं सुराहेयत्वं चोच्यते इति न वैयर्थ्यम् । ‘अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति’, ‘न वा अहमिमं विजानाति’, ‘तस्योपनिषदहम्’(बृ.उ.७.५.४) इत्यादौ विष्णोरेवाहेयत्वेनाहंनामकत्वप्रसिद्धेः । अहंशब्दस्यास्मच्छब्दार्थकत्वे ‘अहमिमं न जानाति’ इति न युज्यते । तस्य ‘भूरिति शिरः, भुव इति बाहू’(बृ.उ.७, ब्रा.५) इत्यादिनाऽक्षिसंस्थो भगवानेव ह्यहंशब्दोदितः । न हि जीवस्याक्षिणि पृथक् शिरोबाह्वादिकं विद्यते । हृदि स्थितमेव हि तस्य स्वरूपम्(रूपम्. हृ) । जागरितेऽप्यक्ष्यादिषु विशेषसन्निहितं भवति दीपप्रकाशवत् । ‘अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद् हृदि हि’(ब्र.सू.२.३.२५) ‘गुणाद्वाऽऽलोकवत्’(ब्र.सू.२.२.२६) इति च सूत्रात् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-112" |
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| oldKey | "AIT_C02_S02_V10_B09" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S02" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘आदित्ये हिरण्मयः पुरुषः’, ‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.उ.१.६.७) इत्यादि सूर्ये स्थितस्य विष्णो रूपमुक्त्वाऽक्षिस्थितस्यापि ‘तस्यैतस्य तदेव रूपम्’(छां.उ.१.७.५) इत्यादि कथनाच्च । ‘स एष एवैतस्माद् अर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे’(छां.उ.१.७.६) इत्यादि लोकाधिपत्यकथनाच्च । न हि ‘कश्चिद् भिक्षुकः पातालाद्यधिपतिः’ इत्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । तस्माद् भगवानेवाहेयत्वाद् अहं नामा । ‘चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः’(ऋ.सं.१.११४.१), ‘जगतस्तस्थुषश्चात्मा’(ऋ.सं.१.११४.१) इत्यादि जीवेभ्यो भेददर्शनाच्च ।
‘यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।
यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति भण्यते (कथ्यते) ॥’ इति भारते ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-113" |
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| oldKey | "AIT_C02_S02_V10_B10" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "देवता अप्येति प्राप्नोतीत्येव चार्थः । लयश्चेद् ‘देवतास्वप्येति’ इति स्यात् । न च विनाशः पुरुषार्थः । मयट्शब्दस्य भगवत्प्राधान्यार्थत्वानङ्गीकारे ‘सम्भूय देवता अप्येति’ इति ल्यब् न युज्यते । उपासनायास्तु सम्पन्नस्य परस्तादित्युक्तत्वात् पूर्वमेव सिद्धिः ।
‘सर्वस्माद्भिन्नमीशेशं जीवाभेदेन यः स्मरेत् ।
स यात्यन्धन्तमो घोरं नित्यातिशयदुःखदम् ॥
सर्वोत्तमं तु यो विष्णुं भिन्नं जानाति सर्वतः ।
नित्यानन्दमसौ याति वासुदेवप्रसादतः ॥’ इति चैतरेयसंहितायाम् ।
अतः सर्वव्यतिरिक्तः सर्वोत्तमः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायण इति सिद्धम् ।
सर्वप्रमाणसिद्धत्वं वक्तुम् आऽध्यायमूलतः ।
अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्यात् पूर्वोक्तस्यावधारणे ॥ इति शब्दनिर्णये ॥" |
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|
| id | "Aitareya-114" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03" |
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| type | "section" |
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| parent | null |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "paada" |
|---|
| text | "स एष पुरुषः समुद्रः सर्वं लोकमति यद्ध किञ्चाश्नुतेऽत्येनं मन्यते । यद्यन्तरिक्षलोकमश्नुतेऽत्येनं मन्यते । यद्यमुं लोकमश्नुवीत, अत्येवैनं मन्येत ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-115" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V01" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "ॐ यो ह वा आत्मानं पञ्चविधमुक्थं वेद, यस्माद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति स सम्प्रतिवित् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-116" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "योऽसौ नारायणो देवः परमात्मा सनातनः ।
नित्याततगुणत्वात् स आत्मेत्युक्तः सदा श्रुतौ ॥
नारायणादिरूपेण पञ्चधाऽवस्थितः सदा ।
सर्वस्योत्थापकत्वात् स उक्थमित्यभिधीयते ॥
बृहतीसहस्ररूपे च स उक्थे पञ्चधा स्थितः ।
पञ्चभेदं हि तच्छस्त्रं तृचाशीतित्रयं च यत् ॥
पूर्वापरं तृचाशीत्या इति पञ्चात्मकं हि तत् ।
प्रथमे पञ्चकाद् भागे स्थितो नारायणः स्वयम् ।
ऋक्त्रयाशीतिके पूर्वे गायत्रीच्छन्दआत्मके ॥
वासुदेवः स्थितो नित्यम् ऋगशीतित्रये तथा ।
द्वितीये बृहतीच्छन्दस्यसौ सङ्कर्षणः स्थितः ॥
यस्याऽवेशबलेनैव जीवः सङ्कर्षणोऽपरः ।
पृथिवीं बिभर्ति सततं तत्प्रसादात्तवैभवः ॥
तृतीयायां तृचाशीत्यामुष्णिक्छन्दसि केशवः ।
प्रद्युम्नरूपी सततं स्थितो यस्यैव सन्निधेः ॥
कामः प्रद्युम्ननामाऽभूत् तत्प्रसादात्तवैभवः ।
उक्थस्यैवान्त्यभागे तु सोऽनिरुद्धो हरिः स्थितः ॥
कामपुत्रोऽनिरुद्धाख्यं यदावेशेन लब्धवान् ।
एवं पञ्चात्मकं विष्णुं बृहत्युक्थस्य देवताम् ॥
यो वेद सम्यग् वेत्ता सः .......।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-117" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येव वा आत्मोक्थं पञ्चविधम् । एतस्माद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति । एतमेवाप्येति । अयनं ह वै समानानां भवति य एवं वेद ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-118" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V02_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | ".... तानि रूपाणि वै हरेः ।
स्थितानि पञ्चभूतेषु पृथिव्याद्यभिधानि च ।
तदावेशात् पृथिव्यादिनाम भूतेषु पञ्चसु ॥
पृथुत्वात् पृथिवीनामा भूमौ नारायणः स्थितः ।
बलज्ञानस्वरूपत्वाद् वायुनामा स एव च ॥
वायौ सङ्कर्षणो नित्यं स्थित आकाशनामकः ।
व्याप्तत्वाद् वासुदेवस्तु सदाऽऽकाशे स्थितः प्रभुः ॥
अनिरुद्धस्तथैवाप्सु बहुरूपो व्यवस्थितः ।
अम्नामा पालनान्नित्यं प्रद्युम्नो ज्योतिषि स्थितः ॥
ज्योतिर्नामा द्योतनाच्च बहुरूपः पृथक् पृथक् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-119" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V02_B02" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "यद्यप्यस्य हरेः सर्वरूपाण्यप्यखिलैर्गुणैः ॥
पूर्णान्यथापि चैकै(वै)करूपेषु स पृथग्गुणैः ।
व्यवहारान् पृथग् देवः करोतीव हि लीलया ॥
तस्मात् पृथगिवास्येति नाम विष्णोः परात्मनः ।
सर्वत्र सर्वनाम्नोऽपि व्यवहारार्थमीर्यते ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-120" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V02_B03" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "एतस्माद्धि हरेर्नित्यं जगदुत्तिष्ठति प्रभोः ॥
मुक्तौ लये च तं याति स च सर्वाश्रयः प्रभुः ।
य एवं वेत्ति तं विष्णुमुपास्ते चाऽपरोक्षतः ॥
स मुक्तः समजातीनाम् आश्रयश्च भविष्यति ।
स्वजातीनामुत्तमत्वपदयोग्या हि ये सुराः ॥
ब्रह्मेन्द्राद्यास्ते हि योग्याः साक्षादस्मिन्नुपासने ।
अन्येषां ज्ञानमात्रेण योग्यमाधिक्यमाप्यते ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-121" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V03" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तस्मिन् योऽन्नं चान्नादं च वेदाहास्मिन्नन्नादो जायते । भवत्यस्यान्नम् । आपश्च पृथिवी चान्नम् । एतन्मयानि ह्यन्नानि भवन्ति ॥
ज्योतिश्च वायुश्चान्नादम् । एताभ्यां हीदं सर्वमन्नमत्ति । अवपनमाकाशः । आकाशे हीदं सर्वं समोप्यत । आवपनं ह वै समानानां भवति । य एवं वेद ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-122" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V03_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तत्र भोक्तृषु संस्थितौ ।
भोक्तृशक्तिप्रदौ नित्यं भोक्तारौ च विशेषतः ॥
नारायणानिरुद्धौ तौ भोग्यवस्तुषु संस्थितौ ।
तर्पकौ सर्वलोकानां तस्माद्भोग्यौ न चर्व्यतः ।
अवकाशप्रदो नित्यं वासुदेवो नभःस्थितः ।
एवं पञ्चात्मकं विष्णुं य उपास्ते सदैव तु (च) ॥
अवकाशप्रदः सोऽपि स्वजातीनां भविष्यति ।
भोक्ता चाप्यायकश्चैव तस्य विष्णोः प्रसादतः ॥
ब्रह्मेन्द्राद्याः स्वजातीयपदयोग्या अमुष्य च ।
योग्या उपासनस्य स्युस्तदन्ये ज्ञानमात्रके ॥" |
|---|
|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तस्मिन् योऽन्नं चान्नादं च वेदा हास्मिन्नन्नादो जायते । भवत्यस्यान्नम् । ओषधिवनस्पतयोऽन्नम् ।
प्राणभृतोऽन्नादम् । ओषधिवनस्पतीन् हि प्राणभृतोऽदन्ति । तेषां य उभयतोऽदन्ताः पुरुषस्यानुविधां विहितास्तेऽन्नादाः । अन्नमितरे पशवः । तस्मात् त इतरान् पशूनधीव चरन्ति । अधीव ह्यन्नेऽन्नादो भवति । अधीव ह समानानां जायते य एवं वेद ॥१ ॥" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नो जङ्गमेषु व्यवस्थितौ ।
नारायणानिरुद्धौ तु स्थावरान्तर्गतौ प्रभू ॥
तत्राप्याकाशगो नित्यं वासुदेवो निरञ्जनः ।
प्राणानां भरणान्नित्यं प्राणभृन्नाम तद्धरेः ॥
न ह्यन्यः प्राणभर्ताऽस्ति तमृते पुरुषोत्तमम् ।
ओषणाच्च निधानाच्च स एवौषधिनामकः ॥
वननीयपतित्वाच्च स एव हि वनस्पतिः ।
अन्ने स्थित्वा तृप्तिदत्वं तस्याऽद्यत्वमपीष्यते ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-125" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "पुरुषस्य हरेर्ये तु सदाऽऽकारेण संस्थिताः ।
देवगन्धर्वमर्त्याद्यास्तेषु सङ्कर्षणो हरिः ॥
प्रद्युम्नश्च स्थितो नित्यं पुरुषाकृतिरेव तु ।
तौ भोक्तारौ च भोग्यानां भोजकावखिलस्य च ॥
नारायणानिरुद्धौ तु तथाऽन्यपशुषु स्थितौ ।
वृषभाश्वादिरूपेण तृप्तिदावखिलस्य च ॥
वाहनोपानहादीनामारोढारो नरादयः ।
यतः सङ्कर्षणश्चैव प्रद्युम्नस्तेषु संस्थितौ ॥
ततस्तयोर्हि सञ्चार उपरीव भविष्यति ।
आकाशगो वासुदेवः पञ्चमोऽत्राप्युपास्यते ।
वाहनादियुतो मुक्तौ भवेदेतदुपासकः ॥
इत्यै(त्याद्यै)तरेयसंहितायाम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-126" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "क्षीराब्धिशयनं विष्णो रूपं यत्पुरुषाभिधम् ।
सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तदाकारौ नृषु स्थितौ ।
नारायणानिरुद्धौ तु पश्वाकारौ पशुस्थितौ ॥ इति सत्तत्त्वे ।
गुणवैशेष्याभावाद् वाहनादिषु चरणमात्राद् ‘अधीव चरन्ति’ इत्यादौ इवशब्दः ॥ १ ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-127" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तस्य य आत्मानम् आविस्तरां वेद, अश्नुते हाऽविर्भूय ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् । स आत्मानमाविस्तरां वेदौषधिवनस्पतिषु हि रसो दृश्यते ।
चित्तं प्राणभृत्सु । प्राणभृत्सु त्वेवाऽविस्तरामात्मा । तेषु हि रसोऽपि दृश्यते । न चित्तमितरेषु ।
पुरुषे त्वेवाऽविस्तरामात्मा । स हि प्रज्ञानेन सम्पन्नतमः । विज्ञातं वदति, विज्ञातं पश्यति, वेद श्वस्तनम् । वेद लोकालोकौ । मर्त्येनामृतमीप्सति । एवं सम्पन्नः ।
अथेतरेषां पशूनामशनापिपासे एवाभिविज्ञानम् । न विज्ञातं वदन्ति, न विज्ञातं पश्यन्ति, न विदुः श्वस्तनम्, न लोकालोकौ । त एतावन्तो भवन्ति । यथाप्रज्ञं हि सम्भवाः ॥ २ ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-128" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "आविर्भावं तारतम्याद्यो वेद परमात्मनः ।
स तस्यैव विशेषेण प्रीतियोगाद् भविष्यति ॥
स्थावरं जङ्गमं चैव भूयस्त्वेनाश्नुते हरिः ।
आविर्भूतस्तेषु सदा सम्यक्स्वात्मानमेव च ॥
तारतम्यात् सन्निहितं सर्वभूतेषु केशवः ।
वेत्त्येक एव, विष्णोर्यद्विशेषावेशनं सदा ॥
जङ्गमेषु च वृक्षेषु नैव तादृक्शिलादिषु ।
तस्माद् वृक्षादिषु रसश्चित्तं चलनवत्सु च ॥
दृश्यते न शिलाद्येषु सन्निधिर्न हि तादृशी ।
शिलाद्येषु स्थितो विष्णुर्भारदार्ढ्यादिकारणम् ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-129" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "नैव चित्तादिकस्यातो वृक्षाद्या उत्तमास्ततः ।
विशेषोऽयं पदार्थानाम्, न तु विष्णोः कथञ्चन(कदाचन) ॥
यत्र विष्णुर्गुणाधिक्यं दर्शयेद् वस्तु तद्वरम् ।
गुणपूर्णो हि सर्वत्र स्वयं विष्णुः सनातनः ॥
वृक्षेभ्योऽप्यधिकं विष्णुर्जङ्गमेषु प्रकाशितः ।
तेभ्योऽपि पुरुषे विष्णुर्गुणाधिक्यप्रकाशकः ॥ इत्यादि च ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-130" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "य आत्मानं परमात्मानम् आविस्तरां आविर्भावतारतम्येन वेद स तस्य विष्णोरेव । सर्वेषां तदीयत्वेऽपि प्रियत्वात् तदीयत्वविशेषणम् । ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् तत्सर्वं शिलादिभ्यो भूयस्त्वेन तेष्वाविर्भूतोऽश्नुते भगवान् । स एव च नारायणः सम्यक् स्वात्मानमाविस्तरां वेद । ‘अन= चेष्टायाम्’ इति धातोश्चेष्टावत्त्वमेव प्राणभृत्त्वं पश्वादीनां ज्ञानानुसारेण ह्युत्पत्तयः सम्भवाः ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-131" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "योऽस्मिन् पुरुषे पश्वादिभ्य आधिक्येन सन्निहितो भगवान् स एष पुरुषः समुद्रः, समुद्रिक्तोऽन्येभ्यः । स जीवो यद्यपि भगवत्प्रसादात् सर्वलोकाधिपो भवति, सर्वलोकानतीत्य यत्ककिञ्चिद् अलौकिकं मोक्षाख्यमप्यश्नुते । तथाऽपि तम् एनम् आत्मशब्देन प्रस्तुतं विष्णुम् अत्येव मन्यतेऽधिकमेव मन्यते स्वात्मनः सर्वस्माच्च । मुक्तोऽपि न तेन साम्यम्, तद्भावं वा मन्यते ‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः’(म.भा.ता.नि.२.५८) ‘मुक्तानां परमा गतिः’(वि.स), ‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.उ.२.५) इत्यादिवाक्याच्च ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-132" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "यद्यपि देवलोकाधिपत्यं तद्योग्यस्य विष्णुर्ददाति तदप्यश्नुवीतैव । ‘बहुगणिकादिपरिवाररूपम् अशुचीदं पदम्’ इत्यादिबुद्ध्या नापह्नुवीत । एनं भगवन्तमतिमन्येतैव च सर्वथा स्वतः सर्वस्माच्चाधिकमेव मन्येत । यद्यमुं लोकमश्नुते प्राप्नोति अश्नुवीत भुञ्जीत ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-133" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "पृथिवीलोकाधिपत्ये(लोके) विष्णोराधिक्यं सत्पुरुषो मन्यत इति प्रत्यक्षसिद्धत्वान्न पृथगुक्तम् । अतिशब्दाद् ‘यद्ध किञ्च’ इति प्रथमोक्तो मोक्ष इति सिद्धम् । अन्तरिक्षप्राप्तेरल्पत्वाद्, मोक्षे स्वतः सिद्धत्वाच्च अतिमन्यते इति सिद्धवचनमेव कृतम् । स्वर्गादिप्राप्तेरधिकैश्वर्याद् ‘भगवत्समोऽहम्’, ‘भगवत्स्वरूपः’ इति वा मन्तुं प्राप्तिरस्तीति ‘अत्येवैनं मन्येत’ इति सावधारणविधिः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-134" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "न च ‘मन्यते’ इति काममात्रम् । ‘मनु= अवबोधने’ इति धातोः । न ह्यवबोध एव कामः । अन्यथा राज्यं जानन्नपि ‘राज्यकामः’ इति स्यात् । न च ‘मन्यते’ ‘मन्येत’ इति द्विविधः प्रयोगस्तस्मिन् पक्षे युज्यते । न च सर्वलोकमतीत्याश्नतो मुक्तस्य मुक्तेरन्यत्र कामो विद्यते । सर्वलोकाधिकं च मुक्तिं विना नान्यत् । तस्मान्मुक्तैरमुक्तैरपि भगवान् सर्वोत्तमत्वेन चिन्त्य इति सिद्धम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-135" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स एष पुरुषः पञ्चविधः । तस्य यदुष्णं तज्ज्योतिः। यानि खानि स आकाशः। अथ यल्लोहितं श्लेष्मा रेतस्ता आपः । यच्छरीरं सा पृथिवी । यः प्राणः स वायुः । स एष वायुः पञ्चविधः। प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः । ता एता देवताः प्राणापानयोरेव निविष्टाः, चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति । प्राणस्य ह्यन्वपायमेता अपियन्ति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-136" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V07_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पुरुषस्थपञ्चभूतेषु पञ्चरूपो हरिः स्थितः ।
प्रद्युम्नादिस्वरूपेण ज्योतिरादौ पृथक् पृथक् ॥
स एव तु(च) पुनर्वायौ पञ्चधाऽवस्थितः प्रभुः ।
प्राणादिरूपे वसति ह्यनिरुद्धादिरूपवान् ॥
अनिरुद्धश्च(द्धः स) प्रद्युम्नस्तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ।
वासुदेवो नारायणः पञ्चरूप इति क्रमात् ॥
पञ्चरूपोऽपि भगवान् यस्माद् वायौ विशेषतः ।
स्थितस्तेन च खादिभ्यो वायुरेव विशिष्यते ॥
अत एव पृथिव्यादिस्वरूपा मनआदयः ।
देवाः प्राणाश्रिता नित्यं गच्छन्ति प्राणमन्वपि ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-137" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V07_B02" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पृथिवीमयं मनस्तत्र शेषवीन्द्रशिवेन्द्रकाः ।
कामानिरुद्धौ देवगुरुर्मनोदेवाः सचन्द्रकाः ॥
श्रोत्रमाकाशरूपं च मित्रधर्मजलाधिपाः ।
कुबेरश्च दिशां देवाः श्रोत्रदेवा इति श्रुताः ॥
ज्योतीरूपं तथा चक्षुश्चक्षुर्देवो रविः स्मृतः ।
किञ्चित् तेजोयुता वाक् च विशेषेण त्वबात्मिका ॥
उपचीयते ततः साऽद्भिस्तदभावे च शुष्यति ।
तृषितस्य हि वागेव पूर्वं मन्दा प्रवर्तते ॥
वाग् देवते ततो वह्निरुमा चापि प्रकीर्तिते ।
चक्षुष्ट्वमग्नेः श्रोत्रत्वं चन्द्रस्यापि सहोच्यते ॥
स्वाहाया अपि वाक्त्वं च पर्जन्यस्य मनःस्थितिः ।
द्वितीयमेतदास्थानं श्रुतिवाक्यप्रमाणतः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-138" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स एष वाचश्चित्तस्योत्तरत्तरिक्रमो यद् यज्ञः । स एष यज्ञः पञ्चविधः- अग्निहोत्रम्, दर्शपूर्णमासौ, चातुर्मास्यानि, पशुः, सोमः । स एव यज्ञानां सम्पन्नतमो यत् सोमः। एतस्मिन् ह्येताः पञ्चविधा अधिगम्यन्ते, यत् प्राक् सवनेभ्यः सैका विधा, त्रीणि सवनानि, यदूर्ध्वं सा पञ्चमी ॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-139" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "शेषवीन्द्रशिवादीनां मनआदिस्वरूपिणाम् ।
आश्रयो वायुरेवैकस्तस्य नारायणः स्वयम् ॥
तस्माद् वायुवशानां हि वाक्चित्तादिस्वरूपिणाम् ।
देवानां क्रमवृत्तिभ्यो जाते यज्ञेऽपि केशवः ॥
अग्निहोत्रादिके नित्यम् अनिरुद्धादिरूपकः ।
पञ्चधाऽवस्थितः सोमे पञ्चरूपो व्यवस्थितः ॥
सवनत्रयात् पूर्वके च सवनत्रितये परे ।
अनिरुद्धादिरूपेण क्रमेणैव व्यवस्थितः ॥
तमेतं परमं विष्णुं मुक्तोऽप्यत्येव मन्यते ।
अधिकं ह्येव तस्मात् तं मन्येतान्योऽपि सर्वदा ॥ इत्यादि च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-140" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यो ह वै यज्ञे यज्ञं वेद, अहन्यहर्देवेषु देवमध्यूळ्हं स सम्प्रतिविद् । एष वै यज्ञे यज्ञोऽहन्यहर्देवेषु देवोऽध्यूळ्हः, यदेतन्महदुक्थम् । तदेतत् पञ्चविधम्- त्रिवृत्पञ्चदशं सप्तदशमेकविंशं पञ्चविंशमिति स्तोमतः । गायत्रं रथन्तरं बृहद् भद्रं राजनमिति सामतः । गायत्र्युष्णिग् बृहतीत्रिष्टुब् द्विपदेति छन्दस्तः । शिरो दक्षिणः पक्ष उत्तरः पक्षः पुच्छम् आत्मेत्याख्यानम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-141" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V09_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यज्ञेषु यज्ञनामानं याज्यत्वात् पुरुषोत्तमम् ।
अधिरूढम्, तथाऽहस्सु चाहर्नामानमेव तु ॥
अहार्यत्वाद्धि, देवेषु देवं सर्वोत्तमत्वतः ।
एवं च सर्वनामानं सर्वेषु स्थितमच्युतम् ॥
स्तोमादिषु च यो वेद स सम्यग्विदिति श्रुतः ।
य एष उक्थनामाऽसौ सर्वोत्थापनको हरिः ॥
महांश्च परिपूर्णत्वात् सहस्रबृहतीस्थितः ।
अहरह्नां स, यज्ञानां यज्ञो, देवाधिकोऽपि सः ॥
अनिरुद्धादिरूपेण स विष्णुः पञ्चधा स्थितः।
