| id | "Bhagavadgitatatparya-1" |
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| oldKey | "BGT_C01_I01" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "समस्तगुणसम्पूर्णं सर्वदोषविवर्जितम् ।
नारायणं नमस्कृत्य गीतातात्पर्यमुच्यते ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-2" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I02" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "शास्त्रेषु भारतं सारं तत्र नामसहस्रकम् ।
वैष्णवं कृष्णगीता च तज्ज्ञानान्मुच्यतेञ्जसा ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-3" |
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| oldKey | "BGT_C01_I03" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "न भारतसमं शास्त्रं कुत एवानयोः समम् ।
भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-4" |
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| oldKey | "BGT_C01_I04" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैर्ऋषिभिश्च समन्वितैः ।
व्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ।
महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-5" |
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| oldKey | "BGT_C01_I05" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
स्वयं नारायणो देवैर्ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वकैः ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-6" |
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| oldKey | "BGT_C01_I06" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अर्थितो व्यासतां प्राप्य केवलं तत्त्वनिर्णयम् ।
चकार पञ्चमं वेदं महाभारतसञ्ज्ञितम् ॥ इति ब्रह्माण्डे ।
तत्र साक्षादिन्द्रावतारमुत्तमाधिकारिणमात्मनः प्रियतमर्जुनं क्षत्रियाणां विशेषतोपि परमधर्मं नारायणद्वितदनुबन्धिनिग्रहं बन्धुस्नेहादधर्मत्वेनाशङ्क्य ततो निवृत्तप्रायं स्वविहितवृत्त्या भक्त्या भगवदाराधनमेव परमो धर्मः, तद्विरुद्धः सर्वोप्यधर्मः, भगवदधीनत्वात् सर्वस्येति बोधयति भगवान् नारायणः । सर्वं चैतदत्रैवावगम्यते -" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-7" |
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| oldKey | "BGT_C01_I07" |
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| type | "introduction" |
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| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "''अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि'' ॥ (२-३३)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-8" |
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| oldKey | "BGT_C01_I08" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इत्यादिना युद्धस्य स्वधर्मत्वम् ।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिदि्धं विन्दति मानवः ॥ (१८-४६)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-9" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I09" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ (१८-४७)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-10" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I10" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।
इष्टोसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-11" |
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| oldKey | "BGT_C01_I11" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-12" |
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| oldKey | "BGT_C01_I12" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (१८-६४-६६)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-13" |
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| oldKey | "BGT_C01_I13" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इत्यादिना स्वधर्मेणैव भगवदाराधनस्यैव कर्तव्यत्वं तदन्यस्य त्याज्यत्वं च ।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-14" |
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| oldKey | "BGT_C01_I14" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ (११-५३, ५४)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-15" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I15" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इत्यादिना विष्णुभक्तेरेव सर्वसाधनोत्तमत्वं परोक्षापरोक्षज्ञानयोर्ज्ञानिनोपि मोक्षस्य तदधीनत्वं च ।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ (११-५५)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-16" |
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| oldKey | "BGT_C01_I16" |
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| type | "introduction" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इत्यादिना भक्तस्यापि तत्कर्म विकर्मत्यागश्च ।
''कुरु कर्मैव तस्मात् त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ।" (४-१५)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-17" |
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| oldKey | "BGT_C01_I17" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इत्यादिना ज्ञानिनोपि भगवत्कर्म ।
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ (११-५२)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-18" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "इष्टोसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् । (१८-६४)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-19" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "दैवीसम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोसि पाण्डव ॥ (१६-५)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-20" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ (९-१३)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-21" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I21" |
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| type | "introduction" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "'दर्शयात्मानमव्ययं''" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-22" |
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|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् । (११-९)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-23" |
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|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इत्यादिनार्जुनस्योत्तमाधिकारित्वमपरोक्षज्ञानित्वं च ।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-24" |
|---|
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| type | "introduction" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-25" |
|---|
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|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
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| text | "बुदि्धर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । (१०, २-४)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-26" |
|---|
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "'महर्षयः सप्त पूर्वे'' ... । (१०-६)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-27" |
|---|
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|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'एतां विभूतिं योगं च'' ... । (१०-७)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-28" |
|---|
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|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ (१०-८)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-29" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I29" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयामि'' (१०-११)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-30" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I30" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्'' । (१२-७)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-31" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I31" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ (५-२९)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-32" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I32" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ (७-२)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-33" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I33" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ।
मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-34" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I34" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । (७-६,७)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-35" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I35" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-36" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I36" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात् ।
'राजविद्या राजगुह्यम्'' ... । (९-१,२)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-37" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I37" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ (९-४)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-38" |
|---|
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "'भूतभृन्न च भूतस्थः'' ... । (९-५)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-39" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I39" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "'न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यः'' (११-४३)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-40" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I40" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । (१४-१)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-41" |
|---|
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-42" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I42" |
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|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत । (१४-३)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-43" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I43" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-44" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I44" |
|---|
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|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च । (१४-२७)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-45" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I45" |
|---|
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|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
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| text | "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-46" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I46" |
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|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-47" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I47" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-48" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I48" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-49" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_I49" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुध्वा बुदि्धमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ (१५, १६-२०)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-50" |
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| oldKey | "BGT_C01_I50" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यम् ... ॥ (३-२२)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-51" |
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| oldKey | "BGT_C01_I51" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "इत्यादिना सर्वस्माद् भगवतो भेदः, सर्वस्य तदधीनत्वं, तस्यानन्याधीनत्वं, सर्वोत्तमत्वं, सर्वगुणपूर्णत्वं, सर्वशास्त्राणां तत्परत्वं, तथा तज्ज्ञानादेव मोक्ष इत्यादि ।
'अधा ते विष्णो विदुषा• चिदर्ध्यः स्तोमो• यज्ञश्च राध्यो• हविष्म•ता'' । (ऋ.मं १, सू. १५६-१)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-52" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "पश्यन्नपीममात्मानं कुर्यात् कर्माविचारयन् ।
यदात्मनः सुनियतमानन्दोत्कर्षमाप्नुयात् ।
भक्त्या प्रसन्नः परमो दद्याज्ज्ञानमनाकुलम् ।
भक्तिं च भूयसीं ताभ्यां प्रसन्नो दर्शनं व्रजेत् ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ततोपि भूयसीं भक्तिं दद्यात्ताभ्यां विमोचयेत्
मुक्तोपि तद्वशो नित्यं भूयो भक्तिसमन्वितः ।
सान्द्रानन्दस्वरूपैव भक्तिर्नैवात्र साधनम्
ब्रह्मरुद्ररमादिभ्योप्युत्तमत्वं स्वतन्त्रताम् ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "सर्वस्य तदधीनत्वं सर्वसद्गुणपूर्णताम् ।
निर्दोषत्वं च विज्ञाय विष्णोस्तत्राखिलाधिकः ॥" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तः सर्वोपायोत्तमोत्तमः ।
तेनैव मोक्षो नान्येन दृष्ट्यादिस्तस्य साधनम् ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "अधमाधिकारिणो मर्त्या मुक्तावृष्यादिकाः समाः ।
अधिकार्युत्तमा देवाः प्राणस्तत्रोत्तमोत्तमः ।
नैव देवपदं प्राप्ता ब्रह्मदर्शनवर्जिताः ।
तिरोहितं तथाप्येते शृण्वन्ति क्रीडयाथवा ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "बहुवारतदभ्यासात्तिरोभावोपि नो भवेत् ।
यथा व्यासानुशिष्टानां देवानां क्षत्रजन्मनाम् ॥" |
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| type | "introduction" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "पार्थानामतिरोधानं ज्ञानं सुस्थिरतां गतम् ।
अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विना विरावत् ॥ (ऋ. ७-४०-५)" |
|---|
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| type | "introduction" |
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।
स मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत्तत एते व्यजायन्त" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-60" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "विश्वो हिरण्यगर्भोग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्रा इति'' ।श्व" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-61" |
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| type | "introduction" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः'' ।
'वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।
'यं यं कामयते विष्णुस्तं ब्रह्माणं च शङ्करम् ।
शक्रं सूर्यं यमं स्कन्दं कुर्यात् कर्तास्य न क्वचित्'' ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-62" |
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| type | "introduction" |
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैव चान्यत्र सत्यम् ।
अवान्तरं तत्परत्वं तदन्यत् सर्वागमानां पुरुषार्थस्ततोतः ॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
'परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति'' । (ऋ. ६-९९-१)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-63" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "'अनन्तगुणमाहात्म्यो निर्दोषो भगवान् हरिः ।
न समो वाधिको वापि विद्यते तस्य कश्चन ।
नासीन्न च भविष्यो वा परतः स्वत एव च'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।
'यस्त्वात्मरतिरेव स्याद्'' इत्यादि तु मुक्तविषयम् ।
यस्त्वेवात्मरतो मुक्तः कार्यं तस्यैव नास्ति हि ।
तस्मात् कुर्वीत कर्माणीत्याह कृष्णोर्जुनं स्मयन् ॥ इति च स्कान्दे ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानाम् इत्यादि तु बाह्यकर्मसङ्कोचापेक्षया ।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । (३-५)" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-64" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः । (३-८)" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | null |
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| text | "एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्'' । (१८-६)" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-66" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "'ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत ।''" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-67" |
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "न सर्वकर्मणां त्यागः कस्यचिद् भवति क्वचित् ।
त्यागिनो यतयोपि स्युः सङ्कोचाद् बाह्यकर्मणाम् । इत्यादि ।
'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः'' इत्यादि चोत्पन्नज्ञानतिरो-भावनिवृत्त्यर्थम् ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-68" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-69" |
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| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-70" |
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|---|
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| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-71" |
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| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-72" |
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| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-73" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-74" |
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| oldKey | "BGT_C01_V07" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-75" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-76" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-77" |
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|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-78" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-79" |
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|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "तस्य सञ्जनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-80" |
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|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोभवत्॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-81" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-82" |
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
प्रौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-83" |
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| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥१६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-84" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥१७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-85" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-86" |
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|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-87" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_V20" |
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| type | "verse" |
|---|
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| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
पृवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥२० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-88" |
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|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-89" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यावदेतान् निरीक्षेहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-90" |
|---|
| oldKey | "BGT_C01_V23" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C01" |
|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "योत्स्यमानानवेक्षेहं य एतेत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥२३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-91" |
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|---|
| chapter | "BGT_C01" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥२४ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-92" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-93" |
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| parent | "BGT_C01" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥२६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-94" |
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| oldKey | "BGT_C01_V27" |
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| parent | "BGT_C01" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान्॥२७ ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥" |
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| chapter | "BGT_C01" |
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| text | "गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥" |
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| text | "निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥३१ ॥" |
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| text | "न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥" |
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| text | "येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥" |
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| text | "एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥" |
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| text | "निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः॥३६ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥" |
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| text | "यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥" |
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| text | "कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥" |
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| text | "कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोभिभवत्युत॥४० ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥४१ ॥" |
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| text | "सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥" |
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| text | "दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३ ॥" |
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| text | "उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥४४ ॥" |
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| text | "अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥४५ ॥" |
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| text | "यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६ ॥" |
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| text | "एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| text | "तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥१ ॥" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-118" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-119" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-120" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम–
स्तेवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-121" |
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| oldKey | "BGT_C02_V07" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वा धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-122" |
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| oldKey | "BGT_C02_V08" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-123" |
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| oldKey | "BGT_C02_V09" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-124" |
|---|
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-125" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-126" |
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| oldKey | "BGT_C02_V11_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "प्रकर्षेण जानन्तीति प्रज्ञाः, तदवादः प्रज्ञावादः । प्राज्ञमतविरुद्धवादं वदसि । कथम् ? गतासून् ॥ ११ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-127" |
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| oldKey | "BGT_C02_V12" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-128" |
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| oldKey | "BGT_C02_V12_B01" |
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|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "बन्धुस्नेहादि्ध त्वया स्वधर्मनिवृत्तिः क्रियते । तत्र देहनाशभयात् किं वा चेतननाशभयात्? देहस्य सर्वथा विनाशित्वान्न तत्र भये प्रयोजनम् । न च चेतननाशभयात् । तस्याविनाशित्वादेव । न तावत्परमचेतनस्य मम नाशोस्ति । एवमेव तवान्येषां च ।
'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान्'' ॥ इत्यादिश्रुतेः ।
<span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">'स्वदेहयोगविगमौ नाम जन्ममृती पुरा ।<br/>इष्येते ह्येव जीवस्य मुक्तेर्न तु हरेः क्वचित्'' ॥</span>
इति स्कान्दे ।
ईश्वरस्यापि युद्धगतत्वान्मोहात् तस्याप्युभयविधानित्यत्वशङ्काप्राप्तौ तदपि निवार्यते न त्वेवाहमिति । यद्यप्येषा शङ्कार्जुनस्य नास्ति । तथापि प्राप्तलोकोपकारार्थं भगवता निवार्यते । एकान्ते कथयन्नपि व्यासरूपेण तदेव लोके प्रकाशयिष्यति हि ॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-129" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "देहिनोस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-130" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V13_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मम स्वकीयदेहान्तरप्राप्तिरपि नास्तीति दर्शयितुं देहिन इति विशेषणम् । भवदादीनां सा भविष्यतीत्यपि शोको न कर्तव्यः । देहस्येदानी- मप्यन्यथात्वदर्शनात् ॥ १३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-131" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-132" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V14_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तददर्शनादिनिमित्तं सोढव्यमित्याह - मात्रास्पर्शा इति । विषयसम्बन्धाः ॥ १४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-133" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-134" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V15_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "फलमाह । यं हीति । न केवलमव्यथामात्रेणामृतत्वं किन्तु पुरुषम् ।
'पुरु ब्रह्म गुणाधिक्यात् तज्ज्ञानात्पुरुषः स्मृतः'' । इति प्रवृत्ते । पुरुसरणात् पुरुष इत्यर्थः ॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-135" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "नासतो विद्यतेभावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-136" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V16_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">न च युद्धात्परलोकदुःखमिति शोकः । असत्कर्मणः सकाशात् भावो नास्ति सत्कर्मणः सकाशात् अभावो नास्तीति नियतत्वात् ।<br/>'सद्भाववाचिनः शब्दाः सर्वे ते सुखवाचकाः ।<br/>अभाववाचिनः शब्दाः सर्वे ते दुःखवाचकाः'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ।
<span class="gr-reference gr-ref-Vakshaya-id">'सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।<br/>प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥''</span>
इति वक्ष्यमाणत्वात् ।
(गीता. १७-२६)
'असन्नेव स भवति, असद्ब्रह्मेति वेद चेत्'' इत्यादेश्च ।
अन्तो निर्णयः । न चाविद्यामानविद्यमानयोरुत्पत्तिनाशनिषेधकोयं श्लोकः । प्रत्यक्षविरोधात् । सन्निति व्यवह्रियमाणमेव पदार्थस्वरूपमुत्पत्तेः प्राङ्ग्नाशोत्तरं च नास्तीति सर्वलोको व्यवहरति । न च विपर्यये किञ्चिन्मानम् । इदं तु वाक्यमन्यथासिद्धम् ।
<span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">'आद्यन्तयोः सर्वकार्यमसदेवेति निश्चितम् ।<br/>यद्यसन्न विशेषोत्र जायते कोत्र जायते ॥<br/>व्यक्तावपि समं ह्येतदनवस्थान्यथा भवेत् ।<br/>एवं नाशेपि बोद्धव्यमतोसन्नेव जायते ॥<br/>तथाप्यभेदानुभवात् कार्यकारणयोः सदा ।<br/>भेदस्य चाविशेषेण देहोगात् क्षितितामिति ॥ व्यवहारो भवेद्यस्माद्बल्येवानुभवः सदा ॥''</span>
इति ब्रह्मतर्के ।
न च सदसद्विलक्षणं किञ्चिदस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न चासतः ख्यात्ययोगात् सतो बाधायोगादुभयविलक्षणं भ्रान्तिविषयम् । असतः ख्यात्ययोगादिति वदतोसतः ख्यातिरभून्न वा ? यदि नाभूत् न तत्ख्यातिनिराकरणम् । यद्यभूत् तथापि । न चासतोसत्वेन भ्रान्तौ सत्वेन च ख्यातिर्नास्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । असद्व्यवहारलोपप्रसङ्गाच्च । यदविद्यमानं रूपं तस्य सत्त्वेन प्रतीतेरेव भ्रान्तित्वाच्च । अनिर्वचनीयत्वपक्षेपि सदिदं रजतमित्यविद्यमानसत्त्वप्रतीतिं विना न हि भ्रान्तित्वम् । भ्रान्तिसत्त्वाङ्गीकारेप्यभ्रान्तं सदिदं रजतमित्यविद्यमानसत्वप्रतीतौ हि प्रवर्तते । तस्मादुभयविलक्षणं न किञ्चित् ।
'विश्वं सत्यम्'' । 'यच्चिकेत सत्यमित्'' । 'कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः'' इत्यादिश्रुतेश्च ॥१६ ॥" |
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| text | "अविनाशि तु तद् विदि्ध येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id">यद्यपि नित्यत्वं जीवस्याप्यस्ति । तथापि सर्वप्रकारेणाविनाशित्वं विष्णोरेवेति तुशब्दः ।<br/>'अनित्यत्वं देहहानिर्दुःखप्राप्तिरपूर्णता ।<br/>नाशश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तदभावो हरेः सदा ।<br/>तदन्येषां तु सर्वेषां नाशाः केचिद् भवन्ति हि'' ॥</span>
इति महावाराहे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Paramashruthi-id">'देशतः कालतश्चैव गुणतश्च त्रिधा ततिः ।<br/>सा समस्ता हरेरेव न ह्यन्ये पूर्णसद्गुणाः'' ॥</span>
इति परमश्रुतिः ॥१७ ॥" |
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| text | "अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोप्रमेयस्य तस्माद् युद्ध्यस्व भारत॥१८ ॥" |
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| text | "शरीरिणां तु देहहान्यादिनाशो विद्यत एव । 'येन सर्वमिदं ततम्'' इति तस्यैव लक्षणकथनात् न जीवानां देशतो गुणतश्च पूर्णता । अनिच्छया देहहान्यादेरेव दुःखावाप्तिः सिद्धा । तस्मादनाशिनोप्रमेयस्य विष्णोः पूजार्थं युद्ध्यस्व । तत्प्रसादाधीनत्वाद् दुःखनिवृत्तेः सुखस्य च ।
'ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
तेषामहं समुद्धर्ता'' (गीता १२-६) इत्यादेः ।
जीवपक्षे 'नित्यस्योक्ताः'' इत्युक्तत्वात् 'अनाशिनः'' इति पुनरुक्तिः । 'अविनाशि, येन सर्वमिदं ततम्'' इत्युक्तस्यैव 'अनाशिनोप्रमेयस्य'' इति प्रत्यभिज्ञानाच्च । 'इमे देहाः'' इति विशेषणान्नित्यश्चिदानन्दात्मकः स्वरूपभूतो देहो मुक्तानामपि विद्यत इति ज्ञायते ।
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">'न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।<br/>न यत्र माया किमुतापरे हरे- रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।<br/>सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि - प्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥ प्रवालवैडूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।<br/>भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥ विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः'' ॥</span>
इति हि भागवते ।
चिदानन्दशरीरेण सर्वे मुक्ता यथा हरिः ।
भुञ्जते कामतो भोगांस्तदन्तर्बहिरेव च ॥ इति परमश्रुतिः । न च जीवेश्वरैक्यं मुक्तावपि ।
'इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च'' । (गीता, १४-२) 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।
सोश्नुते सर्वान्कामान्सह ब्रह्मणा विपश्चिता'' ।
'एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।
इमान् लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन् ।
एतत्सामगायन्नास्ते'' ।
'सर्वे नन्दन्ति यशसागतेन सभासाहेन सख्या सखायः ।
किल्बिषस्पृत्पितुषणिर्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय'' ।
'ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।
ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः'' ।
'परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते'' 'स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा'' ।
'तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति'' ।
'मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्देहं संश्रिता अपि ।
तारतम्येन तिष्ठन्ति गुणैरानन्दपूर्वकैः ।
भूपा मनुष्यगन्धर्वा देवाः पितर एव च ।
आजानेयाः कर्मदेवास्तत्त्व(रूपाः)देवाः पुरन्दरः ।
शिवो विरिञ्चिरित्येते क्रमाच्छतगुणोत्तराः ।
मुक्तावपि तदन्ये ये भूपाच्छतगुणावराः ।
न समो ब्रह्मणः कश्चिन्मुक्तावपि कथञ्चन ।
ततः सहस्रगुणिता श्रीस्ततः परमो हरिः ।
अनन्तगुणितत्वेन तत्समः परमोपि न'' ।
'अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।
आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ।
कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्द्रो परिस्रव ।
इत्यादि मोक्षानन्तरमपि भेदवचनेभ्यः । न च 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्'' ।
'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति'' ।
'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते'' ।
'अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोन्यद्विभक्तं यत्पश्येत्'' ।
'परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'' ।
'तत् त्वमसि'' 'अहं ब्रह्मास्मि'' इत्यादिवाक्यविरोधः ।
'सञ्ज्ञानाशो यदि भवेत्किमुक्त्या नः प्रयोजनम् ।
मोहं मां प्रापयामास भवानत्रेति चोदितः ।
याज्ञवल्क्यः प्रियामाह नाहं मोहं ब्रवीमि ते ।
भूतजज्ञानलोपः स्यान्निजं ज्ञानं न लुप्यते ।
न च ज्ञेयविनाशः स्यादात्मनाशः कुतः पुनः ।
स्वभावतः पराद्विष्णोर्विश्वं भिन्नमपि स्फुटम् ।
अस्वातन्त्र्याद्भिन्नमिव स्थितमेव यदेदृशम् ।
तदा घ्राणादिभोगः स्यात्स्वरूपज्ञानशक्तितः ।
तदात्मानुभवोपि स्यादीश्वरज्ञानमेव च ।
यदान्यं न विजानाति नात्मानं नेश्वरं तथा ।
पुरुषार्थता कुतस्तु स्यात्तदभावाय को यतेत् तस्मात्स्वभावज्ञानेन भिन्ना विष्णुसमीपगाः ।
भुञ्जते सर्वभोगांश्च मुक्तिरेषा न चान्यथा ।
यन्न पश्येत्परो विष्णुर्द्वितीयत्वेन स स्वतः ।
तद्द्वितीयं न भवति प्रादुर्भावात्मकं वपुः ।
प्रधानपुरुषादन्यद्यत्तस्माद्भिन्नमीश्वरः ।
विभक्तत्वेन नियतं यस्मात्पश्यति सर्वदा ।
पश्यन्नेव यतो विष्णुस्तदभेदं न पश्यति ।
चेतनाचेतनस्यास्य नाभेदोस्ति ततोमुना ।
न हि ज्ञानविलोपोस्ति सर्वज्ञस्य परेशितुः ।
ब्रह्माणि जीवाः सर्वेपि परब्रह्माणि मुक्तिगाः प्रकृतिः परमं ब्रह्म परमं महदच्युतः नैव मुक्ता न प्रकृतिः क्वापि हि ब्रह्मवैभवम् ।
प्राप्नुवन्त्यपि तज्ज्ञानान्निजं ब्रह्मत्वमाप्यते ।
>यद्यस्य परमेशि(श)त्वं तदा स्याद्दुःखिता कुतः ।
दुःखी चेत्कुत ईशत्वमनीशो ह्येव दुःखभाक् ।
कुतः सर्वविदोज्ञत्वं क्व भ्रमोप्यज्ञतां विना ।
तस्मान्नैवेश्वरो जीवस्तत्प्रसादात्तु मुच्यते ।
ओयत्वादहंनामा भगवान्हरिरव्ययः ।
ब्रह्मासौ गुणपूर्णत्वादस्म्यसावसनान्मितेः ।
असनादसिनामासौ तेजस्त्वात्त्वमितीरितः ।
सर्वैः क्रियापदैश्चैव सर्वैर्द्रव्यपदैरपि ।
सर्वैर्गुणपदैश्चैव वाच्य एको हरिः स्वयम् ।
युष्मत्पदैः प्रातियोग्यात्तद्युतैश्च क्रियापदैः ।