स्तोमसामचितिच्छन्दश्शस्त्रेष्वपि पृथक् पृथक् ।
एकैकमेव तद्रूपमनिरुद्धादिपञ्चकम् ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-142" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "पञ्चकृत्वः प्रस्तौति, पञ्चकृत्व उद्गायति, पञ्चकृत्वः प्रतिहरति, पञ्चकृत्व उपद्रवति, पञ्चकृत्वो निधनमुपयन्ति ।
तत् स्तोभसहस्रं भवति । एवं ह्येताः पञ्चविधा अनुशस्यन्ते, यत्प्राक् तृचाशीतिभ्यः सैका विधा, तिस्रस्तृचाशीतयः, यदूर्ध्वं सा पञ्चमी ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-143" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V10_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रस्तावादिष्वपि विभुः पञ्चधैव व्यवस्थितः ।
प्रस्तावादीन् पञ्चकृत्वस्तस्मादेव प्रकुर्वते ॥
पञ्चरूपं तमेवैकं स्तोतुमेव पृथक् पृथक् ।
तत्र ये स्तोमशब्दाश्च संस्थिता बहुकोटयः ॥
पृथक् पृथक्तेऽपि विष्णोः प्रादुर्भावान् प्रचक्षते ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-144" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतत् सहस्रं तत् सर्वम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-145" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V11_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अनन्तरूपो हि हरिः शब्दोऽप्येष ह्यनन्तधा ॥
विष्णोः सहस्रनामस्तु यत्तद्रूपसहस्रकम् ।
बृहतीसहस्रमेतच्च तद्वक्ति हि पृथक् पृथक् ॥
सहस्रशब्दोऽप्यमितं यतो वक्त्यमितान्यतः ।
नामानि विष्णोरुच्यन्ते सहस्रमिति चाऽख्यया ॥
अनन्तनामवचने त्वशक्तत्वात् सहस्रकम् ।
नाम्नां पृथगिदं प्रोक्तमनन्ततनुवाचकम् ॥
विष्णोरनन्तरूपाणाम् उक्त्या(उक्ता) पञ्चशतद्वये ।
आसीत् सहस्रमित्याख्या सहस्रं मुख्यतोऽमितम् ॥
‘ब्रह्म यावत् तावती वाग्’ इति वेदप्रमाणतः ।
सहैवानन्तरूपैस्तु सरणेन सहस्रकम् ॥
नाम्ना सह सृतेरेव रूपाणां वा सहस्रता ।
बृहतीसहस्रं चैतस्माद्रूपानन्ताभिधायकम् ॥
पृथक् पृथग्घि नामार्था ऋच एताः प्रकीर्तिताः ।
सर्वनामात्मकं तस्माद ऋक्सहस्रमिदं हरेः ॥
सर्वरूपाण्यतो विष्णोस्संस्तुतान्यमुनैव हि । ॥ ४० ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-146" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V12" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तत् सर्वं तानि दश ।" |
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| id | "Aitareya-147" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V12_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः ॥
कृष्णबुद्धौ च कल्कीति रूपाणां दशकं हरेः ।
पञ्चभेदविभिन्नेन ह्यृक्सहस्रेण शस्यते ॥
रूपाणां पञ्चकं पूर्वमपरं पञ्चकं हरेः ।
प्रस्तावाद्यैरानिधनैः स्तूयते सामभक्तिभिः ॥
तानि रूपाण्यस्य दश सर्वरूपात्मकानि च ।
दशनामानि चास्यैव सर्वरूपाभिधान्यपि ॥
पञ्चकं सामभक्तीनामृक्सहस्रं च तद्द्वयम् ।
स्तावकं सर्वरूपाणामत एव रमापतेः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-148" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V13" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तानि दश दशेति वै सर्वम् ।" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V13_B01" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "दशेति सर्वनामैतत्प्रथितं मुख्यतः श्रुतौ ।
शं रूपं भगवन्तं यद्दद्याद् व्यक्त्या समस्तशः ॥
दशेत्यमितनाम्नां तदाख्या रूपेषु शं ददेः ।
सर्वनामार्थवचनात् पञ्चकद्वितयस्य च ॥
अभूद्दशेति वै नाम तस्मादेतद्दशाखिलम् ।" |
|---|
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| type | "verse" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "एतावती हि सङ्ख्या । दशदशतस्तच्छतम् । दश शतानि तत् सहस्रम् । तत् सर्वम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "दशैव मूलसङ्ख्या च तद्विभेदाः शतादयः ॥
ऋक्सहस्रमिदं तस्मादनन्तगुणमच्युतम् ।
अनन्तशक्तिममितरूपनामानमेव च ॥
वक्ति ..." |
|---|
|
| id | "Aitareya-152" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तानि त्रीणि च्छन्दांसि भवन्ति । त्रेधा विहितं वा इदमन्नम् अशनं पानं खादस्तदेतैराप्नोति ॥४ ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-153" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | ".... च्छन्दस्त्रयं चात्र तृचाशीतित्रयात्मकम् ।
अशनादित्रिकं तच्च भूत्वा विष्णुमुपैति च ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-154" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वच्छन्दोऽभिधश्चैव सर्वदेवाभिधस्तथा ॥
सर्वमुन्यभिधश्चैव सर्ववस्त्वभिधो हरिः।
अनन्तपूर्णगुणकस्तस्माज्ज्ञेयो रमापतिः ॥
मुख्यतोऽस्यां च विद्यायां योग्य एकश्चतुर्मुखः ।
एकदेशपरिज्ञाने त्वन्ये योग्याः शिवादयः ॥ इत्यादि च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-155" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "गायकानां त्राणतोऽसौ गायत्रमनिरुद्धकः ॥
प्रद्युम्नो हि रथारूढस्तेन चोक्तो रथन्तरम् ।
बृहद्रूपो बृहन्नामा तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ॥
भद्रं तु वासुदेवोऽसौ भद्रमोक्षप्रदो यतः ।
नारायणो राजनं स्याद् राजयत्येष मोक्षिणः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-156" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "गायत्री त्वनिरुद्धोऽसौ त्रिकाले गीयते यतः ।
उष्णिगुष्णस्वरूपत्वात् प्रद्युम्नोऽग्न्यादिसंस्थितः ॥
स्त्रीरूपो बृहतीनामा बृहत्सङ्कर्षणः प्रभुः ।
वासुदेवस्तथा त्रिष्टुप् त्रिवेदैः स्तूयते यतः ॥
नारायणस्तु स्त्रीरूपो द्विधैवासौ व्यवस्थितः ।
द्विपदेति ततो नाम सर्वच्छन्दोभिधा इमे ॥
वनितातनवः प्रोक्ताः......" |
|---|
|
| id | "Aitareya-157" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "......मध्यं नारायणः प्रभुः ।
वासुदेवोऽस्य पुच्छं च वामदक्षौ च पक्षकौ ॥
सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नः क्रमादेव प्रकीर्तितौ ।
अनिरुद्धः शिरश्चैव तथैकोऽपि हि पञ्चधा ॥
प्रस्तावनामाऽनिरुद्धो रक्षन् संस्तूयते यतः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-158" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "सृजन् जगच्च रमया प्रद्युम्नस्तत्र गीयते ॥
उद्गीथनामा तेनासौ जगदुद्गमनेन वा ।
संहारात् प्रतिहाराख्यस्तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ॥
मोचयित्वा समीपं हि द्रावयेद् वासुदेवकः ।
तेनोपद्रवनामाऽसौ निधीयन्ते यतोऽखिलाः ॥
मुक्ता नारायणे देवे तेनासौ निधनाभिधः ॥इत्यादि च ।
स्तूयमानत्वात् स्तोमः । समत्वात् साम । छन्द्यत्वाच्छन्दः ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-159" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V16" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद् वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तद्धैतदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं प्रतिजानते । किमन्यत् सत् । अन्यद् ब्रूयामेति त्रिष्टुप्सहस्रमेके, जगतीसहस्रमेके, अनुष्टुप्सहस्रमेके ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-160" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तदिदमुक्तप्रकारेणैव बृहतीसहस्रं सम्पन्नं भवति । तदेके ‘नानाच्छन्दसां सहस्रं शंसितव्यमेव, बृहतीसहस्रसम्पादनमविवक्षितम्’ इति प्रतिजानते । केचित् त्रिष्टुप्सहस्रमेव शंसितव्यमिति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-161" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V17" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदुक्तमृषिणा- ‘अनुष्टुभमनु चर्चूर्यमाणमिन्द्रं निचिक्युः कवयो मनीषा’(ऋ.सं. १०.१२४.९) इति । वाचि वै तदैन्द्रं प्राणं न्यचायन्नित्येतत् तदुक्तं भवति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-162" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V17_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अनुष्टुप्सहस्रमेवेति वदन्तोऽनुष्टुप्प्रशंसात्मिकाम् ऋचं दर्शयन्ति । बीभत्सूनां जगद् भर्तुमिच्छूनाम् । अपां सयुजं सहैव चरन्तं चाऽहुः । विष्णुं हंसस्वरूपिणम्, अनुष्टुभं चर्चूर्यमाणं पुनः पुनर्वदन्तं परमेश्वरं ददृशुश्च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-163" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V18" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स हेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोरीश्वरो ह तु पुराऽऽयुषः प्रैतोः । इति ह स्माऽह ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-164" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V18_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अनुष्टुभां सहस्रं तु यः शंसीतात एव तु ।
भवितुं चेश्वरः स स्याद् भावो मुक्तिर्न चान्यथा ॥
यशस्वी स प्रसिद्धः स्याच्छुभकीर्तिश्च सर्वदा ।
स्वच्छन्दमृत्युता च स्यात् तस्येत्याहैतरेयकः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-165" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अकृत्स्नो ह्येष आत्मा यद् वाग् । अभि हि प्राणेन मनसेस्यमानो वाचा नानुभवति । बृहतीमभि सम्पादयेत् । एष वै कृत्स्न आत्मा यद् बृहती ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-166" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V19_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "महैतरेयो भगवान् तन्नेत्याह रमापतिः ।
नानाच्छन्दःप्रशंसादिप्रमाणरहितत्वतः ॥
परिहाराय चापूर्णमैतरेयमुने शृणु ।
त्वं तु मन्त्रमुदाहृत्य यस्मादेतदवोचथाः ॥
तस्माद् वक्ष्याम्युत्तरं ते प्रियः शिष्योऽसि मे यतः ।
उमैव वागिति प्रोक्ता साऽनुष्टुबभिमानिनी ॥
अकृत्स्ना सा ततो नैव ब्रह्मेत्युक्ता कथञ्चन।
वागिन्द्रियाभिमानिन्यां न हि ब्रह्मवचः क्वचित् ॥
वायुना प्राणरूपेण मनोरूपशिवेन च ।
अभ्यस्यमानोऽनुभवेत् पुमान् वाचा तु न क्वचित् ॥
अभिमानी बृहत्यास्तु वायुरेव यतः प्रभुः ।
तस्मादेषा च्छन्दसां हि वरिष्टा बृहती स्मृता ॥
पूर्णो हि वायुर्देवानां तस्माद् ब्रह्मेति चोच्यते ।
माहात्म्याधिक्यतश्चैव बृहतीत्येव नाम तत् ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-167" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "सोऽयमात्मा सर्वतः शरीरैः परिवृतः। तद् यथाऽयमात्मा सर्वतः शरीरैः परिवृत एवमेव बृहती सर्वतश्छन्दोभिः परिवृता । मध्यं ह्येषाम् अङ्गानामात्मा । मध्यं छन्दसां बृहती । स हेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोरीश्वरो ह तु पुराऽऽयुषः प्रैतोरिति ह स्माऽह । कृत्स्नो ह्येष आत्मा यद् बृहती तस्माद् बृहतीमेवाभिसम्पादयेत् ॥ ५ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-168" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V20_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अङ्गेभ्य एव सम्भूतान्यन्यच्छन्दांसि चाब्जजात् ।
मध्यात् तु बृहती जाता तस्मात् सा मध्यमुच्यते ॥
पठ्यते तेन मध्ये सा छन्दसां प्रवरा सती ।
छन्दांस्यन्यान्यङ्गवत् स्युर्मध्यवद् बृहती परा ॥
सप्तछन्दांसि चैवं हि प्रतिमा वैष्णवी मता ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-169" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V20_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "गायत्रीदेवतात्वं च लक्ष्म्या यत्राभिधीयते ॥
बृहती देवता तत्र भगवान् पुरुषोत्तमः ।
आधिक्यं छन्दसां यत्र गायत्र्यास्तु विवक्षितम् ॥
तत्र तत्पुत्रको वायुर्बृहतीदेवता मता ।
ऋचामाधिक्ययोगार्थं नाङ्गीकर्तव्यमत्र तत् ॥
प्रधानत्वाद् बृहत्यास्तु जगत्याद्यं न युज्यते ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-170" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V20_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सम्पादनाद् बृहत्यास्तन्मुक्तो भवितुमीश्वरः ॥
स्यात् प्रसिद्धः सुकीर्तिश्च च्छन्दोमृत्युर्गुणाधिकः ।
इति प्राह स्वयं विष्णुर्महिदासाभिधः प्रभुः ॥ इत्यादि च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-171" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V20_B04" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘इतोऽन्यत् सत् किमित्याहुर्नानाच्छन्दस्त्ववादिनः ।
अन्यत् सद्रूपमित्याहुस्त्रिष्टुब्वादिन एव ते ॥’" |
|---|
|
| id | "Aitareya-172" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V20_B05" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ऐन्द्रं प्राणं परमेश्वरसहितं वायुम् । प्राणेन मनसा च अभि इस्यमानः अभ्यस्यमानः । ‘तृतीयोऽतिशये’ इति सूत्रादकारस्येकारः । ‘मथनान्मिथिलो जातः सहनात् सिंह उच्यते, हत्वी दस्यून्’(भाग.ता.नि.३.२२.१८) इत्यादिवच्च । अभ्यस्यमानः अभितः क्षिप्यमाणो विषयेषु बहुशः । कृत्स्न आत्मा कृत्स्नप्रतिमा विष्णोः ।
एकाऽपि प्रतिमा विष्णोर्बृहती च्छन्दसां वरा ।
अन्यच्छन्दोऽभिधा यत् स्यात् प्रतिमा मध्यमैव तत् ॥ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-173" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद् वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्यैकादशानुष्टुभां शतानि भवन्ति, पञ्चविंशतिश्चानुष्टुभः । आत्तं वै भूयसा कनीयः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-174" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V21_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "बृहतीसम्पादनेऽनुष्टुप्च्छंसनमात्रात् पञ्चविंशोत्तरशतानुष्टुबाधिक्यं च भवति । अत आधिक्याद् बृहतीसम्पादनमेव वरम् । तस्यात्रैवान्तर्भावात् । जगत्यादिकं त्वधिकत्वेऽपि बृहतीवन्माहात्म्याभावादेवोपेक्ष्यते ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-175" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदुक्तमृषिणा-
‘वाचमष्टापदीमहम्’(ऋ.सं. ८.७६.१२) इति, अष्टौ हि चतुरक्षराणि भवित । ‘नवस्रक्तिम्’ इति, बृहती सम्पद्यमाना नवस्रक्ति । ‘ऋतस्पृशम्’ इति, सत्यं वै वागृचा स्पृष्टा । ‘इन्द्रात् परि तन्वं ममे’ इति, तद् यदेवैतद् बृहतीसहस्रमनुष्टुप् सम्पन्नं भवति । तस्मात् तदैन्द्रात् प्राणाद् बृहत्यै वाचमनुष्टुभं तन्वं सन्निर्मिमीते ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-176" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V22_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वाचमष्टापदीमहम् इत्यनुष्टुभो बृहतीसम्पादनवचनाच्च । अष्टचतुरक्षराण्यनुष्टुप् । तस्या एव बृहतीसम्पादने नव स्रक्तयो भवन्ति । ऋचा वाक् ऋग्रूपेण वाक् ऋतं स्पृष्टा सत्यरूपं विष्णुं स्पृष्टा भवति । इन्द्रस्य परमेश्वरस्य विष्णोः सम्बन्धी नितरां प्रियत्वाद् यः प्राणदेवता वायुः तस्य प्रतिमारूपमिदं बृहतीसहस्रम् । स च वायुर्विष्णोर्मुख्यप्रतिमा । तस्माद् विष्णोरेव प्रतिमा बृहतीसहस्रम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-177" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स वा एव वाचः परमो विकारो यदेतन्महदुक्थम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-178" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V23_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स वा एष वाचः परमो विकारः, अकाराख्यवाग्विकारेषूत्तमो बृहतीसहस्राख्यः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-179" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तदेतत्पञ्चविधम् । मितम् अमितं स्वरः सत्यानृते इति । ऋग् गाथा कुम्ब्या तन्मितम् । यजुर्निगदो वृथावाक् तदमितम् । साम, अथो यः कश्च गेष्णः स स्वरः । ओमिति सत्यम् । नेत्यनृतम् ।
तदेतत् पुष्पं फलं वाचो यत् सत्यम् । सहेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोः पुष्पं हि फलं वाचः सत्यं वदति ॥
अथैतन्मूलं वाचो यदनृतम् । तद् यथा वृक्ष आविर्मूलः शुष्यति, स उद्वर्तते, एवमेवानृतं वदन्नाविर्मूलमात्मानं करोति, स शुष्यति, स उद्वर्तते, तस्मादनृतं न वदेद् । दयेत त्वेनेन ॥
पराग् वा एतद् रिक्तमक्षरं यदेतद् ओम् इति । तद् यत् किञ्च ओमित्याह अत्रैवास्मै तद् रिच्यते । स यत् सर्वम् ओङ्कुर्याद् रिच्याद् आत्मानम् । स कामेभ्यो नालं स्यात् ॥ अथैतत्पूर्णमभ्यात्मं यन्नेति ।
स यत् सर्वं नेति ब्रूयात् पापिकाऽस्य कीर्तिर्जायेत । सैनं तत्रैव हन्यात् । तस्मात् काल एव दद्यात्, काले न दद्यात् । तत् सत्यानृते मिथुनीकरोति । तयोर्मिथुनात् प्र जायते ।
भूयान् भवति, यो वै तां वाचं वेद यस्या एषः विकारः स सम्प्रतिवित् ।
अकारो ह वै सर्वा वाक् । सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति ।
तस्यै यदुपांशु स प्राणोऽथ यदुच्चैस्तच्छरीरम् । तस्मात् तत् तिर इव । तिर इव ह्यशरीरम् । अशरीरो हि प्राणः । अथ यदुच्चैस्तच्छरीरम्, तस्मात् तदाविः । आविर्हि शरीरम् ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-180" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V24_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "येषां परममुक्थं तत् तदेतत्पञ्चधा स्थितम् ॥
व्याख्यानमेवाकारस्य सहैवोक्थेन सर्वशः ।
मितामिते स्वरस्सत्यमनृतं चेति पञ्चधा ॥
तस्मादकार एवायं सर्ववागात्मकः श्रुतः ।
तस्यैव व्यक्तिरूपोऽयं सर्ववेदादिविस्तरः ॥
तस्मात् सर्वगुणान् विष्णोरकारो वक्ति यत्प्रभोः ।
तद्व्यक्तयोऽपि शब्दा ये सर्वे विष्णुगुणब्रुवाः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-181" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "अकारस्य तथोपांशोरभिमानी तु मारुतः।
देहेन्द्रियान्तःकरणनाम्नोऽस्य द्विविधस्य च ॥
स्थूलसूक्ष्मशरीरस्य सर्वेषामभिमानिनी ।
भारत्युच्चोदितस्यापि ह्यकारस्याभिमानिनी ॥
तस्मादुच्चादुपांशुर्हि जपादिषु फलाधिकः ।
वायुः पतिर्हि भारत्या उपांशोर्देवताः....." |
|---|
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | ".....ततः ॥
अकारस्य विकारोऽयम् ओङ्कार इति कथ्यते ।
अधिकोच्चत्वमानं हि तस्यार्थः समुदीरितः ॥
अकारेणैव तत्सर्वमुक्तमाधिक्यवक्तृतः ।
अधिकोच्चस्वरूपोऽसौ माता चाधिक एव हि ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-183" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "एकार्थत्वाद् अकारोऽसौ नकारत्वमुपागतः ।
दीर्घीभूतः पुनस्तेनैवाकारेण सह स्थितः ॥
अभाववाच्यकारस्य ह्यर्थो रेफः क्षयं वदन् ।
सोऽप्यकारेण सहितो दीर्घत्वं समुपागतः ॥
अभाववाच्यकारः स एकार्थाद्गत्यभावयोः ।
यकारत्वं गतस्तस्मान्नो रेफस्योत्तरत्वतः ॥
णत्वं गतो ह्यकारोऽसौ नो विरुद्धार्थवाचकः ।
अन्यत्वात् सर्वजीवेभ्यो जडेभ्यश्च सदैव हि ॥
सर्वदोषोज्झितत्वाच्च सर्वतोऽप्यधिकत्वतः ।
निरासनाच्च दोषाणां स्वभक्तेभ्यः समन्ततः ॥
सर्वदोषविरुद्धोरुगुणपूर्णस्वरूपतः ।
नारायण इति प्रोक्तो ह्यकारार्थोऽयमेव हि ॥
तस्मादकारबीजेयं विष्णोर्नारायणाभिधा ।
प्रणवश्च....." |
|---|
|
| id | "Aitareya-184" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | ".....ततोऽकारः प्रधानं नाम चक्रिणः ॥
अकारनामा नान्योऽस्ति तमृते पुरुषोत्तमम् ।
ब्रह्मरुद्रादिनामानि ब्रह्मादिष्वप्यमुख्यतः ॥
वर्तन्ते न त्वकारोऽयं वर्तते केशवं विना ।
नारायणादिनामानि नृणां नामक्रियास्वपि ॥
विहितान्यकारो नैवायं विहितस्तमृते प्रभुम् ।
वायुर्ब्रह्माऽपि चाऽकारदेवते न तु नामिनौ ॥
यथा वेदाभिधेयोऽन्यो वेदाख्या देवताऽपरा ।
एवं नामाभिमानी तु वायुर्वाच्यो जनार्दनः ॥
तस्माद इति नामैतद् विष्णोः केवलमेव हि ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-185" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "विशेषतोऽस्य व्याख्यानं बृहतीनां सहस्रकम् ॥
तस्मात् प्रीतो भवेद् विष्णुः शंसनादस्य सर्वदा ।
तस्माद्यज्ञेऽपि वा शंसेद् अयज्ञेऽपि रहः पुमान् ।
ध्यात्वा नारायणं देवं विष्णोरन्नं हि तत्परम् ॥ इत्यादि ब्रह्मसारे ।" |
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तद् वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नं तद् यशः । स इन्द्रः स भूतानामधिपतिः । स य एवमेतमिन्द्रं भूतानामधिपतिं वेद विस्रसा हैवास्माल्लोकात् प्रैतीति ह स्माऽह महिदास ऐतरेयः ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "विद्यान्तरोपदेशार्थं तद् वा इदं बृहतीसहस्रम् इति पुनः पुनः परामर्शः । तदिदं बृहतीसहस्रं तद्यशः तस्य= नारायणस्य यशः । यस्य नारायणस्यैतद् यशः स भगवानेवेन्द्रनामा । स हि यत् प्रथमत इन्द्रो बभूव स्वेच्छया यज्ञनामा । तस्मात् तमेव वेदा इन्द्रशब्देन वदन्ति मुख्यतः । ‘इदि= परमैश्वर्ये’ इति धातोश्च तस्यैव हि परमैश्वर्यम् । अन्येषां तु द्वादशानां तेन दत्तमेवेन्द्रत्वम्; न तु मुख्यतः ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-188" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "अतो विष्णावेवेन्द्रशब्दं प्रयुङ्क्ते श्रुतिः- ‘मत्सि सोम वरुणं मत्सि मित्रं मत्सीन्द्रिमिन्दो पवमान विष्णुम्’(ऋ.सं.९.९०.५) इति ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-189" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "न च ‘इन्द्रं विष्णुं च’ इति पृथगन्वयः क्रियते । तदा वरुणादिषु पृथक् पृथक् मत्सिशब्ददर्शनाद् अत्रापि पृथङ् मत्सिशब्दो दृश्येत । न हि सर्वेषां पृथङ् मत्सिशब्ददर्शने एकस्यैवान्यथात्वं युज्यते । न चात्र द्वित्वगमकं चकारादिकं विद्यते । तस्मात् ‘प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिम्’(ऋ.सं.७.४१.१) इत्याद्यप्येकस्यैव विष्णोर्विशेषणम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-190" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V26" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "(महीदास ऐतरेयः)प्रेत्येन्द्रो भूत्वैषु लोकेषु राजति । तदाहुः- ‘यदनेन रूपेणामुं लोकमभिसम्भवन्ती३ , अथ केन रूपेणेमं लोकमा भवती३’ ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-191" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "श्वेतद्वीपादिकान् प्राप्य स इन्द्राख्यो हरिः स्वयम् ॥
महिदासाभिधो भूत्वा लोकेष्वेषु विराजति ।
तत्र पृच्छन्ति केचित्तु यद्येष भगवान् हरिः ।
महिदासादिरूपेण भूमिष्ठो रमते प्रभुः ॥
तदा यदा स्त्रिया विष्णू रमते नित्यसत्सुखः ॥
कया स्त्रिया रतिं कुर्यान्नह्यन्यरतिरच्युतः ।
स्त्रीरूपे तत्स्वयं स्वस्मिन् रमतेऽसावितीदृशम् ।
वाच्यम्, तत्र तु भूमिष्ठरूपेण तु दिवि स्थितम् ।
स्त्रीरूपं किमसौ गच्छेद् ? अथ यद्येवमत्र च ।
स्त्रीरूपं पृथिवीसंस्थं केन रूपेण संव्रजेत् ?
न ह्यन्यगम्यो भगवान् स्त्रीरूपोऽपि जनार्दनः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-192" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद् यदेतत् स्त्रियां लोहितं भवति, अग्नेस्तद् रूपम् । तस्मात् तस्मान्न बीभत्सेत । अथ यदेतत् पुरुषे रेतो भवति, आदित्यस्य तद्रूपम् । तस्मात् तस्मान्न बीभत्सेत । सोऽयमात्मा इममात्मानममुष्मा आत्मने सम्प्रयच्छति । असावात्माऽमुमात्मानमिममस्मा आत्मने सम्प्रयच्छति । तावन्योन्यमभिसम्भवतः । अनेन ह रूपेणामुं लोकमभिसम्भवति, अमुना रूपेणेमं लोकमा भवति ॥
७ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-193" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "इति पृष्ठः स्वशिष्यैः स महिदासोऽवदद्धरिः ।
स्त्रीषु यल्लोहितं लोके तत्राग्निस्थो जनार्दनः ।
स्त्रीरूपः सोऽग्निनामैव ज्वलज्ज्वालासमप्रभः ।
तस्माद्विष्णोः सन्निधानाद्भर्ता भार्याशरीरगात् ॥
न बीभत्सेतैव रक्तात् तथा पुं रेतसि स्थितः ।
आदित्ये संस्थितो विष्णुरादेरादित्यनामकः ।
तस्मान्न रेतसो भार्या बीभत्सेत पतिस्थितात् ।
पुंरूपो भगवान् विष्णू रेतसिस्थो द्युमत्प्रभः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-194" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V27_B02" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्माद् यद् भूमिगं विष्णोः स्त्रीरूपं तत्स्वयं हरिः ।
प्रादुर्भावगतो दद्याद् दिवि स्थितपुमात्मनः ।
सूर्यगस्य तथा पुंसो रेतसिस्थस्य चाऽत्मनः ।
देवीषु यल्लोहितगं स्त्रीरूपं परमात्मनः ।
तत्स सूर्यगतो विष्णुः पुंरेतःस्थस्य चाऽत्मनः ।
दद्याद् भूमिगतस्यैव, रूपद्वयमिदं ततः ।
परस्परं सम्भवति विष्णोर्नित्यसुखात्मकम् ।
प्रादुर्भावस्थितं रूपं यच्च भूमौ पुमात्मकम् ॥
विष्णोस्तदपि देवीषु स्थितस्स्त्रीरूपकात्मना ।
एवमन्योन्यतो विष्णू रतः स्वस्मिन् न चान्यतः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-195" |
|---|
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "रमया रममाणोऽपि तत्स्थेनैव स्त्रियाऽत्मना ।
रमते, नान्यतः क्वापि रतिर्विष्णोः सुखात्मनः ॥
रमया रमणं तस्माद् रमाया रतिपात्रता ।
नैवास्या रतिदातृत्वं विष्णोर्न ह्यन्यतो रतिः ॥ इत्यादि च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-196" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V27_B04" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स एव महिदास इन्द्रनामा प्राप्येमं लोकमत्र भूत्वा प्रादुर्भूय मनुष्यदृष्टिगोचरतां प्राप्येषु लोकेषु राजति । नात्र ‘प्रेत्य’शब्दो मरणवाची ; किन्तु ? ‘प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा’(ऋ.सं.२.४१.१९) इत्यादिवत् प्राप्तिवाच्येव । न हि मृतः पुनरेषु लोकेष्वेव राजति । न च यशोमात्रराजनेन स्वस्य राजनं भवति । भिन्नपदार्थत्वात् । यद्वा- ‘एति च प्रेति च’ इत्यादौ प्राप्त्यर्थेऽपि वेदेषु प्रसिद्धत्वाच्च । ‘लक्ष्मणः प्रेत्य सुग्रीवं बभाषे रामचोदितः’ इति च स्कान्दे ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-197" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V27_B05" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘यदनेन रूपेणामुं लोकमभिसम्भवति’ अनेन= महिदासादिरूपेणामुं लोकं= दिविष्ठं स्वरूपम् । ‘लोक्यते’ इति स्वरूपवाची लोकशब्दः । ‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’(बृ.उ.१.४.१५) इतिवत् । यच्छब्दः किंशब्दार्थे । अनेन रूपेण तद्रूपमभिसम्भवति किम्? उभयोरपि परिहारदर्शनादस्यापि प्रश्नत्वमवगम्यते । ‘यतश्चोदेति सूर्यः’(कठ.उ.२.१.९) इत्यादिवत् । रङ्गस्तु प्रश्नविषयस्य दुरवगमत्वं प्रकाशयति । ‘दुर्गमे प्रश्नविषये प्रश्नो रङ्गयुतो भवेद्’(३ꣳ अयं रङ्गस्वरः) इति शब्दनिर्णये ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-198" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V27_B06" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "केन रूपेणेमं लोकमाभवति, केन स्वरूपेण भूमिष्ठेनात्मन एव स्त्रीरूपेण विष्णुः सम्बध्यते ? सोऽयं महिदासादिप्रादुर्भावरूप इमं भूमिष्ठस्त्रीरूपम्, लोहितगतं च स्वकीयमेव रूपममुष्यै दिविष्ठाय स्वपुरुषरूपाय प्रयच्छति । देवरेतःस्थिताय च देवीलोहितस्थितमात्मनः स्त्रीरूपं महिदासादिरूपेभ्यो मानुषरेतःस्थितरूपेभ्यश्च दिविष्ठैश्च विष्ण्वादिस्वरूपैः प्रयच्छति च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-199" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V27_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तानि भूमिष्ठत्वेन दिविष्ठत्वेन च द्विविधत्वात् ‘तौ’ इत्युच्यन्ते । अग्नेस्तद् रूपम् अग्निनाम्नो विष्णोः प्रतिमा, तत्सन्निधानात् । एवमादित्यनाम्नो विष्णोः । न ह्यग्न्यादिस्वरूपमेव लोहितादि । न च लौकिकस्त्रीपुरुषसम्बन्धमात्रमत्रोच्यते , अप्रस्तुतत्वात् तस्य । भगवानेव ह्यत्र प्रस्तुतः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-200" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V28" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तत्रैते श्लोकाः–
यदक्षरं पञ्चविधं समेति युजो युक्ता अभियत् संवहन्ति ।
सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-201" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V28_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यद् नारायणादिरूपेण पञ्चविधमक्षरं परं ब्रह्म तत् स्वस्मिन्नेव स्त्रीपुंरूपेण समेति । स्त्रीपुंरूपेण युजो देवा अश्वरूपेण रथे युक्ताः सन्तो यद् नारायणाख्यं परं ब्रह्माभिसंवहन्ति । तदेतत्सत्यस्य सत्यं नारायणाख्यं ब्रह्म यत्रानुयुज्यते यस्मिन् स्वरूप एव स्त्रीपुंरूपेण युज्यते , तत्र तस्मिन् एव परे ब्रह्मणि नारायणाख्ये सर्वेदेवा एकीभवन्ति मुक्ताः सन्तो मिलिता भवन्ति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-202" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V28_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "नायमेकीभावो नाम स्वरूपैक्यम् ; किन्तु ? एकस्थाने वासः, अत्यनुकूलचित्तता च ।
‘एकीभूय नृपाः सर्वे ववृषुः पाण्डवं शरैः ।’(म.भा.उद्योगपर्वणि)
‘एकीभूता तु सा सेना पाण्डवानभ्यवर्तत ॥’(न्या.वि,ब्र.सू.२.१.५) इत्यादिवत् ।
न चैकीभावशब्दः स्वरूपैकत्वविषये प्रयुज्यमानः कुत्रचिद् दृष्टः । एकः पुरुषोऽपि यदा द्विधा भूत्वा एकीभवतीत्युच्यते तदाऽपि स्थानैक्यमेव । स्वरूपैक्यस्य पूर्वमेव सिद्धत्वात् । न चाज्ञात एकत्वे पुनर्ज्ञाते ‘ऐक्यं प्राप्तः’ इति प्रयोगो दृश्यते ; किन्तु ? ‘ज्ञातः’ इत्येव प्रयुज्यते । तस्माद् भावसहित एकशब्दो न स्वरूपवाची । न हि पूर्वं भिन्नस्य पश्चात् स्वरूपैक्यं भवति; किन्तु ? संसर्ग एव भवति । तस्माद् अत्रापि संसर्ग एव विवक्षितः ।
(‘समेति’,‘युज्यते’ इति पदयोर्न पुनरुक्तिः)
यदक्षरं पञ्चविधं समेतीत्युक्तस्य सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते इति परामर्शं कृत्वा तत्र देवाः सर्व एकं भवन्तीत्युच्यते । तस्मान्न पुनरुक्तिः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-203" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V29" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यदक्षरादक्षरमेति युक्तं युजो युक्ता अभियत् सं वहन्ति ।
सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-204" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V29_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यस्माद् अक्षराद् नारायणाख्यात् स स्वयमेव भगवान् प्रादुर्भावरूपी स्त्रीपुंरूपेण युक्त आगच्छति । तात्पर्यार्थं तस्यैवार्थस्य पुनरभ्यासः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-205" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V30" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद् वाच ओमिति यच्च नेति यच्चास्याः क्रूरं यदु चोल्बणिष्णु ।
तद् वियूया कवयोऽन्वविन्दन् नामायत्ता समतृप्यञ्च्छृतेऽधि ॥
यस्मिन् नामा समतृप्यञ्च्छृतेऽधि तत्र देवाः सर्वयुजो भवन्ति ।
तेन पाप्मानमपहत्य ब्रह्मणा स्वर्गं लोकमप्येति विद्वान् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-206" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V30_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वियूय= विचार्य नामायत्तान्येव= नामार्थभूतान्येव विष्णोर्माहात्म्यादीनि अन्वविन्दन् । ततश्चाधिकं समतृप्यन्, शृते परिपक्वे सति ज्ञाने । यस्मिन् विष्णौ(विष्णोः हृ) नामानि ज्ञात्वा तस्मिन् ज्ञाने परिपक्वे समतृप्यन्, तस्मिन्नेव देवाः सर्वयुजो भवन्तीत्यवधारणार्थं पुनर्वचनम् । सर्वयुजो भवन्ति मनोवाक्कर्मभिस्तत्रैव युक्ता भवन्ति । ‘अर्थतः कठिनं क्रूरम्, उल्बणं श्रवणाप्रियम्’ इति शब्दनिर्णये ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-207" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V31" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "नैनं वाचा स्त्रियं ब्रुवन्नैनमस्त्रीपुमान् ब्रुवन् ।
पुमांसं न ब्रुवन्नेनं वदन् वदति कश्चन ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-208" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V31_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अस्त्रीपुमान् ब्रुवन् ‘‘अस्त्री पुमांसं ब्रुवन् ‘सप्तसु प्रथमा’ इति सूत्रात्, ‘स्वातन्त्र्ये विभक्तिव्यत्ययः’ ’’ इति च । स्वतन्त्रो हि भगवान्, तत्प्रेरित एव तं वदतीत्यभिप्रायः । वदन् वदति वदन्नेव न वदति । वदन्नेव न वदति । भवत्येव हि भगवान् स्त्रीरूपः पुंरूपश्च । तस्माद् वदत्येव । अप्रसिद्धत्वान्न वदति च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-209" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V31_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "नारायणादिरूपेण पञ्चधैष हरिः स्थितः ।
तन्नामभिश्च स्त्रीरूपैः समेति स्वैः स केशवः ।
यत्स्यन्दनं वहन्त्येते देवा भार्यासमन्विताः ।
अधिदैवे तथाऽध्यात्मे जीवदेहात्मकं रथम् ।
स सूर्यः सूर्यभार्या च चक्षुर्द्वयसमाश्रितौ ।
वहतोऽश्वात्मकौ, देहं नारायणरथात्मकम् ।
सोमश्च रोहिणी चैव दक्षवामश्रुतिस्थितौ ।
उभयोः पक्षयोः स्थित्वा वहतोऽश्वात्मकौ तयोः ।
उद्धारणार्थमेतेषामुमा वाचि समास्थिता ।
नागाकारैव रश्मित्वमगमद्वैष्णवे रथे ।
मनःस्थितः शिवश्चात्र मनोनामा महाबलः ।
अभवत् सारथिर्विष्णोर्विष्णुर्वायुश्च तं रथम् ।
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राणाख्यावधितिष्ठतः ।
तावेव चाश्विनामानौ हयास्यौ जगदीश्वरौ । इत्यादि गारुडे ।" |
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| text | "‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति, प्राणा वै सत्यम् तेषामेष सत्यम्’(बृ.उ.४.१.२०) इति च श्रुतिः ।" |
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| text | "सर्वसाधुगुणत्वात् तु वायुः सत्य इतीर्यते ।
तस्यापि सत्यतादाता साधुपूर्णगुणो हरिः ॥
सत्यस्य सत्य एतस्मात्....." |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | ".....स्त्रीपुंरूप स केशवः ।
यस्मिन् स्वात्मनि युक्तः स रमते स्त्रीपुमात्मना ॥
मुनिर्गन्धर्वपित्राद्यैर्न तत्प्राप्यं कथञ्चन ।
आप्नुवन्ति सुराः सर्वे, तद्रूपं जाज्वलत् सदा ॥
अर्धनारीपुमाकारम्, तस्य वामस्थितानि च ।
स्त्रीरूपाणि तु सर्वाणि विष्णोरत्यद्भुतानि च ॥
विष्णोर्यानि तु पुंरूपाण्यास्थितान्यस्य दक्षिणे ।
तान्यस्यैव तु रूपाणि युज्यन्तेऽत्र परस्परम् ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "एष नारायणो देवो ह्यर्धनारीपुमात्मकः ।
सर्वे देवास्सभार्याश्च तं प्राप्य पुरुषोत्तमम् ॥
एकीभावं स्वभार्याभिरर्धनारीपुमात्मना ।
प्राप्यैवोपासते विष्णुं मुक्ताः संसारसागरात् ॥
मोदन्ते च रमन्ते च विभागं चेच्छयाऽऽप्नुयुः ।
बहुधा च भवन्त्येते स्त्रीपुमात्मपृथक्त्वतः ॥
प्रसादाद् वासुदेवस्य भागैः स्त्रीपुंस्वरूपिणः ।
तेनैव नियता नित्यं तद्वशास्तत्परायणाः ॥
रमन्ते, नान्यगम्योऽसौ देशो विष्णोः परात्मनः ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "स्त्रीपुंरूपेण युक्तं तद् विष्ण्वाख्यं परमक्षरम्(यद्विष्ण्वाख्यं पराक्षरम्.हृ) ॥
अक्षरादेव परमात् पुंसो नारायणाभिधात् ।
आगच्छन्ति तदैते च देवा भार्यासमन्विताः ॥
वहन्त्यश्वादिरूपेण रथस्थं परमं वपुः ।
तत्सर्वदेवैः प्राप्यं च नान्यैः कथमपि क्वचित्॥
मितादिपञ्चरूपं यद्वाक्यं लोकेऽथवा श्रुतौ ।
नारायणस्य नामैतदिति जानन्ति देवताः ॥
मनोवाक्कर्मभिस्तस्माद् योगमाप्स्यन्ति तत्र ते ।
सर्वशब्दान् हरौ नेतुं कस्य देवानृते बलम् ॥
वाय्वन्तास्तारतम्येन विष्णुनामार्थवेदिनः ।
सम्यग्वेत्ता मारुतोऽत्र तस्मान्मुक्तेभ्य एव च ॥
सुरेभ्योऽधिकमानन्दं नित्यं भुङ्क्ते हरेरनु ॥ इत्याद्यर्धनारीनारायणतन्त्रे ।" |
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| text | "अः इति ब्रह्म तत्राऽगतमहमिति ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "एवं सर्वे शब्दा भगवद्वाचका इत्युक्त्वा, अकारो विशेषतो नारायणवाचक इत्याह– अः इति ब्रह्मेति ॥
‘इतिशब्दोऽभिधानान्ते यत्र, वैशेषिकं हि तत् ।
नाम स्यादिति मे साक्षान्निर्णयः समुदाहृतः ॥ इति शब्दनिर्णये ।" |
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| text | "तत्राऽगतमहम् अति यस्माद् अ इति अयं शब्दः प्रस्तुतस्याभावम्, विरोधिनम् अन्यं च वदति तस्मात् प्रत्यक्षत्वाज्जीवजडात्मकस्य जगत एवानुक्तावपि प्रस्तुतरूपत्वात् तदन्यः, तद् विरोधी, तत्र दृश्यमानदोषवर्जितश्चाकारशब्दार्थ इति सिद्ध्यति। मनसि प्रस्तुतत्वाद् अवचनेऽपि प्रस्तुतमेवेदं सर्वम् । दृष्टसम्बन्धित्वाद् अदृष्टं सर्वमपि प्रस्तुतं भवति । भगवांस्तु ‘अ’इति पृथग् विवक्षितत्वादेव न प्रस्तुतसमुदाये ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "(न च शून्यम् अकारार्थः)
न च शून्यस्य ‘अ’शब्दार्थता । शून्याङ्गीकारे हि अकारस्याभावताख्य एक एवार्थ इति सिद्ध्यति । विष्णोरङ्गीकारे त्वभावता, अन्यता, विरोधिता इति त्रयोऽप्यर्थाः सम्यगेव सिद्ध्यन्ति । तस्माद् अकारस्य भगवानेव मुख्यार्थः, न शून्यम् । एकदेशार्थत्वात् । तस्माद् अमुख्यार्थत्वाद् अन्ययुक्तेनैव अकारेण ‘अभावः’ इत्येव तदुच्यते, न तु ‘अ’ इत्येव केनचित् क्वचित्। न च तथा प्रयोगोऽस्ति ।
तस्मात् पारतन्त्र्य- अल्पगुणत्वादिसर्ववस्तुस्वभावविरुद्धस्वभावं स्वतन्त्रं पूर्णगुणं सर्वजीवजडेभ्योऽन्यद् अज्ञान-दुःख-अल्पत्व-पारतन्त्र्य-उत्पत्ति-नाशादिसर्वदोषविवर्जितं ब्रह्मैव ‘अ’शब्दार्थः । पूर्णं हि ‘ब्रह्म’शब्दस्यार्थः । न च दोषयुक्तस्य पूर्णता । न च जीवजडाद्यपूर्णवस्त्वभिन्नस्य पूर्णत्वं भवति । तस्माद् अकारशब्दार्थ एव ब्रह्मशब्दार्थः । तदेतदुक्तं ‘अः इति ब्रह्म’इति ।
(सन्ध्यकरणस्योद्देशः)" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "(सन्ध्यकरणस्योद्देशः)
‘अः’ इति पृथक्त्वेन वचनं ‘तत्समम् अधिकं वा किमपि नास्ति’ इति दर्शयितुम् ।
‘विवृतावपि सर्गः स्यात् संहितायां च यत्र हि ।
समानोत्तमहीनत्वम् उच्यते वस्तुनोऽञ्जसा ॥’ इति शब्दनिर्णये ।
‘अः इति ब्रह्म’ पूर्णं वस्तूच्यते । तत्राऽगतमहमिति । तत्राकारस्य पूर्णवाचित्वेऽहमेव सोऽकारवाच्य इत्याह महिदासरूपो भगवान्नारायणः । अहमेक एव परिपूर्णः । अन्येषां सर्वेषां मदधीनत्वादल्पत्वादिति ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "मुक्तेभ्यः प्रळये लीनेभ्यश्च सर्ववस्तुभ्यश्च(वस्तुभ्यः सर्वदा .हृ) सदा विभिन्न एव भगवानिति दर्शयितुं च ‘अः’ इति पृथग्वचनम् ।
तच्चोक्तं वाक्यनिर्णये–
‘मुक्ता अपि न विष्णुत्वं यान्ति तत्समतामपि ।
आधिक्यं कुत एव स्यान्मुक्तानां मुक्तिदातृतः ।
कुत एव प्रलीनानां प्रळये तु तदात्मता ।
ब्रह्मशर्वेन्द्रपूर्वाणां मुक्तावपि न विष्णुता ।
यदा तदा तु संसारे क्व तद्रूपत्वमिष्यते ।
अन्योऽसौ सर्वतो विष्णुः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ।
सर्ववस्तुस्वभावस्य विरुद्धोरुस्वभावकः ।
पारतन्त्र्याल्पताऽज्ञानजनिनाशादिवर्जितः ।
अकारेण ततो विष्णुः संहितायां पदात्मना ।
बह्वृचोपनिषत्प्रोक्तस्तेनैव परमात्मना ।
महिदासावतारेण सोऽहमेवंविधस्त्विति ।
मत्तोऽन्यो न हि पूर्णोऽस्ति यतोऽकारश्च पूर्णताम् ।
वक्ति तस्मादकारोऽयं मामेव वदति स्फुटम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-221" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "नाभाववाच्यकारः स्याद् अर्थत्रययुतो यतः ।
एकार्थात्मा ह्यभावः स्यान्निषेधैकस्वरूपतः ।
अन्यता च निषेधश्च विरुद्धत्वमिति त्रयः ।
अकारार्था ह्यभावस्तु निषेधैकस्वरूपतः।
एकदेशस्वरूपत्वान्नाकारेणैव भण्यते ।
किन्त्वभाव इति त्वेव तेनाकारोदितो हरिः ॥ इति च ।
न च निषेधस्वरूपेऽपि विरुद्धता चान्यता चास्तीत्येतावता पूर्णार्थता भवति । तदाऽर्थत्रयकल्पनस्य(कथनस्य) वैयर्थ्यात् ।