अस्मत्पदैरान्तरत्वात्क्रियार्थैश्च तदन्वयैः ।
परोक्षत्वात्तत्पदैश्च मुख्यवाच्यः स एव तु ।
सर्वान्वेदानधीत्यैव प्रज्ञाधिक्येन हेतुना श्वेतकेतुरहङ्कारात्प्रायशो नास्मि मानुषः ।
देवो वा केशवांशो वा नैषा प्रज्ञान्यथा भवेत् ।
एवं महत्त्वबुद्ध्यैव दर्पपूर्णोभ्यगात्पितुः ।
सकाशमकृताचारं तं दृष्ट्वा स्तब्धमज्ञवत् ।
पितोवाच कुतः पुत्र स्तब्धता त्वामुपागता ।
प्रायो नारायणं देवं नैव त्वं पृष्टवानसि ।
यस्मिन् ज्ञाते त्वविज्ञातज्ञानादीनां फलं भवेत् ।
प्राधान्यात्सदृशत्वाच्च तदधीनमिति स्फुटम् ।
तत्सृष्टं चेति विज्ञातं फलवदि्ध भवेज्जगत् ।
स्वातन्त्र्येणास्य विज्ञानं मिथ्याज्ञानमनर्थकृत् ।
यथाचैवैकमृत्पिण्डज्ञानादेः सदृशत्वतः ।
मृण्मयं तदकार्यं च ज्ञातं मृदिति वै भवेत् ।
यथैव मृत्तिकेत्यादिनित्यनामप्रवेदनात् ।
वाचारब्धमनित्यं तु ज्ञातं तन्मूलमित्यपि ।
एवं कारणभूतोसौ भगवान्पुरुषोत्तमः ।
प्रधानश्च स्वतन्त्रश्च तन्मूलमखिलं जगत् ।
तदाधारं विमुक्तौ च तदधीनं सदा स्थितम् ।
स सूक्ष्मो व्यापकः पूर्णस्तदीयमखिलं जगत् ।
तस्मात्तदीयस्त्वमसि नैव सोसि कथञ्चन ।
यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्षरसा अपि ।
यथा नद्यः समुद्रश्च यथा वृक्षपरावपि ।
यथा धानाः परश्चैव यथैव लवणोदके ।
यथा पुरुषदेशौ च यथाज्ञज्ञानदावपि ।
यथा स्तेनापहार्यौ च तथा त्वं च परस्तथा ।
भिन्नौ स्वभावतो नित्यं नानयोरेकता क्वचित् ।
एवं भेदोखिलस्यापि स्वतन्त्रात्परमेश्वरात् ।
परतन्त्रं स्वतन्त्रेण कथमैक्यमवाप्नुयात् ।
स जीवनामा भगवान्प्राणधारणहेतुतः ।
उपचारेण जीवाख्या संसारिणि निगद्यते ।
तदधीनमिदं सर्वं नान्याधीनः स ईश्वरः ।
जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा ।
जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ।
जडभेदो मिथश्चेति प्रपञ्चो भेदपञ्चकः ।
विष्णोः प्रज्ञामितं यस्माद्द्वैतं न भ्रान्तिकल्पितम् ।
औतः परमार्थोसौ भगवान्विष्णुरव्ययः ।
परमत्वं स्वतन्त्रत्वं सर्वशक्तित्वमेव च ।
सर्वज्ञत्वं परानन्दः सर्वस्य तदधीनता ।
इत्यादयो गुणा विष्णोर्नैवान्यस्य कथञ्चन ।
अभावः परमद्वैते सन्त्येव ह्यपराणि तु ।
विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।
औतं ज्ञानिनां पक्षे न तस्माद्विद्यते क्वचिद्'' ।
इत्यादिश्रुतिभ्योर्थान्तरस्यैवावगतत्वात् । एकपिण्डनामधेयेतिशब्दानां वैयर्थ्यं चान्यथा । न चैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं तत्पक्षे । न हि शुक्तिज्ञो रजतज्ञ इति व्यवहारः । नवकृत्वोपि भेद एव दृष्टान्तोक्तेश्च । तस्मादतत्त्वमसीत्येवोच्यते । ऐतदात्म्यमित्येतदात्मसम्बन्धि । तत्स्वामिकम् । त्वमपि तदैतदात्म्यमित्येतदात्मसम्बन्धि । तत्स्वामिकम् । त्वमपि तदैतदात्म्यमेवासि न सोसीति वा । तदिति लिङ्गसाम्यं चात्र । अविद्यमानमेवेश्वरं सृष्ट्यादिकं चाप्राप्तमेवात्मनो भिन्नत्वेन प्रापयित्वा तन्निषेधे कथं श्रुतेरुन्मत्तवाक्यत्वं न स्यात् ? अनुवादोपि 'यदिदं वदन्ति तन्न युज्यते'' इत्यादिवाक्यं परिहारे विशेषयुक्तिं च विना न दृष्टः । अतिप्रसङ्गश्चान्यथा । अभेदानुवादेन भेदोपदेशः किमिति न स्यात् ? सर्वशाखान्ते भेदोक्तेश्चैतदेव युक्तम् ।
'नासंवत्सरवासिने प्रब्रूयात् नाप्रवक्त्र इत्याचार्या आचार्याः'' ।
'अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्'' ।
'अनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति इति ब्रह्मविदो विदुः'' ।
'नमो विष्णवे महते करोमि'' । 'पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्'' ।
इत्यादि । न चेश्वरस्तद्भेदो वा प्रत्यक्षादिसिद्धः । तत्पक्षे त्वैक्यादेरपि मिथ्यात्वात्स्वरूपस्य च सिद्धत्वाद्व्यर्थैव श्रुतिः । लक्षितस्वरूपस्यापि न स्वरूपाद्विशेषः । निर्विशेषत्वोक्तेः । मिथ्याविशेषोक्तौ चाप्रामाण्यं श्रुतेः । मिथ्यात्वं च मिथ्यैव तेषाम् । अतः सत्यत्वं सत्यं स्यात् । उपाधिकृतभेदेप्युपाधेर्मिथ्यात्वे त्वप्राप्तमेवोपाधिभेदं प्रापयित्वा पुनर्निषिद्ध्यत इति स एव दोषः । सत्योपाधिपक्षेपि हस्तपादाद्युपाधिभेदेपि भोक्तुरेकत्वदृष्टेरेकेनैवेश्वरेण सर्वोपाधिगतं सुखं दुःखं भुज्यतेत्येवमादयो दोषाः समा एव । अचेतनानामनुभवाभावान्न तत्साम्यम् । अतो जीवेश्वरयोर्भेद एवेति सिद्धम् ॥ १८ ॥" |
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| text | "य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥" |
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| text | "य एनं जीवं वेत्ति हन्तारं स्वातन्त्र्येण । अन्यथा 'मया हतांस्त्वं जहि'' इत्यादिविरोधः । चेतनं प्रति य एनमिति परमात्मनोपि समम् ॥ १९ ॥" |
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| text | "न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ २० ॥" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Mahavishnu-id">जीवेश्वरयोर्नित्यत्वे मन्त्रवर्णोप्यस्तीत्याह । न जायते म्रियत इति । अयं ना परमपुरुषो भूत्वा विद्यमान एव देहसम्बन्धरूपेणापि भविता न । मरणं तु देहवियोग इति प्रसिद्धमेव । न हि घटादीनां मरणव्यवहारः । स्वरूपानाशः कैमुत्येनैव सिद्धः । अयं जीवोप्यजो नित्यश्च । अन्यथा पुनरुक्तेः । शाश्वतश्च । न कदाचिदस्वातन्त्र्यादिकं जीवस्वरूपं जहाति ।<br/>'अल्पशक्तिरसार्वज्ञं पारतन्त्र्यमपूर्णता ।<br/>उपजीवकत्वं जीवत्वमीशत्वं तद्विपर्ययः ।<br/>स्वाभाविकं तयोरेतन्नान्यथा स्यात्कथञ्चन ।<br/>वदन्ति शाश्वतावेतावत एव महाजनाः'' ॥</span>
इति महाविष्णुपुराणे ।
पुराण्यणति गच्छतीति पुराणः ॥२० ॥" |
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| text | "वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥२१ ॥" |
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| text | "अविनाशिनं शरीरापायादिवर्जितम् । नित्यं स्वरूपतः । एनं परमेश्वरम् ।
'कर्तृत्वं तु स्वतन्त्रत्वं तदेकस्य हरेर्भवेत् ।
तच्चाव्ययं तस्य जानन् कथं कर्ता स्वयं भवेत्'' ॥ इति परमश्रुतिः ।
अन्यथाविनाशिनं नित्यमिति पुनरुक्तिः ॥२१ ॥" |
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| text | "वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोपराणि
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ २२ ॥" |
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| text | "जीवस्यापि शरीरसंयोगवियोगावेव जनिमृती यतस्ततो न दुःखकारणमित्याह । वासांसीति ॥ २२ ॥" |
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| text | "'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥२३ ॥" |
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| text | "कारणतोपि नेश्वरस्यान्यथात्वमित्याह - नैनं छिन्दन्तीति ॥२३॥" |
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| text | "अच्छेद्योयमदाह्योयमक्लेद्योशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतस्थाणुरचलोयं सनातनः॥२४ ॥" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Mahavishnu-id">अच्छेद्यत्वादिकं जीवस्यापि तत्सममित्याह - अच्छेद्योयमिति । नित्यं सर्वगते स्थितः अणुश्चायमिति सर्वगतस्थाणुः । सर्वगतो विष्णुस्तदधीनत्वादिकं तत्स्थत्वम् । हेतुतोपि तत्स्थत्वान्न चलतीत्यचलः । नादेन शब्देन सह वर्तत इति सनादन एव सनातनः ।<br/>'नित्यं सर्वगते विष्णावणुर्जीवो व्यवस्थितः ।<br/>न चास्य तदधीनत्वं हेतुतोपि विचाल्यते ।<br/>निषेधविधिपात्रत्वात्सनातन इति स्मृऽतः'' ॥</span>
इति महाविष्णुपुराणे ।
अच्छेद्योयमित्यादिपुनरुक्तिश्चान्यथा । यस्मिन्नयं स्थितः सोव्यक्ताचिन्त्यादिरूपः । एवं ज्ञातः परमेश्वरः सर्वदुःखनाशं करोतीति नानुशोचितुमर्हसि । 'तेषामहं समुद्धर्ता'' इत्यादेः ।
'न त्वेवाहं जातु नासं न त्वम्'' इत्युभयोरपि प्रस्तुतत्वात् । देहिनः शरीरिणः देहीति विशेषितत्वाच्च जीवस्य तत्र तत्र ।
'अविनाशि तु ।'' 'येन सर्वमिदं ततम् ।'' 'अनाशिनोप्रमेयस्य ।'' 'न म्रियते ।'' 'भूत्वा भविता न ।'' 'अविनाशिनम् ।'' 'अव्ययम् ।'' 'अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयम्'' । इत्यादि परमात्मनश्च । न हि जीवेन ततं सर्वम् । न च मुख्यतोप्रमेयोसौ । न च न म्रियते । न चाविनाशिनं नित्यमिति नित्यत्वातिरिक्तमविनाशित्वं तस्य । न चाव्यक्तत्वमविकार्यत्वं च मुख्यम् । न च भूत्वा भविता वा नेति देहस्याप्यनुत्पत्तिः । परमात्मनस्तु देहवियोगादिकमपि नास्तीत्यविनाशि त्वित्यादिविशेषणम् । यस्मादेवं भूतस्तस्मात्स एव स्वतन्त्रः । तदधीनमन्यत्सर्वम् । अतः स एव सर्वपुरुषार्थदः । अतस्तत्पूजा सत्कर्मैव । अतस्तदर्थं युध्यस्व । अन्येषां त्वन्तवन्त एव देहाः । प्राकृतदेहिनश्च । अतोस्वतन्त्रत्वान्न हन्तुं तेषां सामर्थ्यम् । नित्यत्वान्न हन्यते च । तस्माद्धन्ता हत इति मन्यमानौ न विजानीतः । यस्मादयमेव परमेश्वरः शरीरवियोगरूपेणापि न म्रियते तत्संयोगरूपेणापि न जायते जीववत्कदापि । अतः स एव स्वतन्त्रत्वात्सर्वस्य हन्ता । जीवस्तु तेन शरीरे हन्यमाने स्वयं न हन्यत इत्येतावत् । अत एवमविनाशित्वादेः स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तारं परमात्मानं यो वेद स कथं घातयति हन्ति वा ? वाससो जरावत्स्वशरीरजरादावस्वातन्त्र्यदर्शनात्सर्वत्रास्वातन्त्र्यं ज्ञातव्यं जीवस्य । ईश्वरस्य तु देहस्यापि च्छेदादेरभावात्स्वातन्त्र्यम् । नैनं छिन्दन्तीति च्छेदनाद्यभावः साक्षादेव दर्शयितुं शक्यते स्वदेहस्येति वर्तमानापदेशः । छेदनादिकं त्वीश्वरो मोहाय मृषैव दर्शयति ॥ २४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-153" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-154" |
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| oldKey | "BGT_C02_V25_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Painishruthi-id">सर्वगतश्चेत्परमात्मा किमिति तथा न दृश्यत इत्यतो वक्ति - अव्यक्तोयमिति । कथमेतद्युज्यते ? अचिन्त्यशक्तित्वात् । न च सा शक्तिः कदाचिदन्यथा भवति । अविकार्यत्वात् । यानि यान्यस्य रूपाणि तानि सर्वाण्यप्येवं भूतानीति दर्शयितुमेनमयमित्यादिपृथग्वचनम् । जीवे तु सर्वजीवेष्वनुगमार्थम् । सर्वं चैतत् श्रुतिसिद्धम् ।<br/>'सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।<br/>ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोक्षरः'' ।</span>
इति पैङ्गिश्रुतिः ।
'ओहो देहवांश्चैकः प्रोच्यते परमेश्वरः ।
अप्राकृतशरीरत्वाददेह इति कथ्यते ।
शिरश्चरणबाह्वादिविग्रहोयं स्वयं हरिः ।
स्वस्मान्नान्यो विग्रहोस्य ततश्चादेह उच्यते ।
स्वयं स्वरूपवान्यस्माद्देहवांश्चोच्यते ततः ।
शिरश्चरणबाह्वादिः सुखज्ञानादिरूपकः ।
स च विष्णोर्न चान्योस्ति यस्मात्सोचिन्त्यशक्तिमान् ।
देहयोगवियोगादिस्ततो नास्य कथञ्चन ।
गुणरूपोपि भगवान् गुणभुक्च सदा श्रुतः ।
अहमित्यात्मभोगो यत्सर्वेषामनुभूयते ।
अभिन्नेपि विशेषोयं सदानुभवगोचरः ।
विशेषोपि हि नान्योतः स च स्वस्यापि युज्यते ।
नानवस्था ततः क्वापि परमैश्वर्यतो हरेः ।
युक्तायुक्तत्वमपि हि यदधीनं सदेष्यते ।
प्रमाणावगते तत्र कुत एव ह्ययुक्तता'' ॥ इत्यादिपरमश्रुतिः ।
'गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का ।
चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः'' ॥ इत्यादि च ऋग्वेदे सौपर्णशाखायाम् ।
<span class="gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id">'एकमेवाद्वितीयं'' 'नेह नानास्ति किञ्चिन'' ।<br/>'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति'' ।<br/>'यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।<br/>एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति'' ।<br/>'मत्स्यकूर्मादिरूपाणां गुणानां कर्मणामपि ।<br/>तथैवावयवानां च भेदं पश्यति यः क्वचित् ।<br/>भेदाभेदौ च यः पश्येत्स याति तम एव तु ।<br/>पश्येदभेदमेवैषां बुभूषुः पुरुषस्ततः ।<br/>अभेदेपि विशेषोस्ति व्यवहारस्ततो भवेत् ।<br/>विशेषिणां विशेषस्य तथा भेदविशेषयोः ।<br/>विशेषस्तु स एवायं नानवस्था ततः क्वचित् ।<br/>प्रादुर्भावादिरूपेषु मूलरूपेषु सर्वशः ।<br/>न विशेषोस्ति सामर्थ्ये गुणेष्वपि कदाचन ।<br/>मत्स्यकूर्मवराहाश्च नृसिंहवटुभार्गवाः ।<br/>राघवः कृष्णबुद्धौ च कल्किव्यासैतरेयकाः ।<br/>दत्तो धन्वन्तरिर्यज्ञः कपिलो हंसतापसौ ।<br/>शिंशुमारो हयास्यश्च हरिः कृष्णश्च धर्मजः ।<br/>नारायणस्तथेत्याद्याः साक्षान्नारायणः स्वयम् ।<br/>ब्रह्मरुद्रौ शेषविपौ शक्राद्या नारदस्तथा ।<br/>सनत्कुमारः कामभवोप्यनिरुद्धो विनायकः ।<br/>सुदर्शनाद्यायुधानि पृथ्वाद्याश्चक्रवर्तिनः ।<br/>इत्याद्या विष्णुनाविष्टा भिन्नाः संसारिणो हरेः ।<br/>तेष्वेव लक्ष्मणाद्येषु त्रिष्वेवं च बलादिषु ।<br/>नरार्जुनादिषु तथा पुनरावेश उच्यते ।<br/>स्वल्पस्तु पुनरावेशो धर्मपुत्रादिषु प्रभोः ।<br/>एतज्जानाति यस्तस्मिन्प्रीतिरभ्यधिका हरेः ।<br/>सङ्करज्ञानिनस्तत्र पातस्तमसि च ध्रुवम्'' ॥</span>
इत्यादि महावराहे ॥२५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-155" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">तिष्ठतु तावदयं विस्तारः । यावन्मोक्षं जीवस्य जन्ममरणे स्वयमेव मन्यसे न तु नियमेन । तथापि तावन्मात्रेणापि ज्ञानेन शोचितुं नार्हसि ।<br/>'नित्यं सनातनं प्रोक्तं नित्यं नियतमेव च'' । इति</span>
शब्दनिर्णये ।
अत्र तु नियतम् । 'जातस्य हि ध्रुवः'' इति प्रकाशनात् ॥२६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-157" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥" |
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| text | "तस्मान्नात्राश्चर्यबुदि्धः कर्तव्या ॥ २७-२८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-160" |
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| text | "आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद नचैव कश्चित्॥ २९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-161" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "किं तर्ह्याश्चर्यो भगवानेवेत्याह । आश्चर्यवदिति । आश्चर्यमेव सन्तमेनमाश्चर्यवत्पश्यति न पुनरनाश्चर्यम् ।
'गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः'' । इत्यादिवत् ।
<span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">'आश्चर्यो भगवान्विष्णुर्यस्मान्नैतादृशः क्वचित् ।<br/>तस्मात्तद्गोचरं ज्ञानं तद्गोचरवदेव तु'' ॥</span>
इति ब्रह्मतर्के ।
अनाश्चर्यवदप्यसुरादयः पश्यन्तीति कश्चिदिति विशेषणम् ॥२९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-162" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "देही नित्यमवध्योयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥३० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-163" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">देही कुतोवध्यः ? यस्मादयमीश्वरः सर्वस्य जीवस्य सूक्ष्मे स्थूले च देहे रक्षकत्वेनावस्थितः अत एवावध्यः । न स्वसामर्थ्यं कस्यापि ।<br/>'द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।<br/>यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया'' ॥</span>
इति हि भागवते ।
<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">'तत्र तत्र स्थितो विष्णुर्नित्यं रक्षति नित्यदा ।<br/>अनित्यदैवानित्यं च नित्यानित्ये ततस्ततः ।<br/>भावाभावनियन्ता हि तदेकः पुरुषोत्तमः'' ॥</span>
इति पाद्मे ॥३० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-164" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्यादि्ध युद्धाच्छ्रेयोन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-165" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-166" |
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| oldKey | "BGT_C02_V33" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥३३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-167" |
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| oldKey | "BGT_C02_V34" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥३४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-168" |
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| oldKey | "BGT_C02_V35" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-169" |
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| oldKey | "BGT_C02_V36" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥३६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-170" |
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| oldKey | "BGT_C02_V37" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-171" |
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| oldKey | "BGT_C02_V37_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">जित्वा स्वर्गं महीं च ।<br/>'ये युद्ध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनुत्यजः''</span>
इति श्रुतेः ॥३७-३८॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-172" |
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| oldKey | "BGT_C02_V38" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥३८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-173" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एषा तेभिहिता साङ्ख्ये बुदि्धर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-174" |
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| oldKey | "BGT_C02_V39_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">सम्यक् ख्यातिर्ज्ञानं साङ्ख्यम् । युज्यतेनेनेति योगस्तदुपायः ।<br/>'सम्यक्तत्वदृशिः साङ्ख्यं योगस्तत्साधनं स्मृऽतम्'' ।</span>
इति शब्दनिर्णये ।
'ब्रह्मतर्कस्तर्कशास्त्रं विष्णुना यत्समीरितम् ।
अक्षपादकणादौ च साङ्ख्ययोगौ च हैतुकाः ।
बौद्धपाशुपताद्यास्तु पाषण्डा इति कीर्तिताः ।
मीमांसा त्रिविधा प्रोक्ता ब्राह्मी दैवी च कार्मिकी ।
ब्रह्मतर्कं च मीमांसां सेवेत ज्ञानसिद्धये ।
वैदिकज्ञानवैरूप्यान्नान्यत्सेवेत पण्डितः'' ॥ इत्यन्यसाङ्ख्ययोगयोर्निषिद्धत्वान्नारदीये । साङ्ख्यस्य निरीश्वरत्वादुक्तत्वाच्चेश्वरस्य । साङ्ख्यैर्योगैश्च विहितहिंसाया अप्यनर्थहेतुत्वाङ्गीकारात् । अत्र तु युद्धविधानाच्च मोक्षार्थत्वेनैव कर्मबन्धं प्रहास्यसीति । परमसाङ्ख्ययोगयोश्चोक्तार्थत्वेनैव न विरोधः ॥३९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-175" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-176" |
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| oldKey | "BGT_C02_V40_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">'प्रारम्भमात्रमिच्छा वा विष्णुधर्मे न निष्फला ।<br/>न चान्यधर्माकरणाद्दोषवान्विष्णुधर्मकृत्'' ॥ इत्याग्नेये ।<br/>'स्वोचितेनैव धर्मेण विष्णुपूजामृते क्वचित् ।<br/>नाप्रवृत्तिः प्रवृत्तिर्वा यत्र धर्मः स वैष्णवः ।<br/>एनं धर्मं च देवाद्या वर्तन्ते सात्त्विका जनाः ।<br/>एष कार्तयुगो धर्मः पाञ्चरात्रश्च वैदिकः ।<br/>तत्प्रीत्यर्थं विनान्यस्मै नोदबिन्दुं न तण्डुलम् ।<br/>दद्यान्निराशीश्च सदा भवेद्भक्तश्च केशवे ।<br/>नैतत्समेधिके वापि कुर्याच्छङ्कामपि क्वचित् ।<br/>जानीयात्तदधीनं च सर्वं तत्तत्त्ववित्सदा ।<br/>यथाक्रमं तु देवानां तारतम्यविदेव च ।<br/>एष भागवतो मुख्यस्त्रेतादिषु विशेषतः ।<br/>एष धर्मोतिफलदो विशेषेण पुनः कलौ ।<br/>एवं भागवतो यस्तु स एव हि विमुच्यते ।<br/>त्रैविद्यस्त्वपरो धर्मो नानादैवतपूजनम् ।<br/>तत्रापि विष्णुर्ज्ञातव्यः सर्वेभ्योभ्यधिको गुणैः ।<br/>समर्पयति यज्ञाद्यमन्ततस्त्वेव विष्णवे ।<br/>त्रैविद्यधर्मा पुरुषः स्वर्गं भुक्त्वा निवर्तते ।<br/>पुनः कुर्यात्पुनः स्वर्गं याति यावद्धरेर्वशे ।<br/>सर्वान्देवान्प्रविज्ञाय तत्कर्मैव सदा भवेत् ।<br/>सम्यक्तत्वापरिज्ञानादन्यकर्मकृतेरपि ।<br/>स्वर्गादिप्रार्थनाच्चैव रागादेश्चापरिक्षयात् ।<br/>सदा विष्णोरस्मरणात् त्रैविद्यो नाप्नुयात्परम् ।<br/>क्रमेण मुच्यते विष्णौ कर्माण्यन्ते समर्पयन् ।<br/>यदि सर्वाणि नियमाज्जन्मभिर्बहुभिः शुभैः ।<br/>परं विष्णुं न यो वेत्ति कुर्वाणोपि त्रयीक्रियाः ।<br/>नासौ त्रैविद्य इत्युक्तो वेदवादी स उच्यते ।<br/>वादो विवादः सम्प्रोक्तो वादो वचनमेव च ।<br/>वेदोक्ते विष्णुमाहात्म्ये विवादात्पठनादपि ।<br/>अथवा निरर्थकात्पाठाद्वेदवादी स उच्यते ।<br/>वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी ।<br/>तेभ्यो याति तमो घोरमन्धं यस्मान्न चोत्थितिः ।<br/>अनारम्भमनन्तञ्च नित्यदुःखं सुखोज्झितम् ।<br/>वव्रं यद्वेदगदितं तत्र यान्त्यसुरादयः'' ॥</span>
इति ब्रह्मवैवर्ते ॥४० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-177" |
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| oldKey | "BGT_C02_V41" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "व्यवसायात्मिका बुदि्धरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोव्यवसायिनाम्॥४१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-178" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V41_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">'बुदि्धर्निर्णीततत्त्वानामेका विष्णुपरायणा ।<br/>बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोव्यवसायिनाम्'' ॥</span>
इति ब्रह्मवैवर्ते ॥४१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-179" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V42" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-180" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V43" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥४३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-181" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V44" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुदि्धः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-182" |
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| oldKey | "BGT_C02_V44_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अव्यवसायबुदि्धः केषाम् ? यां वाचमविपश्चितः प्रवदन्ति । तयापहृतचेतसाम् । बुदि्धर्व्यवसायात्मकत्वेन समाधानेन वर्तते ।
'यथावस्तु यथा ज्ञानं तत्साम्यात्सममीरितम् ।
विषमं त्वन्यथाज्ञानं समाधानं समस्थितिः ।
न तद्भवत्यसद्वाक्यैर्विषमीकृतचेतसाम् ।
स्वर्गादिपुष्पवाद्येव वचनं यदचेतसाम् ।
न मन्यन्ते फलं मोक्षं विष्णुसामीप्यरूपकम् ।
फलदं च न मन्यन्ते तं विष्णुं जगतः पतिम् ।
भोगैश्वर्यानुगत्यर्थं क्रियाबाहुल्यसन्तताम् ।
बहुसंसारफलदामन्ते तमसि पातिनीम् ।
यां वदन्ति दुरात्मानो वेदवाक्यविवादिनः ।
तया सम्मोहितधियां कथं तत्त्वज्ञता भवेत्'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Atharvana-id">'इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।<br/>नाकस्य पृष्ठे सुकृते तेनुभूत्वा इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति'' ॥</span>
इति च आथर्वणश्रुतिः ।
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">'वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी'' ॥</span>
इति हि भागवते ।
<span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">'ये न जानन्ति तं विष्णुं याथातथ्येन संशयात् ।<br/>जिज्ञासवश्च नितरां श्रद्धावन्तः सुसाधवः ।<br/>निर्णेतॄणामभावेन केवलं ज्ञानवर्जिताः ।<br/>यैर्निश्चितं परत्वं तु विष्णोः प्रायो न यातनाम् ।<br/>ब्रह्महत्यादिभिरपि यान्त्याधिक्ये चिरं न तु ।<br/>ये तु भागवताचार्यैः सम्यग्यज्ञादि कुर्वते ।<br/>बहिर्मुखा भगवतो निवृत्ताश्च विकर्मणः ।<br/>दक्षिणातर्पितानां तु ह्याचार्याणां तु तेजसा ।<br/>यान्ति स्वर्गं ततः क्षिप्रं तमोन्धं प्राप्नुवन्ति च ।<br/>तदन्ये नैव च स्वर्गं यान्ति विष्णुबहिर्मुखाः''॥</span>
इति नारदीये ।
॥ ४२-४४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-183" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V45" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-184" |
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| oldKey | "BGT_C02_V45_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "त्रैगुण्याख्यं विषं यापयन्ति अपगमयन्तीति त्रैगुण्यविषयाः ।
'आश्रित्य वेदांस्तु पुमांस्त्रैगुण्यविषहारिणः ।
निस्त्रैगुण्यो भवेन्नित्यं वासुदेवैकसंश्रयः'' ॥ इति च ।
'सत्त्वं साधुगुणाद्विष्णुरात्मा सन्ततिहेतुतः'' ॥ इति च ।
सन्ततविष्णुस्मरणं नित्यसत्त्वस्थत्वम् । परमात्मा मम स्वामीति ज्ञानमात्मवत्त्वम् । तेनैक्यज्ञानं निवारयति । विरुद्धयोगक्षेमेच्छावर्जितः । अन्यथोत्थानादेरप्ययोगात् ॥४५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-185" |
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| oldKey | "BGT_C02_V46" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-186" |
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| oldKey | "BGT_C02_V46_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'उद्रेकात्पातृराहित्यादनत्वाच्चाखिलस्य च ।
प्रलयेप्युदपानोसौ भगवान् हरिरीश्वरः ।
प्रकृतिर्ह्युदरूपेण सर्वमावृत्य तिष्ठति ।
प्रलयेतो लयं प्राहुः सर्वतः सम्प्लुतोदकम्'' ॥ इति च ।
'यावत्प्रयोजनं विष्णोः सकाशात्साधकस्य च ।
धर्ममोक्षादिकं तावत्सर्ववेदविदो भवेत् ।
वेदार्थनिर्णयो यस्माद्विष्णोर्ज्ञानं प्रकीर्तितम् ।
ज्ञानात्प्रसन्नश्च हरिर्यतोखिलफलप्रदः'' ॥ इति च ।
सर्वतः सम्प्लुतोदकेप्युद्रिक्तः पालकवर्जितः । कालाद्यनश्च यो विष्णुस्तस्माद्यावत्फलं तावत्सर्ववेदेषु विशेषज्ञस्यैव भवतीत्यर्थः । सर्वे हि विष्णोरन्ये प्रलयकाले नोद्रिक्ताः । ये चोद्रिक्ता मुक्ता रमा च तेपि न पालकवर्जिताः, विष्णुपाल्यत्वात् । न च मुक्ताः कालादिचेष्टकाः । नचोद्रिक्तत्वं तेषां तद्वत् । अत उदपानो विष्णुरेव । प्रलये विशेषतोपि ।
'आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ।
तम आसीत्तमसा गू•हमग्रे अप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्'' ।
'आपो वा इदमग्रे सलिलम् आसीत् सलिल एको द्रष्टाद्वैतो भवति'' ॥ इत्यादि श्रुतिभ्यः ॥४६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-187" |
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| oldKey | "BGT_C02_V47" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि॥४७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-188" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V47_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">कर्माधिकारिण एव त्वदादयो जीवाः । फलं तु मदायत्तमिति भावः । मा कर्मफलहेतुर्भूः नेश्वरोहमिति भावं कुरु ।<br/>'एष उ एव शुभाशुभैः कर्मफलैरेनं संयोजयति न स्वयं संयुक्तो भवति यदेनं कर्मफलैः संयोजयति न स्वयं संयुक्तो भवति तस्मादन्य एवासौ भगवान्वेदितव्य''</span>
इति पैङ्गिश्रुतिः ॥४७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-189" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V48" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-190" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V48_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "सङ्गं फलस्नेहम् ॥ ४८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-191" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V49" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "दूरेण ह्यवरं कर्म बुदि्धयोगाद् धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-192" |
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| oldKey | "BGT_C02_V49_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">बुद्धौ जातायामपि विष्णुमेव शरणमन्विच्छ ।<br/>'अज्ञानां ज्ञानिनां चैव मुक्तानां शरणं हरिः ।<br/>तं ये स्वैक्येन मन्यन्ते सर्वभिन्नं गुणोच्छ्रयात् ।<br/>कृपणास्ते तमस्यन्धे निपतन्ति न संशयः ।<br/>न तेषामुत्थितिः क्वापि नित्यातिशयदुःखिनाम् ।<br/>गुणभेदविदां विष्णोर्भेदाभेदविदामपि ।<br/>देहकर्मादिषु तथा प्रादुर्भावादिकेपि वा ।<br/>स्वोद्रिक्तानां तदीयानां निन्दां कुर्वन्ति येपि च ।<br/>सर्वेषामपि चैतेषां गतिरेषा न संशयः'' ॥</span>
इति नारदीये ॥४९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-193" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V50" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "बुदि्धयुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-194" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V50_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यथावद्विष्णुं ज्ञात्वा तदर्थत्वेन कर्मकरणमित्येतत्कर्मकौशलमेव योगः । भगवज्झानमेव बुदि्धः ॥ ५०, ५१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-195" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V51" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कर्मजं बुदि्धयुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-196" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V52" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यदा ते मोहकलिलं बुदि्धर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-197" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V53" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यथा स्थास्यति निश्चला ॥
समाधावचला बुदि्धस्तदा योगमवाप्स्यसि॥ ५३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-198" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V53_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">निर्वेदं नितरां लाभम् ।<br/>'बुदि्धमोहो यदा न स्यादन्यथाज्ञानलक्षणः ।<br/>श्रोतव्यश्रुतसाफल्यं तदा प्राप्नोति मानवः ॥ श्रुतिमार्गं प्रपन्ना तु तदर्थज्ञाननिश्चला ।<br/>समाधानेन तु पुनरापरोक्ष्याच्च निश्चला ॥ विष्णौ प्राप्स्यति तद्योगं मुक्तो भूत्वा तदश्नुते'' ॥</span>
इति च पैङ्गिश्रुतौ विशेषेण प्रतिपन्ना ॥ ५२, ५३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-199" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V54" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥५४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-200" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V54_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "का भाषा ? कथं भाष्यते ? कैर्गुणैः ? समाधिस्थस्य विषमबुदि्धवर्जितस्य ॥ ५४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-201" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V55" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-202" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V55_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'सर्वकामनिवृत्तिस्तु जानतो न कथञ्चन ।
अनिषिद्धकामितैवातो ह्यकामित्वमितीर्यते ।
अपरोक्षदृशोपि स्याद्यदा नास्त्यपरोक्षदृक् ।
क्वचिद्विरुद्धकामोपि यथायुद्ध्यद्धरो हरिम् ।
अतोनभिभवो यावद्दृशस्तावन्निगद्यते ।
स्थितप्रज्ञस्तथाप्यस्य कादाचित्क्यपि या दृशिः ।
नियमेनैव मोक्षाय भवेद्योग्या भवेद्यदि ।
अयोग्या भक्तिजाता चेत्क्रमान्मुक्त्यै भवेत्तथा'' ॥ इति च ।
आत्मनि विष्णौ, आत्मना विष्णुना । तत्प्रसादादेव तुष्टः ॥५५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-203" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V56" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "दुःखेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-204" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V57" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-205" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V58" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यदा संहरते चायं कूर्मोङ्गानीव सर्वशः ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-206" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V59" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-207" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V59_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "रसो रागः ॥ ५९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-208" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-209" |
|---|
| oldKey | "BGT_C02_V61" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C02" |
|---|
| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येंद्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-210" |
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| oldKey | "BGT_C02_V62" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C02" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते॥६२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-211" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृऽतिविभ्रमः ।
स्मृऽतिभ्रंशाद् बुदि्धनाशो बुदि्धनाशाद् प्र(वि)नश्यति ॥६३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-212" |
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| oldKey | "BGT_C02_V63_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| text | "संमोहान्मिथ्याज्ञानात् । ज्ञातमप्यन्यथा स्मर्यते । वाक्यार्थानामन्यथा स्मरणान्निर्णीतं ज्ञानमपि नश्यति ॥ ६२,६३ ॥" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिंद्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-214" |
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| oldKey | "BGT_C02_V64_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "शान्तिर्भगवन्निष्ठा । 'शमो मन्निष्ठता'' इति हि भागवते ॥६४-६६॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-215" |
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| oldKey | "BGT_C02_V65" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुदि्धः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-216" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नास्ति बुदि्धरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-217" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">'देवेभ्योन्ये यदा ब्रह्म पश्यन्त्यन्यन्न दृश्यते ।<br/>निशायामिव सुव्यक्तं यथान्यैर्ब्रह्म नेयते ।<br/>आश्चर्यवस्तुदृग्यद्वद्व्यक्तमन्यन्न पश्यति ।<br/>ऐकाग्र्याद्वा सुखोद्रोकाद्देवाः सूर्यवदेव च ।<br/>प्रायशः सर्ववेत्तारस्तत्रापि ह्युत्तरोत्तरम्'' ॥</span>
इति ब्रह्मतर्के ॥६९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-221" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "'भुञ्जानोपि हि यः कामान् मर्यादां न तरेत्क्वचित् ।
समुद्रवद्धर्ममयीं नासौ कामी स उच्यते ।
केति कुत्सितवाची स्यात्कुत्सितं मानमेव तु ।
कामो मोक्षविरोधी स्यान्न सर्वेच्छाविरोधिनी'' ॥ इति च ।
न च सर्वेच्छाभावे जीवनं भवति । 'शान्तिर्मोक्षो यतो ह्यत्र विष्णुनिष्ठा भवेद्ध्रुवा'' इति च ॥७० ॥" |
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "निषिद्धस्पृहाभावमात्रेण सर्वविषयान् विहाय ।
'अस्वरूपे स्वरूपत्वमतिरेव ह्यहङ्कृतिः ।
त्याज्या सर्वत्र ममता ज्ञात्वा सर्वं हरेर्वशे'' ॥ इति च ॥७१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-225" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति॥७२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-226" |
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| parent | "BGT_C02" |
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| chapter | "BGT_C02" |
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| verseType | null |
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| text | "ब्राह्मी ब्रह्मविषया । ज्ञानिनामप्यन्तकालेन्यमनसां प्रारब्धकर्मभावाज्जन्मान्तरम् । प्रारब्धकर्मनाशकाले नियमेन भगवत्स्मृऽतिर्भवति । ततो मोक्षश्च । 'यं यं वापि स्मरन् भावम्'' इति हि वक्ष्यति । बाणं शरीरम् ।
'अभावाज्जडदेहस्य विष्णुर्निर्बाण उच्यते ।
भिन्नदेहाभावतो वा स सहस्रशिरा अपि'' ॥ इति च ॥७२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-227" |
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| oldKey | "BGT_C03_I01" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | null |
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| text | "आत्मस्वरूपं ज्ञानसाधनं चोक्तं पूर्वत्र ।
ज्ञानसाधनत्वेनाकर्म विनिन्द्य कर्म विधीयत उत्तराध्याये-" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-228" |
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| oldKey | "BGT_C03_V01" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुदि्धर्जनार्दन ।
तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-229" |
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| oldKey | "BGT_C03_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुदि्धं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोहमाप्नुयाम्॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-230" |
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| oldKey | "BGT_C03_V02_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "ज्ञानं योगश्चोक्तौ । तत्र कर्मयोगं विशेषतः प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन । 'दूरेण ह्यवरं कर्म'' इति प्रश्नबीजम् ॥ १,२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-231" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "श्रीभगवानुवाच" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-232" |