उक्तं हि शब्दनिर्णये-
‘विरुद्धतानिषेधान्यभावयुक्ते हि केवलः ।
अकारो वर्तते तेषाम् एकार्थात्मन्यभावके ।
वर्ततेऽभाव इत्येव, न त्व इत्येव केवलः ॥’ इति ।
तस्मान्नारायण एवाकारवाच्य इति सिद्धम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-222" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "‘यतोऽकारः सदा विष्णोर्वाचकत्वेन संस्थितः ।
तस्माद् वर्णत्रयात्माऽयं प्रणवोऽपि त्रयात्मकम् ॥
हरिमेव सदा वक्ति नैवान्यं कञ्चन क्वचित्।
सृष्टिकर्ता ब्रह्मनामा योऽसृजच्चतुराननम् ।
अन्तर्यामी विरिञ्चस्य सोऽकारार्थो जनार्दनः ।
वैकुण्ठलोक आस्ते स द्वितीयवपुषा हरिः ।
उकारवाच्यः स विभुर्नृसिंहो रुद्रनामकः ।
रौद्रत्वात् स शिवस्यापि स्रष्टा संहारकारकः ॥
अन्तर्यामी शिवस्यापि मकारार्थः प्रकीर्तितः ।
एवं त्रयात्मकं विष्णुं प्रणवोऽयं त्रियात्मकः ।
एवं पृथगिवाऽचष्टे बिन्दुर्वक्त्यनिरुद्धकम् ।
प्रद्युम्नाद्यान् नादपूर्वाः सर्वान् नारायणात्मकान् ।
पद्मनाभादिका एव मूर्तीर्नारायणोत्तराः ।
प्रणवोऽयं वदत्यष्टौ तस्मान्नान्याभिधायकः ॥’ इति तत्त्वसारे ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-223" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V33" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतम् अक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति पुरुषायुषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति । जीवाक्षरेणैव जीवाहराप्नोति, जीवाह्ना जीवाक्षरमिति अनकाममारः ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-224" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "‘षट्त्रिंशतिसहस्राणि बृहत्युक्थार्णगानि तु ।
स्त्रीरूपाणि हरेस्तावद् अह्नामप्यभिमानिषु ॥
सूर्यरूपेषु रूपाणि पुमाकाराणि सर्वशः ।
एतैः पुरुषगैः (रूपैर्बृहदुक्थ....)रूपैर्बृहत्युक्थव्यवस्थितैः ॥
कदाचिद् भगवान् विष्णुः पुमाकाराणि तानि च ।
कृत्वा सूर्यगतान्येव स्त्रीरूपाणि विधाय च ॥
तान्याप्नोति च पुंरूपैस्तैरेवाक्षरगानि च ।
स्त्रीरूपाणि जगन्नाथः प्राप्नोत्यात्मेच्छया प्रभुः ॥
पुंरूप-प्रमदारूपस्वरूपै रमते स्वयम् ।
एकीकृत्य च तान्येव द्विरूपो रमते तथा ॥
स एव रमते मायां स्थितात्मस्त्रीतनौ हरिः ।
प्राणस्योत्पत्तिकामः सन् अनेच्छामारनामकः ॥’ इत्यर्धनारीनारायणतन्त्रे ।
वायोरुत्पत्तिकामो मायां= रमायां(मायायां=रमायाम्) रमत इति अनकाममारः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-225" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "जीवस्थितेन(जीवे स्थितेन. हृ) अक्षरगेण अक्षरनाम्ना स्वरूपेण जीवाख्यसूर्यस्थितम् अहराख्यं स्वरूपमाप्नोति, तेन चाक्षराख्यं स्वरूपमाप्नोति । यदक्षरादक्षरमेति युक्तम् इत्यस्य व्याख्यानरूपत्वाच्चैतदवसीयते ।
‘पुमांसं स्त्रियं च वदन्नेव न वदति’ इत्युक्तत्वाद् उभयात्मकं रूपं प्रतीयते । अस्त्रीपुमानिति ब्रुवन्नपि न वदति इत्युक्तत्वाच्च स्त्रीत्वं पुंस्त्वं च प्रतीयते विष्णोः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-226" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "न च नपुंसकरूपं भगवतः कुत्रचिदुक्तम् । प्रसिद्धमेव च रूपद्वयम् । अतो नपुंसके वदन्नपि न वदतीति न तद्वदनुषज्यते । नपुंसकरूपे प्रमाणाभावादेव लौकिकस्त्रीपुंविलक्षणत्वाद् ‘अस्त्रीपुमान्’ इत्यपि वदन्निति भवति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-227" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V34" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ देवरथः- तस्य वाग् उद्धिः, श्रोत्रे पक्षसी, चक्षुषी युक्ते, मनः सङ्ग्रहीता । तदयं प्राणोऽधितिष्ठति । तदुक्तमृषिणा- ‘आ तेन यातं मनसो जवीयसा(ऋ.सं.१०.३९.१२) ।’ ‘निमिषश्चिज्जवीयसा(ऋ.सं.८.७३.२) ।’ इति जवीयसेति ॥
८ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-228" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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|---|
| text | "‘ऋष ज्ञान इति ह्यस्माद्(ह्यद्धा. हृ) धातोः सर्वज्ञ एकराट् ।
वेदद्रष्टा परमर्षिर्हयास्यः पुरुषोत्तमः ।
मन्त्राणां प्रथमो द्रष्टा सर्वेषां यत(योऽतः. हृ) एव तु ।
ऋषिणोक्तमिति प्राहुर्मन्त्रोक्तं ब्राह्मणान्यतः ।
तत्प्रसादाद्धि तपसा पश्चान्मन्त्रान् प्रपेदिरे ।
ब्रह्माद्या ब्राह्मणं पश्चात् तैर्दृष्टमृषिभिः पृथक् ।
मन्त्राश्चोपनिषच्चैव नाकृत्वा सुमहत् तपः ।
प्रथमं तद्धयास्येन दृष्टं केनचिदीक्ष्यते ।
विना पृथक् तपो दृश्येत् ब्राह्मणं मुनिभिर्यतः ।
मन्त्राश्चोपनिषच्चैव ब्राह्मणाद् उत्तमास्ततः ॥
तत्राप्युपनिषच्छ्रेष्ठा युक्तावस्थाधिगम्यतः ॥’ इत्यादि प्रमाणविवेके ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-229" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "तेन रथेन अध्यात्मं शरीराख्येन, अधिदैवं(अधिदैवतम्. हृ) रथरूपेण । ऋभव इत्यत्र देवानां साधारणं नाम(साधारणनाम) ।
‘आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे ऋभव इत्यपि ।
सर्वदेवसमाख्या च द्वादशाष्टादिकेष्वपि ॥ इति शब्दनिर्णये ।
निर्मितो दैवतैः सर्वैर्विष्णुना वायुना सह ।
अधिष्ठितो रथो दिव्यः सोऽध्यात्मं देहनामकः ॥
सम्यग् योगो यदा तस्य मनोवाक्कर्मभिर्भवेत् ।
देहाख्यस्य रथस्यैव तदा नारायणात् प्रभोः ॥
विविधं वासवत्वात्तु विवस्वन्नामकाच्छुभम् ।
संसारवारकं ज्ञानं दिवो दुहितृनामकम् ॥
विष्णुतत्त्वापरोक्षाख्यम् अहनी द्वे च शोभने ।
ज्ञानावस्था मुक्त्यवस्थेत्युभे एवाहनी परे ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-230" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V34_B03" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "जायन्ते देवतास्त्वेषां भारती वायुरेव च ।
जीवन्मुक्तेश्च मुक्तेश्च दाता रूपद्वयी प्रभुः(विभुः हृ) ॥
सर्वस्त्रीणाम् उत्तमत्वाद् द्यौर्नामा श्रीरुदाहृता ।
(अहराख्या, हृ)दुहिताऽस्या भारती तु नित्याहेयस्वरूपतः ॥
अहरित्युच्यते वायुर्ज्ञानात्मत्वात् तथैव च ।
अधिदैवे(अधिदैवरथे. हृ) रथेऽप्येते विष्णोर्लक्ष्म्यां प्रजज्ञिरे ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-231" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "सुखं ददत इति सुदिने । विवस्वतो विष्णोः सकाशाद् दिवो दुहिता अहनी च जायन्ते । अहनी इति द्विवचनेन द्वित्वे सिद्धेऽप्युभे इति वचनमध्यात्माधिदैवतयोः(...धिदैवतयोः. हृ) उभयोरपि वचनार्थम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-232" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "न च सूर्यरथोऽत्र वर्ण्यते । न चाहोरात्रे ‘अहनी’ इत्युच्येते । सूर्यस्याश्विनामाभावात् । सप्ताश्वत्वाच्च तद्रथस्य । चतुरश्वत्वं चात्रोच्यते । श्रोत्रे पक्षसी चक्षुषी युक्ते इत्यध्यात्मसम्बन्धाच्च । न च रात्रौ ‘सुदिनम्’ इति प्रयोगो दृष्टः । असुदिनस्यापि तत एव जातत्वाद् व्यर्थविशेषणता च ।" |
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| id | "Aitareya-233" |
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| text | "अस्मिन् पक्षे तु लौकिकाहर्व्यावृत्त्यर्थं ‘सुदिने’ इति युज्यते । जीवन्मुक्तिर्मुक्तिश्च हि मुख्ये सुदिने । ‘स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवाऽत्मनो यद्यत्कामयते तत्तत् सृजते’(बृ.उ.३.५.९अव्याकृतब्राह्मणम्) इति ज्ञानावस्थायां(ज्ञान्यवस्थायां. हृ) मुक्तौ भोगबाहुल्यकारणत्वात् साऽपि मुक्तिवत् सुदिनम् । न हि मुक्तावधिक्यार्जनमस्ति । ‘न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’(मोक्षधर्मे, ब्र.सू.भा.४.४.२१) इति वचनात् । अतो ज्ञानोत्पत्तिसमनन्तरमेव मुक्तौ न पुनरार्जनमस्तीति किञ्चित्कालं ज्ञानित्वेनावस्थानमपि सुदिनमेव । ज्ञानात् पूर्वं तु पतनसंशयादेव न सुदिनम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "न चाश्विरथो वर्ण्यते । न ह्यश्विरथयोगाद् अहनी जायेते । एकरासभयुक्तो हि तद्रथः । ‘तद्रासभो नासत्या सहस्रम्’(ऋ.सं.१.११५.२) इत्यादि वचनात् । न च विवस्वच्छब्दोऽश्विनोर्विद्यते । ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८२.३) इति विष्णोः सर्वनामानि प्रसिद्धानि च । ‘युजो युक्ता अभियत् संवहन्ति’ इत्यादिना तस्यैव प्रस्तावाच्च । अतो विष्णुरेव मुख्यतः सर्वनामोक्त इति सिद्धम् ॥ ८ ॥" |
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| text | "चतुर्थोऽध्यायः" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीद्, नान्यत् किञ्चन मिषत् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह ।
नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः ।
इदं सर्वमपेक्ष्यासौ कालतो गुणतस्तथा ।
अग्र्य एव समस्तेभ्यस्तद्वशत्वाद् रमाऽपि सा ।
विद्यमानाऽपि नाग्रस्था गुणैरूना ततो यतः ।
न ब्रह्मा न शिवश्चाऽसीन्नैवान्यच्च मिषत् क्वचित्।
सुप्तास्तत्र यतो जीवाः सर्वे ब्रह्मशिवादिकाः ।
असुप्ता श्रीश्च मुक्ताश्च स्वतन्त्रोन्मेषवर्जनात् ।
अनुन्मेषा एव तेऽपि स्वतन्त्रोन्मेष एकराट् ।
नारायणो न चान्योऽस्ति पूर्णोन्मीलद्गुणात्मकः ।
पराधीनेन वित्तेन भुञ्जन्नपि हि भिक्षुकः ।
वित्तवानिति नैवोक्तस्तथा श्रीर्मुक्तिगा अपि ।
मिषन्तोऽप्यन्यतन्त्रत्वान्न मिषन्तः कथञ्चन ।
सर्वदाऽप्येक एवायं स्वतन्त्रो नापरः क्वचित्।
कालाग्र्यत्वं वक्तुमस्य प्रलये स्थितिरुच्यते ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स ईक्षत-‘इमान् लोकान्नु सृजा’ इति स इमान् लोकान् असृजत, अम्भो मरीचीर्मरम् आपः । अदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः, प्रतिष्ठा । अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरः । या अधस्तात् ता आपः । स ईक्षत ‘इमे नु लोकाः, लोकपालान्नु सृजा’ इति । सोऽद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥
लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः ।
स लोकेभ्यः पूर्वतनान् अबाख्यान् महदादिकान् ॥
ब्रह्मशर्वादिकान् सृष्ट्वा जडैस्सह जनार्दनः ।
दिवमाकाशमुर्वीं च ससृजेऽथ द्विसप्तकान् ॥
इति सृष्ट्वा स लोकांस्तु पुनस्तानेव लोकपान् ।
अण्डान्तः स्रष्टुमैच्छच्च तेषां पूज्यत्वसिद्धये ॥
अम्नामकेभ्यस्तेभ्यः स पूर्वसृष्टेभ्य एव तु ।
सर्वजीवाधिकत्वात् तु ब्रह्माणं पुरुषाभिधम् ॥
अंशेनोद्धृत्य रुद्राद्यैः सह चैनमयोजयत् ।
तथैव चेतनानाञ्च भागानुद्धृत्य पिण्डवत् ॥
चेतनाचेतनं राशिमेकस्थं विदधे प्रभुः ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखाद् वाग्, वाचोऽग्निः ।
नासिके निरभिद्येताम् । नासिकाभ्यां प्राणः , प्राणाद्वायुः ।
अक्षिणी निरभिद्येताम् । अक्षिभ्यां चक्षुः , चक्षुषः आदित्यः ।
कर्णौ निरभिद्येताम् । कर्णाभ्यां श्रोत्रम् , श्रोत्राद् दिशः ।
त्वङ् निरभिद्यत । त्वचो लोमानि, लोमभ्य ओषधिवनस्पतयः ।
हृदयं निरभिद्यत । हृदयान्मनः, मनसश्चन्द्रमाः ।
नाभिर्निरभिद्यतः । नाभ्या अपानः, अपानान्मृत्युः ।
शिश्नं निरभिद्यत । शिश्नाद् रेतः, रेतस आपः ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिम् अच्युतः ॥
अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् ।
भिन्नमास्यं पुनस्तस्य विष्णोरेवेच्छया प्रभुः ॥
तत्र वाङ्नामकं रूपं वह्नेरासीत् पुरातनम् ।
तस्यैवाथ द्वितीयं च यदग्निरिति गीयते ।
तथैव नासिकातोऽभून् मुख्यवायोः सुतो मरुत् ।
प्राणो वायुरिति द्वेधा, चक्षुषोऽभूत् तथा रविः ।
द्विरूप एव, कर्णाभ्यां मित्र-धर्म-अप्प-वित्तपाः ।
दिग्देवता द्विरूपेण बभूवुः सर्व एव च ।
हृदयाद् गरुडानन्तशिवचन्द्राः पृथक् पृथक् ।
मनो बुद्ध्यभिमानाश्च तन्नामानश्च जज्ञिरे ।
त्वचश्च रोमनामानो वृक्षनामान एव च ।
द्विविधाः पारिजाताद्या बभूवुर्ब्रह्मदेहतः ।
हस्ताभ्यां द्विविधः शक्रः, पद्भ्यां तत्सूनुरेव च ।
यज्ञस्त्वजनि, पायोश्च यमो निर्ऋतिरेव च ।
रेतोऽम्नामा द्विरूपस्तु शिव एव च गुह्यतः ।
अपानो मृत्युरिति च मुख्यो नाभेश्च(स्तु) मारुतः ॥ १ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन् । तम् अशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्- ‘आयतनं नः प्रजानीहि , यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदाम’ इति । ताभ्यो गामानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः अश्वमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः पुरुषमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘सुकृतं बत’ इति । पुरुषो वाव सुकृतम् ।" |
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| id | "Aitareya-243" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् ।
दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् ।
तदाऽशनापिपासाख्यं द्विरूपं मारुतं पुनः ।
तस्मिन् देवसमूहे तु विष्णुः प्रावेशयत् प्रभुः ।
तेऽब्रुवन् देहि नो वासं यत्र चान्नमदामहे ।
गोरूपमेभ्यो ब्रह्माणं ददौ नारायणः प्रभुः ।
तत्र प्रविश्य ते देवा नालमित्यब्रुवन् पुनः ।
अश्वरूपं विरिञ्चश्च पुनरेवाददत् प्रभुः ।
तद्रूपेऽपि प्रविश्यैव नालमित्यब्रुवन् पुनः ।
पूर्वसृष्टं पुमाकारं ब्रह्मणोऽदात् पुनर्हरिः ।
तद् दृष्ट्वैवालमित्यूचुः....." |
|---|
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| id | "Aitareya-244" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "ता अब्रवीद्- ‘यथाऽऽयतनं प्रविशत’ इति । अग्निः वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् । आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् । ओषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् । चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् । मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् । आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ।" |
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| id | "Aitareya-245" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "... विशतेति स चाब्रवीत् ।
विविशुश्च यथोत्पन्नाः सर्वे देवाश्चतुर्मुखम् ॥" |
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तमशनापिपासे अब्रूताम्- ‘आवाभ्याम् अभिप्रजानीहि’ इति । ते अब्रवीद्- ‘एतास्वेव वां देवतास्वाभजामि, एतासु भागिन्यौ करोमि’ इति ।
तस्माद्यस्मै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते, भागिन्यावेवास्याम् अशनापिपासे भवतः ॥ २ ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-247" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् ।
‘कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥
नित्यं भवाव’ इति, हरिः ‘सर्वत्र प्रविश’ इत्यमुम् ।
आह, तस्माद् देवतानां सर्वासां भागभुङ् मरुत् ॥
एक एव प्राणनामा, नाभिस्थोऽपि स एव हि । अशनापिपासापानश्च मृत्युश्चेति चतुर्विधः ॥
एक एव महान् वायुः सर्वदेवेषु संस्थितः ॥ २ ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-248" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V07" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स ईक्षेत- ‘इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा’ इति । सोऽपोऽभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् । तदेतत् पराङ् अत्यजिघांसत् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-249" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति ।
अबाख्याः देवताः पूर्वसृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः ।
ददर्श(ददर्शाऽशु .हृ) सुविशालाभ्यां नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः ।
तद्दर्शनात् तदिच्छातस्तासां देहोऽभवत् पृथक् ।
सर्वासामपि देहैकदेशेभ्यो मिळितं शुभम् ।
सर्वैरधिष्ठितं चैव विरिञ्चेन विशेषतः ।
दिव्यावयवसम्पन्नमेकमेव सुलोचनम् ।
भोग्यभोक्त्रात्मना नास्ति तस्य दुःखं कथञ्चन ।
ते हि देवाः स्वयं भोग्याः स्वयं भोक्तार एव च ।
क्रीडन्ते मोदिनो नित्यम्, तथाऽप्यन्नात्मकस्त्वसौ ।
क्रीडयाऽपाक्रमत् किञ्चित्...।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-250" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V08" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C02_S04" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "तद् वाचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद् वाचाऽग्रहैष्यद् अभिव्याहृत्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।
तत् प्राणेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् प्राणेनाग्रहैष्यद् अभिप्राण्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।
तच्चक्षुषाऽजिघृक्षत् , तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्चक्षुषाऽग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।
तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यत् श्रुत्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।
तत् त्वचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् त्वचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् त्वचाऽग्रहैष्यत् स्पृष्ट्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।
तन्मनसाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् मनसा ग्रहीतुम् । स यद्धैतन्मनसाऽग्रहैष्यद् ध्यात्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।
तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद् विसृज्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।
तदपानेनाजिघृक्षत् , तदावयत् । सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद् वायुः । अन्नायुर्वा एष यद् वायुः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-251" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V08_B01" |
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| parent | "AIT_C02_S04" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः ।
अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा ।
जानन्नपि क्रीडयैव तारतम्यं प्रकाशयन् ।
एवं चकार ब्रह्मा स क्वाज्ञानं लोककर्तरि ।
क्षुत्पिपासदयश्चैव देवानां भोगसाधकाः ।
न तु पीडाकरास्तेषामैश्वर्यादिगुणोन्नतेः ।
अन्नमूर्तिं ततो ब्रह्मा प्रधानेनैव वायुना ।
अपानाख्येनात्तुमैच्छत् तदैवाशकदाशु सः ।
तस्माद् भोक्तैक एवासौ सर्वस्यान्नस्य मारुतः ।
तत्प्रसादात् परेऽश्नन्ति किञ्चित् किञ्चिन्न चाखिलम् ।
आयूरूपोऽखिलानां च देवानां वायुरेव हि ।
अन्नदेवस्य चाऽयुः स तस्माद्देवोत्तमो मरुत् ॥
आयुःशब्दो ज्ञानवाची गतिवाची च यत्ततः ।
चेष्टामोक्षज्ञानदाता सुराणां मारुतस्ततः ॥
अन्योन्यगुणदातृत्वात् समानौ ब्रह्ममारुतौ ।
तस्मान्मोक्षे सुखे ज्ञाने विष्णुभक्त्यादिकेष्वपि(भक्त्यादिकेषु च .हृ) ॥
सर्वेभ्यश्चाधिकौ तौ हि तयोर्विष्णुः परस्सदा ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-252" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V09" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C02_S04" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स ईक्षत- ‘कथं न्विदं मदृते स्याद्’ इति । स ईक्षत- ‘कतरेण प्रपद्या’ इति । स ईक्षत- ‘यदि वाचाऽभिव्याहृतम्, यदि प्राणेनाभिप्राणितम्, यदि चक्षुषा दृष्टम्, यदि श्रोत्रेण श्रुतम्, यदि त्वचा स्पृष्टम्, यदि मनसा ध्यातम्, यद्यपानेनाभ्यपानितम्, यदि शिश्नेन विसृष्टम्, अथ कोऽहम्’इति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-253" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S04" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ।
इत्थमैक्षत देवेशो ‘ब्रह्माद्या यदि मां विना ।
क्रियादिषु समर्थाः स्युर्न मे विष्ण्वभिधा भवेत् ।’
सर्वचेष्टयितृत्वाच्च विशिष्टबलतस्तथा ।
विष्णुरित्यभिधा मह्यम्, सा न युक्ता दिवौकसाम् ।
स्वतन्त्रत्वे, ततः सर्वे मद्वशा एव नान्यथा ।
तस्मादेषां प्रवृत्त्यर्थं प्रवेक्ष्ये सह वायुना ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-254" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V10" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नाम द्वाः । तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथाः । त्रयः स्वप्नाः । अयमावसथोऽयमावसथ इति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-255" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V10_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S04" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः ।
मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः ।
अग्न्यादयस्ततः पश्चात् प्रविष्टास्तन्नियोजिताः ।
प्रपदाभ्यां तथाऽन्येन रूपेण प्रविवेश सः ।
बिभर्ति देहं तेनैव मूर्धाविष्टेन(मूर्ध्नाविष्टेन) चेष्टयन् ।
नारायणो वासुदेव इति द्वेधा व्यवस्थितः ।
मूर्धाविष्टो(मूर्ध्नाविष्टो) वासुदेवस्तस्य चावसथास्त्रयः ।
अक्षि कण्ठो हृदित्येवं त एव स्वप्ननामकाः ।
आप्नोत्यत्र स्वयं विष्णुरतः स्वप्नाः प्रकीर्तिताः ।
अनिरुद्धादिरूपेण त्रिधा तेषु व्यवस्थितः ।
दाताऽवस्थात्रयस्यास्य जीवस्य क्रमशो विभुः ।
सुषुम्नायां वासुदेवो मूर्धन्येव व्यवस्थितः ।
तस्यामेव ब्रह्मनाड्यां स्थितो नारायणः प्रभुः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-256" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V11" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् । किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्मततममपश्यत् । इदमदर्शमिती३ँ (अयं रङ्गस्वरः)। तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते। परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-257" |
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| oldKey | "AIT_C02_S04_V11_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ।
जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाऽविशत् ।
‘असुराणां निहन्तारं ज्ञानादिगुणदं तथा ।
चेष्टाप्रदं च भूतेषु(देहेषु) न मदन्यं वदत्यपि’ ।
इति मत्वा जगन्नाथो दैत्यनिग्रहणेच्छया ।
ज्ञानदानार्थमपि तु प्रादुर्भूतो भुवि प्रभुः ।
तथा जीवेषु सर्वेषु प्रविष्टः प्रेरणेच्छया ।
को ह्यन्यस्तमृते विष्णुम् एतत्कर्म करिष्यति ।
स सर्वगुणसम्पूर्णं सर्वगं नित्यमव्ययम् ।
एतदेवस्वरूपं स त्वपश्यदवतारगम् ।
तस्मात् सर्वावताराश्च सर्वजीवेषु संस्थिताः(च स्थिताः .हृ) ।
प्रादुर्भावाः सर्वगुणैः पूर्णा एव सदा स्थिताः ।
पश्यन्ति च तथा नित्यं निर्दोषोरुस्वसंविदा ।" |
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| text | "पञ्चमोऽध्यायः" |
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| text | "(अपक्रामन्तु गर्भिण्यः) पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद् रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम् । आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद् यदा स्त्रियां सिञ्चति, अथैनज्जनयति । तदस्य प्रथमं जन्म । तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत् कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति, आत्मानमेव तद् भावयति, एषां लोकानां सन्तत्यै । एवं सन्तता हीमे लोकाः ।" |
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| text | "अयं नारायणो देवः पुरुषे प्रथमं विशेत् ।
अन्नस्थोऽन्नेन सहितस्तस्मिन् रेतस्त्वमागते ।
तस्मिन् स्थितं स्वरूपं(स्थितस्वरूपम्. हृ) स पुरुषस्थो बिभर्त्यजः ।
तद्रूपं रेतसा साकं स्वयं पुंसि स्थितो हरिः ।
स्त्रियां सिञ्चति, तस्यैव स्थानान्तरगतेः प्रभोः ।
प्रथमं जन्म विष्णोस्तु,(विष्णोस्तत्) स तस्या अङ्गवत् प्रभुः ।
नैनां हिनस्त्यानुकूल्यात्, सा पुत्रं भावयत्यथ ।
पुत्रस्य भावना सैव तद्गत्वाद् हरिभावना ।
सम्भावितव्या सा चैव भर्त्रा पुत्रश्च सादरम् ।
सम्भावनं कुमारस्य जानतः केशवे भवेत् ।
तस्येत्यर्पणमात्रेण पूजितो हि भवेद्धरिः ।
पुत्रस्थस्य हरेः पूजां कुर्वतः पृथिवीस्थितिः ।
स्वर्गस्थस्यापि भवति पुत्रपुण्यं यतोऽखिलम् ।
अत्यल्पपुण्यभाक् स स्यान्नार्चयेत् केशवं यदि ॥" |
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| text | "तदस्य द्वितीयं जन्म । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथाऽस्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म । तदुक्तमृषिणा–
‘गर्भे नु सन्नन्वेषाममवेदम् अहं देवानां जनिमानि विश्वा ।
शतं मा पुर आयसीररक्षन् अधः श्येनो जवसा निरदीयमिति(ऋ.सं.४.२७.१) ॥’
गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच । स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् (यथास्थानं गर्भिण्यः) ॥ १ ॥" |
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| text | "पृथिव्यां जन्म पुत्रस्य द्वितीयं विष्णुजन्म हि ।
एतद्रूपं निधायैव जीवार्थे धर्मकर्तवे ।
पितृस्थेन तु रूपेण गच्छत्यन्यत्र केशवः ।
पितुरन्यत्र जननं तृतीयं जन्म तद्धरेः ।
अन्तर्यामितयैवं हि सर्वजीवेषु संस्थितम् ।
सर्वदोषोज्झितं विष्णुं कर्तारं सर्वकर्मणाम् ।
नित्यानन्दं स्वतन्त्रं च सर्वज्ञं सर्वतोऽधिकम् ।
यो वेद देहबन्धात् स विमुक्तो नित्यमुत्तमान् ॥
भोगान् भुङ्क्ते यथायोग्यम् इति वेदानुशासनम् ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ।" |
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| text | "‘आत्मन्येवाऽत्मानं बिभर्ति’, ‘आत्मानमेव तद्भावयति’ इत्याद्यात्मशब्दश्च मुख्यतो विष्णावेव युज्यते । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा इति विष्णुशब्दार्थैकदेशवाचित्वाच्चात्मशब्दस्य । ‘एतया द्वारा प्रापद्यत’ इति तस्यैव शरीरप्रवेशस्य प्रस्तुतत्वाच्च । जीवशरीरं परित्यज्यान्यत्र गमनमात्रं विष्णोरप्यस्तीति प्रैतीत्युक्तेऽप्यविरोधः । कृष्णराघवादिस्वरूपमेव ह्यसौ न परित्यजति ।" |
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| text | "‘कृष्णो ह्यत्यक्तदेहोऽपि त्यक्तदेहवदेव च ।
लोकानां दर्शयामास स्वरूपसदृशाकृतिम् ।
येन रूपेण कंसादीन् जघ्ने तद्रूपमेव(तद्रूप एव हि. हृ) हि ।
पूज्यतेऽद्यापि शर्वाद्यैर्निर्मिताऽन्या शवाकृतिः ।
स्वर्गारोहणकाले तु जनास्तेनैव मोहिताः ।
यत्तद् रूपं निजं विष्णोर्दृष्टं सर्वजनैर्भुवि ।
अद्यापि तद् देवलोके पूज्यते सर्वदैवतैः ॥’ इत्यादि स्कान्दे ।
‘प्रदर्श्यातप्ततपसाम् अवितृप्तदृशां नृणाम् ।
आदायान्तरधाद् यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम्(भाग. ३.२.११) ॥’ इति च भागवते ।
‘प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा’(ऋ.सं.२.४१.१९) इत्यादिवत् प्रकृष्टगतिवाच्येवायं शब्दः । प्रकृष्टगतित्वादेव च मरणेऽपि प्रयुज्यते ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "एषामवेदमहम् इत्यपि जीवभेद एवोक्तः । अन्यथा ‘मम जनिमानि’ इत्येवोच्येत । व्यर्थता च एषाम् इत्यादिविशेषणानाम् । अवेदम् इत्यनेनैव स्वस्य सिद्धत्वात् । अहम् इत्यप्यहेयत्वेनेति क्रियाविशेषणम् । जन्म जानन्नपि देवानां दुःखादिहेयरहितत्वेन व्यजानामीत्यर्थः । तस्माद् ‘अहं मनुरभवम्’(ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादावपि अहेयगुणं भगवन्तमेवाहंशब्दो वक्ति । सर्वान्तरत्वात् तस्मिन्नेव ‘अभवम्’ इत्युत्तमपुरुषशब्दोऽपि सर्वो वर्तते ।
‘अहेयत्वादहं विष्णुः स तु सर्वान्तरत्वतः ।
अस्यस्मीत्यादिभिः शब्दैरुच्यतेऽन्योऽपि जीवतः ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "षष्ठोऽध्यायः" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति , येन वा शृणोति , येन वा गन्धान् आजिघ्रति , येन वा वाचं व्याकरोति , येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "‘अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः ।
इत्यपृच्छद् रमा देवी महिदासं जनार्दनम् ।
आह तां महिदासोऽथ पूर्णानन्दतमस्त्विति ।
उपास्यस्तादृशो ह्यस्य स्वभावः परमात्मनः ।
येन जीवो दर्शनादीन् प्रेरितः कुरुते सदा ।" |
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| id | "Aitareya-269" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "‘यद्, एतद्, हृदयम्, मनः, च, आ, इतत्, संज्ञानम्, आज्ञानम्, विज्ञानम्, प्रज्ञानम्, मेधा, दृष्टिः, धृतिः, मतिः, मनीषा, जूतिः, स्मृतिः, सङ्कल्पः, क्रतुः, असुः, कामः, अवशः’ इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः ।
मन्तृत्वान्मन इत्येव यच्च ज्ञान(तृ)स्वरूपतः ।
एतत् सन्निहितत्वाच्च पूर्णत्वादेति कीर्तितः ।
इतत्वाच्च ततत्वाच्च स इतन्नाम केशवः ।
गुणानामुच्चयो यस्मात् स च इत्येव शब्दितः ।
सम्यग् ज्ञानस्वरूपत्वात् संज्ञानमिति कीर्तितः ।
आततज्ञानरूपत्वाद् आज्ञानं भगवान् हरिः ।
विविधज्ञानरूपत्वाद् विज्ञानमिति कीर्तितः ।
प्रकृष्टात्मगुणज्ञानरूपः प्रज्ञानमुच्यते ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "एष ब्रह्मा, एष इन्द्रः, एष प्रजापतिः, एते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि, पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानि, इमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि च, इतराणि चाण्डजानि च, जरायुजानि च, स्वेदजानि च, उद्भिजानि च, अश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत् किञ्चेदं प्राणि, जङ्गमं च, पतत्त्रि च, यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् , प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः ।
तथैव पञ्चभूतानि पुण्यपापविमिश्रिताः ।
क्षुद्रात्मानस्तु ये मर्त्या इतरे असुरा अपि ।
सर्वं जगदिदं विष्णोर्वशे तिष्ठति सर्वदा ।
तेनैव नीयते नित्यं तस्मिन्नेव प्रतिष्ठितम् ।
मुक्ता येऽलोकनामानो नीयन्ते तेऽपि विष्णुना ।
स्वयं चानन्यनिष्ठत्वात् प्रतिष्ठेत्यभिधीयते ।
देशतः कालतश्चैव गुणतश्चातिपूर्तितः ।
विष्णोर्ब्रह्मेति नामैतन्मुख्यतोऽन्यत्र न क्वचित्।" |
|---|
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| id | "Aitareya-273" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-274" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "‘सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः ।
प्रकृष्टज्ञानरूपस्य प्रसादात् परमात्मनः ।
अस्माद् देहात् समुत्क्रम्य गत्वोर्ध्वं लोकमुत्तमम् ।
अमृतः सन् विष्णुलोके भोगान् सम्प्राप्य पुष्कलान् ।
भुङ्क्ते यथेष्टतो नित्यमिति वेदानुशासनम् ॥’ इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-275" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "यत्प्रेरणाद् अयं जीवो दर्शनादीन् करोति । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् सर्वेषाम्, दर्शनादिकारणत्वम् एकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-276" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "प्रजापतिः शिवः । लिङ्गाभिमानित्वात् ।
‘प्रजापतिः शिवः शेषो(शेपो. हृ) लिङ्गमित्यभिधीयते ।
लिङ्गाभिमानी लोकस्य स्रष्टा गिरिश एव हि ॥’ इति शैवपुराणे ।
‘सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः ।
वाक्यं शिवस्य तत् श्रुत्वा शक्रो नेत्याह सत्वरः ॥’ इति भारते ।" |
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|
| id | "Aitareya-277" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः ।
‘ब्रह्माद्याः सर्व एवैते जीवा भिन्नस्वभावकाः ।
यथा शाल्यादिबीजानि भिन्नवीर्याणि सर्वशः ॥’ इति सत्तत्त्वे ।
प्रथम-इतराणि इतिशब्दो मानुषाणाम्, द्वितीयोऽसुरादीनाम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-278" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत् प्रज्ञाननेत्रम् इति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात्, पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वाद् अलोकः ।
अण्डजानि च इत्याद्युक्त्वा पुनः अश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् ।
‘तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते’ इति भारतवचनाद् अश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणि इति । गमन-पतन-स्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गमम् इत्यादिवचनम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-279" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "स एतेन(अ.व्या.३.२.२१५) इत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्मबन्धमुक्त्यनन्तरं हि शरीराद् उत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः, प्राज्ञेन आत्मनैव उत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् सम्भुङ्क्त इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्तः? इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मना इत्यादि । अनुक्तविशेषाणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति सामान्यवचनम् ।" |
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| id | "Aitareya-280" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "‘अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः ।
कर्मणां दाह एवायं मुक्तिरित्यभिधीयते ॥
स तु मुक्तस्ततो देहाद् उद्गच्छति परात्मना ।
प्रेरितो, विष्णुलोकं च प्राप्य भोगान् अवाप्य च ॥
भुङ्क्ते विष्णुप्रसादेन, न विष्णोरवशः क्वचित्।
विष्णुतन्त्रा इमे सर्वे मुक्ता अपि यतोऽखिलाः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-281" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| text | "ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थम् एष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेतृकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनाम् अत्र विवक्षितम् । ‘नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु’ इति शब्दतत्त्वे ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-282" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "paada" |
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| text | "सप्तमोऽध्यायः" |
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| id | "Aitareya-283" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ, श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि , सत्यं वदिष्यामि , तन्मामवतु , तद् वक्तारमवतु , अवतु माम् , अवतु वक्तारम् ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-284" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S07" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता , अवबोधरूपे विष्णौ प्रतिष्ठिता । स च विष्णुर्मे वाचि स्थितः । यदेतद् हृदयं मनश्च इति विष्णुनामधेयेषूक्तत्वात् । आविराविर्म एधि, हे विष्णो ! ममाऽविराविर्भव । आणीस्थित आण्यां स्थित विष्णो ! इति सम्बोधनम् ।
‘आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते ।
तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यम् आणीस्थ इति गीयते ॥’ इति शब्दतत्त्वे ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-285" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01" |
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| type | "section" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "paada" |
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| text | "प्रथमोऽध्यायः" |
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| id | "Aitareya-286" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V01" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अथाऽतः संहितायाः उपनिषत् ।" |
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| id | "Aitareya-287" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "‘विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् ।
विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकाम्(वाचकाम् .हृ) ऋषयो विदुः ।
तौ च वर्णौ हरेः सम्यक्स्वरूपप्रतिपादकौ ।
बहुधैव स्थितस्यास्य सदैवैकस्वरूपिणः ।
विष्णुनामार्थरूपत्वाद् वेदानामपि सर्वशः ।
अन्येषामपि शब्दानां संहिता विष्णुवाचिकाः(वाचकाः .हृ) ।
तद्वाचकास्तथा वर्णाः सर्वे लौकिकवैदिकाः ।" |
|---|
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वायुस्संहितेति माण्डूकेयः ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ।
देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते ।
देवतोत्तरवर्णस्य क्रीडनाच्च द्युनामकम् ।
दिवि स्थितं हरे रूपमुत्तरं रूपमुच्यते ।
वेदकत्वाच्चायनत्वाद् रूपं यद्वायुनामकम् ।
विष्णोस्तद्वर्णयोर्मध्यदेवतेति प्रकीर्तितम् ।
संहितानामकं तच्च रूपद्वयसहस्थितेः ॥" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "वर्णद्वयं विकारं च षकारं केचिदब्रुवन् ।
षकारं मध्यमत्रैव णकारं केचिदुत्तरम् ।
पृथक्करणमेवैषां वर्णयोर्मध्यमुच्यते ।
उपसर्गमात्रं वीत्याहुः केचिन्नाम ष्णुमात्रकम् ।
षकारं च णकारं च वर्णौ पूर्वोत्तरावपि ।
व्यक्तिरेवोष्मणस्तत्र मध्यमित्यभिधीयते ।
सर्वेप्येत उपादेयाः पक्षा निर्दोषका यतः ।’इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-291" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "आकाशः संहितेत्यस्य माक्षव्यो वेदयाञ्चक्रे ।
स हाविपरिहृतो मेने ,न मेऽस्य पुत्रेण समगादिति समाने वै तत् । परिहृतो मेन इत्यागस्त्यः ।" |
|---|
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः। उभयरूपसंहितत्वात्(उभयरूपसहितत्वात् .हृ) संहितानामकः । स माण्डूकेयः, तेन माक्षव्येण अपरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन= मदुपासितेन अस्य आकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-293" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथाऽपि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "समानं ह्येतद् भवति वायुश्चाऽकाशश्चेत्यधिदैवतम् ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "भगवतस्तु पक्षः(‘भगवतः स्वपक्षः’इति ताम्रपर्णियरीत्या भाष्यपाठः) समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्च उभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-296" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम्, मन उत्तररूपम्, प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-297" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान्, युक्तिमत्वात् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-298" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंह(हि)तः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥" |
|---|
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "‘मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः ।
विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥’ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-300" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ शाकल्यस्य पृथिवी पूर्वरूपम्, द्यौरुत्तररूपम् , वृष्टिः सन्धिः. पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद् बलवद् अनूद्गृह्णन् सन्दधद् अहोरात्रे वर्षति, द्यावापृथिव्यौ समधाताम् इत्युताप्याहुः, इती नु अधिदैवतम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-301" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V07_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः ।
पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् ।