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| oldKey | "BGT_C03_V03_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">ज्ञानप्रचुरो योगो ज्ञानयोगः । कर्मप्रचुरोन्यः ।<br/>'साङ्ख्या ज्ञानप्रधानत्वाद् देवाश्च यतयस्तथा ।<br/>मुख्यसाङ्ख्यास्तत्र देवा ज्ञानमेषां महद् यतः ।<br/>बहुकर्मकृतोप्येते ततोपि बहुवेदनात् ।<br/>मुख्यसाङ्ख्या इति ज्ञेयास्तदन्ये कर्मयोगिनः ।<br/>ज्ञानिनोप्यतिबाहुल्यात् कर्मणः कर्मयोगिनः ।<br/>नोभयं तद् विना कश्चित् पुमान् हि पुरुषार्थभाक् ।<br/>न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।<br/>न च ज्ञानं विना कर्म पुरुषार्थकरं भवेत्'' ॥</span>
इति ब्रह्मवैवर्ते ।
निष्ठा पर्यवसितिर्मुक्तिः ।
<span class="gr-reference gr-ref-Paramashruthi-id">'ज्ञानिनो मोक्षनियमस्तथापि शुभकर्मणा ।<br/>आनन्दवृदि्धरन्येन ह्रासो ज्ञानं तु कर्मणा'' ॥</span>
इति परमश्रुतेः ।
'न कर्मणा न प्रजया धनेन'' इत्यादिविरोधो न । अन्यथा 'न कर्मणामनारम्भात्'' इत्याद्युभयसमवाक्यशेषविरोधश्च । समत्वं च 'न हि कश्चित्'' इत्यादेः । 'नान्यः पन्थाः'' इत्यपि ज्ञानमृते न मोक्ष इत्येवाह ॥ ३,४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-233" |
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| oldKey | "BGT_C03_V04" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिदि्धं समधिगच्छति॥४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-234" |
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| oldKey | "BGT_C03_V05" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-235" |
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| oldKey | "BGT_C03_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">'कर्तृत्वं द्विविधं प्रोक्तं विकारश्च स्वतन्त्रता ।<br/>विकारः प्रकृतेरेव विष्णोरेव स्वतन्त्रता'' ॥</span>
इति पैङ्गिश्रुतेः ।
'कार्यते ह्यवश'' इत्यत्रावशो विष्णुवशः । 'अः इति ब्रह्म'' इत्यादिश्रुतेः ॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-236" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इंद्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-237" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यस्त्विंद्रियाणि मनसा नियम्यारभतेर्जुन ।
कर्मेंद्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-238" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-239" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यज्ञार्थात् कर्मणोन्यत्र लोकोयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-240" |
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| oldKey | "BGT_C03_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Barkshruthi-id">कर्मणा बध्यते जन्तुरित्यादिकमप्यवैष्णवकर्मविषयमित्याह - यज्ञार्थादिति ।<br/>'ज्ञो नाम भगवान्विष्णुस्तं यात्युद्देश एष यः ।<br/>स यज्ञ इति सम्प्रोक्तो विहिते कर्मणि स्थितः'' ॥</span>
इति बर्कश्रुतिः ॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-241" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक्॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-242" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमावाप्स्यथ॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-243" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-244" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-245" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-246" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कर्म ब्रह्मोद्भवं विदि्ध ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-247" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिंद्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-248" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">जननात् परसस्यादेः पर्जन्यो मेघसन्ततिः ।<br/>स यज्ञात् कर्मणः सोपि समस्तं कर्म केशवात् ॥ स नित्योप्यक्षरततिरूपाद्वाक्यादि्ध गम्यते ।<br/>वाक्यमुच्चार्यते भूतैस्तान्यन्नात्तच्च मेघतः ॥ तस्मात्सर्वगतो विष्णुर्नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितः ।<br/>एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।<br/>स पापो विश्वहन्तृत्वान्नरके मज्जति ध्रुवम् ॥ वाचिको मानसो यज्ञो न्यासिनां तु विशेषतः ।<br/>वनस्थस्याक्रतुर्यज्ञः क्रत्वादिर्ग्रहिणोखिलः ॥ शुश्रूषाद्यात्मको यज्ञो विहितो ब्रह्मचारिणः ।<br/>विद्याभयादिदानं च सर्वेषामपि सम्मतम् ॥ गृहिणो वित्तदानं तु वनस्थस्यान्नपूर्वकम् ।<br/>सर्वैः कार्यं तपो घोरमिति सर्वे त्रिकर्मिणः ॥</span>
इति नारदीये ।
ब्रह्माक्षरशब्दार्थयोर्व्यत्यासे तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म इति प्रत्यभिज्ञाविरोधश्चक्राप्रवेशश्च ॥ १४-१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-249" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-250" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V18" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-251" |
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| oldKey | "BGT_C03_V19" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-252" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V19_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यस्मादमुक्तस्य कार्यमस्त्येव तस्मादसक्तः । असक्त आचरन्नेव यस्मा-त्परमाप्नोति । मुक्तस्यैव कार्यं नास्तीत्येवकारार्थोपि यस्त्विति तुशब्देनावगतः । 'तस्मात् कर्म समाचर'' इत्युपसंहारविरोधश्चान्यथा ।
'ब्रह्मनिष्ठा ब्रह्मरता ब्रह्मज्ञानसुतर्पिताः ।
पाण्डवानां च मुक्तानामन्तरं किञ्चिदेव हि'' ॥ इति भविष्यत्पर्ववचनाच्च नार्जुनस्यामुख्याधिकारिता । आत्मरतिरेव स्यात् इत्येवशब्देन मुक्तानामेभ्यो विशेषो दर्शितः । एषां कदाचिद् दुःखाभासस्यापि भावात् ॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-253" |
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| oldKey | "BGT_C03_V20" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कर्मणैव हि संसिदि्धमास्थिता जनकादयः ।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-254" |
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| oldKey | "BGT_C03_V20_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'सहैव कर्मणा सिदि्धमास्थिता जनकादयः ।
ज्ञाननिष्ठा अपि ततः कार्यं वर्णाश्रमोचितम्'' ॥ इति च ।
अज्ञानां ज्ञानदं कर्म ज्ञानिनां लोकसङ्ग्रहात् ।
अद्धैव तुष्टिदं मह्यं सा मुक्तानन्दपूर्तिदा ॥२० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-255" |
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| oldKey | "BGT_C03_V21" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥२१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-256" |
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| oldKey | "BGT_C03_V22" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-257" |
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| oldKey | "BGT_C03_V22_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Krishnasamhitha-id">'ममैव केवलं नास्ति केनाप्यर्थस्तथाप्यहम् ।<br/>कर्मकृल्लोकरक्षायै तस्मात् कुर्वीत मत्परः'' ॥</span>
इति कृष्णसंहितायाम् ।
<span class="gr-reference gr-ref-Barkshruthi-id">'रक्षया वाथ सृष्ट्या वा संहृत्यादेर्न तु क्वचित् ।<br/>अर्थो विष्णोस्तथाप्येष स्वभावात्सर्वकर्मकृत् ।<br/>मत्तो नृत्तादिकं यद्वत्कुर्यात्सुखविशेषतः ।<br/>परमानन्दरूपत्वात् कुर्याद्विष्णुस्तथैव तु'' ॥</span>
इति बर्कश्रुतिः ॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-258" |
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| oldKey | "BGT_C03_V23" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-259" |
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| oldKey | "BGT_C03_V24" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥२४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-260" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥२५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-261" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "न बुदि्धभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥२६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-262" |
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| oldKey | "BGT_C03_V27" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-263" |
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| oldKey | "BGT_C03_V28" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-264" |
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| oldKey | "BGT_C03_V29" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
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| chapter | "BGT_C03" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-265" |
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| oldKey | "BGT_C03_V30" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युद्ध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-266" |
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| oldKey | "BGT_C03_V31" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोनसूयन्तो मुच्यन्ते तेपि कर्मभिः॥३१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-267" |
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| oldKey | "BGT_C03_V32" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विदि्ध नष्टानचेतसः॥३२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-268" |
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| oldKey | "BGT_C03_V33" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-269" |
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| oldKey | "BGT_C03_V34" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ॥ तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-270" |
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| oldKey | "BGT_C03_V35" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-271" |
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| oldKey | "BGT_C03_V35_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'नाहं कर्ता हरिः कर्ता तत्पूजा कर्म चाखिलम् ।<br/>तथापि मत्कृता पूजा तत्प्रसादेन नान्यथा ।<br/>तद्भक्तिस्तत्फलं मह्यं तत्प्रसादः पुनः पुनः ।<br/>कर्मन्यासो हरावेवं विष्णोस्तृप्तिकरः सदा ।<br/>यस्मात्स्वतन्त्रकर्तृत्वं विष्णोरेव न चान्यगम् ।<br/>तदधीनं स्वतन्त्रत्वं स्वावरापेक्षयैव तु ।<br/>जीवस्य विकृतिर्नाम कर्तृत्वं जडसंश्रयम् ।<br/>पुमान्दोग्धा च गौर्दोग्ध्री स्तनो दोग्धेतिवत्क्रमात्'' ॥ इति ब्रह्मतर्कवचनादीश्वरजीवप्रकृत्यादीनां कर्तृत्वमकर्तृत्वं च विभागेन ज्ञातव्यं सर्वत्र ।<br/>'क्वचित् स्वभावः प्रकृतिः क्वचिच्च त्रिगुणात्मिका ।<br/>क्वचित् प्रकृष्टकर्तृत्वाद् भगवान्प्रकृतिर्हरिः'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ।
<span class="gr-reference gr-ref-Prakashasamhitha-id">'स्वभावतस्त्रिधा जीवा उत्तमाधममध्यमाः ।<br/>उत्तमास्तत्र देवाद्या मर्त्यमध्यास्तु मध्यमाः ।<br/>अधमा असुराद्याश्च नैषामस्त्यन्यथाभवः ।<br/>शरीरमात्रान्यथात्वे स्वजातिं पुनरेष्यति ।<br/>उत्तमा मुक्तियोग्यास्तु सृतियोग्यास्तु मध्यमाः ।<br/>अपरेन्धतमोयोग्याः प्राप्तिः साधनपूर्तितः ।<br/>पूर्त्यभावेन सर्वेषामनादिः संसृतिः स्मृऽता ।<br/>नैव पूर्तिश्च सर्वेषां नित्यकालहरीच्छया ।<br/>अतोनुवर्तते नित्यं संसारोयमनादिमान् ।<br/>अतोधमानां जीवानां मिथ्याज्ञानादयोखिलाः ।<br/>स्वाभाविका गुणा ज्ञेया मध्यमर्त्येषु मिश्रिताः ।<br/>तत्वज्ञानं विष्णुभक्तिरित्याद्या देवतादिषु ।<br/>कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वैस्तैः प्राकृतैर्गुणैः ।<br/>स्वाभाविकगुणानेतान् हेतुं कृत्वैव विष्णुना ।<br/>कर्मसु क्रियमाणेषु कर्ताहमिति मूढधीः ।<br/>मन्यते तत्वविद्विष्णोर्गुणा इच्छादयस्तु ये ।<br/>स्वाभाविकेषु जीवस्य कामाद्येषु सदैव तु ।<br/>प्रेरकत्वेन वर्तन्ते स्वातन्त्र्यं मम न क्वचित् ।<br/>इति मत्वा न सक्तः स्यात्प्रीतोस्य भवति प्रभुः ।<br/>स्वभावगुणसम्मूढा ज्ञानादिगुणवत्तरम् ।<br/>स्वातन्त्र्येणैव कर्तारं चात्मानं प्रतिजानते ।<br/>तान्गुणान् कर्म तच्चैव विष्ण्वधीनं न ते विदुः ।<br/>तेष्वयोग्येषु तत्वज्ञस्तत्त्वं नातिप्रकाशयेत् ।<br/>वदेद्विवादरूपेण नोपदेशात्मना क्वचित् ।<br/>सभ्यरूपेण वा ब्रूयात्पृष्टेव्यक्तिकृदेव वा ।<br/>बुद्ध्वाप्यसौ यतो नित्यं स्वभावानुगचेष्टितः ।<br/>स्वभावं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति'' ॥</span>
इत्यादि प्रकाशसंहितायाम् ॥ २७-३५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-272" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V36" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥३६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-273" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V36_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "परमेश्वराद्देवेभ्यश्चार्वाक्तनप्रेरकं पृच्छति । अथ केनेति ॥ ३६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-274" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V37" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-275" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V38" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥३८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-276" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V39" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-277" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V40" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इंद्रियाणि मनोबुदि्धरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-278" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V41" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-279" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V41_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">'अखिलप्रेरको विष्णुर्ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः ।<br/>असुरा अशुभेष्वेव कामादेरभिमानिनः ।<br/>तत्र कामः कालनेमिः सर्वं धूममलोल्बवत् ।<br/>शुभमध्याधमजनं क्रमादावृत्य तिष्ठति ।<br/>महाशनस्य तस्येदं नालं तेनानलोग्निवत् ।<br/>भुञ्जान इंद्रियाविष्टो ज्ञानास्त्रेणैव (दह्यते)हन्यते'' ॥</span>
इति ब्रह्मतर्के ।
ज्ञानावरणरूपेणेदमावृणोतीत्यावृतं ज्ञानमिति पुनराह । न केवलं दुष्पूरो नालमिति मन्यते चेत्यनलः । 'अग्नेरप्यनलः कामो यन्नालमिति मन्यत'' इति च ॥ ३७-४१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-280" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V42" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इंद्रियाणि पराण्याहुरिंद्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुदि्धर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥४२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-281" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V43" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-282" |
|---|
| oldKey | "BGT_C03_V43_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C03" |
|---|
| chapter | "BGT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'सर्वेभ्यः प्रवरा देवा इन्द्राद्या इंद्रियात्मकाः ।
तेभ्यो मनोभिमानी तु रुद्रस्तस्मात्सरस्वती ।
बुध्द्यात्मिका ततो ब्रह्मा महानात्मा परः स्मृऽतः ।
अव्यक्तरूपा लक्ष्मीश्च वरातोतो हरिः स्वयम् ।
न तत्समोधिको वेति ह्यानुपूर्वी प्रकीर्तिता ।
यथाक्रमप्रबोधेन नाश्याः कामादिशत्रवः ।
प्राप्यते च परं स्थानं विष्णोरतुलमञ्जसा'' ॥ इति च ।
'न चेंद्रियेभ्यः परा ह्यर्था रुद्रोहङ्कृतिरूपकः'' । इत्यादिविरोधः ।
'सर्वाभिमानिनो देवाः सर्वेपि ह्युत्तरोत्तरम् ।
आधिक्यं वक्तुमेवैषां पृथक्स्थानमुदीर्यते ।
आधिक्यक्रम एवात्र शास्त्रतात्पर्यमिष्यते ।
स्थानेषु त्ववरेषां च परे सन्ति न चेतरे ।
तथापि पितुरर्थो यः पुत्रस्याप्युपचर्यते ।
अव्यक्तादिपदार्थानां सर्वे तदभिमानिनः'' ॥ इति च ।
'यत्र ह क्व च पुत्रस्य तत्पितुर्यत्र वा पितुस्तद्वा पुत्रस्येत्येतदुक्तं भवति'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'बहुवाचिनां तुशब्दानां लिङ्गप्रकरणादिभिः ।<br/>प्रवृत्तिहेतोश्चाधिक्यान्निर्णयोर्थेषु गम्यते'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ।
<span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">'लिङ्गादिसाम्यं यत्र स्यात्प्रयोगाधिक्यमेव तु ।<br/>निर्णायकं भवेत्तत्र तेन स्यात्सुबहुश्रुतः'' ॥</span>
इति ब्रह्मतर्के ॥४२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-283" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_I01" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेस्मिन्नध्याये ।" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-284" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-285" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-286" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "स एवायं मया तेद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-287" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तरात्मकोयमध्यायः ।<br/>'ब्रह्मरुद्रेन्द्रसूर्याणां यद्दत्तं विष्णुना पुरा ।<br/>पञ्चरात्रात्मकं ज्ञानं व्यासोदात्पाण्डवेषु तत् ।<br/>तेषामेवावतारेषु सेनामध्येर्जुनाय च ।<br/>प्रादाद्गीतेति निर्दिष्टं सङ्क्षेपेणायुयुत्सवे ।<br/>यथा कुर्वन्ति कर्माणि यथा जानन्ति देवताः ।<br/>सर्वे कार्तयुगाश्चैव नृपाश्च मनुपूर्वकाः ।<br/>ज्ञातव्यं चैव कर्तव्यं यथा सर्वैर्मुमुक्षुभिः ।<br/>त्रैतादित्रिषु जातैश्च गीतायां तदुदाहृतम् ।<br/>पाण्डवाद्याः क्षेमकान्ताः करिष्यन्ति च जानते ।<br/>तथैव तेन गीताया नास्ति शास्त्रं समं क्वचित् ।<br/>वेदार्थपूर्वकं ज्ञेयं पञ्चरात्रं यतोखिलम् ।<br/>तत्सङ्क्षेपश्च गीतेयं तस्मान्नास्याः समं क्वचित्'' ॥</span>
इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ १-३ ॥" |
|---|
|
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-289" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५ ॥" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| text | "'जानन्तोपि विशेषार्थज्ञानाय स्थापनाय वा ।
पृच्छन्ति साधवो यस्मात्तेन पृच्छसि पार्थिव ॥'' इत्याग्नेयवचनान्नार्जुनो भगवन्तं न जानाति ॥ ४-५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-291" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Narayanashruthi-id">आत्ममायया आत्मेच्छया । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय स्वभावम् । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' इत्यादिश्रुतेश्च । अत एव स्वशब्देन विशेषणं 'प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य'' इत्यादिषु । 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः'' इत्यादिषु तु न स्वशब्दः । 'प्रकृतिं विदि्ध मे पराम्'' इत्यादिषु सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरन्या । अत्र तु स्वशब्दः स्वरूपवाची । स्वभाव इत्यत्रापि स्वाख्यो भावः स्वभावः । भावशब्दस्तु सम्बन्ध्याशङ्कानिवृत्तये । स्वस्वभाव इति तु स्वस्वरूपमितिवदुपचारत्वाशङ्कां निवर्तयति ।<br/>'स्रष्टृत्वादिस्वभावत्वात्स्वेच्छया विष्णुरव्ययः ।<br/>सृष्ट्यादिकं करोत्यद्धा स्वयं च बहुधा भवेत्'' ॥</span>>
इति नारायणश्रुतिः॥ ६,७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-294" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोर्जुन॥९ ॥" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
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|---|
| text | "'येषां गुणानां ज्ञानेन मुक्तिरुक्ता पृथक्पृथक् ।
वेदेषु चेतिहासेषु सा तु तेषां समुच्चयात् ।
एवमेव शमादीनां नान्यथा तु कथञ्चन'' ॥ इति ब्रह्मवैवर्तवचनाज्जन्म कर्म चेत्यादिषु न तावन्मात्रेण मोक्षः ॥९ ॥" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-298" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "'मयं प्रधानमुद्दिष्टं प्राधान्यं यैर्हरेर्मतम् ।
भगवन्मयास्ते विज्ञेयास्ते मुच्यन्ते न चापरे'' ॥ इति च ।
मयि भावो मद्भावः ॥१० ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-299" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-300" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "काङ्क्षन्तः कर्मणां सिदि्धं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिदि्धर्भवति कर्मजा॥१२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-301" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| text | "तथैव भजामि । तदनुसारिफलदानरूपेण । अन्यदेवतायाजिनामपि मत्समर्पणेन वैष्णवमार्गानुवर्तनेनैव सम्यक् फलं भवति ॥
अन्यदैवतपूजापि यस्मिन्नन्ते समर्पिता स्वर्गादिफलहेतुः स्यात् नान्यथा तं भजेद्धरिम् ॥ इत्याग्नेये ॥ ११-१२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-302" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-303" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | null |
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| text | "'सत्वसत्वाधिकरजोरजोभिस्तमसा तथा ।
वर्णा विभक्ताश्चत्वारः सात्विका एव वैष्णवा'' इति च ।
कर्मविभागं शमो दम इत्यादिना वक्ष्यति ।
'वैष्णवाः सात्विका एव तामसा एव चापरे ।
दौर्लभ्यसुलभत्वेन तेषां वर्णादिभिन्नता'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">'स्वाभाविको ब्राह्मणादिः शमाद्यैरेव भिद्यते ।<br/>योनिभेदकृतो भेदो ज्ञेय औपाधिकस्त्वयम् ।<br/>विष्णुभक्तिश्चानुगता सर्ववर्णेषु विश्पतिम् ।<br/>आरभ्य हीयतेथापि भेदः स्वाभाविकस्ततः'' ॥</span>
इति नारदीये ।
'कर्तापि भगवान्विष्णुरकर्तेति च कथ्यते ।
तस्य कर्ता यतो नान्यः स्वतन्त्रत्वात्परात्मनः'' ॥ इति च ।
अपिशब्दो गुणसमुच्चयार्थः । कर्ता मे नास्तीत्यपि विद्धीति ॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-304" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योभिजानाति कर्मभिर्न स बद्ध्यते॥१४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-305" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | null |
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| text | "जीवाभेदनिवृत्त्यर्थं मामिति विशेषणम् ॥ १४ ॥" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-307" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "किं कर्म किमकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-308" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-309" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | null |
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| text | "कर्मापि नो मत्त इति बोद्धव्यमित्यादि ॥ १७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-310" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुदि्धमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-311" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">कर्मणि जीवे अस्वातन्त्र्यादकर्म कर्मविधिफलयोरभावात् । अकर्मणि विष्णौ । स्वातन्त्र्यात्सर्वकर्तृत्वम् ।<br/>करोस्मिन् मीयत इति कर्म जीव उदाहृतः ।<br/>विधिशब्देनामितत्वात् अकर्म भगवान् हरिः ॥</span>
इति नारदीये ।
कर इति सकारान्तः अदृष्टवाची । क्रियावाची वा । तदधीनत्वात् । प्रसिद्धश्च जीवे कर्मशब्दः पञ्चरात्रे । कृत्स्नफलवत्वात् कृत्स्नकर्मकृत् ।
॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-312" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-313" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तोनिराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित्करोति सः॥२० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-314" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | null |
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| text | "अनिराश्रयो भगवदाश्रयत्वात् । मुक्तस्य स्वातन्त्र्याभिमानात् ॥२०॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-315" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-316" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबद्ध्यते॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-317" |
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| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-318" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-319" |
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| oldKey | "BGT_C04_V24_B01" |
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|---|
| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Bharatha-id">कथमभिमानत्यागः ? ब्रह्मार्पणमित्यादि । ब्रह्मण्यर्पणं ब्रह्मार्पणम् । ब्रह्मणो हविः । ब्रह्मणोग्नौ । ब्रह्मणः कर्मसमाधिना सह । समाधिरपि तदधीना इत्यर्थः ।'एकः स्वतन्त्रो भगवान् तदीयं त्वन्यदुच्यते'' ।</span>
इति भारते ॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-320" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V25" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-321" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V26" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "श्रोत्रादीनींद्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इंद्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-322" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V26_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "दैवं विष्णुमेव यज्ञ इत्युपासते । स्वभोग्यत्वात्स्वयमेव यज्ञः । ब्रह्मा-ख्याग्नौ क्रियायज्ञं तेनैव यज्ञाख्येन विष्णुना समर्पयन्ति । तत्पूजात्वेन श्रोत्रादिसंयमं कुर्वन्ति । तत्पूजात्वेन विषयान् भुञ्जते ॥ २५, २६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-323" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वाणींद्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-324" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V27_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">तत्पूजात्वेनेंद्रियादिसंयमं कुर्वन्ति । यज्ञेनैवेति सर्वत्राप्यन्वीयते ।<br/>'तेनैव तं पूजयेद्वा विहितैर्वान्यसाधनैः ।<br/>स एव विष्णोर्यज्ञः स्यान्मानसो वा स बाह्यकः'' ॥</span>
इति ब्रह्मवैवर्ते॥ २७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-325" |
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| oldKey | "BGT_C04_V28" |
|---|
| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥२८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-326" |
|---|
| oldKey | "BGT_C04_V29" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-327" |
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| oldKey | "BGT_C04_V30" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-328" |
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| oldKey | "BGT_C04_V31" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोस्त्ययज्ञस्य कुतोन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-329" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विदि्ध तान् सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-330" |
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| oldKey | "BGT_C04_V32_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "श्रोत्रादीनित्यादिष्विज्यानुक्तेरिज्योन्य इति शङ्कां निवारयति । वितता ब्रह्मणो मुख इति । 'सर्वयज्ञैः परं ब्रह्म याज्यं विष्ण्वाख्यमव्ययम्'' । इति च ॥ ३२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-331" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-332" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "सर्वं कर्माखिलम् आसमन्तादल्पं ज्ञाने परिसमाप्यते । ज्ञाने जाते पूर्यते ।
'समाप्तविद्यान् धनुषि श्रेष्ठान् यान् सप्त मन्यसे ।'' इतिवत्समाप्तिशब्दोत्र पूर्तिवाची । ज्ञानासिनात्मनः ।
'छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ'' इत्यादि पुनर्योगकथनात् ॥३३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-333" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "तद्विदि्ध प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-334" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-335" |
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| oldKey | "BGT_C04_V35_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C04" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'ज्ञानं तेहं सविज्ञानम्'' इति वक्ष्यमाणत्वात्स्वयमेवोपदेक्ष्यति ॥ ३४ ॥
आत्मनि व्याप्ते मयि । अथो तस्माद्य्वाप्तत्वादेव ॥ ३५ ॥
करणभूतज्ञानं स्तौति पुनः श्लोकत्रयेण-" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-336" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-337" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यथैधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात्कुरुतेर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥३७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-338" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥३८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-339" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "श्रद्धावाल्लभते ज्ञानं मत्परः संयतेंद्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥३९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-340" |
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| oldKey | "BGT_C04_V40" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-341" |
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| oldKey | "BGT_C04_V41" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-342" |
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| oldKey | "BGT_C04_V42" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C04" |
|---|
| chapter | "BGT_C04" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-343" |
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| oldKey | "BGT_C04_V42_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C04" |
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| verseType | null |
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| text | "आत्मवन्तं परमात्मभक्तम् ॥ ४१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-344" |
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| oldKey | "BGT_C05_I01" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
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| chapter | "BGT_C05" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन -'यदृच्छालाभसन्तुष्टः'' इत्यादि सन्न्यासम् ; 'कुरु कर्म'' इत्यादि कर्मयोगं च-" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-345" |
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| oldKey | "BGT_C05_V01" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-346" |
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| oldKey | "BGT_C05_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "योगसंन्यासयोर्लक्षणं स्पष्टयत्यनेनाध्यायेन । योगसंन्यस्तकर्माणमित्यादौ न्यासशब्दः सर्वकर्मत्यागविषयः इत्याशङ्क्य योगसंन्यासयोर्भिन्नपुन्निष्ठत्वाभिप्रायेण पृच्छति । संन्यासमिति ॥१॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-347" |
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| oldKey | "BGT_C05_V02" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-348" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एकपुंयोग्यावेतौ तयोर्मध्ये योग एव विशिष्ट इति परिहाराभिप्रायः । उभौ समुच्चितौ । 'संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगत'' इति वक्ष्यमाणत्वात् ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-349" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-350" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "द्वेषादिवर्जनमेव संन्यासशब्दार्थो न यत्याश्रमोत्राभिप्रेत इत्याह ज्ञेय इति । न च 'काम्यानां कर्मणां न्यासम्'' इत्यनेन विरोधः । तेनापि सहितस्य न्यासत्वात् । न च त्यागस्य पृथग्वचनाद्विरोधः । कुरुपाण्डववत् न्यासावान्तरभेदत्वात्त्यागस्य ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-351" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-352" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "बालास्तु न्यासशब्देन यत्याश्रममेव स्वीकृत्य तत्स्थानामेव साङ्ख्य-शब्दोदितज्ञानाधिकारो गृहस्थानामेव योगशब्दोदितकर्माधिकार इति मन्यन्ते । तन्न पण्डिता मन्यन्ते । कुतः ? यस्माज्ज्ञानमार्गं कर्ममार्गं च सम्यगास्थितः उभयोरपि फलं प्राप्नोति ॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-353" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-354" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Vyasasmruthi-id">तस्माज्ज्ञानिनां कर्माप्यनुष्ठेयम् । कर्मिणामपि गृहस्थानां ज्ञातव्यो भगवान् । न हि ज्ञानं विना कर्मणः सम्यगनुष्ठानं भवति ।<br/>'निष्कामं ज्ञानपूर्वं च निवृत्तमिह चोच्यते ।<br/>निवृत्तं सेवामानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ।<br/>बुद्ध्याविहिंसन् पुष्पैर्वा प्रणवेन समर्चयेत् ।<br/>वासुदेवात्मकं ब्रह्म मूलमन्त्रेण वा यतिः ।<br/>मुक्तिरस्तीति नियमो ब्रह्मदृग्यस्य विद्यते ।<br/>तस्याप्यानन्दवृदि्धः स्याद्वैष्णवं कर्म कुर्वतः ।<br/>कर्म ब्रह्मदृशा हीनं न मुख्यमिति कीर्तितम् ।<br/>तस्मात्कर्मेति तत्प्राहुर्यत्कृतं ब्रह्मदर्शिना ।<br/>एतस्मान्न्यासिनां लोकं संयान्ति गृहिणोपि हि ।<br/>ज्ञानमार्गः कर्ममार्ग इति भेदस्ततो न हि ।<br/>तस्मादाश्रमभेदोयं कर्मसङ्कोचसम्भवः'' ॥</span>
इति व्यासस्मृऽतेः ॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-355" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-356" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'मोक्षोपायो योग इति तद्रूपो न्यास एव तु ।
विष्ण्वर्पिततया भद्रो नान्यो न्यासः कथञ्चन'' । इत्याग्नेये । विष्ण्वर्पितत्वादियोगरूपत्वं विना केवलकर्मत्यागो नरकफल एव । 'यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विदि्ध पाण्डव'' । इति वक्ष्यमाणत्वात् । योगविशेषत्वान्न्यासस्य पृथगुक्तिः ॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-357" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेंद्रियः
सर्वभूतात्मभूतात्माकुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-358" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सर्वभूतात्मभूतात्मेति मुख्ययोगः ।
'आदानात्सर्वभूतानां विष्णुरात्मा प्रकीर्तितः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा तत्र भूतमनाः पुमान्'' ॥ इति च ॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-359" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यन् शृृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-360" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन् अपि ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-361" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "यथा न्यासस्य योगरूपत्वं तथाह नैव किञ्चिदित्यादिना ।
'विष्णुनार्थेष्वीरितानि मन आदीनि सर्वशः ।
वर्तन्तेन्यो न स्वतन्त्र इति जानन् हि तत्ववित्'' ॥ इति च ॥ ८, ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-362" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-363" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-364" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-365" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-366" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V13_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "तत्पूजात्मकानि तत्कृतानि मम शुभार्थमिति ब्रह्मण्याधानम् । स्वातन्त्र्याभावापेक्षयैव जीवस्याकर्तृत्वम् ।
'स्ववन्दनं यथा पित्रा कारितं शिशुकर्तृकम् ।
एवं पूजा विष्ण्वधीना भवेज्जीवकृतेत्यपि'' ॥ इति प्रवृत्ते ।