माण्डूकेयैर्हि, शाकल्यो वासुदेवादिरूपिणम् ।
तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् ।
भूमिद्युवृष्टिपर्जन्यनाम्नोर्व्यादिषु संस्थितम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-302" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथाध्यात्मम् । पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम्, इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाऽकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाऽकाशः । तस्मिन् हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तः, यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः , यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींषि, इत्येवम् इमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि ।
यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुः, यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयम्, यथाऽयमग्निः पृथिव्याम् एवम् इदमुपस्थे रेतः। एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाऽह इदमेव पृथिव्या रूपम् इदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन, सर्वमायुरेति ॥२॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-303" |
|---|
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः ।
अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा ।
वाचो वृष्ट्यैव साम्यं च पर्जन्येनैव चाऽत्मनः ।
तेषां तेषु स्थितिं चैव विष्णोश्च चतुरात्मनः ।
आकाशस्यान्तराकाशे नृसिंहस्यात्र संस्थितिम् ।
वायोः प्राणात्मतां चैव तत्र दाशरथेः स्थितिम् ।
सूर्यविद्युद्धुताशानां दृग्धृद्रेतःसु च स्थितिम् ।
कपिलस्य च हंसस्य जामदग्न्यस्य तेषु च ।
स्थितिं वदति विद्येयमपि मोक्षप्रदायिनी ॥’ इत्यादि च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-304" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V08_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः, ‘धिनु= पृष्टौ’ इति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-305" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनम् उभयम् अन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेद्, अच्योष्ठा अवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेद् । अच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाऽह तस्य नास्त्युपवादः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-306" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता ।
दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता ।
नृसिंहस्त्वन्तरिक्षस्थो भगवान् क्रमदेवता ।
स्वाध्यायमेवं ध्यात्वा यः करोत्यपवदेन्न तम् ।
तस्यापवदिता याति त्रैलोक्याद् अध एव हि ।
नाशमाप्नोति निरये तस्माद् अपवदेन्न तम् ।
गच्छस्यध इति ब्रूयाद् अन्यं ब्राह्मणतस्तथा ।
ब्रह्मप्राप्तेर्हि योग्यो यो ब्राह्मणः स, न चेतरः ॥’ इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-307" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V09_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "भञ्जनवर्जितत्वाद् निर्भुजं संहिता । ‘तृण(तृणु. हृ)= च्छेदने’ इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-308" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V09_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनम् इत्यादि ।
अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्याम् अन्तरिक्षद्युभ्याम् ।
‘क्रमस्वाध्यायकृद् यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् ।
लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥’ इति च ।
तस्माद् अतिदुष्टत्वात् तन्निन्दको नास्त्येवेत्युक्तम्- तस्य नास्त्युपवादः इति । ‘तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत बुद्धिमान्’(भाग.५.६३.८) इत्यादिवत् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-309" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत् प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण ।
अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत्, ‘पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।
अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तं पर उपवदेद्, ‘दिवं देवतामारः, द्यौस्त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।
अथ यद्येनमुभयमन्तरेण ब्रुवन्तं पर उपवदेद्, ‘अन्तरिक्षं देवतामारः, अन्तरिक्षं त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।
यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-310" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V10_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "उपवदेद् इत्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेद् इत्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् ।
‘अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते ।
ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः ।
नाशयिष्यति विष्णुस्त्वाम् अन्धे तमसि पातयेत् ।
इति ब्रूयान्न तु ब्रूयाद् देवसर्गात्मकं क्वचित्॥’ इति च ।
‘षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् ।
विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः ।
सन्ध्युक्तिश्च विभागश्च द्वयं व्याप्तं क्रमेण तु ।
तस्माद् द्विधाऽपि वचनात् क्रमाध्यायी भवेत सः ॥
भोगवृद्धिं च यो मोक्ष इच्छेद् विष्णव इत्यसौ ।
मोक्षकामो विष्णवे द्वयकामो द्वयं वदेत् ॥
विष्णुनामात्मकत्वाच्चाथ संहितपदक्रमाः ।
सर्ववेदस्थिता मोक्षतद्भोगद्वयसाधकाः ॥
तज्ज्ञानामेव नान्येषाम् इति वेदानुशासनम् ।
संहिताद्या ब्रुवन् वाऽपि य एवंविन्नवा ब्रुवन् ॥
परिवादं ब्रुवन्तं वा न ब्रुवन्तम् अथापि वा ।
यद् वदेत् तत् तथैव स्यात् क्षिप्रमेव न संशयः ॥’ इति च ।
अग्र एव ‘अग्र्यमेव’ उभयमन्तरेण ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-311" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयाद् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-312" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V11_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः ।
योऽतिक्रमति तस्याज्ञाम् अतिद्युम्नः प्रकीर्तितः(स कीर्तितः .हृ) ॥
मोक्षयोग्योऽपि(मोक्षायोग्योऽपि . हृ) यस्त्वेवम् अतिद्युम्नो भवेत् पुमान् ।
लोकच्युतोऽसीत्येवं तं ब्रूयान्नाज्ञास्थितं क्वचित्॥
लोकच्युतो भवेत्येनम् अपि नैव वदेत् क्वचित्।
च्युतोऽसीति तु शिक्षार्थं ब्रूयान्नैवान्यथा क्वचित्॥’ इति च ॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-313" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, शक्नुवन्तं चेन्मन्येत ‘प्राणं वंशं समधां३ँ । प्राणं मां वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । अथ चेद् अशक्नुवन्तं मन्येत ‘प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।
यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥
४ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-314" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V12_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद् दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तम् इत्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-315" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V12_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् ।
वायुं च, मुक्तिमाप्नोति, य एवं तदुपासकम् ।
निन्देत विष्णुविज्ञानविषये, तं वदेत सः ।
विष्णुना वंशभूतेन वायुना सहितं तथा ।
न शक्नोषीति मामात्थ हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ ।
ज्ञानसामर्थ्यवान् इत्थं ब्रूयाद् देवादिरुत्तमः ।
अन्यो गन्धर्वपित्रादिरल्पज्ञानबलो, हि यः ।
स ब्रूयाद् विष्णुवायुभ्यां सन्धिमिच्छन्तमेव माम्(मा. हृ) ॥
सन्धातुं नाशको यस्माद् हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ ॥’ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-316" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V12_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत्- ‘प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यति’ इति । नाशकः सन्धातुम्, मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः ।
‘तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा ।
विष्णुर्जहाति तं पापम् इह चामुत्र च प्रभुः ॥’ इति च भारते ॥४ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-317" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V13" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः- ‘पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरम् उत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।
अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः- ‘पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरमुत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण, येन सन्धिं विवर्तयति, येन स्वरास्वरं विजानाति, येन मात्रामात्रां विभजते सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।
अथ हास्य पुत्र आह मध्यमः प्रातीबोधीपुत्रः- ‘अक्षरे खल्विमे अविकर्षन् अनेकीकुर्वन् यथावर्णमाह । तद् याऽसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तद् भवति । सामैवाहं संहितां मन्ये’ इति ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-318" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "‘पूर्ववर्णस्थितं यत्तद् रूपं पूर्वाक्षराभिधम् ।
वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् ।
उत्तराक्षरसंज्ञं च, वर्णयोरन्तरस्थितम् ।
अवनात् काशनाच्चैतद् अवकाशाभिधं हरेः ।
नृसिंहरूपमित्याहुर्निर्भुजास्यास्तथाऽवदन्(त्) ।
ह्रस्वो येनाक्षरोच्चारो मात्रासन्धिस्वरात्मकः ।
व्यासरूपो हरिः साक्षात् संहितानामकस्त्विति ।
तत्पुत्रो मध्यमः प्राह समोच्चारणकारणः ।
सामनामा वासुदेवः संहितानामवानिति ॥’इति च ।
मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-319" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘बृहस्पते न परः साम्नो विदुः’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥" |
|---|
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| id | "Aitareya-320" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "‘मा नः तेनेभ्यो ये अभिद्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६)
‘येषां नैतन्नापरं किञ्चनैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्।’
‘अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।’
‘आ देवानामोहते वि व्रयो(वि ब्रयो. हृ) हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६)
अभिद्रुहस्पदे अभितो द्रोहस्य= नित्यनिरतिशयदुःखस्य अन्धतमसो(अन्धतमसस्य इति ताम्रपर्णीयपाठः) योग्याः ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-321" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ।
कामक्रोधाभिभूतत्वाद् अहङ्कारवशं गताः ।
याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ।
ब्रह्मस्तेना निरानन्दा अपक्वमनसोऽशिवाः ।
वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ।
तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥’
इति मोक्षधर्मे भगवद्वचनाद् एवंविधा एव ‘स्तेनाः’ ‘अभिद्रुहस्पदस्थाः’ च ।" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "‘निरामिणः’ रामस्य रमणरूपस्य पूर्णानन्दस्वरूपस्य विष्णोर्जीवस्वरूपताज्ञानेन(स्वरूपतादिज्ञानेन- हृ) नीचताविदः । त एव(तत एव)) रिपवश्च तस्य ।
‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥’(भ.गी.९.११-१२)
इत्यादिवचनाद् असुरादयः । अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः ।" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "येषामेतत् सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित् । परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि ? किञ्चनैकम् । किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-324" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥’(भ.गी.१६.८-९) इत्यादि वचनात् ।" |
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| id | "Aitareya-325" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "ब्रह्मणस्पते ! ब्रह्मणः= वेदस्य पते वायो ! ‘अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः’(बृ.उ.३.३.७), ‘एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः । वाग्वै ब्रह्म । तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः । वाग्धि बृहती’(बृ.उ.३.३.२१)इत्यादि श्रुतेः । एतादृशेभ्यो मा ब्रूहि ।
शमेन= विष्णुनिष्ठया उप= समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नः= विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-326" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V14_B07" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "‘वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे ।
स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥’ इति च ।
‘सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद् विष्णुमाह ततः प्रियम् ।
तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद् यतः ॥’ इति वचनात् सामनाम्नः संहिताशब्दार्थत्वाद्, विष्णोस्तस्य नाम्नः श्रुतिसिद्धत्वाच्च सामनाम्नोः वासुदेवरूपसमाख्यासु पञ्चरात्रे पठितत्वाच्च तद् रूपं संहितानामकमिति युक्तमित्यभिप्रायः ॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-327" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V15" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "बृहद्-रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यः । वाग्वै रथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– ‘रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः’(ऋ.सं.१०.१८१.१), ‘भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः’(ऋ.सं.१०.१८१.२) इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-328" |
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| type | "bhashya" |
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ।
नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ ।
मध्यस्थः संहितानामा सोऽर्धनारीपुमात्मकः ।
वेदात्मकत्वाद् वाङ्नाम्नी लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ।
प्राणनामा प्रणेतृत्वात् साक्षान्नारायणः स्वयम् ।
रमित्यानन्द उद्दिष्टः सम्भोग्यं थमुदाहृतम् ।
विष्णुभोग्या रतितरा लक्ष्मीरेव रथन्तरम् ।
नारायणो बृहत्वात्तु बृहन्नामा प्रकीर्तितः ।
रथन्तरस्य बृहतो देवते चैव तावुभौ ।
वाक् प्राणसंस्थितौ चैव ताभ्यामेव हि सन्धितम् ।
लक्ष्मीनारायणं रूपं संहितानामकं शुभम् ।
एतां विद्यामवाप्तुं हि वत्सरं गा अरक्षत ।
तार्क्ष्य एतावन्मात्रं(तार्क्ष्य एतन्मात्रं च- हृ) च समुद्दिश्य न चापरम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-329" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V16" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "‘वाक् प्राणेन संहिता’ इति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन, पवमानो विश्वैर्देवैः, विश्वेदेवाः स्वर्गेण लोकेन, स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता ।
स यो हैतामवरपरां संहितां वेद, एवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते । यथैषा संहिता ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-330" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V16_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ।
द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् ।
संहितानामकं तत्र वर्णमध्यस्य देवता ।
तयोरेकं देवतयोः परमन्यत् तथाऽवरम् ।
अवरस्य परस्यापि संयोगात् संहिता तु सा ।
प्रोक्ताऽवरपरेत्येव, वाक् प्राणाख्यौ रमाऽच्युतौ ।
संहितैका, तथैवान्या केशवो वायुसंयुतः ।
वायुः स पवमानाख्यो देवताश्चाखिला अपि ।
तृतीया संहिता प्रोक्ता, देवतास्ताः सशङ्कराः ।
चतुर्थी संहिता प्रोक्ता, शङ्करो ब्रह्मणा सह ।
पञ्चमी संहिता चैव संहिता मोक्षदा इमाः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-331" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेद्, अभिव्याहार्षन्नेव विद्यात् । ‘दिवं संहिताऽगमद् विदुषां देवानामेवं भविष्यति’ इति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-332" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V17_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | ".... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ।
आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा ।
‘विद्वांसो देवता यस्मात् सम्यक् तेन महत् फलम् ॥
तेषामेव, हरिश्चैव संहितारूपकः प्रभुः ।
अगमद् देवलोकं हि कर्तुं देवेष्वनुग्रहम् ॥’
इति चिन्तयतस्तेषां प्रसादात् फलमञ्जसा ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-333" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "वाक् संहितेति पञ्चालचण्डः। वाचा वै वेदा सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति ।
तद् यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेळ्हि । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति, स्वपिति वा, प्राणे तदा वाग् भवति । प्राणस्तदा वाचं रेळ्हि । तावन्योन्यं रीळ्हः । वाग् वै माता । प्राणः पुत्रः ।
तदप्येतदृषिणोक्तम्–
‘एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश।
स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे ।
तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितः।
तं माता रेळ्हि स उ रेळ्हि मातरम् ॥’(ऋ.सं.१०.११४.४) इति ।
स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-334" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ।
मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् ।
वेदैर्हि व्यज्यते विष्णुः सा च वेदाभिमानिनी ।
प्राणस्थो भगवान् विष्णुः प्राणनामा प्रणेतृतः ।
ब्रह्मणोऽपि पिता नित्यं भगवान् पुरुषोत्तमः ।
उपचर्यते पुत्र इति वेदैर्यद् व्यज्यते हरिः ।
सा देवी संहितानाम्नी वाच्योऽस्या विष्णुरेव हि ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-335" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम्, पतिरुत्तररूपम्, पुत्रः सन्धिः, प्रजननं सन्धानम्। सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च, पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च। तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘अदितिर्माता स पिता स पुत्रः’(ऋ.सं.१.८९.१०) इति ।
स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-336" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V19_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहिताऽपि हि ।
विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः ।
स एव पितृसंस्थस्तु पातृत्वात् पितृनामकः ।
देवतोत्तरवर्णस्य मातृस्थो मातृनामकः ।
माननात्, पूर्ववर्णस्य देवतेति प्रकीर्तितः ।
पोषकत्वात् सन्धिनामा वर्णयोरन्तरस्थितः ।
स एव पुत्रसंस्थश्च पुत्रनामा जनार्दनः ।
त्राणात् पू्तित एवासौ, वर्णसन्धानकर्मणि ।
सन्धाननामा सन्धानकर्तृत्वात् पुरुषोत्तमः ।
प्रजातिकर्मसंस्थश्च स एव प्रजनाभिधः ।
जनकत्वात् परो विष्णुरेवं विष्णुर्हि संहिता ।
वासुदेवादिरूपेण चतुर्धैवं व्यवस्थितः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-337" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V19_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स एव दिवि संस्थश्च द्युनामा क्रीडनात् प्रभुः ।
अन्तरेवेक्षणाच्चैव सोऽन्तरिक्षोऽन्तरिक्षगः ।
पृथिवी पृथिवीस्थश्च प्रथितत्वाज्जनार्दनः ।
मुख्यार्थत्वात् सर्वनाम्नां सर्वदेवाभिधो हरिः
विश्वे देवा इति प्रोक्तो बहुधा तेषु संस्थितः ।
ज्ञानद्युतेर्देवनामा स्थितो देवेषु केशवः ।
गां धारयंश्च गन्धर्वो गन्धर्वेषु व्यवस्थितः ।
माननान्मानुषो नाम मानुषेषु स्थितो हरिः(प्रभुः) ।
पालनात् पितृनामाऽसौ पितृष्वेव व्यवस्थितः ।
रतेः प्राणेऽसुराख्यश्च सोऽसुरेषु व्यवस्थितः ।
एवं पञ्चजनेषुस्थो हरिः पञ्चजनाभिधः ।
जातनामा जातसंस्थः प्रादुर्भूतगुणत्वतः ।
जनिक्रियास्थितश्चासौ जनित्वमिति गीयते ।
जनिं यस्मात् तवयति, तवनं हि प्रकाशनम् ॥इति च ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-338" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V19_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ ।
यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे ।
अनुष्टुब्देवता यस्तु नृसिंहो जगतोऽस्य च ।
स्वमुखे हवनादेव हविरित्यभिधीयते ।
तस्मिन् यज्ञे वसिष्ठस्तु चतूरूपाज्जनार्दनात् ।
आजहार श्रियं देवीं रथन्तरवराभिधाम् ।
चतुर्मूतिः स्तुतस्तेन प्रेषयामास तां श्रियम् ।
सा चास्मै प्रददौ विद्यां प्रययौ च पुनर्हरिम् ।
धातेत्युक्तोऽनिरुद्धस्तु प्रद्युम्नस्तु द्युनामकः(द्युतानकः हृ.) ।
वासुदेवः प्रसविता सर्वस्य प्रसवाद् विभुः(प्रभवाद् प्रभुः) ।
सङ्कर्षणो विष्णुनामा प्रणेतृत्वाद् बलादपि ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-339" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V19_B04" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत्= अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयद् इत्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ हविर्यदिति पृथक् सम्बन्धः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-340" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V19_B05" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C03_S01" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "आचक्रे= आकारयामास । ‘अविन्दन् ते’, ‘तेऽविन्दन्’ इत्यध्यात्म-अधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तम् अविन्दन्नित्यर्थः । ‘देवयानम्’, ‘गुहायद्’ इति वचनात् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-341" |
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| type | "section" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "paada" |
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| text | "द्वितीयोऽध्यायः" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "प्राणो वंश इति स्थविरः शाकल्यः । तद् यथा शालावंशे सर्वेऽन्ये वंशाः समाहिताः स्युः, एवमस्मिन् प्राणे चक्षुः श्रोत्रं मनो वाग् इन्द्रियाणि शरीरं सर्व आत्मा समाहितस्तस्यैतस्याऽत्मनः प्राण ऊष्मरूपम् । अस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपम् । मांसं लोहितम् इत्येतद् अन्यच्चतुर्थम् अन्तःस्थरूपम् ।(ह स्माऽह)" |
|---|
|
| id | "Aitareya-343" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "गृहस्याऽच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः ।
तथेन्द्रियाभिमान्यादिदेवानां वायुराश्रयः ।
तेषु सर्वेषु भगवान् बहुरूपो हरिः स्थितः ।
विष्णुनामाऽक्षरेष्वेवम् अन्येष्वपि तदर्थतः ।
प्राणनामा तु(अपि) भगवान् प्राणस्थश्चोष्मसु स्थितः ।
ऊष्मनामा समर्थत्वात् स एव भगवान् हरिः ।
पूर्णत्वाद् आत्मनामाऽसौ, प्रतिमात्वाद् अमुष्य तु ।
सङ्घात आत्मशब्दोक्तो, ह्यस्थिरश्चास्थिनामकः ।
अस्थिस्थितो हरिः स्पर्शसंस्थितः स्पर्शनामकः ।
स्पर्शहेतुत्वतः स्पर्शनामा स भगवान् हरिः ।
मज्जासुस्थः स मज्जाख्यो मदं जनयतीति ह ।
स एव स्वरसंस्थश्च स्वराख्यः स्वरतेः प्रभुः ।
प्रमाणं सारयेद् यस्मान्मांसाख्यो मांससंस्थितः ।
लोहिताख्यो रक्तवर्णो लोहितस्थो जनार्दनः ।" |
|---|
|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "इति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः- त्रयं त्वेव न एतत् प्रोक्तम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति, त्रीणीतः षष्टिशतानि, त्रीणीतस्तानि सप्तविंशतिशतानि भवन्ति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-345" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः ।
तत एव विभक्तानि सङ्ख्या तेषां पृथङ् न तत् ।
तस्मात् सप्तशतान्येव देहे विंशच्च तस्य हि ।
रूपाणि विष्णोर्भागे तु षष्ठ्युत्तरशतत्रयम् ।" |
|---|
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| id | "Aitareya-346" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः स एषोऽहःसम्मानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा ।
स य एवमेतमहःसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अह्नां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति, सर्वमायुरेति ॥
१ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-347" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः ।
अहर्नामा च भगवान् अहार्यत्वात् प्रकीर्तितः ।
अहोभिः समसङ्ख्यानि यस्माद् अध्यात्मगानि तु ।
रूपाणि विष्णोस्तेनायम् अहस्सम्मान उच्यते ।
पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय इतीरितः (उदीरितः) ।
तादृक् श्रवणशक्तित्वाद् तथा श्रोत्रमयः स्मृतः ।
छन्दोमयः सत्यकामो मन्तृवक्तृबलात्मकः ।
एवं विद्वांस्तस्य रूपाण्याप्नोति ज्ञानपुत्रवान् ॥
पीयमानं शमाप्नोति प्राप्याहर्नामकं हरिम् ॥ १ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-348" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ कौण्ठरव्यः- त्रीणि षष्टिशतान्यक्षराणाम्, त्रीणि षष्टिशतान्यूष्मणाम्, त्रीणि षष्टिशतानि सन्धीनाम् ।
यान्यक्षराण्यवोचामाहानि तानि, यानूष्मणोऽवोचाम रात्रयस्ताः, यान् सन्धीन् अवोचामाहोरात्राणां ते सन्धय इत्यधिदैवतम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-349" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथाध्यात्मम्- यान्यक्षराण्यधिदैवतमवोचाम, अस्थीनि तान्यध्यात्मम् । यानूष्मणोऽधिदैवतमवोचाम, मज्जानस्तेऽध्यात्मम् । एष ह वै सम्प्रति प्राणो यन्मज्जा । एतद्रेतेः । न ह वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्यते । यद् वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्येत, पूयेद् न सम्भवेत् । यान् सन्धीन् अधिदैवतमवोचाम पर्वाणि तान्यध्यात्मम् । तस्यैतस्य त्रयस्य, अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति । पञ्चेतश्चत्वारिंशच्छतानि, पञ्चेतः । तदशीतिसहस्रं भवति, अशीतिसहस्रं वा अर्कलिनो बृहतीरहरभिसम्पादयन्ति ।
स एषोऽक्षरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा ।
स य एवम् एतम् अक्षरसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अक्षराणां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-350" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् ।
अशीत्युत्तरसाहस्ररूपं वर्णेषु संस्थितम् ।
विष्णुनाम्नोऽथवाऽन्येषु पञ्चाशत्सङ्ख्यकेष्वपि ।
तावत् सङ्ख्यानि, देहेषु पृथङ् मज्जास्थिपर्वसु ।
रूपाणि विष्णोस्तावन्ति चेष्टकानि(चेष्टकासु) पृथक् पृथक् ।
अर्कस्थितबृहत्याख्यरूपाण्यह्नां च सर्वशः ।
सम्पादकानि तान्येव, तान्यक्षरमितानि च ।
अस्थ्यादिस्थितरूपाणि तान्युपास्य विमुच्यते ॥’ इति च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-351" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "तस्यैतस्याऽत्मनः तस्य शरीराख्यस्याऽत्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेरपि तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-352" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "‘ष्(विष्)’ ‘ण्’ ‘ष्णुः’ इत्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्माक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-353" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः ।
सन्धानात् सन्धिनामाऽसौ स्वयं नारायणः प्रभुः ।
सन्ध्यूष्माक्षरगाण्यस्य विष्णो रूपाणि सर्वशः ।
सन्ध्यारात्रिदिवास्थानि साशीतिकसहस्रकम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-354" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तान्येवास्थिषु मज्जासु पर्वस्वपि च सर्वशः ।
परज्ञानात् तु पर्वाणि विष्णो रूपाणि तानि हि ।
अस्थानान्मदनाच्चैव ह्यस्थिमज्जाभिधानि च ।
व्यक्तिर्मज्जासु तस्यैव प्राणो मज्जासु संस्थितः ।
मज्जैव रेतो भवति रेतसिस्थो विशेषतः ।
प्राणस्तेन हि तद्रेतोयुक्तं प्राणेन सर्वदा ।
यदि प्राणो न तद्रेतो न गर्भत्वं व्रजेत् क्वचित्।
विशेषप्राणसम्बन्धवर्जितान्यत एव हि ।
न मांसादीनि गर्भत्वं यान्त्यतः स हि रेतसि ।
विशेषेण स्थितः प्राणः प्राणे चैव विशेषतः ।
स्थितो नारायणो देवस्तस्मान्मज्जासु च स्थितः ॥इति च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-355" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थम् इदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानाम् अभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । अर्के निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक् प्रेरकत्वाद् । विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येव अहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-356" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V04_B07" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः ।
विष्णुः प्रवर्तको रूपैर्बृहत्युक्थस्य चाञ्जसा ॥
बृहत्युक्थेन वाच्यानि रूपाण्येतान्यधीशितुः ॥’ इति च ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-357" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः ।
स हि मोक्षप्रदो विष्णोराज्ञया स उवाच ह ।
सर्वदेहाभिमानी तु शरीरपुरुषः शिवः ।
सर्ववर्णाभिमानी च शेषोऽसौ छान्दसः पुमान् ।
सर्ववेदाभिमान्येव गरुडो वेदपूरुषः ।
संवत्सराभिमानी तु ब्रह्मैव हि महापुमान् ।
सारः शिवस्यानिरुद्धनामा देहस्थितो हरिः ।
अ इत्याक्रियते यस्माद् वासुदेवो ह्यकारकः ।
शेषस्य सारः स विभुर्ब्रह्माख्यो ज्ञानबृंहणात् ।
सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सारः स गरुडस्य च ।
ब्रह्मर्त्विक्संस्थितश्चासौ तस्माद् ब्रह्मिष्ठमेव हि ।
कुर्याद् ब्रह्मर्त्विजं तस्मिन् विशेषेण स्थितो हरिः ।
ब्रह्मणः सारभूतस्तु प्रद्युम्नो भगवान् हरिः ।
स एवाऽदित्यसंस्थश्च स ह्यादिर्जगतो विभुः ।
ततश्च सर्वभूतेषु जीवानां विनियामकः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-358" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एकमेतदिति विद्यात् तस्मात् पुरुषं पुरुषं प्रत्यादित्यो भवति ।
तदप्येतदृषिणोक्तं–
‘चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।
आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥’(ऋ.सं.१.११५.१) इति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-359" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स एवाऽदित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः ।
स एव सर्वदेहेषु चानिरुद्धतनुः स्थितः ।
सङ्कर्षणो वासुदेव इत्येकः स चतुर्विधः ।
प्रतिपूरुषमेतस्मात् स्थितो विष्णुर्नियामकः ।
आदित्यादिषु च स्थित्वा द्योतकोऽसौ प्रति प्रति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-360" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V06_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स चेतनतमत्वाद्धि चित्रमित्यभिधीयते ।
मुख्यत्वात् सर्वदेवानामननादीशितृत्वतः ।
कर्तृत्वादप्यनीकं स उदैत् सूर्यस्थितो हरिः ।
ज्ञानदत्वाच्च देवानां चक्षुरेतेन दर्शनात् ।
आपूरयन् सर्वलोकान् प्रकाशेन जनार्दनः ।
आदानात् सर्वजीवानाम् अत्तृत्वात् प्रलयेऽपि च ।
आत्मेत्युक्तः स भगवान् जगतः स्थावरस्य च ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-361" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "एताम् अनुविधं संहितां सन्धीयमानां मन्य इति ह स्माऽह बाध्वः । एतां ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्ते । एतमग्नावध्वर्यवः । एतं महाव्रते छन्दोगाः । एतमस्याम्, एतं दिवि, एतं वायौ, एतमाकाशे, एतमप्सु, एतमोषधीषु, एतं वनस्पतिषु, एतं चन्द्रमसि, एतं नक्षत्रेषु, एतं सर्वेषु भूतेषु एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते ।
स एष संवत्सरसंमानश्चक्षुर्मयः, श्रोत्रमयः, छन्दोमयः, मनोमयः, वाङ्मय आत्मा ।
स य एवमेतं संवत्सरसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयम् आत्मानं परस्मै शंसति," |
|---|
|
| id | "Aitareya-362" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा ।
ज्ञायते पूर्ववर्णस्य रूपं नारायणाभिधम् ।
प्रादुर्भावाः समस्ताश्च चरमार्णस्य देवताः ।
तदा तु संहितां सम्यङ् मन्येऽहं सन्धितामिति ।
आह वायुरिमं विष्णुं बृहत्युक्थस्य(बृहदुक्थस्य- हृ) देवताम् ।
महाव्रताख्यस्तोत्रस्य चेष्टकानां च देवताम् ।
एतमेवाखिलजगद् व्याप्तं पूर्णगुणात्मकम् ।
संवसद्रतिदातृत्वाद् ब्रह्मा संवत्सराभिधः ।
नियामकः स जीवानां सर्वेषां प्रभुरीश्वरः ।
अनन्तमूर्तिर्ब्रह्माऽसावनन्तजगदास्थितः ।
नियामकस्तस्य विष्णुस्तावद्रूपेषु संस्थितः ।
तत् संवत्सरसम्मानः स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-363" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "दुग्धदोहा अस्य वेदा भवन्ति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति । न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-364" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "य एनं वक्त्ययोग्येभ्यो योऽथवैनं महाव्रते ।
कर्मण्याचार्यतोऽन्यस्य शंसेत पितृतोऽथवा ।
महाव्रतेन स्तोत्रेण स्तुवीतैनमथापि वा ।
महाव्रते चितिं वाऽपि कुर्यान्नास्य फलं श्रुतेः ।
सुकृतस्य फलं चैव नासौ सम्यगवाप्स्यति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-365" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V08_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रत्यक्षज्ञानिनोऽप्येतद् आनन्दह्रासकृद् भवेत् ।
प्रत्यक्षज्ञानिनो मोक्षो न कथञ्चिद्धि हीयते ।
आचार्यमेव तं विद्याद् गुणैर्यः स्वात्मनोऽधिकः ।
गुणाधिकस्य तेनैव शंसनादि न दुष्यति ।
अयोग्यस्योपदेशे तु कृते हौत्रादिकेऽपि वा ।
प्रायश्चित्तार्थमेतत्तु शंसीत शतवारकम् ।
अन्यथा मानुषेष्वेव जायते न दिवं व्रजेत् ।
योग्या अस्यास्तु विद्याया देवा ऋषय एव च ।
एकदेशज्ञानयोग्या मानुषा उत्तमा यदि ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-366" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V08_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मुख्यत्यागो हरेरेष यन्नास्तीति वदेदमुम् ।
तत्समं वाऽधिकं वाऽपि ब्रूयादैक्यमथापि वा ।
ऐश्वर्यादिगुणानां वा ह्रासं नास्तित्वमेव वा ।
तत्प्रसादं विना मोक्षं ब्रूयाद् वा कस्यचित् क्वचित्।
ऐक्यं वा ब्रह्मशर्वादेर्मुक्तावैक्यम् अथापि वा ।
व्यत्यासं चावताराणां जीवाभेदम् अमुष्य वा ।
भेदज्ञानं तद्गुणानां तेन वाऽथ मिथोऽपि वा ।
तथैव तत्क्रियाणां च तद्रूपाणामथापि वा ।
असाम्यदर्शनं वाऽपि तद्रूपाणां (तद्गुणानां) परस्परम् ।
देहदेहिविभेदं च तस्मिन्नवयवेषु वा ।
परस्परं भेददृष्टिं तेन वा कुत्रचित् क्वचित्।
दोषसंसर्गमस्यापि स्वतः परत एव वा ।
अज्ञानतो ज्ञानतो वा, निर्देहत्वममुष्य च ।
तद्देहस्य प्राकृतत्वम् अचिदानन्ददेहताम् ।
प्रादुर्भावेष्वपि विभोर्देहत्यागोद्भवादिकम् ।
अज्ञानदुःखासामर्थ्यपारवश्यादिकं तथा ।
अतद्वशत्वं कस्यापि कदाचित् क्वचिदप्युत ।
परिमाणं बलादेर्वा तस्य विष्णोर्महात्मनः ।
भेदाभेददृशिर्वाऽस्य जीवैर्वा स्वगुणादिभिः ।
तर्कैस्तस्यापलापो वा तत्र रक्तेन चेतसा ।
त्यागानामेवमुक्तानां तर्काद्यैः साधनं तथा ।
अचिन्त्यविभवेऽप्यस्मिन्नसम्भवनिरूपणम् ।
स एष मुख्यतस्त्यागो वासुदेवस्य कीर्तितः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-367" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V08_B04" |
|---|
| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C03_S02" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "रमाब्रह्मादिकानां च तारतम्यानभिज्ञता ।
संशयश्चोक्ततत्त्वेषु जगन्मिथ्यात्वदर्शनम् ।
अस्मृतिर्वासुदेवस्य तद्भक्तानां च निन्दनम् ।
द्वितीय एष त्यागस्तु विष्णोरेव प्रकीर्तितः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-368" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V08_B05" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "निषिद्धकर्मकरणं विहितस्य च वर्जनम् ।
त्यागस्तृतीयो हि हरेः, चतुर्थोऽयोग्यपूरुषे ।
उपदेशः केशवस्य यथाशास्त्रोदितक्रमात् ।
आचार्यपित्रोरन्यत्र तथैव च महाव्रते ।
हौत्रौद्गात्राध्वर्यवाणि, त्याग एव चतुर्विधः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-369" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "त्यागद्वयात् तु प्रथमात् प्राप्यतेऽन्धन्तमः क्रमात् ।
तृतीयान्निरयप्राप्तिश्चतुर्थान्न दिवं व्रजेत् ।
उपदिष्टेऽपि यस्तत्त्वे संशयं कुरुते पुमान् ।
सोऽन्धन्तमो व्रजेदन्यो निरयायैव गच्छति ।
स एव भगवान् विष्णुरेतैदोषैर्विना यदि ।
ज्ञायते मुक्तिदः साक्षान्नात्र कार्या विचारणा ।
यदि ज्ञानं नातिपक्वं सरागं च मनो भवेत् ।
तदा स्वर्गादिलोकाप्तिः संशयश्चेत् क्वचित् क्वचित्।
आवृत्तिरेव संसारे यावन्निःसशंयो भवेत् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-370" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "पुनरावृत्तिहीनं तु तमोऽन्धं मुक्तिरेव च ।
पूर्वं तु निःसुखं तत्र, निर्दुःखं चापरं मतम् ।
निश्शेषगुणहीनं च पूर्वम्, निर्दोषकं परम् ।
विमिश्रगतयस्त्वन्याः पुनरावृत्तिसंयुताः ।
असुरा देवता मर्त्या योग्या एतेषु च क्रमात् ।
न च तेषां सङ्करोऽस्ति यथायोग्या हि तद्गतिः ।
मानुषेषूत्तमा मुक्तिम् अधमा निरयं तथा ।
आप्नुवन्ति मनुष्येषु मध्यमाः सृतिभागिनः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-371" |
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "नियमोऽयं नान्यथा स्याद्, अच्छिद्रत्वं यथा भवेत् ।
दोषेऽथवा गुणे वाऽपि तदा दैत्याः सुरा अपि ।
स्वां स्वां गतिं समायान्ति तावत् संसारभागिनः ।
अच्छिद्रत्वं नैव सर्वैः कदाचित् प्राप्यते यतः ।
सृष्टिस्थितिलयादीनां नोच्छेदस्तेन कुत्रचित् ।
तस्माद् दोषान् प्रहायैव विष्णुं सर्वोत्तमोत्तमम् ।
जानीयात् तेन मुक्तिः स्याद् अपरोक्षदृशेरनु ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-372" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V09" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्ये, एकमेतदित्यवोचाम । तौ यत्र विहीयेते । चन्द्रमा इवाऽदित्यो दृश्यते, न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । लोहिनी द्यौर्भवति यथा मञ्जिष्ठाः । व्यस्तः पायुः । काककुलायगन्धिकमस्य शिरो वायति । सम्परेतोऽस्याऽत्मा न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात् । स यत्करणीयं मन्येत, तत्कुर्वीत । ‘यदन्ति यच्च दूरके’(ऋ.सं.९.६७.२१) इति सप्त जपेत् । ‘आदित् प्रत्नस्य रेतस’ इत्येका । ‘यत्र ब्रह्मा पवमान’ इति षट् । ‘उद्वयं तमसस्परि’ इत्येका ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-373" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V09_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः ।