अतो मनसैव कर्मन्यासोस्वातन्त्र्यापेक्षया ॥ १०-१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-367" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-368" |
|---|
| oldKey | "BGT_C05_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-369" |
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| oldKey | "BGT_C05_V16" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-370" |
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| oldKey | "BGT_C05_V17" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
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| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥" |
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|
| id | "Bhagavadgitatatparya-371" |
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| oldKey | "BGT_C05_V17_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "यथा पितॄदत्तं पालकत्वं राजपुत्राणाम् एवं परमात्मदत्तं क्रियास्वातन्त्र्य-लक्षणं कर्तृत्वम् । क्रियानिष्पन्नधर्मादिरूपकर्मणि स्वातन्त्र्यं च जीवानामप्यस्तीत्याशङ्कां परिहरति । न कर्तृत्वमित्यादिना । क्रियायामदृष्टोत्पादने फले च स्वातन्त्र्यं लोकस्य न सृजतीश्वर इत्यर्थः । अन्यथा लोकस्येति विशेषणं व्यर्थम् । जनपदे निवसतां तद्वित्त-भोजिनामप्याधिपत्यादानान्न दत्ता जनपदा राज्ञा स्वपुत्राणामितिवत्कर्मफलादिसंयोगिनामपि तत्स्वातन्त्र्यादानान्न सृजतीति युज्यते । स्वयमेव भवति भावयति चेति स्वभावो भगवान् । स्वभावत्वात्स्वयमेव कर्तृत्वादिषु प्रवर्तते ।
<span class="gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id">'स्वातन्त्र्याद्भगवान्विष्णुः स्वभाव इति कीर्तितः ।<br/>तत्स्वातन्त्र्यं कदाप्येष नान्यस्य सृजति क्वचित् ।<br/>स्वातन्त्र्यादेव पापादिसम्बन्धः कुर्वतोपि न ।<br/>अज्ञानावृतबुदि्धत्वादीदृशं तं न जानते'' ॥</span>
इति महावाराहे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">'अहं सर्वस्य प्रभवः'' । 'तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णामि'' ।<br/>'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ।'' 'न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चिनारे'' । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' ।<br/>'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्'' । इत्यादेर्नास्यास्वाभाविकं कर्तृत्वमकर्तृत्वं वा । विपरीतप्रमाणाभावाच्च । अनिर्वाच्यनिरासादेव च निरस्तोयं पक्षः । न च सर्वविशेषराहित्यवादिनां शून्यवादात्कश्चिद्विशेषः । न हि सर्वविशेषरहितमित्युक्ते तदस्तीति सिद्ध्यति । वाच्यत्वलक्ष्यत्वास्तित्वादीनामपि विशेषत्वात् । अन्यथास्ति ब्रह्मेत्यादीनां शब्दानामपि पर्यायत्वादयो दोषाः । व्यावर्त्यविशेषश्च व्यावृत्तविशेषनिबन्धन एव । अन्यथा वैयर्थ्यमेव स्यात् । न च सर्वशब्दावाच्यस्य लक्ष्यत्वम् । न च सर्वप्रमाणागोचरमस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । नास्तित्वं तु सप्तमरसादिवददर्शनात्सिद्ध्यति ।<br/>स्वप्रकाशत्वं च न अमानं सिद्ध्यति । स्वयम्प्रकाशत्वं च ततोतिरिक्तं चेद्विशेषाङ्गीकारः । न चेत्तदेव प्रमाणगोचरम् । तत्प्रमाणाभावे परप्रकाशत्वमात्रनिरासे स्वप्रकाशत्वे प्रमाणाभावादप्रकाशत्वमेव स्यात् । अर्थतः सिदि्धरित्यर्थापत्तितः सिदि्धस्तत्प्रमाणतः सिदि्धर्वा । उभयथापि प्रमेयत्वमेव स्यात् ।<br/>स्वप्रकाशशब्देन स्वमितत्वानङ्गीकारात्परमितत्वानङ्गीकाराच्चासिदि्धरेव । प्रकाश इत्युक्तेपि स्वमन्यं वा किञ्चित्प्रकाश्यं विना न दृष्ट एव भोजनादिवत् । कर्तृकर्मविरोधश्चानुभवविरुद्धः । ज्ञानं च ज्ञेयं ज्ञातारं च विना न दृष्टम् । अतः शून्यवादान्न कश्चिद्विशेषः । अतोनन्तदोषदुष्टत्वादुपरम्यते ।<br/>हरिः स्वभावतः कर्ता सर्वमन्यत्तदीरितम् ।<br/>अतः सा कर्तृता तस्य न कदाचिद्विनश्यति ॥</span>
इति पैङ्गिश्रुतिः ।॥ १४-१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-372" |
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| oldKey | "BGT_C05_V18" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
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| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥१८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-373" |
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| oldKey | "BGT_C05_V18_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
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| verseType | null |
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| text | "'विषमेष्वपि जीवेषु समो विष्णुः सदैव तु ।
यत्तृणादिगतस्यापि गुणाः पूर्णा हरेः सदा'' ॥ इति च ॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-374" |
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| oldKey | "BGT_C05_V19" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-375" |
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| oldKey | "BGT_C05_V20" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुदि्धरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-376" |
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| oldKey | "BGT_C05_V21" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
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| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-377" |
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| oldKey | "BGT_C05_V22" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
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| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-378" |
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| oldKey | "BGT_C05_V23" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-379" |
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| oldKey | "BGT_C05_V23_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "इदानीमपि परमात्मनि स्मृऽतमात्रे सुखं विन्दतीति यत्तदा स एव सम्यगुक्तः किमु ॥ २१-२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-380" |
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| oldKey | "BGT_C05_V24" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "योन्तः सुखोन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोधिगच्छति॥२४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-381" |
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| oldKey | "BGT_C05_V24_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "ब्रह्मणि भूतः । अन्यथा पुनर्ब्रह्म गच्छतीति विरोधाच्च । अन्तस्सुखादिकं च ब्रह्मदर्शनात् ॥ २४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-382" |
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| oldKey | "BGT_C05_V25" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
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| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधायतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-383" |
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| oldKey | "BGT_C05_V26" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
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| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-384" |
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| oldKey | "BGT_C05_V27" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-385" |
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| oldKey | "BGT_C05_V28" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यतेंद्रियमनोबुदि्धर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-386" |
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| oldKey | "BGT_C05_V28_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'अमुक्तो मुक्तसादृश्यान्मुक्त एव हि तत्त्वदृक् ।
किमु मुक्तिगतस्तस्माज्ज्ञानमेवाधिकं नरे'' ॥ इति नारदीये ॥ २७, २८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-387" |
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| oldKey | "BGT_C05_V29" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C05" |
|---|
| chapter | "BGT_C05" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-388" |
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| oldKey | "BGT_C06_I01" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ज्ञानान्तरङ्गं समाधियोगमाहानेनाध्यायेन ध्यानमत्रोच्यते ।" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-389" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-390" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'स ब्रह्मनिष्ठस्तु यतिर्महात्मा शारीरमग्निं च मुखे जुहोति'' ।
इत्यादेर्न यतेरप्यनग्नित्वम् । आत्मसमारोपणाच्च ॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-391" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विदि्ध पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-392" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "योगविशेष एव संन्यास इत्यर्थः ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-393" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-394" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">सम्पूर्णोपायो योगारूढः ।<br/>'नानाजनस्य शुश्रूषा कर्मेति करवन्मितेः ।<br/>योगार्थिना तु सा कार्या योगस्थेन हरौ स्थितिः ।<br/>तेनापि स्वोत्तमानां तु कार्यान्यैरखिलेष्वपि ।<br/>शक्तितः करणीयेति विशेषोसिद्धसिद्धयोः ।<br/>प्राप्तोपायस्तु सिद्धः स्यात् प्रेप्सुः साधक उच्यते ।<br/>तस्य प्राण्युपकारेण सन्तुष्टो भवतीश्वरः ।<br/>सिद्धोपायेन विष्णोस्तु ध्यानव्याख्यार्चनादिकम् ।<br/>कार्यं नान्यत् तस्य तेन तुष्टो भवति केशवः'' ॥</span>
इति प्रवृत्तवचनान्न विरोधः ।
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">'शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इंद्रियनिग्रहः'' ।</span>
इति भागवते ॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-395" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यदा हि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-396" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "कथं नानुषज्यते ? सर्वसङ्कल्पसंन्यासी ।
'मयि सर्वणि कर्माणि'' इत्युक्तत्वात् ।
'मदधीनमिदं ज्ञात्वा मत्संन्यासीति चोच्यते'' । इति च ॥४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-397" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-398" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-399" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'उद्धरेतैव संसाराज्जीवात्मानं परात्मना ।
विष्णुर्बन्धुः सतां नित्यं परात्मा ह्यसतामरिः ।
तत्प्रसादजया भक्तया जितो यस्य वशेत्विव ।
वर्तते तस्य मित्रं स तदन्यस्य च शत्रुवत्'' ॥ इति च ।
'परमात्मा समाहितः'' इति वाक्यशेषाच्च ॥ ५, ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-400" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-401" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेंद्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-402" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'सर्वत्र विष्णोरुत्कर्षज्ञानं ज्ञानमितीर्यते ।
तद्विशेषपरिज्ञानं विज्ञानमिति गीयते'' ॥ इति च ॥ ७,८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-403" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुदि्धर्विशिष्यते॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-404" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">'यस्य यत्र यथा वृत्तिर्विहिता वर्तनं तथा ।<br/>ज्ञानं वापि समत्वं तद्विषमत्वमतोन्यथा'' ॥</span>
इति महाविष्णुपुराणे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">'अनिमित्तस्नेहवांस्तु सुहृज्ज्ञात्वोपकारकृत् ।<br/>मित्रं वधादिकृदरिर्द्वेष्यस्त्वप्रियमात्रकृत् ।<br/>उदासीनः स्नेहवतोप्यस्नेही तत्कृतानुकृत् ।<br/>>मध्यस्थ इति विज्ञेयः सुहृदेषु विशिष्यते'' ॥</span>
इति नारदीये ॥ ९-१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-405" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-406" |
|---|
| oldKey | "BGT_C06_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C06" |
|---|
| chapter | "BGT_C06" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥" |
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| text | "तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेंद्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज््याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥" |
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| text | "समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥" |
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मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥" |
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| text | "युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥" |
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| text | "नात्यश्नतस्तु योगोस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥" |
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| text | "युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥" |
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| text | "यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥" |
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| text | "यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृऽता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥" |
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| text | "यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥" |
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| text | "आत्मानं विष्णुम् । आत्मना तत्प्रसादेन (तत्प्रसादादेव) ॥ २० ॥" |
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| text | "सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुदि्धग्राह्यमतींद्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥" |
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| text | "यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥२२ ॥" |
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| text | "तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥" |
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| text | "संङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेंद्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥" |
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| text | "शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥" |
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| text | "यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥" |
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| text | "प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥" |
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| text | "ब्रह्मणि भूतम् ॥ २७ ॥" |
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| text | "युञ्जन् एवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥" |
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| text | "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥" |
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| text | "सर्वभूतेषु स्थितं परमात्मानम् ॥ २९ ॥" |
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| text | "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥" |
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| text | "सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥" |
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| text | "आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥" |
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| text | "अतो विष्ण्वनुवर्तिषु स्ववत् स्नेहः कर्तव्यः ॥ ३२ ॥" |
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एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥" |
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| text | "चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥" |
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| text | "असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥" |
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| text | "असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥" |
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| text | "अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिदि्धं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥" |
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| text | "अयतिः अप्रयत्नः । ''प्रयत्नाद्यतमानस्तु" इति वाक्यशेषात् । योगशब्द-स्योपायार्थत्वेप्यत्रोपायविशेष एव ध्यानयोगादिर्विवक्षित इति न विरोधः॥ ३७ ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C06" |
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| text | "कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८ ॥" |
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| text | "एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥" |
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| text | "पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥" |
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| text | "प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C06" |
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| text | "अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतदि्ध दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२ ॥" |
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| text | "तत्र तं बुदि्धसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-445" |
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| chapter | "BGT_C06" |
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| text | "पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४ ॥" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Paramayoga-id">'मोक्षोपायस्य जिज्ञासुरपि केवलपाठकात् ।<br/>विशिष्टः किमु तद्विद्वान् किं पुनर्यस्तदास्थितः'' ॥</span>
इति परमयोगे ॥४४ ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C06" |
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| text | "प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-448" |
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| chapter | "BGT_C06" |
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| text | "तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योपि मतोधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥४६ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-449" |
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| chapter | "BGT_C06" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-450" |
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| chapter | "BGT_C06" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Dattatreya-id">'तपसश्चैव यज्ञादेर्ध्यानमेव विशिष्यते ।<br/>अज्ञानिध्यानतो ज्ञानं ध्यानं सज्ज्ञानमप्यतः ।<br/>तत्रापि मय्यभक्तस्य नान्यद्ध्यानं प्रयोजकम् ।<br/>अन्यसामान्यविद् यो मे यश्चान्यं नेति पश्यति ।<br/>अवरत्वदृगुदासीनो विद्वेषी चेत्यभक्तयः ।<br/>मद्भक्तोपि हि कार्यार्थं यो ध्यायेदन्यदेवताः ।<br/>परिवारतामृते तस्मात् केवलं मदुपासकः ।<br/>वरोन्यान् मदधीनांश्च सर्वान् जानन् विशुद्धधीः'' ॥</span>
इति च दत्तात्रेयवचनम् ॥ ४६,४७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-451" |
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| chapter | "BGT_C07" |
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| text | "साधनं प्राधान्येनोक्तमतीतैरध्यायैः । उत्तरैस्तु षड्भिर्भगवन्माहात्म्यं प्राधान्येनाह-" |
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| text | "भगवन्महिमा विशेषत उच्यते ।" |
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| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-454" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-455" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V03" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-456" |
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| oldKey | "BGT_C07_V03_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">'अनन्तानां तु जीवानां यतन्ते केचिदेव तु ।<br/>मुक्त्यै तेषु च मुच्यन्ते केचिन्मुक्तेषु च स्फुटम् ।<br/>केचनैव हरिं सम्यग् ब्रह्मरुद्रादयो विदुः ।<br/>अन्येषां यावता मुक्तिस्तावत् ज्ञानं हरौ परम्'' ॥</span>
इति पाद्मे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">'मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।<br/>सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामते'' ॥</span>
इति भागवते ।
<span class="gr-reference gr-ref-Sattatva-id">'सर्वे मुक्ता हरौ भक्तास्तेषु ब्रह्मैव मुख्यतः ।<br/>विष्णोः परमभक्तस्तु तस्मात् जीवघनो मतः'' ॥</span>
इति सत्तत्त्वे ॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-457" |
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| oldKey | "BGT_C07_V04" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुदि्धरेव च ।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-458" |
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| oldKey | "BGT_C07_V05" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विदि्ध मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-459" |
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| oldKey | "BGT_C07_V06" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-460" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V06_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'अचेतना चेतनेति द्विविधा प्रकृतिर्मता ।
त्रिगुणाचेतना तत्र चेतना श्रीर्हरिप्रिया ।
ते उभे विष्णुवशगे जगतः कारणे मते ।
पिता विष्णुः स जगतो माता श्रीर्या त्वचेतना ।
उपादानं तु जगतः सैव विष्णुबलेरिता'' ॥ इति ॥ ४-६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-461" |
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| oldKey | "BGT_C07_V07" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-462" |
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| oldKey | "BGT_C07_V07_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
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| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मत्तोन्यत् परतरं नास्ति । परतरस्त्वहमेवेत्यर्थः । अन्यथान्यदिति व्यर्थम् ।
'अवरा दुःखसम्बन्धाज्जीवा एव प्रकीर्तिताः ।
नित्यनिर्दुःखरूपत्वात् परा श्रीरेकलैव तु ।
दुःखासम्पीडितत्वात्तु मध्यमो वायुरुच्यते ।
अनन्याधीनरूपत्वादसमाधिकसौख्यतः ।
तत्तन्त्रत्वाच्च सर्वस्य स विष्णुः परतमो मतः ।
अभावादन्तरान्यस्य त्विहैकार्थौ तरप्तमौ ।
यस्याः सम्बन्धयोग्यत्वाज्जीवा अप्यवरा मताः ।
तस्या जडायाः प्रकृतेरवरत्वे क्व संशयः ।
अथावरतरा ये तु विमुखाश्चेतना हरेः ।
नित्यदुःखैकयोग्यत्वान्न ह्येतत् स्यादचेतने ।
अतः परत(रं)मं विष्णुं यो वेत्ति स विमुच्यते ।
मुक्तस्तु स्यात् पराभासः सुनित्यसुखभोजनात् ।
तत्रापि तारतम्यं स्यात् तेषु ब्रह्माधिको मतः ।
विष्णोराधिक्यसंवित्तिः सर्वस्माज्ज्ञानमुच्यते ।
एवं विविच्य तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ।
एतच्च तारतम्येन वर्तते केशवादिषु ।
मुख्यविज्ञान्यतो विष्णुः किञ्चिद्विज्ञानिनोपरे ॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-463" |
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| oldKey | "BGT_C07_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "रसोहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-464" |
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| oldKey | "BGT_C07_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-465" |
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| oldKey | "BGT_C07_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "बीजं मां सर्वभूतानां विदि्ध पार्थ सनातनम् ।
बुदि्धर्बुदि्धमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-466" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरतर्षभ॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-467" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V11_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सोप्सु स्थित्वा रसयति रसनामा ततः स्मृऽतः ।
सूर्यचन्द्रादिषु स्थित्वा प्रभानामा प्रभासनात् ।
वेदस्थः प्रणवाख्योसावात्मानं यत् प्रणौत्यतः ।
खे स्थितः शब्दनामासौ यच्छब्दयति केशवः ॥८ ॥ पुण्यापुण्यं गन्धयति स्वयं पुण्यो धरास्थितः ।
तेजयत्यग्निसंस्थः (स) सन् भूतस्थो जीवनप्रदः ।
तपस्विसंस्थस्तपति ... ... ॥९ ॥ ... व्यञ्जनाद् बीजसञ्ज्ञितः ।
बोधनाद् बुदि्धनामासौ बुदि्धमत्सु व्यवस्थितः ॥१० ॥ नित्यपूर्णबलत्वात्तु बलकामविवर्जितः ।
अरा(जस)गजबलश्चैव स्थानेभ्योन्येष्वयोजनात् ।
एतादृशबलात्मासौ बलिनां बलदः स्वयम् ।
बेति पूर्णत्ववाची स्यात् तद्रतेर्बलमुच्यते ।
प्रायो हि कामिता अर्था धर्मं हन्युर्हरिः पुनः ।
न धर्महानिकृत् किन्तु कामितो धर्मवृदि्धकृत् ।
धर्माविरुद्धकामोतो विष्णुर्भूतेषु संस्थितः ।
एवं स सर्वतश्चान्यः स्वतन्त्रश्चैव सर्वगः ।
व्यवस्थयैव सर्वेषां सर्वदा सर्वदः प्रभुः ॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-468" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विदि्ध न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-469" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V12_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
तत एव नचान्यस्मात् तदायत्तमिदं न सः ॥ अन्यायत्तः ... ॥ १२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-470" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-471" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-472" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-473" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-474" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-475" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-476" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-477" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V19_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "... अचेतनया तन्मेयत्वात्तु मायया ।
लक्ष्म्या वशगया लोको विष्णुनैव विमोहितः ।
ये तु विष्णुं प्रपद्यन्ते ते मायां (तु) तां तरन्ति हि ।
लक्ष्मीः सा जडमायाया देवता ते उभे अपि ।
विष्णोर्वशे ततोनन्यभक्त्या तं शरणं व्रजेत् ।
यादृशी तत्र भक्तिः स्यात् तादृश्यन्यत्र नैव चेत् ।
अनन्यभक्तिः सा ज्ञेया विष्णावेव तु सा भवेत् ।
अन्येषु वैष्णवत्वेन लक्ष्मीब्रह्महरादिषु ।
कुर्याद् भक्तिं नान्यथा तु तद्वशा एव ते यतः ।
एवं जानंस्तमाप्नोति नान्यथा तु कथञ्चन ।
पूर्णं वस्तु यतो ह्येको वासुदेवो नचापरः ।
एवंविद् दुर्लभो लोके यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ १३-१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-478" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-479" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-480" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-481" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V23" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-482" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V23_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "... ... यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ 'विष्णुं तत् परमज्ञात्वा रमाब्रह्महरादिकान् ।
यजन्नपि तमो घोरं नित्युदुःखं प्रयाति हि ।
अज्ञानां तु कुले जातो यावद् विष्णोः समर्चनम् ।
विष्णुतत्त्वं च जानीयात् तावत् सेवा पृथक् कृता ।
विद्याद्यैहिकभोगाय यदि बुद्ध्वा पुनर्न तु ।
परिवारतामृते कुर्यादन्यदेवार्चनं क्वचित् ।
अजानता कृतं त्यक्तं न दोषाय भविष्यति ।
जन्मादिप्रदमेव स्यादत्यागे पुनरेव तु ।
क्षिप्रं च ज्ञापयत्येव भगवान् स्वयमेव तु ।
यदि जन्मान्तरे स्वीयो निमित्तीकृत्य कञ्चन'' ॥ इत्यादि च ।
'मत्त एवेति तान् विदि्ध'' इत्युपसंहाराच्च तत्तत्कारणत्वात् तत्तन्नामेत्यवसीयते । ''मयि सर्वमिदं प्रोतम्" इति भेदेनैवोपक्रमाच्च । आप्नोति विष्णुमित्येवात्मशब्दो ज्ञानिनि । 'यच्चाप्नोति यदादत्ते'' इत्यादेः । 'आस्थितः स हि'' 'मां प्रपद्यते'' इत्यादिवाक्यशेषाच्च । बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । ततो मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति पूर्णमिति जानन् । 'प्रपद्यन्तेन्यदेवताः'' इत्यादिवाक्यशेषे भेददर्शनाच्च । 'देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि'' इति च ॥ २०-२२ ॥ 'ज्ञात्वा परत्वं विष्णोस्तु पृथग् देवान् यजन्नरः ।
याति देवांस्तदज्ञात्वा तम एव प्रपद्यते ।
तथापि यावदन्यैस्तु साम्यं हीनत्वमेकताम् ।
न निश्चिन्वन्ति जायन्ते संसारे ते पुनः पुनः'' ॥ इति च ॥२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-483" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-484" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V24_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'अव्यक्तः परमात्मासौ व्यक्तो जीव उदाहृतः ।
मन्यते यस्तयोरैक्यं स तु यात्यधरं तमः'' ॥ इति च ॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-485" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V25" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-486" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V26" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-487" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V26_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'यथात्मानं हरिर्वेत्ति तथान्ये नैव तं विदुः ।
जानन्ति किञ्चित् क्रमशो रमाद्यास्तत्प्रसादतः'' ॥ इति च ॥२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-488" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-489" |
|---|
| oldKey | "BGT_C07_V27_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C07" |
|---|
| chapter | "BGT_C07" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Bharatha-id">द्वन्द्वमोहो मिथ्याज्ञानम् ।<br/>'तमस्तु शार्वरं विद्यान्मोहश्चैव विपर्ययः'' ।</span>
इति भारते ।
जीवेश्वरादिकं द्वन्द्वम् । तद्विषयो मोहो द्वन्द्वमोहः । सम्मोहः तदाग्रहः'तदाग्रहो महामोहस्तामिस्रः क्रोध उच्यते'' । इत्युक्तत्वात् ।
सर्गे सर्गकाल एव ।
'जीवधर्मानीश्वरे तु यो जीवेष्वैश्वरानपि ।
विद्याज्जीवेश्वरैक्यं वा द्वन्द्वमोही स उच्यते'' ॥ इत्याग्नेये ॥२७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-490" |
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| oldKey | "BGT_C07_V28" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C07" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C07" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-492" |
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| chapter | "BGT_C07" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-493" |
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| oldKey | "BGT_C07_V30_B01" |
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| chapter | "BGT_C07" |
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| verseType | null |
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| text | "'तद् ब्रह्म'' इत्युक्तेन्यत्वाशङ्कां निवारयति साधिभूताधिदैवं मामिति ।
॥३० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-494" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | null |
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| text | "मरणकालकर्तव्यगत्याद्यस्मिन्नध्याये उपदिशति-" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-495" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-496" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अधियज्ञः कथं कोत्र देहेस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोसि नियतात्मभिः॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-497" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः॥३ ॥" |
|---|
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | null |
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| text | "तदिति विशेषणात् ब्रह्मेत्युक्तमन्यदेव प्रकृत्यादीनां मध्ये किञ्चित्; उपरि 'साधियज्ञं च'' इति चशब्दादधिभूतादिसहितत्वेन विष्णुज्ञानमन्यदेवेति संशयः 'किं तद् ब्रह्म'' इति प्रश्नकारणम् ॥ १,२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-499" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥
अधियज्ञोहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-500" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Tatvaviveka-id">परमाक्षरं विष्णुरेव मुख्यत इति प्रसिद्धत्वात् तथैव (परिहार इति) परिहरति । अज्ञानां तदपि ज्ञापयितुं तथैव परिहारः । पुनरहमिति नोक्तमित्याशङ्का 'अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नम्" इति विष्णावेव प्रयुक्तेनाव्यक्तशब्देन 'अव्यक्तोक्षर इत्युक्तः'' इति परिह्रियते । 'ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्'' इत्यत्र तु पृथक् प्रश्नादुपासकयोः फलतारतम्यकथनात् 'कूटस्थोक्षर उच्यते'' इत्युक्ताक्षरादपि चोत्तमः इति विष्णोरुत्तमत्वकथनाच्चान्यदेवेत्यवसीयते । 'अधियज्ञोहमेव'' इति साधियज्ञमित्युक्त्या प्राप्तभेदनिवृत्त्यर्थम् । तस्यैव सर्वप्राणिदेहस्थित-रूपान्तरापेक्षया सहितत्वं युज्यते ।<br/>'प्राणिनां देहगो विष्णुरधियज्ञ इतीरितः ।<br/>स एव व्याप्तरूपेण ब्रह्मेति परिकीर्त्यते ।<br/>तैस्तैरधिकयाज्यत्वाद् बृंहितत्वाच्च हेतुतः ।<br/>अध्यात्मं तत्स्वभावो यदधिकः परमात्मगः ।<br/>पुंसां सजडभावानां सर्गः कर्म हरेः स्मृऽतम् ।<br/>भूताधिकत्वतो जीवा अधिभूतमितीरिताः ।<br/>अधिको दैवतं विष्णुरेव यस्यास्तु सा रमा ।<br/>पुरुप्राणाधिदैवाख्या त्विति ज्ञेयमिदं नरैः'' ॥</span>
इति तत्त्वविवेके ।
कथंरूपोधियज्ञ इति प्रश्नस्तु 'अहमेव'' इत्युक्तत्वात् तल्लक्षणोक्त्यैव परिहृतः ॥॥ ३,४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-501" |
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| oldKey | "BGT_C08_V05" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-502" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-503" |
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| oldKey | "BGT_C08_V07" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुदि्धर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-504" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-505" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | null |
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| text | "मद्भावं मयि भावम् । सदा तद्भावभावितानामेव स्मरंस्त्यजतीति केवलतत्कालस्मरणं भवति । न चेत् स्मरतोपि समाधिस्थस्खलनवत् पूर्वकर्मानुसारिस्मृऽत्या तत्प्राप्तिरेव भवति । अपरोक्षज्ञानिनां प्रारब्धकर्मावसाने स्मरंस्त्यजतीति भवत्येव । 'प्रयाणकालेपि च मां ते विदुः'' इत्युक्तत्वात् । 'युक्तचेतसः'' इति विशेषणान्नित्यं स्मरतामेवापरोक्षज्ञानं जायते ।
'भक्त्या ज्ञानान्निषिद्धानां त्यागान्नित्यहरिस्मृऽतेः ।
अरागाद् विहितात्यागादित्येतैरेव संयुतैः ।
अपरोक्षदर्शनं विष्णोर्जायते नान्यथा क्वचित्'' ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ ५-८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-506" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-507" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥॥ १० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-508" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C08" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | null |
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| text | "तमसः परस्तात् अप्राकृतदेहम् ॥ ९, १० ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-509" |
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| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥॥ ११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-510" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | null |
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| text | "मन आदीनां ब्रह्मणि चरणं ब्रह्मचर्यम् ॥ ११ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-511" |
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| parent | "BGT_C08" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूध््नर्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-512" |
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| oldKey | "BGT_C08_V13" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
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| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-513" |
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| oldKey | "BGT_C08_V13_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "एकाक्षरवाच्यत्वादेकाक्षरं परं ब्रह्म ॥ १३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-514" |
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| oldKey | "BGT_C08_V14" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-515" |
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| oldKey | "BGT_C08_V15" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिदि्धं परमां गताः॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-516" |
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| oldKey | "BGT_C08_V16" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-517" |
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| oldKey | "BGT_C08_V16_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C08" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Tatvaviveka-id">'नियमाज्जन्मनोभावो मुक्तस्यैव तथापि तु ।<br/>महर्लोकमतीतानां न जन्मांशलयौ विना ।<br/>तत्राप्यवश्यं तत् स्थानं तैः क्षिप्रं पुनराप्यते'' ॥</span>
इति पाद्मे ॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-518" |
|---|
| oldKey | "BGT_C08_V17" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-519" |
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| oldKey | "BGT_C08_V17_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सहस्रमिति बह्वेव । ब्रह्मणः परब्रह्मणः ।
'अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके'' ॥ इति वाक्यशेषात् ।
नहि विरिञ्चाहन्येव सर्वव्यक्तलयः ।
'नित्यस्यापि हरेः कालो द्विपरार्धात्मकस्त्वयम् ।
अहःश्चासौ(श्वासो) निमेषश्चेत्यप्रवृत्त्योपचर्यते'' ॥ इति च ॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-520" |
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| oldKey | "BGT_C08_V18" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-521" |
|---|
| oldKey | "BGT_C08_V19" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-522" |
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| oldKey | "BGT_C08_V20" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "परस्तस्मात्तुभावोन्योव्यक्तोव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-523" |
|---|
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|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-524" |
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| oldKey | "BGT_C08_V22" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-525" |
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| oldKey | "BGT_C08_V23" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-526" |
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| oldKey | "BGT_C08_V23_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "यत्र कालाभिमानिदेवतासु मृत्यनन्तरं प्रयाताः । अग्निर्ज्योतिर्धूमानामकालाभिमानित्वेपि कालप्राचुर्यात् काल इत्युच्यते ॥ २३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-527" |
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| oldKey | "BGT_C08_V24" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
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| chapter | "BGT_C08" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-528" |
|---|
| oldKey | "BGT_C08_V25" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-529" |
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| oldKey | "BGT_C08_V26" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C08" |
|---|
| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥२६ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-530" |
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| oldKey | "BGT_C08_V26_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C08" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | null |
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| text | "'अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधा वह्नेः पुत्रो व्यवस्थितः ।
तं प्राप्य याति ब्रह्मिष्ठो दिवसाद्यभिमानिनः'' ॥ इति सत्तत्त्वे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">तत्कालमरणविवक्षायामग्निज्योतिर्धूमानामयोगः । 'अथ यो दक्षिणे प्रमीयते पितॄणामेव महिमानं गत्वा चन्द्रमसः सायुज्यं गच्छत्येतौ वै सूर्याचन्द्रमसोर्महिमानौ ब्राह्मणो विद्वानभिजयति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति'' इति विदुषो दक्षिणायनमरणेप्यपुनरावृत्त्या ब्रह्मप्राप्तिश्रुतेः । 'विद्वान् ब्रह्म समाप्नोति यत्र तत्र मृतोपि सन्''</span>
इति च पाद्मे ॥ २४-२६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-531" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-532" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।
॥२८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C08" |
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| text | "'मार्गौ ब्रह्म च यः पश्येत् साक्षादेवापरोक्षतः ।
सर्वपुण्यातिगोमुह्यन् यात्यसौ ब्रह्म तत् परम्'' ॥ इति च ।॥ २७-२८ ॥" |
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| text | "सप्तमाध्यायोक्तं स्पष्टयत्यस्मिन्नध्याये-" |
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| text | "सप्तमोक्तं प्रपञ्चयति ।" |
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| text | "इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्॥१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-537" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| text | "राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥" |
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| text | "मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-540" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-541" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| text | "सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| text | "'विष्णुगान्यप्यतत्स्थानि भूतान्येष ह्यसङ्गतः'' इति च । ममात्मा मम देह एव । तदनन्यत्वात् । देहस्याचेतनत्वाशङ्कानिवृत्तये 'ममात्मा'' इत्याह ॥ ४-९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-546" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'अध्यक्षोधिपतिः प्रोक्तो यदक्षाण्यस्य चोपरि'' ।</span>
इति शब्दनिर्णये ।॥१० ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-551" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| text | "मानुषीं मनुष्यसदृशीम् 'तन्वा विष्णुरनन्योपि स्वाधीनत्वात् तदाश्रितः'' । इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Bhavishyath-id">'ब्रह्मरुद्ररमादीनां साम्यदृष्टिरनन्यता ।<br/>प्रादुर्भावगतस्यापि दोषदृष्टिरपूर्णता ।<br/>धर्मदेहावतारादेर्भेददृष्टिश्च सङ्करः ।<br/>अवतारेष्विति ज्ञेयमवज्ञानं जनार्दने ।<br/>सर्वं मोघं शुभं तस्य योवजानाति केशवम् ।<br/>अवरं याति च तमः प्रादुर्भावगतोप्यतः ।<br/>ज्ञेयः केवलचिद्देहो विदोषः पूर्णसद्गुणः'' ॥</span>
इति च भविष्यत्पर्वणि ॥ ११-१४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-553" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥१५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-554" |
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| oldKey | "BGT_C09_V15_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C09" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | null |
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| text | "'एकमूर्तिश्चतुर्मूर्तिरथवा पञ्चमूर्तिकः ।
द्वादशादिप्रभेदो वा पूज्यते सज्जनैर्हरिः'' ॥ इति च ॥१५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-555" |
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| oldKey | "BGT_C09_V16" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-556" |
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| oldKey | "BGT_C09_V17" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-557" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-558" |
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| oldKey | "BGT_C09_V19" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-559" |
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| oldKey | "BGT_C09_V19_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'अर्च्यत्वादृक्समत्वाच्च निजरूपेषु साम सः ।
याज्यत्वात् स यजुर्यज्ञः सार्वज्ञ्यात् पुरुषोत्तमः ।
'क्रतुः कृतिस्वरूपत्वात् स्वधानन्यधृतो यतः ।
मानात् त्रातीति मन्त्रोयमुष्टानां निधिरौषधम् ।
आ ज्यायस्त्वादाज्यनामा दर्भोदरधरो यतः ।
अहूतत्वाद्धुतं चायमग्निर्नेतागतेर्यतः'' ॥ इत्यादि च ।
'तत्तत्पदार्थभिन्नोपि तत्तन्नामैवमच्युतः ।
स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वात् गुणानन्त्याच्च केवलम्'' ॥ इति च ।
'ओमित्याक्रियते यस्मादोङ्कारो भगवान् (हरिः) परः'' इति च ।
'पातीति पिता मानान्माता यत् स पितुर्महान् ।
पितामहो निधातृत्वान्निधानं भीतरक्षणात् ।
शरणं व्यञ्जनाच्चैव बीजमित्युच्यते प्रभुः'' ॥ इति च ।
प्रलयकाले संहर्तृत्वात् प्रलयः । अन्यदापीति मृत्युः'प्राणगः प्राणधर्ता यदमृतं प्रविलापयन् ।
विश्वं प्रलय इत्युक्तो मृत्युरन्यत्र मारणात्'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'सत् साधुगुणपूर्णत्वादस्मान्नान्यो गुणाधिकः ।<br/>यतोतोसदिति प्रोक्तं विष्ण्वाख्यं परमं पदम्'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ।
॥ १६-१९ ॥ त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकं अश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान्॥ २० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-560" |
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| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-561" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-562" |
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| oldKey | "BGT_C09_V22" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "येप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-563" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "'अनन्यदेवतायागाद् भक्त्युद्रेकादकामनात् ।
सदा योगाच्च वैशिष्ट्यं त्रैविद्याद् वैष्णवादपि ।
स्यादि्ध भागवतस्यैव तेन ब्रह्मादयोखिलाः ।
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैरपि केशवयाजिनः ।
वैष्णवा इति बुद्ध्यैव मानयन्त्यन्यदेवताः ॥'' इत्याग्नेये ।
'सम्यग्गुणगणज्ञानादुपासा पर्युपासना'' । इति च ॥ २०-२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-564" |
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| oldKey | "BGT_C09_V23" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-565" |
|---|
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोपि माम् ॥॥ २५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-566" |
|---|
| oldKey | "BGT_C09_V25" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-567" |
|---|
| oldKey | "BGT_C09_V26" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-568" |
|---|
| oldKey | "BGT_C09_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-569" |
|---|
| oldKey | "BGT_C09_V27_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C09" |
|---|
| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "मामिष्ट्वा प्रार्थयन्त इत्युक्तत्वाज्जानन्तोपि नाभिजानन्ति तत्त्वेन ।
'सर्वदेववरत्वेन यो न जानाति केशवम् ।
तस्य पुण्यानि मोघानि याति चान्धं तमो ध्रुवम्'' ॥ इति च ।
'मोघाशा मोघकर्माणः'' इत्युक्तत्वाच्च न केवलाज्ञविषयं मिथ्याज्ञानिविषयं वा 'च्यवन्ति ते'' इत्यादि । अतः सर्वाधिक्यं विष्णोर्ज्ञात्वापि ब्रह्मादीनां तत्परिवारत्वादिकमजानतामिदं फलम् ॥ २४-२८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-570" |
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| oldKey | "BGT_C09_V28" |
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| parent | "BGT_C09" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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|---|
| text | "समोहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-571" |
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| oldKey | "BGT_C09_V28_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C09" |
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| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">'नास्य भक्तोपि यो द्वेष्यो नचाभक्तोपि यः प्रियः ।<br/>किन्तु भक्त्यनुसारेण फलदोतः समो हरिः''</span>
इति पाद्मे ।
प्रीत्या मयि ते ॥२९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-572" |
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| oldKey | "BGT_C09_V29" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-573" |
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| oldKey | "BGT_C09_V30" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-574" |
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| oldKey | "BGT_C09_V31" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-575" |
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| oldKey | "BGT_C09_V32" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C09" |
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| chapter | "BGT_C09" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-576" |
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| oldKey | "BGT_C09_V33" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥३४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-577" |
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| oldKey | "BGT_C09_V33_B01" |
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| parent | "BGT_C09" |
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| chapter | "BGT_C09" |
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| verseType | null |
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| text | "'पापादिकारिताश्चैव पुंसां स्वाभाविका अपि ।
विप्रत्वाद्यास्तत्र पुण्याः स्वाभाव्या एव मुक्तिगाः ।
यान्ति स्त्रीत्वं पुमांसोपि पापतः कामतोपि वा ।
न स्त्रियो यान्ति पुंस्त्वं तु स्वभावादेव याः स्त्रियः ।
पुंसा सहैव पुन्देहस्थितिः स्याद् वरदानतः ।
तज्जन्मनि वराः पापजाताभ्यो निजसत्स्त्रियः ।
सर्वेषामपि जीवानामन्त्यदेहो यथा निजः। मुक्तौ च निजभावः स्यात् कर्मभोगान्ततोपि वा'' इति भविष्यत्पर्ववचनात् पापयोनयः पुण्या इति विशेषणम् ।
॥ ३२-३४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-578" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | null |
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| text | "उपासनार्थं विभूतीर्विशेषकारणत्वं च केषाञ्चिदनेन अध्यायेनाह-" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-579" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।
यत्तेहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-581" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | null |
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| text | "उपलक्षणार्थं सुरगणा इत्यादि ॥ १,२ ॥" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-583" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | null |
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| text | "अनस्यापि आदिः अनादिः ॥ ३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-584" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "बुदि्धर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोभावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-585" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-586" |
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| oldKey | "BGT_C10_V05_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'बुदि्धर्बोधनिधित्वात् तदन्तःकरणमुच्यते'' ।</span>
इति शब्दनिर्णये ।
॥ ४-५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-587" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-588" |
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| oldKey | "BGT_C10_V06_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahme-id">'मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।<br/>वसिष्ठश्च महातेजाः पूर्वे सप्तर्षयः स्मृऽताः'' ॥</span>
इति ब्राह्मे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Mahavishnupurana-id">'मनवो बोधवैशेष्याद् देवा ब्रह्मादयः स्मृऽताः ।<br/>विप्रादिवर्णभेदेन चत्वारो बहवोपि ते ।<br/>दीनत्वाद् देवनामानस्त्वन्ये ब्रह्मादिनामकाः ।<br/>अवैष्णवकृतो यज्ञो दीनैर्देवैस्तु भुज्यते ।<br/>वैष्णवैस्तु कृतो यज्ञो देवैर्हि मनुनामकैः ।<br/>मरीच्याद्यास्तु तत्पुत्रा मानवा नामतः स्मृऽताः ।<br/>तत्पुत्रपौत्रा मुनयस्तथा मानवमानवाः ।<br/>तेभ्यो मनुष्या इत्येषा सृष्टिर्विष्णोः समुत्थिता'' ॥</span>
इति महाविष्णुपुराणे ॥॥ ६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-589" |
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| oldKey | "BGT_C10_V07" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-590" |
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| oldKey | "BGT_C10_V07_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'युज्यते येन योगोसावुपायः शक्तिरेव वा'' । इति च । विशिष्टभवनं विभूतिः । महत्त्वम् । विविधभवनं वा । योगः सामर्थ्यम् ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-591" |
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| oldKey | "BGT_C10_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-592" |
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| oldKey | "BGT_C10_V09" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-593" |
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| oldKey | "BGT_C10_V10" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुदि्धयोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-594" |
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| oldKey | "BGT_C10_V11" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-595" |
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| oldKey | "BGT_C10_V11_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'भजन्ते माम्'' इत्यनेन जीवेश्वरैक्यशङ्कां निवर्तयति ॥ ८ ॥
मद्गतप्राणाः मद्विषयचेष्टाः ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-596" |
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| oldKey | "BGT_C10_V12" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-597" |
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| oldKey | "BGT_C10_V13" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-598" |
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| oldKey | "BGT_C10_V14" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-599" |
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| oldKey | "BGT_C10_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-600" |
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| oldKey | "BGT_C10_V16" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-601" |
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| oldKey | "BGT_C10_V17" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योसि भगवन्मया॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-602" |
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| oldKey | "BGT_C10_V18" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेमृतम्॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-603" |
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| oldKey | "BGT_C10_V19" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-604" |
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| oldKey | "BGT_C10_V20" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥२० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-605" |
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| oldKey | "BGT_C10_V21" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-606" |
|---|
| oldKey | "BGT_C10_V22" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "वेदानां सामवेदोस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-607" |
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| oldKey | "BGT_C10_V23" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-608" |
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| oldKey | "BGT_C10_V24" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पुरोधसां च मुख्यं मां विदि्ध पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-609" |
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| oldKey | "BGT_C10_V25" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-610" |
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| oldKey | "BGT_C10_V26" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
|---|
| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-611" |
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| oldKey | "BGT_C10_V27" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "उच्चैःश्रवसमश्वानां विदि्ध माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-612" |
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| oldKey | "BGT_C10_V28" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-613" |
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| oldKey | "BGT_C10_V29" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-614" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-615" |
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| oldKey | "BGT_C10_V31" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-616" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "मृत्युः सर्वहरश्चाहं उद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृऽतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥" |
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| text | "द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोस्मि व्यवसायोस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "वृष्णीनां वासुदेवोस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-623" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| text | "यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-624" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नान्तोस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | null |
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| text | "'येषां विष्णुस्वरूपाणां सन्निधेरन्यवस्तुषु ।
विशिष्टत्वं स्वजातेः स्याद् विभूत्याख्यानि तानि तु ।
ब्रह्मनामा ब्रह्मगतः सर्वदैवतसञ्चयात् ।
आधिक्यहेतुर्भगवान् सामस्थः सामनामकः ।
आधिक्यहेतुर्वेदेभ्यस्तथाश्वत्थस्थितो हरिः ।
उत्कर्षहेतुर्वृक्षेभ्यो य एवाश्वत्थनामकः'' ॥ इत्यादि विभूतितत्त्वे ।
'केषु केषु च भावेषु'' इत्युक्तत्वाच्च ब्रह्मादिजीवेभ्योन्यदेव विभूतिरूपम् ।
'द्विविधं वैभवं रूपं प्रत्यक्षं च तिरोहितम् ।
कपिलव्यासकृष्णाद्यं प्रत्यक्षं वैभवं स्मृऽतम् ।
भिन्नं ब्रह्मादिजीवेभ्यो जडेभ्यश्चापि तद्गतम् ।
स्वजात्याधिक्यदं तेषां तत् तिरोहितवैभवम्'' ॥ इत्यादि च ।
'आत्माततगुणत्वेन रवज्ञेयो यतो रविः ।
उदवन्मेघचलनान्मरीचिः साम साम्यतः ।
सुखात् सुखत्वात्तु शशी वेदो वेदनतो हरिः ।
वासवर्ती वासवोसौ चेतोनेता तु चेतना ।
पालकैर्वननीयत्वात् पवनो बोधनान्मनः ।
पावकः शोधनान्मेरुरीरो यन्मास्य सागरः ।
सारस्य गरणात् स्कन्दो जगतः स्कन्दनाद् भृगुः ।
भर्जनाज्जपयज्ञश्च जातपो याज्य एव च ।
अश्वाकारस्थितोश्वत्थ ऐरा श्रीश्च तदाश्रयः ।
ऐरावतो नराणां यद् दद्यात् सर्वं स नारदः ।
ह्रीश्रीसमाश्रयत्वाच्च हिमालय इतीरितः ।
वर्ज्यत्वादरिभिर्वज्रो वैनतेयो नतास्पदः ।
वासुकिर्वाससुखदः कन्दर्पः सुखभेदपः ।
अर्यमा ज्ञेयमातृत्वात् काल आकालनादपि ।
वरुणो वरणाद् द्वन्द्वो द्विरूपोन्तर्बहिर्यतः ।
मकरो मानकर्तृत्वाद् यमः संयमनाद् विभुः ।
प्रह्लादः स महानन्दो मृगेन्द्रो मृगयत्पतिः ।
जाह्नवी जहतां स्थानमध्यात्मं चात्मनां पतिः ।
विद्या ज्ञप्तिस्वरूपत्वाद् वादो वाच्यत्वतो हरिः ।
कीर्त्यो वक्ताश्रयः कीर्तिर्वाक् श्रीरिति च नामतः ।
स्मरणीयः स्मृऽतिर्मेधा क्षमारूपस्तथेर्यते ।
द्यूतं क्रीडापरत्वाच्च गायत्री त्राति गायकान् ।
सत्त्वं साधुगुणत्वाच्च दण्डनाद्दण्ड उच्यते ।
बृहत्सारोप्यमेयश्च बृहत्सामोशनोशतेः ।
शुभाशुभज्ञानकरः कुसुमाकर ईरितः ।
ज्ञानं ज्ञानात्मतो मौनं मुनीड््यो नीतिरानयन् ।
मार्गाणामन्तगत्वात्तु मार्गशीर्षः प्रकीर्तितः ।
सुखं पिबन् लीलयैव कपिलो व्यास एव च ।
विशिष्टत्वाद् विष्णुनामा विशिष्टप्राणसौख्यतः ।
एवं नानागुणैर्विष्णुर्नानानामभिरीरितः ।
नानाप्राण्यादिसंस्थश्च विभूतिरिति शब्दितः ।
शश्यादिषु विजातीयस्वाम्यदः सारदः क्वचित् ।
शर्वादिषु सजातीयश्रैष्ठ्यदत्वेन संस्थितः ।
शक्रोशनार्जुनाद्येषु सजातीयैकदेशतः ।
देवेष्वभ्यधिको ब्रह्मा यतो विष्णोरनन्तरः ।
कवित्वादिगुणेष्वेवं यत्समो नास्ति कश्चन ।
तथा भीमश्च पार्थेषु ज्ञानं यज्ञेषु चोत्तमम् ।
सुदर्शनश्चायुधेषु वेदेष्वृग्वेद एव च'' ॥ इत्यादि विभूतितत्त्वे ।
क्वचित् साम्न आधिक्यमभिमान्यपेक्षया 'ऋचः श्रीर्गीरुमाद्याश्च साम्नः प्राणशिवादयः'' इत्याद्यभिमानिभेदात् । तत्रापि यथायोग्यम् ।
॥ २१-४० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-626" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम्॥४१ ॥" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | null |
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| text | "मम तेजोंशेन संयुक्तं भवति ॥ ४१ ॥" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-629" |
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| oldKey | "BGT_C10_V42_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C10" |
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| chapter | "BGT_C10" |
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| verseType | null |
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| text | "'किं ज्ञातेन'' इति वक्ष्यमाणस्याधिकफलत्वज्ञापकमेव । अन्यथोक्तेरेव वैयर्थ्यात् ।
'अन्याधिक्यज्ञापनार्थं शुभं चाक्षिप्यते क्वचित् ।
न तावतास्य निन्द्यत्वं ज्ञेयैवान्यवरिष्ठता ।
उभयं मिलितं चैव ततोप्यधिकशोभनम्'' ॥ इति च ॥४२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-630" |
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| oldKey | "BGT_C11_I01" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | null |
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| text | "था श्रुते ध्यानं कर्तुं शक्यं तथा स्वरूपस्थितिरनेनाध्यायेनोच्यते-" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-631" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोयं विगतो मम॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-632" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-633" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-634" |
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| oldKey | "BGT_C11_V04" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-635" |
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| oldKey | "BGT_C11_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-636" |
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| oldKey | "BGT_C11_V06" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-637" |
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| oldKey | "BGT_C11_V07" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-638" |
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| oldKey | "BGT_C11_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-639" |
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| oldKey | "BGT_C11_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-640" |
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| oldKey | "BGT_C11_V10" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-641" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवं अनन्तं विश्वतो मुखम्॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-642" |
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| oldKey | "BGT_C11_V12" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-643" |
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| oldKey | "BGT_C11_V13" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-644" |
|---|
| oldKey | "BGT_C11_V14" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
|---|
| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-645" |
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| oldKey | "BGT_C11_V14_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C11" |
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| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahme-id">'आत्मानमव्ययम्'' 'परमं रूपमैश्वरम्'' 'सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतो-मुखम्'' इत्यादिरूपविशेषणाच्च रूपस्येश्वरसाक्षात्स्वरूपत्वं नित्यत्वं तत एव चिदानन्दाद्यात्मकत्वं च सिद्धम् । 'मम देहे'' इत्युक्तत्वाच्चादित्यादीनां भेदः सिद्धः । 'मे रूपाणि'' 'सर्वतोनन्तरूपम्'' इत्यादेः 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्'' इत्यादेश्चैकस्यैवाभिन्नानन्तरूपत्वं च ।<br/>'एकं रूपं हरेर्नित्यमचिन्त्यैश्वर्ययोगतः ।<br/>बहुसङ्ख्यागोचरं च विशेषादेव केवलम् ।<br/>अभावो यत्र भेदस्य प्रमाणावसितो भवेत् ।<br/>विशेषनामा तत्रैव विशेषव्यवहारवान् ।<br/>विशेषोपि स्वरूपं स स्वनिर्वाहक एव च ।<br/>द्रव्यात्मना स नित्योपि विशेषात्मैव जायते ।<br/>नित्या एव विशेषाश्च केचिदेवं द्विधैव सः ।<br/>वस्तुस्वरूपमस्त्येवेत्येवमादिष्वभेदिनः ।<br/>विशेषोनुभवादेव ज्ञायते सर्ववस्तुषु ।<br/>नचाविशेषितं किञ्चिद् वाच्यं लक्ष्यं तथा मितम् ।<br/>विशिष्टस्य स्वतोन्यत्वे स्वस्यामेयत्वहेतुतः ।<br/>नैव ज्ञेयं विशिष्टं च मानाभावाच्च नो भवेत् ।<br/>स्वयमित्यपि हि स्वत्वविशेषेण विवर्जितम् ।<br/>न ज्ञेयं तद्विशेष्यं च तथैवेत्यनवस्थितिः ।<br/>अभेदे न विरोधोस्ति ज्ञाताज्ञातं यतोखिलम् ।<br/>तदेव ज्ञातरूपेण ज्ञातमज्ञातमन्यथा ।<br/>अभिन्नस्य विशिष्टत्वान्न दोषद्वयमप्युत ।<br/>एकत्वानुभवाच्चैव विशेषानुभवादपि ।<br/>तज्ज्ञानानुभवाच्चैव न दोषद्वयसम्भवः ।<br/>भेदाभेदौ च तेनैव (तौ नैव) कर्तृभोक्तृविशेषणे ।<br/>मदन्य इत्यनुभवो यतो नैवास्ति कस्यचित् ।<br/>भेदो विशेषणस्यापि नान्तरस्य क्वचिद् भवेत् ।<br/>शुद्धस्वरूप इत्यादावभेदस्यैव दर्शनात् ।<br/>अपृथग्दृष्टिनियमाद् बलज्ञानादिकस्य च ।<br/>ऐक्यं बाह्यविशेषाणां पृथग्दृष्ट्यैव तन्न तु ।<br/>विशेषहेत्वभावेपि द्वैविध्यं कल्प्यते यदि ।<br/>कल्पनागौरवाद्यास्तु दोषास्तत्रातिसङ्गताः ।<br/>नैकत्वं वापि नानात्वं नियमादस्त्यचेतने ।<br/>भेदाभेदावनुभवादतस्तत्रान्यथागतेः ।<br/>एको मदन्यतोन्यश्चेत्येवमेव व्यवस्थितौ ।<br/>भेदाभेदौ चेतनेषु तस्मान्नैकप्रकारता ।<br/>एकमित्येव यज्ज्ञातं बहुत्वेनैव तत् पुनः ।<br/>पटाद्यं ज्ञायते यस्माद् भेदाभेदौ कुतो न तत् ।<br/>तन्तुभ्योन्यः पटः साक्षात् कस्य दृष्टिपथं गतः ।<br/>अनन्यश्चेत् तन्तुभावे पटाभावः कुतो भवेत् ।<br/>न चात्मनि विशेषोत्र दृष्टान्तत्वं गमिष्यति ।<br/>शुद्धोहम्प्रत्ययो यस्मात् तत्राभेदप्रदर्शकः ।<br/>अत्रावयवभेदेन स्यादेव ह्यनवस्थितिः ।<br/>न चानवयवं वस्तु क्वचित् स्यान्मानगोचरम् ।<br/>पूर्वापरादिभेदेन यतोंशोस्यावगम्यते ।<br/>उपाधिरप्येकदेशसम्बद्धः सन्तमेव हि ।<br/>ज्ञापयेद् भेदमखिलं ग्रसन् स विभजेत् कथम् ।<br/>तस्माद् गुणादिकमपि नास्त्यनंशतया क्वचित् ।<br/>भावाभावव्यवहृतेर्विद्यमानेपि वस्तुनि ।<br/>भेदाभेदौ गुणादेश्च जडे वस्तुनि संस्थितौ ।<br/>चेतने शक्तिरूपेण गुणादेर्भाव इष्यते ।<br/>सुप्तोयं बलवान् विद्वानित्यादिव्यवहारतः ।<br/>नचैवं शक्तिरूपेण जडे व्यवहृतिः क्वचित् ।<br/>एकमेवाद्वितीयं तन्नेह नानास्ति किञ्चन ।<br/>मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।<br/>यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।<br/>एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ।<br/>इत्यादिश्रुतिमानाच्च परमैश्वर्यतस्तथा ।<br/>सर्वं तु घटते विष्णौ यत् कल्याणगुणात्मकम्'' ॥</span>
इत्यादि ब्रह्मतर्के ।
॥ १-१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-646" |
|---|
| oldKey | "BGT_C11_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C11" |
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| chapter | "BGT_C11" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">कमलासने ब्रह्मणि स्थितं रुद्रम्'विष्णुं समाश्रितो ब्रह्मा ब्रह्मणोङ्कगतो हरः ।<br/>हरस्याङ्गविशेषेषु देवाः सर्वेपि संस्थिताः'' ॥</span>
इति पाद्मे ॥१५ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥" |
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| text | "त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ १८ ॥" |
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| text | "अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥ १९ ॥" |
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| text | "द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥" |
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| text | "द्यावापृथिव्योरन्तरमेकेनैव रूपेण व्याप्तम् । 'नान्तं न मध्यम्'' इत्युक्त-त्वात् पुनः 'अनादिमध्यान्तम्'' इति गुणानन्त्यापेक्षया । 'त्वया ततं विश्वमनन्तरूप'' इति कालापेक्षया । स्वयमन्तं विद्यमानमपि न पश्यतीत्याशङ्क्य 'त्वया ततं विश्वम्'' इत्याह । अन्यत् तात्पर्यज्ञापनायाभ्यासरूपम् । 'सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः'' इति 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'' इत्यादिषु सर्वशब्दव्याख्यानरूपम् ।
'त्रिलोकेषु स्थितैर्भक्तैरर्जुनाय प्रदर्शितम् ।
दृष्टं विष्णोर्विश्वरूपं स्वयोग्यत्वानुरूपतः ।
प्रायः सहैव पार्थेन प्रायो भीताश्च तेखिलाः ।
दर्शनाभ्यासतो दृष्टिरानन्दोद्रेकता भवेत् ।
तस्मिन् काले तु भूमेश्च भारहारार्थमुद्यमात् ।
उग्रत्वमिव सर्वत्र न भीतिर्ब्रह्मदर्शिनाम् ।
अर्जुनादधिका ये तु तेषां भीतिर्न चाभवत् ।