अनिरुद्धश्च हृदये न च भेदोऽनयोः क्वचित्।
अन्येषामपि रूपाणाम् इति विद्याद् विचक्षणः ।
द्विरूपः स यदा विष्णुरपगच्छति देहतः ।
तदैव दुर्निमित्तानि जायन्ते नान्यदा क्वचित्।
तस्मात् तेषां दर्शने तु कर्तव्यं पारलौकिकम् ।
सर्वमेव, जपेच्चैव यदन्तीत्यादिका ऋचः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-374" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V09_B02" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ऋग्भिः षडि्भर्वायुरेव पवमानादिनामकः ।
स्तूयते सोऽङ्गनेतृत्वाद् अग्निरित्यभिधीयते ।
परस्य ब्रह्मणो विष्णोर्ज्ञापनाख्यप्रसूतिभिः ।
वायुः पुनाति यल्लोकान् सविता तेन कथ्यते ।
पवित्रं नाम साक्षात् तत् परं ब्रह्म जनार्दनः ।
प्रसादयित्वा तं विष्णुं तेन लोकान् पुनात्यसुः ।
ज्ञानाख्यप्रसवेनापि स्वयं वायुः पुनात्ययम् ।
प्राणाग्नेरर्चिषो देहे विततास्तेषु केशवः ।
अर्चिष्मान् विततो नित्यं वायुस्तेन पुनात्ययम्(पुनात्यलम्- हृ) ।
यत्र ब्रह्मेति षडि्भश्च प्रार्थनीयः स मारुतः ।
मोचयित्वैव संसारद् विष्णोर्लोके कृधीति च ।
आदित्प्रत्नस्येति विष्णुः स्तुत्यो वैकुण्ठलोकगः ।
आदित्यमण्डलस्थश्च साक्षान्नारायणः प्रभुः ।
उद्वयं त्वितिमन्त्रेण स्तुत्यो वायोरपीश्वरः ।
अपमृत्युभयं तस्य यदन्तीत्यृग्जपाद् व्रजेत् ।
कालमृत्युर्यदि भवेत् तथा जन्मादिकं भयम् ।
अन्याभिः कर्मतः पूतो यत्र ब्रह्मेति वैष्णवम् ।
लोकं व्रजेत् तथाऽन्याभ्यां विष्णुर्मोक्षसुखप्रदः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-375" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V09_B03" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इष्टप्रदानशीलत्वाद् इन्दुर्वायुः स एव च ।
सोमः सौम्यस्वरूपत्वात्, पवमानश्च पावनात् ।
विष्णुः पुरातनत्वात् तु प्रत्नो, रेतो महारतिः ।
देवत्रा देव एवासौ सर्वदेवेश्वरो यतः ।
सूर्यश्च सूरिभिः प्राप्यो नित्यानन्दो रमापतिः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-376" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V10" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथापि यत्र च्छिद्र इवाऽदित्यो दृश्यते, रथनाभिरिवाभिख्यायेत, च्छिद्रां वा छायां पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यादर्शे वोदके वा जिह्मशिरसं वाऽशिरसं वाऽऽत्मानं पश्येद्, विपर्यस्ते वा कन्याके जिह्मेन वा दृश्येयाताम्, तदप्येवमेव विद्यात् ।
अथाप्यपिधायाक्षिणी उपेक्षेत, तद् यथा बटरकाणि सम्पतन्तीव दृश्यन्ते, तानि यदा न पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् ।
अथाप्यपिधाय कर्णावुपशृणुयात्, स एषोऽग्निरिव प्रज्वलतो, रथस्येवोपब्दिस्तं यदा न शृणुयात्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र नील इवाग्निर्दृश्यते यथा मयूरग्रीवा, मेघे वा विद्युतं पश्येत्, मेघे वा विद्युतं न पश्येत्, महामेघे वा मरिचीरिव पश्येत, तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र भूमिं ज्वलन्तीमिव पश्येत तदप्येवमेव विद्याद् इति प्रत्यक्षदर्शनानि ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-377" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः ।
अत इत्युच्यते विष्णुः सन्ततो ह्यत उच्यते ।
तृतीयवर्णोऽतिशये यतस्तेनातिरेव वा ।
अत इत्युच्यते विष्णुः सम्यक् श्रुत्याद्यशक्यतः ।
पूर्णत्वाद् भगवान् विष्णुरश्रुतत्वादिनोदितः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-378" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अन्तस्थः सर्वजीवानां पूर्णत्वात् पुरुषाभिधः ।
समः स सर्वरूपेषु सर्वजीवनियामकः ।
इति विद्यात् परं विष्णुं मुच्यते तेन संसृतेः ॥’ इत्यादि च ।
शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात्, तदुपास्यत्वात्, तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्यत्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यद् ईम् एव । अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत् सर्वम् अरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावः, रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-379" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "परस्मै शंसनमात्राद् अरतिरेव ! इत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागोऽस्ति, न हि प्र वेद सुकृतस्य पन्थाम् इति दोषद्वयमेवेत्यव-धारयति- न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति, न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इत्येतत् तदुक्तं भवति इति । अलकं शृणोति इति त्यागद्वयस्य मुख्यतः, तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद् भवति ।
तौ यदैवास्माच्छरीराद् विहीयेते तदैव तानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-380" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B04" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः ।
‘यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् ।
सोमेन च सुतेनेशमास्ते लोके हरेर्हि सः ॥’ इति स्कान्दे ।
ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते, तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्याऽनन्दं जनयन् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-381" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B05" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "स्वर् आनन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । ‘अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आ वक्षणाभ्यः’(ऋ.सं.१.१३४.४) इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः ।
‘सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव ।
यत्रासौ भगवान् विष्णुस्त्वं हि मोक्षप्रदः सदा ॥’ इति च ।
‘इन्दुरिष्टप्रदत्वाद् यो वायुरादाय गच्छति ।
इन्द्रनाम्नः केशवस्य समीपं मुक्तमञ्जसा ॥’ इति च ।
(आनन्द-मोद-प्रमोद-मुत् शब्देषु अर्थभेदः)
‘अनन्यहेतुकं साक्षाद् भगवद्भक्तिरूपकम् ।
सुखमानन्द इत्युक्तो मोदो भोगनिमित्तकः ।
प्रमोदस्तद्विशेषोत्थो मुन्नामात्यल्पभोगतः ॥’ इत्यृग्वेदसंहितायाम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-382" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B06" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तमसः सकाशाद् उद्गता वयम् उत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तः तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवम् अगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमं ज्योतिः, न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रम् इदम् इति ज्ञापयितुम् ‘अगन्म ज्योतिरुत्तमम्’ इति पुनर्वचनम् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-383" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः’ इति शब्दनिर्णये ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-384" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B08" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् ।
स्वप्ने तस्याचिरान्मृत्यू रक्ताब्जे वा शिरोधृते ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-385" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B09" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता ।
पायसेन हरेन्मृत्युं रात्रिसूक्तादकालिकम् ।
यदि कालिकमृत्युः स्यात् पदं सा परमं नयेत् ।
सहैव विष्णुना भक्तं विष्णोस्तद्वेदिनं तथा ।
रतिदत्वात् परो विष्णुर्मुख्यतो रात्रिरुच्यते ।
तदाश्रयत्वाद् दुर्गाऽपि रात्रीरित्यभिधीयते ।
स्त्रीरूपः स परो विष्णुः पायसेष्टो हि मोक्षदः ।
तस्मादुभौ सहैवेज्यौ भक्त्या दुःस्वप्नदर्शने ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-386" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B10" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "बहुभिर्नयनैर्विष्णुर्बहुधेदं ददर्श ह ।
आयन् सर्वेषु लोकेषु धृतास्तेनैव हि श्रियः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-387" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B11" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "नीचान् उच्चांश्च जीवान् स ब्रह्मादीन् उर्वपूरयत् ।
ज्ञानेन बाधतेऽज्ञानं........." |
|---|
|
| id | "Aitareya-388" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B12" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "जयिनः स्तोममिव च ब्राह्मणाय यथा च गाः ।
उपाकरं तथा स्तोमं तवाहं तद् (वृ)गृणीष्व च ।
द्यौरिति ज्ञानमुद्दिष्टं तद्व्यङ्गत्वाज्जनार्दनः ।
दुहिता दिव इत्युक्तः.........।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-389" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B13" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "......... एवमर्थेन पूज्यते ॥
रात्रीसूक्तेन भगवान् साक्षान्नारायणः प्रभुः ।
तत्सन्निधानाद् दुर्गाया एषोऽर्थ उपचारतः ।
एवं स्तुतस्तथैवेष्टो भगवान् मोक्षदो भवेत् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-390" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् । सर्वा ह्येवेमाः सर्वस्यै वाच उपनिषदः । इमां त्वेवाऽचक्षते । पृथिव्या रूपं स्पर्शाः, अन्तरिक्षस्योष्माणः, दिवः स्वराः । अग्ने रूपं स्पर्शाः, वायोरुष्माणः, आदित्यस्य स्वराः । ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शाः, यजुर्वेदस्योष्माणः, सामवेदस्य स्वराः । चक्षुषो रूपं स्पर्शाः, श्रोत्रस्योष्माणः, मनसः स्वराः । प्राणस्य रूपं स्पर्शाः, अपानस्योष्माणः, व्यानस्य स्वराः ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-391" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V11_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुनामा(शब्दा)र्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववाग् उपनिषद एव । तथापि मुख्यत(मुखत) एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-392" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V11_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "‘पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् ।
स्पर्शादीनां देवताऽसौ क्रमेणैव प्रकीर्तितः ॥" |
|---|
|
| id | "Aitareya-393" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथ खल्वियं दैवी वीणा भवति । तदनुकृतिरसौ मानुषी वीणा भवति । यथाऽस्याः शिरः, एवममुष्याः शिरः । यथाऽस्याः उदरम्, एवममुष्या अम्भणम् । यथाऽस्यै जिह्वा, एवममुष्यै वादनम् । यथाऽस्यास्तन्त्रयः, एवममुष्या अङ्गुलयः । यथाऽस्याः स्वराः, एवममुष्याः स्वराः । यथाऽस्याः स्पर्शाः, एवममुष्याः स्पर्शाः ।
यथा ह्येवेयं शब्दवती तर्द्मवति, एवमसौ शब्दवती तर्द्मवती । यथा ह्येवेयं लोमशेन चर्मणा पिहिता भवति, एवमसौ लोमशेन चर्मणा पिहिता । लोमशेन ह स्म वै चर्मणा पुरा वीणा अपिदधति । स यो हैतां दैवीं वीणां वेद, श्रुतवदनो भवति, भूमिप्राऽस्य कीर्तिर्भवति, यत्र क्व चाऽर्या वाचो भाषन्ते विदुरेनं तत्र ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-394" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V12_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता ।
दैवी वीणा ततः सेयं लोकसिद्धा तु मानुषी ।
ब्रह्मादिदेहान् यो वेद विष्णोर्वीणेति भक्तितः ।
विद्यापूर्णसुखः स स्याद् भूमिपूरितकीर्तिमान् ।" |
|---|
|
| id | "Aitareya-395" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| text | "अथातो वाग्रसः । यस्यां संसद्यधीयानो वा भाषमाणो वा न विरुरुचुषेत । तत्रैतामृचं जपेत् -
‘ओष्ठा पिधाना न कुली दन्तैः परि वृता पविः ।
सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेत्’(सा.मं.ब्रा.१.७.१५) ।
इति वाग्रसः ॥५ ॥" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्साराम् अप्यृचं जपेत् ।
ध्यात्वा नारायणं देवं स्त्रीरूपं वाचि संस्थितम् ।
ओष्ठा पिधानेत्येषा ह्यृक् सारो वाचः प्रकीर्तितः ।
विष्णोर्हि वाचि संस्थस्यैवोष्ठावेतौ पिधानवत् ।
कुलीति चोक्तो भगवान् प्रलीनाशेषकुत्सितः ।
पाति सर्वं विशिष्टश्च सर्वस्मादित्यतः पविः ।
सर्ववागीश्वरो विष्णुः स्त्रीरूपो मां सुवादयेत्’ ॥ इति च ।" |
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| id | "Aitareya-397" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "(नेत्युपमार्थे)न इत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवत् अस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वाद्, वक्ष्यमाणत्वाच्च ।" |
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| id | "Aitareya-398" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "‘श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः’(भाग.२.४.२०) इति भागवते । ‘यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद’(बृह.३.७.२७) इत्यादिश्रुतिश्च । स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥" |
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| id | "Aitareya-399" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "अथ हास्मा एतत् कृष्णहारीतो वाग्ब्राह्मणमिवोपोदाहरति । प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा व्यस्रंसत संवत्सरः । स च्छन्दोभिरात्मानं समदधात् । यच्छन्दोभिरात्मानं समदधात् तस्मात् संहिता ।" |
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| id | "Aitareya-400" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| text | "संवत्सर इति विशेषणाद् विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः । ‘ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सरः’(महाना.उ.१७.१२) इत्यादि श्रुतेः ।
‘श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् ।
तेनैव सम्यक् सन्धाय दार्ढ्यं देहस्य सोऽकरोत् ।
सन्धानात् संहितेत्युक्तो विष्णुरेव सनातनः।" |
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| id | "Aitareya-401" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "तस्यै वा एतस्यै संहितायै णकारो बलम् , षकारः प्राण आत्मा । स यो हैतो णकार-षकारावनुसंहितम् ऋचो वेद, सबलां सप्राणां संहितां वेद । आयुष्यमित विद्यात् ।" |
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| id | "Aitareya-402" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते ।
ण इत्याक्रियमाणत्वाण्णकारोऽस्य बलं मतम् ।
विष्णुनाम्नि षकारेण रमाब्रह्मेशपूर्विणः ।
प्रणेतृताऽखिलस्यैव विष्णोरुक्ता तथाऽऽत्मता ।
आततत्वं सर्वगुणैर्देशतः कालतस्तथा ।
आत्मशब्दोदितं तच्च षशब्देनाभिधीयते ।
ष इत्याक्रियमाणत्वं प्रणेतृत्वं च पूर्णता ।
विष्णोः षकार इत्युक्ता वीत्युक्तस्य विशिष्टता ।
अन्त्यस्थित उकारस्तु ताच्छील्यादि हरेर्वदेत् ।
एवं विशिष्टप्राणत्वम् आततत्वं च सर्वतः ।
विशिष्टं च बलं विष्णोः सर्वस्माच्छीलमित्यपि ।
उदितं विष्णुशब्देन, तस्माद् ऋक्संहितामनु ।
वर्णद्वयसमायोगे ष्णुशब्दस्यार्थमेव तु ।
विष्णोः प्राणत्वमात्मत्वं बलं चैवात्र वेत्ति यः ।
स एव विष्णोर्बलवित् तथा प्राणत्वविद् भवेत् ।
स एव मुक्तः संसारान्नित्यायुष्मान् भविष्यति ।" |
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| id | "Aitareya-403" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "स यदि विचिकित्सेत्, सणकारं ब्रवाणीं३ँ, अणकारा३ँ इति, सणकारमेव ब्रूयात् । सषकारं ब्रवाणी३ँ, अषकारा३ँ इति, सषकारमेव ब्रूयात् ।
ते यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्ताविति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः ।
अथ यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्तावन्ति ह स्माऽह स्थविरः शाकल्यः ।" |
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| id | "Aitareya-404" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V16_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "संहितासहितत्वेन यदृचोऽधीमहे वयम् ।
वेदान् अन्यान् पुराणं वा तेन विष्णुपदोदितः ।
अवाप्तो भगवान् स्यान्नस्तन्नामार्था यतोऽखिलाः ।
इत्याहुर्ऋषयः सर्वे ... ...।" |
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| id | "Aitareya-405" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V17" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C03_S02" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "एतद्ध स्म वै तद् विद्वांस आहुर्ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे । किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुहुमः प्राणे वा वाचम् । यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः ।" |
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| id | "Aitareya-406" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V17_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C03_S02" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | ".... किमन्याध्ययनाद् भवेत् ।
यज्ञैर्वेत्यृषयोऽप्यन्ये कावषेया वदन्ति हि ।
मौनेन विष्णुशब्दार्थं ध्यायन्तो वाचमेव वा ।
जुहुमो विष्णुनामाख्यां जपन्तो मन्त्रमेव वा ।
नमस्कारसमायुक्तं जुहुमः प्राणमत्र हि ।
किमन्यैर्बहुभिः कार्यैरेतस्यैवाधिकत्वतः ।
एतदर्थानुसन्धानपूर्वं वेदान् अथापि वा ।
अधीमहे यजामो वा नान्यथा तु कथञ्चन ।
एष एव हि सर्वेषां वेदानामर्थ ईरितः ।
विष्णुनामोदितो योऽर्थस्तद्व्याख्याऽन्यद् वचोऽखिलम् ॥
एवं विशिष्टप्राणात्मबलाद्यखिलसद्गुणैः ।
पूर्णस्वभावः सर्वेषां वचसामर्थ ईरितः ॥" |
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| id | "Aitareya-407" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V18" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C03_S02" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| text | "ता एताः संहिता नानन्तेवासिने प्रब्रूयात् , नासंवत्सवासिने, नाप्रवक्त्रे इत्याचार्या आचार्याः ॥ ६ ॥" |
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| id | "Aitareya-408" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C03_S02" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "‘संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः ।
अन्यविद्यास्वशिष्यस्य न ब्रूयात् प्रथमं क्वचित्।
व्याख्यानशक्तिहीनाय नैव ब्रूयात् कथञ्चन ।
वैष्णवाय सुवृत्ताय (सुव्रताय सुशिक्षिणे ।
शान्ताय सुविशुद्धाय) मेधाश्रद्धायुताय च ।
गुरोः शुश्रूषकायैव ब्रूयादित्यनुशासनम् ॥’ इत्यादि च ।" |
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| id | "Aitareya-409" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B02" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C03_S02" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "यद् वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोऽधीमहे तेनास्माकं ‘ण’शब्द-‘ष’शब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । ‘वि’इत्युपसर्गत्वाद् उकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वाद् उक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक् तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥" |
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