श्रीब्रह्मरुद्रपूर्वाणां कृष्णाया भीमरामयोः'' ॥ इत्याग्नेयवचनात् ।
'दृष्ट्वाद्भुतं रूपम्'' इत्यादि युज्यते ॥ १९,२० ॥" |
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| text | "अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥" |
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| text | "रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥" |
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| text | "रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥ २३ ॥" |
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| text | "नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥" |
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| text | "दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥" |
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| text | "अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥" |
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| text | "वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥" |
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| text | "यथा नदीनां बहवोम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥" |
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| text | "यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥" |
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| text | "लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात्- लोकान् समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥" |
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| text | "आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥" |
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| text | "मुक्ताः सुरसङ्घा विशन्ति । 'प्रवेशो निर्गमश्चैव मुक्तानां स्वेच्छया भवेत्'' । इति हि ब्रह्माण्डे ॥ २१-२५ ॥
अन्यचेष्टां कुर्वतामपि भगवच्चेष्टयैव प्रलये प्रजानां प्रवेशवत् प्रवेशो युज्यते । सेनामध्यतो भगवन्मुखानामुभयाभिमुखत्वाच्चोभे सेने तत्र प्रविशतः । ये तु तस्मिन्नेव मुहूर्ते मरिष्यन्ति तेषां दशनान्तरेषु चूर्णितमपि शिरः सूक्ष्मदृष्टिगोचरत्वान्मानुषदृष्ट्या तथा न दृश्यते । यथा भिन्नमपि घटादिकं यावत् पृथङ्ग् न पतति तावन्मन्ददृष्टीनां न ज्ञायते । यथा पुरूरवसो जराश्विभ्यामेव दृष्टा ॥ २६-३० ॥
विशेषगुणकर्मविषय एव प्रश्नः । 'विष्णो'' इति सम्बोधनात् ॥ ३१ ॥" |
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| text | "कालोस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id">'कालः कलितसम्पूर्णसद्गुणत्वाज्जनार्दनः ।<br/>संहारात् सर्ववित्त्वाद् वा सर्वविद्रावणेन वा'' ॥</span>
इति महावराहे ।
अपिशब्देन भ्रात्रादीन् अपि ऋते ॥३२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-669" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-670" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | null |
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| text | "जयद्रथस्य पितुर्वरादेव विशेषः । निहताः निहतप्राया । पश्चादर्जुनेपि स्थित्वा स एव हनिष्यति ॥ ३४ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-671" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोप्यादिकर्त्रे ॥ अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-676" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "वायुर्बलज्ञानयोगात् शशाङ्कोतिसुखाङ्कितः ।
इन्द्रः स परमैश्वर्यादिति नानाभिधो हरिः । इति च ॥३९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-677" |
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| text | "नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः॥ ४० ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-678" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-679" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "यच्चापहासार्थमसत्कृतोसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥" |
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| text | "एकः सर्वोत्तमोप्यसत्कृतः । 'एकः सर्वाधिको ज्ञेय एष एव करोति यत्'' इति च ॥ ४२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यो लोकत्रयेप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-682" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड््यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-683" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "अदृष्टपूर्वं हृषितोस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "तेनैव रूपेण भवेति अनन्तरूपगोपनेन तदेव प्रकाशयेत्यर्थः ।
'पञ्चाननं चिन्त्यमचिन्त्यरूपं पद्मासनं गोपितविश्वरूपम्'' ।
इति हि वैहायससंहितायाम् ॥४६ ॥" |
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|---|
| text | "मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-687" |
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| oldKey | "BGT_C11_V47_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">'विश्वनामा स भगवान् यतः पूर्णगुणः प्रभुः'' ।</span>
इति पाद्मे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Brahmanda-id">'त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्'' इत्यनेन तेनैवेन्द्रशरीरेण दृष्टमिति ज्ञायते । त्वदन्येनेति तदवरापेक्षया । तैरपि तद्वन्न दृष्टमित्येव ।<br/>'विश्वरूपं प्रथमतो ब्रह्मापश्यच्चतुर्मुखः ।<br/>तच्छतांशेन रुद्रस्तु तच्छतांशेन वासवः ।<br/>यथेन्द्रेण पुरा दृष्टमपश्यत् सोर्जुनोपि सन् ।<br/>तदन्ये क्रमयोगेन तच्छतांशादिदर्शिनः'' ॥</span>
इति ब्रह्माण्डे ॥४७ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-689" |
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| oldKey | "BGT_C11_V48_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | null |
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| text | "वेदादिभिरपि त्वदवरेणैवं द्रष्टुमशक्यः । अन्यथा 'दृष्ट्वाद्भुतं रूपम्'' इत्यादिविरोधः ॥ ४८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ग्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥" |
|---|
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | null |
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| text | "स्ववत् क्रियत इति स्वकं रूपम् । विश्वरूपमज्ञानां स्वरूपवन्न दर्शयति । एतदज्ञानामपि तथैव दर्शयतीति विशेषः । अन्यथा 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्'' इति विरुद्धं स्यात् ।
'परावरविभेदस्तु मुग्धदृष्टिमपेक्ष्य तु ।
प्रादुर्भावस्वरूपाणां विश्वरूपस्य च प्रभोः ।
अन्यथा न विशेषोस्ति व्यक्तिर्ह्यज्ञव्यपेक्षया'' ॥ इति च ॥५० ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥" |
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| text | "किञ्चित् मनुष्यवद् दृश्यमानत्वात् मानुषम् ॥ ५१ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| text | "सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥" |
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| text | "ये दर्शनकाङ्क्षिणस्तैरपीदानीं दृष्टप्रायः ॥ ५२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥" |
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| chapter | "BGT_C11" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-700" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | null |
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| text | "अव्यक्तोपासनाद् भगवदुपासनस्योत्तमत्वं प्रदर्श्य तदुपायं प्रदर्शयत्यस्मिन्नध्याये-" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-701" |
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| oldKey | "BGT_C12_V01" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥" |
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| oldKey | "BGT_C12_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | null |
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| text | "साधननिर्णयोत्र ।
श्रिये जातः श्रिय आ निरियाय श्रियं वयो जरितृभ्यो दधाति । श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ'' 'उपासिता मुक्तिदा सद्य एव ह्यस्येशाना जगतो विष्णुपत्नी । या श्रीर्लक्ष्मीरौपला चाम्बिकेति ह्रीश्चेत्युक्ता संविदग््रया सुविद्या'' इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
'श्रीः सुतुष्टा हरेस्तोषं गमयेत् क्षिप्रमेव तु ।
अतुष्टा तदतुष्टिं च तस्माद् ध्येयैव सा सदा ।
अव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः कूटस्थं चाक्षरं च ताम् ।
प्रधानमिति च प्राहुर्महापुरुष इत्यपि ।
तां ब्रह्म महदित्याहुः परं जीवं परां चितिम् ।
तस्यास्तु परमो विष्णुः यो ब्रह्म परमं महत्'' ॥ इति ब्रह्माण्डवचनाच्चाव्यक्तोपासनान्मोक्षाशङ्कया पृच्छति । 'कूटस्थोक्षर उच्यते'' इत्युत्तरवचनात् 'कूटस्थमचलम्'' इत्यत्राप्युक्तेरव्यक्तशब्दश्चित्प्रकृतिवाची । अन्यथा 'ये त्वां पर्युपासते, ये चाप्यक्षरम्, तेषां के योगवित्तमाः'' इति भेदेन प्रश्नानुपपत्तिः । 'परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्'' इति तेनैवोक्तत्वात् । ये तु 'ते मे युक्ततमा मताः'' 'मय्येव मन आधत्स्व'' इत्यादौ भगवतोक्तेप्यव्यक्तोपासकानामाधिक्यं वदन्ति ते त्वपलापकत्वादेवाति-साहसिका इति सुशोच्या एव ॥ १ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-703" |
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| oldKey | "BGT_C12_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-704" |
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| oldKey | "BGT_C12_V03" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-705" |
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| oldKey | "BGT_C12_V04" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सन्नियम्येंद्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-706" |
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| oldKey | "BGT_C12_V04_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Paramashruthi-id">'अविष्णुज्ञैरतद्भक्तैस्तदुपासाविवर्जितैः ।<br/>शपेदुपासिताप्येषा श्रीस्तांस्तद्धरितत्त्ववित् ।<br/>तद्भक्तस्तमुपास्यैव श्रियं ध्यायीत नित्यदा ।<br/>तेन तुष्टा तु साच्छिद्रं दद्याद् विष्णोरुपासनम् ।<br/>ततस्तद्दर्शनान्मुक्तिं यात्यसौ नात्र संशयः ।<br/>तथापि सर्वपरमां सर्वदोषविवर्जिताम् ।<br/>ज्ञात्वा श्रियं तत्परमं तत्पतिं पुरुषोत्तमम् ।<br/>विज्ञायोपासते नित्यं ते हि युक्ततमा मताः ।<br/>यतः क्लेशोधिकस्तेषां पृथक् श्रियमुपासताम् ।<br/>विष्णुना सहिता ध्याता सापि तुष्टिं परां व्रजेत् ।<br/>अन्यथा तु पुनर्विष्णोः श्रीपतित्वेन चिन्तनम् ।<br/>अच्छिद्रमेव कर्तव्यमिति मुक्तिश्चिराद् भवेत् ।<br/>तस्मादक्लेशतो मुक्तिः क्षिप्रं विष्णुमुपासताम्'' ॥</span>
इति परमश्रुतिः ।
युक्ततमाः साधकतमाः ॥२ ॥ 'न चलेत् स्वात् पदाद् यस्मादचला श्रीस्ततो मता'' । इत्याग्नेये ।
<span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">'सूक्ष्मत्वादप्रसिद्धत्वाद् गुणबाहुल्यतस्तथा ।<br/>अनिर्देश्यौ तथाव्यक्तावचिन्त्यौ श्रीश्च माधवः'' ॥</span>
इति नारदीये ॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-707" |
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| oldKey | "BGT_C12_V05" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "क्लेशोधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-708" |
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| oldKey | "BGT_C12_V06" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-709" |
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| oldKey | "BGT_C12_V07" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-710" |
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| oldKey | "BGT_C12_V08" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मय्येव मन आधत्स्व मयि बुदि्धं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-711" |
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| oldKey | "BGT_C12_V09" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-712" |
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| oldKey | "BGT_C12_V10" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अभ्यासेप्यसमर्थोसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिदि्धमवाप्स्यसि॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-713" |
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| oldKey | "BGT_C12_V11" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अथैतदप्यशक्तोसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-714" |
|---|
| oldKey | "BGT_C12_V12" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-715" |
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| oldKey | "BGT_C12_V12_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'विष्णोरन्यं न स्मरेद् यो विना तत्परिवारताम् ।
तदधीनतां वानन्ययोगी स परिकीर्तितः'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shanthirmukti-id">'अन्तवत्तु फलं तेषाम्'' इत्यादिनान्यदेवोपासनायाः पूर्वमेव निन्दितत्वात् लक्ष्म्यास्त्वतिसामीप्याद् विशेषमाशङ्क्य तदुपासनाविषय एव प्रश्नः कृतः ।<br/>'वैष्णवान्येव कर्माणि यः करोति सदा नरः ।<br/>जपार्चामार्जनादीनि स्वाश्रमोक्तानि यानि च ।<br/>स तत्कर्मेति विज्ञेयो योन्यदेवादिपूजनम् ।<br/>कृत्वा हरावर्पयति स तु तद्योगमात्रवान् ।<br/>तत्र पूर्वोविशिष्टः स्यादादिमध्यान्ततः स्मृऽतेः ।<br/>अवान्तरे च नियमाद् विष्णोस्तद्दासतास्य यत् ।<br/>मनसा वर्ततेन्योपि यथाशक्ति हरिस्मृऽतेः ।<br/>पूर्वोक्तयोग्यो भवति यदि नित्यं तदिच्छति ।<br/>असम्यग्ज्ञानिनो ध्यानाज्ज्ञानमेव विशिष्यते ।<br/>ज्ञात्वा ध्यानं ततस्तस्मात् तत् फलेच्छाविवर्जितम् ।<br/>तस्माज्ज्ञानाद् भवेन्मुक्तिस्त्यागाद्ध्यानयुतात् स्फुटम्'' इति च ।</span>
शान्तिर्मुक्तिः ॥ ४-१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-716" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "ओष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-717" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
|---|
| verseType | "shloka" |
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| text | "सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुदि्धर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-718" |
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| oldKey | "BGT_C12_V15" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-719" |
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| oldKey | "BGT_C12_V16" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-720" |
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| oldKey | "BGT_C12_V17" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥१७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-721" |
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| oldKey | "BGT_C12_V18" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
|---|
| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-722" |
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| oldKey | "BGT_C12_V19" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-723" |
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| oldKey | "BGT_C12_V19_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C12" |
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| chapter | "BGT_C12" |
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| verseType | null |
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| text | "अवैष्णवसर्वारम्भपरित्यागी । सर्वारम्भाभिमानत्यागेन फलत्यागेन भगवति समर्पणरूपेण च त्यागी । 'सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः'' 'मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा'' ॥ इत्यादेः ॥ 'भक्तिं ज्ञानं च वैराग्यमृते यो नेच्छति क्वचित् ।
शुभाशुभपरित्यागी विद्वद्भिः कीर्तितो हि सः'' ॥ इति च ।
'प्रायः सुखादिषु समः प्रायो हर्षादिवर्जितः ।
तथोच्यते यथाल्पस्वो निःस्व इत्युच्यते बुधैः ।
न हि मुख्यतया साम्यं कस्यचित् सुखदुःखयोः ।
न च हर्षादिसन्त्यागो यावन्मुक्तिः कुतश्चन'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'हृतिर्मदादधर्माय हर्षो नाम प्रकीर्तितः'' ।</span>
इति शब्दनिर्णये ॥१६-१९॥" |
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| text | "ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेतीव मे प्रियाः॥२० ॥" |
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| text | "व्यस्तेन प्रियाः समस्तेनातीव प्रियाः । भक्तिस्तु व्यस्तेप्युक्तैव । यस्मान्नोद्विजते इत्यत्रापि स चेत्यनेन भक्तिरनुषज्यते । धर्मसाधनं धर्म्यं तदेवामृतसाधनममृतं धर्म्यामृतम् ॥ २० ॥" |
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| text | "पूर्वोक्तज्ञानज्ञेयक्षेत्रपुरुषान् पिण्डीकृत्य विविच्य दर्शयत्यनेनाध्यायेन ।सर्वार्थसङ्क्षेपोयम् ॥ १ ॥" |
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| text | "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥" |
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| text | "इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥" |
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| text | "क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि्ध सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥" |
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| text | "तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥" |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Narayanashruthi-id">'हिंसाहेतुश्च जीवस्य परेण प्रेर्यते च यत् ।<br/>अव्यक्तादि शरीरं तत् तत्क्षेत्रं क्षीयतेत्र यत् ।<br/>इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं देहो व्याप्तिश्च चेतसः ।<br/>तद्विकारा इति ज्ञेयाश्चिद्रूपेच्छादिमिश्रिताः ।<br/>विकारेच्छादिनिर्मुक्तश्चिन्मात्रेच्छादिसंयुतः ।<br/>मुक्त इत्युच्यते जीवो मुक्तिश्च द्विविधा मता ।<br/>चिन्मात्रद्वेषदुःखे च देहो मिथ्यादृगात्मकः ।<br/>निषिद्धेच्छा च यत्र स्युर्नित्या सा मुक्तिरासुरी ।<br/>चिन्मात्रा वैष्णवी भक्तिर्देहः सम्यग्दृगात्मकः ।<br/>सुखमिच्छानुकूला च धृतिर्दैवी तु सा मता'' ॥</span>
इति नारायणश्रुतिः ॥२ ॥ 'क्षेत्रज्ञो भगवान् विष्णुर्नह्यन्यः क्षेत्रमञ्जसा ।
वेत्त्यसौ भगवान् ज्ञेयो व्यक्ताव्यक्तविलक्षणः ।
स तु जीवेषु सर्वेषु बहिश्चैव व्यवस्थितः ।
विलक्षणश्च जीवेभ्यः सर्वेभ्योपि सदैव च ।
सर्वतः पाणिपादादिर्यतः पाण्यादिशक्तिमान् ।
केशादिष्वपि सर्वत्र कृष्णकेशो हि यादवः ।
अणोरणुतरै रूपैः पाणिपादादिसंयुतैः ।
सर्वत्र संस्थितत्वाद् वा सर्वतः पाणिपादवान् ।
सर्वेंद्रियाणां विषयान् वेत्ति सोप्राकृतेंद्रियः ।
यतोतोनिंद्रियः प्रोक्तो यन्न भिन्नेंद्रियोथवा ।
गुणैः सत्त्वादिभिर्हीनः सर्वकल्याणमूर्तिमान् ।
अन्यथाभावराहित्यादचरश्चर एव च ।
'चरणात् सर्वदेशेषु व्याप्तोणुर्मध्यमस्तथा ।
सर्वगत्वात् समीपे च दूरे चैवान्तरे च सः ।
अनन्ताव्ययशक्तित्वात् तदन्यत्र विरोधिनः ।
सन्ति सर्वे गुणास्तत्र न च तत्र विरोधिनः'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">न च जीवस्य क्षेत्रज्ञनाम- 'क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूतीर्जीवस्य मायारचिता अनित्याः ।<br/>आविर्हिताश्चापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः'' ॥</span>
इति हि भागवते ।
अतः 'एतद् यो वेत्ति'' इत्युक्ते जीवस्यापि किञ्चिज्ज्ञानात् तत्प्राप्तेस्तन्निवारणार्थं 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि्ध'' इत्याह । अन्यथा 'एतद् यो वेत्ति'' इत्युक्तेनैव सिद्धत्वात् 'क्षेत्रज्ञं चापि'' इति व्यर्थम् । भेदपक्षे तु नामनिरुक्त्यर्थं 'एतद् यो वेत्ति'' इति । सर्वाभेदमपि केचिद् वदन्तीति क्षेत्रं च ज्ञश्चेति व्युत्पत्तिं निवारयति । क्षेत्रज्ञं मां सर्वक्षेत्रेषु स्थितत्वेन विद्धीत्यर्थः । तत्पक्षे तु 'यो वेत्ति'' इत्युक्ते ईश्वरस्यापि क्षेत्रज्ञत्वं सिद्धमेव । सर्वाभेदविवक्षायां च सर्वं क्षेत्र(ज्ञ)मिति वक्तव्यम् । 'सर्वक्षेत्रेषु'' इति व्यर्थम् । न च तत्पक्षे मामित्यस्य कश्चिद् विशेषः । किन्त्वेक एव क्षेत्रज्ञ (अहम्) इति वक्तव्यम् ।॥३ ॥ यतश्च यत् । यतः परमेश्वरानुमतेरिदं याति प्रवर्तते । स चानुमन्ता यः । अनुसारिणी मतिरनुमतिः प्रेरणारूपा ।
प्रेरणानुमतिः प्रोक्ता क्वचित् संवाद उच्यते ।
प्रेरकत्वात्तु भगवाननुमन्ता प्रकीतितः ॥ इति च ।
उपद्रष्टानुमन्ता चेत्यनेनैवानुमतिरनुमन्ता चोक्तः । ज्ञेयं यत्तदित्यादिना 'यत्प्रभाव'' इत्यपि ॥४ ॥" |
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| text | "ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥" |
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| text | "महाभूतान्यहङ्कारो बुदि्धरव्यक्तमेव च ।
इंद्रियाणि दशैकं च पञ्च चेंद्रियगोचराः॥६ ॥" |
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| text | "इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥" |
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| text | "चेतना चित्तव्याप्तिः ।
'सङ्घातो देह उद्दिष्टश्चित्तव्याप्तिस्तु चेतना'' । इति च ॥७ ॥" |
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| text | "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥" |
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| text | "इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥" |
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| text | "असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥" |
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| text | "मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥११ ॥" |
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| text | "अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१२ ॥" |
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| text | "तत्त्वज्ञानविषयस्य विष्णोः । अपरोक्षदर्शनं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । ज्ञायतेनेनेति ज्ञानम्, ज्ञप्तिर्ज्ञानमिति व्युत्पत्त्या 'एतज्ज्ञानम्'' इति ज्ञानसाधनं ज्ञानं चोक्तम् ॥ १२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| text | "ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| verseType | null |
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| text | "अनादीत्युक्ते स्वयं कारणं न भवतीत्याशङ्का स्यादिति तन्निवृत्त्यर्थं 'अनादिमत्'' इत्याह ।
'मुख्यतो गुणपूर्णत्वात् परं ब्रह्म जनार्दनः ।
मूर्तामूर्तव्यतीतत्वान्न सन्नैवासदुच्यते'' ॥ इति च ।
'मूर्तं सदवगम्यत्वादज्ञेयत्वादसत् परम् ।
पुंसामर्थ्यादगम्यत्वात् सर्ववेदप्रसिदि्धतः ।
विलक्षणः सदसतोर्भगवान् विष्णुरव्ययः'' ॥ इति च ॥१३ ॥" |
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| text | "सर्वेंद्रियगुणाभासं सर्वेंद्रियविवर्जितं ।
असक्तं सर्व(भृच्चैव)भुक्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-747" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| text | "अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-748" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| text | "ज्योतिषामपि तज्जयोतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| text | "इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-750" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| text | "ज्ञानेन मुक्तौ प्राप्यत्वाज्ज्ञानगम्यम् । 'स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ'' इति स्वज्ञेयत्वाज्ज्ञेयम् । अन्यज्ञेयत्वस्य 'ज्ञेयं यत् तत्'' इति पूर्वमेव सिद्धत्वात् । कर्तृकर्मविरोधवादिमतं निराकरोत्युत्तरज्ञेयशब्देन ।
स्ववेत्ता वेदनं च स्वं स्वेन वेद्यश्च केशवः ।
परस्य वेत्ता वित्तिश्च वेद्यश्च स्यात् परैः क्वचित् ।
तत्प्रसादं विना कश्चिन्नै(नं)वं वेत्तुं हि शक्नुयात् ।
स्ववेदनेन्यवित्तौ वा नासावन्यदपेक्षते ।
स्वप्रकाश इति प्रोक्तस्तेनैकः पुरुषोत्तमः ।
जीवानां स्वप्रकाशत्वं तत्प्रसादात् स्ववेदनम्'' । इति च ।
मद्भावाय मयि भावाय ॥ १५-१९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-751" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विदि्ध प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-752" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| text | "'प्रकृतिं पुरुषं च'' इत्यत्र पुरुषशब्देन जीवपरयोः प्रकृतिशब्देन चेतना-चेतनप्रकृत्योः स्वीकाराय उभावपीति । विकाराणां सत्वादीनां चोपादानत्वविवक्षया प्रकृतिसम्भवत्वम् । स्वातन्त्र्यं तु परमेश्वरस्यैव । 'उपद्रष्टानुमन्ता च'' इत्यादिवक्ष्यमाणत्वात् । गुणानां च विकारत्वेप्यधिकविकारत्वविवक्षयान्येषां 'विकारांश्च गुणांश्च'' इति पृथगुक्तिः ॥ २० ॥" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| text | "कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-754" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| verseType | null |
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| text | "'स्वदेहेंद्रियहेतुत्वं यज्जीवस्य स्वकर्मभिः ।
आवृत्य विष्णुतत्त्वं तद्धेतुश्चित्प्रकृतिर्मता ।
जीवस्य सुखदुःखानां भोगशक्तिप्रदः सदा ।
परमः पुरुषो विष्णुः सर्वकर्तापि सन् सदा ।
विशेषकर्ता केषाञ्चिदुक्तो यद्वद् विकुण्ठपः ।
उच्यते सर्वपालोपि विशेषेण स कर्मणा'' ॥ इति च ।
परमेश्वरस्यैव सर्वकर्तृत्वेपि भोक्तृत्वदाने देव्या अल्पप्रवृत्तिरिति दर्शयितुं 'उच्यते'' इति स्थानद्वयेप्युक्तम् । कर्तृत्वेपि स एव मुख्यहेतुः । तथापि भोक्तृत्वापेक्षया तस्या अधिकप्रवृत्तिरिति 'कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते'' इति, सर्वहेतुत्वेपि विष्णोः प्रकृतेर्जीवं प्रति भोक्तृत्वदानेल्पप्रवृत्तिरिति 'पुरुषो भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते'' इति विशेषहेतोरेवमुच्यत एव । मुख्यतस्तु सर्वहेतुत्वं विष्णोरेवेति भावः ।
॥२१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-755" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥" |
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| text | "उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः॥२३ ॥" |
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| verseType | null |
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| text | "'पुरुषः प्रकृतिस्थः'' इत्यत्र पुरुषशब्दो जीवे । उभयोरपि पुरुषशब्देन पूर्वं प्रस्तुतत्वात् । यथायोग्यमुपपत्तेः । कार्यकारणसम्बन्धं भोगं च मिथ्येति वदतां निवारणायाह । 'पुरुषः प्रकृतिस्थो हि'' इति । हीत्यनुभवविरोधं दर्शयति तेषाम् । न हि ज्ञाना-ज्ञानसुखदुःखादिविषयस्यान्तरानुभवस्य भ्रान्तित्वं क्वचिद् दृष्टम् । नचास्य मिथ्यात्वे किञ्चिन्मानम् । शरीरमारभ्यैव ह्यपरोक्षभ्रमो दृष्टः । तत्रापि बलवत्प्रमाणविरोधादेव भ्रान्तित्वं कल्प्यम् । साक्षिसिद्धस्यापि भ्रान्तित्वाङ्गीकारे येन सर्वस्य भ्रान्तित्वमभ्रान्तित्वं चात्मनोवगतं तदपि प्रमाणमात्मैव । व्यवहारतोप्यस्तीत्यत्र प्रमाणाभावाद् भ्रान्तिर-भ्रान्तिर्वा न किञ्चित् सिद्ध्यति ।
अनुभवो भ्रान्तिः इत्युक्ते भ्रान्तित्वे प्रमाणं तत्प्रामाण्यं च कुतः सिद्ध्येत् ? व्यवहारतः सर्वमङ्गीकुर्म इत्युक्ते व्यवहारो व्यवहर्ता च कुतः सिद्धः ? प्रतीतित इत्युक्ते सैव कुतः ? स्वत इत्युक्ते स्वस्य भ्रान्तित्वे प्रतीतिं विनैव प्रतीतिरस्तीति भ्रान्तिः स्यात् । स्वाभावोपि स्यात् । स्वयमस्तीति च भ्रमः स्यात् । निरालम्बनो भ्रमो नोपपद्यत इत्यस्यापि भ्रमत्वोपपत्तेः । तत्प्रमाणमप्यप्रमाणमेव । प्रमाणत्वभ्रम इति न किञ्चित् सिद्ध्यति ।
भ्रम इत्यस्यैव भ्रमत्वे अन्यस्याभ्रमत्वमेव भवति । सुखदुःखादिविषयं ज्ञानमात्मस्वरूपमेवेति तस्य भ्रमत्वे छद्मना विनैव शून्यवादो भवति । न हि वृत्तिज्ञानविषयमज्ञानादिकं तेषामपि । भ्रमस्य चाविद्याकार्यत्वाङ्गीकारात् । आत्मस्वरूपस्याप्यविद्याकार्यत्वं स्यात् । दुर्घटत्वं भूषणमित्युक्ते दुर्घटत्वं सुघटत्वं चोभयं भूषणमस्माकमित्युत्तरम् । न हि प्रमाणसिद्धस्य दुर्घटत्वे सुघटत्वे वापवादो दृष्टः । दुर्घटत्वं भूषणमिति वदद्भिरात्मनोप्यविद्यात्वमङ्गीकृत्य तदयुक्तमित्युक्ते तत्रापि भूषणत्वं किमिति नाङ्गीक्रियते ? अतिसुकरत्वात् । न चात्मनोप्यविद्यात्वं वदतां तेषामुत्तरम् । अतोनन्तदोषदुष्टत्वाद्धीति प्रसिद्ध्यैव भगवता निराकृताः॥ २२ ॥ अस्य जीवस्य सदसद्योनिजन्मसु कारणं सत्त्वादिगुणसङ्गः । स्वतन्त्रकारणं तु परमेश्वर एवेत्याह उपद्रष्टानुमन्तेति ।
'सर्वेभ्य उपरि द्रष्टा यदुपद्रष्टॄनामकः ।
स्वातन्त्र्यात् स्वानुकूल्येन मत्या पे्ररयति स्म यत् ।
अनुमन्तेति कथितः स्वयं प्रभुरजो हरिः ।
महाशक्तिर्यतो विष्णुर्महेश्वर इतीरितः ।
परमत्वाच्च तस्यैव ह्यनुमन्तृत्वमुच्यते ।
स एव सर्वदेहेषु देहिनोन्यो व्यवस्थितः'' ॥ इति च ।
'मां विदि्ध सर्वक्षेत्रेषु'' इति देहेप्युक्तः । तेनाहमेव स इति दर्शयति ।
॥२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-758" |
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| oldKey | "BGT_C13_V24" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C13" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "य (एनं) एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोपि न स भूयोभिजायते॥२४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-759" |
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| oldKey | "BGT_C13_V24_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'द्विविधं पुरुषं चैव प्रकृतिं द्विविधामपि ।
सह तत्तद्गुणैः सम्यग् ज्ञात्वा पश्यति यः पुमान् ।
सर्वथा वर्तमानोपि न स भूयोभिजायते'' ॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-760" |
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| oldKey | "BGT_C13_V25" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-761" |
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| oldKey | "BGT_C13_V26" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-762" |
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| oldKey | "BGT_C13_V26_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "'अनादियोग्यताभेदात् पुंसां दर्शनसाधनम् ।
नानैव तत्र विष्णोस्तु प्रसादाद् वैष्णवं वपुः ।
स्वयं विज्ञायते किञ्चित् श्रूयते किञ्चिदन्यतः ।
तथा ज्ञात्वा हरिं ध्यात्वा स्वान्तः पश्यन्ति केचन ।
ऋषयः केचिदृषयो नारदाद्या बहिस्त्वपि ।
देवा विष्णुप्रसादेन लब्धसत्प्रतिभाबलात् ।
सर्वं क्रमेण विज्ञाय प्रतिभास्पष्टताक्रमात् ।
पश्यन्ति बहिरन्तश्च विष्णुं ध्यानमृतेपि तु ।
येषां ध्यानमृते दृष्टिस्तेषां ध्यानेपि दर्शनम् ।
स्यादेव साङ्ख्ययोगास्ते देवा ब्रह्माधिकोत्र च ।
केचित्तु क्षत्रियवरा अश्वमेधादिकर्मभिः ।
यजन्तो भक्तिमन्तश्च यज्ञभागार्थमागतम् ।
श्रवणप्रतिभाभ्यां च स्मरन्तः पुरुषोत्तमम् ।
पश्यन्त्यन्ये तथान्येभ्यः सर्वं श्रुत्वानुमत्य च ।
उपास्यैव तु पश्यन्ति नान्यथा तु कथञ्चन ।
ऋषीन् राज्ञस्तथारभ्य प्रतिभाभ्यधिका क्रमात् ।
यावद् ब्रह्मा ब्रह्मणस्तु प्रायो नाप्रतिभासितम् ।
विष्णोः प्रीत्यर्थमेवास्य श्रोतव्यं प्रायशो हरेः ।
अन्येषां श्रवणाज्ज्ञानं क्रमशो मानुषोत्तरम् ।
अत्यल्पप्रतिभानत्वान्मानुषाः श्रुतवेदिनः ।
सर्वे ते दर्शनात् तस्मात् स्वयोग्यान्मुक्तिगामिनः'' ॥ इति च ।
अन्येषामपि किञ्चिच्छ्रवणे विद्यमानेपि मानुषाणामत्यल्पप्रतिभानत्वात् 'श्रुत्वान्येभ्यः'' इति विशेषणम् । मनुष्याणां प्रतिभामूलप्रमाणापेक्षा प्रायो न सम्यगुत्पद्यते अल्पा चेति 'श्रुतिपरायणाः'' इति ।
'अश्रुतप्रतिभा यस्य श्रुतिस्मृऽत्यविरोधिनी ।
विश्रुता नृषु जातं च तं विद्याद् देवसत्तमम् ।
यश्च स्वमुखमानेन नवाधोदेहवान् पुमान् ।
अष्टमानवती स्त्री च षण्णवत्यङ्गुलौ पुनः ।
दशताौ सप्तपादौ विद्यात् तौ च सुरोत्तमौ ।
यावत् पञ्चाङ्गुलोनं तद्देवमानं क्रमात् परम् ।
पादे त्वङ्गुलमात्रोनं तदूनं चतुरङ्गुलम् ।
यावद्देवोपदेवानां पादे चोनाङ्गुलं पुनः ।
तावन्मनुष्यमानं स्यात् ततोधस्त्वासुरं स्मृऽतम् ।
द्विचत्वार्यधिकं तस्मात् षण्णवत्यङ्गुलादधः ।
ज्ञेयमङ्गुलमानं तदुपदेवादिषु स्फुटम् ।
देवेष्ववरवज्ज्ञेयमृषीणां चक्रवर्तिनाम् ।
यावद् यावत् प्रियो विष्णोस्तावत् स्त्रीपुंस्वरूपिणः ।
हरेः सादृश्यमस्य स्यादनादिक्रमसुस्थिरम्'' ॥ इति च ॥ २५-२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-763" |
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| oldKey | "BGT_C13_V27" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
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| chapter | "BGT_C13" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्वि भरतर्षभ॥२७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-764" |
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| oldKey | "BGT_C13_V28" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-765" |
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| oldKey | "BGT_C13_V29" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-766" |
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| oldKey | "BGT_C13_V29_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Vakshyamana-id">'क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्'' इत्यत्र क्षेत्रं श्रीः'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्''</span>
इति वक्ष्यमाणत्वात् ।
'अव्यक्तं च महद् ब्रह्म प्रधानं क्षेत्रमित्यपि ।
उच्यते श्रीः सदा विष्णोः प्रिया निर्दोषचिद्घना ।
सा हि न व्यज्यते विष्णुरत्र क्षेति महागुणा ।
जीवोत्तमा च तेनैतैः शब्दैरेकाभिधीयते ।
महान् ब्रह्मा जीवमहान् परात्मप्रेरिताः क्रियाः ।
अहं कर्तेति येनायं जीवो मंस्यत्यसौ शिवः ।
सोहङ्कार इति प्रोक्तो जीवाहङ्कृतिकृद् यतः ।
उमा बुदि्धरिति ज्ञेया शब्दादिज्ञानदा यतः ।
मतिदो मन उद्दिष्ट इन्द्रः स्कन्दोपि तत्सुतः ।
श्रोत्रं तु श्रावयंश्चन्द्रः स्पर्शो वायुसुतो मरुत् ।
चक्षुः सूर्यश्चक्षयति जिह्वा वारिपतिर्हृतेः ।
अश्विनौ घ्राणमाघ्रातेर्वागग्निर्वचनादपि ।
हस्तौ वायुसुतौ ज्ञेयौ मरुतौ हानिलाभयोः ।
पादौ तु विष्णुनाविष्टौ यज्ञशम्भू शचीसुतौ ।
पदनादेव पायुश्च भुक्तस्यैवाप्ययाद् यमः ।
सन्तत्युपस्थितिकृतेरुपस्थः सशिवो मनुः ।
विनायकस्तथाकाशो निरावृत्या प्रकाशनात् ।
प्रधानवायुजो भूतवायुर्नाम्ना मरीचिकः ।
अग्निश्च पृथिवी चैव प्रसिद्धौ वरुणो जलम् ।
अदनात् प्रथनाज्जन्मजयहेतोस्तथाभिधाः ।
शब्दाद्याः पञ्च शिवजाः शब्दनात् स्पर्शनादपि ।
रूपणाद् रसनाच्चैव गन्धनाच्च तथाभिधाः ।
सुखं धृतिश्चेतना च सुखनाद् विधृतेरपि ।
चेतोनेतृत्वतश्चैव मुख्यवायुः सरस्वती ।
श्रीश्चेच्छा चैव सा वायोः पत्नी त्वे(वं)व धृतिर्मता ।
इच्छादानात्तु सैवेच्छा स्थानभेदात्तु देवताः ।
पृथक् पृथक् च कथ्यन्ते लक्ष्म्याद्या उदिता अपि ।
दुःखद्वेषौ कलिश्चैव द्वापरो ब्रह्मणः सुतौ ।
प्रवरावसुराणां तौ सङ्घातश्चेतनाः परे ।
एतैरभिमतं यच्च तत्तन्नाम्नाभिधीयते ।
चेतनाचेतनं त्वेतत् सर्वं क्षेत्रमितीरितम् ।
क्षितिरेतद् भगवतो यदतः क्षेत्रमीर्यते ।
क्षिणोति त्राति चैवैतत् सोतो वा क्षेत्रमुच्यते ।
क्षितिं कृत्वा त्राति चैतदतो वा क्षेत्रमीरितम् ।
एतस्मात् क्षीणमेतेन त्रातमित्यथवा पुनः ।
इच्छाद्यानां क्षेत्रनाम्नामपि नामान्तरं स्मृऽतम् ।
विकारा (विशेषा) इति यस्मात् ते विशेषविकृतिस्थिताः ।
विशेषात् क्रियते यस्माद् विकारं कार्यम(न्तिमम्)न्तगम् ।
विगतं करणं वात्र पुनर्नाशमृते यतः ।
तत्सम्बन्धाद् विकाराख्या इच्छाद्या अभिमानिनः ।
एतत् सर्वं सर्वदैव निर्दोषेणैव चक्षुषा ।
प्रेरयन्नेव जानाति यत् क्षेत्रज्ञो हरिस्ततः'' ॥ इति च ।
'यस्यात्मा शरीरम्'' इत्यादिश्रुतेश्चेतनस्यापि 'इदं शरीरं कौन्तेय'' इति शरीरत्वोक्तिर्युज्यते ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'सत्त्वं जीवः क्वचित् प्रोक्तः क्वचित् सत्त्वं जनार्दनः ।<br/>सत्त्वं नाम गुणः क्वापि क्वचित् साधुत्वमुच्यते'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ।
<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वम्''</span>
इति च पैङ्गिश्रुतिः ।
<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">'जनी प्रादुर्भावे'' इति धातोर्जीवस्यापि शरीरे व्यक्त्यपेक्षया जनिर्युज्यते ।॥२७ ॥ जीवेषु दुःखयोगादिरूपेण विनश्यत्स्वप्यतथाभूतम् 'दुःखयोगादिरूपेण जीवेषु विनश्यत्स्वपि ।<br/>दुःखयोगादिरहितः सर्वजीवेष्ववस्थितः ।<br/>गुणैः सर्वैः समो नित्यं न हीनो हीनगोपि सन् ।<br/>इति पश्यति यो विष्णुं स एव न तमो व्रजेत्'' ॥</span>
इति पाद्मे ॥ २८,२९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-767" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V30" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥३० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-768" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V30_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavad-id">प्रकृत्य स्वयमेव प्रारभ्य विष्णुना क्रियमाणानि । विष्णोर्नान्य पूर्वप्रेरक इति । 'पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात्''</span>
इति भगवद्वचनात् ।
'द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।
यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">'स्वयं प्रकृत्य भगवान् करोति निखिलं जगत् ।<br/>नैव कर्ता हरेः कश्चिदकर्ता तेन केशवः'' ॥</span>
इति स्कान्दे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">तेनेति प्रस्तुतत्वादेव सिद्धम् । 'अहं सर्वस्य प्रभवः'' 'स हि कर्ता'' 'कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्'' 'जन्माद्यस्य यतः'' 'मत्त एवेति तान् विदि्ध'' इत्यादिसकलप्रमाणविरोधश्चान्यथा । 'प्रकृत्यैव च'' इति चशब्दाच्चैतेनैवेति सिद्ध्यति ।<br/>'प्रकृतेन क्रियायोगं चशब्दः क्वचिदीरयेत् ।<br/>क्वचित् समुच्चयं ब्रूयात् क्वचिद् दौर्लभ्यवाचकः'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ।
प्रकृतेः कर्तृत्वं 'रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्'' इत्यादिना च निरस्तम् । 'न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे'' इति च । केवलप्रकृतेः कर्तृत्वाङ्गीकारे चशब्दोपि व्यर्थः । 'तत एव च विस्तारम्'' इति वाक्यशेषविरोधश्च । 'अहं बीजप्रदः पिता'' इति वक्ष्यमाणमत्रापि 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्'' इति प्रकृतमिति तेनापि विरोधः । अचेतनं करोतीति स्वोक्तिविरोधश्च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">'इच्छापूर्वक्रियादानं कर्तृत्वं मुख्यमीरितम्''</span>
इति हि पैङ्गिश्रुतिः ।
विकारलक्षणं कर्तृत्वं तु प्रकृतेरङ्गीकृतमेव । तथापि लक्ष्मीपरमेश्वरमुक्तचेष्टासु तदभावात् 'सर्वशः'' इत्यस्य सङ्कोचप्राप्तिः ।
'अचेतनाश्रितं कर्म विकारात्मकमीरितम् ।
यत्तु केवलचित्संस्थं प्रत्यभिज्ञाप्रमाणतः ।
अविकारात्मकं ज्ञेयं तन्न तत् प्राकृतं भवेत्'' ॥ इति च ॥३० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-769" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V31" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-770" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V31_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'एकविष्ण्वा(श्रितानां)श्रयाणां तु जीवानां भेदमेव यः ।
ततः परस्परं चैव तारतम्येन पश्यति ।
विष्णोरेव च विस्तारं जगतः स विमुच्यते'' ॥ इति च ॥३१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-771" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V32" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-772" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V33" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-773" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V34" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-774" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V34_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">शरीरस्थो जीवः । 'स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्य असुप्तः सुप्तानभिचाकशीति''</span>
इति श्रुतेः ।
'शरीरस्थस्तु संसारी शरीराभिमतेर्मतः ।
विष्णुः शरीरगोप्येष न शरीरस्थ उच्यते ।
शरीराभिमतिर्यस्मान्नैवास्यास्ति कदाचन ।
तद्गतानां तु दुःखानां भोगोभिमतिरुच्यते ।
तदभावान्नाभिमानी भगवान् पुरुषोत्तमः'' ॥ इति च ।
अनादित्वान्निर्गुणत्वाच्च परमात्मा जीवोपि न । किमुत जडं न भवतीति ? शरीरोत्पत्तिलक्षणमप्यादिमत्त्वं परमस्य नास्तीति विशेषः । जीवस्य हि तदस्तीति । सत्त्वादिगुणसम्बन्धश्च । सर्वं करोति परमात्मा । तथापि न लिप्यते । वादिसिद्धत्वादेव 'इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठम्'' इत्यादिवन्निषेधः ।
'कुर्वाणोपि यतः सर्वं पुण्यपापैर्न लिप्यते ।
जन्ममृत्यादिरहितः सत्त्वादिगुणवर्जितः ।
विष्णुस्तद्विपरीतस्तु जीवोतस्तौ पृथक् सदा'' ॥ इति च ।
'स एष नेति नेति'' इत्यादि च ॥ ३२-३४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-775" |
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| oldKey | "BGT_C13_V35" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-776" |
|---|
| oldKey | "BGT_C13_V35_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C13" |
|---|
| chapter | "BGT_C13" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "जीवानामचेतनप्रकृतेर्मोक्षं भूतप्रकृतिमोक्षम् ॥ ३५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-777" |
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| oldKey | "BGT_C14_I01" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | null |
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| text | "साधनं प्राधान्येनोत्तरैरध्यायैर्वक्ति-" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-778" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_I02" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्पष्टीकरणपूर्वकं त्रैगुण्यं विविच्य दर्शयति ।" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-779" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_V01" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिदि्धमितो गताः॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-780" |
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| oldKey | "BGT_C14_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-781" |
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| oldKey | "BGT_C14_V03" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-782" |
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| oldKey | "BGT_C14_V03_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'योनिर्भार्या तथा स्थानं योनिः कारणमेव च''</span>
इति शब्दनिर्णये । अत्र योनिर्भार्या 'तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्'' इति वाक्यशेषात् ॥ ३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-783" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-784" |
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| oldKey | "BGT_C14_V05" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-785" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-786" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "रजो रागात्मकं विदि्ध तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-787" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तमस्त्वज्ञानजं विदि्ध मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-788" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-789" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-790" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सर्वद्वारेषु देहेस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-791" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-792" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अप्रकाशोप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-793" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान् प्रतिपद्यते॥१४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-794" |
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| oldKey | "BGT_C14_V15" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-795" |
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| oldKey | "BGT_C14_V16" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-796" |
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| oldKey | "BGT_C14_V17" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोज्ञानमेव च॥१७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-797" |
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| oldKey | "BGT_C14_V18" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-798" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोधिगच्छति॥१९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-799" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोमृतमश्नुते॥२० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-800" |
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| oldKey | "BGT_C14_V21" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणानतिवर्तते॥२१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-801" |
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| oldKey | "BGT_C14_V21_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C14" |
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| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Mahavishnu-id">एतेभ्यः सत्त्वादिगुणेभ्योन्यं कर्तारमीशं यदा पश्यति तदैवायं ना पुरुषः । अन्यथा पशुसमः । न केवलमन्यत्वेन पश्यन् ना तं कर्तारं विष्णुम् किन्तु गुणेभ्य उत्तमत्वेन च । कथं स एव ना ? यस्मात् 'मद्भावं सोधिगच्छति'' ।<br/>'महालक्ष्मीरिति परा भार्या नारायणस्य या ।<br/>प्रकृतिर्नाम सा ज्ञेया प्रकर्षेण करोति यत् ।<br/>तस्यास्तु त्रीणि रूपाणि सत्त्वं नाम रजस्तमः ।<br/>सृष्टिकाले विभज्यन्ते सत्त्वं श्रीः सद्गुणप्र(भा)दा ।<br/>रजो रञ्जनकर्तृत्वाद् भूः सा सृष्टिकरी यतः ।<br/>यदावेशादियं पृथ्वी भूमिरित्येव कथ्यते ।<br/>जीवानां ग्लपनाद् दुर्गा तम इत्येव कीर्तिता ।<br/>एताभिस्तिसृभिर्जीवाः सर्वे बद्धा अमुक्तिगाः ।<br/>सर्वान् बध्नन्ति सर्वाश्च तथापि तु विशेषतः ।<br/>श्रीर्देवबन्धिका नॄणां भूर्दैत्यानामथापरा ।<br/>एताभ्योन्यं परं चैव विष्णुं ज्ञात्वा विमुच्यते ।<br/>सामर्थ्यातिशयादासां नैताभ्यो विद्यते परः ।<br/>इति यावद् विजानाति तावत् तं नृपशुं विदुः ।<br/>तस्मादाभ्योधिकगुणो विष्णुर्ज्ञेयः सदैव च'' ॥</span>
इति महाविष्णुपुराणे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'रजसस्तु फलं दुःखम्'' इत्यत्र दुःखमिति दुःखमिश्रं सुखम्- 'दुखं दुरिति सम्प्रोक्तं खं नाम सुखमुच्यते'' ।</span>
इति शब्दनिर्णये ।
<span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">'कर्मणो राजसस्योक्तं दुःखमिश्रं सुखं फलम् ।<br/>अज्ञानजं तामसस्य नित्यदुःखं फलं विदुः'' ।</span>
इति स्कान्दे ॥१६-२१॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-802" |
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| oldKey | "BGT_C14_V22" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-803" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_V23" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-804" |
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| oldKey | "BGT_C14_V23_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">'लोकस्थितान् प्रकाशादीन् प्रायो न द्वेष्टि नेच्छति ।<br/>स्वयम्प्रकाशी मोहोज्झस्तथापि पुनरिच्छति ।<br/>विष्णौ प्रकाशं तं चैव नित्यभक्त्याभिसेवते ।<br/>सुखदुःखादिभावेपि विष्णुभक्तौ समः सदा ।<br/>अर्थार्थं वा प्रियार्थं वा निन्दादीनां भयादपि ।<br/>न विष्णुभक्तिह्रासोस्य किन्तु साम्यमथोन्नतिः ।<br/>अवैष्णवारम्भवर्जी विष्णुं याति न संशयः'' ॥ इति च ॥२२ ॥ उदासीनवदित्युक्तेश्च न केवलोदासीनत्वम् । नेङ्गते इत्युदासीनप्रवृत्ति-निषेधः । सर्वारम्भपरित्यागीति विशेषप्रयोजनापेक्षयापि न अवैष्णवारम्भः इति । 'इङ्गनं क्षणिकं कर्म दीर्घमारम्भ उच्यते''</span>
इति शब्दनिर्णये ॥ २३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-805" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-806" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_V25" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-807" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_V26" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मां च योव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-808" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_V26_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'लक्ष्म्यादिभिः कृतो बन्धो योनादिः पुरुषस्य तु ।
तमत्येतीह यो विद्वान् स विज्ञेयो गुणात्ययी'' ॥ इति च प्रवृत्ते ।
तत्कृतबन्धात्ययात् तदधिकविष्णुप्राप्तेश्च तदत्ययीत्युच्यते । यथा द्वारपालमतीत्य राजानं गच्छतीति । ब्रह्मणि भूयं ब्रह्मभूयम् । ब्रह्मेति प्रकृता महालक्ष्मीः 'अतीत्य त्रीणि रूपाणि महालक्ष्मीं प्रपद्यते ।
तया त्वनुगृहीतोसौ वैष्णवो विष्णुगो भवेत्'' ॥ इति च ॥२६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-809" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_V27" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-810" |
|---|
| oldKey | "BGT_C14_V27_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C14" |
|---|
| chapter | "BGT_C14" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "ब्रह्म प्राप्तो मत्प्राप्त (इव) एव भवतीत्याह- ब्रह्मणो हीति । मदवियोगात् तस्या अपि मत्स्थ एव भवतीत्यर्थः । तथापि प्राप्तिक्रमविवक्षया तदुक्तिः । एकान्तिकस्य सुखस्य मोक्षस्य ॥ २७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-811" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_I01" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "संसारस्वरूपतदत्ययोपायविज्ञानान्यस्मिन्नध्याये दर्शयति-" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-812" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_I02" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "त्रयोदशोक्तं विविच्य दर्शयति-" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-813" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-814" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'पृथङ्ग् मूलं हरिस्त्वस्य जगद्वृक्षस्य भूमिवत् ।
सत्त्वादियुक्ते चिदचित्प्रकृती मूलभागवत् ।
अत्रापि चिदचिद्योगो वृक्षवत् सम्प्रकीर्तितः ।
पृथिवीदेवतावत् तद्धरिर्मृद्वदचेतना ।
उत्तमत्वात्तु मूलानामूर्ध्वमूलस्त्वयं स्मृऽतः ।
नीचास्ततो महदहम्बुद्धयो भूतसंयुताः ।
शाखाश्छन्दांसि पर्णानि काममोक्षफले ह्यतः'' ॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-815" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-816" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "कारणेषु स्थितं कार्यं व्याप्तं कार्येषु कारणम् ।
अन्योन्यसंयुताः शाखाः मूलानि च सदैव तु ।
विषयाः दर्शनीयत्वात् प्रवालसदृशाः मताः ॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-817" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_V03" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्रेण दृढेन छित्त्वा॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-818" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_V04" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ततः परं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-819" |
|---|
| oldKey | "BGT_C15_V04_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C15" |
|---|
| chapter | "BGT_C15" |
|---|
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|---|
| text | "जगद्वृक्षोयमश्वत्थो ह्यश्ववच्चञ्चलात्मकः ।
अव्ययोयं प्रवाहेण स्वस(क्ति)क्तज्ञानहेतिना ।
विष्णोः सम्यक् पृथग्दृष्टिनामच्छेदनभाक् सदा ।
अव्यक्तादिसमस्तं तु नेति नेत्यादिवाक्यतः ।
बोधेनैव पृथग् विष्णोः कृत्वा मृग्यः स केशवः ।
तमेवाद्यं प्रपद्येत यदंशाभासको ह्ययम् ।
जीवराशिः समस्तोपि ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वकः ॥ ३-४ ॥" |
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| chapter | "BGT_C15" |
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| text | "निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥" |
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| text | "न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥" |
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| text | "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥" |
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| text | "किञ्चित् सादृश्यमात्रेण भिन्नोप्यंश इवोच्यते ।
ईश्वरस्तु यदा त्वस्य शरीरं विशति प्रभुः ।
मनःपष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ शब्दादीन् प्रति ... ॥ ७ ॥" |
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| chapter | "BGT_C15" |
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| text | "शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥" |
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| text | "... अथ यदा जीवमादाय यात्यतः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥८ ॥" |
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| text | "श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥" |
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| text | "यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥" |
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| text | "यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेखिलम् ।
यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विदि्ध मामकम्॥१२ ॥" |
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| text | "भुङ्क्ते हरिः शुभान् भोगानिंद्रियेषु व्यवस्थितः ।
पूर्णानन्दोपि भगवान् क्रीडया भुङ्क्त एव तु ॥ ९-१२ ॥" |
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| text | "गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥" |
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| text | "अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥" |
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| text | "सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृऽतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥" |
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| text | "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते॥१६ ॥" |
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| text | "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७ ॥" |
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| text | "यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C15" |
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| text | "यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९ ॥" |
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| text | "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुदि्धमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥" |
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| chapter | "BGT_C15" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Narayanashruthi-id">सौम्यत्वात् सोमनामासौ सोममण्डलगः सदा ।<br/>स एवाग्निस्थितो विष्णुः नाम्ना वैश्वानरः सदा ।<br/>सर्वेषां स नराणां यदुपजीव्यः सदैव च ।<br/>स एव व्यासरूपेण वेदान्तकृदुदाहृतः ।<br/>ब्रह्मरुद्रादयः सर्वे शरीरक्षरणात् क्षराः ।<br/>श्रीरक्षरात्मेत्युदिता नित्यचिद्देहका यतः ।<br/>चेतनाचेतनस्यास्य राशेः संस्थापकत्वतः ।<br/>कूटस्थ आत्मा सा ज्ञेया परमात्मा हरिः स्वयम् ।<br/>'क्षराक्षरात्मनोर्यस्मादुत्तमः स सदानयोः ।<br/>पुरुषोत्तमनाम्नातः प्रसिद्धो लोकवेदयोः'' ॥</span>
इति नारायणश्रुतिः ।॥ १३-२० ॥" |
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| text | "पुमर्थसाधनविरोधीनि अनेनाध्यायेन दर्शयति-" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| text | "अभयं सत्त्वसंशुदि्धर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-843" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| text | "तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥३ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "दम्भो दर्पोभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोसि पाण्डव॥५ ॥" |
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| text | "द्वौ भूतसर्गौ लोकेस्मिन् दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥" |
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| text | "असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| text | "एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥" |
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| text | "काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेशुचिव्रताः॥१० ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोहमहं भोगी सिद्धोहं बलवान् सुखी॥१४ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-855" |
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| text | "आढ््योभिजनवानस्मि कोन्योस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| text | "अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेशुचौ॥१६ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| text | "आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| text | "अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोम्यसूयकाः॥१८ ॥" |
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| text | "तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥१९ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| text | "आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२० ॥" |
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| text | "त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्त्रयं त्यजेत्॥२१ ॥" |
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| text | "एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| text | "यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिदि्धमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥" |
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| chapter | "BGT_C16" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-865" |
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| oldKey | "BGT_C16_V24_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C16" |
|---|
| chapter | "BGT_C16" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">देवासुरलक्षणम्- 'येतिमानेन मन्यन्ते परमेशोहमित्यपि मिथ्या जगदिदं सर्वं भ्रमजत्वान्न तिष्ठति ।<br/>मिथ्यात्वान्नेश्वरोस्यास्ति परेभ्यो न च जायते ।<br/>स्वस्मिन्नपि तथान्यस्मिन् नियन्तान्य इतीरिते ।<br/>प्रद्विषन्त्यसुरास्ते तु सर्वे यान्त्यधरं तमः ।<br/>अयोग्येशत्वकामत्वात् लोभाच्चात्मसमर्पणे ।<br/>तत्त्व(वेदेषु)वादिषु कोपाच्च तत(तम)स्तेषां न दुर्लभम् ।<br/>अक्षानुमागमानां च स्वोक्तेरपि विरोधिनः ।<br/>यस्मात् तेतोसुरा ज्ञेया एवमन्येपि तादृशाः ।<br/>ये तु विष्णुं परं ज्ञात्वा यजन्तेनन्यदेवताः ।<br/>प्रत्यक्षाद्यविसंवादिज्ञानादेव विमुक्तिगाः'' ॥</span>
इति ब्रह्मवैवर्ते ।
'निबन्धाय'' नीचस्थानेन्धे तमसि बन्धाय ।
'सर्गाणां सुबहुत्वेपि शुभाशुभपथाधिकौ ।
देवासुराख्यौ द्वावेव गन्धर्वाद्यास्तदन्तराः ।
मुक्तिगा एव विज्ञेया देवा एव विमुक्तिगाः'' ॥ इति च ।
'विमोक्षाय'' इत्यत्र वीत्युपसर्गादेव च मोक्षनानात्वं ज्ञायते ।
'देवासुरनरत्वाद्या जीवानां तु निसर्गतः ।
निसर्गो नान्यथैतेषां केनचित् क्वचिदेव वा ।
देवाः शापबलादेव प्रह्लादादित्वमागताः ।
अतः पुनश्च देवत्वं ते यान्ति निजमेव तु ।
हेतुतः सोन्यथाभावो रक्तता स्फटिके यथा ।
ततो नित्यश्च नाप्येष स्वभाव विनिवर्तकः ।
किञ्चाक्रम्यैव तं तिष्ठेद् देवसर्गस्ततो हि यः ।
अशोच्य एव विज्ञेयो मोक्षयोग्यो हरेः प्रियः'' ॥ इति च ॥ १-२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-866" |
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| oldKey | "BGT_C17_I01" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | null |
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| text | "गुणभेदान् प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन ।सदसत्कर्मविवेकः ।" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-867" |
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| oldKey | "BGT_C17_V01" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
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| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-868" |
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| oldKey | "BGT_C17_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
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| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-869" |
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| oldKey | "BGT_C17_V03" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
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| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-870" |
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| oldKey | "BGT_C17_V03_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C17" |
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| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "सत्त्वानुरूपा जीवानुरूपा अतो ये सात्त्विकश्रद्धास्ते सात्त्विका इति (ज्ञेयाः) ज्ञायन्तेन्येन्य इति । श्रद्धामयः श्रद्धास्वरूपः ।
'श्रद्धा स्वरूपं जीवस्य तस्माच्छ्रद्धाविभेदतः ।
उत्तमाधममध्यास्तु जीवा ज्ञेयाः पृथक् पृथक् ।
स्वरूपभूता श्रद्धैव तमोगानां च मोक्षिणाम् ।
शिष्यते संसृतिस्थानां श्रद्धारूपं मनोपरम् ।
तत्र स्वरूपश्रद्धैव व्यज्यते प्रायशः क्वचित् ।
सात्विकस्य तमोरूपा श्रद्धान्तःकरणात्मिका ।
सात्त्विकी तामसस्यापि भूयस्त्वात् तद् विविच्यते ।
श्रद्धेत्यास्तिक्यनिष्ठोक्ता सा येषां दैवतोत्तमे ।
विष्णौ तद्भक्तबुद्ध्यैव रमाब्रह्मादिकेषु तु ।
ते सात्त्विका इति ज्ञेयास्तैरिष्टं विष्णुरेव तु ।
श्रीश्च साध्यक्षविद्याख्या ब्रह्मेन्द्राद्याश्च देवताः ।
विबुधत्वात्तु मन्वाख्या भुञ्जते प्रीतिपूर्वकम् ।
व्यामिश्रयाजिनो ये तु विष्ण्वाधिक्ये ससंशयाः ।
स्वरूपमात्रे देवानां श्रद्धायुक्ताश्च सर्वदा ।
राजसास्ते तु विज्ञेयास्तैरिष्टं यक्षराक्षसाः ।
दीनत्वाद् देवनामानो ब्रह्मेन्द्रादिसनामकाः ।
गृह्णन्ति ये हरिं त्वन्यदेवादिसममेव वा ।
नीचं ब्रह्माद्यनन्यं वा मन्यन्ते नेति चाखिलम् ।
तत्तच्छ्रद्धायुतास्ते तु तामसाः परिकीर्तिताः ।
भूतप्रेतास्तु तैरिष्टं शिवस्कन्दादिनामकाः ।
साक्षाच्छिवपरीवारा भुञ्जते ह्यतितामसाः ।
मोक्षः साङ्कल्पिकः स्वर्गो भूतादित्वं फलं क्रमात् ।
त्यक्त्वापि शास्त्रविहितं मिथ्याज्ञानविवर्जिताः ।
भक्त्या विष्णुं यजन्तो ये निषिद्धाचरणोज्ज्ञिताः ।
तेपि यान्ति हरिं शास्त्रविधानस्थाः कुतः पुनः ॥३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-871" |
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| oldKey | "BGT_C17_V04" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-872" |
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| oldKey | "BGT_C17_V05" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-873" |
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| oldKey | "BGT_C17_V06" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-874" |
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| oldKey | "BGT_C17_V07" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-875" |
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| oldKey | "BGT_C17_V07_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C17" |
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| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपोधनाः (तपो जनाः) ।<br/>डम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ।<br/>अकृशानपि लक्ष्म्यादीन् देवान् विष्णुपरायणान् ।<br/>विष्णुं च सर्वदेहस्थान् कृशत्वेन विजानते ।<br/>तेषामल्पगुणत्वेन कल्पनात् ते तमो ध्रुवम् ।<br/>यान्ति ज्ञेयाश्च ते दैत्याः पिशाचा वाथ राक्षसाः ॥ अन्नैश्चैवाथ यज्ञाद्यैः प्रायो ज्ञेया इमे नराः ।<br/>सात्त्विका सात्त्विकान् कुर्युर्यस्मादन्ये तथेतरान् ॥ ओन्तत्सदिति यद् विष्णोर्नामत्रयमुदाहृतम् ।<br/>प्रसिद्धं वैदिकं तस्मात् कर्म सद्विषयं हि सत् ।<br/>तत्राश्रद्धाकृतं तस्मादसदित्येव कीर्त्यते ।<br/>विप्रा वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मादोताः परस्परम् ।<br/>विहिता विष्णुना तेन विष्णुरोमिति कीर्तितः ।<br/>ओतमस्मिन्निदं सर्वमिति चोक्तः स ओमिति ।<br/>तस्मादोमिति यज्ञादीन् प्रवर्तन्ते हि वैदिकाः ।<br/>अनोङ्कृतं ह्यासुरं स्याद् यत् तस्मादोङ्कृतं त्वपि ।<br/>ओङ्कारार्थहरेः सम्यगज्ञानादासुरं भवेत् ।<br/>फलं त्वनभिसन्धाय तद् ब्रह्म स्यान्ममास्पदम् ।<br/>इति यत् क्रियते कर्म तन्नामातो जनार्दनः ।<br/>अभिसन्धितं हि तत् प्रोक्तं ततं वा स्वगुणैः सदा'' ॥ इत्यादि च ।<br/>'मयः(मयं) प्रधानमुद्दिष्टं स्वरूपं कार्यमेव च''</span>
इति शब्दनिर्णये ।
<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">शास्त्रविहितमपि भगवच्छ्रद्धाहीनमसदेवेति वक्ष्यति'अश्रद्धया हुतम्'' इति । भगवच्छ्रद्धारहितत्वादेव चाशास्त्रविहितं भवति । 'विष्णुभक्तिविधानार्थं सर्वं शास्त्रं प्रवर्तते'' ॥</span>
इति पैङ्गिश्रुतिः ।॥ ४-७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-876" |
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| oldKey | "BGT_C17_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-877" |
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| oldKey | "BGT_C17_V08_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">स्थिराः स्थिरगुणाः घृतादयः । कवादीनामप्यारोग्यरसाद्यर्थत्वेन सात्त्विकत्वमेव । रस्यादीनामपि राजसत्वमनारोग्यादिहेतुत्वे ।'दुःखशोकामयप्रदाः'' इत्युक्तेः । सत्त्वं साधुभावः । भवति हि सोपि शुच्यन्नात् ।<br/>'हृद्यं पश्चान्मनोहारि प्रियं तत्कालसौख्यदम् ।<br/>सुखदं दीर्घसुखदं रस्यमभ्यास सौख्यदम्'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-878" |
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| oldKey | "BGT_C17_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कवाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-879" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V09_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "रूक्षं नीरसम् । तीक्ष्णं सर्षपादि ॥ ९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-880" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-881" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V10_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'यामान्तरितपाकं तु यातयाममुदीर्यते ।
क्वचिच्च गतसारं स्यान्नियम्यं यातमस्य यत्'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">पूर्वं स्वादु पश्चादन्यथाजातं गतरसम्'शुद्धभागवतानां तु स्वभावापेक्षयैव तु ।<br/>स्वादुत्वादि विजानीयात् पदार्थानां न चान्यथा'' ॥</span>
इति सूदशास्त्रे ।
॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-882" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-883" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विदि्ध राजसम्॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-884" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-885" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-886" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-887" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V15_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">'यागात्तु राजसात् स्वर्गः साङ्कल्पिक उदाहृतः ।<br/>लोकः स दीनदेवानां सनाम्नां वासवादिभिः ।<br/>विष्णावश्रद्धयायोग्यकामाच्चैषां पुनर्भवेत् ।<br/>नरकं च विना यज्ञं राजसा नरलोकगाः ।<br/>निषिद्धकर्म कुर्युश्चेदीयुस्ते नरकं ध्रुवम् ।<br/>'कदाचित् सात्त्विकाः कुर्युः कर्म राजसतामसम् ।<br/>अन्येन्यच्च तथाप्येषां स्थितिः स्वाभावि(की)के पुनः ।<br/>स्वं स्वं कर्म तु सर्वेषां सदैव स्यान्महत्फलम् । अन्यदल्पफलं चैव बाहुल्यं तेषु लक्षणम्'' ॥</span>
इति पाद्मे ॥ १२-१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-888" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुदि्धरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-889" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V16_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "मौनं मननम् ॥ १६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-890" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-891" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-892" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-893" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "दातव्यमिति यद्दानं दीयतेनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृऽतम्॥२० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-894" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृऽतम्॥२१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-895" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V22" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ओशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-896" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V22_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "युक्तैः भगवदर्पणादियोगयुक्तैः । युक्तैरिति दानादिषु सर्वत्र समम् ॥ १७-२२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-897" |
|---|
| oldKey | "BGT_C17_V23" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-898" |
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| oldKey | "BGT_C17_V24" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-899" |
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| oldKey | "BGT_C17_V25" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-900" |
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| oldKey | "BGT_C17_V26" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
|---|
| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-901" |
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| oldKey | "BGT_C17_V27" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C17" |
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| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-902" |
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| oldKey | "BGT_C17_V28" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C17" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-903" |
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| oldKey | "BGT_C17_V28_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C17" |
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| chapter | "BGT_C17" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">तत्सम्बन्धित्वादेव कर्मादि सत् । ओं तत्सदिति नाम्नां विष्णौ प्रसिद्धत्वात् । ''स्रवत्यनोङ्कृतं ब्रह्म परस्ताच्च विशीर्यते । अनोङ्कृतं आसुरं कर्म"</span>
इति श्रुतेः अनोङ्कृतस्य आसुरत्वप्रसिद्धेः ।
<span class="gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id">''अनर्थज्ञोदितो मन्त्रो निरर्थस्त्राति मानतः ।<br/>यन्मन्त्रस्तेन कथितो मन्त्रार्थो ज्ञेय एव तत्" ॥</span>
इति पैङ्गिश्रुतेश्च ।
तदर्थत्वेन फलानभिसन्धिपूर्वककर्मणः एव सात्विकत्वाच्च । तद्भक्त्या तत्स्मरणपूर्वकमेव कर्म सत् अन्यदसदेवेति भावः । राजसस्यापि असदन्तर्भाव एव । विष्णुश्रद्धारहितत्वात् ॥ 'सात्त्विकं मोक्षदं कर्म राजसं सृतिदुःखदम् ।
तामसं पातदं ज्ञेयं तत् कुर्यात् कर्म वैष्णवम्'' ॥ इत्याग्नेये॥२३-२८॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-904" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "पूर्वोक्तं साधनं सर्वं सङ्क्षिप्योपसंहरति अनेनाध्यायेन-" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-905" |
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| type | "introduction" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "सर्वाध्यायोक्तधर्मस्य समासतो निर्णयात्मकोनुक्तत्रैगुण्यवादी चायम् ।" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-906" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-907" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-908" |
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| oldKey | "BGT_C18_V03" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-909" |
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| oldKey | "BGT_C18_V03_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "'मनीषिणः'' इत्युक्तत्वात् तेप्यनिन्द्याः । अतः 'त्याज्यं दोषवत्'' इत्यस्यार्थः 'सङ्गं त्यक्त्वा फलं च'' इति ॥ ३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-910" |
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| oldKey | "BGT_C18_V04" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-911" |
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| oldKey | "BGT_C18_V05" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-912" |
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| oldKey | "BGT_C18_V06" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-913" |
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| oldKey | "BGT_C18_V06_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "द्रव्ययज्ञादीनां मध्ये स्वोचितो यज्ञो विद्यादानादिषु स्वोचितं दानं स्वोचितं तपश्च सर्वैर्वर्णाश्रमिभिरन्यैश्च कार्यमेवेत्यर्थः । विष्णुनामस्वाध्यायोन्त्यानां सत्योपवासादितपश्च ॥ ५,६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-914" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-915" |
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| oldKey | "BGT_C18_V07_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">सङ्गफलत्यागमृते स्वरूपत्यागः कार्य इति मिथ्याज्ञानाख्यमोहात् । 'स्वयज्ञादीन् परित्यज्य निरयं यात्यसंशयम्'' ।</span>
इति पाद्मे ॥ ७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-916" |
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| oldKey | "BGT_C18_V08" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-917" |
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| oldKey | "BGT_C18_V09" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-918" |
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| oldKey | "BGT_C18_V09_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">मोहं विना दृष्टदुःखमित्येव । दुःखशब्देन केवलमानसम् । कायक्लेशस्य पृथगुक्तेः ।<br/>'दुःखं तु मानसं ज्ञेयमायासो बाह्य उच्यते ।<br/>'दुःखं तु मानसं ज्ञेयमायासो बाह्य उच्यते ।<br/>विशेषस्य विवक्षायामन्यथा सर्वमेव तु'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ॥ ८,९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-919" |
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| oldKey | "BGT_C18_V10" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-920" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-921" |
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| oldKey | "BGT_C18_V11_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म केवलं दृष्टदुःखदम् ।
जन्मान्तरकृते पुण्ये न सज्जेत् सात्त्विकश्चले ।
यः सम्यक् तत्त्वविद् विष्णोस्तदर्पणधियैव तु ।
फलेच्छावर्जितस्तस्य कर्मबन्धाय नो भवेत् ।
बहुलं चेदल्पदोषं यावदेवापरोक्षदृक्'' ॥ इति च ॥ १०,११ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-922" |
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| oldKey | "BGT_C18_V12" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-923" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V12_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अन्येषामिष्टम् । अस्य तु त्यागित्वादेव नेष्टम् ।
'ज्ञानादेर्मोक्षभोग्याच्च नान्यत् स्यात् कर्मणः फलम् ॥ त्यागिनस्तत्त्वसंवेत्तुरन्येषां तदृते फलम्'' ॥ इति च ।
केवलकाम्यकर्मणां फलानपेक्षयाप्यकरणमित्येतावांस्त्यागात् संन्यासस्य विशेष इत्यत्यागिनां प्रतियोगित्वेन न्यासिन उक्ताः । त्यागित्वं तेषामपि ह्यस्ति ।
'परेच्छयापि ये काम्यं कर्म कुर्युर्न तु क्वचित् ।
न्यासिनो नाम तेन्येभ्यः फलत्यागिभ्य उत्तमाः'' ॥ इति च ॥१२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-924" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-925" |
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| oldKey | "BGT_C18_V13_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'कथितं परमं साङ्ख्यं कपिलाख्येन विष्णुना ।
सेश्वरं वैदिकं साक्षाज्ज्ञेयमन्यदवैदिकम्'' ॥ इति च ॥१३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-926" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-927" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-928" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V15_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "अधिष्ठानं शरीरादि ॥ १४, १५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-929" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुदि्धत्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-930" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यस्य नाहङ्कृतो भावो बुदि्धर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-931" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V17_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'स्वातन्त्र्यमीश्वरे वेत्ति नैवात्मनि कदाचन ।
ईश्वराधीनमेवात्मन् स्वातन्त्र्यं तु जडान् प्रति ।
तारतम्येन लक्ष्म्यादेर्जीवान् प्रति च सर्वशः ।
यस्तदर्थं समुत्पन्नो यथा रुद्रो यथा यमः ।
हत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबद्ध्यते ।
अज्ञस्तदर्थं जातोपि ब(व)द्ध्यते दैत्यवद् ध्रुवम् ।
अपरोक्षदृङ्ग् न जातो यस्तदर्थं मुक्तिगं सुखम् ।
ह्रसेत् तस्य परोक्षज्ञः किञ्चिद् दोषेण लिप्यते'' ॥ इति च ।
अस्वातन्त्र्यज्ञानात् हन्मीति भावोप्यस्य नास्तीति न हन्ति । अन्यस्य भावोस्तीति विशेषः । 'बुदि्धर्यस्य न लिप्यते'' इति । रागान्न हन्ति, किन्तु धर्मबुद्ध्या ।
'स्वातन्त्र्यं मन्यमानस्य रागाद् धर्मं च कुर्वतः ।
तन्निमित्तस्तु दोषः स्याद् गुणश्च स्यात् सुकर्मजः'' ॥ इति च ॥१७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-932" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-933" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "'सम्प्रेरयितुरीशस्य कर्मस्वखिलचेतनान् ।
ज्ञातृज्ञेयज्ञानरूपा प्रेरणा सा स एव यत् ।
स्वरूपेणैव नित्या सा विशेषात्मतया भवेत् ।
विशेषोपि स्वरूपेण नित्यश्च स्याद् विशेषतः ।
स्वनिर्वाहकता यस्मान्नानवस्था विशिष्टवत् ।
विशेष्यस्य विशिष्टस्याप्यभेदे(प्य)पि विवादिनि ।
विशेषोस्त्येव नात्रापि ह्यनवस्था कदाचन ।
ज्ञातुरन्योहमिति तु कस्याप्यनुभवो न हि ।
अस्मि ज्ञातैवाहमिति भेदस्तस्मात् तयोः कुतः ।
पश्यामीति विशेषोयमिदानीं मे समुत्थितः ।
इत्याद्यनुभवाद् भेदो न विशेष्यविशिष्टयोः ।
विशेषणं तु द्विविधं विशेषाख्यं तथेतरत् ।
विशेषमणयेद् येन प्रोक्तं तेन विशेषणम् ।
विशेषोपि विशेषस्य स्वस्यैव गमको भवेत्'' ॥ इत्यादि तत्त्वविवेके ।
सङ्ग्रहः पञ्चकारणानां सङ्क्षेपः । अधिष्ठानस्य करणेन्तर्भावात् । दैवशब्दोदितेश्वरस्यैव मुख्यकर्तृत्वात् स्वतन्त्रकर्त्रोः कर्तृशब्देनैवोक्तेः त्रैविध्यम् । कर्म चेष्टा ॥१८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-934" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-935" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V19_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "एवं गुणसङ्ख्याने परमसाङ्ख्यशास्त्रे ॥ १९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-936" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V20" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विदि्ध सात्त्विकम्॥२० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-937" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V20_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "'अस्तित्वाद् भूतनामभ्यः सर्वजीवेभ्य एव यत् ।
मुक्तेभ्योपि पृथक्त्वेन विष्णोः सर्वत्रगस्य च ।
ऐक्येन च स्वरूपाणां प्रादुर्भावादिकात्मनाम् ।
तारतम्येन जीवानां भेदेनैव परस्परम् ।
जडेभ्यश्चैव जीवानां जडानां च परस्परम् ।
तेभ्यो विष्णोश्च सम्यक् तल्लक्षणज्ञानपूर्वकम् ।
ज्ञानं सात्त्विकमुद्दिष्टं यत् साक्षान्मुक्तिकारणम्'' ॥२० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-938" |
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| oldKey | "BGT_C18_V21" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विदि्ध राजसम्॥२१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-939" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">'विष्णोरन्यस्य याथार्थ्यज्ञानं राजसमुच्यते ।<br/>यदि विष्णुं न जानाति यदि वा मिश्रतत्त्ववित् ।<br/>अन्यथाकरणीयत्वात् कार्याख्यं जीवमेव यः ।<br/>अकार्यं ब्रह्म जानाति स एवाखिलमित्यपि । एकजीवपरिज्ञानात् कृत्स्नज्ञोस्मीति मन्यते ।<br/>युक्तिभिर्ज्ञान(युक्तिविज्ञान)राहित्यात् स्वपक्षस्याल्पयुक्तितः ।<br/>अयुक्ततामेव गुणं मन्यते चाल्पदर्शनः ।<br/>अतत्त्वार्थं जगद् ब्रूते तत्त्वार्थज्ञानवर्जनात् ।<br/>स मुख्यतामसज्ञानी ह्येकैकेनापि किं पुनः ।<br/>सर्वैरेतैर्विशेषैश्च युक्तः पापतमाधिकः'' ॥</span>
इति पाद्मे ।
'पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानम्'' इत्यस्य व्याख्यानम्'नानाभावान्'' इत्यादि । सर्वगतमेकमीश्वरं न जानातीत्येतावतैव राजसत्वम् । एकस्य कृत्स्नवज्ज्ञानमेव तामसम् । मुक्तत्वादिरूपेण अन्यथा करणीयत्वात् पराधीनत्वेनाल्पस्य जीवस्य स्वातन्त्र्यादिगुणपूर्णत्वात् कृत्स्नेन ब्रह्मणैक्यज्ञानं च महातामसम् । किं पुनस्तावन्मात्रं सर्वमिति ज्ञानम् । किं पुनस्तत्राप्येकजीवादन्यत् किमपि नास्तीति औतुकं ज्ञानं सर्वमपि तामसम् । किमु तदेवोक्तलक्षणम् । अतत्त्वार्थवत् सदसद्वैलक्षण्याद्यन्यथार्थकल्पनायुक्तमेव तामसम् । किमु तदेवोक्तविशेषणैर्युक्तम् । प्रायोल्पज्ञानमपि तामसम् । अज्ञानबहुलत्वात् किमु तदेवोक्तमिथ्याज्ञानबहुलमित्यपुनरुक्तिः । एकस्मिन् सर्ववज्ज्ञानं कार्ये जीवे पूर्णब्रह्मेति सक्तं ज्ञानं निर्युक्तिकं चातत्त्वार्थकल्पनायुक्तमल्पज्ञानं च पृथक्पृथगपि तामसानीति च । मायावादे त्वेतानि समस्तानि । अन्यत्रापि त्वहैतुकत्वादिकं विरुद्धवादिषु समं सर्वेषु ॥ २१,२२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-941" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥" |
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| text | "अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥२५ ॥" |
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| text | "'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा'' इत्युक्त्वा 'ये मे मतम्'' 'ये त्वेतत्'' इति च तस्य मोक्षसाधनत्वस्याकरणे प्रत्यवायस्य चोक्तेर्भगवदर्पितत्वेन सर्वकर्मकरणं तस्य विष्णोः सर्वपरमत्वज्ञानं च नियतमेवेति ज्ञायते । 'अध्यात्मचेतसा'' इत्युक्तत्वात् तत्स्व(तत्व)रूपयाथार्थ्यज्ञानादि । 'ये तु सर्वाणि'' इत्यस्मिन् श्लोकेध्यात्मचेतस्त्वस्य 'मत्पराः अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्तः'' इति व्याख्यातत्वात् । एवं सर्वमपि भगवद्भक्तियुक्तमेव सात्त्विकम् ।
॥ २३-२५ ॥" |
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| text | "मुक्तसङ्गोनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥" |
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| text | "सर्वस्य भगवदधीनत्वनिश्चयादेवानहंवादी ॥ २६ ॥" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| text | "रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-950" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "'भगवद्भक्तिसामर्थ्यात् प्रकृष्टो न कृतो हि यः ।
स प्राकृतो दीर्घसूत्री कुर्यां पश्चादिति स्मरन्'' ॥ इति शब्दतत्त्वे ।
प्राप्तकालस्य कर्मणो दीर्घकालेनैव कृतिं सूचयन् दीर्घसूत्रीत्यर्थः ।
'अलसो दीर्घसूत्री च सत्त्वयुक् तामसो मतः ।
अयुक्तो राजसः स्तब्धः प्राकृतो नैकृतिः शठः ।
एकैकेनैव दोषेण प्रोक्तस्तामसतामसः ।
दुर्नरत्वं च तिर्यक्त्वं तमश्चैतत्फलं क्रमात्'' ॥ इति च ॥ २८-२९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-951" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुदि्धः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-952" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुदि्धः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-953" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुदि्धः सा पार्थ तामसी॥३२ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-954" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "'किञ्चिद् यथावद् धर्मादीनयथावच्च पश्यति ।
यया बुद्ध्या राजसी सा मिथ्यादृक्त्वेव तामसी'' ॥ इति च ॥३१,३२॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-955" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-956" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-957" |
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| oldKey | "BGT_C18_V34_B01" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "'वैष्णवो भक्तियोगो यस्त(दुक्ता)द्युक्ता सात्त्विकी धृतिः'' । इति च । विहित-विषयैवेत्यव्यभिचारिणी ॥ ३३,३४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-958" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-959" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-960" |
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| oldKey | "BGT_C18_V36_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">'स्वप्नं भयम्'' इत्यादि सर्वनिषिद्धोपलक्षणम् ।<br/>'तत्तत् सात्त्विकमेव स्याद् यद्यद् वृद्धाः प्रचक्षते ।<br/>निन्दन्ति तामसं तत्तद् राजसं तदुपेक्षितम्'' ॥</span>
इति हि भागवते ।
'महात्मानस्तु मां पार्थ'' 'अभयं सत्त्वसंशुदि्धः'' इत्यादिना वृद्धाश्चोक्ताः ॥ ३५, ३६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-961" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यत्तदग्रे विषमिव परिणामेमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुदि्धप्रसादजम्॥३७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-962" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "'विष्णोः प्रसादात् स्वमनःप्रसादात् सात्त्विकं सुखम्'' इति पाद्मे ।
॥३७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-963" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "विषयेंद्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृऽतम्॥३८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-964" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥३९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-965" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-966" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-967" |
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| oldKey | "BGT_C18_V41_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "सत्त्वं जीवजातम् । मुक्तानां गुणातीतत्वात् 'पृथिव्यां दिवि देवेषु वा'' इति विशेषः ।
'यथेष्टं सञ्चरन्तोपि मुक्ता भूम्यादिगा न तु ।
ग्रामस्था अपि न ग्राम्या वैलक्षण्यादि्ध सज्जनाः ।
नराधमास्तामसेषु सात्त्विकास्तत्र राजसाः ।
दैत्यभृत्या महादैत्या मुख्यतामसतामसाः ।
राजसास्तु नरास्तत्र विप्रा राजससात्त्विकाः ।
तत्रस्थशुद्धसत्त्वास्तु परहंसाः प्रकीर्तिताः ।
हंसो बहूदः कुटिको वनस्थो नैष्ठिको गृही ।
क्रमाद् रजोधिका बाह्यं कर्मैषामधिकं यतः ।
धर्माः परमहंसानां ब्राह्मा एव शमादिकाः ।
देवादेः कर्मबाहुल्यं न लिङ्गं रजसः क्वचित् । न हि विष्णोश्चलेत् तेषां मनः कर्मकृतावपि ।
अन्येषां चलचित्तत्वात् प्रायः स्यात् कर्म राजसम् ।
यदि तत् स्मारकं विष्णोर्विद्यात् सात्त्विकमेव तत् ।
धर्मार्थहिंसनाग्निश्च विशेषो ब्रह्मचारिण; ।
पैतृकं चापि यतितो दारास्तु गृहिणस्ततः ।
असर्गो (असङ्गो) ग्राम्यसन्त्यागः पश्वहिंसा गृहस्थतः ।
वनस्थस्य विशेषोयं सर्वेषामितरत् समम्'' ॥ इति च ।
'सात्त्विकाः स्वल्परजसः क्षत्रियाः सत्त्वराजसाः ।
वैश्याः शूद्रा अतिस्वल्पसत्त्वाधिक्येन तामसाः ।
ये तु भागवता वर्णास्तेषां भेदोयमीरितः ।
सत्त्वाधिकः पुल्कसोपि यस्तु भागवतः सदा ।
त्रैविद्यमात्रा विष्णोर्ये सर्वाधिक्ये ससंशयाः ।
अन्याधिक्यं न मन्यन्ते श्रीशाद् राजसराजसाः ।
अज्ञा विष्णौ द्वेषहीनाः सर्वे राजसतामसाः ।
पितृगन्धर्वपूर्वाश्च मुनयो देवता इति ।
सात्त्विकास्त्रिविधास्तत्र श्रेष्ठा एवोत्तरोत्तराः ।
देवा इन्द्रो विरिञ्चाद्या इति त्रेधैव देवताः ।
क्रमोत्तराः शिवो वाणी ब्रह्मा चैवोत्तरोत्तराः ।
सत्त्वसत्त्वमहासत्त्वसूक्ष्मसत्त्वश्चतुर्मुखः ।
तस्माद् यावद् विमुक्तिः स्यान्मुक्तावेवं सुखक्रमः'' ॥ इति च ।
विष्णौ किञ्चिदप्रीतियुक्तास्तामसमध्ये सात्त्विका नराधमा इत्यर्थः । राजसानां मध्ये सात्त्विका एव भागवतविप्रादयः ।
राजसस्थसात्त्विकेष्वेव शुद्धसात्त्विकाः किञ्चिद्रजोयुक्तसात्त्विकाः समरजोयुक्तसात्त्विकाः सत्त्वात् किञ्चिदूनतमोयुक्तसात्त्विका इति वर्णभेदः । सत्त्वप्रधानत्वादेव तानारभ्योत्तरोत्तरं सर्वेपि मोक्षयोग्याः । 'सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम्'' इत्यादेः ।
'सत्त्वाधिको मोक्षयोग्यो योग्योन्धतमसस्तथा ।
तम उत्तरो रजो भूयान् समो वा सृतिपात्रकः'' ॥ इति च ॥ ४०,४१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-968" |
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| oldKey | "BGT_C18_V42" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥४२ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-969" |
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| oldKey | "BGT_C18_V42_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "'शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म (विप्रकर्म) स्वभावजम् ।
एते गुणाः किञ्चिदूना विप्रात् क्षत्रिय एव च ।
अधिका वा ब्राह्मणेभ्यः केषुचिच्चक्रवर्तिषु ।
ऋषयस्त्वेव विज्ञेयाः कार्तवीर्यादयो नृपाः ॥४२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-970" |
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| oldKey | "BGT_C18_V43" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ॥ दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ ४३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-971" |
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| oldKey | "BGT_C18_V43_B01" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| text | "'शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षत्रिये(भ्यो)न्ये गुणा अपि ॥४३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-972" |
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| oldKey | "BGT_C18_V44" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-973" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिदि्धं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिदि्धं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-974" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| text | "यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिदि्धं विन्दति मानवः॥४६ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-975" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| text | "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४७ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-976" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥४८ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-977" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">'क्षत्रियोनब्रह्मगुणो वैश्यः कृष्यादिजीवनः ।<br/>>तत ऊनः शमाद्यैर्यः शुश्रूषुः शूद्र उच्यते ।<br/>अधिकाश्चेद् गुणाः शूद्रे ब्राह्मणादिः स उच्यते ।<br/>ब्राह्मणोप्यल्पगुणकः शूद्र एवेति कीर्तितः ।<br/>नरोपि यो देवगुणो ज्ञेयो देवो नृतां गतः'' ॥ इति च ।नरोपि यो देवगुणो ज्ञेयो देवो नृतां गतः'' ॥ इति च ।<br/>'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य'' इति वचनाच्च क्षत्रियादिष्वपि शमाद्यनुवृत्ति-र्ज्ञायते । न हि शमादिकं विना तस्याभितोर्चनं भवति । सम्यक् शमादिभिरर्चनं ह्यभ्यर्चनम् । न च शमादीन् विना सिदि्धं विन्दति । 'यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यम्'' इत्युक्तत्वाच्च । 'शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इंद्रियनिग्रहः'' इति हि भागवते । न च क्षत्रियादिभिरपि शौचतपःक्षमा(शमा)दिभिर्हीनैर्भाव्यमिति तत्तद्धर्मेषूच्यते । युक्ता ह्येतैः सर्वैर्गुणैर्जनकतुलाधारादयः । अतो युद्धेपलायनमैश्वर्यं च क्षत्रियस्य विशेषगुणौ । तौ, च कृष्यादयः, जीवनार्थं शुश्रूषा, याजनं, जीवनार्थं प्रतिग्रहश्चेत्येत एवान्येषां परधर्माः ।<br/>'शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं दानं च क्षत्रियेधिकाः ।</span>
तद्धीना ब्राह्मणे तस्माद् वैश्ये शूद्रे ततोल्पकाः ।
अध्यापनं च शुश्रूषा जीवनार्थमृते सदा (सताम्) ।
विप्रादिषु क्रमात् ज्ञेयाः शूद्रस्याध्यापनं विना ।
तस्माच्छूद्रोल्पशुश्रूषुः स्वभावाज्जीवनं विना ।
एते नैसर्गिका भावाः स्याद् भावोन्योपि कुत्रचित् ।
बलाद् विरुद्धभावस्तु हेयः स्वाभाविकोपि यः ।
अनिसर्गोपि हि शुभो वर्धनीयः प्रयत्नतः ।
याजनैश्वर्यपूर्वास्तु नान्यैः कार्याः शुभा अपि ।
अपलायनं च शूद्राणां ब्रह्मक्षत्रार्थमिष्यते'' ॥ इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Vyasasmruthi-id">'प्रसह्य वित्ताहरणं शारीरो दण्ड एव च ।<br/>अशिष्याणां शासनं च तथैवार्थविनाशनम् ।<br/>एष ईश्वरभावः स्यान्न कार्यः क्षत्रियेतरैः ।<br/>सर्वे विधर्मिणः शास्याः क्षत्रियैर्यत्नतः सदा ।<br/>अङ्गाद्यहानिकृद् दण्डः शिष्येषु ब्राह्मणादिभिः ।<br/>कार्यो देहेपि शिष्यश्च स्वामिना स्वेन वार्पितः ।<br/>पुत्रानुजादयः सर्वे शिष्या एव निसर्गतः ।<br/>गुरवश्चैव मित्राणि सखिसब्रह्मचारिणः ।<br/>सम्बन्धिनश्च सर्वेपि तत्तद्योग्यतयाखिलैः ।<br/>शिक्षणीयेषु भावेषु शिक्षणीयाः प्रयत्नतः ।<br/>उन्मादे बन्धानाद्यैर्वा ताडनं न गुरोः क्वचित् ।<br/>पापं चरन्तस्त्वन्येपि सर्वैर्दृष्टिपथं गताः ।<br/>शक्तितो वारणीयाः स्युर्देशकालानुसारतः ।<br/>तदुत्तमविरोद्धारः सन्त्याज्या गुरवोपि तु ।<br/>यथाशक्त्यनुशास्यैव कालतोपि न चेच्छुभाः ।<br/>विष्णौ परमभक्तस्तु न त्याज्यः शास्य एव च ।<br/>शिक्षयंश्च गुरून् शिष्यो गुरुवन्नैव शिक्षयेत् ।<br/>महान्तो नानुशास्याश्च विरुद्धाचरिता अपि ।<br/>यदि च स्वोत्तमानां ते विरोधं नैव कुर्वते'' ॥ इत्यादि च ।<br/>'आपत्सु विप्रः क्षात्रं तु विशां वा धर्ममाचरेत् ।<br/>क्षात्रासिद्धौ न शूद्रस्तु विप्रक्षत्रिययोः क्वचित् ।<br/>क्षत्रियो ब्राह्ममापत्सु तदापत्सु विशामपि ।<br/>क्षत्रियो विप्रधर्मापि नैव भैक्ष्यप्रतिग्रही ।<br/>वैश्य आपत्सु शौद्रं तु धर्ममेकं न चापरम् ।<br/>>शूद्र आपत्सु विड्धर्मा तदापत्सु च कारुकः ।<br/>शूद्रस्तु वैश्यधर्मापि नैव वेदाक्षरो भवेत् ।<br/>अत्यापदि क्षत्रियोपि पादशुश्रूषणं विना ।<br/>शौद्रधर्मं चरन् विप्रक्षत्रियेषु न दुष्यति ।<br/>येषु कर्मसु याच्यः स्यात् स्वामिनापि न याचिता ।<br/>शौद्राण्यपि स्वधर्मत्वे क्षत्रियस्यापदो यदि ।<br/>आत्मनश्चेद् बलाधिक्यं सानुबन्धादपि प्रभोः ।<br/>धर्मार्थं सेवतोर्थार्थं विप्रधर्माधिकाद् वरः ।<br/>प्रभुणा याच्यवृत्तिस्तु विशेषेणापि धर्मभाक् ।<br/>बाह्वोर्बलेधिको यः स्यात् क्षत्रियो विद्ययाधिकः ।<br/>विप्रो भागवतौ चैतौ सेशा लोकास्तयोरिमे'' ॥</span>
इति व्यासस्मृऽतौ ।॥ ४४-४८ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-978" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "असक्तबुदि्धः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिदि्धं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-979" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| text | "'नैष्कर्म्यसिदि्धम्'' अनिष्टसर्वकर्मनाशाख्यसिदि्धम् ॥ ४९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-980" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "सिदि्धं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-981" |
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| oldKey | "BGT_C18_V51" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-982" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-983" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Vakshya-id">वक्ष्यमाणप्रकारेण वर्तमानस्तदनन्तरं नैष्कर्म्यसिदि्धं प्राप्तो भूत्वा ब्रह्मा-ख्यायाः महालक्ष्म्याः सकाशं यथाप्नोति तथा निबोध । 'मम योनिर्महद् ब्रह्म'' 'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्'' इत्युक्तत्वात् । 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा'' इत्युक्त्वा 'मद्भक्तिं लभते पराम्''</span>
इति वक्ष्यमाणत्वाच्च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id">'सर्वपापक्षयाद् देहं त्यक्त्वा देवान् क्रमाद् व्रजन् ।<br/>प्राप्य लक्ष्मीं तत्प्रसादात् पुनः स्वृद्धा हरौ यदा ।<br/>भक्तिस्तया पुनर्ज्ञाने स्वृद्धे विष्णुं प्रपद्यते ।<br/>अपरोक्षदृशो विष्णोः शरीरेपि सतः पुरा ।<br/>त्यक्तदेहादिकस्यापि यावद् विष्णुं प्रपद्यते ।<br/>तावद् गुणा विवर्धन्ते स्थिताः स्युः प्राप्य केशवम्'' ॥</span>
इति महावराहे॥ ५०-५२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-984" |
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| oldKey | "BGT_C18_V53" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-985" |
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| oldKey | "BGT_C18_V53_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
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| text | "'विमुच्य निर्ममः शान्तः'' नैष्कर्म्यसिदि्धं प्राप्तो भूत्वा ब्रह्मणि भूयाय भवतीत्यर्थः ॥ ५३ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-986" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-987" |
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| oldKey | "BGT_C18_V55" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "भक्त्या मां अभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-988" |
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| oldKey | "BGT_C18_V56" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-989" |
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| oldKey | "BGT_C18_V56_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "विहितानि सर्वकर्माण्यपि मद्व्यपाश्रयो भूत्वा सदा कुर्वाणः । न हि यथेष्टाचरणे तात्पर्यमत्र । तथा सति विहिताकरणेपि समत्वात् 'मामनुस्मर युद्ध्य च'' 'ततः स्वधर्मं किर्तिं च'' इत्यादिप्रस्तुतविरोधः । अपिशब्दस्त्वेकमपि कर्मातदाश्रयेण न कार्यमित्यर्थे ॥ ५६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-990" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V57" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुदि्धयोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-991" |
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| oldKey | "BGT_C18_V57_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "भगवत्संश्रितस्य त्रैविद्यस्य च चेतसैव विशेष इत्याहचेतसा सर्व-कर्माणीति । स एव सर्वस्मात् परम इति भावोस्येति तत्परः । तत्र चित्तवृत्तिनिरोधोपि यो बुदि्धयोगः प्रत्याहारादिः ॥ ५७ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-992" |
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| oldKey | "BGT_C18_V58" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-993" |
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| oldKey | "BGT_C18_V59" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-994" |
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| oldKey | "BGT_C18_V60" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत्॥६० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-995" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V60_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "प्रकृतिरीश्वरेच्छा । 'प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छानन्त कथ्यते'' इत्यादि-वचनात् । एषा तु 'प्रकृत्यैव च कर्माणि'' इत्यादिष्वपि युज्यते । तस्या एव हि मुख्यतो नियोक्तृत्वं स्वभावकर्मादिभिर्बद्ध्वा ॥ ५९,६० ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-996" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V61" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-997" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V62" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-998" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V63" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-999" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V64" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।
इष्टोसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-1000" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V65" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-1001" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V65_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">तदेवाह ईश्वरः सर्वभूतानामिति ।<br/>'निश्चितार्थः स तु ज्ञेयो यत्रात्मैव परोक्षतः ।<br/>उच्यते विष्णुना यद्वत् तद् ब्रह्मेत्यादि कथ्यते'' ॥</span>
इति शब्दनिर्णये ।
'मन्मनाः'' इत्युपसंहाराच्च ॥६१ ॥ शाश्वतं स्थानं वैकुण्ठादि- 'श्रीरेव लोकरूपेण विष्णोस्तिष्ठति सर्वदा ।
अतो हि वैष्णवा लोका नित्यास्ते चेतना अपि'' ॥ इत्याग्नेये ।
'न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च'' इत्याद्युक्तं च ॥६२ ॥ तत्त्वसारकथनं 'द्वाविमौ पुरुषौ'' इत्यत्रैवोपसंहृतम् । तत्त्वप्रशंसार्थमेव तद्बुदि्धप्रशंसा कृता । अत्र तु साधनसारोपसंहारः सर्वगुह्यतममिति । 'मन्मनाः'' इत्यादेः पूर्वमेवोक्तत्वात् भूय इति । अर्थतस्त्वत्रापि विष्ण्वाधिक्यमेवोक्तं भवति ॥ ६४,६५ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-1002" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V66" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
|---|
| text | "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥" |
|---|
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1003" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V66_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
|---|
| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Mahavishnu-id">अन्यसर्वधर्मान् परित्यज्येत्युक्तशेषत्वेनैव सर्वधर्मानिति वचनम् । 'मामेकं शरणं व्रज'' इत्यपि 'मन्मना'' इत्याद्युक्तनिगमनात्मना तद्व्याख्यानम् ।<br/>'सर्वोत्तमत्वविज्ञानपूर्वं तत्र मनः सदा ।<br/>सर्वाधिकप्रेमयुक्तं सर्वस्यात्र समर्पणम् ।<br/>अखण्डा त्रिविधा पूजा तद्रत्यैव स्वभावतः ।<br/>रक्षतीत्येव विश्वासस्तदीयोहमिति स्मृऽतिः ।<br/>शरणागतिरेषा स्याद् विष्णौ मोक्षफलप्रदा'' ।</span>
इति महाविष्णुपुराणे ।
अनादिजन्मकृतसर्वपापेभ्यः । अत्र प्राप्त्यभावात् । धर्मपरित्यागे पापपरित्यागस्य कैमुत्येनैव सिद्धत्वात् ॥६६ ॥" |
|---|
|
| id | "Bhagavadgitatatparya-1004" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V67" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योभ्यसूयति॥६७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1005" |
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| oldKey | "BGT_C18_V67_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "<span class="gr-reference gr-ref-Sbhbdanirnaya-id">अतपस्कायैव न वाच्यम् । अशुश्रूषवे पुनश्चेति दोषाधिक्यमशुश्रूषोर्दर्शयितुं चशब्दः । एवमभक्ताय कदापि न वाच्यम् । कदाचिदल्पतपसोल्पशुश्रूषोरपि भक्त्याधिक्ये वाच्यं भवतीति कदाचनेति विशेषः । अभक्ताच्च न वाच्यमसूयोरिति तत्रापि चशब्दः ।<br/>'समुच्चये तथाधिक्ये न्यूनत्वे चः प्रयुज्यते'' ।</span>
इति शब्दनिर्णये ।
<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">'अभक्तादपि पापः स्यादसूयुर्दोषदृग् यतः''</span>
इति च पाद्मे ॥६७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1006" |
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| oldKey | "BGT_C18_V68" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1007" |
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| oldKey | "BGT_C18_V69" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥६९ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1008" |
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| oldKey | "BGT_C18_V70" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥७० ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1009" |
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| oldKey | "BGT_C18_V71" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।
सोपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ।
॥७१ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1010" |
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| oldKey | "BGT_C18_V72" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "कच्चिदेतत् श्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1011" |
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| oldKey | "BGT_C18_V73" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "नष्टो मोहः स्मृऽतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1012" |
|---|
| oldKey | "BGT_C18_V74" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1013" |
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| oldKey | "BGT_C18_V75" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "व्यासप्रसादात् श्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात् कथयतः स्वयम्॥७५ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1014" |
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| oldKey | "BGT_C18_V76" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "राजन् संस्मृऽत्य संस्मृऽत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1015" |
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| oldKey | "BGT_C18_V77" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
|---|
| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "तच्च संस्मृऽत्य संस्मृऽत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1016" |
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| oldKey | "BGT_C18_V78" |
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| type | "verse" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | "shloka" |
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| text | "यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥" |
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| id | "Bhagavadgitatatparya-1017" |
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| oldKey | "BGT_C18_V78_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "BGT_C18" |
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| chapter | "BGT_C18" |
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| verseType | null |
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| text | "'सोपि मुक्तः'' 'न च तस्मान्मनुष्येषु'' इत्युक्तेश्च मुक्तानां महत् तारतम्यं ज्ञायते । 'मनुष्येषु'' इति विशेषणात् तत्रापि देवानामाधिक्यं च ।
'मुक्तिर्ज्ञात्वापि विष्णुं स्याच्छास्त्रं श्रुत्वा ततोधिकम् ।
मुक्तौ सुखं तत्पठतस्ततोप्यधिकमिष्यते ।
व्याख्यातुस्तु समं मुक्तौ सुखं नान्यस्य कस्यचित् ।
ततोधिकं तु देवानां मुख्यव्याख्याकृतो यतः'' ॥ इति ॥ ६८-७२ ॥ 'यथेच्छसि तथा कुरु'' इत्याक्षेपपरिहाराय 'करिष्ये वचनं तव'' इत्यनुसरति भगवन्तम् ॥ ७३-७८ ॥ नमस्ते वासुदेवाय प्रेयसां मे प्रियोत्तम ।
समस्तगुणसम्पूर्णनिर्दोषानन्ददायिने ॥ यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेव हि कृतो ग्रन्थोमुना केशवे ॥ निःशेषदोषरहित कल्पाणाखिलसद्गुण ।
भूतिस्वयम्भुशर्वादिवन्द्यं त्वां नौमि मे प्रियम् ॥" |
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